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Saturday, September 25, 2021

सूफियों पर पुनर्विचार की जरूरत


हिंदी के मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह की एक पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ 1982 में प्रकाशित हुई थी। तब उस पुस्तक की बहुत चर्चा हुई थी। इसकी भूमिका में नामवर सिंह ने स्वीकार किया था कि ‘परंपरा के समान ही खोज भी एक गतिशील प्रक्रिया है’। उसी गतिशील प्रक्रिया के तहत उन्होंने अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि की खोज की थी। इस पुस्तक के प्रकाशन  के 37 साल बाद एक और मार्क्सवादी आलोचक सुधीश पचौरी ने ‘तीसरी परंपरा की खोज’ पुस्तक लिखी जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। सुधीश पचौरी अपनी इस पुस्तक में ‘हिंदी साहित्य के उपलब्ध इतिहास की अबतक न देखी गई सीमा को उजागर करने’ का दावा करते हैं। ये भी कहते हैं कि ‘ये हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन का दरवाजा खोलती है’। इसमें नामवर सिंह की खोज से आगे जाकर सुधीश पचौरी ने कुछ ‘खोजा’ है। इस लेख का उद्देश्य इन दोनों पुस्तकों की तुलना करना नहीं है बल्कि सुधीश पचौरी की पुस्तक के कुछ निष्कर्षों पर विचार करना है। सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक में सूफियों को इस्लाम का प्रचारक कहा है। अपनी इस अवधारणा के समर्थन में उन्होंने पूर्व में लिखी गई पुस्तकों और वक्तव्यों का सहारा लिया है। सुधीश पचौरी लिखते हैं, ‘मध्यकाल के इतिहास ग्रंथों में सूफी कवियों की छवि ठीक वैसी नजर नहीं आती जैसा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में नजर आती है। साहित्य के इतिहास में वे सिर्फ कवि हैं जबकि इतिहास ग्रंथों में वो वे इस्लाम के प्रचारक के तौर पर सामने आते हैं। साहित्य के इतिहास का लेखन अगर अंतरानुशासिक नजर से किया जाता तो सूफियों की इस्लाम के प्रचारक की भूमिका स्पष्ट रहती।‘ सुधीश पचौरी ने इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि सूफी लोग सुल्तानों के साथ आते थे। उनका काम इस्लाम का प्रचार होता था लेकिन यहां के यथार्थ की जटिलताओं को देखकर कई सुल्तान कट्टर की जगह नरम लाइन लेने लगते थे उसी तरह सूफी भी अपनी लाइन को बदलते थे। 

इतिहासकार मुजफ्फर आलम की बातों से इसकी पुष्टि भी होती है। उनके हवाले से लिखा गया है कि ‘उत्तर भारत में ग्यारहवीं शताब्दी में गजनवी के हमलों के साथ ही सूफियों का आगमन हो गया था। तेरहवीं शताब्दी में जब सल्तनत स्थापित हो गया तब सूफियों ने भी अपना विस्तार आरंभ किया’। सूफियों के विस्तार का तरीका बहुत चतुराई भरा था। वो इस्लाम के धर्मगुरुओं से अलग तरीके से काम करते थे लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही होता था कि जिन इलाकों को सुल्तान जीतता था उन इलाकों में इस्लाम को मजबूत करते चलना। इस काम के लिए वो भारत के संतों और महात्माओं से संवाद करते थे और उनकी उन बातों को अपनी रचनाओं में शामिल कर लेते थे जो उनके धर्म को बढ़ावा देने के काम आ सकती थीं। इतिहासकार जियाउद्दनी बरनी के हवाले से ये भी बताया गया है कि जब सुल्तान शम्सुद्दीन अलतुतमिश से इस्लाम के धर्मशास्त्रियों ने शरीआ लागू करने की मांग की और हिंदुओं के सामने इम्माइल इस्लाम-इम्माइल कत्ल यानि इस्लाम या कत्ल में से एक को चुनने का विकल्प दिया जाए तो सुल्तान ने बेहद चतुराई से इस मसले को टाल दिया था। सुल्तान ने तब कहा था कि अभी अभी हिन्दुतान को जीता गया है जहां हिन्दू बड़ी संख्या में रहते हैं। अगर अभी शरीआ लागू की गई तो हिंदू एकजुट हो सकते हैं और विद्रोह हो सकता है। जब मुस्लिम सेनाएं और ताकतवर हो जाएंगी तब हिंदुओं को इस्लाम या मृत्यु में से एक विकल्प चुनने की बात होगी। इस प्रसंग में अगर सूफियों के उपयोग की बात जोड़कर देखें तो पूरा परिदृश्य साफ हो जाता है। 

हिंदी साहित्य कि बात करें तो सूफियों को इस तरह से स्थापित किया गया कि वो सामाजिक समरसता को बढ़ाने में या सामासिक संस्कृति की जड़ें मजबूत करने के लिए अपनी कविताओं और गीतों का उपयोग करते थे। उनको इस तरह से स्थापित किया गया कि कई लोग तो सूफी ‘संत’ तक कहे जाने लगे। साहित्य के इतिहास में ऐसे कई ‘संतों’ का उल्लेख मिलता है। जबकि वो उन दिनों अपने धर्म का प्रचार करने के लिए इस भूमि पर आए थे। उनका उपयोग उस दौर के आक्रमणकारियों ने साफ्ट पावर के तौर पर किया था। जो काम तलवार नहीं कर पा रही थी उस काम को इन कथित संतों ने अपनी बोली और वाणी से करने का काम किया। इन ‘संतों’ को स्थापित और लोकप्रिय करने के लिए कई मार्क्सवादी इतिहासकारों ने श्रमपूर्वक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। सतीश चंद्रा ने मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखते हुए भक्तिकाल के कवियों की चर्चा में सूफियों को तो याद किया लेकिन तुलसीदास का नाम भी नहीं लिया। ये भूल नहीं हो सकती, ये सायास था। ऐतिहासिक घटनाओं की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की गई जिसने हमारे देश में इस्लाम के प्रचार प्रसार को अलग ही रंग दे दिया। युद्ध में जय पराजय को उस वक्त हमारे देश में व्याप्त सामाजिक स्थितियों से जोड़कर देखा गया। नागरीय क्रांति जैसे पद गढे गए। भारतीय समाज को जातियों में बांटकर इतिहास लेखन किया गया। उस वक्त समाज में व्याप्त कुरीतियों को भी इतिहास लेखन का आधार बनाया गया।  लेखन की इस पक्षपाती प्रविधि ने इतिहास को एकांगी कर दिया। अगर इतिहास को समग्रता में लिखा गया होता और सारी बातों जनता के सामने आती तो संभव है कि इतिहास के पुनर्लेखन की बात नहीं होती। दुनिया में इतिहास लेखन इस बात का गवाह है कि जब भी इतिहास लेखन एकांगी हुआ है तो उसको वर्षों बाद भी समावेशी करने की कोशिशें हुई हैं। अगर इतिहासकार किसी भी देश के इतिहास को यथार्थ से दूर लेकर जाते हैं और उसमें कल्पना या अपने सिद्धांत के आधार पर की गई व्याख्या को यथार्थ बनाने की कोशिश करते हैं तो फिर उसके पुनर्लेखन की बात होती ही है चाहे वो दशकों बाद हो या उससे भी बड़े कालखंड के बाद। 

सूफियों का जिस तरह से महिमामंडन किया गया वो भले ही बहुत लंबे कालखंड तक स्वीकार्य रहा लेकिन अब साहित्य के अंदर से ही उस महिमामंडन पर प्रश्न खड़े होने आरंभ हो गए हैं। हिंदी साहित्य में अनेक प्रकार के ज्ञानात्मक विमर्श होते रहे हैं लेकिन साहित्य के इतिहास लेखन को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं दिखाई देता। यूरोप और अमेरिका में आज से करीब पचास पूर्व ही इतिहास लेखन को लेकर एक बहुत गंभीर बहस चली थी। न सिर्फ बहस चली बल्कि इतिहास को नए नजरिए से देखने की कोशिशें भी हुईं। हमारे देश में इतिहास लेखन को राजनीति से जोड़ दिया जाता है इस वजह से हमारे यहां इतिहास लेखन की प्रविधियों को लेकर न तो विमर्श हो पाता है और न ही नए दृष्टिकोण से लेखन। नतीजा यह होता है कि जब भी कोई लेखक इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश करता है तो उसको हतोत्साहित किया जाता है। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है कि तो ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि इतिहास लेखन को लेकर ऐसा माहौल बनाया जाए कि अलग अलग तरीके से घटनाओं और प्रवृतियों पर विचार किया जाए। हिन्दुस्तान पर आक्रमण करके उसको गुलाम बनानेवाली ताकतों और उन ताकतों को भारत में स्थापित करने वाले तमाम लोगों, समूहों और शक्तियों के बारे में उपलब्ध जानकारियों के आधार पर समग्र विश्लेषण हो। कोई तथ्य न दबाया जाए न छिपाया जाए। न तो सतीश चंद्रा जैसी गलती होने दी जाए और न ही सूफियों के बारे में उपलब्ध तथ्यों को दबाया जाए। 


Friday, September 24, 2021

आक्रांता के सेनापति के नाम सड़क


अगर आप कभी पूर्वी दिल्ली से लोदी कालोनी होते हुए बीके दत्त कालोनी जाते हैं तो आपको एक सड़क से गुजरना पड़ता है। उस सड़क का नाम है नजफ खान रोड। ये लोदी कालोनी के बाहर बाहर निकलती है और इसी सड़क पर नजफ खान का मकबरा भी है। ये मकबरा एक बहुत बड़े पार्क में बना हुआ है। कभी आपने सोचा है कि ये नजफ खान कौन था जिसके नाम पर इस महत्वपूर्ण इलाके की एक सड़क का नामकरण हुआ। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि वो कौन लोग थे जिन्होंने हिन्दुस्तान को परतंत्र बनाए रखने के लिए दर्जनों युद्ध लड़े । जब मुगलों की सत्ता कमजोर होने लगी थी तो शाह आलम द्वितीय ने मिर्जा नजफ खान को अपना सेनापति बनाया था। मिर्जा नजफ खान ने मुगलों की सत्ता को फिर से स्थापित करने के लिए सेना को संगठित किया और दिल्ली के आसपास कई युद्ध लड़े। उसने जाट राजा नवल सिंह की सेना के साथ मैदानगढ़ी पर कब्जा करने के लिए युद्ध किया था। इस युद्ध में नजफ खान बुरी तरह से घायल हुआ लेकिन मैदानगढ़ी पर कब्जा करने में उसको कामयाबी हासिल हुई। नजफ खान यहीं नहीं रुका था उसने दिल्ली से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर रामगढ़ के किले पर कब्जे के लिए भी उसपर चढाई की और कई दिनों के युद्ध के बाद उसपर कब्जा कर लिया। उसने रामगढ़ के किले पर कब्जा करने के बाद उसका नाम बदलकर अलीगढ़ कर दिया। तब से अलीगढ़ उसी के नाम से जाना जाता है। 

मिर्जा नजफ खान बहुत शातिर सैनिक था और वो जानता था कि साम्राज्य को बढ़ाने और उसको कायम रखने के लिए किन किन विधियों का उपयोग करना चाहिए। मुगल सल्तनत को दिल्ली में मजबूती देने के लिए उसने जासूसी का एक पूरा तंत्र विकसित किया था। उसके पास महल के अंदर की हर गतिविधि की जानकारी होती थी। यहां तक कि वो शाह आलम द्वितीय के हरम पर भी नजर रखता था। वो अपने विरोधियों को निबटाने के लिए खुफिया जानकारियों का उपयोग करता था। उसके जासूस आम जनता पर भी नजर रखते थे ताकि किसी तरह की विद्रोही गतिविधि से निबटा जा सके। नजफ खान को इस बात के लिए याद किया जाना चाहिए कि उसने दिल्ली के आसपास हुए स्थानीय विद्रोह को नाकाम किया, उसको रोका ताकि मुगलों का राज कायम रह सके। विदेशी आक्रांताओं को मदद और मजबूती देनेवाले नजफ खान नाम पर स्वाधीन भारत में सड़क होना सालता है।  

Saturday, September 18, 2021

गलतियां सुधारने की चुनौतियां


उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में महाराजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय की आधारशिला रखने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के राष्ट्र नायकों और राष्ट्र नायिकाओं को याद करते हुए कहा कि उनकी तपस्या से देश की अगली पीढियों को परिचित ही नहीं कराया गया। बीसवीं सदी की उन गलतियों को आज इक्कीसवीं सदी का भारत सुधार रहा है। अलीगढ़ के समारोह के दो दिन बाद प्रधानमंत्री ने दिल्ली में संसद टीवी का शुभारंभ किया। संसद टीवी का गठन लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी के विलय के बाद किया गया है। जब प्रधानमंत्री संसद टीवी का शुभारंभ कर रहे थे तो उनका अलीगढ़ में दिया उपरोक्त भाषण याद रहा था कि बीसवीं सदी की गलतियों को आज इक्कसीवीं सदी का भारत ठीक कर रहा है। आपके मन में प्रश्न उठ सकता है कि कैसे? इसको समझने के लिए हमें तीन दशक पूर्व जाना होगा। 1989 में ये संसद सत्र के दौरान की कार्यवाही का कुछ अंश दूरदर्शन पर दिखाने का फैसला हुआ। इस तरह से दूरदर्शन लोकसभा की शुरुआत हुई। कुछ सालों बाद दूरदर्शन लोकसभा पर प्रश्नकाल का प्रसारण आरंभ हुआ। ये व्यवस्था चलती रही। 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी। लोकसभा के अध्यक्ष बने सोमनाथ चटर्जी। सरकार के गठन के कुछ महीने बाद ही लोकसभा के अलग चैनल को लेकर चर्चा शुरु हो गई थी। 2006 में लोकसभा टीवी के नाम से एक स्वतंत्र सैटेलाइट चैनल अस्तित्व में आया। उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक स्वतंत्र लोकसभा चैनल शुरु करने के लिए आरंभिक निवेश 8 करोड़ रुपए था और चैनल चलाने के लिए 12 से 15 करोड़ रु वार्षिक खर्च होने का अनुमान लगाया गया था। ये चैनल लोकसभा सचिवालय के अधीन था। 

जब लोकसभा के लिए स्वतंत्र चैनल आरंभ हुआ तो राज्यसभा से जुड़े लोगों में भी अपने चैनल को लेकर चर्चा आरंभ हो गई। 2006 में राज्यसभा की एक समिति ने इसपर विचार किया। समिति इस नतीजे पर पहुंची कि राज्यसभा के लिए एक स्वतंत्र चैनल की जरूरत नहीं है। मामला ठंडे बस्ते में चला गया। लेकिन उसके बाद भी बैठकों का दौर चलता रहा और अंत में  कई तरह की आपत्तियों के बावजूद 2011 में राज्यसभा ने अपना एक स्वतंत्र चैनल लांच कर दिया गया। ये चैनल राज्यसभा सचिवालय के अधीन था। उस वक्त राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी थे। इस चैनल को लांच करने का अनुमानित खर्च 28 करोड़ रुपए था और चलाने का सलाना खर्च 15 करोड़ के करीब था। ये खर्च बढ़ता ही चला गया। फिर तो राज्यसभा ने संविधान के नाम से सीरीज बनावाया और एक फिल्म का भी निर्माण करवाया। इन खर्चों पर विवाद भी उठे। इतना विस्तार से बताने का उद्देश्य ये है कि आपत्तियों के बावजूद हामिद अंसारी की मंजूरी मिली। जो चैनल प्राथमिक रूप से राज्यसभा की कार्यवाही दिखाने के लिए आरंभ किया गया था वो एक खास विचारधारा के लोगों का अड्डा बनने लगा था। कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा के लोगों को वहां जगह मिलने लगी थी और वो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अपनी विचारधारा का पोषण करने में जुटे थे।  

