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Saturday, August 15, 2026

दिमागी नक्सलियों से निपटने की चुनौती


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही, जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। नक्सलवाद ने चार-पांच दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को दबोच कर रखा। बंदूक की नोक पर दबोच रखा था। संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीं। देश के समान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि उनको खुशी है कि नक्सलवादी-माओवादी हिंसा को आखिरी सांस लेने की ताकत भी नहीं बची। जहां पर कभी नक्सलियों की गोलियां चलती थी, जहां कभी धरती रक्त रंजित रहा करती थी, आज उन्हीं नक्सल क्षेत्रों में विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा लहरा है। यहां तक तो प्रधानमंत्री अपनी सरकार की सफलता के बारे में बात कर रहे थे लेकिन इसके बाद प्रधानमंत्री ने जो कहा उसपर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल बचे हैं। दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। वो हिंसा और अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव चल रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा। सुरक्षित भारत बनाना हम सबका दायित्व है। चुनौती सीमा के भीतर हो या सरहद के बाहर भारत हर परिस्थिति के लिए तैयार है।

प्रधानमंत्री की उपरोक्त बातों के आलोक में हम पिछले तीन चार महीने में घटी घटनाओं पर नजर डालते हैं। सबसे पहले अयोध्याजी के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के प्रकरण को देखते हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय अपराध था। इसमें लिप्त लोगों की गिरफ्तारी हुई। सभी जेल में हैं। विशेष जांच दल इसकी पड़ताल में जुटा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस केस पर नजर रखे हुए हैं। ये आपराधिक घटना कोई साधारण अपराध नहीं है इस कारण अपराधियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और उनको कठोर दंड भी मिलना चाहिए। अब इसका दूसरा हिस्सा देखते हैं जो इस अपराध से अधिक खतरनाक है। चढ़ावा चोरी की घटना को सनातन से जोड़ कर सनातन को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। संसद परिसर में एक निर्दलीय सांसद ने भगवा पहनकर सनातन के प्रतीकों के साथ सनातन को बदनाम करने के लिए एक प्रहसन किया। इस प्रहसन में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने पात्र के तौर पर हिस्सा लिया। हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्रीराम की तस्वीर जिस तरह से जमीन पर गिराकर अपमान किया गया उसको भी याद रखा जाना चाहिए। सनातन पर आक्रमण करके भारत की आत्मा पर चोट पहुंचाने का प्रयास किया गया। भारत की सभ्यता और संस्कृति पर चोट की गई। भारत विचार पर कुठाराघात किया गया। सनातन को कठघरे में खड़े करने का विचार दिमागी नक्सलियों का हो सकता है। उन्होंने इसकी रूपरेखा तय की होगी और कुछ दलों को चुनावी लाभ का स्वप्न दिखाया होगा। दिमागी नक्सली जब किसी को अपने कब्जे में लेते हैं तो सबसे पहले उसके दिमाग पर कब्जा करते हैं। फिर उसको लाभ होने या दिलाने का आश्वासन देकर अपने जाल में फांसते हैं। इस बात की चिंता किए बगैर कि उसके इस कदम के देश कितना और किस हद तक प्रभावित होगा। चढ़ावा चोरी प्रकरण में पूरे देश ने दिमागी नक्सलियों की इन करतूतों को देखा कि कैसे एक आपराधिक घटना को सनातन से जोड़कर उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया।

