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Monday, November 9, 2009

बड़े दिलवाले प्रभाष जी

आज से लगभग सात साल पहले की बात है जब नामवर सिंह पचहत्तर साल के हुएथे और प्रभाष जोशी की पहल पर देशभर में उनका जन्मदिन- नामवर के निमित्त- मनाया गया था । अब ठीक से याद नहीं है लेकिन दो हजार दो में ही हंस और एक दो जगह पर मैंने इस आयोजन को लेकर कई आलोचनात्मक लेख लिखे थे । ऐसा ही एक लेख हंस में – कारण कवण नाथ मोहे मारा- के शीर्षक से भी छपा था । बात आई गई हो गई थी । अचानक एक दिन फोन की घंटी बजी और जब मैंने उठाया तो उधर से आवाज आई क्या क्या अनंत से बात हो सकती है । मेरे जबाव देने पर फिर आवाज आई प्रभाष जोशी बोल रहा हूं । मैंने आदरपूर्वक नमस्कार किया तो उन्होंने कहा कि – बेटा हमीं पर शुरू हो गए । मैं डर से चुप रहा । चंद पलों के सन्नाटे के बाद प्रभाष जी ने ठहाका लगाया और कहा जमकर लिखते रहो और डरो मत । अगर तुम्हारी कलम में ताकत है और बगैर किसी पूर्वग्रह के लिख रहे हो तो बेखौफ अपनी बात रखो । फिर हाल चाल पूछा, परिवार में कौन लोग हैं यह दरियाफ्त करने के बाद फोन रखते हुए कहा कि जब वक्त मिले मिलना । फोन रखने के बाद मैं सिर्फ यह सोचकर खुश हो रहा था कि मेरे लेख का प्रभाष जी ने नोटिस लिया और फोन कर मुझे इस बात का एहसास भी करवाया । बात आई गई हो गई ।
दो साल बाद प्रभाष जी से मेरी दूसरी मुलाकात पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के घर पर हुई । वी पी सिंह के घर कुछ साहित्यकारों और पत्रकारों की मुलाकात और गपशप का एक कार्यक्रम रखा गया था और प्रभाष जी समेत कई लोग वहां पहुंचे थे । ऑफ व्हाइट धोती कुर्ता पहने प्रभाष जी जब लोगों से मिलजुलकर खड़े तो तो मैं भी हिम्मत कर उनके पास पहुंचा और अपना परिचय दिया । झट से उन्होंने नामवर सिंह से कहा कि देखो यही हैं अनंत विजय जिन्होंने नामवर के निमित्त पर हंस में लेख लिखा था । नामवर जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं जानता हूं कि आजकल ये साहित्य के मैदान में तलवारबाजी कर रहे हैं । मैं तो अंदर ही अंदर इस बात से खुश हो रहा था कि दो साल बाद भी प्रबाष जी को मेरा लिखा याद है और दूसरे यह कि नामवर सिंह जैसे दिग्गज मुझे मेरे लेख से पहचानते हैं । खुशी से मैं फूला नहीं समा रहा था । फिर प्रभाष जी ने मेरा हौसला बढ़ाया और कहा कि लिखते रहो लेकिन सिर्फ यह बात ध्यान में रखना कि कोई तुम्हारा इस्तेमाल कर अपना हित ना साध ले । इस बीच मुझे उनकी किताब हिंदू होने का धर्म मिल चुकी थी और मैंने उसके संदर्भ में कई बातें प्रभाष जी से पूछी और जानी । उन्होंने मुझे इंडियन साधूज पढ़ने की सलाह दी । लेकिन बाद में कई बार उनसे स्टूडियो में उनसे मुलाकात हुई लेकिन गंभीर बातचीत का अवसर नहीं मिला जो अब कभी मिल भी नहीं पाएगा क्योंकि 5 नबंवर की रात प्रभाष जी हम सब को छोड़कर चले गए ।
