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Saturday, May 11, 2013

लेखकों की उपेक्षा का जिम्मेदार कौन

अभी कुछ दिनों पहले फेसबुक पर टहलते हुए वरिष्ठ पत्रकार और फिलहाल यायावरी कर रहे मित्र अरविंद कुमार सिंह की वॉल पर उनका पोस्ट पढ़ा जो कुछ यूं था- रचनाकारों के प्रति सम्मान...ताजिकिस्तान है तो छोटा देश, लेकिन यहां के लोग अपने लेखकों, कवियों और रचनात्मक प्रतिभाओं वाले लोगों का बेहद सम्मान करते हैं..तजाकिस्तान की मुद्रा यानि नोटों पर सबसे ज्यादा तस्वीरें रुदाकी से लेकर तमाम बड़े लेखकों और कवियों की ही मिलेगी..जगह-जगह उनके स्मारक तो हैं ही उनके बारे में विवरण भी पढ़ने को मिल जाते हैं...जीवन परिचय सहित..सरकारी दफ्तरों से लेकर तमाम सार्वजनिक जगहों और पार्कों और लोगों की जेबों तक में इनकी यादें जीवित हैं....और भारत में..... । चंद साल पहले हिंदी के आलोचक भारत भारद्वाज ने क्यूबा की यात्रा से लौटकर कुछ इसी तरह की बात की थी और बताया था वि वहां भी लेखकों और कवियों के नाम पर एयरपोर्ट से लेकर इमारतों तक के नाम हैं, सड़कें तो हैं ही उनके नाम पर । अरविंद जी की इस वॉल पोस्ट से कई बड़े सवाल खड़े होते हैं । अरविंद ने जहां भारत में कहकर छोड़ दिया है सवाल वहीं से उठते हैं । भारत में लेखकों और कवियों को लेकर हमारे समाज में उत्साह क्यों नहीं बन पाता है । देश की राजधानी दिल्ली में तमाम छोटे बड़े नेताओं के नाम पर सड़कों के नाम हैं लेकिन सुब्रह्मण्यम भारती और दिनेश नंदिनी डालमिया को छोड़कर शायद ही दिल्ली तक में कोई सड़क हमारे साहित्यकारों के नाम पर है । मुझे नहीं याद है कि भारत के किसी शहर में कोई हवाई अड्डा साहित्यकारों के नाम पर है । क्या प्रेमचंद से लेकर निराला तक, रामधारी सिंह दिनकर से लेकर मैथिलीशरण गुप्त तक किसी भी साहित्यकार ने समाज को इतना प्रभावित नहीं किया कि हम उनका ऋण उतारने के लिए इतना भी सम्मान उनको दे सकें । आज देश के हर गली कूचे में आपको जवाहर लाल नेहरू से लेकर, संजय गांधी, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के नाम की पट्टिका लगी मिल जाएगी । देश के कई एयरपोर्ट से लेकर अस्पताल और स्कूल कॉलेज गांधी परिवार के इन लोगों के नाम पर हैं । संजय गांधी को छोड़कर इन लोगों का देश के प्रति बहुत योगदान रहा है, लिहाजा उनके नाम पर सड़क इत्यादि का नाम रखने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन क्या हमारे लेखकों ने इस देश के लिए कुछ नहीं किया । क्या देश की आजादी में हिंदी के लेखकों का कोई योगदान नहीं है । या फिर हमारे समाज में लेखकों को लेकर कोओई उत्साह नहीं है ।
एक जमाना था जब राज्यसभा में साहित्यकार के कोटे से मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन और श्रीकांत वर्मा जैसे कवि लेखकों का मनोमयन होता था । लेकिन कालांतर में यह क्रम भी टूटा और अब साहित्यकार और कलाकार के कोटे से अब तो लोकसभा चुनाव हारे राजनेताओं का मनोनयन होने लगा । । आजादी के पहले और बाद में भी हिंदी में कई ऐसे लेखक हुए जिनको समाज में हीरो का दर्जा तो प्राप्त है लेकिन उनकी मृत्यु के बाद हम उनको लगभग भुला बैठे हैं । 
अब अगर हम इसकी वजहों की तलाश करते हैं तो सिर्फ और सिर्फ एक वजह सतह पर आते हैं वह है लेखकों के प्रति उपेक्षा के भाव का बढ़ते जाना । दूसरी वजह यह है कि देश का जो राजनीतिक वर्ग है उनका पढ़ने लिखने से रिश्ता कम होते जाना । आज के नेताओं में चाहे वो शासक वर्ग के हों या फिर विपक्ष में बैठने वाले, मौलिक लेखन और चिंतन करनेवाले कम हैं या ये कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लिखने पढ़ने की संवेदनशीलता लिए कोई नेता अब बचा ही नहीं है । बातों बातों में जब मैंने हंस संपादक राजेन्द्र यादव से इस बारे में बात की तो उन्होंने भी कमोबेश यही कहा । राजेन्द्र जी का मानना है कि शासक वर्ग की लेखकों और उनकी रचना के बारे में अज्ञानता ही इसकी वजह है कि हमारे देश में लेखकों को अहमियत नहीं मिल पाती है । इसके अलावा राजेन्द्र जी ने यह भी माना कि आज के राजनेताओं में संवेदनशीलता भी नहीं के बराबर बची है चाहे वो समाज के प्रति हो या किसी व्यक्ति के प्रति तो फिर लेखकों के लिए उनके मन में कहां से सम्मान आएगा । यही राजनेता यह भी तय करते हैं कि कौन सी इमारत या कौन सी सड़क या फिर कौन सी योजना अमुक व्यक्ति के नाम पर बनेगी ।
यह तो रही नेताओं और देश के नीति नियंताओं की लेखकों और लेखक समाज के बारे में अज्ञानता की बात । नेताओं ने लेखकों को नजरअंदाज किया इस बारे में कोई शक शुबहा नहीं है लेकिन लेखक बिरादरी को भी एक बार अपने गिरेबां में झांक कर देखना होगा । आजादी के बाद के जिन लेखकों के बारे में हम बात कर रहे थे या फिर जिनको पार्लियामेंट की मेंबरी मिली थी उसके बाद की पीढी के लेखकों ने क्या समाज के प्रति अपनी उस भूमिका का निर्वाह किया जो उनसे अपेक्षित था । क्या अब लेखक समुदाय से समाज के किसी मुद्दे पर संगठित आवाज सुनाई देती है । यूपीए सरकार के दौरान जब देश में एक से बढ़कर एक घोटाले हो रहे थे तो लेखकों ने उसके खिलाफ कोई आवाज उठाई । क्या किसी भी बड़े लेखक ने भ्रष्टाचार के खिलाफ चले आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई । क्या अपनी लेखनी से किसी आंदोलन को समर्थन दिया या फिर उसके समर्थन में माहौल बनाने में कोई भूमिका निभाई । इसके अलावा जब पिछले साल दिल्ली में चलती बस में एक मेडिकल की छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ तो लेखक समुदाय ने उसके बारे में कोई टिप्पणी की । हो सकता है कि राजेन्द्र जी ने हंस के संपादकीय में या एक दो अन्य लेखकों ने छिटपुट रचनाएं लिखी हो लेकिन कोई संगठित लेखन नहीं हुआ जिससे कि समाज में एक वातावरण बन सके, सरकार पर दबाव बन सके । जब हम समाज के किसी मुद्दे पर लेखक अपनी राय नहीं प्रकट करेंगे या फिर समाज पर अपने विचारों की छाप नहीं छोड़ेंगे तब तक क्यों कर कोई राजनेता उनको जानेगा या उनके बारे में कुछ करने की सोचेगा । सत्ता का अपना व्याकरण होता है और वह उसी के हिसाब से चलती है । जरूरत लेखक समुदाय को भी उस व्याकरण को अपने हिसाब से बदलने की है ।

Saturday, May 4, 2013

संसदीय संस्था की बर्बादी

इन दिनों एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपए के टेलीकॉम घोटाले में संसद की संयुक्त संसदीय कमेटी के अध्यक्ष और कांग्रेस नेता पी सी चाको की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं । चाको के पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा को कमेटी के सामने नहीं बुलाने के फैसले पर विरोधी दल के सदस्य खासे लाल-पीले हो रहे हैं । इस मामले में लंबे समय तक जेल काट चुके डीएमके के नेता और पूर्व मंत्री राजा ने जेपीसी के सामने पेश होकर अपनी सफाई देने का अनुरोध किया था जिसे चाको ने खारिज कर दिया । दरअसल चाको प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम को आरोपों के घेरे में आने से बचाने की कोशिश में जुटे हैं । राजा के तर्क हैं कि दो हजार सात के स्पेक्ट्रम आवंटन के पहले उन्होंने प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्त मंत्री से इस बारे में विस्तार से चर्चा की थी । राजा ने अपने 100 पेज की चिट्ठी में दावा किया है कि नवंबर 2007 से लेकर जनवरी 2008 के बीच उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से व्यक्तिगत मुलाकात कर दोनों को अपनी नीतियों का बारे में जानकारी दी थी । राजा का कहना है कि पहले आओ पहले पाओ की नीति के बारे में भी उन्होंने प्रधानमंत्री और उनके दफ्तर को बता दिया था । लेकिन जेपीसी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में इसका कोई जिक्र नहीं है । विपक्ष के नेताओं का आरोप है कि ड्राफ्ट रिपोर्ट में प्रधानमंत्री कार्यालय के आला अफसर पुलॉक चटर्जी और पीएम के उस वक्त के प्रधान सचिव टी ए के नायर ने 29 दिसंबर 2007 को पीएम के निर्देश पर पहले आओ पहले पाओ की नीति की समीक्षा की थी और उसमें तीन चरणों में बदलाव पर सहमति जताई थी । लेकिन जेपीसी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में इसका कोई जिक्र नहीं है । विपक्ष का आरोप है कि अगर राजा दोषी हैं तो फिर प्रधानमंत्री इसकी कालिख से कैसे बच सकते हैं ।  लिहाजा जेपीसी अध्यक्ष और उसके ड्राफ्ट रिपोर्ट को लेकर विपक्ष ने आसमान सर पर उठा रखा है । पहले जेपीसी गठन की मांग को लेकर संसद ठप रहा और अब जेपीसी की ड्राफ्ट रिपोर्ट पर हंगामा जारी है । संसदीय व्यवस्था का मजाक बन रहा है और लगातार संसद की कार्रवाई ठप होने से जनता भी खिन्न हो रही है ।  
दरअसल हमारे देश की संसदीय व्यवस्था में संयुक्त संसदीय समिति की परंपरा को शुरुआत से ही गलत तरीके से अपनाया गया  जिसकी वजह से कालांतर में यह समिति राजनीति का अखाड़ा बनती चली गई । 1947 में जब देश आाजद हुआ और उसके बाद संसदीय परंपरा को लेकर संविधान सभा में लंबी लंबी बहसें हुई और सभा के विद्वान सदस्यों के बीच तर्कों का लंबा दौर चला था । उसके बाद यह तय किया गया था कि देश में इंगलैंड की तर्ज पर ही संसदीय व्यवस्था को अपनाया जाए । हमने अपने देश की संसद को इंगलैंड की हॉउस ऑफ कामंस और हाउस ऑफ लॉर्ड्स की परंपराओं और कार्यवाहियों के हिसाब से ही चलाना तय किया, जिसे वेस्टमिनिस्टर मॉडल भी कहते हैं । संविधान के निर्माताओं ने यह भी तय किया था कि संसद का बहुत सारा काम उसकी समितियों के जरिए हुआ करेगी । समितियों को मिनी संसद का अघोषित सा दर्जा दिया गया । इन्हीं समितियों में से एक संयुक्त संसदीय समिति भी है । इसमें दोनों सदनों के सदस्य होते हैं । उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि ये राजनीति से उपर उठकर देशहित से जुड़ों अहम मसलों पर माथापच्ची करें और अपने सुझाव दें । हमने जिस तरह से इंललैंड की अलिखित परंपराओं से प्रेरणा ली और अपने मनमुताबिक उसकी व्याख्या करते चले गए उससे कई समितियों के काम करने का अर्थ ही बदलता चला गया ।  संसद की संयुक्त समिति को हमने अपने यहां जिस तरह से अपनाया वह घपले घोटालों की जांच करनेवाली कमेटी में तब्दील होती चली गई जो पक्ष-विपक्ष की राजनीति का बेहतरीन मंच बन गया । जहां हर राजनीतिक दल अपनी राजनीति के हिसाब से अपनी सियासी दांव चलने लगे । नतीजा यह हुआ कि संयुक्त समिति का इस्तेमाल जिस वेस्टमिनिस्टर मॉडल से हमने उठाया था वह उद्देश्य ही अपने रास्ते से भटक गया । इंगलैंड के लोकतांत्रिक इतिहास में बहुत कम मौकों पर संयुक्त संसदीय समिति का गठन हुआ लेकिन हमारे यहां तो हल्ला हंगामा करके विपक्ष ने जेपीसी की मांग मनवा ली या फिर अपनी खाल बचाने के लिए सरकार ने खुद से जेपीसी जांच का ऐलान कर दिया । देश को अहम मसले पर अपनी राय देने के बदले जेपीसी जांच एजेंसी में बदलती चली गई । आज भी इंगलैंड में पार्लियामेंट की एक स्थायी संयुक्त संसदीय समिति है जो मानवाधिकार से जुड़े मसलों पर सरकार को अपनी राय देती है । लेकिन हमारे देश में जेपीसी इन मसलों पर बनी ही नहीं । कभी शेयर घोटाले पर तो कभी कोला विवाद पर तो कभी टेलीकॉम घोटाले पर जेपीसी बनती रही । जहां पक्ष विपक्ष के नेताओं ने सैद्धांतिक सुक्षाव देने के बजाए राजनीतिक स्टैंड लिए और अपने दलसीय लाभ के लिए या फिर सरकार को घेरने के लिए जेपीसी के मंच का उपयोग किया ।
जिस तरह से भारत में संयुक्त संसदीय समिति में राजनीति हो रही है उससे संसद की साख को भी बट्टा लग रहा है और इस तरह की समितियों से जुड़े नेताओं की भी जनता के बीच सिर्फ हंगामा करनेवाले नेता की छवि बन रही है, एक संसदीय संस्था की गरिमा तो ध्वस्त हो ही रही है । लेकिन अफसोस और दुख की बात यह है कि इतनी गंभीर संसदीय संस्था की गरिमा लगातार ध्वस्त हो रही है और लोकसभा और राज्यसभा के अध्यक्ष और सभापति इसको बचाने की दिशा में कोई ऐसा कदम नहीं उठा रहे हैं जिससे इनकी गरिमा बची रह सके । हमें इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए कि क्या इतिहास हमें इस बात के लिए माफ करेगा कि हम अपनी संसदीय व्यवस्था की गरिमा नहीं बचा सके ।

