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Saturday, March 26, 2016

चला निर्देशक हीरो बनने !

अपने छात्र जीवन में या यों कहें कि स्कूल के दिनों में जैकी श्रॉफ और मीनाक्षी शेषाद्रि की फिल्म हीरो देखी थी । उस फिल्म में उसके निर्देशक सुभाष घई चंद पलों के लिए दिखाई दिए थे । तब सुभाष घई को फिल्म में देखकर सिनेमा हॉल में तालियां बजी थीं और थोड़ा शोर भी हुआ था । तब मुझे इस बात को लेकर बहुत जिज्ञासा हुई  कि निर्देशक फिल्म में क्या करने आया था । बाद में लोगों ने बताया कि सुभाष घई अपनी हर फिल्म के किसी ना किसीसीन के कुछ फ्रेम में अवश्य नजर आते हैं । फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि सुभाष घई इसको अपनी फिल्मों के लिए शुभ मानते हैं । उनको लगता है कि वो जिस फिल्म में थोड़ी देर के लिए भी दिखाई देंगे वो फिल्म हिट हो जाएगी । उस वक्त मेरे लिए निर्देशक का पर्दे पर आना विसम्य था । तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि एक वक्त ऐसा भी आएगा कि फिल्मों के निर्देशक खुद नायकों की भूमिका में नजर आने लगेगे । अभी हाल ही में हिंदी फिल्मों के मशहूर निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म आई है – जय गंगाजल । अपनी इस फिल्म का निर्देशन भी प्रकाश झा ने ही किया है और उसमें मुख्य भूमिका में भी वही हैं । साठ साल के प्रकाश झा की एक्टिंग की चारो तरफ तारीफ अवश्य हुई । पुलिस अफसर की भूमिका में उनकी डॉयलॉग डिलीवरी से लेकर स्टंट आदि के सीन में भी उनके अभिनय की प्रशंसा हुई, बावजूद इसके फिल्म बुरी तरह से फ्लॉप रही । जय गंगाजल के फ्लॉप होने के बावजूद अभिनय को लेकर प्रकाश झा के हौसले बुलंद हैं । फिल्म के जानकारों के हवाले से खबर ये है कि प्रकाश झा अपनी अगली फिल्म में बतौर नायक काम करने जा रहे हैं । यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि प्रकाश झा को जिन दर्शकों ने निर्देशक के तौर पर भरपूर प्यार दिया वो उनको अभिनेता के तौर पर कितना पसंद करते हैं । लंबे वक्त से फिल्मों से जुड़े प्रकाश झा को अभिन की बारीकियों का तो पता है ही ।
ऐसा नहीं है कि प्रकाश झा इकलौते ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने फिल्म में अभिनय करना शुरू कर दिया है । इसके पहले अनुराग कश्यप की फिल्म बांबे वेलवेट में करण जौहर ने भी भूमिका निभाई थी । इस फिल्म में करन जौहर निगेटिव रोल में थे । छोटे पर्द पर अपनी सफलता से उत्साहित करन जौहर ने फिल्मों में काम करना शुरु किया लेकिन वो यहां कोई कमाल नहीं दिखा पाए । अनुराग कश्यप की ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थी । जबकि इस फिल्म में करन जौहर के अलावा अनुष्का शर्मा और रणबीर कपूर भी थे । ये फिल्म लेखक ज्ञान प्रकाश के उपन्यास मुंबई फेबल्स पर बनी थी । सिर्फ करन जौहर और प्रकाश झा ही क्यों नए निर्देशक के तौर पर अपनी पहचान कायम करने वाले तिग्मांशु धूलिया ने भी कई फिल्मों में काम