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Sunday, April 19, 2009
किताबों में क्रांति
Friday, April 17, 2009
लेखकों के मरने का इंतजार करते लेखक संगठन !
दूसरी सबसे शर्मनाक बात ये है कि इन लेखक संगठनों को किसी लेखक के मरने के बाद ही ही उसकी महत्ता समझ में आती है । लेखक के जीवित रहते ये संगठन लेखकों की रचनाओं पर कुछ भी करने से कतराते रहते हैं लेकिन उनके मरते ही उसे महान तथा उसकी रचनाओं को बेहद अहम बताने लग जाते हैं । इससे लगता तो ये है कि ये लेखक संगठन लेखकों की मरने की प्रतीक्षा कर रहा होता है । पिछले दिनों हिंदी के कवि सुदीप बनर्जी का निधन हुआ और तामम संगठनों के बीच उन्हें महान साबित करने की होड़ लग गई लेकिन मुझे नहीं याद कि उनके जीवित रहते किसी भी संगठन ने कोई मग्तवपूर्ण कार्यक्रम सुदीप बनर्जी पर आयोजित किया ।
कई साल पहले हिंदी के एक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने एक बातचीत में कहा था कि लेखक संगठन लेखकों के यूनियन नहीं है जो कॉपीराइट आदि के मुद्दे पर संघर्ष करें । उनका मानना था कि ये वैचारिक संगठन हैं जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है । अगर मंगलेश की बातों को मान भी लिया जाए तो सवाल ये उठता है कि वैचारिक संवेदना के प्रचार के लिए भी लेखक संगठन क्या कर रहे हैं ?
आज जरूरत इन लेखक संगठों की भूमिका पर पुन्रविचार की है । इन संगठनों की निष्क्रियता के पीछे वामपंथी राजनीति की हिम्मतपरस्ती और अवसरवादिता की राजनीति है । लेखको के बीच भी पद और पुरस्तार पाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है । वैचारिकता पर अवसरवादिता हावी हो गई है । तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि किस संगठन से जुड़कर उन्हें लाभ हो सकता है और ये तय करते ही वो उन संगठनों से जुड़कर साहित्यिक मठाधीशों का आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है । सच तो ये है कि इन दिनों लेखक संगठनों से न तो कोई उर्जा प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही कोई वैचारिक दिशा ।
लेखक संगठनों का इतना बुरा हाल है कि वो अपने ही साथी लेखकों के हित के लिए कुछ बी नहीं कर पा रहा है । कॉपीराइट हिंदी में लेखकों के लिए आज एक बड़ा मु्दा है और तमाम लेखक इसके शिकायत हो रहे हैं । लगातार प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की बात सामने आती रहती है लेकिन आजतक लेखक संगठनों ने इस शोषण के खिलाफ कोई ठोस आवाज नहीं उठाई है, आंदोनल की बात तो दूर । इसके अलावा भी की मुद्दे हैं जिनपर लेखक संगठनों की खोमोशी चिंतनीय है ।
दरअसल अब प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, और जन संसकृति मंच को आपसी भेदभाव भुलाकर साथ आकर एक नया सांस्कृतिक और साझा मंच बनाना चाहिए और लेखकों की मर्सिया पढ़ना बंद कर उनके जीवित रहते उनको उनका देय दिलाने के लिए प्रयास करना चाहिए तभी साहित्या का भी भला होगा और साहित्यकारों का भी । अन्यथा लेखक संघ अपने ही साथियों के मरने का इंतजार करनेवाला संगठन बनकर रह जाएगा ।
Sunday, April 12, 2009
जूता, कांग्रेस और अपराध बोध
Thursday, April 9, 2009
हिंदी साहित्य का राग 'कुलपति'
Sunday, April 5, 2009
बिहार में नीतीश की ‘जय हो’
लगभग चार सालों के बाद कुछ दिनों पहले मुझे बिहार जाने का मौका मिला । जब ट्रेन गया रेलवे स्टेशन पर रुकी और मैं उतरा तो सबकुछ आशा के अनुरूप ही था । शोरगुल-भीडभाड़, धक्का-मुक्की । किसी तरह बाहर आया तो बेतरतीब ढंग से गाड़ियां खड़ी थी । किसी तरह पार्किंग से निकलकर अपने गंतव्य की तरफ बढ़ा तो रास्ते में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर दिखा, बेसाख्ता मुंह से निकला, बिहार में फ्लाईओवर । लेकिन लगभग हफ्ते भर गया में रहने के दौरान समाज के हर तबके से बातचीत करने के बाद ये लगा कि कुछ बदलाव तो है । बिहार के कई शहरों में हर ओर बेहतरी के लिए काम हो रहा है । मुझे विश्वास है कि अगर आनेवाले दिनों में राजनैतिक नेतृत्व में यही इच्छा शक्ति रही तो बिहार भी किसी अन्य विकसित राज्य से कम नहीं होगी । बिहार में रहने के दौरान दौरान मेरी बातचीत समाज के कई तबके के लोगों से हुई । सब लोग कमोबेश नीतीश सरकार से संतुष्ट नजर आए । अखबारों में अपराध की खबरें बिल्कुल ही कम नजर आई । बातचीत से ये लगा राज्य में बेहतर शिक्षा का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है ।
मैं चार साल के बाद अपने गृह राज्य गया था, जाहिर है कानून व्यवस्था को लेकर मेरे मन में उसी जमाने की स्थिति चल रही थी । खबरिया चैनल में काम करते हुए बिहार के बाहुबली विधायकों के कारनामे आते ही रहते थे । जाहिर है जब बिहार में विकास की हचलच और उच्च शिक्षा में सुधार महसूस किया तो स्वाभाविक रूप से बाहुबलियों के बारे में जानने की इच्छा हुई । बातों बातों में टाल क्षेत्र के एक बड़े जमींदार से इसकी चर्चा कर दी । उन्होंने जो कहानी बताया उसे सुनकर दिल को बड़ा ही सुकून मिला । पता ये चला कि नीतीश सरकार ने चुनचुनकर बाहुबलियों के इलाके में ऐसे अफसरों की तैनाती कर दी है, जिन्होंने बाहुबलियों पर नकेल कस दी है । इस बात का समाज पर मनोवैज्ञानिक असर हुआ और छुटभैये अपराधियों और अपराध पर खुद-ब-खुद लगाम लग जाती है । इस दौरान मेरी बात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के धुर विरोधियों से भी हुई । सबों से बात करके ये नतीजा निकला कि राज्य में कानून और व्यवस्था की हालात में सुधार हुआ है । ये नहीं है कि स्थिति बिल्कुल सुधर गई है । लेकिन अपहरण और दिन दहाड़े गाड़ी लूट या फिर शो रूम से गाड़ी उठा ले जाने जैसी घटना लगभग बंद हो गई है । छोटे मोटे अपराध तो अब भी हो रहे हैं लेकिन लोगों के मन में इस बात का विश्वास पैदा हुआ है कि अपराधी पकड़े भी जा सकते हैं । शासन में लोगों का विश्वास जमना लोकतंत्र की मजबूती की निशानी है और पिछले तीन वर्षों के शसान काल में नीतीश सरकार ने लोगों के मन में ये विश्वास तो पैदा कर ही दिया है । राष्ट्रकवि दिनकर ने भी संसकृति के चार अध्याय में लिखा है कि विद्रोह, क्रांति या बगावत ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले अनेक काल तक पकते रहते हैं । अगर दिनकर जी की बातों में हम बदलाव को भी जोड़ लें तो बिहार के संदर्भ में सटीक बैठेगी । किसी भी तरह के बदलाव के लिए वक्त और राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है । उसके बगैर न तो विकास हो सकता है और न ही बदलाव । मैं नीतीश कुमार की बहुत सी नीतियों का समर्थक नहीं हूं लेकिन ये देखना और सुनना अछ्छा लगता है कि मेरे राज्य का कोई मुख्यमंत्री कंप्यूटर और विदेशी निवेश की बात करता है . सन 1991 में भारत की इकॉनोमी में बदलाव शुरु हुए लेकिन बिहार में सिवाए दूरसंचार के किसी भी क्षेत्र में उस तरह से बदलाव महसूस नहीं किया जिस तरह से देश के अन्य राज्यों का विकास हुआ । बिहार में लगभग दो दशकों तक विकास की बात ही नहीं हुई । बात