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Sunday, March 30, 2025

रजतपट की पहली रानी


कौन जानता था कि 1933 के उत्तरार्ध में लंदन से भारत आनेवाले दो युवा भारतीय हिंदी फिल्मों की दिशा बदलनेवाले साबित होंगे। ये दोनों थे हिमांशु राय और देविका रानी। हिमांशु राय और देविका रानी ने ना केवल भारत में फिल्म स्टूडियो की नींव रखी बल्कि उनको व्यावसायिक तरीके से चलाया भी। बांबे टाकीज ने हिंदी फिल्मों को कई चमकदार सितारे दिए। एक तरफ जहां हिमांशु राय ने अशोक कुमार के अंदर फिल्म अभिनेता बनने की संभावनाएं देखीं। उनको अपनी फिल्म में काम देकर सफलतम अभिनेताओं में एक बनने का अवसर प्रदान किया। वो अशोक कुमार जिनकी मां ने उनको लड़कियों से दूर रहने की हिदायत दी थी, वो अशोक कुमार जो अपनी पहली फिल्म में अपनी अभिनेत्री के गले में हार नहीं पहना पा रहे थे क्योंकि वो इस बात पर नर्वस थे कि हीरोइन उनको छू न दे। इसी तरह से देविका रानी ने हिंदी फिल्म को दिलीप कुमार जैसा अभिनेता दिया। अपने पति हिमांशु राय के निधन के बाद देविका रानी बांबे टॉकीज चला रही थीं। फिल्म ‘किस्मत’ को लेकर अशोक कुमार और अमिय चक्रवर्ती में विवाद हुआ और अशोक ने बांबे टॉकीज छोड़ दिया। ये बांबे टॉकीज के लिए बड़ा झटका था। जब अशोक कुमार बांबे टॉकीज छोड़ गए तो देविका रानी किसी नए हीरो की खोज में जपुट गईं। कई जगह इस बात की चर्चा मिलती है कि देविका रानी ने दिलीप कुमार को नैनीताल के फल मार्केट में देखा। वहीं उनको मुंबई में मिलने को कहा। परंतु दिलीप कुमार अपनी आत्मकथा, ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में अलग ही कहानी बताते हैं। एक दिन बांबे (अब मुंबई) के चर्चगेट पर उनकी भेंट मनोविज्ञानी डा मसानी से होती है। बातों बातों में डा मसानी ने बताया कि वो बांबे टॉकीज की मालकिन से मिलने जा रहे हैं। दिलीप कुमार जो तब युसूफ खान थे, मसानी के साथ हो लिए। मसानी ने युसूफ खान का परिचय देविका रानी से  करवाया और साथ लाने का उद्देश्य बताया। देविका रानी ने युसूफ से पूछा क्या आप उर्दू जानते हैं। फिर पूछा कि क्या आप सिगरेट पीते हैं और अगला प्रश्न था कि क्या कभी अभिनय किया है।  सभी उत्तर सुनने के बाद देविका रानी ने पूछा कि क्या आप अभिनय करना चाहते हैं। जवाब आया हां। देविका रानी ने युसूफ खान के सामने 1250 प्रतिमाह के वेतन का प्रस्ताव दे दिया। उनको इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था कि 1250 प्रतिमाह वेतन मिलेगा। ये वो समय था जब हीरो मासिक वेतन पर काम किया करते थे। अगले दिन जब वो काम पर पहुंचे तो देविका रानी ने युसूफ खान का नाम बदलने का प्रस्ताव किया। उन्होंने युसूफ खान के सामने तीन नाम रखे- जहांगीर, वासुदेव और दिलीप कुमार। देविका रानी को दिलीप कुमार नाम पसंद था क्योंकि ये अशोक कुमार से मिलता जुलता था। जाहिर सी बात है कि दिलीप कुमार के नाम पर ही सहमति बनी। 

लंदन से भारत लौटने के तीन साल बाद देविका रानी ने अशोक कुमार के साथ अछूत कन्या फिल्म की। स्वाधीनता संग्राम के इस दौर में अस्पृश्ता पर गांधी निरंतर प्रहार कर रहे थे। ऐसे समय में अछूत कन्या फिल्म ने इस विमर्श को बल दिया। माना जाता है कि देविका रानी के अभिनय के कारण ये फिल्म बेहद सफल रही थी। आज भी इसको क्लासिक फिल्म माना जाता है। कुछ फिल्म समीक्षकों ने तो देविका रानी के इस रोल की तुलना ग्रेटा गार्बो के अभिनय से की थी। ये अकारण नहीं है कि देविका रानी को हिंदी फिल्मों में वही रुतबा हासिल है जो हालीवुड में ग्रेटा गार्बो को है। इस फिल्म की एक और विशेषता रही है। इसमें देविका रानी और अशोक कुमार ने गाना भी गाया है। इन्होंने अलग अलग भी अपने गाने गाए और देविका रानी और अशोक कुमार का एक युगल गीत भी है, मैं बन की चिड़ियां...। इस गाने की रिकार्डिंग के समय काफी दिक्कत हुई थी। अशोक कुमार और देविका रानी को जिस तरह से म्यूजिक डायरेक्टर सरस्वती देवी गवाना चाहती थीं वो हो नहीं पा रहा था। इसके अलावा 1937 में देविका रानी ने एक और फिल्म में अभिनय किया था जिसका नाम है सावित्री। इस फिल्म में भी देविका रानी का अभिनय उत्कृष्ट रहा। सावित्री और सत्यवान की कहानी हमारे देश के लोक में व्याप्त है। उस रोल को पर्दे पर सफलतापूर्वक निभाना बड़ी चुनौती थी। देविका ने वो चुनौती स्वीकार की। 1933 में पहली फिल्म कर्मा से आरंभ करें तो देविका रानी के खाते में 15 फिल्में हैं लेकिन बांबे टाकीज में हिमांशु राय के साथ उनका काम बहुत महत्वपूर्ण है। देविका रानी ने स्वभाव से बेहद बिंदास और खुले विचारों की थीं। हिमांशु राय से प्रेम विवाह किया। बांबे टाकीज के दौरान एक साथी कलाकार के साथ उनका नाम जुड़ा। हिमांशु के निधन के बाद फिर उन्होंने विवाह किया और कुछ समय तक बांबे टाकीज को चलाया। उसके बाद कुछ दिनों तक मनाली में रहीं और फिर बेंगलुरू के पास अपने फार्म हाउस में अपना जीवन बिताया। जब दादा साहेब फाल्के पुर्साकर की स्थापना हुई तो पहले पुरस्कार के लिए देविका रानी का चयन हुआ। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से भी अलंकृत किया। 


Saturday, March 29, 2025

इतिहास में दौड़ते कल्पना के घोड़े


समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सदस्य रामजीलाल सुमन के राणा सांगा और बाबर पर संसद में दिए बयान पर बवाल मचा हुआ है। सुमन ने कहा था कि राणा सांगा ने बाबर को भारत पर हमले के लिए आमंत्रित किया। वो इतने पर ही नहीं रुके बल्कि राणा सांगा को लेकर एक अभद्र टिप्पणी भी कर दी। इस बयान के बाद समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगी दलों से समानुभूति रखने वाले बौद्धिकों ने इसको उचित ठहराना आरंभ कर दिया। चैटजीपीटी और एआई के सहारे ये साबित करने की कोशिश की जाने लगी कि इस प्रसंग का उल्लेख बाबर ने अपने संस्मरणों की किताब बाबरनामा में किया है। अनुदित बाबरनामा की प्रामाणिकता को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। आगे बढ़ने से पहले बाबरनामा के बारे में थोड़ी चर्चा कर लेते हैं। बाबरनामा तुर्की भाषा में लिखा गया था। 1590 में अकबर के शासनकाल के दौरान अब्दुरर्हीम खानखाना ने इसका फारसी में अनुवाद किया। 1826 में इसका अंगेजी में अनुवाद हुआ जिसको लायडन और इर्सिकन ने किया। इसके बाद फ्रांसीसी भाषा में भी इसका अनुवाद हुआ। ये सभी अनुवाद मूल से नहीं होकर फारसी से हो रहे थे। इसके बाद ए एस बेवरेज ने मूल तुर्की से अंग्रेजी में अनुवाद किया जो अपेक्षाकृत प्रामाणिक माना गया। मजे की बात ये है कि बाबरनामा में राणा सांगा का उल्लेख उस समय नहीं होता है जब बाबर भारत पर बार-बार आक्रमण कर रहा था। बाबरनामा में 1519 से लेकर 1525 तक की एंट्री नहीं है या वो उपलब्ध नहीं है। कुछ भाषा के अनुवाद में राणा सांगा का प्रसंग नहीं है लेकिन जिसमें है वो पुस्तक में बहुत बाद में आता है। जहां लिखा गया कि राणा सांगा ने बाबर के पास एक दूत भेजा था और कहा था कि आप उत्तर से आक्रमण करो हम पश्चिम से करेंगे। लेकिन इस दूत वाली कहानी की प्रामाणिकता पर कई इतिहासकार संदेह जता चुके हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रकाशित पुस्तक मध्यकालीन भारत, जिसकी भूमिका सैयद नुरुल हसन ने लिखी है, में इस बात का उल्लेख है कि- ‘तारीख के बारे में निश्चयपूर्वक भले ही न कहा जा सके पर यही वो समय था जब बाबर को राणा सांगा का आमंत्रण मिला था। इस आमंत्रण का उल्लेख केवल बाबर ने ही किया है और अन्य किसी साक्ष्य से इसकी पुष्टि नहीं होती।‘ (पृ. 283) यही बात अन्य इतिहासकार भी करते रहे हैं। इतिहासकार जी एन शर्मा ने भी राणा के दूत वाली कहानी पर संदेह व्यक्त करते हुए अपनी पुस्तक मेवाड़ और मुगल सम्राट में लिखा है कि बाबर ने राणा सांगा को शक्तिशाली समझते हुए उनकी मित्रता और सहायता प्रात करने के लिए अपना दूत चित्तौड़ भेजा था। इनके अपने तर्क हैं। किस तरह से इतिहास को विकृत किया गया और भ्रामक अनुवाद के आधार पर तरह तरह की भ्रांतियां फैलाई गईं उसका उदाहरण भी इतिहास की पुस्तकों में उपस्थित है। इतिहासकार रोमिला थापर की एक पुस्तक है भारत का इतिहास। इसमें थापर लिखती हैं, केवल अफगानों ने ही बाबर को सहयाता नहीं दी, एक राजपूत राजा भी दिल्ली से राज्य करने का स्वप्न देख रहा था और उसने बाबर से संधि कर ली। चार पृष्ठ के बाद फिर से राणा सांगा और बाबर का उल्लेख रोमिला थापर करती हैं, ‘1509 में राणा सांगा मेवाड़ का राजा बना और दिल्ली की सत्ता का विरोध करने लगा...सांगा ने दिल्ली पर आक्रमण का विचार किया। सांगा ने इब्राहिम लोदी के विरुद्ध बाबर से मैत्री कर ली और इस बात पर सहमत हो गया कि जब बाबर दिल्ली पर उत्तर से आक्रमण करेगा तो वह दक्षिण और पश्चिम से कर देगा।‘ अब देखिए कैसे इतिहास को बदलने का खेल खेला जाता है। अगर बाबरनामा के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर हम ये मान भी लें कि राणा सांगा ने बाबर के पास दूत भेजा था तो उससे ये कहां से सिद्ध होता है कि दोनों के बीच संधि और मैत्री हो गई जिसका दावा थापर कर रही हैं। संधि और मैत्री का अर्थ तो थापर को ज्ञात ही होगा। 

