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Sunday, April 19, 2009

किताबों में क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के डेढ सौ साल का जश्न देशभर में मनाया गया । दिल्ली में राष्टीय स्तर के कई भव्य आयोजन एवं इसको लेकर कई गोष्ठियां भी आयोजित की गई, जहां विद्वानों ने जमकर बहस- मुबाहिसे किए ।  अखबारों और पत्रिकाओं ने अपने कई पन्ने आजादी की पहली लड़ाई को समर्पित किए । पत्र पत्रिकाओं के अलावा इस मौके पर कई किताबें भी प्रकाशित हुई । लेकिन किताबों के प्रकाशन में भी एक बार फिर से हिंदी प्रकाशन जगत अंग्रेजी से पिछड़ता नजर आया । जिस तरह से अंग्रेजी के प्रकाशकों ने योजनाबद्ध तरीके से भारतीय स्वतंत्रता की पहली लड़ाई के विभिन्न पहुलुओं पर किताबें प्रकाशित की वो काबिले तारीफ है । हिंदी में भी कई किताबें प्रकाशित हुई लेकिन इसमें लेखकीय प्रयास ज्यादा, प्रकाशकीय परिश्रम कम नजर आया । जब मैंने अंग्रेजी के लेखकों और प्रकाशकों से बात की तो पता चला कि तीन चार साल पहले से ही आजादी की 150 वीं सालगिरह को ध्यान में रखकर योजनाएं तैयार की हुई थी और बकायदा लेखकों को प्रोजेक्ट सौंप कर किताबें लिखवाई गई । इसका परिणाम ये हुआ कि जब पूरा देश आजादी की इस पहली लड़ाई की सालगिरह का जश्न मना रहा था और देश भर की पत्रिकाओं और अखबरों में  इसकी चर्चा हो रही थी तो अंग्रेजी में एक के बाद एक धड़ाधड़ किताबें प्रकाशित हो रही थी । इसका व्यावसायिक फायदा भी अंग्रेजी प्रकाशन व्यवसाय को हुआ । अपने इस लेख में हम अंग्रेजी और हिंदी में वर्ष दो हजार सात-आठ में 1857 की क्रांति पर प्रकाशित पुस्तकों पर विचार करेंगे । इस क्रम में पहले बात अंग्रेजी में प्रकाशित किताबों की । 
आजादी की एक सौ पचासवीं सालगिरह पर जो सबसे महत्वपूर्ण किताब आई वो है विलियम डेलरिंपल की - "द लास्ट मुगल,द फॉल ऑफ अ डायनेस्टी, दिल्ली 1857" (पेंग्विन प्रकाशन, नई दिल्ली) । अंग्रेज लेखकों ने भारत के इतिहास को लिखते हुए आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर को लगभग नजरअंदाज कर दिया है । कई अंग्रेज लेखकों ने तो बहादुर शाह जफर को सिर्फ दिल्ली का राजा तक लिखा डाला है । ये तो उस तरह की ही बात हुई कि पोप को रोम का बिशप कह दिया जाए ।  लेकिन विलियम डेलरिंपल ने बहादुरशाह जफर को केंद्र में रखकर मेहनतपूर्वक उस दौर की तमाम गतिविधियों को कलमबद्ध किया है । विलियम डेलरिंपल ने-' द लास्ट मुगल,द फॉल ऑफ अ डायनेस्टी' में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शुरु होने और उसके अंजाम तक पहुंचने को आखिरी मुगल शासक बहादुरशाह जफर के इर्द गिर्द रखकर परखने की कोशिश की है । विलियम डेलरिंपल ने भारतीय विरोध और विद्रोह के कई अनछुए पहलुओं को सिलसिलेवार ढंग से, व्यापक शोध के आधार पर व्याख्यायित किया है, जिसे पहले के अंग्रेज इतिहासकारों ने या तो असावधानीवश या फिर सायास छोड़ दिया था । अपनी इस किताब में विलियम डेलरिंपल ने दावा किया है उन्होंने तथ्यों को जुटाने में भारतीय पुरात्तव संग्रहालय और बर्मा के राष्ट्रीय संग्रहालय के दस्तावेजों की मदद से उस दौर के इतिहास को नए सिरे से उद्घाटित किया है लेकिन कई भारतीय इतिहासकारों को डेलरिंपल की दिल्ली की घटनाओं की व्याख्या पर ऐतराज भी है ।
पेंग्विन प्रकाशन से ही जूलियन रॉथबॉन की 'द म्यूटिनी-अ नॉवेल' प्रकाशित हुआ । अपने इस ऐतिहासिक उपन्यास में लेखक ने उस दौर में इंगलैंड से भारत आई एक जवान और बेहद खूबसूरत महिला सोफी -जो अपने दुधमुंहे बच्चे को लेकर भारत आई थी - और गदर की हिंसा में फंस गई थी - को केंद्र में रखकर बेहद मार्मिक कहानी लिखी है । दोनों पक्षों के बीच की हिंसा में सोफी का बच्चा कहीं गुम हो जाता है । उस बेहद भयावह दौर में अपने बच्चे को ढूंढने का प्रयास करती दर दर भटकती सोफी की कहानी है इस उपन्यास में । इस क्रम में सोफी गवाह बनती है भारतीय जनता और ब्रिटिश सिपाहियों की लडाई में एक दूसरे को नेस्तानाबूद कर डालने की हद तक की घृणा की । रॉथबॉन, सोफी की इस कहानी को एक व्यापक फलक के साथ उठाते हैं । ये कृति विक्टोरियन एडवेंचर स्टोरी की तरह है, जिसमें लेखक ने उस दौर में जनता और राज के बीच फैली धर्मांधता को लेखकीय कसौटी पर कसा है । इसमें लेखक ने कई बेहद छोटे व्यक्तिगत अनुभवों को इस करीने से पिरोया है कि इसे पढ़ते वक्त पाठकों को लगता है कि सारी घटनाएं उनके सामने घटित हो रही है । 
1857 की घटनाओं के साथ दो धाराएं चलती हैं - एक धारा वो है जो उसे महज सिपाही विद्रोह बताते हैं और दूसरी वो जो इसे भारतीय स्वाधीनता संग्राम का आगाज मानते हैं । 1857 के लगभग डेढ सौ साल से भी ज्यादा बीत जाने के बाद भी ये बहस जारी है कि 1857 में जो हुआ वो क्या था- सिपाही विद्रोह, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या फिर सिपाहियों का राज के खिलाफ स्वत: स्फूर्त भड़का गुस्सा । इसपर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है, इसका परिणाय ये हुआ कि उस विषय पर प्रचुर मात्रा में सामग्री उपलब्ध है । 'द पेंग्विन -1857 रीडर' इस ऐतिहासिक घटना को भारतीय, यूरोपीय, अमेरिकन, और ब्रिटिश अखबारों और पत्रिकाओं में उस दौर में बारे में जो कुछ लिखा छपा था, उसका दस्तावेजीकरण है । इसका संपादन-संकलन प्रमोद नायर ने किया है । ये संकलन इस लिहाज से अहम है कि इसमें उस दौर की घटनाओं को अपनी आंखों से देखनेवाले लोगों की टिप्पणियां भी संकलित की गई हैं । व्यक्तिगत अनुभवों के अलावा कार्ल मार्क्स, लॉर्ड मैकाले के विचारों भी यहां हैं । मिर्जा गालिब की डायरी के वो अहम अंश भी है जिसमें बहादुर शाह जफर के मुकदमे के ट्रायल का विवरण है । इस किताब की भूमिका में विश्व इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना के कई आयामों को पकड़ने की कोशिश की गई है । 
प्रमोद नायर की ही दूसरी किताब - 'द ग्रेट अपराइजिंग' भी मई दो हजार सात में प्रकाशित हुई । इस किताब में नायर ने 1857 की क्रांति के दौर में विद्रोह और उसको दबाने के ब्रिटिश राज के नृशंस तौर तरीकों पर विस्तार से लिखा है । इसमें 1857 के दौर के मुख्य किरदारों - हेनरी लॉरेंस, लॉर्ड कैनिंग, नाना साहिब, लक्ष्मीबाई, जॉन निकोलसन, के साथ साथ बहादुर शाह जफर के कारनामों का जिक्र है । इस किताब में प्रमोद नायर ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ साथ उस दौर की साहित्यिक कृतियों से भी सामग्री लेकर गंभीरता पूर्वक विचार किया है । इस किताब के आखिर में ये भी बताया गया है कि किस तरह से 1857 की क्रांति ने यूरोपीय साहित्य को प्रभावित किया । 
पिछले वर्ष रुद्रांग्सु मुखर्जी की लगभग ढाई सौ पृष्टों की किताब- स्पेक्ट्रम ऑफ वायलेंस - भी छपकर आई । इस किताब में 27 जून 1857 को कानपुर के सत्तीचुरा घाट पर लगभग तीन सौ ब्रिटिश लोगों के मारे जाने के कारणों की तह में जाने की कोशिश की गई है । ब्रिटिश इतिहासकारों के मुताबिक इस सामूहिक हत्याकांड में बच गए लोगों को 15 जुलाई को बीबीघर के पास कत्ल कर दिया गया । कहा जाता है कि जब विद्रोहियों ने कानपुर पर कब्जा किया तो ब्रिटिश महिलाओं और बच्चों को जलमार्ग से वाया भागलपुर, कलकत्ता भेजने की योजना के तहत जहाज से रवाना किया गया । लेकिन विद्रोही वहां पहुंचकर मरने मारने पर उतारू हो गए । लेकिन निहत्थे महिलाओं और बच्चों को देखकर उनपर हमला करने को लेकर विद्रोही दो गुटों में बंट गए । लेकिन कुछ विद्रोहियों ने आगे बढ़कर हमले की कमान संभाली । उनका तर्क ये था कि उनपर बर्बरता की हद तक अत्याचार तो ये महिलाएं ही करती हैं । कालांतर में सत्तीचूरा का ये घाट मैसेकर घाट के नाम से जाना गया । ब्रिटिश इतिहासकार इस कत्लेआम पर तो जमकर टसुए बहाते नजर आते हैं, लेकिन वो जनरल हॉवलॉक के अत्याचारों को नजरअंदाज कर देते हैं । दो दिन बाद ही जनरल हॉवलॉक और कर्नल जोम्स नील के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने फिर से कानपुर पर कब्जा कर लिया और आम जनता पर इतने अत्याचार किए कि नाजियों की रूह भी कांप जाए । मुखर्जी ने विद्रोहियों में हिंसा पर उतारू होने की प्रवृति को भी परखने का प्रयास किया । लेखक के मुताबिक इस हिंसा से संबंधित विद्रोहियों का कोई पक्ष उपलब्ध नहीं है । जो उपलब्ध है वो है ब्रिटिश नागरिकों के बयान और सरकारी दस्तावेज । तो इस एकतरफा बयानों और दस्तावेजों के आधार पर इतिहास बनाने की कोशिशों को 'स्पेक्ट्रम ऑफ वायलेंस' रोकता है और ब्रिटिश इतिहासकारों को हिंसा के कारणों को फिर से परिभाषित करने की चुनौती भी देता है । 
रूपा एंड कं. से पत्रकार और लेखक अमरेश मिश्रा की दो खंडों में भारी भरकम ग्रंथ- वॉर ऑफ सिविलाइजेशन-  भी प्रकाशित हुआ । अमरेश इसके पहले भी मंगल पांडे और लखनऊ पर किताब लिककर 1857 में अपनी रुचि का संकेत दे चुके हैं । अमरेश ने अपनी इस किताब में 1857 की क्रांति को दो सभ्यताओं की लड़ाई बताया है । साथ ही लेखक का जोर इस बात पर भी है कि ये भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था । दो हजार पृष्ठों की इस किताब में अमरेश लगातार पश्चिमी इतिहासकारों की इस अवधारणा- कि ये सिपाही विद्रोह था- को निगेट करते चलते हैं । हलांकि ये कोई नई बात या नई प्रस्थापना नहीं है । लेखक इस किताब में भारत में जातिवाद और संप्रदायवाद की खाई बढाने के लिए उस दौर के अंग्रेजी शासनकाल को भी जिम्मेदार ठहराते हैं । उनका कहना है कि अंग्रेजों के आने के बाद न केवल विभिन्न जातियों बल्कि समुदायों के बीच वैमनस्यता बढी । जो एक बड़ी बात अमरेश अपनी इस किताब में उठाते हैं, वो ये है कि उस दौर में 1 करोड़ से ज्यादा लोग सिर्फ उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा में मारे गए थे । अमरेश अपने इस निष्कर्ष के लिए उस दौर के लेबर रिपोर्ट्स को आधार बनाते हैं । अमरेश की इस किताब में कई नई बातें हैं जो आनेवाले दिनों में बहस के लिए एक आधार प्रदान करती है । अंग्रेजी के प्रसिद्ध अखबार गार्डियन में इस किताब की समीक्षा के बाद ब्रिटिश इतिहासकारों और लेखकों के बीच बहस की नई जंग के आगाज के संकेत मिलने लगे हैं । क्योंकि मिश्रा ने 1857 के विद्रोह को दबाने के लिए जो कत्लेआम ब्रटिश फौजियों ने किया उसे दुनिया का पहला नरसंहार करार दिया है । 
रोली बुक्स ने भी क्रिकेट इतिहासकार बोरिया मजुमदार और शर्मिष्ठा गुप्तू के संपादन में - रिविजिटिंग 1857, मिथ, मेमेरी, हिस्ट्री का प्रकाशन किया । इसमें कई दिलचस्प लेख संकलित हैं । इस किताब की जो बेहद दिलचस्प बात है वो ये कि 1857 में हुई क्रांति को भारतीय सिपाहियों और ब्रिटिश अफसरों के बीच उस दौर में हुए क्रिकेट मैचों के द्वारा परखने की कोशिश की है । इस तरह से ये किताब एक बिल्कुल ही अलग चश्मे से 1857 की क्रांति को देखता है । 
'डेटलाइन 1857- रिवोल्ट अगेंस्ट द राज' प्रमोद कपूर और रुद्रांग्सु मुखर्जी के संपादन में एक अद्भुत संकलन है । इस पुस्तक में बैरकपुर से लेकर झांसी तक की क्रांति की दास्तां दर्ज है । एक सौ चवालीस पृष्ठ की इस किताब में भी लेखों के अलावा कई महत्वपूर्ण मानचित्र, क्रांति के छह प्रमुख फोटोग्राफ, तबाही के कई चित्र हैं । ये वो चित्र या फोटोग्राफ जो बाद के दिनों में भी स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों को एकजुट करने में मददगार साबित हुए । प्रमोद कपूर ने इस किताब में श्रमपूर्वक तस्वीरों को इकट्ठा किया है । जो तस्वीर सुलभ नहीं हो सकी उसकी भारपाई उस दिन के अखबार की कटिंग को संकलित कर किया गया है । इस किताब को पढ़ते हुए पाठकों को उस दौर की सामाजिक हलतल का भी अंदाजा मिलता है । अंग्रेजी में इसके अलावा भी कई किताबें आईं लेकिन सबको समेटना नामुमकिन है । लेकिन उपरोक्त किताबें महत्वपूर्ण हैं और इनके चयन के समय मेरे जेहन में ये बात थी ऐसी कृतियों को ही चुनुं जो कि कुछ नए तथ्य या नई प्रस्थापनाएं लेकर आई हों । इसका ये मतलब कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि अन्य प्रकाशित किताबों में कुछ नया नहीं है । 
एक ओर जहां अंग्रेजी में योजनाबद्ध तरीके से 1857 की क्रांति की 150वीं सालगिरह पर काम हुआ वहीं हिंदी में बेहद ही एडहॉक तरीका अपनाया गया । हो सकता है कि हिंदी के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों को मेरी ये बात बुरी लगे लेकिन हकीकत यही है । क्योंकि अंग्रेजी के बरक्स अगर आप हिंदी में प्रकाशित कृतियों को देखें तो ये बात साफ-साफ नजर आती है । हिंदी में 1857 की क्रांति की डेढ सौवीं सालगिरह के मौके पर कई पत्रिकाओं ने अपने अंक केंद्रित किए। सबसे पहले नागपुर से प्रकाशित होनेवाले 'लोकमत समाचार' ने 2006 के अपने दीवाली विशेषांको को 1857 पर केंद्रित किया, जिसका संपादन प्रकाश चंद्रायन ने किया । इसमें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम का लेख बेहद दिलचस्प और जानकारीपूर्ण है । विनोद अनुपम ने फिल्मों में 1857 पर श्रमपूर्व लिखकर कई तथ्यों को सामने लाने का काम किया है । यहां भी पत्रिकाओं ने प्रकाशकों से बाजी मार ली । जिन पत्रिकाओं ने अपने अंक केंद्रित किए उनमें - समयांतर( संपादक - पंकज बिष्ठ), उदभावना ( संपादक -अजेय कुमार), नया पथ( संपादन- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी), वर्तमान साहित्य( संपादक- कुंबरपाल सिंह) । लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बिहार सरकार की पत्रिका- बिहार समाचार- ने भी अपना एक अंक 1857 पर केंद्रित किया । इस अंक में पीर अली की कहानी विलियम टेलर की जुबानी को देखकर अच्छा लगा । इसके अलावा इस अंक में श्रीकांत और प्रेम कुमार मणि के लेख भी महत्वपूर्ण हैं । उद्भभावना का अंक तो बाद में - 1857 निरंतरता और परिवर्तन- के नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित भी हुआ । पत्रिकाओं के अलावा अखबारों ने भी 1857 पर सीरीज छापी । लेकिन दिल्ली से प्रकाशित 'दैनिक हिंदुस्तान' ने तो गदर के 150 साल पर महीनों तक, हर सप्ताह एक पूरा पृष्ठ छापा । इन पन्नों पर 1857 से संबंधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेज तो छपे ही , जमकर विचार विमर्श भी हुआ। मुझे नहीं पता कि इसमें किसने पहल की लेकिन चाहे जिसने भी इसकी परिकल्पना की वो बधाई के पात्र हैं । 
सामयिक प्रकाशन दिल्ली से आदित्य अवस्थी की किताब - दिल्ली क्रांति के 150 वर्ष- प्रकाशित हुआ । आदित्य अवस्थी पेशे से पत्रकार हैं और अपनी इस शोधपरक किताब में उन्होंने दिल्ली को केंद्र में रखकर 1857 की क्रांति पर विचार किया है । उस दौर में दिल्ली के किन मुहल्लों में क्रांति की चिंगारी फूटी थी, का विस्तारपूर्वक वर्णन इसमें है । दिल्ली के लिहाज से ये किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यहां के बाशिदों को अपने शहर के गौरवशाली इतिहास की जानकारी उन्हें मिल सकती है वो भी डिटेल में । मधुकर उपाध्याय ने भी मराठी में प्रकाशित 'मांझा प्रवास' का हिंदी अनुवाद किया वो इस लिहाज से अहम है कि इसमें 1857 के विद्रोह को अंग्रेजी मानसिकता से इतर आम जनता की नजर से देखा गया है । 
राजकमल प्रकाशन से श्रीकांत और वसंत चौधरी की किताब -बिहार में 1857- प्रकाशित हुई । इसमे बिहार के प्रत्येक जिले में उस दौर में क्या हुआ था का सिलसिलेवार विवरण है । व्यापक शोध और श्रम इस किताब में सहज ही परिलक्षित की जा सकती है । इसके अलावा पेंग्विन हिंदी ने भी -गदर के 150 साल- का प्रकाशन किया । इसमें पीसी जोशी, हीरालाल बछोरिया के लेख महत्वपूर्ण हैं । इसके अलावा भी लगभग दर्जभर किताबें विश्व पुस्त मेले के दौरान देखने को मिली लेकिन उसमें शम्सुल इस्लाम के संपादन में वाणी से प्रकाशित किताब '1857 के दस्तावेज' अहम है । इसके अलावा अनामिका प्रकाशन से कर्मेंदु शिशिर की किताब- 1857 की राज्य क्रांति , विश्लेषण और विचार- भी प्रकाशित हुई । 
अगर मैं इस लेख में मध्यप्रदेश के पुरातत्व विभाग द्वारा प्रकाशित किताबों का जिक्र न करूं तो ये अधूरा रह जाएगा । पुरातत्व विभाग ने पंकज राग और गीता सबरवाल के संपादन में कई किताबें अंग्रेजी और हिंदी में छापीं । 'द फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस- डॉक्यूमेंट्स ऑफ जबलपुर एंड मांडला' तो अंग्रेजी में प्रकाशित की गई । इसके अलावा 1857 - प्रथम स्वतंत्रता संग्राम खंड 2 -हिंदी में है । इसमें उस दौर के बुंदेली अभिलेख तो हैं ही उसके जरिए क्रांति के सूत्रों को पकड़ने की कोशिश भी है । 1857 - प्रथम स्वतंत्रता संग्राम खंड-3 भी हिंदी में ही है । इसमें उर्दू और फारसी के अभिलेख हैं,इसका संपादन भी पंकज राग और गीता सबरवाल ने किया है लेकिन अनुवादक हैं हाशिम अल सादिक और मुमताज खान । इसके अलावा पंकज राग की किताब 'रेलिक्स ऑफ 1857'  भी अहम है । इसमें मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों - मंदसौर,नीमच, झाबुआ, सिहोर, भोपाल, विदिशा, बैतूल, सागर में मौजूद शिलालेखों में क्या लिखा है, इसको इकट्ठा कर विश्लेषित किया गया है । इन किताबों का जिक्र अलग से इसलिए किया कि ये सरकारी प्रयासों से छपी है।
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Friday, April 17, 2009