कुछ दिनों पहले प्रभाष जी ने एक बेवसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वो अपनी आत्मकथा लिखना चाहते हैं । प्रभाष जी ने उसका शीर्षक दे भी दिया था – ओटत रहे कपास । लेकिन मासूम नहीं कि वो कितना कपास ओट पाए । अगर उन्होंने लिख दिया होगा तो यह किताब बेहद दिलचस्प होगी, भाषा औक कंटेंट दोंनों के लिहाज से । क्योंकि प्रभाष जी भाषा के साथ खेलते थे । प्रभाष जी को इस बात का श्रेय जाता है कि जब उन्होंने जनसत्ता का संपादन संभाला तो अखबारों की भाषा बेहद शास्त्रीय हुआ करती थी और संपादकों में यह हिम्मत नहीं थी कि वो भाषा को जनोन्मुख बना सकें । प्रबाष जी ने यह साहस दिखाया और अखबारों की भाषा के व्याकरण को आमूल चूल बदल दिया । बाद में इस तरह की भाषा का अनुसरण अखबारों ने और टीवी चैनलों ने अपनाया । न्यूज चैनल में काम करनेवाले हमारे मित्र यह जानते हैं कि बार-बार उनसे कहा जाता है कि आम आदमी की भाषा लिखो । प्रभाष जी ने अप्रैल 1992 से जनसत्ता में अपना साप्ताहिक कॉलम शुरू किया- कागद कारे । कुछ हफ्तों को छोड़कर यह कॉलम चलता रहा और इस कॉलम को पढनेवाले यह जानते हैं कि प्रभाष जी ने हिंदी में लोकभाषा को किस तरह मिलाकर भाषा का एक नया मुहावरा गढा और उसे पाठकों के बीच स्वीकार्य ही नहीं बनाया बल्कि लोकप्रिय बनाकर स्थापित भी किया । और उनकी इसी भाषा के चलते रामनाथ गोयनका ने प्रभाष जी को अपने साथ जोड़ा और पहले प्रजानीति फिर इंडियन एक्सप्रेस फिर बाद में जनसत्ता का संपादक बनाया ।
प्रभाष जी ने पत्रकारिता की शुरुआत नई दुनिया अखबार से की । लेकिन फिर दिल्ली आ गए और अपनी भाषा और पत्रकारिता के नए तौर तरीके के बलबूते ना केवल खुद को स्थापित किया बल्कि पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी ही खड़ी कर दी जिसे लोग प्रभाष जोशी स्कूल ऑप जर्नलिज्म कहने लगे । प्रबाष जोशी पत्रकार के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी थे । जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई तो प्रभाष जी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के साथ हो लिए और बेहद सक्रिया के साथ इमरजेंसी का विरोध किया। उस दौर में लोग ये कहते थे कि दो ही संपादक इंदिरा गांधी के निशाने पर हैं मुलगांवकर और प्रभाष जोशी । बाद में यह साबित भी हुआ और प्रभाष जोशी को जयप्रकाश के समर्थन की कीमत भी चुकानी पड़ी । लेकिन संघर्ष के उन दिनों ने प्रभाष जोशी ने जमकर अध्ययन किया, जिसका असर बाद के दिनों में उनके लेखन पर दिखाई दिया । प्रभाष जोशी के लेखन का रेंज बहुत व्यापक था । वो समान अधिकार से राजनीति, फिल्म, खेल और साहित्य पर लिख सकते थे । बहुत कम लोगों को यह बात पता होगी कि प्रभाष जी ने फिल्म पर एक पत्रिका का संपादन भी किया था । वो लंदन के अखबार में भी काम कर चुके थे । हिंदी साहित्या का भी प्रभाष जी ने गहन अध्ययन किया था और गाहे बगाहे उसपर अपनी राय भी जाहिर करते रहते थे लेकिन आज जब प्रबाष जी नहीं रहे तो ऐसा लगता है कि हिंदी की एक ऐसी आवाज खामोश हो गई जो लगातार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नकली और आक्रामक तत्वों के बरक्स हिंदू होने के असली धर्म और मर्म को उभार रहा था ।

1 comment:

गुस्ताख़ said...

शून्य आ गया है, प्रभाष जी के जाने से...हमारी श्रद्धांजलि...