हुई तो भूरा बाल की, जातिवाद की, और नरसंहार और प्रतिनरसंहार की। नीतीश कुमार के पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने न तो राज्य में कंप्यूटरीकरण और न ही विदेशी निवेश की बात की, प्रयास तो दूर की बात । आज जब हर राज्य में जमकर विदेशी निवेश हो रहा है तो बिहार में इसके लिए प्रयास शुरु हुए हैं । लगभग दो दशक पीछे चल रहा है बिहार । राज्य में किसी तरह का कोई निवेश नहीं हुआ तो इसके लिए सिर्फ शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व और उनकी सोच जिम्मेदार है । अगर बिहार में निवेशकों के लिए माहौल बनाया जाता और प्रयास किए जाते तो कोई वजह नहीं थी इस राज्य में निवेश नहीं होता । लेकिन अब राज्य में इस तरह की बातें भी होने लगी है तो जाहिर तौर पर काम भी शुरु हो गया है । जरूरत सिर्फ इस बात की है कि राजनैतिक इच्छा शक्ति बनी रहे और अभी नीतीश कुमार जिस तरह बिना किसी दबाव मे आए काम कर रहे हैं उसी तरह करते रहें, तो भूरा बाल साफ करने की बात करनेवाले लोग साफ हो जा सकते हैं । लोकसभा चुनाव में जनता विकास के दुश्मनों को करारा जवाब देने का मन बना चुकी है ।
Thursday, April 2, 2009
फ्रंट क्रांति लायेगा..।
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सुना है फिर से थर्ड फ्रंट बन रहा। सुना है एक बार फिर भारतीय राजनीति को नई दिशा देने की कवायद चल रही। सुना है इलेक्शन फिर पास है। सुना है इस थर्ड फ्रंट में लेफ्ट भी है। सुना है ये थर्ड फ्रंट बड़ा सेक्यूलर होगा। सुना है ये थर्ड फ्रंट भारत की थर्ड वर्ल्ड दुनिया के दर्द को समझेगा। सुना है ये थर्ड फ्रंट देश को नया प्रधानमंत्री देगा। सुना है देश की राजनीति में फिर क्रांति आने वाली है।
तो क्या थर्ड फ्रंट के इन क्रांतिकारियों से आप मिलना चाहेंगे। आइये इधर आइये। थोड़ा नीचे नजर डालिये। देखिये तो भारतीय राजनीति के इस विशाल समंदर में थर्ड फ्रंट की नाव में कौन कौन सवार कहां पर कैसे कांटा डाल रहा।
ये हैं हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवेगौड़ा। एक्स पीएम। एक्स सीएम। एक्स प्रो सोनिया। एक्स प्रो बीजेपी। एक्स ऐन्टी लेफ्ट। मोजूदा एन्टी सोनिया। मौजूदा एन्टी बीजेपी। मौजूदा प्रो लेफ्ट। भावी पीएम इन मेकिंग। मौजूदा पीएम इन मेकिंग जैसे मायावती, जयललिता, चंद्रबाबू नायडू एटसेटरा सरीखी लश्कर के लीडर। मुंह से किसान, कर्म से डेवलपमेंट के दुश्मन। एक्स एन्टी डाइनेस्टी। मौजूदा बेटे के अंध भक्त। सत्ता की लोलुपता है पिता-पुत्र डुओ की पहचान। बीजेपी से बेटे ने टाइ-अप किया। पिता श्री सोनिया के भरोसे 1996 में प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन फिलहाल हठ ये कि कांग्रेस और बीजेपी दोनो से बराबर की दूरी। 16 मई बाद इनमें से किसी की सरकार बनती दिखी तो एक को बड़ा मैनेस बता कर दूसरे से सट लेंगे।
सीपीएम - इनके पब्लिसिटी मैनेजर ने पार्टी की पब्लिसिटी कम अपनी ज्यादा की। इसलिये आज राज्य सभा में हैं। इनकी पार्टी कहती कुछ है करती कुछ है। बंगाल में कुछ बोलती है, दिल्ली में कुछ। 86 साल के ज्योति बसु को बंगाल की सीएमशिप से विदा करती है, केरल के अछूतानंदन को 85 की उम्र में मुख्यमंत्री बनाती है। टाटा से हैंडशेक करती है। केन्द्र में एसईजेड का विरोध। मजलूम की राजनीति भी करते हैं। नंदीग्राम और सिंगूर में उनपर गोली भी चलाते हैं। इनके मुताबिक मोदी घोर कम्यूनल है। लेकिन बंगाल का मुस्लिम डेवलेप्मेंट इन्डेक्स अरसों से लुढ़का पड़ा है। अभी तक उठ नहीं पाया। सरकार बनवाते है। सरकार गिराते हैं। दूर बैठ के खेल का मजा लेते हैं। छोटे भाई सीपीआई को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में घुसा देते हैं। खुद हिस्टॉरिक ब्लंडर कर देते हैं। सामने सामने पाक साफ मगर बैकसीट ड्राइविंग के उस्ताद। अब मायावती को स्टीयरिंग थमा कर सत्ता का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखने के मंसूबे बांध रहे।
जयललिता - इनके पास कभी बाटा के स्टोर से ज्यादा सैंडिलस्स और जूतियों की दुकान थी। यानि एक कमरे में अम्मा की जूतियां ही सजी थी। अम्मा अपने मूड के हिसाब से सैंडिल्स पहनती हैं। जितना सोना भप्पी लहरी अपने सीने पर लाद के चलते हैं उतना सोना तो जयललिता ने अपने खानसामे की बीवी को गिफ्ट कर दिया था। जयललिता खुद मैकेनास गोल्ड की वो गुफा जहां के सोने की रखवाली एक तीसरी शक्ति करती है। वो तीसऱी शक्ति भी खुद जयललिता ही हैं। इस गोल्ड से ऊबी तो तमिलनाडू के रियल एस्टेट गोल्ड पर नजर जमाती हैं। एक बार तो यें जबरदस्त फंस गयीं। जया अम्मा को अदालत नें तांसी जमीन घोटाले में पांच साल की सजा सुना दी। चुनाव भी नहीं लड़ पायीं। कभी हां तो कभी न। आडवाणी जी ने अंग वस्त्रम पहनाया तो अम्मा ने वाजपेयी के लिये रिटर्न गिफ्ट में ये गाना ब्लूटूथ किया --- खींचे मुझे कोई डोर, तेरी ओर... लेकिन साल भर बाद वाजपेयी जी ये गाते हुये नजर आये - तुम्हारी नजर क्यों खफा हो गयी..खता बख्श दो गर खता हो गयी। इस बार आडवाणी नहीं कांग्रेस पर डोरे डाल रहीं। थर्ड फ्रंट में हैं भी और नहीं भी। 16 मई बाद थर्ड फ्रंट से जुड़ कर यूपीए की शिप में कूदने का जुगाड़ भी तलाश रहीं।
सुश्री मायावती - मैं बन की चिड़िया बन के बन बन डोलूं रे...मास्टर कांशीराम से इस स्टूडेंट ने यही सीखा सत्ता के लिये कुछ भी करेगा। मन किया तो मुलायम से सटे, मन किया तो उसे दुतकार दिया। मन किया तो कल्याण से संधि। मन किया तो बीजेपी मनुवादी। मन किया तो बहुजन। मन किया तो सर्वजन। मन किया तो क्रिमिनल का सफाया। मन किया तो क्रिमिनल को चुनावी टिकट। मन किया तो हाथी को कांग्रेसी बन में दौड़ा दिया। मन किया तो रायबरेली में कांग्रेसी बन को रौंद दिया।
मन किया तो मास्टर जी की याद में करोड़ो की मूर्ति तराश दी। मन किया तो सैंकड़ो करोड़ लगा कर अपनी मूर्ती और विशाल बनवा दी। मन किया तो 5 कालीदास मार्ग से ताजमहल के बीच करप्शन का एक्सप्रेसवे बनवा दिया। मन किया तो ब्लू। मन किया तो पिंक। अब बोल रहीं पीएम बनना है सो, गिव मी रैड।
चंद्रबाबू नायडू - लेफ्ट वालों की तरह ये विदेशी ब्रांड की सिग्रेट नहीं पीते। लेकिन लेफ्ट से अलग शहरों के विकास और चकाचौंध पर बड़ा जोर देते हैं। मॉल कल्चर में घोर विश्वास है। सीपीएम की तरह सरकार को बाहर से समर्थन देते हैं। सीपीएम की तरह स्पीकर अपना बनाते हैं मगर सरकार से डिस्टेंस बना कर रखते हैं। कहीं अख्लियत छिटक न जाये। सीपीएम बैकसीट में माहिर तो बाबू केन्द्र से फंड निकलवाने में। वाजपेयी की इंडिया शाइनिंग में बाबू के मॉल कल्चर का भी योगदान था। फिर पब्लिक ने बाबू के मॉल और वाजपेयी के एनडीए कल्चर दोनों पर शटर गिरवा दिया। मन किया तो एनडीए मन किया तो अकेले। और फिर मन किया तो थर्ड फ्रंट जिन्दाबाद। बाबू कहते हैं पीएम नहीं बनना। ये चुनाव से पहले। चुनाव के बाद - वी विल क्रॉस द ब्रिज वेन इट कम्स।