लेखकों के मरने का इंतजार करते लेखक संगठन !

पिछले कुछ वर्षों से लेखकों की सामाजिक भूमिका लगभग खत्म हो गई है । कहीं से भी ये लगता ही नहीं है कि लेखकों का समाज से कोई जुड़ाव भी है । किसी भी बड़े सामाजिक प्रश्न पर इनकी एकजुटता नजर नहीं आती है । वे छोटे-छोटे गुटों में बनाई अपनी ही दुनिया में संतुष्ट नजर आते हैं, जबकि साहित्य और संस्कृति के सामने संकट गहराता जा रहा है । लेखकों की सामाजिक सक्रियता को लेकर लेखक संगठों की स्थापना की गई थी । कहने को तो आज हिंदी में तीन लेखक संगठन हैं और ये तीनों अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध हैं । प्रगति लेखक संघ, सीपीआई से , जनवादी लेखक संघ, सीपीएम से और जन संस्कृति मंच, सीपीआई-एमएल से । लेकिन ये संगठन इन पार्टियों के पिछलग्गू ही साबित हो रहे हैं । जब सन 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी तो दो दशकों तक इसने सभी भारतीय भाषाओं में समान रूप से लेखकों को जोड़कर गंभीरता से काम किया लेकिन समय बीतने के साथ ये संगठन कमजोर होता गया और आज तो हालत ये है कि कुछ शहरों को छोड़ दें तो ये लगभग मृतप्राय है । यही हाल जलेस और जसम का भी है । अब तो ये तक पता नहीं चलता है कि इनके अध्यक्ष और सचिव कौन हैं । इन संगठनों का पता तब चलता है जब किसी लेखक की मृत्यु होती है । इसके बाद लेखक संगठन एक शोकसभा का आयोजन करते हैं और उसमें मर्सिया पढकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं । यह सही और दुखद है कि लेखक लोग या तो किसी शोकसभा में मिलते हैं या पुस्तक विमोचन के अवसर पर । मुद्दों को लेकर लेखकों ने आपस में मिलना बंद कर दिया है ।
दूसरी सबसे शर्मनाक बात ये है कि इन लेखक संगठनों को किसी लेखक के मरने के बाद ही ही उसकी महत्ता समझ में आती है । लेखक के जीवित रहते ये संगठन लेखकों की रचनाओं पर कुछ भी करने से कतराते रहते हैं लेकिन उनके मरते ही उसे महान तथा उसकी रचनाओं को बेहद अहम बताने लग जाते हैं । इससे लगता तो ये है कि ये लेखक संगठन लेखकों की मरने की प्रतीक्षा कर रहा होता है । पिछले दिनों हिंदी के कवि सुदीप बनर्जी का निधन हुआ और तामम संगठनों के बीच उन्हें महान साबित करने की होड़ लग गई लेकिन मुझे नहीं याद कि उनके जीवित रहते किसी भी संगठन ने कोई मग्तवपूर्ण कार्यक्रम सुदीप बनर्जी पर आयोजित किया ।
कई साल पहले हिंदी के एक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने एक बातचीत में कहा था कि लेखक संगठन लेखकों के यूनियन नहीं है जो कॉपीराइट आदि के मुद्दे पर संघर्ष करें । उनका मानना था कि ये वैचारिक संगठन हैं जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है । अगर मंगलेश की बातों को मान भी लिया जाए तो सवाल ये उठता है कि वैचारिक संवेदना के प्रचार के लिए भी लेखक संगठन क्या कर रहे हैं ?
आज जरूरत इन लेखक संगठों की भूमिका पर पुन्रविचार की है । इन संगठनों की निष्क्रियता के पीछे वामपंथी राजनीति की हिम्मतपरस्ती और अवसरवादिता की राजनीति है । लेखको के बीच भी पद और पुरस्तार पाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है । वैचारिकता पर अवसरवादिता हावी हो गई है । तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि किस संगठन से जुड़कर उन्हें लाभ हो सकता है और ये तय करते ही वो उन संगठनों से जुड़कर साहित्यिक मठाधीशों का आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है । सच तो ये है कि इन दिनों लेखक संगठनों से न तो कोई उर्जा प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही कोई वैचारिक दिशा ।
लेखक संगठनों का इतना बुरा हाल है कि वो अपने ही साथी लेखकों के हित के लिए कुछ बी नहीं कर पा रहा है । कॉपीराइट हिंदी में लेखकों के लिए आज एक बड़ा मु्दा है और तमाम लेखक इसके शिकायत हो रहे हैं । लगातार प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की बात सामने आती रहती है लेकिन आजतक लेखक संगठनों ने इस शोषण के खिलाफ कोई ठोस आवाज नहीं उठाई है, आंदोनल की बात तो दूर । इसके अलावा भी की मुद्दे हैं जिनपर लेखक संगठनों की खोमोशी चिंतनीय है ।
दरअसल अब प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, और जन संसकृति मंच को आपसी भेदभाव भुलाकर साथ आकर एक नया सांस्कृतिक और साझा मंच बनाना चाहिए और लेखकों की मर्सिया पढ़ना बंद कर उनके जीवित रहते उनको उनका देय दिलाने के लिए प्रयास करना चाहिए तभी साहित्या का भी भला होगा और साहित्यकारों का भी । अन्यथा लेखक संघ अपने ही साथियों के मरने का इंतजार करनेवाला संगठन बनकर रह जाएगा ।

Sunday, April 12, 2009

जूता, कांग्रेस और अपराध बोध

पत्रकार जरनैल के जूते ने जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार का टिकट कटवा दिया । इस बारे में अपनी राय रख रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू
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नेता और जूता। क्या नेताओं को जूते की भाषा में तौला जायेगा। जो जरनैल ने किया वो कतई अशोभनीय था। पत्रकार की पहचान जूता नहीं कलम है। जरनैल अपने इमोशन पर काबू नहीं ऱख पाये इस पर उन्होने खेद भी जताया। 

जरनैल का ये जूता चिदंबरम को भले न लगा हो मगर जनता भांप गयी जूता किस पर फेंका गया था। जूता चिदंबरम पर नहीं कांग्रेस की उस राजनीतिक सोच पर फेंका गया था जिसके तहत वो कुछ ऐसे लोगों को पाल पोस रही थी जिनपर 25 साल पहले दिल्ली में सिखों के खिलाफ दंगे भड़काने का आरोप लगा। 1984 के अक्टूबर नवंबर के उन चार दिनों में दिल्ली की सड़कों पर 3000 से ज्यादा लाशे बिछीं थीं। कत्लेआम का ऐसा घिनौना रूप की इसकी दर्दनाक कहानी जल्लाद बैतुल्ला महसूद भी सुने तो शर्मसार हो उठे।

सवाल ये उठता है कि चुनाव के ऐन वक्त सरकार के हाथ की कठपुतली कहे जानी वाली सीबीआई ने टाइटलर को क्लीन चिट क्यों दिया। आखिर कांग्रेस को टाइटलर को बचाने की क्या जरूरत आन पड़ी। मोदी की राजनीति को गरियाने वाली कांग्रेस, अपने आप को सेक्यूलरिज्म का चौकीदार बताने वाली कांग्रेस,  वरूण के जहरीले बयान पर गीता का पाठ पढ़ाने वाली कांग्रेस को आखिर जगदीश टाइटलर को टिकट देने की क्या जरूरत पड़ गयी थी। सीबीआई के क्लीन चिट देने से क्या सिखों के दिलो-दिमाग से वो तस्वीरें पोछी जा सकती हैं जो वो अपने जहन में आरकाइव कर चुके हैं। 

टाइटलर पर जब 2005 में दोबारा सिख विरोधी दंगो का मुकद्दमा खुला तो मनमोहन मंत्रिमंडल से उन्हे इस्तीफा देना पड़ा था। सीबीआई ने भले ही उन्हे क्लीन चिट दे दी हो मगर उनके खिलाफ दिल्ली की अदालत में आज भी मुकद्दमा चल रहा है। तो क्या इस देश में अब सीबीआई तय करेगी कौन अपराधी है और कौन निर्दोष। इसका मतलब जब सोनिया गांधी सीबीआई चलायेंगी तो वो तय करेंगी टाइटलर निर्दोष हैं और जब आडवाणी चलायेंगे तो वो कहेंगे माया कोडनानी निर्दोष हैं। लोकतंत्र का स्तंभ कहे जाने वाली ज्यूडिशियरी फिर क्या करेगी। दस जनपथ और 7 रेसकोर्स रोड में आने जाने वालों की प्रेस विज्ञप्ति जारी करेगी। 

कांग्रेस ने मनमोहन को प्रधानमंत्री बना कर किसी हद तक अपनी गिल्ट फीलिंग पर काबू पा लिया था। मनमोहन सिंह ने संसद में 1984  के सिख विरोधी दंगो को 'नेश्नल शेम' करार दिया था। मगर हाई कमांड सोनिया बस अफसोस जता कर रह गयीं। दिल में सज्जन कुमार और टाइटलर की फांस कहीं न कहीं उसे इस अपराध बोध से उबरने में रूकावटें भी डाल रही थी। तो एक को जब अदालत ने बरी कर दिया तो उसे टिकट थमा दिया तो दूसरे को खुद ही दोष मुक्त बता दिया। ताकि पार्टी के अपराध बोध को किरपाण के एक झटके में खत्म कर दिया जाये और कांग्रेस फिर से सीना तान के अपनी राजनीतिक रोटी सेंके।

लेकिन कांग्रेस का ये अपराध बोध विरासत में मिला है। कांग्रेस पर एक हिंदुवादी पार्टी होने का आरोप पार्टी के जन्म के समय से ही लगता रहा है। मुस्लिम लीग के जन्म की एक वजह कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व था। बाल गंगाधर तिलक हों या लाला लाजपत राय। तिलक मंदिर में आरती कराकर लोगों ( इसे हिंदुओं पढ़िये ) को अंग्रेजो के खिलाफ गोलबंद करते थें तो नेहरू 1939 के चुनाव में मुस्लिम लीग से सरकार में भागीदारी पर कन्नी काट लेते हैं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर बैन लगाते हैं और चीन युद्ध के बाद आरएसएस को गणतंत्र दिवस की परेड में शिरकत करने का न्योता देते हैं। नेहरू 1949 में अयोध्या में राम लला की मूर्ति स्थापित करवाते है और लगभग चालीस साल बाद उनके नाती राजीव  अयोध्या मंदिर के ताले खुलवाकर अपने हिंदुत्व का प्रमाण पेश करते हैं। पुरषोत्तम दास टंडन हों या इंदिरा गांधी। देश में कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में अनगिनत देंगे हों या असम में 1983 के अख्लियतों की हत्यायें। मेरठ हो या मुरादाबाद के दंगे। अयोध्या में मस्जिद गिराये जाते समय नरसिंह राव का नीरो की तर्ज पर सोते रहना भी सॉफ्ट हिंदुत्व की कैटिगरी में ही तो आयेगा। और फिर चाहे वो 1984 का दिल्ली हो या कानपुर। 

इंदिरा ने भिंदरनवाले को पाल पोस कर फ्रैन्किस्टीन न बनाया होता तो ऑप्रेशन ब्लू स्टार की नौबत न आती। भिंद्रनवाले ने पंजाब में मार काट मचाये रखी मगर केन्द्र की इंदिरा सरकार सोती रही। हिंदु कार्ड भी खेला और अकालियों को सबक सिखाने की अपनी जिद भी पूरी की। इंदिरा के लिये ये जानलेवा साबित हुया। हिंदु मुस्लिम रिश्तों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा।

और फिर जो राजीव नें तब बोला क्या वो सेक्यूलर  भाषा थी - जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांप उठती है। यानि जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और हरकिशन लाल भगत के खिलाफ सिखों के खिलाफ देंगा भड़काने के जो आरोप लगे, वो गलत थे ? देश में दर्जन भर कमीशनों ने 84 दंगों की तफ्तीश की क्या वो हवा में थी। चलो राजीव तो राजनीति में नये थे तो क्या उनकी सॉफ्ट हिंदुत्व की कांग्रेसी 'कोटरी'  ने उन्हे ये बयान जारी करने की मुगली घुट्टी पिलायी थी। अल्लाह जाने। 

लेकिन जरनैल के जूता कांड से पंजाब से लेकर दिल्ली और जम्मू तक सिखों के प्रदर्शन उग्र होने लगे। तब कांग्रेस को लगा शायद टाइटलर और सज्जन को टिकट देकर गल्ती हो गयी। इन राज्यो में करीब 20-25 सीटों पर सिख वोटर पार्टी की किस्मत तय कर सकते हैं। इसलिये कांग्रेस का अपराध बोध ने एक बार फिर उसका गिरेबान पकड़ कर कहा अब बच के कहां जाओगे बच्चू। इस अपराध बोध से बच निकलने का एक ही रास्ता दिखा। पब्लिक ने कहा ना तो ना। पब्लिक परसेप्शन के आगे झुकना पड़ा। क्योंकि सवाल तो है ज्यादा लाओगे तो ज्यादा पाओगे। गद्दी भी तो बचानी है। 

कांग्रेस के अपराध बोध का एक हाथ उसके गिरेबान पर था तो उसके दूसरे हाथ में जूता था। जरनैल वाला नहीं। ये जूता पब्लिक परसेप्शन का था। ये जूता बड़ा सेक्यूलर है। ये जूता जनता जनार्दन के कान्शेन्स का है। जो सिर्फ उसपर पड़ता है जो राजनीति के नाम पर समाज को बांटता है। 


Thursday, April 9, 2009

हिंदी साहित्य का राग 'कुलपति'

