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Saturday, August 1, 2026

परंपरा में गालियों का सौंदर्यशास्त्र


जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन में शामिल हुए युवक और युवतियों की भाषा और गालियों पर चर्चा हो रही है। साहित्य जगत इससे अछूता नहीं है। साहित्य जगत में भी गालियों पर खूब चर्चा हुई। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसी भाषा का उपयोग किया गया जो साहित्यकारों और लेखक/लेखिकाओं से अपेक्षित नहीं थी। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर गालियों की पैरोकारी की गई। कुछ उत्साही लेखकों ने तो गाली को साहित्य का अभिन्न अंग बता दिया। राही मासूम रजा से लेकर काशीनाथ सिंह के उपन्यासों में गालियों की बात कर अपने तर्कों में वजन डालने का प्रयत्न किया गया। अति उत्साह में वैसी रचनाएं खोजी गईं जिनको गालियों के पक्ष में उद्धूत किया जा सके। पर वहां ये नहीं बताया जा सका कि गालियों में प्रयुक्त शब्दावली कैसी थी और उसका किस संदर्भ में प्रयोग किया गया था। चूंकि ये विवाद साहित्यकारों, लेखकों और कुलेखकों के बीच था इस कारण हमें उन कृतियों पर भी विचार करना चाहिए जिसमें गालियों की भरमार है। विचार तो उसपर भी किया जाना चाहिए कि गालियों का संदर्भ क्या रहा है। किन पात्रों और परिवेश में गालियां दी जाती रही हैं। इस संबंध में राही मासूम रजा के उपन्यास आधा गांव का उदाहरण कई लोगों ने दिया। राही ने अपने उपन्यास आधा गांव में जिन पात्रों के मुंह से गालियां दिलवाई हैं उनका परिवेश और उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। उसको देखने से ये स्पष्ट हो जाता है कि गालियों का उपयोग लेखक ने कथा को प्रामाणिक बनाने के लिए किया। किसी को अपमानित करने या उसको नीचा दिखाने के लिए नहीं। कटेंट का इटेंट देखना सबसे आवश्यक है। यही स्थिति काशीनाथ सिंह के यहां भी दिखाई देती है। 

जिन लेखकों ने अपने उपन्यासों में गालियों को अश्लीलता के साथ प्रस्तुत किया उनपर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी में एक उपन्यासकार हुए कृष्ण बलदेव वैद। उनका एक उपन्यास है विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां। इस उपन्यास में अश्लीलता की पराकाष्ठा है। उनकी ये कृति जब प्रकाशित होकर आई थी तो उसकी भाषा को लेकर,स्थितियों के चित्रण में अश्लीलता को लेकर चर्चा हुई थी। आमतौर पर इस तरह की कृतियों के साथ जो होता है वही उनके इस उपन्यास के साथ भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी चर्चा कम होती चली गई। अब तो गाहे बगाहे ही इस उपन्यास का नाम सुनाई देता है। वैद का एक और उपन्यास है उसका बचपन। इस औपन्यासिक कृति को संवेदनशील बचपन की आंख से देखी गई एक बड़ी दुनिया की कथा कहा गया। इसकी भाषा भी अश्लील ही थी। प्रकाशन के बाद इसकी चर्चा हुई लेकिन धीरे-धीरे चर्चा तो खत्म हुई ही ये कृति पाठकों की दृष्टि से ओझल भी हो गई। कहना ना होगा कि कटेंट का इंटेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैद ने कभी कहा था कि ये हिंदी साहित्य में उनके खिलाफ साजिश है। उनको ये भी विचार करना चाहिए था कि किस कारण से उनके उपन्यास फौरी तौर पर चर्चित होते थे और फिर नेपथ्य में चले जाते थे। दूसरी तरफ निर्मल वर्मा हैं जो उनके ही समकालीन थे। उनके उपन्यासों में भी ऐसी परिस्थियां बनती थीं कि वो अश्लील हो सकते थे। गालियों और स्त्री देह का वर्णन कर सकते थे। उन्होंने अपने भाषा कौशल से उन स्थितियों को अश्लील होने से बचाया। याद पड़ता है उनका एक उपन्यास लाल टीन की छत। इस उपन्यास में निर्मल ने अपने पात्र काया के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाया है। काया इस उपन्यास में बचपन और किशोरावस्था के संधिकाल में थी। यहां भी देह के यथार्थ से पात्र का मुठभेड़ होता है। लेखक बेहद संवेदनशील तरीके से उसका बगैर अश्लील हुए पात्र की मन:स्थिति का सफलतापूर्वक चित्रण कर ले जाते हैं। ये उपन्यास भी खूब चर्चित हुआ। अब भी ये हिंदी के पाठकों के साथ साथ गैर-हिंदी पाठकों को अपने शिल्प और भाषाई सौष्ठव के कारण लुभाता है। कंटेंट का इंटेंट साफ है। निर्मल कई बार विसंगतियों को रेखांकित करते हैं लेकिन अर्थहीन नहीं होते। 

