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Sunday, February 16, 2014

विवाद के बहाने राग फासीवाद

मशहूर अमेरिकी लेखिका और शिकागो विश्वविद्यालय में इतिहास और धर्म में प्रोफेसर वेंडी डोनिगर की किताब- हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को उसके प्रकाशक पेंग्विन बुक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने बाजार से वापस लेने और छपी हुई बाकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया गया है यह फैसला अदालत में उस किताब पर चल रहे केस के मद्देनजर याची शिक्षा बचाओ समिति के साथ समझौते के बाद हुआ दरअसल दिल्ली की एक संस्था को इस किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी और उस संगठन से जुड़े दीनानाथ बत्रा ने दो हजार ग्यारह में इस किताब के कुछ अंशों को हिंदुओं की भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था किताब के खिलाफ याचिका दायर होने के तीन साल बाद आउट ऑफ द कोर्ट एक समझौता हुआ जिसके तहत किताब को वापस लेने का फैसला हुआ दरअसल इस किताब के छपने के बाद से ही विवाद शुरू हो गया था इस किताब के छपने के बाद ही अमेरिका में इसको खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो चुका है लंदन में तो लेखिका पर अंडे तक फेंके जा चुके हैं साइबर दुनिया में भी इस किताब के खिलाफ अभियान चल रहा है इस मामले के सामने आने के बाद कई लोग इस बात पर छाती कूटने लगे कि ये अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है कई लोग इसको हिंदू संगठनों की कथित फासीवादी मानसिकता करार दे रहे हैं सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों को हिंदू संगठनों पर हमला करने का एक बहाना चाहिए होता है प्रकाशक के इस फैसले में उनको संभावना नजर आई और वो फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने लगे सवाल ये उठता है कि साल दो हजार नौ में किताब छपी उसके पांच साल बाद इस किताब को वापस लेने का फैसला प्रकाशक ने लिया इसमे फासीवाद कहां से गया क्या अब इस देश में किसी को भी अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार नहीं है क्या शांतिपूर्ण तरीके से कोई विरोध नहीं जताया जा सकता है ।  क्या अहिंसक तरीके से विरोध करना फासीवाद है । इस तरह के मामले तो पूरे विश्व में होता रहा है कि अगर किसी को किसी किताब पर या उसके अंश पर आपत्ति है तो वो अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं इस किताब के खिलाफ याचिकाकर्ता ने भी भारतीय संविधान के तहत मिले अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए कोर्ट में केस किया अदालत में मुकदमा चल ही रहा था कि दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया, इसमें फासीवाद और हिंदू संगठनों की मनमानी कहां से गया ये तो किताब के प्रकाशक की कमजोरी है जो अदालती कार्रवाई के झमेले में नहीं पड़ना चाहता है विश्व के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक, जिसके पास ना तो पैसे की कमी है और ना ही संसाधनों की, उसने अदालती कार्रवाई के झंझट से मुक्त होने के लिए समझौता किया । वैसे भी इंटरनेट के इस युग में किसी भी कृति पर पाबंदी संभव ही नहीं है और इस मामले में तो अगर लेखक चाहे तो वो इसको छापने का अधिकार पेंग्विन से लेकर किसी अन्य प्रकाशक को दे सकता है वो इसको छापने के लिए स्वतंत्र होगा क्योंकि अदालत ने इस किताब के भारत में प्रकाशन और वितरण पर पाबंदी नहीं लगाई है इस किताब की लेखिका ने भी इसके बाद ट्विट कर अपनी नाराजगी जताई । वेंडी डोनिगर के मुताबिक भारतीय कानून इसके लिए जिम्मेदार है । अब ये तो हर देश के नागरिक को हक है कि वो अपने देश के कानून के मुताबिक काम कर सके । लेकिन छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों को तो ना तो कानून में आस्था है और ना ही अदालत में । कई बार ये उचित ही प्रतीत होता है कि प्रगतिशीलता का परचम लहरानेवाले बगैर किसी बात के बतंगड़ बनाने में जुट जाते हैं । इस समझौते का विरोध करनेवाले कई लोगों ने तो इस किताब को पढ़ा भी नहीं है और बगैर पढ़े ही उसके बारे में अपनी राय बनाए बैठे हैं ।
ये तो बातें हुआ छद्म प्रगतिवादियों की जो बेवजह का वितंडा खड़ा कर रहे हैं । अब बात की जाए इस किताब और इसके लेखिका की । भारत के धर्म और उसका धार्मिक इतिहास वेंडी डोनिगर की रुचि के केंद्र में रहे हैं । वो संस्कृत और इंडियन स्टडीज में पीएचडी कर चुकी हैं । संस्कृत में लिखे गए कई मशहूर ग्रंथों का उन्होंने अनुवाद किया है । ऋगवेद, मनुस्मृति और कामसूत्र का अनुवाद वो कर चुकी हैं । इसके अलावा शिवा, द इरोटिक एसेटिक, द ओरिजन ऑफ एविल इन हिंदू मायथोलॉजी जैसी विचारोत्तेजक कृतियां वेंडी डोनिगर ने लिखी हैं । अपनी इल किताब द हिंदूज एन ऑलटेरनेटिव हिस्ट्री की भूमिका में लेखिका ने स्वीकार किया है कि इस किताब को लिखने के पीछे उनका एजेंडा तय है । वो यह बताना चाहती है कि जो समूह पारंपरिक रूप से विकास के लिए और अन्य सामाजिक स्थितियों के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं हैं दरअसल उनकिी भूमिका कितनी और कैसी रही है । वेंडी डोनिगर साफ तौर पर कहती हैं कि उनका मानना है कि दलितों और महिलाओं ने हिंदू धर्म के फैलाव और उत्थान में बड़ा योगदान किया है । महिलाओं और दलितों के इस योगदान को सदियों से नजरअंदाज किया जाता रहा है । वेंडी डोनिगर ने अपनी इस किताब में हाशिए के इन लोगों की नजरों से इतिहास को देखने की कोशिश की है । इस किताब में वेंडी डोनिगर ने हिंदू धर्म की अवधारणाओं और प्रस्थापनाओं को लेकर पश्चिमी मानकों और कसौटी पर कसा है । उनकी इन प्रस्थापनाओं पर कई विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सदियों कीविकास यात्रा को तय करते हुए हिंदू धर्म बना है और देश की सर्वोच्च अदालत तो अब भी इसको धर्म के बजाए एक जीवन दर्शन मानती है । हिंदुओं का धर्म तो सनातन धर्म है । हिंदुत्व की बात करने पर जो दो चीज प्रमुखता से सामने आती है वो है कर्म और धर्म । ये दोनों अवधारणाएं अलग अलग कालखंड में हिदुत्व के केंद्र में रही हैं । वेंडी डोनिगर के मुताबिक हिंदू धर्म की खूबसूरती उसकी जीवंतता और विविधता है जो हर काल में अपने दर्शन पर डिबेट की चुनौती पेश करता है । हमारे धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक एक आदर्श हिंदू वह है जो लगातार सवाल खड़े करता है, जवाब को तर्कों की कसौटी पर कसता है और किसी भी चीज, अवधारणा और तर्क को अंतिम सत्य नहीं मानता है । हिंदू धर्म की इस आधारभूत गुण को आत्मसात करते हुए वेंडी डोनिगर ने कई व्याख्याएं की हैं और कुछ असुविधाजनक सवाल खड़े किए हैं । इस किताब में कई ऐसी बातें हैं जो वेंडी डोनिगर ने संस्कृत में पहले से सुलभ हैं और उसको अंग्रेजी के पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है । जैसे वो अपनी इस किताब में वैदिक काल में प्रचलित बहुदेववादी अवधारणा को एकेश्वरवाद का ही एक रूप मानती है । अपनी इस अवधारणा को अपने तर्कों के साथ इस तरह से पेश करती है कि वो कोई नई बात कह रही हों जबकि संस्कृत में पहले से ही सर्वदेवा नमस्कार केशवम प्रतिगच्छति कहा गया है ।  

