हाल के दिनों में दो नायिका प्रधान फिल्में आई। दोनों एक्शन फिल्म है। दोनों फिल्मों में बच्चियों की जिंदगी केंद्र में है। जुलाई में शिव रवैल के निर्देशन में आई फिल्म अल्फा में आलिया और शरवरी मुख्य भूमिका में हैं। जबकि इसी महीने देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी फिल्म गांधारी आई। इसमें तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में है। गांधारी के पहले तापसी और कंगना के बीच विवाद भी उठा था। कई बार देखा गया है कि जब कोई फिल्म रिलीज होनेवाली होती है तो उससे जुड़े नायक-नायिका या कहानी को लेकर विवाद होता है। कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म की रिलीज के समय इस तरह के विवाद उठाने के पीछे मंशा फिल्म को चर्चित करने की होती है। कंगना और तापसी के बीच के विवाद को तापसी ने खत्म करने का प्रयास किया, लेकिन विवाद की चर्चा तो हो ही गई। फिल्म को इससे कितना लाभ मिला ये कहना तो कठिन है लेकिन विवाद की टाइमिंग को तो रेखांकित किया ही जाना चाहिए। इस लेख का विषय दो नायिकाओं के बीच विवाद की चर्चा नहीं हे। चर्चा तो नायिका प्रधान एक्शन फिल्मों की करना चाह रहे हैं।
हिंदी फिल्मों में इस बात की बहुत चर्चा होती रही है कि नायिकों को सिर्फ उनके ग्लैमर औरर आकर्षण के कारण फिल्मों में शो पीस की तरह रखा जाता है। ये बात तो कई दशकों से कही सुनी जा रही है कि हिंदी फिल्मों में नायिकाओं को पेड़ के चारों तरफ घूमते हुए डांस करना और रोमांटिक सीन देने के लिए फिल्मों रखा जाता है। पिछले सालों में तो चर्चा ये होने लगी थी नायक और नायिकाओं को फिल्म में काम करने के लिए एक समान पैसे मिलते हैं या नहीं। अगर नायिकाओं को कम दिए जाते हैं तो क्यों। एक दौर ऐसा भी आया था कि फिल्मों में माधुरी दीक्षित को कई नायकों से अधिक पैसे मिलते थे। टीवी की दुनिया में स्मृति इरानी को साथी पुरुष कलाकारों से अधिक पैसे मिला करते थे। लेकिन ये एक दो उदाहरण हैं। हिंदी फिल्मों में नायकों को अधिक और नायिकाओं को कम पैसे मिलते रहे हैं। अभी भी मिल रहे हैं। इसके पीछे का कारण तो सिर्फ व्यवसाय ही नजर आता है। इसमें नायक नायिका में भेद-भाव की मानसिकता जैसी कोई बात ना तो समझ आती है और ना ही नजर। फिल्म उद्योग पूरी तरह से कारोबारी दुनिया है जहां सबकुछ लाभ-हानि को ध्यान में रखकर होता है। अगर कोई फिल्म नायक के नाम और छवि पर सफल होती है तो उसका बाजार भाव बढ़ जाता है। अगर कोई फिल्म नायिका अपने कंधे पर उठाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ती है तो उसका बाजार भाव निश्चित रूप से बढता है।
फिल्म अल्फा यशराज फिल्म्स की स्पाई यूनिवर्श की कहानी है। इसमें अनिल कपूर, बाबी देओल, ऋतिक रोशन भी हैं लेकिन कहानी आलिया भट्ट और शरबरी के इर्द गिर्द ही घूमती है। कहानी अच्छी है। स्पाई यूनिवर्स की कहानियों में सरप्राइज एलिमेंट बहुत होते हैं। इस फिल्म में भी है। बाबी देओल का जो फिल्मी चरित्र है वो खुद को देशभक्त कहता है लेकिन अंत में उसका भेद खुलता है और वो पाकिस्तानी एजेंट होता है। वो सेना और आर एंड डब्ल्यू को चकमा देने में सफल रहता है। कहानी बहुत सधे तरीके से आगे बढ़ती है। फिल्म में मार-धाड़ बहुत है लेकिन निर्देशक ने फिल्म को जुगुप्साजनक हिंसा से बचा लिया है। हिंसक दृष्यों को देखकर मन खराब नही होता है। आलिया अपने एक्शन दृष्यों में स्वाभाविक लगती