थर्ड फ्रंट की चुनावी नौका में या तो लोग प्रधानमंत्री रह चुके हैं या पीएम बनने की ऐम्बिशन पाल रहे। ठीक भी है। खुदा न खास्ता सरकार बनी भी तो हर एक शक्स रोटेशन से एक साल प्रधानमंत्री रह सकता है। जिनको प्रधानमंत्री नहीं बनना वो अपना अपना कस्बा लेकर खुश हैं। अलग राज्य मिलेगा तो मुख्यमंत्री बन ही जायेंगे। इस थर्ड फ्रंट में सभी के लिये कुछ न कुछ है। ये थर्ड फ्रंट सर्वजन है। ये थर्ड फ्रंट सेक्यूलर है। इस थर्ड फ्रंट में लेफ्ट है। इस थर्ड फ्रंट में बड़े बड़े क्रांतिकारी है। ये भारी भरकम थर्ड फ्रंट की नाव किस ओर जायेगी पता नहीं। मंजिल मिलेगी या नहीं पता नहीं। चुनावी थपेड़ों को साथ झेल पायेगी पता नहीं। चुनाव के बाद किनारा मिलेगा या नही पता नहीं। किनारा आते आते कहीं सवार बीच में ही कूद के दूसरी शिप पर सवार हो जायेगा, पता नहीं। मगर हिंदुस्तान की राजनीति में जब जब इलेक्शन आयेंगे, थर्ड फ्रंट की नाव दूर क्षितिज पर नजर आ ही जायेगी।
Wednesday, April 1, 2009
साहित्य को शर्मसार करते दो बुजुर्ग
लेकिन हाल के दिनों में इन दोनों बुजुर्ग लेखकों ने अपनी शादी को लेकर जो कहा लिखा है उससे मन में ये सवाल उठने लगा है कि क्या हिंदी के इन दो प्रतिष्ठित लेखकों के पास लिखने के लिए अब कुछ नहीं रह गया है ।
हिंदी पत्रिका कथादेश के मार्च अंक में मन्नू भंडारी ने एक लंबा लेख लिखा है – सच को स्वीकार करने का साहस हो तभी साक्षात्कार दें । इस पूरे लेख में मननू जी ने ये साबित करने की कोशिश की है कि कथादेश के जनवरी अंक में राजेन्द्र यादव ने जो साक्षात्कार दिया उसमें दोनों की शादी को लेकर यादव जी ने गलत कहा और अब मन्नू भंडारी उसे ठीक कर रही हैं । एक आम हिंदी पाठक को इस बात से क्या लेना देना कि दोनों की शादी किन परिस्थितियों में हुई, क्यों हुई, किसने पहल की आदि आदि । मन्नू भंडारी, राजेन्द्र यादव से सच कहने की अपेक्षा करती हैं लेकिन मन्नू भंडारी में भी तो ये साहस नहीं है कि वो ये बता सकें कि मीता का असली नाम क्या था। इन दोनों के संबंधों में मीता तो वैसी ही हो गई है जैसी कि हिंदी साहित्य में स्नोबा बार्नो, जिसके बारे में सुना तो खूब जा रहा है लेकिन देखा किसी ने भी नहीं । साथ ही मन्नू ने किन परिस्थितियों में और किसकी वजह से राजेन्द्र यादव को घर से निकाला, ये बताने का साहस मन्नू भंडारी आजतक क्यों नहीं कर पाई ? बेहद चतुराई से इस, बात का उन्होंने अपनी आत्मकथा में उल्लेख नहीं किया और बचकर निकल गई । तो अगर खुद सच कहने और लिखने का साहस न हो तो दूसरों से ये अपेक्षा करना बेमानी है ।
रही बात राजेन्द्र यादव की तो वो तो पिछले दो दशकों से विवादों को जानबूझकर न्योता देते आ रहे हैं । लेकिन पहले राजेन्द्र यादव की रुचि साहित्यिक विवाद में हुआ करती थी जो हाल के दिनों में व्यक्तिगत विवादों तक पहुंच गी है । प्रचार पाने के लिए इस तरह से अपने संबंधों को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना देना हिंदी के पाठकों के साथ छल है । लेकिन जिस तरह से हाल के दिनों में गंभीर छवि वाली मन्नू भंडारी विवाद वीर हो गई हैं, वाकई वो चौंकानेवाला है । आज हिंदी का पाठक ये जानना चाहता है कि राजेन्द्र यादव या मन्नू भंडारी ने नया क्या लिखा है । ये जानने में उसकी कोई रुचि नहीं है कि दोनों की शादी में क्या हुआ था । दोनों के व्यक्तिगत झगड़ों को छापने के लिए संपादक भी कम जिम्मेदार नहीं है । एक संपादक में इतना साहस तो होना ही चाहिए कि वो ये कह सके कि राजेन्द्र जी या मन्नू जी आपके इस व्यक्तिगत झगड़े को हम अपनी अपनी पत्रिका में जगह नहीं दे सकते । लेकिन कथादेश संपादक से ये अपेक्षा बेमानी है । इन व्यक्तिगत विवादवीर बुजुर्ग लेखकों की वजह से आज हिंदी साहित्या शर्मसार है । शर्मसार हम भी हैं क्योंकि ये हमारे सबसे प्रतिष्ठित लेखकों में से एक हैं । गुजारिश ये कि बंद करो ये आपसी झगड़े और विशाल हिंदी पाठक समुदाय के बीच जो आपकी छवि और प्रतिष्ठा है उसको नेस्तानाबूद न करें ।
अनंत विजय
( ये एक बड़ा प्रश्न है, अगर बहस शुरु हो सके तो साहित्य का भला होगा )
Sunday, March 29, 2009
नन की आत्मकथा से उठा बवंडर
ऐसा नहीं है कि ये सब कुरीतियां सिर्फ हिंदू धर्म में ही मौजूद हैं । कुछ दिनों पहले कोलकाता की लेखिका मधु कांकरिया के उपन्यास- सेज पर संस्कृत- में जैन धर्म में संस्था और आस्था के नाम पर महलाओं के शोषण को साहसपूर्वक सामने लाया गया है । और अब मलयालम में प्रकाशित सिस्टर जेसमी की आत्मकथा ने चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं की पोल पट्टी खोलकर रख दी है । मलयाली भाषा में प्रकाशित इस उपन्यास के दो महीनों में ही तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और अब ये आत्मकथा हिंदी समेत कई भाषाओं में प्रकाशित होने की प्रक्रिया में है । लगभग पैंतीस साल कांग्रेगेशन में गुजारने के बाद सिस्टर जेसमी 2007 में वहां से बाहर निकलती है, गौरतलब है कि इन पैंतीस सालों में जेसमी ने 26 साल बतौर नन गुजारे । इस आत्मकथा के प्रकाशन के बाद कैथोलिक चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं में हड़कंप है ।
दरअसल ये आत्मकथा एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एक ऐसे परिवार से आती है जहां बेटी की स्कूल फीस भरने के लिए उसकी मां को जबरदस्त संघर्ष करना पड़ता है । ये वो दौर होता है जब जेसमी बारहवीं की छात्रा थी । उस वक्त त्रिसूर के बिशप जोसेफ कुंडुकुलम, जेसमी की सहायता के लिए आगे आते हैं । जब भी फीस के लिए के लिए जेसमी को पैसे की जरूरत होती है तो वह बिशप हाउस जाती है । सेंट थॉमस कॉलेज के पास की तंग गलियों से बिशप हाउस तक जाने का भी बेहद दिलचस्प वर्णन है । किस तरह से कॉलेज के लड़के उसपर कागज की हवाई जहाज रूपी मिसाइल फेंका करते थे और किस तरह से चर्च के प्रीस्ट उसको खा जानेवाली नजरों से घूरा करते थे । इन घबराहट के बीच वो बिशप से पैसे तो ले लेती थी लेकिन बगैर धन्यवाद दिए भाग आती थी । तमाम घटनाओं के बीच जेसमी परिवार को सन्न कर देनेवाला फैसला लेती है और बारहवीं की परीक्षा के बाद यीशू को खुद को समर्पित कर देती है ।
लेकिन ईसा मसीह को समर्पित होने के बाद जब वो कंफेशन के लिए जाती है तो उसको अपने चारों ओर एक रहस्यमय चुप्पी नजर आती है । आसपास चल रही खुसफुसाहट को जब वो ध्यान से सुनती है तो उसके होश फाख्ता हो जाते हैं । उसकी साथी कुसुमम और मारिया ने बताया कि जो भी लड़की कंफेशन के वक्त अंदर कमरे में जाती है उसको वहां मौजूद प्रीस्ट किस करता है । जब जेसमी कंफेशन के लिए जाती है तो फादर उससे भी किस करने की इजाजत मांगता है, जिससे जेसफी साफ इंकार कर देती है। दूसरी बार जब उसे दबाव डालकर उसी प्रीस्ट के पास भेजा जाता है तो अंदर जाकर जेसमी फादर को आगाह करती है कंफेशन रूम में किस करने को लेकर कांग्रेगेशन की लड़कियों में बहुत रोष है । लेकिन डर से विरोध नहीं कर पा रही हैं । फादर का उत्तर बेहद दिलचस्प ही नहीं हैरान करनेवाला भी है - मैंने हर किसी से किस करने की इजाजत ली है और जिसने मना किया है उसको मैंने किस नहीं किया । और ये सब तो जीजस और बाइबिल की आत्मा के अनुरूप है ।" लेकिन इस घटना से फादर बेहद विचलित हो जाते हैं और एडोरेशन-कम हीलिंग सेशन को जल्द से खत्म करने का हुक्म सुना देते हैं वो भी एक हल्के से बहाने से । इस सेशन के बाद फादर के हुक्म से जेसमी को उनके कमरे में भेजा जाता है । वहां फादर बाइबिल के पन्ने खोलकर होली किस के कोट्स पढ़कर सुनाते हैं । आप भी एक देखिए - सेंट पॉल ने कहा कि - एक दूसरे का अभिवादन पवित्र चुंबन से करें । पीटर कहते हैं - एक दूसरो को प्यार के चुंबन से विश करो, आदि आदि ।
