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Saturday, January 24, 2026

साख और विश्वास के बूते जोखिम भरे निर्णय


भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष ने कार्यभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत पार्टी के दिग्गज नेताओं की उपस्थिति में 45 वर्ष के नितिन नवीन ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाल लिया। कहीं से किसी प्रकार का विरोध या विद्रोह के स्वर सुनाई नहीं दिए। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन को उनकी कुर्सी पर बिठा रहे थे तो अचानक मेरे ध्यान में 2013 में गोवा में भारतीय जनता पार्टी कार्यकारिणी की बैठक का स्मरण हो आया। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाना चाहती थी तो कितना बवाल हुआ था। पार्टी के कई नेता पीढ़ीगत बदलाव चाहते थे। पार्टी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी की जगह नेतृत्व की कमान नरेन्द्र मोदी को देने की चर्चा थी। पार्टी के एक धड़े ने तय कर लिया था कि मोदी को कमान सौंपनी है लेकिन आडवाणी और उनके खेमे को ये मंजूर नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मोदी के नाम पर सहमति थी। गोवा में दो दिनों तक हाई वोल्टेज ड्रामा चला था। आडवाणी जी की उम्र उस समय 85 वर्ष थी और नरेन्द्र मोदी 63 वर्ष के थे। पार्टी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार हो रही थी पर आडवाणी और उनके समर्थक तैयार नहीं हो पा रहे थे। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में पहले दिन आडवाणी नहीं आए। दूसरे तक उनके आने की चर्चा होती रही लेकिन आखिरकार वो नहीं आए। उनके समर्थक और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वो नरेन्द्र मोदी के कारण नहीं आ रहे हैं। उन्होंने तब कहा भी था कि उनको नमोनिया नहीं हुआ है इस कारण वो गोवा नहीं जा रहे हैं। जसवंत सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता भी किसी बहाने से गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए थे। 

नरेन्द्र मोदी के बढ़ते समर्थन को देखकर लालकृष्ण आडवाणी गोवा नहीं गए थे। कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे दिन तक ये चर्चा चलती रही थी कि दिल्ली विमानतल पर विशेष विमान खड़ा है जो आडवाणी को लकर गोवा आएगा। आडवाणी नहीं आए और उनकी अनुपस्थिति में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी को कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। आडवाणी जी की नाराजगी बनी रही। घोषणा के अगले ही दिन उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र देने की बात की। अपने पत्र में लालकृष्ण आडवाणी ने ये भी लिखा था कि पार्टी अपनी विचारधारा से हटती नजर आ रही है। इसके अधिकतर नेता अपना व्यक्तिगत एजेंडा चला रहे हैं। उस समय मीडिया के एक खास वर्ग ने इस विवाद को खूब हवा दी थी। गोवा प्रसंग की चर्चा सिर्फ इस कारण से ताकि पार्टी में नेतृत्व का कंट्रास्ट दिखाया जा सके। एक तरफ आडवाणी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार नहीं थे और उसको रोकने के तमाम प्रयास कर रहे थे। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही 49 वर्ष के अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने। अब 45 वर्ष के नितिन नवीन पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए हैं। भारतीय राजनीति में हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि मजबूत नेता किसी अन्य नेता को पनपने नहीं देता है। मजबूत नेता चाहता है कि  उसके बाद नेतृत्व शून्यता की स्थिति बने। इस संबंध में इंदिरा गांधी का उदाहरण दिया जाता रहा है कि जब भी कोई कांग्रेसी मजबूत होते दिखता था तो उसके पर कतर दिए जाते थे। ये बात उस तरह के मजबूत नेता पर लागू होती है जिसको अपनी जनप्रियता या साख पर भरोसा नहीं होता है। जिस भी नेता को अपनी काबिलियत पर, जनता के बीच अपनी साख पर भरोसा होगा वो अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयत्न करता है। नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में जीत का कीर्तिमान बनाया है। नोटबंदी से लेकर कोरोना काल में जिस प्रकार से जनता ने मोदी के निर्णयों का समर्थन किया उसको भी देखा जाना चाहिए। विरोधी दलों के नेताओं का और उनके समर्थक विश्लेषकों का आकलन था कि नोटबंदी के बाद के चुनाव में मोदी को पराजय का सामना करना पड़ेगा। ये भी कहा गया कि पूरी दुनिया में जिस भी नेता ने नोटबंदी लागू की उसको जनता ने अगले चुनाव में नकार दिया। मोदी के मामले में इसके उलट हुआ। मोदी और ताकतवर बनकर उभरे। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां भारतीय पार्टी को 282 सीटें मिली थीं वहीं नोटबंदी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 300 से अधिक सीटें जीकने में कामयाब रही। लोकतंत्र में जिसको जनता पसंद करती है वही सर्वमान्य नेता माना जाता है। 

एक बात और जो नितिन नवीन के चयन से स्पष्ट हुआ है वो ये कि भारतीय जनता पार्टी जात-पात की राजनीति का निषेध करने का प्रयास कर रही है। लंबे समय तक इस देश ने जाति आधारित राजनीति और उसपर ही आधारित चयन का दौर देखा है। किसी नेता को शीर्ष पद पर चुनने या मनोनयन के पहले उसकी जाति या उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि देखी जाती रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा भी कई राज्यों की राजनीतिक नियुक्तियों में जातिगत संतुलन का ध्यान रखा जाता रहा है। नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी से इसकी शुरुआत की है। नितिन नवीन कायस्थ जाति के हैं जिनके वोट उनके गृह प्रदेश में भी बहुत कम हैं। बावजूद इसके उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना देना, जातिगत राजनीति के निषेध की ओर बढ़ाए गए कदम की तरह देखा जा सकता है। सिर्फ नितिन नवीन ही क्यों बिहार में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को बनाया गया है। संजय सरावगी मारवाड़ी/वैश्य हैं और बिहार में मतदाता के लिहाज से मारवाड़ियों की संख्या बहुत नहीं है। बिहार में राजनीतिक नियुक्तियों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि अमुक व्यक्ति यादव हैं या राजपूत हैं या कुर्मी हैं तो इनको महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता है। ताकि उश समुदाय के वोटरों को आकर्षित किया जा सके। ये सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं बल्कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में देखा जाता रहा है। 