फिर 2014 में लोकसभा के चुनाव हुए और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी। सुमित्रा महाजन लोकसभा की अध्यक्ष बनीं लेकिन उपराष्ट्रपति का दूसरा कार्यकाल मिलने की वजह से हामिद अंसारी राज्यसभा के सभापति बने रहे। अब ऐसी स्थिति बनी कि राज्यसभा टीवी पर सरकार के कार्यक्रमों की आलोचना करनेवाले लोग बैठकर पैनल चर्चा करने लगे। उन तमाम पत्रकारों और तथाकथित विचारकों को वहां जगह मिलने लगी जो मोदी सरकार का विरोध करनेवाले और कांग्रेस के समर्थक थे। राज्यसभा टीवी से कांग्रेस का एजेंडा चलने लगा। जनता के पैसे का अपव्यय तो हो ही रहा था। 2017 तक तो यही स्थिति बनी रही। 2017 में हामिद अंसारी का कार्यकाल समाप्त हुआ लेकिन वहां काम करनेवाले वही लोग बने रहे। इसी दौर में दोनों चैनलों को मिलाकर एक चैनल करने की शुरुआत हुई जो अब जाकर मूर्त रूप ले सकी। लोकसभा और राज्यसभा चैनल का विलय करके संसद टीवी बना। जब संसद का सत्र चलेगा तो उसकी कार्यवाही दिखाने के लिए दो चैनल चलेंगे, एक पर राज्यसभा और दूसरे पर लोकसभा की कार्यवाही प्रसारित की जाएगी। बीसवीं सदी कि गलती को इक्कीसवीं सदी में सुधारने का प्रयास।

संसद टीवी की शुरुआत से पूर्व की गलती सुधरी लेकिन दूरदर्शन में सुधार कब होगा। प्रसार भारती बनने के बावजूद दूरदर्शन सरकारी चैनल ही माना जाता है। प्रत्यक्ष न सही पर परोक्ष रूप से सरकार का दखल तो है ही। दूरदर्शन के करीब तीस चैनल इस वक्त चल रहे हैं। जिनमें से सात राष्ट्रीय चैनल हैं और बाकी के क्षेत्रीय चैनल हैं। अभी टेलीविजन चैनलों की रेटिंग देख रहा था तो ब्राडकास्ट आडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के ताजा आंकड़ों की सूची में टॉप टेन में दूरदर्शन कही नहीं है। टेलीविजन रेटिंग में दूरदर्शन की अनुपस्थिति इस ओर संकेत करती है कि उसके कार्यक्रमों को देखा नहीं जा रहा है या कार्यक्रम का वो स्तर नहीं है कि उसको दर्शक पसंद करें। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं हैं जब कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान लाकडाउन लगा था तो दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत सीरियल दिखाया गया था। इन सीरियल ने फिर से लोकप्रियता का नया कीर्तिमान रचा था। निष्कर्ष ये कि अगर कार्यक्रम बेहतर हों तो लोकप्रिय होंगे और बार्क की रेटिंग में स्थान बना पाएंगे। लेकिन कार्यक्रमों का तो ये हाल है कि दूरदर्शन किसान चैनल पर मनोरंजन के कार्यक्रम से लेकर गीत संगीत की  प्रतियोगिता आयोजित होती है।  

दूरदर्शन की अलग ही कहानी है। जब से दूरदर्शन आरंभ हुआ वहां अपेक्षित कार्य संस्कृति का विकास ही नहीं हो पाया। इंजीनियरिंग विभाग को प्रोग्रामिंग विभाग से ज्यादा महत्व दिया गया। आज भी कमोबेश वही स्थिति बनी हुई है। यहां इंजीनियरिंग और संपादकीय विभाग के कर्मचारियों का अनुपात बहुत असंतुलित है। इस असंतुलन की वजह से बाधाएं उत्पन्न होती हैं।  दूरदर्शन को मैन पावर आडिट करवाना चाहिए और उसके आधार पर सुधार करना चाहिए। कई बार तो महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की कवरेज के दौरान दूरदर्शन का तामझाम देखकर ही लगता था कि क्या सचमुच इतने कैमरे की जरूरत थी ? जहां तीन या चार कैमरे के सेटअप से काम हो सकता है वहां बीस कैमरे लगा दिए जाते थे। ये अलग बात है कि उनमें से तीन चार काम भी नहीं करते थे। पर मानव संसाधन तो लगता था। इससे भी अधिक दोषपूर्ण दूरदर्शन के नए चैनल खोलने की नीति रही है। नए चैनल खोलने का आधार उसके दर्शक होने चाहिए थे लेकिन आधार राजनीति होती थी। कांग्रेस के शासनकाल में ये पुरानी प्रविधि रही है कि अपने लोगों को खुश करने और सेट करने के लिए संस्थान बना दिए जाते थे। इस तरह के दर्जनों उदाहरण हैं । चिंता की बात ये है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार को आए भी सात साल से अधिक वक्त हो गया है लेकिन दूरदर्शन में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया। राजनीतिशास्त्र की पुस्तकों में पढ़ा था कि सिस्टम को बदलना बहुत आसान नहीं होता है, लेकिन सिस्टम को बदले बगैर उसमें सुधार तो किया ही जा सकता है। कई मंत्रालयों के अधीन कई ऐसी संस्थाएं हैं जो एक ही तरह का काम करती हैं। इस स्तंभ में पहले भी इस बारे में लिखा जा चुका है। नीति आयोग ने भी इन संस्थाओं के पुनर्गठन की बात की थी, उस दिशा में पहल भी हुई लेकिन अबतक ठोस परिणाम सामने नहीं आया है  जिसकी प्रतीक्षा है। 


राजधानी में गुलामी के निशान?


सरकारी नीतियों और फैसलों को लागू करने में नौकरशाही की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अगर अधिकारी योग्य और कार्यक्रमों को लागू करने की कला में माहिर होता है तो उसको लंबे समय तक याद रखा जाता है। राजनीति के गलियारों में भी उसकी पूछ होती है और उसको समय के साथ बड़ी भूमिकाएं दी जाती हैं। ऐसे ही एक अंग्रेज अधिकारी थे विलियम मैल्कम हेली। 1895 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) की परीक्षा पास की और अधिकारी बने। भारत में उनकी पहली पोस्टिंग उपनिवेशन (कोलोनाइजेशन) अधिकारी के तौर पर हुई। उस दौर में उपनिवेशन अधिकारी के अन्य कार्यों में एक कार्य औपनिवेशिक शासन को मजबूत करना था ताकि उसका विस्तार संभव हो सके। मैल्कम हेली ने झेलम में अपनी पदस्थापना के समय ये काम बखूबी किया और बरतानिया सरकार ने उनके कामकाज से खुश होकर 1912 में उनको दिल्ली का कमिश्नर नियुक्त कर दिया। वो इस पद पर छह साल तक रहे। इस दौरान उन्होंने ब्रिटिश राज को अपनी कामों से मजबूती भी दी और जनता के बीच अलग अलग तरीकों से स्वीकार्यता बढ़ाने का काम भी किया। औपनिवेशिक शक्तियों को मैल्कम हेली लगातार अपने काम से खुश कर रहे थे और करियर के शिखर की ओर बढ़ रहे थे। उस दौर के इस तरह के अफसर जनता को बेहतर सपने दिखा कर ब्रिटिश राज के समर्थन में करने की कोशिश कर रहे थे। ये अंग्रेजों की रणनीति का हिस्सा था कि एक तरफ सैन्य सख्ती और दूसरी तरफ प्रशासनिक नरमी से गुलामी की व्यवस्था को बनाए रखा जा सके। 

मैल्कम हेली बाद में पंजाब और तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर भी बने। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की वेबसाइट पर इस बात की जानकारी है। उपनिवेशवादी ताकतों को मजबूत करनेवाले इसी अंग्रेज अफसर के नाम पर नई दिल्ली में एक सड़क है नाम है हेली रोड। नई दिल्ली में पहले कई अंग्रेज अफसरों, सैन्य अधिकारियों और ब्रिटिश राज से जुड़े कई लोगों के नाम पर सड़कें आदि थीं। उन सड़कों का नाम धीरे धीरे बदला गया। लेकिन अब भी कई सड़कें विदेशी आक्रांताओं और देश को लंबे समय तक गुलामी की जंजीर में रखनेवालों और उनके मददगारों के नाम पर मौजूद हैं। आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव वर्ष मना रहा है तो उपनिवेश के इन चिन्हों को मिटाने का अनुकूल समय । बेहतर होगा कि देश को गुलाम बनाए रखने में भूमिका निभानेवाले अफसरों और आक्रांताओं के नाम हटाकर हम भारत के उन सपूतों के नाम पर इन सड़कों और इमारतों का नाम रखें जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान किया। जिन्होंने स्वाधीनता के स्वप्न को साकार करने में अपने प्राणों की आहुति दी।  


Saturday, September 11, 2021

हिंदुत्व को बदनाम करने का उपक्रम


कुछ दिनों से अकादमिक जगत में एक सम्मेलन की बहुत चर्चा हो रही है, जिसका नाम है डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व। इस तथाकथित सम्मेलन के आयोजकों का अता-पता नहीं है। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इसकी घोषणा होती है।  इसकी एक वेबसाइट बना दी जाती है जिसपर तीन दिन के आनलाइन सम्मेलन की घोषणा की जाती है। उसपर अमेरिकी विश्वविद्लायों के नाम जुड़ते और हटते रहते हैं। ट्वीटर पर एक हैंडल बनाया जाता है और उससे इस सम्मेलन की गतिविधियां पोस्ट की जाने लगती हैं। दावा किया जाता है कि अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों के विभागों का समर्थन इस सम्मेलन को प्राप्त है। तीन दिन के सम्मेलन में घिसे पिटे विषयों को लेकर आनलाइन चर्चा सत्र आयोजित है। इन सत्रों में वही घिसे पिटे वक्ता हैं जिन्होंने अपने देश में अपनी प्रासंगिकता खो दी है।  असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी के प्रपंच में भी इनमें से कइयों का नाम सामने आया था।तब भी वो सब भारतीय जनता पार्टि की सरकार के खिलाफ एकजुट होकर सामने आए थे। अब एक बार फिर से इस नए शिगूफे से वो अपनी प्रासंगिकता साबित करने की जुगत में लग गए हैं। ऐसे लोगों का  नाम लेकर उनको महत्व देने का कोई अर्थ नहीं है। डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व सम्मेलन को लेकर हमारे देश के भी कुछ विश्वविद्यालय शिक्षक और कार्यकर्ता उत्साहित नजर आ रहे हैं। ये वही शिक्षक हैं जो मानसिक तौर पर गुलाम हैं और उनको हर चीज में व अमेरिका या अन्य देशों में हो रही गतिविधियां पसंद हैं। अपनी परंपरा या अपने पौराणिक ग्रंथों को पढ़ने में शर्म महसूस होती है। ये खुद को वामपंथी विचारधारा की तरफ खड़े दिखाने की कोशिश करते हैं लेकिन अमेरिका की पूंजीवादी व्यवस्था में उनको ज्यादा यकीन है।  

डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व के गुमनाम आयोजकों को न तो हिंदुत्व का ज्ञान है और न ही इसकी व्याप्ति और उदारता का अंदाज। हिंदुत्व के ध्वंस की कई असफल कोशिशें कई स्तर पर कई बार हो चुकी हैं। पिछले दिनों गांधी दर्शन के अध्येता मनोज राय से बात हो रही थी तो उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों की ओर ध्यान दिलाया। गांधी ने विस्तार से इस विषय पर लिखा है जो गांधी वांगमय के खंड 64 में संकलित है। महात्मा गांधी ने काल्पनिक स्थिति पर लिखा है कि ‘यदि सारे उपनिषद् और हमारे सारे धर्मग्रंथ अचानक नष्ट हो जाएं और ईशोपवनिषद् का पहला श्लोक हिंदुओं की स्मृति मे रहे तो भी हिंदू धर्म सदा जीवित रहेगा।‘ गांधी ने संस्कृत में उस श्लोक को उद्धृत करते हुए उसका अर्थ भी बताया है। श्लोक के पहले हिस्से का अर्थ ये है कि ‘विश्व में हम जो कुछ देखते हैं, सबमें ईश्वर की सत्ता व्याप्त है।‘ दूसरे हिस्से के बारे में गांधी कहते हैं कि ‘इसका त्याग करो और इसका भोग करो।‘ और अंतिम हिस्से का अनुवाद इस तरह से है कि ‘किसी की संपत्ति को लोभ की दृष्टि से मत देखो।‘ गांधी के अनुसार ‘इस उपनिषद के शेष सभी मंत्र इस पहले मंत्र के भाष्य हैं या ये भी कहा जा सकता है कि उनमें इसी का पूरा अर्थ उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है।‘ गांधी यहीं नहीं रुकते हैं और उससे आगे जाकर कहते हैं कि ‘जब मैं इस मंत्र को ध्यान में रखककर गीता का पाठ करता हूं तो मुझे लगता है कि गीता भी इसका ही भाष्य है।‘ और अंत में वो एक बेहद महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि ‘यह मंत्र समाजवादियों, साम्यवादियों, तत्वचिंतकों और अर्थशास्त्रियों सबका समाधान कर देता है। जो लोग हिंदू धर्म के अनुयायी नहीं हैं उनसे मैं ये कहने की धृष्टता करता हूं कि यह उन सबका भी समाधान करता है।‘  डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व में अपने देश के कई वक्ता हैं उनको गांधी जी की इस उक्ति को पढ़ लेना चाहिए तब हिंदुत्व के ध्वंस की बात करनी चाहिए थी। 

हिंदुत्व या हिंदू धर्म कोई भौतिक वस्तु नहीं है कि इसको किसी सम्मेलन से, चंद विश्वविद्यालयों के हिंदू विरोधी मानसिकता वाले शिक्षकों की मदद से या इंटरनेट मीडिया पर अभियान चलाकर ध्वस्त किया जा सके। ये एक ऐसा शब्द है जिसका हमारे जीवन से हर पल वास्ता पड़ता रहता है। इस शब्द पर विचार करें तो ऋगवेद से लेकर हजारों वर्ष के लंबे कालखंड में इसके अर्थ का दायरा इतना व्यापक हुआ है कि उसको डिसमेंटल करने की सोचने वाले की स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। वेदव्यास इसको नियम से जोड़ते हैं तो वाल्मीकि इसको चरित्र से जोड़कर व्याख्यित करते हैं। स्वामी विवेकानंद इसको सहिष्णुता से जोड़कर अपना दर्शन देते हैं। हिंदुत्व एक ऐसी अवधारणा है जो अपने धर्म से अपने धर्मगुरुओं से या अपने भगवान को भी प्रश्नों के घेरे में खड़ा करता है और फिर उन प्रश्नों के आधार पर स्वस्थ संवाद करता है। हिंदुत्व के उथले ज्ञान वाले कुछ लोग इसकी गहराई में न जाकर इसकी व्याख्या करने लग जाते हैं। एक विदेशी विद्वान महाभारत की व्याख्या करते हुए कृष्ण को हिंसा के लिए उकसाने का दोषी करार देते हैं और कहते हैं कि अगर वो न होते तो महाभारत का युद्ध टल सकता था। अब इनको कौन समझाए कि महाभारत को और कृष्ण को समझने के लिए समग्र दृष्टि का होना आवश्यक है। अगर अर्जुन युद्ध के लिए तैयार नहीं होते और कौरवों का शासन कायम होता तब क्या होता। कृष्ण को हिंसा के जिम्मेदार ठहरानेवालों को महाभारत के युद्ध का परिणाम भी देखना चाहिए था। लेकिन अच्छी अंग्रेजी में आधे अधूरे ज्ञान के आधार पर भारतीय पौराणिक ग्रंथों की व्याख्या करने से न तो हिंदुत्व की व्याप्ति कम होगी और न ही हिंदुत्व का चरित्र बदलेगा। हिंदुत्व के अंदर ही खुद को सुधार करने की व्यवस्था है। यहां जब भी कुरीतियां बढ़ी हैं तो इसी समाज के अंदर से कोई न कोई सुधारक सामने आया है और उसने कुरीतियों के खिलाफ जंग लड़ी है।  

डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व का जो सम्मेलन है उसको हिंदुत्व से कोई लेना देना नहीं है बल्कि अगर सूक्षम्ता से विश्लेषण करें और उनकी वेबसाइट का अध्ययन करें तो ये स्पष्ट होता है कि उनके निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम ठीक से नहीं लिख पानेवाले लोग इस संगठन का फैक्टशीट पेश कर रहे हैं। एक के बाद एक लेख में एक ऐसा नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों को बदनाम किया जा सके। इनको ये नहीं मालूम कि कोई भी संगठन अपने कार्यक्रमों की वजह से, अपने सिद्धांतों की वजह से समाज में स्वीकार्यता हासिल करता है किसी फैक्टशीट से नहीं। दरअसल इस  तरह के सम्मेलनों के आयोजन और कुछ  विदेशी विश्वविद्यालयों के समर्थन से ये संकेत मिलता है कि अलग अलग शक्तियां भारत के खिलाफ एकजुट होने को बेचैन हैं। इस तरह के लोग माहौल बनाने में भी माहिर होते हैं। इस सम्मेलन के पहले कोरोना प्रबंधन को लेकर विदेशी अखबारों में छपनेवाले लेखों को देखें तो ये गठजोड़ और स्पष्ट होगा। हिंदुत्व की आड़ में भारत को भारतीयता को और वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव को कम करने के इस उपक्रम के बारे में अब सबको पता है। इस तरह की प्रविधि आज से कुछ सालों पहले तक कामयाब हो जाती थी लेकिन अब देश की जनता जागरूक ही नहीं सक्रिय भी हो गई है। उनको इस तरह के सम्मेलनों से बरगलाना संभव नहीं है। हां अंतराष्ट्रीय मंचों पर और देश के कुछ वामपंथी रुझान वाले संगठनों को इस तरह के सम्मेलनों से कुछ आस जग सकती है लेकिन जनता की समझदारी से ये आस स्वप्न भर रह जाएगी। 