चर्च के शुरआती दिनों में जेसमी को सिर्फ फादर के किस का ही सामना नहीं करना पड़ता है, उसका वास्ता मलयालम पढानेवाली टीचर से भी पड़ता है, जो समलैंगिक है । उसने जैसे ही जेसमी को देखा उसका दिल बल्लियों उछलने लगा और हालात पहली नजर में प्यार वाला पैदा हो गया । विम्मी ने जेसमी को लंबे-लंबे प्रेम पत्र लिखकर अपने प्यार का इजहार किया । हैरान और परेशान जेसमी को तब तो करंट सा झटका लगा जब एक पत्र में विम्मी ने उसके साथ समलैंगिक रिश्ते बनाने की बात का इजहार किया । जब विम्मी को जेसफी की तरफ से सकारात्मक जबाव नहीं मिलता है तो वह जेसमी के खिलाफ षड़यंत्र रचने में जुट जाती है । जेसमी पर जब चौतरफा दबाव बढ़ा तो उसने विम्मी के आगे समर्पण कर दिया । रात में विम्मी उसके बिस्तर में घुस आती थी और उसके साथ लेस्बियन रिश्ता कायम करती थी । जब वो ये संबंध बना रही होती तो हमेशा जोसमी के कान में कहती गर्भ के झंझट से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका यही संबंध है ।
जोसमी लंबे समय तक इस संबंध को झेलती रहती है लेकिन जब इंतहां होने लगती है तो वो मदर प्रोवेंशियल से दया की भीख मांगती है और किसी तरह वहां से अपना तबादला करवा लेती है । जब उसका ट्रांसफर ऑर्डर आता है तो विम्मी उसे बुरी तरह से धमकाती और प्रताड़ित करती है और कहती है कि वो उसे चैन से रहने नहीं रहने देगी । जो कालांतर में सच भी साबित होती है ।
नन के लिए सबसे बड़ी सजा ये होती है कि उसे कोई काम नहीं दिया जाए । तबादले के बाद ये खेल जोसफी के साथ शुरु होता है, पहले उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है और फिर उसे मानसिक तौर पर बीमार साबित करने के लिए तमाम दंद-फंद रचे जाते हैं । मदर प्रोवेंशियल क्लोडिया उसे पागल करार देना चाहती है । ये तमाम षडयंत्र चीख-चीखकर इस बात की गवाही देते हैं कि किस तरह से ननरी में कुछ लोग मिलकर एक सिंडिकेट की तरह ऑपरेट करते हैं और यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठानेवाले को पागल करार देकर नर्क में धकेल देते हैं ।
इस आत्मकथा में जीसस और बाइबिल के नाम पर दैहिक शोषण और फादर और नन के बीच अवैध देह संबंध बनाने की कोशिशों का भी पर्दाफाश किया गया है । सिस्टर जेसमी की शीघ्र प्रकाश्य इस आत्मकथा ने कैथोलिक समुदाय के बीच एक सन्नाटे जैसी स्थिति पैदा दी है और चर्च को इसपर आधिकारिक प्रतिक्रिया देते नहीं बन रहा । शायद बाइबिल से कोई उद्धरण खोजा जा रहा होगा ताकि उसके आधार पर सिस्टर को माफ किया जा सके । वैसे क्रिश्चियनिटी में कई बिडंबनाएं हैं और सबसे बड़ी बिडंबना तो ये है कि अगर कोई कुंवारी लड़की मां बनती है और बच्चा पैदा करती है और उसके बाद शादी करना चाहती है तो उसकी शादी चर्च में नहीं हो सकती । यहां ये बताते चलें कि ईसा मसीह का जन्म मेरी नाम की कुंवारी कन्या से हुआ था ।
इन सबसे इतर अगर हम इस आत्मकथा को हिंदी में प्रकाशित और चर्चित आत्मकथाओं के बरक्स रखकर देखें तो एक बुनियादी फर्क नजर आता है । इसमें जो सेक्स प्रसंग है वो कथा के साथ सहजता से आते हैं और वास्तविकता का एहसास कराते हैं जबकि हिंदी की आत्मकताओं में जबरदस्ती ठूंसे गए प्रतीत होते हैं ।
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समीक्ष्य पुस्तक- अमीन, द स्टोरी ऑफ ए नन
लेखिका- सिस्टर dजेसमी
Tuesday, March 24, 2009
BORN TO WIN- AN INTERVIEW WITH DR SHYAMA CHONA
Tuesday, March 3, 2009
पचासी साल की जवानी
Friday, February 20, 2009
यही तो सच्चा प्यार है......ऋचा अनिरुद्ध
वो चल फिर नहीं सकती, न जाने कितनी बीमारियां हैं उसको। जिंदगी भी बस कुछ ही दिनों की होगी उसके पास, अगर जल्द ही कोई चमत्कार न हुआ तो। लेकिन उसके पास एक ऐसी चीज है जिसके लिए शायद हर कोई सारी उम्र तरसता है। उसके पास सच्चा प्यार है। मैं बात कर रही हूं निवेदिता और उसके पति पंकज की।जब पंकज ने निवेदिता को पहली बार देखा था तभी उससे प्यार कर बैठा था। निवेदिता उस वक्त भी ठीक से चल नहीं पाती थी। उसका अपना परिवार तक उसका साथ छोड़ चुका था। पर पंकज ताउम्र उसके साथ बिताना चाहता था.....लेकिन क्यों? इसका जवाब पंकज के पास भी नहीं है। बस इतना सच है कि निवेदिता के साथ जीने के लिए पंकज ने अपने परिवार तक से रिश्ता तोड़ लिया।
लेकिन कुदरत ने उन दोनों प्रेमियों पर जुल्म कम नहीं किए या यूं कहिए कि पंकज को प्यार के इम्तिहान अब तक देने पड़ रहे हैं। निवेदिता की तबियत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। हालात दिन-ब-दिन मुश्किल होते जा रहे हैं। आर्थिक स्थिति भी कमजोर होती जा रही है। लेकिन पंकज की हिम्मत का क्या कहूं....उसकी एक बात ने दिल छू लिया। उसने बोला कि हीर रांझा अपने प्यार के लिए मर गए, हम जीना चाहते हैं।
पंकज निवेदिता का जिंदगी लाइव वैंलेंटाइन डे स्पेशल में आना अपने आप में एक चमत्कार है। शो 8 फरवरी को शूट होना था। सारी तैयारियां पूरी थीं कि अचानक 6 की शाम एक मेहमान ने आने से मना कर दिया। शो प्रॉड्यूसर नीतू बुद्धिराजा रो पड़ी। समझ नहीं आ रहा था क्या करें। मैंने एक बार फिर वो कहानियां खोलीं जो दर्शकों ने हमें IBNkhabar.com पर भेजी थीं। अचानक नजर निवेदिता के मेल पर पड़ी। सरसरी नजर से मैंने उसे देखा लेकिन उसने अपना फोन नंबर नहीं भेजा था।
मुझे 7 फरवरी को एक और एपिसोड शूट करना था, उसकी तैयारी करनी थी तो अपनी सहयोगी फरहीन से कहा कि निवेदिता को मेल लिखकर फौरन नंबर मांगे। सिर्फ 24 घंटे का वक्त था हमारे पास, पर न जाने क्यों मेरा दिल कह रहा था कि निवेदिता जरूर मिलेगी। 7 को शूट के बीच में फरहीन आई और बोली निवेदिता मिल गई। बस फिर जो हुआ वो मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी। नीतू बुद्धिराजा उनसे मिलने गई। 7 फरवरी 3 बजे रात तक उसने उन दोनों की कहानी लिखी और 8 फरवरी की सुबह निवेदिता और पंकज जिंदगी लाइव के स्टूडियो में थे।
आज मेरे दिल में बस एक ही दुआ है, जो चमत्कार निवेदिता और पंकज को जिंदगी लाइव में लाया ऐसा ही एक चमत्कार निवेदिता की जिंदगी बचा ले। उसे नई जिंदगी दे दे। उसे इलाज के लिए अमेरिका जाने की जरूरत है लेकिन साधन नहीं है उनके पास। काश! कहीं से उनको मदद मिल जाए। काश! इस प्यार की जीत हो। आज तक प्यार की बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को सुना था मैंने....लेकिन पंकज चुप रहकर बता गया मुझे कि सच्चा प्यार क्या होता है। वो मुझे सिखा गया कि यही होता है प्यार....।
अगर हो सके तो...