दूसरा उदाहरण दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के प्रदर्शन के बाद की घटनाओं के विश्लेषण से निकलता है। अब ये बात लगभग स्पष्ट हो चुकी है कि जंतर-मंतर के आंदोलन का जिन लोगों ने नेतृत्व किया उनका सिरा आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ था। यहां तक तो ठीक था। किसी भी राजनीतिक दल को ये अधिकार है कि वो अपने दांव पेंच से अपने राजनीतिक विरोधियों को घेरे, कभी सामने से आकर और कभी परोक्ष रूप से। पर जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान वहां जिस तरह के नारे लगे। जिस तरह के भाषण दिए गए उसके पीछे की मंशा साफ थी। जंतर-मंतर पर नारे लगे कि मेरा लिंग मेरी मर्जी, मेरा जेंडर मेरी मर्जी, मेरे कपड़े मेरी मर्जी। वहीं कुछ प्रदर्शनकारियों के बयानों के निहितार्थ परिवार और शादी नाम की संस्था को चुनौती देनेवाले थे। एक तरफ एक संस्था पिछले सौ वर्षों से भारत और भारतीयता को लेकर आगे चल रही है। अपनी संस्था के सौ वर्ष पूरे होने पर परिवार नाम की संस्था को बल प्रदान करने के लिए कुंटुब प्रबोधन जैसा देशव्यापी कार्यक्रम चला रही हो, जिसमें नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, भाषा और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बताए जाते हों ताकि राष्ट्र मजबूत हो सके। दूसरी तरफ दिमागी नक्सली परिवार नाम की संस्था को ही खारिज करते हैं। वो किशोरों और युवाओं के मन में स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता का बीज बोना चाहते हैं। ये दो तरह के विचारों की लड़ाई है। एक भारतीय विचार जो परिवार को जोड़कर राष्ट्र को मजबूत करना चाहता है और दूसरा जो परिवार को कमजोर करके देश को कमजोर करना चाहता है। कहा भी जाता है कि देश एक बड़ा परिवार है और परिवार एक छोटा देश है। तो सनातन से लेकर भारतीय मूल्यों पर हमला करना ही दिमागी नक्सलियों का ध्येय है।

अर्बन नक्सल वो होते थे जो परोक्ष रूप से माओवादी हिंसा का समर्थन करते थे। उनके पक्ष में माहौल बनाकर देश के युवाओं को गुमराह करके माओवाद के रोमांटिसिज्म की ओर ले जाते थे। दिमागी नक्सल वो हैं जो अकादमिक जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा का विरोध करते हैं। उसको दकियानूसी और रूढ़ीवादी बताकर खारिज करते हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के 12 वर्षों में अकादमिक जगत में ये दिमागी नक्सल कमजोर अवश्य हुए हैं लेकिन अपनी उपस्थिति का एहसास समय-समय पर करवाते रहते हैं। सरकारी सिस्टम में भी इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। विशेषकर शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में तो ये अब भी सक्रिय ही नहीं ताकतवर भी हैं। दिमागी नक्सलियों ने कमजोर पड़ने की आशंका में रणनीति बदल ली है। अब वे तिलक लगाकर सनातनी होने का स्वांग रचकर अपनी पहचान छिपाते हैं। तमाम तरह के लाभ लेते हैं। समय आने पर राष्ट्रवादी ताकतों का परोक्ष रूप से विरोध करते हैं और उनको अपने लक्ष्य से दूर करने के लिए राह में रोड़ा भी अटकाते हैं। कई बार तो बहुत साफ दिखता है कि ये हो रहा है लेकिन सिस्टम में दिमागी नक्सलियों की मजबूककी के कारण कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए प्रधानमंत्री की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। देश में सक्रिय दिमागी नक्सलियों की पहचान करने और उनको आइसोलेट करने का कार्य समाज को भी करना होगा। जब तक सामाजिक रूप से ये आइसोलेट नहीं होंगे तबतक वो रूप बदल बदलकर किशोरों और युवाओं को भटकाते रहेंगे।

 

Saturday, August 8, 2026

संप्रुभता को डिजीटल चुनौती


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फेसबुक पर की गई पोस्ट को थोड़े समय के लिए हटाने के लिए फेसबुक चलानेवाली कंपनी मेटा ने भारत सरकार से माफी मांग ली है लेकिन इससे पूरा प्रकरण समाप्त नहीं हो जाता। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले प्लेटफार्म्स के बारे में गंभीरता से विचार ही करने और एक ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। जंतर-मंचर पर छात्रों के नाम पर जो आंदोलन हुआ और उसमें इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका रही उसपर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की व्यंग्यात्मक टिप्पणी के बाद अमेरिका में बैठा एक व्यक्ति काकरोच जनता पार्टी के नाम से इंस्टाग्राम हैंडल बनाता है। 78 घंटे में इस हैंडल को तीस लाख फालेवर्स मिल जाते हैं। कुछ और समय में ये संख्या दो करोड़ बीस लाख तक पहुंच जाती है। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या आर्गेनिक रूप से इतने फालोवर्स इतने कम समय में किसी भी हैंडल को मिल सकते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न स्त्रोतों के अनुसार भारत में इंस्टाग्राम पर करीब 55 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं। इस समूह में सबसे बड़ी संख्या 25-34 आयुवर्ग के उपभोक्ताओं की है और उसके बाद 18-24 वर्ष के यूजर्स है। इलके अलावा भारत में फेसबुक के करीब 70 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप का प्रयोग करनेवाले 85 करोड़ लोग हैं। ये तीनों प्लेटफार्म मेटा कंपनी के अंतर्गत आते हैं। मेटा अमेरिका की कंपनी है। 