Friday, April 26, 2013

ट्विटर का अराजक गणतंत्र

पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । हर हाथ को काम मिले ना मिले हर हाथ को मोबाइल फोन जरूर मिल गया है । घर में काम करनेवाली मेड से लेकर रिक्शा चलानेवाले तक अब मोबाइल पर उपलब्ध हैं । किसी भी देश के लिए यह एक बेहतर स्थिति है जहां समाज के सबसे निचले पायदान पर रहनेवालों को भी तकनीक का फायदा मिल रहा है । तकनीक के इस विस्तार से उनकी हालात में भी सुधार हुआ । कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम के दौरान हिंदी की वरिष्ठ लेखिका और महिला अधिकारों को लेकर अपने लेखन में बेहद सजग मैत्रेयी पुष्पा ने तकनीक की ताकत पर प्रकाश डाला था । मैत्रेयी ने कहा था कि आज गांव घर की बहुओं की ज्यादातर समस्याएं मोबाइल फोन ने हल कर दी हैं । बहुएं घूंघट के नीचे से फोन पर अपनी समस्याओं के बारे में अपने मां बाप को या फिर शुभचिंतकों को अपनी व्यथा बता सकती हैं । मैत्रेयी ने इसे स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में लगभग क्रांति करार दिया । मैत्रेयी पुष्पा की बातों में दम है । हो सकता है कि कुछ लोगों को ये समस्या का सरलीकरण लगे लेकिन महिलाओं की हालात को मोबाइल फोन ने बेहतर बनाया है साथ ही उनके हाथ में ताकत भी मिली है । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है ।
मोबाइल फोन की क्रांति के बाद जो विकास हुआ वह था इंटरनेट का फैलाव । तकनीक के विकास ने आज लोगों के हाथ में इंटरनेट का एक ऐसा अस्त्र पकड़ा दिया जो उनको अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म प्रदान करता है, बगैर किसी रोक टोक के । स्मार्ट फोन के बाजार में आने और उसकी कीमत मध्यवर्ग के दायरे में आने से यह और फैला । थ्री जी सेवा ने इसे और फैलाया । हाथ में इंटरनेट के इस औजार ने सोशल मीडिया पर लोगों की सक्रियता बेहद बढ़ा दी है । पहले तो ऑरकुट हुआ करता था जो नेट यूजर्स के बीच खासा लोकप्रिय था । बाद में सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने जोर पकड़ा और हर वर्ग के लोगों के बीच फेसबुक पर होने की होड़ लग गई । सोशल नेटवर्किंग साइट सोशल स्टेटस साइट में तब्दील हो गया । महानगरों के अलावा छोटे शहरों में फेसबुक पर होना अनिवार्य माना जाने लगा । जो लोग यह कहकर फेसबुक की खिल्ली उड़ाते थे कि फोन पर बात नहीं कर सकते वो वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर बात करेंगे वो लोग भी अब फेसबुक पर घंटों गुजारते हैं । दरअसल किसी भी नई तकनीक को पहले इस तरह की विरोध का सामना करना ही होता है और बाद में लोगों की आदतों में शुमार हो जाता है । जब अस्सी के दशक में कंप्यूटर आया था तो पहले उसका जमकर विरोध हुआ था । वामपंथियों और समाजवादियों ने इस बात को लेकर खासा बवाल मचाया था कि कंप्यूटर से बेरोजगारी बढ़ेगी । लोगों के हाथों से काम छिन जाएगा आदि आदि ।
हम बात कर रहे थे सोशल मीडिया साइट्स की । सोशल मीडिया साइट् फेसबुक ने लोगों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की आजादी दी । वहां किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं थी लिहाजा वह हुआ जिसका अंदाजा फेसबुक की कल्पना करनेवालों को नहीं रहा होगा । अभिव्यक्ति की जो आजादी मिली उसका कई लोगों ने, जिसकी संख्या भारत में बहुत ज्यादा थी, बेजा फायदा उठाया और राजनीतिक से लेकर व्यक्तिगत तक कई तरह की आपत्तिजनक बातें और फोटोग्राफ्स फेसबुक पर पोस्ट होने लगे । फेसबुक पर ऐसी भाषा भी लिखी जाने लगी जिसको पढ़ा नहीं जा सकता था । देश की राजनीतिक शख्सियतों के बारे में भद्दी और अनर्गल पोस्ट शुकु हो गए । फेक आईडी बनाकर लोगों की धार्मिक भावनाएं भड़कानें की कोशिशें भी खूब हुई । दोस्ती और सामाजिक मेल मिलाप के लिए बनाई गई साइट का इस्तेमाल अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने और अपमानित करने के लिए किया जाने लगा । अराजकता इस हद तक बढ़ गई कि सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा । सरकार के हस्तक्षेप के इरादे का पता चलते ही अभिव्यक्ति के आजादी के पैरोकार खड़े हो गए नतीजे में सरकार को अपने पैर वापस खींचने पड़े । कुछ कानून बने हैं जो इस तरह की बातों को रोकने में सक्षम हैं लेकिन जिसके बारे में कुछ कहा जा रहा हो वो अगर शिकायत ही नहीं करेगा तो कार्रवाई लगभग मुमकिन नहीं है । फेसबुक से निकलकर यह वायरस अब ट्विटर पर पहुंच गया है ।
ट्विटर पर अब राजनीकित विरोधी एक दूसरे को निबटाने में जुट गए हैं । इसका बेहतरीन नमूना दिखा था पिछले महीने जब राहुल गांधी एक उद्योग संगठन के कार्यक्रम में बोल रहे थे तो ट्विटर पर पप्पू नाम से उनके विरोधियों ने हैस टैग लगाकर लिखना शुरू कर दिया । इसका नतीजा यह हुआ कि ट्विटर पर पप्पू ट्रेंड करने लग गया । कांग्रेस से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि यह भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोगों की करतूत है । चंद दिनों बाद ही गुजरात के मुख्यमंत्री भी भाषण देने दिल्ली पहुंचे । तब अचानक से ट्विटर पर फेंकू ट्रेंड करने लगा । इस बार आरोप लगाने की बारी भारतीय जनता पार्टी की थी । उन्होंने कांग्रेस पर आरोप जड़ा कि फेंकू के पीछे उनकी पार्टी के लोग हैं । लेकिन तबतक तो सोशल नेटवर्किंग साइट पर राहुल गांधी पप्पू और नरेन्द्र मोदी फेंकू हो चुके थे । यह लड़ाई इतने पर ही नहीं रुकी । अभिव्यक्ति की आजादी अराजकता में बदल गई । दोनों पार्टियों से जुड़े उत्साही कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने ट्विटर पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी, नरेन्द्र मोदी और उनके संगठनों के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखनी शुरू कर दी । उत्साह इतना बढ़ता चला गया कि बात गाली गलौच तक पहुंच गई । कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि बीजेपी ने सोशल मीडिया पर काम करने के लिए एक पूरा सेल बना रखा है जो इस तरह की आपत्तिजनक बातें लिखता है । लेकिन बीजेपी इस बात से इंकार करती रही है । इस बीच इस तरह की खबरें भी आई कि कांग्रेस पार्टी ने भी सोशल मीडिया को लेकर एक भारी भरकर ग्रुप बनाया । यहां तक तो ठीक है लेकिन खुद को कांग्रेस का समर्थक होने का दावा करनेवाले एक इतिहासकार इन दिनों ट्विटर पर बेहद गंदी और बेहूदी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं । महिलाओं के लिए बेहद आपत्तिजनक बातें लिख रहे हैं जिसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है । इतिहासकार महोदय का तर्क है कि फासीवाद से निबटने के लिए गाली गलौच की आक्रामकता जरूरी है । अपने इस तर्क के समर्थन में वो मोजार्ट का नाम भी लेते हैं । उधर संघ और मोदी समर्थक भी कम नहीं है वो भी उसी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं । इस सबके बीच कुछ संवेदनशील लोग हैं जो ट्विटर पर इस तरह की गाली गलौच के बीच अपनी संवेदना बचाए हुए हैं ।
इस बीच एक सर्वे आया कि सोशल मीडिया इस बार दो सौ से ज्यादा लोकसभा क्षेत्रों पर प्रभाव डालेगी । इस खबर ने भी राजनीतिक दलों के कान खड़े कर दिए । आज हालात यह है कि ट्विटर पर आने और ट्विटरबाज बनने की होड़ लगी है चाहे वो नेता हो या अभिनेता । लेकिन साथ ही अब इस बात का भी वक्त आ गया है कि इन सोशल मीडिया बेवसाइट्स को लेकर कोई नीति बने जहां अराजकता की कोई जगह ना हो । अभिव्यक्ति की आजादी बहुत अच्छी बात है, सबको होनी चाहिए लेकिन जब यह आजादी अराजकता में बदलती है तो उसपर रोक भी लगाई जानी चाहिए । आज फेसबुक और ट्विटर एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं कि उनके लिए किसी तरह की गाइडलाइंस की सख्त जरूरत महसूस होने लगी है । इन साइट्स के लिए गाइडलाइंस जितनी जल्दी बन जाएं उतना अच्छा है वर्ना वर्चुअल की दुनिया की जंग एक दिन हकीकत बन जाएगी और अभिव्यक्ति की यह आजादी अराजकता के गणतंत्र में तब्दील हो जाएगा और तब हम फिर सरकार के हाथों में पाबंदी लगाने का हक दे देंगे जो कि लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं होगा ।