जिंदगी लाइव टीम के लिए सबसे सुकून के लम्हे वही होते हैं जब लोग हमें लिखते हैं या कॉल करते हैं कि हमारे शो से उनकी जिंदगी में, उनकी सोच में बदलाव आए। इस बार हमने आपको वैलेन्टाइन्स डे स्पेशल में पंकज और निवेदिता की प्रेम कहानी दिखाई। हमारे पास ढेरों फ़ोन कॉल आए। लोग निवेदिता के लिए सलामती की दुआएं कर रहे हैं। लेकिन उसके इलाज में लाखों का ख़र्च है। टीम ज़िंदगी लाइव की आप सभी से अपील है कि निवेदिता की मदद करें। आप हमें zindagilive@network18online.com या 09999024924 पर संपर्क कर सकते हैं।
Saturday, February 7, 2009
महानायक का खंडित व्यक्तित्व
अंग्रेजी में एक कहावत है - ए मैन इज नोन बाय द कंपनी ही कीप्स । इस लिहाज से हम अमिताभ बच्चन की मित्रमंडली पर जरा गौर फरमा लें - छोटे भाई अमर सिंह, पितातुल्य मुलायम सिंह यादव, सहारा के कर्ता-धर्ता सुब्रत राय और अनिल अंबानी । अगर अनिल अंबानी को छोड़ दिया जाए तो बाकी की ख्याति क्या है ये बताने की जरूरत नहीं है । भारत की जनता जब अपने महानायक अमिताभ बच्चन को मुलायम के आगे झुकता देखती है तो उसे पचा नहीं पाती । फिल्मों में क्रांतिकारी तेवरों वाले अपने नायक को राजनेताओं की प्रशस्ति गाते सुनना भारतीय जनमानस को भाता नहीं है । यहां ये तर्क दिया जा सकता है कि रील और रीयल लाइफ में फर्क होता है । चलिए अगर इस बात को मान भी लिया जाए तो अमिताभ जैसे सदी के महानायक,जो करोडों भारतीयों के आदर्श हैं, को लोग रियल लाइफ में एकदम विपरीत भूमिका में देखना पसंद नहीं कर पाते ।
अमिताभ बच्चन भारतीय फिल्म जगत के अबतक के सबसे बड़े स्टार माने जा सकते हैं । लगभग चार दशकों से बॉलीवुड पर एकछत्र राज कर रहे हैं । उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी जिस तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं वो सफलतापूर्वक निभा रहे हैं उसको तो सिर्फ सलाम ही किया जा सकता है । अपनी भूमिकाओं को लेकर बच्चन ने लगातार जितने प्रयोग किए हैं वो भी काबिले-तारीफ है । बच्चन की अदाकारी का रेंज इतना व्यापक है कि अब भी बॉलीवुड का कोई कलाकार रेंज के मुकाबले में उनके सामने नहीं टिक सकता है । चाहे वो ब्लैक फिल्म में अंधी लड़की रानी मुखर्जी के टीचर की भूमिका हो या फिल्म नि:शब्द में किशोरी पर फिदा एक बूढे का अभिनय हो या फिल्म चीनी कम में पैंसठ साल के प्रौढ का अपने से आधी उम्र की लड़की से प्यार करने की भूमिका हो , सबमें अमिताभ ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया । फिल्म झूम बराबर झूम में मस्ती का जो अंदाज अमिताभ की आंखों से झलकता है उसे देखना और महसूस करना काफी आनंददायक है ।
लेकिन अगर अभिनेता अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व पर समग्रता में विचार करें तो हर तरह के विवाद में अमिताभ रहे हैं । कुछ दिनों पहले इंकम टैक्स विभाग के नोटिस की वजह से अमिताभ सुर्खियों में रहे । इसके बाद एक विदेशी कार के टैक्स की किचकिच में भी बिग बी फंसे । पहले खबर आई कि भाई अमर सिंह ने भतीजे अभिषेक को जन्मदिन का तोहफा दिया है लेकिन जब कार के टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क को लेकर बवाल मचा तो अमर सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने उपयोग के लिए ये गाड़ी मुंबई में रखी है । कुछ दिनों पहले बाराबंकी में फर्जीवाड़े से जमीन अपने नाम कराने का मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट के लखनऊ बेंच तक पहुंचा । आरोप ये लगा कि मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में ग्रामसभा की जमीन बच्चन ने अपने नाम करवा ली । और इसके आधार पर पुणे में पावना डैम के पास खेती योग्य पांच एकड़ जमीन खरीदी । उस इलाके में ये नियम है कि कोई भी व्यक्ति जो किसान है वही वहां जमीन खरीद सकता है । इस मामले पर जब जमकर विवाद हुआ तो सदी के महानायक ने दरियादिली दिखाते हुए दोनों जमीनें दान करने का ऐलान कर दिया । अमिताभ से जुडा़ ही दूसरा मामला बंबई हाइकोर्ट में है – ये मामला है फेमा यानि विदेशी मुद्रा के गड़बड़झाले से जुडा़ । जिसपर भी नोटिस जारी किया जा चुका है ।
तो अगर हम महानायक के गढे हुए व्यक्तित्व और असली व्यक्तित्व को एक साथ समग्रता में देखें तो हमें महानायक की छवि में कई चेहरे नजर आते हैं । रील लाइफ का कद्दावर महानायक रियल लाइफ में बिल्कुल ही साधारण और आम आदमी की तरह हर तरह के दंद-फंद में व्यस्त ।
Monday, January 26, 2009
All and anything in the name of Terror and Pakistan- Vivek Avasthi
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Vivek avasthi is Senior Edior with IBN7
Tuesday, January 20, 2009
बॉलीवुड पर बाजार हावी
लेकिन नब्बे के दशक में जब आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की तो उसका असर फिल्म उद्योग पर भी दिखने लगा ।
आर्थिक उदारीकरण के दूसरे दौर में या यों कहें कि बीसबीं शताब्दी के आखिरी सालों में बॉलीवुड पर पूंजी की बरसात होने लगी । फिल्मों पर बड़ी अंतराष्ट्रीय कंपनियों ने दांव और पैसा लगाना शुरु कर दिया । अनिल अंबानी की ऐडलैब्स से लेकर सोनी इंटरनेशनल और इरोज इंटरनेशनल ने भारतीय फिल्मों पर एक सोची समझी रणनीति के तहत पैसा लगाना शुरु कर दिया और मोटी कमाई की । पिछले दिनों संजय लीला भंसाली की फिल्म कंपनी एसएलबी में सोनी इंटरटेनमेंट ने तीस से चालीस करोड़ रुपये लगाए और लगभग इससे दुगनी रकम की कमाई की । ये पहली भारतीय फिल्म थी जिसमें बॉलीवुड की कंपनी का पूरा पैसा लगा । खबर तो ये भी है कि सोनी ने इसके अलावा तीन और फिल्मों के लिए संजय लीला भंसाली की कंपनी के साथ कारार किया है । शाहरुख खान की कंपनी रेड चिली की फिल्म ओम शांति ओम पर भी लगभग तीस-चालीस करोड़ रुपये लगे, इस फिल्म का वितरण भी विदेशी कंपनी इरोज इंटरनेशनल के साथ मिलकर किया और कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले । भारतीय फिल्म बाजार की अपार संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कई अन्य विदेशी कंपनियों की नजर भी भारतीय फिल्म बाजार पर है और अगर बॉलीवुड के जानकारों की मानें तो आनेवाले दिनों में और भी कई करार देखने को मिल सकते हैं । विदेशी कंपनियों के पैसे पर बनने वाली फिल्मों में मार्केटिंग के लिए एक बड़ा बजट होता है और उस पैसे से एक ऐसी व्यूह रचना की जाती है जिसमें दर्शकों को फांसने का सारा खेल किया जाता है । हाल में आई कुछ फिल्में मार्केटिंग के बूते हिट रही हैं । बाजार का पहला शिकार कला और संस्कृति ही बनती है और भारत में भी ऐसा ही होता नजर आ रहा है । अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका के पूर्व अटार्नी भारत के दौरे पर थे । उन्होंने कोलकाता में एक साक्षात्कार में कहा कि उपभोक्तावाद और बाजारवाद, साम्राज्यवाद से ज्यादा खतरनाक है ।
भारतीय फिल्मों के इस कॉर्रपोरेटाइजेशन का सबसे बड़ा नुकसान सार्थक सिनेमा को हुआ । अब सामाजिक विषयों पर फिल्में बननी लगभग बंद हो गई । मंडी, अर्थ, पार, सारांश, मिर्च मसाला, अंकुश, तमस जैसी फिल्मों का दौर खत्म होता सा लग रहा है । इस बीच कम बजट की कुछ अच्छी फिल्में- हैदराबाद ब्लूज से लेकर भेजा फ्राई, वेलकम टू सज्जनपुर - बनी, लेकिन ये फिल्में भी एक खास दर्शकवर्ग को ध्यान में रखकर बनाई गई और उन दर्शकों ने इन फिल्मों को पसंद भी किया । ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या भारत से सार्थक सिनेमा का दौर खत्म हो गया है या यों कहें कि सामाजिक विषयों को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली फिल्मों को बाजार ने लील लिया है । क्या मार्केटिंग की वजह से घटिया फिल्में हिट होती रहेंगी और जो फिल्में कम बजट की होने के कारण अपनी मार्केटिंग नहीं कर पा रही हैं वो बेहतर होने के बावजूद पिटती रहेंगी । ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब फिल्म उद्योग से जुडें लोगों को शिद्दत से ढूढना ही होगा ।