Friday, September 10, 2021

सांस्कृतिक हमलावरों को सम्मान क्यों


नई दिल्ली में एक सड़क है जिसका नाम है हुमांयू रोड। ये सड़क करीब डेढ किलोमीटर लंबी है और दिल्ली के पाश इलाकों को जोड़ती है। इंडिया गेट से सुजान सिंह पार्क या खान मार्केट जाना हो तो हुमांयू रोड मिलता है। हिन्दुस्तान में मगुल सल्तनत की स्थापना करनेवाले बाबर के बेटे हैं हुमांयू। मध्यकाल पर लिखनेवाले इतिहासकारों ने हुमांयू पर बहुत उदारता के साथ लिखा है। 1970 के बाद के वर्षों में रूस के कई प्रकाशन गृहों ने इस तरह की पुस्तकें प्रकाशित की जिनमें मुगल बादशाहों का महिमामंडन किया गया था। उनको बहुत कम दाम पर बेचा भी जाता था ताकि अधिक से अधिक लोग खरीद कर पढ़ सकें। इनमें प्रगति प्रकाशन और रादुगा प्रकाशन प्रमुख थे। मुगलकाल के इतिहास पर लिखते हुए भारतीय इतिहासकारों ने बाबरनामा, हुमांयूनामा और अकबरनामा को आधार बनाकर लिखा। ये सब आत्मकथाएं या जीवनियां थीं। इनका स्त्रोत के तौर पर उपयोग किया जा सकता था लेकिन इसको इतिहास लेखन का आधार बनाने से इतिहास दोषपूर्ण हो गया। कालखंड विशेष का समग्र मूल्यांकन नहीं हो पाया। परिणाम यह हुआ कि हमारे देश पर आक्रमण करनेवाले, हजारों लोगों का कत्ल कर अपने सल्तनत की स्थापना करनेवालों, देश की सांस्कृतिक परंपराओं को नष्ट करनेवालों के प्रति उदारता का भाव पैदा होने लगा। इसी उदारता की वजह से मुगल आक्रांता हुमांयू के नाम से सड़क और मुहल्ला बना दिया गया। 

अपने पिता की मौत के बाद जब हुमांयू दिल्ली की गद्दी पर बैठा था तो कई युद्धों के बावजूद सल्तनत नहीं बचा सका था। शेरशाह सूरी से हारने के बाद वो फारस भाग गया था। कई वर्षों बाद फारस के सैनिकों के साथ उसने फिर से दिल्ली सल्तनत पर कब्जा किया। जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने भले ही हिन्दुस्तान में मुगल सल्तनत की स्थापना की लेकिन उसके बेटे हुमांयू ने सांस्कृतिक सल्तनत का बीजोरोपण किया। जब हुमांयू दूसरी बार दिल्ली की गद्दी पर बैठा तब उसने भारत में फारसी कलाओं को बढ़ाना आरंभ किया। उसने फारसी वास्तुकला, चित्रकला, स्थापत्य कला आदि को प्राथमिकता देना आरंभ किया। इसके लिए फारस के वास्तुविद, चित्रकार आदि हिन्दुस्तान बुलाए गए। ये हुमांयू का हिन्दुस्तान पर सांस्कृतिक हमला था। समय के साथ मुगल सल्तनत का भले ही अंत हो गया लेकिन जिस सांस्कृतिक सल्तनत की स्थापना हुमांयू ने की थी वो अब भी हमारे देश में चल रहा है। आज भी मुगल कुजीन से लेकर मुगल स्थापत्य कला और मुगल चित्रकला जीवित है। रहे, पर उस आक्रांता के नाम पर सड़क का नाम क्यों है जिसने भारत की संस्कृति को बदलने का काम किया। 


Saturday, September 4, 2021

पाठ्यक्रम बदलाव पर बेवजह विवाद


देशभर के विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में नियमित अंतराल पर बदलाव होते रहते हैं। विभाग विशेष की अनुशंसा पर विद्या परिषद (अकेडमिक काउंसिल) बदलाव को स्वीकार करते हुए मंजूरी देती है। नियमानुसार साल में दो बार विद्या परिषद की बैठक आवश्यक है। मोटे तौर पर विश्वविद्लाय दो या तीन साल में अपने पाठ्यक्रमों में बदलाव करते हैं। इसके पीछे उद्देश्य ये रहता है कि छात्रों में नई प्रवृत्तियों से परिचित करवाया जा सके। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि किसी विषय में कोई नया शोघ हुआ हो तो उससे छात्रों का परिचय हो सके। अगर साहित्य से जुड़े विषयों की बात करें तो लेखन की नई प्रवृत्तियों से छात्रों का परिचय तभी संभव होता है जब पाठ्यक्रम में उस नई प्रवृत्ति को शामिल किया जाए। अभी दिल्ली विश्विद्यालय ने अंग्रेजी के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है और महाश्वेता देवी समेत कुछ अन्य लेखकों की रचनाओं को हटा कर दूसरे लेखकों की रचनाओं को स्थान दिया गया है। इसपर विवाद खड़ा किया जा रहा है। विवाद की वजह रचना नहीं बल्कि उससे इतर है। इसको विचारधारा के आधार पर विवादित करने का प्रयास आरंभ हो गया है। कुछ वामपंथी विचारधारा के समर्थक लेखक और स्तंभकार इसको केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर देखने लगे हैं। उनको लगता है कि महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने के पीछे हिंदुत्ववादी विचारधारा के लोग हैं। जबकि ये एक सामान्य प्रक्रिया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से महाश्वेता देवी की कहानी द्रोपदी को हटाया गया है। इसके बारे में विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने अपना पक्ष रखा है। ये कहानी एक आदिवासी महिला और उसके संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने के फैसले की आलोचना करनेवाले ये तर्क भी दे रहे हैं कि महाश्वेता जी ने जीवन भर समाज के हाशिए के लोगों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने उन लोगों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलनों में भी हिस्सेदारी की। यह कहानी भी उसी वर्ग पर लिखी गई है, इसलिए इसको हटाना अनुचित है । यह ठीक बात है कि उन्होंने समाज के वंचित वर्गों के लिए संघर्ष किया, पर अब समय बदल गया है। क्या पाठ्यक्रम को बदलते हुए समय के साथ नहीं बदला जाना चाहिए। महाश्वेता देवी समादृत लेखिका रही हैं। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। भारत सरकार ने उनको पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया है। इसके आधार पर अगर पाठ्यक्रम में उनकी रचना को रखने को फैसला होता है तो फिर उनके अन्य क्रियाकलापों पर भी विचार करना चाहिए और समग्र मूल्यांकन के आधार पर फैसला होना चाहिए। महाश्वेता देवी पर माओवादियों को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप भी है। बात 1997 की है, तब बिहार में जातीय संघर्ष चरम पर था। जातीय हिंसा में लोग मारे जा रहे थे। 1997 के एक दिसंबर को लक्ष्मणपुर बाथे में नरसंहार हुआ। रणवीर सेना पर उस नरसंहार का आरोप लगा था। इसके बाद 27 दिसंबर 1997 को महाश्वेता देवी ने एक हस्तलिखित अपील जारी की थी। उस अपील में माओवादियों से बिहार में हुए इस नरसंहार का बदला लेने का आह्वान किया गया था। उस वक्त बदले का आह्वान करके महाश्वेता देवी साफ-साफ हिंसा के लिए उकसा रही थीं। इस तरह हिंसा के लिए उकसाना वर्ग शत्रुओं के सफाए की विचारधारा का अनुयायी ही कर सकता है। जिसकी भी संविधान में आस्था हो और जो सार्वजनिक जीवन में हो वो किसी नरसंहार के लिए बदला लेने की बात करे तो यह उसकी सोच को दर्शाता है। बदले के इस आह्वान का कितना असर हुआ ये नहीं पता लेकिन उनकी अपील के 15 महीने बाद मार्च, 1999 में बिहार के जहानाबाद जिले के सेनारी में माओवादियों ने एक नरसंहार को अंजाम दिया। तब महाश्वेता देवी से किसी ने सवाल नहीं पूछा ना ही उनके खिलाफ माओवादियों को उकसाने का कोई केस दर्ज किया। जब भी महाश्वेता देवी का मूल्यांकन होगा तो उनके इस हस्तलिखित पत्र का उल्लेख जरूर होगा क्योंकि बगैर समग्रता के उचित मूल्यांकन संभव नहीं है। जो लोग इस आधार पर महाश्वेता देवी की रचना को पाठ्यक्रम से हटाने का विरोध कर रहे हैं कि वो एक बड़ी और सम्मानित लेखिका थीं, उनको भी महाश्वेता के उपरोक्त पक्ष पर विचार करना चाहिए।

पाठ्यक्रम में बदलाव का फैसला न तो विचारधारा के आधार पर होना चाहिए, न ही लेखक की ख्याति के आधार पर और न ही किसी को खुश करने के लिए। स्वाधीनता के बाद से इस देश में जिस तरह शिक्षा के क्षेत्र में विचारधारा को प्राथमिकता देकर उसका राजनीतिकरण किया गया उसने छात्रों का बहुत नुकसान किया। शिक्षण प्रणाली का भी। शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए न ही पाठ्यक्रमों को तय करते समय लेखकों की विचारधारा के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए। पाठ्यक्रमों के बारे में निर्णय लेते समय छात्रों के हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। विश्वविद्यालयों के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की है। इस शिक्षा नीति के हिसाब से तो अभी विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रमों में बहुत बदलाव करना होगा। जिस तरह से भारतीयता के स्वर को इस शिक्षा नीति में प्राथमनिकता देने की बा की गई है उसके आधार पर बनने वाले पाठ्यक्रमों को बनाना भी बड़ी चुनौती है। विरोध के स्वर भी उठेंगे और विरोध का आधार भी लेखकों की प्रतिष्ठा आदि को बनाया जाएगा। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय से मिले संकेतों से सीख लेने की जरूरत है ताकि पाठ्यक्रम बनाते समय किसि प्रकार के दबाव को नकारा जा सके। दरअसल भारत में हो रहे बदलावों पर पूरी दुनिया की नजर है। शिक्षा आदि के क्षेत्र से जुड़े संगठनों पर अगर इस बदलाव का असर पड़ता है तो वो किसी भी हद तक जाकर विरोध कर सकते हैं। 

इसका एक और दिलचस्प पहलू भी है। अमेरिका में रहनेवाले भारतीय मूल के लेखक सलिल त्रिपाठी ने भी दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में बदलाव पर लिखा है। विश्वविद्यालय को कठघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने महाश्वेता देवी का गुणगान किया है। इस कहानी के बहाने सवाल खड़े करते हुए वो महाभारत के पात्र द्रोपदी और उसके चीरहरण की घटना की व्याख्या भी करने लग जाते हैं। अंग्रेजी के लेखकों के साथ दिक्कत ये है कि वो मूल ग्रंथ को नहीं पढ़ते हैं बल्कि उसके आधार पर लिखी गई पुस्तकों को आधार बना लेते हैं। महाश्वेता देवी की कहानी पर लिखते हुए द्रोपदी के चीरहरण के प्रसंग तक पहुंचते हैं तो अंग्रेजी के लेखक किरण नागरकर का उदाहरण देते हैं। उनके हवाले से कहते हैं कि द्रोपदी का जब चीर हरण हो रहा था तो कृष्ण देर से उनके बचाव के लिए आए थे। इस प्रसंग के लिए महाभारत का मूल पाठ देखना चाहिए। पौराणिक पात्रों पर विपुल लेखन करनेवाले नरेन्द्र कोहली हमेशा मूल महाभारत में वर्णित चरित्रों के संवाद को पढ़ने की बात किया करते थे। पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों पर लिखना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। इसके लिए बहुत अध्ययन की आवश्यकता होती है और प्राथमिक स्त्रोत तक पहुंचने की चुनौती भी होती है। ऐतिहासिक पात्रों पर लिखते भी हैं और उसको फिक्शन भी करार देते हैं। फिक्शन ही लिखना है तो ऐतिहासिक पात्रों के नाम उनका परिवेश और कालखंड भी वही क्यों होता है। इस प्रकार की रचनात्मकता, फिक्शन की आड़ में इतिहास के साथ खिलवाड़ को वैधता देने की कोशिश होती है। अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए भी इस प्रविधि का सहारा लिया जाता है। यह खेल लंबे समय से हमारे देश में चल रहा है लेकिन अब जनता इस खेल को समझ चुकी है।   


Friday, September 3, 2021

गुलामी के चिन्हों से मुक्ति का अवसर


आज संपूर्ण राष्ट्र अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। हम अपने उन पुरखों को याद कर रहे हैं जिन्होंने देश की स्वाधीनता के लिए बलिदान किया। हम अपने उन क्रांतिवारों का भी स्मरण कर रहे हैं जिन्होंने अपने देश को गुलामी बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए अपनी जान की बाजी तक लगा दी। आज स्वाधीन राष्ट्र के सामने अवसर है कि वो अपने उन वीर सपूतों को ना केवल याद करे बल्कि आनेवाली पीढ़ियों के सामने भी उनकी वीरता की कहानी को बताएं। ये सभी भारतीयों का सामूहिक दायित्व है। इन बलिदानियों का स्मरण करने में किसी तरह की दलगत राजनीति या विचाराधारा आड़े नहीं आनी चाहिए। लंबे समय की गुलामी ने जनमानस को भी गहरे तक प्रभावित किया जिससे मुक्त होने में भी समय लग रहा है। अब भी देश के कई शहरों या इलाकों में आततायियों और आक्रमणकारियों के नाम से सड़कें और इमारतें मौजूद हैं। राजधानी दिल्ली में भी कई सड़कें अब भी विदेशी आक्रांताओं के नाम पर हैं। उन आक्रांताओं के नाम पर जिन्होंने भारत पर न केवल हमला किया बल्कि हमारी संस्कृति और सनातन परंपरा को भी नष्ट करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। आज नई दिल्ली इलाके में बाबर के नाम पर सड़क है, बाबर रोड। ये वही बाबर है जिसने भारत पर न केवल हमला किया, बल्कि हजारों लोगों की हत्या कर अपना सल्तनत स्थापित किया। अपने शासन के दौरान भारत की जनता पर बेइंतहां जुल्म किए।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपने एक व्याख्यान में शक्ति के सिद्धांत की चर्चा करते हुए बताया था कि दिल्ली में बाबर रोड है लेकिन राणा सांगा के नाम पर रोड नहीं है। दिल्ली में न केवल बाबर रोड है बल्कि कई ऐसी सड़कें हैं जो अंग्रेजों और मुगल शासकों के नाम पर हैं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के वर्ष में राष्ट्र को इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आक्रांताओं के नाम पर सड़कें क्यों रहनी चाहिए। सड़कों या इमारतों का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर इस वजह से रखा जाता है कि हम उनको सम्मान देना चाहते हैं, उनके योगदान को याद रखना चाहते हैं। प्रश्न ये उठता है कि क्या बाबर को उनके जुल्मों की वजह से या भारत पर हमला करने की वजह से याद रखा जाना चाहिए। क्यों नहीं इन सड़कों और इमारतों के नाम बदलकर स्वाधीनता संग्राम के शहीदों के नाम पर कर दिए जाने चाहिए। कई बार सड़कों के नाम बदलने को लेकर राजनीति होने लगती है। अलग अलग राजनीतिक दलों और विचारधारा से जुड़े लोग इसका विरोध करते हैं। पर जब सवाल एक संप्रभु राष्ट्र के स्वाभिमान का हो तब राजनीति से किनारा कर एक स्वर में बात होनी चाहिए।

