हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने बौद्धिक प्रकोष्ठ बनाए थे। उनका नाम लेखक संगठन रखा था। इन लेखक संगठनों को स्वायत्त होने का वातावरण बनाया गया था। जबकि ये परोक्ष तौर पर राजनतिक दल से जुड़े थे। लंबे समय तक यही होता रहा और इन लेखक संगठनों से जुड़े लोग राजनीतिक बयानबाजी करते रहे। राजनीतिक मुद्दों को अपनी रचनाओं में उठाते रहे। इसका लाभ उनके पितृ संगठन यानि कम्युनिस्ट पार्टियों को मिलता रहा। कालांतर में ये लेखक संगठन एक्सपोज होते चले गए। लेखक संगठन लेखकों के कल्याण के लिए कुछ नहीं करके अपने राजनीतिक आकाओं की लक्ष्य प्राप्ति का वातावरण बनाने में लगे रहे। जैसे-जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन होता गया लेखक संगठन भी बंटते चले गए। प्रगतिशील के बाद जनवादी और उसके बाद जन संस्कृति नाम से संगठन बने। जनवादी लेखक संगठन और जन संस्कृति मंच तो अधिकतर वार्षिक आयोजनों तक सिमट कर रह गए हैं। नियमित रूप से फेसबुक आदि पर उनके पदाधिकारी कुछ लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते रहे हैं। फासीवाद और अधिनायकवाद जैसे नारे वर्षों से कागजों में लगते रहे हैं। यही बात अलग अलग तरीके से कम्युनिट पार्टियां भी करती रही हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की बिहार ईकाई सक्रिय थी लेकिन अब वहां भी संगठन बंटा नजर आ रहा है। दो अलग अलग गुटों के अपने अपने पदाधिकारी हैं। ये तो इन लेखक संगठनों की स्थिति है, लेकिन अभी एक बहुत ही मजेदार स्थिति पैदा हुई है। कुछ समय पूर्व प्रगतिशील लेखक संगठन ने पूर्व पुलिस अधिकारी और कुलपति विभूति नारायण राय को अपना कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था।
राय के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद भी संगठन के क्रियाकलापों में तेजी आई हो ऐसा दिखा नहीं। एकाध आयोजन आदि हुए लेकिन लेखकों के व्यापक हित में संगठन ने कुछ कार्य किया हो, ज्ञात नहीं हो सका। विनोद कुमार शुक्ल और एक दो अन्य लेखकों ने प्रकाशकों को एकतरफा पत्र भेजकर पुस्तक प्रकाशन का अधिकार वापस लेने की बात की। लेखक संगठनों ने कभी भी इन मसलों में हस्तक्षेप नहीं किया। न तो प्रकाशकों के हित में और ना ही लेखकों के हित में। इन लेखक संगठनों को ये भी समझ नहीं आ सकी कि कोई लेखक एकतरफा करार को कैसे रद कर सकता है। उसी तरह प्रकाशकों के साथ बैठकर लेखकों को मिलनेवाली रायल्टी पर भी कुछ ठोस नहीं कर सके। इनकी सारी ऊर्जा अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने में लगी रही। इन लेखक संगठनों ने लेखकीय अस्पृश्यता को भी जमकर बढ़ावा दिया। अपने से अलग विचारधारा वाले लेखकों के साथ संवाद नहीं करना इनकी प्राथमिकता में रहा। इस तरह लेखकों को बांटने का काम भी इन संगठनों ने किया। कभी भी इन लेखक संगठनों ने अलग अलग विचार वाले लेखकों को साथ बैठाकर साहित्यिक प्रवृत्तियों पर चर्चा करने का मंच उपलब्ध नहीं करवाया। परिणाम ये रहा कि इन लेखक संगठनों का दायरा सिकुड़ता चला गया। भारतीय समाज हमेशा से समावेशी रहा है। समाज के इस चरित्र को समझने में कम्युनिस्ट लेखक संगठन असफल रहे और अपने ही बने दायरे में घूमते रहे। विभूति नारायण राय ने प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष होने के बावजूद जब लेखक संघों की भूमिका पर सवाल उठाए तो उनके विचार को निजी विचार माना गया। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव सिरसा ने एक पत्र जारी किया जिसमें राय को कठघरे में खड़ा किया गया। उस पत्र में ही बताया गया कि राय ने एक इंटरव्यू में कहा कि लेखक संगठनों की अब कोई भूमिका नहीं बची है और उनको बंद कर दिया जाना चाहिए। दूसरी टिप्पणी राय की ये थी कि देश में पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से सशक्त वामपंथी संघर्ष के अंत के आसार दिखने लगे हैं। दूसरी टिप्पणी को उन्होंने 2025 की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया।
