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Saturday, March 6, 2021

हिंदू नवजागरण के अनुत्तरित प्रश्न


पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के सामने भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी चुनौती लेकर खड़ी है। कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्षरत दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव देश के अन्य राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव से थोड़ा अलग हटकर है। यहां बंगाल की संस्कृति और बंगाली अस्मिता भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बनते हैं। भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस लगातार वहां की संस्कृति की बात कर रही है। तृणमूल कांग्रेस खुद को बंगाल की संस्कृति का ध्वजवाहक बताते हुए चुनाव मैदान में है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कई नेता लेखकों, कलाकारों और फिल्म अभिनेताओं के संपर्क में हैं। उधर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी सोनार बांगला के नारे के अंतर्गत बंगाल की खोई हुई अस्मिता को वापस लाने की बात करते हुए लगातार बुद्धिजीवियों के संपर्क में हैं। जब ममता बनर्जी बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ पहली बार चुनाव लड़ रही थीं तब कोलकाता की सड़कों पर कई होर्डिंग लगे थे जिसमें महाश्वेता देवी समेत कई लेखकों कलाकारों के चित्र लगे थे और उसमें बांग्ला में लिखा था ‘परिवर्तन’। तब ये माना गया था कि इन होर्डिंग्स का मतदताओं पर असर पड़ा था। पश्चिम बंगाल में अब भी लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को गंभीरता से लिया जाता है और लोग उनका आदर भी करते हैं। इस आदर की ऐतिहासिक वजहें हैं। माना जाता है कि बंगाल के महापुरुषों ने सबसे पहले एक राष्ट्र का स्वप्न देखा था। भारतीयता के अराधक राजा राममोहन राय बंगाल की धरती पर पैदा हुए थे। राजा राममोहन राय से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक जो परंपरा चली जिसे नवजागरण के नाम से जानते हैं उसमें केंद्र में भी भारत और भारतीयता है। इस नवजागरण का जब विश्लेषण किया जाता है तो इस बात को छोड़ दिया जाता है कि दरअसल ये नवजागरण, हिंदू नवजागरण था। इस राष्ट्रवादी चेतना के उत्थान के सूत्र राजा राममोहन राय से लेकर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लेखन और उनके कार्यों में स्पष्ट रूप में दिखाई देते हैं।

जब राममोहन राय बंगाल में सक्रिय हो रहे थे तो उनका उद्देश्य हिंदू धर्म के यथार्थ और वास्तविक स्वरूप से बंगाल की जनता का परिचय करवाना था। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और कर्मकांडों के विरोध में उन्होंने बड़ा अभियान चलाया, उनको सफलता भी मिली। बंगाल में इस हिंदू नवजागरण का आरंभ करनेवाले राममोहन राय को समाज सुधारक के तौर पर पेश कर उनकी इसी छवि को मजबूत किया गया। उनके कृतित्व का वो पक्ष सायास ओझल कर दिया जिसमें वो हिंदू धर्म को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। उनको हिंदू धर्म से इतना लगाव था कि वो धर्म के नाम पर हो रहे विचलन को दूर करने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे। अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदू धर्म के सामने उपस्थित खतरों को लेकर जनता को सावधान कर रहे थे। उन्होंने न केवल वेद और उपनिषदों को आधार बनाकर विपुल लेखन किया बल्कि 1820 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई ‘हिंदू धर्म की रक्षा’। अपनी इस पुस्तक में राममोहन राय ने हिंदू धर्म को लेकर अपनी सोच और इसको मजबूती प्रदान करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की चर्चा की थी। राममोहन राय के अलावा अगर हम बंकिमचंद्र के लेखन को देखें तो उसमें भी हिंदू धर्म को लेकर एक चिंता दिखाई देती है। उनकी रचना वंदे मातरम और उपन्यास ‘आनंदमठ’ की तो खूब चर्चा होती है, इन रचनाओं में व्याप्त देशभक्ति की भावना को लेकर भी बहुत कुछ लिखा गया है। परंतु बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘सीताराम’ की इतनी चर्चा नहीं होती है। बंकिम की इस रचना के बिना उनका समग्र मूल्यांकन संभव नहीं है। इस उपन्यास में बंकिम ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में विस्तार से लिखकर इस बात के संकेत दिए थे कि हिंदूओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। कहना ना होगा कि बाद के दिनों में बंकिम के इस उपन्यास पर इसलिए अधिक चर्चा नहीं की गई क्योंकि इसमें हिंदुओं पर आक्रांताओं के अत्याचार और फिर उसके प्रतिकार की कहानी है। अगर समग्रता में बंकिम के लेखन पर विचार हो तो उनको राष्ट्रीयता का ऋषि कहने में कोई संकोच नहीं होगा। बंकिम की परंपरा में ही केशवचंद्र सेन जैसे हिंदू धर्म और दर्शन के विद्वान को भी रखना होगा। बंगाल की धरती पर कई ऐसे सपूत पैदा हुए या उस धरती को अपनी कर्मभूमि बनाया, जिन्होंने हिंदू धर्म और दर्शन की चिंता की जिनमें रमेशचंद्र दत्त, माइकल मधुसूदन दत्त, दीनबंधु मित्र, भूदेव मुखोपाध्याय से लेकर विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर प्रमुख हैं।इस हिंदू नवजागरण की चर्चा तब तक पूर्ण नहीं होती जबतक कि हम 1867 में स्थापित ‘हिंदू मेला’ नामक संस्था की चर्चा नहीं करते। इसकी स्थापना गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। इस संस्था का उद्देश्य अंग्रेजों के सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार तो था ही, भारतीयता को मजबूती के साथ स्थापित करना था। ‘हिंदू मेला’ ने ही भारत में स्वदेशी आंदोलन के लिए जमीन भी तैयार की थी।

आज पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के समय एक बार फिर से वही हिंदू अस्मिता विमर्श के केंद्र में है। यह अनायास नहीं है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक अनिर्वाण गांगुली पिछले कई महीनों से बंगाल के कोने कोने में जाकर स्थानीय स्तर के लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों आदि के साथ संवाद कर रहे हैं। ममता बनर्जी के लिए भी कई सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। कई जगहों पर उन्होंने भाषा और कला को लेकर भी अपनी बात रखी। दरअसल स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद जब बंगाल में वामपंथियों का शासन आरंभ हुआ तो इस हिंदू नवजागरण की परंपरा थोड़ी धूमिल पड़ने लगी। सायास नवजागरण के दौर के लेखकों की उन रचनाओं को भुलाने की कोशिशें तेज हो गईं जिनमें हिंदू अस्मिता की चर्चा थी या उन पुस्तकों को ओझल करने का खेल शुरू हुआ जिनमें हिंदू धर्म और उसपर होनेवाले प्रहारों का उल्लेख था या इस पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। यह अनायास नहीं है कि जब ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री थे तो 28 अप्रैल 1989 को पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने पत्रांक एसवाईएल/89/1 के जरिए एक निर्देश जारी किया। इस पत्र में सभी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्यों को निर्देश दिया गया था कि ‘मुस्लिम काल की कोई निंदा या आलोचना नहीं होनी चाहिए, मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने का जिक्र कभी नहीं किया जाना चाहिए।‘ इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि इतिहास की पुस्तकों से क्या क्या हटाया जाना है। स्पष्ट है कि वामपंथी शासन की मंशा क्या रही होगी। वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल में चौंतीस साल तक शासन किया और उसके बाद से ममता बनर्जी वहां की मुख्यमंत्री हैं। क्या अब ये प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि हिंदू नवजागरण के नायकों की स्मृति को मिटाने या उनको विस्मृत करने या उसको नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक कार्य क्यों नहीं किया गया? क्यों वामपंथी शासनकाल में हुई गलतियों को पिछले दस साल में ठीक करने की कोशिशें नहीं की गईं। क्या बंगाल के सांस्कृतिक नायकों का स्मरण सिर्फ चुनावों के समय किया जाएगा या फिर उस धरती के जिन राष्ट्रवादी मनीषियों ने जो स्वप्न देखा था उसको पूरा करने का उपक्रम भी किया जाएगा। लोकतंत्र में चुनाव एक ऐसा ही अवसर होता है जब जनता इन प्रश्नों को पूछ सकती है। बंगाल की जनता जरूर इन प्रश्नों के उत्तर मतदान के दिन तलाशेगी भी और उम्मीद की जानी चाहिए कि जिन्होंने गलतियां की उनको सबक भी सिखाएगी।

Saturday, February 27, 2021

कलात्मक(?) अराजकता पर अंकुश


हाल के दिनों में दो तीन ऐसी खबरें आईं जो मनोरंजन की दुनिया की दशा और दिशा दोनों बदल सकती है। एक खबर है कि अमेजन प्राइम वीडियो से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित का पुलिस ने बयान दर्ज करवाया। ये बयान वेब सीरीज ‘तांडव’ में आपत्तिजनक कटेंट को लेकर दर्ज कराए गए केस के संबंध में लिया गया है। साढे तीन घंटे तक अपर्णा पुरोहित से लखनऊ के हरतगंज कोतवाली में पुलिस ने पूछताछ की। इससे ही जुड़ी एक और खबर आई प्रयागराज से। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपर्णा पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया। अपर्णा पुरोहित पर वेब सीरीज ‘तांडव’ तो लेकर नोएडा में भी केस दर्ज हुआ था, उस सिलसिले में वो हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत चाहती थीं। पिछले कई सालों से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट, जिसको ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म भी कहते हैं, पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री को लेकर तो कई बार वहां दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। पिछले तीन साल से इन वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाली सामग्री में हिंसा, यौनाचार, मनोरंजन की आड़ में विचारधारा की पैरोकारी, हिंदू धर्म प्रतीकों का गलत चित्रण से लेकर अन्य कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। जब भी इन बातों को लेकर विवाद उठते थे तो सरकार से ये मांग भी की जाती थी कि ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के संदर्भ में विनियमन नीति लागू की जानी चाहिए। इस स्तंभ में भी लगातार इस बारे में चर्चा जाती रही है कि इस क्षेत्र में बढ़ रही अराजकता पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को दिशा निर्देश या कटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार के स्तर पर विनियमन लागू करने के लिए इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर के  संवाद भी हुए थे, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर 2018 में सख्त टिप्पणी की थी, संसद में भी ये मामला कई बार उठा । इस पृष्ठभूमि में सरकार ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर अब एक दिशा निर्देश जारी कर दिया है।

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश में ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के लिए स्वनियमन की बात की गई है। स्वनियमन की बात तो की गई है लेकिन ये नियमन कैसे हो और इसका दायरा क्या हो इसको सरकार ने स्पष्ट कर दिया है। ये स्पष्ट कर दिया गया है कि कोई भी प्लेटऑर्म भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को आघात पहुंचानेवाले दृश्य और संवाद नहीं दिखाएंगें। कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में कोई भी ऐसी सामग्री दिखाने की अनुमति नहीं होगी जो कानून सम्मत नहीं है। लेकिन सरकार ने दिशा निर्देश जारी करते हुए सेवा प्रदताओं को इसका तंत्र विकसित करने को कहा है। अच्छी बात ये है कि सरकार ने जो व्यवस्था बनाई है उसमें कार्यक्रमों को दिखाने के पहले किसी से अनुमति लेने की बात नहीं है यानि की प्री सेंसरशिप का रास्ता सरकार ने नहीं अपनाया। उन्होंने सबकुछ इन प्लेटफॉर्म पर छोड़ दिया है। नए नियमों के अनुसार सेवा प्रदाता कंपनियों को खुद अपनी सामग्रियों का वर्गीकरण करना होगा। बच्चों के देखने लायक सामग्री से लेकर अलग अलग उम्र की मनोरंजन सामग्रियों का वर्गीकरण कर दिया गया है। सेवा प्रदाता कंपनियों को इसका पालन करना होगा। अगर किसी को शिकायत होती है या किसी प्रकार से इन नियमों का उल्लंघन होता है तो उससे निबटने के लिए तीन स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है। ये व्यवस्था लगभग उसी तर्ज पर है जिस तर्ज पर टेलीविजन के कार्यक्रमों का स्वनियमन होता है। 

सरकार के इस स्वनियम के दिशा निर्देशों को लेकर तमाम तरह की शंकाएं जताई जा रही हैं। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ स्वयंभू निर्देशक इस कदम की आलोचना कर रहे हैं और इसको कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करनेवाला कदम बता रहे हैं। दरअसल जब वो कलात्मक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि ये स्वतंत्रता असीमित नहीं है। भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं को भी स्पष्ट किया गया है। ऐसा भी नहीं है कि इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले इन मनोरंजन के माध्यमों के लिए दिशानिर्देश जारी करनेवाला भारत दुनिया का पहला देश है। कई देशों में ओटीटी के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। सिंगापुर में तो बकायदा इसके लिए एक प्राधिकरण है जिसको इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी कहते है। इसकी स्थापना ब्राडकास्टिंग एक्ट के तहत की गई थी। इसमें सभी सेवा प्रदताओं को ब्राडकास्टिंग एक्ट के अंतर्गत इस प्राधिकरण से लाइसेंस लेना पड़ता है। ओटीटी, वीडियो ऑन डिमांड और विशेष सेवाओं के लिए एक विशेष कंटेंट कोड है। इसमें सामग्रियों के वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था है। सिंगापुर की इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट प्राधिकरण को अधिकार है कि वो ओटीटी प्लेटऑर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री को अगर कानून सम्मत नहीं पाती है तो उसका प्रसारण रोक दे।इसके अलावा नियम विरुद्ध सामग्री दिखाने पर जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। सिर्फ सिंगापुर ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया में भी इस तरह के प्लेटऑर्म पर नजर रखने के लिए ई सेफ्टी कमिश्नर हैं। उनका दायित्व है वो डिजीटल मीडिया पर चलनेवाली सामग्रियों पर नजर रखें। वहां तो विनियमन इस हद तक है कि ई सेफ्टी कमिश्नर अगर पाते हैं कि किसी मनोरंजन सामग्री का वर्गीकरण अनुचित है या गलत तरीके से उसको किया गया है तो वो दंड के तौर पर उसको प्रतिबंधित भी कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री की शिकायत मिलने पर उसके निस्तारण की एक तय प्रक्रिया है। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में किसी न किसी तरह के दिशा निर्देश लागू हैं। हमारे देश में अबतक ओटीटी की सामग्री को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं था। इसका नतीजा यह था कि कई प्लेटफॉर्म पर तो बेहद अश्लील सीरीज भी परोसे जा रहे थे, बिना किसी वर्गीकरण के। कहीं किसी कोने में छोटा सा अठारह प्लस लिख दिया जाता था लेकिन किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं थी। कोई भी उसको देख सकता था।

जहां तक कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करने की बात है उसको लेकर जो लोग प्रश्न खड़े कर रहे हैं वो यह भूल रहे हैं कि हमारे देश में फिल्मों को भी रिलीज के पहले प्रमाणन करवाना होता है। क्या इस प्रमाणन की व्यवस्था से हमारे देश में फिल्मों की कलात्मक स्वतंत्रता बाधित हुई? टीवी चैनलों को लेकर स्वनियमन लागू है क्या टीवी चैनलों पर दिखाई जानेवाली सामग्रियों में कलात्मक स्वतंत्रता बाधित दिखती है? दरअसल इस तरह के नियमनों से अराजकता पर रोक लगती है। ये कौन सी कलात्मक स्वतंत्रता है जिसमें वेब सीरीज की आड़ में राजनीति की जाती हो, भारतीय सेना की छवि को धूमिल किया जाता हो, कश्मीर में सेना के क्रियाकलापों को गलत तरीके से पेश किया जाता हो, हिंसा, गाली गलौच और यौनिकता के दृश्यों को प्रमुखता से दिखाया जाता हो। कोई भी माध्यम समाज सापेक्ष होना चाहिए, समाज से, संस्कृति से, निरपेक्ष होकर कला का विकास नहीं हो सकता है। समाज और संस्कृति को छोड़कर कोई भी कला अपने उच्च शिखर को प्राप्त नहीं कर सकती है। और इस मामले में तो सरकार ने बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा की कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अपनी तरफ से कोई स्वनियमन की नीति बनाकर देंगे लेकिन जब उनके बीच सहमति नहीं बन सकी तो सरकार ने दिशा निर्देश जारी कर दिए। जो लोग इसको बाधा मान रहे हैं उनको ये पता होना चाहिए कि कला भी अनुशासन की मांग करती है। सरकार ने ओटीटी के लिए दिशा निर्देश जारी करने में थोड़ी देरी अवश्य की लेकिन अब जब ये जारी हो गा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ओटीटी पर हम वाक्य में गाली गलौच नहीं होगी और अश्लीलता की सीमाएं भी नहीं टूटेंगीं।  