Saturday, August 28, 2021

विभाजन विभीषिका पर उदासीन साहित्य


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले एक ट्वीट किया। लिखा कि ‘देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी। उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया है।‘  केंद्र सरकार के इस फैसले पर राजनीति आरंभ हो गई है। हम राजनीति से इतर साहित्य सृजन के आइने में विभाजन की विभीषिका को परखने की कोशिश करते हैं। 1947 में हमारे देश का बंटवारा हुआ। उसके बाद के हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर नजर डालें तो इस विषय को केंद्र में रखकर बहुत कम लेखन नजर आता है। ले-देकर यशपाल की औपन्यासिक कृति ‘झूठा सच’ का दो खंड और भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का नाम याद पड़ता है। बदीउज्जमा के उपन्यास ‘छाको की वापसी’ के अलावा सच्चिदानंद हीरानंद  वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, मोहन राकेश और कृष्णा सोबती ने कुछ कहानियां लिखी हैं। बहुत बाद में आकर कमलेश्वर ने भी लिखा। भीष्म जी को भी तमस लिखने में बीस साल से अधिक लगे। कथा साहित्य में तो कुछ रचनाएं मिलती भी हैं लेकिन कवियों ने तो इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया, प्रतीत होता है। अज्ञेय की ही एक कविता ‘शरणार्थी’ का स्मरण होता है। वामपंथी लेखक जिन मुक्तिबोध को अपना सबसे बड़ा कवि मानते और प्रचारित करते हैं उनकी रचनाओं में भी विभाजन की विभीषिका नहीं दिखाई देती है। दूसरी तरफ गुरुदत्त जैसे राष्ट्रवादी लेखकों ने विभाजन पर कम से कम आधा दर्जन उपन्यास लिखे। लेकिन गुरुदत्त को इन कथित प्रगतिशील लेखकों और आलोचकों ने साहित्य के परिदृश्य से ओझल कर दिया। उनकी विभाजन पर लिखी रचनाओं पर न तो आलोचनात्मक लेख लिखे गए और न ही किसी विमर्श में उनका नामोल्लेख किया जाता है। बावजूद इसके जब भी हिंदी में विभाजन पर लिखे साहित्य की बात होगी तो गुरुदत्त का नाम लेना ही पड़ेगा।  

स्वाधीनता के बाद हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता का झंडा लेकर घूमनेवाले लेखकों का बोलबाला रहा है। कई तरह के साहित्यिक आंदोलन चले लेकिन उन आंदोलनों में कहीं भी विभाजन की विभीषिका के दर्द और संघर्ष को जगह नहीं मिल पाई है। लाखों लोगों की जान गई, उससे अधिक लोग विस्थापित हुए। मरनेवालों के परिवार और विस्थापित समूहों के दर्द को हिंदी साहित्य के लेखक पकड़ नहीं पाए। पिछले दिनों मार्क्सवादी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी से बात हो रही थी तो उन्होंने एक बेहद चौंकानेवाला तथ्य बताया। 15 अगस्त 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो उसके अगले महीने यानि सितंबर में प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में प्रगतिशील लेखक संघ की एक बैठक हुई। उस बैठक में उस वक्त के तमाम छोटे-बड़े लेखक शामिल हुए थे। सितंबर 1947 में हुए प्रगतिशील लेखक संघ की इस बैठक में 22 प्रस्ताव पास किए गए थे। इन 22 प्रस्तावों में कहीं भी विभाजन की चर्चा तो दूर की बात उसका उल्लेख तक नहीं था। ये वो दौर था जब पूरे देश में सिर्फ विभीषिका की चर्चा ही हो रही थी। यह तथाकथित प्रगतिशील लेखकों की अज्ञानता नहीं हो सकती है ये तो उदासीनता थी। बैठक के एक प्रस्ताव में एक या डेढ़ पंक्ति में सांप्रदायिकता की बात कही गई थी। ये चर्चा भी इस वजह से हुई कि प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक के एक दिन पहले शाम को प्रयागराज के मुस्लिम बहुल इलाके में छुरेबाजी की घटना हुई थी। जिसकी वजह से प्रस्ताव में सांप्रदायिकता का उल्लेख हुआ था। ये वही प्रगतिशील लेखक संघ है जिसने 1975 में इमरजेंसी लगाए जाने के बाद दिल्ली में हुई अपनी बैठक में उसका समर्थन किया था। इमरजेंसी के समर्थन में प्रस्ताव पास किया था। इसलिए यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि लेखक संघों की बैठक में राजनीतिक मसलों पर प्रस्ताव पास नहीं किए जाते थे। विभाजन का दर्द वैसे भी राजनीतिक मसला नहीं था बल्कि वो सामाजिक और मानवीय मसला था। मानवता के कलेजे पर भोंके गए इस खंजर का दर्द उस समनय के हिंदी के लेखक महसूस नहीं कर सके।  

दरअसल अगर हम समग्रता में विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जिन लेखकों की आस्था कम्युनिस्ट पार्टियों में थीं वो विभाजन को लेकर उदासीन रहे, उसके दर्द को लेकर खामोश रहे। अपनी इस उदासीनता को उन्होंने बहुत करीने से दबाए रखा। वो लगातार ये नारा लगा रहे थे कि ‘ये आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है’ । ये नारा नहीं कम्युनिस्टों की मानसिकता को दर्शा रहा था। स्वाधीनता का ये अस्वीकार क्यों था। ये एक अलग लेख की मांग करता है। जब एक संप्रभु राष्ट्र जन्म ले रहा था तो ये कम्युनिस्ट उसका स्वागत करने की बजाए उसपर प्रश्न खड़े कर रहे थे। जब देश में लोकतंत्र स्थापित हो रहा था तो ये भूख और गरीबी का नारा लगाकर लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे थे। इनको ये बुनियादी बात समझ नहीं आ रही थी कि अगर देश स्वतंत्र नहीं होगा तो भूख और गरीबी कैसे हटेगी। दरअसल ये कम्युनिस्ट मन से स्वाधीनता के विरोधी थे। ये अनायास नहीं था कि देश के स्वतंत्र होने के 74 साल बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने कार्यालय पर तिरंगा झंडा फहराया। जब मातृ संगठन की ये सोच होगी तो उससे संबद्ध लेखक संगठन और उन लेखक संगठनों से जुड़े लेखक भी तो इसी सोच के आधार पर सृजन करेंगे। हिंदी साहित्य में विभाजन की विभीषिका पर कहानी-कविता तो कम लिखी ही गईं कोई विमर्श भी नहीं हुआ। तो क्या ये माना जाए कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में ऐसा किया गया। 

दूसरा तर्क ये हो सकता है कि विभाजन के समय सक्रिय हिंदी के लेखकों की सोच का दायरा बहुत छोटा रहा। उनकी संवेदना में विभाजन का दर्द या विस्थापन की पीड़ा आ ही नहीं सकी। वो जिस भौगोलिक क्षेत्र में रहते थे वहां का विभाजन नहीं हुआ तो वो स्वतंत्र भारत की इस घटना को महसूस नहीं कर सके। पंजाब का विभाजन हुआ तो पंजाबी साहित्य में विभाजन को लेकर, उसके अलग अलग पहलुओं को लेकर विपुल लेखन हुआ। बंगाल का विभाजन हुआ तो बंगला में विभाजन पर, उसके असर को लेकर कई उत्कृष्ट कृतियां हैं। ये सही है कि हिंदी प्रदेश का भौगोलिक विभाजन नहीं हुआ लेकिन हिंदी प्रदेशों ने विभाजन की विभीषिका को तो बहुत करीब से देखा तो था ही। हिंदी के लेखकों की संवेदना क्यों नहीं झंकृत हुईं, ये आश्चर्य की बात है। इसी भौगोलिक प्रदेश के इतिहासकारों ने विभाजन को लेकर बहुत लिखा। भारत विभाजन के राजनीतिक पक्ष भी बहुत लिखा गया लेकिन हिंदी के लेखक अलग अलग विषयों में उलझे रहे। कहानी कविता से इतर आकर अगर आलोचना पर भी विचार करें तो वहां भी देश के बंटवारे को लेकर कोई डिस्कोर्स नहीं दिखता। रामविलास जी से लेकर नामवर सिंह तक के लेखन में इस विषय को प्रमुखता नहीं मिलती है। नामवर सिंह तो उर्दू के भी जानकार माने जाते हैं, उनको बंगला का भी ज्ञान था लेकिन उनके लेखन में भी विभाजन की बात नहीं आना हैरत में डालता है। बात घूम फिरकर वहीं पहुंचती है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में रहनेवाले लेखकों को विभाजन का दर्द या तो समझ नहीं आया या फिर वो जानबूझकर उस वक्त हुए नरसंहार और विस्थापन को लेकर आंखें मूंदे बैठे रहे। अब अगर विभाजन विभीषिका दिवस की घोषणा हुई है तो एक बार फिर से हिंदी के लेखकों को अपनी इस ऐतिहासिक भूल पर विचार करना चाहिए और उसको सुधारने का उपक्रम भी। 


Sunday, August 22, 2021

भगत सिंह की हत्या का बदला


दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद चंपारण की धरती पर गांधी ने जो आंदोलन किया उसकी सफलता ने उनको देशभर में व्याप्ति दी। स्वाधीनता के संघर्ष में चंपारण की धरती से कई क्रांतिवीर निकले लेकिन इतिहासकारों ने गांधी और चंपारण को अपने लेखन में जिस तरह से रेखांकित किया उससे उस धरती के कई क्रांतिकारियों का योगदान धूमिल पड़ गया। आज जब देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है तो ऐसे सपूतों को याद करने का अवसर है जिन्होंने अपनि मातृभूमि के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे बैकुंठ सुकुल।

महात्मा गांधी के चंपारण पहुंचने के पहले मुजफ्फरपुर में एक ऐसी घटना घट चुकी थी जिसने बिहार समेत पूरे देश के मानस को झकझोर दिया था। ये घटना थी खुदीराम बोस को फांसी की। जब खुदीराम बोस को 1908 में मुजफ्फरपुर जेल में फांसी की सजा दी गई तो उसका उस इलाके के युवकों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। समाचारपत्रों में युवकों ने पढ़ा कि खुदीराम को जब फांसी के लिए तख्ते तक ले जाया जा रहा था तब वो सीना ताने थे और मुस्कुरा रहे थे। इस समाचर ने वहां के युवकों को अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दी। उस दौर में उत्तर बिहार में सक्रिय कुछ युवकों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के बैनर तले युवकों को जोड़ने का काम आरंभ कर दिया। इस काम में जोगेन्द्र सुकुल, किशोरी प्रसन्न सिंह और बसावन सिंह के साथ एक और युवक था बैकुंठ सुकुल। बैकुंठ सुकुल के अंदर भी अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना तब और जोर मारने लगी जब एक दिन उसको पता चला कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के मृत्युदंड का जिम्मेदार शख्स उसी बिहार की धरती पर रह रहा है जहां ये लोग सक्रिय थे। दरअसल भगत सिंह और उनके साथियों को मृत्युदंड मिलने के पीछे फणीन्द्र नाथ घोष की गवाही थी। पहले फणीन्द्र नाथ घोष भी क्रांतिकारियों के साथ थे लेकिन जब लाहौर षडयंत्र केस चला तो वो सरकारी गवाह बन गए। उनकी गवाही की वजह से स्वाधीनता आंदोलन को तगड़ा झटका लगा था क्योंकि घोष ने कई गुप्त जानकारियां अपनी गवाही के दौरान सार्वजनिक कर दी थीं। लाहौर षडयंत्र केस (ताज बनाम सुखदेव तथा अन्य) में सात अगस्त 1930 को फैसला आया। उस फैसले में इस बात का भी उल्लेख है कि मनमोहन बनर्जी तथा ललित मुखर्जी ने भी क्रांतिकारियों के खिलाफ गवाही दी थी। पर उस फैसले को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट होता है कि फणीद्र नाथ घोष की गवाही बेहद अहम थी। यह घोष की गवाही ही थी जिसमें बेहद सूक्ष्मता और व्यापकता के साथ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के क्रांतिकारी मंसूबों को उजागर किया गया था। उसकी गवाही इस वजह से भी इन क्रांतिकारियों की फांसी की सजा की वजह बनी क्योंकि वो पहले इनके साथ ही काम कर रहा था। जब इन तीनों को फांसी दे दी गई तो पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बढ़ा। 

1932 में पंजाब के क्रांतिकारी साथियों ने बिहार के अपने साथियों को एक संदेश भेजा कि इस कलंक को धोओगे कि ढोओगे? इस संदेश का अर्थ ये था कि जिस घोष की गवाही पर लाहौर में सांडर्स को मारने के जुर्म में भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी गई वो बिहार के बेतिया का रहनेवाला था और सरकारी सुरक्षा में बेतिया में रह रहा था। पंजाब के क्रांतिकारी साथियों के संदेश के बाद बिहार में स्वाधीनता के लिए छटपटा रहे युवकों की एक बैठक हुई। इस बैठक में बैकुंठ सुकुल, अक्षयवट राय, किशोरी प्रसन्न सिंह आदि शामिल हुए। ये सभी फणीन्द्र नाथ घोष से बदला लेने का काम अपने हाथ में लेना चाहते थे। सभी चाहते थे कि स्वाधीनता के लिए अपनि जान देनेवाले अपने क्रांतिकारी साथियों की शहादत का बदला वो लें। लेकिन बैठक में जब कोई निर्णय नहीं लिया जा सका तो छह युवकों के नाम चिट पर लिखकर लाटरी निकाली गई। बैकुंठ सुकुल भाग्यशाली रहे और उनके नाम की चिट निकल आई और उनको फणीन्द्र नाथ घोष से बदला लेने की जिम्मेदारी मिली। अब बैकुंठ सुकुल ने अपने मित्र चंद्रमा के साथ मिलकर योजना बनाई। वो हाजीपुर से करीब सवा सौ किलोमीटर सायकिल चलाकर दरभंगा पहुंचे। दरभंगा में अपने एक साथी के साथ ठहरे। वहां एक भुजाली का इंतजाम किया और अपने साथी से एक धोती मांगकर मोतिहारी होते हुए बेतिया पहुंचे। 9 नवंबर 1932 की शाम, हल्का अंधेरा होने लगा था। फणीन्द्र घोष बेतिया बाजार में अपने एक दोस्त की दुकान पर बैठे हुए थे। उसी वक्त बैकुंठ सुकुल और चंद्रमा सिंह ने उनपर हमला कर बुरी तरह से जख्मी कर दिया। आठ दिन बाद उसकी मौत हो गई। 

ब्रिटिश हुकूमत लाहौर केस के गवाह पर हुए इस जानलेवा हमले के असर को समझ रही थी। लिहाजा बैकुंठ सुकुल और चंद्रमा सिंह की गिरफ्तारी के लिए चौतरफा घेरे बंदी की गई। करीब आठ महीने की मशक्कत के बाद अंग्रेजों ने चंद्रमा सिंह को कानपुर से और बैकुंठ सुकुल को सोनपुर से गिरफ्तार कर लिया। हमले के बाद जब ये दोनों वहां से गए थे तो अफरातफरी में उनकी गठरी वहीं छूट गई थी। गठरी से मिले सामान के आधार पर इनकी गिरफ्तारी हुई थी। फिर सात महीने केस चला और फरवरी में बैकुंठ सुकुल को फांसी की सजा सुनाई गई और मई 1934 में गया जेल में उनको फांसी दे दी गई। ये पूरा प्रसंग नंदकिशोर शुक्ल की पुस्तक स्वतंत्रता सेनानी बैकुंठ सुकुल का मुकदमा में उल्लिखित है। तमाम दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने ये पुस्तक लिखी हैं। 

चंद्रमा सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। नवंबर 1932 से लेकर बैकुंठ सुकुल की फांसी होने तक इस केस से जुड़ी गतिविधियों ने युवको के अंदर देश के लिए मर मिटने का ज्वार पैदा कर दिया था। बैकुंठ सुकुल ने अपने कृत्य से ये संदेश दे दिया था कि अंग्रजों से मिलने और क्रांतिकारियों से गद्दारी की सजा मौत है। हमारे स्वाधीनता संग्राम के कई ऐसे नायक हैं जिनके देशभक्ति के कृत्य इतिहास की पुस्तकों में दबा दी गई है या उनको वो अहमियत नहीं दी गई जिसके वो अधिकारी थे। बैकुंठ सुकुल उनमें से एक थे। 