किया । अपनी फिल्म साहब बीबी और गैंगस्टर में भी तिग्मांशू ने अभिनय किया । जिमी शेरगिल, माही गिल और रणदीप हुडा के साथ तिग्मांशु भी इस फिल्म में थे । ये फिल्म भी कोई जोरदार बिजनेस नहीं कर पाई लेकिन सफलता के लिहाज से ठीक-ठाक रही, कहा गया था कि इसने अपनी लागत निकाल ली थी । तिग्मांशु ने तो अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में मुख्य विलेन का किरदार निभाया था । तिग्मांशु भी इस फिल्म में निगेटिव रोल में थे और इस फिल्म में उनके अभिनय की भी काफी तारीफ हुई थी और इसने को बिजनेस भी अच्छा किया था । इलस फिल्म को देश विदेश में कई पुरस्कार भी मिले थे । जहां तक मुझे याद पड़ता है कि अनुराग कश्यप ने भी किसी फिल्म में अभिनय किया है ।
नब्बे के दशक के एकदम शुरुआत में लमहे और उसके बाद फिल्म हिमालयपुत्र के साथ बतौर
सहायक निर्देशक जुड़े फरहान अख्तर इन दिनों बेहद कामयाब हीरो हैं । फरहान अख्तर ने सबसे पहले 1991 में फिल्म लमहे का सहायक निर्देशन किया लेकिन निर्देशक के तौर पर उनकी पहली फिल्म रही दिल चाहता है । इस फिल्म से फरहान अख्तर को एक नई पहचान तो मिली ही निर्देशक के तौर पर सम्मान भी मिला । इसके बाद फरहान अख्तर ने दो हजार चार में लक्ष्य फिल्म बनाई और उसी साल लीवुड में भी उनकी एंट्री हुई । उन्होंने ब्राइड एंड प्रीज्यूडिस के लिए गाने लिखे । फरहान बेहद प्रतिभाशाली हैं और अपने पिता जावेद अख्तर की तरह लेखन में भी सिद्धहस्त हैं । निर्देशक के तौर पर उन्होंने शाहरुख खान को हीरे लेकर फिल्म डॉन बनाई जो कारोबार के लिहाज से सुपर पर हिट रही थी । सहायक निर्देशक के तौर पर करियर शुरू करने के सत्रह साल बाद फरहान अख्तर ने दो हजार आठ में रॉक ऑन के साथ अपने अभिनय के करियर की शुरुआत की । इस फिल्म को दर्शकों ने काफी सराहा और जमकर पुरस्कार आदि मिले । इसके बाद फरहान अख्तर ने फिल्म  जिंदगी मिलेगी ना दोबारा में सह अभिनेता का रोल किया । जिंदगीना मिलेगीदोबारा में फरहानम के अभिनय की प्रशंसा हुई तो उनके हौसले बुलंद हो गए ।  उसके बाद को उन्होंने भाग मिल्खा भाग से अपने अभिनय के झंडे गाड़ दिए । अभी हाल ही में उनकी एक फिल्म आई है वजीर जिसमें उन्होंने सदी के महानायक अभिताभ बच्चन के साथ अभिनय किया है । फरहान ने निर्देशक और अभिनेता के मिश्रण का एक आदर्श प्रस्तुत किया जिसमें वो दोनों भूमिकाओं में सफल रहे हैं । उनके बाद ये फेहरिश्त लंबी होनी शुरू हो गई है ।  
अब सवाल यही है कि फिल्मों ने निर्देशकों ने अभिनय करना क्यों शुरू कर दिया है । जो सबसे पहली बात सतह पर दिखाई देती है वो है ग्लैमर और लोगों के बीच अपने को पहचाने जाने की चाहत । पर्दे के पीछे के प्रोड्यूसर के मन में कहीं ना कहीं ये आकांक्षा दबी होती है कि वो भी पर्दे पर दिखे और लोग उनको भी पहचानें। जैसे न्यूज चैनल में खबरों को बनाने वाले प्रोड्यूसर्स को कोई जानता नहीं है क्योंकि वो कभी टीवी स्क्रीन पर नजर नहीं आता है । उसी तरह फिल्मों में भी