इस पृष्ठभूमि में जंतर मंतर पर जुलाई में हुए काकरोच जनता पार्टी के धरने को देखते हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना आरंभ होता है। बहुत समर्थन नहीं मिलता है। काकरोच जनता पार्टी के लोग पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर मंतर पर लाते हैं। उनके अनशन पर बैठने के बाद उनके स्वास्थ्य को लेकर चर्चा होती है। काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है लेकिन अपेक्षित नहीं। इंटरनेट मीडिया विशेषकर इंस्टाग्राम पर इस आंदोलन को लेकर रील आदि दिखने लगते हैं। काकरोच जनता पार्टी 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा करती है। अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगती है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर रीलों की संख्या बढ़ने लगती है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से उठाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवा देती है। सुबह हुए पुलिस एक्शन की खूब सारी रीलें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती हैं। उन अकाउंट्स पर भी ये रीलें दिखने लगती हैं जो कभी इस तरह की रील नहीं देखते थे। मेरे एक मित्र ने बताया कि वो सिर्फ फिल्मों और पर्यटन से जुड़ी रीलें देखते थे लेकिन उन दिनों उनके वाल पर जंतर मंतर की ही रीलें दिखती थीं। आमतौर पर ये माना जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक अल्गोरिथम से काम करता है और आप जिस तरह का वीडियो देकते हैं उसी तरह के वीडियो आपको दिखाता है। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करवाने के बाद उन अकाउंट्स पर भी जंतर मंतर से संबंधित वीडियो दिखने लगे थे जिनकी रुचि इनमें नहीं थी। रीलों  के माध्यम से माहौल बनाया जाने लगा। इसके बाद ही जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी। ये कसेंट मैनुफैक्चरिंग का उदाहरण है। इंटरनेट मीडिया के माध्यम से आंदोलन को गति दिया जाने लगा। 

इंटरनेट मीडिया के माध्यम से साइकोलाजिकल टेकओवर आफ पालिटिकल कंज्यूमर का खेल आरंभ हो चुका था। बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किसी के भाषण का अंश, सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का विजुअल, किशोर छात्रों का सरकार के विरुद्ध बयान रील के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगे थे। भारत में यह एक नए तरह का प्रयोग था। इसके पहले विश्व के कई देशों में इस तरह के प्रयोग हो चुके हैं। बंग्लादेश और नेपाल में तो हाल ही में ऐसा हुआ था। योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले कोई मुद्दा उठाया जाता है। इस बार पेपर लीक को मुद्दा बनाया गया। पेपर लीक ऐसा मुद्दा है जिससे युवा वर्ग सीधे जुड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाने लगा। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया गया। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। सारा खेल लोकतंत्र को बचाने की आड़ में खेला जाता है। 

नेपाल और बंगलादेश के अलावा 2010 में मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ था। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए दुर्वव्यवहार पर विरोध का स्वर उठा। पूरे देश में ये इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए। भारत में भी बार-बार वो शक्तियां इस तरह का षडयंत्रकारी खेल रचती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती और संविधान बदलने जैसे विमर्श केंद्र में आए। मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय नहीं हुई हैं। निरंतर सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का और तथाकथित सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। 

इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका की चर्चा 2020 के अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी हुई थी। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़े और हारे थे। चुनाव के दरान ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को कुछ समय के लिए सस्पेंड किया गया था। चुनाव परिणाम के बाद ट्विटर (अब एक्स) ने डोनाल्ड ट्रंप के हैंडल पर बैन लगा दिया था। ट्रंप ने अपना प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल लांच किया था। बाद में उनके समर्थक एलन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया था और ट्रंप के अकाउंट से बैन हटाया था। ट्विटर नाम एक्स हुआ। ये अनायास नहीं है कि चीन इस तरह के प्लेटफार्म्स को अपने देश में घुसने नहीं देता। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स के बढ़ते दायरे के कारण भारत में उनका प्रभाव काफी बढ़ गया है। उनके पास उपभोक्ताओं की सारी जानकारी है। वो जब चाहें जिसको चाहें अपना मनचाहा कंटेंट दे सकते हैं। ये विशेष आयुवर्ग के लोगों को लक्षित कर दिया जा सकता है, विशेष भौगोलिक क्षेत्र को लक्षित कर दिया जा सकता है। यह एक नए तरह का उपनिवेशवाद है जो किसी भी देश की संप्रभुता पर आक्रमण करता है। इसके लिए राजनीतिक दल मायने नहीं रखते हैं। मायने रखती है अपना कारोबारी हित। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि इस तकनीकी नवउपनिवेशवाद से राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा की जा सके। 