प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के हस्ताक्षर से जारी पत्र में लिखा गया है कि प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय नेतृत्व अपने कार्यकारी अध्यक्ष के विचारों से सहमत नहीं है। माओवाद के खात्मे पर सिरसा के पत्र में लिखा है कि जिन जगहों से माओवादी के सफाए को विभूति जी ने अमित शाह की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया है वो सभी आदिवासी क्षेत्र हैं। जिनको माओवादी कहकर मारा गया है उन घनाओं पर भी झूठे एनकाउंटकर के आरोप लगे हैं। सिरसा के इस पत्र का विभूति नारायण राय ने उत्तर दिया और लिखा कि लेखक संगठनों को अब व्हाट्सएप लेखक संगठन कहना उचित होगा। राय ने अपने पत्र में अपनी विचारधारा का प्रदर्शन भी किया, लेकिन बहुत ही सधे तरीके से सिरसा को और उनकी आलोचना करनेवालों की ठीक से खबर भी ले ली। विभूति नारायण राय ने सिरसा के पत्र का जो उत्तर दिया है उसमें अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी और संगठन के दायित्वों से मुक्त होने की बात लिखी। विभूति ने लिखा कि संगठन अनुशासन से चलता है लेकिन साहित्येतर अनुशासन किसी भी लेखक के लिए आत्महत्या जैसा है। हलांकि लेखक संघ ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। संभव है कि विभूति के तार्किक पलटवार को झेल पाने में संगठन सक्षम नहीं हो। राय ने दक्षिणपंथी सच्चिदानंद जोशी और रामबहादुर राय को कार्यक्रम में बुलाने पर भी अपना पक्ष रखा और माओवाद के खात्मे वाली टिप्पणी पर भी। प्रगतिशील लेखक संगठन के इस विवाद ने एक बार फिर से कम्युनिस्टों की बराबरी और समानता के दावों और नारों की पोल खोल दी है। कम्युनिस्ट दावे बराबरी की करते हैं लेकिन वैचारिक आधार पर समाज को बांटनेवाली ये विचारधारा अपने विरोधियों को एक मिनट भी झेल नहीं सकती। इनका चरित्र समावेशी बिल्कुल नहीं है। ये दूसरों पर फासीवादी होने का आरोप जड़ते हैं लेकिन इनका स्वयं का चरित्र फासीवादी है। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं लेकिन अगर इनके संगठन से जुड़ा कोई व्यक्ति भी सच कहने का साहस करे तो संगठन से जुड़े लोग झुंड बनाकर उनपर आक्रमण करते हैं। उनको नेतृत्व का भी शह प्राप्त होता है।
इस पूरे प्रसंग से एक बात साफ हो गई है कि बचे-खुचे लेखक संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र और विमर्श की कोई जगह शेष नहीं है। इस प्रसंग में एक और खतरनाक बात सिरसा ने लिखी है। उन्होंने अन्य नामों के साथ उमर खालिद के नाम का भी उल्लेख करते हुए लिखा कि उनको कानूनी शिकंजे में फंसाकर परेशान किया जा रहा है। सिरसा को क्या ये पता नहीं कि देश की अदालतों ने उमर खालिद को जमानत देने से इंकार कर दिया है। वो दंगे का आरोपी है। दरअसल ये होता तब है जब आप राजनीतिक दल के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करते हैं। राजनीतिक दलों की राय पर चलनेवाली बुद्धिजीवियों से लेखकीय स्वतंत्रता की अपेक्षा करना ना सिर्फ बेमानी है बल्कि असंभव भी है। कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध इन लेखक संगठनों को अगर पुनर्जीवित होना है तो उनको अपने पितृ संगठनों से मुक्त होकर समावेशी और उदार बनना होगा। भारत में सोवियत रूस या चीन की नीतियां नहीं चल सकतीं, वहां का समाज अलग है और भारत का समाज अलग है।

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