वेंडी डोनिगर को इस बात की आशंका थी कि इस किताब को लेकर कुछ हिंदुओं को आपत्ति हो सकती है । उन्होंने इस किताब की भूमिका में इसके संकेत भी किया है । वेंडी ने लिखा है कई हिंदू धार्मिक नेता इस किताब को समुद्र में फेंक देना चाहेंगे क्योंकि उन्हें इसमें तथ्यों के साथ खिलवाड़, धार्मिक प्रसंगों की गलत व्याख्या आदि आदि दिखाई देंगे । लेखिका इतने पर ही नहीं रुकती हैं उन्होंने अपनी इसी किताब में ये भी लिखा है कि हमें हिंदी धर्म मैं मौजूद ज्ञान और दर्शन का उपयोग करना चाहिए क्योंकि यहां मौजूद साहित्य उच्च कोटि का है और हिंदू धर्म सर्व को समाहित करता चलता है । इन बातों से लेखिका की मंशा और उसकी आशंका का पता चलता है । दिक्तत वहां होती है जहां जहां पश्चिमी देशों के विद्वान किसी भी भारतीय मिथकीय प्रसंग की व्याख्या का आधार अपने समाज की रीतियों को बना लेते हैं । दरअसल होना यह चाहिए कि बारतीय मिथकीय चरित्रों की व्याख्या के तर्कों का आधार भारतीय समाज में उस वक्त की या वर्तमान की मान्यताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए । ताकि इस तरह के विवादों से बचा जा सके । वेंडी डोनिगर की किताब एक बेहतरीन शोध का नतीजा है और वो एक वैकल्पिक इतिहास प्रस्तुत करती है । इस किताब को वापस लेकर पेंग्विन इंडिया ने गलती की है । भारतीय पाठकों के साथ छल भी । इस गलती को तत्काल सुधारे जाने की जरूरत है । 