कई लोगों ने प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के उपन्यासों का नाम लेकर भी गालियों को या अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन को उचित ठहराने का प्रयत्न किया। ऐसे लोगों की हालत भी वैद साहब जैसी होकर रह गई। चर्चा तो मिली लेकिन तर्कों को स्थायित्व नहीं। इंटरनेट मीडिया के जमाने में किसको स्थायित्व की चिंता है। हो भी क्यों ? यहां तो तुरंता प्रसिद्धि के फेर में लोग साहित्यकार बने फिरते हैं। किसी भी चर्चा में छूट ना जें इसलिए उलजलूल लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उपन्यासकारों के बाद अशोक वाजपेयी की बात कर लेते हैं। आयोजनधर्मी होने के बावजूद आज भी अशोक वाजपेयी को कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रतिक्रीड़ा की कविताएं लिखनेवाले अशोक वाजपेयी को देह और गेह का कवि ही माना गया। अपनी कविताओं में बाद के दिनों में अशोक वाजपेयी ने मोहक गद्य लिखना आरंभ किया लेकिन कवि के तौर पर पहचान और कविताओं को लोक में स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उनकी तुलना में कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह ना केवल कवि के रूप में स्थापित हुए बल्कि कविताओं में वैचारिकी और सिद्धांत के कारण हिंदी साहित्य समाज में समादृत भी हुए। कुंवर जी कविता है- अबकी बार लौटा तो। उसकी कुछ पंक्तियां हैं- अबकी बार लौटा तो/ वृह्तर लौटूंगा। अबकी बार लौटूंगा तो मनुष्यतर लौटूंगा। अबकी बार लौटा तो/ हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/ पूर्णतर लौटूंगा। इन पंक्तियों में भारत है। भारत का दर्शन है । अशोक वाजपेयी की तरह पाश्चात्य पांडित्य को भारतीय परिवेश में ढालने की फूहड़ कोशिश नहीं। केदारनाथ सिंह की कविता है घास। इस कविता की आखिरी पंक्ति है कभी भी.../ कहीं से उग आने की/ एक जिद है वह। इस तरह की कई पंक्तियां पाठकों को याद हैं। अशोक वाजपेयी की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो पाठकों को या काव्य रसिकों को याद हो। यह है कंटेंट का इटेंट। इंटेंट अगर फौरी चर्चा है तो वो तो गालियों से मिल सकती है लेकिन कालजयी नहीं हो सकते। 

कुछ लोगों ने विवाहोत्सव में बारातियों के स्वागत में गाई जानेवाली गालियों और  नकटौरा के संवादों में अश्लीलता की बात की। दोनों बातें सही हैं। गालियां दी जाती हैं लेकिन उसका अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। विवाहोत्सव के दौरान गाई जानेवाली गालियां शारदा सिन्हा ने खूब गाईं। बिहार में उसको गारी कहते हैं। उसको सुनकर कभी भी उबकाई नहीं आई। विवाहोत्सव और नकटौरा की गालियों में एक रस होता है। वैसा रस जो शब्दों में घुलकर सुननेवाले को आनंद देता है। नकटौरा तो बिल्कुल ही निजी आयोजन होता है। इसके मनोविज्ञान को समझना चाहिए। ये महिलाओं को अपनी बात, अपनी भावनाएं सामने रखने का एक निजी मंच है। इसलिए जंतर मंतर पर दी गई गालियों का गारी और नकटौरा से तुलना हास्यास्पद है। जो अंतर सेंसुअलिटी और सेक्सुअलिटी में है वही जंतर मंतर की गालियों और गारी में है। गालियों को लेकर फेसबुक आदि पर लिखी टिप्पणियों से कई लेखकनुमा जीवों का अज्ञान सामने आ गया।   


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