Sunday, April 14, 2013

सेक्स और साहित्य

पिछले साल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखिका अलका पांडे से उनकी किताबों पर बात हो रही थी । अलका पांडे ने अंग्रेजी में न्यूज एज कामसूत्र फॉर वूमन नाम से एक किताब लिखी थी । उन्होंने जो अनुभव बताए वो बेहद चौंकाने वाले थे । अलका जी बताया कि उनकी किताब के बाद उन्हें इरोटिक लेखक मान लिया गया । पार्टियों में उनसे अजीबोगरीब सवाल पूछे जाने लगे । उनको सेक्स क्वीन तक कहा गया । उसी तरह से मैत्रेयी पुष्पा पर भी अपने उपन्यासों में सेक्स प्रसंगों को लिखने के लिए लानत मसलामत की गई थी । उसके पहले मृदुला गर्ग के उपन्यास चितकोबरा को लेकर भी शुद्धतावादियों और नैतिकतावादियों ने कई सवाल खड़े किए थे । ऐसा नहीं है कि इस तरह के सवाल सिर्फ हिंदी लेखन में ही उठते रहे हैं । कुछ महीनों पहले बयालिस साल की पूर्व टेलीविजन स्क्रिप्ट राइटर ई एल जेम्स की पहली किताब– फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे जब प्रकाशित हुई तो उसको लेकर इंग्लैंड और अमेरिका में भी जमकर बवाल मचा । कुछ आलोचकों ने तो इसे मम्मी पॉर्न का खिताब दे डाला है तो कुछ इसको वुमन इरोटिका लेखन के क्षेत्र में क्रांति की तरह देख रहे हैं। अमेरिका में इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि इस किताब को पुस्तकालयों के लिए खरीदा जाए या नहीं। लंदन में कई पुरातनपंथी आलोचक इस किताब को पोर्नोग्राफी बताकर इसे खारिज करने पर उतारू हैं लेकिन जिस तरह से इस किताब की बिक्री हो रही है उसने तमाम आलोचनाओं को ध्वस्त कर दिया है। अमेरिका की एक टेलीविजन शो में तो एक एंकर ने इसे रैप फैंटेसी करार दे दिया। उधर कई फेमिनिस्ट लेखक-लेखिका भी इस उपन्यास के पक्ष में उठ खड़े हुए हैं और उन्हें लगता है कि इस उपन्यास ने महिलाओं के सेक्सुअल डिजायर पर अबतक पड़े पर्द को हटा दिया है, लिहाजा उस पर्दे के पीछे लेखन करनेवालों को तकलीफ हो रही है। ई एल जेम्स के पक्ष में खड़ी फेमिनिस्ट लेखिकाओं की दलील है कि इस किताब के बाद से महिलाओं को और खुलकर अपनी सेक्सुअल डिजायर के बारे में बात करने का साहस मिलेगा। सेक्सुअल डिजायर पर लिखना या फिर महिलाओं के इनर डिजायर पर लिखना हमेशा से दुधारी तलवार पर चलने जैसा होता है। जेम्स की इस किताब के साथ भी यही हो रहा है। डिक्शनरी में पोर्नोग्राफी का जो मतलब है वह यह है कि जिस लेखन को पढ़ने के बाद किसी की सेक्साकांक्षा में बढ़ोतरी ( मैटेरियल प्रोड्यूस्ड टू स्टीमुलेट सेक्सुअल एक्साइटमेंट) होती है। लेकिन लेखिका इस बात को लेकर लेखिका को सख्त आपत्ति है। उनका कहना है कि यह उपन्यास एक प्रेम कहानी है। उनके मुताबिक सेक्स प्रेम का अनिवार्य अंग है और जो भी प्रेम करते हैं वो सेक्स भी करते हैं। लेकिन यूरोप और अमेरिका में अबतक किताब और ई बुक के रूप में पचास लाख से ज्यदा प्रतियों के बिक जाने के बाद तमाम आलोचनाएं बेमानी हो गई हैं। यूनिवर्सल एंड फोकस ने उनसे पचास लाख डॉलर में उपन्यास पर फिल्म बनाने का अधिकार खरीदा है।
यह उपन्यास नायिका अनाशटेशिया और उसके प्रेमी ग्रे के इर्द गिर्द घूमता है। दोनों के बीच जिस तरह से प्यार की पींगे बढ़ रही होती है उससे यह तय हो जाता है कि ग्रे ही अन्ना का कौमार्य भंग करेगा। कौमार्य भंग करने के इस पल को दोनों विशेष बनाना चाहते हैं। वह अना के हाथ कुर्सी से हत्थे से बांधकर उसके साथ सेक्स करना चाहता है। जब अना को उसके BDSM (Bondage-discipline, dominance-submission, sadism-masochism) यानि कष्ट देकर सेक्स का आनंद लेने की प्रवृत्ति का पता चलता है तो पहले तो वो कुछ देर के लिए हिचकती है लेकिन फिर उसकी बात मान लेती है।
अमेरिका और यूरोप में इस बात को लेकर बहस चल रही है कि क्या ये सामान्य है। इस बात को लेकर भी बहस शुरू हो गई है कि क्या फीमेल इरोटिका या महिलाओं के इनर डिजायर पर इतनी खुलकर बात हो सकती है। आलोचक इस किताब को रूपर्ट कैंपबेल के स्नीरिंग लिप एंड हॉर्समैन थाईज, डायरीज ऑफ अनीस नैन, एरिका जांगस के फीयर ऑफ फ्लाइंग और नैंसी फ्राइड के उपन्यासों से आगे की कृति मान रहे हैं।
अभी हाल में ही सत्रह किताबें लिखकर मशहूर हो चुकी लेखिका और भारतीय अंग्रेजी महिला लेखन की स्टार राइटर शोभा डे की नई किताब ‘’सेठजी’’ छपकर आई है। शोभा डे के लेखन में सेक्स एक अनिवार्य तत्व की तरह आता है । तकरीबन तीन सौ पन्नों के इस उपन्यास में भी शोभा डे ने सेक्स के भरपूर प्रसंग डाले हैं। सेठजी – की महिला पात्र अमृता को जब उसका पुराना प्रेमी उत्तेजना के अंतरंग क्षणों में छोड़ता है तब जिस तरह से वो अपने आप को बाथरूम में रिलैक्स करती है, इसका वर्णन बेहद घटिया है । इस तरह के कई प्रसंग और अंतरंग क्षणों के वर्णन इस किताब में है। शोभा डे के इस तरह के लेखन के मद्देनजर ही ब्रिटेन के प्रख्यात साहित्यकार रेजीनॉल्ड मैसी ने अभी हाल ही में अपने भारत दौरे के दौरान कहा था कि- लोगों के भाग्य उदय होने के अलग-अलग कारण होते हैं। मशहूर लेखिका शोभा डे भारत में एक बड़ा नाम है लेकिन उनके मशहूर होने की प्रमुख वजह उनके द्वारा रचा जाने वाला अश्लील साहित्य है। वे एक खूबसूरत महिला हैं, स्टाइलिश हैं, लेकिन मैं उन्हें गंभीर लेखक नहीं मानता।‘’ इस तरह के विवाद और विमर्श अंग्रेजी में खूब होते हैं लेकिन भारत में जहां कालिदास दशकों पहले अभिज्ञान शाकुंतल लिख गए वहां इन मसलों पर खुलकर चर्चा नहीं होती है तो क्या इसे हम हिंदी का पिछड़ापन मानें ?

 

 

Saturday, April 13, 2013

खत्म होते पुस्तक बाजार


अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली के दरियागांज इलाके में रविवार को फुटपाथ पर लगनेवाले किताबों के बाजार में गया था । वहां जाकर पता चला कि बाजार का स्वरूप काफीबदल गया है । पहले वहां सिर्फ किताबें बिका करती थी लेकिन अब उन किताबों की दुकान के आगे स्टेशनरी और पुराने कपड़ों ने उनको नेपथ्य में डाल दिया है । दरअसल जब से लाल किले के पीछे लगनेवाले चोर बाजार को बंद किया गया है तब से ही वहां से हटाए गए दुकानदारों ने इस ओर रुख किया और जगह की कमी की वजह से वो किताबों के समांतर एक और लाइन लगाने लग गए । नतीजा यह हुआ कि किताबें पीछे चली गई । दिल्ली गेट से शुरू होकर जामा मस्जिद के गेट नंबर एक तक जानेवाली सड़क तक दरियागंज की इस किताब बाजार में तकरीबन दो दशक से जा रहा हूं । तब वहां एक लोहे का पुल भी हुआ करता था जो अब विकास और सौदर्यीकरण की भेंट चढ़ चुका है । मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब उन्नीस सौ तिरानवे में दिल्ली आया था तो पहली बार किसी रविवार को अपने मित्रों के साथ उस बाजार में गया था । तब वह किताब बाजार काफी समृद्ध हुआ करता था । देश विदेश की हिंदी अंग्रेजी की तमाम किताबें वहां मिल जाया करती थी । बाजार शुरु होते ही आपको सबसे पहले आपको साइंस और अन्य विषयों की की किताबें दिखाई पड़ेंगी । गोलचा सिनेमा हॉल के पास पुराना सिक्का बेचने वाले के पास आते आते आपको सोशल साइंस और अन्य विषयों की किताबें दिखने लगती थी । फुटपाथ पर लगनेवाले इस बाजार में व्यक्तिगत लाइब्रेरी से निकाल कर कबाड़ी को बेच दी गई पुरानी किताबें, प्रकाशकों के यहां से चोरी से लाई गई किताबें और पुस्तकालयों से उड़ाई गई किताबें बिका करती थी । मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैंने दास कैपिटल की प्रति सात रुपए में इसी बाजार से खरीदी थी । उस किताब पर दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर हिंदू कॉलेज की लाइब्रेरी की मुहर लगी थी । इसके अलावा हिंदी के एक प्रसिद्ध आलोचक को लेखकों द्वारा समर्पित कई किताबें भी इस बाजार में दिखाई देती थी । उसपर लिखा समर्पण देखकर एकबारगी यह लगा था कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक कितने कठोर होते हैं जो प्यार और आदर से दी गई किताबों को भी कबाड़ में बेच देते हैं । बात में यह धारणा और पुष्ट हो गई जब उन आलोचक को भेंट की गई किताबें नियमित अंतराल पर उस बाजर में दिखाई देने लगीं ।  