Thursday, February 13, 2014

नरेन्द्र मोदी के नाम खुला खत

आदरणीय नरेन्द्र मोदी जी
जिस तरह से आप पूरे देश में घूम रहे हैं और अपनी वकतृत्व कला से मतदाताओं को बांध रहे हैं उससे एक बात तो साबित हो गई है कि आपने उत्तर भारत में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में हवा बना दी है । न्यूज चैनलों पर चुनाव पूर्व सर्वे में ये बातें परिलक्षित भी हो रही है । आपकी इस लोकप्रियता के बाद तो एक जमाने में पार्टी में आपके पैरोकार रहे लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी भी आपकी लोकप्रियता का लोहा मान रहे होंगे वयोवृद्ध नेता आडवाणी जी अब गोवा में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और उसके बाद की घटनाओं का स्मरण भी नहीं करना चाह रहे होंगे आपकी पार्टी के दिल्ली के स्थापित नेता जिन्हें राजनीतिक पंडित गैंग ऑफ फोर कहा करते थे वो भी आपके सामने नतमस्तक हैं, ऐसा प्रतीत होता है आप जिस तरह से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंद करते हुए देशभर में घूम रहे हैं उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस भी आगामी लोकसभा चुनाव के परिणामों को लेकर आशंकित होगी इस वक्त जब देश में भयंकर महंगाई से आम जनता त्रस्त है और भ्रष्टाचार के कई संगीन इल्जाम संप्रग सरकार पर लग रहे हैं, आपने बेहतरीन तरीके से जनता का मूड भांपते हुए उन्हें सपने दिखाने शुरू कर दिए हैं । मोदी जी, आपकी छवि काफी साफ सुथरी है और गुजरात की जनता ने आपको लगातार अपना प्यार भी दिया । भ्रष्टाचार के खिलाफ जब आप दहाड़ते हैं तो लगता है कि वो दिन आ गया है जब देश में कोई घूसखोर बच नहीं पाएगा । मोदी जी आप अपनी रैलियों में सीएजी की रिपोर्ट के हवाले से संप्रग सरकार पर लाखों करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप जड़ते रहे हैं । जब आप इस तरह के आरोप लगाते हैं तो मन में एक सवाल खड़ा होता है । पिछले सालों में आपके राज्य गुजरात में सीएजी की रिपोर्ट में कई ऐसे गड़बड़झालों का जिक्र है । विपक्ष का आरोप है कि गुजरात में सीएजी ने सौराष्ट्र के तकरीबन दो हजार गांवों में पानी के इंतजाम में तकरीबन पांच सौ करोड़ की गड़बड़ियों की ओर इशारा किया है उसके बारे में गुजरात सरकार ने क्या कार्रवाई की ये अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है । इसी तरह विपक्ष ने सीएजी के समय समय पर दिए गए रिपोर्ट के हवाले से शिक्षा विभाग, पंचायत और गृह विभाग के अलावा नर्मदा परियोजना में सैकड़ों करोड़ के घोटालों का आरोप जड़ा है लेकिन उस पर भी आप कमोबेश खामोश ही रहते हैं । ये गुजरात में विपक्ष की नाकामी और कमजोरी है कि वो आपको इन मुद्दों पर घेर नहीं पाता है ।ये विपक्षी दलों की कमोजर साख है कि जनता उनके कहे पर यकीन नहीं करती है । उनकी इस कमजोरी और आपकी टीम की प्रबंधकीय कौशल का भी परिणाम है कि लोग इन आरोपों पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं । आप बहुधा केंद्र सरकार पर भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने का आरोप भी जड़ते रहे हैं लेकिन आपने भी अपने मंत्री बाबूभाई बोखारिया को सेशंस कोर्ट से लाइमस्टोन घोटाले में दोषी करार दिए जाने के बाद भी अपने मंत्रिमंडल में बनाए रखा था । कांग्रेस इन आरोपों को लेकर लगातार आपपर दोहरे मानदंड़ अपनाने का आरोप लगाती रहती है । लोकायुक्त की नियुक्ति को लंबे समय तक टालकर आपने इन आरोपों को मजबूकी प्रदान की । आपको इन आरोपों पर खुलकर अपने विचार व्यक्त करने चाहिए ।    
आप अपनी रैलियों में जनता से साठ महीने का वक्त मांग रहे हैं । एक ऐसे राजनेता, जो अपने देश के लिए कुछ कर दिखाना चाहता है, के लिए जनता से वोटयाचना करना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। आप और आपके समर्थक गुजरात के विकास के मॉडल को मिसाल के तौर पर पेश कर रहे हैं । गुजरात में पिछले एक दशक से ज्यादा आपके शासनकाल में आपके विकास के दावों पर कमोबेश जनता को यकीन भी होता नजर आ रहा है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं । अगर हम आंकड़ों के मकड़जाल में नहीं भी फंसे और शुद्ध सियासत पर बात करें तो मन में कई आशंकाएं हैं । सबसे बड़ी आशंका तो ये है कि भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जो माहौल बना है और आपकी सभाओं में जो भीड़ आ रही है वो वोट में कैसे तब्दील हो पाएगी । अगर हम सीटों की बात करें तो भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, बिहार और महाराष्ट्र बेहद अहम हैं । इन राज्यों में लोकसभा की कुल दो सौ उनचास सीटें हैं । इन पांच राज्यों में से उत्तर प्रदेश और बिहार में तो आपके और आपकी पार्टी के पक्ष में हवा दिखती है, लेकिन आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू में भाजपा कहीं मुकाबले में भी दिखाई नहीं देती है । ऐसे में उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में से सबसे ज्यादा सीट जीतने की चुनौती है । आपको भी इस बात का अंदाजा है इस वजह से आपने अपने सबसे विश्वासपात्र सिपहसालार अमित शाह को वहां की कमान सौंपी है । अमित शाह को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी साथ है और आपकी कट्टर हिंदूवादी छवि का सहारा भी है । अगर हम उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास का विश्लेषण करें तो तस्वीर धुंधलाने लगती है । उत्तर प्रदेश के चुनाव में जाति और समुदाय की अहम भूमिका का लंबा इतिहास है । उत्तर प्रदेश में दलितों और मुसलमानों के वोट को जोड़ देते हैं तो ये उनचालीस फीसदी होता है । राजनीति के जानकारों के मुताबिक दलित वोटर मायावती के साथ बेहद मजबूती के साथ खड़े हैं और मुसलमानों के वोट आपकी छवि और भारतीय जनता पार्टी और संघ के इतिहास की वजह से आपकी झोली में आने से रहे । तो बचते हैं इकसठ फीसदी मतदाता । अब सूबे में दस फीसदी यादव वोटर हैं जो बुरे से बुरे दिनों में मुलायम सिंह यादव का दामन नहीं छोड़ते हैं और इस वक्त तो वो सत्ता का आनंद भी उठा रहे हैं । लिहाजा बाकी बचे इक्यावन फीसदी वोटरों के सहारे आपके सामने पचास सीटें जीतने की चुनौती है । आपकी ये रणनीति सही है कि आप उत्तर प्रदेश की अपनी रैलियों में कल्याण सिंह को साथ खड़े रखते हैं । कल्याण सिंह भाजपा के उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े पिछड़े नेता हैं लेकिन उनकी साख संदिग्ध है । भाजपा में उनका आना जाना लगा रहा है । लिहाजा मुझे इस बात में संदेह है कि वो पिछड़ी जाति के वोटरों को अपनी ओर खींच पाएंगे । इससे ज्यादा फायदा तो आपके पिछड़ी जाति से होने के प्रचार से मिल सकता है । आपको इस बात का एहसास है इसलिए जहां मौका मिलता है वहां आप पिछड़ा कार्ड खेलने से नहीं चूकते हैं । उत्तर प्रदेश में आपके पक्ष में कई बातें हैं । पहला तो सूबे में खराब कानून व्यवस्था और अपराधियों के सामने समाजवादी पार्टी के घुटने टेक देने से आवाम में राज्य सरकार को लेकर काफी नाराजगी है । दूसरा मुजफ्फरनगर दंगों की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण के संकेत मिल रहे हैं । तीसरा सूबे में कांग्रेस का बुरा हाल । लेकिन इन इलाकों में भी प्रत्याशियों के चयन में अगर सावधानी हटी तो दुर्घटना घट सकती है ।
उत्तर प्रदेश के बाद अगर बिहार की बात करें तो वहां भी तमाम चुनाव पूर्व सर्वे में भारतीय जनता पार्टी को लाभ मिलता दिख रहा है । इन सर्वे में सूबे की ज्यादातर जनता आपको प्रधानमंत्री पद के तौर पर देखना चाहती है । लेकिन अगर वहां भी लालू यादव, रामविलास पासवान और कांग्रेस के बीच गठजोड़ हो जाता है, जिसकी प्रबल संभावना है, तो आपके लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है । महाराष्ट्र में अड़तालीस सीटें हैं और वहां पिछले दस सालों से कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार है। आपकी सहयोगी पार्टी शिवसेना अपने अंतर्कलह से जूझ रही है । उधर शरद पवार और उनके नुमाइंदे भले ही आपके साथ मेल मुलाकात कर रहे हों लेकिन वो राज ठाकरे को भी आगे बढ़ा रहे हैं । राज ठाकरे अगर मजबूत होते हैं तो वो आपके गठबंधन के वोट ही काटेंगे । माना जा रहा था कि तमिलनाडु में जयललिता का समर्थन आपको मिलेगा लेकिन जिस तरह से जयललिता ने वामदलों के साथ चुनाव पूर्व समझौता कर लिया है वो आपके लिए तगड़ा झटका है । ऐसी खबरें आ रही है कि जयललिता की भी प्रधानमंत्री पद की महात्वाकांक्षा हिलोरें ले रही हैं । यही महात्वाकांक्षा उनको तीसरे मोर्चे की ओर खींच रही है । अब अगर इन दो सौ उनचास सीटों से इतर हम कर्नाटक, केरल, ओडिशा, पश्चिम बंगाल की सीटों को जोड़ें तो वो संख्या एक सौ ग्यारह तक पहुंचती है । इनमें कर्नाटक और ओडिशा से कुछ सीटों की तो आपको उम्मीद होगी लेकिन केरल और पश्चिम बंगाल में तो उम्मीद करना बेमानी है । उसी तरह उत्तर पूर्व की पच्चीस सीटों पर भी आपकी पार्टी अपनी पहचान के लिए ही संघर्ष कर रही है । इस विश्लेषण से यह बात साफ है कि तकरीबन दो सौ दस सीटों पर आपकी पार्टी मुकाबले में भी नहीं है । बचती है तीन सौ तैंतीस सीटें । आपको लाल किला पर झंडा फहराने के लिए दो सौ बहत्तर सीटें चाहिए । सवाल यही है कि क्या आप अपनी पार्टी को सफलता का ये सट्राइक रेट दिलवा पाते हैं । । इसके अलावा आप अभी तक अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का नाम नहीं लेकर उनको नजरअंदाज कर रहे हैं लेकिन देश के मतदाता भी उन्हें नजरअंदाज करेंगे ये कहना मुश्किल है ।  