इस प्रसंग पर एक और इतिहासकार सतीश चंद्रा की राय देख लेते हैं। सतीश चंद्रा की लिखी ये पुस्तक लंबे समय तक ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ाई जाती रही है। वो लिखते हैं कि इसी समय बाबर को दौलत खां के पुत्र दिलावर खां ने भारत आने का निमंत्रण दिया और आग्रह किया कि वो इब्राहिम लोदी को सत्ता से हटाने में मदद करें क्योंकि वो तानाशाह है। अब इसकी जो अगली पंक्ति है वो बहुत महत्वपूर्ण है। सतीश चंद्रा लिखते हैं, ये संभव है कि इसी समय राणा सांगा का भी एक दूत बाबर के पास पहुंचा और उनको भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। अब इस पूरे वाक्य से एक इतिहासकार का छल सामने आ जाता है। सतीश चंद्रा के पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि राणा सांगा का दूत बाबर के पास पहुंचा था। संभव लगाकर उन्होंने पाठ्य पुस्तक में ये बात लिख दी। इस संभावित मुलाकात, जिसका कोई प्रमाण नहीं है, को वर्षों से ग्यारहवीं के विद्यार्थियों को पढ़ाया जा रहा है। उनके मानस पर तथ्यहीन बात अंकित की जा रही है। इतिहास संभावनाओं के आधार पर नहीं उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर लिखा जाता है। मार्क्सवादी इतिहासकारों ने तो इतिहास लेखन में भी साक्ष्य की अनदेखी करके एजेंडा को प्राथमिकता दी। इसी पुस्तक में सतीश चंद्रा जब खानवा युद्ध के बारे में लिखते हैं तो बताते हैं कि राणा सांगा की वीरता की कहानियां सुनकर बाबर के सैनिकों का मनोबल गिरा हुआ था। सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए बाबर ने राणा सांगा के खिलाफ युद्ध को जेहाद घोषित किया। उसने युद्ध आरंभ करने के पहले शराब की सभी बरतनों को तोड़ डाला ताकि वो अपने सैनिकों को भरोसा दिला सके कि वो कट्टर मुस्लिम है और जेहाद के पहले शराब छोड़ रहा है। जिससे युद्ध के लिए बाबर को धर्म का सहारा लेना पड़ा हो उससे मैत्री और संधि कैसे हो सकती थी। वो भी चंद महीने पहले। कुछ मार्क्सवादी इतिहासकार ये तर्क देते हैं कि बाबर ने जब लोदी को पराजित कर दिया तो उसने भारत में रहने का निर्णय लिया। इससे राणा सांगा नाराज हो गए। क्या तथाकथित संधि में इस बात का उल्लेख था कि बाबर इब्राहिम लोदी को हराकर लौट जाएगा। रोमिला थापर जैसी इतिहासकार को ये भी बताना चाहिए था। 

हमारे देश के इतिहास के साथ स्वाधीनता के बाद के मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इतने तथ्यों को छिपाया और इतने तथ्यों को गढ़ा जिसने भारतीय इतिहास की सूरत और सीरत दोनों बिगाड़ दी है। आज हमारे देश के नायक पर संसद में अशोभनीय टिप्पणी की जा रही है तो उसके लिए ये इतिहासकार ही जिम्मेदार हैं। आज अगर भारत के मध्यकालीन इतिहास को लेकर भ्रम का वातावरण बना है तो उसके लिए भी अर्धसत्य लिखनेवाले ये इतिहासकार ही जिम्मेदार हैं। अगर आप 1946 में प्रकाशित नेहरू की पुस्तक डिस्कवरी आफ इंडिया पढ़ लेंगे तो अनुमान हो जाएगा कि मार्क्सवादी इतिहासकारों ने मुगल आक्रांताओं को नायक बनाने का प्रयास क्यों किया। आज आवश्यकता है कि इतिहास को साक्ष्यों के आधार पर लिखा जाए संभावनाओं के आधार पर नहीं। 


Sunday, March 23, 2025

तमिल को हिंदी नहीं अंग्रेजी से खतरा- शास्त्री


राष्ट्रीय शिक्षा नीति के त्रिभाषा फार्मूले को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन निरंतर गैर हिंदी भाषी प्रदेशों पर हिंदी थोपने का आरोप लगा रहे हैं। संसद में भी इस आरोप पर हंगामा हुआ और गृहमंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए स्टालिन की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पर भाषा के नाम पर समाज में जहर घोलने का आरोप लगाया। शिक्षा मंत्रालय में एक भारतीय भाषा समिति कार्य करती है जो सभी भारतीय भाषाओं के प्रोन्नयन के लिए मंत्रालय को सुझाव देती है। हिंदी को लेकर उठ रहे विवादों के बीच शिक्षा मंत्रालय में भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष प्रो चमू कृष्ण शास्त्री से राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हिंदी और भारतीय भाषाओं की स्थिति, हिंदी थोपने के आरोप और त्रिभाषा फार्मूले के क्रियान्वयन पर एसोसिएट एडीटर अनंत विजय ने उनसे बातचीत की।  

प्रश्न- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फर्मूला क्या है जिसको लेकर इतना विवाद हो रहा है? 

त्रिभाषा सूत्र सबसे पहले 1968 में आया था। उसको ही वर्ष 1986 की शिक्षा नीति में दोहराया गया जो कि वर्ष 2019 तक चला। त्रिभाषा सूत्र में फर्स्ट लैंग्वेज यानी पहली भाषा मातृभाषा, दूसरी भाषा अंग्रेजी, तीसरी भाषा हिंदी राज्यों में अन्य किसी राज्य की भाषा और अन्य अहिंदी भाषी राज्यों में हिंदी भाषा होती थी। त्रिभाषा का सारांश यह था। वर्ष 2020 में पहली बार त्रिभाषा सूत्र के बारे में यह कहा गया कि यह आगे भी प्रचलित रहेगा। हालांकि उसमें राज्यों व छात्रों की आकांक्षाएं, प्रादेशिक आवश्यकताएं और संविधानसम्मत प्रविधान को ध्यान में रखते हुए सभी राज्य अपना त्रिभाषा सूत्र का क्रियान्वयन करेंगे। एक तरह से इसे इतना लचीला बनाया गया, जिसमें कोई प्रिस्क्रिप्शन नहीं है। यानी किसी भी भाषा विशेष के लिए कोई निर्देश नहीं दिया गया। शिक्षा की दृष्टि से देखें तो स्वाधीन भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। 

प्रश्न- आपकी बातों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि त्रिभाषा फार्मूले में हिंदी की अनिवार्यता नहीं है? 