28 मार्च को दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा की तीन पत्रिकाओं का पुनर्जीवन समारोह हुआ । नए संपादकों के साथ तीन पुरानी पत्रिकाओं- बहुबचन (संपादक- राजेन्द्र कुमार), हिंदी ( संपादक- ममता कालिया) और पुस्तक वार्ता ( संपादक- भारत भारद्वाज) का विमोचन समारोह बेहद सफल रहा । त्रिवेणी सभागार श्रोताओं से खचाखच भरा था और लोग सीढियों पर बैठे थे और मंच पर हिंदी साहित्य की तीन विभूतियों- नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव और अशोक वाजपेयी के साथ श्रद्धेय कवि कुंवर नाराय़ण और कुलपति विभूति नारायण राय थे । लेकिन असली किस्सा तो समारोह शुरू होने के पहले और बाद का है । समारोह के पहले हर छोटे-बड़े साहित्यकार के बीच कुलपति महोदय के चरणों की धूल लेकर अपने को धन्य करने की होड़ सी मची थी । कुलपति के सामने हाजिरी बजाने की हड़बड़ी में एक वरिष्ठ कवि ये भी भूल गए कि आसपास भी लोग खड़े हैं । उन्होंने तो सरेआम अपने से उम्र में छोटे कुलपति के से कहा कि मुझ गरीब पर कृपा-दृष्टि बनाए रखिए । उनके बात करने का जो अंदाज था वो चापलूसी की सारी हदें तोड़ रहा था । याचक का ये अंदाज सिर्फ इन वरिष्ठ कवि का ही नहीं बल्कि वहां मौजूद कई साहित्यकारों का था जो कुलपति से आशीर्वाद लेने के लिए लाइन में खड़े थे । 
दरअसल कुलपति के इर्द गिर्द ये जमावड़ा सिर्फ उस दिन नहीं लगा था, ये हालत तो तब से हो गई है जबसे उन्होंने विश्वविद्यालय का कार्यभार संभाला है । लेकिन ये शर्मनाक स्थिति सतह के उपर जितनी दिखाई देती है, सतह के नीचे उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक है । हर छोटा बड़ा साहित्यकार विभूति नारायण राय के पीछे पड़ा है- कोई चाहता है कि विश्वविद्यालय उसे प्रमुख साहित्यकारों पर फिल्म बनाने का ठेका दे दे, किसी की ख्वाहिश है कि संचयिता के संपादन की जिम्मेदारी उसे सौंप दी जाए, कोई विश्वकोष का प्रस्ताव लिए दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, कोई चाह रहा है कि विश्वविद्यालय द्वारा खरीदी जानेवाली पत्रिकाओं में उसकी पत्रिका का भी नाम डाल दिया जाए,  हद तो ये हो गई कि विभूति नाराय़ण राय को कुलपति की दौड़ से बाहर करार देने वाला तथा अखबार में लेख लिखने के एवज में महिला लेखिकाओं से 'फेवर' मांगनेवाला एक पत्रकार मीडिया सेंटर में निदेशक बनने के लिए अपना बायोडाटा लिए गणेश परिक्रमा कर रहा था । और एक बेहद चतुर अधिकारी की तरह कुलपति हर किसी को विश्वविद्यालय मुख्यालय वर्धा आने का न्योता दे रहे थे । इस वजह से सबकी आकांक्षाएं हिलोरे ले रही थी । 
इस पूरे किस्से को बयां करने के पीछे हिंदी के साहित्याकारों की याचक मानसिकता को उजागर करना है । दरअसल आज हिंदी साहित्य की स्थिति इतनी शर्मनाक हो गई है कि जहां भी साहित्यकारों को कुछ लाभ दिखाई देता है वहीं वो हाथ फैलाए खड़े नजर आते हैं । सारे आदर्श और ज्ञान सिर्फ लेखन तक सिमटकर रह गए हैं । जब भी अपनी बारी आती है तो सारे आदर्श और सिद्धांत ताक पर रख दिए जाते हैं । एक जमाने में जब अशोक वाजपेय़ी इस विश्वविद्यालय के कुलपति बने तो एक वरिष्ठ आलोचक ने उन्हें समकाली कविता का प्रमुख हस्ताक्षर करार दे दिया जबकि यही आलोचक महोदय वाजपेयी को पतनोन्मुख परंपरा के सबसे सशक्त और खूबसूरत हस्ताक्षर बताते नहीं थकते थे । उन्हें कलावादी बताकर उनके लेखन को कारिज कर दिया करते थे । ये अलग बात है कि बाद में उन्हीं आलोचक को विश्विविद्यालय के संचयिता का संपादन मिला। ये हाल तो शीर्ष आलोचक का था तो बाकिय़ों की तो छोड़िए । 
मेरे कहने का आशय ये है कि हिंदी के लेखकों से जिस तरह की गरिमापूर्ण और गंभीर व्यवहार की अपेक्षा की जाती है वो उसके आसपास भी नहीं पहुंच पाते हैं । कुछ लेखकों को अगर छोड़ दें तो आप पाएंगें कि तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि कहीं से कुछ प्राप्त हो जाए । आप हिंदी के प्रकाशकों से बात करिए तो आपको ये पता चलेगा कि किताबों के विमोचन समारोह में आने के लिए भी वरिष्ठ साहित्यकार सौदा करते हैं, मार्ग व्यय से लेकर मानदेय तक की बात तय करते हैं । इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन ये सौदेबाजी टुच्चेपन की हद तक चली जाती है ।  
तो आज जिस तरह से हिंदी साहित्य में राग 'कुलपति' गूंज रहा है और हर कोई इस राग में डूबकर 'गीला' होना चाहता है तो दिमाग में यही गूंजता है - हाय रे ! हमारे मूर्धन्य, हाय रे ! हमारे नायक, हाय रे ! लेखकीय आदर्श 

Sunday, April 5, 2009

बिहार में नीतीश की ‘जय हो’

लगभग चार सालों के बाद कुछ दिनों पहले मुझे बिहार जाने का मौका मिला । जब ट्रेन गया रेलवे स्टेशन पर रुकी और मैं उतरा तो सबकुछ आशा के अनुरूप ही था । शोरगुल-भीडभाड़, धक्का-मुक्की । किसी तरह बाहर आया तो बेतरतीब ढंग से गाड़ियां खड़ी थी । किसी तरह पार्किंग से निकलकर अपने गंतव्य की तरफ बढ़ा तो रास्ते में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर दिखा, बेसाख्ता मुंह से निकला, बिहार में फ्लाईओवर । लेकिन लगभग हफ्ते भर गया में रहने के दौरान समाज के हर तबके से बातचीत करने के बाद ये लगा कि कुछ बदलाव तो है । बिहार के कई शहरों में हर ओर बेहतरी के लिए काम हो रहा है । मुझे विश्वास है कि अगर आनेवाले दिनों में राजनैतिक नेतृत्व में यही इच्छा शक्ति रही तो बिहार भी किसी अन्य विकसित राज्य से कम नहीं होगी । बिहार में रहने के दौरान दौरान मेरी बातचीत समाज के कई तबके के लोगों से हुई । सब लोग कमोबेश नीतीश सरकार से संतुष्ट नजर आए । अखबारों में अपराध की खबरें बिल्कुल ही कम नजर आई । बातचीत से ये लगा राज्य में बेहतर शिक्षा का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है ।
मैं चार साल के बाद अपने गृह राज्य गया था, जाहिर है कानून व्यवस्था को लेकर मेरे मन में उसी जमाने की स्थिति चल रही थी । खबरिया चैनल में काम करते हुए बिहार के बाहुबली विधायकों के कारनामे आते ही रहते थे । जाहिर है जब बिहार में विकास की हचलच और उच्च शिक्षा में सुधार महसूस किया तो स्वाभाविक रूप से बाहुबलियों के बारे में जानने की इच्छा हुई । बातों बातों में टाल क्षेत्र के एक बड़े जमींदार से इसकी चर्चा कर दी । उन्होंने जो कहानी बताया उसे सुनकर दिल को बड़ा ही सुकून मिला । पता ये चला कि नीतीश सरकार ने चुनचुनकर बाहुबलियों के इलाके में ऐसे अफसरों की तैनाती कर दी है, जिन्होंने बाहुबलियों पर नकेल कस दी है । इस बात का समाज पर मनोवैज्ञानिक असर हुआ और छुटभैये अपराधियों और अपराध पर खुद-ब-खुद लगाम लग जाती है । इस दौरान मेरी बात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के धुर विरोधियों से भी हुई । सबों से बात करके ये नतीजा निकला कि राज्य में कानून और व्यवस्था की हालात में सुधार हुआ है । ये नहीं है कि स्थिति बिल्कुल सुधर गई है । लेकिन अपहरण और दिन दहाड़े गाड़ी लूट या फिर शो रूम से गाड़ी उठा ले जाने जैसी घटना लगभग बंद हो गई है । छोटे मोटे अपराध तो अब भी हो रहे हैं लेकिन लोगों के मन में इस बात का विश्वास पैदा हुआ है कि अपराधी पकड़े भी जा सकते हैं । शासन में लोगों का विश्वास जमना लोकतंत्र की मजबूती की निशानी है और पिछले तीन वर्षों के शसान काल में नीतीश सरकार ने लोगों के मन में ये विश्वास तो पैदा कर ही दिया है । राष्ट्रकवि दिनकर ने भी संसकृति के चार अध्याय में लिखा है कि विद्रोह, क्रांति या बगावत ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले अनेक काल तक पकते रहते हैं । अगर दिनकर जी की बातों में हम बदलाव को भी जोड़ लें तो बिहार के संदर्भ में सटीक बैठेगी । किसी भी तरह के बदलाव के लिए वक्त और राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है । उसके बगैर न तो विकास हो सकता है और न ही बदलाव । मैं नीतीश कुमार की बहुत सी नीतियों का समर्थक नहीं हूं लेकिन ये देखना और सुनना अछ्छा लगता है कि मेरे राज्य का कोई मुख्यमंत्री कंप्यूटर और विदेशी निवेश की बात करता है . सन 1991 में भारत की इकॉनोमी में बदलाव शुरु हुए लेकिन बिहार में सिवाए दूरसंचार के किसी भी क्षेत्र में उस तरह से बदलाव महसूस नहीं किया जिस तरह से देश के अन्य राज्यों का विकास हुआ । बिहार में लगभग दो दशकों तक विकास की बात ही नहीं हुई । बात हुई तो भूरा बाल की, जातिवाद की, और नरसंहार और प्रतिनरसंहार की। नीतीश कुमार के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने न तो राज्य में कंप्यूटरीकरण और न ही विदेशी निवेश की बात की, प्रयास तो दूर की बात । आज जब हर राज्य में जमकर विदेशी निवेश हो रहा है तो बिहार में इसके लिए प्रयास शुरु हुए हैं । लगभग दो दशक पीछे चल रहा है बिहार । राज्य में किसी तरह का कोई निवेश नहीं हुआ तो इसके लिए सिर्फ शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व और उनकी सोच जिम्मेदार है । अगर बिहार में निवेशकों के लिए माहौल बनाया जाता और प्रयास किए जाते तो कोई वजह नहीं थी इस राज्य में निवेश नहीं होता । लेकिन अब राज्य में इस तरह की बातें भी होने लगी है तो जाहिर तौर पर काम भी शुरु हो गया है । जरूरत सिर्फ इस बात की है कि राजनैतिक इच्छा शक्ति बनी रहे और अभी नीतीश कुमार जिस तरह बिना किसी दबाव मे आए काम कर रहे हैं उसी तरह करते रहें, तो भूरा बाल साफ करने की बात करनेवाले लोग साफ हो जा सकते हैं । लोकसभा चुनाव में जनता विकास के दुश्मनों को करारा जवाब देने का मन बना चुकी है ।

Thursday, April 2, 2009

फ्रंट क्रांति लायेगा..।

थर्डफ्रंट पर हर ओर चर्चा हो रही है । क्या भूमिका होगी इस चुनाव में इस फ्रंट की, और क्या रहा है इसके नेताओं का ऐतिहासिक चरित्र -इसका आकलन कर हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू । प्रभात की भाषा से शुद्धतावादियों को आपत्ति हो सकती है लेकिन एक ही वाक्य में अंग्रेजी के कठिन शब्द के साथ बेहद भदेस शब्द का इस्तेमाल पाठकों को आनंद देगा- अनंत विजय
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सुना है फिर से थर्ड फ्रंट बन रहा। सुना है एक बार फिर भारतीय राजनीति को नई दिशा देने की कवायद चल रही। सुना है इलेक्शन फिर पास है। सुना है इस थर्ड फ्रंट में लेफ्ट भी है। सुना है ये थर्ड फ्रंट बड़ा सेक्यूलर होगा। सुना है ये थर्ड फ्रंट भारत की थर्ड वर्ल्ड दुनिया के दर्द को समझेगा। सुना है ये थर्ड फ्रंट देश को नया प्रधानमंत्री देगा। सुना है देश की राजनीति में फिर क्रांति आने वाली है।
तो क्या थर्ड फ्रंट के इन क्रांतिकारियों से आप मिलना चाहेंगे। आइये इधर आइये। थोड़ा नीचे नजर डालिये। देखिये तो भारतीय राजनीति के इस विशाल समंदर में थर्ड फ्रंट की नाव में कौन कौन सवार कहां पर कैसे कांटा डाल रहा।
ये हैं हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवेगौड़ा। एक्स पीएम। एक्स सीएम। एक्स प्रो सोनिया। एक्स प्रो बीजेपी। एक्स ऐन्टी लेफ्ट। मोजूदा एन्टी सोनिया। मौजूदा एन्टी बीजेपी। मौजूदा प्रो लेफ्ट। भावी पीएम इन मेकिंग। मौजूदा पीएम इन मेकिंग जैसे मायावती, जयललिता, चंद्रबाबू नायडू एटसेटरा सरीखी लश्कर के लीडर। मुंह से किसान, कर्म से डेवलपमेंट के दुश्मन। एक्स एन्टी डाइनेस्टी। मौजूदा बेटे के अंध भक्त। सत्ता की लोलुपता है पिता-पुत्र डुओ की पहचान। बीजेपी से बेटे ने टाइ-अप किया। पिता श्री सोनिया के भरोसे 1996 में प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन फिलहाल हठ ये कि कांग्रेस और बीजेपी दोनो से बराबर की दूरी। 16 मई बाद इनमें से किसी की सरकार बनती दिखी तो एक को बड़ा मैनेस बता कर दूसरे से सट लेंगे।
सीपीएम - इनके पब्लिसिटी मैनेजर ने पार्टी की पब्लिसिटी कम अपनी ज्यादा की। इसलिये आज राज्य सभा में हैं। इनकी पार्टी कहती कुछ है करती कुछ है। बंगाल में कुछ बोलती है, दिल्ली में कुछ। 86 साल के ज्योति बसु को बंगाल की सीएमशिप से विदा करती है, केरल के अछूतानंदन को 85 की उम्र में मुख्यमंत्री बनाती है। टाटा से हैंडशेक करती है। केन्द्र में एसईजेड का विरोध। मजलूम की राजनीति भी करते हैं। नंदीग्राम और सिंगूर में उनपर गोली भी चलाते हैं। इनके मुताबिक मोदी घोर कम्यूनल है। लेकिन बंगाल का मुस्लिम डेवलेप्मेंट इन्डेक्स अरसों से लुढ़का पड़ा है। अभी तक उठ नहीं पाया। सरकार बनवाते है। सरकार गिराते हैं। दूर बैठ के खेल का मजा लेते हैं। छोटे भाई सीपीआई को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में घुसा देते हैं। खुद हिस्टॉरिक ब्लंडर कर देते हैं। सामने सामने पाक साफ मगर बैकसीट ड्राइविंग के उस्ताद। अब मायावती को स्टीयरिंग थमा कर सत्ता का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखने के मंसूबे बांध रहे।