Saturday, August 21, 2021

कुंठा की मीनार पर विचारशून्य शायर


पृथ्वीराज चौहान से बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद मुहम्मद गोरी का लश्कर खैबर के दर्रे में दाखिल हुआ तो पराजित बादशाह को एक दीनदार नौजवान हिंदुस्तान की तरफ आता दिखाई दिया। बादशाह ने उस नौजवान को हाथ के इशारे से रोककर पूछा कि तू हिंदुस्तान किसलिए जा रहा है। नौजवान ने दृढ़ संकल्प का सहारा लेते हुए कहा कि मैं वहां इस्लाम फैलाने जा रहा हूं। बादशाह ने कहा कि पहले हमलोगों की हालत पर निगाह डाल और ये बात भी समझ ले कि हमलोग भी वहां इस्लाम के प्रचार के लिए गए थे लेकिन उनलोगों ने हिंदुस्तान से भागने पर मजबूर कर दिया। नौजवान ने फकीराना मुस्कुराहट होठों पर बिखेरते हुए कहा आपलोग वहां तलवार लेकर इस्लाम फैलाने गए थे इसलिए नाकाम और नामुराद लौटना पड़ रहा है। मेरे हाथों में सिर्फ कलामे इलाही है और दिल में इंसानियत का जज्बा है।  नौजवान कोई मामूली शख्स नहीं था। यह तो हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती थे।‘  ये अंश है पूर्व में मशहूर और इन दिनों भटके हुए शायर मुनव्वर राना की पुस्तक ‘मीर आ के लौट गया’ का। यहां मुनव्वर राना इस्लाम को तलवार की ताकत पर फैलाने को गलत ठहरा रहे हैं। ये पुस्तक 2016 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी। पांच साल में ही मुनव्वर राना अपनी ही कही कहानी से अलग जाकर अफगानिस्तान में तालिबानियों का समर्थन करते नजर आ रहे हैं। तालिबानी तो मुहम्मद गौरी से भी ज्यादा बर्बर हैं और अफगानिस्तान पर कब्जा जमाते ही इस्लामी राज की घोषणा कर देते हैं। लेकिन राना को तालिबानियों में शांति दूत नजर आते हैं और वो उनकी तुलना में ऐसी ओछी बातें कर देते हैं तो उनकी कुंठा को, धर्मांधता को और अज्ञानता को प्रदर्शित करता है।

अपनी इसी किताब में ही बड़े ही चुनौतीपूर्ण अंदाज में राना कहते हैं कि ‘दुनिया के हर गैर मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा है तो यही है कि इस्लाम तलवार के जोर से फैलाया गया मजहब है लेकिन दुनिया के तमाम इतिहासकार मिलकर भी इस बात को साबित नहीं कर सके कि दुनिया के किसी भी हिस्से में मुसलमान बे सबब हमलावर हुए या कत्ल और गारतगरी (तबाही) का बाजार गर्म किया। इस्लाम के सदाबहार दुश्मन यहूदियों और ईसाइयों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से इस्लाम के खिलाफ प्रोपगंडा की जो मुहिम शुरू की थी वो आज भी सूरतें बदल-बदलकर दुनिया में मौजूद है।‘ वो यहां भी सामान्यीकरण के दोष के शिकार तो हो जाते हैं और अपनी अज्ञानता का सार्वजनिक प्रदर्शन करते नजर आते हैं। मुनव्वर राना छह साल पहले इस तरह की बातें लिखते हैं क्या उनको नहीं मालूम था कि 1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान में किस तरह की क्रूरता की थी। क्या राना को यह मालूम नहीं था कि तालिबानियों के दौर में अफगानिस्तान में महिलाओं को किस तरह से प्रताड़ित किया गया था। या इस्लाम को मानने वाले दहशतगर्दों ने अमेरिका से लेकर फ्रांस और अन्य मुल्कों में किस तरह की तबाही मचाई। तब भी वो लिख रहे थे कि मुसलमान कभी भी हमलावर नहीं हुए और दुनियाभर के तमाम इतिहासकारों ने इस्लाम के खिलाफ दुश्प्रचार किया। अब भी उनको ये नजर नहीं रहा कि तालिबान अफगानिस्तान में क्या कर रहा है। किस तरह से लोगों की जान ले रहा है या किस तरह के अत्याचार वहां हो रहे हैं। मुनव्वर राना तालिबानियों के प्रेम में इतने डूब गए कि उनको अपने वतन की साख का भी ख्याल नहीं रहा। तमाम मर्यादा को तोड़ते हुए इस बुजुर्ग शायर ने अपने देश के अपराधियों के पास तालिबान से ज्यादा हथियार होने की बात कह डाली। इतना ही नहीं मुनव्वर राना ने अपने जाहिल होने का भी सबूत पेश किया। उनका कहना है कि तालिबानियों के यहां जितनी क्रूरता है उससे अधिक क्रूरता तो हमारे यहां है। मुनव्वर राना के बेटों ने जिस तरह का ड्रामा रचा था अगर वैसा ड्रामा वो अफगानिस्तान में रचते तो उनको पता चलता कि क्रूरता क्या होती है। राना ये भूल जाते हैं कि इस देश में संविधान का राज चलता है, कोई धार्मिक सत्ता नहीं। यहां तर्क और तथ्यों के आधार पर कानून की धाराएं तय होती हैं किसी अन्य तरीके से नहीं। 

मुनव्वर राना बार-बार अपनी मूर्खता का प्रमाण देते हैं। तालिबानियों पर बोलते हुए उनको महर्षि वाल्मीकि याद आ गए। मैं जान-बूझकर मूर्खता शब्द का उपयोग कर रहा हूं कि मुनव्वर राना को न तो महर्षि वाल्मीकि के अतीत के बारे में पता है और न ही उनके योगदान के बारे में। वाल्मीकि के बारे में जानने के लिए राना को न केवल वाल्मीकि रामायण पढ़ना पड़ेगा बल्कि स्कन्दपुराण आदि का अध्ययन भी करना पड़ेगा। इन ग्रंथों में वाल्मीकि के बारे में, उनकी जिंदगी के आरंभिक वर्षों के बारे में, उनके पेशे के बारे में विस्तार से उल्लेख मिलता है। बगैर पढ़े और सुनी सुनाई बातों के आधार पर राना की बातें बुढ़भस सरीखी हैं। राना पूरी तरह से न केवल विचार शून्य हैं बल्कि अपनी परंपराओं और पूर्वजों के बारे में भी उनको कुछ पता नहीं है। अगर पता होता तो वो वाल्मीकि की तुलना कभी भी तालिबानियों से नहीं करते। अब जब उनके खिलाफ मुकदमा हो गया है तो उनके होश ठिकाने आ गए हैं और उस बयान पर दाएं-बांए करते नजर आ रहे हैं। ऐसा वो पहले भी करते रहे हैं, ऊलजलूल बोल देते हैं और जब चौतरफा घिरने लगते हैं तो अपने बयान से पलट जाते हैं। 

मुनव्वर राना का अतीत इसी तरह की पलटीमार घटनाओं से भरी हुई हैं। ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए अगर हम 2015 की ही बात करते हैं। उस वर्ष देश में कुछ लेखकों ने असहिष्णुता को आधार बनाकर सरकार को बदनाम करने की साजिश रची। साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने का प्रपंच भी रचा गया। मुनव्वर राना ने भी तब साहित्य अकादमी के अपने पुरस्कार को लौटाने के लिए एक न्यूज चैनल का मंच चुना। हलांकि इसके तीन चार दिन पहले एक अंग्रेजी अखबार में उनका बयान पुरस्कार वापसी के खिलाफ छपा था।  न्यूज चैनल पर पुरस्कार वापसी की घोषणा के बाद चैनल के कर्मचारी उनकी ट्राफी और चेक लेकर साहित्य अकादमी पहुंचे थे। चेक पर किसी का नाम नहीं लिखा था। पूरा ड्रामा फिल्मी था। उस वक्त न्यूज चैनलों में चर्चा थी कि राना ने एक बड़ी डील के तहत पुरस्कार वापसी को लेकर अपना स्टैंड बदला। अब डील क्या थी या उसकी सचाई क्या थी ये तो राना ही बता सकते हैं। पुरस्कार वापसी के अलावा राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी राना ने बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था और सर्वोच्च न्यायालय पर आरोप लगाए थे। 

दरअसल राना की अपनी कोई विचारधारा नहीं है। उनका सार्वजनिक आचरण इस बात की गवाही देता है कि वो बेहद स्वार्थी व्यक्ति हैं और अपने स्वार्थ के आगे उनको कुछ नहीं दिखता है। वो लाभ के लिए स्टैंड लेते हैं और लाभ के लिए कभी अपने धर्म का तो कभी अपनी शायरी की आड़े लेते हैं। जब फंसने लगते हैं तो स्टैंड बदल देते हैं। राना जैसे लोगों के इस तरह के व्यवहार पर कथित प्रगतिशील खेमा भी खामोश रहता है। यहां तक कि बात बात पर प्रेस रिलिज जारी करनेवाला जनवादी लेखक संघ भी राना के तालिबान वाले बयान पर खामोश है। प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच को तो जैसे सांप सूंघ गया है। दरअसल इस तरह की खामोशी या कथित प्रगतिशीलता ही कट्टरता को सींचती है। आज अगर राना के बयानों का विरोध ये लेखक संगठन नहीं करते हैं तो फिर उनकी बची-खुची साख पर बड़ा सवालिया निशान लगता है।


सिनेमा के इतिहास के जरूरी पन्ने की याद


स्वतंत्रता के पहले जब फिल्में रिलीज होती थीं तो उस वक्त सिनेमाघरों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। फिल्में तैयार होने के पहले से फिल्म निर्माता देशभर के सिनेमाघरों की बुकिंग कर लिया करते थे। इसमें प्रतिद्वंदी निर्माताओं के बीच अलग अलग तरह के खेल भी होते थे। कई बार ऐसा होता था निर्माता अपनी फिल्मों के लिए पहले से सिनेमाघर बुक कर लिया करते थे ताकि दूसरे निर्माताओं को अपनी फिल्में रिलीज करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े। इसी दौर में दिल्ली में एक फिल्म निर्माता और फिल्मों को फाइनेंस करनेवाले सेठ जगत नारायण अपनी फिल्मों को रिलीज करने में परेशानी महसूस करने लगे थे। कई बार ऐसा होता था कि वो जिस फिल्म में पैसा लगाते थे उसको दिल्ली में रिलीज करने के लिए सिनेमा हाल सही समय पर नहीं मिल पाता था। इस परेशानी से उबरने के लिए सेठ जी ने दिल्ली में तीन सिनेमा हाल खरीद लिए। ये तीनों सिनेमा हाल पुरानी दिल्ली इलाके में थे। नावेल्टी सिनेमा पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास, जामा मस्जिद के पास जगत सिनेमा और कश्मीरी गेट में रिट्ज। उसके बाद सेठ जगत नारायण की परेशानी कुछ कम हुई। उन्होंने नावल्टी और जगत सिनेमा को आम जनता का हाल बनाया और उनकी ही रुचि की फिल्में यहां लगाया करते थे। रिट्ज को उन्होंने थोड़ा अपमार्केट बनाया और उसको अपर मिडिल क्लास की रुचियों के अनुसार न सिर्फ सजाया बल्कि फिल्में भी इस रुचि का ध्यान में रखकर ही लगाई जाती थीं।

अभी जब नावेल्टी सिनेमा की जमीन को लेकर जब राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है तो अचानक से इस प्रसंग का स्मरण हो आया। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सेठ जगत नारायण के स्वामित्व में आने के पहले नावल्टी सिनेमा का नाम एलफिस्टन हुआ करता था। 1930 से 1940 के बीच कभी सेठ जगत नारायण ने इसका स्वामित्व हासिल किया था। कालांतर में सेठ जी के वारिसों ने इसको चलाया। जब से फिल्मों को दिखाने की तकनीक बदली और महानगरों में मल्टीप्लैक्स संस्कृति मजबूत होने लगी तो नावल्टी जैसे सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमा हाल के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। एक तो तकनीक के साथ बदलाव की चुनौती, दूसरे दर्शकों का मल्टीप्लैक्स की ओर बढता रुझान, नावल्टी जैसे सिनेमाघरों की बंदी का कारण बना। अन्यथा एक जमाने में तो दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए नावल्टी सिनेमा सबसे पसंदीदा सिनेमा हाल हुआ करता था। कई बार तो विश्वविद्यालय के विभिन छात्रावासों में रहनेवाले छात्र पैदल ही नावल्टी में फिल्म देखने पहुंच जाते थे। आज दिल्ली क्या पूरे देश में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर या तो बंद हो चुके हैं या बंद होने के कगार पर हैं।

Saturday, August 14, 2021

पर्दे पर शौर्य गाथाओं से निकलते संकेत


 पिछले वर्ष गांधी जयंती के अवसर पर एकता कपूर और करण जौहर समेत कई फिल्मकारों ने एक वक्तव्य जारी किया था। उसमें ये कहा गया था कि स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारतीय संस्कृति, भारतीय मूल्यों और शौर्य के बारे में फिल्मों का निर्माण किया जाएगा। अभी हाल में कुछ फिल्में आई हैं जिनमें भारतीय सैनिकों के साथ-साथ आम जनता के साहस की कहानी भी कही गई है। अजय देवगन की फिल्म ‘भुज, द प्राइड ऑफ इंडिया’ में 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान भुज एयरबेस पर तैनात स्कावड्रन लीडर विजय कार्णिक के अदम्य साहस की कहानी कहता है। 1971 में पाकिस्तानियों ने भुज हवाई अड्डे पर हमला कर वहां की हवाईपट्टी को तबाह कर दिया था। इस हमले को युद्ध के इतिहास में भारत का ‘पर्ल हार्बर मोमेंट’ कहा जाता है। दिवतीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने अमेरिका के हवाई के पर्ल हार्बर में नौसेना अड्डे पर उस वक्त हमला किया था जब इसकी कल्पना नहीं की गई थी। उस हमले में करीब 180 अमेरिकी युद्धक विमानों को तबाह कर दिया गया था। उसी तरह जब भारत, पूर्वी पाकिस्तान सीमा पर युद्ध लड़ रहा था और पश्चिमी भारत में किसी हमले की आशंका नहीं थी तब पाकिस्तानी वायुसेना ने भुज हवाई अड्डे को निशाना बनाया था। हमले में कई विमान और हवाई पट्टी को नुकसान पहुंचा था। स्कावड्रन लीडर विजय कार्णिक की सूझबूझ और स्थानीय गांववालों की मदद से टूटी हवाई पट्टी को तीन दिन में चालू कर लिया गया था। कार्णिक के अलावा स्थानीय महिला सुंदरबेन की सांगठनिक क्षमता, रणछोरदास पगी और रामकरण नायर के शौर्य को भी चित्रित किया गया है। 

इस फिल्म में एक और खूबसूरत बात ये है कि इसमें हमें हिंदी के श्रेष्ठ शब्दों को सुनने का अवसर भी मिलता है। संवाद बेहद अच्छे हैं और समाज को एक संदेश देते हैं। सुंदरबेन अपने बच्चे को बचाने के लिए तेंदुए को मार डालती है और उसके बाद हाथ में तलवार लेकर हुंकार करती है। ‘जय हिंद और जय जय गर्वी गुजरात’ के घोष के बाद वो कहती है कि ‘भगवान कृष्ण कहते हैं कि हिंसा पाप है लेकिन किसी की जान बचाने के लिए की गई हिंसा धर्म है।‘ यहां भी भगवान कृष्ण हैं और जब स्कावड्रन लीडर विजय कार्णिक भुज की टूटी हुई हवाईपट्टी के मरम्मत के लिए गांववालों से मदद मांगने जाते हैं तो सुंदरबेन एक बार फिर भगवान कृष्ण और शंकर को याद करती है। गांववालों के अंदर के भय को खत्म करने और उनमें देशभक्ति का जोश भरने के लिए कहती हैं, ‘सारे जग का पालनहारा है कृष्ण कन्हैया, एक बाल भी बांका नहीं होने देंगे। आज अगर हमने अपने देश की मदद नहीं की तो सब साथ में जाकर जहर पी लेना, भगवान शंकर जहर पीने नहीं आएंगे। सबका चीरहरण होगा और भगवान कृष्ण चीर देने नहीं आएंगे।‘ संवाद लंबा है लेकिन अर्थपूर्ण है। वो आगे कहती है कि ‘लेकिन अगर आज हमने पांडवों की तरह अत्याचारियों के खिलाफ लड़ने का संकल्प ले लिया तो भगवान कृष्ण खुद हमारे सारथी बनकर आएंगे। सुंदरबेन के किरदार में जब सोनाक्षी सिन्हा ये कहती हैं तो लोगों में जोश भर जाता है।‘ 