रविवार को लगने वाले इस किताब बाजार में मोलभाव का बेहद अलग मनोविज्ञान काम करता है । अगर आपको कोई किताब पसंद आ गई और आपने अपनी प्रसन्नता जाहिर कर दी तो समझ लीजिए कि आपको उस किताब की मंहमांगी कीमकत अदा करनी होगी । इस तरह के बाजार में तो ग्राहकों को अपनी प्रसन्नता जाहिर ही नहीं करनी होती है । अगर कोई किताब पसंद भी आ जाए तो उसको बस यूं ही अनमने ढंग से उठाकर दाम पूछना होता है । कहने का मतलब यह कि फुटपाथ पर चलनेवाले किताबों के इस बाजार के नियम कानून बाजार के नियम कानून से भिन्न होते हैं । वहां के दुकानदारों और ग्राहकों के बीच एक अलग ही तरह का रिश्ता होता है । दरअसल फुटपाथ पर लगनेवाले इस तरह के किताब बाजार देश के अनेक छोटे बड़े शहरों में लगते रहे हैं । मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन से लेकर कोलकाता के गरियाहाट और गोलपार्क के बीच फुटपाथ से लेकर अहमदाबाद के एलिस ब्रिज से लेकर मद्रास रेलवे स्टेशन के ठीक बगल की एक इमारत में पुरानी किताबों का बाजार रविवार को सजा करता था । कोलकाता के किताब बाजार में तो मार्कसवादी साहित्य की ही धूम रहा करती थी । कोलकाता का कॉलेज स्ट्रीट को तो ज्ञान का पुंज ही माना जाता था । कहा जाता था कि वहां हर तरह की किताबें मिल जाया करती थी । अस्सी के दशक में कोलकाता और मुंबई की फुटपाथी दुकानों को देखा था । कोलकाता की इन दुकानों पर वामपंथी और मार्क्सवादी साहित्य बहुतायत में मिला करती थी । 1987 में मैक्सिम गोर्की का कालजयी उपन्यास मां की प्रति वहीं से खरीदी थी । अस्सी के ही आखिरी दशक में मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन के फुटपाथ पर किताबों की दुकानों पर घंटों बिताया था । दिल्ली और कोलकाता की तुलना में वहां किताबों की कीमत में ज्यादा मोलभाव नहीं होता था । वहां फुटपाथी दुकानों के मालिक आपसे किताबों पर विमर्श कर सकते थे, इस विषय से जुड़ी अन्य किताबों के बारे में आपको जानकारी दे सकते थे । कहने का मतलब यह है कि वहां के दुकानदारों की किताब और उसके विषयों को लेकर समझ दिल्ली के फुटपाथी किताब बेचनेवालों से बेहतर थी । कोलकाता में तो दुकानदारों पर भी लाल रंग ही चढ़ा रहता था । वो बातचीत में हमेशा बुर्जुआ से लेकर क्रांति की डींगें हांका करते थे ।

एक और चौंकानेवाली बात जो इस बार दरियागांज के इस किताब बाजार में महसूस हुई वह यह कि अब वहां हिंदी की बहुत कम किताबें उपलब्ध हैं । तकरीबन बीस साल पहले दरियागंज की इन पटरियों पर आपको विश्व क्लासिक्स के साथ साथ हिंदी की अहम कृतियां भी मिल जाया करती थी । चाहे वो निराला की कोई कृति हो या फिर जयशंकर प्रसाद या रेणु की किताब । हंस का साहित्य संकलन जो बालकृष्ण राव और अमृतराय के संपादन में संभवत 1957 में निकला था की प्रति भी 1994 में मुझे वहीं से मिली थी । हंस के उस अंक में रामकुमार का जार्ज लुकाच से मुलाकात पर बेहद रोचक संस्मरण छपा था । मैक्सिम गोर्की की कालजयी कृति मां भी वहीं से खरीदी थी। सारिका और धर्मयुग के पुराने अंकों के अलावा नई कहानियां का प्रवेशांक भी मुझे वहीं से मिल पाया था । नई कहानियां को वह प्रवेशांक मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी से कहीं गुम हो गया है लेकिन उसका स्कैन किया गया कवर अब भी मेरे पास है । इसके अलावा आजादी के बाद निकले कई साहित्यक पत्रिकाओं के अंक भी आसानी से दरियागंज में उपलब्ध थे । लेकिन समय के साथ साथ हिंदी की पुरानी पत्रिकाएं फुटपाथ से गायब होते चली गई । और अब तो हालात यह है कि एक दो दुकानों को छोड़कर हिंदी की किताबें भी नहीं मिल पा रही हैं । फुटपाथ से हिंदी की किताबें गायब होने के पीछे क्या वजह हो सकती है । यह किस ओर इशारा करती है , इसके क्या निहितार्थ हैं इस बारे में विचार करना आवश्यक है । वहां लंबे समय से हिंदी की किताबें बेचनेवाले अजीज अहमद से पूछने पर पता चला कि हिंदी की किताबों में रुचि लेनेवाले ग्राहकों की संख्या में कमी आई है । उन्होंने एक और चौंकानेवाली बात बताई । उनका कहना था कि पहले दिल्ली के विश्वविद्यालयों के छात्र हिंदी और वैचारिक किताबों की खोज में यहां आते थे लेकिन अब यहां आनेवाले छात्रों की संख्या में कमी आई है और जो छात्र यहां आते हैं वो अंग्रेजी की हल्की फुल्की किताबें खरीदने में रुचि रखते हैं । उन्होंने साफ तौर पर बताया कि यह बाजार है और यहां मांग के अनुसार ही उपलब्धता होती है । अहमद के इस बयान के बाद यह सवाल खड़ा हो गया कि क्या सचमुच देश की राजधानी के युवाओं की रुचि हिंदी साहित्य में कम हुई है । अगर यह संकेत मात्र भी है तो यह हिंदी जगत के लिए बेहद चिंता की बात है । उससे भी चिंता की बात है इन बाजारों का सिमटना । दिल्ली में किताबों के रविवारीय बाजार के अलावा कोलकाता में भी गरियाहाट वाले बाजार को बंद करवा दिया गया । एलिस ब्रिज के नीचे लगनेवाले बाजार में भी किताबों की दुकानों की संख्या कम हो रही है । इन बाजारों के सिमटने से पुस्तक संस्कृति के सिमटने का संकेत मिल रहा है । पुस्तक संस्कृति किसी भी विकासशील समाज के लिए एक मजबूक आधार प्रदान करती है लेकिन हिंदी में पुस्तक संस्कृति को लेकर एक उदासीनता का माहौल देखकर निराशा होती है । जिनपर इस तरह की संस्कृति को विकसित करने का दायित्व है वह भी अपने दायित्वों के प्रति उदासीन दिखाई देते है ।
 

   