जयललिता - इनके पास कभी बाटा के स्टोर से ज्यादा सैंडिलस्स और जूतियों की दुकान थी। यानि एक कमरे में अम्मा की जूतियां ही सजी थी। अम्मा अपने मूड के हिसाब से सैंडिल्स पहनती हैं। जितना सोना भप्पी लहरी अपने सीने पर लाद के चलते हैं उतना सोना तो जयललिता ने अपने खानसामे की बीवी को गिफ्ट कर दिया था। जयललिता खुद मैकेनास गोल्ड की वो गुफा जहां के सोने की रखवाली एक तीसरी शक्ति करती है। वो तीसऱी शक्ति भी खुद जयललिता ही हैं। इस गोल्ड से ऊबी तो तमिलनाडू के रियल एस्टेट गोल्ड पर नजर जमाती हैं। एक बार तो यें जबरदस्त फंस गयीं। जया अम्मा को अदालत नें तांसी जमीन घोटाले में पांच साल की सजा सुना दी। चुनाव भी नहीं लड़ पायीं। कभी हां तो कभी न। आडवाणी जी ने अंग वस्त्रम पहनाया तो अम्मा ने वाजपेयी के लिये रिटर्न गिफ्ट में ये गाना ब्लूटूथ किया --- खींचे मुझे कोई डोर, तेरी ओर... लेकिन साल भर बाद वाजपेयी जी ये गाते हुये नजर आये - तुम्हारी नजर क्यों खफा हो गयी..खता बख्श दो गर खता हो गयी। इस बार आडवाणी नहीं कांग्रेस पर डोरे डाल रहीं। थर्ड फ्रंट में हैं भी और नहीं भी। 16 मई बाद थर्ड फ्रंट से जुड़ कर यूपीए की शिप में कूदने का जुगाड़ भी तलाश रहीं।
सुश्री मायावती - मैं बन की चिड़िया बन के बन बन डोलूं रे...मास्टर कांशीराम से इस स्टूडेंट ने यही सीखा सत्ता के लिये कुछ भी करेगा। मन किया तो मुलायम से सटे, मन किया तो उसे दुतकार दिया। मन किया तो कल्याण से संधि। मन किया तो बीजेपी मनुवादी। मन किया तो बहुजन। मन किया तो सर्वजन। मन किया तो क्रिमिनल का सफाया। मन किया तो क्रिमिनल को चुनावी टिकट। मन किया तो हाथी को कांग्रेसी बन में दौड़ा दिया। मन किया तो रायबरेली में कांग्रेसी बन को रौंद दिया।
मन किया तो मास्टर जी की याद में करोड़ो की मूर्ति तराश दी। मन किया तो सैंकड़ो करोड़ लगा कर अपनी मूर्ती और विशाल बनवा दी। मन किया तो 5 कालीदास मार्ग से ताजमहल के बीच करप्शन का एक्सप्रेसवे बनवा दिया। मन किया तो ब्लू। मन किया तो पिंक। अब बोल रहीं पीएम बनना है सो, गिव मी रैड।
चंद्रबाबू नायडू - लेफ्ट वालों की तरह ये विदेशी ब्रांड की सिग्रेट नहीं पीते। लेकिन लेफ्ट से अलग शहरों के विकास और चकाचौंध पर बड़ा जोर देते हैं। मॉल कल्चर में घोर विश्वास है। सीपीएम की तरह सरकार को बाहर से समर्थन देते हैं। सीपीएम की तरह स्पीकर अपना बनाते हैं मगर सरकार से डिस्टेंस बना कर रखते हैं। कहीं अख्लियत छिटक न जाये। सीपीएम बैकसीट में माहिर तो बाबू केन्द्र से फंड निकलवाने में। वाजपेयी की इंडिया शाइनिंग में बाबू के मॉल कल्चर का भी योगदान था। फिर पब्लिक ने बाबू के मॉल और वाजपेयी के एनडीए कल्चर दोनों पर शटर गिरवा दिया। मन किया तो एनडीए मन किया तो अकेले। और फिर मन किया तो थर्ड फ्रंट जिन्दाबाद। बाबू कहते हैं पीएम नहीं बनना। ये चुनाव से पहले। चुनाव के बाद - वी विल क्रॉस द ब्रिज वेन इट कम्स।
थर्ड फ्रंट की चुनावी नौका में या तो लोग प्रधानमंत्री रह चुके हैं या पीएम बनने की ऐम्बिशन पाल रहे। ठीक भी है। खुदा न खास्ता सरकार बनी भी तो हर एक शक्स रोटेशन से एक साल प्रधानमंत्री रह सकता है। जिनको प्रधानमंत्री नहीं बनना वो अपना अपना कस्बा लेकर खुश हैं। अलग राज्य मिलेगा तो मुख्यमंत्री बन ही जायेंगे। इस थर्ड फ्रंट में सभी के लिये कुछ न कुछ है। ये थर्ड फ्रंट सर्वजन है। ये थर्ड फ्रंट सेक्यूलर है। इस थर्ड फ्रंट में लेफ्ट है। इस थर्ड फ्रंट में बड़े बड़े क्रांतिकारी है। ये भारी भरकम थर्ड फ्रंट की नाव किस ओर जायेगी पता नहीं। मंजिल मिलेगी या नहीं पता नहीं। चुनावी थपेड़ों को साथ झेल पायेगी पता नहीं। चुनाव के बाद किनारा मिलेगा या नही पता नहीं। किनारा आते आते कहीं सवार बीच में ही कूद के दूसरी शिप पर सवार हो जायेगा, पता नहीं। मगर हिंदुस्तान की राजनीति में जब जब इलेक्शन आयेंगे, थर्ड फ्रंट की नाव दूर क्षितिज पर नजर आ ही जायेगी।

Wednesday, April 1, 2009

साहित्य को शर्मसार करते दो बुजुर्ग

राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी । हिंदी के दो शीर्षस्थ कथाकार । दोनों की प्रतिष्ठा इतनी कि पाठक तो क्या लेखक भी नतमस्तक । लेकिन पिछले लगभग एक दशक से दोनों ने कुछ भी उल्लेखनीय नहीं लिखा है । राजेन्द्र यादव ने हंस के संपादकीय के बहाने समकालीन समय में जरूर सार्थक हस्तक्षेप किया है, लेकिन साथ ही ये स्वीकार भी किया है कि – इधर शब्द संकट बहुत बढ़ गया है- जो लिख रहा हूं उसे लेकर दुहराव की कचोट अलग बनी रहती है......अब तो मुझे दो तीन ड्राप्ट करने पड़ते हैं, उन्हें संशोधित करना पड़ता है । इधर एक बैठक में चार पांच सौ से ज्यादा शब्द नहीं लिख पाता- वह भी सुबह पांच-छह बजे के एकांत में ( हंस फरवरी का संपादकीय) । वर्षों बाद मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा लिखी लेकिन उस आत्मकथा में भी साहस और ईमानदारी का आभाव आलोचकों को दिखा । मन्नू जी अपनी आत्मकथा में भी राजेन्द्र यादव से ऑबसेस्ड दिखी । ये कहने का मेरा मतलब दोनों की साहित्यिक लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगाना नहीं है और ना ही इनकी महानता पर सवाल खड़ा करना ।
लेकिन हाल के दिनों में इन दोनों बुजुर्ग लेखकों ने अपनी शादी को लेकर जो कहा लिखा है उससे मन में ये सवाल उठने लगा है कि क्या हिंदी के इन दो प्रतिष्ठित लेखकों के पास लिखने के लिए अब कुछ नहीं रह गया है ।
हिंदी पत्रिका कथादेश के मार्च अंक में मन्नू भंडारी ने एक लंबा लेख लिखा है – सच को स्वीकार करने का साहस हो तभी साक्षात्कार दें । इस पूरे लेख में मननू जी ने ये साबित करने की कोशिश की है कि कथादेश के जनवरी अंक में राजेन्द्र यादव ने जो साक्षात्कार दिया उसमें दोनों की शादी को लेकर यादव जी ने गलत कहा और अब मन्नू भंडारी उसे ठीक कर रही हैं । एक आम हिंदी पाठक को इस बात से क्या लेना देना कि दोनों की शादी किन परिस्थितियों में हुई, क्यों हुई, किसने पहल की आदि आदि । मन्नू भंडारी, राजेन्द्र यादव से सच कहने की अपेक्षा करती हैं लेकिन मन्नू भंडारी में भी तो ये साहस नहीं है कि वो ये बता सकें कि मीता का असली नाम क्या था। इन दोनों के संबंधों में मीता तो वैसी ही हो गई है जैसी कि हिंदी साहित्य में स्नोबा बार्नो, जिसके बारे में सुना तो खूब जा रहा है लेकिन देखा किसी ने भी नहीं । साथ ही मन्नू ने किन परिस्थितियों में और किसकी वजह से राजेन्द्र यादव को घर से निकाला, ये बताने का साहस मन्नू भंडारी आजतक क्यों नहीं कर पाई ? बेहद चतुराई से इस, बात का उन्होंने अपनी आत्मकथा में उल्लेख नहीं किया और बचकर निकल गई । तो अगर खुद सच कहने और लिखने का साहस न हो तो दूसरों से ये अपेक्षा करना बेमानी है ।
रही बात राजेन्द्र यादव की तो वो तो पिछले दो दशकों से विवादों को जानबूझकर न्योता देते आ रहे हैं । लेकिन पहले राजेन्द्र यादव की रुचि साहित्यिक विवाद में हुआ करती थी जो हाल के दिनों में व्यक्तिगत विवादों तक पहुंच गी है । प्रचार पाने के लिए इस तरह से अपने संबंधों को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना देना हिंदी के पाठकों के साथ छल है । लेकिन जिस तरह से हाल के दिनों में गंभीर छवि वाली मन्नू भंडारी विवाद वीर हो गई हैं, वाकई वो चौंकानेवाला है । आज हिंदी का पाठक ये जानना चाहता है कि राजेन्द्र यादव या मन्नू भंडारी ने नया क्या लिखा है । ये जानने में उसकी कोई रुचि नहीं है कि दोनों की शादी में क्या हुआ था । दोनों के व्यक्तिगत झगड़ों को छापने के लिए संपादक भी कम जिम्मेदार नहीं है । एक संपादक में इतना साहस तो होना ही चाहिए कि वो ये कह सके कि राजेन्द्र जी या मन्नू जी आपके इस व्यक्तिगत झगड़े को हम अपनी अपनी पत्रिका में जगह नहीं दे सकते । लेकिन कथादेश संपादक से ये अपेक्षा बेमानी है । इन व्यक्तिगत विवादवीर बुजुर्ग लेखकों की वजह से आज हिंदी साहित्या शर्मसार है । शर्मसार हम भी हैं क्योंकि ये हमारे सबसे प्रतिष्ठित लेखकों में से एक हैं । गुजारिश ये कि बंद करो ये आपसी झगड़े और विशाल हिंदी पाठक समुदाय के बीच जो आपकी छवि और प्रतिष्ठा है उसको नेस्तानाबूद न करें ।
अनंत विजय
( ये एक बड़ा प्रश्न है, अगर बहस शुरु हो सके तो साहित्य का भला होगा )

Sunday, March 29, 2009

नन की आत्मकथा से उठा बवंडर

हाल के दिनों में हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है और देह मुक्ति के नाम पर श्रद्धेय के प्रति समर्पण का जो रूप सतह के नीचे दिखाई देता है उसे विमर्श के अलावा कोई और नाम दिया जा सकता है । आप चाहें तो व्यभिचार का विमर्श कह सकते हैं । ये व्यभिचार सिर्फ विमर्श के नाम पर नहीं हो रहा है । धर्म, आस्था, विश्वास, कर्म के नाम पर भी ये खेल खेला जा रहा है । चाहे वो बाल विधवा आश्रम हो या वो नारी निकेतन हो या जैन आश्रम हो या फिर चर्च या इससे जुड़ी संस्थाएं, हर जगह पर धर्म के आवरण में चकलाघर चलता है । हर जगह नारी मुक्ति के नाम पर, धर्म की आड़ लेकर यौन शोषण की खबरें बाहर निकलती रहती हैं । तमाम कानूनी बंदिशों के बावजूद दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है, जहां लड़कियों को मंदिर को समर्पित कर दिया जाता है, जहां भगवान के नाम पर उन लड़कियों का जमकर यौन शोषण किया जाता है । देश के कई इलाकों में आजादी के बाद वर्षों तक यह परंपरा रही कि जब लड़की का विवाह होता था तो उसे पहली रात विवाह करवाने वाले पंडित के साथ गुजारना होता था । पूजनीय पंडित जी धर्म और भगवान के नाम पर पहले उस कुंवारी कन्या को 'शुद्ध' कर आशीर्वाद देते थे । हद तो तब हो जाती थी जब एक पंडित एक साथ कई लड़कियों की शादी करवाता था, तो वह अलग अलग लड़कियों की शुद्धिकरण के लिए अपने कुनबे को इकट्ठा करता था और धर्म के नाम पर सब लोग मिलकर लड़कियों के अस्मत से खेलते थे ।
ऐसा नहीं है कि ये सब कुरीतियां सिर्फ हिंदू धर्म में ही मौजूद हैं । कुछ दिनों पहले कोलकाता की लेखिका मधु कांकरिया के उपन्यास- सेज पर संस्कृत- में जैन धर्म में संस्था और आस्था के नाम पर महलाओं के शोषण को साहसपूर्वक सामने लाया गया है । और अब मलयालम में प्रकाशित सिस्टर जेसमी की आत्मकथा ने चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं की पोल पट्टी खोलकर रख दी है । मलयाली भाषा में प्रकाशित इस उपन्यास के दो महीनों में ही तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और अब ये आत्मकथा हिंदी समेत कई भाषाओं में प्रकाशित होने की प्रक्रिया में है । लगभग पैंतीस साल कांग्रेगेशन में गुजारने के बाद सिस्टर जेसमी 2007 में वहां से बाहर निकलती है, गौरतलब है कि इन पैंतीस सालों में जेसमी ने 26 साल बतौर नन गुजारे । इस आत्मकथा के प्रकाशन के बाद कैथोलिक चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं में हड़कंप है ।
दरअसल ये आत्मकथा एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एक ऐसे परिवार से आती है जहां बेटी की स्कूल फीस भरने के लिए उसकी मां को जबरदस्त संघर्ष करना पड़ता है । ये वो दौर होता है जब जेसमी बारहवीं की छात्रा थी । उस वक्त त्रिसूर के बिशप जोसेफ कुंडुकुलम, जेसमी की सहायता के लिए आगे आते हैं । जब भी फीस के लिए के लिए जेसमी को पैसे की जरूरत होती है तो वह बिशप हाउस जाती है । सेंट थॉमस कॉलेज के पास की तंग गलियों से बिशप हाउस तक जाने का भी बेहद दिलचस्प वर्णन है । किस तरह से कॉलेज के लड़के उसपर कागज की हवाई जहाज रूपी मिसाइल फेंका करते थे और किस तरह से चर्च के प्रीस्ट उसको खा जानेवाली नजरों से घूरा करते थे । इन घबराहट के बीच वो बिशप से पैसे तो ले लेती थी लेकिन बगैर धन्यवाद दिए भाग आती थी । तमाम घटनाओं के बीच जेसमी परिवार को सन्न कर देनेवाला फैसला लेती है और बारहवीं की परीक्षा के बाद यीशू को खुद को समर्पित कर देती है ।
लेकिन ईसा मसीह को समर्पित होने के बाद जब वो कंफेशन के लिए जाती है तो उसको अपने चारों ओर एक रहस्यमय चुप्पी नजर आती है । आसपास चल रही खुसफुसाहट को जब वो ध्यान से सुनती है तो उसके होश फाख्ता हो जाते हैं । उसकी साथी कुसुमम और मारिया ने बताया कि जो भी लड़की कंफेशन के वक्त अंदर कमरे में जाती है उसको वहां मौजूद प्रीस्ट किस करता है । जब जेसमी कंफेशन के लिए जाती है तो फादर उससे भी किस करने की इजाजत मांगता है, जिससे जेसफी साफ इंकार कर देती है। दूसरी बार जब उसे दबाव डालकर उसी प्रीस्ट के पास भेजा जाता है तो अंदर जाकर जेसमी फादर को आगाह करती है कंफेशन रूम में किस करने को लेकर कांग्रेगेशन की लड़कियों में बहुत रोष है । लेकिन डर से विरोध नहीं कर पा रही हैं । फादर का उत्तर बेहद दिलचस्प ही नहीं हैरान करनेवाला भी है - मैंने हर किसी से किस करने की इजाजत ली है और जिसने मना किया है उसको मैंने किस नहीं किया । और ये सब तो जीजस और बाइबिल की आत्मा के अनुरूप है ।" लेकिन इस घटना से फादर बेहद विचलित हो जाते हैं और एडोरेशन-कम हीलिंग सेशन को जल्द से खत्म करने का हुक्म सुना देते हैं वो भी एक हल्के से बहाने से । इस सेशन के बाद फादर के हुक्म से जेसमी को उनके कमरे में भेजा जाता है । वहां फादर बाइबिल के पन्ने खोलकर होली किस के कोट्स पढ़कर सुनाते हैं । आप भी एक देखिए - सेंट पॉल ने कहा कि - एक दूसरे का अभिवादन पवित्र चुंबन से करें । पीटर कहते हैं - एक दूसरो को प्यार के चुंबन से विश करो, आदि आदि ।
चर्च के शुरआती दिनों में जेसमी को सिर्फ फादर के किस का ही सामना नहीं करना पड़ता है, उसका वास्ता मलयालम पढानेवाली टीचर से भी पड़ता है, जो समलैंगिक है । उसने जैसे ही जेसमी को देखा उसका दिल बल्लियों उछलने लगा और हालात पहली नजर में प्यार वाला पैदा हो गया । विम्मी ने जेसमी को लंबे-लंबे प्रेम पत्र लिखकर अपने प्यार का इजहार किया । हैरान और परेशान जेसमी को तब तो करंट सा झटका लगा जब एक पत्र में विम्मी ने उसके साथ समलैंगिक रिश्ते बनाने की बात का इजहार किया । जब विम्मी को जेसफी की तरफ से सकारात्मक जबाव नहीं मिलता है तो वह जेसमी के खिलाफ षड़यंत्र रचने में जुट जाती है । जेसमी पर जब चौतरफा दबाव बढ़ा तो उसने विम्मी के आगे समर्पण कर दिया । रात में विम्मी उसके बिस्तर में घुस आती थी और उसके साथ लेस्बियन रिश्ता कायम करती थी । जब वो ये संबंध बना रही होती तो हमेशा जोसमी के कान में कहती गर्भ के झंझट से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका यही संबंध है ।
जोसमी लंबे समय तक इस संबंध को झेलती रहती है लेकिन जब इंतहां होने लगती है तो वो मदर प्रोवेंशियल से दया की भीख मांगती है और किसी तरह वहां से अपना तबादला करवा लेती है । जब उसका ट्रांसफर ऑर्डर आता है तो विम्मी उसे बुरी तरह से धमकाती और प्रताड़ित करती है और कहती है कि वो उसे चैन से रहने नहीं रहने देगी । जो कालांतर में सच भी साबित होती है ।
नन के लिए सबसे बड़ी सजा ये होती है कि उसे कोई काम नहीं दिया जाए । तबादले के बाद ये खेल जोसफी के साथ शुरु होता है, पहले उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है और फिर उसे मानसिक तौर पर बीमार साबित करने के लिए तमाम दंद-फंद रचे जाते हैं । मदर प्रोवेंशियल क्लोडिया उसे पागल करार देना चाहती है । ये तमाम षडयंत्र चीख-चीखकर इस बात की गवाही देते हैं कि किस तरह से ननरी में कुछ लोग मिलकर एक सिंडिकेट की तरह ऑपरेट करते हैं और यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठानेवाले को पागल करार देकर नर्क में धकेल देते हैं ।
इस आत्मकथा में जीसस और बाइबिल के नाम पर दैहिक शोषण और फादर और नन के बीच अवैध देह संबंध बनाने की कोशिशों का भी पर्दाफाश किया गया है । सिस्टर जेसमी की शीघ्र प्रकाश्य इस आत्मकथा ने कैथोलिक समुदाय के बीच एक सन्नाटे जैसी स्थिति पैदा दी है और चर्च को इसपर आधिकारिक प्रतिक्रिया देते नहीं बन रहा । शायद बाइबिल से कोई उद्धरण खोजा जा रहा होगा ताकि उसके आधार पर सिस्टर को माफ किया जा सके । वैसे क्रिश्चियनिटी में कई बिडंबनाएं हैं और सबसे बड़ी बिडंबना तो ये है कि अगर कोई कुंवारी लड़की मां बनती है और बच्चा पैदा करती है और उसके बाद शादी करना चाहती है तो उसकी शादी चर्च में नहीं हो सकती । यहां ये बताते चलें कि ईसा मसीह का जन्म मेरी नाम की कुंवारी कन्या से हुआ था ।
इन सबसे इतर अगर हम इस आत्मकथा को हिंदी में प्रकाशित और चर्चित आत्मकथाओं के बरक्स रखकर देखें तो एक बुनियादी फर्क नजर आता है । इसमें जो सेक्स प्रसंग है वो कथा के साथ सहजता से आते हैं और वास्तविकता का एहसास कराते हैं जबकि हिंदी की आत्मकताओं में जबरदस्ती ठूंसे गए प्रतीत होते हैं ।
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समीक्ष्य पुस्तक- अमीन, द स्टोरी ऑफ ए नन
लेखिका- सिस्टर dजेसमी