कहना ना होगा कि मोदी युग में जिस तरह की राजनीति हो रही है वो स्वाधीन भारत की पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर है। इस युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीति विज्ञान के पुराने औजार से काम नहीं चलनेवाला है। जो पुराने राजनीतिकक सिद्धांत थे उसके आधार पर आकलन बहुधा गलत परिणाम देने लगे हैं। मोदी युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीतिक विश्लेषकों को अब नए तरीके से सोचना होगा, नए आधार पर आकलन करना होगा। जिस तरह से नरेन्द्र मोदी अपने निर्णयों से चौंकाते रहे हैं और कई बार जोखिम भरे निर्णय भी लेते हैं, इससे ये प्रतीत होता है कि उनको अपने मतदाताओं पर भरोसा है और मतदाताओं को भी उनपर विश्वास है कि उनके निर्णय देश और जनहित में ही होंगे।      


नागिन का प्यार


नाग-नागिन की कहानियां हमारे समाज को गहरे तक आकर्षित करती है। गांवों में जब संपेरे टोकरी में सांप लेकर पहुंचते हैं और किसी सार्वजनिक स्थान पर बीन बजाकर सांप को उसकी धुन पर नचाते हैं तो देखनेवालों की भीड़ जमा हो जाती थी। नाग-नागिन की प्रेम कहानी और नागमणि को लेकर भी तरह तरह की कहानियां समाज जीवन में सुनी और कही जाती रही हैं। इच्छाधारी नागिन का नाग के प्रति समर्पण की कथा लोग चाव से सुनते हैं। इतिहासकार ए एल बैशम ने अपनी पुस्तक वंडर दैट वाज इंडिया में भी इंडिया इज अ कंट्री आफ स्नेक चार्मर्स (भारत संपेरों का देश है) लिखे। बैशम की इस पुस्तक को अब भी भारतीय अकादमिक जगत में खासी प्रतिष्ठा प्राप्त है। इतना ही नहीं एक तस्वीर इंटरनेट मीडिया पर चलती रहती है जिसमें जवाहरलाल नेहरू अपने विदेशी मेहमान, संभवत: जैकलीन कैनेडी को, संपेरे की कला दिखाते नजर आते हैं। इस पृष्ठभूमि का फिल्मकारों ने भी खूब फायदा उठाया। आज से 50 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई नागिन। 1976 में प्रदर्शित और राजकुमार कोहली निर्देशित इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया था। इतना ही नहीं तब से लेकर आजतक जिसने भी जिस फार्मेट में नाग-नागिन की कहानी को बेहतर ट्रीटमेंट के साथ दिखाया उसको दर्शकों ने पसंद किया। 

मल्टीस्टारर फिल्म नागिन के बाद अभिनेत्री रीना राय की गिनती हिंदी फिल्मों की शीर्ष अभिनेत्री में होने लगी। रीना राय के पहले निर्माता निर्देशक इस भूमिका के लिए सायरा बानो को लेना चाहते थे लेकिन नकारात्मक किरदार होने के कारण सायरा तैयार नहीं हुईं। इस फिल्म में इच्छाधारी नाग की भूमिका में जितेन्द्र हैं। उनके साथ सुनील दत्त, फिरोज खान, कबीर बेदी, योगिता बाली, रेखा जैसी कई कलाकारों से सज्जित इस फिल्म का आरंभ बेहद रोचक तरीके से होता है। मानवरूपी इच्छाधारी नाग जितेन्द्र पर गरुड़ आक्रमण करते हैं। ठीक उसी समय सुनील दत्त उसकी जान बचाता है। सुनील दत्त इचछधारी नाग-नागिन पर पुस्तक लिखने की चाहत की बात जितेन्द्र से करता है। वहां फिर वही कहानी दोहराई जाती है कि अमावस की रात को नागिन अपने नाग से मिलने आती है। नाग अपनी मणि को निकाल कर रख देता है। मणि की आभा में नागिन मस्त होकर नाचती है। इस बीच सुनील दत्त के एक दोस्त ने नाग को गोली मार दी। नाग मर जाता है। फिर एक कहानी। सभी दोस्त आपस में बात करते हैं कि जल्दी से मृत नाग को खोजकर जमीन में गाड़ देना चाहिए नहीं तो उसकी आंख में नागिन हत्यारों की तस्वीर देख लेगी। पर ऐसा हो नहीं पाता है और मृत नाग की आंखों में नागिन को हत्यारे और उसके दोस्तों की तस्वीर नजर आती है। नागिन रूपी रीना राय हत्यारों को चुन चुन कर मारना आरंभ कर देती है। रीना राय की बड़ी बड़ी आंखें और आंखों का रंग दर्शकों को मोहित करता है। रीना राय जब एक एक करके किरदारों की हत्या करती है तो दर्शकों को थ्रिलर का आनंद मिलता है। एक दिन सुनील दत्त को इच्छधारी नागिन का राज पता चल जाता है। प्रेमनाथ के रूप में एक साधु की एंट्री होती है जो कहता है कि इंसान बदला लेना भूल सकता है पर नागिन नहीं। ये संवाद भी काफी लोकप्रिय हुआ था। निर्देशक ने पूरी कहानी को इस तरह से बुना कि समाज में व्याप्त नाग-नागिन को दर्शक जब पर्दे पर देखता है तो वो कहानी के बहाव में बहता चला जाता है। प्रेमनाथ ने साधु के रूप में बेहद शानदार अभिनय किया और नागिन को वश में करने के उसके प्रयासों को देखते हुए दर्शकों को नागिन से सहानुभूति होती है। बहुत कम फिल्मों में ऐसा होता है कि नकारात्मक भूमिका के साथ दर्शकों की सहानुभूति होती है। 