Sunday, January 18, 2009
संभावनाओं के संकेत का उपन्यास
पिछले दिनों कई दलित लेखकों की आत्मकथाएं आई और संस्मरणात्मक उपन्यास भी छपे । पूर्व में छपे आत्मकथाओं और संस्मरणों से जो दलित लेखन का फार्मूला बना या यो कहें कि जो पद्धति विकसित हुई, उसी फार्मूले में अजय नावरिया भी फंस गए हैं । इस उपन्यास के नायक को पहला प्रेम भी वंदना झा (ब्राह्मण लड़की) से होता है और तमाम पारिवारिक विरोधों और सामाजिक मान्यताओं को ताक पर ऱखकर एक ब्राह्मण लड़की एक दलित से शादी भी कर लेती है । लेकिन कुछ ही दिनों बाद संस्करों या यों कहें कि दोनों की जीवन पद्धति का संघर्ष सामने आता है और नायक की मां और वंदना के बीच जमकर लडाई शुरु हो जाती है । वो दोनों अपने मां बाप से अलग रहना शुरु कर देते हैं । एक दिन जब नायक अपनी पत्नी को थप्पड़ मारता है तो वंदना भी पलटकर उसके गाल पर थप्पड जड़ देती है । यहीं से शुरु होता है प्रेम और नंगे यथार्थ में संघर्ष, जिसकी परिणति होती है वंदना की खुदकुशी से । विडंवना ये कि खुदकुशी के लिए लेखक परोक्ष रूप से वंदना को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करते हैं ।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती । नायक की फिर उसकी ही बिरादरी की संगीता से शादी होती है लेकिन मास्टर जी ( नायक) की जिंदगी में एक और औरत है - आएशा, जो हाई प्रोफाइल वेश्या है और तमाम धनपशु और बडे पुलिस अधिकारी उसके क्लाइंट हैं । आएशा मास्टर जी की शराफत पर फिदा है । दरअसल पहली ही मुलाकात में आएशा मास्टर जी को खुला मिमंत्रण देती है, जिसे वो बेहद शराफत से ठुकरा देते हैं । मास्टर जी और आएशा का रिश्ता बेहद पवित्र किस्म का दिखाने की कोशिश की गई है । उन्हें आएशा के साथ हंसना, बोलना, बीयर पीना, कॉफी पर घंटों बतियाना अच्छा लगता है। मन का रिश्ता बनता है लेकिन शरीर का नहीं । लेकिन अंतत एक रात दोनों के बीच 'चुप्पी की मकड़ी जाल बुनती है और वो उस जाल में फंसकर आएशा के साथ एक बिस्तर पर रात गुजार कर सुबह उठते हैं तो तरोताजा होते हैं।" संकेत साफ हैं ।
इस बीच मास्टर जी और उनकी दूसरी पत्नी संगीता के बीच भी नहीं निभती है और पति पत्नी अलग रहने लगते हैं । मास्टर जी के भाई की शादी के मौके जब संगीता घर लौटती है, तो अपने घर में आएशा को देखकर और ये जानकर कि वो उसके पति की दोस्त है स्वाभाविक रूप से नाराज होती है । और नाराजगी प्रकट कर घर छोड़कर चली जाती है । लेकिन कहानी कई मोड़ लेती है और संगीता गर्भवती होती है । कहानी का अंत सुखद है, संगीता और मास्टर जी के एक बेटी पैदा होती है और दोनों फिर जुड़ जाते हैं । मास्टर जी की मां कहती हैं - "औरत मर्द आसानी से अलग हो सकते हैं....मां बाप का अलग होना इतना आसान नहीं होता ।"
अगर हम समग्रता में अजय नावरिया के इस पहले उपन्यास पर विचार करें तो दलित लेखन के खांचे में लिखा गया फार्मूलाबद्ध उपन्यास है । इतना अवश्य है कि इस उपन्यास में लेखक ने अपने अंदर की प्रतिभा के संकेत दिए है । अगर अजय नावरिया अपने पूर्वाग्रहों और फार्मूलाबद्ध दलित लेखन पद्धति से इतर लिखेगें तो बेहतर लिख पाएंगे । इन संभावनाओं के पर्याप्त प्रमाण इस उपन्यास में यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। नायक एक ऐसा दलित है जिसके तमाम मित्र उंचे ओहदों पर हैं, उनका समाज, उनकी सोच और उनके द्वंद पर अगर लेखक फोकस करते और दलित लेखन की लीक को छोड़ पाते तो एक नया समाज हमारे सामने होता । अजय का अनुभव संसार व्यापक प्रतीत होता है लेकिन उसे वो सिर्फ छूकर निकल जाते हैं जो उनकी इस कृति को एक साधारण कृति में बदल देता है ।
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समीक्ष्य कृति- उधर के लोग
लेखक- अजय नावरिया
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, 1- बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
नई दिल्ली- 110002
Friday, January 16, 2009
दलित अल्पसंख्यक सशक्तीकरण का दस्तावेज
ऐसा नहीं है कि इस किताब में सिर्फ राजनेताओं के ही लेख हैं । इस भारी भरकम ग्रंथ में पांच खंड हैं जिसमें देश के प्रमुख विचारकों और दलित चिंतकों के लेख हैं - जिसमें असगर अली इंजीनियर, पी एस कृष्णन, प्रो. मुशीरुल हसन, डॉ सतीनाथ चौधरी, इम्तियाज अहमद आदि प्रमुख हैं । इस पुस्तक के दूसरे खंड में वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली ने अपने लंबे शोधपरक आलेख में भारत में मुस्लिम समुदाय के साथ होनेवाले भेदभाव को रेखांकित किया है । बेहद श्रमपूर्वक लिखे गए इस लेख में कुरबान ने भारत के मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन की असलियत और उसके कारणों के अलावा सांप्रदायिक हिंसा को आंकड़ों के आधार पर विश्लेषित किया है । कुरबान के लेख को पढ़ते हुए मुझे पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल से सुना एक संस्मरण याद हो आया । गुजराल साहब जब सूचना और प्रसारण मंत्री बने तो तो वो जाकिर हुसैन साहब से मिले गए और बातों-बातों में मंत्रालय में मुसलमान चपरासियों के बारे में बात चल निकली तो गुजराल साहब ने कहा कि वो अपने मंत्रालय में मुसलमान चपरासियों की संख्या का पता करेगें । ये सुनकर जाकिर साहब ने कहा कि इस मुल्क में मुसलमान का राष्ट्रपति बनना तो आसान है लोकिन चपरासी बनना बेहद मुश्किल । जाकिर हुसैन साहब की ये बात हमारे समाज और मुल्क की एक ऐसी हकीकत है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है । इसके बाद गुजराल साहब ने अपने मंत्रालय में पता किया तो एक भी मुसलमान चपरासी नहीं मिला और जब सारे मंत्रालयों के बारे में जानकारी इकट्ठा की गई तो आंकड़े जाकिर साहब की बयान की तस्दीक कर रहे थे ।
संतोष भारतीय द्वारा संपादित इस किताब में की ऐसे लेख हैं जो अब के समाज में दलितों और अल्पसंख्यकों की स्थिति को आईना दिखाते हैं । ये किताब इस लिहाज से भी अहम बन गई है कि इसमें एक जगह दलितों और अल्पसंख्यकों के बारे में विद्वानों, विचारकों और देश के नीति नियंताओं के विचार खुलकर सामने आए हैं और हिंदी में मेरे जानते इस तरह की कोई किताब उपलब्ध नहीं है । इस वजह से इस किताब का एक स्थायी महत्व है और भविष्य में इसका उपयोग एक संदर्भ ग्रंथ के रूप में होगा । ये किताब हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुई है ।
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समीक्ष्य पुस्तक - दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण
लेखक- संतोष भारतीय
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
Thursday, January 15, 2009
स्त्री आकांक्षा का नया चित्र
हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की आंधी के बीच जब पत्रकार गीताश्री कि किताब – स्त्री आंकाक्षा के मानचित्र- प्रकाशित हुई तो उसके कवर ने पाठकों का खासा ध्यान अपनी ओर खींचा । दरअसल कवर पर एक लड़की गीले कपड़ों में एक कमरे की खिड़की से बाहर समुद्र को देख रही है । इस तस्वीर से किताब के मिजाज के बारे में संकेत मिल जाता है। कहावत भी है कि लिफाफा देखकर खत का मजमून पता चल जाता है । लेकिन जब मैंने किताब पढ़ना शुरु किया को कवर से ज्यादा आकर्षित पुस्तक में संकलित लेखों ने किया । अपनी इस पहली किताब की भूमिका में लेखिका कहती हैं कि आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में औरत की जिम्मेवारी और जवाबदेही तो तय है मगर आज भी उसके अधिकार और स्पेस तय नहीं हैं । गीताश्री की छवि एक बिंदास और खरी-खरी कहने और लिखनेवाली पत्रकार की है और भूमिका में भी इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि किताब में क्या होनेवाला है ।गीता
वेश्या और उसके समाज का चित्रण हिंदी साहित्य में ही नहीं, हर भाषा और देश के साहित्य में जरूरत से ज्यादा हुआ है । अधिकतर पुरुषों द्वारा, कुछ हद तक स्त्रियों द्वारा भी । पर इन वेस्याओं का चित्रण बहुआयामी जटिल इंसान के रूप में जरा कम ही हुआ है । लेकिन गीताश्री ने अपने लेख-अंधेरी गली के रोशन मकान- में कोलकाता की रेडलाइट एरिया की यौनकर्मियों की स्थिति और उनके संघर्ष को जिस तरह से उभारा है वो किसी को भी सोचने पर विवश कर देता है । सोनागाछी की यौनकर्मियां किस तरह से सरकार से मनोरंजनकर्मी का दर्जा देने को लेकर जूझ रही है और मनोरंजन कर देने के लिए सीना ठोक कर तैयार है वो एक नए बहस को जन्म देने के लिए काफी है । गीताश्री पत्रकार तो हैं ही साहित्य जगत में भी उनकी आवाजाही नियमित रही है । दिल्ली में बुजुर्ग साहित्यकार और संपादक किस तरह से भी किसी भी युवा लेखिका को हाथों-हाथ लेते हैं और उसको महान रचनाकार साबित करने पर तुल जाते हैं लेकिन उनकी मानसिकता क्या होती है इसको गीता ने अपने लेख – उठो कवियो, नी कवयित्री आई है – में बेनकाब किया है । एक और जो लेख इस किताब में अहम है वो है – लेस्बियन लोक की मानसिकता । अपने इस लेख में लेखिका ने स्त्रियों की समलैंगिकता को कोमलता से जोडा़ है । प्रचीन भारतीय समाज में लेस्बियनिज्म को ढूंढती लेखिका कामसूत्र तक पहुंच जाती है और गणिकाओं के बहाने से उस वक्त के सामज में समलैंगिकता को सामने लाती हैं । साथ ही विश्व साहित्य में सीमोन, अरस्तू के विचारों के आधार पर लेस्बियनिज्म को एक मानवीय चश्मे से देखने का प्रयास किया गया है । गीताश्री के विचारों से सहमति आवश्यक नहीं है लेकिन बहस का एक आधार और इल विषय पर नए सिरे से विमर्श की चुनौती तो देती ही है ।
कुल मिलाकर अगर स्त्री आकांक्षा के इस नए मानचित्र पर विचार करते हैं तो उपरी तौर पर पाते हैं कि इस मानचित्र में कई खांचे बेहद साधारण और सामान्य लगते हैं लेकिन गहराई से विचार करने पर ये बेहद गंभीर और विचारोत्तेजक हैं । गीताश्री अपने लेखों में कई अहम विषयों को सरसरी तौर पर छूकर निकल गई है जो कि गंभीर विश्लेषण और लेखिका के विचारों की मांग करते हैं लेकिन लेखिका की पहली किताब होने की वजह से इसको नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन इस किताब ने स्त्री आकांक्षा के नए बनने वाले चित्र का खाका तो खींच ही दिया है ।
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समीक्ष्य पुस्तक- स्त्री आकांक्षा के मानचित्र
लेखिका- गीताश्री
प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य- 200 रुपये
Sunday, December 14, 2008
बुड्ढा अस्पताल में भी बुला रहा है !
हिंदी में इस तरह का पहला प्रयोग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1876 में पहली बार - एक कहानी, कुछ आपबीती, कुछ जगबीती में किया था । लेकिन जब छह साल बाद जब मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का दूसरा खंड- गुडिया भीतर गुडिया- प्रकाशित हुआ तो लेखिका ने इस बात से किनारा कर लिया और पाठकों के सामने पूरी तौर पर इसे आत्मकथा के रूप में प्रस्तुत किया, और एक अनावश्यक विवाद से मुक्ति पा ली।
पहले खंड - कस्तूरी कुंडल बसै- में लेखिका ने मैं के परतों को पूरी तरह खोल दिया लेकिन दूसरे खंड में मैं को खोलने में थोड़ी सावधानी बरती गई है, ऐसा लगता है। पहले खंड में मैत्रेयी और उनेक मां के संघर्षों की कहानी है और दूसरे में सिर्फ मैत्रेयी का संघर्ष है या कुछ हद तक उनके पति डॉक्टर शर्मा का द्वंद । पहला खंड इस वाक्य पर खत्म होता है - घर का कारागार टूट रहा है।
उससे ही दूसरे खंड का क्यू लिया जा सकता है और जब दूसरा खंड आया तो न केवल कारागार टूटा बल्कि घर का कैदी पूर्ण रूप से आजाद होकर सारा आकाश में विचरण करने लगा । 'गुडिया भीतर गुडिया' में शुरुआत में तो उत्तर प्रदेश के एक कस्बाई शहर से महानगर दिल्ली पहुंचने और वहां घर बसाने की जद्दोजहद है, साथ ही एक इशारा है पति के साथी डॉक्टर से प्रेम का का भी।
लेकिन दिलचस्प कहानी शुरू होती है दिल्ली से निकलनेवाले साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सह संपादक की रंगीन मिजाजी के किस्सों से। किस तरह से एक सह संपादक नवोदित लेखिका को फांसने के लिए चालें चलता है, इसका बेहद ही दिलचस्प वर्णन है । साथ ही इस दौर में लेखिका की मित्र इल्माना का चरित्र चित्रण भी फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड के तौर पर हुआ है, कहना ना होगा कि इल्माना के भी अपने गम हैं और इसी के चलते दोनों करीब आती हैं।
मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के बारे में इतना ज्यादा लिखा गया कि मैत्रेयी की आत्मकथा की उत्सुकता से प्रतीक्षा करनेवाले पाठकों की रुचि ये जानने में भी थी कि मैत्रेयी, राजेन्द्र यादव के साथ अपने संबंधों को वो कितना खोलती हैं । लेकिन मैत्रेयी पुष्पा और राजेन्द्र यादव के संबंधों में सिमोन और सार्त्र जैसे संबंध की खुलासे की उम्मीद लगाए बैठे आलोचकों और पाठकों को निराशा हाथ लगेगी।
हद तो तब हो जाती है जब राजेन्द्र यादव राखी बंधवाने मैत्रेयी जी के घर पहुंच जाते हैं, हलांकि मैत्रेयी राखी बांधने से इंकार कर देती हैं। राजेन्द्र यादव को लेकर मैत्रेयी को अपने पति डॉक्टर शर्मा की नाराजगी और फिर जबरदस्त गुस्से का शिकार भी होना पड़ता है।
लेकिन शरीफ डॉक्टर गुस्से और नापसंदगी के बावजूद राजेन्द्र यादव की मदद के लिए हमेसा तत्पर दिखाई देते हैं, संभवत: अपनी पत्नी की इच्छाओं के सम्मान की वजह से। लेखिका ने अपने इस संबंध पर कितनी ईमानदारी बरती है, ये कह पाना तो मुश्किल है,लेकिन मैं सिर्फ टी एस इलियट के एक वाक्य के साथ इसे खत्म करूंगा- भोगनेवाले प्राणी और सृजनकरनेवाले कलाकार में सदा एक अंतर रहता है और जितना बड़ा वो कलाकार होता है वो अंतर उतना ही बड़ा होता है।
अगर मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा- गुडिया भीतर गुड़िया- को पहले खंड- कस्तूरी कुंडल बसै -के बरक्श रखकर एक रचना के रूप में विचार करें तो दूसरा खंड पहले की तुलना में कुछ कमजोर है। लेकिन इसमें भी मैत्रेयी जब-जब गांव और अपनी जमीन की ओर लौटती हैं तो उनकी भाषा, उनका कथ्य एकदम से चमक उठता है।
अंत में इतना कहा जा सकता है कि गुड़िया भीतर गुड़िया यशराज फिल्मस की उस मूवी की तरह है, जिसमें संवेदना है, संघर्ष है , जबरदस्त किस्सागोई है. दिल को छूने वाला रोमांस है , भव्य माहौल है और अंत में नायिका की जीत भी - जब राजेन्द्र यादव अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हैं और मैत्रेय़ी को फोन करते हैं तो डॉक्टर शर्मा की प्रतिक्रिया - क्या बुड्ढा अस्पताल में भी तुम्हें बुला रहा है?