Tuesday, March 24, 2009

BORN TO WIN- AN INTERVIEW WITH DR SHYAMA CHONA

It was one chilly morning of 1991 of London when the late Princess of Great Britain, Lady Diana received a letter from India. More than a letter it was an invitation, very unique, from the children of special school ‘Tamanna’ with the thumbnail signatures of its special students. The late Princess was impressed by the very self-effacing style of invitation and she accepted it at the first instance. This visit of Lady Diana on February 12, 1992 albeit without any diplomatic initiatives hogged the maximum headlines in the newspapers. People came to know about ‘Tamanna’ and its founder Dr Shyama Chona with a different dimension to her academician profile. By this time Dr Shyama Chona had already earned herself a place in the glitterati of the national capital as the high profile Principal of DPS School. But she was not happy just being a Principal, academician and celebrity. She had the horizon of social service in the shape of spreading awareness in people for the cause of disabled children waiting with open arms for her.
She listened to her inner voice and answered the call of her undying spirit of social service. She went on to became the recipient of the highest national awards, the Padma Shri and Padma Bhushan, along with more than 55 other awards to her name. Her will and determination of doing something for the society still remains the same even after 40 years of her dedicated services. She is daughter of a bureaucrat and wife of a retired army officer (Major General).
As I entered her office at DPS RK Puram the sight of more than 35 honours on the wall was enticing. ‘Wow, this is greatness personified,’ were the words that instantly danced on my lips. There are very few persons who can boost of achieving what they desire. A twinkle in the eyes and the spirit of ‘miles to go before I sleep….’ defines her indomitable spirit.
Excerpts from a talk to her by preeti Prakash:
Q 1. At this juncture of a highly successful life what do you attribute to your childhood.
The peace in my mind, the strength of conviction, compassion for all, to be the best, sharing are all attributes of childhood that I cherish. I was a product of a happy childhood. My father being the financial Controller of Govt of India I grew up in Lodi Estate. With around 12 servant quarters I would go and play with their children, take food for them. I always had a soft corner for them in my heart. We had a tonga whose horse, I would talk to. I was always the brilliant one and topped studies. I was the youngest of the 5 children. I had a phenomenal memory. My homework copy was always stolen before my exams but I still got the best marks. I would say though we were not children of abundance but we were taught to use, finish and get more instead of get more and discard. My mother would always feed the cow and dog first before her children.My schooling was from Sophia Ajmer and MGD Jaipur where I learnt to swim, dance, walk, talk, dress all in style. I did my graduation from Maharani’s college Jaipur. When I topped my graduation I was immediately offered lecturership in MGD. I was President of University Students Council. I was the first Femina correspondent for Rajasthan. In 1965 war I worked for soldiers & their families.With all the achievements at that point of time I had never known who I am. I felt I wanted to do more and better. This desire and undying urge to work for humanity inspite of the composure within has surely gone a long way in moulding my personality.
Q 2. Biggest Challenges faced in life.
The biggest challenge in my life was my daughter Tamanna. Till she was nine she could not walk, talk and even swallow. She was like a doll given to me by god in the shape a half finished job, for me to finish the rest. It was an internal and external fight with my ownself. It was first a denial, then sorrow combined with anger. But there was a feeling of positive contribution. I desperately tried everything possible to see her behave like other children. This made me go to all kinds of saints and babas later to realise that nothing worked. I took her to America for treatment, tried all therapies and doctors. When in need you are ready to do anything. My tools were hope, inner strength and support from my family. I was reading and writing and teaching at that time too. My son was an equal partner with me in the days of struggle when my husband would go for exercises (he was in the army). It was sorrow combined with hope. She could not speak and I longed to hear ‘mumma’ from her. I knew that the language was in her mind and I waited for the day. She is now standing on her own, independent and can read and do her chores herself.
Q 3. With more than 55 awards and 96 nominations, one honour after another, year after year, were you lucky or was it love of labour.
I have always been a hard working person and enjoyed my work thoroughly. Whatever task I had in hand I did it with honesty and earnestly. That gave me immense satisfaction. It also gave me strength to work for greater benefit of society. With all the hardships, the challenge that I felt were like forts to be conquered. I don’t know where luck was but hope never died because of which I am what I am.
Q 4. What is Tamanna project. Other projects you are working on.
Three decades ago life stood still when I had my daughter Tamanna. When I needed to put her in school, there was no place to take her. The whole problem of disability should be looked at the other way. We expect everyone to be like us and have no patience if they aren't. They just need our shoulders and our hand, Tamana is a registered voluntary and non-profit making Society, working since 1984 for the upliftment of multiple-handicapped children. As its Founder Member, I have established 3 of its branches in the prime locality of Vasant Vihar, in South Delhi, namely : Tamana Special School, Nai Disha and the School of Hope, which educate approximately 500 mentally-challenged and autistic children. 40 per cent of the handicapped children in these institutions are from poor families. I also provide, from my own salary as the Principal of DPS R.K. Puram, for their education and maintenance. My main concern today, is to streamline the handicapped with the normal children, by providing them with special education, physiotherapy and occupational therapy. For the first time in the history of special education, the Tamana Special School is providing integrated facilities for the disabled. The ‘School of Hope’ is also the only institution which is educating autistic children, a symptom the detection of which is as difficult as its rehabilitation. Autism is a mental disability affecting one in every 10,000 children. I have taken the first step in setting up a school for slum children, This is called ‘DPS ANUBHAV SHIKSHA KENDRA and has become a role model for other schools to emulate. The school, with 1500 students on its roles. I am also running a free school in Ekta Basti, R.K. Puram for the poor, providing free educational services to children of the weaker sections of society, and I’m also training the mothers to cope with family situations. This school is run under the aegis of UNESCO and UNICEF. I have also been a regular columnist with the Hindustan Times and the 4th D Magazine, and have been writing on various issues concerning parenting. These appear in a weekly column entitled ‘Nurture Talk’. Some of these articles have been compiled and a book has been published bearing the same name.
Q 5. But for your daughter Tamanna, would you have taken up this project with equal zeal.
I always had the zeal to work for the weaker sections of society and disabled children. As I said earlier life was much larger than we realized. One should think beyond oneself. The number of underprivileged in society are more than the privileged. I believe in the verdict “There is a destiny that makes us brothers, none goes his way alone. All that we send into the lives of others, comes back into our own.” The satisfaction derived after helping out the needy is much greater than anything desirable. She was surely the motivation and a light that took me to that higher goal.
Q 6. With your vast global experience how do you rate schools in India.
School education is India surely need lot of changes. There is no elasticity in school education which means that we have a system in which a child is either pass or fail. It is totally exam oriented. There is no value of social sciences. More practical changes are awaiting our education system. Stress should be laid on emphasizing vocational education aiming at employment opportunities. Today American and Japanese schools have 40% dropouts. In India every school policy differs. There is a great difference in government and private schools. Value education is missing. It's not a school's function to equip one to find jobs, points out the principal, and faith-based schools have no role to play in our education system. The most important thing for children is to accept discipline.
Q 7. Gap between past & present generation.
These days due to high degree of professionalism and materialism parents are not acting responsible. Young parents themselves seem confused. Consequently respect for parents is decreasing. We are planning to open a school for parents to provide them training. Then there is the influence of media on children, giving rise to frustration and competition. Children are not positively occupied. Children should be brought up under some rules and limits. Children now a days need time and space. However, spanking is not a part of the parenting process.
Q 8. What is the philosophy of your life.
My best moment of life is this moment. The now is important and most mindful. A book named, ‘I am ok, you are ok,’ says that life is a replay of childhood- the book is close to my heart and my inspirer too.
Q 9. What plans do you have for future.
Apart from Anubhav School I also am working on a school for parents named ‘Love and Logic school for Parents.’ But it is miles to go before I sleep, miles to go before I sleep. One birth is not enough to do what I want to do. There is lots that is to be done in social sector, education, disability.
Q 10. Message to children.
Respect elders. Be polite, work hard, discover yourself, any conflict with parents sort them out through communication. You are never alone in this world.

Tuesday, March 3, 2009

पचासी साल की जवानी

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने अपने एक प्रसिद्ध लेख में लेख में आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन लेकिन कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । लेकिन हमारे लेख का ये विषय नहीं है । हम तो भारतीय फिल्मों के सदबहार हीरो और बीते छब्बीस सितंबर को अपने जीवन का चौरासी बसंत देख चुके देवानंद की आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ - एन ऑटोबायोग्राफी’ के बहाने देवानंद की रूमानी छवि और उनकी फिल्मी जिंदगी को खंगालने की कोशिश कर रहे हैं । अपनी इस आत्मकथा में देवानंद साहब ने अपनी निजी जिंदगी और भारतीय फिल्म जगत के कई राज खोले हैं । देवानंद की छवि एक जबरदस्त रोमांटिक हीरो की रही है । अविभाजित भारत के गुरुदासपुर में जन्मे देवानंद ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी (आनर्स) करने के बाद लंदन जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने की सोची थी । लेकिन पिता की मुफलिसी की वजह से ये संभव नहीं हो सका । परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर जब देवानंद ने रॉयल इंडियन नेवी में शामिल होने की कोशिश की तो वहां भी असफलता ही हाथ लगी । देवानंद के पिता की इच्छा थी की वो बैंक में क्लर्क की नौकरी कर ले लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और देवानंद फ्रंटियर मेल से बंबई आ गए । फिर शुरु हुआ संघर्ष- यहां भी बनना चाहते थे गायक लेकिन बन गए अभिनेता । इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है और फिर देवानंद ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा । 
देवानंद की पहली फिल्म थी - हम एक हैं - इस फिल्म के रिलीज होते ही देवानंद के अभिय की न केवल नोटिस ली गई बल्कि जमकर तारीफ भी हुई । इसके बाद तो देवानंद, उस दौर के दो सबसे सफल हीरो, दिलीप कुमार और राजकपूर के साथ फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बन गए और उस दौर की तमाम चोटी की अभिनेत्रियों के साथ फिलमों में तो काम किया ही, रोमांस भी कम नहीं किया । देवानंद और सुरैया के बीच के रोमांस और प्रेम की खूब चर्चा हुई और अब अपनी आत्मकथा – रोमांसिंग विद लाइफ - में देवानंद ने अपनी इस प्रेम कहानी का विस्तार से वर्णन किया है । देवानंद लिखते हैं - "हम दोस्त से गहरे दोस्त और फिर प्रेमी प्रेमिका बन गए, हमारी प्रेम कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था । एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब मैं और सुरैया फोन पर बात नहीं करते थे, मुझे सुरैया से प्यार हो गया था लेकिन उस वक्त सुरैया के परिवार में उसकी दादी का जबरदस्त प्रभाव था और उनकी मर्जी के बिना उस परिवार में पत्ता तक नहीं हिलता था । मुझे लगने लगा कि हमारी इस प्रेम कहानी में सुरैया की दादी बाधा बन रही थी ।मेरा सुरैया के घर में अब पहले जैसा स्वागत नहीं होता था । लेकिन प्यार की तड़प बढ़ती ही जा रही थी । मैं सुरैया के लिए बेचैन होने लगा था । लेकिन उसके परिवार ने हमारे प्यार पर बंदिशें लगा थी मिलने जुलने पर रोक था । एक दिन हम चुपके से एक पानी टंकी के पास मिले और सुरैया ने मुझसे लिपटकर कहा - आई लव यू, आइ लव यू । इसके बाद मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे । मैंने जवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक मंहगी अंगूठी खरीदी और उसे भिजवा दिया । मैं सातवें आसमान पर था लेकिन अपने परिवार के दवाब में सुरैया ने मेरी दी हुई अंगूठी समंदर में फेंक दी ।" देवानंद साहब ने इस प्रेम कहानी को बहुत ही बेहतरीन अंदाज में अपनी आत्मकथा में कलमबद्ध किया है । इस पूरी किताब से देवानंद की पर्दे पर की जो एक बेहद रूमानी छवि थी वो और भी पुष्ट होती है, प्रामाणिक भी, क्योंकि खुद देव साहब ने अपनी जुबानी अपनी कई प्रेम कहानी और आशिकी को दुनिया के सामने पेश किया है । सुरैया के अलावा देवानंद ने अपने स्कूली दिनों की प्रेमिका से लेकर अबतक की अपनी नायिकाओं और प्रेमिकाओं के बारे में खुलकर लिखा है । चाहे वे टैक्सी ड्राइवर फिल्म की नायिका मोना जो बाद में देवसाहब की पत्नी भी बनी या फिर मुमताज हो या फिर जीनत अमान हो या टीना मुनीम । संजय दत्त की पत्नी ऋचा को फिल्मों में लाने का श्रेय भी देवानंद को ही है । जीनत अमान पर लिखते हुए देव साहब ने इमानदारी से स्वीकार किया है कि जब भी राज कपूर जीनत अमान से लिपटते चिपटते थे तो उनको जलन होती थी । देवानंद को लगता था कि जीनत अमान उनकी खोज है, उनकी नायिका है इसलिए सिर्फ उनकी अमानत है लेकिन जब एक पार्टी में राजकपूर ने जीनत अमान को जब अपने आलिंगन में लिया तो जीनत की जो प्रतिक्रिया थी, उसे देखकर देवानंद का दिल चकनाचूर हो गया ।
देवानंद जब एक नायक के रूप में फिल्मों में कामयाब हो गए तो नवकेतन नाम से अपना बैनर बनाकर फिल्म निर्माण में उतरे और कई नई प्रतिभाओं, टीना मुनीम, तब्बू से फिल्मी दुनिया का साक्षात्कार कराया । फिल्म निर्माण के बाद देवानंद फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे और फिल्म प्रेम पुजारी का निर्देशन किया । देवानंद की फिल्म गाइड, काला पानी, हरे रामा हरे कृष्णा, काला बाजार, जब प्यार किसी से होता है जैसी फिल्में हिंदी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर है ।कुछ लोगों का कहना है कि देवानंद ने बाद के दिनों में अपनी फिल्मों में काफी प्रयोग किए और अपने समय से आगे की फिल्में बनाई । बॉक्स ऑफिस पर भले ही बाद में देवानंद की कई फिल्मों को उतनी सफलता नहीं मिली जितनी पहले मिला करती थी लेकिन देवानंद ने अपने स्टाइल के साथ कोई समझौता नहीं किया ।
देवानंद के जमाने में लड़कियां उनपर जान छिड़कती थी । युवाओं में उनके स्टाइल से सिगरेट के कश लेना, गले में मफलर डालना, शर्ट के बड़े –बड़े कॉलर स्कार्फ आदि का जबरदस्त क्रेज था । देव आनंद की जो डॉयलॉग डिलीवरी थी, उनका जो अंदाज था वो अनूठा था, अपनी तरह का अकेला था । उनकी दिलकश अदा और होठों पर शरारती मुस्कराहट काफी कुछ कह जाती थी ।
देवानंद ने अपनी आत्मकथा में फिल्मी हस्तियों के अलावा राजनैतिक हस्तियों का भी जिक्र किया है । खासतौर से इंदिरा गांधी और उनके पुक्ष संजय गांधी का । इंदिरा गांधी के बार में देवानंद ने लिखा है कि वो बहुत ही कम बोलती थी जिसकी वजह से उनके विरोधी इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहते थे । देव साहब ने इंदिरा गांधी के साथ कई मुलाकातों का जिक्र किया है लेकिन हर बार उन्हें लगा कि श्रीमति गांधी, नकारात्मक या सकारात्मक किसी भी तरह की कोई प्रकिक्रिया देती ही नहीं है ।
देवानंद साहब को मैंने दो बार नजदीक से देखा है, मिला भी । एक बार तो दो साल पहले मुंबई में एक होटल में हम लोग एक कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, देव साहब भी उसी होटल में थे, हमलोगों को जब पता लगा तो उनसे मिलने चले गए । उनसे मिलकर बाहर निकलते वक्त हम चार लोग यही बात कर रहे थे कि बताओ यार अस्सी में ये हाल है तो तीस चालीस में क्या सितम ढाया होगा । मैंने अपने स्कूल के दिनों में देवानंद की फिल्म काला बाजार देखी थी और देवानंद की वही छवि थी मन पर । उस दिन जब मिलकर निकला तो लगा कि चौबीस पच्चीस साल पहले जिस देवानंद को पर्दे पर देखा था उसी देवानंद से मिलकर निकला हूं । पिछले साल छब्बीस सितंबर को उनकी किताब रिलीज होनी थी तो वो दिल्ली के प्रेस क्लब में वो पत्रकारों से मिले थे । वही जोश, वही जवानी, वही स्टाइल । उसी तरह सवालों के जवाब देने से पहले गले का स्कार्फ स्टाइल से झटकना । मानो कोई हसीना अपने चेहरे पर अनचाहे आए जुल्फ को झटक रही हो ।