फिल्म में रोचक मोड़ तब आता है जब सुनील दत्त अपना ताबीज साधु को वापस करता है और कहता है कि उसने नागिन को मार दिया है। इस संवाद के बाद जब साधु पूजा कर रहा होता है तो अचानक रीना राय वहां दिखती है। आश्चर्यचकित होकर प्रेमनाथ कहते हैं कि तुम मरकर कैसे जिंदा हो गई। रीना राय का साधु को दिया गया उत्तर भई उस समय खूब चर्चित हुआ था, नागिन के इंतकाम की ज्वाला को कोई ताबीज शांत नहीं कर सकता। संवाद के अलावा इस फिल्म के गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत में लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर का गाया गीत तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना लोगों की जुबां पर चढ़ गया था। कहना ना होगा कि जिस प्रकार का ट्रेंड इस फिल्म ने सेट किया था उसपर आगे चलकर श्रीदेवी और ऋषि कपूर अभिनीत फिल्म नगीना बनी। श्रीदेवी ने अपनी आंखों के मूवमेंट से नागिन के किरदार को जीवंत कर दिया था। फिल्में को कई बनीं। इतना ही नहीं एकता कपूर ने नागिन नाम से ही एक सीरियल बनाया जिसके सात सीजन आ गए हैं। नागिन टीवी सीरियल ने अपने जानर में सफलता के नए कीर्तिमान गढ़े। और तो और नागराज के नाम एक कामिक्स भी बाजार में आया था जिसको भी खूब पसंद किया गया था।   


Saturday, January 17, 2026

जुमलों के बीच दबी प्रश्न की सार्थकता


प्रतिवर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में जयपुर में एक आयोजन होता है, जनवरी आफ जयपुर। इस आयोजन में राजस्थान की संस्कृति का उत्सव मनाया जाता है। राजस्थान से जुड़े कलाकार एक सत्र में प्रस्तुति देते हैं। दूसरे सत्र में या तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करता है या फिर किसी ख्यात व्यक्ति से बातचीत होती है। जनवरी आफ जयपुर में आमंत्रित अतिथि राजस्थानी व्यंजन का भी आनंद उठाते हैं। जनवरी आफ जयपुर का आयोजन संस्कृतिकर्मी संदीप भूतोड़िया-मंजरी भूतोड़िया और सौरभ कक्कड़-विनी कक्कड़ करते हैं। इस वर्ष 11 जनवरी को जय महल पैलेस में जनवरी आफ जयपुर का आयोजन हुआ। सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित लोकगायक अली और मोहम्मद गनी ने अपने गीतों से समां बांधा। इसके बाद प्रख्यात पटकथा लेखक-गीतकार जावेद अख्तर से बातचीत का सत्र हुआ। जावेद अख्तर से बातचीत नृत्यांगना शिंजिनी कुलकर्णी ने की। संवाद के बाद प्रश्नोत्तर का सत्र था। प्रश्न करने के लिए तीन चार हाथ उठे जिसको जावेद साहब देख नहीं पाए। उन्होंने टिप्पणी कर दी कि पहले प्रश्न पूछने में लोग हिचकते हैं। एक-दो प्रश्नों के बाद सिलसिला चल निकलता है। मैंने  पहले प्रश्न के लिए हाथ खड़ा किया था। जावेद अख्तर हमको देख नहीं पा रहे थे तो उन्होंने पूछा कि आप किधर हैं। मैंने खड़े होकर कहा कि मैं आपके राइट में हूं तो तपाक से टिप्पणी की आप तो जानते ही हैं कि राइट वालों से मेरा जरा कम ही....। मैंने जावेद अख्तर से जानना चाहा था कि, क्या फिल्म लेखक के लेखन पर उसके संस्कार, उसके पारिवारिक परिवेश और उसके धार्मिक या मजहबी मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है। जावेद अख्तर ने इस प्रश्न को और खोलने को कहा। 

