Translate

Thursday, September 22, 2016

अपने समय का सूर्य 'दिनकर'

कौन जानता था कि सिमरिया घाट की बालू की रेत पर खेलनेवाला बालक एक दिन अपनी तर्जनी उठाकर कह सकेगा लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी जरूर, आंसू के कण बरसाता चल । सिमरिया घाट है बिहार के मौजूदा बेगूसराय जिले में और उसकी बालू की रेत पर खेलनेवाला बालक था रामधारी सिंह दिनकर । यह दिनकर की कल्पनाशीलता है कि वो प्रेम के बल पर लोहे के पेड़ के हरे होने की बात करते हैं । यह दिनकर का आत्मविश्वास है कि वो खुद को अपने समय का सूर्य घोषित करता है – मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं ।हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा भी था कि दिनकर अपने ढंग का अकेला हिंदी कवि है । यौवन और जीवन उसे आकृष्ट करते हैं, सौंदर्य के मोहन संगीत उसे मुग्ध करते हैं पर वह इनसे अभिभूत नहीं होता है । रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के ऐसे कवि लेखक हैं जिनका रेंज इतना व्यापक है कि वो अपने में साहित्य, समाज, इतिहास और राजनीति को एक साथ समेट कर चलते हैं । नामवर सिंह का मानना है कि दिनकर जी को सूर्य कहते समय हम यह भूल जाते हैं कि सूर्य का एक ही रंग नहीं होता है और सूर्य में ताप हीनहीं होता है, रोशनी भी होती है । उस प्रकाश के उस आलोक के अनेक रंग होते हैं, बल्कि धरती पर जितने रंग दिखाई पड़ते हैं, वे सारे के सारे रंग और रंग बिरंगे पुष्प सूरज की रोशनी से ही हैं । सूरज न हों तो उतने रंग धरती पर नहीं होंगे । करीब पांच दशक लंबे कालखंड में सृजनरत दिनकर समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे । आजादी के पहले बारदोली विजय पर विजय संदेश के नाम से उनकी कविताओ की एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी जिसके बारे में दिनकर ने खुद लिखा है कि उसमें एक उदयीमान कवि के रेंगने की रेखाएं देखने को मिलती हैं ।    
दिनकर की रचनाओं की व्यपकता का आलम यह है कि वो गांधी से लेकर मार्क्स तक, आर्य से लेकर अनार्य तक, हिन्दू संस्कृति के आविर्भाव से लेकर प्राचीन हिन्दुत्व से विद्रोह के अलावा हिंदू संस्कृति और इस्लाम से लेकर भारतीय संस्कृति और यूरोप के संबंधों को परखते हुए विपुल लेखन किया है । गांधी और मार्क्स को लेकर दिनकर में एक खास तरह का द्वंद् देखने को मिलता है । वो गांधी की अहिंसा और मार्क्स के हिंसक सिद्धातों के बीच फंसे हुए नजर आते हैं । हिंसा ओर अहिंसा के बीच का उनका द्वंद्व उनकी रचनाओं में भी दिखाई देता है । जब चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था तब दिनकर जी ने परशुराम की प्रतीक्षा लिखी जिसमें उन्होंने अपने तर्कों के आधार पर हिंसा और अहिंसा के इस्तेमाल के दर्शन को साफ किया । दिनकर ने स्वीकार भी किया है कि – मैं जीवनभर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूं । इसलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है वही रंग मेरी कविता का रंग है ।लेकिन जब साहित्य की बात आती है तो दिनकर बेहद साफगोई से कहते हैं कि – साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद का समर्थन लिखवाए औप न किसी स्टालिन की ही, जो हमे साम्यवाद से तटस्थ रहकर फूलने फलने नहीं दे सकता । हमारे लिए फरमान न तो क्रेमलिन से आ सकता है और न आनंद भवन से ही । अपने क्षेत्र में तो हम सिर्फ उन्हीं नियंत्रणों को स्वीकार करेंगे जिन्हें साहित्य की कला अनंत काल से मानती चली आ रही है ।दिनकर इस बात से बहुधा खिन्न नजर आते थे कि मार्क्सवादियों को लेखन की स्वतंत्रता नहीं थी । उन्हें पार्टी लाइन पर लेखन करना पड़ता था और दिनकर इस क्षोभ को दृढता से प्रकट भी करते थे ।  14 मई 1957 को राज्यसभा के अपने भाषण में दिनकर ने साफ किया था- कम्युनिस्ट देश के लेखकों और कवियों ने पाया तो क्या पाया ? शारीरिक सुख और रुपया तो बहुत पाया, आराम तो उनको सबसे अधिक है। उनके साथ इंकम टैक्स की दरों में रियारतें रखी जाती हैं, लेकिन बदले में उनको देना क्या पड़ा है ?  देना यह पड़ा है कि अपनी स्वाधीनता का हनन करना पड़ा है । रेजीमेंटेशन को स्वीकार करना पड़ा है । मैं पूछना चाहता हूं कि क्रांति हुए इतने दिन हुए हैं, तो दस्तोव्स्की, तुर्गनेव, चेखोव, टॉलस्टाय और गोर्की के समान लेखक क्यों नहॆं पैदा हुए कम्युनिज्म में ? फिर पैदा हो नहीं सकते क्योंकि मनुष्य की आत्मा को जहां स्वाधीनता नहीं है वहां सच्चा साहित्य, सच्ची कविता, सच्ची कला कभी पैदा नहीं हो सकती।

इसी तरह से पिछले दिनों जब पूरे देश में राष्ट्रीयता और असहिष्णुता को लेकर बहस चली थी तो पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के नेताओं और विद्वानों ने दिनकर को उद्धृत करते हुए अपने तर्कों को वैधता प्रदान करने की कोशिश की । दिनकर की कविता समर शेष है की आखिरी पंक्ति– समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध । के हवाले से उस बहस में तटस्थ रहनेवालों की लानत मलामत की गई थी । लेकिन उस वक्त किसी को याद नहीं आया कि इसी कविता में दिनकर कहते हैं – समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं, गांधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं । दिनकर को उस बहस में लोगों ने सुविधानुसार उद्धृत किया और विरोधियों ने बगैर दिनकर को समग्रता में पढ़े उनपर जाने कैसे कैसे आरोप मढ़ दिए । दिनकर राष्ट्रवादी कवि हैं इसमें कोई दो राय नहीं है । उनकी कविताओं में उग्र राष्ट्रवाद के स्वर भी मुखर रहे हैं । उनकी रचनाओं में इस उग्र राष्ट्रीयता के पीछे अपने गौरवशाली अतीत का भान और मान था । संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने अतीत के इस गौरव को बेहद करीने और सलीके से सजाया है । लेकिन इसका यह मतलब नहीं हुआ कि दिनकर की राष्ट्रीयता सांप्रदायिक या फिर जनता विरोधी है  । इसको उनकी कविता दिल्ली को पढ़कर समझा जा सकता है । दिनकर साहित्य में मार्क्सवाद की सत्ता की गुलामी को भी तैयार नहीं थे लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि दिनकर उस राष्ट्रवाद के समर्थक थे जो नफरत की बुनियाद पर टिका था । दिनकर ने घृणा को राष्ट्रीयता की बुनियाद बताया था लेकिन उसको उद्धरणों से स्पषट भी किया था । दिनकर का मानना है कि बहुधा राष्ट्रीयता का जन्म घृणा से होता है । उनका मानना है कि नेपोलियन की हुकूमत के खिलाफ लोगों में एकता हुकूमत से घृणा की वजह से आई । इसी तरह से भारत में राष्ट्रीयता इस वजह से पनपी कि यहां के लोग अंग्रेजों से घृणा करने लगे । अब यहां अगर पूरे संदर्भ से काटकर सिर्फ ये बताया जाए कि दिनकर की राष्ट्रीयता का आधार घृणा है तो यह उनके साथ अन्याय होगा । कुछ लोगों ने उनके साथ ये अन्याय पिछले दिनों किया । दिनकर ने अपने लेखों में टैगोर के राष्ट्रीयता और अंतराष्ट्रीयता की अवधारणा पर भी विचार करते वक्त अपनी मान्यताओ को सामने रखा है । दिनकर की एक कविता भी है – राष्ट्रदेवता का विसर्जन’, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि राष्ट्रीयता अगर अंतराष्ट्रीयता के खिलाफ खड़ी हो रही हो तो उसका विदा होना बेहतर है । कहना ना होगा कि दिनकर विश्व शांति और मैत्री की वकालत भी कर रहे थे । दरअसल अगर देखा जाए तो दिनकर का सभी ने अपने अपने हक में इस्तेमाल किया लेकिन उनका समग्र मूल्यांकन करने में किसी ने रुचि नहीं दिखाई 

Tuesday, September 20, 2016

‘एक्स’ के साथ ऑन एयर रोमांस

अमिताभ बच्चन और रेखा के रोमांस के किस्सों के बीच जब यश चोपड़ा की फिल्म सिलसिला उन्नीस सौ इक्यासी में रिलीज हुई थी तो फिल्म लगभग फ्लॉप हो गई थी । उस वक्त हिंदी के दर्शकों को विवाहेत्तर संबंध की थीम पसंद नहीं आई थी । यश चोपड़ा की इस फिल्म में समीक्षक कोई कमी ढूंढ नहीं पाए थे । स्टार कलाकारों की मौजूदगी और बेहतरीन संगीत और लोकेशन के बावजूद फिल्म बेहतर नहीं कर पाई थी तो उसकी वजह कुछ और ही रही होगी । उस वक्त कुछ समीक्षकों ने फिल्म के सेट पर रेखा और जया के बीच की केमिस्ट्री की चर्चा भी की थी । सिलसिला के बाद अमिताभ बच्चन और रेखा की कोई मुक्कमल फिल्म नहीं आई । कुछ तो वजह रही होगी कोई यूं ही बेवफा नहीं होता । मतलब फिल्म के प्रोड्यूसर्स को कुछ लगा होगा वर्ना इतने बड़े कलाकारों के साथ फिर फिल्म नहीं बनने की वजह समझ से परे है । अमिताभ और रेखा की तरफ से भी इस तरह की कोई पहल नजर नहीं आई।  वक्त बदला, समाज बदला और इन बदले परिदृश्य में दर्शकों की रुचि भी बदली बदली नजर आ रही है । अब तो फिल्मकार से लेकर अभिनेता तक अपनी और अपने एक्स के साथ फिल्म करने से परहेज नहीं कर रहे हैं ।