लेकिन वही डॉ. शर्मा कुछ देर बाद यादव जी के आपरेशन के कंसेंट फॉर्म पर दस्तखत कर रहे होते हैं । इस आत्मकथा में एक और बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आपबीती के बहाने दिल्ली के संपादकों और लेखक समुदाय के स्वार्थों बेनकाब किया है ।
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समीक्ष्य पुस्तक- गुड़िया भीतर गुड़िया
लेखक- मैत्रेयी पुष्पा
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 395 रुपये
Thursday, December 4, 2008
बुड्डों ने किया बेड़ागर्क- अनुपम श्रीवास्तव
जब मैंने पत्रकारिता का ये प्रोफेशन ज्वाइन ही किया था तब किसी ने कहा था कि सीख जाओगे वक्त के साथ और ये भी जोड़ दिया की तुम अभी बच्चे हो। 'अच्छे-अच्छे गधे घोड़े बन गए इस प्रोफेशन में।' चाहे वो नेता, क्षेत्र या अपने बाप के दम पर आए हों।
कुम्बले और गांगुली रिटायर हो गए और बाकी सभी बूढ़ों का यही हाल होना है मगर जाने क्यों सचिन की बात अलग है। ये खिलाड़ी सारी दुनिया से टक्कर लेता है। शायद भारत का राइस ग्राफ भी ऐसा है जैसा सचिन का रहा। पिछले 19 सालों में जैसा कि लोग अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग मैन की भूमिका में देखते थे। तब शायद भारत का भी लुकआउट वैसा ही था जैसा अमिताभ बच्चन की भूमिका रहती थी एंग्री यंग मैन में, जो शायद समाज से दुखी रहता था और उसका फ्रस्ट्रेशन परदे पर दिखता था।
मैंने सचिन के साथ जिया है क्योंकि जब से मैंने होश संभाला सचिन ही देखा। मुझे हमेशा से लगता है कि सचिन हम लोगों के मोटिवेटर हैं और 'सिंबल ऑफ़ होप' हमेशा रहे हैं। कहीं न कहीं मुझे मेरे पूरे स्ट्रगल पीरियड में जाने क्यों सचिन हमेशा याद रहते हैं।
चलो ये तो रहा हाल खेल का। देश-विदेश में जो घटनाएं हो रही हैं उससे हम पत्रकारों पर भारी संकट है। चुनाव का वक्त करीब है... तो आप किस आइडियोलॉजी से जुड़े पत्रकार हैं ये प्रश्न हमेशा आपसे जाने अंजाने पूछा जाता है मगर क्या जवाब है आपके पास। क्या आप संघी हैं या फिर वामपंथी या फिर बताएं कि leftist, rightist, centrist, capitalist हैं। हैं क्या आप। पत्रकार क्या कहे, साहब मैं तो पेट भरने आया हूं प्रोफेशनल हूं। मेरा इंटरेस्ट था इसलिए आया। 'आई एम हेयर बाई चॉइस नोट बाइ डीफॉल्ट ओर बाई चांस'... चल डॉयलाग मत मार। मुझे तो वही याद आता है जो मेरे रिश्तेदारों ने कहा था - जो कुछ नहीं कर पाता जिन्दगी में वही पत्रकार बनता है।
अब जमाना चाहे जो हो गया हो लाखों रुपये में मॉस कम्युनिकेशन की डिग्री मिलती हो या लाखों रुपये की नौकरी है और फिर वही मानसिक डाउनमार्केट सॉरी खांटी पत्रकारों के बीच की जिंदगी। मेरे पास नौकरी मांगने आए एक इन्टर्न ने कहा- सर मेरे पापा ने लाखों रुपये खर्चे कर ये कोर्स कराया है बस मुझे नौकरी दे दीजिए बाकी मैं कर लूंगा, नौकरी बची रहने का भी जुगाड़ देख लूंगा। बाकी मैं सीख लूंगा। मुझे बॉस, नौकरी दे दीजिये।
मैं जब मुंबई में था तो कई नए पत्रकार कहते थे कि जर्नलिस्ट "Is always ahead of times "। "master of all traits"- शायद वो अंग्रेजी के पत्रकार थे इसलिए कहते थे। मीडिया समाज का आईना होता है या फिर में पूछता हूं ' मीडिया में बीते लोग समाज का'... सही कहा बीड़ू
मैं भी कहां फंस गया, ज्ञान की बातों में, ज्ञान कि बातों से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। खैर, आजकल दफ्तरों में भी खेल होने लगा है। कंट्रोल में रहेगा। आजकल जैसा सारे न्यूज चैनलों में माहौल है थोड़ा चिल्लाइये, डोज दीजिये फिर जानिये आपकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा। सब डर कर काम करेंगे। खौफ का माहौल होगा, आपकी सब जी हुजूरी करेंगे बस खलीफा बन जाएंगे फिर क्या आप ही आप हैं।
शायद हम हिन्दुस्तानियों को डंडे के बिना काम करने की आदत ही नहीं है। तभी दिमागी शोरगुल में भी हमारी जिंदगी कटती है। नेचुरल इंस्टिंक्ट, टेलेंट क्या होता है। फ्लेयर इसलिये नहीं है क्योंकि सभी नौकरी या खानापूर्ति करने आए हैं। किसको दोष दें आप। अगर सब कुछ ठीक होता तो जो हाल हिन्दी न्यूज़ चैनलों का दिवालियापन है क्या दिवालियापान..अरे... भाई अगर ख़बर नहीं होगी तो हम क्या दिखायेंगे।
राखी सावंत का हैप्पी बर्थडे ही तो दिखायेंगे भले ही वो ऐश्वर्या, माधुरी या तब्बू, कैटरीना, दीपिका नहीं। अगर वो मीडिया को यूज, सॉरी..समय देना चाहें तो क्या बुराई है। ड्रामा हर रोज मिलता नहीं है। देश में हार्ड न्यूज़ देखता कौन है। हांलाकि चुनाव चल रहे हैं मगर फिर भी रेटिंग का सवाल है।
वो तो भला हो मुंबई ब्लास्ट का कि कुछ जर्नलिज्म करने को मिला। हम सब ने वो ही किया जो कभी भी किसी ने नहीं किया था। जाहिर तौर पर खबर ही ऐसी थी। मगर कहीं न कहीं हर पैमाने पर होड़ लगी हुई थी। आखिर बुराई क्या है इसमें। .......थैंक्स मुंबई ब्लास्ट....180 फीसदी का इजाफा हुआ व्यूअरशिप में। मगर अब तो ये खबर भी ख़त्म हो रही है। पब्लिक मेमोरी इज शॉर्ट ..अब फिर से नया कुछ खोजना पड़ेगा।
चुनाव है न मगर क्या जो जनता का गुस्सा है नेताओं के प्रति इससे चैनल संख्या या पोलिंग करने वालो की संख्या में इजाफा होगा। इस रिसेसन के दौर में भी हमारी निकल पड़ी..सही है बिड़ू। बाकवास बंद कर और नौकरी कर।
छोड़िए, नौकरी कीजिए..नौकरी...नहीं सर नहीं आपको सचिन बनना ही होगा... सचिन बनिए...सचिन बनिए...सचिन।