फिल्म शोले और दीवार का उदाहरण देकर प्रश्न के धागे खोले गए। फिल्म शोले के एक दृष्य में हेमा मालिनी भगवान शंकर से अरनी मन की बात करती है तो धर्मेन्द्र प्रतिमा के पीछे से भोंपू से आवाज बदलकर उत्तर देता है। अमिताभ बच्चन की एंट्री होती है और वो हेमा मालिनी को प्रतिमा के पीछे ले जाकर धर्मेन्द्र की असलियत दिखाता है। फिल्म दीवार में नायक जब मंदिर में जाता है तो भगवान से कहता है कि आज खुश तो तुम बहुत होगे। अन्य दृष्य में अमिताभ बच्चन पुलिस से बचकर भागते हैं और शशि कपूर उसका पीछा करते हैं। एक जगह वो ग्रिल से टकरा कर गिरते हैं और 786 का बिल्ला छिटक जाता है। अमिताभ बिल्ला उठाने का प्रयास करते हैं। पुलिस पीछा कर रही होती है लिहाजा वो बिल्ला थोड़कर भागते हैं। शशि कपूर चेतावनी के बाद गोली चला देता है जो अमिताभ की बांह पर लगता है। इसमें लेखक की धार्मिकता का प्रभाव दिखता है या नहीं। इतना सुनते ही जावेद साहब लगभग भड़क से गए और अपनी पुरानी दलीलें देने लगे कि आप क्या मुल्क को सीरिया जैसा बनाना चाहते हैं। आप भी क्या उनकी तरह होना चाहते हैं। उनकी बातों को सुनकर तालियां बजती थीं। मैंने सहजता से कहा कि आपके जुमलों पर तालियां बज सकती हैं लेकिन प्रश्न अनुत्तरित है। उनको लगा कि मैं उनकी लोकप्रियता पर टिप्पणी कर रहा हूं जबकि मैं तो बगैर लाउड हुए अपने प्रश्न का उत्तर चाहता था। जावेद साहब लंबी तकरीर करने लगे और दुनिया का तमाम कट्टरपंथी और मजहबी मुल्कों का उदाहरण देने लगे। प्रश्न के उत्तर पर अंत तक नहीं आए। जब मैंने उनको फिर से प्रश्न पर लाने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे क्रास क्वेश्चनिंग ना करने की नसीहत देकर अपनी बात जारी रखी। गाजा पर बच्चों पर बम बरसाने की बात तक चले गए। अंत में कहा कि अगर आज उनको वो दृष्य लिखने होते तो नहीं लिखते। बदतमीजी न हो जाए इस कारण मैंने प्रश्न के उत्तर जानने की अपेक्षा नहीं की और बैठ गया। प्रश्नोत्तर के पूरे सत्र में जावेद साहब मेरे प्रश्न से परेशान से दिखे। मेरी मंशा उनको परेशान करने की नहीं बल्कि एक वरिष्ठ लेखक से ये जानने की थी कि लेखक का लेखन किन बातों से प्रभावित होता है। सत्र की समाप्ति के बाद एक महिला मेरे पास आईं और बोलीं कि जावेद साहब को गाजा के बच्चों पर बमबारी की याद रही लेकिन पहलगाम में धर्म पूछकर हत्या करने की वारदात उनके जेहन में नहीं थी। 

जावेद अख्तर ने प्रश्न का उत्तर टाल तो दिया लेकिन यह प्रश्न तो हिंदी सिनेमा के सामने अब भी है। क्या कारण रहा कि जब हिंदी फिल्में आरंभ हुई तो दादा साहब फाल्के से लेकर उनके बाद के कई वर्षों तक भारतीय संस्कृति के अनुसार नायक होते रहे। हिंदू देवी देवताओं और धार्मिक प्रतीक चिन्हों का उपहास नहीं उड़ाया गया। बाद में जब सलीम जावेद की जोड़ी आई तो भगवान और हिंदू धर्म के प्रतीक चिन्हों का उपहास आरंभ हुआ। उनके बाद के लेखकों ने भी ऐसा किया। तिलकधारी पुजारी को खलनायक के तौर पर चित्रित किया जाने लगा। शोले में तो अजान की आवाज सुनकर अपने बेटे की मृत्यु का गम छोड़कर पात्र उस ओर उन्मुख हो जाता है। हिंदू नायक भी मंदिरों में जाकर भगवान के सामने अपने मन की भड़ास निकालने लगा। नास्तिक टाइप के नायक गढ़े गए, जो मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने में हिचकते दिखे। फिल्म मि. नटवरलाल में भी नायक भगवान कृष्ण की तस्वीर सामने जिस तरह से संवाद बोलते हैं उसको भी ध्यान में रखा जाना चहिए। इसको अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता के तौर पर रेखांकित किया जाता रहा। प्रश्न यही है कि अभिव्यक्ति की वो कथित स्वतंत्रता सिर्फ हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू धर्म से जुड़े लोगों को लेकर ही क्यों दिखती है। किसी और मजहब को लेकर उस तरह से किसी संवाद लेखक ने मजाक किया हो याद नहीं पड़ता। मेरी जिज्ञासा बस इतनी सी थी और जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठतम फिल्म लेखक से अपेक्षा भी थी कि वो बेलौस अंदाज में अपनी बात रखते। पर ऐसा हो न सका। 

समय का पहिया घूमता रहा और भगवान का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई। हद तो ये हुई कि उस समय से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने भी इस तरह की प्रवृत्ति पर किसी तरह का रोक लगाने की कोशिश नहीं की। फिल्मों के बाद जब ओटीटी का युग आरंभ हुआ तो उसमें भी यही प्रवृत्ति दिखाई देने लगी। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में तो मंदिरों के अंदर चुंबन दृष्य तक दिखाए जाने लगे। तर्क खजुराहो की मूर्तियों में भी इस तरह नायक नायिका को दिखाया गया है। धार्मिक ग्रंथों से कहानियां उद्धृत कर इस प्रवृत्ति का बचाव किया गया। तर्क गढे गए कि हिंदू धर्म और उसके अनुयायी बहुत उदार हैं इस कारण वो अपने अराध्य को लेकर किसी तरह की उपहासजनक टिप्पणी से आहत नहीं होते हैं। देश में बौद्धिक जगत में ऐसी विचारधारा का दबदबा था जिसमें कहा जाता था कि धर्म तो अफीम है। हिंदू धर्म पर उपहासजनक टिप्पणी या संवाद करनेवालों को प्रगतिशील कहा जाने लगा। धर्म और आस्तिकता की बात करने और उसके चिन्हों का सार्वजनिक उपयोग करनेवालों को दकियानूसी कहा गया। प्रश्न वही कि ऐसा जानबूझकर किया गया या लेखक के सामाजिक और मजहबी परिवेश ने उससे ऐसा करवाया। 


