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Saturday, November 3, 2012

नीतीश पर साख का संकट

बिहार में सुशासन के रथ पर सवार होकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे नीतीश कुमार की सूबे में हनक कम होती दिखाई देने लगी है । बिहार से जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे लगता है कि नीतीश कुमार के सुशासन का तिलिस्म दरकने लगा है । पहले मधुबनी में अफवाह की वजह से हिंसा और फिर पुलिस फायरिंग में मौत, उसके बाद पटना में दिन दहाड़े बमबाजी और अब उनकी पार्टी से जुड़े पूर्व विधायक और जेल में बंद बाहुबलि मुन्ना शुक्ला पर एक इंजीनियरिंग कॉलेज के एमडी से दो करोड़ की रंगदारी मांगने का मामला । सूबे के आला पुलिस अधिकारी ये मानते हैं कि प्रथम दृष्टया मुन्ना शुक्ला पर केस बनता है बावजूद इसके पटना की सड़कें मुन्ना शुक्ला के पोस्टरों से भरी है । ये दो करोड़ की फिरौती नीतीश कुमार के बहुप्रचारित अधिकार रैली के लिए मांगे जाने का आरोप है । लेकिन मुख्यमंत्री इस पूरे मामले में कानून अपना काम करेगा की मुगली घुट्टी पिलाकर अपना पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं । अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क  रहे नीतीश कुमार का किसी तरह की कार्रवाई नहीं करना हैरान करता है । इसके पहले बिहार के खगड़िया में भी नीतीश की यात्रा के दौरान जब विरोध प्रदर्शन हुआ तो वहां के बाहुबलि नेता और जेडीयू विधायक के पति रणबीर यादव ने पुलिस वालों के हाथ से गन लेकर फायरिंग की और फिर विरोध करनेवालों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा । इस घटना की फुटेज कई दिनों तक बिहार के न्यूज चैनलों की सुर्खियां रहीं । रणबीर के खिलाफ कोई कार्रवाई ज्ञात नहीं है ।
अधिकार रैली के नाम पर जिस तरह से पटना की सड़कों पर बाहुबलियों के पोस्टर लगे हैं उससे ये लगता है कि नीतीश कुमार भी ये समझने लगे हैं कि बगैर बाहुलबलियों की मदद से रैली में भीड़ नहीं जुटाया जा सकता है । बिहार में पूर्व की रैलियों के व्याकरण को अगर समझने की कोशिश करें तो ये तस्वीर और साफ हो जाती है । नीतीश कुमार को चुनावों में जनता का अपार समर्थन मिला लेकिन पिछले दिनों उनकी यात्रा के दौरान जिस तरह से कई जगहों पर उनको काले झंडे दिखाए गए क्या उससे नीतीश का आत्मविश्वास हिल गया है । प्रतीत यही होता है और इसी हिले हुए आत्मविशवास का नतीजा है कि अपराधी और आपराधिक छवि के नेताओं की अधिकार रैली में मदद ली जा रही है । नहीं तो कोई वजह नहीं है कि पटना की सड़कों पर लगे होर्डिंग में नीतीश कुमार से बड़ी तस्वीरें अनंत सिंह और मुन्ना शुक्ला की लगी है ।
अपराधियों और बाहुबलियों के समर्थन से अधिकार रैली में भीड़ जुटाकर नीतीश हो सकता है अपनी ताकत का एहसास करवा दें लेकिन उससे उनकी लोकप्रियता में इजाफा होगा इसमें संदेह है । नीतीश कुमार बिहार में एक ऐसा नेता के तौर पर उभरे और स्थापित हुए जो अपराध और अपराधियों से नफरत करता था लेकिन अपनी राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के लिए इन दिनों वो जिस तरह से अपराधिक छवि के दागदार नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे हैं उससे उनकी इस छवि को बट्टा लग रहा है । इसके पहले नीतीश कुमार ने अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के नतीजे देने वाले कदम उठाए । फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर अपराधियों को सलाखों के पीछे भिजवाने के बाद से बिहार में कानून का राज कायम होता दिखने लगा था । सैयद शाहबुद्दीन से लेकर पप्पू यादव जैसे बाहुबलियों को भी कानून और