सफेद सागर में शौर्य की अग्नि


नई दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदलोन और उसके बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में दी जानेवाली गालियों को लेकर चर्चा हो रही है। इसके पहले जी-5 पर फिल्म सतलुज के प्रदर्शित होने और उसको हटाने के बाद ओटीटी पर अंकुश लगाने के पक्ष और विपक्ष में तर्क रखे जा रहे हैं। उधर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि ओटीटी के विनियमन के लिए एक विस्तृत संवैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है। ये भी जोड़ा गया कि विनियमन को इस तरह से तैयार किया जा रहा है ताकि किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वाधीनता बाधित ना हो। इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात कही गई है। वो ये सरकार ओटीटी प्लेटफार्म पर किसी वेबसीरीज या फिल्म के रिलीज होने के बाद विशेषज्ञों के पैनल से समीक्षा पर विचार कर रही है। अगर सीरीज या फिल्म में किसी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री हो तो उसको हटाने का उपक्रम किया जा सके। जानबूझकर मैंने इस संभावना को दिलचस्प कहा। अगर कोई फिल्म या वेबसीरीज रिलीज हो गई तो उसको भारत में तो हटवाया जा सकता है लेकिन क्या भारत के बाहर के दर्शकों के लिए हटवाया जा सकता है। तकनीक के विस्तार से ये लगभग मुमकिन नहीं है। फिल्म सतलुज के केस में हमने ये देखा कि जी 5 से फिल्म को हटवा देने के बाद भी वो इंटरनेट पर उपलब्ध रही। इस रिपोर्ट में ये भी माना गया है कि ओटीटी प्लेटफार्म ने मनोरंजन की दुनिया में पारंपरिक मनोरंजन के साधन यथा सिनेमा को पीछे छोड़ दिया है। फिल्मों में तो प्रदर्शन के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था है लेकिन ओटीटी मुख्यतया स्वनियमन के फार्मूले पर कार्य करती है। इसमें दर्शकों की उम्र को चेक करने का कोई मैकनिज्म भी नहीं है जिससे बहुधा कम उम्र के बच्चे भी सेक्सुअल कटेंट या गाली गलौच वाले संवादों से भरी सीरीज देखते हैं। इसका प्रभाव भी उनपर पड़ता है। इतना ही नहीं कई बार तो इस तरह के कटेंट सामने आते हैं जो समाज में वैमनस्यता परोसते हैं। दो समुदायों के बीच में कटुता बढ़ाते हैं। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय पोस्ट रिलीज पैनल के माध्यम से इसको विनयमित करना चाहती है। जब भी किसी वेबसीरीज या फिल्म को लेकर दर्शकों की शिकायत आएगी तो ये पैनल उसको देखेगी। अपने सुझावों से मंत्रालय को अवगत कराएगी। 

अभी भी लगभग इसी तरह की व्यवस्था है। स्वनियमन की त्रिस्तरीय व्यवस्था में शिकायत मिलने पर मंत्रालय की समिति विचार करती ही है। उसके बाद निर्णय करती है। इस तरह के कई उदाहरण है। 2024 में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का आयोजवन होनेवाले था। उससे एक महीने पहले नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी, द गाडेस आफ फूड रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको बताया गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना सीखना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्यों को लेकर मुकदमा हुआ। केस होने के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। एक तो इसके प्रदर्शन के टाइमिंग पर विचार करना चाहिए। पहले ही फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी थी। दर्शक इसको नकार चुके थे। लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के कुछ दिनों पूर्व इसको ओटीटी पर रिलीज करने के पीछे की मंशा क्या थी। इस तरह की स्थितियों में पोस्ट रिलीज पैनल की क्या भूमिका होगी। क्या मुकदमा होने के बाद वो फिल्म देखेगी। क्या दर्शकों की आपत्ति या शिकायत के बाद फिल्म देखेगी। सरकारी प्रक्रिया में जबतक पैनल देखेगी तबतक कितना समय बीत चुका होगा। किसी भी वैधानिक फ्रेमवर्क को बनाने के पहले इन बातों और पहलुओं पर विचार करना चाहिए। 