बिल्कुल नहीं। हिंदी की अनिवार्यता नहीं है परंतु साथ ही अंग्रेजी की अनिवार्यता भी नहीं है। यदि आप देखेंगे तो पाएंगें कि पूरे देश में हिंदी से ज्यादा यदि कोई एक भाषा पढ़ी जाती है तो वह अंग्रेजी है। दूसरी भाषा के रूप में पूरे देश में अंग्रेजी ही पढ़ाई जाती है। एक दृष्टि से अंग्रेजी की अनिवार्यता को भी खत्म किया गया। यह पहली बार हुआ। बेशक, त्रिभाषा फार्मूला नीति है, लेकिन इसके क्रियान्वयन के लिए तीन साल तक नेशनल या स्टेट एजुकेशन बोर्ड और अन्य भागीदारों की मदद से कैरिकुलम फ्रेम वर्क (पाठ्यक्रम) बनाया गया। इसे स्कीम आफ स्टडीज कहते हैं। इस पर फिर तीन साल काम किया गया। वर्ष 2023 में नेशनल कैरिकुलम फ्रेमर्वक बना। इस स्कीम आफ स्टडीज में किसी भाषा विशेष का उल्लेख न करते हुए उसे समभाव तरीके से परिभाषित किया गया। एक नए सोच को सामने रखते हुए पहली, दूसरी और तीसरी भाषा की जगह आर-1, आर-2 और आर-3 शब्द  का प्रयोग किया गया। साक्षरता की शुरूआत रीडिंग से होती है...यानी पढ़ने से।  आर-1 में मातृभाषा या राज्य की भाषा को स्थान दिया गया। इसमें मातृभाषा और राज्य दोनों को रखा गया क्योंकि यह जरूरी नहीं कि मातृभाषा और राज्य भाषा एक हो। दोनों अलग-अलग हो सकते हैं। आर-2 में आर-1 के अलावा कोई भी भाषा, आर-3 में आर-1 और आर-2 के अलावा कोई भारतीय भाषा। दरअसल, होता क्या था कि वर्ष 2020 से पहले बच्चे थर्ड लैंग्वेज के रूप में फ्रेंच, जर्मन या अंग्रेजी पढ़कर आगे निकल जाते थे। राज्यों में तो ऐसा नहीं हो पाता था, लेकिन  सीबीएएसई में इस तरह से किया जाता था। अब नई शिक्षा नीति के तहत ऐसा नहीं हो पाएगा। सबसे अहम यह है कि अब हर विद्यार्थी को दो भारतीय भाषा अनिवार्य रूप से सीखनी होगी। अब बताइए, कि इसमें हिंदी कहां थोपी गई है ? वर्तमान सरकार ने सर्वसमावेशक, सार्वभौमिक व सार्वदेशिक भाषा नीति अपनाई है।

प्रश्न- आर-1, आर-2,आर-3 उत्तर प्रदेश और बिहार में कैसे लागू होगा? कौन कौन सी भाषाएं छात्र चुन सकते हैं। 

सिर्फ उप्र ही नहीं बल्कि हिंदी भाषी 10 राज्यो में यह चुनौती है। बिहार- उत्तर प्रदेश में मगधी, अवधी, भोजपुरी जैसी भाषा है। दरअसल, नई शिक्षा नीति के तरह बहुभाषिता को बढ़ावा देना ही प्राथमिकता है। अन्य प्रदेश की एक भाषा सीखना है। अब सवाल यह है कि यह कैसे सीखेंगे? आनलाइन सीख सकते हैं। समर वेकेशन में अन्य राज्य में जाकर भाषा सीख सकते हैं। स्कूलों द्वारा 15 दिनों का क्रैश कोर्स शुरू किया जा सकता है। एक राज्य के स्कूल दूसरे राज्यों के स्कूलों से पेयरिंग कर सकते हैं। क्लस्टर बना सकते हैं। इसी तरह अंतरराज्यीय यानी कुछ दिनों के लिए वहां जाकर रहकर भी बच्चे एक भारतीय भाषा सीख सकते हैं। इससे आत्मीयता बढ़ेगी या एकता बढ़ेगी। 

प्रश्न- क्या यह व्यवहारिक है? संसाधन कहां से लाएंगे? उप्र, बिहार जैसे राज्यों में जहां शिक्षकों की भारी कमी है, वहां नई भाषा सीखाने के लिए शिक्षक कैसे मिलेंगे? 

ये सब हो जाएगा अगर इससे राजनीति निकल जाएगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर जितनी भ्रांतियां हैं उसको पहले दूर करना होगा। इस शिक्षा नीति में सबकुछ सुझाव मात्र है, सजेस्टिव है, निर्णय तो राज्य सरकारों को ही करना है, क्रियान्वयन भी।

प्रश्न- फिर इतना विरोध क्यों हो रहा है? हिंदी थोपने की बात कहां से आई?राष्ट्रीय  शिक्षा नीति में तो कहीं भी हिंदी शब्द तक का उपयोग नहीं किया गया? वह भी चार साल बाद इसके विरोध का क्या औचित्य? 

देखिए, राजनीति मेरा विषय नहीं है। मैं भाषाविद् हूं। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषा नीति को लेकर जो सोच है और इसको उन्होंने प्रकट भी किया है कि सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं। तमिल संगमम जैसे कार्यक्रम के जरिये तमिल भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर लेकर आए। अब तक अलगाववादी ताकतों व विभाजनकारी सोच रखने वाले तत्वों द्वारा भाषा का उपयोग समाज और देश को तोड़ने के लिए किया जाता रहा है। प्रधानमंत्री ने इसी भाषा को समाज व देश को आपस में जोड़ने का साधन बनाया। भाषाओं के बीच में जो आत्मीयता है, उसका उपयोग किया। उनका कहना है भारत में अलग-अलग भाषा बोलने वालों के बीच जो आत्मीयता है, यह आत्मीयता ही एकता का निर्माण करती है। विविधता सौंदर्य है, एकता शक्ति है। विविधता का सौंदर्य एकता की शक्ति के आधार पर ही सुदीर्ष काल जीवंत और विकसित रह सकता है। एकता की शक्ति के बिना यह विविधता टिक नहीं सकती है। आत्मीयता, विविधता और एकता...यही भारतीयता है। इससे ही लाखों सालों से भारत एक राष्ट्र के नाते अडिग रहा। भारत राष्ट्र के नाते सब प्रकार के विदेशी आक्रमणों को झेलते हुए भी एक रहा। सभ्यता पर आक्रमण के साथ-साथ वैचारिक आक्रमण भी हुआ। अब जब प्रधानमंत्री की भाषा नीति से एकता का सूत्र और सुदृढ़ हो रहा है, तो कुछ अलगाववादी तत्व भाषा को साधन बना रहे हैं। आने वाले समय में चुनाव भी होने वाले वाले हैं। हो सकता है विरोध का यही कारण हो। 

प्रश्न- आपने अभी तमिल संगमम का नाम लिया...कहा जाता है कि ये कार्यक्रम आपका ब्रेन चाइल्ड है? 

(हंसते हुए) नहीं...नहीं। ऐसा नहीं है। 

प्रश्न-आपने प्रधानमंत्री का नाम जरूर लिया, लेकिन कहा जाता है कि प्रस्ताव आपका था। सच्चाई क्या है? 

सच्चाई यही है कि विचार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे दिशा दिया और भारतीय भाषा समिति ने संयोजक के रूप में मैंने इसे क्रियान्वित किया। 

प्रश्न- क्या तमिल संगमम जैसे आयोजन से कोई फायदा हुआ? 

निश्चित रूप से लाभ हुआ। की के अलावा गुजरात के सौराष्ट्र में भी तमिल संगमम का आयोजन किया गया। दरअसल, लगभग 500 साल पहले गुजरात के जो लोग तमिलनाडु के जाकर बसे, वे सौराष्ट्री कहलाते हैं। उनके लिए आयोजन किया गया। 

प्रश्न- क्या श्रीनगर में भी भारतीय भाषाओं को लेकर आप लोगों ने कुछ किया था? 

जम्मू-कश्मीर सहित सभी राज्यों में भारतीय भाषा संगम कार्यक्रम किया था। इस आयोजन में उस राज्य में अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग एक दिन एक मंच पर एकत्रित होते हैं और अपनी-अपनी बात रखते हैं। इसके अलावा मोदी सरकार ने भारतीय भाषा उत्सव शुरू किया। महाकवि सुब्रह्रमणयम भारती के जन्मदिवस (11 दिसंबर) पर भारतीय भाषा उत्सव के रूप में मनाना शुरू किया। काशी विश्वविद्यालय में कवि सुब्रह्रमणय भारती के नाम से एक चेयर की स्थापना भी की गई। 

प्रश्न- तमिलनाडु सरकार को फिर क्या परेशानी है, सभी जगह अगर ऐसा होगा तो वहां भी होगा। 

देखिए, तमिलनाडु में वर्ष 1965-1968 से कभी न कभी हिंदी विरोध की आवाज उठती रहती है। सही मायने में मैं इसे हिंदी विरोधी नहीं बल्कि यह हिंदू समाज विरोधी आंदोलन कहना चाहूंगा। वह द्रविड़ राज्य बनाने का आंदोलन था। द्रविड़ अलग है...आर्य अलग है। इसको बढ़ावा देने के लिए वहां टू लैंग्वेज यानी द्विभाषा फर्मूला रखा गया। इसके तहत वे तमिल और अंग्रेजी ही पढ़ाते हैं। तमिलनाडु में 12 प्रतिशत लोग गैर तमिलभाषी है। यह 14 अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं। इससे समस्या यह होती है कि तमिलनाडु के 12 प्रतिशत विद्यार्थी अपनी मातृभाषा नहीं सीख पाते हैं। यह  बड़ा अन्याय है। दूसरी, बड़ी परेशानी यह है कि एक और भारतीय भाषा नहीं जानने के कारण यहां के युवा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगी परीक्षा और दूसरे राज्यों में नौकरी के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं से वंचित रह जाते हैं। तीसरी परेशानी, तमिलनाडु से अलग-बगल के राज्यों में काम करनेवाले मजदूरों को भाषा की परेशानी होती है। वहीं, दूसरे राज्यों से यहां आने वाले कर्मचारियों व मजदूरों के बच्चे भी अपनी भाषा नहीं सीख पाते हैं। दरअसल, यह तमिलनाडु को देश के अन्य राज्यों से काटने का एक प्रयास है। भाषा के नाम पर अकारण विवाद खड़ा करके तमिनलाडु को एक अलग द्वीप बना रहे हैं। चेन्नई के 44 प्रतिशत गैर तमिलाभाषी हैं। उनके साथ अन्याय हो रहा है। केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र से सटे राज्यों की  सीमाओं पर सदियों से बसे गैर तमिलभाषी भी अपनी मातृभाषा पढ़ नहीं पा रहे हैं, सीख नहीं पा रहे हैं। 

प्रश्न - तो असली चुनौती क्या है? भारतीय भाषा समिति इसे कैसे देखती है?