Saturday, February 20, 2021

पूर्वज नायकों के सम्मान का सही समय


हाल ही में महाराज सुहेलदेव पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इतिहास लेखन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी उस टिप्पणी में भारतीय इतिहास लेखन को लेकर भी टिप्पणी की। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘देश का इतिहास वो नहीं जो भारत को गुलाम बनाने वालों और गुलाम मानसिकता वालों ने लिखा। इतिहास वो है जो लोककथाओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है।‘ नरेन्द्र मोदी ने इस ओर भी स्पष्ट तौर पर संकेत किया भारत में हमने कई महापुरुषों को अपनी इतिहास की पुस्तकों में भुला दिया। उन्होंने कई उदाहरण भी दिए। भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में देखें तो अबतक तो यही दिखाई देता है कि हमारे देश का ज्यादातर इतिहास गुलाम बनाने वालों ने या गुलाम मानसिकता वालों ने ही लिखा। मार्क्सवादियों ने जिस प्रकार से इतिहास लेखन किया उसको देखने के लिए ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की स्थापना के उद्देश्यों की पड़ताल कर ली जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। जब 1972 में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की स्थापना की गई थी तब इसका प्रमुख उद्देश्य था ‘वस्तुपरक और वैज्ञानिक इतिहास लेखन को बढ़ावा देना, जिससे देश की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विरासत की समझ बढ़े व सही मूल्यांकन भी हो सके।‘  अपने स्थापना काल से ही भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, मार्क्सवादी इतिहासकारों के कब्जे में चला गया। परिणाम यह हुआ कि भारतीय इतिहास लेखन में छल की प्रविधि का उपयोग होने लगा। यह अनायास नहीं है कि प्राचीन भारत के इतिहास से लेकर मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत के इतिहास में भारतीय नायकों को परिधि पर रखने की एक कोशिश दिखाई देती है। इतिहास लेखन के लिए औपनिवेशिक और मार्क्सवादी पद्धति अपनाई गई। वही पद्धति जिसने रूस के लेनिन-त्रॉतस्की शासन को लेनिन-स्तालिन शासन बना दिया। रूस के इतिहास से त्रॉतस्की को प्रयासपूर्वक ओझल कर दिया गया। इस पद्धति के अलावा ब्रिटिश इतिहासकारों के लिखे को भी आधार बनाकर लेखन किया गया। लेकिन ब्रिटिश इतिहासकार किस तरह से सोचते हैं इसका एक उदाहरण डेविड वॉशब्रुक की आधुनिक भारत के संबंध में की गई एक टिप्पणी है। इस टिप्पणी से भारत को लेकर उनकी दृष्टि और मानसिकता का संकेत मिलता है। आधुनिक भारत का इतिहास लिखते वक्त वो एक जगह टिप्पणी करते हैं कि ‘1895 और 1916 के बीच मद्रास की सड़क पर शायद ही कोई ब्रिटिश विरोधी कुत्ता भौंका हो।‘ 

अब जब हमारा देश अपनी स्वतंत्रता के पचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है तो भारत के वस्तुनिष्ठ इतिहास का प्रश्न एक बार फिर से हमारे सबके सामने चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की है कि हम अपने नायकों को याद करें, उनको पुनर्स्थापित करें और आनेवाली पीढ़ियों को उनके बारे में बताएं। आज आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही है, उस दिशा में गंभीर काम भी हो रहे हैं। एक बार फिर से स्वदेशी बनाने और उसको अपनाने पर जोर दिया जा रहा है लेकिन क्या हम आधुनिक भारत में स्वदेशी को लेकर अपना पूरा जीवन होम करनेवाले नायकों को याद कर पा रहे हैं। अंग्रेजों को चुनौती देनेवाले चिदंबरम पिल्लई, जिनको ‘स्वदेशी पिल्लई’ कहा जाता है, को याद करते हैं?  चिंदबरम पिल्लई हमारी धरती का ऐसा साहसी सपूत है जिसने अंग्रेजों को स्वदेशी के नाम पर खुली चुनौती दी थी। तूतीकोरन में 1872 में जन्मे चिदंबरम पिल्लई की कहानी बेहद प्रेरणादायक है, लेकिन मार्क्सवादी इतिहासकारों ने उनको हाशिए पर रखा। चिदंबरम पिल्लई पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने दक्षिण में स्वदेशी का आंदोलन चलाया। उन्होंने ‘ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन शिपिंग कंपनी’ के मुकाबले अपनी शिपिंग कंपनी बनाकर उनको चुनौती दी थी। उनकी कंपनी का नाम ही ‘स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी’ था और उनके जहाज पर स्वदेशी लिखा होता था। उनकी कंपनी की इतनी लोकप्रियता थी ब्रिटिश कंपनी के लोग अपनी जहाज पर यात्रा करनेवालों को कम किराए का प्रलोभन तो देते ही थे, यात्रा करने वालों को मुफ्त में छाता आदि भी देते थे। बावजूद इसके पिल्लई की कंपनी का मुनाफा इतना बढ़ा कि उन्होंने दो और जहाज आयात किए। ‘स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी’ के बढ़ते कारोबार से अंग्रेज इतना घबरा गए थे कि उन्होंने ब्रिटिश इंडिया नेविगेशन कंपनी के जहाजों पर भी ‘स्वदेशी’ लिखकर यात्रियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश की थी। इसी समय से दक्षिण भारत में चिदंबरम पिल्लई को लोग ‘स्वदेशी पिल्लई’ कहने लगे थे। ये समय 1905 के आसपास का था। 

अब अगर हम पिल्लई की विकास यात्रा को देखते हैं तो उसमें तमिलनाडू में चलनेवाले ‘शैव सभाओं’ का बड़ा योगदान रहा है। इन सभाओं में जब पिल्लई सक्रिय हुए थे तब उनके संपर्क का दायरा बढ़ा था और इलाके के बुद्धिजीवियों से उनका संवाद आरंभ हुआ था। इन्हीं सभाओं के सदस्यों के मार्फत उनका परिचय लोकमान्य तिलक के लेखन और कार्य ये हुआ। उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को अपना गुरू मान लिया था। वर्षों बाद 1907 में सूरत में आयोजित कांग्रेस की वार्षिक बैठक में पिल्लै अपने गुरू बाल गंगाधर तिलक से मिले थे। 1907 का ये अधिवेशन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा था। इस बैठक में ही कांग्रेस उदारवादी और अतिवादी समूह में विभाजित हुई थी। इस बैठक के बाद ही पिल्लई के काम को कांग्रेस ने मान्यता दी और उनको दक्षिण भारत का प्रभार सौंपा। उसके बाद उनकी सक्रियता बहुत बढ़ गई थी। इस बात के भी उल्लेख मिलते हैं कि जब 1911 में उनकी गिरफ्तारी हुई थी तब उनके एक समर्थक ने उस अंग्रेज अफसर की हत्या कर दी थी जिन्होंने इनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे। इन आरोपों के मद्देनजर पिल्लई को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी लेकिन जनता के गुस्से को देखते हुए सजा को छह साल की कैद में बदल दिया गया था। अब अगर स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर पिल्लई के संघर्षों का आकलन किया जाता तो वो एक राष्ट्रीय नायक के तौर पर बाद की पीढ़ियों में जाने जाते। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उनपर 1961 में तमिल भाषा में एक फिल्म जरूर बनी लेकिन उनके लेखन को, उनके योगदान को, उनके संघर्षों को वो स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी हैं। 

स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्ष में प्रवेश को एक अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों के काम को सामने लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अलावा अन्य अकादमियों को भी इस काम में आगे आकर पहल करनी चाहिए। इन स्वतंत्रता सेनानियों के लेखन को सामने लाने के लिए साहित्य अकादमी से लेकर देश के विश्वविद्यालयों को भी पहल करनी चाहिए। उनको इतिहास और राजनीति में रुचि रखनेवाले विद्वानों और शोधार्थियों को चिन्हित करके प्राथमिकता के आधार पर ये काम सौंपा जाना चाहिए। शोधार्थियों और विद्वानों के सामने एक समय सीमा हो जिसके अंदर इस तरह के प्रोजेक्ट पूरे किए जाएं। जब पूरा राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाए तो इन पुस्तकों का प्रधानमंत्री के हाथों विमोचन हो और उसका खूब प्रचार प्रसार किया जाए। इन सकारात्मक प्रयासों को अलावा जो गलत इतिहास लेखन हुआ है उसको भी चिन्हित करके उसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए। जैसे ब्रिटिश सरकार के उस ट्रांसफर ऑफ पॉवर नाम के उस दस्तावेज का प्रतिकार आवश्यक है जिसमें उन्होंने ये मान्यता दी है कि वो भारत को गुलाम बनाने नहीं आए थे बल्कि सभ्य बनाने आए थे। वो भारत का विभाजन नहीं चाहते थे आदि आदि। ये तभी संभव है जब सरकार के स्तर पर इन कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध करवाया जाए और इसको पूरा करने की इच्छाशक्ति हो। 

Monday, February 15, 2021

राजा हरिश्चंद्र नहीं कृष्ण थे पहली पसंद


महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्रयंबकेश्वर के एक पुजारी परिवार में 30 अप्रैल 1870 को एक लड़के का जन्म हुआ। उसके पिता अपने बेटे को संस्कृत पढ़ाकर पंडित बनाना चाहते थे। इस बालक का नाम था धुंडीराज गोविंद फाल्के था। जब उसके पिता की मुंबई (तब बांबे) में नौकरी लगी तो वो अपने पिता के साथ नासिक से वहां आ गया। सरकारी नौकरी मिल गई। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव में नौकरी छोड़ दी और फोटोग्राफी करने लगा। उसकी रुचि को देखकर कुछ मित्रों ने उसको फोटोग्राफी सीखने के लिए जर्मनी भेज दिया। वहां से 1909 में वापस लौटा तो बीमारी की वजह से भले ही आंखों की रोशनी चली गई लेकिन सपने आकार लेने लगे थे। सालभर के इलाज के बाद जब आंखों की रोशनी लौटी तो वो एक फिल्म देखने गए जिसका नाम था ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ । इस फिल्म को देख तो रहे थे लेकिन उनके दिमाग में राम और कृष्ण की कथा चल रही थी। अगले दिन वो अपनी पत्नी के साथ इसी फिल्म को देखने पहुंचे। पत्नी ने उनको कृष्ण के चरित्र पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया। पत्नी ने अपने गहने गिरवी रखे और उससे मिले पैसे को लेकर फाल्के लंदन गए। वहां से सिनेमैटोग्राफी सीखकर वापस लौटे। 

अब अपने सपने को साकार करने का समय था। पहले कृष्ण और फिर राम पर फिल्म बनाने की कोशिश की लेकिन संसाधन के अभाव में इसको छोड़ कर राजा हरिश्चंद्र की कहानी पर काम शुरू कर दिया। महिला कलाकार मिलने में मुश्किल हो रही थी। विज्ञापन के बावजूद कोई महिला अभिनय के लिए तैयार नहीं हो रही थी। निराशा बढ़ती जा रही थी। पास की दुकान में चाय पीने गए। वहां चायवाले लड़के, सालुंके, पर उनकी नजर पड़ी को आंखें चमक उठी। उस लड़के को तारामती के रोल के लिए तैयार कर लिया। इस तरह भारतीय फिल्म में एक पुरुष ने पहली अभिनेत्री का रोल किया। ‘राजा हरिश्चंद्र’ फिल्म बन गई। 3 मई 1913 को बांबे के कोरोनेशन हॉल में उसका प्रदर्शन हुआ। फिल्म लगातार बारह दिन चली। 1914 में लंदन में प्रदर्शित हुई। इनकी दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में नाटकों में काम करनेवाली कमलाबाई गोखले ने अभिनय किया। कमला बाई को फिल्म में अभिनय के लिए उस वक्त फाल्के साहब ने आठ तोला सोना, दो हजार रुपए और चार साड़ियां दी थीं। इसके बाद इन्होंने ‘कृष्ण जन्म’ बनाई। कहते हैं कि इस फिल्म ने इतनी कमाई की कि टिकटों की बिक्री से जमा होनेवाले सिक्कों को बोरियों में भरकर ले जाना पड़ता था। सफलता के बाद इनको फाइनेंसर मिल गया और उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई। लेकिन पार्टनर ने निभी नहीं तो सब कामकाज छोड़कर बनारस जाकर नाट्य लेखन में जुट गए। फिर नासिक लौटे और ‘सेतुबंध’ नाम की फिल्म बनाई। इस बात का उल्लेख मिलता है कि फाल्के साहब ने अपने जीवन काल में करीब नौ सौ लघु फिल्में और बीस फीचर फिल्में बनाईं। 16 फरवरी 1944 को नासिक में भारतीय फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के का देहावसान हो गया। 

Sunday, February 14, 2021

इश्क बागी न हुए, ख्वाब मुकम्मल न हुए

हिंदी फिल्मों में रोमांटिक जोड़ियों की एक लंबी फेहरिश्त है लेकिन उतनी ही लंबी फेहरिश्त रीयल लाइफ रोमांटिक जोड़ियों की भी रही है। उन्नीस सौ पचास के बाद के वर्षों में अगर देखें तो कई ऐसी रोमांटिक जोड़ियां रहीं है जिनके इश्क के किस्से अबतक बॉलीवुड में सुनाई देते हैं। मोतीलाल और शोभना समर्थ के बीच इश्क इतना गाढ़ा था कि एक बार मोतीलाल बीमार पड़े और उनको ऑक्सीजन लगाना पड़ा। शोभना समर्थ उनको देखने अस्पताल पहुंची तो उन्होंने नर्स को इशारा किया कि मास्क हटा दिया जाए। मास्क हटाते ही उन्होंने कहा कि जब शोभना समर्थ उनके आसपास होती हैं तो उनकी सांसें सामान्य रहती हैं। इसी तरह अशोक कुमार और नलिनी जयवंत के बीच प्यार इतना गाढा था कि अशोक कुमार उनको देखेने के लिए बेचैन रहा करते थे। हिंदी फिल्म जगत में ये किस्सा बहुत प्रसिद्ध है कि अशोक कुमार ने अपने घर की छत पर दूरबीन लगा रखी थी जिसके कि वो पड़ोस में रहनेवाली नलिनी को ठीक तरीके से देख सकें। राज कपूर और नर्गिस, देव आनंद और सुरैया के प्रेम के किस्से भी आम हैं। दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच अफेयर की भी अलग ही दास्तां है। दिलीप कुमार पहले तो कामिनी कौशल के इश्क में डूबे लेकिन जब उनका प्यार परवान नहीं चढ़ सका तो दिलीप कुमार का दिल मधुबाला पर आ गया। प्यार का रंग गाढा होता चला गया। इनका प्यार अपने अंजाम तक पहुंच पाता इसके पहले मधुबाला के पिता इन दोनों के मोहब्बत के बीच आ गए। 