Friday, February 20, 2009

यही तो सच्चा प्यार है......ऋचा अनिरुद्ध

वो चल फिर नहीं सकती, न जाने कितनी बीमारियां हैं उसको। जिंदगी भी बस कुछ ही दिनों की होगी उसके पास, अगर जल्द ही कोई चमत्कार न हुआ तो। लेकिन उसके पास एक ऐसी चीज है जिसके लिए शायद हर कोई सारी उम्र तरसता है। उसके पास सच्चा प्यार है। मैं बात कर रही हूं निवेदिता और उसके पति पंकज की।
जब पंकज ने निवेदिता को पहली बार देखा था तभी उससे प्यार कर बैठा था। निवेदिता उस वक्त भी ठीक से चल नहीं पाती थी। उसका अपना परिवार तक उसका साथ छोड़ चुका था। पर पंकज ताउम्र उसके साथ बिताना चाहता था.....लेकिन क्यों? इसका जवाब पंकज के पास भी नहीं है। बस इतना सच है कि निवेदिता के साथ जीने के लिए पंकज ने अपने परिवार तक से रिश्ता तोड़ लिया।
लेकिन कुदरत ने उन दोनों प्रेमियों पर जुल्म कम नहीं किए या यूं कहिए कि पंकज को प्यार के इम्तिहान अब तक देने पड़ रहे हैं। निवेदिता की तबियत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। हालात दिन-ब-दिन मुश्किल होते जा रहे हैं। आर्थिक स्थिति भी कमजोर होती जा रही है। लेकिन पंकज की हिम्मत का क्या कहूं....उसकी एक बात ने दिल छू लिया। उसने बोला कि हीर रांझा अपने प्यार के लिए मर गए, हम जीना चाहते हैं।
पंकज निवेदिता का जिंदगी लाइव वैंलेंटाइन डे स्पेशल में आना अपने आप में एक चमत्कार है। शो 8 फरवरी को शूट होना था। सारी तैयारियां पूरी थीं कि अचानक 6 की शाम एक मेहमान ने आने से मना कर दिया। शो प्रॉड्यूसर नीतू बुद्धिराजा रो पड़ी। समझ नहीं आ रहा था क्या करें। मैंने एक बार फिर वो कहानियां खोलीं जो दर्शकों ने हमें IBNkhabar.com पर भेजी थीं। अचानक नजर निवेदिता के मेल पर पड़ी। सरसरी नजर से मैंने उसे देखा लेकिन उसने अपना फोन नंबर नहीं भेजा था।
मुझे 7 फरवरी को एक और एपिसोड शूट करना था, उसकी तैयारी करनी थी तो अपनी सहयोगी फरहीन से कहा कि निवेदिता को मेल लिखकर फौरन नंबर मांगे। सिर्फ 24 घंटे का वक्त था हमारे पास, पर न जाने क्यों मेरा दिल कह रहा था कि निवेदिता जरूर मिलेगी। 7 को शूट के बीच में फरहीन आई और बोली निवेदिता मिल गई। बस फिर जो हुआ वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी। नीतू बुद्धिराजा उनसे मिलने गई। 7 फरवरी 3 बजे रात तक उसने उन दोनों की कहानी लिखी और 8 फरवरी की सुबह निवेदिता और पंकज जिंदगी लाइव के स्टूडियो में थे।
आज मेरे दिल में बस एक ही दुआ है, जो चमत्कार निवेदिता और पंकज को जिंदगी लाइव में लाया ऐसा ही एक चमत्कार निवेदिता की जिंदगी बचा ले। उसे नई जिंदगी दे दे। उसे इलाज के लिए अमेरिका जाने की जरूरत है लेकिन साधन नहीं है उनके पास। काश! कहीं से उनको मदद मिल जाए। काश! इस प्यार की जीत हो। आज तक प्यार की बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को सुना था मैंने....लेकिन पंकज चुप रहकर बता गया मुझे कि सच्चा प्यार क्या होता है। वो मुझे सिखा गया कि यही होता है प्यार....।
अगर हो सके तो...
जिंदगी लाइव टीम के लिए सबसे सुकून के लम्हे वही होते हैं जब लोग हमें लिखते हैं या कॉल करते हैं कि हमारे शो से उनकी जिंदगी में, उनकी सोच में बदलाव आए। इस बार हमने आपको वैलेन्टाइन्स डे स्पेशल में पंकज और निवेदिता की प्रेम कहानी दिखाई। हमारे पास ढेरों फ़ोन कॉल आए। लोग निवेदिता के लिए सलामती की दुआएं कर रहे हैं। लेकिन उसके इलाज में लाखों का ख़र्च है। टीम ज़िंदगी लाइव की आप सभी से अपील है कि निवेदिता की मदद करें। आप हमें zindagilive@network18online.com या 09999024924 पर संपर्क कर सकते हैं।

Saturday, February 7, 2009

महानायक का खंडित व्यक्तित्व

अमिताभ बच्चन- सदी का महानायक,भारतीय फिल्म जगत का सबसे बड़ा नाम, विश्व मंच पर भारतीय फिल्म उद्योग का सबसे विश्वसनीय चेहरा. पैंसठ साल से ज्यादा की उम्र में भी भारतीय फिल्म निर्माताओं का सबसे भरोसेमंद और चहेता अभिनेता । बिग बी के नाम से मशहूर अमिताभ बच्चन की प्रशंसा की ये सूची और भी लंबी हो सकती है । लेकिन अगर सदी के इस महानायक के पूरे व्यक्तित्व पर विचार करें तो ये खंडित और विवादित नजर आता है । लार्जर दैन लाइफ की छवि वाले सदी के इस महानायक के मन में भी बिल्कुल ही एक आम आदमी की तरह ही हर तरह की चाहतें हिलोरे लेती है और अपनी इन चाहतों के लिए वो तमाम तरह के दंद-फंद भी करते हैं । फिल्म जगत का ये सबसे विश्वसनीय चेहरा और करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करनेवाला ये महानायक जब मुलायम सरकार की प्रशंसा वाले विज्ञापन में ये कहता था कि - यूपी में दम है क्योंकि जुर्म यहां कम है - तो उनकी विश्वसनीयता पर एक बडा़ सवालिया निशान लग जाता था । बिग बी को ये विज्ञापन करने की क्या मजबूरी थी ये राज आजतक नहीं खुल पाया है, हां मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये पता चला कि अमिताभ को इस विज्ञापन के एवज में कोई भुगतान नहीं किया गया । अमिताभ बच्चन जब भी जहां भी मौका मिलता है ये कहने से नहीं चूकते कि उन्होंने राजनीति से पूरी तरह तौबा कर ली है और अब आगे राजनीति में जाने का उनका कोई इरादा नहीं है । लेकिन यूपी के हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान प्रत्यक्ष तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से राजनीति में आए ही, समाजवादी पार्टी के लिए परोक्ष रूप से विज्ञापन के जरिए वोट जुटाने की कोशिश की ही गई । मित्रता निभाने के लिए ही सही ।
अंग्रेजी में एक कहावत है - ए मैन इज नोन बाय द कंपनी ही कीप्स । इस लिहाज से हम अमिताभ बच्चन की मित्रमंडली पर जरा गौर फरमा लें - छोटे भाई अमर सिंह, पितातुल्य मुलायम सिंह यादव, सहारा के कर्ता-धर्ता सुब्रत राय और अनिल अंबानी । अगर अनिल अंबानी को छोड़ दिया जाए तो बाकी की ख्याति क्या है ये बताने की जरूरत नहीं है । भारत की जनता जब अपने महानायक अमिताभ बच्चन को मुलायम के आगे झुकता देखती है तो उसे पचा नहीं पाती । फिल्मों में क्रांतिकारी तेवरों वाले अपने नायक को राजनेताओं की प्रशस्ति गाते सुनना भारतीय जनमानस को भाता नहीं है । यहां ये तर्क दिया जा सकता है कि रील और रीयल लाइफ में फर्क होता है । चलिए अगर इस बात को मान भी लिया जाए तो अमिताभ जैसे सदी के महानायक,जो करोडों भारतीयों के आदर्श हैं, को लोग रियल लाइफ में एकदम विपरीत भूमिका में देखना पसंद नहीं कर पाते ।
अमिताभ बच्चन भारतीय फिल्म जगत के अबतक के सबसे बड़े स्टार माने जा सकते हैं । लगभग चार दशकों से बॉलीवुड पर एकछत्र राज कर रहे हैं । उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी जिस तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं वो सफलतापूर्वक निभा रहे हैं उसको तो सिर्फ सलाम ही किया जा सकता है । अपनी भूमिकाओं को लेकर बच्चन ने लगातार जितने प्रयोग किए हैं वो भी काबिले-तारीफ है । बच्चन की अदाकारी का रेंज इतना व्यापक है कि अब भी बॉलीवुड का कोई कलाकार रेंज के मुकाबले में उनके सामने नहीं टिक सकता है । चाहे वो ब्लैक फिल्म में अंधी लड़की रानी मुखर्जी के टीचर की भूमिका हो या फिल्म नि:शब्द में किशोरी पर फिदा एक बूढे का अभिनय हो या फिल्म चीनी कम में पैंसठ साल के प्रौढ का अपने से आधी उम्र की लड़की से प्यार करने की भूमिका हो , सबमें अमिताभ ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया । फिल्म झूम बराबर झूम में मस्ती का जो अंदाज अमिताभ की आंखों से झलकता है उसे देखना और महसूस करना काफी आनंददायक है ।
लेकिन अगर अभिनेता अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व पर समग्रता में विचार करें तो हर तरह के विवाद में अमिताभ रहे हैं । कुछ दिनों पहले इंकम टैक्स विभाग के नोटिस की वजह से अमिताभ सुर्खियों में रहे । इसके बाद एक विदेशी कार के टैक्स की किचकिच में भी बिग बी फंसे । पहले खबर आई कि भाई अमर सिंह ने भतीजे अभिषेक को जन्मदिन का तोहफा दिया है लेकिन जब कार के टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क को लेकर बवाल मचा तो अमर सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने उपयोग के लिए ये गाड़ी मुंबई में रखी है । कुछ दिनों पहले बाराबंकी में फर्जीवाड़े से जमीन अपने नाम कराने का मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट के लखनऊ बेंच तक पहुंचा । आरोप ये लगा कि मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में ग्रामसभा की जमीन बच्चन ने अपने नाम करवा ली । और इसके आधार पर पुणे में पावना डैम के पास खेती योग्य पांच एकड़ जमीन खरीदी । उस इलाके में ये नियम है कि कोई भी व्यक्ति जो किसान है वही वहां जमीन खरीद सकता है । इस मामले पर जब जमकर विवाद हुआ तो सदी के महानायक ने दरियादिली दिखाते हुए दोनों जमीनें दान करने का ऐलान कर दिया । अमिताभ से जुडा़ ही दूसरा मामला बंबई हाइकोर्ट में है – ये मामला है फेमा यानि विदेशी मुद्रा के गड़बड़झाले से जुडा़ । जिसपर भी नोटिस जारी किया जा चुका है ।
तो अगर हम महानायक के गढे हुए व्यक्तित्व और असली व्यक्तित्व को एक साथ समग्रता में देखें तो हमें महानायक की छवि में कई चेहरे नजर आते हैं । रील लाइफ का कद्दावर महानायक रियल लाइफ में बिल्कुल ही साधारण और आम आदमी की तरह हर तरह के दंद-फंद में व्यस्त ।

Monday, January 26, 2009

All and anything in the name of Terror and Pakistan- Vivek Avasthi

The aftermath of 26/11 terror attacks on the commercial capital of India saw a major change in the thinking and mindset of the common Indian, rich or poor, educated or illiterate or to broadly classify, in all strata of the Indian society. It gave us a sense of being Indian, fighting back against terror, getting back our values of togetherness, unity and belonging. The spirit and flame of patriotism is back in every Indian, be it children, youth or old. It is really amazing that after quite some time we have realised the feeling of being INDIAN, which was once confined to two calender days in a year - January 26 which is our Republic Day and August 15, our Independence Day. This is the time one silent evil slowly crept into our system. Our police seems to have got a licence to kill as a result of the aftermath of 26/11. This specific case is a glaring example of the brutal face of Uttar Pradesh Police and its much hyped Anti-Terror Squad (ATS) which was involved in operations against criminals for years together. Now it was time to prove that they were worth their name and hence the need of the hour was an encounter. An encounter of dreaded Pakistani terrorists armed with sophisticated weapons no less than AK-47 assault rifles and then began U.P. Police's operation - 'Create Terrorists'. It was in the wee hours of January 25th, when frantic messages were passed to media persons, both print and electronic that an encounter has taken place in Sector-97 of Noida between two Pakistani terrorists and U.P. Police ATS had taken place which resulted in the killing of both the terrorists who were armed with AK-47 rifles, hand grenades etc. etc. etc. Media rushed to the spot but only a few questions were asked and those too were silenced in the name of nationalism, patriotism etc, etc, etc. Strangely, where the encounter took place has recently shot into limelight with at least five encounters here in the last three months. Is this area the Bermuda Triangle for criminals in this part of the country ? The story provided by the ATS is quite intriguing and interesting as well. The Pak terrorists were first spotted in a Maruti-800 car in Lal Kuan in Ghaziabad where they were signalled to stop. But the occupants of the car fled from there and were chased all the way to the lonely Sector -97 of Noida where the encounter took place. The distance between Lal Kuan and Sector 97 of Noida is at least 15 odd kilometres. Was there not a single barricade or a picket in between or the ATS wanted the encounter to happen at the isolated Sector-97 of Noida ! The encounter started and ended within minutes resulting in the killing of the two 'wanted terrorists' from foreign soil. When the terrorists were armed with AK-47 assault rifles, which sophisticated weaponry did the ATS have - some pistols and rifles to counter them ! It is well known and established fact, specially after 26/11, that the bullet-proof vests provided to the personnel of police and Indian armed forces are not protected from bullets coming out of weapons such as sophisticated AK series. Combating AK-47 with pistols and rifles can indeed be termed as a heroic deed of the ATS ! After the 'encounter' was over, the ATS proudly displayed the modern weapons seized from the 'terrorists'. But they had some more revealing items to show and prove beyond doubt that the nationality of the killed was Pakistani. Two Pakistan passports were recovered and proudly shown to the media. What makes it more intriguing is that the ATS claims that the terrorists had planned some operation and were heading towards their mission. If it were so, why were they carrying their passports ? The question itself is perhaps the answer. Of the police party, one Constable Vinod is said to be injured and is admitted in a private hospital in Noida. No one is allowed to meet him despite the fact that a bullet has grazed past his leg. Had he been seriously injured, one could have understood why people are not being allowed inside his ward but the constable is being kept in isolation due to reasons best known to the Uttar Pradesh ATS. The police Gypsy (Registration no. UP-16K 0895) involved in the encounter has a bullet hole on the windscreen. Police say that the terrorists fired on their vehicle and in retaliation they killed the terrorists. What is more surprising is that the angle of the hole is such that it would have hit the occupant of the vehicle between head and chest and no one from the police party has sustained such injury. Moreover, the bullet is not even embedded in the seat back of the Gypsy giving credence to the doubt that bullet was perhaps fired from inside the vehicle. A top notch officer of the Uttar Pradesh Police in a hurriedly called press conference in Lucknow, congratulated his boys for this heroic deed and in his statement said that the terrorists were forced to stop their when the ATS team successfully fired and punctured the tyre of the car, making it come to a grinding halt. But the car found at the spot has not bullet mark on the tyre. It seems that the tube has been deflated later. Who were these persons who have been killed ? What is their previous track record ? Were they earlier involved in some terrorist act ? Were they wanted ? If yes, for which crime ? No one in Uttar Pradesh Police has any answer of any of these questions. The only answer they have is - investigation is on. Well, investigation is on and the ATS team in this case is gearing up for some bravery awards, some cash rewards and out of turn promotions. What is more scary is that 26/11 has changed the psyche of the Indian is that no one is willing to raise a single question on this. The so called champions of Human Rights - the numerous organisations we have in the country who used to raise hue and cry over police atrocities and high handedness are not prepared to utter a single word over the killing of two youth, just because they are Pakistani nationals ? Yes, we are indeed patriots and true Indians but does that mean that we let blood be spilled on the streets of our country and people be killed because they are of a different nationality and do not even question the intent of our law enforcers ?
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Vivek avasthi is Senior Edior with IBN7