देश में द्वि या त्रिभाषा फार्मूला से कहीं ज्यादा बड़ा व अहम मुद्दा है शिक्षा की 'माध्यम भाषा'। असली लड़ाई तो मातृभाषा माध्यम या भारतीय भाषा माध्यम और अंग्रेजी माध्यम के बीच है। वर्ष 2011 में तमिलनाडु में बारहवीं में 65 प्रतिशत विद्यार्थी तमिल माध्यम में पढते थे। वर्ष 2021 तक यह आंकड़ा 54 प्रतिशत तक आ गया। अब यह घटकर 47 प्रतिशत हो गया। तमिल का नुकसान हिंदी की वजह से नहीं बल्कि अंग्रेजी माध्यम की वजह से हो रहा है। यही हाल पूरे देश का है। देशभर के प्राइवेट स्कूलों में 65 प्रतिशत विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हैं। सरकारी, अनुदान प्राप्त और निजी स्कूलों को मिला लें तो आंकड़ा निकाले तो 35 प्रतिशत विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हैं। हर साल डेढ़ से दो करोड़ विद्यार्थी मातृभाषा या राज्यभाषा से आंग्रेजी माध्यम में 'माइग्रेट' हो रहे हैं। मैं अपने परिवार का उदाहरण देता हूं। मेरे परिवार में हम लोग नौ भाई-बहन हैं। दो को छोड़कर शेष सात भाई-बहन के परिवारों में उनके बच्चे मातृभाषा में पढ़-लिख नहीं सकते हैं क्योंकि वह अंग्रेजी भाषा में पढ़े हैं। उनका सोचना, लिखना-पढ़ना सबकुछ अंग्रेजी भाषा में हो रहा है। वह अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। अंग्रेजी भाषा का एक प्रवाह है। हायर एजुकेशन और आइआइएम, आइआइटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अंग्रेजी माध्यम से है। यह क्यों है ? इसलिए, क्योंकि इकोसिस्टम अंग्रेजी माध्यम में है। कोर्ट, प्रशासन, व्यापार, उद्योग, साइंस-टेक्नोलाजी सब जगह अंग्रेजी माध्यम में ही काम हो रहा है। एक गांव का बच्चा यदि चिप्स का एक पैकेट भी खरीदता है तो उसके सामने पैकेट पर अंग्रेजी में लिखा शब्द आता है। पूरा इको सिस्टम ही अंग्रेजी माध्यम के नीचे दबता जा रहा है। स्थिति भयावह है। 

प्रश्न- तो आगे रास्ता क्या है, कैसे और क्या करना होगा? 

अंग्रेजी के इकोसिस्टम को बदलकर भारतीय भाषाओं का इकोसिस्टम बनाना होगा।  

 प्रश्न- राष्ट्रीय शिक्षा नीति कब तक इम्प्लीमेंट हो सकेगा? पांच साल तो निकल गया है? 

कूरिकुलम फ्रेमवर्क बन रहा है। दो-तीन साल में क्रियान्वयन हो जाना चाहिए।   

 प्रश्न- क्या आपको नहीं लगता कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन धीमी गति से चल रहा है। 

देर इसलिए हो रही है क्योंकि सभी को लेकर काम करना है। कांग्रेस की सरकार के दौरान सबको लेकर चलना जरूरी नहीं होता था,लेकिन वर्तमान सरकार में सभी को साथ मिलाना जरूरी है। सिर्फ पाठ्यक्रम बदलना ही काम नहीं है बल्कि मानसिकता बदलना भी जरूरी है। इसमें भारतीय दृष्टिकोण और उस विषय में भारतीय इतिहास को जोड़ना है। इस पाठ्यक्रम के आधार पर जो पढ़कर आगे बढ़ेंगे, वह भारत की जड़ों से जुड़ेंगे। इसलिए समय लग रहा है। अभी तक समझाया गया कि भाषा और संस्कृति अलग-अलग है, लेकिन ऐसा नहीं है। भाषा और संस्कृति एक ही है। उनकी अभिव्यक्ति अलग-अलग है। मूल तत्व एक है। यह भी पढ़ाना है। अब तक जो-जो गलत सिखाया गया, उसे भी सुधारना है। 

प्रश्न-यानी भाषा के साथ-साथ संस्कृति से जोड़ना ही उद्देश्य है?   

बिलकुल। कर्नाटक के गांव में आज भी एक व्यवस्था है। वहां खाने से पहले व्यक्ति घर के सामने खड़े होकर कहते हैं कि गांव में कोई भूखा है तो वह हमारे घर पर आकर खाना खाएं। यह पंरपरा आज भी कुछ जगहों पर हैं। यह जीवन व्यवस्था में लाना है।   

प्रश्न- भाषा के विकास के लिए क्या करना चाहिए? 

इसके लिए सात चीजें जरूरी है। उस भाषा में बोलने वाले लोग हों, माध्यम भाषा के रूप में प्रयोग हो,.समकालीन शब्द निर्माण, एडाप्टेशन आफ टेक्नोलाजी, टीचींग-लर्निंग, सर्टिफिकेशन और पैट्रनेज (स्टेट या कार्पोरेट)। एडाप्टेशन आफ टेक्नोलाजी की जरूरत को इस तरह से समझा जा सकता है कि दुनिया में 6000 भाषाएं थीं, लेकिन जिनका उपयोग प्रिटिंग में नहीं हुआ, वह खत्म हो गए। सर्टिफिकेशन से आशय यह है कि अंग्रेजी की प्रोफेशिएंसी (योग्यता) परीक्षण के लिए टोफेल की परीक्षा होती है, लेकिन भारतीय भाषाओं के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं है। इन सात आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हर राज्य में बहुभाषिता को बढ़ना देना चाहिए।  हिंदी राष्ट्रभाषा है ऐसा मानकर लड़ रहे हैं। जबकि प्रधानमंत्री बार-बार कह रहे हैं सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषा हैं। दरअसल, भाषाओं को अलग-अलग वर्गों में बांटकर बहुत नुकसान पहुंचाया गया।  

Saturday, March 22, 2025

रील्स की मायावी दुनिया और साहित्य


इन दिनों रील्स और उसके कटेंट की अच्छे और बुरे कारणों से खूब चर्चा होती रहती है। रील्स देखना भी लोकप्रिय होता जा रहा है। चकित करने वाली बात ये है कि रील्स के विषयों का फलक इतना व्यापक है कि वो किसी को भी घंटों तक रोके रख सकता है। अब तो स्थिति ये हो गई है कि रील्स में दिखाई गई बातों को सत्य माना जाने लगा है। रील्स की दुनिया में भविष्यवक्ताओं की बाढ़ आई हुई है। कोई आपके नाम के आधार पर तो कोई आपके नाम में प्रयुक्त अक्षरों की संख्या को जोड़कर आपका भविष्य बता रहा है। कई महिलाएं भी भविष्य के बारे में बात करती नजर आएंगी। वो भी बता रही हैं कि कैसे शुक्रवार को पति के साथ व्यवहार करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। कोई बताती हैं कि पत्नी को हर दिन पति के पांब दबाने चाहिए। क्योंकि लक्ष्मी जी भी विष्णु जी के पांव दबाती हैं। कोई महिला ये बताती है कि अमुक अंक लिखकर अपने घर की तिजोरी में रख दो या अमुक नंबर के नोट अगर आपने अपने घर में पैसे रखने के स्थान पर रख दिया तो पैसौं की कमी नहीं होगी। इतना ही नहीं रील्स की दुनिया में बिजनेस करने के तौर तरीकों और और जमाधन को दुगुना और तिगुना करने के नुस्खे भी बताए जाने लगे हैं। ये सब इतने रोचक अंदाज में बताया जाता है कि देखनेवाला मोबाइल से चिपका रहता है। आमतौर पर यह देखा जाता है कि अगर रील्स देखना आरंभ कर दें तो घंटे दो घंटे तो ऐसे ही निकल जाते हैं। कहना न होगा कि रील्स की दुनिया एक ऐसी मनोरंजक दुनिया है जो लोगों को बेहतर भविष्य का सपना भी दिखाती है। लोगों को पैसे कमाने से लेकर घर परिवार की सुख समृद्धि के नुस्खे बताती है। ये नुस्खे कितने सफल होते हैं ये पता नहीं क्योंकि इस तरह का कोई रील देखने में नहीं आता है कि फलां नुस्खे ये उनका लाभ हुआ या इस तरह की कोई केस स्टडी भी सामने नहीं आई है कि फलां नंबर के नोट तिजोरी में रखने से उसकी आमदनी निरंतर बढ़ती चली गई। पर हां इतना अवश्य है कि रील्स एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में ले जाता है जहां सबकुछ मोहक और मायावी लगता है। 