सलमान खान और कटरीना का अफेयर लंबे समय तक चर्चा में रहा । ब्रेकअप के बाद गाहे बगाहे सलमान अपनी बातों से कटरीना से चुटकी भी लेते रहे लेकिन साथ फिल्म कम ही आई । अब एक बार सलमान और कटरीना दोनों टाइगर जिंदा है में साथ साथ नजर आनेवाले हैं । सलमान से ब्रेकअप के बाद कटरीना ने रणबीर को अपना हमसफर बनाया और उसके साथ लिवइन में रहने लगी । साथ छुट्टियां मनाते दोनों की तस्वीरें खूब चर्चित हुई थी लेकिन इस रूमानी सफर पर भी ब्रेक लगा और दोनों की राह जुदा हो गई । दोनों के बीच बातचीत तक बंद हो गई और सार्वजनिक समारोहों में एक दूसरे से मुंह भी फरते नजर आने लगे । लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था । पहले अफेयर, फिर लिवइन फिर ब्रेकअप के बाद अब एक बार फिर से दोनों एक साथ फिल्म जग्गा जासूस में नजर आनेवाले हैं । अफेयर और ब्रेकअप अपनी जगह लेकिन प्रोफेशन अपनी जगह । जग्गा जासूस फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि कटरीना और रणवीर दोनों इस बात का एहसास नहीं होने देते हैं कि उनके बीच रीयल लाइफ में बातचीत तक बंद है । इतना जरूर कहा जा रहा है कि अब कटरीना और रणवीर वैनिटी वैन शेयर नहीं करते हैं । इसी तरह से रणवीर के पहले कटरीना के ब्यायफ्रेंड रहे सलमान के साथ टाइगर जिंदा है के फिल्मकार भी खासे उत्साहित नजर आ रहे हैं । फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि कटरीना इतनी प्रोफेशनल है कि उसको पूर्व प्रेमी के साथ काम करने में कोआ दिक्कत नहीं है । बात सिर्फ कटरीना के प्रोफेशनल होने की नहीं है । आशिकी टू के बाद श्रद्धा कपूर और सिद्धार्थ रॉय कपूर के रोमांस के किस्से भी खूब सुने गए । फिर उनके ब्रेकअप की खबर आई और अब खबर ये है कि वो शाद अली की अगली फिल्म में साथ काम करने जा रहे हैं । आलिया और वरुण धवन के अफेयर और ब्रेकअप भी चर्चित रहे हैं लेकिन अब वो दोनों भी एक फिल्म में साथ आ रहे हैं । इतने किस्से, इतने ब्रेकअप, इतनी गॉसिप के बाद भी प्रोफेशनल लाइफ पर कोई असर नहीं पड़ना, नई पीढ़ी की मानसिकता में आ रहे बदलाव को इंगित करता है । अब संबंधों का असर उनके काम-काज पर नहीं पड़ता है । ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री को ऑफ एयर संबंध बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करते हैं । एक जमाना था जब फिल्मकार भी उन अभिनेता-अभिनेत्री को लेकर फिल्में बनाने के लिए उत्सकु रहा करते थे जिनके रोमांस के किस्से आम होते थे । फिल्मकार उनके रोमांस को भुनाना चाहते थे लेकिन अब स्थिति बदली बदली सी नजर आती है, अब तो फिल्मकार भी ब्रेकअप कपल को लेकर फिल्म बनाकर चर्चा बटोरना चाहते हैं । इलके पीछे का मनोविज्ञान ये हो सकता है कि दर्शकों के बीच की उस उत्सुकता को भुनाया जाए कि ब्रेकअप के बाद कैसे दिखते हैं, कैसे करते हैं या फिर ब्रेक अप के बाद ऑन एयर केमिस्ट्री कैसी दिखती है । अब जरा सोचिए कि सलमान ने ब्रेक अप के बाद कटरीना का कितना मजाक उड़ाया है । रणबीर को लेकर भी, लेकिन जब दोनों साथ काम करेंगे या फिर पर्दे पर रोमांस करेंगे तो केमिस्ट्री नजर आएगी जो उनके अफेयर के दिनों की फिल्मों में नजर आती थी । तो ये  जो क्या है न वही दर्शकों को सिनेमा हॉल तक लेकर आ सकता है, ऐसा फिल्मकार और अभिनेता दोनों सोचने लगे हैं । अफेयर को लेकर जिस तरह से समाज की स्वीकार्यता मिली है या फिर ब्रेकअप को लेकर जिस तरह की सहानुभूति मिलने लगी है वो भी फिल्मकारों को अपनी ओर खींचती है । अब तो वो जमाना भी नहीं रहा कि विवाहेत्तर संबंधों पर बनी फिल्म के उस आधार पर फ्लॉप होने का खतरा है । एक्स के साथ फिल्म का नया ट्रेंड इसका ही नतीजा है ।  

Monday, September 19, 2016

Politics of Check and mate

There is a very famous teaching example in Management classes. It is about a frog and the water. When a frog is thrown into a pot of boiling water, it is shocked for few moments and then jumps out from the boiling pot. The frog gets scaled but it survives. Now take the second scenario. Another frog is put in a pot-filled with normal water. After putting the frog in the pot, start the water to boil gradually. The frog will get accustomed to higher and higher temperature. First, the frog will sink into unconsciousness and then gradually boil to death but will never jump out of the pot.
We, the people of Bihar are like the second frog who are getting accustomed to worse and worst situation in the state but will never jump out of it. If you remember the first Lalu tenure during 1990s, it was like throwing a frog in the boiling water. At that time, many Bihar residents left the state and shifted to Delhi or elsewhere. Now, this Grand alliance of Lalu-Nitish Kumar is not like a boiling water but the pot is gradually made to boil. It could be understood what fate the frog will meet.
The release of LaluYadav’s protege and accused of murder, kidnapping and many heinous crime and Ex-Member of Parliament Shahabuddin poses serious question about ‘sushashan’ of Nitish Kumar. Questions are being asked about what we have made of our democracy? The way Lalu Yadav has started dominating Bihar politics, it is also being said that Nitish Kumar is becoming what Manhoman Singh was to UPA. But before reaching to any conclusion, we have to minutely analyze political equations of Bihar today.
The dominance of Lalu and its silent counter by Nitish Kumar raised serious questions about the future of this grand alliance. Nitish Kumar came up with very stringent law for total ban on liquor sale. It is widely propagated that Nitish Kumar has fulfilled the election promise made to the half population of Bihar. But some say that it is targeted towards Lalu Yadav. It is also said that most of the businessman in liquor trade are supporters of Lalu Yadav. So, the people who are keeping close tab on Bihar politics suggests that by curbing the liquor sale, Nitish Kumar tried to weaken the support base of his ‘Big brother’. Sensing this, LaluYadav opened his gambit on political chess board. First, some of his party MLA opposed the stringent prohibition law but that move could not get any fruitful result. So, it seems that Laludecided to move back to its support base of Yadav and Muslims, i.e. the MY Combination.
First, he showed his clout against the Upper Caste don Anant Singh and got him arrested allegedly by putting pressure on the government of that time. Anant Singh was accused of murder of a Yadav. At that time much noise was made against Lalu’s move. Lalu alleged those who opposed his move by saying that they had some secret agenda, he or she is advocating the causes of Upper caste persons, they are ganged up against the downtrodden of the society etc.
Now, it is alleged by Bharatiya Janata Party (BJP) leaders of Bihar that Shahbuddinhas been released from jail due to pressure of RJD chief. It is also alleged that under pressure from RJD supremo, Bihar government did not hire some good advocates who oppose the Shahabuddin bail plea in Patna High Court. After release from jail, Shahabuddin showered praise on Lalu Yadav and when asked about Nitish kumar, he vehemently and vociferously stated that he is not his leader. He went a step ahead andsaid that Nitish Kumar is Chief Minister of Bihar due to some circumstances prevailing at the time of assembly election. Shahabuddin clearly stated that Laluis his leader and will remain so.
It is also a fact that when grand alliance came to power under Nitish Kumar-Lalu Yadav combine, crime rate saw an upward movement. RJD MLA Rajballabh Yadav was arrested on the charges of raping a minor girl. During investigation of some more crimes, many Yadav leaders or criminals got arrested and still behind bars.Nitish Kumar did not come to defend them, rather the police cracked heavily on the criminals. LaluYadav’s son and Deputy Chief Minister of Bihar Tejaswi Yadav was left to defend Bihar government over allegation of crime surge in the state. The message went to Yadav community that Nitish is calling the shots in the government and Lalu can’t defend his fellow casteman, who are traditionally the solid vote bank of Lalu. After sensing this, Lalu started exerting himself on the functioning of Bihar Government.
When the grand alliance won the Bihar Election, Lalu declared that Nitish will look after Bihar and he will take on the growing menace of RSS and BJP in the country. But what happened in Bihar is just opposite. Nitish Kumar is very often seen touring other states and Lalu most of the time stayed in Bihar. So, the game of check and mate is in full swing in Bihar Politics. Lalu has started giving signal to his MY vote bank that he is not weak and able to take care of them. Many political pundits are of the opinion that Nitish Kumar is not like Manmohan Singh and have the political acumen to mould the situation as he wishes.Nitish is such a politician who could not compromise on his image.Political grapevine doing the rounds in Bihar and in Lutyens power corridor is that Nitish is exploring the possibility of again joining hands with BJP. The recent  bonhomie in the meeting of Nitish and Prime Minister Narendra Modi is seen in this light. It is very often said about cricket and Politics that both are the games of uncertainty and anything can happen at any moment. So, let’s keep the finger crossed for Bihar.

( Writer is a Senior TV Journalist) 

Sunday, September 18, 2016

भाषादूत सम्मान से उठा विवाद

दिल्ली की हिंदी अकादमी एक विवाद से उबरती नहीं है कि दूसरे विवाद के भंवर में फंस जाती है । विवादों के केंद्र में बहुधा रहती हैं आम आदमी पार्टी सरकार द्वारा नियुक्त की गई अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा । मैत्रेयी पुष्पा हिदी अकादमी में काफी सक्रिय हैं और उन्होंने इसको आयोजनों आदि से चर्चा में तो ला ही दिया है । आयोजनों में बुलाए जानेवाले रचनाकारों के नाम पर आपत्तियां हो सकती हैं लेकिन इस बात पर लगभग सभी एकमत हैं कि दिल्ली की हिंदी अकादमी की गाड़ी चल पड़ी है । लेकिन जब कोई संस्था मंत्रालय के अंदर होती है तो उसको एक चौहद्दी विशेष में काम करना पड़ता है । इस बात का एहसास मैत्रेयी पुष्पा को हाल ही में एक बार फिर हुआ । हिंदी दिवस के मौके पर अकादमी ने सोशल मीडिया पर हिंदी के प्रचार प्रसार और उत्कृष्ट कार्य के लिए सक्रिय नौ शख्सियतों को भाषादूत सम्मान देने का एलान किया । अब गड़बड़ी इस पुरस्कार देने के फैसले के साथ शुरू हुई । बताया जा रहा है कि अकादमी से सम्मानित होनेवाले लोगों की जो सूची दिल्ली सरकार के भाषा और संस्कृति विभाग गई थी वहां से कुछ नाम जोड़ दिए गए और कुछ हटा दिए गए । लेकिन इस बीच अकादमी ने जल्दबाजी दिखाते हुए अपनी सूची के सदस्यों से संपर्क कर उनको सम्मानित करने का पत्र जारी कर दिया और उनका बॉयोडाटा आदि मंगवा लिया । मंत्रालय से सूची आने पर वो बदला हुआ था, लिहाजा जिनका नाम कटा था उनसे अकादमी ने लिखित रूप में क्षमा मांग ली । परंतु मामला इतना सरल नहीं था । सोशल मीडिया पर इसको लेकर खासा बवाल मचा । मैत्रेयी पुष्पा से इस्तीफे की मांग उठी । संचालन समिति के सदस्य ओम थानवी ने इस्तीफे का एलान कर दिया । जो हो सकता था वो हुआ लेकिन अच्छी बात ये रही कि अकादमी की उपाध्यक्ष मजबूती से डटी रहीं । इसके पहले भी जब होली के वक्त भारतीय जनता पार्टी के सांसद मनोज तिवारी को कार्यक्रम करने के लिए साढे आठ लाख का भुगतान किया गया था तब भी उपाध्यक्ष को पता नहीं था और शायद कार्यकारिणी से सदस्यों को भी अंधेरे में रखा गया था । सवाल यही उठता है कि क्या भाषा और संस्कृति विभाग में कौन है जो अकादमी के फैसलों को बगैर उपाध्यक्ष को विश्वास में लिए बदल दे रहा है और उसकी मंशा क्या है ।

हाल ही में कार्यकारिणी के दो सदस्यों- हरियाणा के पूर्व पुलिस अफसर विकास नारायण राय और वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार विजय किशोर मानव- को हटाने का फरमान जारी हो गया था । ये दोनों मैत्रेयी पुष्पा के विश्वासपात्र माने जाते हैं । इसकी वजह का तो पता नहीं लेकिन अकादमी से जुड़े लोगों का दावा है कि उस वक्त भी ये मामला मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक गया था और उनके दखल के बाद ही ये मसला सुलझ पाया था । विकास नारायण राय और विजय किशोर मानव कार्यकारिणी में बने रहे । बार बार दिल्ली सरकार के भाषा और संस्कृति विभाग से इस तरह की बातें सामने आने के बाद सवाल तो खड़े होने ही लगे हैं । दरअसल हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष का पद अबतक लगभग शोभा और सानिध्य का पद रहा था लेकिन मैत्रेयी पुष्पा ने उस शोभा और सानिध्य का अतिक्रमण करना शुरू कर दिया । अब अगर कहीं स्थापित मान्यताओं को तोड़-फोड़ की कोशिश होगी तो विरोध तो होगा ही । ये देखना दिलचस्प होगा कि मैत्रेयी पुष्पा कब तक इन राजनीतिक दांव-पेंच को झेल पाती हैं या फिर राजनीति के चालों को नाकाम करते हुए अकादमी को चलाने में सफल हो पाती है । 