वो कमाल भी क्या खूब था


 कमाल अमरोही का नाम लेते ही  फिल्म महल, पाकीजा. दायरा और रजिया सुल्तान का नाम याद आता है। कमाल अमरोही ने बहुत कम फिल्में निर्देशित कीं लेकिन सबमें उन्होंने अपनी कला की अमिट छाप छोड़ी। वैसे तो वो 1938 से ही फिल्म जगत में कहानीकार और संवाद लेखक के रूप में उपस्थित थे। लेकिन उनको निर्देशक के रूप में पहचान मिली बांबे टाकीज की फिल्म महल से। स्वाधीनता के ठीक पहले देविका रानी ने 1946 में रशियन पेंटर से विवाह कर लिया और बांबे टाकीज में उनकी रुचि कम हो गई। उन्होंने अभिनेता अशोक कुमार और सावक वाचा को 28 लाख रुपए में बांबे टाकीज बेच दिया। अशोक कुमार ने दब बांबे टाकीज संभाला तो उस समय स्वाधीनता आंदोलन चरम पर पहुंच चुका था। पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव की स्थिति थी। बांबे टाकीज में काम करनेवाले हिंदू और मुस्लिम कर्मचारियों के बीच तनाव महसूस किया जा रहा था। उस दौर में अशोक कुमार और सावक वाचा ने बांबे टाकीज से कई हिंदू कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाकर मुस्लिम कर्मचारियों को काम पर रख लिया था। वहां तनाव बढ़ रहा था। उनके लिए काम करने वाले लेखक सअदात हसन मंटो ने अशोक कुमार को चेताया था कि वो ऐसा ना करें क्योंकि इससे हिंदी बहुत नाराज हो जाएंगे। अशोक कुमार कहा करते थे कि वो ना तो हिंदू हैं और ना ही मुसलमान बल्कि वो तो कलाकार हैं। कला ही उनका धर्म है। इस सोच के अंतर्गत ही अशोक कुमार ने बांबे टाकीज की अपनी पहली फिल्म महल को निर्देशित करने के लिए एक मुस्लिम निर्देशक कमाल अमरोही को साइन किया था। नोआखाली में हिंदुओं के नरसंहार के बाद देशभर में हिंदू मुसलमान के बीच की दरार गहरी हो गई थी। ऐसे माहौल में अशोक कुमार ने क मुस्लिम निर्देशक को फिल्म सौंपने का निर्णय लिया था जिसकी बहुत आलोचना हुई थी लेकिन अशोक कुमार अपने निर्णय पर अडिग रहे। कमाल अमरोही ने ही फिल्म महल निर्देशित की जो 1949 में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने इतिहास रच दिया था। इसके बाद 1953 में कमाल अमरोही ने दायरा फिल्म निर्देशित की। ये फिल्म फ्लाप रही थी और कमाल अमरोही एक बेहचर कहानी और फिल्म की तलाश में थे। उनको पाकीजा की कहानी में ये संभावना दिखी और उसको निर्देशित करने का कार्य आरंभ किया। 

फिल्म पाकीजा ने कमाल अमरोही को हिंदी फिल्मों के शीर्ष निर्देशकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। मीना कुमारी इस फिल्म की नायिका थीं जो कमाल अमरोही की पत्नी थीं। पाकीजा की शूटिंग के दौरान दोनों के संबंध बहुत खराब हो चुके थे। मीना कुमारी का दिल बरी तरह से टूट चुका था और वो मरणासन्न हो गई थीं। फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी थी कि नायिका प्यार खोजती है लेकिन ना तो उसको प्यार मिलता है ना ही सुकून। फिल्म पाकीजा में बुरी तरह टूटे हुए दिल वाली नायिका में दर्शकों को मीना कुमारी की रीयल लाइफ कहानी नजर आई थी। पाकीजा फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी इतनी बीमार थीं कि मुजरा करने की स्थिति में नहीं थी। ऐसे में कमाल अमरोही ने तय किया कि मीना कुमारी के डांस सीक्वेंस को पद्मा खान से करवाया जाए। पद्मा खान की कद काठी मीना कुमारी जैसी थी और उनको बुर्का पहनाकर क्लाइमैक्स का डांस शूट करवाया गया था। कैमरे और उसके उपयोग की कमाल अमरोही को कमाल की समझ और जानकारी थी। इस फिल्म को 35 एमएम कैमरे पर शूट किया गया था। कमाल अमरोही ने रील देखकर बता दिया था कि शूट किए गए कुछ सीन आउट आफ फोकस हैं। विदेश में दो बार जांच हुई तब जाकर ये बात पकड़ में आ सकी कि कुछ फ्रेम में शूट आउट आफ फोकस है। पाकीजा को पहले 1971 में रिलीज होना था लेकिन भारत पाकिस्तान युद्ध के कारण रिलीज टली। 1972 में ये फिल्म रिलीज हुई। 1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में भारत की विजय हुई तो शिमला समझौते के लिए भुट्टो शिमला आए थे। वहां भुट्टो और उनकी टीम ने पाकीजा देखने की इच्छा जताई । कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इंदिरा गांधी ने पराजित पाकिस्तान के नेताओं के लिए पाकीजा की स्क्रीनिंग की व्यवस्था करवाई थी। कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म रजिया सुल्तान थी। कमाल अमरोही ने कम फिल्में की लेकिन महल और पाकीजा में उनके निर्देशन ने उनकी प्रतिभा का रंग दर्शकों को दिखाया। 