Saturday, March 23, 2013

पुरस्कार का कारोबार


इन दिनों उत्तर प्रदेश में साहित्यिक पुरस्कारों की बाढ़ आई हुई है । मायावती के शासनकाल के दौरान रुके या रोके गए साहित्यक पुरस्कारों को अर्पित किया जा रहा है । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन पुरस्कार अर्पण समारोह में शिरकत कर रहे हैं और गाजे बाजे के साथ पुरस्कृत साहित्यकारों का सम्मान किया जा रहा है । पुरस्कार समारोह में युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की उपस्थिति से उम्मीद भी जगती है कि अब उत्तर प्रदेश की समृद्ध साहित्यक विरासत को इस शासनकाल में फिर से अहमियत मिलेगी । मुख्यमंत्री ने पिछले शासनकाल में पुरस्कारों के बंद होने को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए अगले साल से सम्मान राशि बढ़ाने का भी ऐलान किया । अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि साहित्य शाश्वत होता है और वो समाज को रास्ता भी दिखाता है । यह सब तो ठीक था, उम्मीद भी जगा गया । लेकिन इन पुरस्कारों से कई सवाल भी खड़े हो गए हैं । इस बार का यश भारती पुरस्कार हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव को दिया गया है और सम्मान स्वरूप उन्हें ग्यारह लाख रुपए भी मिलेंगे । आमतौर पर यादव जी पुरस्कार नहीं लेते लेकिन लखटकिया पुरस्कारों से उन्हें परहेज भी  नहीं है । उनका तर्क होता है कि पुरस्कार राशि को वो हंस में लगा देते हैं और हंस पत्रिका को चलाने के लिए वो कहीं से भी राशि ले सकते हैं । तमाम विरोध के बावजूद बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का गुणगान करनेवाले विज्ञापन तो वो छापते ही रहते हैं । लेकिन यह एक अवांतर प्रसंग हैं । लेकिन यादव जी के अलावा जिन दो लेखकों को यह पुरस्कार दिया गया है, साहित्य जगत अबतक उनसे अपरिचित है । यह उसी तरह से है जब साहित्य अकादमी के जनरल काउंसिल में प्रोफेसरों के कॉकस एक दूसरे को चुनते हैं जिनका साहित्य में कोई योगदान नहीं है ।
बात हिंदी में पुरस्कारों की हो रही थी । हिंदी में पुरस्कारों की महत्ता और प्रतिष्ठा लगातार कम होती जा रही है । हिंदी में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार साहित्य अकादमी सम्मान को माना जाता था लेकिन पिछले एक दशक से जिस तरह से साहित्य अकादमी पुरस्कारों की बंदरबांट हुई है उससे अकादमी पुरस्कारों की साख पर बट्टा लगा है । दो हजार एक से लेकर दो हजार दस तक की साहित्य अकादमी पुरस्कारों के लिए बनाई गई पुस्तकों की आधार सूची पर नजर डालने से यह बात और साफ हो जाती है । दो हजार तीन में जब कमलेश्वर को उनके उपन्यास - कितने पाकिस्तान - पर साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था तो उस वक्त की आधार सूची में इकतीस लेखकों के नाम थे जिसे मृदुला गर्ग ने तैयार किया था । इस सूची में तेजिन्दर, गौरीनाथ, हरि भटनागर, संजना कौल और जयनंदन आदि के नाम शामिल थे । तब अकादमी पर यह आरोप लगा था कि कमलेश्वर का नाम पहले से तय था । कई अखबारों ने तो उस वक्त पुरस्कारों के ऐलान के पहले ही उनके नाम का खुलासा कर दिया था । दो हजार चार में तो और भी आरोप लगे थे । पुरस्कार मिला था वरिष्ठ और चर्चित कवि वीरेन डंगवाल को उनके कविता संग्रह दुश्चक्र में स्रष्टा पर। उस वक्त के संयोजक थे उपन्यासकार गिरिराज किशोर और आधार सूची तैयार की थी कहानीकार प्रियंवद ने । हद तो तब हो गई थी जब निर्णायक मंडल के तीन सदस्यों में से दो कमलेश्वर और श्रीलाल शुक्ल बैठक में उपस्थित ही नहीं हो सके थे । अपनी टिप्पणी में निर्णायक मंडल के तीसरे सदस्य से रा यात्री ने लिखा- दुश्चक्र में स्रष्टा- काव्य कृति को हम सभी निर्णायक मंडल के सदस्य एक समान प्रथम वरीयता देते हैं और साहित्य अकादमी के दो हजार चार के पुरस्कार के लिए सहर्ष प्रस्तुत करते हैं । लेकिन संस्तुति पत्र पर सिर्फ उनके ही दस्तखत हैं । उसी जगह हिंदी भाषा के तत्कालीन संयोजक गिरिराज किशोर ने लिखा- श्री श्रीलाल शुक्ल एवं कमलेश्वर जी उपस्थित नहीं हो सके । उन्होंने अपनी लिखित संस्तुति बंद लिफाफे में भेजी है । श्रीलाल जी ने ज्यूरी के उपस्थित सदस्य से रा यात्री से फोन पर लंबी बातकर दुश्चक्र में स्रष्टा को 2004 के पुरस्कार के लिए समर्थन दिया । हलांकि साहित्य अकादमी के दस्तावेजों में श्रीलाल जी की संस्तुति मौजूद नहीं है । कमलेश्वर का बीस दिसंबर खत है जो इक्कीस दिसंबर की बैठक के पहले प्राप्त हो गया था । इस तरह की जल्दबाजी ने सवाल भी खड़े किए । वीरेन डंगवाल की प्रतिष्ठा पर किसी को कोई शक नहीं है । वो साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व भी करते थे लेकिन जिस तरह की अफरातफरी में उन्हें पुरस्कार देने का ऐलान किया गया उससे उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई । कालांतर में अकादमी पुरस्कारों के चयन को लेकर कई गंभीर आरोप लगे । नतीजा यह हुआ कि अकादमी पुरस्कार को हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं रहा जो नब्बे के दशक में हुआ करता था । अब अकादमी में पहली बार हिंदी भाषा के प्रतिनिधि प्रोफेसर विश्वनाथ तिवारी अध्यक्ष बने हैं । उनपर यह महती जिम्मेदारी है कि अकादमी पुरस्कारों की विश्वसनीयता और साख बहाल करें ।
इसके अलावा भी हिंदी में कई पुरस्कार दिए जाते हैं । कुछ पुरस्कार तो ऐसे हैं जो बकायदा लेखकों से एक निश्चित राशि के बैंक ड्राफ्ट के साथ आवेदन मांगते हैं । हिंदी के पुरस्कार पिपासु लेखक बड़ी संख्या में इस तरह के पुरस्कारों के लिए आवेदन भेजते हैं । कहना नहीं होगा कि हिंदी के बहुतायत लेखकों में बगैर काम किए या यों कहे कि हल्का काम करके भी प्रसिद्धि की ललक ऐसे पुरस्कारों को प्राणवायु प्रदान करती है । उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में कई ऐसे पुरस्कार हैं जिनकी धनराशि तो पांच से दस हजार रुपए तक होती है लेकिन उन पुरस्कारों की आड़ में साहित्य का खेल खेला जाता है । जिस पत्रिका की कोई पहचान नहीं बन पाती है या उसके दो एक अंक निकले होते हैं वह भी अपने नाम पर शॉल श्रीफल देकर साहित्याकारों और लेखकों को उपकृत करते हैं और उसके एवज में जाने क्या क्या होता है । लेकिन जो भी होता है वह हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठा को धूमिल करता है । सवाल यह उठता है कि हिंदी के लेखकों में पुरस्कार को लेकर इतनी भूख क्यों है । क्योंकर वो हजार दो हजार के पुरस्कार के लिए सारे दंद फंद और पुरस्कार देनेवालों की चापलूसी पर उतारू है । अगर हम विस्तार से इसकी पड़ताल करते हैं तो जो तस्वीर सामने आती है वह बेहद निराशाजनक है । हिंदी के लेखकों जिस एक प्रवृत्ति का लागातार क्षय हो रहा है वह है मेहनत से दूर भागने का । बगैर व्यापक शोध के और कल्पना के आधार पर यथार्थ लिखने की प्रवृत्ति ने साहित्य का बड़ा नुकसान किया है । विचारधारा वाली साहित्य ने तो नुकसान किया ही । इसके अलावा जो एक और प्रवृत्ति नई पीढ़ी के साहित्यकारों लेखकों में दिख रहा है वह है जल्दबाजी, धैर्य की कमी, कम वक्त में सारा आकाश छेक लेने की तमन्ना और वह भी किसी कीमत पर । इसी मानसिकता का फायदा उठाकर कुछ साहित्य के कारोबारी पुरस्कारों का कारोबार करते हैं और उसमें फंसा कर लेखकों को उलझा देते हैं । नवोदित लेखक तो कोंपल की तरह होता है जिसे बहुत सावधानी से विकसित किया जाता है लेकिन हिंदी के नए लेखक तो शुरू से ही आसमान पर चढ़ने की तमन्ना पाले बैठे रहते हैं । महात्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है।  हर किसी को महात्वाकांक्षी होना चाहिए लेकिन उसमें अति के जुड़ने से जो बेचैनी आ जाती है वह एक खतरनाक संकेत है और पुरस्कार देनेवाले इस प्रवृत्ति को बढ़ाकर खतरा और बढ़ा देते हैं । हिंदी के कर्ता धर्ताओं की यह जिम्मेदारी है कि वो इस वक्त आगे आएं और टुटपुंजिए पुरस्कारों को चिन्हित कर उसके बहिष्कार का विरोध करें ताकि हिंदी से पुरस्कारों के कारोबार पर रोक लगाई जा सके ।

Saturday, March 9, 2013

Mela of Powerful Discourse also

The Jaipur Literature Festival, the biggest in south Asia has earned a reputation among world literary circle as a platform for serious dialogue. But in India some feudal intellectuals see it as a useless platform and label it ‘Tamasha’. Leading this criticism is the learned Ex judge of Supreme court of India and currently the Chairman of Press Council of India – Justice Katju. The critics of Jaipur Lit Fest think that there was only sound and fury and it had no significance. They borrow this phrase from Shakespeare.  But in criticism they show so much excitement and make a comment that puts a big question mark on the contemaporary creative writing. While questioning the ability of the contemporary writers and their writings it is said that there is hardly any worthwhile literature to be read nowadays and there was certainly none at the festival. Everything has become commercialized. This generalized statement of retired Justice  Katju is most bizarre statement coming from a person of his repute. It also reflects his ambit of knowledge of the Indian writing as well as the world literary writing. He is looking for writers like Premchand and Sharat Chandra. He made the very objectionable statement that writers often write only to earn money and there is hardly any artistic value in what they produce. At the same time this statement also shows that he doesn’t have  iota of idea about the contemporary writing of Hindi, Marathi, Bengoli and to some extent Kannada language. The Dalit writing movement in Marathi not only makes ripples among the literary world but it made remarkable impact on the life of Dalits. How can anybody forget the feminist movement run by Rajendra Yadav, the Editor of Hindi literary magazine. The argument that the writers often write only for the money is a juvenile one as he did not gave any fact to support it. Katju was a learned judge of the apex court and it was expected of him that the selection of the words in his writing must be near perfect. But in the above example he said that writers often write ONLY for money. This word ONLY is an insult to the whole writing community of our country.  
Katju is in the Habit of dropping names of world philosophers and writers like Victor Hugo, Voltaire and many more in support of his argument. On the surface this makes his articles more serious but in the process he loses the focus and gives logic which is of no relevance.
Justice Katju also advised the writers of the country to join those who are fighting to make India free from the socio economic evils. He also preaches the writers community to inspire the people and also write against oppression and backword mentality. This advise also shows that he doesn’t have any iota of idea about the progressive Hindi writing after the sixties. The almost entire writing of that period is in support of the downtrodden and the oppressed classs of the society. Even before that the famous Hindi writer Yashpal wrote a novel in 1941 in which he advocated socialism. How can anybody forget the writing of Amrit Lal Nagar, Ramdhari Singh Dinkar. Fanishwar nath Renu, Shiv Prasad Singh, Nagarjun, Raghubir Sahay, Mahasweta Devi, Rambriksha Benipuri and many more.
Katju preaches that there is hardly any great art and literature in our country today. Again by making this generalized statement in his scholarly article Katju  shows his limitations and less knowledge about the Indian writing.
 In criticizing the literati of the country he turned his gun on Jaipur Literature festival and said that the elite of this country descended at Diggi Palace of Jaipur and discussed Sex and Kamsutra. Here again he is misinformed or rather ill-informed. Sessions were there on  sex and Kamsutra but they were a part of whole Lit Fest. There was a  session on the films and the songs where speakers showed their worry on the wordings used in the item songs thses days. Mahasweta Devi was present in one of the inaugural sessions. Has anybody any doubt about the writings of Mahashweta Devi . She is the classical case of making the impact on oppressed class by of her writing, which Katju missed. She worked and wrote for more than four decades for the oppressed class. The need is to read her work and than make comments.
But one must praise Katju who is very kind in comparing the Indian literature with other countries and here also delivered a judgment that in other countries also hardly any great literature is being written. The question is that how can anybody in a sentence say like this. Has he heard about the works of British Writer Howard Jacobson or does he know about the works of so many Latin American writers who attended the lit Fest. Doesn’t seem so. If Freedom, the Masterpiece written by Jonathan Frenzen of America was taken into consideration, such statement cant be made. The list is very long but these are some examples which proves Katju wrong. We can not forget the contribution of JLF that it showed the path and now in many big or small country there is lit Fest. This is a good sign for cultural revival of the country. And despite of controversies involving Ashish Nandy and Salman Rushdie, Jaipur lit fest was a great platform for serious discourse. So by saying it a Tamasha or sound and fury shows the feudal or orthodox mindset which has to be intellectually fought.