Saturday, September 17, 2016

‘पुरस्कार वापसी’ का पुरस्कार ! ·

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले हिंदी के चंद कवियों और लेखकों ने देशभर में असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करने का एलान कर माहौल बनाने की कोशिश की थी । माहौल बना भी था । अशोक वाजपेयी ने ठीक-ठाक समां बांध दिया था । चंद दिनों तक पूरे देश में इस बात पर ही बहस हुई थी कि देश में असहिष्णुता का मौहाल है । यहां तक कि वित्त मंत्री अरुण जेटली और बाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी इस पर बयान देना पड़ा था । साहित्य अकादमी को भी आपात बैठक बुलानी पड़ी थी । इस बात के लिए अशोक वाजपेयी को दाद देनी होगी कि उन्होंने देश भर में एक सरकार के खिलाफ माहौल बना दिया था । उस माहौल के बाद बिहार विधानसभा का चुनाव परिणाम आया और भारतीय जनता पार्टी वहां बुरी तरह से परास्त हो गई । महागठबंधन की जीत के बाद नीतीश कुमार ने बिहार की कमान संभाली । पुरस्कार वापसी अभियान के लोगों से उनकी मुलाकातें होती रहीं । इस समूह के रहनुमाओं ने नीतीश कुमार को विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद ये जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि महागठबंधन की जीत में उनके द्वारा निर्मित माहौल का भी हाथ था । अब बिहार फतह करने के बाद नीतीश कुमार की महात्वाकांक्षा अपने लिए देश की सियासत में बड़ी भूमिका तलाश रही है । नीतीश कुमार को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद करने का भरोसा एक बार फिर से इस पुरस्कार वापसी समूह ने दिया है । दिल्ली में इस समूह के सदस्यों और नीतीश कुमार की एक बैठक हुई जिसमें समान विचारधारा के लेखकों को एक मंच पर लाने की कोशिश करने की बात हुई । देशभर के इस तरह के लेखकों से नीतीश कुमार की मुलाकातें करवाई जाएंगी । अब ये देखना दिलचस्प होगा कि इन मुलाकातों से क्या निकलता है । देखना तो ये भी दिलचस्प होगा कि वो कौन सी वजहें हैं जिसकी वजह से प्रगतिशील, जनवादी और कलावादी लेखक एक साथ एक मंच पर तमाम वैचारिक विरोधों को भुलाकर बैठेंगे । इतनी लंबी पृष्ठभूमि बताने की भी वजह है । वजह पुरस्कार वापसी समूह की मंशा को उजागर करने की है ।
देश में फैल रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी समूह के मुखिया अशोक वाजपेयी की लंबे समय से इच्छा रही है कि वो देश में विश्व कविता समारोह का आयोजन करें । इस तरह के कार्यक्रमों में करोड़ों रूपए खर्च होते हैं लिहाजा आयोजन का भार कोई सरकार या सरकारी संस्था ही उठा सकती है । अशोक वाजपेयी ने भारत सरकार को 2014 में भी इस तरह के आयोजन का प्रस्ताव दिया था जो परवान नहीं चढ़ सका था । दरअसल उस वक्त सरकार ने अशोक वाजपेयी के उस प्रस्ताव को साहित्य अकादमी के पास भेज दिया था जिसे साहित्य अकादमी ने ठुकरा दिया था । साहित्य अकादमी ने अशोक वाजपेयी के प्रस्ताव को नकारते हुए साफ कर दिया था कि वो किसी से साथ साझीदारी में इतना बड़ा आयोजन करने के बजाए खुद इस तरह का आयोजन कर सकती है । साहित्य अकादमी ने विश्व कविता समारोह का आयोजन किया भी था । अब एक बार अशोक वाजपेयी ने बिहार सरकार को विश्व कविता समारोह के आयोजन के लिए तैयार कर लिया है । बिहार सरकार ने इस आयोजन का जिम्मा बिहार संगीत नाटक अकादमी को सौंपा है । इस संस्था के अध्यक्ष कवि आलोक धन्वा हैं । विश्व कविता सम्मेलन के लिए जिस आयोजन समिति का गठन किया गया है उसमें सरकारी नुमाइंदों के अलावा राष्ट्रीय जनता दल के नेता रामश्रेष्ठ दीवाना, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि अरुण कमल, रामवचन राय और अशोक वाजपेयी को इस कमेटी में रखा गया है । इस कमेटी की एक बैठक हो चुकी है और तय किया गया है कि अगले साल अप्रैल में पटना में विश्व कविता समारोह का आयोजन किया जाएगा । सूबे के संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम के मुताबिक इस समारोह में चालीस देशों के कवि शिरकत करेंगे । राम के मुताबिक कमेटी ने जो फैसला लिया है उसके मुताबिक पटना और सूबे के अन्य ऐतिहासिक शहरों में ये समारोह आयोजित होगा । इसके लिए दिल्ली में एक अस्थायी कार्यालय होगा जो अशोक वाजपेयी की देखरेख में चलेगा । अब इस कार्यालय में क्या क्या सहूलियतें होंगी इस बारे में जानकारी सामने आने का इंतजार है ।
अभी नामवर सिंह के नब्बे साल के मौके पर प्रकाशित पत्रिका बहुवचन के अंक में अशोक वाजपेयी ने एक लंबा लेख लिखकर नामवर सिंह के दुर्गुणों को गिनाया था । अशोक वाजपेयी के मुताबिक विचारधारा के अतिरेक के अलावा नामवर सिंह के यहां तीन और अतिचार सक्रिय हैं- वाचिकता, अवसरवादिता और सत्ता का आकर्षण । अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह पर सत्ता के आकर्षण का आरोप लगाते हुए कहा कि वो सत्ताधारियों के मंच पर होने पर बहुत विनम्र हो जाते हैं । अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह पर तो सत्ता के आकर्षण का आरोप जड़ा लेकिन कहावत है ना कि अगर आप किसी की ओर एक उंगली उठाते हैं तो आपकी ओर भी कुछ उंगलियां उठती हैं । यह कहावत अशोक वाजपेयी पर भी लागू होती है । अशोक जी को भी ना तो कभी सत्ता से परहेज रहा और ना ही कभी उन्होंने सत्ताधारियों से निकटता से कोई परहेज किया । चाहे वो समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेन्द्र यादव के साथ मंच साझा करना हो या फिर नीतीश कुमार के साथ । पुरस्कार वापसी अभियान के बाद तो नीतीश कुमार से उनकी निकटता बढ़ती ही गई और पिछले दिनों जिस तरह की खबरें आई उसके मुताबिक अशोक वाजपेयी खेमे के लेखकों की नीतीश कुमार के साथ लंबी बैठक हुई जिसमें देशभर के लेखकों के साथ नीतीश की मुलाकातें तय करवाने का बीड़ा उठाया गया । क्या ये सत्ता का आकर्षण नहीं है । क्या ये सत्ता का आकर्षण नहीं है कि अशोक वाजपेयी जैसे हिंदी के वरिष्ठ और बेहद आदरणीय लेखक को उस कमेटी में रखा गया है जिसमें कि लालू यादव की पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के मुखिया हैं । कमेटी की सदस्यता स्वीकार करना अवसरवादिता नहीं है ।
अबतक भले ही बिहार में विश्व कविता सम्मेलन करने के फैसले का दावा किया जा रहा है लेकिन पर्दे के पीछे इस कविता महोत्सव को दिल्ली में करवाने का खेल भी चल रहा है । इस आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि अशोक वाजपेयी और बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष आलोक धन्वा इस पक्ष में हैं कि विश्व कविता के इस आयोजन को दिल्ली में करवाया जाए । अब दिल्ली में आयोजन के लिए तर्क ढूंढे जा रहे हैं । एक तर्क तो ये दिया जा रहा है कि विश्व के चालीस देशों के कवियों के रुकने का पटना में इंतजाम कैसे हो सकता है । दूसरा तर्क ये गढ़ा जा रहा है कि दिल्ली में इस आयोजन से नीतीश कुमार की छवि को देशभर में मजबूती मिलेगी और एक संवेदनशील और उनको सहिष्णु विकल्प के रूप में पेश किया जाएगा । इन तर्कों से ज्यादा तो इस तर्क में दम लगता है कि विश्व कविता महोत्सव अगर बिहार में करवाया गया तो रसरंजन कैसे होगा । बिहार में पूर्ण शराबबंदी है और ऐसे में कविता सुनाने के बाद कवियों के सामने संकट पैदा हो सकता है । इसकी काट के तौर पर भी इस आयोजन को दिल्ली ले जाया जा सकता है । अगर ऐसा होता है तो नीतीश की छवि मजबूत होगी या कमजोर ये तो उस वक्त ही तय होगा ।

बिहार संगीत नाटक अकादमी के विश्व कविता महोत्सव के आयोजन पर करीब चार-पांच करोड़ रुपए के बजट पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं । बिहार में शुरू हुआ अखिल भारतीय कविता समारोह और कहानी समारोह को सरकार ने बंद कर दिया जिसमें बमुश्किल पच्चीस तीस लाख रुपए खर्च होते थे । पटना लिटरेचर फेस्टिवल को बिहार सरकार ने मदद बंद कर दिया जिससे वो आयोजन भी ठप है । अब सवाल यही है कि विश्व कविता महोत्सव के आयोजन पर करोड़ों खर्च करने का औचित्य क्या है । इससे बिहार की जनता को या बिहार की रचनात्मकता को क्या फायदा होना है । इस बात का आंकलन सरकार के स्तर पर किया गया या सिर्फ अशोक वाजपेयी को पुरस्कार वापसी मुहिम के लिए पुरस्कृत करने के लिए ये आयोजन किया जा रहा है । इस बात को भी प्रचारित किया जा रहा है कि गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने के जश्न के तौर पर भी इसका आयोजन किया जा रहा है । बेहतर तो ये होता कि बिहार सरकार इस चार पांच करोड़ रुपए की राशि से पटना या बिहार के किसी अन्य शहर में एक बेहतरीन कला केंद्र की स्थापना करती जहां बिहार के प्रतिभाशाली कलाकार ना केवल अपनी कला को मांज सकते बल्कि उसका प्रदर्शन भी कर सकते । पटना में मौजूद सांस्कृतिक केंद्रों की बदहाली इन पैसों से दूर हो सकती है । लेकिन नेताओं को तो अपने कार्यकर्ताओं का ध्यान रखना होता है और इस आयोजन में भी इस सिद्धांत का पालन किया जा रहा है ।  