उस जमाने में नायिकाओं के मुंबई (तब बांबे) से बाहर जाने को लेकर उनके माता-पिता बहुत झंझट किया करते थे। खासतौर पर जब उनको अपनी बेटियों के इश्क के बारे में पता होता था। टी जे एस जॉर्ज ने अपनी किताब द ‘लाइफ एंड टाइम्स ऑफ नर्गिस’ में लिखा है कि राज कपूर फिल्म बरसात की शूटिंग कश्मीर में करना चाहते थे लेकिन नर्गिस की मां जद्दनबाई इस बात पर अड़ गईं थीं कि उनकी बेटी राज कपूर के साथ कश्मीर नहीं जाएंगी। आखिरकार फिल्म के उन दृष्यों को महाबालेश्वर में शूट करना पड़ा था। इसी तरह जब बी आर चोपड़ा अपनी फिल्म ‘नया दौर’ की शूटिंग भोपाल में करना चाहते थे लेकिन मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान किसी भी कीमत पर अपनी बेटी को दिलीप कुमार के साथ भोपाल नहीं जाने देने पर अड़े हुए थे। दिलीप कुमार ने मधुबाला से फैसला लेने को कहा लेकिन मधुबाला अपने पिता से बगावत नहीं कर सकी। यहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला का इश्क दरक गया। इसके पहले भी कामिनी कौशल ने अपने परिवार की मर्जी बताकर दिलीप कुमार के साथ प्यार को अंजाम तक पहुंचाने से मना कर दिया था। एक बार फिर अपने और अपनी मोहब्बत के बीच परिवार के आने से दिलीप कुमार बेहद खफा थे। अताउल्लाह खान के मधुबाला के भोपाल जाने से मना करने पर बी आर चोपड़ा ने मधुबाला पर केस कर दिया। मधुबाला की बहन मधुर भूषण ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘नया दौर’ फिल्म से संबंधित कोर्ट केस के दौरान दिलीप कुमार ने बी आर चोपड़ा का साथ दिया था। अदालत में मधुबाला के खिलाफ गवाही दी थी। दिलीप कुमार ने तो कोर्ट में यहां तक कह दिया कि वो मधुबाला से बेहद प्यार करते हैं और अपनी महबूबा के मरने तक उससे प्यार करते रहेंगे। मधुबाला के पिता ने भी अपनी बेटी को इस बात के लिए ताना मारा था कि उसका प्रेमी उसके मरने की कामना कर रहा था। इस केस को बाद में बी आर चोपड़ा ने वापस ले लिया था लेकिन मधुबाला कोर्ट में हुए अपमान को भूल नहीं पाई। वो अंदर से टूट गई थीं। ये अनायास नहीं था कि मधुबाला ने अपनी एक सहेली से कहा था कि उससे शादी मत करना जिससे तुम प्यार करती हो बल्कि उस व्यक्ति से शादी करना जो तुम्हें प्यार करता है। आठ साल की उम्र में फिल्मी दुनिया में कदम, बीस साल में तमाम शोहरत और सत्ताइस साल में फिल्मी दुनिया को अलविदा कहनेवाली मधुबाला को छोटी उम्र मिली लेकिन जीवन भर तो प्यार के लिए तरसती ही रहीं। 

Saturday, February 13, 2021

लोकतंत्र में अपीलजीवियों का पाखंड


यह अनायास नहीं होता है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अचानक से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ कोलाहल आरंभ हो जाता है। यह भी अनायास नहीं होता है कि हमारे देश के कुछ वैसे कलाकार और लेखक आदि जो अपनी प्रासंगिकता तलाश रहे होते हैं, वो इस कोलाहल में शामिल हो जाते हैं। यह भी अनायस नहीं होता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक नियमित अंतराल पर कुछ जाने पहचाने लोग बयान जारी करते हैं। यह भी अनायास नहीं होता कि इस तरह के अपीलजीवी लेखक,कलाकार एकजुट होते दिखते हैं। यही सब लोग आपको दादरी कांड के दौरान भी नजर आएंगे, पुरस्कार वापसी के दौरान भी नजर आएंगे, नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में भी नजर आएंगे, कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भी दिखेंगे। दरअसल ये सब एक सोची समझी रणनीति के तहत होता है, जिनमें बार-बार वही चेहरे होते हैं तो इन दिनों अपने अपने क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति और प्रासंगिकता के लिए संघर्षरत हैं। खुद को प्रगतिशील कहते हैं। इनको साथ मिलता है कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का भी जो भारत को इन्हीं की नजरों से देखते और समझते हैं। ये ताकतें भारतीय कानूनों की उसी व्याख्या को स्वीकार करते हैं जो लेखकों-कलाकारों का ये समूह उनके समक्ष प्रस्तुत करता है। इनको कई बार भारत विरोधी ताकतों का भी प्रत्यक्ष तो कई बार परोक्ष समर्थन मिलता है। कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भी ये ताकतें दिख रहीं हैं, अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी। 

अब इनको मौका मिला है स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी की गिरफ्तारी को लेकर। फारुकी को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दी है। फारूकी को अंतरिम जमानत मिलने के बाद भारत के कई अज्ञात कुलशील लेखकों-अभिनेत्रियों और विदेशों में रह रहे लेखकों कलाकारों के एक समूह ने अपील जारी की है कि मुनव्वर के खिलाफ आरोप वापस लिए जाएं। ये इन अपीलजीवियों का लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, है भी। इस अपील को जारी करनेवाले संगठनों का नाम देखेंगे तो इनकी मंशा और राजनीति दोनों स्पष्ट हो जाती है। इन संगठनों के नाम हैं पीईएन अमेरिका, प्रोग्रेसिव इंडिया कलेक्टिव, रिक्लेमिंग इंडिया आदि। इनमें से पीईएन को छोड़कर कोई ऐसी संस्था नहीं है जिसके बारे में या जिनके काम के बारे में बहुत कुछ पता हो। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी संस्थाएं अपील करने के लिए ही बनाई जाती हैं ताकि इन अपीलजीवियों की दुकानें चलती रहें। अपीलजीवियों ने जो बयान जारी किया है उसका शीर्षक है, हास्य अपराध नहीं है (कॉमेडी इज नॉट अ क्राइम)। इसको समझने के लिए किसी शब्दकोश की या किसी टीका की आवश्यकता नहीं है। भारत में हास्य-व्यंग्य की बहुत लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। जब से ये स्टैंड अप कॉमेडियन नाम की जमात आई है जिसने हास्य के नाम पर फूहड़ता,अश्लील टिप्पणियां या फिर देवी-देवताओँ के बारे में भद्दी टिप्पणियां शुरू कर दी हैं तब से इनकी आलोचना आरंभ हुई है।

हास्य लोगों को प्रसन्न करने के लिए होता है किसी को अपमानित करने के लिए नहीं। व्यंग्य तो व्यवस्था पर चोट करती है किसी व्यक्ति या समूह की धार्मिक आस्था पर नहीं। लेकिन जब हास्य की आड़ में एजेंडा चलाया जाए, जब हास्य की आड़ में विचारधारा विशेष का पोषण होने लगे, जब हास्य की आड़ में धार्मिक आस्थाओं पर चोट होने लगे तो स्वाभाविक है कि समाज में उद्वेलन होगा। जब उद्वेलन होगा तो विरोध भी होगा, जब विरोध होगा तो कानून के दखल की अपेक्षा भी होगी। कानून जब दखल देगी तो उसके लिए संविधान सर्वोपरि होगा। और संविधान अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में क्या कहता है, उसको देखने की जरूरत पड़ेगी। इस स्तंभ में इस बात को कई बार कहा जा चुका है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं है। जो अनुच्छेद हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है वहीं पर इस बात की भी व्याख्या है कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं क्या हैं। इसलिए इन स्टैंडअप कॉमेडियन को भी और इनके लिए झंडा-बैनर लेकर खड़े होनेवाले अपीलजीवियों को भी भारत के संविधान का ज्ञान होना आवश्यक है। 

अब जरा नजर डालते हैं अपीलजीवी संस्थाओं पर। पीईएन इंटरनेशनल और उससे संबद्ध संस्थाएं भारत के बारे में वर्षों से अनर्गल प्रचार करते रहे हैं। दो हजार चौदह में जब नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी थी तो उसके करीब साल डेढ़ साल बाद ही पीईएन इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट का नाम था ‘इंपोजिंग साइलेंस, द यूज ऑफ इंडियाज लॉ टू सप्रेस फ्री स्पीच’। इस रिपोर्ट को पीईएन कनाडा, पीईएन भारत और युनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो की लॉ फैकल्टी ने संयुक्त रूप से जारी किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लेकर स्थिति अच्छी नहीं है। जो शोध पत्र प्रस्तुत किया गया था उसमें दावा किया गया था ‘भारत में इन दिनों असहमत होनेवालों को खामोश कर देना बहुत आसान है। भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है।‘  इस अध्ययन ने अपने निष्कर्ष का आधार बनाया था आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘पी के’ को लेकर उठे विवाद को और अमेरिकी लेखिका वेंडि डोनिगर की पुस्तक को लेकर उठे विवाद पर। उस अध्ययन में भी दोनों ही उदाहरण अनुचित तरीके से पेश किए गए थे। उस वक्त भी भारत के लिबरल अपीलजीवियों ने पीईएन इंटरनेशनल की उस रिपोर्ट को लेकर माहौल बनाने की असफल कोशिश की थी। पीईएन इंटरनेशनल का दावा है कि वो कवियों, लेखकों, उपन्यासकारों की वैश्विक संस्था है और वो पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति और कलात्मक आजादी के लिए काम करती है। परंतु पिछले करीब छह सात साल से तो ये संस्था भारत में राजनीति के औजार की तरह इस्तेमाल हो रही है।

संस्थाओं से अलग हटकर अरुंधति राय जैसों के वक्तव्यों का विश्लेषण करें तो ये साफ दिखता है कि इनको अभिव्यक्ति की आजादी पर संकट तब दिखता है जब इनकी विचारधारा के लोगों का विरोध होता है। अरुंधति राय का तो विदेशी मंचों पर भारत विरोधी बातें कहने का लंबा इतिहास रहा है। अपनी भारत विरोधी बातों को प्रामाणिकता देने के लिए तो वो पाकिस्तान तक की तारीफ कर चुकी हैं। ये सब एक इंटरनेश्नल सिंडिकेट का हिस्सा है। ये लोग तो भारत की छवि को बिगाड़ने के उपक्रम में ही जुटे रहते हैं और ऐसा करने का कोई भी मौका नहीं चूकते। मुनव्वर फारुकी के मामले में उनको एक बार फिर से अवसर नजर आया और वो राग विरोध गाने लगे। लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। इन सबको ये बात समझ लेनी चाहिए कि भारत का लोकतंत्र अब परिवक्व हो गया है, भारत की जनता भी अब बेहद समझदार हो गई है और इन भारत विरोधी बयानों की असलियत समझ चुकी है। अब इनसे ना तो भारत की जनता विचलित होती है और ना ही इनसे उनको बरगलाया जा सकता है। परोक्ष रूप से राजनीति करनेवाले इन लेखकों-कलाकारों को इस देश की जनता ने उनकी सही जगह बता दी है। लगातार दो लोकसभा चुनाव में इस भारत विरोधी विचार को जनता ने ना केवल खारिज किया बल्कि इसके पोषकों को भी नकार दिया। इस नकार को भी वामपंथ के अनुयायी या उनके पोषक समझ नहीं पा रहे हैं और अब भी उन्ही पुराने औजारों से भारत की जनता को भरमाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रसिद्ध रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है, जिससे सब परिचित हैं। लेकिन नाटक के उपकरणों की तरह इसका उपयोग भाषण के मंचों पर होता है। अपीलजीवियों को ये समझना चाहिए कि विचारधारा का पाखंड अब नहीं चलनेवाला है। 

Saturday, February 6, 2021

रचनात्मकता सूखी तो विवाद का सहारा

हिंदी के एक कहानीकार हैं। नाम है उदय प्रकाश। उनकी लंबी कहानी ‘मोहनदास’ को साहित्य अकादमी ने उपन्यास मानते हुए पुरस्कृत किया था। उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार देनेवाली जूरी में अशोक वाजपेयी भी थे। ये वही अशोक वाजपेयी हैं जिनको कभी उदय प्रकाश ने ‘भारत भवन का अल्सेशियंस’ कहा था। ये वही उदय प्रकाश हैं जिनको योगी आदित्यनाथ ने पहला ‘नरेन्द्र स्मृति सम्मान’ दिया था। जब उनको ये पुरस्कार मिला था तब हिंदी के कई लेखकों ने बयान जारी कर उनकी निंदा की थी। इनमें ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन के अतिरिक्त विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बर रब्बी, मदन कश्यप और देवी प्रसाद मिश्र जैसे वामपंथी लेखक शामिल थे। उस वक्त खूब विवाद हुआ था। इसके बाद उदय प्रकाश ने 2015 में पुरस्कार वापसी का शिगूफा छेड़ा था। ये अलग बात है कि अभी तक वो अपनी पुस्तकों पर अपने परिचय में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक लिखते हैं। पुरस्कार वापसी का शिगूफा छोड़नेवाले उदय प्रकाश पहले लेखक थे लेकिन बाद में अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल जैसे लेखकों ने इसको लपक लिया था और वो पुरस्कार वापसी अभियान के अगुआ माने गए थे। उदय प्रकाश इस बात को लेकर अपने वामपंथी साथियों से झुब्ध हुए थे कि पुरस्कार वापसी का पर्याप्त श्रेय उनको नहीं मिल पाया। 

उदय प्रकाश ने लंबे समय से छिटपुट लघु कथाएं और कविताओं को छोड़कर कुछ लिखा नहीं। लेकिन चर्चा में बने रहने की कला में माहिर हैं। कभी रेत माफिया से जान का खतरा तो कभी हिंदी लेखक प्रभात रंजन के साथ इंटरनेट मीडिया पर अनावश्यक विवाद खड़ा करके वो चर्चा में बने रहते हैं। उदय प्रकाश के बारे में इतना लिखने का औचित्य ये है कि वो एक बार फिर से विवादों में हैं। दरअसल पिछले दिनों उदय प्रकाश ने अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के लिए चंदा दिया और उसकी रसीद अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट कर दी। इस टिप्पणी के साथ कि ‘आज की दान दक्षिणा’। इसके नीचे कोष्ठक में लिखा ‘अपने विचार अपनी जगह पर सलामत’। उनकी इस पोस्ट के बाद वामपंथी खेमे से विरोध के स्वर उठने लिखे। कई लोगों ने उदय प्रकाश का नाम लेकर तो कइयों ने बगैर नाम लिए उनपर पाला बदलने का आरोप लगाया। उदय प्रकाश के इस कदम को लेकर हिंदी साहित्य के कई लेखक अबतक उबल रहे हैं। कुछ ने तो सारी हदें पार करते हुए राम मंदिर तक पर मर्यादाहीन टिप्पणी कर डाली। इसके बाद राम मंदिर के पक्षधरों ने भी मोर्चा खोल दिया। परिणाम ये हुआ कि उदय प्रकाश एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गए।  

उदय प्रकाश हिंदी के एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने किसी जमाने में कुछ अच्छी कहानियां और कविताएं लिखी थीं। बाद में जब रचनात्मकता का सिरा उनके हाथ से छूटा तो वो साहित्येतर क्रियाकलापों से खुद को प्रासंगिक बनाने की जुगत में लग गए। कुछ सालों पहले इस बात की चर्चा हुई थी उदय प्रकाश अपना पहला उपन्यास लिखने जा रहे हैं। खुद लेखक ने भी इस आशय की बातें की थीं। उस वक्त कवि केदारनाथ सिंह जीवित थे, उन्होंने भी अपने एक साक्षात्कार में ये बात बताई थी कि उदय प्रकाश ‘चीना बाबा’ के नाम से एक उपन्यास लिख रहे हैं। साहित्यिक हलकों में तो इस बात की भी चर्चा थी कि उदय प्रकाश ने एक विदेशी प्रकाशन गृह से इसके प्रकाशन के लिए अनुबंध कर लिया है और उनको अग्रिम धनराशि भी मिल गई है। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी अबतक हिंदी साहित्य जगत ‘चीना बाबा’ का इंतजार कर रहा है। इस बीच ‘चीना बाबा’ को लेकर कई तरह की बातें हिंदी प्रकाशन की दुनिया में होती रहीं। कभी किसी प्रकाशन से तो कभी किसी प्रकाशन से उसके प्रकाशित होने की चर्चा होती रही। इस बीच करीब दो साल पहले उनका एक कविता संग्रह ‘अंबर में अबाबील’ प्रकाशित हुआ था। इस कविता संग्रह को ना तो पाठकों ने पसंद किया और ना ही आलोचकों ने। हिंदी साहित्य जगत में तो इसकी चर्चा ही नहीं हुई। पिछले दो साल से ही उनके नए कहानी संग्रह के प्रकाशन की चर्चा सुनाई दे रही है लेकिन वो भी अबतक प्रतीक्षित है। इन सालों में तात्कालिक घटनाओं पर उन्होंने जो खबरनुमा लघु कथाएं लिखी हैं वो भी अबतक इतनी नहीं हो पाई हैं कि जिसको एक संग्रह का रूप दिया जा सके।     

रचनात्मकता के स्तर पर चुक जाने के बाद उदय प्रकाश ने अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए या खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए राम के शरण में जाना तय किया। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए उन्होंने चंदा दिया। राम मंदिर को चंदा देने को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। राम को किसी वाद विशेष के अनुयायियों के आराध्य के तौर पर देखनेवालों से इस तरह की गलतियां हो जाती हैं। राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करनेवालों से भी अक्सर इस तरह की भूल हो जाती हैं। राम भारतीय संस्कृति में इस तरह से रचे-बसे हैं कि उनके सामने कोई भी वाद अर्थहीन हो जाता है। राम के व्यक्तित्व का जो वैराट्य है वो धर्म,जाति, विचारधारा,तर्क आदि की परिधि से परे है। राम मंदिर निर्माण को किसी संकीर्ण दृष्टि से देखना या उसपर विवाद खड़ा करना अनुचित है। राम मंदिर पर उठने वाले तमाम विवादों को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से विराम दे दिया था। उसके बाद ही अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण आरंभ हुआ है। मंदिर का निर्माण पूरे देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप हो रहा है। ऐसे में एक वामपंथी लेखक का प्रभु श्रीराम के अयोध्या में निर्मित हो रहे मंदिर के लिए योगदान करना कोई ऐसी बात नहीं है जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जाए। वो उनकी आस्था है। यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में नामवर सिंह की ईश्वर में आस्था सार्वजनिक हुई थी। लेकिन उदय प्रकाश ने जिस तरह से मंदिर के लिए दिए गए चंदे की रसीद को सार्वजनिक किया उसको लेकर प्रश्न उठाना सही है। लेकिन वामपंथी लेखक प्रश्न इस बात पर नहीं ख़ड़े कर रहे हैं, उनको आपत्ति इस बात को लेकर है कि उदय प्रकाश ने मंदिर निर्माण के लिए चंदा क्यों दिया? यह अनायास नहीं है कि उदय प्रकाश जैसे विवादाचार्य वामपंथ की इन कमजोरियों का फायदा उठाकर खुद को चर्चा में बनाए रखने का उपक्रम करते हैं। उदय प्रकाश को ये बखूबी पता रहा होगा कि राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा देने से वामपंथी नाहक विवाद खड़ा करेंगे। हुआ भी वैसा ही। 

दरअसल भारत के वामपंथी बुद्धिजीवी अबतक ना तो भारत को समझ पाए हैं और ना ही भारतीय मानस को। अगर भारतीय मानस को समझ जाते तो प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण को लेकर इस तरह की अमर्यादित टिप्पणियां नहीं करते। समझ तो वो भारतीय संस्कृति को भी नहीं पाए, अगर समझ पाते तो राम मंदिर को किसी खास विचारधारा या खास राजनीतिक दल से जोड़कर देखने की गलती नहीं करते। वो बहुधा इस तरह की गलतियां करते रहे हैं और इसी गलत सोच के चलते उनके सारे कदम भारतीय संस्कृति के खिलाफ ही उठते रहे हैं। इन्हीं गलत आकलन के चलते वामपंथ भारत में लगभग अप्रसांगिक हो चुका है। सांस्कृतिक तौर पर भी और राजनीतिक तौर पर भी। आज जब एक बार फिर से पूरा विश्व भारत की ज्ञान परंपरा को, भारतीय संस्कृति को, भारतीय चिकित्सा पद्धति को एक नई उम्मीद के साथ देख रहा है वहीं भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी अब भी विदेशी विचारधारा के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। 


Sunday, January 31, 2021

पचास की 'पाकीजा'


आपके पांव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे। फिल्म ‘पाकीजा’ ये संवाद बहुधा सुनाई देता है। ये भी सुनने को मिलता है कि ये संवाद अमर हो गया है। दरअसल ये संवाद फिल्म ‘पाकीजा’ की मूल स्क्रिप्ट में नहीं था। जब ये सीन फिल्माया जा रहा था और कैमरा मीना कुमारी के पांव पर पहुंचा तो अचानक कमाल अमरोही के दिमाग में एक मुजरे की याद कौंधी। वो मुजरा था चंदेरी नाम की एक खूबसूरत बाई का, जिसे उन्होंने काफी पहले सुना था। मुजरे में वो अपने पांव को अदा से लहराती थी। कमाल अमरोही ने शूटिंग रोकी और स्क्रीनप्ले में बदलाव करके ये पंक्ति जोड़ दी। हिंदी फिल्मों के इतिहास में कई ऐसी फिल्में हैं जिनके बनने के दौरान के कई रोचक किस्से आज भी सिनेमा प्रेमियों के बीच याद किए जाते हैं। कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ इस तरह की फिल्मों में शीर्ष पर है। इसको लेकर सैकड़ों कहानियां कही-सुनी जाती हैं। ये स्वाभाविक भी है क्योंकि 1957 में जिस फिल्म का मूहुर्त हुआ हो और वो पंद्रह साल बाद 1972 में रिलीज हो तो कहानियां तो बनेंगी हीं। इन पंद्रह सालों में इस फिल्म के निर्माता कमाल अमरोही ने कई बार फिल्म का नाम बदला। ‘पाकीजा’ का नाम ‘लहू पुकारेगा’ तो लगभग तय हो गया था, लेकिन जब फिल्म के रिलीज होने का वक्त आया तो वो फिर से ‘पाकीजा’ पर ही जा पहुंचे। कई पुस्तकों में और उस वक्त की पत्रिकाओं में इसका उल्लेख मिलता है कि जब कमाल अमरोही ने फिल्म बनाने की सोची थी उनके दिमाग में अपने जमाने की दो बाइयों का जीवन था। एक तो जद्दनबाई, जिनकी महफिल में जुल्फिकार अली भुट्टो और के एल सहगल जैसे दिग्गज जाते थे और दूसरी थीं गौहर जान, जिसकी आन-बान के किस्से मशहूर हैं। इसके अलावा भी कमाल अमरोही ने कई बाइयों की जिंदगी को नजदीक से देखा था और कइयों के बारे में सुना था। जब मीना कुमारी से उनकी शादी हुई तो कमाल अमरोही ने उनको लीड रोल में लेकर बाइयों की जिंदगी पर एक फिल्म बनाने की सोची जिसका नाम रखा ‘पाकीजा’।

फिल्म शुरू हुई और सबकुछ ठीक चल रहा था इस बीच कमाल अमरोही और उनकी पत्नी और फिल्म की नायिका मीना कुमारी के बीच संबंध खराब हो गए और फिल्म का काम रुक गया। इसको लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन सात साल के व्यवधान के बाद अगर ‘पाकीजा’ फिर से शुरू हो सकी तो उसके लिए संगीतकार खय्याम और उनकी पत्नी जगजीत कौर की भूमिका को रेखांकित करना जरूरी है। ये वो समय था जब कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को साथ काम करने के लिए अनुरोध पत्र भी लिखा था जिसे मीना कुमारी ने ठुकरा दिया था। कमाल अमरोही परेशान थे। इसी दौर में वो एक दिन अपने दोस्त ख्य्याम के घर गए। वहां जगजीत कौर ने ‘पाकीजा’ की चर्चा छेड़ दी और कमाल अमरोही से अनुरोध किया कि वो अब तक शूट की गई फिल्म उनको दिखाएं। कमाल तैयार हो गए। खय्याम, उनकी पत्नी और कमाल अमरोही ने आधी फिल्म देखी। जगजीत फिल्म के अधूरे हिस्से को देखकर इतनी उत्साहित हो गईं कि उसने मीना कुमारी को मनाने का बीड़ा उठाया। खय्याम और उनकी पत्नी मीना कुमारी के भी अच्छे दोस्त थे। जगजीत कौर ने मीना कुमारी से बात की। मीना कुमारी ने उनको बताया कि कमाल से उनकी बोलचाल बंद है, संबंध बहुत खराब हैं इसलिए ये संभव नहीं है। जगजीत ने हार नहीं मानी और मीना कुमारी को मनाने में लगी रहीं। धीरे-धीरे उनको तैयार कर लिया । मीना कुमारी ने फिर खुद ही कमाल अमरोही को संदेश भेजा कि वो पाकीजा को पूरा करने के लिए तैयार हैं। सात साल के व्यवधान के बाद ‘पाकीजा’ की शूटिंग शुरू हो सकी।

फिर वो दिन आया जब फिल्म रिलीज हुई। फिल्म के प्रीमियर पर मीना कुमारी और कमाल अमरोही साथ बैठे थे। मीना कुमारी के साथ ही खय्याम और जगजीत कौर भी थीं। फिल्म खत्म होने के बाद मीना कुमारी ने जगजीत कौर को गले से लगा लिया। सिनेमा हॉल में ही दोनों काफी देर तक आलिंगनबद्ध रहे और फिर मीना कुमारी ने जगजीत से कहा कि ‘तुम्हारी वजह से ही कमाल का ये सपना साकार हो सका है। तुम्हारी वजह से मैं इतनी अच्छी फिल्म को पूरा कर सकी।‘ भावुकता के इन क्षणों की गवाह बहुत सी फिल्मी हस्तियां बनीं। रिलीज के बाद इस फिल्म ने इतिहास रच दिया। आज पचास साल बाद भी इस फिल्म के गीत, संगीत, फिल्मांकन और निर्देशन की बारीकियां इसको क्लासिक की श्रेणी में रखती हैं।

Saturday, January 30, 2021

प्रासंगिकता साबित करने की युक्ति


गणतंत्र दिवस के पहले रविवार को दिल्ली के सिंघु बॉर्डर गया था, सोचा था कि किसानों के आंदोलन को नजदीक से देखूंगा और समझूंगा। दिनभर वहां बिताया और आंदोलन के अलावा जो एक चीज वहां रेखांकित की, उसका उल्लेख करना आवश्यक है। प्रदर्शन आदि समान्य तरीके से चल रहा था। लोग टेंट में और ट्रैक्टर ट्रालियों के नीचे बैठे थे। मुख्य मंच पर जाकर लोग अपनी बातें कह रहे थे। फिर प्रदर्शन स्थल पर घूमने लगा। पूरे प्रदर्शन स्थल पर लोग जत्थों में घूम रहे थे। कई जगहों पर नारेबाजी भी हो रही थी। यहीं पर एक बेहद दिलचस्प नजारा देखने को मिला। जहां समूह में नारेबाजी हो रही थी उस समूह के साथ चल रहे चार-पांच लोग फटाफट अपने हाथ में लिया लाल झंडा खोल कर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाने लगते थे। इनमें से ही एक दो लोग गत्ते पर हस्तलिखित नारे भी लहराने लगते थे। ये लोग उस समूह के आगे एक जगह इस तरह से जमा हो जाते जैसे कि वो पूरा समूह इनके नेतृत्व में ही प्रदर्शन कर रहा है। जब ये लोग लाल झंडा खोलकर नारे लगा रहे होते थे, या पोस्टर लहरा रहे होते थे तो उनका एक साथी तस्वीरें ले रहा था। तस्वीरें इस तरह से ली जा रही थी कि लगे कि लाल झंडा में जिनकी आस्था है वो लोग किसानों के समर्थन में आए हैं और नारेबाजी कर रहे हैं। थोड़ी देर में नारेबाजी बंद हो जाती थी और फिर झंडा-पोस्टर समेट कर ये लोग आगे बढ़ जाते थे। सिंघु बॉर्डर पर ऐसा कई जगह पर दिखाई दिया था। जब घर वापस लौटा तो वैसे कई फोटो फेसबुक और अन्य इंटरनेट मीडिया माध्यमों पर दिखाई दिए थे जिसमें ये दावा किया गया था कि वामपंथ में आस्था रखनेवाले लोग किसानों के आंदोलन के साथ हैं। बात आई गई हो गई। लेकिन गणतंत्र दिवस के दिन जब लालकिला पर हंगामा चल रहा था और तिरंगा लहराने वाली जगह पर उपद्रवियों ने झंडा लगाना शुरू कर दिया था। उपद्रव के उन क्षणों में एक दृश्य दिखा था जिसमें लाल किला की प्राचीर पर लगी रेलिंग पर कई झंडे एक साथ बांधे जा रहे थे। न्यूज चैनलों पर इसका लाइव करवेज चल रहा था। अचानक दिखा कि एक व्यक्ति लाल झंडा लिए आया और झंडा लगानेवालों के साथ खड़ा हो गया। उसने अपने हाथ में लिया लाल झंडा रेलिंग में इस तरह से फंसाने की कोशिश की जिससे ये लगे कि लाल झंडा प्रमुखता से दिखे। इस दृश्य को देखकर मेरे दिमाग में अचानक से सिंघु बॉर्डर के प्रदर्शऩ के दौरान लाल झंडा लहराने और उसकी फोटो खींचते वामपंथियों का दृश्य कौंध गया। 

उपरोक्त दोनों दृश्यों का विश्लेषण करें तो एक बात उभर कर आती है कि न्यून संख्या होने के बावजूद वामपंथी सिंघु बॉर्डर पर भी और लालकिला पर भी अपनी अपनी प्रासंगिकता और उपस्थिति दिखाने में लगे थे। लालकिला पर तो उपद्रव इतना बढ़ गया कि वहां लगाया गए लाल झंडे के फोटो को इंटरनेट मीडिया पर दिखाने की हिम्मत वामपंथियों को नहीं हुई। अगर किसी ने लगाया हो तो मुझे दिखा नहीं। दरअसल वामपंथियों की ये युक्ति बहुत पुरानी है। वो दूसरों के कंधे पर चढ़कर ना केवल अपनी उपयोगिता और उपस्थिति सिद्ध करने का उपक्रम करते हैं बल्कि राजनीति और सामाजिक लाभ भी लेते हैं। इसका एक लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी वामपंथियों की ये परजीविता देखने को मिली थी। यह अकारण नहीं था कि डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने 12 दिसंबर 1945 को नागपुर के अपने भाषण में देश की जनता को वामपंथियों के मंसूबों को लेकर आगाह किया था। बाबा साहेब ने तब कहा था कि ‘मैं आप लोगों को आगाह करना चाहता हूं कि आप कम्युनिस्टों से बच कर रहिए क्योंकि अपने पिछले कुछ सालों के कार्य से वे कामगारों का नुकसान कर रहे हैं, क्योंकि वे उनके दुश्मन हैं, इस बात का मुझे पूरा यकीन हो गया है...हिन्दुस्तान के कम्युनिस्टों की अपनी कोई नीति नहीं है उन्हें सारी चेतना रूस से मिलती है।‘ बाबा साहेब के शब्दों पर गौर करने से स्थिति और साफ हो जाती है। उन्होंने कहा कि भारत के कम्युनिस्टों की अपनी कोई नीति नहीं है। तब साफ तौर पर वो उनकी परजीविता को रेखांकित कर रहे थे। दूसरी बात उन्होंने ये कही कि वो कामगारों का नुकसान कर रहे हैं। उनकी दूरदर्शिता ने उस वक्त ही कम्युनिस्टों को पहचान लिया था और बेहद स्पष्ट तरीके से साफ शब्दों में देश को आगाह किया था।

स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक इतिहास को देखें तो कई मौकों पर वामपंथियों की ये परजीविता और उससे लाभ उठाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के अधिकानयकवाद का समर्थन करके अपने को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इमरजेंसी के समर्थन के एवज में वामपंथियों ने इंदिरा सरकार से कला और संस्कृति की ठेकेदारी हासिल की थी। ये उसी इंदिरा गांधी को समर्थन था जिन्होंने 1959 में केरल की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार को अपदस्थ करने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। ऑस्ट्रेलिया के ल ट्रॉब युनिवर्सिटी से संबद्ध रॉबिन जेफ्री ने एक बेहद मशहूर लेख लिखा था, ‘जवाहरलाल नेहरू एंड द स्मोकिंग गन, हू पुल्ड द ट्रिगर ऑन केरला’ज कम्युनिस्ट गवर्मनमेंट इन 1959’ । इस लेख में उन्होंने नेहरू और इंदिरा गांधी की कम्युनिस्टों को लेकर सोच और सरकार बर्खास्त करने के कारणों का विश्लेषण किया था। जेफ्री ने स्पष्ट रूप से इस बात को रेखांकित किया था कि नेहरू उस समय कम्युनिस्टों की जीत को पचा नहीं पा रहे थे। इंदिरा अपना स्थान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी। कम्युनिस्ट सरकार की बर्खास्तगी से दोनों के मंसूबे पूरे हुए थे। इन बातों को जानते समझते हुए भी वामपंथियों ने कालांतर में कई मौकों पर लाभ उठाने के लिए या राजनीतिक हित साधने के लिए कांग्रेस के साथ समझौता किया या उनके अधीन काम करना स्वीकार किया। अभी वामपंथी विचारों वाले कई लोग राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ काम करे हैं।  हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान और पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस और वामपंथियों में समझौता हुआ है। विचारधारा की बात करनेवाले वामपंथी दरअसल अवसर को ही विचार के तौर पर देखते और मानते रहे हैं। 

हमेशा से कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा की आड़ में सिर्फ और सिर्फ सत्ता या लाभ लेने की कोशिश करते रहे हैं। यह अनायास नहीं है कि वो प्रोलेतेरियत तानाशाही की बात भी करते हैं और समाज या देश के पूंजीवाद से साम्यवादी व्यवस्था की ओर जाने के बीच इस तानाशाही व्यवस्था को जरूरी मानते हैं। जो इनकी इस सोच के हिसाब से नहीं चलता है उसके खिलाफ ये तमाम तरह की अनर्गल बातें करके, माहौल बनाकर दबाव में लेने की कोशिश करते हैं। ये प्रविधि भी पुरानी है। यहां इस बात का उल्लेख इस धारणा को पुष्ट करेगा कि लेनिन ने तो एक बारगी जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के सिद्धांतों को इंफैंटाइल डिसऑर्डर (शिशु विकार) का शिकार तक कह डाला था। इस तरह के जुमले भारत में सुनने को मिलते रहते हैं। कभी असहिष्णुता का नारा गढ़ा जाता है तो कभी फासीवाद की आहट सुनने लगते हैं और कभी पुरस्कार वापसी की युक्ति अपनाई जाती है। वामपंथी विचारधारा के अनुयायी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि लाभ हासिल करने के लिए दबाव बनाने की उनकी ये तरकीबें अब पुरानी हो गई हैं और देश की जनता इसको समझ भी गई हैं। कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती तो इस कहावत को वामपंथियों को समझ लेना चाहिए।   


Saturday, January 23, 2021

राजनीति का औजार बनते वेब सीरीज


वेब सीरीज ‘तांडव’ को लेकर पिछले दिनों खूब हंगामा हुआ। केस मुकदमा तक बात पहुंची। वेब सीरीज से जुड़े लोगों से पुलिस ने पूछताछ की। उनके बयान दर्ज हुए। पुलिस की पूछताछ के पहले हो रहे विरोध की वजह से निर्माताओं ने माफी भी मांगी। हर बार की तरह इस बार भी भावनाएं आहत होने की बात उठी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर कलात्मक स्वतंत्रता की बात भी की गई। इन तमाम विवादों और कोलाहल के बीच निर्माताओं ने वेब सीरीज में आपत्तिजनक प्रसंगों को हटाने की बात की और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को उनके समर्थन और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद भी दिया। हो सकता है कि इस वेब सीरीज में से कुछ अंश हटा दिए गए हों। लेकिन ‘तांडव’ पर उठे विवाद से जो प्रश्न उठे हैं वो अभी अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों पर कलाकारों को और कला से जुड़े लोगों को खुले दिल से बहस करनी चाहिए। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू धर्म के देवी देवताओं के चित्रण पर आपत्ति उठी थी। धर्मिक भावनाएं आहत होने की बात की गई। जिन अंशों पर आपत्ति की गई थी उनको हटाने और निर्माताओं के माफी मांग लेने से मामला ठंडा पड़ता जा रहा है लेकिन इस औसत कहानी वाली वेब सीरीज में जिस तरह से खुले आम राजनीतिक टिप्पणियां की गईं हैं वो भावनाओं को आहत करने से अधिक गंभीर सवाल उठाते हैं। इसके आरंभिक एपिसोड में जो कुछ संवाद हैं या दृश्यों से जो कहने की कोशिश की गई है वो ये है कि ‘मुसलमानों को चिन्हित कर मारा’। सलीम और अयूब के संदर्भ में जो संवाद हैं उसमें एक वाक्य है, ‘हमलोगों को मारना बहुत आसान होता है। मेरा नाम भी किसी आतंकवादी संगठन से जोड़ देंगे’। इस तरह के संवाद बेहद गंभीर निहितार्थ लिए हुए होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के संवादों के जरिए देश की एक बड़ी आबादी को भड़काने का उपक्रम किया गया है। इस वेब सीरीज पर तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाना चाहिए। भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) के अनुसार ‘जब कोई व्यक्ति लिखित में या संकेतों में या प्रत्यक्ष प्रस्तुतिकरण या किसी अन्य विधि से भारत सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह करता है।‘ 

वेब सीरीज तांडव के जिस संवाद का जिक्र ऊपर किया गया है उससे साफ तौर पर भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने की कोशिश नजर आती है। व्यवस्था के खिलाफ एक पूरे समुदाय को भड़काने की कोशिश भी नजर आती है। किसी समस्या की ओर ध्यान दिलाना और किसी समस्या को लेकर जजमेंटल होना दोनों अलग अलग बात हैं। ‘तांडव’ में ही ऐसा हुआ है ये भी नहीं है, इसके पहले के वेब सीरीज में भी और उसके पहले की कुछ फिल्मों में भी इस तरह के संवाद और दृश्य रखे हैं जो मुसलमानों के मन में भारत सरकार के खिलाफ घृणा के बीज बोने जैसे हैं। इसके पहले एक सीरीज आई थी जिसका नाम है ‘पाताल लोक’ । उस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर इसी तरह की बातें की गई थीं। उस सीरीज में पुलिसवालों के बीच की आपसी बातचीत में मुसलमानों के लिए जिस तरह के विश्लेषण गढ़े गए थे वो भी प्रत्यक्ष रूप से पुलिस और परोक्ष रूप से भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने जैसा था। सीबीआई तक को मुसलमानों के खिलाफ चित्रित किया गया था। सिर्फ संवादों में ही नहीं बल्कि काल्पनिकता की आड़ में भी दृश्यों को इस तरह से चित्रित किया गया था कि इस नैरेटिव को मजबूती मिले कि सरकार मुसलमानों के खिलाफ है। इसके पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में भी दिखाया गया था कि कैसे पुलिस निर्दोष मुस्लिम लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराती है। इसके बाद संवाद के जरिए राजनीतिक बयान दिया जाता है और कहा जाता है कि उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा है और सिस्टम से उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। इसी वेब सीरीज में बाबरी विध्वंस के फुटेज लंबे समय तक दिखाकर बैकग्राउंड से राजनीतिक टिप्पणियां आती रहती हैं। इसके पहले एक फिल्म आई थी ‘मुक्काबाज’, उसमें बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है कि ‘वो आएंगे तुमको मारेंगे और भारत माता की जय कहकर चले जाएंगे’। मंशा स्पष्ट है। किसी चरित्र को पहले की फिल्मों में भी सांप्रदायिक दिखाया जाता रहा है लेकिन पूरे सिस्टम को एक ही रंग में रंगने का प्रयास इन दिनों ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर पर वेब सीरीज में। 

वेब सीरीज में इस तरह के प्रसंगों या दृष्यों को देखने के बाद साफ तौर पर एक पैटर्न नजर आता है जिसमें कि सीरीज के निर्माता मनोरंजन के इस माध्यम का उपयोग किसी खास विचारधारा को पुष्ट करने और किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए करते हैं। इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इन वेब सीरीज के निर्माता हिंदू धर्म प्रतीकों को अपमानित क्यों करते हैं? अगर मुसलमानों को लेकर की गई टिप्पणियों और हिंदू धर्म प्रतीकों के अपमान के चित्रण को जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर साफ नजर आती है। ये तस्वीर है राजनीति की, ये तस्वीर है इन वेब सीरीज के राजनीति का औजार बन जाने की। एक तरफ मुसलमानों के मन में मौजूदा सरकार के खिलाफ, उसकी संस्थाओं के खिलाफ जहर भरने का काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ आप हिंदुओं के धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं। जब आप हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमान करते हैं तो मंशा ये हो सकती है कि आप एक समुदाय विशेष के मन में अपनी साख जमाना चाह रहे हों। ये तब और सही प्रतीत होता है जब इन वेब सीरीज को बनानेवाला एक निर्माता शाहीन बाग पहुंचता है और आंदोलन के दौरान मंच पर खढ़े होकर बिरयानी खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाता है। ये बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति की  का संकेत है। इस प्रवृत्ति के लिए ये वेब सीरीज इस वजह से भी सुविधाजनक है क्योंकि वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स के लिए या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म को लेकर हमारे देश में किसी प्रकार की कोई आचार संहिता नहीं है। 

देश में पिछले दो लोकसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को बहुमत की स्वीकृति मिली। वामपंथी विचारधारा या उसकी तरफ झुकी हुई विचारधारा को जनता ने नकार दिया। लगातार दो नकार से वामपंथ के अनुयायी बौखला भी गए हैं और कुंठित भी होते नजर आ रहे हैं। अब जब उनको जनता के मध्य जाकर अपनी लोकप्रियता वापस प्राप्त करने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने मनोरंजन के इस अराजक माध्यम को अपनी राजनीति का औजार बनाया है। यह अनायास नहीं है कि ‘तांडव’ जैसी घटिया स्टोरी को बड़े कलाकार और बड़ा प्लेटफॉर्म मिलता है। ये एक ऐसी कहानी है जिसमें न तो निरंतरता है न ही रोचकता और न ही कहानी लेखक को भारतीय राजनीति की समझ। इस कहानी में सिर्फ एजेंडा भरा गया है और अखबारों से उठाकर घटनाओं का भोंडा कोलाज बनाने का प्रयास किया गया है। इस कहानी पर तो कायदे से चोरी का केस भी दर्ज होना चाहिए। ब्राहमण प्रोफेसर और उसके दलित प्रेमी के बीच का जो संवाद है वो हिंदी के कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी ‘पीली छतरीवाली लड़की’ से जस का तस उठा लिया गया है। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्र सरकार इस बात को समझे कि इन वेब सीरीज के बहाने राजनीति हो रही है। ये वेब सीरीज राजनीति के औजार से राजनीति का हथियार बनें उसके पहले ही एक सम्यक और व्यापक आचार संहिता बने जो इन सब बातों का ख्याल रख सके।   


Saturday, January 16, 2021

समय के साथ चलने की बड़ी चुनौती


इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक समाप्त हो गया और अब हम तीसरे दशक में प्रवेश कर चुके हैं। रचनात्मक लेखन में भी इन दो दशकों में कई बदलाव देखने को मिले। कुछ लेखकों ने अपनी कहानियों में या उपन्यासों में नए प्रयोग किए, भाषा के स्तर पर भी और कथ्य के स्तर पर भी। बावजूद इसके हिंदी में साहित्य के जितने पाठक होने चाहिए वो नहीं हैं। कहानी, कविता, उपन्यास से लेकर आलोचना और निबंध आदि की पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं। कई बार ये कहा जाता है कि पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े जानने का कोई वैज्ञानिक तरीका हमारे पास नहीं है इस वजह से ये भ्रम बनता है। हो सकता है कि इसमें सचाई हो लेकिन अगर पुस्तकों की बिक्री होती है तो इसके संकेत तो मिलने ही लगते हैं। सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ का उदाहरण दिया जा सकता है। खैर ये अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी। अभी हम बात कर रहे हैं कि हिंदी में कहानियों या उपन्यासों के लेखन प्रविधि में कोई बदलाव हुआ या नहीं। भाषा के स्तर पर कोई नया प्रयोग हुआ कि नहीं। अगर हम सबसे पहले कहानी की बात करें तो मुझे लगता है कि हिंदी कहानी की दुनिया बहुत नहीं बदली । हिंदी कहानी समय के साथ चल नहीं पा रही है और पिछड़ती नजर आ रही है। आज के ज्यादातर कहानीकार अब भी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लिखी गई कहानियों के विषय से अलग जाकर कोई नवोन्मेष करते नहीं दिख रहे। हिंदी की कहानियां गावों से मुक्त नहीं हो पाई है। हिंदी कहानी गांव की भाषा से भी कहां मुक्त हो पाई है। 

जब हम हिंदी कहानी के कम होते पाठक की बात करते हैं तो तमाम साहित्यिक गुणों और अवगुणों की चर्चा करते हैं लेकिन एक बेहद महत्वपूर्ण बात की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता है। हिंदी के कहानीकार ऐसे दोष का शिकार हो रहे हैं जिसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। हिंदी के कहानीकार अब भी गांव भी भाषा लिख रहे हैं जबकि कहानी की पहुंच शहरी पाठक तक अधिक है। ज्यादातर कहानियां गांव की पृष्ठभूमि पर लिखी जा रही हैं जबकि उनकी पहुंच शहरी पाठकों तक अपेक्षाकृत अधिक है। हिंदी के ज्यादातर कहानीकार अपनी कहानियों में अपने पात्रों को उन घटनाओं और परिस्थियों से मुठभेड़ करवाते हैं जो गांव की होती हैं। शहरी घटनाओं और शहरी परिस्थितियों को चित्रित करने का हुनर अभी हिंदी के कम कहानीकारों के पास है। परिणाम ये होता है कि शहरी पाठक गांव की भाषा और परिस्थितियों या घटनाओं से अपना तादात्म्य नहीं बना पाता है और वो हिंदी कहानी से विमुख होने लगते हैं। शहरी पाठक को इस वजह से रेखांकित कर रहा हूं क्योंकि साहित्यिक कृतियों की पहुंच गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। गांवों और कस्बों में पुस्तकों की दुकानें कम हो रही हैं, कम तो शहरों में भी हैं लेकिन शहरी इलाकों में ऑनलाइन या ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस कमी को बहुत हद तक पूरा कर देते हैं। हिंदी के कहानीकारों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी के कुछ कहानीकारों ने शुरुआती कहानियों में शहरी परिवेश को उठाया  लेकिन फिर वो गांव चले गए। हिंदी कहानी की इस स्थिति को देखते हुए मुझे फ्रांसीसी कथाकार सार्त्र का एक कथन याद पड़ता है। सार्त्र ने कभी कहा था कि वो एक ऐसे लेखक हैं जिनको इस बात की चिंता है कि उनके पाठक तो हैं पर पब्लिक नहीं है (वी हैव रीडर्स बट वी हैव नो पब्लिक)। सार्त्र अपने पाठकों से आगे जाकर अपने लिए जनता की तलाश करते हैं उसके लिए प्रयत्न करते हैं। लेखन के स्तर पर भी और पाठकों से आत्मीयता बढ़ाने के अन्य काम करते हुए भी। लेकिन हिंदी के कहानीकार अपने पाठकों की ही बहुत अधिक चिंता नहीं करते हैं तो उनसे ये अपेक्षा करना, कि वो अपनी रचनाओं के लिए ‘पब्लिक’ की तलाश करेंगे, व्यर्थ है। 

यही हाल हिंदी के उपन्यासों का भी है। जहां तक उपन्यासों की पहुंच है वहां की भाषा में उपन्यास कम लिखे जा रहे हैं। हिंदी के पाठक हैं, वो पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन उनको उनकी पसंद की सामग्री नहीं मिल पाती है। आज भी हिंदी में लिखे जा रहे अधिकांश उपन्यासों की कथावस्तु या उसकी भाषा काफी पुरानी हो गई है। हिंदी उपन्यास भी हिंदी कहानियों की तरह गांव से बाहर नहीं निकल पा रही है। उपन्यासों में गांव में आ रहे बदलावों को रेखांकित नहीं किया जा रहा है। समकालीनता की हिंदी में बहुत बातें होती है लेकिन लेखन को समकालीन बनाने के लिए वैसे विषय नहीं उठाए जाते हैं। कोरोना काल में जिस तरह से शहरों में काम करनेवाले लोग अपने गांव की ओर लौटे, उसने गांव का पूरा समीकरण बदल दिया। पारिवारिक से लेकर सामाजिक संरचना पर असर पड़ा लेकिन हिंदी कहानी या हिंदी उपन्यास इस बदलाव को अबतक नहीं पकड़ पाई है। इसके पहले की सामाजिक घटनाओं को भी समकालीन हिंदी रचनाशीलता में स्थान नहीं बना पाई है। दो चार लेखक लिखते तो हैं लेकिन वो पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। यह अनायास नहीं है कि हिंदी में विभाजन पर बहुत ज्यादा नहीं लिखा गया, न ही उसकी त्रासदी पर और ना ही उसके सामाजिक असर पर। यशपाल और भीष्म साहनी ने लिखा जरूर पर इतनी बड़ी त्रासदी के लिए वो बहुत कम है। भारत का विभाजन मानवता के इतिहास में सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है। इस बात पर हिंदी के साहित्यकारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि समय को पकड़ पाने और उसको अपनी रचनाओं में उतार पाने में वो क्यों पिछड़ जा रहे हैं। इक्सीवीं शताब्दी के दूसरे दशक में हिंदी में कुछ नए लेखक आए जिन्होंने अपनी रचनाओं में शहरी युवाओं की कहानियां उनकी भाषा में लिखीं। पाठकों ने ऐसे लेखकों को पसंद भी किया। उनके उपन्यासों को लेकर साहित्य जगत में चर्चा भी हुई लेकिन वो अपनी ही बनाए खांचे को तोड़कर बाहर नहीं निकल पाए और खुद को दोहराने लगे। विश्वविद्यालय कैंपस से बाहर निकलते ही उनके लेखन की सीमाएं सामने आ गईं। 

इससे इतर अगर हम देखें तो सिनेमा ने बदलते हुए समय को पकड़ा। जब व्यवस्था से विद्रोह की बात थी तो एंग्री यंग मैन आया। जब देश में उदारीकरण की आहट सुनाई देने लगी तो तो हिंदी सिनेमा में एंग्री यंग मैन की जगह ऐसे नायक ने ले ली जो कॉलेज का छात्र है। उसके अपने सपने हैं, वो अपने फैसले खुद लेना चाहता है। फिर जब हिंदी सिनेमा इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करता है तो उसकी कहानियां फिर बदलती हैं और वो शहरों की यथार्थवादी कहानियों तक आता है। समाज में प्रचलित उन मुद्दों पर फिल्में बनने लगती हैं जिसपर कम बात होती थी। फिल्मों में संवाद की भाषा बदलती है, गानों के बोल बदलते हैं। विकी डोनर, पीकू, दम लगाके हईसा, बैंड बाजा बारात, लेडीज वर्सेज रिकी बहल से लेकर गली बॉय तक पहुंचती है। इस बदलाव को लोगों ने पसंद भी किया और फिल्में हिंट भी हुईं। सार्त्र के शब्द उधार लेकर अगर कहें तो इन फिल्मों को ‘पब्लिक’ भी मिली। हिंदी कहानीकारों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो समय के साथ चलें और उन पाठकों का ध्यान रखें जहां तक उनकी रचनाएं पहुंच सकती हैं। अगर ऐसा हो पाता है तो वो हिंदी कथा जगत के लिए एक आदर्श स्थिति होगी। अन्यथा हिंदी कहानी भी उसी गति को प्राप्त हो जाएगी जिस गति को हिंदी की आर्ट फिल्में प्राप्त हुईं। 

जिंदगी नाम है कुछ लम्हों का


उर्दू के मशहूर शायर और गीतकार कैफी आजमी का हैदराबाद, औरंगाबाद और मुंबई से खास रिश्ता है। उनके जीवन में प्रेम का प्रवेश हैदराबाद में होता है, परवान औरंगबाद में चढ़ता है और अंजाम तक मुंबई में पहुंचता है। किस्सा कुछ यूं है कि हैदराबाद में एक मुशायरा हो रहा था। इस मुशायरे में कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी और सरदार जाफरी जैसे शायर शामिल थे। श्रोताओं में पहली पंक्ति में सफेद कुर्ता, सफेद शलवार और इंद्रधनुषी दुपट्टा पहने एक बेहद खूबसूरत युवती बैठी थी। मुशायरा खत्म हुआ तो वहां उपस्थित लड़कियों ने ऑटोग्राफ के लिए कैफी को घेर लिया लेकिन सफेद कपड़ों वाली वो हसीन लड़की सरदार जाफरी की ओर गई और उनका ऑटोग्राफ लिया। बाद में वो कैफी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने ऑटोग्राफ के साथ एक बेहद अजीबोगरीब शेर लिख दिया। जब वो बाहर निकल रहे थे तो उस युवती ने कैफी से पूछा कि उनकी कॉपी पर इतना खराब शेर क्यों लिखा ? कैफी ने फौरन कहा कि आप भी तो पहले सरदार जाफरी के पास गईं थीं। इतना सुनते ही वो युवती हंसी और कहते हैं कि दोनों के बीच प्यार की शुरुआत यहीं से होती है। वो युवती शौकत थीं। दिन बीते दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया। 

दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी बेहद रूमानी अंदाज में किया। हैदराबाद के मुशायरे के बाद कैफी, मजरूह और सरदार जाफरी औरंगबाद आ गए। ये लोग शौकत के पिता के मेहमान बने और उनके घर पर ही रुके। एक दिन शौकत और कैफी एक कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। शादी विवाह की बातें होने लगीं तो अचानक शौकत ने कहा कि वो उनका हाथ देखना चाहती हैं। शौकत के हाथ में कैफी का हाथ था और वो उनकी लकीरें देख रही थीं। देखते देखते शौकत ने कहा कि आपकी किस्मत में तो प्रेम विवाह लिखा है। फिर शौकत ने अनूठे अंदाज में प्रपोज कर दिया। एक कागज पर लिखा- ‘जिंदगी के सफर में अगर तुम मेरे हमसफर होते तो यह जिंदगी इस तरह जैसे फूलों पर से नसीमे-सहर’। लिखने के बाद उन्होंने ये कागज का टुकड़ा कैफी को दिया। कैफी ने इसको पढ़ा और शौकत की आंखों में आंख डालकर कहा, ‘मेरी जिंदगी की किस्मत इन्हीं आंखों में है’। 

शौकत और कैफी के बीच प्यार अब परवान चढ़ने लग गया था। लेकिन शौकत की मां इसके पक्ष में नहीं थीं। परिवार ने शौकत पर काफी पाबंदियां लगाईं लेकिन प्रेम पत्रों को रोका नहीं जा सका। शौकत के पिता अपनी बेटी के साथ थे और वो अपनी बेटी को लेकर कैफी से मिलने मुंबई पहुंचे। शौकत जब कैफी से शादी के अपने फैसले पर डटी रही तो उन्होंने सज्जाद जहीर से दोनों की शादी करवाने का अनुरोध किया। तय दिन पर सज्जाद जहीर के घर पर शौकत और कैफी के घर दोनों का निकाह हो गया। निकाह के दौरान भी एक दिलचस्प प्रसंग हुआ। जब काजी ने शौकत से पुछवाया कि उनको अतहर हुसैन रिजवी से निकाह कुबूल है तब शौकत को उनका असली नाम पता चला। लेकिन पेंच तो ये फंसा कि दूल्हा शिया और दुल्हन सुन्नी। ऐसे में तो दो काजी निकाह करवा सकते हैं। अब सब एक दूसरे का मुंह ताकें कि दूसरे काजी का इंतजाम कहां से हो। खैर किसी तरह से सज्जाद जहीर ने मामला निबटाया और निकाह संपन्न हुआ। इस शादी में इस्मत आपा, मजाज,जोश मलीहाबाद, अशफाक बेग, मेहंदी, मुनीष सक्सेना आदि शामिल हुए। शौकत और कैफी की शादी के बाद महफिल जमी तो जोश और मजाज ने जमकर शायरी सुनाई। ये महफिल चल ही रही थी कि अचानक मुनीष और मेहंदी को शरारत सूझी और उन्होंने जोश साहब से कहा कि ‘हैदराबाद में एक रिवाज है कि निकाह वाले दिन दूल्हे के पिता के सर पर सुनहरा पाउडर मला जाता है, और अभी तो आप ही कैफी के पिता हैं। जोश साहब तैयार हो गए और सबने जोश के गंजे सर पर जमकर पाउडर लगाया। तब जोश साहब की महबूबा ने शौकत को मुंहदेखाई के तौर पर दो रुपए दिए थे। कैफी ने अपनी पत्नी को शादी के बाद पहला तोहफा एक किताब दिया था, जिसका नाम था ‘इंसान का उरूज’। इस अनूठी प्रेम कहानी में कई ऐसे लम्हे हैं जो बेहद दिलचस्प हैं, खुद शौकत कैफी ने इन लम्हों को अपने संस्मरणों में कलमबद्ध किया है। 

Saturday, January 9, 2021

हिंदी की मजबूती का मूलमंत्र उदारता


आज विश्व हिंदी दिवस है। इस अवसर पर एक बेहद दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है। बात ग्यारह अप्रैल 1941 की है। जबलपुर में सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार स्टूडेंट्स फेडरेशन का एक सांस्कृतिक अधिवेशन होना तय हुआ था। फेडरेशन के सचिव चाहते थे कि इस अधिवेशन का शुभारंभ अभिनेता और निर्देशक किशोर साहू करें। किशोर साहू को आमंत्रित करने के लिए वो बांबे (अब मुंबई) पहुंचे और उनसे मिलकर अपना प्रस्ताव उनके सामने रखा। किशोर साहू ने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया और नियत दिन वो जबलपुर पहुंच गए। उस वक्त तक किशोर साहू की तीन फिल्में लोकप्रिय हो चुकी थीं और एक निर्माता के तौर पर भी उनकी पहचान बन चुकी थी। रेलवे स्टेशन पर अभिनेता किशोर साहू के स्वागत में काफी लोग जुटे थे। स्टेशन पर ‘कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद’ का नारा भी लगाया गया था। किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘राजनीतिक क्षेत्र में मैने कोई तीर नहीं मारा था, कोई विशेष कॉमरेडी नहीं दिखाई थी।‘ बावजूद इसके उनके स्वागत में कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद का नारा लगा था। इस प्रसंग पर विचार करने से वामपंथ का वो पहलू सामने आता है जिसमें वो लोगों को छद्म नारों आदि से भरमाते रहे हैं। खैर यह अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी चर्चा। 

अभी हम हिंदी की बात कर रहे हैं। शाम को स्टूडेंट फेडरेशन के अधिवेशन का भव्य शुभारंभ हुआ था जिसकी अध्यक्षता विश्वंभरनाथ जी ने की थी। किशोर साहू ने अपना उद्घाटन भाषण अंग्रेजी में दिया था। भाषण को उपस्थित श्रोताओं ने काफी पसंद किया था। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन किशोर साहू के बाद के वाले वक्ता जब बोलने खड़े हुए तो उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देने के लिए किशोर साहू की जमकर आलोचना की। हिंदी फिल्मों से प्रसिद्धि पाने और भाषण अंग्रेजी में देने को लेकर भी उन्होंने किशोर साहू को घेरा था। किशोर साहू तबतक उनको जानते नहीं थे। अपनी आत्मकथा में किशोर साहू ने इस प्रसंग का विस्तार से उल्लेख किया है। किशोर ने मंच पर साथ बैठे एक व्यक्ति से उनका परिचय पूछा। साहू को बताया गया कि ‘वो यशपाल हैं और खुद को कॉमरेड बताते हैं।‘ तबतक किशोर साहू हिंदी के लेखक यशपाल से या उनके नाम से परिचित नहीं थे। तो उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि कौन यशपाल ? जवाब मिला ‘अपने को कम्युनिस्ट कहता है अब फॉर्वर्ड ब्लाकिस्ट बना हुआ है और आपके जयघोष से जलकर आपकी खिल्ली उड़ाना चाहता है।‘ यशपाल ने किशोर साहू की इतनी तीखी और व्यक्तिगत आलोचना कर दी थी कि वो गुस्से से लाल-पीला हो रहे थे और मंच से ही यशपाल पर जवाबी हमला करने लगे थे। मामला गरमा गया था। कुछ अप्रिय घटने की आशंका को लेकर अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे विश्वंभरनाथ ने पहले तो किशोर साहू को रोका और फिर उनसे आगे कुछ नहीं बोलने का अनुरोध किया था। विश्वंभरनाथ ने यशपाल की उनके आचरण के लिए सार्वजनिक रूप से निंदा की और कहा, ’अगर किशोर साहू ने अंग्रेजी में भाषण दे दिया तो कोई पाप नहीं किया। उनका दिल और पोशाक तो भारतीय है। मगर, यशपाल जी, अगर आपको अंग्रेजी से इतनी नफरत है तो आपने यह अंग्रेजी पोशाक क्यों पहन रखी है?’ सभास्थल लोगों के ठहाके से गूंज उठा था। आपको बताते चलें कि कॉमरेड यशपाल ने तब कोट-पैंट पहना हुआ था और गले में लाल टाई बांधी हुई थी। किसी तरह अधिवेशन का उद्घाटन सत्र समाप्त हुआ लेकिन यशपाल अपने उपेक्षा से इतने आहत हो गए कि तय समय से पहले ही अधिवेशन छोड़कर जबलपुर से निकल गए। 