Sunday, March 3, 2013

साहित्य का मीना बाजार


पिछले कई सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के साहित्यक मानचित्र पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है । बेहद छोटे स्तर से शुरु हुए इस लिटरेचर फेस्टिवल ने छह सालों में एक लंबा सफर तय किया है । इन छह सालों में इस फेस्टिवल में विश्व के अनेक भाषाओं के लेखकों ने शिरकत की और साहित्य से जुड़े गंभीर विषयों पर विमर्श किया । लेकिन समय बदला तो इस महोत्सव का स्वरूप भी बदला । पिछले साल सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर मचे बवाल ने लिटरेचर फेस्टिवल को लोकप्रियता और चर्चा के शीर्ष पर पहुंचा दिया था । सलमान रश्दी के नहीं आने से भी कोई फर्क नहीं पड़ा था क्योंकि विवाद फिर भी हुआ था । जीत थाईल, रुचिर शर्मा और हरि कुंजरू ने सलमान रश्दी की विवादित किताब के अंश पढ़ दिए थे । उसके बाद जीत थाईल पर जयपुर और अजमेर में आठ केस दर्ज किए गए थे । यह अलग बात है कि साल भर बीत जाने के बाद भी इन केस की अबतक फाइल खुली ही नहीं है । जीत थाईल इस साल भी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पहुंचे और उन्हें उनके उपन्यास नारकोपोलिस पर प्रतिष्ठित डीएससी पुरस्कार भी मिला ।
अपने छठे एडिशन तक आते आते जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल साहित्यक उत्सव से अपना फलक बड़ा करते हुए साहित्य के मीना बाजार में तब्दील होता नजर आया । मैं पिछले कई सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को देखता आ रहा हूं । इस बार इस साहित्य मेले में कई नई चीजें देखने को मिली । पहले जयपुर के दिग्गी पैलेस में आयोजित इस मेले में साहित्य पर गंभीर विमर्श हुआ करते था, इस बार भी हुआ लेकिन विमर्श के साथ साथ मेले में कारोबार का भी प्रवेश हो गया । शुरुआत में जब इस साहित्यक उत्सव की कल्पना की गई होगी तब भी उसके पीछे साहित्य पर गंभीर चिंतन के अलावा लाभ कमाने का भी उद्देश्य रहा होगा । लेकिन पिछले पांच मेलों तक यह थोड़ा ढंके छुपे तौर पर चल रहा था । इस बार मेले में खुलकर कारोबार हो रहा था । इस साल मेले में हर मंडप के पास तरह तरह के खाने पीने के स्टॉल लगे थे । कुल्हड़वाली चाय जो इस मेले की खासियत हुआ करती है उसके दाम में पिछले साल की तुलना में सौ फीसदी का इजाफा करते हुए उसे बीस रुपए प्रति कुल्हड़ कर दिया गया । खाने-पीने तक तक अगर यह मामला रुका रहता तब भी बात समझ में आती वेकिन इस बार तो विदेशी मेहमानों को ध्यान में रखते हुए हैंडीक्राफ्ट की भी कई दुकानें वहां लगाई गई थी जिसनें जयपुरी बलॉक प्रिंट के कपड़ों से लेकर थैले और टोपियां मिल रही थी । सबसे हैरानी की बात तो यह थी कि इस बार मेले में पहली बार गहनों की भी एक दुकान थी । साहित्यक मेले में गहनों की दुकान का मतलब समझ में नहीं आया । क्या आयोजकों को यह लगता है कि लिटरेचर फेस्टिवल में आनेवाले लोग वहां साहित्य सुनने और अलग अलग सत्रों में होनेवाले विमर्श में शामिल होने के अलावा पिकनिक और मौज मस्ती और शॉपिंग के लिए आते हैं । या फिर लिटरेचर फेस्टिवल की लोकप्रियता को भुनाते हुए आयोजक ज्यादा से ज्यादा लाभ कमा लेना चाहते हैं । इन सवालों के जबाव अबतक अनुत्तरित हैं । हलांकि इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रोड्यूसर संजॉय रॉय के हवाले से खबरें छपी कि मेले के आयोजन में तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपए का नुकसान होगा । आयोजकों की दलील थी कि एकदम आखिरी वक्त में दो बड़े प्रायोजकों ने हाथ खींच लिया । साहित्यक मेले का इस साल का बजट तकरीबन साढ़े पांच करोड़ का था और प्रायोजकों से चार करोड़ रुपए मिले थे । इस लिहाज से मोटे तौर पर जो बैलेंस शीट बनती है उसमें डेढ करोड़ का नुकसान है ।
मैंने इस मेले को साहित्य का मीना बाजार इस वजह से कहा क्योंकि इस बार मेले में मीना बाजार में मौजूद तकरीबन हर चीज वहां मौजूद थी एक सिर्फ चरखी को छोड़कर । इस मेले के पहले इस साल रायल्स इलेवन और लेखकों की टीम के बीच एक क्रिकेट मै भी खेला गया । मेले को सफल बनाने के लिए कई फिल्मी सितारों को भी बुलाया गया । इस बार पहली बार शाम को होनेवाले म्यूजिकल कार्यक्रम को आयोजन स्थल, दिग्गी पैलेस से हटाकर एक अलग होटल के लॉल में आयोजित किया गया । जहां शामिल होने के लिए तीन सौ रुपए का टिकट भी था । लेकिन ऐसा नहीं है कि जयपुर साहित्य उत्सव सिर्फ कारोबार है, सिर्फ चकल्लस का अड्डा है । जैसा कि हमारे कई बुद्धिजीवी और बुद्दिजीवी होने का भ्रम पाले बैठे लोग सोचते हैं । जयपुर लिट फेस्ट में कई गंभीर मुद्दों पर भी चर्चा हुई । कई लोगों को इस बात पर आपत्ति है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साहित्यक विमर्श के नाम पर हल्की चर्चा हुई । यह मानसिकता उन लोगों की है जो पूर्वग्रह से ग्रसित हैं और समाज में कुछ भी अच्छा और रचनात्मक घटित होना, उनके हिसाब से देश की अस्सी फीसदी गरीब जनता के साथ छल है ।
इस तरह के तर्क देनावाले लोग यह भूल जाते हैं कि इसी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के सत्र ऑफ वुमन आुटकास्ट्स प्रजेंट्स एंड रिबेल्स में में अपने जीवन काल में ही महान लेखिका का दर्जा हासिल कर चुकी महाश्वेता देवी ने कहा था कि सपने देखना इंसान का पहला और मूलभूत अधिकार है । नक्सलवादी भी सपने देखते हैं । उनका अपराध यही तो है कि उन्होंने सपने देखने का सहस किया, तो उनको फिर यह अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए । महाश्वेता देवी के इस बयान पर लंबा विमर्श चला । अखबारों में विशेष संपादकीय लिखे गए । एक ओर जहां महाश्वेता यह बात कह रही थी वहीं दूसरी ओर इसी मेले में किनशिप्स ऑफ फेश नाम के सत्र में तिब्बती धर्मगुरू और नोबेल पुरस्कार प्राप्त दलाई लामा ने शांति की जमर वकालत की । दलाई लामा ने कहा कि – जो लोग मैं –मैं के बारे में सोचते हैं उन्हें दिल का दौरा पड़ने की संभावना ज्यादा रहती है । दिल पर ऐसा दबाव ना बनाएं । दूसरों के बारे में भी सोचें । यही इस तरह के साहित्यक उत्सव की खूबसूरती है । उसी मेले में पाकिस्तान की उर्दू साहित्यकार और महिलावादी लेखिका फहमीदा रियाज का दर्द भी झलक आया, जब उन्होंने पूछा कि कहां जाऊं- उस पार जाऊं तो लोग मुझे भारत का एजेंट कहते हैं और यहां आती हूं तो विरोध की धमकी दी जाती है । धर्म में औरतों की हालात पर गीतकार जावेद अख्तर और फहमीदा के बीच जमकर तकरार हुई । जावेद का मानना था कि हर धर्म औरतों के खिलाफ है जिसका  फहमीदा ने जमकर विरोध किया और कहा कि इस तरह किसी भी मसले का सरलीकरण नहीं किया जा सकता है ।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जो और बात रेखांकित की जा सकती है वह यह है कि इसमें युवाओं की भागीदारी ने पिछले कई सालों के कीर्तिमान तोड़ दिए । इस बार के साहित्योत्सव में स्कूली छात्रों ने भी जमकर हिस्सा लिया । स्कूली छात्रों की भीड़ को देखकर ब्रिटिश लेखक एच जैक्ब्सन ने मजाक में कहा- हमारे मुल्क में मेरे श्रोताओं की औसत उम्र नब्बे साल से ज्यादा रहती है लेकिन यहां जयपुर में मुझे औसतन चौदह साल की बच्चियां प्रशंसक के रूप में मिली । मजाक में कही इस बात पर गंभीरता से चिंतन किया जा सकता है । हम इसको अपने देश के किशोर और नौजवानों के साहित्य में झुकाव के तौर पर देख सकते हैं । कई हिंदी लेखकों को यह अंग्रेजीवालों का जमावड़ा लगता है लेकिन इस बार एक और बात साफ हो गई कि हिंदी और उर्दू के सत्रों में अंग्रेजी साहित्य के सत्रों से ज्यादा श्रोता मौजूद थे । यह भी तो कुछ ना कुछ कहता ही है जिसको डिकोड किया जाना चाहिए । जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल साहित्य का मीना बाजार तो बन गया है लेकिन अगर इस मीना बाजार से देऎश के किशोरों और युवाओं के बीच साहित्य के सवालों को सुनने और उससे टकराने की रुचि जागती है तो इस मीनाबाजर का स्वागत किया जाना चाहिए । इस मीना बाजार से अगर देश के किसी भी हिस्से में नई पीढ़ी में साहित्य का संस्कार विकसित होता है तो हमें तमाम विरोध के बावजूद इसका समर्थन करना चाहिए ।

 