Friday, September 16, 2016

‘शिवाय’ और ‘दिल’ की मुश्किल

फिल्मों में कई चरित्र ऐसे होते हैं जो सिर्फ विवाद पैदा करने के लिए रखे जाते हैं जिनसे मनोरंजन भी होता है । ये फिल्मी कैरेक्टर बॉलीवुड में भी नजर आने लगे हैं, जिनका काम ही होता है विवाद पैदा करना और उससे कुछ ना कुछ हासिल करना । किसी जमाने में अभिनेता रहे कमाल खान इन दिनों इसी राह पर चलते नजर आ रहे हैं । विक्रम भट्ट के साथ हुआ उनका विवाद अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि अब अजय देवगन के साथ उनका विवाद शुरू हो गया । दरअसल इस दीवाली पर अजय देवगन की फिल्म शिवाय और करण जौहर की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल एक साथ रिलीज हो रही है । चंद दिनों पहले जब करण की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल का पहला टीजर रिलीज हुआ तो केआरके के नाम से मशहूर कमाल खान ने एक के बाद एक ट्वीट करके फिल्म को प्रमोट करना शुरू कर दिया । यह बात अजय देवगन को नागवार गुजरी और उन्होंने केआरके और अपने बिजनेस पार्टनर के बीच हुई एक बातचीत का ऑडियो जारी करते हुए आरोप लगा दिया कि केआरके को करण की फिल्म ऐ दिल है मुश्किल को प्रमोट करने के लिए पच्चीस लाख रुपए दिए गए हैं । दरअसल कमाल खान जब फिल्मों में फ्लॉप हो गए तो उन्होंने फिल्म समीक्षा करनी शुरू कर दी । हलांकि केआरके ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और उन्होंने कहा कि अजय के बिजनेस मैनेजर से पीछा छुड़वाने के लिए उन्होंने कह दिया कि फिल्म को ट्विटर पर प्रमोट करने के लिए करण ने उसको पच्चीस लाख दिए । अजय देवगन ने जो ऑडियो जारी किया है उसमें पैसों के लेनदेन की बात है । लब्बोलुआब यह कि आरोपों के मुताबिक करण ने कमाल खाऩ को संगठित तरीके से शिवाय के खिलाफ प्रचार के काम में लगाया है । भगवान जाने कि उसमें कोई एडिटिंग की गई है या नहीं लेकिन अगर करण ने ऐसा किया है तो उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाएगी और कारोबार में अनैतिक खेल माना जाएगा। कमाल खान की ना तो कोई साख है और ना ही कोई उनको गंभीरता से लेता है । इन सबके बावजूद अब ये तो साफ हो गया है कि ट्वीटर पर प्रमोशन में पैसे के लेन देन के खेल का खुलासा तो हो ही गया ।
कुछ दिनों पहले ऐसी खबरें आई थीं कि फिल्मी सेलिब्रिटीज जिनके ट्वीटर पर लाखों फॉलोवर हैं वो किसी ब्रांड को इंडोर्स करने के लिए पैसे लेते हैं । ये खबर जब आई थी तब बकायदा उसके साथ रेट लिस्ट भी छपी थी । दरअसल सोशल मीडिया के इस दौर में ट्विटर किसी भी फिल्म के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाने के लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म है ।अब इसमें अगर पैसे लेकर ट्वीट करने की बात आ रही है तो ये फिर शख्स विशेष की विश्वसनीयता को भी कठघरे में खड़ा कर रही है ।  कमाल खान के करीब बारह लाख फॉलोवर ट्विटर पर मौजूद हैं और वो खुद को फिल्म समीक्षक साबित करने के लिए ट्विटर पोल आदि लगातार करते रहते हैं लेकिन ये बात समझ से परे है कि करीब साठ लाख के ट्विटर फॉलोवर वाले अजय देवगन को कमाल खान को इतना भाव देने की क्या जरूरत पड़ी । कमाल खान को ना तो फिल्म इंडस्ट्री गंभीरता से लेती है और ना ही फिल्मों के दर्शक । वो अपनी टिप्पणियों से मनोरंजन करते हैं और कई बार तो प्रचार पिपासा उनको बदतमीज टिप्पणियों तक ले जाती है । कमाल खान का ट्वीटर प्रोफाइल उनको अभिनेता के साथ साथ प्रोड्यूसर और समीक्षक भी बता रहा है लेकिन रील लाइफ से ज्यादा बड़े अभिनेता वो रीयल लाइफ में हैं ।  

अजय देवगन पहले भी अपनी फिल्म के रिलीज के डेट्स को लेकर आदित्य चोपड़ा से भिड़ चुके हैं । दो हजार बारह की बात है जब अजय की फिल्म सन ऑफ सरदार और आदित्य चोपड़ा की फिल्म जबतक है जान की रीलिज डेट टकरा गई थी तब भी अजय नाराज हो गए थे । उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी फिल्म को कम स्क्रीन मिल रहे हैं । उस वक्त भी मामला कोर्ट तक पहुंचा था । अब इस बार अजय का प्रत्यक्ष मुकाबला करण जौहर की फिल्म से है तो कहीं ऐसा तो नहीं कि वो परोक्ष रूप से कमाल खान के बहाने करण को घेर रहे हैं । अजय देवगन को जानने वालों का कहना है कि अजय देवगन इस तरह की हरकत नहीं कर सकते । इसके पहले भी करण जौहर और देवगन की फिल्म की रिलीज डेट टकरा चुकी है । तो सवाल यही कि कहीं करण जानबूझकर तो ऐसा नहीं करते है । शिवाय और ऐ दिल है मुश्किल को इस विवाद से कितना फायदा होगा ये तो दीवाली पर पता चलेगा लेकिन इस तरह के विवाद फिल्मकारों की संजीदगी को ठेस पहुंचाते हैं । (10 सितंबर )      

Tuesday, September 13, 2016

कट्टरता की पड़ताल करती कृति

आतंकवाद, जिहाद, बम धमाका, बगदादी, आईएसआईएस आदि शब्दों पर जब चर्चा होती है तो एक और शब्द इन सबसे जुड़ता है वो है रैडिकल इस्लाम । और जब ये शब्द जुड़ता है तो आतंक की तमाम घटनाओं को इस्लाम से जोड़ने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं । बार-बार ये कहा जाता है कि आतंकवाद का कोई नाम या रंग नहीं होता है, ये मूलत: मानवता विरोधी वारदात है जिसको धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए । प्रतिपक्ष में तर्क दिया जाता है कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते हैं लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं । तर्क-वितर्क और कुतर्क चलते रहेंगें लेकिन इन दिनों जो एक सबसे खतरनाक बात सामने आ रही है वो यह कि आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वालों का पढ़ा लिखा होना ।  चाहे वो बांग्लादेश की आतंकीवादी वारदात हो या फिर पेरिस में भीड़ पर आतंकवादी हमला । इन हमलावरों की प्रोफाइल देखने पर आतंकवाद को लेकर चिंता बढ़ जाती है । पहले तो कम पढ़े लिखे लोगों को आतंकवादी संगठन अपना शिकार बनाते थे । उसको धर्म की आड़ में जन्नत और हूर का ख्वाब दिखाकर और पैसों का लालच आदि देकर आतंकवाद की दुनिया में दाखिला दिलवाया जाता था । अनपढ़ों और जाहिलों को धर्म का डर दिखाकर बरगलाया जा सकता है । आश्चर्य तब होता है जब एमबीएम और इंजीनियरिंग के छात्र भी आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं । रमजान के पाक महीने में बांग्लादेश, पेरिस और मक्का समेत कई जगहों पर आतंकवादी वारदातें हुईं । ढाका पुलिस के मुताबिक बम धमाके के मुजरिम शहर के सबसे अच्छे विश्वविद्यालय में पढ़नेवाले छात्र थे । पूरी दुनिया में इस बात पर मंथन हो रहा है कि इस्लाम को मानने पढ़े लिके युवकों का रैडिकलाइजेशन कैसे संभव हो पा रहा है ।

अभी हाल ही में भारतीय मूल के डैनिश लेखक ताबिश खैर की नई किताब आई है जिहादी जेन । ताबिश खैर इन दिनों डेनमार्क के एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और अपने लेखन से उन्होंने पूरी दुनिया में एक मुकाम हासिल किया है । ताबिश खैर ने अपना लंबा वक्त भारत में बिताया । बिहार के गया के रहनेवाले ताबिश खैर जब पत्रकारिता कर रहे थे उनके पिता, जो शहर के मशहूर डॉक्टर थे, के क्लीनिक पर कट्टरपंथियों ने ताबिश के लेखन से खफा होकर हमला कर दिया था । बावजूद इसके ताबिश खैर ने तर्कवादी लेखन नहीं छोड़ा और दो हजार चौदह में प्रकाशित उनकी किताब- हाउ टू फाइट इस्लामिस्ट टेरर फ्रॉम द मिशनरी पोजिशन- की विश्वव्यापी चर्चा हुई । जिहादी जेन भी औपन्यासिक शैली में लिखी गई किताब है जिसमें वैचारिकी भी है और पढ़े लिखे मुसलमानों की सोच का सामाजिक विश्लेषण भी है । जिहादी जेन उस शक्स का निकनेम है जिसने दो हजार ग्यारह में स्वीडिश कार्टूनिस्ट पर जानलेवा हमला किया था जिसने पैगंबर मोहम्मद साहब का कार्टून बनाया था ।
जिहादी जेन में ताबिश खैर ने ग्रेट ब्रिटेन के यॉर्कशर में रहनेवाली दो मुस्लिम दोस्तों और उसके कट्टरपंथ की ओर प्रवृत्त होने की कहानी तो कही ही है, उनके कट्टरपंथी होने की वजहों का विश्लेषण भी किया है । यॉर्कशर में रहनेवाली दो दोस्त जमीला और अमीना अलग-अलग पारिवारिक पृष्टिभूमि से आती हैं । दोनों की अपनी अलग लाइफस्टाइल है । जमीला एक परंपरागत मुस्लिम परिवार से आनेवाली लड़की है जो अपने पिता के साथ नियमित रूप से मस्जिद जाती है, वक्त पर नमाज पढ़ती है, आधुनिक देश और परिवेश में रहने के बावजूद बुर्का पहनती है । जमीला को इस बात का फख्र भी है कि वो अपने भाइयों से ज्यादा इस्लाम को जानती समझती है । भारतीय मूल की उसकी दोस्त अमीना अपने ख्यालों से लेकर अपनी वेशभूषा तक में खालिस ब्रिटिश है । वो सिगरेट पीती है, शॉर्ट स्कर्ट और टाइट जीन्स पहनती है और बिंदास है । उसका अपने ब्यायफ्रेंड से ब्रेकअप भी होचा है । अमीना के माता-पिता के बीच तलाक भी हो चुका है । दोनों दोस्तों की पारिवारिक पृष्ठभूमि तो अलग है लेकिन एक बिंदु पर आकर दोनों मिलती हैं वो है उनका इस्लामिक कट्टरपंथ की ओर आकर्षण । हम गहराई से ताबिश खैर की इस किताब पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बिल्कुल अलग पारिवारिक पृष्ठभूमि से आनेवाली इन दो मुस्लिम लड़कियों का रैडिकलाइजेशन बिल्कुल अलग अलग वजहों से होता है जो कि व्यक्तिगत भी हैं ,सामाजिक भी और धार्मिक भी, रूढियों से नाराजगी को लेकर विद्रोह भी । इन दो वजहों को पढ़ने के बाद एक बात जेहन में आती है कि कुछ पढ़े लिखे मुसलमान युवकों और युवतियों के कट्टरपंथ की ओर बढ़ने की कई वजहें हो सकती हैं – धर्म और समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी मानसिक यातना, महिलाओं को सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह देखा जाना, इस्लाम की गलत व्याख्या और कुरान और हदीस की आड़ में बरगलाने की कोशिश । जिस तरह से अरब देशों में महिलाओं की स्थिति है उसको देखकर समझा जा सकता है । दो हजार तेरह में प्रकाशित शीरीन अल फकी की किताब- सेक्स एंड सिटडल, इंटीमेट लाइफ इन अ चेंजिंग अरब वर्ल्ड को पढकर भी ये बात समझ आती है । जब अरब की सड़कें क्रांति की गवाह बन रही थीं, जब मिस्त्र से लेकर ट्यूनिशिया में विद्रोह हो रहा था तो शीरीन वहां की महिलाओं की स्थिति और यौनिकता पर शोध कर रही थीं ।
इस किताब में ताबिश खैर ने परोक्ष रूप से ये भी बताने की कोशिश की है कि किस तरह से इस समस्या के लिए वो लोग भी जिम्मेदार हैं जो मानते हैं कि इस्लाम की बुनियाद पर बने आतंकवादी संगठनों के बारे में पश्चिमी देश भ्रम फैला कर पूरे धर्म को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं । ताबिश खैर ये सवाल भी उठाते हैं कि किल तरह से इस्लाम की परंपराओं की आड़ में मानवता को लहूलुहान किया जाता है । ताबिश खैर के मुताबिक जबतक कट्टरपंथ की ओर झुकाव रखनेवाली महिलाओं को इसका अहसास होगा तबतक बहुत देर हो चुकी होगी । अपने इस नतीजे को जमीला और अमीना के मार्फत कहते चलते हैं ।
अपनी पारिवारिक स्थितियों से उबकर कट्टर इस्लाम की ओर झुकाव रखनेवाली अमीना और जमीला सोशल नेटवर्किंग साइट्स और यूट्यूब पर कट्टरपंथी भाषणों को सुनने लगती हैं । वहां वो फेसबुक और ट्वीटर पर उन साइट्स पर जाने लगती हैं जो युवाओं को धर्म के नाम पर बरगलाते हैं । उस तरह के लिटरेचर को पढ़कर आधुनिक विचारों वाली अमीना में बदलाव देखने को मिलने लगता है और उसकी वेशभूषा जीन्स स्कर्ट से बदलकर बुर्के तक पहुंच जाती है । इतना ही नहीं इंटरनेट पर उनका संपर्क एक धर्मगुरू टाइप शख्स से होता है जो अपनी लच्छेदार बातों से उन दोनों का ब्रेनवॉश करता है । वो इन दोनों महिलाओं को ये बताने में कामयाब हो जाता है कि जिहाद में महिलाओं की बड़ी भूमिका है । इसके बाद वो एक वृहत्तर कॉज और अपने धर्म की रक्षा के लिए इंगलैंड में अपना घर-बार, परिवार को छोड़कर सीरिया के लिए निकल पड़ती हैं । अमीना और जमीला के इस फैसले का लक्ष्य एक, लेकिन आधार अलग । अमीना के लिए विचारधारा आधार बनती है तो जमीला के लिए ये एक तरह की आजादी थी क्योंकि उसकी मां उसकी मर्जीके बगैर शादी करवाना चाहती थी । अब इस तरह की बातें ही ताबिश खैर के उस उपन्यास को किताबों की भीड़ से अलग कर देती है ।
सीरिया पहुंचने के बाद दोनों उसी धर्मउपदेशक के अनाथालय में काम करने लगती हैं । शुरुआत में तो उनको लगता है कि उनका फैसला बिल्कुल सही था लेकिन धीरे-धीरे असलियत खुलने लगती है । अमीना शादी कर लेती है उधर जमीला का अनाथालय की हालत को देखकर मोहभंग होने लगता है । उस अनाथालय में छोटी छोटी लड़कियों को आत्मघाती दस्ता में शामिल होने के लिए तैयार किया जाता है । इसी क्रम में जब एक छोटी सी लड़की हाल्दी ये कहती है कि कुरान तो खुद को मारने का नाजायज कहता है तो उसको बुरी तरह से यातनाएं दी जाती हैं । धर्म के नाम पर ये सब होता देख जमीला के अंदर कुछ दरकने लगता है । उधर अमीना जब ये देखती है कि एक दस साल के बच्चे सबाह को यजीदी होने पर गला रेत कर हत्या कर दी जाती है तो उसके मन के कोने अंतरे में भी मोहभंग की चिंगारी सुलगने लगती है । अमीना तय करती है कि वो कुर्दिश हमलावरों के खिलाफ आत्मघाती दस्ता में शामिल होगी और जब उसका पति इसके लिए तैयार होता है तो वो आखिरी मौके पर वो खुद उड़ाती है और उस धमाके में इसका पति हसन और उसके साथी मारे जाते हैं । ये अमीना का इंतकाम था सबाह की कत्ल का । ये पूरी किताब धार्मिक उन्माद की कलई खोलते चलती है और मुस्लिम युवाओं के रैडिकलाइजेशन की वजहों की पड़ताल भी करती है इस लिहाज से ये किताब इस वक्त बेहद मौजूं है ।