Saturday, January 10, 2026

अकादमियों की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन


बीते वर्ष जनवरी में दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों के लिए पिछले तीन साल के पुरस्कारों की एक साथ घोषणा की थी। दिल्ली के तत्कालीन मंत्री सौरभ भारद्वाज ने उस समय बड़ी-बड़ी बातें की थीं, कहा था कि पुरस्कारों की घोषणा से हिंदी अकादमी ने साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर दोबारा स्थापित किया है। जो पुरस्कार किन्हीं कारणों से पिछले छह साल से नहीं दिए गए थे, उन्हें अकादमी ने फिर से शुरू किया है।सौरभ भारद्वाज ने किस मील के पत्थर की बात की थी पता नहीं। हिंदी अकादमी के पुरस्कार की घोषणा अगर मील का पत्थर थी तो उस मील के पत्थर को ढंका भी तो उनकी यानि आम आदमी पार्टी की सरकार ने ही था। 2018-19 के बाद से पुरस्कारों की घोषणा और उसका वितरण भी तो सौरभ भारद्वाज की पार्टी की सरकार ने ही रोका था। सौरभ भारद्वाज को क्या पता था कि वो जिसे वो मील का पत्थर बता रहे हैं वो भी घोषणा मात्र होकर रह जाएगी। हिंदी अकादमी ने पुरस्कारों की घोषणा तो की लेकिन पुरस्कार अर्पण समारोह नहीं हो सका। दिल्ली में विधानसभा चुनाव घोषित हो गए। विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी हार गई। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। सत्ता बदली तो हिंदी अकादमी में भी बदलाव देखने को मिला। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा वहां से हटे। सुरेन्द्र शर्मा ने भी पुरस्कारों की घोषणा के समय मंत्री के साथ बैठकर दावा किया था कि पिछले तीन साल के पुरस्कारों की घोषणा से देशभर में हिंदी का मान बढ़ेगा। घोषणा करके पुरस्कार नहीं दे पाने से हिंदी अकादमी का मान बढ़ा या उसकी साख प्रश्नांकित हुई ये तो सुरेन्द्र शर्मा ही बता सकते हैं। 

पिछले वर्ष फरवरी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो रेखा गुप्ता मुख्यमंत्री बनीं और कपिल मिश्रा को भाषा और संस्कृति विभाग मिला। इस विभाग के अंतर्गत ही हिंदी और अन्य भाषाई अकादमियां आती हैं। नई सरकार बने लगभग 11 महीने होने को आए लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा घोषित पुरस्कार अभी तक नहीं बंट सके। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले आम आदमी पार्टी की सरकार ने जिनका चयन पुरस्कार के लिए किया था उनमें भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधियों का भी नाम था। अगर पुरस्कार सूची से नई सरकार या नए मंत्री को कोई आपत्ति है तो उसको रद कर देना चाहिए। उन वर्षों के पुरस्कार की घोषित सूची को रद करने से अनिश्चितता की स्थिति दूर होगी। पूर्व में भी कई-कई वर्ष तक पुरस्कार नहीं दिए गए इस कारण किसी विवाद की आशंका भी नहीं है। अधिक से अधिक क्या होगा, अशोक वाजपेयी कहीं लिख-बोल देंगे क्योंकि उनका नाम श्लाका सम्मान के लिए घोषित हुआ था। जब से अशोक वाजपेयी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए हैं तब से उनके कहे या लिखे का उतना असर नहीं रहा क्योंकि उनकी निष्पक्षता संदिग्ध हो गई। ये तो हुई पुरस्कार की बात लेकिन अगर हिंदी अकादमी और अन्य भाषाई अकादमियों के काम-काज पर नजर डालें तो स्थिति बदलतर नजर आती है।

हिंदी अकादमी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी स्थापना का उद्देश्य हिंदी भाषा साहित्य और संस्कृति से संबंधित कार्यक्रमों को कार्यरूप में लाना है। इसके अन्तर्गत दिल्ली के प्राचीन तथा समकालीन उत्कृष्ट साहित्य का संकलन, परिरक्षण तथा उसके सृजन के लिए प्रोत्साहन का कार्य सम्मिलित है। जिससे कि दिल्ली के साहित्यकारों को उत्कृष्ट साहित्य के सृजन के लिए प्रोत्साहन मिले, पुराना और दुर्लभ साहित्य सुरक्षित किया जा सके और नये साहित्यकारों के लिए योजनाओं और नयी दिशाओं की खोज की जा सके। जब वेबसाइट पर ही इन उद्देश्यों की पूर्ति के उपक्रम खोजने लगा तो वहां दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली की मुख्यमंत्री का चित्र- परिचय दिखा। जब हमने नया क्या है सेक्शन में क्लिक किया तो बहुत ही दिलचस्प जानकारियां मिली। पहली जानकारी दो दिवसीय बाल नाट्य उत्सव कलरव -2 के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित करने की थी। इसके लिए अंतिम तिथि 25 अक्तूबर 25 थी। यानि उसके बाद नया कुछ हुआ नहीं। उसके पहले समाचार पत्रों की रद्दी बेचने और सचिव के प्रभार देने की जानकारी है। सबसे दिलचस्प है पथ-प्रदर्शन का खंड। इसमें संचालन समिति पर क्लिक करने पर कोई जानकारी नहीं मिलती है। प्रतीत होता है कि नई सरकार गठन के बाद हिंदी अकादमी की संचालन समिति नहीं बन पाई है। संचालन समिति नहीं बन पाई तो संचालन कैसे हो। इसी खंड में दायित्वों की सूची है जिसमें सचिव, सहायक सचिव और मुख्य लेखाधिकारी की जानकारी है। सिर्फ तीन की। हिंदी अकादमी का सरकारी उपयोग शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते ही आरंभ हो गया था। अरविंद केजरीवास की सरकार के समय तो ये पूरी तरह से सरकार की प्रचार एजेंसी में तब्दील हो गई। आरंभिक दिनों में केजरीवाल की पार्टी से जुड़े मंचीय कवि इसको चलाते थे। उसी दौर में कपिल मिश्रा उसके बाद मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज ने इसको संभाला। हो सकता है कि अन्य मंत्रियों के पास भी हिंदी अकादमी का दायित्व रहा हो। शीला दीक्षित के समय जब नानकचंद इसके सचिव थे तो उस दौरान हिंदी अकादमी ने काफी कार्य किया था। उसके बाद से निरंतर इस संस्था की साख और कार्य छीजते चले गए। अब न तो इस संस्था का उपाध्यक्ष है और ना ही संचालन समिति। भगवान भरोसे है इनका कार्य। 