धार्मिक प्रतीकों और अपने पौराणिक चरित्रों को हवाले से कथानक को आगे बढ़ाने का कौशल संवाद लेखकों ने दिखाया है। हिंदी फिल्मों में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। अबतक ज्यादातर फिल्मों में पौराणिक चरित्रों को मिथकों की तरह चित्रित करके उपहास उड़ाया जाता रहा है। धार्मिक फिल्मों को अगर छोड़ दिया जाए तो अन्य फिल्मों में कई बार नायक भगवान को कोसते नजर आते हैं। नायकों को भगवान से इस बात से खिन्न दिखाया जाता रहा है कि उन्होंने न्याय नहीं किया। लेकिन ‘भुज द प्राइड ऑफ इंडिया’ में फिल्मकार ने उपहास की इस मानसिकता को तोड़ने का साहस दिखाया। धर्म और नीति की भारतीय परंपरा का उपयोग कथानक में किया। इस लिहाज से अगर इस फिल्म पर विचार करें तो इसको संवाद लेखन की शैली में एक बदलाव के तौर पर भी देखा जा सकता है। इतना ही नहीं जब सुंदरबेन के नेतृत्व में सभी गांववाले भुज की टूटी हवाईपट्टी को ठीक करने का निर्णय लेते हैं तो वहां भी ‘जय कन्हैया लाल की हाथी घोड़ा पालकी’ का घोष उनके अंदर जोश भर देता है। इस फिल्म में गानों के बोल भी हिन्दुस्तानी से मुक्त और हिंदी की शान बढ़ानेवाले हैं। एक गीत है जिसमें ईश्वर के साथ साथ नियंता और घट, विघ्नहरण, करुणावतार जैसे शब्दों का उपयोग किया गया है। इस गाने को सुनते हुए 1961 में आई फिल्म ‘भाभी की चूड़ियां’ फिल्म का गीत ‘ज्योति कलश छलके’ की प्रांजल और सरस हिंदी का स्मरण हो उठता है। उस गीत को पंडित नरेन्द्र शर्मा ने लिखा था। भुज के गीतों को मनोज मुंतशिर, देवशी और वायु ने लिखा है। 

आज जब हम अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो ऐसे में संवाद लेखन और गीतों को बोल में अपनी भाषा का गौरवगान आनंद से भरनेवाला है। इसकी अनुगूंज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक सुनाई दे सकती है। यह हिंदी के उपहास की मानसिक दासता से मुक्ति का संकेत भी है। अब दूसरे अन्य फिल्मकारों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए। भाषा के अलावा धर्म को लेकर भी कोई ऐसी वैसी टिप्पणी नहीं की गई है जो पिछले दिनों ओटीटी पर आई वेबसीरीज में फैशन बन गई थी। यहां तो जब रणछोरदास पगी पाकिस्तानियों से लोहा लेने जाता हैं तो अपनी पगड़ी करणी माता के सामने रखकर शपथ लेते हैं कि जिस दिन लड़ाई जीतूंगा उस दिन पगड़ी पहनूंगा। ये दृश्य बहुत छोटा है लेकिन इसका संदेश बहुत बड़ा है। आजतक जब भी भारत में ये नारा गूंजता था कि जबतक सूरज चांद रहेगा तो इसके साथ व्यक्ति विशेष का नाम लगाकर कहा जाता था कि उनका नाम रहेगा। इस फिल्म में सुंदरबेन कहती हैं कि जब तक सूरज चंदा चमके, तब तक ये हिन्दुस्तान रहेगा। इसका भी संदेश दूर तक जा सकता है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस फिल्म के संवाद अभिषेक, रमन, रीतेश और पूजा ने लिखे हैं। 

दूसरी फिल्म ‘शेरशाह’ का मुगल बादशाह से कुछ लेना देना नहीं है बल्कि ये करगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी है। युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा का कोडनेम ‘शेरशाह’ है। ये फिल्म विक्रम बत्रा के शौर्य की कहानी तो कहता ही है उनके प्रेम प्रसंग को भी उभारता है। इस फिल्म के संवाद लेखक बहुधा भटकते नजर आते हैं। आतंकवाद पर बात करते समय कश्मीर के लोगों का भरोसा जीतने की भी बात होती है और देशभक्ति की भी। पूर्व में बनी कई फिल्मों में कश्मीर के आतंकवाद और आतंकवादियों के चित्रण में संवाद लेखक दुविधा में दिखते हैं। ऐसा लगता है कि वो कुछ आतंकवादियों को भटका हुआ मानते हैं और उसी हिसाब से उसको ट्रीट करते हैं। जबकि संवाद में स्पष्टता होनी चाहिए। ‘शेरशाह’ में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने कैप्टन विक्रम बत्रा का किरदार निभाया है लेकिन बेहतर अभिनेता को इस रोल के लिए चुना जाता तो फिल्म अधिक प्रभाव छोड़ सकती थी। ये सुखद संकेत है कि हिंदी के फिल्मकारों ने आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर उन कम ज्ञात नायकों को भी सामने लाने का बीड़ा उठाया है। आगामी दिनों में अक्षय कुमार की फिल्म ‘बेलबॉटम’ रिलीज होने के लिए तैयार है। बालाकोट एयर स्ट्राइक पर भी फिल्मों की घोषणा हुई है। इसके अलावा फील्ड मार्शल सैम मॉनकशा और क्रांतिवीर उधम सिंह पर भी फिल्में बनने के संकेत हैं। 


Saturday, August 7, 2021

अश्लीलता और मुनाफे का खेल


अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा इन दिनों अश्लील फिल्मों के बवंडर में घिरे हैं। थाना,पुलिस,कचहरी और जेल के चक्कर लगा रहे हैं। उनपर आरोप है कि वो एक एप के जरिए अश्लील फिल्मों का कारोबार करते हैं। यह पहली बार हो रहा है कि एक टॉप की अभिनेत्री के पति अश्लील फिल्मों के कारोबार में फंसे हैं। लेकिन ये पहली बार नहीं है कि शिल्पा के पति विवाद में आए हैं। राज कुंद्रा जब राजस्थान रॉयल्स के मालिकों में से एक थे तब उनपर मैच फिक्सिंग का आरोप लगे थे। उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी और वो जेल भी गए थे। उनकी टीम राजस्थान रायल्स के खलने पर प्रतिबंध भी लगा था। उसके पहले जब राज कुंद्रा ने शिल्पा शेट्टी से शादी की थी तो उनकी पहली पत्नी और उनके बहनोई के रिश्तों को लेकर भी आरोप प्रत्यारोप का दौर चला था। इस बार राज कुंद्रा पहले के आरोपों से ज्यादा संगीन इल्जाम में फंसे हैं। उनकी पत्नी शिल्पा शेट्टी से भी पूछताछ की जा चुकी है। शिल्पा शेट्टी ने अपनी निजता को लेकर अपील भी की है, उनकी निजता का सम्मान होना चाहिए लेकिन अगर कहीं कानून तोड़ा गया है तो उसकी चर्चा तो स्वाभाविक है। उसमें निजता आदि की बात बेमानी हो जाती है। दरअसल अश्लील फिल्मों का कारोबार पिछले दस साल में कई गुणा बढ़ा है। तकनीक के फैलाव और इंटरनेट के घनत्व के बढ़ते जाने से अश्लीलता के कोष्ठक में रखी जानेवाली सामग्री का चलन काफी बढ़ गया है। अगर गहराई से इसपर विचार करें तो पाते हैं कि राज कुंद्रा पर जो दो आरोप लगे उन दोनों कारोबार में लागत कम और मुनाफा बहुत अधिक है। मैच फिक्सिंग और अश्लील फिल्मों के कारोबार में बहुत अधिक पैसा कमाया जा सकता है। धंधे में इसको ईजी मनी कहते हैं। अश्लील फिल्मों का कारोबार करना हमारे देश के कई कानून के अंतर्गत अपराध माना जाता है और आरोप सिद्ध होने पर दंड का भी प्राविधान है। 

राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध अश्लील सामग्रियों को लेकर देशव्यापी बहस होनी चाहिए। इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री को रोक पाना लगभग असंभव है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में अश्लीलता के खिलाफ कानून है। कई देशों में दिशा निर्देश है कि मनोरंजन या यथार्थ के नाम पर आप कितना दिखा सकते हैं और कितना छिपा सकते हैं। अमेरिका में फिल्मों में इतना खुलापन है कि वहां स्त्री-पुरुष के बीच के अंतरंग दृश्यों को दिखाया जाता है और उसपर कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है। इसी तरह से कई यूरोपीय देशों में खुलापन है लेकिन जापान समेत कई देश फिल्मों में इस तरह के दृश्यों को लेकर सचेत हैं और वहां उन दृश्यों में अंगों को छिपाने का दिशा निर्देश है। हमारे देश में इस तरह से कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है और ये अदालत या जांच एजेंसी के विवेक पर निर्भर करता है। कामुकता और अश्लीलता के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा है। उसको परिभाषित करने की अपनी अपनी दृष्टि है। आज फेसबुक से लेकर कई अन्य इंटरनेट मीडिया माध्यमों पर इस तरह की सामग्रियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर भी अश्लील सामग्रियों की भरमार है। ओटीटी को लेकर नियमन जारी हो गया, संभव है कि उसको लेकर कार्यवाही भी आरंभ हो गई होगी लेकिन यहां उपलब्ध अश्लील सामग्री पर किसी तरह की रोक दिखाई नहीं देती। जितनी जुगुप्साजनक सामग्री पहले उपलब्ध थी वो अब भी है, बल्कि वो बढ़ ही रही है। 

अश्लील फिल्में या सामग्री दिखानेवाले निर्माता या प्लेटफॉर्म अधिक मुनाफा की चाहत में ऐसा करते हैं। पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में नायिका को टापलेस दिखाया गया, ‘लस्ट स्टोरीज’ में उससे एक कदम आगे बढ़ गए। बाद में आई वेब सीरीज में रति प्रसंगों को दिखाया जाने लगा। वेब सीरीज को लेकर किसी तरह की कोई पाबंदी या दिशा निर्देश नहीं होने की वजह से इन निर्माताओं का हौसला बढ़ता चला गया। अश्लीलता को दिखाने का एक अलग ही पैटर्न है। और कई फिल्म निर्माता इस पैटर्न को अपनाते हैं। पहली बार जितना दिखाया जाता है अगली बार उससे अधिक या आगे दिखाने की प्रवृत्ति काम करती है। ये प्रवृत्ति संक्रामक होती है जो दूसरे फिल्म निर्माताओं को भी अपनी चपेट में ले लेती है। अगर हम भारतीय फिल्मों के उदाहरण से इसको समझें तो ये पैटर्न साफ दिखता है। 1970 के बाद ही फिल्मों को लें तो बलात्कार जैसे दृश्यों को दिखाने के लिए पहले फूलों को मसलने से लेकर गिरगिट के फतंगे को खाने के दृष्य को प्रतीक के तौर पर उपयोग में लाया जाता था। फिर जब ये स्थापित हो गया तो निर्माता थोड़ा और आगे बढ़े और नायिका को जबरन पकड़ने और साड़ी आदि खींचने के दृश्य आ गए। अब तो ये प्रवृत्ति नग्नता तक चली गई है। इसका आधुनिकता और समाज के खुलेपन आदि से कोई लेना देना नहीं है बल्कि ये अश्लीलता का व्याकरण है जो इस नियम का पालन करता है जिसमें थोड़ा और, थोड़ा और करते हुए आगे बढ़ते हैं। 

चतुर निर्माता पहले थोड़ा दिखाते हैं और उन दृश्यों को दर्शकों की स्वीकार्यता की प्रतीक्षा करते हैं। उसको बोल्ड, खुलापन आदि कहकर एक सुंदर सा आवरण चढ़ाते हैं। अगर आप हिंदी फिल्मों में किसिंग सीन के विकास क्रम को देखें या नायिकाओं के बिकिनी या कम कपड़े पहनने के चलन के बारे में विचार करें तो निर्माताओं की चतुराई की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखती है। ‘संगम’ फिल्म में वैजयंतीमाला के बिकिनी पहनने से फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में मंदाकिनी के झरने में झीनी साड़ी में स्नान-दृश्य से लेकर फिल्म ‘जिस्म’ तक के दृश्यों में इसको रेखांकित किया जा सकता है। ये सब कहानी की मांग की आड़ में होता है। नायिकाओं के खुलेपन को दिखाने का भी एक कौशल होता है। राज कपूर की फिल्मों में ये कौशल दृष्टिगोचर होता है। वहां खुलेपन में भी एक कलात्मकता होती है या कह सकते हैं कि उस खुलेपन का एक सौंदर्यशास्त्र होता है। कालांतर में ये कलात्मकता गौण होती चली गई और उसका स्थान नग्नता ने ले लिया। यही हाल हिंसा का भी है। अगर आप 1970 के पहले की फिल्में देखें तो उसमें जिस तरह की हिंसा होती थी अपेक्षाकृत उसके बाद हिंसा बढ़ती चली गई। अब तो हालात ये है कि किसी की हत्या के बाद उसके शरीर को इस बुरी तरह के काटा जाता है कि आप चंद सेकेंड उस दृश्य को नहीं देख सकते। पहले पेट में चाकू मारकर हत्या की जाती थी, फिर गोलियों से भूना जाने लगा अब फाइट सीन के बाद खलनायक को नुकीली चीज पर टांग दिया जाता है या फिर धारदार हथियार से मारकर अंतड़ियां तक निकाल दी जाती हैं। परिवार के साथ बैठकर न तो खुलापन देख सकते हैं न ही हिंसा के दृश्य।  

कुछ निर्माताओं या निर्देशकों के बारे में कहा जाता है कि कई बार वो अपनी फिल्मों में निजी कुंठा का प्रदर्शन करते हैं। आप ओटीटी पर चलनेवाले कुछ वेब सीरीज के निर्माता या निर्देशक का नाम देखेंगे और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे तो ये और भी स्पष्ट हो जाएगा। मानसिक रूप से बीमार या कुंठित कुछ निर्माता यौनिकता के चित्रण में आनंद प्रात करते हैं। उनको जब दर्शक भी मिल जाते हैं तो उनका ये आनंद बढ़ जाता है। अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर से मनोरंजन के नाम पर अश्लील सामग्री परोसने की या अश्लील फिल्मों के निर्माण को लेकर सख्त नियम बनाने की बात शुरू हो सकती है। इंटरनेट माध्यमों पर उपलब्ध नग्नता को काबू में करने की बात और मांग संभव है।   

Saturday, July 31, 2021

दिशाहीन होता कला का ‘भारत भवन’


पिछले विधानसभा चुनाव के बाद मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी और कमलनाथ मुख्यमंत्री। मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ सरकार ने एक आदेश के जरिए सूबे की तमाम उन समितियों को भंग करने का आदेश दिया था जिसके सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार करती थी। किसी भी समिति के कार्यकाल के खत्म होने की प्रतीक्षा नहीं की गई थी। उसके पहले लंबे समय से मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और वहां अलग अलग विभागों की समितियों, सलाहकार समितियों आदि में ज्यादातर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग नामित थे। कमलनाथ ने एक झटके में सभी समितियों को भंग करके कांग्रेस और वामदलों में आस्था रखनेवालों को नियुक्त करना आरंभ कर दिया था। भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने से दबाव डालकर इस्तीफा लेने की खबर उस वक्त आई थी। उनके इस्तीफे के बाद कमलनाथ सरकार ने अपनी पसंद का कुलपति बनाया गया था। उन कुलपति महोदय ने भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी पर सार्वजनिक रूप से अनर्गल टिप्पणी करनेवाले तीन व्यक्तियों को प्रोफेसर के तौर पर अस्थायी नियुक्ति भी दी थी। फिर मध्य प्रदेश का राजनीतिक घटनाक्रम बदला और शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बन गए। पर कला-संस्कृति के क्षेत्र में कमलनाथ ने अपने सवा साल के कार्यकाल में जो बदलाव किए थे उनमें से ज्यादातर अब भी अपने अपने पदों पर डटे हुए हैं। कुछ लोगों ने भले ही इस्तीफा दे दिया। 