ओटीटी पर लेकर हो रही तमाम चर्चाओं के बीच एक ऐसी सिरीज आई जिसको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद संभव नहीं है। नाम है आपरेशन सफेद सागर। 1999 के कारगिल युद्ध के समय भारतीय वायुसेना के आपरेशन पर आधारित छह एपिसोड की इस सीरीज में निर्देशक ओनी सेन ने अपने क्राफ्ट, संवाद और परिस्थितियों की रचना इस प्रकार से की है कि दर्शक बंधा रहता है। इस सीरीज में सिर्फ काकपिट और युद्ध की कहानी ही नहीं है। शांति के समय पायलटों और उनके परिवारों की भावनाओं का सुंदर चित्रण भी है। युवा और अनुभवी पायलटों के जीवन को इस तरह से दिखाया गया है जो लगभग वास्तविक जैसा है। एक युवा पायलट की प्रेमिका जब अपने घर से भागकर एयरफोर्स स्टेशन पहुंचती है तो उसके बाद के दृष्य एकदम वास्तविक प्रतीत होते हैं। लड़की को बगैर मेकअप या गहरे मेकअप के पेश करने का जोखिम निर्देशक ने उठाया है। इसी तरह से इस सीरीज के केंद्रीय पात्रों में से एक स्कावड्रन लीडर अजय आहूजा, जिसका किरदार सिद्धार्थ ने निभाया, ने बहुत ही स्वाभिवक ढंग से निभाया गया है। उनकी पत्नी अलका आहूजा का किरदार अमृता बागची ने निभाया है। कैसे सीनियर पायलट का परिवार भी जूनियर पायलट के परिवार को बातों बातों में ट्रेनिंग देते हैं। इसको स्वाभाविक तरीके से संवाद के माध्यम से चित्रित किया गया है। युवा पायलट की प्रेमिका अजय आहूजा के घर में रहती है। एक दिन बातों बातों में अलका आहूजा उससे कहती है कि जब भी उसके पति जहाज लेकर जाते हैं उस दिन वो झगड़ा नहीं करती। लेकिन शिकायतों की सूची बनाते रहती हैं। जब उनके पति को जहाज नहीं उड़ाना होता है उसदिन वो सारा हिसाब बराबर कर लेती हैं। वेबसीरीज आपरेशन सफेद सागर एयरफोर्स से जुड़े पायलटों की जीवन की तमाम बारीकियों को छूती है। रिश्तों की संवेदना को इस तरह से उकेरती है कि कई बार दर्शकों की आंखें भर आती हैं। बेहद सधा हुआ संवाद। कोई पात्र अकारण लाउड नहीं होता है। कई बार तो पात्रों के बीच की चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।  

इस वेब सीरीज के पहले भी माधुरी दीक्षित अभिनीत क्राइम थ्रिलर मिसेज देशपांडे आई थी। वो भी सलीके से बनाई गई थी। दरअसल जिन निर्देशकों को अपने हुनर और कहानी पर भरोसा होता है वो अकारण यौनिकता, हिंसा, गाली गलौच नहीं दिखाते। जिनको अपने हुनर पर भरोसा नहीं होता और जो कला में वैचारिकी की मिलावट करते हैं। राजनीति करते हैं। उससे सफलता का रसायन तैयार करना चाहते हैं। उससे ही विवाद खड़े होते हैं। ओटीटी को लेकर अगर सरकार को विनियमिन की व्यवस्था करनी है तो पोस्ट रिलीज पैनल के स्थान पर प्री रिलीज पैनल बनाने पर विचार करना होगा। ताकि अकारण नग्नता और अश्लीलता परोसने पर तो लगाम लगे ही सीरीज के बहाने राजनीति करनेवालों की पहचान भी हो सके। उनके मंसूबों को नाकाम किया जा सके। इससे ना केवल विवाद कम होंगे बल्कि अकारण सरकारी कामकाज भी नहीं बढ़ेगा।