रील्स की दुनिया को हल्के फुल्के मनोरंजन के तौर पर लिया जाना चाहिए। लिया जा भी रहा है। लेकिन इन दिनों साहित्य, कला और कविता से जुड़े कुछ ऐसे रील्स देखने को मिले जो चिंतित करते हैं। हाल के दिनों में कई ऐसे रील्स देखने को मिले जिनमें सेलिब्रेटी कविता पढ़ते नजर आ रहे हैं। वो कविता किसी और की पढ़ते हैं और रील्स के डिस्क्रप्शन में कवि का नाम लिख देते हैं। रील में कहीं कवि का नाम नहीं होता है। सेलिब्रिटी की टीम उसको इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर पोस्ट कर देती है और अश्वत्थामा हतो नरो...वाली ईमानदारी के साथ वीडियो के डिस्क्रिप्शन में कवि का नाम लिख देती है। होता ये है कि सेलिब्रटी की पढ़ी गई कविताओं का वीडियो इन प्लेटफार्म्स से डाउनलोड करके उनके प्रशंसक उसको फिर से उन्हीं प्लेटफार्म्स पर साझा करना आरंभ कर देते हैं। प्रशंसक अश्वत्थामा वाली ईमानदारी को समझ नहीं पाते और वो सेलिब्रिटी की कविता के नाम से ही उसको साझा करना आरंभ कर देते हैं। दिनकर जी जैसे श्रेष्ठ कवियों की कविताएं तो लोगों को पता है तो उसमें ये खेल नहीं हो पाता है लेकिन कई नवोदित कवि की कविताएँ सेलिब्रिटि के नाम से चलने लगती हैं। कवि को पता भी नहीं चलता और वो कविता सेलिब्रिटी के नाम हो जाती है। रील्स की दुनिया में इस बेईमानी से कई साहित्यिक प्रतिभा कुंद हो जा रही हैं। इसका निदान कहीं न कहीं बौदधिक जगत को ढूंढना ही चाहिए। 

एक और नुकसान जो साहित्य का हो रहा है वो ये कि पौराणिक ग्रंथों से बगैर संदर्भ के किस्सों को उठाकर प्रमाणिक तरीके से पेश कर दिया जा रहा है। पिछले दिनों जब अल्लाबदिया का केस हुआ था तो उसके कुछ दिनों बाद एक रील मेरी नजर से गुजरा। एक बेहद लोकप्रिय व्यक्ति उसमें एक किस्सा सुना रहे थे। किस्से में वो बता रहे थे कि कालिदास अपना ग्रंथ कुमारसंभव पूरा क्यों नहीं कर पाए? उनके हिसाब से कालिदास जब कुमारसंभव में पार्वती और शंकर जी की रतिक्रिया के बारे में लिखने जा रहे थे तब पार्वती जी को पता चल गया। उन्होंने सरस्वती जी तो बुलाया और कहा कि ये कौन सा कवि है और क्या लिखने जा रहा है। इसको रोकना होगा। फिर किस्सागोई के अंदाज में ये प्रसंग आगे बढ़ता है। वो बताते हैं कि सरस्वती जी ने क्रोधित होकर उनको श्राप दे दिया और वो बीमार हो गए। इस कारण से कुमारसंभव पूरा नहीं हो पाया। कालिदास बीमार अवश्य हुए थे। उनको पक्षाघात हो गया और वो भी सरस्वती के श्राप के कारण इसको कहां से उद्धृत किया गया था यह सामने आना चाहिए। इस पूरे प्रसंग में शब्द कुछ अलग हो सकते हैं पर उनका भाव यही था। चिंता की बात ये है कि ये पूरा प्रसंग जैसे सुनाया गया वो विश्वसनीय सा लगता है। इसको सुनकर नई पीढ़ी के लोगों में से कई सच मान सकते हैं, विशेषकर वो जो उनके प्रशंसक हैं। इससे तो एक अलग तरह का इतिहास बनता है। बौद्धिक समाज को इस तरह के प्रसंगों पर विचार करते हुए इसपर विमर्श को बढ़ावा देना चाहिए। चिंता तब और अधिक होती है जब इस तरह के रील बनानेवाले लोग बेहद लोकप्रिय होते हैं।

रील्स की दुनिया के पहले फेसबुक ने साहित्य का बहुत नुकसान किया, विशेषकर कविता का। फेसबुक के लाइक्स और कमेंट ने कवियों औ रचनाकारों के दिमाग में ये बैठा दिया कि अब उनके आलोचकों की आवश्यकता ही नहीं है। वो सीधे पाठक तक पहुंच रहे हैं। ऐसे लोग ये मानते थे कि आलोचक पाठकों तक पहुंचने का एक जरिया है। जबकि आलोचकों की भूमिका उससे कहीं अलग होती है। आलोचक रचना के अंदर प्रवेश करके उसकी गांठों को खोलकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। रचनाओं में अंतर्निहित भावों को आसान शब्दों में पाठकों को समझाने का प्रयत्न करता है। इससे रचनाकार और पाठक के बीच एक ऐसा संबंध बनता था जो फेसबुक के कमेंट से नहीं बन सकता है। फेसबुक पर जिस तरह के कमेंट आते हैं उनमें से अधिकतर तो प्रशंसा के ही होते हैं जो रचना का ना तो आकलन कर पातें हैं और ना ही रचना के भीतर प्रवेश करके उसकी परतों को पाठकों के लिए खोलते हैं। कुल मिलाकार आज जो परिस्थितियां बन रही हैं उनमें प्रमाणिक स्त्रोंतो के आधार पर तथ्यों को प्रस्तुत करने के लिए साहित्यकारों को आगे आना होगा। प्रो जगदीश्वर चतुर्वेदी कई वर्षों से ये आह्वान कर रहे हैं कि साहित्यकारों को इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर लिखना चाहिए। उनके नहीं लिखने से अनर्गल लिखनेवालों का बोलबाला होता जा रहा है। तकनीक को साहित्यकारों को अपनाना चाहिए और उसके नए माध्यमों को पाठकों तक पहुंचने का औजार बनाना चाहिए।     


Wednesday, March 19, 2025

तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती


शशि कपूर भारतीय फिल्म जगत के ऐसे नायक हैं जिनके बारे में फिल्म जगत से जुड़े लोगों की राय अलग अलग थी। शशि कपूर के बड़े भाई राज कपूर, श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी से लेकर विदेशी निर्देशकों की राय अलग थी। पहले तो शशि को फिल्मों के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था। संघर्ष पर आगे चर्चा करेंगे पहले सफलता के दौर की बात। जब शशि के पास खूब सारी फिल्में थीं। दिन-रात, तीन तीन शिफ्टों में फिल्मों की शूटिंग करते थे। एक साथ चार पांच फिल्में कर रहे थे। फिल्में भी यश चोपड़ा और मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा जैसे निर्देशकों के साथ। लगभग यही समय था जब राज कपूर ने फिल्म सत्य शिवम सुंदरम बनाने की सोची। उन्होंने तय किया कि इस फिल्म में शशि कपूर को लिया जाए। शशि कपूर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि एक दिन राज जी अचानक उनके पास पहुंचे। बोले- मैं एक फिल्म करने जा रहा हूं। आपको उस फिल्म में लेना चाहता हूं। पता नहीं आप कितने पैसे लेते हैं? मैं दे भी पाऊंगा कि नहीं। आप बहुत व्यस्त एक्टर हो गए हो। क्या पता आपके पास डेट्स हैं भी या नहीं। इतना सुनते ही शशि कपूर इमोशनल हो गए। उन्होंने झट से राज कपूर का पांव छू लिया और कहा आप जैसा कहेंगे वैसा कर लूंगा। आपको अपनी डायरी भिजवा देता हूं आपको जो और जितनी डेट्स चाहिए वो ले लीजिएगा। शशि कपूर ने राज कपूर को अन्य प्रोड्यूसर्स पर वरीयता दी। इस कारण कई प्रोड्यूसर्स नाराज भी हुए। शशि की व्यस्तता देखकर राज साहब से रहा नहीं गया। एक दिन जब वो सत्य शिवम सुंदरम के सेट पर पहुंचे तो राज कपूर ने कहा, शशि साहब अब आप टैक्सी एक्टर बन गए हो। शशि को समझ नहीं आया। वो चुपचाप खड़े रहे। राज कपूर हंसे और बोले आपकी हालत टैक्सी जैसी हो गई है। जो भी प्रोड्यूसर आपको काम दे दे आप उसके पास चले जाते हो। टैक्सी की तरह ये नहीं देखते कि कहां जाना है बस ये देखते हो कि मीटर डाउन है कि नहीं। शशि कपूर झेंप कर मेकअप रूम की ओर चले गए। 