सिर्फ हिंदी अकादमी ही क्यों अगर मैथिली-भोजपुरी अकादमी को देखें तो उसकी हालत और भी दयनीय है। पूर्वांचलियों को प्रसन्न करने के लिए 2008 में इस अकादमी की स्थापना की गई थी। विधानसभा चुनाव के आसपास सभी दलों को पूर्वांचलियों की याद आती है लेकिन उसके बाद भूल जाते हैं। मैथिली और भोजपुरी अकादमी का उद्देश्य मैथिली और भोजपुरी भाषाओं और साहित्य संस्कृति का उन्नयन और पल्लवन। जब इस संस्था का ही उन्नयन नहीं हो पाया तो भाषा, साहित्य और संस्कृति का उन्नयन कैसे हो पाता। ये अकादमी भी संचालन समिति और पूर्णकालिक कर्मचारियों की कमी से मरणासन्न है। दिल्ली के भाषा और संस्कृति विभाग और उसके मंत्री कपिल मिश्रा को प्राथमिकता के आधार पर इन अकादमियों पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी तो कला और संस्कृति के काम करने की प्रतिबद्धता निरंतर दोहराती रहती है बावजूद इसके दिल्ली की इन अकादमियों की स्थिति कुछ और ही कहानी कह रही है। दिल्ली सरकार के सामने अपनी पूर्ववर्ती सरकार की इन अकादमियों के प्रति बरती गई उदासीनता को दूर करने की चुनौती है। इस उदासीनता के कारण ही इन अकादमियों की दुर्दशा हुई। अकादमियों को मूल स्वरूप में लाने का काम करना होगा। साहित्य और संस्कृति की बदलती प्रवृत्तियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चुनौती है। सरकार की प्रचार मशीनरी के तौर पर काम करनेवाली इन अकादमियों को इससे मुक्त करके भाषा और संस्कृति के लिए गंभीर कार्य करने पर ध्यान देना होगा। यह सही है कि साहित्य कला के उन्नयन आदि के कार्यों से वोट नहीं मिलते लेकिन कई बार यही सेगमेंट वोटर की मानसिकता तय कर देते हैं।  

Saturday, January 3, 2026

ताजा हवा के झोंके की तरह अपराध कथा


ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स पर चलने वाली वेबसीरीज की बात आते ही पहली प्रतिक्रिया होती है गालियों की भरमार होगी। जबरदस्ती ठूंसी गई यौनिकता या न्यूडिटी होगी। जबरदस्त हिंसा होगी। शरीऱ के अंगों को काटा जा रहा होगा और तड़पते हुए कटे अंग होंगे। प्रश्न आता है कि कोई अच्छी और साफ-सुथरी वेबसीरीज बताइए। उत्तर मिलता है पंचायत और गुल्लक। अच्छी कहानी, साफ सुथरी प्रस्तुति, कम गाली-गलौच और न्यूमतम हिंसा जिस वेबसीरीज में हो उसकी संख्या कम है। हमारे देश में विशेषकर हिंदी में बनने वाली वेब सीरीज एक ऐसी राह पर चली गई जिसमें निर्माता और निर्देशकों को लगता है कि बगैर गालियों के, बिना यौनिकता और हिंसक दृष्यों के वेबसीरीज लोगों को पसंद नहीं आएंगी। लिहाजा सफलता के लिए ये तीन अवयव जबरदस्ती कहानी में ठूंसे जाते हैं। अपराध कथा हो तो ये तो आवश्यक ही होते हैं। भले ही ये कहानी का सत्यानाश क्यों न कर हो जाए। पता नहीं निर्देशकों को क्या लगता है और वो भारतीय दर्शकों की मानिकता को किस तरह से विश्लेषित करते हैं। इनको पता नहीं ये बात कब समझ में आएगी कि दर्शकों को कहानी चाहिए। बेहतर कहानी और बेहतर ट्रीटमेंट ही किसी सीरीज को दर्शकों को पसंद बना सकती है। एक जमाने में इसी तरह से हिंदी फिल्मों में अश्लीलता दिखाने के लिए तर्क गढ़े जाते थे। नायिकाओं को बिकिनी या अर्धनग्न दिखाने के लिए उसको कहानी का हिस्सा बनाया जाता था। कई ऐसी फिल्में दर्शकों ने पसंद भी की थीं लेकिन ये ट्रेंड लंबे समय तक नहीं चल सका और दर्शक जबरदस्ती ठूंसी गई नग्नता से ऊब गए। फिर हिंदी फिल्मों ने अपनी राह बदली।