Sunday, September 11, 2016

विवाद के भंवर में साहित्य

साहित्यक पत्रिका सामयिक सरस्वती के ताजा अंक में कथाकार और पेंटर प्रभु जोशी और कहानीकार भालचंद्र जोशी के बीच का एक विवाद प्रकाशित हुआ है । इस विवाद को लेकर संपादक की एक टिप्पणी है- साहित्य में विवाद का पुराना रिश्ता है । समय समय पर साहित्य की दुनिया में लेखकों के लिखे पर विवाद होता रहते हैं । कुछ वर्ष पुरानी बात है जब मैत्रेयी पुष्पा को लेकर ये हवा गरम रहती थी कि उनके लिए राजेन्द्र यादव और उनकी एक पूरी टीम लिखती है । फिर ये विवाद महुआ माजी को लेकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा का विषय बना । ...तो कथाकार जयश्री रॉय के लेखन पर भी इस विवाद के छींटे आयी। इधर ताजा विवाद प्रभु जोशी के ऑडियो ने फैलाया है, जिसमें वो कथाकार भालचंद्र जोशी पर अपनी बात कहते हैं । हमने उनके ऑडियो को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने की कोशिश की है । साथ ही इस विषय पर भालचंद्र जोशी का मत भी प्रकाशित कर रहे हैं । हमारा मानना है कि साहित्य में इस तरह के विवादों से साहित्य को ही नुकसान होता है । इस विवाद पर पाठकों की प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है ।जोशी बनाम जोशी विवाद पर थोड़ा ठहरकर आते हैं लेकिन पहले सामयिक सरस्वती के संपादक की टिप्पणी पर विवात कर लेते हैं । संपादक का मानना है कि इस तरह के विवादों से साहित्य का नुकसान होता है लेकिन अगली ही पंक्ति में वो पाठकों से प्रतिक्रिया मांग रहे हैं । संभव है वो अपने मत पर पाठकों की स्वीकृति चाहते हों लेकिन अगर संपादक का मानना है कि इस तरह के विवादों से साहित्य का नुकसान होता है तो उसको अपनी प्रतिष्ठित पत्रिका में इतना जगह देना क्या उचित है । यह तो वैसी ही प्रवृत्ति है जो इन दिनों न्यूज चैनलों में खासतौर पर दिखाई देने लगी है । बहुधा विवादित वीडियो पर ये लिखा होता है कि – चैनल इस वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है लेकिन उस वीडियो को दिनभर बार-बार दिखाया जाता है । अगर विवाद साहित्य के लिए नुकसानदायक हैं तो उसको हवा देने की क्या आवश्यकता और अगर वीडियो के प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं कर सकते हैं तो उसको लगातार दिखाने की क्या मजबूरी ? इसके पीछे की वजह क्या है इस बारे में फैसला लेने का अधिकार पाठकों के विवेक पर छोड़ देना चाहिए ।
अब आते हैं जोशी बनाम जोशी विवाद पर । दरअसल पिछले दिनों इंदौर में एक साहित्यक जलसे में कथाकार और चित्रकार प्रभु जोशी के दिए भाषण का एक ऑडियो साहित्यप्रेमियों के बीच व्हाट्सएप पर जमकर साझा किया गया । इस ऑडियो में प्रभु जोशी अपनी दमदार आवाज में भालचंद्र जोशी के लेखन को लेकर आक्रामक नजर आ रहे थे । लेकिन ऑडियो और उसकी सत्यता की प्रामाणिकता हमेशा से संदिग्ध रही है लिहाजा साहित्य जगत में आपसी बातचीत में तो प्रभु जोशी के इस कथित ऑडियो को लेकर खूब चर्चा हुई लेकिन कहीं इसके बारे में ना तो लिखा गया और ना ही छापा गया । अब सामयिक सरस्वती ने प्रभु जोशी के उस ऑडियो का लिप्यांतरण कर छाप दिया है और साथ में भालचंद्र जोशी की लंबी सफाई भी छापी गई है । प्रभु जोशी ने अपने भाषण में दावा किया है कि जबतक भालचंद्र जोशी उनके साथ रहे तबतक उनकी कहानियों का पुनर्लेखन करते रहे । अपने दावों के समर्थन में वो अपने बेटे का उदाहरण देते हुए कहते हैं - मेरा बेटा कभी-कभी फोन करता और बाइचांस ये ( भालचंद्र जोशी) होते तो उठा लेता था तो वो चिढ़ता था कि ये आदमी..क्या फिर आपसे कहानी लिखवाने आ गया है । आप अपनी भाषा का क्लोन पैदा करना चाहते हो क्या पापा ? जिस दिन आप लिखना शुरू करोगे तोलोग समझेंगे कि भालचंद्र जोशी की नकल कर रहा है ।प्रभु जोशी ने अपने भाषण में ये साबित करने के लिए कि वो भालचंद्र की कहानियों का पुनर्लेखन करते हैं, अपनी पत्नी से हुई बातचीत से लेकर बेटे को लिखे पत्रों का हवाला देते हैं । वो कई साहित्यकारों से हुई बातचीत का हवाला भी देते हैं और भालचंद्र को मूर्ख साबित करने की कोशिश करते हुए ये सलाह भी देते हैं कि वो खोखला जीवन जीना बंद करे ।
इसके अलावा प्रभु जोशी ने भालचंद्र पर किए एहसानों की सूची भी गिनाई । लेकिन बात सिर्फ इतनी सी प्रतीत होती है कि प्रभु जोशी को ये अब लगता है कि उन्होंने भालचंद्र जोशी के लिए कहानियां लिखकर गलती कर दी । भालचंद्र उनसे ज्यादा मशहूर हो गया । लेकिन प्रभु जोशी ने जिस तरह से दूसरे साहित्यकारों का नाम लिया है उससे उनकी भी कुंठा उजागर होती है । जैसे एक जगह वो आलोचक रोहिणी अग्रवाल को रोहिणी-वोहिणी अग्रवाल कहते हैं । क्या इस तरह से साथी रचनाकारों का नाम लेनास वो भी सार्वजनिक मंच पर, मर्यादित व्यवहार है?  इससे पता चलता है कि प्रभु जोशी के अंदर भालचंद्र को लेकर कोई ग्रंथि है जिसकी वजह से वो ऐसी हल्की और अमर्यादित बातें करते हैं । अगर कुछ देर के लिए ये मान भी लिया जाए कि प्रभु जोशी उनकी कहानियों का क्लाइमेक्स बदल देते हैं या फिर कुछ बदलाव का सुझाव देते हैं तो इसमें गलत क्या है । हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने जाने कितने कहानीकारों की कहानियों का अंत बदलवाया होगा, कितनी कहानियों के पात्रों के चरित्र को बदलवाया होगा तो क्या ये मान लिया जाए कि सबके लिए यादव जी ही लिखते थे । साथी रचनाकार एक दूसरे से अपनी रचनाएँ साझा करते हैं और उसपर सुझाव आदि भी मांगते और उसपर अमल करते हैं । इसमें बुराई क्या है ।
भालचंद्र जोशी ने अपनी सफाई में भी ये माना है कि प्रभु जोशी ने उनकी कुछ कहानियों में बदलाव के सुझाव दिए  थे जो उन्होंने मान लिए थे । अपनी सफाई में भालचंद्र ने भी मर्यादा की सारी हदें पार कर दी हैं । उनकी टिप्पणियों पर गौर करें- शहर के इस असफल और भारत भवन के पेंटरों की भाषा में प्राथमिक स्कूल के बच्चोंनुमा पेंटिंग करनेवाले पेंटर और एक चुके हुए लेखक दोनों ने अपनेसभी क्षेत्रों की असफलता और कुंठा की भड़ास मुझ पर निकाली और इस कुंठा, भड़ास और ईर्ष्या से लिपटी भाषा से निर्मित खुद की स्तरहीन छवि से उपस्थित श्रोताओं को हतप्रभ कर दिया।इसके अलावा अपने लेख में भालचंद्र जोशी ने प्रभु जोशी पर अंधविश्वासी होने का आरोप भी लगाया । उन्होंने कई प्रसंगों को उद्धृत कर प्रभु जोशी के दोहरे चरित्र को उजागर करने का उपक्रम भी किया है । परंतु लगभग हप विवाद की तरह इस विवाद की नींव भी पांच लाख रुपय़ों को लेकर पड़ी प्रतीत होती है जब प्रभु जोशी के लिए भालचंद्र जोशी ने जुटाए थे । खैर ये व्यक्तिगत मसले हैं और उनको साहित्यक विवाद की आड़ देना उचित नहीं है । दरअसल इन दिनों हिंदी में साहित्यक विवादों की जगह व्यक्तिगत राग-द्वेष ने ले ली है ।

जोशी बनाम जोशी विवाद के अलावा जिस तरह से कवयित्री गगन गिल को लेकर फेसबुक पर विवाद उठा वो भी बिल्कुल अवांछित था । जिस तरह से गगन गिल के विवाद में फेसबुक पर लेखक बंटे नजर आए वो भी चिंतनीय है । गगन गिल विवादों से दूर रहती हैं और निर्मल वर्मा की मृत्यु के बाद साहित्यक समारोहों आदि में भी कम ही नजर आती हैं । उन्होंने खुद को समेट लिया है तो ऐसे माहौल में उनपर कीचड़ उछालना गलत है । जिस तरह से कुछ लेखकों ने अपनी साथी लेखिकाओं को लेकर टिप्पणियां की वो उनकी मानसिकता को उघाड़ने वाली हैं । हमारा तो मानना है कि लेखिकाओं पर टिप्पणी करनेवाले लेखक अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए । दरअसल हिंदी साहित्य में इन दिनों विवादों का स्तर बहुत गिर गया है । हिंदी के पाठकों को याद होगा कि मई दो हजार एक में साहित्यक पत्रिका वर्तमान साहित्य में उपेन्द्र कुमार की एक कहानी- झूठ कीमूठ छपी थी । उस कहानी में तलवार को रूपक के रूप में उठाकर महानगर दिल्ली के बजबजाते हुए समकालीन साहित्यक परिदृश्य को उभारने की कोशिश की गई थी । उस व्यंग्यात्मक रचना की सफलता इस बात में थी कि वो कहानी सपाटे से हिंदी साहित्यकारों के चरित्र, व्यवहार और लेखन को गहराईमें उजागर ही नहीं करती, साहित्य की राजनीति से भी परिचित कराती हुई सीधे मर्म पर चोट करती है । उस वक्त हिंदी के कुछ साहित्यकारों ने तलवार के प्रतीक को जातीय दंभ से जोड़कर देखा था लेकिन उसपर हुई चर्चा में एक साहित्यक मर्यादा कायम रही थी । कई अखबारों ने उस कहानी पर पूरे पृष्ठ की परिचर्चा करवाई थी परंतु कहीं भी लक्ष्मण रेखा नहॆं लांघी गई थी । कुछ ऐसा ही हुआ था जब राजेन्द्र यादव ने होना सोना लिखा था । जमकर बहसे हुईं, तर्क वितर्क हुए लेकिन तब भी कुतर्क को कोई स्थान नहीं मिला था । जबकि अब तो विवादों में कुतर्क ही केंद्र में है और बाकी सबकुछ परिधि के बाहर ।   

Saturday, September 10, 2016

पुरस्कारों का खुला खेल

फिल्म नास्तिक में कवि प्रदीप का लिखा एक गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था । उस गीत का मुखड़ा है– देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान/ कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान/सूरज ना बदला / चांद ना बदला /ना बदला रे आसमान/कितना बदल गया इंसान/कितना बदल गया इंसान/ आया समय बड़ा बेढ़ंगा /आज आदमी बना लफंगा । गाना तो ये फिल्म की थीम के हिसाब से फिट बैठता था लेकिन अगर इस गाने को आज के साहित्यक परिदृश्य, खासकर साहित्यक पुरस्कारों के संदर्भ में देखें तो वहां भी सटीक प्रतीत होता है । गीत के बोल में चंद शब्दों के हेर फेर से पूरा का पूरा हिंदी का साहित्यक परिदृश्य जीवंत हो सकता है । संसार की जगह साहित्य संसार कर दें और इंसान की जगह लेखक कर दें तो स्थिति बिल्कुल साफ हो जाएगी । हिंदी में पुरस्कारों को लेकर जो हालात बन रहे हैं वो बेहद चिंताजनक हैं । अब से कुछ समय पहले तक साहित्यक पुरस्कारों को लेकर सेटिंग गेटिंग का खेल पर्दे के पीछे चलता था जिसके बारे में चंद लोगों को ही पता चल पाता था या फिर साहित्यक बैठकों में उसपर चर्चा होकर खत्म हो जाती थी । पिछले दिनों इस बात को लेकर खूब चर्चा रही थी कि किस तरह से एक उपन्यासकार ने खुद के लिए पुरस्कार को लेकर व्यूहरचना की थी  और उसमें वो सफल भी रहे थे । दबी जुबान में इसकी चर्चा रही थी लेकिन खुलकर बात सामने नहीं आ पाई थी । वो बात भी इस वजह से खुल गई थी कि पुरस्कार के आयोजकों ने पहले किसी दूसरे उपन्यासकार को पुरस्कार देने की बात कह डाली थी लेकिन बाद में बदली हुई परिस्थिति में किसी अन्य को वो पुरस्कार मिला । आहत उपन्यासकार ने बात खोल दी थी । इसी तरह से साहित्य अकादमी के पुरस्कार को लेकर भी तमाम तरह के दंद-फंद होते रहते हैं लेकिन वो कभी इतने ओवियस नहीं होते कि पाठकों तक को ये पता लग जाए कि ये होनेवाला है या फिर इस वजह से ये हुआ । अब तो खुला खेल फरूखाबादी हो गया है और साफ-साफ दिखने लगा है कि किस वजह से अमुक लेखक को पुरस्कार मिला है । इस खेल के खुलने में फेसबुक का बड़ा योगदान है । फेसबुक पर प्रसिद्धि की चाहत लेखकों को आयोजनों आदि की तस्वीर डालने के लिए दबाव बनाती है । आयोजनों की तस्वीरों और बाद में पुरस्कारों की सूची पर नजर डालेंगे तो एक सूत्र दिखाई देता है । उस सूत्र को पकड़ते ही सारा खेल खुल जाता है । और हां ये सूत्र कोई गणित के कठिन सूत्र की तरह नहीं होता है यहां बहुत आसानी से इसको हल किया जा सकता है । किसी पुरस्कार या लेखक का नाम लेकर मैं उनकी साख पर सवाल खड़ा करना नहीं चाहता हूं लेकिन इस बात के पर्याप्त संकेत करना चाहता हूं कि साहित्य में इस तरह की बढ़ती प्रवृत्ति से उसके सामने साख का संकट बड़ा हो सकता है ।

अब अगर पुरस्कारों की सूची देखी जाए तो ये बात भी साफ तौर पर नजर आती है कि कुछ पुरस्कार तो उसको देनेवाले अपनी साख मजबूत करने के लिए देते हैं । कुछ महीनों पहले हिंदी के वरिष्ठ और बेहद संजीदा कथाकार ह्रषिकेश सुलभ ने एक बातीचत में कहा था एक वक्त जिन साहित्यकारों की साहित्य में दुंदुभि बजती थी उनका आज कोई नामलेवा नहीं है । उनका मानना था कि समय सबसे बड़ा निकष है और पाठक अच्छे बुरे को छांट लेता है । यहां विनम्रतापूर्वक सुलभ जी को याद दिलाना चाहता हूं कि इन दिनों लेखकों को समय रूपी निकष की परवाह नहीं है बल्कि वो पुरस्कारों को इसकी कसौटी मानकर चल रहे हैं । पुरस्कारों को लेकर ह्रषीकेश सुलभ का मानना है कि अगर मंशा लेखन को सम्मानित करने का है तो बहुत अच्छा है लेकिन अगर मंशा पुरस्कार के बहाने खुद यानि आयोजकों का स्वीकृत होना है तो ये सम्मान के साथ छल है । ये छल इन दिनों साफ तौर पर कई पुरस्कारों में दिखाई देता है । छोटे-छोटे पुरस्कार बड़े-बड़े लेखकों को उनके उन योगदान पर दिया जा रहा है जो अपेक्षाकृत लेखकीय अवदान से कमजोर हैं । हाल के दिनों में पुरस्कृत लेखकों और उनको पुरस्कृत किए जाने की विधा या वजह पर नजर डालें तो तो इसको साफ तौर पर लक्षित किया जा सकता है । साहित्यक पत्रकारिता के लिए उनको पुरस्कृत किया जा रहा होता है जो पिछले कई दशकों से किसी साहित्यक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं लेकिन उसी श्रेणी में कई बार ऐसे लेखकों को पुरस्कृत कर दिया जाता है जो जुम्मा जुम्मा चार दिनों से साहित्यक पत्रकारिता में डग भरना सीख रहे हैं । साफ है कि पुरस्कार आयोजकों की मनमर्जी से या फिर किसी अन्य वजह से तय किए जाते हैं । जाहिर है कि ये वजह साहित्येतर ही होते हैं ।
हिंदी में एक दौर में जिस तरह से लघु पत्रिकाएं निकलने लगी थीं और एक दो अंक निकालकर संपादक बनने का उपक्रम चला था उसी तरह से अब पुरस्कारों के कारोबारी सक्रिय हो गए हैं । उनकी सक्रियता की कई वजहें हैं और उन वजहों की पड़ताल की जानी आवश्यक है । इन वजहों को लेकर साहित्य में गंभीर और देशव्यापी बहस भी होनी चाहिए । पुरस्कार देकर अपने को प्रासंगिक बनाने के इस उपक्रम में लेखकों का लाभ नहीं हो रहा है बल्कि कई बार तो नए लेखकों का दिमाग इतना खराब हो जाता है कि वो खुद को टॉलस्टाय समझने लगता है । नतीजा यह होता है कि उसका रचनात्मकता खत्म होने लगती है और एक संभावना की असमय मौत हो जाती है । यह स्थिति हिंदी साहित्य के लिए बेहद खराब है । हिंदी और साहित्य से प्यार करनेवालों को इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए फौरम कदम उठाने की आवश्यकता है । पुरस्कारों के इस लेन-देन के कारोबार पर अगर हिंदी साहित्य में जल्द रोक नहीं लगाई गई तो फिर वो दिन दूर नहीं जब बड़े से बड़े पुरस्कार को लेकर साहित्य जगत में कोई स्पंदन नहीं होगा ।  

Thursday, September 8, 2016

Krishna Sobti did it again!

Krishna Sobti, the octogenarian Hindi Novelist, is known for her bold writings. She is still active at the age of 91, and it is good to see that she continues to write and take part in Seminars and other activities of her choice. Many literature lovers call her the living legend of Hindi literature. She May be a living legend but she also loves to be in controversies. Sometimes through her actions and sometimes through her statements.
Latest is her dictate to a young writer, Blogger Dr Kaynat Kazi. Dr Kazi has written a well-researched book on Krishna Sobti. Dr Kazi was very happy that she did her first book on one of the greatest Hindi writers. The title of the book, Krishna Sobti ka sahitya aur Samaj, itself suggests what Dr Kazi took into account while writing the book. Till the book was published there was no controversy. It seems Krishna Sobti was happy about this book.
Now the real story unfolds. Dr Kazi planned the book launch at a café in Delhi. The Young lady was very happy because for her it’s like a dream come true. But she didn’t have any idea what is going to happen. She sent the invitation card of the book launch to Krishna Sobti and after receiving the book launch card she erupted like a volcano. The book was to be launched by Dr Sacchidanand Joshi, Member Secretary, Indira Gandhi National Centre for the Arts, Vijay Kranti, Editor DD. She called up Dr Kaynat kazi and started shouting at her. How dare you plan to get the book launched by the Sanghis.
Krishnaji threatened the young author with dire consequences. It is also being said that Krishnaji told Dr Kazi that if she would go ahead with the book launch with Dr Joshi and Vijay Kranti then she should be prepared to face a court case. She also allegedly threatened with a court case if her name was used anywhere. Kaynat Kazi was intimidated and the book launch was cancelled. Krishna Sobti is known for filing court cases. She slapped a court case in 1984 and asked for a damage of Rs 1.5 lakh on Amrita Pritam when the latter came with abook  called- Hardatt ka Zindginama.

At that point of time Krishna Sobti slapped a case of plagiarism on Pritam because she thought that the title was inspired by her acclaimed novel, Zindaginama. The case stretched over a quarter of century. The case lingered over twenty five years and was decided in favour of Amrita Pritam, the Jananpith award winner writer. After losing the case Krishna Sobti tried to place a brave face by saying that the fight was for principle. But still she thinks that Zindaginama was her ‘extensive intellectual property’.
 It is irony that Amrita Pritam died before the case was decided. But here also question arises as to how any writer can claim ‘extensive intellectual property’ rights on a word which is used very often and there are dozens of books written in Persian with this title. One of the Guru Gobind Singh’s disciples wrote his biography by this name Zindaginama much before the publication of Sobti’s novel. It seems that Dr Kaynat Kazi feared to take on Sobti and cancelled the book launch programme.
 Now we come to the point of Krishna Sobtiji’s objection on certain names and calling them Sanghis. If  Dr Joshi and Vijay Kranti are Sanghis, so they don’t have the right to talk on their language’s big writer like Krishna Sobti. If Krishna Sobti hates the Sanghis so much then she should write on the cover of all her books that those who believe in RSS ideology should not buy and read it. But none of her books ever mentioned anything like this.
 Krishna Sobti attended a seminar in Delhi around Bihar assembly elections when the so called ‘award wapsi’ movement was on its peak. The organizers of that seminar are now rubbing shoulders with the Bihar Chief Minister Nitish Kumar and making ground for him for the meeting with intellectuals across the country. It is implied that Krisha Sobti is also part of that move.
 Now when you are aligning with a certain ideology or ganging up with those who are against an ideology then it’s right. At the same time, a young writer invited some persons with certain ideology you are enraged. Isn’t it double standard? There is a very famous line of a Salman movie- Tum karo toh rasleela aur ham karen to character dheela. Isn’t the entire episode is like that?
 Now come to the untouchability part of this story. If you don’t share your ideas or you don’t argue with other ideologies then loss is yours. By doing this you create your own world and move around that. This world without any other ideology is like a fool’s paradise. Our leftist friends very often live in this type of paradise. It is dangerous for any society where ideological untouchabilty persists. This scenario stops the development of argumentative citizens.
 This is the irony of this country that the propagators of leftist ideology never engaged in any dialogue with any other ideology. One can say that they are afraid of the shortcomings of Marxism and did not want to publically accept this. They want the romanticism of the Marxism to be continued so that people could be made fool in the name of ideology. Krishna Sobti intimidated a young writer in the name of ideology. It seems that she thinks that nobody will raise the question than she is grossly mistaken. Questions will be raised on her fascist behaviour in the coming days.



Monday, September 5, 2016

पैंतालीस साल बाद इंसाफ

आतंकवाद और कठमुल्लापन की मार झेल रहे बांग्लादेश की शेख हसीना की अगुवाई वाली सरकार इनसे लोहा लेती दिखाई दे रही है । आतंक के खिलाफ बांग्लादेश ने तो जंग छेड़ ही रखी है । अपने देश के अंदर इस्लामी कठमुल्लापन और उससे उपजने वाले विद्रोह, जिसका रास्ता राष्ट्र के खिलाफ जाता है, को उसकी जगह दिखाने के लिए भी सरकार कटिबद्ध दिखाई देती है । एक तरफ वो अपने देश के अंदर कट्टरपंथी ताकतों को अदालत से सुनाई गई सजा की तामील करवा रही है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान को कूटनीति के माध्यम से भी बांग्लादेश की अंदरुनी गतिविधियों से से दूर रहने का कड़ा संदेश दे रही है । उन्नीस सौ इकहत्तर के मुक्ति संग्राम के दौरान के अपराधियों को सजा दिलाने में शेख हसीना की सरकार ने कड़ा रुख अख्तियार किया हुआ है ।अभी हाल ही में बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन जमाते इस्लामी के नेता और वहां के प्रमुख मीडिया संस्थान के मालिक मीर कासिम अली को बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान किए गए युद्ध अपराध की वजह से फांसी दी गई । मीर कासिम अली बांग्लादेश के छठे युद्ध अपराधी हैं जिनको फांसी की सजा दी गई है । दरअसल जब कुछ दिनों पहले मीर कासिम ने राष्ट्रपति के पास क्षमा याचना की अर्जी देने से इंकार कर दिया था तब से इस बात के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन बांग्लादेश में मीर कासिम के प्रभाव, दबदबे और अकूत संपत्ति के मद्देनजर कुछ लोगों को लग रहा था कि शायद उनको फांसी नहीं दी जाए । बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के खिलाफ उसकी अर्जी को खारिज कर दिया था और उसके तीन दिन बाद मीर कासिम अली को फांसी पर लटका दिया गया । दरअसल अगर हम देखें तो मीर कासिम अली को फांसी पर लटकाने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना आवश्यक है क्योंकि बांग्लादेश के कट्टरपंथी मुसलमानों के बीच वो काफी लोकप्रिय था और इस्लामिक संगठनों को काफी पैसे दिया करता था । अपने अकूत संपत्ति के बल पर उसने कई कट्टरपंथी संगठनों को अपने कब्जे में कर रखा था ।
उन्नीस सौ इकहत्तर में जब बांग्लादेश अपनी मुक्ति के लिए ना सिर्फ छटपटा रहा था बल्कि उसके निर्दोष नागरिकों के खून से धरती लाल हो रही थी उस वक्त मीर कासिम पाकिस्तान समर्थक बदनाम संगठन अल बदर मिलिशिया की नुमाइंदगी कर रहा था । ये वही संगठन था जिसने बांग्लादेश के नागरिकों पर कहर बरपाने में पाकिस्तान की हर तरह से मदद की थी । मीर कासिम अल बद्र के यातना शिविर का इंचार्ज था जहां सैकड़ों बाग्लादेशी मुक्ति योद्धाओं को भयंकर यातनाएं दी गईं और उसके बाद उनको जान से मार दिया गया था । मीर कासिम को उस यातना शिविर में एक मासूम की जान लेने का आरोप साबित हो गया था । एक अनुमान के मुताबिक पाकिस्तानी सेना और उसके पिट्ठुओं ने उस दौर में करीब तीस लाख लोगों को मार डाला था ।  शेख हसीना ने वो दौर देखा था, उसके बाद अपने पिता की हत्या का दर्द भी झेला ।  संभव है कि उनके जेहन में 25 मार्च उन्नीस सौ इकहत्तर और उसके बाद की घटनाएं ताजा हों । 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी जनरल याह्या खां ने एलान कर दिया कि मुजीबुर्रहमान के साथ बातचीत टूट गई है । 25 मार्च को मुजीब ने अपने देशवासियों के नाम एक संदेश लिखा था- संभव है कि ये मेरा आखिरी संदेश हो लेकिन आज से बांग्लादेश आजाद है । मैं बांग्लादेश के हर नागरिक से अपील करता हूं कि वो जहां भी हों पाकिस्तानी सेना का मरते दम तक विरोध करें । तबकर इस काम पर ड़टे रहें जबतक कि पाकिस्तानी सेना का अंतिम सिपाही आजाद बांग्लादेश की धरती से खदेड़ ना दिया जाए । उसके बाद पाकिस्तानी सेना ने 25 और 26 मार्च की दरम्यानी रात को मुजीब को तो गिरफ्तार किया ही उसके बाद वहां पाकिस्तानी सेना ने करीब दो महीने तक नंगा नाच किया था । मानवाधिकार की तो धज्जियां उड़ी ही थीं लाखों महिलाओं के साथ रेप करने के बाद उनका कत्ल कर दिया । बांग्लादेश के हालात ऐसे रहे कि उस दौर के पाकिस्तानी पिट्ठुओं को सजा दिलवाने की पहल में काफी देर हुई । दो हजार दस में इन युद्ध अपराधियों के खिलाफ केस शुरू किया गया और अबतक छह लोगों को फांसी पर लटकाया जा चुका है ।

बांगलादेश में कट्टरपंथियों के बुलंद हौसलों को देखते हुए शेख हसीना सरकार का ये फैसला एक संदेश तो दे ही रहा है । मीर कासिम को फांसी पर लटकाए जाने के बाद जब पाकिस्तान ने दुख प्रकट करते हुए बयान जारी किया था- गलत तरीके से केस चलाकर विरोधियों की आवाज को दबाना लोकतंत्र की भावनाओं के खिलाफ है । कई अंतराष्ट्रीय संगठनों ने मीर कासिम के खिलाफ चलाए जा रहे केस पर आपत्ति जताई थी । पाकिस्तान के इस बयान को भी शेख हसीना की सरकार ने गंभीरता से लिया और बांग्लादेश में पाकिस्तान के उच्चायुक्त को विदेश मंत्रालय में तलब करके साफ कर दिया कि पाकिस्तान का बयान उनके घरेलू मामलों में दखल है और वो इस तरह की हरकतों से दूर रहे । ये दो घटनाएं ऐसी हैं जिससे ये साफ होता है कि शेख हसीना की सरकार राजनीतिक लाभ लोभ के चक्कर में पड़े इस्लामिक कट्टरपंथियों को उसकी सही जगह दिखा रही है । 

Sunday, September 4, 2016

'संतवाणी' के बहाने उठते सवाल ·

हमारे देश में आजादी के बाद से ऐसा माहौल बनाया गया कि अन्य भारतीय अंग्रेजीदां लोगों का षडयंत्र भी हो सकता है या फिर हिंदी के उन उत्साही पैरोकारों की पूरे देश पर हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर थोपने की जिद भी । हिंदी को लेकर अन्य भारतीय भाषाओं में जिस तरह का एक डर पैदा किया उसने हिंदी का बहुत नुकसान किया । भारतीय भाषाएं हिंदी के खिलाफ कड़ी हो गईं । यह अनायास नहीं है कि अपने गठन के पचास साल के बाद साहित्य अकादमी किसी हिंदी भाषी लेखक को अपना अध्यक्ष चुन सका । जिस तरह से हिंदी का खौफ पैदा किया गया उसने भाषाओं की एक दूसरे के प्रदेशों में आवाजाही को बाधित किया । मतलब ये कि भारतीय भाषाओं की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद और हिंदी की रचनाओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद उस पैमाने पर संभव नहीं हो पाया जितना होना चाहिए था । पिछले दिनों तमिल और हिंदी के अलावा कई अन्य भाषाओं के विद्वान डॉ पी जयरामन द्वारा अनुदित तमिल के भक्त कवियों की रचनाओं के दस खंड का विमोचन हुआ । तमिल से हिंदी में अनुवाद और उसको पाठकों की सुविधानुसार शब्दों के साथ पिरोना एक ऐतिहासिक काम था और इस काम ने हिंदी और तमिल के बीच की खाई को पाटने की कोशिश तो की ही दोनों भाषाओं के बीच एक मजबूत सेतु निर्माण का कार्य भी किया । दस खंडों के विमोचन के मौके पर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मृणाल पांडे ने डॉ जयरामन के इस कार्य के रामायण में राम के लंका जाने के लिए सेतु निमार्ण के प्रसंग से तुलना की और जयरामन जी को साहित्य का नल-नील बताया जिसकी तरह उन्होंने काम किया है ।यह अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि ये काम है ही इतना अहम । डॉ जयरामन पिछले करीब चार दशकों से अमेरिका में रह रहे हैं और वहां हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए सक्रिय हैं । नब्बे साल की उम्र में भी उनकी काम करने की ललक देखते ही बनती है । वाणी प्रकाशन से प्रकाशित संतवाणी के दस खंडों के विमोचन के मौके पर जयरामन जी ने इच्छा जताई कि ईश्वर अगर उनको सौ साल और दे दें तो तो वो तमिल साहित्य को प्रचुरता में हिंदी में अनुदित करना चाहते हैं ।
ये तो हुई हिंदी और तमिल के बीच के सेतु के काम की बात । अब जरा मौजूदा साहित्यक परिवेश पर नजर डालें, जिस तरह से यहां प्रवासी साहित्य का लेकर कोलाहल दिखाई देता है उसमें जयरामन जी का नाम कमोबेश नहीं लिया जाता है । जो लोग प्रवासी साहित्य के झंडाबरदार हैं उनको अपनी रचनाओं के अलावा अन्य कृतियां या काम दिखाई नहीं देते हैं । स्व के शोरगुल में वो दूसरे लेखकों को नजरअंदाज करते चलते हैं । कहना ना होगा कि प्रवासी साहित्य का ये परिदृश्य बेहद एकहरा और एक्सक्लूसिव है जबकि इसको प्रामाणिकता हासिल करने के लिए समावेशी होना पड़ेगा । अगर प्रवासी साहित्य को समकालीन भारतीय साहित्य में मजबूती से स्थापित करना है तो हमें विदेशों में रह रहे भारतीय भाषाओं के सभी लेखकों की रचनाओं को साथ लेकर चलना ही नहीं होगा उसपर विचार और मंथन भी करना होगा । इकहरे प्रचार प्रसार से फौरी तौर पर प्रसिद्धि तो मिल सकती है, मिल भी रही है , लेकिन उसका कोई स्थायीमहत्व नहीं होगा । शोरगुल की तरह वो वक्त के साथ दब जाएगा ।  


Saturday, September 3, 2016

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

ये हिंदी साहित्य का सौभाग्य है कि नब्बे साल के आसपास के और उसके पार के कई लेखक अभी भी अपनी रचनात्मक मौजूदगी और सक्रियता से पूरे परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । नामवर सिंह तो अब भी गोष्ठियों की शान हैं । रामदरश मिश्र लगातार अपने लेखन से समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं । इसी तरह से कृष्णा सोबती की हिंदी साहित्य में उपस्थिति आश्वस्तिकारक है । पिछले दिनों जब पूरे देश में असहिष्णुता के खिलाफ कुछ लेखकों ने आंदोलन और पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया था तो उसके बाद दिल्ली में देशभर के लेखकों का एक जमावड़ा भी हुआ था । कृष्णा सोबती जी उस जमावड़े में पहुंची थीं और अपनी बात उन्होंने रखी थी । उस वक्त देश में कथित तौर पर बढ़ रहे असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी अभियान को कृष्णा सोबती की भागीदारी से बल मिला होगा, ऐसा मेरा मानना है । उनकी भागीदारी का जनमानस पर कितना असर हुआ इस पर मतभिन्नता हो सकती है। लेखक के तौर पर उनको अपनी बात कहने का हक है और साहित्य से इतर राजनीति पर भी अपनी राय प्रकट करने का अधिकार । कृष्णा सोबती के इस अधिकार की उनके वैचारिक विरोधियों ने भी सम्मान किया । असहिष्णुता के खिलाफ अभियान का साथ देनेवाली कृष्णा सोबती से हिंदी जगत सहिष्णुता की अपेक्षा करता है । वाजिब भी है क्योंकि कहा जाता है कि जैसी आपकी अपेक्षा हो वैसा ही आपको आचरण करना चाहिए । लेकिन लगता है कि कृष्णा सोबती जी की अपेक्षाएं तो सहिष्णुता की है लेकिन वो अपने आचरण में वैसा दिखना नहीं चाहती हैं । अभी हाल के अपने एक आचरण से उन्होंने इस बात के संकेत दिए कि वो एक सीमा के बाद असहिष्णु हो जाती है । पूरा वाकया ये है कि युवा लेखिका, फोटग्राफर कायनात काजी के कृष्णा सोबती के लेखन पर किए गए शोध प्रबंध के प्रकाशन और विमोतन से जुड़ा । श्रमपूर्वक सालों तक शोध कार्य के बाद कायनात काजी की किताब – कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज प्रकाशित हुई । युवा लेखिका के लिए यह सपने के सच होने जैसा था । हिंदी की मौजूदा दौर की सबसे बड़ी लेखिकाओं में से एक कृष्णा सोबती पर प्रकाशित किताब को लेकर वो खासी उत्साहित थीं । पुस्तक प्रकाशित होने के बाद ज्यादातर लेखकों को उसको विमोचित करवाने और उस पर चर्चा आदि की इच्छा होती है । कायनात ने भी ऐसा ही एक सपना देख लिया लेकिन उसे नहीं पता था कि उसका ये सपना दिवास्वप्न साबित होगा । विमोचन के लिए उसने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी और दूरदर्शन के संपादक और तिब्बत के मसलों पर काफी दिनों से सक्रिय विजय क्रांति को बुला लिया । कार्ड आदि भी छप और बंट भी गए । उत्साह में उसने कार्ड कृष्णा सोबती जी को भेज दिया । अब यहीं से हिंदी की इस युवा लेखिका कायनात काजी के सपनों के दरकने की शुरुआत हो गई । विमोचन कार्यक्रम के कार्ड पर जोशी जी और विजयक्रांति का नाम देखकर वो आगबबूला हो गईं और कायनात को फौरन इस कार्यक्रम को रद्द करने का फरमान जारी कर दिया । वजह बेहद दिलचस्प । कृष्णा जी का मानना था कि चूंकि कार्यक्रम में सभी संघियों को बुला लिया गया है लिहाजा वो वहां अपने नाम का इस्तेमाल होने की इजाजत नहीं दे सकती । एक तरफ कृष्णा सोबती जैसी हिंदी साहित्य की कद्दावर लेखिका तो दूसरी तरफ एक नवोदित लेखिका कायनात काजी । बताया जा रहा है कि कृष्णा सोबती जी ने तो कायनात को धमकी दी कि अगर विमोचन का कार्यक्रम हुआ और उसमें उनके नाम का इस्तेमाल किया गया तो वो केस कर देंगी । कृष्णा जी के साहित्यक कद और प्रतिष्ठा के आगे कायनात काजी ने अपने सपनों को कुर्बान कर दिया । विमोचन का कार्यक्रम नहीं हुआ ।
कुछ दिनों पहले कृष्णा सोबती जी का एक इंटरव्यू छपा था जिसमें उन्होंने युवा लेखकों को लेकर उत्साह दिखाया था समकालीन युवा लेखन को लेकर आश्वस्त भी दिखाई दे रही थीं । उन्होंने किसी लेखक का नाम तो नहीं लिया था लेकिन युवा लेखकों को चेताते हुए उनको अपने लिखे की तारीफ की अपेक्षा से बचने की सलाह दी थी। उन्होंने युवा रचनाकारों को देश विदेश के लेखकों को पढ़ने की नसीहत भी दी थी और कहा था कि इससे उनकी सोच का दायरा बढ़ेगा । जब उनकी नसीहतों के मुताबिक एक युवा लेखिका ने कृष्णा जी की रचनाओं को पढ़कर, समझकर अपने सोच का दायरा बढ़ाने की कोशिश की तो उसका क्या हश्र हुआ ये पूरे हिंदी साहित्य के सामने है । ऐसी परिस्थितां साहित्य जगत में हर काल में मौजूद रही होंगी तभी तो कहा गया है – पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।
अब जरा हम कृष्णा सोबती की उस मानसिकता का विश्लेषण करते हैं जिसके तहत उन्होंने पुस्तक विमोचन के कार्ड को देखने के बाद कहा कि सभी संघियों को बुला लिया । चलिए अगर हम कृष्णा जी की बात मान भी लें कि सच्चिदानंद जोशी और विजयक्रांति संघी हैं तो क्या संघी होने से कोई भी शख्स अस्पृश्य हो जाता है । क्या वामपंथी या अन्य किसी विचारधारा को माननेवालों के लिए अपने से अलग विचारधारा के साथ विचार विनिमिय नहीं करना चाहिए । अगर कृष्णा जी को संघियों से और उनकी विचारधारा से इतना ही परहेज या घृणा है तो उनको अपनी किताबों के कवर पर लिखवा देना चाहिए कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े या उनकी विचारधारा को मानने वाले इस किताब को नहीं खरीदें । क्या कृष्णा जी ये साहस दिखा पाएंगी । अगर पूर्व प्रकाशित किताबों पर नहीं लिखा तो क्या शीघ्र प्रकाश्य अपनी आत्मकथात्मक कृति गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान तक के कवर पर यह लिखने का साहस दिखा पाएंगी । अगर हां तो उनके साहस को सलाम किया जाना चाहिए और कायनात काजी के विमोचन को टलवा देने के उनके फैसले को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए । अगर वो ऐसा करने का साहस नहीं दिखा पाती हैं तो फिर उनके इस दोहरे रवैये पर साहित्य जगत में व्यापक बहस होनी चाहिए । क्या ये एक प्रकार की साहित्यक असहिष्णुता और अस्पृस्यता नहीं है । कृष्णा जी हिंदी साहित्य की गौरव हैं और उनका लेखन हिंदी समाज कि थाती । उसपर चर्चा करने का हक व्यापक हिंदी समाज को है । मेरा तो मानना है कि किसी भी लेखक की कृति जब छपकर पाठकों के बीच पहुंच जाती है तो वो लेखक से ज्यादा पाठकों की हो जाती है, चाहे वो किसी भी विचारधारा, जाति या धर्म का क्यों ना हो । क्या पाठक की भी कोई अलग पहचान हो सकती है । क्या साहित्य में वर्ग विभाजन का कृष्णा जी का ये कदम उचित है । एक नवोदित लेखिका के साथ इस तरह का व्यवहार अगर साहित्य के शिखर पर बैठी लेखिका करेंगी तो साहित्यकारों की कैसी छवि बनेगी इसका सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ।
अब रही बात कायानात को केस करने की धमकी की तो कृष्णा जी ने तो अमृता प्रीतम पर उनकी कृति हरदत्त का जिंदगीनामा को लेकर केस कर ही दिया था । वो केस करीब पच्चीस साल तक चला था और फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया था । दरअसल अमृता प्रीतम की किताब हरदत्त का जिंदगीनामा, जब छपा तो कृष्णा जी को लगा कि ये शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ाया गया है और वो कोर्ट चली गईं । साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृष्णा सोबती और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजी गई अमृता प्रीतम के बीच इस साहित्यक विवाद की उस वक्त पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी । जब केस का फैसला आया तो अमृता प्रीतम की मौत हो गई थी । केस के फैसले के बाद कृष्णा सोबती ने बौद्धिक संपदा का तर्क देते हुए कहा था कि हार जीत से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के लिए संघर्ष करना था । अब उस वक्त भी कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को याद दिलाया था कि जिंदगीनामा का पहली बार प्रयोग उन्होंने नहीं किया था । कृष्णा सोबती के उपन्यास के पहले फारसी में लिखी दर्जनों किताबें इस शीर्षक के साथ मौजूद हैं । मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने तो उस वक्त भी कहा था कि श्रद्धेय गुरु गोविंद सिंह जी के एक शिष्य़ ने उनकी जीवनी भी जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी और ये किताब कृष्णा सोबती के उपन्यास के काफी पहले प्रकाशित हो चुकी थी । जिंदगीनामा को लेकर कैसी बौद्धिक संपदा का गुमान और उसको लेकर कैसा विवाद और केस मुकदमा । बावजूद इसके कृष्णा जी ने वो सब किया। ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्णा जी के इस कदम की जानकारी कायनात काजी को थी लिहाजा इस नवोदित लेखिका ने केस मुकदमों के पचड़े में पड़ने की बजाए कृष्णा जी के फरमान को मानने में ही अपनी भलाई समझी और पुस्तक विमोचन और उसपर चर्चा के कार्यक्रम को रद्द कर दिया । पुस्तक विमोचन का रद्द होना संभव है मामूली घटना लगे लेकिन इसकी अनुगूंज लंबे समय तक सुनाई देगी ।