प्रोड्यूसरों और निर्देशकों को कोई जानता नहीं है । पोस्टरों पर उनका नाम अवश्य होता है लेकिन उनकी तस्वीर आदि कहीं नहीं छपती । प्रोड्यूसर निर्देशक को लगता होगा कि जो अभिनेता उनकी मर्जी से अभिनय करते हैं, उनके कहे अनुसार किरदार में ढलते हैं । फिर सफल होकर लाखों लोगों के दिलों पर राज करते हैं तो क्यों ना वो खुद भी इस भूमिका में आएं । न्यूज चैनल के प्रोड्यूसर्स पर तो पेशगत व्यस्तता भी होती है क्योंकि उनको कई और काम करने होते हैं ।  लेकिन जो खुद फिल्म बना रहा है या जो खुद फिल्मों में पैसे निवेश कर या करवा रहा है उसको अभिनय करने से कौन रोक सकता है । एक तो ये मानसिकता हो सकती है जो निर्देशकों को अभिनय की ओर खींच कर लेकर आती है । दूसरी बात ये हो सकती है कि कुछ निर्देशकों को लगता होगा कि अभिनेताओं को बताने के बाद भी अगर वो किरदार को पर्दे पर सही तरीके से उतार नहीं पा रहे हैं तो वो खुद उस किरदार में घुसकर उसको जीवंत कर सकते हैं । यह सोच भी निर्देशकों के अभिनेता बनने की राह तैयार करती है । एक और बात है वो ये कि जब से हिंदी फिल्मों में चॉकलेटी हीरो का दौर खत्म हुआ है और हर तरह के चेहरे मोहरे, काले गोरे हीरो हिट होने लगे हैं तो निर्देशकों के सामने भी सुंदर होने या दिखने की बाध्यता खत्म हो गई है । उनको लगता है कि दर्शक को बेहतर अभिनय के आधार पर किसी भी अभिनेता को पसंद या नापसंद करते हैं । लिहाजा वो खुद से ये अपेक्षा करते हैं या मान लेते हैं कि किसी खास किरदार के लिए वही सबसे फिट हैं । अब अगर जय गंगाजल की बात की जाए और उसमें डीएसपी की भूमिका में प्रकाश झा की बात हो तो ये लगता है कि वो इस किरदार के लिए सबसे ज्यादा सुटेबल थे । जिस तरह से उन्होंने लखीसराय के अधेड़ और घूसखोर सर्कल बाबू की भूमिका निभाई है उसमें वो फिट बैठते हैं । फिर अब तो कम उम्र हीरो के सफल होने की बात भी बीते दिनों की बात हो गई । अब तो लगभग सभी सुपर स्टार पचास पार के हैं ऐसे में निर्देशकों को भी लगता है कि किसी भी उम्र में वो अभिनय करने के लिए उतर सकते हैं और अपनी सफलता का परचम लहरा सकते हैं ।

     

2 comments:

Sajid Ashraf said...

सर अच्छा लिखा है आपने , लेकिन राज कपुर और गुरु दत्त का भी ज़िक्र कर देते तो फेहरिस्त और भी लम्बी हो जाती ,अनुराग कश्यप ने फिल्म शागिर्द में नाना पाटेकर के साथ ऐक्टिंग की है , महेश मांजरेकर ने फिल्म कांटे समेत कई फिल्मों में ऐक्टिंग की है , सुधीर मिश्रा का ज़िक्र भी ज़रूरी है . कहने का मतलब है बॉलीवुड में हीरो बनने डायरेक्टर आज ही नहीं चला . इस चलन की शुरुआत उतनी ही पुरानी है जितना बॉलीवुड का इतिहास . लेकिन अब आप्शन ज़्यादा है . फिल्म भाग मिल्खा भाग में फरहान अख्तर की ऐक्टिंग देख कर कौन कह सकता है की , मिल्खा के किरदार को फरहान से बेहतर कोई और निभा सकता था .

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " एक अधूरी ब्लॉग-बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !