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Sunday, April 17, 2011

महानगरीय जीवन की त्रासदी

राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के एक बेहद पॉश इलाके की बहुमंजिला इमारत के एक फ्लैट में सात महीने से दो बहनें गुमनाम जिंदगी जी रही थी । ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्तिगत अवसाद और असुरक्षा बोध की वजह से दोनों बहनें अनुराधा और सोनाली ने खुद को अपने फ्लैट में कैद कर लिया था । पिछले सात महीनों से दोनों बहनें ना तो घर से बाहर निकल रही थी और ना ही बाहर की दुनिया से या फिर अपने नाते रिश्तेदारों से कोई संपर्क रख रही थी । यह भी बेहद हैरान करनेवाला और चौंकानेवाल तथ्य सामने आया है कि चंद फीट के फासले पर मौजूद दूसरे फ्लैट में रह रहे परिवारों से भी उनका किसी तरह का कोई नहीं संबंध था । सात महीने बाद जब मीडिया में खबर प्रकाशित होने के बाद पुलिस की मौजूदगी में गैर सरकारी संगठन की मदद से फ्लैट को दोनों बहनों के विरोध के बावजूद ताला तोड़ कर खोला गया तो अंदर का मंजर दिल दहला देनेवाला था । फ्लैट में भयानक बदबू के बीच जिंदगी जी रही दोनों बहनों की हालत बेहद खराब थी । पूरे फ्लैट में खाने पीने का कोई सामान मौजूद नहीं था । जाने कब से दोनों बहनों ने खाना नहीं खाया था। महीनों की तन्हाई और कुछ नहीं खाने-पीने की वजह से एक बहन तो नरकंककाल में तब्दील हो चुकी थी और दूसरी चलने फिरने लायक तो थी लेकिन अस्पताल पहुंचते ही उसकी हालत भी खराब हो गई । बड़ी बहन तो खुलेपन में चौबीस घंटे भी जिंदा नहीं रह सकी जबकि दूसी भी सदमे में और तमाम बीमारियों की वजह से अस्पताल में बेंटिलेटर पर मौत और जिंदगी के बीच झूल रही है । नोएडा की इन बहनों की यह काहनी बेहद डरावनी लगती है लेकिन उससे भी भयावह है समाज का और हमारा आपका संवेदनाशून्य हो जाना । आपके पड़ोस में दो अकेली लड़की रहती है, उसके माता-पिता की मौत हो चुकी है, भाई वयक्ति कारणों से घर छोड़कर जा चुका होता है । दोनों की नौकरी चली जाती है । आर्थिक और समाजिक असुरक्षा का बोध इतना गहरा हो जाता है कि वो खुद को अपने घर में कैद कर लेती है । इतना सबकुछ होने के बाद भी आस पड़ोस के लोग दोनों बहनों की हालात से बेखबर रहते हैं, दो घरों के बीच की दीवार इतनी मोटी हो जाती है कि दीवार के उस पार तिल तिल कर मर रही दो जिंदगियों की सिसकियां भी पड़ोसियों को सुनाई नहीं देती या फिर हम उन्हें सुनना नहीं चाहते । इन दोनों की कारुणिक दास्तान से हमको, हमारे समाज को लेकर कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं । क्या इन बहनों की हालत के लिए हम और आप जिम्मेदार नहीं है । एक बहन की मौत खुदकुशी नहीं बल्कि हत्या है । समाज की संवेदनाशून्यता ने उनकी हत्या कर दी । सवाल यह उठ खड़ा होता है कि हम और आप इतने संवेदनहीन क्यों हो गए हैं । क्यों समाज और आस पड़ोस को लेकर हमारी संवेदनाएं मर गई हैं । वसुधैव कुटुम्बकम की हमारी परंपरा से हम इतने दूर क्यों चले गए हैं । इन सवालों का जबाव ढूंढने की अगर हम कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि महानगर की भागदौड़ की जिंदगी और पैसा कमाने की हवस ने हमको ना केवल संवेदनशून्य बना दिया बल्कि हम स्वकेंद्रित भी होते चले गए । इस आपाधापी में हमारा परिवार और हमारा समाज हमसे दूर होता चला गया । हम महानगर की भाग दौड़ की जिंदगी में अपने को स्थापित करने की होड़ में इतने डूब गए कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह चुराने लगे । पश्चिमी सभ्यता के आक्रमण और उसके बाद उसके अंधानुकरण ने हमसे हमारे समाज को अलग कर दिया । नतीजा यह हुआ कि महानगरों में न्यूक्लियर फैमिली की अवधारणा को बल मिलता चला गया है । मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे की अवधारणा ने परिवार के बाकी बचे लोगों को अलग-थलग कर दिया । इस अलगाव की वजह से परिवार के अन्य लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा होती गई । इस असुरक्षा की भावना ने उनको डिप्रेशन का शिकार बना दिया जिससे वो मनोरोग के शिकार होते चले गए । हाल ही में एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली में सिर्फ दस फीसदी लोग संयुक्त परिवार में रहते हैं जबकि 76 फीसदी लोग एकल परिवार का हिस्सा हैं । इस एकाकीपन का जो खौफ होता है, अपने परिवार से अलग होने या रहने का जो एक अजीब अनुभूति होती है जिसे हर कोई वयक्त नहीं कर पाता है, अंदर ही अंदर घुटते रहने से और अपनी भावनाओं को जज्ब करने से मानसिक रोगी होने का खतरा बढ़ जाता है। महानगरों में एकल परिवार की अवधारणा को बढावा देने के दो अहम कारण हैं- पहला तो काम करने या फिर पढ़ाई लिखाई के जगह का दूर होना और दूसरा परिवार में पर्सनल स्पेस की कमी । अभी कुछ दिनों पहले इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के तीन महानगरों में कराए गए सर्वे का नतीजा भी बेहद हैरान करनेवाला है । आईसीएमआर के उस सर्वे के मुताबिक दिल्ली में रहनेवाले आठ प्रतिशत लोग तनाव के शिकार हैं जबकि चंडीगढ़ और पुणे में स्थिति थोड़ी सी बेहतर है जबकि चेन्नई में हालात बेहद खराब हैं और वहां तकरीबन सोलह फीसदी लोग मानसिक रोगी हैं । अगर हम पूरे देश पर नजर डालें तो तकरीबन सवा करोड़ लोग किसी ना किसी तरह के मानसिक रोग के शिकार हैं । सिर्फ दिल्ली में ही दो हजार एक के मुकाबले दो हजार दस में मानसिक रोगियों की संख्या में छह फीसदी का इजाफा हुआ है । यहां हमें यह याद रखना होगा कि इसी दस साल में देश ने आधुनिकता का दामन कसकर पकड़ा और उन्मुक्त अर्थवयवस्था ने देश में अपने पांव पसारे । इसके अलावा अगर हम इंडियम साइकेट्रिक सोसाइटी की सालाना रिपोर्ट पर गौर करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि एकांत अवसाद का प्रमुख कारक है और तकरीबन पचपन फीसदी लोगों की सामाजिक भागीदारी नग्णय है । इसमें ज्यादातर वो लोग हैं जो अन्य शहरों या सूबों से नौकरी की तलाश में यहां आए और अपना कोई समाज नहीं बना पाए । सामाजिक सहभागिता कम होने की वजह से लोग अवसाद के शिकार होते चले गए । अगर मनोचिकित्सकों की मानें तो सामाजिक या पारिवारिक या फिर आर्थिक असुरक्षा बोध में महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा जल्दी डिप्रेशन की शिकार हो जाती हैं और अकेलापन इस डिप्रेशन को और बढ़ा देता है । महिलाओं के अलावा महानगरों में बुजुर्गों में भी असुरक्षा का बोध ज्यादा होता है । अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर योग्य बनाने के बाद उनके बच्चे उन्हें ही छोड़ जाते हैं । कई परिवारों के साथ तो यह भी देखने को मिलता है कि बेटे-बहू एक ही शहर में अलग रहते हैं और बुजुर्ग मां-बाप भी उसी शहर में अलग मकान में रहते हैं । मां-बाप को उम्र के उस मुकाम पर जब अपने औलाद के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तभी वो अलग हो जाते हैं । इसल अलगाव से जो मानसिक तनाव या फिर बच्चों की संवेदनहीनता से एकाकीपन का जो गहरा एहसास होता है वो उन्हें अंदर से तोड़ देता है जिसकी भरपाई ताउम्र नहीं हो पाती है। नोएडा में दोनों बहनों की इस घटना ने हमारे समाज को एक बार फिर से झकझोर दिया है और यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि महानगरों की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में एकाकी से बढ़ रहे अवसाद या फिर डिप्रेशन को कैसे रोका जाए ।

Friday, April 15, 2011

जश्न में दबे बड़े सवाल

चार दिनों से दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल को लेकर जारी आमरण अनशन खत्म हो गया । अन्ना के अनशन और देशभर में उसको मिल रहे अपार जनसमर्थन को देखकर सरकार के हाथ पांव फूल गए । भारत सरकार के कर्ता-धर्ता और वरिष्ठ मंत्रियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद अन्ना की सभी मांगे मान ली गई । चार दिन तक चले एक व्यक्ति के आंदोलन ने भारत सरकार को जनता की भावनाओं को समझने और अन्ना की मांग मानने के लिए मजबूर कर दिया । दो दिन पहले जिस सरकार की एक वरिष्ठ मंत्री अंबिका सोनी दहाड़ते हुए बयान दे रही थी कि चंद मुट्ठी भर लोगों के दबाव में सरकार झुकने वाली नहीं है । उन्हीं चंद मुट्ठीभर लोगों ने सरकार से अपनी सभी मांगे मनवा ली । अन्ना के आह्वान पर देशभर में जिस तरह से हर वर्ग के लोग स्वत:स्फूर्त घर से बाहर आंदोलन के लिए निकले वो इस अनशन की सबसे बड़ी उपलब्धि है । वैश्वीकरण के इस दौर में कई विद्वानों की राय थी कि जिस तरह से देश का नया मध्यवर्ग बाजार के प्रभाव में है उसमें वो सिर्फ अपने बारे में सोचती है और उनके सामाजिक सरोकार खत्म हो गए हैं । आम जनता से जनआंदोलन की अपेक्षा करने की तो वो सोच भी नहीं सकते थे । नतीजा यह हुआ कि देश के नेताओं के मन में जनादेश को लेकर जो आदर होना चाहिए था वो खत्म होने लगा था । जनता का डर कम होने के इस भाव से नेताओं के मन में यह बैठ गया कि वो कुछ भी करके बेदाग निकल सकते हैं । जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों-करोड़ों रुपए डकार कर भी वो मजे में रह सकते हैं । उनके मन से जनता का डर और आमजन के प्रति आदर का भाव खत्म होने लगा था जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत था । लेकिन अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि अगर कोई विश्वसनीय व्यक्ति जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर खड़ा होता है तो देश की जनता का ना केवल उसे समर्थन मिलता है बल्कि देश के हर तबके का आदमी उसकी एक आवाज पर घर से निकल कर उसके कदम से कदम मिलाकर सरकार से लोहा लेने तो भी तैयार हो जाते हैं । अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से देश के नेताओं में जनता के लिए आदर और जनता का डर कायम कर दिया । अन्ना का अनशन खत्म हो गया देशभर में अभी जीत का जश्न मनाया जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जंग जीत ली है । दरअसल पूरा भारतीय मानस जो है वो बेहद इमोशनल है, एक छोटी सी उपलब्धि में भी वह मानस जश्न में डूब जाता है । लेकिन जीत के इस जस्न के बीच कई सवाल भी मुंह बाए खड़े हो गए हैं । सबसे पहला और बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अन्ना के इस अनशन से हासिल क्या हुआ । अगर हम उपरी तौर पर देखें तो लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता को बड़ी जीत और कामयाबी हासिल हुई है । देश में इस तरह का एक वातावरण बन गया है जिसमें आम जनता को लगने लगा है कि लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बडा़ हथियार होने जा रहा है जिसे भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का वध संभव हो सकेगा । लेकिन क्या सचमुच ऐसा संभव हो पाएगा । अगर कुछ देर के लिए यह मान लिया जाए कि जनदबाव में प्रधानमंत्री, मंत्री और देश के आला अफसर लोकपाल के दायरे में आ जाते हैं और लोकपाल को किसी को मुजरिम करार देकर सजा देने का अधिकार भी दे दिया जाता है तो क्या इससे भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा । अगर यह भी मान लिया जाए कि माथापच्ची के बाद बिल ोक कानूनी जामा पहना कर लागू कर दिया जाता है । तो क्या सिर्फ कानून बना देने भर से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा । लेकिन सिर्फ कानून बना देने भर से जुर्म कम नहीं होता । जरूरत होती है कानून को सही तरीके से लागू करने की और ऐसा वातावरण तैयार करने की जिसमें मुजरिमों के मन में कानून का भय पैदा हो जाए । भ्रष्टाचार से निबटने के लिए हमारे देश में पहले से प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट है । उसमें भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कई सख्त प्रावधान हैं तो कई खामियां भी हैं । जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए एक नया कानून बनाने के बजाए वर्तमान में लागू कानून की कमियों को दूर किया जाए । जैसे अफसरों या मंत्रियों को आरोपी बनाने के पहले जो इजाजत लेने का प्रावधान है उसको खत्म किया जाना चाहिए । वर्तमान कानून में स्पेशल जज से सुनवाई का प्रावधान है लेकिन बहुधा ऐसा हो नहीं पाता है । जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जाए और दोषी को जल्द से जल्द सजा दिलवाया जाए । एक और अहम सवाल उठता है कि क्या इसती आसानी से लोकपाल को इतने तरह के अधिकार दे दिए जा सकते हैं । देश के मौजूदा कानून और संवैधानिक संस्थाओं को संविधान से मिले अधिकारों के मद्देनजर यह इतना आसान नहीं है । इसमें कई संवैधानिक अड़चनें आएंगी – ड्राफ्ट कमिटी का गठन जितनी आसानी से नोटिफाई हो गया है प्रस्तावित बिल का मसौदा बनाने में उतनी ही दिक्कतें आएंगी । लोकपाल बिल के कानून बनने के बाद भी हर आरोपी के पास राइट टू अपील तो होगा ही । किसी भी तरह के कानून से अपील के इस अधिकार को ना तो खत्म किया जा सकता है और ना ही ऐसा किया जाना चाहिए । क्योंकि अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक बात होगी । राइट टू अपील आरोपी के हाथ एक ऐसा अधिकार है जिसका इस्तेमाल करके वो लंबे समय तक खुला घूम सकता है, संसद और विधानसभा का सदस्य बन सकता है । देश का कोई भी कानून आरोपी को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता है । एक अजीब विडंबना और भी है कि अगर कोई संसद सदस्य या मंत्री या विधानसभा का सदस्य किसी जुर्म में दोषी भी करार दे दिया जाता है तो उसकी सदस्यता खत्म नहीं होती है और सिर्फ आरोपी है तो वह ठाठ से लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का सम्मानित सदस्य बना रह सकता है । जरूरत इस बात की है कि इस तरह के कानूनों में संशोधन किया जाए । अगर भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी है तो न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने और मुकदमों के जल्द से जल्द निबटारे की आवश्यकता है, जिसकी ओर अन्ना को ध्यान देना चाहिए था । इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेहद अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है । वहां के अपराधियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाकर जल्द से जल्द मुकदमे का निबटारा करवाया और मुजरिमों को सजा मिली । नतीजा यह हुआ कि सूब में लोगों के मन में कानून के प्रति एक विश्वास जगा और अपराधियों के मन में कानून का भय । अंत में एक बात और कि अन्ना को इस अनशन के दौरान कई उत्साही लोगों ने छोटे गांधी कह डाला लेकिन गांधी और अन्ना में बुनियादी अंतर है । गांधी हमेशा व्यक्ति में बदलाव की बात करते थे और अन्ना संस्थागत बदलाव की बात करते हैं । गांधी हमेशा आदर्श स्थिति और रामराज्य की कल्पना करते थे । उनका मानना था कि लोगों का मन इतना साफ हो कि वो भ्रष्टाचारी बनें ही ना जबकि अन्ना हजारे कानून बनाकर उसे रोकने की बात करते हैं ।गांधी का लक्ष्य और आदर्श दोनों बेहद बड़े थे । इसलिए गांधी से अन्ना की तुलना बेमानी है । लेकिन उत्साह में बहुधा तुलना में गलती हो जाती है

Thursday, April 14, 2011

सवालों के घेरे में ललित कला अकादमी

क्रिकेट के विश्वकप के शोरगुल में एक अहम घटना दब कर रह गई । यह एक ऐसी घटना है जो सरकार पोषित संस्था के कार्यकलापों पर सवालिया निशान खड़ा करती है । मैं बात कर रहा हूं ललित कला अकादमी की जिसके अध्यक्ष हिंदी के वरिष्ठ कवि, आलोचक और कला प्रेमी अशोक वाजपेयी हैं । सवाल इस लिए खड़े हो रहे हैं कि एक मशहूर चित्रकार डॉक्टर प्रणब प्रकाश ने अकादमी पर मनमानी का आरोप लगाया है । प्रणब प्रकाश का आरोप है कि उसने अरुंधति की एक न्यूड पेंटिग बनाई जिसकी वजह से ललित कला अकादमी ने उसकी पेंटिंग प्रदर्शनी की इजाजत नहीं दी । प्रणब का कहना है कि ललित कला अकादमी के अधिकारियों ने उन्हें मौखिक रूप से इस प्रदर्शनी की इजाजत दे दी थी और दो मार्च को उन्हें अकादमी के दफ्तर में आकर पैसे जमाकर प्रदर्शनी लगाने का आदेश पत्र लेने के लिए बुलाया गया था । लेकिन जब वो दो मार्च को अकादमी के दफ्तर में पहुंचे तो उन्हें मना कर दिया गया । पहले तो यह बताया गया कि उन्हें प्रदर्शनी के लिए गैलरी नहीं मिल सकती है क्योंकि बांग्लादेश के कुछ कलाकार उन्हीं तारीख को अपनी पेंटिग्स की नुमाइश करना चाहते हैं । लेकिन प्रणब प्रकाश का आरोप है कि जब उन्होंने कहा कि अगर बांग्लादेश के चित्रकारों की प्रदर्शनी उन्हीं तारीखों में लगनी थी तो पहले ही अनुरोध आया होगा ऐसे में उन्हें क्यों बुलाया गया । इस बात पर अकादमी के उपसचिव ने गैलरी के एसी खराब होने की बात बताई, साथ ही उन्हें इशारों-इशारों में यह भी बता दिया गया कि सचिव और अकादमी के आला अफसर उनके अरुंधति के न्यूड पेंटिग से खफा हैं और इस वजह से उनको प्रदर्शनी की इजाजत नहीं दी जा सकती है । हलांकि ललित कला अकादमी के सचिव सुधाकर शर्मा का कहना है कि प्रणब प्रकाश को कभी प्रदर्शनी की इजाजत दी ही नहीं गई थी, लिहाजा मनमानी का कोई सवाल ही नहीं उठता है । उन्होंने तो यह भी कहा कि अगर प्रणब प्रकाश के पास ललित कला अकादमी से किसी भी तरह का कोई पत्र व्यवहार हुआ हो या अकादमी ने हामी भरी हो तो वो फैरन दिखाएं । अगर ऐसा होता है तो सुधाकर शर्मा अपने अधिकारियों के खिलाफ जांच की बात भी करते हैं । दरअसल यह पूरा विवाद है बड़ा ही दिलचस्प । पढ़ाई से डॉक्टर, पेशे से शिक्षक और अपनी पेंटिग्स के जरिए मशहूर हुए प्रणब प्रकाश ने एक बेहद ही विवादास्पद पेंटिग बनाई जिसका शीर्षक दिया – गॉडेस ऑफ फिफ्टीन मिनट्स ऑफ फेम । इस पेंटिंग का नाम भी अरुंधति की मशहूर किताब गॉड ऑफ स्माल थिंग्स से ही उठाया गया है । इस विवादास्पद पेंटिंग में प्रणब प्रकाश ने लेखिका अरुंधति राय को न्यूड तो पेंट किया ही साथ ही एक ही बिस्तर पर उन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन और चीन के नेता माओ के साथ दिखाया । प्रणब ने अपनी इस पेंटिग में बेहद चटख रंगों का इस्तेमाल करके अपने विरोध को मुखरता के साथ चित्रित किया है । प्रणब का कहना है कि अरुंधति एक बेहद प्रचार प्रिय लेखिका और तथाकथित समाजसेवी हैं जो प्रचार के लिए एक तरफ तो नक्सलियों के पक्ष में खड़ा होती हैं दूसरी तरफ कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ भी अपनी एकजुटता दिखाती हैं । प्रणब प्रकाश के इस पेंटिंग्स के बाद तो भूचाल आ गया । कई वामपंथी लेखकों और विचारकों और कलाकारों ने इसे घोर आपत्तिजनक माना और उसको प्रचार का हथकंडा करार दिया । अरुंधित के न्यूड पेंटिंग पर आपत्ति जताते हुए उक्त पेंटिग को वयक्ति विशेष की निजता का हनन और अभिवयक्ति की आजादी का दुरुपयोग करार दिया गया । उन्होंने इसे एक लेखक का अपमान बताते हुए इस तरह की चीजों को गैरजरूरी बताया । अभिवयक्ति की आजादी के बेजा इस्तेमाल पर शोर मचाने वाले यही लोग तब एम एफ हुसैन का समर्थन कर रहे थे जब उन्होंने सरस्वती, दुर्गा और सीता की आपत्तिजनक तस्वीरें बनाई थी । दरअसल मुझे लगता है कि प्रणब प्रकाश तो एस एफ हुसैन के दिखाए रास्ते पर ही चलने की कोशिश कर रहे हैं । एक बार हुसैन साहब ने भी आइंस्टीन, हिटलर और गांधी की तस्वीर बनाई थी जिसमें उन्होंने हिटलर को नंगा दिखाया था । जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने तीनों में सिर्फ हिटलर को उन्होंने नंगा पेंट किया तो एम एफ हुसैन ने जवाब दिया था कि किसी को अपमानित करने का यह उनका अपना तरीका है । और प्रणब प्रकाश बी यही कर रहे हैं । खैर यह एक अलग और अवांतर प्रसंग है जिसपर मैंने चौथी दुनिया के अपने इसी स्तंभ में कई लेख लिखे हैं । अब यहां सवाल यह उठता है कि प्रणब प्रकाश की पेंटिंग्स पर विवाद हो सकता है लेकिन क्या ललित कला अकादमी को किसी भी पेंटर के प्रदर्शनी को रोकने की इजाजत दी जा सकती है । ललित कला अकादमी देश की शीर्ष संस्था है जिसपर देश और विदेश में भारतीय कला को प्रोत्साहित करने और प्रचार प्रसार की महती जिम्मेदारी है । अगर यह संस्था किसी चित्रकार को उसके चित्रों के आधार पर दरकिनार करता है तो यह उसके घोषित उद्देश्य से भटकने जैसा होगा । ललित कला अकादमी पर इस तरह के आरोप पहले भी लग चुके हैं । कुछ दिनों पहले कार्टूनिस्ट इरफान ने भी अकादमी पर आखिरी वक्त पर प्रदर्शनी के लिए गैलरी देने से इंकार करने का इल्जाम लगाया था । उनका आरोप था कि चूंकि उनकी प्रदर्शनी का उद्घाटन बीजेपी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी को करना था इस वजह से उसको जगह देने से मना कर दिया गया । बाद में वह प्रदर्शनी प्रेस क्लब ऑप इंडिया में लगाई गई थी । तब भी अकादमी की तरफ से यही बताया गया था कि इरफान को इजाजत नहीं दी गई थी । अगर एक ही तरह के आरोप कई लोग लगाते हैं तो ललित कला अकादमी की कार्यप्रणाली के बारे में उसके कर्ताधर्ताओं को सोचना चाहिए । किसी विचारधारा विशे, से ताल्लुक रखनेवाले कलाकार पर पाबंदी लगाकर तो सिर्फ फासीवाद का उदाहरण ही प्रस्तुत किया जा सकता है । लोकतंत्र में इस तरह से विचारधारा पर पाबंदी लगाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है । इस तरह के काम वामपंथी प्रभाव वाले संस्थानों में जमकर हुआ है । जबतर वामपंथ का जोर रहा राष्ट्रवादी विचारधारा या फिर उनका विरोध करनेवाले को भगवा विचारधारा का पोषक करार देकर अछूत जैसा व्यवहार किया जाता रहा । इस बात को ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी से बेहतर कोई नहीं समझ सकता । अशोक वाजपेयी पर भी कलावादी कहकर जाने कितने हमले हुए । लेकिन अंतत बचता है तो लेखन और कला ही । अगर अशोक वाजपेयी के ललित कला अकादमी का अध्यक्ष रहते हुए कलाकारों के साथ उनकी विचारधारा के आधार पर भेदभाव किया जाता है, पावंदियां लगाई जाती हैं तो यह हिंदी जगत को किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा । ललित कला अकादमी पर इस तरह के आरोप से बचाने के महती जिम्मेदारी उसके अध्यक्ष अशोक वाजपेयी पर है और पूरे देश को उनसे वस्तुनिष्ठता की उम्मीद है ।

Saturday, April 9, 2011

निराशा का संपादकीय

पिछले पच्चीस साल से राजेन्द्र यादव के संपादन में प्रकाशित हंस का संपादकीय होता है- मेरी तेरी उसकी बात । मैं पिछले पच्चसी साल से तो नहीं लेकिन सत्तरह अठारह साल से नियमित राजेन्द्र जी का संपादकीय पढ़ता रहा हूं । मुझे यह कहने या मानने में कोई संकोच नहीं है कि हंस के संपादकीय ने मुझे चीजों को देखने समझने की एक अलग दृष्टि दी । राजेन्द्र यादव का संपदकीय बहुधा उर्जा से लबरेज और व्यवस्था से लड़ने भिड़ने पर उतारू या सामाजिक रूढियों पर चोट करता हुआ रहता था । यादव जी की तीखी भाषा और तर्क गढ़ने की शक्ति का कायल हो गया था । कई बार हंस संपादक से उनके संपादकीय में प्रकट किए गए विचारों को लेकर असहमतियां भी रही जो लिखकर या फिर मौखिक दर्ज करवाई । लोग संपादकीय के बारे में बेशक अनाप शनाप बोलते रहे हों, कई नामवर लोग तो -मेरी तेरी उसकी बात- को कूड़े की बात कहकर मजाक भी उड़ाते रहे हैं लेकिन अगर ईमानदारी से कहूं तो मुझे उनका संपादकीय हमेशा से विचारोत्तेजक लगता रहा है । अभी पिछले दो तीन अंकों का संपादकीय बेहद अच्छा था,पसंद इसलिए आ रहा था क्योंकि कम डिप्लोमैटिक था । साफ बातें हमेशा से लोगों को पसंद आती हैं, मुझे भी । लेकिन फरवरी अंक का संपादकीय पढ़कर मुझे जाने क्यों बेहद कोफ्त हुई । मैं उनको पत्र लिखना चाह रहा था लेकिन अपनी व्यस्तताओं की वजह से लिख नहीं पाया । लेकिन अगले ही अंक में संपादकीय की भूल-गलतियों पर साधना अग्रवाल का एक लंबा पत्र और राजेन्द्र यादव का खेद भी प्रकाशित है । लेकिन वो तो तथ्यात्मक भूल की बातें थी लेकिन फरवरी अंक के संपादकीय से जो निराशा का भाव सामने आता है वो ना केवल चिंता जनक है बल्कि उस निराशा के अंधकार में यादव जी इतना डूब जाते हैं कि उन्हें पूरी दुनिया, समाज का हर तबका(लेखक को छोड़कर) भ्रष्ट और टुच्चा नजर आता है । उनके संपादकीय को देखिए- “घूस, घोटालों और घपलों का एक साल (2010) बीत गया, शायद यह साल स्वतंत्र भारत के सबसे काले दिनों के रूप में याद किया जाएगा, जहां निरंकुश सत्ता भारतीय संविधान से कारपोरेट हाउसों ने छीन ली और देश के सारे शक्ति स्तंभ चरमरा कर ढह गए हैं । पांचवां स्तंभ यानी मीडिया या तो पेड न्यूज के हाथों बिक गया है या नीरा राडिया जैसों के माध्यम से दोनों हाथों से दलाली खा रहा है ।“ यादव जी के इस संपादकीय ने मीडिया को लोकतंत्र में एक पायदान नीचे ठेल दिया अब तक चौथा स्तंभ माना जाता था लेकिन राजेन्द्र जी ने इसे पांचवा स्तंभ करार दिया । निराशा के घोर आलम में राजेन्द्र यादव जी ने पूरी मीडिया को बिका हुआ या दलाल करार दे दिया । यादव जी जैसे जिम्मेदार और बुजुर्ग लेखक से इस तरह की फतवेबाजी की उम्मीद नहीं की जा सकती है । अगर किसी एक दो अखबार में पेड न्यूज छप रहा है या फिर कुल जमा चार पत्रकारों के नीरा राडिया से संवंध सामने आए हैं वैसे में पूरी मीडिया को दलाल कहना गैरजरूरी ही नहीं गैर जिम्मेदाराना भी है । यादव जी जैसे सम्मानित लोगों को इस तरह के स्वीपिंग रिमार्क से बचना चाहिए । उन्हें शायद इस बात का एहसास होगा कि लोग उनकी बात सुनते हैं, उनके कहे का समाज पर असर पड़ता है । इसलिए अगर वो कोई बात कहते हैं तो उसमें सब्सटैंस होना चाहिए । लेकिन वो तो एक डंडा लेकर निकल पड़े हैं और उससे ही सभी को हांकने पर आमादा हैं । मीडिया पर यहीं नहीं रुकते उसी में आगे कहते हैं – देश की राजधानी में हर रोज दर्जनों हत्याएं, बलात्कार और लूट-पाट की घटनाएं आम हो चुकी हैं – गरीबी अमीरी के बीच की खाई अपराधों और हत्याओं से पाटी जा रही है । गरीब और वंचित आदमी आखिर कब तक उपर वालों की हजारों-लाखों करोड़ की हेर-फेर को चुपचाप बैठा देखता रहे ? टीवी चैनलों और अखबारों के पास इन सनसनीखेज खबरों के सिवा परोसने को कुछ नहीं बचा है । वे इन्हें ही कूट पीस रहे हैं । गांव और गरीबी का वहां कोई नामोनिशान नहीं रह गया है । यहां भी यादव जी का संपादकीय समान्यीकरण के दोष का शिकार हो गया है । यादव जी जिन घपलों –घोटालों की बात कर रहें हैं उसे किसने उजागर किया । जिस एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टेलीकॉम घोटाले में पूर्व मंत्री ए राजा जेसल में हैं उसका पर्दाफाश किसने किया । क्या एक अखबार के रिपोर्टर ने आजाद भारत के इस सबसे बड़े घोटाले का पर्दाफाश नहीं किया । क्या कमजोर के हक की लडाई मीडिया नहीं लड़ता है । क्या यादव जी जेसिका के इंसाफ की लड़ाई भूल गए या फिर प्रियदर्शिनी मट्टू कांड में मीडिया की सामाजिक भूमिका को भुला दिया या फिर अभी अभी दिल्ली के एक कॉलेज की लड़की राधिका की सरेआम हत्या पर मीडिया ने सरकार और पुलिस पर दबाव नहीं बनाया । यह फेहरिश्त बड़ी लंबी है । लेकिन यादव जी देखना चाहें तब तो उन्होंने तो पहले से ही तय कर लिया है कि सबका नाश करना है और फिर उसपर पिल पड़े । लेकिन जब आप सामान्यीकरण की बीमारी से ग्रस्त होते हैं तो आप सिर्फ वही देख सकते हैं जो आप देखना चाहते हैं । आगे अपने संपादकीय में यादव जी अपने पसंदीदा विषय नक्सली और उसके हमदर्द विनायक सेन पर पहुंचते हैं और टिप्पणी करते हैं – उधर काश्मीर, असम और महाराष्ट्र में रोज बंद होते हैं । घर बसें और सार्वजनिक संपत्तियां फूंकी जाती हैं । गोली लाठी पत्थर चलाए जाते हैं ऐसे में आदिवासियों, किसानों के हितों के लिए लड़नेवाले माओवादी, नक्सली देश के दुश्मन नंबर वन घोषित ही नहीं किए जाते, फौजों और हवाई जहाजों से वहां शांति स्थापित की जाती है । भगवान जाने किसने माओवादियों को देश का दुश्मन नंबर वन घोषित किया है लेकिन यादव जी इतना तो तय मानिए कि जिसे आप आदिवासियों और किसानों के हितों के लिए लड़नेवाला नक्सली और माओवादी बता रहे हैं वो अब सिर्फ अपने हित की सोचते हैं । अब वो अपराधी बन चुके हैं । अब वो फिरौती के लिए अपहरण करते हैं और धन नहीं मिलने पर मासूमों को जान से मार डालते हैं । किसानों के हितों की आड़ में अपराध का नंगा खेल खेला जा रहा है । उससे भी चिंता की बात है कि उनका संपर्क आतंकवादी और अलगाववादी संगठनों से होने लगा है । लेकिन यादव जी आप जिस लाल चश्मे से नक्सलियों को देखते हैं उससे तो वो किसानों और गरीबों के हितों का रक्षक ही नजर आएगा । जरा आंखों से लाल चश्मा हटाकर देखिए आपको अपराध की काली दुनिया नजर आएगी । जिस बिनायक सेन को आप गरीबों का चिकित्सक बता रहे हैं वो देशद्रोह की सजा काट रहे हैं । देश के तमाम नामी गिरामी वकीलों और गैर सरकारी संस्थाओं का पैसा भी बिनायक सेन को हाईकोर्ट से जमानत नहीं दिलवा सका । आपलोगों का तर्क होगा कि अदालत भी तो राज्य सत्ता का एक अंग ही होता है । देश की न्यायपालिका पर भी आपका भरोसा नहीं रहा । आपने लिखा- न्यायपालिकाएं खुलेआम अपने फैसले अपराधी के पक्ष में बेच रही हैं । यहां भी जनरलाइजेशन । अगर हमारी न्यायपालिका अपने फैसले बेच रही होती तो विदेशों से आर्थिक मदद पानेवाली देशी एनजीओ बिनायक सेन के लिए फैसला खरीद चुकी होती । लेकिन यकीन मानिए यादव जी हमारी देश की न्यायपालिका आपको अवस्य बिकी हुई नजर आ रही हो लेकिन एक दो अपवादों को छोड़कर, कमोबेश ईमानदार है । राजेन्द्र जी के अपने इस छाती पीट रंडी रोना पर क्षमा मांगते हुए भविष्य को और काला देख रहे हैं । लेकिन असलियत में यादव जी जितना काला देख पा रहे हैं उतना है नहीं । समाज के हर क्षेत्र में गड़बड़ लोग हैं, गड़बड़ियां भी हो रही है लेकिन उससे ज्यादा अच्छा काम भी हो रहा है । जरूरत है कि हम अपने अप्रोच और आउटलुक में पॉजेटिव हों । अगर इतना हो गया तो यकीन मानिए यादव जी की निराशा की काली छाया भी छंट जाएगी ।

Monday, March 21, 2011

संगीन इल्जाम, लचर दलील

भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से चौतरफा घिरी मनमोहन सरकार के लिए विकिलीक्स के खुलासे के बाद मुश्किलें और बढ़ गई हैं । मनमोहन सिंह की सरकार की साख पर लगातार लग रहे बट्टे ने प्रधानमंत्री की छवि को कमजोर किया है । यूपीए वन के दौरान जिस तरह से न्यूक्लियर डील पर सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त का खुलासा हुआ है, उसके बारे में उस वक्त भी काफी चर्चा हुई थी और जांच वगैरह भी हुई थी । लेकिन ताजा खुलासे ने विपक्ष को सरकार पर एक बार फिर हमला करने का मौका दे दिया । खुलासे पर फजीहत होते देख पहले सरकार के कद्दावर मंत्री और संकटमोचक प्रणब मुखर्जी ने मोर्चा संभाला । संसद में विपक्ष के हमलावर तेवर पर पलटवार करते हुए वित्त मंत्री ने यह कहकर विपक्ष के आरोपों की हवा निकालने की कोशिश की यह पूरा मामला चौदहवीं लोकसभा का है और पंद्रहवीं लोकसभा पिछली लोकसभा में हुई घटनाओं पर विचार नहीं कर सकती । इतने संगीन इल्जाम पर सरकार की ओर से वित्त मंत्री और कानून, संसदीय परंपरा और सरकारी नियमों के चलते फिरते इंसाइक्लोपीडिया माने जानेवाले प्रणब मुखर्जी ने बेहद हल्की बात करके पूरे देश को चौंका दिया । प्रणब मुखर्जी की याददाश्त का लोहा पूरा देश मानता है । क्या प्रणब मुखर्जी यह भूल गए कि जब इमरजेंसी के खत्म होने के बाद हुए चुनाव के बाद सातवीं लोकसभा का गठन हुआ थो तो सदन ने इंदिरा गांधी को उसके पहले के लोकसभा के दौरान उनके किए कार्यों पर कार्रवाई की थी । उस वक्त इंदिरा गांधी के निकट सहयोगी रहे प्रणब दा क्या यह भी भूल गए कि जब जनता सरकार के पतन के बाद उन्नीस सौ अस्सी में इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आई और आठवीं लोकसभा का गठन हुआ तो उसने फिर से पिछली लोकसभा के इंदिरा गांधी के मुतल्लिक लिए गए फैसलों को पलट दिया था । इन दोनों उदाहरणों से यह साबित होता है कि सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक से चूक हो गई । क्या प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस पार्टी कुछ ही दिन पहले लिए गए सरकार के निर्णय को ही भूल गई । कुछ ही दिन पहले सरकार ने टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय दल का गठन किया है जो पिछली लोकसभा के दौरान लिए गए निर्णयों को कसौटी पर कसेगा । इन आधारहीन तर्कों को खारिज करते हुए विपक्ष ने सरकार पर अपना हमला जारी रखा और प्रधानमंत्री से सदन में बयान देने का दबाव बढ़ा दिया । नतीजे में प्रधानमंत्री को संसद में बयान देना पड़ा ।
आक्रमण सबसे अच्छा बचाव की तर्ज पर प्रधानमंत्री ने संसद के दोनों सदनों में बयान दिया । अपनी सरकार और पार्टी का जोरदार बचाव करते हुए प्रधानमंत्री ने नोट के बदले वोट के आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर तीखा प्रहार किया । मनमोहन सिंह ने अपनी पिछली सरकार को बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए विपक्ष को यह कहते हुए आईना दिखाने की कोशिश की कि जनता ने आमचुनाव में विपक्ष के इन आरोपों को तवज्जो नहीं दी । कांग्रेस पार्टी को पिछले आमचुनाव में 2004 के चुनाव के मुकाबले ज्यादा सीटें मिली । प्रधानमंत्री मनमोहमन सिंह ने संसद में दिए अपने बयान में बीजेपी और वामदलों को चुनाव में मिली कम सीटें भी गिना दीं । मनमोहन सिंह ने यह तर्क दिया कि विपक्ष जनता द्वारा नकारे गए आरोपों को फिर से हवा देकर बेवजह सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है । अपने वित्त मंत्री की राह पर चलते हुए प्रधानमंत्री ने भी बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया । क्या चुनाव जीत जाने से सारे आरोप और जुर्म खारिज हो जाते हैं । क्या सही गलत का फैसला जनता की अदालत में ही हुआ करेगी, क्या अब जांच एजेंसी और जांच कमेटियां बेमानी हो जाएंगी ।
अगर प्रधानमंत्री के इन बयानों को मान लिया जाए तो तमाम अपराधी और गुंडे जो विधायक या सांसद बन जाते हैं उनके जुर्म चुनाव जीतते ही खत्म हो जाते हैं । इस तर्क के आधार पर बिहार के बाहुबली सांसद रहे शाहबुद्दीन के तमाम जुर्म गलत हैं क्योंकि अदालत द्वारा मुजरिम करार दिए जाने और कोर्ट से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के पहले तो शाहबुद्दीन को जनता लगातार चुनकर लोकसभा में भेजती रही थी । क्या अपने बयान से प्रधानमंत्री यह संदेश देना चाह रहे हैं कि आप चाहें जितना भी बड़ा अपराध करें अगर जनता ने आपको चुन लिया है तो आपके सारे पाप धुल जाते हैं । क्या प्रधानमंत्री अपने इस बयान से डीएमके के नेताओं को यह संदेश देना चाह रहे हैं कि ए राजा पर चाहे एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टेलीकॉम घोटाले का आरोप लगा हो लेकिन अगर वो फिर से चुनाव जीत जाते हैं तो सारे आरोप खारिज हो जाएंगे । देश के शीर्ष पद पर बैठा एक जिम्मेदार व्यक्ति अगर देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस तरह का गैर जिम्मेदाराना बयान देता है तो लोकतंत्र के लिए बेहद चिंता की बात है । चिंता इस बात को लेकर भी होती है कि जिसके हाथ में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाने और उसकी गरिमा को बचाने की जिम्मेदारी है वह लोकतंत्र और जनता के समर्थन को ही घोटालों से बचने की ढाल बना रहा है । संसद में प्रधानमंत्री के उक्त बयान को कांग्रेस के लोग बेहद आक्रामक और हमलावर बयान करार देकर खुद की पीठ थपथपा रहे हैं । आक्रामक दिखने वाले उक्त बयान में ना तो गंभीरता है और ना ही दम ।
जिस तरह की लचर दलील और जनता के समर्थन की आड़ लेकर प्रधनामंत्री मनमोहन सिंह ने नोट के बदले वोट के आरोपों को नकारनेवाला बयान दिया है उसी से मिलता जुलता बयान लंदन में भारत के हाई कमिश्नर रहे बी के नेहरू ने भी दिया था । जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनावी गड़बड़ियों के आधार पर खारिज कर दिया था, तब बी के नेहरू ने कहा था कि अदालत के इस फैसले से इंदिरा गांधी के राजनीतिक भविष्य पर कोई असर नहीं पड़नेवाला है । श्रीमती गांधी को अब भी देश की जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल है और मुझे लगता है कि भारत के प्रधानमंत्री को उस वक्त तक अपने पद पर बने रहना चाहिए जब तक कि जनादेश उनके खिलाफ ना हो । उस वक्त इंदिरा गांधी के चमचों ने उन्हें देश में इमरजेंसी लगाने की सलाह दी थी और पद छोड़ने के भयानक दबाव में श्रीमती गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा थी । उसके बाद क्या हुआ यह इतिहास है । अब वक्त आ गया है कि सरकार देश को गुमराह करना छोड़े, जनता की आड़ लेकर लोकतंत्र को कमजोर करनेवालों लोगों की इमानदारी से पहचान की जाए और उन्हें सख्त सजा मिले ताकि भविष्य में इस तरह की हरकतें नहीं दुहारई जाएं ।

Saturday, March 19, 2011

पत्रकारिता के अभिमन्यु !

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता और ग्लोबल समस्याएं विषय पर एक सेमिनार आयोजित था । कॉलेज के उत्साही शिक्षक डॉ हरीश अरोड़ा ने बेहद श्रमपूर्व दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी । दो दिनों की इस संगोष्ठी के अंतिम दिन और अंतिम सत्र में मुझे भी बोलना था । मेरा साथ वक्ता थी साप्ताहिक आउटलुक की सहायक संपादक गीताश्री और हमारे सत्र के अध्यक्ष थे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के के एएम मुंशी इंस्टीट्यूट ऑफ हिंदी स्टडीज के प्रोफेसर हरिमोहन । दो विद्वान वक्ताओं के बीच में मुझे ही सबसे पहले बोलना था । गीता जी मुझसे वरिष्ठ हैं और नब्बे के शुरुआती दशक में जब मैं दिल्ली आया था और काम और पहचान की तलाश से जूझ रहा था तो गीता जी ने ही मुझे पहला असाइनमेंट दिया था । उस वक्त वो स्वतंत्र भारत अखबार के आईएनएस दफ्तर में बैठती थी । इस अवांतर प्रसंग की चर्चा इस वजह से कर रहा हूं क्योंकि मुझे दोनों से पहले बोलना था और मेरी हालात खराब हो रही थी ।
जब मैं वहां पहुंचा तो सभागार लगभग भरा हुआ था लेकिन यह जानकर आश्चर्य हुआ कि श्रोताओं में दिल्ली विश्वविद्यालय के तमाम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग से जुड़े शिक्षक मौजूद थे । पहले मुझे यह अंदाज था कि कॉलेज के पत्रकारिता विभाग के छात्र होंगे जिनसे बातचीत करनी होगी । खैर समारोह शुरू हुआ और मंच संचालन कर रहे सज्जन ने पत्रकारिता के गिरते स्तर पर चिंता जताते हुए पिछले दिन और पूर्वान्ह के सत्र में हुई बातचीत का संक्षिप्त ब्योरा दिया । पहली बात उन्होंने कही कि पूर्ववर्ती वक्ताओं ने मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के गिरते स्तर पर चिंता जताई । उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यूज चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों ने खुद को अभिमन्यु बताया और कहा कि वो पत्रकारिता के चक्रव्यूह में फंस गए हैं और उससे निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पा रहे हैं लिहाजा वहीं नौकरी करने को अभिशप्त हैं । दूसरी बात उन्होंने ब्लाग के माध्यम से हो रही पत्रकारिता को प्रमुखता से रेखांकित किया । इस भूमिका के बाद उन्होंने मुझे मंच पर आमंत्रित कर लिया । मैंने सबसे पहले खबरिया चैनलों के अभिमन्युयों को पत्रकारिता के चक्रव्यूह में फंसे होने पर दुख प्रकट किया । मेरा साफ तौर पर मानना है कि न्यूज चैनलों में कुछ ऐसे पत्रकारों की जमात है जो न्यूज चैनल के मंच का, उसके ग्लैमर का, उसकी पहुंच का इस्तेमाल कर अपनी छवि भी चमकाते हैं और जब भी जहां भी सार्वजनिक तौर पर बोलने का मौका मिलता है वहां न्यूज चैनलों को गरियाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । उनका यह रूप और चरित्र मुझे हमेशा से परेशान करता है । मेरा मानना है कि यह अपने पेशे से एक तरह का छलात्कार है जो क्षणिक तो मजा देता है लेकिन पत्रकारिता का बड़ा नुकसान कर डालता है । खुद की छवि को चमकाने के लिए पत्रकारिता पर सवाल खड़े करनेवाले इन पत्रकारों की वजह से दूसरे लोगों को आलोचना का मौका और मंच दोनों मिल जाता है । मेरा मीडिया के उन अभिमन्युओं से नम्र निवेदन है कि वो अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फंसकर दम तोड़ने की बजाए युद्ध का मैदान छोड़ दें । अगर न्यूज चैनलों में उनका दम घुटता है तो वो वहां से तत्काल आजाद होकर अपना विरोध प्रकट करें लेकिन जिसकी खाते हैं उसको ही गरियाना कहां तक उचित है यह मेरी समझ से बाहर है । मैं कई न्यूज चैनलों के अभिमन्युओं से वाकिफ हूं और मेरे जानते अब तक ऐसा कोई वाकया सामने नहीं आया जहां इस तरह के पत्रकार वंधुओं ने व्यवस्था का विरोध किया हो । विरोध करना तो दूर की बात कभी अपनी नाखुशी भी जताई हो । मालिकों से सामने भीगी बिल्ली बने रहनेवाले इन पत्रकारों को सार्वजनिक विलाप से बचना चाहिए, यह उनके भी हित में है और पत्रकारिता के हित में भी । किसी भी चीज की स्वस्थ आलोचना हमेशा से स्वागतयोग्य है लेकिन वयक्तिगत छवि चमकाने के लिए की गई आलोचना निंदनीय है ।
दूसरी बात बताई गई कि हिंदी में ब्लाग के माध्यम बड़ा काम हो रहा है । यह बिल्कुल सही बात है कि ब्लाग और नेट के माध्यम से हिंदी के लिए बडा़ काम हो रहा है ।लेकिन कुछ ब्लागर और बेवसाइट जिस तरह से बेलगाम होते जा रहैं वह हिंदी भाषा के लिए चिंता की बात है । ब्लाग पर जिस तरह से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए उलजलूल बातें लिखी जा रही हैं वो बेहद निराशाजनक हैं । कई ब्लाग तो ऐसे हैं जहां पहले किसी फर्जी नाम से कोई लेख लिखा जाता है फिर बेनामी टिप्पणियां छापकर ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता है । कुछ कमजोर लोग इस तरह की ब्लैकमेलिंग के शिकार हो जाते हैं और कुछ ले देकर अपना पल्ला छुडा़ते हैं । लेकिन जिस तरह से ब्लाग को ब्लैकमेलिंग और चरित्रहनन का हथियार बनाया जा रहा है उनसे ब्लाग की आजादी और उसके भविष्य को लेकर खासी चिंता होती है । बेलगाम होते ब्लाग और बेवसाइट पर अगर समय रहते लगाम नहीं लगाया गया तो सरकार को इस दिशा में सोचने के लिए विवश होना पड़ेगा । ब्लाग एक सशक्त माध्यम है, गाली गलौच और बेसिर पैर की बातें लिखकर अपनी मन की भड़ास निकालने का मंच नहीं । इस बात पर हिंदी के झंडाबरदारों को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है । मैंने विनम्रतापूर्वक ब्लाग पर चल रहे इस घटिया खेल पर विरोध जताया और हॉल में फैले सन्नाटे से मुझे लगा कि वहां मौजूद लोग मेरी बातों से सहमत हैं ।
चूंकि उक्त सेमिनार में दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता पढ़ानेवाले शिक्षक उपस्थित थे और वैश्विक समस्या पर मुझे बोलना था । मुझे लगा कि पत्रकारिता की फैक्ट्री में काम करनेवाले लोग वहां मौजूद हैं इस वजह से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के सामने मुझे उनसे जुड़ी बात ही रखनी चाहिए । वैश्विक समस्या पर तो बाद में चर्चा हुई लेकिन सबसे पहले मैंने पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के बाबा आदम जमाने के होने की बात उठाई । कुछ दिनों पहले मैंने देश के सबसे प्रतिष्ठित युनिवर्सिटी में से एक के पत्रकारिता के छात्रों से मिला था जहां उनके सिलेबस पर बात की थी । प्रथम वर्ष में एक पेपर था- लेटर प्रेस और मुद्रण की विधियां । जब मैंने ये विषय देखा तो अपना सर पीट लिया । क्योंकि अखबार भी अब इनसे आगे निकल चुके थे । अब तो सारा कुछ कंप्यूटराइज्ड होता है । वो दिन लदे भी अब सालों हो गए जब लेटर प्रेस पर अखबार छपा करते थे । लेकिन हमारे युनिवर्सिटी के पत्रकारिता के छात्रों को अब भी लेटर प्रेस और मुद्रण की विधियां पढाई जा रही है । इसके अलावा भी अगर पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को देखें तो उसे समय के हिसाब से बिल्कुल नहीं बदला गया है । पता नहीं सालों पहले जब उसको बनाया गया था उसके बाद किसी ने भी उसको अद्यतन करने की जरूरत समझी या नहीं । अगर हम न्यूज चैनलों की कार्यपद्धति की बात करें तो उसमें तकनीक ने क्रातिकारी परिवर्तन किया है और हर रोज कोई ना कोई अपडेट हो रहा है जिसकी छात्रों को तो दूर विश्वविद्यालय में पढानेवाले शिक्षकों को भी जानकारी नहीं । तो पत्रकारिता की फैक्ट्री में जहां से देश के होनहार पत्रकार निकलते हैं वहां यह आधारभूत दोष अब भी कायम है और इसको दूर करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जाना अफसोसनाक है । अपनी इस चिंता को मैंने सेमिनार में जाहिर किया जिसपर बाद में कई शिक्षकों ने कड़ी आपत्ति जताई कि उनके ज्ञान पर सरेआम सवाल कैसे खड़ा किया जा रहा है । लेकिन बातचीत के बाद उन्होंने माना कि तकनीक के अपडेशन के बारे में उनकी जानकारी नहीं के बराबर है । छात्रों को कैमरा पढ़ानेवाले शिक्षक ने शायद ही कभी कैमरा देखा-छुआ हो यह जरूरी भी नहीं है लेकिन कम से कम कैमरा तकनीक में हुए आधुनिकीकरण के बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिए । न्यूजरूम सिस्टम के बारे में तो पता होना ही चाहिए ।
सवाल सिर्फ पत्रकारिता के सिलेबस का नहीं है सवाल अन्य विषयों का भी है जहां के सिलेबस में समय के साथ बदलाव नहीं किया गया । शिक्षा के तमाम कर्ताधर्ताओं को भी कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई । अब वक्त आ गया है कि सरकार को इस ओर तत्काल ध्यान देकर इन खामियों को दूर करना होगा ताकि देश में शिक्षा का स्तर उंचा हो सके और कॉलेजों में दी जानेवाली शिक्षा का उपयोग नौकरी में हो सके ।

Monday, March 14, 2011

लोक से दूर होती कविता !

एक दिन दफ्तर के साथियों से कविता पर बात शुरू हुई । मेरे मन में सवाल बार-बार कौध रहा था खि अब कोई दिनकर, बच्चन या श्याम नारायण पांडे जैसी कविताएं कोई क्यों नहीं लिखता । आज जिस तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं वो सिर्फ कुछ खास लोगों की समझ में आती है और एक सीमित दायरे में ही उसका प्रचार प्रसार और सम्मान मिलता है , लोक के बीच ना तो उन्हें प्रियता हासिल होती है और ना ही वो लोगों की जुबान पर चढ़ जाता है । कविता के मामले में मेरी जानकारी बिल्कुल नहीं है लेकिन बहुधा मन में यह सवाल उठता है कि छंद वाली कविता या फिर जोश या जुनून पैदा करनेवाली कविता क्यों नहीं लिखी जा रही है । आज भी दिनकर की पंक्तियां- रे रोक युधिष्ठिर को ना यहां जाने दे उसको स्वर्ग धीर, पर फिरा हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर या फिर बच्चन की – बैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला या फिर श्याम नारायण पांडे की – रण बीच चौकड़ी भर-भर कर,चेतक बन गया निराला था, राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा को पाला था- जैसी कविता क्यों नहीं लिखी जा रही है । मेरे इन सवालों पर मेरे एक मित्र ने कहा कि प्रगतिवादियों के विकास ने और साहित्य पर वामपंथियों के दबदबे ने इस तरह की कविता को बहुत नुकसान पहुंचाया । मैंने जब इसका विरोध किया तो वो और मजबूती से अपनी बात कहने लगे । उनका तर्क था कि जिस तरह से हिंदी में एक खास तरह की विचारधारा वाली कविता का दौर शुरू हुआ और मार्क्सवादी आलोचकों ने उसको जिस तरह से उठाया उसने कविता का बड़ा नुकसान किया । उनका तर्क था कि मार्क्सवादी आलोचकों ने विचारधाऱा वाली कविता को श्रेष्ठ साबित करने के लिए छंद में कविता लिखनेवालों को मंचीय कवि कहकर मजाक उड़ाना शुरू कर दिया । पूरे हिंदी साहित्य में ऐसा परिदृश्य निर्मित कर दिया गया कि अगर आप छंदोबद्ध कविता करते हैं और मंच पर सुर में कविता पाठ करते हैं तो आप प्रतिष्ठित कवि या गंभीर कवि नहीं हैं । उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि इस दुष्प्रचार का नतीजा यह हुआ कि आगे आनेवाली पीढ़ी ने छंद वाली कविता लिखना बंद कर दिया । मंच पर जाना बंद कर दिया । कविता का जो संवाद लोक से होता वह बंद हो गया । मंच पर होनेवाली कवि गोष्ठी से लोगों में पढ़ने का जो एक संस्कार बनता था वह खत्म हो गया । किसी कवि की अगर कोई रचना लोगों को पसंद आती थी तो श्रोता उसकी किताब ढूंढते थे और खोजकर उसको ना केवल खरीदते थे बल्कि पढ़कर उसपर चर्चा करते थे । इस तरह से समाज में कवि और कविता को लेकर एक संस्कार एक समझ विकसित होती थी । लेकिन कवि गोष्ठी के खत्म होने या फिर कमरों में सिमट जाने से कवियों का जो एक वृहत्तर संवाद होता था उसका दायरा भी सिमट गया । इसका नतीजा यह हुआ कि पाठकों में भी कमी आई, रचना का प्रचार प्रसार कम से कमतर होता चला गया । पाठकों को नई रचनाओं के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई जिसके आभाव में कविता संग्रह या तो प्रकाशकों के पास सालों साल रहते रहे या फिर सरकारी खरीद के बूते लाइब्रेरी शोभा बढ़ाते रहे ।
मेर मित्र अपनी बातें इस मजबूती से कह रहे थे कि हम तीन लोग भावविभोर होकर उनको सुन रहे थे । बीच बीच में टोका टाकी उनको और मजबूती प्रदान कर रही थी लेकिन उनके तर्कों में ताकत थी जिस वजह से हम उन्हें सुनना चाह रहे थे । नई पीढ़ी के कवियों के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि नए लड़कों को लगने लगा कि अगर वो विचारधाऱा की या आम आदमी की यथार्थवादी कविता नहीं लिखेंगे तो हिंदी साहित्य में उनकी नोटिस नहीं ली जाएगी, उनकी पहचान नहीं बन पाएगी, उनको पुरस्कार आदि नहीं मिल पाएगा । यह उस माहौल का नतीजा था जो मार्क्सवादी आलोचकों और उस दौर के कर्ता-धर्ताओं ने बनाया था । लेकिन जिस यथार्थवाद और आम आदमी की आड़ में पूरा आंदोलन चल रहा था वही कविता से दूर होता चला गया । हम काफी देर तक उनकी बातें सुनते रहे लेकिन अचानक से मेरे दूसरे मित्र ने हस्तक्षेप किया और उनको रोकते हुए कहा कि वो जिस तरह से पूरे परिदृश्य का सरलीकरण या सामान्यीकरण कर रहे हैं वो उचित नहीं है । अब दोनों थोड़े भिड़ने के अंदाज में बहस करने लगे । दूसरे मित्र का तर्क था कि बाद के दिनों में माहौल बदला और समादज के सामने कोई चुनौती नहीं थी कोई बड़ा लक्ष्य नहीं था । जोश और जुनून बाले दौर में देश की आजादी और उसके बाद की स्थितियां जिम्मेदार थी । बाद में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो भी वीररस से सराबोर कविताएं लिखी गई । उसके बाद इमरजेंसी के दौर में नागार्जुन ने भी कई लोकप्रिय कविताएं लिखी जो जनता की जुबान पर ही नहीं चढ़ी बल्कि जयप्रकाश आंदोलन के दौर में आंदोलनकारियों के लिए प्रेरक भी साबित हुई । कविता पर अच्छी बहस चल रही थी जिसमें मैं अपनी अज्ञानता की वजह से कोई खास हस्तक्षेप नहीं कर पा रहा था । लेकिन फिर भी बार बार मेरे मन में यह सवाल उठ रहा था कि आज की कविता जनता से दूर क्यों हो गई है ।
इस बहस के कुछ दिन बाद कवि मित्र तजेन्द्र लूथरा का संदेश मिला कि वो अपने घर पर एक कवि गोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं जो अनौपचारिक होगा जिसमें कुछ कवि मित्र अपनी रचनाएं सुनाएंगे और मिल बैठकर बातें करेंगे । मेरी कवि गोष्ठी में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही लेकिन कुछ दिनों पहले कविता पर हो रही बहस और कवि मित्रों से मिलने का लोभ ने मुझसे हां करवा लिया । दिल्ली की ट्रैफिक से जूझता जब में उनके घर पहुंचा तो कवि गोष्ठी शुरू हो चुकी थी और युवा कवि राजेन्द्र शर्मा अपनी कविता का पाठ कर रहे थे । श्रोताओं में कवियत्रि शबनम, बिपिन चौधरी, गोल्डी मल्होत्रा, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, ममता जी, बरखा सिंह, मदन कश्यप, मिथिलेश श्रीवास्तव और वरिष्ठ कवि विष्णु नागर मौजूद थे । जो श्रोता ते वही कवि भी थे, मेरे जैसे दो लोग और थे जो शुद्ध रूप से श्राता थे । वहां भी साफ तौर पर छंद वाली कविता और यथार्थवादी कविता का फर्क मुझे दिखा लेकिन जिस तरह की कविता शबनम, गोल्डी मल्होत्रा, ममता जी और लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने सुनाई वो समस्याओं के अलावा कर्णप्रिय भी था । उस दिन मुझे जो एक खास बात नजर आई वो यह कि कविता में अब आरटीआई से लेकर पीआईएल जैसे शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है । मौजूद सभी कवियों को तीन तीन कविताएं सुनाने की छूट थी । तजेन्द्र शर्मा की कविता शब्द से बातचीत मुझे बेहद पसंद आई दूसरी कविता लुहार का डर समाज की कई प्रवृतियों पर चोट करती प्रतीत हुई । इस अनौपचारिक गोष्ठी का संचालन पत्रकार-कवि-उपन्यासकार अरुण आदित्य कर रहे थे । उनकी कविता एक फूल का बॉयोडाटा और कागज का आत्मकथ्य बड़े सवाल तो खड़े कर ही रही थी समाज को हकीकत का आईना भी दिखा रही थी । दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह ने भी कुछ गजलें गाकर सुनाई । विष्णु नागर और मदन कश्यप ने भी गंभीरता से अपनी बात अपनी कविता में कही ।उसी कवि गोष्ठी के बाद राजेन्द्र शर्मा ने एक छोटी सी पुस्तिका- गाथा पांवधोई की – मुझे दी । घर आकर जब उसे पलटा तो जानकर खुशी हुई कि सहारनपुर में पांवधोई नदी जो कि नाले में तब्दील हो गई थी उसका जीर्णोद्धार जिलाधिकारी आलोक कुमार ने स्थीनय जनता की मदद से करवाया । उत्तर प्रदेश में यह अपने तरह की अनोखी पहल थी जहां प्रशासन ने जनसहयोग से जनहित के एक ऐसे काम को अंजाम देकर अपनी ऐतिहासिक विरासत को संवारा । इस एक छोटी सी घटना से अगर उत्तर प्रदेश में प्रशासन और जन सहयोग का नया अध्याय शुरू हो सके तो सूबे के लोगों के लिए बेहतर होगा ।

Monday, February 28, 2011

सपने भी सच होते हैं

क्या आपने कभी कोई सपना देखा है । क्या आपने कभी सपने को हकीकत में बदलते देखा है । कम ही ऐसे लोग होते हैं जिनके ख्बाव हकीकत में बदलते हैं, जो अपने सपनों को महसूस करते हुए उसके साथ जीते हैं । अभी कुछ दिनों पहले मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ जो एक सपने के सच होने जैसा था । पिछले दिनों बातों-बातों में तय हुआ कि दफ्तर के कुछ लोग पहाड़ों पर चलें । दफ्तर के दोस्तों के साथ शिमला नारकंडा जाने का कार्यक्रम बना, प्रस्ताव भी हमारे बॉस संजीव पालीवाल की तरफ से आया था और हमारे ग्रुप की अगुवाई भी उन्हें ही करनी थी । मैं तकरीबन पंद्रह साल पहले सड़क मार्ग से अपने परिवार के साथ शिमला गया था । धुंधली सी स्मृति मेरे जेहन में थी । खतरनाक और घुमावदार पहाड़ी रास्ते का अंदाजा भी था । इसलिए जब यह तय हुआ कि अपनी गाड़ियों से नारकंडा चलेंगे तो मन में एक अजीब सा डर था । पहाड़ी रास्तों पर ना जाने का अनुभव इस डर को बढ़ा रहा था । घबराहट इस बात की भी हो रही थी मुझे अपने वरिष्ठ सहयोगी तसलीम खान की गाड़ी में जाना था । खान साहब गाड़ी बेहद तेज चलाते हैं सौ सवा सौ किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से तो आमतौर पर चलाते ही हैं, ड्राइविंग के वक्त एडवेंचरस भी हो जाते हैं । कभी जब भी ऑफिस से उनके साथ घर लौटा हूं, राम-राम करते ही बारह किलोमीटर का रास्ता कटता है । हलांकि गाड़ी पर उनका नियंत्रण रहता है लेकिन फिर भी सांस अटकी रहती है । खैर पहाड़ पर बर्फ देखने का जोश उस डर पर भारी पड़ा और हम सात लोग दो गाड़ियों में भरकर जन्नत देखने निकल पड़े । दिल्ली से निकलते ही खान साहब ने अपनी गाड़ी का एक्सीलेटर दबा दिया और गाड़ी के स्पीडोमीटर का कांटा एक सौ पचास को चूमने को बेताब होने लगा। उसकी बेकरारी लगातार बनी रही और वो डेढ़ सौ के साथ गलबहियां करता रहा और साथ वाली सीट पर बैठा मैं मन ही मन हनुमान चालीसा बुदबुदाता रहा । खैर स्पीडोमीटर और उसकी सुई का रोमांस जारी था लेकिन अंबाला के आसपास कोहरा खलनायक बनकर रास्ते पर आ गया और उसने कांटे और डेढ़ सौ के निशान को काफी समय तक दूर कर दिया । फिर तो इन दोनों का मिलन लौटते वक्त ही सोनीपत में हो पाया ।
दिल्ली से सुबह निकले हम सब लोग तकरीबन ग्यारह बजे जाबली में रुके और वहां एक होटल में रुककर पूड़ी और आलू की सब्जी का नाश्ता किया । हिमाचल में घुसते ही बेहद स्वादिष्ठ खाना इस बात की आश्वस्ति दे रहा था कि आनेवाले दो दिन अच्छा भोजन मिलेगा । थोड़ी देर रुककर हमलोग फिर रवाना हो गए । लेकिन इस बीच मेरी सीट बदल गई थी और मैं पीछे बैठ गया था इसलिए स्पीडोमीटर और सुई के खतरनाक रोमांस को देख नहीं पा रहा था, दूसरी तरफ पहाड़ी रास्ता शुरू होने के बाद इस रोमांस पर ब्रेक भी लग चुका था । जाबली से हम आगे बढ़े तो एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ हजारो फीट गहरी खाई देखकर डर थोड़ा और बढ़ा लेकिन घंटे भर की ड्राइव के बाद ये डर जाता रहा और फिर मैं उस घुमावदार रास्ते को इंज्वॉय करने लगा । नारकंडा पहुंचने के पहले ही, कुफरी से ही बर्फ दिखने लगा था । सड़क के एक तरफ पहाड़ और उस पर जमी बर्फ, हमें पागल बना रहा रहा था । बर्फ को छूने और उसपर खड़े होने का टेंपटेशन पर काबू पाना मुमकिन नहीं था । आखिरकार जगह मिलते ही हमने गाड़ी रास्ते में खड़ी की और बर्फ पर कूद पड़े । मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार इतना बर्फ देखा था । अबतक या तो फ्रिज में जमे बर्फ या फिर स्कूल के दिनों में बर्फ रगड़कर जो गोला मिलता था उसे देखा था । हां जब दिल्ली आया था तो किंग्सवे कैंप से सेंट्रल सेक्रेटेरियट बाली बस में बैठा मलकागंज के बाद बर्फखाना के आसपास ठेले पर लदी बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्ली देखी थी । लेकिन बर्फ का पहाड़ देखकर हमारी खुशी सातवें आसमान पर थी । संजीव जी ने हमारे उत्साह को यह कहकर हवा दे दी कि आगे तो और भी बर्फ मिलेगी ।
चलते चलाते तकरीबन शाम पांच बजे हमलोग नारकंडा पहुंच गए । नारकंडा बाजार में हम थोड़ी देर रुके और खाने-पीने का सारा सामान अपनी गाड़ी में लाद कर वहां से दस बारह किलोमीटर दूर घरयौती के लिए रवाना हो गए । घरयौती में हमें संजीव जी के घर में रुकना था । जैसे ही हम नारकंडा से थोड़ा नीचे उतरे इतनी बर्फ जमा थी कि हम खुद को रोक नहीं पाए । दोनों गाड़ियां रुक गई और हम सात लोग बाहर बर्फ पर । संजीव जी और तसलीम जी हमारी तस्वीरें लेने लगे क्योंकि ये दोनों पहले भी पहाड़ों पर खूब घूम चुके थे । पंकज तो हिमाचल के रहनेवाले ही थे लेकिन बावजूद इसके उनका उत्साह जबदरदस्त था । लेकिन बाकी चार- धीरज, आशुतोष, अमित और मैं तो बर्फ पर चढ़ता ही चला गया । जैसे जैसे आगे जा रहे थे बर्फ बढ़ता जा रहा था । अभी तक मैंने फिल्मों में इतनी बर्फ देखी थी, मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बर्फ पर सोया भी जा सकता है । स्कीइंग करती तस्वीरें तो देखी थी लेकिन बीस फीट की उंचाई से बर्फ पर सरकना..उफ्फ...क्या अनुभव था । सारे बर्फ सूखे थे लेकिन कपड़ों के अंदर जाकर शैतानी पर उतारू थे, पिघलकर हमें गुदगुदाने में लगे थे । खैर तकरीबन आधे घंटे की धींगामुश्ती के बाद हम सूखे बर्फ के ठंडे और सुखद एहसास के साथ घर की ओर रवाना हो गए।
बारह तेरह घंटे की सड़क यात्रा के बाद कोई थकान नहीं, यह तो देवभूमि में ही संभव था, वर्ना दिल्ली में तो अगर आप मयूर विहार से रोहिणी चले जाइये तो आपके दम निकल जाएगा। खैर हम जा पहुंचे घरयौती । नीचे गाड़ी खड़ी करके तकरीबन 25-30 मीटर की उंचाई पर स्थित संजीव जी के घर तक पहुंचना था । मैंने कंधे पर अपना सामान उठाया और हाथ में चिप्स का पैकेट लेकर चढ़ाई चढ़ने लगा । पगडंडियों से चलते हुए उपर पहुंचना था । तसलीम जी जितनी तेज गाड़ी चला कर आए थे उतनी ही धीमी रफ्तार से चढ़ाई चढ़ रहे थे । उन्होंने मुझे भी धीरे चलने की सलाह दी लेकिन मैं जोश में तेज चल गया लेकिन चंद मीटर के बाद ही औकात में आ गया । फिर तो कंधे पर लटका बैग तो भारी लगने ही लगा, हाथ में मौजूद दस ग्राम का चिप्स का पैकेट भी वजनी महसूस होने लगा। अनुरोध कर पंकज को चिप्स का पैकेट थमाया और फिर धीरे-धीरे घर तक पहुंचा । सेब के बगीचे के बीच तीन फ्लोर का लकड़ी का बना मकान बेहद आकर्षक लग रहा था । बॉलकनी में खड़े होकर आप दूर तक फैले पर्वत श्रृंखला को देख सकते हैं । दूर-दूर तक फैला पहाड़, उसपर जमी बर्फ और काफी दूर- दूर बसे घर । मनोहारी दृश्य, हर फ्रेम ऐसा कि जहां मन हो वहां कैमरा क्लिक कर दो, तस्वीर बेहतरीन ही आएगी । इतने लंबे सफर और थोड़े पैदल चढाई के बाद भी हम सबलोग उर्जा से लबरेज । धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगा,ठंडी हवा के झोंकों के बीच रसरंजन का कार्यक्रम बना । घर का केयर टेकर नंदू ने बॉन फायर का इंतजाम कर रखा था । चारो तरफ पहाड़, उसपर जमी बर्फ, साफ और खुला आसमान, सामने जल रही आग और साथ में रसरंजन । आसमान के तारे भी हमारे साथ इस माहौल में शामिल होने को बेताब लग रहे थे, तभी तो सितारे बेहद करीब लग रहे थे । लग रहा था कि हाथ उठाकर सितारों को छू सकते हैं । माहौल को आशुतोष ने रूमानी बना दिया । अपने मोबाइल से साठ के दशक के रूमानी गाने बजा कर । बॉन फायर और रसरंजन का यह कार्यक्रम रात के दो बजे तक चलता रहा । आठ हजार फीट की उंचाई पर यह सब जारी था । मैंने तो कभी सपने में भी इस बात की कल्पना नहीं की थी कि सेब की लकड़ी जलाकर आग तापेंगे । जब मैं अपने गांव में रहता था तो सेब घर में तभी आता था जब कोई बीमार पड़ता था । उसी सेब की लकड़ी का बॉन फाय़र । अकल्पनीय लेकिन हो रहा था ।
अगले दिन सुबह हम हाटू पीक जाने के लिए निकले लेकिन रास्ते पर इतनी बर्फ जमी थी कि गाड़ी जा नहीं सकती थी और हम पैदल दो ढाई किलोमीटर से ज्यादा जाने को तैयार नहीं थे । उसी में मस्ती करके धमाल मचा रहे थे । हाटू पीक पर जाने के पहले हम तानी जुब्बर लेक पर भी गए । तकरीबन बीस फीट चौड़े उस झील की खास और चकित कर देनेवाली बात ये थी कि एक किनारे पर धूप और दूसरे किनारे पर तीन फीट तक जमी बर्फ । झील के एक किनारे पर एक छोटा सा मंदिर उस पूरे कैंपस को एक अध्यात्मिक स्वरूप भी दे रहा था । प्राकृतिक सौंदर्य के आगोश में एक और दिन बीत गया और हम फिर लौट आए अपने अड्डे पर । फिर रसरंजन और बॉन फायर का दौर । हम वहां बैठकर नॉस्टेजिक भी हो रहे थे । अपने जमाने के, अपने कॉलेज के, अपने दोस्तो के, अपनी मोहब्बत के किस्से । समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला । सुबह आठ बजे वहां से रवाना हुआ और कुछ देर शिमला में बिताकर रात दस बजे दिल्ली पहुंच गया । लौटने में खान साहब की गाड़ी और तेज चल रही थी लेकिन दो दिन की मस्ती में पहाड़ों में घूमने के बाद रफ्तार के डर काफूर हो चुका था । तीन दिनों तक हिमाचल में घूमने के बाद यह पता चला कि क्यों कहलाता है यह प्रदेश देवभूमि । दफ्तर के तनाव और तमाम पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त ये तीन दिन ऐसे थे जिन्हें भुला पाना मुमकिन नहीं । ऐसे मजेदार ट्रिप के लिए संजीव जी को तहे दिल से शुक्रिया अदा करने के बाद अब मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सपने सच होते हैं ।

Saturday, February 26, 2011

उपन्यासकार की 'आजादी'

अमेरिकी लेखक जोनाथन फ्रेन्ज का उपन्यास फ्रीडम पिछले कई हफ्तों से बेस्टसेलर की सूची में बना हुआ है । यह उपन्यास ना केवल बेस्ट सेलर की सूची में शीर्ष पर है बल्कि पाठकों के साथ साथ आलोचकों ने भी इसे खुले दिल से सराहा है । इस उपन्यास को लेकर अमेरिका और यूरोप में काफी शोरगुल मचा, हर अखबरा और पत्रिका में इसकी चर्चा हुई । उपन्यास की लोकप्रियता और उसकी शैली को लेकर आलोचक इतने अभिभूत हो गए कि कई लोगों ने इसके लेखक जोनाथन फ्रेंन्ज को टॉलस्टॉय और टॉमस मान के समांतर खड़ा कर दिया । विश्व प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने अपने कवर पर जोनाथन की तस्वीर छापी और उन्हें पिछले दस सालों में प्रकाशन जगत का सबसे ज्यादा ध्यान खींचनेवाला लेखक करार दे दिया । आमतौर पर उपन्यासों को बेदर्दी से तसौटी से पर कसनेवाले अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में जब इसकी समीक्षा छपी तो इसे अमेरिकन फिक्शन का मास्टरपीस करार दिया । लब्बोलुआब यह कि फ्रीडम को उसके पाठकों ने काफी पसंद किया ।
लेखक का दावा है कि उसे यह उपन्यास लिखने में नौ वर्ष लगे ।
दरअसल अगर हम इस उपन्यास के कथानक को देखें तो यह पूरा उपन्यास एक फैमिली ड्रामा है जिसमें वाल्टेयर और पैटी का प्यार परवान चढ़ता है । वो दोनों शादी के बंधन में भी भंधते हैं और फिर सेंट पॉल शहर के प्रतिष्ठित इलाके में घर खरीदकर अपना वैवाहिक जीवन शुरू करते हैं । पैटी एक आदर्श पड़ोसी की तरह व्यवहार करती है जो बहुधा अपने अगल बगल में रहनेवालों को बैटरी रिसाइकल करने की युक्ति बताती है तो कभी लोगों को यह समझाती है कि कैसे स्थानीय पुलिसकर्मियों का उपयोग किया जा सकता है । पैटी और वाल्टर का जीवन बेहद रोमांटिक तरीके से गुजरता है और वाल्टर की नजर में पैटी एक बेहतरीन माशूका है जो पत्नी बनने के बाद भी उतनी ही शिद्दत से उसे प्यार करती है । प्यार और मोहब्बत के बीच चल रही जिंदगी के बीच एक अहम मोड़ तब आता है जब कुछ दिनों बाद उन्हें एक पुत्र पैदा होता है । पुत्र के पैदा होने के बाद समय का पहिया घूमता है और कहानी थोड़ी तेजी से चलती है और समय के साथ पैटी और वॉल्टर जवान जोड़े से बुढाते जोडे़ में तब्दील होने लगते हैं ।
इस उपन्यास की कहानी में रोचक मोड़ तब आता है जब पैटी का बेटा किशोरावस्था में पहुंचता है । टकराहट होती है मां के सपनों और बेटे की आकांक्षाओं में । यहां इस मनोविज्ञान को लेखक ने बेहद सूक्षम्ता से पकड़ा है । किशोरवय बेटे जॉय और मां पैटी के बीच जो मनमुटाव और विचारों का संघर्ष चलता है उसकी परणिति होती है कि एक दिन उनका इकलौता बेटा घर छोड़कर आक्रामक रिपब्लिकन पड़ोसी के घर में रहने चला जाता है । यह उपन्यास एक फैमिली ड्रामा के अलावा अभिभाकत्व के संघर्षों की दास्तां भी है । बाद में जॉय शादी कर लेता है और अपनी पत्नी कोनी के साथ रहने लगता है । बुढ़ाती मां पैटी अपने बेटे के पास तो जाना चाहती है लेकिन उसकी पत्नी कोनी को वो पसंद नहीं करती है। यहां आपको टिपिकल इंडियन मानसिकता भी नजर आ सकती है । जोनाथन के हर उपन्यास में एक भारतीय पात्र तो होता ही है इसलिए मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि जोनाथन ने भारतीय परिवार की मनस्थिति को अमेरिकी परिवेश में ढाला है । गौरतलब है कि जोनाथन ने अपने इस उपन्यास में भी एक भारतीय पात्र को रखा है । इस उपन्यास में वॉल्टर की सेक्रेटरी ललिता एक भारतीय लड़की है । इसके पहले भी जोनाथन ने अपने उपन्यास द ट्वेंटीसेवन्थ सिटी में मंबई की एक लड़की एस जामू को एक शहर के पुलिस प्रमुख के रूप में चित्रित किया है ।
कहानी आगे बढ़ती है तो जॉय अपनी पत्नी के पत्नी के अलावा बेहद खबसूरत लड़की जेना में सुकून तलाशता है । उधऱ पैटी को अपने पति वॉल्टर की सेक्रेटरी ललिता फूटी आंखों नहीं सुहाती । इस तरह के परिवेश में जहां बेटा अपनी पत्नी के रहते अपनी प्रेमिका के जुल्फों में उलझा हो और पति अपनी सेक्रेटरी के साथ इश्क की पींगे बढ़ा रहा हो तो एक महिला के दिमाग में क्या चल रहा होगा । पैटी की मानसिकता और खंडित वयक्तित्व का जो सूक्ष्म चित्रण जोनाथन ने किया है वह इस उपन्यास को रोचरता की नई उंचाई पर ले जाता है । कहानी में ही यह तथ्य भी सामने आता है कि दरअसल पैटी की का जो असुरक्षा बोध है, उसके पीछे का मनोविज्ञान यह है कि पैटी जब किशोरी थी तो देश के प्रथम परिवार के बेटे ने उसके साथ डेट रेप किया था । चूंकि अपराधी देश के बड़े परिवार से था इसलिए पैटी के मां-बाप इस अपराध को भी भुनाने में लग गए और बेटी का सौदा कर अपने फायदे की सोचने लगे। पैटी को जब अपने मोल भाव का पता चला तो वह बेहद खिन्न हो गई । उसे लगने लगा कि घर-परिवार सब बेकार है , सब अपने फायदे की सोचते हैं । उस वक्त से ही पैटी के अंदर बेहद असुरक्षा का बोध घर कर गया था जो उसके मां बनने के बाद बढ़ता चला गया ।
जोनाथन के इस उपन्यास के सारे पात्रों ने कहीं न कहीं जबरदस्त पाबंदी के बाद स्वतंत्रता के स्वाद को चखा है । लेकिन ज्यों ही वो स्वतंत्रता के जोश में उन्मादी होने लगते हैं उन्हें जबरदस्त ठोकर लगती है और वो जमीन पर आ जाते हैं । अगर हम उदाहरण के तौर पर देखें तो बॉस्केटबॉल खिलाड़ी पैटी जब आजाद होकर दौड़ते हुए सड़क पर आती हैं तो अचानक फिसलकर गिरती हैं और अस्पताल पहुंच जाती है । पैटी के जोश और फिर उसके ठोकर खाकर गिर जाने की घटना से इस उपन्यास का एक पैटर्न दिखाई देता है जिसका जिक्र मैं उपर कर चुका हूं । लेकिन जिस तरह से सांप सीढी के खेल की तरह इस उपन्यास कथा चलती है उससे रोचकता बरकरार रहती है और वो पाठकों को लगातार बांधे रखती है । इसके अलावा घटनाओं और परिस्थियों को जो सूक्ष्म चित्रण लेखक ने किया है उससे उनकी मेहनत साफ तौर पर झलकती है । लेखक ने इस बहाने से अमेरिका के समाज का चित्रण किया है । यह उपन्यास बराक ओबामा के अमेरका के राजनीतिक पटल पर उदय के साथ खत्म होता है । जहां जीत की उम्मीद है और बदलाव की आहट भी ।

Saturday, January 29, 2011

वर्धा में दो दिन

बेहद सर्द सुबह थी, कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था । मैं बात कर रहा हूं जनवरी के पहले हफ्ते की जब अचानक से दिल्ली में सर्दी कम हुई थी और कोहरा घना हो गया था । मुझे वर्धा जाना था और उसके लिए नागपुर तक की प्लाइट लेनी थी जो दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह सवा पांच बजे उड़ती थी । जाहिर तौर पर मुझे घर से तड़के साढ़े तीन बजे निकलना था । टैक्सी लेकर घर से निकला तो कार की लाइट और कोहरे के बीच संघर्ष में कोहरा जीतता नजर आ रहा था । इंदिरापुरम का इलाका कुछ खुला होने की नजह से कोहरा और भी ज्यादा था । एक जगह तो हमारी गाड़ी डिवाइडर से टकराते -टकराते बची । सामने कुछ दिख नहीं रहा था अंदाज से गाड़ी चल रही थी । लेकिन वर्धा के गांधी आश्रम को और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय को देखने की इच्छा मन में इतनी ज्यादा थी कि वो कोहरे पर भारी पड़ रही थी। किसी तरह चलते चलाते हम हवाई अड्डे तक पहुंचने वाले थे लेकिन ड्राइवर के सुझाव पर हम हवाई अड्डे के ठीक पहले चाहरदीवारी से घिरे गांव मेहरमपुर में घुस गए। हवाई अड्डे के पहले इतनी बड़ी बस्ती जिसका हमें आजतक एहसास भी नहीं था । लेकिन वो पूरी बस्ती तो सुबह चार सवा चार बजे पूरी तरह से जगमगा रही थी । कई चाय की दुकान और कूरियर कंपनी के कर्मचारी अपने काम में तन्मयता से लगे थे उनको देखकर लग रहा था कि ना तो उन्हें ठंड का एहसास था और ना ही कोहरे का भय । हमने भी वहां रुककर चाय पी । उस हाड़ कंपा देनेवाली ठंड में चाय पीने का आनंद ही कुछ और था । इच्छा थी उस बस्ती को घूमकर वहां की जिंदगी को देखता लेकिन हवाई यात्रा की घंटे भर पहले पहुंचने की मजबूरी की वजह से संभव नहीं हो पाया ।
लगभग सवा घंटे की उड़ान के बाद जब सुबह सवा सात बजे नागपुर हवाई अड्डे पर उतरा तो बेहद शांत हवाई अड्डा शहर के मिजाज का भी एहसास करा रहा था । थोड़ी देर वहां रुकने के बाद वर्धा के लिए रवाना हो गया क्योंकि सुबह ग्यारह बजे से वहां दो दिनों का राष्ट्रीय सेमिनार होना था जिसमें भाग लेने के लिए वक्त पर पहुंचना जरूरी था । नागपुर से तकरीबन डेढ़ घंटे में वर्धा पहुंचा । विश्वविद्यालय कैंपस में घुसते ही सामने फादर कामिल बुल्के अंतराष्ट्रीय छात्रावास दिखा । वहीं हमारे रुकने का इंतजाम था और पत्रकारिता के उत्साही छात्र हमारे स्वागत के लिए खड़े थे । वहीं हमारी मुलाकात जनमोर्चा के संपादक और बुजुर्ग पत्रकार शीतला सिंह और वरिष्ठ लेखक गंगा प्रसाद विमल जी से हुई । विमल जी सुबह की सैर से लौटकर आए थे और शीतला सिंह छात्रावास के बाहर धूप सेंक रहे थे । सुबह वहां भी ठीक-ठाक ढंड थी लेकिन लोग बता रहे थे कि दिन में मौसम गर्म हो जाता है । शीतला सिंह से गपशप करते हुए पुराने हिंदुस्तानी प्रदीप सौरभ से मुलाकात हो गई । खुले आकाश के नीचे बैठकर ढंड में धूप का आनंद लेना दिल्ली में तो कभी नसीब नहीं हुआ इसलिए छात्रों के बार-बार कमरे में जाकर आराम करने की सलाह को नजरअंदाज करते हुए वहीं बैठा रहा । कुछ देर बाद पत्रकारिता विभाग के युवा और उत्साही प्रोफेसर और अध्यक्ष अनिल के राय अंकित भी आ गए जो इस कार्यक्रम के संयोजक थे । उनसे गपशप करने के बाद विश्विद्यालय के दिल्ली केंद्र प्रभारी मनोज राय के साथ मैं कैंपस घूमने निकल गया । हम वहां भी गए जहां बैरकनुमा चार कमरों से विश्वविद्यालय शुरू हुआ था । सड़क के आमने सामने विश्वविद्यालय के दो कैंपस हैं । लेकिन अभी मुख्य कैंपस में ही ज्यादा हचलचल और चहल पहल थी क्योंकि विश्वविद्यालय के तमाम अधिकारियों के दफ्तर और आवास इसी कैंपस में है । पूरे विश्वविद्यालय कैंपस के चारो ओर रिंग रोड बन बनाकर उसे सुरुचिपूर्ण तरीके से एक आकार दिया जा रहा है । उपर एक जगह गांधी हिल है जहां पहाड़ी के हिस्से को एक छोटे पार्क के तौर पर विकसित किया गया है जिसमें गांधी के तीन बंदरों की मूर्तियों के अलावा गांधी की घड़ी और उनका चश्मा भी है । पहाड़ी के उपर, पानी की कमी के बावजूद गांधी हिल पर तमाम फूल पौधे लहलहा रहे थे । छात्रों ने बताया कि कुलपति की व्यक्तिगत रुचि की वजह से ही यह हो पाया ।
नियत समय पर हमलोग विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर सभागार में पहुंचे और बाबू विष्णुराव पराड़कर को नमन कर कार्यक्रम शुरू हुआ । बनारस से आए विद्वान प्रोफेसर राममोहन पाठक और कोलकाता विश्वविद्यालय की पत्राकरिता विभाग की प्रोफेसर ताप्ती बसु का भाषण हुआ । बोझिल से कार्यक्रम में गर्मी आई जब हरिभूमि के संपादक हिमांशु द्विवेदी ने जोशीले अंदाज में ये साबित करने की कोशिश की पत्रकारिता भी कारोबार है और पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए पाठक भी जिम्मेदार हैं । हिंमाशु ने कहानियां, चुटकुले और शेर सुनाकर खूब तालियां बटोरी लेकिन बाद में जब गंगा प्रसाद विमल और कुलपति विभूति नारायण राय बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने हिमांशु के भाषण की धज्जियां उड़ा दी । जोश में विमल जी ने तो सारे संपादकों और पत्रकारों को बिचौलिया करार दे दिया । कुलपति ने भी डंके की चोटपर कहा कि पत्रकारिता और किसी व्यवसाय की तरह नहीं है, जब भी मीडिया की आजादी पर हमला हुआ है तो पूरा समाज उसके खिलाफ खडा़ हो गया । इस वजह से मीडिया से समाज की अपेक्षा भी है लेकिन जोश में कुलपति ने भी मीडिया संपादकों को भ्रष्ट करार दे दिया । जिसपर बाद में उन्होंने, अगले दिन जब ये मुद्दा उठा, तो सफाई देते हुए कहा कि उन्हें मिसकोट किया गया । दो सत्रों में यह विमर्श हुआ । दोनों सत्रों में बजुर्ग प्रोफेसर और पत्रकारों ने विमर्श किया जिनकी बातें सुनकर मैं बहुत ज्यादा निराश हुआ, पत्रकारिता कहां से कहां चली गई लेकिन वो लोग अब भी मिशन की लकीर पीट रहे हैं । मुझे लगता है कि पत्रकारिता पर बात हो तो युवा पत्रकारों को ज्यादा मौका मिलना चाहिए क्योंकि विश्वविद्यालय के बुजुर्ग प्रोफेसर ना तो नई तकनीक से अवगत हैं और ना ही मीडिया में पिछले दशक में आए बदलाव से । ऐसे में पत्रकारिता के छात्रों को हम नैतिकता और मिशन की घुट्टी तो पिला देते हैं लेकिन व्यावहारिकता छूट जाती है । अनिल के राय अंकित युवा विभागाध्यक्ष हैं और उम्मीद करता हूं कि भविष्य में इस तरह के सेमिनार में युवाओं को भी बराबरी का मौका देंगे इससे एक तो छात्रों को नई तकनीक और माहौल में काम करने का तरीका और दबाव दोनों का पता चलेगा ।
अगले दिन टीवी पर केंद्रित सत्र था जिसकी अध्यक्षता कोलकाता विश्वविद्यालय की पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष ताप्ती बसु थी और वक्ता थे वरिष्ठ पत्रकार और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एन के सिंह, जी न्यूज के एंकर और राजनीतिक संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, आगरा विश्वविद्यालय पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष गिरिजा शंकर शर्मा और मैं । एन के सिंह ने बीज वक्तव्य में जोर देकर इस बात को कहा कि आज समाज के हर क्षेत्र में मूल्यों में गिरावट देखी जा सकती है चाहे वो राजनीति हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका । एन के ने तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात रखते हुए कहा कि मूल्यों के क्षरण की समस्या हमारे लोकतांत्रिक वयवस्था में खामी की वजह से है । मैंने पूर्ववर्ती वक्ताओं द्वारा पूरी मीडिया को भ्रष्ट और संपादकों को बिचौलिया रहे जाने पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि विभूति नारायण राय और गंगा प्रसाद विमल की समाज में एक अहमियत हैं और जब वो बोलते हैं तो समाज पर असर डालते हैं । इस वजह से उन्हें इस तरह के स्वीपिंग रिमार्क से बचना चाहिए । प्रसून ने अपने अंदाज में बोलते हुए गूगल को पत्रकारिता का पर्याय ना मानने की सलाह दी । इसके बाद भी एक सत्र हुआ जिसमें प्रकाश दूबे, विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति अरविंदाक्षन ने अपनी बात रखी । कुल मिलाकर दो दिनों तक चला यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा । लेकिन जैसा कि मैं उपर भी कह चुका हूं कि ऐसे कार्यक्रमों में युवा पत्रकारों की भागीदारी इस विमर्श को एक अलग स्तर पर लेकर जाएगी । क्योंकि विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की जो राय पुरानी पड़ चुकी है और वो अपनी विद्वता के बोझ तले इतने दब चुके होते हैं कि उन्हें जो कुछ नया हो रहा है उसको जानने की रुचि ही नहीं रहती है । दो दिनों तक वर्धा में रहने के दौरान मैं गांधी आश्रम भी गया, गांधी के कमरे हर चीज को देखा-छुआ । अपने स्तंभ में आश्रम के अपने अनुभवों को भी लिखूंगा ।

हंसराज के फैसले का निहितार्थ

कांग्रेस के पूर्व नेता और देश के कानून मंत्री रहे हंसराज भारद्वाज एक बार फिर से विवादों में हैं । कर्नाटक के रा्ज्यपाल के तौर पर उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री वाई एस येदुरप्पा के खिलाफ केस चलाने की इजाजत देकर राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है । एक जमाने में देश में विकास और गुड गवर्नेंस की मिसाल देनेवाला यह राज्य आज अपने संवैधानिक प्रमुख और सरकार के मुखिया के बीच के विवादों की मिसाल कायम कर रहा है । राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जारी इस तनातनी में राज्य का प्रशासन और विकास दोनों ठप हो गए हैं । कार्यपालिका के मुखिया के खिलाफ केस चलाने की इजाजत देने के बाद एक बार फिर से राज्यपाल की भूमिका पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सवाल इस इजाजत का नहीं है, बड़ा मुद्दा तो वो है जो सतह पर दिखाई नहीं देता । जिस तरह से आनन फानन में कुछ लोगों ने राज्यपाल से मुख्यमंत्री येदुरप्पा के खिलाफ केस चलाने की इजाजत मांगी और हंसराज भारद्वाज ने त्वरित गति से कार्रवाई करते हुए उसकी इजाजत दे दी । उससे राज्यपाल की नीयत और उनकी मंशा दोनों पर सवाल खड़ा होते हैं । संविधान के मुताबिक राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करना होता है लेकिन इस तरह के मामलों में राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह ठुकराकर स्वतंत्र रूप से फैसला लेने का अधिकार प्राप्त है । दो हजार चार में सुप्रीम कोर्ट की एक पांच सदस्यीय खंडपीठ में ऐतिहासिक फैसले में यह कहा था कि भ्रष्टाचार के मामलों में मंत्रिमंडल की सिफारिश को नामंजूर करते हुए राज्यपाल मंत्रियों के गैर कानूनी कामों और भ्रष्ट आचरण के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे सकते हैं । मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री के खिलाफ केस चलाने या आरोपी बनाने की इजाजत देने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि यह निर्णय लेते वक्त राज्यपाल को पूरी स्वतंत्रता है और वह मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है । जाहिर सी बात है पूर्व कानून मंत्री रहे भारद्वाज को अपने इस अधिकार का बखूबी पता था और उन्होंने इसका इस्तेमाल करते हुए येदुरप्पा के खिलाफ केस चलाने की इजाजत दे दी । उस इजाजत के पहले और बाद के गवर्नर के बयानों पर गौर करें तो उनकी राजनीतिक मंशा साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है । इस देश के संविधान में राज्यपाल से ये अपेक्षा की गई है कि वो दलगत राजनीति से उपर उठकर काम करें लेकिन कर्नाटक के राज्यपाल उससे उपर उठ नहीं सके । भारद्वाज के इस फैसले से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक गलत परंपरा को मजबूती मिलती है । उसके बाद जिस तरह से देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भारद्वाज का बचाव किया उससे भी यह शक गहरा होता है कि केंद्र के इशारे पर हंसराज भारद्वाज ने येदुरप्पा के खिलाफ मुकदमे को हरी झंडी दिखाई । चंद मामूली आरोपों के आधार पर अगर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ मुकदमा चलाने को मंजूरी दी जाने लगे तो इससे देश के शासन तंत्र में बड़ा बखेड़ा खड़ा हो सकता है ।
अब अगर कल को कोई एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपए के टेलीकॉम घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ मुकदमा चलाने की कार्रवाई की इजाजत के लिए कुछ लोग राष्ट्रपति के पास पहुंच जाते हैं और इसकी इजाजत मांगते हैं तो क्या राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रोसिक्यूशन को स्वीकृति देंगी । येदुरप्पा के खिलाफ अपने रिश्तेदारों को गैरकानूनी तरीके से जमीन आवंटन के आरोप लगे हैं । उसी तरह प्रधानमंत्री के दामन पर भी टेलीकॉम घोटाले के छींटे तो पड़ ही रहे हैं । कॉमनवेल्थ घोटाले में उस वक्त के केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री तक पर घोटाले के परोक्ष आरोप लगे । अगर कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के तरीके से लोकतंत्र चले तो राष्ट्रपति को किसी भी अदने से वयक्ति की शिकायत पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ केस चलाने की अनुमति दे देनी चाहिए । हंसराज भारद्वाज के इस कदम को सही ठहरानेवाले कांग्रेस के नेता छोटे लाभ के लिए बड़े मूल्यों और मानदंडों को भुलाने में लगे हैं ।
दरअसल भारद्वाज कांग्रेस की पुरानी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं । राज्यपाल के पद का दुरुपयोग 1967 से देश में शुरू हुआ । यह वो दौर था जब देश में एक पार्टी का शासन चल रहा था और विपक्ष बेहद कमजोर था । जब 1967 में गैरकांग्रेसवाद की लहर चली और कई सूबों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी तो केंद्र की कांग्रेसी सरकार ने राज्यपाल का इस्तेमाल चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने के लिए शुरू कर दिया । इमरजेंसी के बाद जब इंदिरा गांधी दुबारा चुन कर आई तो उन्होंने राजनीतिक तौर पर बदला चुकाने के लिए जनता पार्टी के शासन वाले नौ राज्यों की सरकारों को भंग कर दिया और वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था । आजाद भारत के इतिहासक में इंदिरा गांधी ने राज्यपाल नाम की संस्था का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया और चुनी हुई सरकारों को भंग कर दिया । 1984 में आंध्र प्रदेश में जब एन टी रामाराव ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी उस वक्त ठाकुर रामलाल ने इंदिरा गांधी के हुक्म पर बहुमत होने के बावजूद रामाराव को सरकार नहीं बनाने दिया और उनकी बजाए कांग्रेस के भास्कर राव को सरकार बनाने का न्यौता दे दिया था । जबकि एन टी रामाराव 48 घंटे के भीतर सदन में बहुमत साबित करने को तैयार थे । बाद में चौतरफ दबाव में रामाराव को सरकार बनाने दिया गया था । उसी तरह से जम्मू और कश्मीर की चुनी हुई सरकार के मुखिया फारुख अबदुल्ला को जगमोहन ने बर्खास्त कर दिया । जब राज्यपाल की भूमिका को लेकर देशव्यापी बहस शुरू हुई और सरकार की जमकर आलोचना होने लगी तो राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर सरकारिया कमीशन का गठन हुआ । 27 अक्तूबर 1987 को सरकारिया आयोग ने राज्यपाल की नियुक्तियों को लेकर कुछ सुझाव दिए थे जिसपर ज्यादा अमल हो ना सका । सरकारिया आयोग दो एक अहम सुझाव दिये थे – पहला कि घोर राजनीतिक वयक्ति को जो हाल तक सक्रिय राजनीति में रहा हो उसको राज्यपाल नहीं बनाया जाना चाहिए । दूसरा कि केंद्र में जिस पार्टी की सरकार हो उसके सदस्य को विपक्षी पार्टी के शासन वाले राज्य में राज्यपाल नियुक्त ना किया जाए । कर्नाटक के मामले में कांग्रेस ने दोनों सुझावों की अनदेखी की । केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं पानेवाले कानून मंत्री को खुश करने के लिए कर्नाटक जैसे अहम राज्य का राज्यपाल मनोनीत कर दिया जहां कि भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में सरकार काम कर रही थी । गौरतलब हैं कि ये वही हंसराज भारद्वाज जिनपर कानून मंत्री रहते बोफोर्स तौप सौदे के दलाल क्वात्रोकी के खिलाफ कार्रवाई में ढिलाई बरतने का संगीन इल्जाम लगा था । भारद्वाज अपने इन कार्यकलापों से भारतीय जनता पार्टी की चुनी हुई सरकार को मुश्किल में डालकर कांग्रेस पार्टी और आलाकमान की नजर में अपना नंबर बढा़ना चाहते हैं । हाल तक सक्रिय राजनीति करनेवाले हंसराज भारद्वाज राजभवन के रास्ते एक बार फिर से राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं, इसलिए येदुरप्पा सरकार की राह में रोड़े अटकाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं । लेकिन कानून और संविधान के जानकार हंसराज भारद्वाज यह भूल जा रहे हैं कि इससे कई गलत परपंराओं की नींव डल रही है जो अगर नजीर बन गई तो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा ।

Monday, January 10, 2011

संस्थागत साहूकारों पर लगे लगाम

देश में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों की शुरुआत गरीबों की भलाई और उसको रोजगार शुरू करने के लिए सहायता देने के घोषित उद्देश्य से की गई थी । पिछले दशक में भारत में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के विकास पर नजर डालें तो पाते हैं कि पहला और शुरुआती दौर तो वह था जिसमें गरीबों को उनके छोटे-मोटे काम के लिए कर्ज मुहैया कराने की कवायद शुरू की गई । इस वक्त तक गरीबों की मदद करना और समाज के सबसे निचले पायदान के लोगों के जीवन स्तर को सुधारना मकसद था । लेकिन ज्यों-ज्यों उसका दायरा बढ़ा तो बाजार और कंपनियां इसमें फायदेमंद कारोबार की संभावनाएं तलाशने लगी । नतीजा यह हुआ कि दशक के अंत तक आते आते कई नामचीन और बड़ी कंपनियां इस कारोबार में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कूद पड़ी । इस कारोबार में उनको कम लागत पर ज्यादा मुनाफे की संभावना नजर आने लगी थी । इन कंपनियों ने इस तरह का मॉडल अपनाया जिसमें वो पहले गरीबों को चिन्हित करते,फिर उनको समूहों में इकट्ठा करते ताकि वसूली की एक सामाजिक गारंटी हो,उसके बाद गरीबों को डराकर कर अपने प्रभाव में लेकर ऋण वापसी या ब्याज वसूली की जा सके ।
गरीबी उन्मूलन या फिर गरीबों या किसानों की मदद की आड़ में ये कंपनियां अपने कामकाज को बेहद शातिराना अंदाज में अंजाम देती हैं । समय के साथ उन कंपनियों का अघोषित उद्देश्य सामने आ गया और गरीबों की भलाई की आड़ में खेला जानेवाला खेल खुल गया । आंध्र प्रदेश में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के वसूली एजेंटों की ज्यादतियों से तंग आकर कई किसानों की खुदकुशी ने देशभर का ध्यान इन कंपनियों के क्रियाकलापों की ओर खींचा । पड़ताल में पता चला कि छोटे ऋण की आड़ में निवेश कर कंपनियां बड़ा लाभ कमा रही हैं । इन कंपनियों का तर्क है कि वो गरीबों को बगैर किसी गारंटी या गारंटीदाता के ऋण उपलब्ध करवाते हैं लिहाजा पैसा डूबने का खतरा बहुत ज्यादा रहता है । इस तर्क को ढाल बनाकर वो ब्याज की दरें उंची रखते हैं । आमतौर पर ये कंपनियां पांच प्रतिशत की दर पर अपना कारोबार करती हैं जो सालाना तकरीबन साठ प्रतिशत के करीब बैठता है । चूंकि ये कंपनिया ब्याज की दरें साप्ताहिक वसूलती हैं इस वजह से गरीबों को बेहिसाब ब्याज दर का एहसास नहीं हो पाता है । इन कंपनियों के कामकाज में कोई पारदर्शिता भी नहीं होती और ये जिन तबकों के बीच काम करती हैं उनको बाजार का यह व्यभिचार समझ में भी नहीं आता । ये कंपनियां व्यक्तिगत ऋण के बजाए तीन चार लोगों के छोटे समूह को कर्ज देती है। अगर समूह का कोई वयक्ति ब्याज चुकाने में नाकाम रहता है तो पूरे समूह पर जुर्माना लगाया जाता है । जुर्माने की यही राशि कंपनियों के मुनाफे को बढ़ा देती हैं ।
दरअसल ये माइक्रो फाइनेंस कंपनियां सूदखोर साहूकार की तरह काम करती है । फर्क सिर्फ इतना होता है कि सूदखोरी के धंधे को संस्थागत रूप दे दिया गया है और साहूकारों की जगह बड़ी कंपनियों ने ले लिया है । एक अनुमान के मुताबिक देशभर में सात करोड़ लोगों ने इन कंपनियों से कर्ज लिया हुआ है । अगर माइक्रो फाइनेंस इंफॉर्मेशन एक्सचेंज के दो हजार नौ के आंकड़ों पर नजर डालें तो हमारे देश में इस वक्त एक सौ उनचास माइक्रो क्रेडिट कंपनियां काम कर रही हैं । इन कंपनियां का सालाना कारोबार बीस हजार सात सौ करोड़ रुपये का है । गणित लगाने पर प्रति वयक्ति कर्ज की औसत रकम साढे छह हजार रुपये बैठती है ।
आंध्र प्रदेश में किसानों की खुदकुशी के बाद यह सवाल भी उठा कि ये कंपनियां अधिकतम कितना ब्याज वसूल सकती हैं । माइक्रो फाइनेंस के अंतराष्ट्रीय विशेषज्ञ और अंतराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी माइक्रोरेट के संस्थापक डी वी स्टॉफनबर्ग का मानना है कि – ‘ब्याज की दरों को तय करते वक्त स्थानीय परिस्थितियों और लागत पूंजी के खतरे को ध्यान में रखना जरूरी होता है लेकिन बाजार के मौजूदा दर से बीस या तीस फीसदी अधिक ब्याज दर रखना और उसे वसूलना नाजायज है । लेकिन हमारे यहां ये बेलगाम कंपनियां साठ से सत्तर फीसदी तक ब्याज वसूलती हैं । गरीबों के बीच काम करनेवाली इन कंपनियां से यह अपेक्षा की जाती है कि वो धन जुटाने के लिए बाजार से पैसा नहीं उठाएंगी । लेकिन कुछ महीनों पहले हैदराबाद की एक माइक्रो फाइनेंस कंपनी ने आईपीओ के जरिए बाजार से धन जुटाया । इससे एक बात तो साबित हो गई कि बड़ी कंपनियां इस सेक्टर में मुनाफा की ना केवल गुंजाइश देख रही हैं बल्कि निवेशकों को इसका भरोसा भी दे रही हैं ।
अब सवाल यह उठता है कि क्या ये कंपनियां गरीबों की सहायता कर रही हैं या उनका खून चूस कर अपना खजाना भर रही हैं। विभिन्न अध्ययनों के नतीजों से यह पता चलता है कि गरीबों के बेहतरी के नाम पर चलनेवाली ये कंपनियां धन कमाने का आसान जरिया बन चुकी है। आम आदमी की बात करनेवाली सरकार के सामने ये कंपनियां एक बड़ी चुनौती की तरह हैं । वक्त आ गया है कि सरकार इन संस्थागत साहूकारों को काबू में करने के लिए सख्त कानून बनाए नहीं तो खुदकुशी करनेवाले किसानों-गरीबों की संख्या बढ़ती जाएगी और ये इन बेलगाम कंपनियों का खजाना बढ़ता रहेगा ।

Saturday, January 1, 2011

उदय प्रकाश नहीं थे पहली पसंद

इस वर्ष के साहित्य अकादमी पुरस्कारों का एलान हो गया है । हिंदी के लिए
इस बार का अकादमी पुरस्कार यशस्वी कथाकार और कवि उदय प्रकाश को उनके
उपन्यास मोहनदास(वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया गया । उदय प्रकाश
साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व करते हैं बल्कि उन्हें तो अरुण कमल,
राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति के पहले ही यह सम्मान मिल जाना चाहिए था ।
जब मैंने पुरस्कार के एलान होने के दो दिन पहले अपने ब्लाग पर इस बारे
में लिखा तो जूरी के सदस्य मुझसे खफा हो गए । मैंने अपने ब्लाग- हाहाकार-
पर पुरस्कार के चयन के लिए हुई बैठक में जो बातें हुई, जो सौदेबाजी हुई
उसपर लिखा था। पहले मैंने तय किया था कि इस विषय पर अब और नहीं लिखूंगा
लेकिन जब मुझे परोक्ष रूप से धमकी मिली तो मैंने तय किया कि और बारीकी से
सौदेबाजी को उजागर करूंगा । जो कि ना केवल अकादमी के हित में होगा बल्कि
हिंदी का भी भला होगा । इस बार के पुरस्कार के चयन के लिए जो आधार सूची
बनी थी उसमें रामदरश मिश्र, विष्णु नागर, नासिरा शर्मा, नीरजा माधव, शंभु
बादल, मन्नू भंडारी और बलदेव वंशी के नाम थे । हिंदी के संयोजक विश्वनाथ
तिवारी की इच्छा और घेरेबंदी रामदरश मिश्र को अकादमी पुरस्कार दिलवाने की
थी । इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडे
और चित्रा मुद्गल का नाम जूरी के सदस्य के रूप में प्रस्तावित किया और
अध्यक्ष से स्वीकृति दिलवाई । लेकिन पता नहीं तिवारी जी की रणनीति क्यों
फेल हो गई- जब पुरस्कार तय करने के लिए जूरी के सदस्य बैठे तो रामदरश
मिश्र के नाम पर चर्चा तक नहीं हुई । बैठक शुरू होने पर अशोक वाजपेयी ने
सबसे पहले रमेशचंद्र शाह का नाम प्रस्तावित किया । लेकिन उसपर मैनेजर
पांडे और चित्रा मुदगल दोनों ने आपत्ति की । कुछ देर तक बहस चलती रही जब
अशोक वाजपेयी को लगा कि रमेशचंद्र शाह के नाम पर सहमति नहीं बनेगी तो
उन्होंने नया दांव चला और उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित कर दिया । जाहिर
सी बात है कि मैनेजर पांडे को फिर आपत्ति होनी थी क्योंकि वो उदय प्रकाश
की कहानी पीली छतरी वाली लड़की को भुला नहीं पाए थे । उन्होंने उदय के
नाम का पुरजोर तरीके से विरोध किया । पांडे जी के मुखर विरोध को देखते
हुए उनसे उनकी राय पूछी गई । मैनेजर पांडे ने मैत्रेयी पुष्पा का नाम
लिया और उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की वकालत करने लगे । मैनेजर
पांडे के इस प्रस्ताव पर अशोक वाजपेयी खामोश रहे और उन्होंने चित्रा
मुदगल से उनकी राय पूछी । बजाए किसी लेखक पर अपनी राय देने के चित्रा जी
ने फटाक से अशोक वाजपेयी की हां में हां मिलाते हुए उदय प्रकाश के नाम पर
अपनी सहमति दे दी । इस तरह से अशोक वाजपेयी की पहली पसंद ना होने के
बावजूद उदय प्रकाश को एक के मुकाबले दो मतों से साहित्य अकादमी पुरस्कार
देना तय किया गया ।
उधर हिंदी भाषा के संयोजक विश्वनाथ तिवारी का सारा खेल खराब हो गया और
रामदरश मिश्र का नाम आधार सूची में सबसे उपर होने के बावजूद उनको
पुरस्कार नहीं मिल पाया । यहां यह भी बताते चलें कि उदय प्रकाश और
रमेशचंद्र शाह दोनों के ही नाम हिंदी की आधार सूची में नहीं थे । लेकिन
यहां कुछ गलत नहीं हुआ क्योंकि जूरी के सदस्यों को यह विशेषाधिकार
प्राप्त है कि वो जिस वर्ष पुरस्कार दिए जा रहे हों उसके पहले के एक वर्ष
को छोड़कर पिछले तीन वर्षों में प्रकाशित कृति प्रस्तावित कर सकते हैं ।
इस वर्ष दो हजार छह, सात और आठ में प्रकाशित कृति में से चुनाव होना था ।
मैं पिछले कई वर्षों से साहित्य अकादमी के पुरस्कारों में होनेवाले
गड़बडियों और घेरबंदी पर लिखता रहा हूं । वहां कई ऐसे उदाहरण हैं जहां
घेरबंदी कर पुरस्कार दिलवाए गए । जब हिंदी के कवि वीरेन डंगवाल को
उनके कविता संग्रह-दुश्चक्र में स्रष्टा-पर पुरस्कार दिया गया तो उस वक्त
के हिंदी के संयोजक गिरिराज किशोर पर सारे नियम कानून ताक पर रखकर डंगवाल
को पुरस्कृत करने के आरोप लगे थे । गिरिराज किशोर ने वीरेन डंगवाल को
पुरस्कार दिलावने के लिए श्रीलाल शुक्ल, कमलेश्वर और से रा यात्री की
जूरी बनाई । जब नियत समय पर जूरी की बैठक होनी थी उस वक्त कमलेश्वर बीमार
हो गए और श्रीलाल शुक्ल जी को बनारस ( अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही
है तो ) से दिल्ली आना था और किन्हीं वजहों से उनका जहाज छूट गया और वो
नहीं आ पाए । पुरस्कार का एलान करवाने की इतनी जल्दी थी कि से रा यात्री
को कमलेश्वर के पास भेजकर अस्पताल से उनकी राय मंगवाई गई । श्रीलाल
जी से फैक्स पर उनकी राय मंगवाई गई और फिर से रा यात्री और गिरिराज किशोर
ने दोनों की सहमति के आधार पर वीरेन डंगवाल का नाम तय कर दिया
यह उठा कि गिरिराज जी की क्या बाध्यता थी कि वो पुरस्कार की इतनी जल्दी घोषणा कर दें
। अगर आप अकादमी के स्वर्ण जयंती के मौके पर प्रकाशित डी एस राव की
किताब- साहित्य अकादमी का इतिहास देखें तो उसमें कई ऐसे प्रसंग हैं जहां
कि पुरस्कार का एलान रोका गया और बाद में उसको घोषित किया गया ।
वीरेन डंगवाल की प्रतिभा पर किसी को शक नहीं था और ना ही है, वो
हिंदी के एक महत्वपूर्ण कवि हैं, लेकिन जिस तरह से जल्दबाजी में जूरी के
दो सदस्यों की अनुपस्थिति में उनका नाम तय किया गया उस वजह से पुरस्कार
संदेहास्पद हो गया । हलांकि उस वक्त विष्णु खरे, भगवत रावत, विजेन्द्र और
ऋतुराज भी दावेदार थे जो किसी भी तरह से वीरेन डंगवाल से कमजोर कवि
नहीं हैं ।
साहित्य अकादमी में सौदेबाजी का एक भरा पूरा इतिहास रहा है । जब गोपीचंद
नारंग का अकादमी के अध्य़क्ष के रूप में कार्यकाल खत्म हुआ तो उनपर दवाब
बना कि वो दूसरी बार चुनाव नहीं लड़ें । चौतरफा दवाब में उन्होंने चुनाव
तो नहीं लड़ा पर अपने कैंडिडेट को अध्यक्ष बनवाने में कामयाब रहे । जब
हिंदी भाषा के संयोजक के चुनाव का वक्त आया तो गोपीचंद नारंग की पसंद विश्वनाथ
तिवारी थे । लेकिन कैलाश वाजपेयी ने उसमें फच्चर फंसा दिया और वो भी
चुनाव लडने को तैयार हो गए । उस वक्त आपसी समझदारी में यह तय हुआ कि
कैलाश वाजपेयी चुनाव नहीं लड़ेंगे बदले में उनको अकादमी का पुरस्कार दिया
जाएगा । उन्हें यह भी समझा दिया गया कि अगर वो भाषा के संयोजक हो जाएंगे
तो उनको पुरस्कार नहीं मिल पाएगा । पुरस्कार मिलने के आश्वासन के बाद
कैलाश वाजपेयी ने चुनाव नहीं लड़ा और विश्वनाथ तिवारी हिंदी भाषा के संयोजक
बन गए । उन्होंने अपने संयोजकत्व में पहला पुरस्कार गोविन्द मिश्र को
दिया और अगले वर्ष कैलाश वाजपेयी को उनकी कृति हवा में हस्ताक्षर के लिए
पुरस्कार मिला ।
अब वक्त आ गया है कि अकादमी के पुरस्कारों में पूरी
पारदर्शिता बरती जाए और जूरी के सदस्यों के नाम के साथ-साथ उनकी राय को
भी सार्वजनिक किया जाए । पहले तो जूरी के सदस्यों का नाम भी गोपनीय रखा
जाता था लेकिन बाद में उसे सार्वजनिक किया जाने लगा । अब तो अकादमी को
जूरी की बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग भी करवानी चाहिए ताकि पारदर्शिता के
उच्च मानदंडों को स्थापित किया जा सके । मुझे याद है कि जब साहित्य
अकादमी का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया जा रहा था तो विज्ञान भवन में
प्रधानमंत्री की मौजूदगी में अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष गोपीचंद नारंग
ने अपने भाषण में नेहरू जी को उद्धृत करते हुए कहा था कि - मुझे विश्वास है
कि प्रधानमंत्री अकादमी के कामकाज में दखल नहीं देंगे । नारंग के इस मत
पर प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने सहमति जताई थी । उस वजह से ही
अकादमी में तमाम गडबड़ियों के आरोप से घिरे गोपीचंद नारंग अपने कार्यकाल
के आखिर तक ड़टे रहे थे । लेकिन जहां स्वायत्ता आती है वहां जिम्मेदारी
भी साथ साथ आती है । यह अकादमी के कर्ता-धर्ताओं का दायित्व है कि जहां
भी संदेह के बादल छाने लगे उसे तथ्यों को सामने रखककर साफ करें ।
पुरस्कारों के मामले में तो यह तभी हो सकता है जब कि चयन से लेकर जूरी की
मीटिंग और उसकी कार्यवाही पूरी तरह से पारदर्शी हो और जो चाहे वो इस बाबत
अकादमी से सूचना प्राप्त कर सके । तभी देश के इस सबसे बड़े साहित्यिक
संस्था की साख बची रह सकेगी ।

Wednesday, December 29, 2010

बिनायक पर बवाल क्यों ?

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के उपाध्यक्ष बिनायक सेन को राजद्रोह के मामले में उम्र कैद की सजा सुनाई है । बिनायक सेन को यह सजा कट्टर नक्सलियों के साथ संबंध रखने और उनको सहयोग देने के आरोप साबित होने के बाद सुनाई गई है । अदालत द्वारा बिनायक सेन को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद देशभर के मुट्ठी भर चुनिंदा वामपंथी लेखक बुद्धिजीवी आंदोलित हो उठे हैं । उन्हें लगता है कि न्यायपालिका ने बिनायक सेन को सजा सुनाकर बेहद गलत किया है और उसने राज्य की दमनकारी नीतियों का साथ दिया है । उन्हें यह भी लगता है कि यह विरोध की आवाज को कुचलने की एक साजिश है । बिनायक सेन को हुए सजा के खिलाफ वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े विद्यार्थी और नक्सलियों के हमदर्द दर्जनों बुद्विजीवी दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए और जमकर नारेबाजी की । बेहद उत्तेजक और घृणा से लबरेज भाषण दिए गए । जंतर मंतर पर जिस तरह के भाषण दिए जा रहे थे वो बेहद आपत्तिजनक थे, वहां बार-बार यह दुहाई दी जा रही थी कि राज्य सत्ता विरोध की आवाज को दबा देती है और अघोषित आपातकाल का दौर चल रहा है । वहां मौजूद एक वामपंथी विचारक ने शंकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या को सरकार-पूंजीपति गठजोड़ का नतीजा बताया । उनका तर्क था जब भी राज्य सत्ता के खिलाफ कोई आवाज अपना सिर उठाने लगती है तो सत्ता उसे खामोश करने का हर संभव प्रयास करता है । शंकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या तो इन वामंपंथी लेखकों-विचारकों को याद रहती है, उसके खिलाफ डंडा-झंडा लेकर साल दर साल धरना प्रदर्शन विचार गोष्ठियां भी आयोजित होती है । लेकिन उसी साहिबाबाद में नवंबर में पैंतालीस साल के युवा मैनेजर की मजदूरों द्वारा पीट-पीट कर हत्या किए जाने के खिलाफ इन वामपंथियों ने एक भी शब्द नहीं बोला । मजदूरों द्वारा मैनेजर की सरेआम पीट-पीटकर नृशंस तरीके से हत्या पर इनमें से किसी ने भी मुंह खोलना गंवारा नहीं समझा । कोई धरना प्रदर्शन या बयान तक जारी नहीं हुआ क्योंकि मैनेजर तो पूंजीपतियों का नुमाइंदा होता है लिहाजा उसकी हत्या को गलत करार नहीं दिया जा सकता है । लेकिन हमारे देश के वामपंथी यह भूल जाते हैं कि गांधी के इस देश में हत्या और हिंसा को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता है । शंकर गुहा नियोगी या सफदर की हत्या जिसकी पुरजोर निंदा की जानी चाहिए और दोषियों को किसी भी तीमत पर नहीं बख्शा जाना चाहिए लेकिन उतने ही पुरजोर तरीके से फैक्ट्री के मैनेजर की हत्या का भी विरोध होना चाहिए और उसके मुजरिमों को भी उतनी ही सजा मिलनी चाहिए जितनी नियोगी और सफदर के हत्यारे को । दो अलग-अलग हत्या के लिए दो अलग अलग मापदंड नहीं हो सकते ।
ठीक उसी तरह से अगर बिनायक सेन के कृत्य राजद्रोह की श्रेणी में आते हैं तो उन्हें इसकी सजा मिलनी ही चाहिए और अगर निचली अदालत से कुछ गलत हुआ है तो वो हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट से निरस्त हो जाएगा। अदालतें सबूत और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं । आप अदालतों के फैसले की आलोचना तो कर सकते हैं लेकिन उन फैसलों को वापस लेने के लिए धरना प्रदर्शन करना घोर निंदनीय है । भारत के संविधान में न्याय की एक प्रक्रिया है – अगर निचली अदालत से किसी को सजा मिलती है तो उसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का विकल्प खुला है । अगर निचली अदालत में कुछ गलत हुआ है तो उपर की अदालत उसको हमेशा से सुधारती रही हैं । ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहां निचली अदालत से मुजरिम बरी करार दिए गए हैं लेकिन उपरी अदालत उनको कसूरवार ठहराते हुए सजा मुकर्रर करती रही है । दिल्ली के चर्चित मट्टू हत्याकांड में आरोपा संतोष सिंह को निचली अदालत ने बरी कर दिया लेकिन उसे उपर की अदालत से जमा मिली । ठीक उसी तरह से निचली अदालत से दोषी करार दिए जाने के बाद भी कई मामलों में उपर की अदालत ने मुजरिमों को बरी किया हुआ है । लोकतंत्र में संविधान के मुताबिक एक तय प्रक्रिया है और संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखनेवाले सभी जिम्मेदार नागरिक से उस तय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने की अपेक्षा की जाती है ।
बिनायक सेन के केस में भी उनके परिवारवालों ने हाईकोर्ट जाने का एलान कर दिया है लेकिन बावजूद इसके ये वामपंथी नेता और बुद्धिजीवी अदालत पर दवाब बनाने के मकसद से धरना प्रदर्शन और बयानबाजी कर रहे हैं । दरअसल इन वामपंथियों के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि अगर कोई भी संस्था उनके मन मुताबिक चले तो वह संस्था आदर्श है लेकिन अगर उनके सिद्धांतों और चाहत के खिलाफ कुछ काम हो गया तो वह संस्था सीधे-सीधे सवालों के घेरे में आ जाती है । अदालतों के मामले में भी ऐसा ही हुआ है, जो फैसले इनके मन मुताबिक होते हैं उसमें न्याय प्रणाली में इनका विश्वास गहरा जाता है लेकिन जहां भी उनके अनुरूप फैसले नहीं होते हैं वहीं न्याय प्रणाली संदिग्ध हो जाती है । रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के पहले यही वामपंथी नेता कहा करते थे कि कोर्ट को फैसला करने दीजिए वहां से जो तय हो जाए वो सबको मान्य होना चाहिए । लेकिन जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला उनके मनमुताबिक नहीं आया तो अदालत की मंशा संदिग्ध हो गई । इस तरह के दोहरे मानदंड नहीं चल सकते । अगर हम वामपंथ के इतिहास को देखें तो उनकी भारतीय गणतंत्र और संविधान में आस्था हमेशा से शक के दायरे में रही है । जब भारत को आजादी मिली तो उसे शर्म करार देते हुए उसे महज गोरे बुर्जुआ के हाथों से काले बुर्जुआ के बीच शक्ति हस्तांतरण बताया था । यह भी ऐतिहासितक तथ्य़ है कि सीपीआई ने फरवरी उन्नीस सौ अडतालीस में नवजात राष्ट्र भारत के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह शुरू किया था और उसपर काबू पाने में तकरीबन तीन साल लगे थे और वो भी रूस के शासक स्टालिन के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो पाया था । उन्नीस सौ पचास में सीपीआई ने संसदीय वयवस्था में आस्था जताते हुए आम चुनाव में हिस्सा लिया लेकिन साठ के दशक के शुरुआत में पार्टी दो फाड़ हो गई और सीपीएम का गठन हुआ । सीपीएम हमेशा से रूस के साथ-साथ चीन को भी अपना रहनुमा मानता था । तकरीबन एक दशक बाद सीपीएम भी टूटा और माओवादी के नाम से एक नया धड़ा सामने आया । सीपीएम तो सिस्टम में बना रहा लेकिन माओवादियों ने सशस्त्र क्रांति के जरिए भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने का एलान कर दिया था । विचारधारा के अलावा भी वो वो हर चीज के लिए चीन का मुंह देखते थे । माओवादी में यकीन रखनेवालों का एक नारा उस वक्त काफी मशहूर हुआ था – चीन के चेयरमैन हमारे चेयरमैन । माओवादी नक्सली अब भी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने की मंशा पाले बैठे हैं । क्या उस विचारधारा को समर्थन देना राजद्रोह नहीं है । नक्सलियों के हमदर्द हमेशा से यह तर्क देते हैं कि वो हिंसा का विरोध करते हैं लेकिन साथ ही वो यह जोड़ना नहीं भूलते कि हिंसा के पीछे राज्य की वो दमनकारी नीतियां हैं । देश में हो रही हिंसा का खुलकर विरोध करने के बजाए नक्सलियों को हर तरह से समर्थन देना कितना जायज है इसपर राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए । एंटोनी पैरेल ने ठीक कहा है कि – भारत के मार्क्सवादी पहले भी और अब भी भारत को मार्क्सवाद के तर्ज पर बदलना चाहते हैं लेकिन वो मार्क्सवाद में भारतीयता के हिसाब से बदलाव नहीं चाहते हैं । एंटोनी के इस कथन से यह साफ हो जाता है कि यही भारत में मार्क्स के चेलों की सबसे बड़ी कमजोरी है ।
बिनायक सेन अगर बकसूर हैं तो अदालत सो वो बरी हो जाएंगे लेकिन अगर कसूरवार हैं तो उन्हें सजा अवश्य मिलेगी । देश के तमाम बुद्दजीवियों को अगर देश के संविधान और कानून में आस्था है तो उनको धैर्य रखना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया पर दवाब बनाने के लिए किए जा रहे धरने प्रदर्शन को तत्काल रोका जाना चाहिए ।

Saturday, December 25, 2010

सदियों का सफरनामा

तकरीबन चार साल पहले की बात है एक किताब आई थी - भारतीय डाक सदियों का सफरनामा लेखक थे अरविंद कुमार सिंह । डाक भवन दिल्ली के सभागार में किताब के विमोचन समारोह में भी शामिल हुआ था । यह किताब नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थी और उस वक्त ट्रस्ट की कर्ताधर्ता पुलिस अधिकारी नुजहत हसन थी । बात आई गई हो गई । मैनें किताब को बगैर देखे सुने रख दिया था । कई बार इस किताब की चर्चा सुनी-पढ़ी । लेकिन अभी दो मजेदार वाकया हुआ जिसके बाद डाकिया,उसके मनोविज्ञान और डाक विभाग को जानने की इच्छा हुई । हुआ यह कि मैं पिछले दिनों अपनी सोसाइटी में खुले डाकघर में गया और वहां काउंटर पर बैठे सज्जन से कहा कि मुझे पचास पोस्टकार्ड दे दाजिए तो पहले तो उसने हैरत से मेरी ओर देखा और फिर दोहराया कि कितने पोस्टकार्ड चाहिए । मैंने फिर से उसे कहा कि पचास दे दीजिए । इसके बाद उन्होंने अपनी दराज खोलकर कार्ड गिनने शुरू कर दिए, लेकिन बीच बीच में वो मेरी ओर देख रहे थे । पोस्टकार्ड मुझे सौंपने और पैसे लेने के बीच में उस सज्जन की आंखों में कुछ प्रश्न तैर रहे थे जो पैसे वापस करते समय उन्होंने मुझसे पूछ ही लिए । उन्होंने कहा कि आप इतने पोस्टकार्ड का क्या करेंगे - जबतक मैं कुछ बोलता तबतक उन्होंने खुद ही जबाव दे दिया कि शायद आप कोई मार्केटिंग कंपनी चलाते हैं और अपने ग्राहकों को किसी उत्पाद के बारे में जानकारी देना चाहते हैं और पोस्टकार्ड से सस्ता और सुरक्षित माध्यम कुछ और हो नहीं सकता । मैं उनके अनुमान को गलत साबित नहीं करना चाहता था इस वजह से मुस्कुराता हुआ डाकघर से निकल गया ।
दरअसल मैं पोस्टकार्ड का इस्तेमाल छोटे पत्र लिखने में करता हूं । संचार के इस आधुनिक दौर में मेरा अब भी मानना है कि पत्र का स्थान फोन, एसएमएस या फिर ईमेल भी नहीं ले सकते । पत्रों का अपना एक महत्व होता है जिसे पढ़ते वक्त आप पत्र लिखनेवाले की भावनाओं को महसूस कर सकते हैं । मुझे अब भी याद आता है कि जब मैं अपने गांव वलिपुर में रहा करता था तो हर दिन नियम से सुबह-सुबह डाकघर जाता था । तकरीबन बीस साल पहले की बात है उस वक्त लैंडलाइन फोन ने बस, मेरे घर में कदम ही रखा था लेकिन एसटीडी रेट इतने ज्यादा थे कि फोन पर बात नहीं हो सकती थी । हमारे घरों में फोन को लॉक करके रखा जाता था और रात ग्यारह बजने का इंतजार किया जाता था क्योंकि उस वक्त रात ग्यारह बजे के बाद एसटीडी की दरें काफी कम हो जाती थी । उस दौर में डाक लानेवाला डाकिया मेरे लिए पूरी दुनिया से जुड़ने और उसके जानने समझने का एकलौता माध्यम था । इस वजह से डाकिया हमारे समाज का हमारे इलाके का एक अहम वयक्ति होता था । मेरे साहित्यिक मित्र और प्रकाशक काफी पत्र-पत्रिकाएं भेजते थे इस वजह से हर रोज मेरे तीन चार पत्र होते ही थे । कभी कभार डाकिया इस बात से खफा भी होता था कि सिर्फ मेरे तीन पत्र की वजह से उसे तीन-चार किलोमीटर सायकल चलाना पड़ता है लेकिन बाद के दिनों में मैंने उससे दोस्ती कर ली थी । इसके दो फायदे हुए एक तो मेरे पत्र सुरक्षित मिल जाते थे और दूसरे वो पुस्तकों के वीपीपी आदि भी घर तक ले आते थे ।
दूसरा वकया भी डाकिया से ही जुडा़ है । मैं जब भी कहीं लंबे समय के लिए बाहर जाता हूं तो यह वयवस्था करके जाता हूं कि मेरी डाक मेरे अस्थायी पते पर रिडायरेक्ट कर दी जाएं । इस बार यह हुआ कि मैं कीं बाहर गया था । जब लौटकर आया तो महीने भर से कोई डाक नहीं आने पर मेरा माथा ठनका । मैं अपने पास के डाकघर में पहुंचा और पोस्टमास्टर से शिकायत की तो उन्होंने मेरे इलाके के डाकिया को बुलाया और पूछताछ की तो डाकिया ने बेहद मासूमियत से जबाव दिया कि इनकी डाक तो रिडायरेक्ट हो रही थी तो मैंने सोचा कि ये यहां से चले गए हैं सो अब मैं ही इनकी डाक को उसी पते पर रिडायरेक्ट कर देता हूं । डाकिया का यह जबाव इतना मासूमियत भरा और अपनापन लिए था कि मैं कुछ कह नहीं पाया और उन्हें वस्तुस्थिति बताकर डाकघर से बाहर निकल आया । आज के इस भागमभाग के दौर में कौन इतना ध्यान रखता है कि अमुक वयक्ति को इस पते पर डाक रिडायरेक्ट होना है । कूरियर के बढ़ते चलने वाले इस दौर में निजी कंपनियों से आप ये अपेक्षा कर हरी नहीं सकते । दोनों वाकयों से संबंधित अलग-अलग अध्याय इस किताब में हैं- भारतीय पोस्टकार्ड और सरकारी वर्दी में सबका चहेता ।
इन दोनों वाकयों के बाद मैंने अरविंद सिंह की किताब निकाली और उसको पढ़ना शुरू किया । सदियों के सफरनामा में डाक विभाग से जुड़ी हर छोटी बड़ी और रोचक जानकारियां मौजूद हैं । जैसै कि हम डाक बंगला का नाम हमेशा से सुनके रहे हैं , कई बार उन डाक बंगलों में रुकने और रहने का मौका भी मिला है लेकिन यह नहीं सोचा कि इसको जाक बंगला क्यों कहते हैं । अरविंद सिंह ने अपनी इस किताब में यह बताया है कि क्यों इन सरकारी गेस्ट हाउसों को डाक बंगला कहा जाता है- इसका उद्भव डाकविभाग के लिए हुआ था । सड़कों के किनारे उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दिनों तक होटल या सरया नाममात्र की थी । इसी नाते डाक बंगले और विश्राम गृह बनाए गए । ये सरकारी नियंत्रण में थे और वहां पर खिदमतगार चौकीदार और पोर्टर सेवा में उपलब्ध रहते थे.....लॉर्ड डलहौजी के जमाने में कई और डाक बंगले बने । डाक बंगले पुरानी डाक चौकियों के ही उन्नत रूप थे । सन 1863-64 तक डाकविभाग के हाथों में ही इन डाक बंगलों का प्रबंध रहा । इस वर्ष ही डाक विभाग ने डाक बंगलों से मुक्ति पा ली । अरविंद ने इस प्रणाली के बारे में प्रसिद्ध लेखक चेखव की चर्चित कहानी ट्रेवलिंग विथ मेल के जरिए रूस में इस तरह की वयवस्था का उदाहरण दिया है । इस तरह की कई रोचक जानकारियों के अलावा डाक विभाग और डाकिया के बारे में कई शोधपरक जानकारियां भी पेश की गई हैं । मसलन स्वतंत्रता संग्राम में डाक विभाग और डाकियों की भूमिका पर एरक पूरा अध्याय है । 1857 की क्रांति के वक्त उत्तर प्रदेश में आंदोलनकारियों के 8 हरकारों को गिरफ्तार कर फांसी पर चढ़ा दिया गया था । इस तरह की कई घटनाएं इस किताब में दर्ज हैं जो अबतक या तो अछूती रही हैं या फिर बेहतर तरीके से रेखांकित नहीं हो पाई । इस किताब में डाक विभाग के एक ऐसे महकमे का उल्लेख भी है जो हर साल तकरीबन ढाई करोड़ ऐसे पत्रों को गंतव्य तक पहुंचाता है जिनपर या तो पता लिखा ही नहीं होता है या फिर ऐसा पता लिखा होता है जिसे इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ डाकिया भी नहीं ढूंढ पाता है । इस विभाग रिटर्न लेटर ऑफिस कहा जाता है । इसके अलावा डाक विभाग की उन ऐतिहासिकत इमारतों के चित्र और रोचक विवरण भी इस किताब में है जिन्हें हम देखते तो हैं पर इस बात का एहसास तक नहीं होता है कि वो कितनी अहम इमारतें हैं ।
अरविंद सिंह ने बेहद श्रमपूर्वक शोध के बाद यह पुस्तक लिखी है । इसके पहले डाक विभाग पर कुछ छिटपुट किताबें आई हैं । मुल्कराज आनंद ने अंग्रेजी में एक किताब लिखी थी- स्टोरी ऑफ द इंडियन पोस्ट ऑफिस । लेकिन अरविंद सिंह की किताब मुल्कराज आनंद की किताब से बहुत आगे जाती है । इस वजह से अरविंद की किताब को प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी मूल्यवान मानती हैं । मुझे तो यह किताब इस लिहाज से अहम लगी कि कि यह एक ऐसे महकमे के इतिहास का दस्तावेजीकरण है जो दशकों से हमारे जीवन और समाज का ना केवल अंग रहा है बल्कि हमें गहरे तक प्रभावित भी करता रहा है । नेशनल बुक ट्रस्ट ने इस किताब को हिंदी के अलावा अंग्रेजी,उर्दू और असमिया में भी प्रकाशित कर बड़ा काम किया है । अभी अभी अरविंद सिंह की नई किताब - डाक टिकटों पर भारत दर्शन - भी नेशनल बुक ट्रस्ट ने छापी है । यह भी अपनी तरह की एक अनूठी और कह सकते हैं कि हिंदी में पहली किताब है । यह बात संतोष देती है कि हिंदी में भी इन विषयों पर काम शुरू हो गया है ।