राज कपूर साहब शशि कपूर को अपने बेटे की तरह मानते थे, ख्याल रखते थे। शशि कपूर के सफल होने के पहले की कहानी बेहद दारुण है। आज नेपोटिज्म की बात होती है। उन दिनों पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर के भाई को फिल्म में काम मांगने के लिए दर दर भटकना पड़ता था। बीस वर्ष की उम्र में शशि की शादी हो गई और एक साल बाद पुत्र पैदा हो गया। पृथ्वी थिएटर की नौकरी से अपने परिवार को पालना मुश्किल हो रहा था। उनकी पत्नी जेनिफर को 200 और उनको भी 200 रु मिला करते थे। की तरह से घर चलता था लेकिन वो खुश थे। सब चल रहा था कि पृथ्वी थिएटर बंद हो गया। शशि की नौकरी खत्म। अब संकट बड़ा था। ये वही दौर था जब शशि का फिल्मों की ओर झुकाव हुआ अन्यथा वो तो थिएटर में ही खुश थे। शशि रोज सुबह फिल्मिस्तान के गेट पर बैठ जाते थे ताकि निर्देशक की उनपर नजर पड़े और काम मिले। इसी बेंच पर उनकी मुलाकात धर्मेन्द्र और मनोज कुमार से हुई थी। वो दोनों भी फिल्मों में काम करने के लिए संघर्षरत थे। मनोज कुमार को तो रोल मिल गया लेकिन इन दोनों को नहीं। शशि को पता था कि राज कपूर को केदार शर्मा ने ब्रेक दिया था और वो पृथ्वीराज कपूर के दोस्त थे। वो उनके पास पहुंचे लेकिन रोल नहीं मिला। अचानक इनकी भेंट यश चोपड़ा से हुई। उन्होंने शशि को लेकर एक फिल्म बनाई धर्मपुत्र जो असफल रही। इसके बाद शशि कपूर को बिमल राय जैसे निर्देशक मिले लेकिन सफलता नहीं मिली। पांच लगातार फिल्मों में असफलता ने प्रोड्यूसर्स को इनसे दूर कर दिया। वो शशि को दिए एडवांस पैसे वापस मांगने लगे। पांच साल तक असफलता का ये दौर चला। 1965 में नंदा के साथ उनकी फिल्म जब जब फूल खिले सुपरहिट हुई। फिर तो निर्माताओं की लाइन उनके घर पर लगने लगी। शशि और जेनिफर ने जो झेला था उसका गहरा असर उनके मन पर था। जब जब फूल खिले की सफलता के बाद एक निर्माता ने उनको अपनी अगली फिल्म के लिए साइनिंग अमाउंट के तौर पर पांच हजार रुपए नकद दिए। जेनिफर ने डरते हुए शशि से कहा कि इस पैसे को छह महीने तक हाथ नहीं लगाएंगे। अगर अगली फिल्म पिट गई तो फिर वो पैसा वापस मांगने पहुंच जाएगा। दोनों ने यही किया। उस पैसे को छह महीने तक हाथ नहीं लगाया। हलांकि उसके बाद शशि कपूर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक हिट फिल्में। प्यार का मौसम, हसीना मान जाएगी, नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे, प्यार किए जा जैसी फिल्में खूब लोकप्रिय हुईं। 1970 के बाद भी उनकी फिल्में खूब चल रही थीं। सूची लंबी है। लेकिन ये समझना होगा कि हर सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी दास्तान होती है। क्योंकि सफलता का शार्टकट नहीं होता। 


Saturday, March 15, 2025

हिंदी विरोधी छद्म नारों की राजनीति


अगले वर्ष तमिलनाडु में विधानसभा के चुनाव होनेवाले हैं। चुनाव की आहट से ही वहां के मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता एम के स्टालिन को हिंदी की याद आ आई। उनको लगने लगा केंद्र सरकार तमिलनाडु पर हिंदी थोपने का षडयंत्र कर रही है। दरअसल तमिलनाडु में जब भी कोई चुनाव आता है तो वहां के स्थानीय दलों को भाषा की याद सताने लगती है। उनको लगता है कि तमिल को नीचा दिखाकर हिंदी को उच्च स्थान पर स्थापित करने का षडयंत्र किया जा रहा है। स्टालिन को करीब पांच साल बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति की याद आई। शिक्षा नीति के त्रिभाषा फार्मूले पर उनको आपत्ति है। उसके माध्यम से ही वो तमिल पर हिंदी के वर्चस्व की राजनीति को देखते हैं। यह एक राजनीतिक वातावरण बनाने की योजनाबद्ध चाल है जिसमें तथ्य का अभाव है। 105 पृष्ठों की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कहीं भी हिंदी शब्द तक का उल्लेख नहीं है। पहले भी इस स्तंभ में इस बात की चर्चा की जा चुकी है। संभवत: शिक्षा नीति बनाने वालों को भारतीय भाषाओं की भावनाओं का ख्याल रहा होगा। संभव है कि वो तमिल राजनीति से आशंकित रहे होंगे। इस कारण उन्होंने पूरे दस्तावेज में कहीं भी हिंदी शब्द नहीं हे। पता नहीं क्यों स्टालिन को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के किस प्रविधान के अंतर्गत हिंदी थोपने का उपक्रम नजर आ गया है। स्टालिन तमिलनाडु की जनता की संवेदनाओं को भड़काने का खेल खेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिसने भी तमिलनाडु पर हिंदी थोपने की कोशिश की वो या तो हार गए या बाद में अपना रुख बदलकर डीएमके के साथ हो गए। तमिलनाडु हिंदी उपनिवेशवाद को स्वीकार नहीं करेगा। कौन सा हिंदी उपनिवेशवाद और हिंदी थोपने की कौन सी कोशिश। स्टालिन इसको स्थापित नहीं कर पा रहे हैं तो हिंदी विरोध के नाम पर कभी तमिल अस्मिता की बात करने लग जाते हैं तो कभी कुछ अन्य। संभव है कि उनको तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में तात्कालिक लाभ मिले लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर उनकी स्थिति हास्यास्पद हो रही है। 

विगत दस वर्षों में तमिल और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रोन्नयन के लिए केंद्र सरकार के स्तर पर कई तरह के कार्यक्रम चलाए गए हैं। आज से करीब तीन वर्ष पहले काशी तमिल संगमम नाम से एक कार्यक्रम काशी में आरंभ किया गया था। इसका शुभारंभ स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। ये कार्यक्रम तमिलनाडु और काशी के ऐतिहासिक संबंधों को फिर से याद करने और समृद्ध करने के लिए आयोजित किया गया था। तमिल को लेकर महाराष्ट्र और कश्मीर में भी कार्यक्रम आयोजित किए गए। इससे पूर्व 2021 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमिल के महान कवि सुब्रह्ण्य भारती के सौवीं पुण्यतिथि पर काशी हिंदी विश्वविद्यालय के कला विभाग में महाकवि के नाम पर सुब्रह्ण्य भारती चेयर आन तमिल स्टडीज स्थापित करने की घोषणा की थी। ऐसे प्रकल्पों की लंबी सूची है। सिर्फ तमिल ही क्यों, ओडिया, मराठी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय बढ़ाने को लेकर भी अनेक कार्य किए जा रहे है। इस पूरे प्रसंग को देखने के बाद हिंदी के अप्रतिम लेखक कुबेरनाथ राय का एक निबंध जम्बुक की कुछ पंक्तियों का स्मरण हो उठता है। कुबेरनाथ राय ने इस निबंघ में बंगला के श्रेष्ठ साहित्यकार ताराशंकर बनर्जी की एक पंक्ति उद्धत की है। उन्होंने लिखा है कि ताराशंकर बनर्जी ने बताया कि था कि बिना एक अखिल भारतीय जीवन-दृष्टि विकसित किए हम अपना अस्तित्व बचा नहीं पाएंगे। यहां पर कुबेरनाथ जी आशंकित होते हुए लिखते हैं कि बनर्जी बात तो ठीक कर रहे हैं परंतु क्षेत्रीय जीवन दृष्टि के बढ़ते जोर के सामने कोई अखिल भारतीय जीवन दर्शन की रचना करने में समर्थ हो सकेगा इसमें संदेह है। क्रांतियुग में तिलक ने एक अखिल भारतीय जीवन दर्शन ‘कर्मयोग’ को सामने रखा था। इसके बाद महात्मा गांधी ने चरखा ( स्वावलंबन और सर्वोदय) हिंदी (राष्ट्रीय एकता) और अध्यात्म का त्रिकोणात्मक जीवन दर्शन सामने रखा। परंतु राजपट्ट बांधकर उनके शिष्य ही उसे अस्वीकृत कर गए। इसके बाद लोहिया ने एक अखिल भारतीय जीवन दृष्टि विकसित करने की चेष्टा की। परंतु न तो उनके पास पर्याप्त साधन थे और न ही कोई सुयोग्य उत्तराधिकारी था जो उनके बोध को विकसित कर सके।

महात्मा गांधी हिंदी को राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक मानते थे। यह अकारण नहीं था कि उन्होंने स्वाधीनता के आंदोलन में बड़े अभियानों का नाम हिंदी में रखा था। सविनय अवज्ञा, अंग्रेजो भारत छोड़ो, नमक सत्याग्रह आदि। लेकिन स्वाधीनता के बाद जब भाषा के आधार पर प्रांतों का गठन आरंभ हुआ तब क्षेत्रीय जीवन दृष्टि को ना सिर्फ मजबूती मिली बल्कि वो राजनीति के एक औजार की तरह भी विकसित होने लगा। भाषा विवाद के बाद जिस तरह से केंद्र सरकार ने घुटने टेके थे उसपर कुबेरनाथ राय की टिप्पणी गौर करने लायक है। एक तरफ वो मुट्ठी भर तमिल उपद्रवियों को कोसते हैं तो दूसरी तरफ कहते हैं कि हिंदी प्रातों के कुछ राजनीति-व्यवसायी या कुछ किताबी बुद्धीजीवी जो मौज से हर एक बात पर वाम बनाम दक्षिण की शैली में सोचते हैं।...1947 से पूर्व ऐसे ही आंख मूंदकर ऐसे प्रगतिशील पाकिस्तान का समर्थन करते थे (देखिए श्री राहुल की कहानी सुमेरपण्डित) और फिर वैसे ही आंख मूंदकर सोचते हैं कि इस देश में वर्ग युद्ध तो संभव नहीं अत: संप्रदाय युद्ध, जाति युद्ध, भाषा युद्ध कराओ जिससे बंसी लगाने का मौका मिल सके। कुबेरनाथ राय भाषा विवाद के समय देश के नेतृत्व पर बहुत कठोर टिप्पणी भी करते हैं और कहते हैं कि वर्तमान धृतराष्ट्र इस बार केवल अंधा ही नहीं बल्कि बहरा भी है। कुबेरनाथ राय जब ऐसा कह रहे होंगे तो उनके मष्तिष्क में नेहरू रहे होंगे। ऐसा इस लेख के अन्य हिस्सों को पढ़कर प्रतीत होता है। 