Saturday, August 1, 2026

परंपरा में गालियों का सौंदर्यशास्त्र


जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन में शामिल हुए युवक और युवतियों की भाषा और गालियों पर चर्चा हो रही है। साहित्य जगत इससे अछूता नहीं है। साहित्य जगत में भी गालियों पर खूब चर्चा हुई। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसी भाषा का उपयोग किया गया जो साहित्यकारों और लेखक/लेखिकाओं से अपेक्षित नहीं थी। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर गालियों की पैरोकारी की गई। कुछ उत्साही लेखकों ने तो गाली को साहित्य का अभिन्न अंग बता दिया। राही मासूम रजा से लेकर काशीनाथ सिंह के उपन्यासों में गालियों की बात कर अपने तर्कों में वजन डालने का प्रयत्न किया गया। अति उत्साह में वैसी रचनाएं खोजी गईं जिनको गालियों के पक्ष में उद्धूत किया जा सके। पर वहां ये नहीं बताया जा सका कि गालियों में प्रयुक्त शब्दावली कैसी थी और उसका किस संदर्भ में प्रयोग किया गया था। चूंकि ये विवाद साहित्यकारों, लेखकों और कुलेखकों के बीच था इस कारण हमें उन कृतियों पर भी विचार करना चाहिए जिसमें गालियों की भरमार है। विचार तो उसपर भी किया जाना चाहिए कि गालियों का संदर्भ क्या रहा है। किन पात्रों और परिवेश में गालियां दी जाती रही हैं। इस संबंध में राही मासूम रजा के उपन्यास आधा गांव का उदाहरण कई लोगों ने दिया। राही ने अपने उपन्यास आधा गांव में जिन पात्रों के मुंह से गालियां दिलवाई हैं उनका परिवेश और उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। उसको देखने से ये स्पष्ट हो जाता है कि गालियों का उपयोग लेखक ने कथा को प्रामाणिक बनाने के लिए किया। किसी को अपमानित करने या उसको नीचा दिखाने के लिए नहीं। कटेंट का इटेंट देखना सबसे आवश्यक है। यही स्थिति काशीनाथ सिंह के यहां भी दिखाई देती है। 

जिन लेखकों ने अपने उपन्यासों में गालियों को अश्लीलता के साथ प्रस्तुत किया उनपर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी में एक उपन्यासकार हुए कृष्ण बलदेव वैद। उनका एक उपन्यास है विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां। इस उपन्यास में अश्लीलता की पराकाष्ठा है। उनकी ये कृति जब प्रकाशित होकर आई थी तो उसकी भाषा को लेकर,स्थितियों के चित्रण में अश्लीलता को लेकर चर्चा हुई थी। आमतौर पर इस तरह की कृतियों के साथ जो होता है वही उनके इस उपन्यास के साथ भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी चर्चा कम होती चली गई। अब तो गाहे बगाहे ही इस उपन्यास का नाम सुनाई देता है। वैद का एक और उपन्यास है उसका बचपन। इस औपन्यासिक कृति को संवेदनशील बचपन की आंख से देखी गई एक बड़ी दुनिया की कथा कहा गया। इसकी भाषा भी अश्लील ही थी। प्रकाशन के बाद इसकी चर्चा हुई लेकिन धीरे-धीरे चर्चा तो खत्म हुई ही ये कृति पाठकों की दृष्टि से ओझल भी हो गई। कहना ना होगा कि कटेंट का इंटेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैद ने कभी कहा था कि ये हिंदी साहित्य में उनके खिलाफ साजिश है। उनको ये भी विचार करना चाहिए था कि किस कारण से उनके उपन्यास फौरी तौर पर चर्चित होते थे और फिर नेपथ्य में चले जाते थे। दूसरी तरफ निर्मल वर्मा हैं जो उनके ही समकालीन थे। उनके उपन्यासों में भी ऐसी परिस्थियां बनती थीं कि वो अश्लील हो सकते थे। गालियों और स्त्री देह का वर्णन कर सकते थे। उन्होंने अपने भाषा कौशल से उन स्थितियों को अश्लील होने से बचाया। याद पड़ता है उनका एक उपन्यास लाल टीन की छत। इस उपन्यास में निर्मल ने अपने पात्र काया के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाया है। काया इस उपन्यास में बचपन और किशोरावस्था के संधिकाल में थी। यहां भी देह के यथार्थ से पात्र का मुठभेड़ होता है। लेखक बेहद संवेदनशील तरीके से उसका बगैर अश्लील हुए पात्र की मन:स्थिति का सफलतापूर्वक चित्रण कर ले जाते हैं। ये उपन्यास भी खूब चर्चित हुआ। अब भी ये हिंदी के पाठकों के साथ साथ गैर-हिंदी पाठकों को अपने शिल्प और भाषाई सौष्ठव के कारण लुभाता है। कंटेंट का इंटेंट साफ है। निर्मल कई बार विसंगतियों को रेखांकित करते हैं लेकिन अर्थहीन नहीं होते। 