पिछले दिनों भोपाल के भारत भवन से जुड़े प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ल की कविता को लेकर विवाद आरंभ हुआ तो पूरे देश की नजर इस कला केंद्र की ओर गई। भारत भवन की परिकल्पना और स्थापना कला के विभिन्न रूपों में समन्वय और संवाद के एक केंद्र के रूप में की गई थी। आज से करीब अट्ठाइस साल पहले इसकी स्थापना हुई थी। इस संस्था को मध्य प्रदेश सरकार से अनुदान मिलता है। इसको चलानेवाले ट्रस्ट में मध्य प्रदेश सरकार और भारत सरकार के प्रतिनिधि होते हैं। प्रदेश के संस्कृति सचिव भी इस ट्रस्ट में रहते हैं। कमलनाथ सरकार ने जब सभी समितियों आदि को भंग किया था तब भारत भवन के ट्रस्टियों को भी हटा दिया गया था। उसके बाद कांग्रेस सरकार ने अपनी पसंद के लोगों को ट्रस्ट में नामित किया था। इस वक्त श्याम बेनेगल, गुलजार और संजना कपूर भारत भवन के ट्रस्टियों हैं। कमलनाथ ने जब भारत भवन के ट्रस्ट को भंग किया था तो उस वक्त की ट्रस्टियों में पद्मा सुब्रह्मण्यम जैसी विख्यात कलाकार और डॉ सच्चिदानंद जोशी जैसे प्रतिष्ठित लेखक और सांस्कृतिक प्रशासक शामिल थे। उस वक्त किसी ने ये नहीं सोचा कि पद्मा जी जैसी बड़ी कलाकार को कैसे हटाया जा सकता है। लेकिन अब के हुक्मरानों में इस बात को लेकर हिचक है गुलजार और श्याम बेनेगल को कैसे हटाया जा सकता है। यही फर्क है भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में। कांग्रेस को जिसको रखना या हटाना होता है वो बेहिचक अपना काम करती है। और अगर कांग्रेस बौद्धिक क्षेत्र में ऐसा करती है तो वामपंथी उनके फैसलों को संरक्षण भी देते हैं। इससे उलट भारतीय जनता पार्टी सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करती है। उदारतापूर्वक अपने विरोधियों को भी स्थान देती है। खैर ये एक अलहदा मुद्दा है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। फिलहाल हम बात कर रह हैं भारत भवन की। 

भारत भवन अपनी स्थापना काल से ही विवादों में रहा है लेकिन अब लगभग दिशाहीन हो गया है। 1982 में जब इसकी स्थापना हुई थी तब नौकरशाह अशोक वाजपेयी इसके कर्ताधर्ता थे। उस समय भी अशोक वाजपेयी के एक बयान से विवाद हुआ था। दिसंबर 1984 के भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोगों की मौत हुई थी। उसके तीन महीने बाद भारत भवन ने 1985 में विश्व कविता समारोह का आयोजन किया था। अशोक वाजपेयी का बयान इस आयोजन के संदर्भ में ही था, जिसकी पूरे देश में निंदा हुई थी। अशोक वाजपेयी ने कहा था कि ‘मरनेवाले से साथ मरा नहीं जाता’। बाद में अशोक वाजपेयी ने अपनी सफाई में कहा कि उनकी संवाददाता से फोन पर अनौपचारिक बातचीत हुई थी और उन्होंने कहा था कि ‘यही जीवन है और हम मरनेवालों के साथ मर नहीं जाते’। अगर अशोक वाजपेयी की दलील मान भी ली जाए तो अनौपचारिक बातचीत से भी संवेदना के संकेत तो मिलते ही हैं। उसके बाद भी कई विवाद भारत भवन को लेकर होते रहे हैं। अभी हाल का विवाद यहां के कर्ताधर्ता प्रेमशंकर शुक्ल की कविता और उनकी कार्यशैली को लेकर उठा है। इस विवाद पर आगे बात हो इसके पहले बताना आवश्यक है कि प्रेमशंकर शुक्ल अशोक वाजपेयी की बगिया के ही फूल हैं। प्रेमशंकर शुक्ल की आस्था अब भी अशोक वाजपेयी से ही जुड़ी है। यह अनायास नहीं है कि अशोक वाजपेयी से जुड़े लोगों पर या वामपंथ से जुड़े लेखकों कवियों को भारत भवन से प्रकाशित पत्रिकाओं के अंकों में प्रमुखता से स्थान मिलता है। उन्हीं कवियों को भारत भवन के आयोजनों में बार बार बुलाया जाता है जो अशोक वाजपेयी की मित्र मंडली में हैं। इस तरह की कला संस्थाओं में किसी कवि या लेखक को आमंत्रित करने का कोई मानदंड तो होता नहीं है, न ही इस बात की कोई व्यवस्था होती है कि किस रचनाकार को कितनी बार आमंत्रित किया जाए। इसकी ही आड़ में इन संस्थाओं में खेल चलते हैं। 

भारत भवन के अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ल कविता भी लिखते हैं। उनकी कुछ कविताएं जो इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं उनमें शिव-पार्वती से लेकर पान और होठ तक के बिंब का प्रयोग किया गया है। इन कथित कविताओं में जो भावोच्छवास है वो अश्लीलता तक पहुंचती है। यह ठीक है कि कवि अपनी कल्पना में बहुधा देह के सौंदर्य का उपयोग करते हैं लेकिन प्रेमशंकर शुक्ल के यहां जब इस तरह के बिंब आते हैं तो वो फूहड़ता के साथ उपस्थित होते हैं। चाहे उनकी कविता अंगराग हो, मीठी पीर हो, केलि हो या अनावरण और आदि पलथी हो। इनकी कविताओं को पढने के बाद ऐसा लगता है कि अशोक वाजपेयी की शागिर्दी में इतने लंबे समय से रहने के बाद भी प्रेमशंकर शुक्ल कविता लिखना नहीं सीख पाए। हिंदी साहित्य के पिछले तीन चार दशक के परिदृश्य पर नजर डालें तो पाते हैं कि इस कालखंड में कई अफसर लेखक-कवि हुए। अगर वो अपने समकालीन रचनाकारों को लाभ पहुंचाने की स्थिति में होते हैं तो वो चर्चित भी होते रहे हैं। वजह बताने की जरूरत नहीं। कोई अफसर किसी शोध संस्थान में पदस्थापित होते ही पुस्तक लिखने लग जाता है। उनके पास सहूलियतें होती हैं और समकालीन लेखकों को उपकृत करने का संसाधन। इन सरकारी सहूलियतों और संसाधनों के बल पर ज्यादातर अफसर कवि हो जाते हैं। नामवर सिंह ने कई ऐसे अफसरों को सदी का श्रेष्ठ रचनाकार तक घोषित किया था।  

मध्य प्रदेश के बारे में माना जाता रहा है कि इस प्रदेश में संस्कृति को लेकर अन्य राज्यों की अपेक्षा ज्यादा संजीदगी से काम होता है। इस प्रदेश के सबसे बड़े कला केंद्र की गतिविधियां इस धारणा को खंडित करती है। भारत भवन में जिस तरह के आयोजन हो रहे हैं या जो प्रकाशन हो रहा है उसपर मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग को ध्यान देना चाहिए। गुलजार और श्याम बेनेगल की प्रतिष्ठा हो सकती है लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर उनसे ये अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वो संस्था को कोई दिशा दे सकेंगे। भारत भवन को रचनात्मक केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए रचनात्मक और सकारात्मक बदलाव की आवश्यकता कला जगत में महसूस की जा रही है। 

Wednesday, July 28, 2021

गाइड में लीला नहीं बन पाई 'रोजी'


नौसेना अधिकारी के एम नानावटी की जिंदगी और उनके अपनी पत्नी के प्रेमी को गोलीमार देने की घटना हर दौर में फिल्मकारों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है। सुनील दत्त ने जब फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने की सोची तो उनको नानावटी की स्टोरी पसंद आई और उन्होंने उसपर फिल्म बनाने का ताय किया। उन्होंने ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ नाम से नानवटी की कहानी पर फिल्म बनाई। इसमें सुनील दत्त के साथ रहमान थे और नायिका के तौर पर मिस इंडिया रही लीला नायडू को चुना गया था। फिल्म बनी लेकिन बहुत चल नहीं पाई लेकिन लीला नायडू की खूबसूरती और अदायगी का हिंदी फिल्मकारों ने नोटिस लिया। नानावटी की कहानी पर बाद में गुलजार के निर्देशन में ‘अचानक’ फिल्म बनी जिसको ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखा था। इसमें विनोद खन्ना लीड रोल में थे। कई वर्षों बाद अक्षय कुमार अक्षय कुमार को लीड रोल में लेकर एकबार फिर इस कहानी पर ‘रुस्तम’ बनी। बाद की दोनों फिल्में सफल रहीं लेकिन ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ को दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाया। 1963 में ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ रिलीज हुई थी। इसी समय विजय आनंद ने आर के नारायणन की कहानी पर ‘गाइड’ फिल्म बनाने की सोची थी तो उनके जेहन में रोजी की भूमिका के लिए लीला नायडू का नाम ही आया। वो लीला की खूबसूरती से बहुत प्रभावित थे और उनको लगता था कि ‘गाइड’ में रोजी की भूमिका के लिए वो उपयुक्त अदाकारा हैं। इस बात का कई जगह उल्लेख मिलता है कि विजय आनंद ने लीला नायडू से इस रोल के लिए बात कर ली थी। जब फिल्म के फ्लोर पर जाने का समय आया और उसका स्क्रीनप्ले लिख लिया गया तो विजय आनंद को महसूस हुआ कि रोजी के रोल में तो वही अभिनेत्री सफल हो सकती हैं जो बेहतरीन डांसर भी हो। लीला नायडू नृत्यकला में उतनी पारंगत नहीं थीं लिहाजा विजय आनंद को अपना फैसला बदलना पड़ा और लीला नायडू की जगह वहीदा रहमान को चुना गया। बाद की बातें तो इतिहास हैं। 

फिल्म ‘गाइड’ तो लीला नायडू को नहीं मिली लेकिन उसी समय इस्माइल मर्चेन्ट ने एक कंपनी बनाई और फिल्म ‘द हाउसहोल्डर’ का निर्माण किया। इस फिल्म में लीला नायडू को लिया गया था। ‘द हाउसहोल्डर’ के बनने की प्रक्रिया में सत्यजित राय बहुत गहरे जुड़े थे और वो लीला नायडू से प्रभावित हो गए थे। उन्होंने लीला नायडू, शशि कपूर और मर्लेन ब्रांडो को लेकर एक फिल्म बनाने की योजना बनाई थी, पर ये योजना परवान नहीं चढ़ सकी। दरअसल लीला नायडू मुंबई फिल्म जगत की ऐसी अदाकारा थीं जो बेहद खूबसूरत थीं लेकिन उनकी फिल्मों को बहुत अधिक सफलता नहीं मिली। इनके पिता वैज्ञानिक थे और लंबे समय तक पेरिस में रहे। लीला नायडू अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं। स्विट्जरलैंड में पली बढ़ी और वहीं उन्होंने एक्टिंग की ट्रेनिंग भी ली। 1954 में वो मिस इंडिया बनीं और इसके आठ साल बाद उनको सुनील दत्त ने फिल्म का ऑफर दिया। फिल्मी दुनिया में आने के पहले उन्होंने ओबरॉय होटल चेन के मालिक मोहन सिंह ओबरॉय के बेटे तिलक राज ओबरॉय से विवाह कर लिया था। ये शादी बहुत लंबी नहीं चल सकी और दो बेटियों के जन्म के बाद दोनों में तलाक हो गया। बाद में लीला ने लेखक कवि डाम मारिस से दूसरी शादी कर ली। लीला नायडू ने एकाध और फिल्में की लेकिन बहुत सफलता नहीं मिल पाई। बाद के दिनों में वो अपने दूसरे पति से भी अलग हो गई और अकेले रहने लगीं। मुंबई के कोलाबा इलाके के अपने फ्लैट में अंतिम दिनों में रहीं और वहीं 29 जुलाई 2009 को उनका निधन हो गया। 


Saturday, July 24, 2021

समग्र नीति से समृद्ध होगी संस्कृति


हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संस्कृति को लेकर एक नई पहल की है। खबरों के मुताबिक संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव ने उनके सामने प्रदेश की प्रस्तावित संस्कृति नीति के प्रमुख बिंदुओं को रखा। प्रस्तावित संस्कृति नीति के बारे में योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को विषय से जुड़े विशेषज्ञों से बातचीत कर इसको तैयार करने का निर्देश दिया है। यह तो एक राज्य की बात है लेकिन अब समय आ गया है कि संस्कृति को लेकर गंभीरता से विचार किया जाए और देशभर की एक संस्कृति नीति बनाई जाए। कई राज्यों में संस्कृति नीति के नाम पर अलग अलग नियम आदि मिलते हैं, पर वहां भी एक समग्र संस्कृति नीति की आवश्यकता है। हमारे पूरे देश की संस्कृति एक है। उस एक संस्कृति के विविध रूप हैं जो अलग अलग राज्यों से लेकर अलग प्रदेशों और इलाकों में लक्षित किए जा सकते हैं। स्वाधीनता के पचहत्तर साल पूरे होने जा रहे हैं और इतना समय बीत जाने के बाद भी देश में एक समग्र संस्कृति नीति नहीं है। समग्र संस्कृति नीति के अभाव में राज्यों से लेकर केंद्रीय स्तर पर अलग अलग संस्थाएं कार्यरत हैं। ऐसा लगता है कि जब जरूरत हुई तो संस्कृति से जुड़ी एक संस्था बना दी गई। इन संस्थाओं के कामों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करने पर कई विसंगतियां दिखती हैं। सबसे बड़ी विसंगति तो यही है कि एक ही काम को अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। दिल्ली में केंद्र सरकार की संस्कृति से जुड़ी कई संस्थाएं काम करती हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, साहित्य अकादमी, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र,गांधी स्मृति और दर्शन समिति, राष्ट्रीय संग्रहालय आदि हैं। इनके अलावा अगर हम संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी अन्य संस्थाओं को देखें तो इसमें सबसे बड़ा है क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र। पूरे देश में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र हैं। बुद्ध अध्ययन से जुड़ी चार संस्थाएं हैं। पांच पुस्तकालय हैं, सात संग्रहालय भी हैं। 

उपरोक्त संस्थाओं के कामकाज पर नजर डालें तो एक ही काम अलग अलग संस्थाएं कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जो काम कर रही हैं उसमें से कुछ काम संगीत नाटक अकादमी भी कर रही है। नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट और ललित कला अकादमी के काम भी कई बार एक जैसे होते हैं। ये सब संस्थाएं जो काम कर रही हैं उनमें से कई काम क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी कर रहे हैं। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की असलियत तो कोरोना महामारी के दौरान खुल गई। उनके पास संबंधित इलाकों के कलाकारों की कोई सूची तक नहीं है। पूर्व संस्कृति मंत्री लगातार ये कहते रहे कि कोरोना महामारी से प्रभावित कलाकारों की मदद के लिए क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र सूची तैयार कर रहे हैं। पर मदद तो दूर की बात आजतक सूची की जानकारी भी ज्ञात नहीं हो सकी। किसी भी कलाकार से बात करने पर पता चलता है कि इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों में कितना भ्रष्टाचार है और अगर सही तरीके से जांच हो जाए तो समूचा सच सामने आ जाएगा। ये सांस्कृतिक केंद्र जिन उद्देश्यों से बनाए गए थे वो अब पुनर्विचार की मांग करते हैं। 

इसके अलावा राज्यों में कई तरह की अकादमियां हैं जो संस्कृति संरक्षण और उसको समृद्ध करने के काम में लगी हैं। मध्य प्रदेश में भी कला साहित्य और संगीत से जुड़ी कई संस्थाएं हैं। मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी, आदिवासी लोक कला और बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, साहित्य अकादमी भोपाल, कालिदास संस्कृत अकादमी, भारत भवन आदि। इन सबके क्रियाकलापों पर नजर डालने से कई बार एक ही तरह के काम कई संस्थाएं करती नजर आती हैं। इसी तरह से बिहार संगीत नाटक अकादमी, बिहार ललित कला अकादमी, भारतीय नृत्य कला मंदिर के अलावा ढेर सारी भाषाई अकादमियां हैं। इन दो राज्यों के के अलावा अन्य राज्यों का सांस्कृतिक परिदृश्य भी लगभग ऐसा ही है। दरअसल कांग्रेस के लंबे शासनकाल के दौरान अपने लोगों को पद और प्रतिष्ठा देने-दिलाने के चक्कर में संस्थान खुलते चले गए। तर्क दिया गया कि विकेन्द्रीकरण से काम सुगमता से होगा लेकिन हुआ इसके उलट। कला-संस्कृति के प्रशासन के विकेन्द्रकरण ने अराजकता को बढ़ावा दिया। अब तो स्थिति ये है कि कला संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं आयोजन में लग गई हैं। ज्यादातर जगहों पर ठोस काम नहीं हो पा रहा है। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य कला और संस्कृति से जुड़ी ज्यादातर संस्थाएं इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में तब्दील हो गई हैं। वो आयोजन करके ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं।  