अंत में मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि अगर आप भारतीय जनता पार्टी को दो सौ बहत्तर का जादुई आंकड़ा दिलवाने से पिछड़ते हैं तो आपके नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। आडवाणी ने अपने ताजा ब्लॉग में ये कहकर अपनी संभावनाएं फिर से खोल दी हैं कि उनकी सियासी पारी अभी खत्म नहीं हुई । आपकी छवि को लेकर जिस तरह से एनडीए के पूर्व सहयोगियों को आपत्ति है उसके बरक्श आडवाणी का ये ब्लॉग एक संकेत तो दे ही रहा है । आपके नेतृत्व के तेज और प्रबंधकीय कौशल के सामने जिस तरह से इस वक्त आपकी पार्टी के आला नेता चुप बैठे हैं वही आपके खिलाफ लामबंद हो सकते हैं । तब आपके सामने आपके जीवन की सबसे बड़ी सियासी चुनौती का समाना करना होगा । अगर आप इन चुनौतियों से पार पा लेते हैं तो भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में जबरदस्त तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज । आपका  

Tuesday, February 11, 2014

नियमित हो तो बात बने


मैंने अपने स्तंभ में कई बार हिंदी में निकल रही साहित्यक पत्रिकाओं के बारे में विस्तार से लिखा है । पाठकों ने पिछले अंक में पढ़ा होगा कि किस तरह से हिन्दी साहित्य में साहित्यक पत्रिकाओं को निकालने के पीछे बाजार को भुनाने की चाहत बढ़ती जा रही है । मैं हमेशा से इस बात का पक्षधर रहा हूं कि बाजार का अपने पक्ष में उपयोग किया जाना चाहिए । लेकिन बाजार को कोसना और फिर उसका ही इस्तेमाल करना मुझे साइकोफैंसी लगती है । बाजार के विरोध की आड़ में जिस तरह से ये खेल खेला जा रहा है उसको पाठकों के सामने बेनकाब करने की जरूरत है । ऐसी पत्रिकाओं की संख्या थोड़ी ही है लेकिन वो बिगाड़ने और पाठकों को भ्रमित करने के लिए काफी है । जरूरत इस बात की है कि हिंदी जगत खड़ा होकर ये कहने का हिम्मत जुटाए कि अमुक पत्रिका अमुक मकसद से निकल रही है । मेरे यह कहने का अर्थ कदापि यह नहीं है कि हिंदी में निकलनेवाली सभी साहित्यक पत्रिकाएं इस खेल में शामिल हैं । हिंदी में अब भी कई पत्रिकाएं बेहद गंभीरता से निकल रही है । कुछ व्यक्तिगत प्रयास से तो कुछ सांस्थानिक पूंजी के सहारे । ऐसी ही दो पत्रिका है तद्भव और आलोचना । तद्भव को कथाकार-उपन्यासकार अखिलेश बेहद श्रमपूर्व सालों से बगैर किसी संस्थागत पूंजी किी मदद के निकाल रहे हैं और आलोचना तो राजकमल प्रकाशन से अरुण कमल के संपादकत्व और नामवर सिंह जी की रहनुमाई में निकल रहा है । अभी हाल ही में तद्भव और आलोचना दोनों ही पत्रिकाओं का नया अंक आया है । आलोचना का समीक्ष्य जुलाई-सितंबर 2013 अंक सहस्त्राब्दी अंक 50 है । आलोचना लंबे समय से निकल रही है और इस पत्रिका की हिंदी के पाठकों के बीच साहित्यक रुचि और संस्कृति विकसित करने में अहम भूमिका है । शिवदान सिंह चौहान से लेकर नामवर सिंह तक इसके संपादक रहे हैं । इन दिनों नामवर जी इसके प्रधान संपादक है और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित और वरिष्ठ कवि अरुण कमल इसके संपादन का दायित्व संभाल रहे हैं । पत्रिका की आवर्तिता लगभग ठीक होने के बावजूद समय से थोड़ा पीछे चल रही है। जैस समीक्ष्य सहस्त्राब्दी अंक जुलाई सितंबर दो हजार तेरह का अंक है । सहस्त्राब्दि अंक के संपादकीय में अरुण कमल ने बेहद विनम्रतापूर्क कहा है कि- आलोचना का मुख्य काम श्रेष्ठ की पहचान कर, उसके मूल्य को स्वीकार्य बनाना है । साथ ही, ऐसे वातावरण, ऐसे समाज की रचना में अपना योग देना है जो श्रेष्ठ को पोषण प्रदान करे । ऐसे समाज का निर्माण जहां रोटी और कविता में सबकी बराबर की हिस्सेदारी हो। अब कवि हैं तो आत्मा तो थोड़ी कविता की ओर झुकी ही होगी लेकिन बेहतर होता कि संपादक यह कहता कि- रोटी और साहित्य में सबकी बराबर की हिस्सेदारी हो । इसके अलावा साहित्य को रोटी से जिस तरह से अरुण कमल ने जोडा़ है उसको थोड़ा और विस्तार देते तो आलोचना के आम पाठकों के लिए समझना आसान होता । अरुण कमल का गद्य भी पद्य की ही तरह मोहक होता है । इसके अलावा अपने संपादकीय में अरुण कमल ने बड़े बोल नहीं बोले हैं । वो कहते हैं हम यह नहीं कहते कि यहां जो भी प्रकाशित हुआ वह सब मूल्यवान ही है या श्रेष्ठ ही है । लेकिन पचास ऐसी प्रस्तुतियां भी मिले को हम धन्य होंगे । अब इस वाक्य में ही शब्द पर ध्यान देने की आवश्यकता है । सिर्फ ही लगाकर संपादक ने विनम्रता के साथ अपने दावे को पेश कर दिया है । इस बात का हक भी उनको है क्योंकि आलोचना में सैकड़ों ऐसे लेख और कविताएं प्रकाशित हुई हैं जिनकी गूंज लंबे समय तक हिंदी साहित्य में सुनाई देती रही है । समीक्ष्य अंक में लेख स्तरीय हैं लेकिन इस बार ज्यादातर कविताएं औसत हैं । संपादक और सहसंपादक दोनों अच्छे कवि हैं । लिहाजा यह कमी खटकती है ।