पुलिस की ताकत का एहसास करवा दिया गया था । सभी पार्टियों में मौजूद बाहुबलियों ने अपने आपको संयमित और नियंत्रित कर लिया था । लेकिन हाल के दिनों में फिर से वो संयम और नियंत्रण के खोल से बाहर निकलकर दबंगई पर उतारू हैं । राष्ट्रीय जनता दल के नेता ब्रजबिहारी की हत्या की सजा काट रहे मुन्ना शुक्ला की रैली के लिए दो करोड़ की रंगदारी मांगना इसी ओर संकेत करता है । लालू यादव के शासन काल में जेल में रहकर भी अपराधी अपना गिरोह बखूबी संचालित करते थे लेकिन नीतीश के आने के बाद से ये धंधा बंद हो गया था ।
दरअसल हमें इसको कानून व्यवस्था की समस्या के अलावा भारतीय राजनीति में आ रहे गिरावट और जनप्रतिनिधियों के लिए संविधान में समानता के मिले अधिकार को भी परखना होगा । भारत के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है लोकसभा और विधानसभा में जीतकर आने वाले जनप्रतिनिधियों, जिनपर शासन चलाने की जिम्मेदारी होती है, के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं है । हर वयक्ति चाहे वो शैक्षणिक, चारित्रिक या अन्य रूप से चाहे जितना अक्षम हो उसे रोका नहीं जा सकता । हमारा संविधान सबको बराबरी का हक देता है । हम देश की बेहतरी की बात तो करते हैं लेकिन क्या हमने कभी देश को बेहतर तरीके से चलानेवालों के लिए कोई आर्हता तय की है । राजेन्द्र बाबू के मुताबिक संविधान में ऐसा प्रावधान इस वजह से नहीं हो सका क्योंकि किसी पश्चिमी देश में इस तरह का प्रावधान नहीं है और हमारा संविधान पश्चिम के कई देशों के संविधान का कॉकटेल है । राजेन्द्र बाबू ने इस बात की जोरदार वकालत की थी संविधान में इस तरह का प्रावधान होना चाहिए । लेकिन उन्होंने जनप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम आर्हता तय नहीं कर पाने के लिए उस वक्त के नेताओं की सोच को जिम्मेदार माना था । इस तरह की बात को संविधान में शामिल नहीं कर पाने के लिए राजेन्द्र बाबू उस वक्त के नेताओं के पश्चिमी देशों के प्रभाव में फैसले लेने की मानसिकता को जिम्मेदार ठहराते हैं । उनका मानना था कि इस तरह की मानसिकता पश्चिमी देशों की शिक्षा से बनी थी ।
लेकिन अब वक्त आ गया है कि राजेन्द्र बाबू के कथन पर गंभीरता से विचार हो और चरित्रवान और विषेषज्ञों के हाथ में सत्ता सौंपने का उपक्रम किया जाना चाहिए । नीतीश कुमार जैसे नेताओं से राजनीति में शुचिता की उम्मीद जगी थी लेकिन जिस तरह से क्षणिक सफलता के लिए नीतीश ने इन दिनों बाहुबलियों को बढ़ावा दिया है उससे शुचिता की ये उम्मीद तार तार हो गई है । यहां सवाल ये उठता है कि क्या अपनी अधिकार यात्रा के दौरान जनता के गुस्से और विरोध से नीतीश कुमार का जनसमर्थन से विश्वास हट गया और वो लालू यादव की राह पर चलने की सोचने लगे । लालू यादव ने भले ही पंद्रह वर्षों तक बिहार पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राज किया हो लेकिन जनता ने वक्त आने पर उनको उनकी जगह दिखा दी । नीतीश कुमार लालू यादव की राह की ओर बढते दिख रहे हैं लेकिन उन्हें लालू यादव का हश्र भी नहीं भूलना चाहिए । लालू यादव को एक समय बिहार की जनता मसीहा के तौर पर देखती थी लेकिन सिर्फ राजनीति में अपराध और अपराधियों के घालमेल ने उन्हें बिहार की राजनीति में हाशिए पर पहुंचा दिया । नीतीश कुमार के लिए अब भी वक्त है कि वो अपनी इल गलती को सुधारें और बिहार की जनता ने जिस उम्मीद और अपेक्षा के साथ उनको शासन की बागडोर सौंपी थी उसको कायम रखें नहीं तो उनके भी राजनीति के बियावान में गुम हो जाने का खतरा है ।

2 comments:

संगीता पुरी said...

सुंदर विश्‍लेषणात्‍मक आलेख ..

Manu Tyagi said...

ये तो होना ही था