वर्तमान परिदृश्य में अब यह बेहद आवश्यक हो गया है कि पूरे देश के लिए एक समग्र संस्कृति नीति बने और उसके आधार पर संस्थाओं का पुनर्गठन हो। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहल होनी चाहिए। नीति आयोग इस बारे में संस्कृति के जानकारों, प्रशासकों के साथ मंथन करे और इस संबंध में सरकार को अपना सुझाव भेजें। बेहतर हो कि एक राष्ट्रीय कला केंद्र बने और उसके अंतर्गत अलग अलग विधाओं और क्षेत्रों की शाखाओं का गठन हो। प्रशासनिक कमान एक जगह रहने से कामों में दोहराव से बचा जा सकेगा, ठोस काम हो सकेगा और करदाताओं के पैसे की बर्बादी रुकेगी। इसको इस तरह से भी समझा जा सकता है कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सभी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का विलय हो जाना चाहिए ताकि एक समग्र नीति पर लोककलाओं से लेकर अन्य कलाओं को समृद्ध करने का कार्य आरंभ हो। ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, कथक केंद्र को भी प्रस्तावित राष्ट्रीय कला केंद्र का हिस्सा बना देना चाहिए। इन संस्थाओं में लगभग एक जैसे काम होते हैं। उनको कला केंद्र का हिस्सा बनाकर सीमित स्वायत्ता देने पर भी विचार किया जा सकता है ताकि वो अपने स्तर पर कामों को प्रस्तावित कर सकें लेकिन प्रशासन का एकीकृत कमांड हो। 

जितने भी संग्रहालय हैं उनको किसी एक संस्था के अधीन करके उसका प्रशासनिक दायित्व नियोजित किया जा सकता है। इनको देखनेवाली संस्था का दायित्व हो कि वो समग्र संस्कृति नीति के अनुसार इनके कामकाज को तय करे और फिर उसका उचित क्रियान्यवन सुनिश्चित करे। इसी तरह से नाटक और नाट्य प्रशिक्षण से जुड़ी संस्थाओं को पुनर्गठित करके उसको ज्यादा मजबूती प्रदान की जा सकती है। नृत्य आदि रूपकंर कला से जुड़ी सभी संस्थाओं को भी कला केंद्र में समाहित करके नया और क्रियाशील स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। सूचना और प्रसाऱण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत विभिन्न संस्थाओं के पुनर्गठन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। उसी मॉडल पर संस्कृति मंत्रालय में भी काम किया जा सकता है लेकिन यहां के लिए आवश्यक ये होगा कि पहले एक समग्र संस्कृति नीति बने। ये नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को भी आसान कर सकती है। नई शिक्षा नीति ये मानती है कि कला के माध्यम से संस्कृति का प्रसार हो सकता है और इसके लिए उसमें कई बिंदु सुझाए गए हैं। शिक्षा नीति में संविधान में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी के गठन का भी प्रस्ताव है। इसको साहित्य अकादमी के कार्यक्षेत्र का विस्तार करके आसानी से किया जा सकता है। भाषा और उससे जुड़े विषयों की संस्थाओं को साहित्य अकादमी के अंतर्गत लाकर बेहतर तरीके से काम हो सकता है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार संस्कृति मंत्रालय में एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री पदस्थापित किए गए हैं। इससे इस बात का संकेत तो मिलता ही है कि प्रधानमंत्री का फोकस संस्कृति की ओर है। 


Friday, July 23, 2021

इमारत कला के पुरोधा के नाम पर सड़क


दिल्ली के मशहूर लोदी गार्डन जाने के कई रास्ते हैं। एक रास्ता इंडिया इंटरनेशनल सेंटर(आईआईसी) के बगल से भी जाता है। ये एक घुमावदार गलीनुमा रास्ता है जो मैक्स मूलर मार्ग से लोदी गार्डन तक जाता है। लोदी गार्डन तक पहुंचने के पहले इसके दोनों तरफ कई इमारतें हैं। मैक्स मूलर रोड से लोदी गार्डन तक इस सड़क का नाम जोसफ स्टेन लेन है। कई बार इस गली से गुजरा। गलीनुमा सड़क के नाम पर ध्यान जाता था, लगता था कि ये नाम औपनिवेशिक शासनकाल से जुड़ा होगा लेकिन इसकी बिल्कुल अलग कहानी है। जोसफ स्टेन मशहूर अमेरिकी आर्किटेक्ट थे। उन्होंने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर समेत उस इलाके की कई इमारतों को डिजायन किया था, उनमें फोर्ड पाउंडेशन, वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर-इंडिया (डब्लूडब्लूएफ-आई), यूनिसेफ आदि हैं। इस वजह से कई बार उस इलाके को स्टेनाबाद भी कहा जाने लगा था। जोसफ स्टेन जब आईआईसी की इमारत का डिजायन कर रहे थे तब उन्होंने कहा था कि ‘एक ऐसी इमारत बनाने की चुनौती है कि जो जगह से ज्यादा सादगी और सहजता के साथ संबंधों को विकसित कर सके। मार्बल और ग्रेनाइट से बनी फाइव स्टार प्रापर्टी न हो। ये एक ऐसी इमारत हो जहां प्रकृति और इमारत के बीच एक संबंध दिखे।‘ बाग में इमारत उनका कांसैप्ट था। आईआईसी के परिसर में प्रवेश करने पर आप संबंध को महसूस कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी ये सोच सिर्फ आईआईसी परिसर में दिखाई देती है। अगर आप डब्लूडब्लूएफ-आई की इमारत या उसके आसपास की इमारतों को ध्यान से देखेंगे तो आपको जोसफ स्टेन की कला की छाप साफ तौर पर दिखाई देगी। इन इमारतों में प्रकृति से जुड़ाव की समान कला के दर्शन होते हैं। इस इलाके से थोड़ी दूर पर दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में है त्रिवेणी कला संगम। इसका भवन भी जोसफ स्टेन की कला का ही नमूना है। अगर आप ध्यान से देखें तो त्रिवेणी कला संगम के बाहर की तरफ की दीवार और आईआईसी की दीवार में समानता दिखाई देगी। त्रिवेणी कला संगम में जगह कम होने के बावजूद खुली जगह और पेड़-पौधों को उचित स्थान दिया गया है जोसफ स्टेन ने ही इंडिया हैबिटेट सेंटर को भी डिजायन किया था।  

जोसफ स्टेन अमेरिका में जन्मे थे और वहीं से आर्किटेक्ट की पढ़ाई की। 1952 में वो पहली बार भारत आए और कोलकाता (तब कलकत्ता) के बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज के आर्किटेक्चर डिपार्टमेंट के अद्यक्ष बने। 1955 में वो दिल्ली आ गए। स्वाधीनता के बाद के इस दौर में कई विदेशी आर्किटेक्ट भारत आए थे क्योंकि उनको यहां असीम संभावनाएं नजर आ रही थीं। उनमें से ज्यादातर अपना काम करके अपने वतन लौट गए थे। जोसफ स्टेन पचास वर्षों से अधिक समय तक भारत में रहे और कई महत्वपूर्ण काम किए। उन्होंने दुर्गापुर स्टील प्लांट और दुर्गापुर औद्योगिक शहर को बसाने के काम में भी महत्वपूर्ण योगदान किया था। उनके कार्यों को देखते हुए 1992 में उनको पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। बाद में वो वापस अमेरिका लौट गए थे जहां 2001 में उनका निधन हो गया। 


Saturday, July 17, 2021

लापरवाहियों से खंडित होता इतिहास


मेरे एक मित्र हैं, संजीव सिन्हा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। दो दिन पहले उन्होंने चहकते हुए फोन किया, भाई साहब, नामवर सिंह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक थे, क्या आपको मालूम है? जब संघ पर प्रतिबंध लगा था तो वो जेल भी गए थे। मैंने अनभिज्ञता प्रकट की तो उन्होंने पूरा प्रकरण बताया। दरअसल हुआ ये है कि नामवर सिंह की एक जीवनी प्रकाशित हुई है, नाम है ‘अनल पाखी’। इस जीवनी को लिखा है अंकित नरवाल ने। इस पुस्तक में हिंदी के शिक्षक-लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी के हवाले से नामवर सिंह को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का अपने जिले का संस्थापक बताया गया है। दरअसल 2017 में नामवर सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी की एक बातचीत प्रकाशित हुई थी जो बाद में 2019 में एक पुस्तक में संकलित हुई। पुस्तक का नाम है ‘आमने-सामने’। प्रकाशक हैं राजकमल प्रकाशन। इस पुस्तक का संकलन-संपादन किया है नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने। इसका प्रकाशन जुलाई 2019 में हुआ था। हम इस विषय़ पर आगे बात करें इसके पहले साक्षात्कार का वो अंश देख लेते हैं जिसके आधार पर जीवनीकार से भूल हुई है। विश्वनाथ त्रिपाठी का प्रश्न है, आप पहले आरएसएस में थे, फिर वामपंथी कैसे हो गए? नामवर सिंह का उत्तर है, ‘मैं कोई किताब या मार्क्स को पढ़कर प्रगतिशील नहीं हुआ। लेकिन हां, मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अपने जिले के संस्थापकों में से हूं। गांधी की हत्या के बाद तीन महीने जेल में भी था, पुणे से मुझे लखनऊ सेंट्रल जेल भेजा गया। जब छूटा तो अटल जी मेरे सम्मान में जेल के द्वार  पर खड़े थे। मैंने उनको कविताएं भी सुनाई थीं। आरएसएस में था जरूर लेकिन मुसलमान और वामपंथियों से मेरी दोस्ती थी।...संघ हिंदू संगठन है और वहां भी पैसे वालों का दबदबा है। जात-पात छूआछूत जैसी विसंगतियां देखने को मिलीं। इसी वर्गभेद की वजह से मैं वामपंथ में चला गया।‘ 

इन बातों के सामने आने के बाद विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से किसी और ने सफाई पेश की। सफाई में कहा गया कि ‘नामवर जी आजीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी विचारधारा के सक्रिय विरोधी रहे थे। नामवर सिंह मार्क्सवादी थे, प्रगतिशील लेखक संघ और सीपीआई से संबद्ध थे। सीपीआई के उम्मीदवार के तौर पर चंदौली से लोकसभा चुनाव भी लड़े थे।‘  विश्वनाथ त्रिपाठी के भक्त और कम्युनिस्ट लेखक इस अभियान में लग गए हैं कि उनको इससे बरी कर दिया जाए। चाहे कितना भी बड़ा अभियान चला लें,इस साहित्यिक अपराध को ढंकने की कितनी भी कोशिश की जाए, लेकिन ये अक्षम्य है। चार साल पहले एक साक्षात्कार छपा,फिर दो साल पहले वो बातचीत एक पुस्तक में संकलित हुई, लेकिन विश्वनाथ जी दोनों को ही देख नहीं पाए। क्या ये मान लिया जाए कि हिंदी का ये लेखक अपना लिखा नहीं पढ़ते हैं या अपने कृतित्व को लेकर बेहद असावधान हैं। इस जीवनी के प्रकाशक भी पूरे मामले को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं और इस पुस्तक की बची हुई प्रतियों पर चिट लगाकर भूल सुधार की डुगडुगी बजा रहे हैं। अगले संस्करण में उस अंश को हटाने की घोषणा भी की गई है। सवाल फिर वही उठता है कि जो प्रतियां बिक गईं या जो पाठकों तक पहुंच गईं या जो बातें इंटरनेट मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हो गईं उनका परिमार्जन कैसे हो पाएगा। हो भी पाएगा या नहीं।  

जीवनीकार अंकित नरवाल से गलती ये हुई कि उन्होंने इस तथ्य की पुष्टि के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी से स्पष्ट रूप से इस मुद्दे पर बात नहीं की और प्रकाशित बातचीत को सही मान लिया। बहुधा लेखक ऐसा करते हैं। अंकित ने दावा किया है कि ‘इसके संबंध में विश्वनाथ त्रिपाठी जी से मेरी बातचीत हुई थी। उनसे पूरी तरह यह पांडुलिपि तैयार होने से पहले और बाद में भी घंटों-घंटो बातचीत होती थी। उन्होंने अपनी बातचीत में हमेशा यह दोहराया है कि उन्होंने नामवर जी के बारे में जो इधर-उधर संस्मरण लिखे हैं, वह सभी प्रामाणिक तथ्य हैं। उनके साथ हुए साक्षात्कारों के संबंध में भी उनकी यही दृढ़ता बनी रहती थी। अब जब यह मामला तूल पकड़ गया है, तो उन्होंने अपने उस साक्षात्कार से किनारा कर लिया है।‘ लगता है कि अंकित नरवाल, विश्वनाथ जी के अतीत में कहने-पलटने की आदत से परिचित नहीं रहे होंगे। त्रिपाठी जी बहुधा पल्ला झाड़ते रहे हैं और किसी न किसी बहाने की ओट लेते रहते हैं। अपनी पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के हिंदी भाषा के संयोजक रहते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से संबंधित एक प्रसंग लिखा। उस प्रसंग की सत्यता के बारे में जब इस स्तंभ में सवाल उठाया गया तो उन्होंने अगले संस्करण में उस पूरे प्रसंग को ही पुस्तक से हटा दिया। इसी तरह से एक साहित्यिक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में जब कुछ आपत्तिजनक बातें उनके हवाले से छपीं तो उससे किनारा कर लिया और ठीकरा बातचीत करनेवालों पर फोड़ दिया। मैत्रेयी पुष्पा से संबंधित एक साहित्यिक पत्रिका में अश्लील टिप्पणी करने के बाद उनको फोन करके हाथ-पांव जोड़े थे।

नामवर जी से जुड़े इस प्रसंग पर उठे विवाद से कई बड़े प्रश्न खड़े हो रहे हैं। ये प्रश्न लेखकों की साख, प्रकाशकों की विश्वसनीयता और पुस्तकों के संपादकों की गंभीरता को लेकर भी खड़े होते हैं। कोई भी लेखक क्यों नहीं तथ्यों की पड़ताल के लिए प्राथमिक स्त्रोत तक जाने की कोशिश करता है, क्यों वो सेकेंडरी सोर्स पर आश्रित रहता है। इसी तरह से प्रकाशकों की किसी पुस्तक को लेकर क्या कोई जिम्मेदारी नहीं होती है? क्या आधार प्रकाशन और इसके स्वामी देश निर्मोही का दायित्व नहीं था कि वो नामवर सिंह की जीवनी में प्रकाशित हो रहे तथ्यों के बारे में जांच पड़ताल करते। क्या आधार प्रकाशन सिर्फ प्रिंटर हैं कि जो भी आया छापा और उसको बाजार में भेज दिया। जब उसपर आपत्ति आई तो अगले संस्करण में सुधार की बात कहकर किनारे हो गए। इस पूरे प्रसंग से एक बार फिर से प्रिंटर और प्रकाशक की भमिका पर विचार करने का आधार हिंदी साहित्य जगत के सामने है। देश निर्मोही स्वयं प्रगतिशीलता का डंडा-झंडा लेकर चलते रहते हैं लेकिन उनको भी नामवर सिंह के बारे में इस तथ्य की पड़ताल की जरूरत नहीं लगी। राजकमल प्रकाशन से नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह के संपादन में आमने सामने छपी, उसमें भी विश्वनाथ त्रिपाठी का नामवर का लिया साक्षात्कार छपा लेकिन न तो उनके पुत्र ने इसको जांचने की जहमत उठाई और न ही प्रकाशक के स्तर पर इसकी कोशिश हुई। अब प्रकाशक ने पुस्तक में संशोधन की बात की है।

दरअसल ये पूरा मामला ही लापरवाहियों से भरा हुआ है। इससे हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत में व्याप्त अगंभीरता सामने आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिनको हम बड़े साहित्यकार या बड़े प्रकाशक मानते हैं उनको अपनी साख की कोई चिंता नहीं । एक और बात जो प्रमुखता से उभर कर सामने आई है कि खुद को प्रगतिशील कहनेवाले कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लेखक अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों की भूल गलतियों के लिए उनको कठघरे में खड़ा नहीं करते। कम्युनिस्ट लेखक ये काम बहुत ही संगठित तरीके से करते हैं। पूरा माहौल बनाते हैं कि उनकी विचारधारा के लेखक की गलती नहीं है वो तो परिस्थितियों के शिकार हो गए हैं आदि आदि। अब वक्त आ गया है कि साहित्य में वामपंथ की गलतियों और उनको ढ़कने और छुपाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाए। साहित्य में सत्य का अनुकरण हो और झूठ और मिथ्या की इस विचारधारा के बचे खुचे ध्वजवाहकों को आईना दिखाया जाए।