तद्भव के इस अंक में अखिलेश ने साहित्य और राजनीति को मिलाकर अपने संपादकीय पेश किया है । अपने सारगर्भित संपादकीय में अखिलेश ने हिंसा और घृणा को अपने तरीके से परिभाषित किया है । उनका मानना है कि घृणा की बिसात पर होनेवाली हिंसा ज्यादा भयानक और गहन होती है । वो इसके लिए नरेन्द्र मोदी के मशहूर कुत्ते के पिल्ले वाले बयान का उदाहरण देते हैं। अखिलेश का मानना है कि मगुलों ने राज्य सत्ता का विस्तार करने के लिए हिंसा का सहारा अवश्य लिया था लेकिन बाद में अपना शास्न स्थापित कर वो वैमनस्यता भूल गए थे । अखिलेश इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि हिंसा और घृणा के खिलाफ साहित्य का कला कोई प्रतिरोध नहीं कर रहा है । अखिलेश की विचारधारा ज्ञात है और इस वजह से उनके संपादकीय में अमेरिका की घृणा और युद्दोन्माद तो दिखाई देता है लेकिन रूस या फिर पश्चिम बंगाल में वामदलों के शासनकाल में सरकारी हिंसा पर टिप्पणी करने से बच निकलते हैं । संभवत वो यह सोचते हों कि रूस या बंगाल में जो हिंसा हो रही है वो मुगलों की तरह है जो अपना आधिपत्य स्थापित कर वैमनस्यता भूल जाती है । लेकिन इतना अवश्य है कि राजेन्द्र यादव ते निन के बाद हिंदी में इस तरह के तीखे संपादकीय लिखने वाले अखिलेश अकेले लेखक बचे हैं । अब तद्भव चूंकि अनियतकालीन है लिहाजा संपादकीय पढ़ने का अवसर भी तय वक्त पर नहीं मिल पाता है । वीरेन्द्र यादव तद्भव में संपादकीय की तरह ही स्थायी हैं । इस बार भी उन्होंने अतिया हुसैन पर लिखा है । वीरेन्द्र यादव को पढ़ना हमेशा से रुचिकर होता है बीच बीच में जब वो अपने पूर्वग्रहों पर जाते हैं तो अतार्किक हो जाते हैं लेकिन इस लेख में वो इस फैलेसी के शिकार नहीं है । तद्भव के इस अंक में गरिमा श्रीवास्तव का मलयालम स्त्री आत्मकथा पर लिखा बेहतरीन है । अपने इस शोधपूर्ण लेख में गरिमा ने हिंदी के पाठकों का मलयालम में लिखी गई आत्मकथाओं से परिचय करवाया है । मैं जब इस अंक को पढ़ रहा था तो मन के किसी कोने अंतरे में यह बात थी कि शायद गरिमा ने सिस्टक जेसमी की आत्मकथा पर नहीं लिखा हो लेकिन लेख ने मेरी आशंका को गलत साबित किया । उसने ना केवर सिस्टर जेसमी की आत्मकथा आमीन को उभारा है । इसके अलावा इस अंक में उपासना और शिवेन्द्र की लंबी कहानियां हैं । कविताओं में कुंवर नारायण, ऋतुराज, चेतनक्रांति और सुंदरचंद ठाकुर की कविताएं हैं । तुलसीराम का आत्मकथा तो लंबे वक्त से चल ही रही है जो इस अंक में भी जारी है । कुल मिलाकर अखिलेश के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका तद्भव हिंदी साहित्य में एक अलग और उंचे स्थान पर स्थापित है । मैं पहले भी कई बार इस बात को कह चुका हूं कि अखिलेश को इस पत्रिका को नियमित करना चाहिए । अगर मासिक निकालना संभव नहीं है तो कम से कम द्वैमासिक तो निकालना ही चाहिए । मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि पूरा हिंदी साहित्य अखिलेश को रचनात्मक सहयोग करेगा ।  