हिंदी दिवस पर इस किस्से का स्मरण इस वजह से हो रहा है कि आज भी कई लोग हिंदी को लेकर इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि वो उसमें अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग को लेकर हाय तौबा मचाने लगते हैं। गैर हिंदी भाषियों से भी अपेक्षा करते हैं कि वो हिंदी में ही बात करें और अगर लिखें तो शुद्ध लिखें। यह आग्रह उचित है लेकिन आग्रह जब जिद में और सामने वाले को अपमानित करने में बदल जाता है तो समस्या गंभीर हो जाती है। किशोर साहू ने साफ तौर पर स्वीकार किया था कि कॉलेज के डिबेट्स में अंग्रेजी में बोलते थे और किसी विषय पर लंबा बोलने के लिए वो अंग्रेजी में ही ज्यादा सहज थे। इसलिए उन्होंने स्टूडेंट्स फेडरेशन के सांस्कृतिक अधिवेशन में अंग्रेजी में भाषण दिया था। यशपाल को ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने किशोर साहू को लेकर सार्वजनिक रूप से व्यक्तिगत कटाक्ष कर दिया। वो यह भूल गए कि फिल्मों की दुनिया में काम करनेवाले किशोर साहू न सिर्फ एक अच्छे अभिनेता के तौर पर स्थापित थे बल्कि उनकी हिंदी में लिखी कहानियां उस दौर की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो चुकी थीं। बाद में तो किशोर साहू ने ‘परदे के पीछे’ के नाम से एक उपन्यास भी हिंदी में लिखा था। 

हिंदी को वैश्विक स्तर पर ना केवल स्वीकार्यता मिल रही है बल्कि व्याप्ति भी बढ़ रही है, लेकिन अगर हिंदी अपना मूल स्वभाव, उदारता, त्यागती है तो स्वीकार्यता और व्याप्ति दोनों में परेशानी हो सकती है। हिंदी में तो शुरू से ही दूसरी भाषा के शब्द लेने की उदारता रही है। हिंदी में आज न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि फारसी और पुर्तगाली तक के शब्द बहुत सहजता के साथ स्वीकृत और प्रचलित हैं। इन भाषाओं के शब्दों को हिंदी ने इतनी उदारता के साथ अंगीकार किया है कि लगता ही नहीं है कि वो दूसरी भाषा के शब्द हैं। दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर दुश्मनी का भाव नहीं होना चाहिए बल्कि देश काल और परिस्थिति के मुताबिक उसको अपने अंदर समाहित और स्वीकृत करने की उदारता होनी चाहिए। इससे ना केवल भाषा समृद्ध होती है बल्कि उसका शब्द भंडार भी व्यापक होता है। यह भी किया जा सकता है कि विदेशी भाषा के शब्दों को स्वीकार करने के पहले अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को देखा, परखा और आजमाया जाए। अगर हमें भारतीय भाषाओं में उपयुक्त शब्द मिल जाते हैं तो उसको अंगीकार करने में प्राथमिकता देनी चाहिए। इस प्रयास की सफलता के लिए आवश्यक होगा कि भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को तैयार किया जाए। जो शब्दकोश तैयार हैं उनको जनता के बीच पहुंचाने का उपक्रम करना होगा। आज जिस तरह से इंटरनेट मीडिया का विस्तार हो रहा है, जिस तरह से देशभर में इंटरनेट का घनत्व बढ़ता जा रहा है, उसको ध्यान में रखते हुए भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने की कोशिश करनी चाहिए। बोलियों के शब्दों को सहेजने का प्रयास होना चाहिए। ये प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर हो रहे हैं, लेकिन वो नाकाफी हैं। इसको संस्थागत स्तर पर शुरू करने का समय है ताकि भारतीय भाषाओं के बीच जो वैमनस्यता बोध कभी कभार गहराने लगता है उसका निषेध किया जा सके।

देश के अलग अलग हिस्सों में केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, वहां अगर इस काम की शुरुआत करवाई जाए तो ये शब्दकोश आसानी से कम समय में बन सकते हैं। किसी एक संस्थान पर बहुत ज्यादा वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा। इसको कुलपति चाहें तो अपने स्तर पर भी आरंभ करवा सकते हैं, लेकिन अगर सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों का केंद्रीयकृत प्रयास हो तो नतीजे बेहतर होंगे। इसकी शुरुआत संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं से की जा सकती है। यह काम अगर अभी शुरू कर दिया जाए तो इससे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में भी सुविधा होगी। जिस तरह से राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं में साहचर्य की बात करती है और मातृभाषा में शिक्षा की बात कहती है उसके लिए सभी भाषाओं के आधुनिक शब्दकोश तैयार करने होंगे और हर वर्ष उसको अद्यतन भी करना होगा। करना भी चाहिए।  

Saturday, January 2, 2021

कलाकारों के लिए भी उम्मीदों का नववर्ष


नया वर्ष नई उम्मीद लेकर आया है। वर्ष के पहले ही दिन देश में कोरोना वैक्सीन के आपात उपयोग को मंजूरी मिल गई है। कोरोना महामारी के भीषण संकट से जूझ रहे देशवासियों के मनोबल को बढ़ाने वाला ये सुखद समाचार है। कोरोना की वैक्सीन ने जो उम्मीद जगाई है उससे देशभर के कलाकार भी खुश होंगे और उनकी उम्मीद भी जगेगी। उनके संकट के दिन भी समाप्त होने के आसार बढ़ेंगे। पिछले नौ दस महीने से कोरोना की वजह से कलाओं के प्रदर्शन पर बहुत असर पड़ा था। मंच पर अपनी कलाओं के प्रदर्शऩ से होनेवाली आय पर ग्रहण लगा हुआ है। कुछ दिनों पहले राजस्थान से खबर आई थी कि पद्मश्री से सम्मानित कालबेलिया नृत्य के लिए मशहूर गुलाबो सपेरा अपने घर की बिजली का बिल नहीं भर पा रही थीं। उन्होंने राजस्थान फोरम के अध्यक्ष पंडित विश्वमोहन भट्ट को इस बाबत एक पत्र लिखकर अपनी पीड़ा जताई थी। गुलाबो ने अपने पत्र में लिखा कि बिल का भुगतान नहीं होने की वजह से उनके घर की बिजली काट दी गई है। इस संबंध में उन्होंने राजस्थान के संस्कृति मंत्री बी डी कल्ला से भेंट कर अपनी व्यथा उनके सामने रखी थी। गुलाबो ने अपने पत्र में लिखा है कि ‘मैंने माननीय मंत्री महोदय श्रीमान बी डी कल्ला से जी से भी निवेदन किया था लेकिन उन्होंने भी असमर्थता व्यक्त करते हुए कोई मदद नहीं की।‘ राजस्थान सरकार की संवेदनहीनता के बाद गुलाबो ने राजस्थान फोरम का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कहा कि उन्हें मदद मांगते हुए बहुत शर्म आ रही है, लोग क्या कहेंगे कि पद्मश्री से सम्मानित कलाकार बिजली का बिल नहीं भर पा रही है। लेकिन बच्चों की खातिर उन्होंने मदद मांगी। राजस्थान फोरम ने उनके बिजली बिल का भुगतान कर दिया जो करीब चौवन हजार रुपए का था। ये हालत तो उस कलाकार की है जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है और जिसने नृत्य की एक विधा को स्थापित कर लोकप्रिय बनाया। 

कोरोना के संकट के समय कलाकारों के सामने जीवन-यापन का बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। कोरोना की वजह से कलाकारों की प्रस्तुतियां बंद हो गईं।     हम इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि जब कलाकार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं तो उनके साजिंदों का क्या हाल होगा। मंच पर गायन प्रस्तुत करनेवाले कलाकार अपनी आय से अपने साजिंदों को भुगतान करते हैं। ज्यादातर साजिंदों को कलाकार प्रस्तुति के हिसाब से भुगतान करते हैं। कोरोना की वजह से पिछले वर्ष मार्च में लॉकडाउऩ हुआ था तब ये चिंता जाहिर की गई थी। केंद्र सरकार से भी कलाकारों के लिए मदद की अपील की गई थी। सरकार की तरफ से मदद का आश्वासन मिला था। बताया गया था कि देशभर में फैले क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के जरिए कलाकारों की मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों को मदद की अपेक्षा कर रहे कलाकारों की सूची बनाने के लिए कहा गया था। पूरे देश में सात सांस्कृतिक केंद्र काम करते हैं जो अपने अपने क्षेत्रों के कलाकारों के संपर्क में रहते हैं। लेकिन सूची बनाने का काम अभी तक कहां पहुंचा ये जानकारी नहीं मिल पाई। कितने कलाकारों को मदद दी गई इसके बारे में भी ज्ञात नहीं हो सका। कई कलाकारों से बात करने के बाद ये पता चला कि कलाकारों को अभी सरकार की तरफ से कोरोना संकट के दौरान कोई आपातकालीन मदद नहीं दी जा सकी है।

इस बीच कलाकारों की मदद के लिए कुछ निजी प्रयास हुए। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने साथियों के साथ मिलकर कलाकारों की मदद की पहल शुरू की थी। ‘सेव द रूट्स’ के नाम से। इसके तहत लोगों से कलाकारों के आर्थिक मदद की अपील की गई थी। बाद में संस्कृति गंगा न्यास भी इससे जुड़ा और अबतक इसके माध्यम से करीब आठ सौ कलाकारों को आर्थिक मदद दी जा चुकी है। राजस्थान फोरम ने भी कलाकारों की मदद का फैसला लिया है।  छोटे कलाकारों के अलावा बड़े कलाकारों को मंच से होनेवाली आय तो नहीं ही हो रही है, उनको भारत सरकार से मिलनेवाली ग्रांट भी देर सबेर मिल रही है। भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय कलाकारों को प्रोडक्शन ग्रांट और सैलरी ग्रांट देता है। पिछले तीन साल से इसको देने में भी देरी हो रही थी। गुरुओं को उनके शागिर्दों के लिए जो सैलरी ग्रांट मिलती थी उसको सरकार अब सीधे उनके खाते में ट्रांसफर करने लगी है। इसकी वजह से भी परेशानी हो रही है। सैलरी ग्रांट का भुगतान समय से हो अन्यथा कलाकारों को परेशानी होती है। किसी कार्यक्रम में कोई शागिर्द तीन महीने काम करता है और प्रोडक्शन के बाद छोड़ कर चला जाता है। जाने के पहले वो गुरू से तीन महीने का अपना तय वेतन लेकर चला जाता है। सरकार उस सैलरी ग्रांट को अगर दो साल बाद उस शागिर्द के खाते में सीधे ट्रांसफर करेगी तो गुरुओं को नुकसान होगा। क्योंकि गुरू तो पहले ही शागिर्द को भुगतान कर चुके हैं। इसके व्यावहारिक पक्ष को देखा जाना चाहिए। इसपर भी विचार करना चाहिए कि शागिर्द गुरुओं के स्थायी कर्मचारी नहीं होते हैं।

इसके अलावा पिछले दिनों कलाकारों को दिल्ली में मिले सरकारी घरों को खाली कराने के नोटिस की भी खूब चर्चा रही। ये सही है कि कलाकार तय समय सीमा से अधिक समय से इन घरों में रह रहे हैं। उनसे सरकारी घरों को खाली करवाना कानूनसम्मत है, लेकिन कोरोना संकट के समय मानवीय आधार पर भी विचार होना चाहिए था। बिरजू महाराज समेत कई कलाकार सरकारी घरों में रह रहे हैं। ये स्थितियां इस वजह से सामने आ रही हैं कि हमारे देश में कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। कांग्रेस के शासनकाल के दौरान ज्यादातार समय संस्कृति से संबंधित मामलों को चलाने का ठेका वामपंथियों के पास था। तय नीति नहीं होने की वजह से वो अपनी विचारधारा के लोगों को तरह-तरह से उपकृत करते रहते थे। भारत ने संस्कृति को लेकर यूनेस्को कंवेंशन 2005 को 15 दिसंबर 2006 को स्वीकार किया था। यूनेस्को कंवेंशन के मुताबिक कला और संस्कृति को लेकर सरकार की नीति के अंतर्गत इनको संरक्षित करने, उसके लिए कानून बनाने, आर्थिक और अन्य मदद के नियम बनाने से लेकर कार्यक्रमों की नीति बनाना तक शामिल किया गया था। इसके मूल में ये अवधारणा है कि संस्कृति सतत विकास की संवाहक होती है। इस कंवेंशन के मुताबिक सरकार को हर वर्ष अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी लेकिन पहली रिपोर्ट नरेन्द्र मोदी सरकार ने 29 अप्रैल 2015 में पेश की। इससे ये भी दिखता है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार संस्कृति को लेकर कितनी गंभीर थी। दरअसल संस्कृति को लेकर जो सबसे बड़ी बाधा है वो ये कि ये सरकारों की प्राथमिकता में नहीं होती है, जिसकी वजह से इसको लेकर कोई ठोस नीति नहीं बन पाती। ठोस नीति के नहीं होने की वजह से अलग अलग विभागों की अपनी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं, कई बार कई संस्थाएं एक ही काम कर रही होती हैं। कोरोना काल में जिस तरह से कलाकारों की समस्याएं उभर कर सामने आईं उसने सांस्कृतिक नीति पर गंभीरता से विचार करने की वजह दे दी है। संस्कृति को बेहद संवेदनशीलता के साथ समझने और उसके मुताबिक काम करने की जरूरत है। संस्कृति मंत्रालय बेहद अहम और संवेदनशील मंत्रालय है जिसके जिम्मे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण और उसको मजबूत करने की जिम्मेदारी है। संस्कृति नीति के लिए संस्कृति मंत्रालय को पहल करनी चाहिए, इसके लिए ये सबसे उचित समय है। अगर ऐसा हो पाता है तो फिर गुलाबो जैसी प्रतिष्ठित कलाकार को अपने घर की बिजली का बिल भरने के लिए कहीं हाथ नहीं फैलना पड़ेगा।     


Saturday, December 26, 2020

सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार हो


अभी अभी क्रिसमस बीता है, उस अवसर पर एक मित्र से बात हो रही थी। उन्होंने बताया कि क्रिसमस के दो दिन पहले उनकी तीन साल की बिटिया ने उनसे पूछा कि ‘व्हेयर इज माइ क्रिसमस ट्री (मेरा क्रिसमस ट्री कहां है)?’ उसके पहले भी वो अपनी बिटिया के बारे में बताते रहते थे कि कैसे अगर वो ब्रश नहीं करती है तो उसको कार्टून सीरियल दिखाना पड़ता है आदि-आदि। वो इस बात को लेकर चिंता प्रकट करते रहते थे कि बच्चों पर इन कार्टून सीरियल्स का असर पड़ रहा है। लेकिन जब क्रिसमस ट्री वाली बात बताते हुए उन्होंने कहा कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि बच्चे कहने लगें कि ‘टुडे इज संडे, लेट्स गो टूट चर्च’ ( आज रविवार है, चलो चर्च चलते हैं) । ये सुनने के बाद मुझे लगा कि उनकी बातों में एक गंभीरता हैं। उनसे बातचीत होने के क्रम में ही एक और मित्र से हुई बातचीत दिमाग में कौंधी। उसने भी अपने दो साल के बेटे के उच्चारण के बारे में बताया था कि वो इन दिनों ‘शूज’ को ‘शियूज’ कहने लगा है। इन दोनों में एक बात समान थी कि दोनों के बच्चे यूट्यूब पर चलनेवाले सीरियल ‘पेपा पिग’ देखते हैं और दोनों उसके दीवाने हैं। लॉकडाउन के दौरान जब बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे और घर पर थे तो ‘पेपा पिग’ और भी लोकप्रिय हो गया। यूट्यूब पर इसका अपना चैनल है जिसको लाखो बच्चे देखते हैं। ‘पेपा पिग’ चार साल की है जिसका एक भाई है ‘जॉर्ज’ और उसके परिवार में मम्मी पिग और डैडी पिग हैं। बच्चे इसके दीवाने हैं कि ‘पेपा पिग’ के चित्र वाला स्कूल बैग से लेकर पानी की बोतल, लंच बॉक्स तक बाजार में मिलते है। बच्चे इन सामग्रियों को बहुत पसंद करते हैं। कई छोटे बच्चों के माता-पिता से बात हुई तो उन्होंने कहा कि ‘पेपा पिग’ उनके लिए बहुत मददगार है क्योंकि जब बच्चा जिद करता है या खाना नहीं खाता है तो उसको ‘पेपा पिग’ के उस जिद से संबंधित वीडियो दिखा देते हैं और वो खाने को तैयार हो जाता है। ये कार्टून कैरेक्टर के वीडियोज को ब्रिटेन की एक कंपनी बनाती है और उसको यूट्यूब पर नियमित रूप से अपलोड करती है। 