दरअसल काफी लंबे समय से इस बात को कहा जाता रहा है कि हिंदी, हिंदू हिन्दुस्तान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे पर रहा है। 1965 में अंग्रेजी पत्रिका क्वेस्ट में अन्नदाशंकर राय की टिप्पणी है कि, भाषा संदर्भ में हिंदी का वही स्थान है जो राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेक संघ या जनसंघ का है। अत: धर्मनिरपेक्ष शासनतंत्र में दोनों के लिए कोई खास जगह नहीं है। उस टिप्पणी में अन्नदाशंकर राय के निष्कर्ष का आधार था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी हिंदी का प्रयोग करता है इस कारण हिंदी का संबंध हिंदू धर्म से है। विद्वान लोग भी कैसे भ्रमित होते हैं ये उसका उदाहरण है। तभी तो कुबेरनाथ राय को उस लेख के प्रतिकार में लिखना पड़ा- मुखौटा उतार लो, राय महाशय ! आज अगर स्टालिन तमिल को हिंदी के सामने खड़ा करके अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं तो करें पर ये न तो देश हित में है और ना ही स्टालिन को राजनीति में किसी प्रकार से दीर्घकालीन लाभ होगा। संभव है कि वो हिंदी उपनिवेशवाद जैसे छद्म नारों के आधार पर कुछ सीटें जीत जाएं लेकिन ये तय है कि उनकी राजनीति एक न एक दिन हारेगी। जब तक उनको ये समझ आएगा तबतक बहुत देर हो चुकी होगी। वो तबतक तमिल का भी नुकसान कर चुके होंगे। ये समय भारतीय भाषाओं का स्वर्णकाल है, स्टालिन को समझना चाहिए।  


Saturday, March 8, 2025

साहित्यकारों से समय का छूटता सिरा


दिल्ली के रविन्द्र भवन में साहित्य अकादेमी का साहित्योत्सव चल रहा है। अकादमी का दावा है कि ये साहित्य उत्सव एशिया का सबसे बड़ा उत्सव है। कार्यक्रम की संरचना से इसकी विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। पिछले चार दशकों से साहित्य अकादेमी ये आयोजन करती रही है। जबसे के श्रीनिवासराव अकादमी के सचिव बने हैं तब से ये आयोजन निरंतर समृद्ध हो रहा है, लेखकों की भागीदारी के स्तर पर भी और विषयों के चयन में भी। साहित्योत्सव का शुभारंभ केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने किया। विभिन्न भारतीय भाषा के साहित्यकारों और लेखकों की उपस्थिति में करीब आधे घंटे के भाषण में शेखावत ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। साहित्य का सृजन करनेवालों की प्रशंसा, उत्सवधर्मिता का हमारे समाज में महत्व, सामूहिक चिंतन की भारतीय परंपरा, भारत के भविष्य और उसकी प्रासंगिकता पर शेखावत ने अपनी बात रखी। साहित्यकारों की भूमिका को बेहद सम्मानपूर्वक याद किया। साहित्य की जीवंतता और गतिशीलता, भारत की विविधताओं का साहित्य में स्थान, देश को एकता के सूत्र में निबद्ध करने में साहित्य की भूमिका जैसे विषयों को संस्कृति मंत्री ने अपने व्याख्यान में छुआ। साहित्य समाज का दर्पण है से आगे जाकर शेखावत ने कहा कि हमारा साहित्य केवल समाज के वर्तमान का दर्पण नहीं अपितु भारत के दर्शन, भारत के धर्म, भारत की नीति, भारत का प्रेम, भारत का युद्ध, भारत की स्थापत्य कला और भारत के समाज जीवन से जुड़ी बातों की व्याख्या भी है। यहीं पर उन्होंने बौद्धिक प्रदूषकों की भूमिका पर टिप्पणी तो की लेकिन लगा जैसे उनको बहुत महत्व नहीं देना चाहते हैं।

अच्छी-अच्छी बातों के बाद संस्कृति मंत्री शेखावत ने उपस्थित साहित्यकारों के सामने विनम्रता से एक चुनौती रखी। साहित्यकारों और लेखकों का आह्वान किया कि वो परिवर्तन के वर्तमान दौर को अपने लेखन का विषय बनाएं। परिवर्तन के कारक के रूप में खुद को इस तरह से अनुकूलित करें कि आनेवाली पीढ़ी उनका स्मरण करे। शेखावत ने कहा कि आज भारत नई करवट ले रहा है। पूरे विश्व में भारत की नई पहचान बन रही है। पिछले 10 वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत से जिस तरह और जिस गति के साथ प्रगति की है, केवल आर्थिक दृष्टिकोण से ही नहीं इससे इतर भी, उससे पूरे विश्व में भारत का सम्मान नए सिरे से गढ़ा और लिखा जा रहा है। सम्मान बढ़ने के साथ भारत के ज्ञान की, भारत के विज्ञान की, भारत के योग की, भारत की संस्कृति की, आयुर्वेद की, जीवन पद्धति की, भारत की कृषि परंपराओं पर नए सिरे पूरे विश्व में पहचान सृजित हो रही है। ऐसे महत्वपूर्ण समय में हमारे साहित्य सर्जकों की, कलम के धनी लोगों की प्रासंगिकता महत्वपूर्ण हो जाती है। जब कोई समाज या राष्ट्र समपरिवर्तन से गुजरता है, जब संभवनाएं द्वार पर दस्तक देती हैं, तो हर घटक की जिम्मेदारी बनती है कि वो बदलाव के पहिए को गति प्रदान करने का माध्यम बने। शेखावत बोले कि हम सौभाग्यशाली हैं कि हम सबको ऐसे समय में जीने और काम करने का अवसर मिला है जब भारत इस तरह के समपरिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है कि भारत विकसित होने की दिशा में काम कर रहा है। भारत विश्व का बंधु बनकर नेतृत्वकर्ता बनने वाला है। ऐसे महत्वपूर्ण समय में समाज के सबसे महत्वपूर्ण तबके को भी अपनी जिम्मदारी का एहसास करके अपनी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए।

अंत में गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि वो ऐसा नहीं कह रहे, कहने की धृष्टता भी नहीं कर सकते कि आज के साहित्यकार बदलाव को लक्षित कर लिख नहीं रहे। उन्होंने अवसर का लाभ उठाते हुए लेखकों से अनुरोध कर डाला कि समय की महत्ता को पहचान कर देश को एक साथ, एक विचार, एक मन, एक संकल्प लेकर एक पथ पर आगे ले चलें, ताकि उसपर गर्व किया जा सके। शेखावत ने स्वाधीनता संग्राम में साहित्यकारों और लेखकों की भूमिका को याद किया। कहा कि आज से सौ डेढ़ सौ साल पहले जिन लोगों ने अंग्रेजों की सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया था उनके पास भी वो अवसर था। जिन्होंने मुगलों की सत्ता से लोहा लिया उनके पास भी अवसर था। अवसर के अनुरूप आचरण के कारण उनका नाम हम गर्व से लेते हैं। आज भी अपने रक्त में उनके नाम को सुनकर स्पदंन महसूस करते हैं। मैं आज ये बात जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं भारत परिवर्तित होगा। 50 साल बाद जब इस परिवर्तन का इतिहास लिखा जाएगा तो मैं चाहूंगा कि आपका नाम भी उतने ही सम्मान के साथ आनेवाली पीढ़ी स्मरण करते हुए गर्व करे जिस गर्व की अनुभूति सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के स्मरण से होती है।

साहित्योत्सव के उद्घाटन भाषण में संस्कृति मंत्री ने भले ही अंत में कुछ मिनट इस विषय को दिया लेकिन इसकी गूंज लंबे समय तक साहित्य जगत में रहनेवाली है। आज साहित्यकारों और लेखकों के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है अपने समय को ना पकड़ पाने की है। पटना में आयोजित जागरण बिहार संवादी के दौरान उपन्यासकार रत्नेश्वर ने एक सत्र में इस बात को रेखांकित किया था कि आज के लेखक अपने समय में घटित हो रहे बदलाव को या तो पकड़ नहीं पा रहे हैं या जानबूझकर उसकी अनदेखी कर रहे हैं। उन्होने जोर देकर कहा था कि ये अकारण नहीं है कि आज बड़े पाए के न तो कहानीकार सामने आ रहे हैं और ना ही उपन्यासकार। घिसी पिटी लीक पर चलने से पाठक विमुख होते जा रहे हैं।  समय का हाथ छूट जाने का दुष्परिणाम है कि आज उपन्यासों की महज पांच सौ प्रतियां छप रही हैं। कविता संग्रह के प्रकाशन के लिए कम ही प्रकाशक उत्साह दिखाते हैं। हाल ही में प्रयागराज में संपन्न महाकुंभ को केंद्र में रखकर अनिल विभाकर ने जलकुंभियां नाम से एक कविता लिखी। इस कविता में अनिल विभाकर ने लिखा, जलकुंभियों का महाकुंभ पसंद नहीं/ कोई नहीं करता जलकुंभियों की चिंता/कोई कर भी नहीं रहा/चिंता करे भी तो कोई क्यों/हमेशा गंदे जल में पनपती हैं वे/निर्मल जल भी सड़ जाता है इनके संसर्ग में/पानी फल और मखाना की दुश्मन होती है जलकुंभियां/इन्हें साफ करना ही पड़ेगा/जहां-जहां भी है जल/लोग लगाएंगे मखाना, उगाएंगे पानी फल। इस कविता में अनिल विभाकर ने महाकुंभ की अकारण आलोचना करनेवालों पर प्रहार किया है। वो कहते हैं कि इन्हें साफ करना ही पड़ेगा। निहितार्थ स्पष्ट है। इस कविता के सामने आने के बाद अनिल विभाकर की आलोचना आरंभ हो गई। देखा जाए तो विभाकर समाज मानस में हो रहे परिवर्तन को पकड़ने और उसको लिखने का प्रयास कर रहे हैं। आज भारतीय समाज में जिस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं क्या वो साहित्य का विषय बन पा रहे हैं? इस पर चर्चा होनी चाहिए। संस्कृति मंत्री ने साहित्य अकादेमी के मंच से लेखकों से इस परिवर्तन को पकड़ने और परिवर्तन का सारथी बनने का आह्वान किया। अगर ऐसा हो पाता है तो ना केवल भारतीय साहित्य का भला होगा बल्कि लेखकों को समाज जीवन से जुड़ने और समाज के मन को सामने लाने का अवसर भी मिल सकेगा।