Sunday, February 9, 2014

गुरु आख्यान को सम्मान

आज से तकरीबन दो दशक पहले की बात है , मुझे ठीक से याद नहीं है कि कौन सा महीना था । दि्ल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में पत्रकारिता का कोर्स शुरू हुआ था । अपने किसी मित्र की सलाह पर मैंने भी एडमिशन फॉर्म भर दिया, प्रवेश परीक्षा में पास कर गया, इंटरव्यू का बुलावा भी आ गया । दक्षिण परिसर के हिंदी विभाग के अंतर्गत पत्रकारिता कोर्स था, लिहाजा हिंदी विभाग में सारा कामकाज होता था । साक्षात्कार उसी इमारत की पहली मंजिल के किसी कमरे में था । जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तो वहां सात लोग बैठे थे । जिनमें से मैं नामवर सिंह और सुरेन्द्र प्रताप सिंह को जानता था । नामवर सिंह जी को दिल्ली और पटना की कई गोष्ठियों में सुन चुका था और सुरेन्द्र जी को रविवार के दिनों से जानता था । इसके अलावा इंटरव्यू बोर्ड के पांच अन्य सदस्यों को मैं नहीं जानता था । बाद में पता चला कि उनमें मनोहर श्याम जोशी, प्रभाष जोशी, जे एस यादव, विश्वनाथ त्रिपाठी और पाठ्यक्रम संयोजक निर्मला जैन थीं । ये तो अच्छा हुआ इन विभूतियों को नहीं जानता था वर्ना इतने मूर्धन्य लोगों के सामने बोल पाना मुमकिन नहीं था । मेरा इंटरव्यू चला, सामान्य ज्ञान के अलावा साहित्य पर सवाल शुरू हो गए तो फिर साक्षात्कार तकरीबन चालीस मिनट तक खिंच गया था । सभी ने सवाल दागे थे । हिंदी उपन्यासों में प्रेम पर जब बात हुई तो मैंने मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास कसप की जमकर तारीफ की । लोग एक दूसरे को देखकर मुस्कराने लगे तो मुझे उस वक्त लगा था कि कुछ गलत बोल रहा हूं । वहां बैठे एक शख्स ने कसप और गुनाहों का देवता के बारे में तुलनात्मक सवाल पूछा था । बाद में मुझे पता लगा था कि इंटरव्यू बोर्ड में मनोहर श्याम जोशी भी बैठे थे और जब मैंने कसप की तारीफ की थी तो उस वजह से सारे लोग मुस्कुरा उठे थे । गुनाहों का देवता और कसप के बारे में सवाल पूछनेवाले शख्स विश्वनाथ त्रिपाठी थे । पत्रकारिता के कोर्स में त्रिपाठी जी हमें हिंदी भाषा की प्रकृति और विकास के अलावा पत्रकारिता का इतिहास पढ़ाते थे । खैर पढ़ाई के दौरान विश्वनाथ त्रिपाठी से संवाद का काफी अवसर मिला । उनकी निश्छल हंसी और साहित्य के प्रसंगों को सुनना हमें रुचिकर लगता था । बहुधा हम दो चार मित्र उनको घेर लेते थे और फिर उनसे साहित्यक प्रसंगों को सुनाने का आग्रह करते थे । कोर्स खत्म होने के बाद हमारा संपर्क टूटता चला गया । महानगर की आपाधापी में साहित्यक गोष्ठियों में कभी कभार मिलना होता था और यदा कदा फोन पर बातचीत । मैं दक्षिण परिसर के दिनों से उनको गुरुदेव कहने लगा था । विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन दिनों हमें कई बार कहा था कि निर्भीक होकर अपनी बात कहनी चाहिए । बातचीत में उन्होंने यह भी कहा था कि अगर तुम्हारे पास तथ्य हों तो उसे जोर देकर दबंगई से सबके सामने रखो और अगर तथ्य ना हों तो टेबल पर मुक्का मारते हुए अपनी बात कहो।
खैर उस दौर की कई यादें हैं लेकिन अभी विश्वनाथ त्रिपाठी जी की चर्चा इस वजह से कर रहा हूं कि गुरुदेव को उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक व्योमकेश दरवेश पर तेइसवां व्यास सम्मान देने का ऐलान हुआ है । व्योमकेश दरवेश दो हजार ग्यारह में प्रकाशित हुआ था और यह किताब विश्वनाथ त्रिपाठी के गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी पर केंद्रित है । खुद लेखक ने भी इस किताब को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का पुण्य स्मरण कहा है । दो हजार ग्यारह में जब त्रिपाठी जी की यह किताब प्रकाशित हुई थी तो हिंदी जगत में इस पर व्यापक चर्चा हुई थी । आलोचकों से लेकर पाठकों तक ने इस पुस्तक को जमकर सराहा था । माना गया था कि बहुत दिनों के बाद हिंदी में कोई ऐसी किताब आई थी जिसने पाठकों और आलोचकों को अपनी ओर आकृष्ट किया । इसके पहले दो हजार चार में विश्वनाथ त्रिपाठी की अपने गांव पर लिखी संस्मरणात्मक किताब नंगातलाई का गांव भी प्रकाशित होकर लोकप्रिय हो चुकी थी । मेरा मानना है कि नंगातलाई के गांव ने विश्वनाथ त्रिपाठी को हिंदी में पर्याप्त शोहरत दी । इसके पहले विश्वनाथ त्रिपाठी एक सम्मानित शिक्षक के रूप में जाने जाते थे जिनकी आलोचना की भी कुछ किताबें प्रकाशित हुई थी । नंगातलाई के गांव के प्रकाशन के पहले त्रिपाठी जी को अकादमिक जगत से बाहर लोकप्रियता हासिल नहीं थी जो उसके प्रकाशन के बाद मिली ।  नंगातलाई के मोहक गद्य और किताब से गुजरते हुए गांव के माहौल को महसूस करता पाठक उसे सम्मोहित होकर पढ़ता चला जाता है । मैं दृढता से यह बात कह सकता हूं कि नंगातलाई का गांव से त्रिपाठी जी को शोहरत मिली और व्योमकेश दरवेश ने उनको बड़ा पुरस्कार दिलवाया । व्योमकेश दरवेश को तेइसवें व्यास सम्मान के ऐलान के वक्त के के बिरला फाउंडेशन ने कहा यह पुस्तक अपने  विधागत रूप, भाषा शैली और शिल्प में एक अनोखापन लिए हुए है । इसमें जीवनी, संस्मरण, आत्मचरित, इतिहास और आलोचना के विभिन्न रंग किस्सागोई की तरलता में मिलकर एक ऐसा इंद्रधनुष बनाते हैं जो अपने आप में बेजोड़ है । इसमें मैं सिर्फ यह जोड़ना चाहता हूं कि इस पुस्तक में त्रिपाठी जी ने अपने गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को भी कई बार  कसौटी पर कसा है लेकिन बहुधा वो गुरू को श्रद्धाभाव से ही देखते चलते हैं ।