ये बातें बेहद सामान्य बात लग सकती है। ‘पेपा पिग’ के वीडियोज के संदर्भ में ये तर्क भी दिया जा सकता है कि वो परिवार की संकल्पना को मजबूत करता है। ये बात भी सामने आती है कि ब्रिटेन में जब पारिवारिक मूल्यों का लगभग लोप हो गया तब बच्चों को परिवार नाम की संस्था की महत्ता के बारे में बताने के लिए ‘पेपा पिग’ का सहारा लिया गया है। वो वहां काफी लोकप्रिय हो रहा है लेकिन उन्होंने इन वीडियोज को अपने धर्म, अपनी संस्कृति के हिसाब से बनाया है। लेकिन जिस तरह का असर हमारे देश के बच्चों पर पड़ रहा है, जिस तरह की बातों का उल्लेख ऊपर किया गया है, उसके बाद इन वीडियोज के हमारे देश में प्रसारण के बारे में विचार किया जाना चाहिए। अगर मेरे मित्रों की कही गई बातों का ध्यान से विश्लेषण करें तो इससे बच्चों के दिमाग में एक ऐसी संस्कृति की छाप पड़ रही है जो भारतीय नहीं है। बालमन पर पड़ने वाले इस प्रभाव का दूरगामी असर हो सकता है। बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति से दूर हो सकते हैं। इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि क्या इन वीडियोज से हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का और अधिक क्षरण होगा। इस समय संचार माध्यमों का उपयोग अपने हितों का विस्तार देने के औजार के तौर पर किया जा रहा है. इसका ध्यान रखना अपेक्षित है। तकनीक के हथियार से सांस्कृतिक और धार्मिक उपनिवेशवाद को मजबूत किया जा सकता है। ‘पेपा पिग’ के माध्यम से जो बातें हमारे देश के बच्चे सीख रहे हैं वो तो कम से कम इस ओर ही इशारा कर रहे है। बाल मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि बच्चे जब इस तरह के वीडियोज देखते हैं तो वो अपने आसपास की दुनिया को भी वैसा ही समझने लगते हैं। इसका असर बच्चों के बौद्धिक स्तर पर भले न पड़ता हो लेकिन उसका सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। जब सामाजिक जीवन प्रभावित होता है तो संस्कृति प्रभावित होती है।

अभी हाल में भारत सरकार ने क्यूरेटेड और नॉन क्यूरेटेड सामग्री को लेकर मंत्रालयों के बीच स्थिति स्पष्ट की थी। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी), जहां क्यूरेटेड सामग्री दिखाई जाती है, उसको सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन किया गया था। नॉन क्यूरेटेड सामग्री दिखाने वाले जिसमें यूट्यूब, फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स आते हैं को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन किया गया। ये इन प्लेटफॉर्म्स पर चलनेवाले कंटेट पर बेहतर तरीके से ध्यान देने के लिए किया गया है। यूट्यूब पर चलनेवाले चैनलों पर अगर भारतीय संस्कृति को प्रभावित करनेवाले वीडियोज हैं तो भारत सरकार को इसको गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसा करना इस वजह से भी आवश्यक है क्योंकि हमने वो दौर भी देखा है जब कांग्रेस ने वामपंथियों को संस्कृति और उससे जुड़े विभाग आउटसोर्स किए थे। उस दौर में कालिदास के नाटकों पर चेखव के नाटकों और प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ पर मैक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘मां’ को तरजीह दी गई। परिणाम ये निकला कि हमारा सांस्कृतिक क्षरण बहुत तेजी से हुआ। शिक्षा, भाषा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जितना काम होना चाहिए था वो हो नहीं पाया। अंग्रेजी के दबदबे की वजह से सांस्कृतिक उपनिवेशवाद को मजबूती मिली। इसका असर बच्चों पर भी पड़ा। भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री ने नेपथ्य में धकेल दिया। अब तकनीक के माध्यम से जिस तरहसे भारतीय संस्कृति को दबाने का प्रयास किया जा रहा है उसका प्रतिकार जरूरी है।  

प्रतिकार का दूसरा एक तरीका ये हो सकता है कि बच्चों के लिए बेहतर वीडियोज बनाकर यूट्यूब से लेकर अन्य माध्यमों पर प्रसारित किए जाएं। इसको ठोस योजना बनाकर क्रियान्वयित किया जाए।। भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा और भारतीयता को चित्रित करते वीडियोज को बेहद रोचक तरीके से पेश करना होगा ताकि बच्चों की उसमें रुचि पैदा हो सके। हमारे पौराणिक कथाओं में कई ऐसे चरित्र हैं जो बच्चों को भा सकते हैं, जरूरत है उनकी पहचान करके बेहतर गुणवत्ता के साथ पेश किया जाए। इसके लिए सांस्थानिक स्तर पर प्रयास करना होगा क्योंकि ‘पेपा पिग’ का जिस तरह का प्रोडक्शन है वो व्यक्तिगत प्रयास से बनाना और उसकी गुणवत्ता के स्तर तक पहुंचना बहुत आसान नहीं है। इसके लिए बड़ी पूंजी की जरूरत है। व्यक्तिगत स्तर पर छिटपुट प्रयास हो भी रहे हैं लेकिन वो काफी नहीं हैं क्योंकि उनकी पहुंच बहुत ज्यादा हो नहीं पा रही है। हमारे देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक बीत चुके हैं लेकिन हमने अबतक अपनी संस्कृति को केंद्र में रखकर ठोस काम नहीं किया। आजादी के पचहत्तर साल पूरे होने के मौके पर फिल्म जगत के बड़े निर्माताओं ने फिल्में बनाने की घोषणा की है। करण जौहर ने इसकी घोषणा करते हुए ट्वीटर पर प्रधानमंत्री को टैग भी किया है। जरूरत इस बात की है कि करण और उनके जैसे बड़े निर्माता बच्चों के लिए मनोरंजन सामग्री बनाने के बारे में भी विचार करें। ‘पेपा पिग’ के स्तर का प्रोडक्शन हो जिसमें भारतीय संस्कृति के बारे में बताया जाए। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो ना केवल अपनी संस्कृति को सांस्कृतिक औपनिवेशिक हमलों से बचा पाएंगे बल्कि आनेवाली पीढ़ी को भी भारतीयता से जोड़कर रख पाएंगे। 


Thursday, December 24, 2020

पौराणिक भारतीय कथाओं में दिलचस्पी


कोरोना की छाया में बीत रहे इस वर्ष में भारतीय दर्शकों को पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं में गहरी दिलचस्पी देखने को मिली। लॉकडाउन के दौरान जब दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत सीरियल दिखाने का एलान हुआ था तब इस बात की आशंका भी थी कि इतने लोकप्रिय धारावाहिकों को दूसरी बार देखा जाएगा कि नहीं। तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए रामायण धारावाहिक ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। अप्रैल में प्रसारित एपिसोड को करीब पौने आठ करोड़ दर्शकों ने देखा। रामायण के दर्शकों का ये आंकड़ा हाल फिलहाल में पूरी दुनिया में किसी भी सीरीज को हासिल नहीं हो सका है। मशहूर और बेहद लोकप्रिय सीरीज ‘द गेम ऑफ थ्रोन्स’ और ‘बिग बैंग थ्योरी’ को भी इतने अधिक दर्शक नहीं मिले थे। उनके दर्शक भी पौने दो करोड़ तक पहुंच सके थे। तब प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर वेम्पति ने ट्वीट कर देशभर के दर्शकों का शुक्रिया अदा किया था और साथ ही ये जानकारी भी साझा की थी कि टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) जारी करनेवाली संस्था बीएआरसी के मुताबिक इस वर्ष के तेरहवें सप्ताह में दूरदर्शन देशभर में सबसे अधिक देखा जानेवाला चैनल बन गया। सिर्फ रामायण ही नहीं बल्कि महाभारत को भी दर्शकों ने बेहद चाव से देखा। इसके अलावा चाणक्य और शक्तिमान को मिले दर्शकों ने दूरदर्शन को अपने पुराने सीरीज के पुनर्प्रसारण का रास्ता दिखाया।

कोरोना काल के दौरान के दौरान रामायण और महाभारत को मिली अपार सफलता ने एक बार फिर से साबित किया कि हमारे देश के दर्शकों में धर्म और अध्यात्म से संबंधित चीजों को देखने जानने और समझने की लालसा है। जरूरत इस बात की है कि उनको इस तरह की श्रेष्ठ सामग्री दिखाई जाए। देश का युवा वर्ग भी अपनी परंपराओं और अध्यात्म में खासी रुचि रखता है, ये बात भी इन सीरीज की लोकप्रियता ने साबित की। हमारे देश में आध्यात्म का जो बल है, अध्यात्म की जो आतंरिक अनुभूति है उसका प्रकटीकरण भी कोरोना काल के दौरान हुआ। इसको ध्यान में रखते हुए एक बार फिर से पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित फिल्में और सीरीज बनाए जाने लगे हैं। आनेवाले दिनों में पृथ्वीराज चौहान से लेकर महाभारत की कहानियों पर आधारित फिल्में आने वाली हैं। हमारा देश कथावाचकों का देश रहा है। कथावाचन की हमारे यहां सुदीर्घ परंपरा रही है। इस कथावाचन का आधार भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक पात्र और चरित्र रहे हैं। फिल्मों में भी कथावाचन की इस परंपरा के सूत्र को खोजने और उसको पकड़कर दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिशें इस वर्ष आरंभ हो चुकी है।  

देसी कहानियों के बोलबाला का वर्ष


वर्ष 2020 खत्म होने को आया। लगभग पूरा वर्ष कोराना संकट से जूझते ही बीता। कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन की वजह से पूरे देश के सिनेमा हॉल कई महीनों तक बंद रहे। कोरोना के भय के कम होने के बाद जब सिनेमा हॉल खुले तब भी दर्शकों का पुराना प्यार नहीं मिल पाया है। मनोरंजन के विकल्प के तौर पर लोगों की रुचि वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स में बढ़ी। फिल्में भी वहीं रिलीज होने लगीं। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स पर दर्शकों की संख्या में भी अभूतपूर्व इजाफा हुआ, महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक में। ये वो घटनाएं रहीं जिनके बारे में चर्चा होती रही है लेकिन कोरोना संकट के दौरान पिछले नौ महीने में कुछ ऐसा मंहत्वपूर्ण हुआ जिसने मनोरंजन जगत को बहुत गहरे तक प्रभावित किया। उसकी दिशा में अहम बदलाव देखने को मिला। सबसे पहले जिस महत्ववपूर्ण बदलाव को रेखांकित करने की जरूरत है वो है कहानियों में भारतीय परिवेश और भारतीयता का बढ़ता चलन। अगर हम इस वर्ष रिलीज हुई फिल्मों और वेब सीरीज पर नजर डालें तो इनकी कहानियों में भारतीयता बोध उभर कर सामने आता है। फिल्मकारों ने उन कहानियों को तवज्जो दी और दर्शकों ने भी उसको पसंद किया जिसमें अपनी माटी की मिट्टी की खुशबू थी, अपने आसपास की कहानी होने का लगाव सा था या अपने समाज में घटी या घट रही घटनाओं का चित्रण है। जैसे अगर हम बात करें तो सबसे पहले जून में रिलीज हुई फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ का कथानक जेहन में आता है। एक हवेली के माध्यम से मिर्जा और उनकी बेगम के बीच रची गई इस कॉमेडी ड्रामा में लखनऊ का परिवेश साकार हो उठता है। इस फिल्म की कहानी के साथ साथ संवाद में भी लखनऊ की पूरी संस्कृति उपस्थित है। ‘गुलाबो सिताबो’ की रिलीज के अगले ही महीने एक और फिल्म आई जिसमें हमारे आसपास की ही एक और कहानी को दर्शकों ने खूब पसंद किया, ये फिल्म थी ‘शकुंतला देवी’। इस फिल्म में गणित की जीनियस शकुंतला देवी के बहाने दर्शकों को आजादी पूर्व के दक्षिण भारत के एक गांव का परिवेश दिखता है। वहां के सामाजिक यथार्थ से सामना होता है और फिर ये कहानी महानगरों से होती हुई दर्शकों को देश विदेश ले जाती है। इस पूरी कहानी में भारतीय परिवार के सस्कारों को स्थापित किया गया है। एक और फिल्म का उल्लेख करना आवश्यक है वो है ‘गुंजन सक्सेना, द करगिल गर्ल’। इस फिल्म में भी एक भारतीय महिला अफसर की जाबांजी के किस्से को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया है। 

हम इन फिल्मों में एक साझा सूत्र की तलाश करें तो हमें अपने देसी परिवेश और यहां का संघर्ष दिखाई देता है, भारतीय होने का गौरव दिखाई देता है। कोरोना संकट शुरू होने के पहले एक फिल्म आई थी तान्हाजी, इसमें भी हमारे देश के उस नायक को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया था जिसकी वीरता के किस्से लोकगाथाओं में गूंजते हैं। इन सबके मद्देनजर ये भी कहा जा सकता है कि ये वर्ष फिल्मों में लेखकों की वापसी का वर्ष भी रहा। बीच में इस तरह की कहानियां आ रही थीं जिनके बारे में ‘माइंडलेस कॉमेडी’ जैसे शब्द कहे जाते थे लेकिन इस वर्ष जितनी भी कहानियां आईं उसमें अगर कॉमेडी भी थी तो उसका एक अर्थ था, एक संदेश था। इस तरह की एक और फिल्म आई ‘छलांग’, जिसकी कहानी हरियाणा के एक गांव के स्कूल के इर्द गिर्द चलती है। ये भी एक कॉमेडी ड्रामा ही है लेकिन इसमें भी हरियाणा का परिवेश जीवंत हो उठता है। एक जमाना था जब विदेशी फिल्मों के प्लॉट उठातक उसको भारतीय स्थितियों में ढालकर चित्रित किया जाता था। यहां तक अब तक की सबसे हिट फिल्म मानी जानेवाली ‘शोले’ को भी कुरुसोवा की फिल्म सेवन समुराई पर आधारित माना गया था। लेकिन इस वर्ष को भारतीय फिल्मों में भारतीय कहानियों के वर्ष के तौर पर याद किया जाएगा। 

इसी तरह से अगर हम वेब सीरीज देखें तो उसमें भी भारतीय कहानियों की मांग ही बढ़ी। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर दुनियाभर की सीरीज मौजूद हैं लेकिन भारतीय कहानियों और लोकेल पर पर बनी सीरीज अधिक पसंद की गईं। इस साल रिलीज हुई वेब सीरीज पर नजर डालें तो चाहे वो आर्या हो, पाताल लोक हो, आश्रम हो, बंदिश बैंडिट्स हो, पंचायत हो इन सबमें हमारे आसपास की कहानियां हैं। ना सिर्फ कहानियों में बल्कि इन सीरीज की भाषा और मुहावरों में भी देसी बोली के शब्दों को जगह मिलने लगी है। अगर हम याद करें तो एक वेब सीरीज आई थी जामताड़ा, सबका नंबर आएगा। इस फिल्म के संवाद में ‘कनटाप’ शब्द का उपयोग हुआ है। ये शब्द कानपुर और उसके आसपास में प्रयोग किया जाता है। इसी तरह से वेब सीरीज आर्या में भी राजस्थान की भाषा सहज रूप से आती है और लोग उसको स्वीकार भी करते हैं और पसंद भी। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए ये कहा जा सकता है कि ये वर्ष भारतीय मनोरंजन जगत के आत्मनिर्भर होने और अपनी आंतरिक सामर्थ्य को पहचानने का वर्ष भी रहा।