Wednesday, December 22, 2010

लीक ने उतारा मुखौटा

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं रहे हैं कि भारत के मुस्लिम समुदाय में कुछ तत्व ऐसे हैं, जिनको लश्कर ए तोयबा का समर्थन हासिल है। लेकिन ज्यादा बडा़ खतरा कट्टरपंथी हिंदू संगठनों का हो सकता है । ये संगठन मुस्लिम समुदाय से धार्मिक तनाव और राजनीतिक कट्टरता पैदा करते हैं । ये कथित बातें कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर को 20 जुलाई 2009 को कहा । दरअसल ये कथित बातचीत रोमर और राहुल के बीच तब हुई जब अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत आई हुई थी और प्रधानमंत्री ने उनके सम्मान में दावत दी थी । उस दावत में जब रोमर ने राहुल से लश्कर की गतिविधियों और भारत पर आसन्न खतरे के बारे में पूछा तब राहुल गांधी ने उनसे यह बातें कही थी । दोनों के बीच की बातचीत भारत अमेरिका डिप्लोमैटिक संदेशों में दर्ज है । जिसका खुलासा विकिलीक्स ने किया है । जाहिर सी बात है कि इस खुलासे के बाद देशभर में बहस छिड़ गई । बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राहुल गांधी के इस बयान को बचकाना करार दिया । लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जिस वयक्ति में कांग्रेस देश का भविष्य़ देख रही है, जिस वयक्ति को देश के सर्वोच्च पद के लिए तैयार किया जा रहा है, वो शख्स इतनी हल्की बातें कैसे कर सकता है । हल्की इसलिए कि एक ओर जहां भारत आतंकवाद से जूझ रहा है और पूरे विश्व में आतंकवाद और उसके आका पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है, वहीं देश पर शासन करनेवाली पार्टी का एक अहम नेता हिंदू कट्टरपंथियों को लश्कर से बड़ा खतरा बता रहा है । क्या ये मान लिया जाए कि राहुल गांधी विश्व के सबसे खूंखार आतंकी संगठन लश्कर-ए-तोयबा से अंजान हैं, क्या यह भी मान लिया जाए कि राहुल गांधी संयुक्त राष्ट्र संघ के उस प्रस्ताव से भी अंजान हैं जिसमें लश्कर को आतंकी संगठन घोषित कर विश्व मानवता के लिए खतरा बताते हुए उसपर पाबंदी लगा दी गई है। जिसके बाद से लश्कर ने अपना नाम बदल लिया । क्या यह भी मान लिया जाए कि मुंबई हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को जो तमाम डॉजियर सौंपे थे उसकी जानकारी भी राहुल गांधी को नहीं है । क्या यह भी मान लिया जाए कि राहुल गांधी को लश्कर के खिलाफ भारत के मुहिम की जानकारी नहीं थी । यह संभव ही नहीं है कि इन सारी बातों से राहुल गांधी अनजान हों ।
दरअसल कांग्रेस पार्टी देश की अल्पसंख्यक आबादी की तुष्टीकरण के लिए किसी भी हद तक जा सकती है । कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं पर बारीकी से नजर रखनेवालों का मानना है कि वोट बैंक की राजनीति के लिए कांग्रेस का एक तबका इस तरह के बयानबाजी करता रहता रहता है । 26/11 के मुंबई हमलों के बाद उस वक्त केंद्र में मंत्री और किसी जमाने में महाराष्ट्र के कद्दावर नेता ए आर अंतुले ने एटीएस चीफ हेमंत करकरे की शहादत पर सवाल खड़े किए थे । अंतुले ने कहा था कि हेमंत करकरे की मौत को संदेहास्पद करार दिया था और साथ ही यह भी जोडा़ ता कि मालेगांव धमाकों की जांच कर रहे थे । इशारों-इशारों में उन्होंने करकरे की शहादत को मालेगांव धमाके की जांच से जोड़ दिया था । उस वक्त पूरा राष्ट्र मुंबई हमले के जख्मों को झेल रहा था, लिहाजा अंतुले के बयान की चौतरफा आलोचना शुरू हो गई । पाकिस्तानी मीडिया ने भी इसे खूब प्रचारित करना शुरू कर दिया । दबाव बढ़ता देखकर कांग्रेस ने उस बयान से पल्ला झाड़ लिया और बाद में अंतुले को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा । उस वक्त का अंतुले का बयान भी अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखते हुए किया गया था । अभी हाल ही में विकिलीक्स ने इस बात का खुलासा भी किया था कैसे दो हजार चार के आमचुनाव में कांग्रेस ने मुंबई हमलों को भुनाने की कोशिश की थी । कुछ दिनों पहले देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी भगवा आतंक का जुमला फेंककर एक बहस को जन्म देने की कोशिश की थी । जब उनके बयान पर बवाल शुरु हुआ तो कांग्रेस ने उसको उनकी वयक्तिगत राय करार दे दिया ।
अब कुछ दिनों पहले पार्टी में खुद को अल्पसंख्यकों का पैरोकार मानने वाले कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी यह कहकर सनसनी फैला दी कि अपनी मौत के चंद घंटे पहले करकरे ने उन्हें फोन कर यह बताया था कि वो हिंदू संगठनों से मिल रही धमकियों से परेशान हैं । दिग्विजय सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं सो उनकी बात को मीडिया में खासी तवज्जों मिली । लेकिन बाद में कुछ अखबारों ने करकरे की कॉल डिटेल छापकर दिग्विजय के बयान को संदेहास्पद बना दिया । बाद में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने भी दिग्विजय के बयान की हवा निकाल दी । पाटिल ने कहा कि महकमे के पास कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं है जिससे दिग्विजय और करकरे के बीच की बातचीत की पुष्टि होती हो । यहां एक बार फिर सवाल खड़ा होता है कि अगर उस वक्त करकरे ने दिग्विजय सिंह से अपनी जान का खतरा बताया था तो दिग्गी राजा दो साल तक चुप्पी क्यों साधे रहे । देश यह जानना चाहता है करकरे की आशंका के मद्देनजर दिग्विजय खामोश क्यों रहे । दरअसल ये संदेहास्पद खामोशी कांग्रेस की सियासत का हिस्सा है । दिग्विजय सिंह पहले भी इस तरह की खामोशी साधते रहे हैं । दिल्ली कते बटला हाउस एनकाउंटर के डेढ साल बाद उनको अचानक से इलहाम होता है कि वो एनकाउंटर फर्जी था । दिग्विजय को इस ज्ञान की प्राप्ति आजमगढ़ के संजरपुर में होती है । जहां वो कहते हैं कि उन्होंने बटला हाउस एनकाउंटर के फोटोग्राफ्स देखे हैं जिनमें आतंकवादियों के सर में गोली लगी है । उनके मुताबिक दहशतगर्दों के खिलाफ एनकाउंटर में इस तरह से गोली लगना नामुमकिन है । जाहिर है इशारा और इरादा दोनों साफ था । अदालत और सरकारी जांच में ये सही साबित हुए मुठभेड़ पर सवाल खड़ा कर दिग्विजय क्या हासिल करना चाह रहे थे, यह आईने की तरह साफ था । उस वक्त भी कांग्रेस ने उनके इस बयान को उनकी वयक्तिगत राय बताकर पल्ला झाड लिया था ।
कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की तुलना प्रतिबंधित संगठन सिमी से कर दी थी । सिमी और संघ की तुलना करने के अलावा राहुल कोई ठोस सबूत या तर्क अपने इस बयान के समर्थन में पेश नहीं कर पाए । राहुल गांधी अगर अपने इस बयान को लेकर गंभीर थे तो उन्हें अपनी सरकार पर दबाव डालना चाहिए था कि संघ के खिलाफ कार्रवाई करें । लेकिन उस बयान की मंशा किसी तरह की कार्रवाई या देश के प्रति चिंता नहीं बल्कि सिर्फ राजनीतिक फायदा था । अगर हम अंतुले, चिदंबरम और फिर दिग्विजय सिंह के बयानों से राहुल गांधी के बयान को जोड़कर देखें तो एक महीन सी रेखा नजर आती है जिससे एक ऐसी राजनीति की तस्वीर बनती है जहां एक खास समुदाय के वोटरों को लुभाने के लिए खाका तैयार किया जा रहा है । जाहिर सी बात है कि उसके केंद्र में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव है । बिहार की जनता ने राहुल गांधी के करिश्मे पर पानी फेर दिया । राहुल के ताबड़तोड़ दौरे और यूथ ब्रिगेड को वहां उतारने का भी कोई नतीजा नहीं निकला और पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले वहां पार्टी को आधी सीटें मिली । अब चुनौती उत्तर प्रदेश में अपनी साख और सीट दोनों बचाने की है । लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिल गई थी । अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को ठीक-ठाक सीटें नहीं मिल पाती हैं तो राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल खडे़ होने शुरू हो जाएंगे क्योंकि राहुल गांधी और उनके रणनीतिकारों ने उत्तर प्रदेश को राहुल गांधी की प्रयोगशाला के तौर पर प्रचारित किया हुआ है ।

Monday, December 20, 2010

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार

खबरों के मुताबिक इस बार का साहित्य अकादमी पुरस्कार हिंदी के यशस्वी कथाकार उदय प्रकाश को देना तय हो गया है । दो दिनों पहले हुई तीन सदस्यीय जूरी की बैठक में दो-एक से उदय प्रकाश के पक्ष में फैसला हो गया । इस बार हिंदी की जूरी में अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडे और चित्रा मुदगल थी । सूत्रों के मुताबिक बैठक में अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश के नाम का प्रस्ताव किया जिसका मैनेजर पांडे ने विरोध किया । उसके बाद मैनेजर पांडे से उनकी राय पूछी गई तो उन्होंने मैत्रेयी पुष्पा का नाम लिया । मैत्रेयी पुष्पा का नाम आते ही चित्रा मुदगल ने अशोक वाजपेयी की बात मान ली और फिर दो के मुकाबले एक से उदय प्रकाश को पुरस्कार देना तय हो गया । उदय प्रकाश को पुरस्कार दिलवाने में अशोक वाजपेयी की महती भूमिका रही । उदय प्रकाश ने पूर्व में अशोक वाजपेयी की तमाम आलोचनाएं की थी । लेकिन पिछले दिनों दोनों के समीकरण ठीक होने लगे थे । उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार डिजर्व करते हैं लेकिन जिस तरह से घेरेबंदी कर अशोक वाजपेयी ने उनको पुरस्कार दिलवाया उससे एक बार फिर से साहित्य अकादमी की कार्यशैली संदेह के घेरे में आ गई है । इस बारे में जैसे-जैेस और जानकारी मिलेगी उसको मैं पोस्ट करूंगा ।

Saturday, December 11, 2010

टोनी ब्लेयर की जर्नी

टोनी ब्लेयर ब्रिटेन के पहले ऐसे राजनेता थे जो बगैर किसी सरकारी अनुभव के सीधे प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए थे । वह ब्रिटेन के लंबे लोकतांत्रिक इतिहास के दूसरे प्रधानमंत्री थे जिनके नेतृत्व में पार्टी ने आमचुनाव में लगातार तीसरी बार जीत हासिल की थी । इसके पहले ये गौरव सिर्फ मारग्रेट थैचर को मिला था । विश्व युद्ध के बाद लेबर पार्टी के नौ नेताओं में सिर्फ तीन ने आमचुनाव में जीत हासिल की उसमें से भी टोनी ब्लेयर एक हैं । ब्रिटेन के राजनीतिक पंडित लेबर पार्टी में आमूलचूल बदलाव और सुधारों का श्रेय भी युवा टोनी ब्लेयर को ही देते हैं । उनके मुताबिक एक ऐसी पार्टी जिसी साख लगातार गिरती जा रही थी और जो मार्क्सवाद के हैंगओवर से जूझ रही थी, उसमें ब्लेयर ने नई जान फूंकी और उसे आधुनिक यूरोपीय विचारधाऱा के अनुरूप ढालने की ना केवल कोशिश की बल्कि उसमें सफलता भी पाई । टोनी के इस प्रयास को लोगों के समर्थन से बल भी मिला । इसके अलावा टोनी ने ब्रिटेन की अंतराष्ट्रीय नीतियों में भी काफी बदलाव किए । इराक पर अमेरिका का साथ देने से लेकर अंतराष्ट्रीय निशस्त्रीकरण के ब्रिटेन के भावुकता भरे पुराने स्टैंड को बदलकर एक ऐसा स्वरूप दिया जो ज्यादा देशों को स्वीकार्य हो सकता था । टोनी ब्लेयर ने 1994 में लेबर पार्टी की कमान संभाली और तीन साल के अंदर पार्टी में जो बदलाव किया उसको लेकर वहां की जनता में एक उम्मीद जगी और 1997 में ब्लेयर को अपार जनसमर्थन मिला जो ब्रिटेन के इतिहास में अभूतपू्र्व था । इसने वहां 18 साल के कंजरवेटिव पार्टी के शासन का अंत कर दिया ।
इसलिए जब टोनी ब्लेयर ने अपनी आत्मकथा लिखने का ऐलान किया तो बताया जाता है कि प्रकाशक ने उन्हें बतौर अग्रिम राशि पांच मिलियन पौंड की राशि दी । इतनी बड़ी अग्रिम राशि इस वर्ष के प्रकाशन जगत की प्रमुख घटना थी । इसके बाद जब टोनी ब्लेयर की आत्मकथा - अ जर्नी -प्रकाशित हुई तो पाठकों ने उसे हाथों हाथ लिया और प्रकाशन के चार हफ्तों के अंदर उसके छह रिप्रिंट करने पड़े और देखते देखते एक लाख से ज्यादा प्रतियां बिक गई । लेकिन यहां एक बात गौर करने की है कि इस किताब के छपने से पहले उत्सुकता का एक वातावरण तैयार किया गया और प्रकाशक या फिर लेखक के रणनीतिकारों ने इस आत्मकथा के रसभरे प्रसंगों के चुनिंदा अंश लीक किए वह भी जोरदार बिक्री का आधार बना । टोनी ब्लेयर को केंद्र में रखकर पहले भी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । टोनी की पत्नी चेरी ब्लेयर की आत्मकथा तो पूरे तौर पर टोनी के इर्द-गिर्द ही घूमती है और उनकी जिंदगी के कई अनछुए पहलुओं को उद्गाटित करती है । इसके अलावा उनके सहयोगी एल्सटर कैंपबेल की भी किताब आई । उनके दूसरे सहयोगी पीटर मैंडलसन की किताब - द थर्ड मैन, लाइफ एट द हर्ट ऑफ न्यू लेबर - तो कई हफ्तों तक ब्रिटेन के बेस्ट सेलर की सूची में शीर्ष पर रहकर लोकप्रियता और चर्चा दोनों हासिल कर चुका था । सिर्फ राजनीतिक ही नहीं बल्कि टोनी और चेरी के वयक्तिगत और अंतरंग संबंधों का भी पहले खुलासा हो चुका है । जब चेरी और टोनी क्वीन के स्कॉटिश कैसल, बालमोर में छुट्टियां बिताने जा रहे थे तो चेरी वहां गर्भ निरोधक नहीं ले जा सकी क्योंकि उसे इस बात की शर्मिंदगी थी नौकर-चाकर इस तरह की चीजें उसके सामान में कैसे रखेंगे । नतीजा यह हुआ कि बालमोर में चेरी के गर्भ में उनकी चौथी संतान आ गई । इस तरह के कई और प्रसंग पहले से ज्ञात हैं लेकिन टोनी के रणनीतिकारों ने इस किताब को इस तरह से प्रचारित किया कि बाजार ने उसे हाथों-हाथ लिया । हिंदी के लेखकों और प्रकाशकों को इससे सीख लेनी चाहिए ।
तकरीबन सात सौ पन्नों की इस आत्मकथा में टोनी ने अपनी राजनीति में प्रवेश से लेकर अपने समकालीन विश्व राजनेताओं के साथ अपने संबंधों का भी खुलासा किया है । इसके अलावा टोनी ने एक पूरा अध्याय ब्रिटेन की अपू्रव सुंदरी प्रिंसेस डायना पर भी लिखा है । डायना पर लिखे अध्याय में टोनी ने कहा है कि डायना बेहद आकर्षक थी । टोनी ने खुद को डायना का जबरदस्त प्रशंसक बताया है । इस अध्याय में टोनी और डायना की साथ की गई भारत(कोलकाता), सउदी अरब, इटली आदि की यात्रा का उल्लेख भी है । टोनी लिखते हैं- डायना एक आयकॉन थी और संभवत विश्व की सबसे ज्यादा प्रसिद्ध महिला थी जिसके सबसे ज्यादा फोटोग्राफ खींचे गए थे । वह अपने समय की एक ऐसी खूबसबरत महिला थी जो अपने संपर्क में आनेवाले लोगों पर अपने वयक्तित्व की अमिट छाप छोड़ती थी । पेरिस में सड़क हादसे में डायना की मृत्यु के बाद देश में उपजे हालात और अपनी मनस्थिति का भी विवरण पेश किया है । दरअसल टोनी ने अपनी इस आत्मकथा को कालक्रम के हिसाब से नहीं लिखा है, उन्होंने हर अध्याय को एक थीम दिया है, नतीजा यह हुआ कि पूरे किताब में एक भ्रम की स्थिति बनती नजर आती है । सांप-सीढ़ी के खेल की तरह संस्मरण भी भटकती नजर आती है । इसके अलावा टोनी की जो भाषा है वह भी आकर्षक नहीं है । सामान्य बोलचाल की भाषा को उठाकर टोनी ने लिख दिया है इसको लेकर पश्चिम के विद्वानों ने उनकी खूब लानत-मलामत की है । चार्ल्स मूर ने कहा कि यह किताब बेहद अनाकर्षक ढंग से लिखी गई है । उसमें ऐसे वाक्यों की भरमार है जिसमें अंग्रेजी के सामान्य व्याकरण का भी पालन नहीं करती है । ऐसे जुमलों का का प्रयोग किया गया है जो सुनने में तो बेहतर लगते हैं लेकिन छपकर बेहद हास्यास्पद ।
टोनी ब्लेयर और उनके सहयोगी गॉर्जन ब्राउन के बीच के संबंधों को लेकर बहुत ज्यादा लिखा और कहा जा चुका है । अपने और अपने सहयोगी के बीच के संबंधों पर टोनी ने विस्तार से प्रकाश डाला है और कहीं-कहीं दकियानूसी कहकर ब्राउन का मजाक भी उड़ाया है । टोनी के कार्यकाल में उनका सबसे विवादास्पद निर्णय रहा इराक पर हमले के लिए अमेरिका के नेतृत्व वाले 34 देशों के गठबंधन को समर्थन देना । टोनी ब्लेयर के लिए इस गठबंधन से दूर रहना आसान था । उस वक्त के अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने टोनी को कहा भी था कि वो लंदन की मजबूरी समझ सकते हैं । टोनी ब्लेयर के सामने अपने पू्र्ववर्ती प्रधानमंत्री हेरॉल्ड विल्सन का उदाहरण भी था जिसने 1964 में वियतनाम युद्ध में अमेरिका को ब्रिटेन का समर्थन देने से इंकार कर दिया था । लेकिन ब्लेयर ने लिखा है कि उन्हें यह लगा कि इराक में बाथ पार्टी की ज्यादतियों का अंत होना चाहिए इस वजह से उन्होंने अमेरिका का समर्थन किया । इस किताब के बाद टोनी के कई आलोचकों ने उनपर जमकर हमले किए । उनका तर्क है कि जब ब्रिटेन के इराक पर हमले में अमेरिका का साथ देने की जांच की जा रही हो तो इस बीच उन स्थितियों के खुलासे का कोई अर्थ नहीं है ।
इस किताब के आखिरी पन्नों पर ब्लेयर ने लिखा है - मेरी हमेशा से राजनीति की तुलना में धर्म में ज्यादा रुचि रही है । इस एक वाक्य के अलावा इस पूरी किताब में धर्म या फिर धर्म के बारे में ब्रिटेन के पू्र्व प्रधानमंत्री ने ना तो कुछ लिखा है और ना ही यह बताया है कि उनके हर दिन के फैसलों और बड़े रणनीतिक निर्णयों को धर्म कैसे प्रभावित करता है । जो वयक्ति यह कह रहा हो कि उसकी धर्म में राजनीति से ज्यादा रुचि हो उसकी जीवन यात्रा में धर्म का उल्लेख ना मिलना हैरान करनेवाला है । इसी तरह से टोनी ने अपनी इस किताब में तेरह जगहों पर भारत का उल्लेख किया है लेकिन कहीं भी गंभीरता से कुछ भी नहीं लिखा है, लगता है कि टोनी के एजेंडे पर भारत था ही नहीं । लेकिन जहां लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं की बात आती हो तो टोनी भारत का उदाहरण देते हुए कहते हैं - लोकतंत्र सबसे बेहतर शासन पद्धति है और भारत का इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है जहां सर्वोत्तम रूप से लोकतंत्र कायम है । इस तरह की टिप्पणियों से टोनी ब्लेयर की जर्नी की गंभीरता खत्म होती है । पूरी किताब को पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि टोनी ब्लेयर की यह आत्मकथा दरअसल ब्रिटेन के उनके प्रधानमंत्रित्व काल का दस्तावेजीकरण है । लेकिन इस दस्तावेज में टोनी ब्लेयर ने अपने राजनीतिक बदमाशियों का जो जिक्र किया है उसकी वजह से इस भारी भरकम किताब में थोड़ी रोचकता और पठनीयता बनी रहती है ।