Tuesday, January 20, 2009

बॉलीवुड पर बाजार हावी

आज अगर बॉलीवुड और वहां बनने वाली फिल्मों पर नजर डालें इसपर बाजारवाद पूरी तरह से हावी नजर आ रहा है । बाजार और मार्केटिंग के खेल ने ग्लैमर से भरी इस दुनिया की राह ही बदल दी है । बाजार पैसा चाहता है और उसके लिए वो अपने रास्ते में आनेवाली तमाम बाधाओं को इस तरह से दरकिनार कर डालता है । भारतीय फिल्म उद्योग के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ । ग्लैमर के इस धंधे से होनेवाली बड़ी आमदनी को ध्यान में रखकर पहले मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन अपना काला पैसा इस यहां लगाया करते थे । हाजी मस्तान से लेकर वरदाराजन मुदलयार, करीम लाला से लेकर दाऊद इब्राहिम और उसके गुर्गों के पैसे लेने की बात गाहे-बगाहे सामने आती रहती है । यहां किसी भी फिल्म निर्माता या कलाकार का नाम लेना उचित नहीं होगा लेकिन साठ और सत्तर के दशक में दर्शकों के दिलों पर राज करनेवाले शोमैन की हाजी मस्तान के सामने मत्था टेकती तस्वीर अब भी लोगों के जेहन में है । अनुपमा चोपड़ा ने कुछ दिन पहले शाहरुख खान पर लिखी अपनी किताब में किंग खान को अंडरवर्ल्ड के गुर्गे की धमकी का विस्तार से जिक्र है । इन सबसे ये साबित होता है कि अंडरवर्ल्ड और बॉलीवुड में पैसे को लेकर गहरे रिश्ते रहे हैं और ये सिर्फ तत्काल लाभ कमाने के उद्देश्य से किया गया निवेश था । लेकिन अंडरवर्ल्ड से गठजोड़ में फिल्म निर्माताओं पर एक खतरा तो बना ही रहता था । इस गठजोड़ पर रोक लगाने के लिए सरकार ने सन् उन्नीस सौ पतहत्तर में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की स्थापना की और फिर उन्नीस सौ अस्सी में इंडियन मोशन पिक्चर एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन और फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन को इसमें समाहित कर दिया । इस संस्था का उद्देश्य बेहतर फिल्मों के लिए धन मुहैया करना भी था । ये संस्था कहां है और क्या कर रही है, किन फिल्मकारों को ये मदद दे रही है ये किसी को नहीं पता । अन्य सरकारी संस्ताओं की तरह ये भी लालफीताशाही का शिकार हो गई और बड़े नौकरशाहों का ऐशगाह बनकर रह गई है ।
लेकिन नब्बे के दशक में जब आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की तो उसका असर फिल्म उद्योग पर भी दिखने लगा ।
आर्थिक उदारीकरण के दूसरे दौर में या यों कहें कि बीसबीं शताब्दी के आखिरी सालों में बॉलीवुड पर पूंजी की बरसात होने लगी । फिल्मों पर बड़ी अंतराष्ट्रीय कंपनियों ने दांव और पैसा लगाना शुरु कर दिया । अनिल अंबानी की ऐडलैब्स से लेकर सोनी इंटरनेशनल और इरोज इंटरनेशनल ने भारतीय फिल्मों पर एक सोची समझी रणनीति के तहत पैसा लगाना शुरु कर दिया और मोटी कमाई की । पिछले दिनों संजय लीला भंसाली की फिल्म कंपनी एसएलबी में सोनी इंटरटेनमेंट ने तीस से चालीस करोड़ रुपये लगाए और लगभग इससे दुगनी रकम की कमाई की । ये पहली भारतीय फिल्म थी जिसमें बॉलीवुड की कंपनी का पूरा पैसा लगा । खबर तो ये भी है कि सोनी ने इसके अलावा तीन और फिल्मों के लिए संजय लीला भंसाली की कंपनी के साथ कारार किया है । शाहरुख खान की कंपनी रेड चिली की फिल्म ओम शांति ओम पर भी लगभग तीस-चालीस करोड़ रुपये लगे, इस फिल्म का वितरण भी विदेशी कंपनी इरोज इंटरनेशनल के साथ मिलकर किया और कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले । भारतीय फिल्म बाजार की अपार संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कई अन्य विदेशी कंपनियों की नजर भी भारतीय फिल्म बाजार पर है और अगर बॉलीवुड के जानकारों की मानें तो आनेवाले दिनों में और भी कई करार देखने को मिल सकते हैं । विदेशी कंपनियों के पैसे पर बनने वाली फिल्मों में मार्केटिंग के लिए एक बड़ा बजट होता है और उस पैसे से एक ऐसी व्यूह रचना की जाती है जिसमें दर्शकों को फांसने का सारा खेल किया जाता है । हाल में आई कुछ फिल्में मार्केटिंग के बूते हिट रही हैं । बाजार का पहला शिकार कला और संस्कृति ही बनती है और भारत में भी ऐसा ही होता नजर आ रहा है । अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका के पूर्व अटार्नी भारत के दौरे पर थे । उन्होंने कोलकाता में एक साक्षात्कार में कहा कि उपभोक्तावाद और बाजारवाद, साम्राज्यवाद से ज्यादा खतरनाक है ।
भारतीय फिल्मों के इस कॉर्रपोरेटाइजेशन का सबसे बड़ा नुकसान सार्थक सिनेमा को हुआ । अब सामाजिक विषयों पर फिल्में बननी लगभग बंद हो गई । मंडी, अर्थ, पार, सारांश, मिर्च मसाला, अंकुश, तमस जैसी फिल्मों का दौर खत्म होता सा लग रहा है । इस बीच कम बजट की कुछ अच्छी फिल्में- हैदराबाद ब्लूज से लेकर भेजा फ्राई, वेलकम टू सज्जनपुर - बनी, लेकिन ये फिल्में भी एक खास दर्शकवर्ग को ध्यान में रखकर बनाई गई और उन दर्शकों ने इन फिल्मों को पसंद भी किया । ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या भारत से सार्थक सिनेमा का दौर खत्म हो गया है या यों कहें कि सामाजिक विषयों को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली फिल्मों को बाजार ने लील लिया है । क्या मार्केटिंग की वजह से घटिया फिल्में हिट होती रहेंगी और जो फिल्में कम बजट की होने के कारण अपनी मार्केटिंग नहीं कर पा रही हैं वो बेहतर होने के बावजूद पिटती रहेंगी । ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब फिल्म उद्योग से जुडें लोगों को शिद्दत से ढूढना ही होगा ।

Sunday, January 18, 2009

संभावनाओं के संकेत का उपन्यास

'हंस' खेमे के सिपहसालार, दलित युवा लेखक अजय नावरिया का नाम हाल के दिनों में बहुत तेजी से उभरा है । दो साल पहले जब उनका पहला कहानी संग्रह- पटकथा और अन्य कहानियां- छपा था तो पाठकों और आलोचकों ने उसका नोटिस लिया था । कहानी संग्रह के पहले अजय ने कई पत्रिकाओं के विशेषांको का संपादन सहयोग कर अपनी कौशल का प्रदर्शन किया था । अब उनका पहला उपन्यास- उधर के लोग- छपकर आया है । ये उपन्यास 'मैं' शैली में छपा है जिससे ये भ्रम हो सकता है कि ये लेखक की कहानी है, हलांकि इस बात का कहीं उल्लेख नहीं किया गया है । इस उपन्यास के बलर्ब पर लिखा है - 'अजय नावरिया का यह उपन्यास -उधर के लोग- में भारतीय संस्कृति की विशिष्टता, वैयक्तिक सत्ता के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को रेखांकित किया गया है ।' हिंदी में आमतौर पर ब्लर्ब अतिशय प्रशंसात्मक होते हैं और ये भी उससे अछूता नहीं है । पूरे उपन्यास में कहीं भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को रेखांकित करने जैसी कोई बात नहीं है, हां कहीं कहीं उसे छू भर लिया गया है ।
पिछले दिनों कई दलित लेखकों की आत्मकथाएं आई और संस्मरणात्मक उपन्यास भी छपे । पूर्व में छपे आत्मकथाओं और संस्मरणों से जो दलित लेखन का फार्मूला बना या यो कहें कि जो पद्धति विकसित हुई, उसी फार्मूले में अजय नावरिया भी फंस गए हैं । इस उपन्यास के नायक को पहला प्रेम भी वंदना झा (ब्राह्मण लड़की) से होता है और तमाम पारिवारिक विरोधों और सामाजिक मान्यताओं को ताक पर ऱखकर एक ब्राह्मण लड़की एक दलित से शादी भी कर लेती है । लेकिन कुछ ही दिनों बाद संस्करों या यों कहें कि दोनों की जीवन पद्धति का संघर्ष सामने आता है और नायक की मां और वंदना के बीच जमकर लडाई शुरु हो जाती है । वो दोनों अपने मां बाप से अलग रहना शुरु कर देते हैं । एक दिन जब नायक अपनी पत्नी को थप्पड़ मारता है तो वंदना भी पलटकर उसके गाल पर थप्पड जड़ देती है । यहीं से शुरु होता है प्रेम और नंगे यथार्थ में संघर्ष, जिसकी परिणति होती है वंदना की खुदकुशी से । विडंवना ये कि खुदकुशी के लिए लेखक परोक्ष रूप से वंदना को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करते हैं ।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती । नायक की फिर उसकी ही बिरादरी की संगीता से शादी होती है लेकिन मास्टर जी ( नायक) की जिंदगी में एक और औरत है - आएशा, जो हाई प्रोफाइल वेश्या है और तमाम धनपशु और बडे पुलिस अधिकारी उसके क्लाइंट हैं । आएशा मास्टर जी की शराफत पर फिदा है । दरअसल पहली ही मुलाकात में आएशा मास्टर जी को खुला मिमंत्रण देती है, जिसे वो बेहद शराफत से ठुकरा देते हैं । मास्टर जी और आएशा का रिश्ता बेहद पवित्र किस्म का दिखाने की कोशिश की गई है । उन्हें आएशा के साथ हंसना, बोलना, बीयर पीना, कॉफी पर घंटों बतियाना अच्छा लगता है। मन का रिश्ता बनता है लेकिन शरीर का नहीं । लेकिन अंतत एक रात दोनों के बीच 'चुप्पी की मकड़ी जाल बुनती है और वो उस जाल में फंसकर आएशा के साथ एक बिस्तर पर रात गुजार कर सुबह उठते हैं तो तरोताजा होते हैं।" संकेत साफ हैं ।
इस बीच मास्टर जी और उनकी दूसरी पत्नी संगीता के बीच भी नहीं निभती है और पति पत्नी अलग रहने लगते हैं । मास्टर जी के भाई की शादी के मौके जब संगीता घर लौटती है, तो अपने घर में आएशा को देखकर और ये जानकर कि वो उसके पति की दोस्त है स्वाभाविक रूप से नाराज होती है । और नाराजगी प्रकट कर घर छोड़कर चली जाती है । लेकिन कहानी कई मोड़ लेती है और संगीता गर्भवती होती है । कहानी का अंत सुखद है, संगीता और मास्टर जी के एक बेटी पैदा होती है और दोनों फिर जुड़ जाते हैं । मास्टर जी की मां कहती हैं - "औरत मर्द आसानी से अलग हो सकते हैं....मां बाप का अलग होना इतना आसान नहीं होता ।"
अगर हम समग्रता में अजय नावरिया के इस पहले उपन्यास पर विचार करें तो दलित लेखन के खांचे में लिखा गया फार्मूलाबद्ध उपन्यास है । इतना अवश्य है कि इस उपन्यास में लेखक ने अपने अंदर की प्रतिभा के संकेत दिए है । अगर अजय नावरिया अपने पूर्वाग्रहों और फार्मूलाबद्ध दलित लेखन पद्धति से इतर लिखेगें तो बेहतर लिख पाएंगे । इन संभावनाओं के पर्याप्त प्रमाण इस उपन्यास में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। नायक एक ऐसा दलित है जिसके तमाम मित्र उंचे ओहदों पर हैं, उनका समाज, उनकी सोच और उनके द्वंद पर अगर लेखक फोकस करते और दलित लेखन की लीक को छोड़ पाते तो एक नया समाज हमारे सामने होता । अजय का अनुभव संसार व्यापक प्रतीत होता है लेकिन उसे वो सिर्फ छूकर निकल जाते हैं जो उनकी इस कृति को एक साधारण कृति में बदल देता है ।
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समीक्ष्य कृति- उधर के लोग
लेखक- अजय नावरिया
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, 1- बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
नई दिल्ली- 110002

Friday, January 16, 2009

दलित अल्पसंख्यक सशक्तीकरण का दस्तावेज

पिछले दिनों मैं रविवार पत्रिका के पुराने अंक पलट रहा था तो मुझे संतोष भारतीय के दलितों और उनकी समस्याओं पर लिखे कई लेख मिले । इस क्रम में मैं सिर्फ दो लेखों का उल्लेख करना चाहूंगा जो मार्च और अगस्त उन्नीस सौ चौरासी में छपे थे । पहला लेख था- श्रीपति जी, गरीब हरिजन की जमीन तो लौटा दीजिए । ये लेख उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र के इनके अपने गांव में एक दलित जोखई की जमीन कब्जाने के बारे में विस्तार से लिखी गई थी । श्रीपति मिश्र के परिवार पर एक हरिजन की जमीन कब्जाने की कहानी छपने के बाद उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक की सियासी हलकों में हड़कंप मच गया और चार महीने बीतते बीतते ही श्रीपति मिश्र को इंदिरा गांधी ने चलता कर दिया । ये एक रिपोर्ट की ताकत है, एक पत्रकार की ताकत है, एक पत्रकार का अपने समाज के प्रति उत्तर दायित्व भी जहां वो समाज के सबसे निचले तबके को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश के सबसे ताकतवर आदमी को भी नहीं बख्शता है । संतोष भारतीय ने पत्रकारिता के अपने लंबे करियर में दलितों और अल्पसंख्यकों की बेहतरी के सवाल को अपने लेखों में जोरदार तरीके से उठाया, और इसका असर भी हुआ । अभी हाल ही में संतोष भारतीय के संपादन में - दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण नाम की लगभग पांच सौ पन्नों की किताब आई है । इस किताब में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व प्रधानमंत्रियों- विश्वनाथ प्रताप सिंह और इंद्र कुमार गुजराल समेत कई विद्वानों के लेख संकलित किए गए हैं । डॉ मनमोहन सिंह ने अपने लेख में बेहद ही साफगोई और साहस के साथ ये स्वीकार किया है कि - "मेरा मानना है कि साठ वर्षों के संवैधानिक तथा कानूनी संरक्षण और राज्य सहायता के बावजूद देश के कई हिस्सों में दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव अब भी मौजूद है ।" आजादी के साठ साल बाद भी अगर एक लोकतांत्रिक देश के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ये स्वीकार करता है कि दलितों के साथ सामाजिक भेदभाव होता है तो ये न केवल एक बेहद गंभीर बात है बल्कि एक सभ्य समाज का दावा करनेवाले देश के सामने एक बड़ा सवाल भी है, जिसका निराकरण तरत ढूंढे जाने की जरूरत है । केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने अपने लेख में दलित अल्पसंख्यक महाशक्ति की यात्रा और उसके संघर्षों और पीड़ा को शिद्दत के साथ चिन्हित किया है । साथ ही दलितों और अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए समाज के सभी वर्गों को आगे आने की वकालत भी करते हैं ।
ऐसा नहीं है कि इस किताब में सिर्फ राजनेताओं के ही लेख हैं । इस भारी भरकम ग्रंथ में पांच खंड हैं जिसमें देश के प्रमुख विचारकों और दलित चिंतकों के लेख हैं - जिसमें असगर अली इंजीनियर, पी एस कृष्णन, प्रो. मुशीरुल हसन, डॉ सतीनाथ चौधरी, इम्तियाज अहमद आदि प्रमुख हैं । इस पुस्तक के दूसरे खंड में वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली ने अपने लंबे शोधपरक आलेख में भारत में मुस्लिम समुदाय के साथ होनेवाले भेदभाव को रेखांकित किया है । बेहद श्रमपूर्वक लिखे गए इस लेख में कुरबान ने भारत के मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन की असलियत और उसके कारणों के अलावा सांप्रदायिक हिंसा को आंकड़ों के आधार पर विश्लेषित किया है । कुरबान के लेख को पढ़ते हुए मुझे पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल से सुना एक संस्मरण याद हो आया । गुजराल साहब जब सूचना और प्रसारण मंत्री बने तो तो वो जाकिर हुसैन साहब से मिले गए और बातों-बातों में मंत्रालय में मुसलमान चपरासियों के बारे में बात चल निकली तो गुजराल साहब ने कहा कि वो अपने मंत्रालय में मुसलमान चपरासियों की संख्या का पता करेगें । ये सुनकर जाकिर साहब ने कहा कि इस मुल्क में मुसलमान का राष्ट्रपति बनना तो आसान है लोकिन चपरासी बनना बेहद मुश्किल । जाकिर हुसैन साहब की ये बात हमारे समाज और मुल्क की एक ऐसी हकीकत है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है । इसके बाद गुजराल साहब ने अपने मंत्रालय में पता किया तो एक भी मुसलमान चपरासी नहीं मिला और जब सारे मंत्रालयों के बारे में जानकारी इकट्ठा की गई तो आंकड़े जाकिर साहब की बयान की तस्दीक कर रहे थे ।
संतोष भारतीय द्वारा संपादित इस किताब में की ऐसे लेख हैं जो अब के समाज में दलितों और अल्पसंख्यकों की स्थिति को आईना दिखाते हैं । ये किताब इस लिहाज से भी अहम बन गई है कि इसमें एक जगह दलितों और अल्पसंख्यकों के बारे में विद्वानों, विचारकों और देश के नीति नियंताओं के विचार खुलकर सामने आए हैं और हिंदी में मेरे जानते इस तरह की कोई किताब उपलब्ध नहीं है । इस वजह से इस किताब का एक स्थायी महत्व है और भविष्य में इसका उपयोग एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में होगा । ये किताब हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुई है ।
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समीक्ष्य पुस्तक - दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण
लेखक- संतोष भारतीय
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