कई लोगों ने प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के उपन्यासों का नाम लेकर भी गालियों को या अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन को उचित ठहराने का प्रयत्न किया। ऐसे लोगों की हालत भी वैद साहब जैसी होकर रह गई। चर्चा तो मिली लेकिन तर्कों को स्थायित्व नहीं। इंटरनेट मीडिया के जमाने में किसको स्थायित्व की चिंता है। हो भी क्यों ? यहां तो तुरंता प्रसिद्धि के फेर में लोग साहित्यकार बने फिरते हैं। किसी भी चर्चा में छूट ना जें इसलिए उलजलूल लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उपन्यासकारों के बाद अशोक वाजपेयी की बात कर लेते हैं। आयोजनधर्मी होने के बावजूद आज भी अशोक वाजपेयी को कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रतिक्रीड़ा की कविताएं लिखनेवाले अशोक वाजपेयी को देह और गेह का कवि ही माना गया। अपनी कविताओं में बाद के दिनों में अशोक वाजपेयी ने मोहक गद्य लिखना आरंभ किया लेकिन कवि के तौर पर पहचान और कविताओं को लोक में स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उनकी तुलना में कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह ना केवल कवि के रूप में स्थापित हुए बल्कि कविताओं में वैचारिकी और सिद्धांत के कारण हिंदी साहित्य समाज में समादृत भी हुए। कुंवर जी कविता है- अबकी बार लौटा तो। उसकी कुछ पंक्तियां हैं- अबकी बार लौटा तो/ वृह्तर लौटूंगा। अबकी बार लौटूंगा तो मनुष्यतर लौटूंगा। अबकी बार लौटा तो/ हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/ पूर्णतर लौटूंगा। इन पंक्तियों में भारत है। भारत का दर्शन है । अशोक वाजपेयी की तरह पाश्चात्य पांडित्य को भारतीय परिवेश में ढालने की फूहड़ कोशिश नहीं। केदारनाथ सिंह की कविता है घास। इस कविता की आखिरी पंक्ति है कभी भी.../ कहीं से उग आने की/ एक जिद है वह। इस तरह की कई पंक्तियां पाठकों को याद हैं। अशोक वाजपेयी की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो पाठकों को या काव्य रसिकों को याद हो। यह है कंटेंट का इटेंट। इंटेंट अगर फौरी चर्चा है तो वो तो गालियों से मिल सकती है लेकिन कालजयी नहीं हो सकते। 

कुछ लोगों ने विवाहोत्सव में बारातियों के स्वागत में गाई जानेवाली गालियों और  नकटौरा के संवादों में अश्लीलता की बात की। दोनों बातें सही हैं। गालियां दी जाती हैं लेकिन उसका अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। विवाहोत्सव के दौरान गाई जानेवाली गालियां शारदा सिन्हा ने खूब गाईं। बिहार में उसको गारी कहते हैं। उसको सुनकर कभी भी उबकाई नहीं आई। विवाहोत्सव और नकटौरा की गालियों में एक रस होता है। वैसा रस जो शब्दों में घुलकर सुननेवाले को आनंद देता है। नकटौरा तो बिल्कुल ही निजी आयोजन होता है। इसके मनोविज्ञान को समझना चाहिए। ये महिलाओं को अपनी बात, अपनी भावनाएं सामने रखने का एक निजी मंच है। इसलिए जंतर मंतर पर दी गई गालियों का गारी और नकटौरा से तुलना हास्यास्पद है। जो अंतर सेंसुअलिटी और सेक्सुअलिटी में है वही जंतर मंतर की गालियों और गारी में है। गालियों को लेकर फेसबुक आदि पर लिखी टिप्पणियों से कई लेखकनुमा जीवों का अज्ञान सामने आ गया।