Saturday, March 1, 2025

भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता


शिवरात्रि के साथ ही प्रयागराज महाकुंभ का समापन हो गया। प्रयागराज में डेढ़ महीने तक चले महाकुंभ के दौरान करोड़ों आस्थावान हिंदुओं ने पवित्र संगम में डुबकी लगाई। तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करके भी देश के कोने कोने से श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचे। प्रयागराज और दिल्ली में भगदड़ से हुई मौत ने भी आस्था के इस समागम पर कोई प्रभाव डाला हो ऐसा प्रतीत नहीं होता। दो दुर्घटनाओं में जो मौत हुईं वो बेहद तकलीफदेह है। बावजूद इसके अगर महाकुंभ में शिवरात्रि के दिन तक गंगा में स्नान करनेवालों की संख्या में कमी नहीं आई तो इसके पीछे कुछ न कुछ कारण तो होगा। कई विरोधी दल के नेताओं ने कुंभ को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां कीं उसने भी जनता के मनोबल पर कोई विपरीत असर नहीं डाला। 

कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तो यहां तक कह दिया कि कुंभ में डुबकी लगाने से नौकरी नहीं मिलती, पेट नहीं भरता आदि आदि। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव निरंतर कुंभ को लेकर टीका टिप्पणी करते रहे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो महाकुंभ को मृत्युकंभ तक कह दिया। विपक्षी नेताओं के इतना सब कहने के बाद भी महाकुंभ के दौरान पवित्र स्नान करनेवाले श्रद्धालुओं की संख्या का कीर्तिमान बना। एक अनुमान के मुताबिक इस महाकुंभ में बड़ी संख्या में युवाओं ने भी आस्था की डुबकी लगाई। इसको युवाओं के सनातन की ओर बढ़ते झुकाव या फिर अपनी जड़ों की ओर लौटने की तरह देखा जा रहा है। विपक्षी नेता भले ही वोटबैंक के लोभ-लालच में सनातन के इस विशेष आयोजन को लेकर उलजलूल टिप्पणियां कर रहे थे लेकिन भारत के जन का मन कहीं और रमा था। 

इस वातावरण को देखकर प्रेमचंद के एक लेख का स्मरण हो रहा है। प्रेमचंद का एक निबंध है, स्वराज्य के फायदे। इस निबंध में प्रेमचंद ने स्वाधीनता के फायदे गिनाए हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा फायदा बताया है वो इस प्रकार है। प्रेमचंद कहते हैं, स्वराज्य से देश को सबसे बड़ा फायदा जो होगा वह भारतीय जीवन का पुनरुद्धार है। प्रत्येक जाति के जीवन में कोई प्रधान गुण होता है। अंग्रेज जाति का प्रधान गुण पराक्रम है, फ्रांसिसियों का प्रधान गुण स्वतंत्र प्रेम है, उसी भांति भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता है। हमारे जीवन का मुख्य आधार धर्म था। हमारा जीवन धर्म के सूत्र में बंधा हुआ था। लेकिन पश्चिमी विचारों के असर से हमारे धर्म का सर्वनाश हुआ जाता है, हमारा वर्तमान धर्म मिटता जाता है, हम अपनी विद्या को भूलते जाते हैं। अपने रहन-सहन, रीति-रिवाज से विमुख होते जाते हैं। हमारा अद्वितीय सामाजिक संगठन छिन्न-भिन्न हुआ जाता है। पश्चिम की देखादेखी हम धनोपार्जन को ही जीवन का लक्ष्य मानने लगे हैं। संपत्ति को ही सर्वापरि समझने लगे हैं। यही हमारा धर्म हो गया है। 

ज्ञान का, संतोष का, कर्तव्यपालन का , त्याग का महत्व हमारी निगाहों में उठता जाता है। हम विद्या को धर्म समझ कर सीखते और सिखाते थे, चाहे वो गान विद्या हो, धनुर्विद्या हो या कोई अन्य विद्या हो। अब हम उसे धनोपार्जन के लिए सीखते और सिखाते हैं। हममें परस्पर प्रेम नहीं रहा, सहानुभूति नहीं रही। हमारी मैत्री, हमारा प्रेम, हमारी सदिच्छाएं, हमारे ह्रदय की उच्च वृत्तियां, सभी धन इच्छा के नीचे दबती जाती हैं। सारांश यह है कि हम अपनी आत्मा को भूलते जाते हैं। स्वराज्य पाकर हम अपनी आत्मा को पा जाएंगे। हमारे धर्म का उत्थान हो जाएगा। अधर्म का अंधकार मिट जाएगा और ज्ञान भास्कर का उदय होगा।...हम किसी जाति के पिछलग्गू न बनकर संसार सभा में उचित स्थान पर बैठेंगे। हमारी गणना दीन हीन परवश जातियों में न होकर उन जातियों में होने लगेगी जिनके हाथों में संसार की बागडोर है।...हम उन्नत और बलवान जातियों के सम्मुख बैठने के अधिकारी हो जाएंगे। 

प्रेमचंद की उपर्युक्त टिप्पणी में दो महत्वपूर्ण बात है। एक तो जब वो कहते हैं कि भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता है और हमारा पूरा जीवन धर्म के सूत्र में बंधा हुआ है। उनके इस वाक्य से समझा जा सकता है कि भारतीय समाज जीवन में धर्म का कितना महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा। जब वो पश्चिमी विचार की बात करते हैं तो उनके दिमाग में क्या रहा होगा ये कहना कठिन है। अनुमान लगाया जा सकता है कि वो उन विचारों की चर्चा कर रहे होंगे जिसने भारत के मूल विचार पर प्रहार किया। प्रश्न उठ सकता है कि क्या वो मार्क्स और उनके विचारों की ओर इशारा कर रहे थे? प्रेमचंद ने इस निबंध के आरंभ में भी स्वराज्य के फायदे को गिनने को ईश्वर के गुणों को गिनने जैसा बताया है। सिर्फ इस निबंध में ही नहीं बल्कि प्रेमचंद ने अपने लेखन में अन्यत्र भी ईश्वर और भगवान का स्मरण किया है। प्रेमचंद सनातनी थे। सनातन और भारत में उनकी पूर्ण आस्था थी। बावजूद इसके अकादमिक जगत के वामपंथी विचार के शिक्षकों ने उनको जबरदस्ती वामपंथी घोषित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। दूसरी बात ये देखी जानी चाहिए कि प्रेमचंद ने जाति शब्द का उपयोग किन अर्थों में किया है। वो अंग्रेजों को फ्रांसीसियों को भारतीयों को एक जाति के तौर पर देखते हैं। उनके लिए जाति का मतलब एक तरीके से राष्ट्रीयता है। बाद में पता नहीं किन परिस्थियों में जाति को समूह विशेष के साथ जोड़ दिया गया। यह पूरा मसला एक अलग अध्ययन की मांग करता है। 

प्रेमचंद भारत में जिस धर्मपरायणता की बात कर रहे हैं वो भारतीयों का मूल जीवन दर्शन है। प्रगतिशीलता के दावे करनेवालों के मन में कहीं न कहीं धर्म और उसकी परायणता को लेकर एक लगाव दिखता है। कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि धर्म और आस्था बहुत ही व्यक्तिगत चीज है, ऐसे लोग भी धर्म को लेकर भ्रमित होते हैं। वो धर्म को कर्मकांड समझ लेते हैं और उसके ही आधार पर धर्म की व्याख्या कर उसके फायदे और नुकसान गिनाने लगते हैं। धर्म ना तो फायदा देखता है और ना ही नुकसान। उसका उद्देश्य तो मानव कल्याण है। धर्म को अफीम बतानेवाली विचारधारा के अनुयायी इस बात को समझ नहीं पाते हैं। अपने एजेंडे के अनुसार समाज में शोर मचाते हैं। धर्म के विरोध में वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं। प्रेमचंद ने पराधीनता के कालखंड में ही इस बात का अनुमान लगा लिया था कि अगर भारत की जनता धर्म की ओर उन्मुख होती है तो संसार सभा में हमारे देश को उचित स्थान मिल सकेगा। आज वैश्विक स्तर पर भारत की जो स्थिति है उसको प्रेमचंद के इस अनुमान के साथ मिलाकर देखने के स्पष्ट तस्वीर बनती है। वैश्विक परिदृष्य में आज भारत ना तो किसी जाति का पिछलग्गू है और ना ही कोई अन्य देश हमारी उपेक्षा करने के बारे में सोच भी सकता है। आज भारत को दीन-हीन परवश जाति बताने का साहस दुनिया का शक्तिशाली और विकसित देश भी नहीं कर सकते हैं। आज कोई भी इतिहासकार भारत के बारे में लिखते हुए इसको संपेरों का देश कहने का साहस नहीं कर पाएगा। यह भारतीय जनता की धर्मपरायणता का ही प्रतिफल है। सनातन का जितना उत्थान होगा भारत उतना सबल और शक्तिशाली होगा। धर्मो रक्षति रक्षित:।