Thursday, January 15, 2009

स्त्री आकांक्षा का नया चित्र

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की आंधी के बीच जब पत्रकार गीताश्री कि किताब – स्त्री आंकाक्षा के मानचित्र- प्रकाशित हुई तो उसके कवर ने पाठकों का खासा ध्यान अपनी ओर खींचा । दरअसल कवर पर एक लड़की गीले कपड़ों में एक कमरे की खिड़की से बाहर समुद्र को देख रही है । इस तस्वीर से किताब के मिजाज के बारे में संकेत मिल जाता है। कहावत भी है कि लिफाफा देखकर खत का मजमून पता चल जाता है । लेकिन जब मैंने किताब पढ़ना शुरु किया को कवर से ज्यादा आकर्षित पुस्तक में संकलित लेखों ने किया । अपनी इस पहली किताब की भूमिका में लेखिका कहती हैं कि आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में औरत की जिम्मेवारी और जवाबदेही तो तय है मगर आज भी उसके अधिकार और स्पेस तय नहीं हैं । गीताश्री की छवि एक बिंदास और खरी-खरी कहने और लिखनेवाली पत्रकार की है और भूमिका में भी इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि किताब में क्या होनेवाला है ।
गीताश्री की ये किताब स्त्री के अधिकार और स्पेस को तलाश करती है और इस तलाश में समाज के स्थापित मूल्यों से टकराती भी है । समीक्ष्य पुस्तक में इकत्तीस लेख हैं जो समाज, साहित्य, राजनीति, अपराध, फिल्म और ग्लैमर की दुनिया में स्त्री के सच से हमें रूबरू कराने की कोशिश करती है । यहां स्त्रियों के किस रूप में देखा जाता है या स्त्रियों को लेकर किस तरह की मानसिकता व्याप्त है, इसको अपने लेखों में गीताश्री ने संजीदगी से उठाया है ।
वेश्या और उसके समाज का चित्रण हिंदी साहित्य में ही नहीं, हर भाषा और देश के साहित्य में जरूरत से ज्यादा हुआ है । अधिकतर पुरुषों द्वारा, कुछ हद तक स्त्रियों द्वारा भी । पर इन वेस्याओं का चित्रण बहुआयामी जटिल इंसान के रूप में जरा कम ही हुआ है । लेकिन गीताश्री ने अपने लेख-अंधेरी गली के रोशन मकान- में कोलकाता की रेडलाइट एरिया की यौनकर्मियों की स्थिति और उनके संघर्ष को जिस तरह से उभारा है वो किसी को भी सोचने पर विवश कर देता है । सोनागाछी की यौनकर्मियां किस तरह से सरकार से मनोरंजनकर्मी का दर्जा देने को लेकर जूझ रही है और मनोरंजन कर देने के लिए सीना ठोक कर तैयार है वो एक नए बहस को जन्म देने के लिए काफी है । गीताश्री पत्रकार तो हैं ही साहित्य जगत में भी उनकी आवाजाही नियमित रही है । दिल्ली में बुजुर्ग साहित्यकार और संपादक किस तरह से भी किसी भी युवा लेखिका को हाथों-हाथ लेते हैं और उसको महान रचनाकार साबित करने पर तुल जाते हैं लेकिन उनकी मानसिकता क्या होती है इसको गीता ने अपने लेख – उठो कवियो, नी कवयित्री आई है – में बेनकाब किया है । एक और जो लेख इस किताब में अहम है वो है – लेस्बियन लोक की मानसिकता । अपने इस लेख में लेखिका ने स्त्रियों की समलैंगिकता को कोमलता से जोडा़ है । प्रचीन भारतीय समाज में लेस्बियनिज्म को ढूंढती लेखिका कामसूत्र तक पहुंच जाती है और गणिकाओं के बहाने से उस वक्त के सामज में समलैंगिकता को सामने लाती हैं । साथ ही विश्व साहित्य में सीमोन, अरस्तू के विचारों के आधार पर लेस्बियनिज्म को एक मानवीय चश्मे से देखने का प्रयास किया गया है । गीताश्री के विचारों से सहमति आवश्यक नहीं है लेकिन बहस का एक आधार और इल विषय पर नए सिरे से विमर्श की चुनौती तो देती ही है ।
कुल मिलाकर अगर स्त्री आकांक्षा के इस नए मानचित्र पर विचार करते हैं तो उपरी तौर पर पाते हैं कि इस मानचित्र में कई खांचे बेहद साधारण और सामान्य लगते हैं लेकिन गहराई से विचार करने पर ये बेहद गंभीर और विचारोत्तेजक हैं । गीताश्री अपने लेखों में कई अहम विषयों को सरसरी तौर पर छूकर निकल गई है जो कि गंभीर विश्लेषण और लेखिका के विचारों की मांग करते हैं लेकिन लेखिका की पहली किताब होने की वजह से इसको नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन इस किताब ने स्त्री आकांक्षा के नए बनने वाले चित्र का खाका तो खींच ही दिया है ।
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समीक्ष्य पुस्तक- स्त्री आकांक्षा के मानचित्र
लेखिका- गीताश्री
प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य- 200 रुपये

Sunday, December 14, 2008

बुड्ढा अस्पताल में भी बुला रहा है !

सन् 2002 में जब चर्चित उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का पहला खंड छपा था तो उसके शुरू में लेखिका की टिप्पणी थी - इसे उपन्यास कहूं या आपबीती......? तब इस बात को लेकर खासा विवाद हुआ था कि ये आत्मकथा है उपन्यास । लेकिन ये विवादज करने वालों ने शायद ये ध्यान नहीं दिया इस तरह का प्रयोग कोई नई बात नहीं थी ।
हिंदी में इस तरह का पहला प्रयोग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1876 में पहली बार - एक कहानी, कुछ आपबीती, कुछ जगबीती में किया था । लेकिन जब छह साल बाद जब मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का दूसरा खंड- गुडिया भीतर गुडिया- प्रकाशित हुआ तो लेखिका ने इस बात से किनारा कर लिया और पाठकों के सामने पूरी तौर पर इसे आत्मकथा के रूप में प्रस्तुत किया, और एक अनावश्यक विवाद से मुक्ति पा ली।
पहले खंड - कस्तूरी कुंडल बसै- में लेखिका ने मैं के परतों को पूरी तरह खोल दिया लेकिन दूसरे खंड में मैं को खोलने में थोड़ी सावधानी बरती गई है, ऐसा लगता है। पहले खंड में मैत्रेयी और उनेक मां के संघर्षों की कहानी है और दूसरे में सिर्फ मैत्रेयी का संघर्ष है या कुछ हद तक उनके पति डॉक्टर शर्मा का द्वंद । पहला खंड इस वाक्य पर खत्म होता है - घर का कारागार टूट रहा है।
उससे ही दूसरे खंड का क्यू लिया जा सकता है और जब दूसरा खंड आया तो न केवल कारागार टूटा बल्कि घर का कैदी पूर्ण रूप से आजाद होकर सारा आकाश में विचरण करने लगा । 'गुडिया भीतर गुडिया' में शुरुआत में तो उत्तर प्रदेश के एक कस्बाई शहर से महानगर दिल्ली पहुंचने और वहां घर बसाने की जद्दोजहद है, साथ ही एक इशारा है पति के साथी डॉक्टर से प्रेम का का भी।
लेकिन दिलचस्प कहानी शुरू होती है दिल्ली से निकलनेवाले साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सह संपादक की रंगीन मिजाजी के किस्सों से। किस तरह से एक सह संपादक नवोदित लेखिका को फांसने के लिए चालें चलता है, इसका बेहद ही दिलचस्प वर्णन है । साथ ही इस दौर में लेखिका की मित्र इल्माना का चरित्र चित्रण भी फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड के तौर पर हुआ है, कहना ना होगा कि इल्माना के भी अपने गम हैं और इसी के चलते दोनों करीब आती हैं।
मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के बारे में इतना ज्यादा लिखा गया कि मैत्रेयी की आत्मकथा की उत्सुकता से प्रतीक्षा करनेवाले पाठकों की रुचि ये जानने में भी थी कि मैत्रेयी, राजेन्द्र यादव के साथ अपने संबंधों को वो कितना खोलती हैं । लेकिन मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के संबंधों में सिमोन और सार्त्र जैसे संबंध की खुलासे की उम्मीद लगाए बैठे आलोचकों और पाठकों को निराशा हाथ लगेगी।
हद तो तब हो जाती है जब राजेन्द्र यादव राखी बंधवाने मैत्रेयी जी के घर पहुंच जाते हैं, हलांकि मैत्रेयी राखी बांधने से इंकार कर देती हैं। राजेन्द्र यादव को लेकर मैत्रेयी को अपने पति डॉक्टर शर्मा की नाराजगी और फिर जबरदस्त गुस्से का शिकार भी होना पड़ता है।
लेकिन शरीफ डॉक्टर गुस्से और नापसंदगी के बावजूद राजेन्द्र यादव की मदद के लिए हमेसा तत्पर दिखाई देते हैं, संभवत: अपनी पत्नी की इच्छाओं के सम्मान की वजह से। लेखिका ने अपने इस संबंध पर कितनी ईमानदारी बरती है, ये कह पाना तो मुश्किल है,लेकिन मैं सिर्फ टी एस इलियट के एक वाक्य के साथ इसे खत्म करूंगा- भोगनेवाले प्राणी और सृजनकरनेवाले कलाकार में सदा एक अंतर रहता है और जितना बड़ा वो कलाकार होता है वो अंतर उतना ही बड़ा होता है।
अगर मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा- गुडिया भीतर गुड़िया- को पहले खंड- कस्तूरी कुंडल बसै -के बरक्श रखकर एक रचना के रूप में विचार करें तो दूसरा खंड पहले की तुलना में कुछ कमजोर है। लेकिन इसमें भी मैत्रेयी जब-जब गांव और अपनी जमीन की ओर लौटती हैं तो उनकी भाषा, उनका कथ्य एकदम से चमक उठता है।
अंत में इतना कहा जा सकता है कि गुड़िया भीतर गुड़िया यशराज फिल्मस की उस मूवी की तरह है, जिसमें संवेदना है, संघर्ष है , जबरदस्त किस्सागोई है. दिल को छूने वाला रोमांस है , भव्य माहौल है और अंत में नायिका की जीत भी - जब राजेन्द्र यादव अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हैं और मैत्रेय़ी को फोन करते हैं तो डॉक्टर शर्मा की प्रतिक्रिया - क्या बुड्ढा अस्पताल में भी तुम्हें बुला रहा है?
लेकिन वही डॉ. शर्मा कुछ देर बाद यादव जी के आपरेशन के कंसेंट फॉर्म पर दस्तखत कर रहे होते हैं । इस आत्मकथा में एक और बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आपबीती के बहाने दिल्ली के संपादकों और लेखक समुदाय के स्वार्थों बेनकाब किया है ।
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समीक्ष्य पुस्तक- गुड़िया भीतर गुड़िया
लेखक- मैत्रेयी पुष्पा
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 395 रुपये

Thursday, December 4, 2008

बुड्डों ने किया बेड़ागर्क- अनुपम श्रीवास्तव

सचिन जब भी फ्लॉप होते हैं तो यही आवाज़ एडिटोरियल मीटिंगों में गूंजती है कि 'बाहर करो बूढ़ों को' मगर सचिन कभी न कभी मौका देखकर अपने खेल से सभी को चुप कर देते हैं। मैं उन पत्रकारों की बात नहीं कर रहा हूं जो सिर्फ़ इसको भगवान जाग उठा या भगवान सो गया से ज्यादा नहीं समझते। चूंकि सारे संपादकों की रुचि क्रिकेट में है तो क्रिकेट का गुरु बनने की हर कोई कोशिश करता है या फिर दिखने की।
जब मैंने पत्रकारिता का ये प्रोफेशन ज्वाइन ही किया था तब किसी ने कहा था कि सीख जाओगे वक्त के साथ और ये भी जोड़ दिया की तुम अभी बच्चे हो। 'अच्छे-अच्छे गधे घोड़े बन गए इस प्रोफेशन में।' चाहे वो नेता, क्षेत्र या अपने बाप के दम पर आए हों।
कुम्बले और गांगुली रिटायर हो गए और बाकी सभी बूढ़ों का यही हाल होना है मगर जाने क्यों सचिन की बात अलग है। ये खिलाड़ी सारी दुनिया से टक्कर लेता है। शायद भारत का राइस ग्राफ भी ऐसा है जैसा सचिन का रहा। पिछले 19 सालों में जैसा कि लोग अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन की भूमिका में देखते थे। तब शायद भारत का भी लुकआउट वैसा ही था जैसा अमिताभ बच्चन की भूमिका रहती थी एंग्री यंग मैन में, जो शायद समाज से दुखी रहता था और उसका फ्रस्ट्रेशन परदे पर दिखता था।
मैंने सचिन के साथ जिया है क्योंकि जब से मैंने होश संभाला सचिन ही देखा। मुझे हमेशा से लगता है कि सचिन हम लोगों के मोटिवेटर हैं और 'सिंबल ऑफ़ होप' हमेशा रहे हैं। कहीं न कहीं मुझे मेरे पूरे स्ट्रगल पीरियड में जाने क्यों सचिन हमेशा याद रहते हैं।
चलो ये तो रहा हाल खेल का। देश-विदेश में जो घटनाएं हो रही हैं उससे हम पत्रकारों पर भारी संकट है। चुनाव का वक्त करीब है... तो आप किस आइडियोलॉजी से जुड़े पत्रकार हैं ये प्रश्न हमेशा आपसे जाने अंजाने पूछा जाता है मगर क्या जवाब है आपके पास। क्या आप संघी हैं या फिर वामपंथी या फिर बताएं कि leftist, rightist, centrist, capitalist हैं। हैं क्या आप। पत्रकार क्या कहे, साहब मैं तो पेट भरने आया हूं प्रोफेशनल हूं। मेरा इंटरेस्ट था इसलिए आया। 'आई एम हेयर बाई चॉइस नोट बाइ डीफॉल्ट ओर बाई चांस'... चल डॉयलाग मत मार। मुझे तो वही याद आता है जो मेरे रिश्तेदारों ने कहा था - जो कुछ नहीं कर पाता जिन्दगी में वही पत्रकार बनता है।
अब जमाना चाहे जो हो गया हो लाखों रुपये में मॉस कम्युनिकेशन की डिग्री मिलती हो या लाखों रुपये की नौकरी है और फिर वही मानसिक डाउनमार्केट सॉरी खांटी पत्रकारों के बीच की जिंदगी। मेरे पास नौकरी मांगने आए एक इन्टर्न ने कहा- सर मेरे पापा ने लाखों रुपये खर्चे कर ये कोर्स कराया है बस मुझे नौकरी दे दीजिए बाकी मैं कर लूंगा, नौकरी बची रहने का भी जुगाड़ देख लूंगा। बाकी मैं सीख लूंगा। मुझे बॉस, नौकरी दे दीजिये।
मैं जब मुंबई में था तो कई नए पत्रकार कहते थे कि जर्नलिस्ट "Is always ahead of times "। "master of all traits"- शायद वो अंग्रेजी के पत्रकार थे इसलिए कहते थे। मीडिया समाज का आईना होता है या फिर में पूछता हूं ' मीडिया में बीते लोग समाज का'... सही कहा बीड़ू
मैं भी कहां फंस गया, ज्ञान की बातों में, ज्ञान कि बातों से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। खैर, आजकल दफ्तरों में भी खेल होने लगा है। कंट्रोल में रहेगा। आजकल जैसा सारे न्यूज चैनलों में माहौल है थोड़ा चिल्लाइये, डोज दीजिये फिर जानिये आपकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा। सब डर कर काम करेंगे। खौफ का माहौल होगा, आपकी सब जी हुजूरी करेंगे बस खलीफा बन जाएंगे फिर क्या आप ही आप हैं।
शायद हम हिन्दुस्तानियों को डंडे के बिना काम करने की आदत ही नहीं है। तभी दिमागी शोरगुल में भी हमारी जिंदगी कटती है। नेचुरल इंस्टिंक्ट, टेलेंट क्या होता है। फ्लेयर इसलिये नहीं है क्योंकि सभी नौकरी या खानापूर्ति करने आए हैं। किसको दोष दें आप। अगर सब कुछ ठीक होता तो जो हाल हिन्दी न्यूज़ चैनलों का दिवालियापन है क्या दिवालियापान..अरे... भाई अगर ख़बर नहीं होगी तो हम क्या दिखायेंगे।
राखी सावंत का हैप्पी बर्थडे ही तो दिखायेंगे भले ही वो ऐश्वर्या, माधुरी या तब्बू, कैटरीना, दीपिका नहीं। अगर वो मीडिया को यूज, सॉरी..समय देना चाहें तो क्या बुराई है। ड्रामा हर रोज मिलता नहीं है। देश में हार्ड न्यूज़ देखता कौन है। हांलाकि चुनाव चल रहे हैं मगर फिर भी रेटिंग का सवाल है।
वो तो भला हो मुंबई ब्लास्ट का कि कुछ जर्नलिज्म करने को मिला। हम सब ने वो ही किया जो कभी भी किसी ने नहीं किया था। जाहिर तौर पर खबर ही ऐसी थी। मगर कहीं न कहीं हर पैमाने पर होड़ लगी हुई थी। आखिर बुराई क्या है इसमें। .......थैंक्स मुंबई ब्लास्ट....180 फीसदी का इजाफा हुआ व्यूअरशिप में। मगर अब तो ये खबर भी ख़त्म हो रही है। पब्लिक मेमोरी इज शॉर्ट ..अब फिर से नया कुछ खोजना पड़ेगा।
चुनाव है न मगर क्या जो जनता का गुस्सा है नेताओं के प्रति इससे चैनल संख्या या पोलिंग करने वालो की संख्या में इजाफा होगा। इस रिसेसन के दौर में भी हमारी निकल पड़ी..सही है बिड़ू। बाकवास बंद कर और नौकरी कर।
छोड़िए, नौकरी कीजिए..नौकरी...नहीं सर नहीं आपको सचिन बनना ही होगा... सचिन बनिए...सचिन बनिए...सचिन।