है लेकिन शबरबी की एंट्री के साथ ही वो आलिया पर भारी पड़ती दिखती है। आलिया की तुलना में शरबरी का रोल कम है लेकिन जितनी भी देर वो पर्द पर रहती है आलिया को टक्कर देती नजर आती है। अपने अपियरेंस से, अपने एटीट्यूड से और अपने अभिनय से। इस फिल्म में निर्देशक शिव रवैल की भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने कथानक को बहुत मजबूती से बुना। दर्शक कहीं उबता नहीं है। कहानी में सरप्राइज एलिमेंट्स भी हैं जो कथानक के बढने के साथ साथ खुलता है। दर्शकों के मन में फिल्म देखते हुए ये चलता रहता है कि आगे क्या। यही आगे क्या किसी फिल्म की सफलता का पैमाना होना चाहिए, खासकर अगर स्पाई यूनिवर्स की फिल्म है तो। शिव रवैल ने इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित वेबसीरीज द रेलवे मैन निर्देशित की थी। उस सीरीज को दर्शकों का प्यार मिला था और शिव के काम की सराहना हुई थी। शिव रवैल एक समृद्ध विरासत को भी आगे बढ़ा रहे हैं, उनके पिता राहुल रवैल और दादा एचएस रवैल ने कई सुपर हिट फिल्में बनाई थीं। फिल्म अल्फा में शिव रवैल ने पहली बार निर्देशक की भूमिका का निर्वाह किया है।
फिल्म गांधारी में तापसी पन्नू अपनी छवि के अनुरूप किरदार निभा रही हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला जिसकी बेटी का अपहरण हो जाता है। बेटी की तलाश में पूरी फिल्म है। तापसी ने एक्शन करने का भी प्रयास किया है लेकिन जब वो फाइट सीन देती है तो स्वाभाविक नहीं लगती हैं। अपनी बेटी की तलाश करते करते उसको छह साल से कम उम्र की बच्चियों को अवैध तरीके से विदेश भेजने के गैंग का पता चलता है। कहानी बहुत उलझी हुई है और कथानक में गैप है जिसको भरने में निर्देशक विफल रहे हैं। दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कथानक की निरंतरता बाधित होती है। फिल्म में धर्म का ज्ञान भी दिया गया है लेकिन ये आउट आफ प्लेस लगता है। जैसे तापसी की ही एक अन्य फिल्म अस्सी में जबरदस्ती हिंदी के कवियों का नाम पात्रों से कहलवाया गया था। ना तो उसकी कोई प्रासंगिकता थी और ना ही आवश्यकता। निर्देशक और फिल्म लेखक को लगा होगा कि उन नामों के उल्लेख से उनको हिंदी साहित्य का ज्ञाता मान लिया जाएगा। फिल्म गांधारी के कई दृश्यों में तापसी स्वाभाविक भी लगी है। जब वो दृष्टिहीन महिला के रोल में थाने के बाहर बैठकर बेबस दिखती हैं। ये बहुत ही पावरफुल सीन है। ऐसा फिल्म में बहुत कम जगह दिखा है। कई जगह तो अस्वाभिवक से लगने वाले दृष्य भी निर्देशक ने ठूंसे हैं। बहुरूपियों की दुनिया को दिखाने का प्रयत्न भी किया गया है लेकिन उस दुनिया को लेकर और रिसर्च करने की जरूरत थी।
फिल्म अल्फा और गांधारी को देखने के बाद लगता है कि हिंदी की फिल्मी दुनिया अब नायिका प्रधान फिल्मों में ज्यादा निवेश करने लगी है। कंगना की फिल्म भारत भाग्य विधाता भी नायिका प्रधान थी। नायिका प्रधान फिल्म बनाना अच्छी बात है लेकिन कहानी और उसके ट्रीटमेंट को लेकर बहुत सजग और सावधान रहने की आवश्कता होती है। जहां भी अनावश्यक रूप से नायिका को सुपर हीरो बनाने या दिखाने का प्रयास होता है, दर्शक फौरन भांप लेता है। परिणाम फिल्म असफलता के रास्ते पर चल पड़ती है। बावजूद इसके अगर नायिकाओं को लीड रोल और विशेषकर एक्शन रोल में लेकर फिल्में बनने लगी हैं तो यह एक सुखद ट्रेंड है। हिंदी दर्शकों को के लिए भी और फिल्मकारों के लिए भी।