इस किताब में एक ऐसा प्रसंग है जो मुझे खटका था । व्योमकेश दरवेश के पहले संस्करण में पृष्ठ संख्या दो सौ चौदह पर यशपाल और साहित्य अकादमी विवाद के संदर्भ में त्रिपाठी जी लिखते हैं यशपाल के विषय में विवाद हुआ ।कहते हैं कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि झूठा सच के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है ।नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है । अब यहीं विश्वनाथ त्रिपाठी का दिनकर को लेकर पूर्वग्रह सामने आता है । जबकि यह पूरा प्रसंग ही इससे उलट है । डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स, अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ साहित्य अकादमी के पृष्ठ संख्या 197 पर लिखा है एक्जीक्यूटिव बोर्ड की बैठक में नेहरू ने जानना चाहा कि यशपाल के झूठा सच को अकादमी पुरस्कार क्यों नहीं मिला तो हिंदी के संयोजक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि उसमें नेहरू जी को बुरा भला कहा गया है । नेहरू जी ने कहा कि पुरस्कार नहीं देने की ये कोई वजह नहीं होनी चाहिए । इसपर द्विवेदी जी ने जवाब दिया कि सिर्फ वही एकमात्र कारण नहीं था बल्कि और भी अन्य बेहतर किताबें पुरस्कार के लिए थी । अर्थात द्विवेदी जी ने यशपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं दिया । कालांतर में यह बात सुननियोजित तरीके से फैलाई गई कि इसके पीछे दिनकर थे लेकिन वो गलत तथ्य है । इस पूरे प्रसंग से यह साबित होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी या तो स्मरण दोष के शिकार हो गए या जानबूझकर दिनकर को बदनाम करने की साजिश के हिस्सा बने । अगर स्मरण दोष के शिकार हुए होते तो यह नहीं कहते- मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है । डॉ नागेन्द्र की किताब विमोचन के प्रसंग में विश्वनाथ त्रिपाठी ने आचार्य जी को कोट किया है मंजन की बात थी ताड़ व भोज के पत्तों पर ग्रंथ लिखा जाता था । कभी किसी पत्ते को हवा उड़ा ले गई या दीमकों ने चाट लिया तो उसकी जगह पर सादा पत्ता लगा दिया जाता था । उस सादे पत्ते पर कुंडलिनी का चिन्ह बना दिया जाता था । उस कुंडलिनी चिन्ह सामग्री का मंजन होता था जिसका अभिप्राय यह है कि खोई हुई चिन्तन सामग्री की पुनरुद्भावना की जाएगी । गुरू उठ जाते थे तो शिष्य मंजन करते थे । लेकिन दिनकर के प्रसंग में त्रिपाठी जी अगले संस्करण में खुद ही सक्रियता दिखाई और मुझे बताया गया है कि दिनकर का नाम और अपने समय का सूर्य वाली लाइन हटा दी गई है । सवाल यही उठता है कि कि सादा कागज लगाने की आवश्यकता विश्वनाथ त्रिपाठी को क्यों पड़ी । खैर इस तरह के कई प्रसंग इस किताब में हैं । गुरू जी आपने ही कहा था कि निर्भीकता के साथ अपनी बात कहनी चाहिए और अगर तथ्य मजबूत हों तो दबंगई से सामने रखो । अंत में पुरस्कार के लिए आपको बधाई । आप दीर्घजीवी हों । 

Sunday, February 2, 2014

यौनिकता पर हो राष्ट्रीय बहस

अपनी आत्मकथा बियांड द लाइंस में कुलदीप नैयर ने लाल बहादुर शास्त्री से जुड़े कई बेहद दिलचस्प प्रसंग लिखे हैं । उनमें से एक सोवियत रूस के दौरे के दौरान बैले नृत्य देखने का है । शास्त्री जी के सोवियत रूस के दौरे के दौरान उनके सम्मान में वहां की सरकार ने लेनिनग्राद में बैले नृत्य का आयोजन किया गया था । कुलदीप नैयर, लालबहादुर शास्त्री और उनकी पत्नी ललिता शास्त्री नृत्य देखने पहुंचे । पूरे समारोह के दौरान शास्त्री जी बेहद असहज दिखे । नृत्य के बीच में शास्त्री जी से जब कुलदीप नैयर ने इसकी वजह जाननी चाही तो शास्त्री जी ने संकोच के साथ बताया कि वो इस वजह से असहज हैं कि नर्तकियों के पांव बहुत उपर तक बगैर कपड़ों के और खुले हुए हैं । शास्त्री जी की दलील थी कि चूंकि उनकी पत्नी भी साथ बैठ कर इस तरह का नृत्य देख रही हैं लिहाजा वो सहज नहीं महसूस कर रहे हैं । इलसके अलावा एक और प्रसंग से सामाजिक स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है । पंडित जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे तो उस वक्त ही नोबोकोब का मशहूर उपन्यास लोलिता का प्रकाशन हुआ था । तब लालबहादुर शास्त्री ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर लोलिता को भारत में प्रतिबंधित करने की वकालत की थी । शास्त्री के पत्र के जवाब में नेहरू जी ने एक लंबा पत्र लिखा और लोलिता को देश में प्रतिबंधित करने से मना कर दिया । नेहरू तो अपने खत में एक और कदम आगे चले गए और सलाह दी कि डी एच लॉरेंस का उपन्यास- लेडी चैटर्लीज लवर- भी पाठकों के लिए उपलब्ध होना चाहिए । तो ये दो तरह की धारा साफ तौर पर देखी जा सकती है । कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में शास्त्री जी को रूढिवादी करार दिया है । अब इस पूरे प्रसंग से ये समझा जा सकता है कि हमारे देश की राजनीति के शीर्ष पर बैठनों वालों में से कई लोग स्त्री देह के खुलेपन और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर कितना संकोच करते थे । नेहरू जी हमेशा से अपने समय से आगे थे । उनकी सोच पश्चिमी देशों से प्रभावित थी इसलिए वो आधुनिक माने गए । भारतीय समाज नेहरू जी के वक्त भी और उनके बाद भी पारंपरिक समाज ही रहा है । अब भी स्त्री देह के सार्वजनिक प्रदर्शन और साहित्य में यौनिकता का खुला वर्णन आलोच्य है । हिंदी साहित्य में तो यौनिकता को लेकर बहस ही छिड़ी हुई है । कामनसूत्र के रचियता वात्सयायन के देश में लोग यौनिकता पर बात करने में परहेज करने लगे हैं । कालिदास की कृतियों में जिस तरह की सेंसुअलिटी है वो विश्व की किसी भी भाषा की श्रेष्ठ कृतियों को टक्कर दे सकती है । खैर यह एक अवांतर प्रसंग और यह विषय विस्तार से विमर्श की मांग करता है । इस पर फिर कभी चर्चा होगी ।
बैले नृत्य में शास्त्री जी की असहजता उस भारतीय मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जो स्त्री देह के सार्वजनिक प्रदर्शन को अश्लीलता मानता रहा है । हमारे देश में लंबे समय से चली आ रही यही मानसिकता हमारी फिल्मों में भी प्रदर्शित होती रही है । वक्त बदलने के साथ साथ फिल्मों में खुलापन आने लगा । लेकिन सेंसर बोर्ड ने कुछ वर्जनाओं को कायम रखा । भारत में प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों में चुंबन दृष्यों को तो आधुनिकता के नाम पर मंजूरी मिलनी शुरू हो गई लेकिन कामक्रीडा को दर्शाने की इजाजत अभी भी नहीं है । महिलाओं के शरीर के उपरी अंगों के खुले प्रदर्शन पर भी अबतक रोक रही है । कम कपड़ों में या फिर पारदर्शी कपड़ों में कहानी की मांग के नाम पर कुछ निर्देशक छूट लेते रहे हैं । राजकपूर ने अपनी फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम और राम तेरी गंगा मैली में बड़े गले के या फिर पारदर्शी कपड़ों में नायिकाओं को दिखाने की छूट सेंसर बोर्ड से हासिल कर ली थी । उस वक्त भी इसको लेकर काफी बहसें हुई थी । माना गया था कि निर्देशकों ने इस तरह के दृश्य को दिखाकर दर्शकों में उद्दीपन पैदा करने की कोशिश की है । इसी तरह जब उन्नीस सौ तेहत्तर में बी के आदर्श ने गुप्त ज्ञान नाम की फिल्म बनाई थी तो सेंसर बोर्ड के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया था । उस फिल्म में कई दृश्य ऐसे थे जिनको लेकर निर्माताओॆ की दलील थी कि वो यौनिकता को लेकर जनता को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म में डाली गई हैं । लेकिन बोर्ड के कई सदस्यों को लग रहा था कि ये जनता की यौन भावनाओं को भड़का कर पैसा कमाने की एक चाल है । लंबी बहस के बाद गुप्त ज्ञान को बगैर किसी काट छांट के प्रदर्शन की इजाजत मिल गई । सिनेमाघरों में प्रदर्शन के बाद उस फिल्म के अंतरंग दृष्यों को लेकर बवाल बढ़ा तो चंद महीनों के भीतर उसको वापस लेना पड़ा था । सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने एक बार फिर से फिल्म गुप्त ज्ञान को देखा और उसपर जमकर कैंची चलाने के बाद ही प्रदर्शन की इजाजत मिली । इस पूरी प्रक्रिया में लगभग ढाई से तीन साल लग गए । उन्नीस सौ चौहत्तर में अपने प्रदर्शन के चंद महीनों में वापस ली गई ये फिल्म उन्नीस सौ सतहत्तर में सिनेमाघरों में पहुंच पाई। भारतीय सिनेमा में चाहे कितना भी खुलापन आ जाए नग्नता को अभी तक मंजूरी नहीं मिल पाई है चाहे वो आंशिक ही क्यों ना हो । उन्नीस सौ चौरानवे में फूलन देवी की जिंदगी पर बनी फिल्म बैंडिट क्वीन में भी स्त्री देह की नग्नता को लॉंग शॉट में ही दिखाने की इजाजत दी गई थी । स्त्री देह की आंशिक नग्नता को प्रतीकात्मक रूप में अबतक इजाजत मिलती रही है । कहीं उसे धुंधला कर तो कहीं उसे लांग शॉट में दिखाकर ।