Saturday, March 2, 2013

साहित्येत्तर विवाद की 'ज्योति

हर साल आयोजित होने के फैसले के बाद पहली बार आयोजित दिल्ली विश्व पुस्तक मेला इस बार कई मायनों में अहम है । नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक एम ए सिकंदर ने पिछले साल ये ऐलान किया था और कहा था कि उन्हें कुछ वक्त दिया जाए तो वो बेहतर आयोजन कर सकते हैं । उस वक्त सिकंदर ने एनबीटी का पदभार ग्रहण ही किया था । दिल्ली के प्रगति मैदान में रविवार को खत्म हुए विश्व पुस्तक मेले का यह आयोजन पहले के पुस्तक मेलों से ज्यादा व्यवस्थित और नियोजित रहा । पिछले  सालों में आयोजित पुस्तक मेलों को अव्यवस्था और लोकार्पणों के रेला के तौर पर याद किया जाता था । प्रकाशकों को भी इस बात की शिकायत रहती थी कि उन्हें कोई ऐसी जगह मुहैया नहीं करवाई जाती है जहां लेखकों का पाठकों के साथ संवाद हो सके । बड़े प्रकाशक तो कई स्टॉल को जोड़कर अपनी दुकान सजाते थे जहां विमोचन आदि में काफी सहूलियत होती थी लेकिन छोटे प्रकाशकों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था । इस बार मेले के आयोजक ने इस दिक्कत को दूर कर दिया है । प्रगति मैदान के हॉल नंबर 12 में एक बड़ा सा ऑथर्स कॉर्नर बना दिया है जहां हर घंटे लेखक अपनी बात रखते हैं । कभी कहानी पाठ होता है तो कभी कविता पाठ, कभी बुजुर्ग लेखक अपने अनुभवों को बांटते हैं तो कभी युवा लेखक अपनी लेखन प्रक्रिया को साझा करते हैं । पाठकों और लेखकों के बीच संवाद से हमेशा साहित्य का भला हुआ है । पाठकों के मन में उठने वाले सवालों का भी जवाब मिलता है और लेखकों को भी पाठकों की नब्ज पर हाथ रखने का मौका मिलता है । इसका लाभ लेखकों को कुछ भी रचते समय होता है ।
इस बार का पुस्तक मेला हिंदी के पाठकों, प्रकाशकों और लेखकों के लिए एक दुखद विवाद लेकर भी आया । हिंदी की बिल्कुल नवोदित कहानीकार ज्योति कुमारी ने हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह राजकमल प्रकाशन और उसके मालिक अशोक महेश्वरी पर बेहद सनसनीखेज आरोप लगाए । इस विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा विस्तार देना होगा । ज्योति कुमारी ने कुछ कहानियां हंस में लिखी और राजेन्द्र यादव की सरपरस्ती में हिंदी कहानी जगत में प्रवेश किया । लेकिन सिर्फ सरपरस्ती से किसी रचनाकार के आगे बढने में हमेशा से संशय रहता है । इस बार भी था । ज्योति की कहानियां हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगी तो लगा कि सरपरस्ती से इतर उसमें प्रतिभा भी है  । कई कहानियां छप जाने के बाद हर कथाकार की तरह उसके मन में भी आया होगा कि एक संग्रह छपे । लेकिन संग्रह छपने के पहले जिस तरह का अप्रिय विवाद हुआ, वैसा विवाद कोई भी संवेदऩशील और नवोदित रचनाकार नहीं चाहता है । अपवाद हर जगह होते हैं । ज्योति कुमारी के मुताबिक प्रकाशक ने उसके सामने कुछ साहित्येत्तर शर्तें रखी जिस वजह से उसने राजकमल प्रकाशन से अपना संग्रह नहीं छपवाने का फैसला लिया । ज्योति के बयान के मुताबिक प्रकाशक ने उनके संग्रह का नाम ‘दस्तखत और अन्य कहानियां’ की जगह ‘शरीफ लड़की’ रखने का प्रस्ताव दिया था । ‘शरीफ लड़की’ भी ज्योति की ही एक अन्य कहानी है । कहानीकार के मुताबिक प्रकाशक का यह तर्क था कि ‘शरीफ लड़की’ शीर्षक ज्यादा सेलेबल है ।  इसके अलावा ज्योति यह चाहती थी कि उसके संग्रह में राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह की लिखी भूमिका प्रकाशित की जाए । इसपर भी प्रकाशक को एतराज था । प्रकाशक यह चाहते थे कि कवर पर नामवर सिंह की कोई एक पंक्ति और बैक कवर पर राजेन्द्र जी की लिखी भूमिका से चार पांच पंक्तियां प्रकाशित कर दी जाए । ज्योति को प्रकाशक की दोनों शर्तें मंजूर नहीं थी । ज्योति कुमारी ने राजकमल प्रकाशन के मालिक पर यह भी आरोप जड़ा है कि उन्होंने उसे नाम बदलने की नसीहत दी । ज्योति के मुताबिक अशोक महेश्वरी के मुताबिक ज्योति कुमारी नाम सेलेबल नहीं है लिहाजा उसको बदलकर ज्योतिश्री या कुछ और दिया जाना चाहिए । कोई ऐसा नाम जो पाठकों को आकर्षित कर सके । ज्योति को प्रकाशक का यह तर्क भी नहीं रुचा । ज्योति का कहना है कि – मेरा लेखन उस बाजारवाद के खिलाफ रहा है जो जरूरत नहीं जेब देखकर तय होता है । जो औरत को एक उत्पाद, प्रेजेंटेशन की तरह पेश करता है, अपने लाभ के लिए । तो सिर्फ इसलिए कि किताब की बिक्री यह नाम सहायक होगा और इस नाम से सेंसे्शन फैलेगा, जो बाजार की दृष्टिकोण से लाभदायक है , मैं इस नाम पर सहमत नहीं हो सकी । यह बात ठीक है, लेखिका को अपनी किताब कहीं से भी छपवाने का हक है । लेकिन अगर इस पूरे् विवाद को प्रकाशक की नजर से देखें तो इसमें कुछ बुराई नहीं है । प्रकाशक कारोबार के लिए बैठा है और वह बाजार का दोस्त है । अगर वो बाजार से दुश्मनी मोल लेगा या बाजार के नियमों के खिलाफ जाएगा तो फिर क्या खाक कारोबार करेगा । प्रकाशक की इन दोनों सलाहों में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है । ये दो ऐसी सलाह है जो कोई भी प्रकाशक दे सकता है । इस पर इतना बड़ा वितंडा खड़ा करने की जरूरत नहीं थी ।
अशोक माहेश्वरी ने इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने राजेन्द्र यादव से व्यक्तिगत बातचीत में कुछ सुझाव दिए थे । उनका कहना है पुस्तक मेले के अवसर पर वो तीन युवा कथाकारो- ज्योति, आकांक्षा और इंदिरा की किताबें छाप रहे थे और उनमें से किसी भी संग्रह में भूमिका नहीं थी लिहाजा उन्होंने ज्योति को परोक्ष रूप से यह सलाह दी । राजेन्द्र यादव का भी कहना है कि अशोक महेश्वरी ने कुछ भी गलत नहीं किया और चूंकि वो इस पूरे मामले में बीच में थे लिहाजा उनको पूरी जानकारी है । लेकिन यहां अशोक महेश्वरी को यह समझना चाहिए था कि कहानीकार या कहानियां कितनी अहम रही होंगी जिसके लिए नामवर सिंह को भी कलम उठानी पड़ी । राजेन्द्र यादव तो गाहे बगाहे लेखकों-लेखिकाओं को आशीर्वचन देते ही रहते हैं ।
लेकिन जिस तरह की चर्चा पुस्तक मेले में चल रही है और मीडिया में इस पूरे विवाद को कास्टिंग काऊच की तरह से पेश किया जा रहा है । हमारे लिए वो चिंता का विषय है । ज्योति कुमारी ने एक पत्र जारी कर लेखकों से साथ मांगा है और इस तरह की अनैतिक साहित्यिक हथकंडो के पुरजोर विरोध का आह्वान भी किया है । ज्योति की इन बातों की व्याख्या हर कोई अपने तरीके से कर रहा है । लेकिन चाहे जो भी एक नवोदित लेखक और हिंदी के शीर्ष प्रकाशक के बीच विश्व पुस्तक मेले के दौरान इस तरह के अप्रिय विवाद से हिंदी की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है । दरअसल अगर हम इस विवाद के बहाने से हिंदी प्रकाशन जगत पर गौर करें तो एक बेहद तकलीफदेह तस्वीर उभर कर सामने आती है । राजकमल प्रकाशन जैसा शीर्ष प्रकाशक ज्योति कुमारी जैसी बिल्कुल नई लेखिका की किताब बगैर किसी एग्रीमेंट के छापने को क्यों तैयार हो जाता है । दूसरा सवाल यह है कि ज्योति कुमारी, आज जिस स्त्री शक्ति की दुहाई दे रही हैं और जिस तरह से अपने और राजकमल के बीच के विवाद को एक बड़ा फलक देने की कोशिश कर रही हैं,  ने भी बगैर एग्रीमेंट के अपने संग्रह की पांडुलिपि राजकमल प्रकाशन को क्यों सौंपी । क्या उसे राजकमल प्रकाशन पर इतना भरोसा था या फिर कोई और वजह थी जिसने उसे एग्रीमेंट के बगैर किताब छपवाने के लिए राजी कर लिया था । ज्योति को इन वजहों, अगर कोई थी, तो खुलासा करना चाहिए । अगर उसने बगैर किसी अन्य वजह की, अनुभवहीनता के चलते ऐसा किया था तो उसको भविष्य में सतर्क रहने की जरूरत है । इस मामले में वाणी प्रकाशन ने बेहद प्रोफेशनल रवैया अख्तियार किया और ज्योति-राजकमल विवाद के बीच में पहले ज्योति कुमारी से प्रकाशन एग्रीमेंट किया और फिर उसके संग्रह को छापा । अगर राजकमल ने भी किताब छपने से पहले ज्योति कुमारी से एग्रीमेंट किया होता तो बेहतर होता, शर्तें पहले ही साफ हो जाती । राजकमल प्रकाशन जैसे संस्थान से इस तरह के अनप्रोफेशनल एप्रोच की अपेक्षा नहीं की जा सकती है ।
साहित्य में इस तरह से लेखकों-प्रकाशकों के बीच पहले भी कई अप्रिय प्रसंग सामने आते रहे हैं । लेकिन इस बार इस विवाद में जिस तरह से साहित्येत्तर शब्द का इस्तेमाल हुआ है उसने हिंदी प्रेमियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है । हिंदी में प्रकाशक और लेखक का संबंध बहुत कुछ विश्वास की बुनियाद पर चलता है । अगर इस छोटे से विवाद ने इस विश्वास की बुनियाद में छोटा सा भी दरार पैदा कर दिया तो लेखक-प्रकाशक संबंधों पर इसका दूरगामी असर होगा । आज जरूरत इस बात की है कि हिंदी के बड़े लेखक इस पूरे विवाद में दखल दें और अगर कोई साहित्येतर वजह है तो उसको बातचीत से हल करें । हिंदी को बदनामी से बचाने के लिए यह बेहद जरूरी है, जरूरी तो अशोक महेश्वरी को प्रोफेशन एप्रोच अपनाने की है
 

Friday, February 1, 2013

संजय गांधी की कहानी


आजाद भारत के इतिहास में संजय गांधी इकलौते ऐसे राजनेता हैं जिनके व्यक्तित्व और क्रियाकलापों के बारे में जानने की जिज्ञासा भारतीय जनमानस में अब भी है, लेकिन उनके बारे में ज्यादा लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं है, लिहाजा उनके बारे में सबसे ज्यादा किवदंतियां सुनी जाती रही हैं । संजय गांधी खुद कहा करते थे कि उनकी रैलियों के दौरान किसी को भी पैसे देकर रैली में नहीं लाया जाता है बल्कि ये लोगों की मेरे बारे में जानने और मुझको देखने की जिज्ञासा से मेरी रैली में खिंचे चले आते हैं । इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के तानाशाही रवैये को लेकर काफी कुछ लिखा गया है, उनके दोस्तों और युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की ज्यादतियों के बारे में भी सैकडो़ं लेख लिखे गए , किताबें भी आईं । इस बात की भी काफी चर्चा हुई कि संजय गांधी की महात्वाकांक्षा इंदिरा गांधी को लगातार कमजोर करती रही । संजय गांधी को भारत में कई लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म करने या कमजोर करने का भी जिम्मेदार माना जाता है । इमरजेंसी, उस दौरान सरकारी कामकाज, इंदिरा गांधी के दांव पेंच आदि के बारे में राजनीतिक टिप्पणीकार इतने उलझ गए कि संजय गांधी की जीवनी या उनपर कोई मुक्कमल किताब लिखने के बारे में सोचा ही नहीं गया । अगर सोचा गया होता तो संजय गांधी पर लिखने के लिए बेहद श्रम करना होता क्योंकि उनके व्यक्तित्व कई पहलू हैं और विश्लेषण के अनेक विंदु । संजय गांधी को भगवान ने बहुत छोटी सी उम्र दी लेकिन उस छोटी उम्र में ही संजय ने देश को हिलाकर रख दिया था ।
मेरे जानते अबतक संजय गांधी की एकमात्र जीवनी लिखी गई है जिसका नाम है – द संजय स्टोरी और उसके लेखक हैं – वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता । यह जीवनी भी ना तो प्रामाणिक होने का दावा करती है और ना ही आधिकारिक । भारत जब इमरजेंसी की बेड़ियों से मुक्त होने का जश्न मना रहा था और कई पत्रकार, लेखक इमरजेंसी की ज्यादतियों पर अपनी लेखनी चला रहे थे उसी वक्त विनोद मेहता ने इमरजेंसी के कथित खलनायक संजय गांधी की जीवनी छपवाने का साहसपूर्ण निर्णय लिया था । जयको पब्लिशिंग से 1978 में विनोद मेहता की किताब छपी थी उस वक्त इसकी कीमत पैंतीस रुपए थी । अब चौंतीस साल बाद विनोद मेहता की नई भूमिका के साथ इस किताब का पुनर्प्रकाशन हुआ है । विनोद मेहता ने इस किताब की नई भूमिका में लिखा है – मैंने कोशिश की है कि उस व्यक्ति के जीवन के बारे में पाठकों को बताऊं जो एक दिन राजा बननेवाला था । वह व्यक्ति जिसने लगभग राजगद्दी पर कब्जा कर लिया था, अगर उसने हवाई जहाज उडा़ने के वक्त कोल्हापुरी चप्पल नहीं पहनी होती । दरअसल जब विनोद मेहता कोल्हापुरी चप्पल की बात कर रहे हैं तो वो उस हादसे की ओर इशारा कर रहे हैं जो दिल्ली के आसमान में 23 जून 1980 की सुबह घटा। उस विमान हादसे की बात कर रहे हैं जिसमें संजय गांधी की मौत हो गई थी । विनोद मेहता ने इस पूरी किताब में संजय गांधी के व्यक्तित्व का जो खाका खींचा है उसके मुताबिक संजय गांधी अपने निर्णयों पर अडिग रहने वाले शख्सियत थे । वो अगर किसी चीज को करने की ठान लेते थे तो फिर किसी की भी नहीं सुनते थे चाहे वो उनकी मां इंदिरा गांधी ही क्यों ना हों । यही जिद संभवत संजय गांधी की मौत की वजह भी बनी । माना जाता है कि राजीव गांधी, जो कि एक ट्रेंड पायलट थे, हमेशा संजय को विमान उड़ाने वक्त जूते पहनने की सलाह दिया करते थे और चप्पल पहन कर विमान उड़ाने से मना करते थे, लेकिन संजय ने कभी उनकी बात नहीं मानी ।

