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Sunday, July 22, 2012

लेखकों की राजनीति


मध्य प्रदेश का भारत भवन अपने स्थापना काल से ही विवादों में रहा है । हिंदी के वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी की पहल पर भोपाल में बना यह साहित्य और संस्कृति का केंद्र एक बार फिर से विवादों में घिर गया है । इस बार विवाद की वजह है हिंदी के प्रगतिशील और जनवादी लेखक संगठनों से जुड़े तीन लेखकों की वो अपील जो उन्होंने जनवादी-प्रगतिवादी लेखक संगठनों से जुड़े कॉमरेड लेखकों से की है । इस अपील में इन संगठनों और विचारधारा से जुड़े साथी लेखकों से अनुरोध किया गया है कि वो भारत भवन, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद, उर्दू अकादमी समेत मध्य प्रदेश के कई सरकारी संस्थानों के कार्यक्रमों का बहिष्कार करें । इस अपील में दलील दी गई है कि मध्य प्रदेश की वर्तमान सरकार की अन्यथा स्पष्ट सांस्कृतिक नीतियों की वजह से इन संस्थानों का और साथ ही प्रदेश की मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला सृजनपीठों का, वागर्थ, रंगमंडल आदि विभागों का पुछले आठ नौ सालों में सुनोयोजित तरीके से पराभव कर दिया गया । अब यहां सवाल यह उठता है कि अगर पिछले आठ नौ सालों से ये सुनियोजित साजिश चल रही थी तो अब तक लेखक और लेखकों के संगठन चुप क्यों बैठे थे । क्या जनवादी और प्रगतिशील पत्रिकाओं में मध्यप्रदेश शासन का विज्ञापन नहीं छपता रहा है । दरअसल मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आते ही इन लोगों को इन संस्थाओं के पतन और पराभव की याद आने लगी । चाहे वो प्रगतिशील लेखक संगठन हों या फिर जनवादी लेखक संगठन इनके सदस्यों का ना तो अपना कोई वजूद है ना तो अपनी कोई सोच ना ही अपनी कोई लाइन । हर तरह के कार्यक्रमों के लिए साहित्य के ये संगठन अपने राजनीतिक आकाओं का मुंह जोहते हैं और इतिहास इस बात का गवाह है प्रगतिशील लेखक संगठन और जनवादी लेखक संगठन से जुड़े लेखक हमेशा से सीपाआई और सीपीएम की विचारधारा के ही पोषक और प्रचारक रहे हैं । दरअसल अगर हम इस अपील को ठीक से पढ़ें और उसकी पड़ताल करें तो इसमें कुछ और खेल नजर आता है ।
इस अपील में लिखा गया है कि हमारा विरोध किसी राजनैतिक अनुशंसा से उतना नहीं है जितना क्योंकि व्यवस्था में इन पदों पर पहले भी राजैनतिक अनुशंसाओं ले लोग नामित किए जाते रहे हैं लेकिन वे सब असंदिग्ध रूप से हमारे समकालीन साहित्य के मान्य, समादृत हस्ताक्षर रहे हैं । इस वाक्य के बाद लेखकों की एक सूची दी गई है जिसमें वामपंथी विचारधारा के बाहर के भी कुछ लोगों के नाम शामिल कर अपील की साख को बढ़ाने की कोशिश की गई है । लेकिन इन तीन लोगों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि जब अशोक वाजपेयी भारत भवन के कर्ता-धर्ता थे तो इन्हीं संगठनों से जुड़े लेखकों ने वाजपेयी पर जोरदार हमले किए थे । उन हमलों को अभी हिंदी साहित्य जगत भूला नहीं है । अशोक वाजपेयी का दोष तब इतना था कि उन्होंने भारत भवन पर कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा लहराने से मना कर दिया था । लिहाजा उन पार्टियों से जुड़े लेखकों ने अशोक वाजपेयी औऱ उनसे जुड़े लेखकों को कलावादी कह किनारा लगाने की लगातार कोशिश की। उनको कल्चरल माफिया कहा गया तो भारत भवन को संस्कृति का अजायबघर । अशोक वाजपेयी के साथियों को अष्टछाप कह कर उनका मजाक उड़या गया । यही काम इन संगठन से जुड़े लेखकों ने हिंदी के हिरामन लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ भी किया और अब भी कर रहे है । भारत भवन के कामकाज में निसंदेह गिरावट आई है । जिस उद्देश्य के लिए उसकी स्थापना की गई थी उससे वह भटक गया है । लेकिन आठ सालों तक उसके कार्यक्रमों में दीप प्रजज्वलित करने और सक्रिय हिस्सेदारी के बाद चुनाव के वक्त उसका गिरता स्तर याद आना अपीलकर्ताओं की मंशा को संदेहास्पद बना रही है । अपीलकर्ताओं ने जो ईमेल अखबारों और लेखकों को भेजा है उसमें बार बार राजनीतिक भावना से काम न करने की सफाई दी है । बार-बार सफाई देना ही उस संदेह को बढ़ाने का पर्याप्त आधार है ।
दरअसल प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ दोनों लेखकों के बड़े समुदाय से कट गए है । लेखकों की बेहतरी और उनके कल्याण के लिए उनके पास कोई ठोस योजना नहीं है । उनका काम सिर्फ लेखकों की मौत पर शोकगीत लिखना रह गया है । हिंदी के वरिष्ट कथाकार अरुण प्रकाश का जब  निधन हुआ था तो उनके पड़ोस में रहनेवाले जनवादी और प्रगतिशील संगठनों से जुड़े उनके साथी लेखकों के पास उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने का वक्त नहीं था । दुख की उस घड़ी में परिवार के साथ खड़े होने से ज्यादा जरूरी उन संगठनों को सारे अखबारों को शोक संदेश प्रेषित करना लगा । जो लेखक अरुण प्रकाश के घर से चंद मीटर की दूरी पर रहते थे उनके दुख का पता अखबारों से चला । प्रचारप्रियता की पराकाष्ठा । दरअसल इन संगठन से जुड़े लेखक अब लेखक रहे नहीं वो पूरे तौर पर नेता हो गए हैं और उन्हीं की तरह के राजनीतिक दांव-पेंच चलते हैं । नेताओं की तरह का व्यवहार भी करते हैं और उनका वर्गचरित्र भी नेताओं वाला ही हो गया है । लेखकों का काम लिखना है राजनीति करना नहीं । इन लेखक संगठनों ने लेखकों को राजनीति करना सिखा दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि उनसे जुड़े लेखकों की साख नेताओं की तरह संदिग्ध हो गई । लेखक अपने पाठकों से और रचनाओं से दूर होते चले गए । आज हालात यह है कि हिंदी समाज चंद लेखकों को छोड़कर किसी को जानता नहीं है, जानते हैं साहित्य की दुनिया में आवाजाही करनेवाले चंद लोग । लेखक संगठनों ने लेखकों को राजनीति के ऐसे दलदल में ढकेल दिया था कि जितना वो उससे निकलने की कोशिश करते थे उतना ही उसमें फंसते चले गए ।
मध्यप्रदेश के ये तीन कवि जो अपने सूबे की संस्थाओं के गिरते स्तर और पतनशीलता पर जार-जार हो रहे हैं उनको साथी लेखिका तसलीमा नसरीन का दर्द याद नहीं आता है । तसलीमा हर दिन घुट रही है लेकिन उसके लिए क्या कभी कोई प्रयास किया गया । एम एफ हुसैन के लिए बुक्का फाड़ विरोध करनेवाले इन लेखक संगठनों ने सलमान रश्दी के भारत आने पर मुल्लाओं के विरोध में चुप्पी साध ली थी । वजह बहुत साफ है उसको कहने की आवश्यकता नहीं है । जनवादिता और प्रगतिशीलता जब अपने आपको एक दायरे में समेट लेती है या विरोध या प्रशंसा का पैमाना विचारधारा और परोक्ष रूप से विचारधारा के लिए वोट जुटाना हो जाता है तो लेखकों का व्यवहार राजनेताओं सरीखा हो जाता है । लेखन से ज्यादा राजनीति करने का नतीजा यह होता है कि पाठकों के बीच उनकी साख कम से कमतर होती चली जाती है । आज संस्थाओं से ज्यादा जरूरी, गंभीर और बुनियादी समस्याएं लेखकों के सामने हैं । आज हिंदी में किताबों की उपलब्धता, हिंदी समाज के फैलाव के बावजूद साहित्यिक किताबों की कम बिक्री, लेखकों की रॉयल्टी, लेखकों की सहायता के लिए आकस्मिक कोष की कमी जैसी समस्याएं हैं जिनपर तवज्जो की जरूरत है । लेखक संगठन के कर्ताधर्ताओं और उनसे जुड़े लेखकों को इनपर ध्यान देना चाहिए और हालात की बेहतरी के लिए काम करना होगा । लेकिन इन समस्याओं को लेकर कभी हल्ला-गुल्ला नहीं मचता, कोई आंदोलन नहीं होता , कभी कोई अपील नहीं जारी की जाती । इसकी वजह है कि उससे कोई दलगत हित नहीं सधता । जरूरत इस बात की है कि इन मुद्दों पर गंभीर विमर्श हो वर्ना लेखक समुदाय एक दिन मृतप्राय लेखक संगठनों का शोकगीत लिख डालेंगे ।