इतने सालों बाद अब लगता है कि भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड में खुलेपन की बयार बहने लगी है । दो हजार तेरह में बनी विदेशी फिल्म - 12 इयर्स अ स्लेव - को भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शन की इजाजत मिली तो स्त्री देह की नग्नता को दिखाने की मंजूरी के साथ । ऐतिहासिकता को केंद्र में रखकर बनाई गई स्टीव मैक्वीन की इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने वयस्क फिल्म का प्रमाण पत्र दिया है । हमारे यहां वयस्क फिल्मों में भी स्त्री के शरीर के उपरी हिस्से को पूर्ण रूप से नग्न दिखाने पर एक रोक है । इस फिल्म में इस तरह के दृश्यों की इजाजत के पीछे तर्क वही है कि गुलामों पर बर्बर अत्याचार के दौरान उनको सार्वजनिक तौर पर नंगा करके जलील किया जाता था । निर्देशक का तर्क है कि इस तरह के दृश्य फिल्म की मांग है । कहानी की आवश्कता है । सेंसर बोर्ड पूर्व में इस तरह के तर्कों को खारिज करता रहा है । विदेशी फिल्मों पर भी उसकी कैंची चलती रही है । फिल्म फायर के दृश्यों से लेकर डर्टी पिक्चर तक पर अच्छा खासा विवाद हुआ लेकिन सेंसर बोर्ड ने अपनी बात मनवा कर ही दम लिया था । लेकिन 12 इयर्स अ स्लेव में गुलामों के अत्याचार के नाम पर इस तरह के दृश्यों की इजाजत देना हैरान करनेवाला है । यहां सवाल यह उठता है कि क्या हमारा समाज इस तरह के दृश्यों को देखने और उसको सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए परिपक्व हो चुका है । हमारी सामाजिक संरचना और समाज को प्रतिबिंबित करनेवाले मानदंड तो यह बताते हैं कि हमारा समाज इतने खुलेपन के लिए अभी तैयार नहीं है । समाज में शिक्षा की स्थिति, महिलाओं को लेकर सामाजिक वर्जनाएं और फिर यौनिकता को समझ नहीं पाने से पैदा हुई कुंठा इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत का समाज अभी फिल्मों में स्त्री देह के आंशिक रूप से नग्न प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं है । कई समाज विज्ञानियों की तो दलील है कि फिल्मों में इस तरह के दृश्यों और अशिक्षा के मेल से जो मानसिकता बनती है वो स्त्रियों के खिलाफ अपराध को बढ़ावा देती है । कई ऐसे मामले सामने भी आए हैं जब स्त्रियों के खिलाफ होनेवाले अपराध के पीछे इस तरह की वजहें सामने आई हैं । सेंसर बोर्ड को इस तरह के खुलेपन और नग्नता के सार्वजनिक प्रदर्शन के पहले समाजिक संरचना को भी ध्यान में रखना चाहिए । फिल्मों में इजाजत के बाद अब तो टेलीविजन पर भी देर रात एक खास वक्त और टाइम बैंड पर वयस्क फिल्मों और वयस्क कार्यक्रमों को दिखाने के लिए मुहिम शुरू हो गई है । हमारा मानना है कि इस तरह के फैसले के पहले एक राष्ट्रव्यापी बहस की जानी चाहिए ताकि पूरे देश की सहमति हासिल हो सके । चंद लोगों की कमेटी को कमरों में बैठकर इस तरह सार्वजनिक रूप से नग्नता के प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।