आज वेबसीरीज के निर्माताओं को इसपर विचार करने की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए। वेबसीरीज पर चूंकि किसी प्रकार के सेंसर या प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण वहां अराजकता जारी है। इस स्तंभ में अनेकों बार इस ओर ध्यान दिलाया गया है। स्वनियंत्रण और स्वनियमन की आड़ में प्रमाणन को रोका गया है। सरकार इस कारण से इस दिशा में गति से नहीं बढ़ रही है क्योंकि अगर प्रसारण पूर्व प्रमाणन का निर्णय होता है तो एक अलग संस्था बनानी होगी। अलग संस्था नहीं बनाई जाती है और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को ये दायित्व दे दिया जाता है तब भी बहुत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी। मानव संसाधन की आवश्यकता तो होगी ही। इसलिए सरकार जल्द निणय लेने के मूड में नहीं दिखाई देती है। सरकार ने एक व्यवस्था बनाई है और जब किसी वेबसीरीज को लेकर अधिक विवाद होता है या अधिक आलोचना आदि होती है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने स्तर से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हस्तक्षेप करके ममले को सुलझा देता है। आज चर्चा वेबसीरीज के प्रमाणन पर नहीं बल्कि एक ऐसी वेबसीरीज की करनी है जो बहुत ही साफ-सुथरी, न्यूनतम गाली गलौच के साथ और बगैर किसी अश्लीलता और जुगुप्साजनक हिंसा के बनाई गई है। ये वेबसीरीज अपराध कथा है, उसमें मर्डर है, ग्लैमर और लड़कियां हैं, प्रेम-प्रसंग हैं, अश्लीलता दिखाने का अवसर भी है, लेकिन अश्लीलता या नग्नता कम से कम है। इस वेबसीरीज को परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर देख सकते हैं। रोचकता अपने चरम पर है और दर्शकों के दिमाग में इसको देखते हुए बस यही चलता रहता है कि आगे क्या?  यही तो निर्माता निर्देशक की सफलता है।

बात हो रही है एक वेबसीरीज मिसेज देशपांडे की। छह एपिसोड की ये सीरीज एक सीरीयल किलर को पकड़ने की कथा है। कहा गया है कि ये किसी फ्रेंच कहानी पर आधारित सीरीज है लेकिन इसके निर्देशक और लेखक नागेश कुकनूर ने जिस प्रकार से कहानी को भारतीय पुट दिया है वो प्रशंसनीय है। अपने जमाने की सुपरस्टार रही माधुरी दीक्षित लीड रोल में हैं। उन्होंने अपने अभिनय कला से दर्शकों को बांधे रखा है। अधिक मेकअप के बिना और चेहरे पर बढ़ती उम्र के निशान के बावजूद माधुरी दीक्षित ने जिस तरह से मिसेज देशपांडे के पात्र को पर्दे पर जीवंत किया है वो उल्लेखनीय है। माधुरी दीक्षित अपनी परिस्थियों के कारण सीरीयल किलर बन जाती है। पकड़ ली जाती हैं और मिसेज देशपांडे को जेल में जीनत का नाम मिलता है। वो इस पहचान के साथ जेल में सूर्य नमस्कार करती है और साथी कैदियों को भोजन बनाकर खिलाती हैं। सीरियल किलर होने के बावजूद अन्य कैदी, जो संभवत: उसके अपराध से परिचत नहीं है, माधुरी का सम्मान करती हैं। ये सीरीयल किलिंग पुणे में हुई थी। मिसेज देशपांडे के केस की फाइल किसी एक लड़की के हाथ लग जाती है। यहां भी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ है वो लड़की पहले लड़का होती है लेकिन अपनी मानसिक स्थिति के कारण वो चिकित्साकीय रास्ते से लड़की बनती है। ये लड़की पुणे की सीरियल किलर मिसेलज देशपांड की कापी कैट किलर बनती है। उसके ही अंदाज में अपने शिकार का नायलान की रस्सी से गला घोंटकर हत्या करती है और उसका आंख खोल देती है।

जब कापीकैट किलर ने मुंबई में कत्ल करना आरंभ किया तो पुलिस कमिश्नर ने मिसेज देशपांडे यानी जीनत की मदद लेना तय किया। कहानी में इतने चक्करदार घुमाव हैं कि मिसेज देशपांडे इस केस की जांच करनेवाले पुलिस आफिसर की मां होती है और कापीकैट किलर जांच अधिकारी की पत्नी की दोस्त। कहानी इतने दिलचस्प मोड़ लेती है कि दर्शक उससे बंधे रहने पर मजबूर होता है। जब दर्शक को लगता है कि पुलिस किलर के पास पहुंच गई है तो कहानी में एक नया मोड़ आता है और किलर की नए सिरे से तलाश आरंभ हो जाती है। कोई नया क्लू मिलता है। जिसपर किलर होने का शक होता है या जिसको किलर की तरह पेश किया जाता है वो तो किसी और ही मानसिक स्थिति में होता है। दर्शक जब उसकी सचाई जानता है तो उसके प्रति संवेदना से भर उठता है। प्रश्न उठता है कि किलर कौन ? निर्देशक ने कहानी को किसी तरह से लाउड नहीं होने दिया है। ना ही किसी प्रकार का छद्म वातावरण तैयार करके अपराध कथा को तिलस्मी स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया। बगैर लाउड हुए कहानी का ट्रीटमेंट बेहतरीन है। बस कहानी में एक ही चीज खटकती है। अंत में भेद खुलता है कि मिसेज देशपांड को उसके पिता ने ही सेक्सुअली अबयूज किया था। वो अपने पिता की हत्या के लिए पहुंचती है। वो छत से कूदकर अपनी जान दे देते हैं। पश्चिम में इस तरह की कहानी होती होगी लेकिन भारतीय दर्शकों के लिए ये एक झटके की तरह है। इस तरह की वेबसीरीज से एक उम्मीद जगती है कि ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री में परिपक्वता आनी आरंभ हो गई है। दूसरे निर्माता भी इसको देखकर प्रेरित होंगे और कहानी का इस तरह का ट्रीटमेंट करेंगे। मिसेज देशपांड को एक शुभ संकेत की तरह लिया जाना चाहिए। इसकी सफलता ने ये संकेत भी दिया है कि साफ सुथरी वेबसीरीज दर्शकों को भाती है। मिसेलज देशपांडे उन निर्देशकों के लिए मिसाल है जो सेक्स और हिंसा दिखाकर सफल होना चाहते हैं।