संजय गांधी की जीवनी में विनोद मेहता ने बेहद वस्तुनिष्ठता के साथ संजय गांधी के बहाने उस दौर को भी परिभाषित किया है । इमरजेंसी की ज्यादतियों के अलावा मारुति कार प्रोजेकट के घपलों पर तो विस्तार से लिखा है लेकिन साथ ही इमरजेंसी हटने पर सरकारी कामकाज में ढिलाई पर भी अपने चुटीले अंदाज में वार किया है । वो लिखते हैं- जिस दिन 21 मार्च को इमरजेंसी हटाई गई उस दिन राजधानी एक्सप्रेस चार घंटे की देरी से पहुंची । कानपुर में एल आई सी के कर्मचारियों ने लंच टाइम में मोर्चा निकाला, दिल्ली के प्रेस क्लब में मुक्केबाजी हुई, कलकत्ता में दो फैमिली प्लानिंग वैन जलाई गई, बांबे के शाम के अखबारों में डांस क्लासेस के विज्ञापन छपे, तस्करी कर लाई जानेवाली व्हिस्की की कीमत दस रुपए कम हो गई । देश में हालात सामान्य हो गए । व्यगंयात्मक शैली में ये कहते हुए विनोद इमरजेंसी के दौर में इन हालातों के ठीक होने की तस्दीक करते हैं ।
संजय की स्टोरी की शुरुआत विनोद मेहता आनंद भवन से करते हैं और कहते हैं कि माना जाता है कि आनंद भवन उसी जगह पर स्थित है जहां राम के 14 वर्षों के बनवास से लौटने के बाद भरत मिलाप हुआ था । आनंद भवन की कहानी में मोती लाल नेहरू के अलावा जवाहर लाल नेहरू और कमला नेहरू के दांपत्य जीवन के बारे में कई दिलचस्प प्रसंग हैं । किस तरह से नेहरू शादी के बाद हनीमून के लिए कश्मीर गए तो कमला को दो हफ्ते के लिए होटल में छोड़ कर अपने एक रिश्तेदार के साथ ट्रेकिंग पर चले गए । इंदिरा और फिरोज के प्रेम संबंधों के बारे में विनोद मेहता ने जो लिखा है वो वरिष्ठ पत्रकार प्रणय गुप्ते की किताब - मदर इंडिया अ पॉलिटकल बायोग्राफी ऑफ इंदिरा गांधी से कई जगहों पर अलग नजर आता है । तथ्यों में भी कई असमानताएं हैं लेकिन हम फिलहाल संजय गांधी की जीवनी पर बात कर रहे हैं ।
इस किताब में संजय गांधी के स्कूल के दिनों और बाद में स्कूल छोड़कर वापस दिल्ली आने और यहां अपने दोस्तों का साथ उधम मचाने का विनोद मेहता ने बेहद ही दिलचस्प वर्णन किया है । दिल्ली के शिव निकेतन स्कूल से वेलहम्स होते हुए संजय गांधी दून स्कूल पहुंचते हैं । संजय गांधी का दिल पढ़ाई में कहीं नहीं लगा । एक बार जब छुट्टियों में संजय गांधी प्रधानमंत्री निवास तीन मूर्ति भवन लौटे तो उन्होंने कहा था- आई हेट स्कूल, आई डोंट वांट टू गो बैक । विनोद मेहता की किताबों में कई तथ्य पुराने हैं- जैसे दून स्कूल में ही संजय को कमलनाथ जैसा दोस्त मिला जो लगातार दो साल तक फेल हो चुका था । स्कूल से वापस आने के बाद संजय गांधी की दोस्तों के साथ मस्ती काफी बढ़ गई थी और विनोद मेहता ने बिल्कुल फिक्शन के अंदाज में उसको लिखा है जिसकी वजह से रोचकता अपने चरम पर पहुंच जाती है । संजय गांधी की इस किताब में जो सबसे दिलचस्प अध्याय है वो है मारुति कार के बारे में देखे गए संजय के सपने के बारे में । मारुति- सन ऑफ द विंड गॉड में विनोद मेहता ने संजय गांधी की किसी भी कीमत पर अपनी मन की करने, किसी भी कीमत पर अपनी चाहत को हासिल करने की, उस हासिल करने के बीच में रोड़े अटकाने वाले को हाशिए पर पहुंचा देने की मनोवृत्ति का साफ तौर पर चित्रण किया है । संजय गांधी की बचपन से मशीनों और उपकरणों में खास रुचि थी जिसे देखकर नेहरू जी कहा करते थे कि उनका नाती एक बेहतरीन इंजीनियर बनेगा । संजय गांधी इंजीनियर तो नहीं बन पाए लेकिन रॉल्स रॉयस में मैकेनिक का काम सीखने जरूर गए जिसे आधे में ही छोड़ आए थे । वापस दिल्ली लौटने पर एक गैरेज मालिक अर्जुन दास मिले जिसमें संजय को अपने कार बनाने के सपने का साथी दिखाई दिया । अर्जुन दास के साथ एक गैरेज खोला लेकिन उनका सपना तो कार बनाना था । संजय के सपने को पूरा करने के लिए उस वक्त की सरकार ने अपनी नीतियों में आमूल चूल बदलाव कर दिया । उनके कार बनाने के प्रस्ताव का औपचारिक ऐलान उस वक्त के उद्योग मंत्री ने 13 नवंबर 1968 को संसद में किया था । बताया गया था कि संजय ने जो प्रस्ताव दिया है उसके मुताबिक उनकी कंपनी मात्र 6 हजार रुपए में ऐसी कार बनाएगी जो 53 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी । इस एलान के बाद संसद में जमकर हंगामा हुआ था जार्ज फर्नांडिस से लेकर मधु लिमेय, राज नारायण, ज्योतिर्मय बोस और श्यामनंदन मिश्रा ने इंदिरा गांधी को घेरा था । अटल बिहारी वाजपेयी ने तो इसे करप्शन अनलिमिडेट की संज्ञा दी थी । लेकिन संजय गांधी ने किसी की परवाह नहीं की और प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया । हरियाणा के मुथ्यमंत्री बंसीलाल ने डंडे के जोर पर गुड़गांव के पास मारुति को सैकड़ों एकड़ जमीन मुहैया करवाकर संजय के दरबार में अपनी स्थिति पक्की कर ली थी । इस अध्याय में विनोद मेहता ने विस्तार से मारुति कंपनी के माध्यम से शेयर होल्डिंग पैटर्न के जरिए लाभ लेने की स्थितियों का खुलासा भी किया है जो नई पीढ़ी के लिए चौंकानेवाली नहीं हे क्योंकि अब के समय में ऐसा होना आम है ।
जाहिर सी बात है कि जब संजय गांधी की जीवनी लिखी जाएगी तो तुर्कमान गेट, नसबंदी कार्यक्रम और युवा कांग्रेस के बारे में बात तो होगी ही । विनोद मेहता ने अपनी इस किताब में तुर्कमान गेट से झोपड़पट्टी हटाने के वक्त की घटनाओं का सूक्षम्ता से विवरण दिया है, विवेचन भी किया है । नसबंदी पर तो एक पूरा अध्याय इंद्रिय बचाओ ही है । नसबंदी को विनोद मेहता परोक्ष रूप से देश के लिए जरूरी मानते हैं लेकिन जोर जबरदस्ती की वकालत वो नहीं करते हैं । संजय गांधी के दौर में जब भी युवा कांग्रेस की चर्चा होगी तो गुवाहाटी सम्मेलन और अंबिका सोनी का नाम भी आएगा । गुवाहाटी सम्मेलन के दौरान ही संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम को देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से मंजूरी ही नहीं दी बल्कि समर्थन भी किया । राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गुवाहाटी में ही इंदिरा गांधी ने संजय गांधी में अपना वारिस ढूंढ लिया था और नवंबर 76 तक तो वो यह मानने लगी थी कि देश का भविष्य संजय के हाथों में सुरक्षित है । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । अपनी इस किताब में विनोद मेहता ने उस दौर की पत्र पत्रिकाओं और उसके संपादकों की भूमिका को भी परखा है  विनोद मेहता के मुताबिक इमरजेंसी की हार के बाद भी इंदिरा गांधी अपने बेटे संजय को लेकर बेहद पजेसिव थी और उसकी पसंदगी का ख्याल रखती थी ।
विनोद मेहता का दावा है कि उनकी संजय गांधी से कभी मुलाकात नहीं हुई । उन्होंने जीवनी लिखने के वक्त संजय और मेनका से मिलने की कई कोशिशें की लेकिन वो कामयाब नहीं हो सके । संजय की शर्तें उन्हें मंजूर नहीं थी । विनोद मेहता अगर इस जीवनी को लिखने के क्रम में संजय गांधी से मिल लेते और उनकी राय और बातें इस किताब में होती तो ये आधिकारिक होती, प्रामाणिक भी । विनोद मेहता की एक खूबी यह है कि वो अपनी बातें अफवाहों के सहारे बखूबी कहते रहे हैं । इंदिरा गांधी और संजय के संबंधों के बारे में उन्होंने इस जीवनी में चार थ्योरी दी है और फिर उनमें से तीन को काटकर अपनी बात कही है । ठीक उसी तरह जिस तरह अपनी आत्मकथा- लखनऊ ब्यॉय में मैच फिक्सिंग के प्रसंग में कपिलदेव के भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से मिलने और अपने हिंदू होने की दुहाई देने का प्रसंग है । लेखन के इस स्टाइल का फायदा यह होता है कि सारी बातें भी आ जाती हैं और उसको काटकर लेखक अपनी विश्वसनीयता भी बचा कर ले जाता है । इस किताब का एक फायदा यह है कि नई पीढ़ी को भारत के एक ऐसे नेता के बारे में जानने को मिलेगा जिनको राजनीतिक विश्लेषक इतिहास के फुटनोट की तरह देखते हैं ।