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Saturday, July 25, 2009

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?

हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं । विवाद की जड़ में है - पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथो पहला 'नरेन्द्र स्मृति सम्मान' लेना । जबसे ये खबर छपी है पूरे साहित्य जगत में उदय की जमकर आलोचना शुरू हो गई । उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं । लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुधंला होकर भगवा हो गया है । दरअसल उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है । परिस्थितियों के अनुसार उदय अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं और एक रणनीति के तहत उसपर अमल भी करते हैं ।
अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही है तो उदय प्रकाश ने अपने कहानी संग्रह- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था, जिसमें नामवर भी थे और काशीनाथ सिंह भी और नंदकिशोर नवल भी थे और भारत भारद्वाज भी । जाहिर तौर पर ये एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश थी । बाद में जब शिवनारायण सिंह संस्कृति मंत्रालय में थे तो उनको भी अपना एक कविता संग्रह समर्पित कर दिया । संयोगवश उसी वक्त उदय को मंत्रालय की फैलोशिप भी मिली । इसके अलावा उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुडे़ रहे हैं, ये वो वक्त था जब अशोक वाजपेयी मध्य प्रदेश में साहित्य और संस्कृति के कर्ताधर्ता हुआ करते थे । लेकिन जब किसी वजह से वो पूर्वग्रह से बाहर हुए तो अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को 'भारत भवन के अल्सेशियंस' तक कह डाला था । उसके बाद से अशोक और उदय साहित्य के दो अलग-अलग छोर पर रहे । लेकिन वाजपेयी के पिछले जन्मदिन पर उदय ने जिस अंदाज में वाजपेयी को शुभाकमनाएं अर्पित की उसके बाद दोनों के बीच जमी बर्फ पिघली और बताते हैं कि एक मुलाकात के बाद उदय को लखटकिया वैद सम्मान मिला । ये हैं उदय की प्राथमिकता और प्रतिबद्धता ।
बीजेपी सांसद और कट्टर हिंदुत्ववाद के स्वयंभू मसीहा योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मान ग्रहण करने के बाद जब उदय पर चौतरफा हमले शुरू हुए तो अपने बचाव में उन्होंने बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया - एक नियोजित तरीके से मुझ पर आक्रमण करके बदनाम करने की घृणित जातिवादी राजनीति की जा रही है.....दरअसल इस हिंदू जातिवादी समाज में विचारधाराओं से लेकर राजनीति और साहित्य का जैसा छद्म और चतुर खेल खेला गया है, उसके हम सब शिकार हैं । मेरे परिवार में यह सच है कि कि कोई भी एक सदस्य ऐसा नहीं है ( इनमें मेरी पत्नी, बच्ची, बहू और पोता तक शामिल हैं और मेरे मित्र तथा पाठक भी ) जो किसी एक धर्म, क्षेत्र, जाति, नस्ल आदि से जुडे़ हों । लेकिन हिंदी साहित्य और ब्लॉगिंग में सक्रिय सवर्ण हिंदू उसी कट्टर वर्णाश्रम -व्यवस्थावदी माइंडसेट से प्रभावित पूर्व आधुनिक सामंती, अनपढ़ और घटिया लोग हैं -जिनके भीतर जैन, बौद्ध, नाथ, सिद्ध, ईसाइयत, दलित, इस्लाम आदि तमाम आस्थाओं और आइडेंटिटीज़ के प्रति घृणा और द्वेष है इसे वे भरसक ऊपर-ऊपर छिपाए रखने की चतुराई करते रहते हैं । मैंने जीवनभर इनका दंश और जहर झेला है और अभी भी झेल रहा हूं ।' अपनी लंबी सफाई के आखिर में धमकाने के अंदाज में सवर्ण लुटेरों के साम्राज्य को ध्वस्त करने का दावा भी करते हैं । उदय पर पहले भी जब-जब उनकी व्यक्तिवादी कहानियों को लेकर उंगली उठी थी तो किसी को मथुरा का पंडा, तो किसी को घनघोर अनपढ़ घोषित किया तो किसी को अफसर होकर साहित्य की दुनिया में अनाधिकार प्रवेश के लिए लताड़ा ।

इसके पहले जब वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो अच्छा खास विवाद खड़ा हो गया था । उस वक्त भी सफाई देते हुए उदय प्रकाश ने कहा था कि- दरअसल ऐसा है कि दिल्ली में गृह मंत्री के भ्रष्ट अधिकारियों का एक क्लब है जो नाइट पार्टी का आयोजन करता है । इसमें शराब पी जाती है और अश्लील चर्चा होती है । जो इसमें शामिल नहीं होता है, ये लोग उसपर हमला करते हैं । ये साहित्येतर लोग हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध तो करते हैं मगर गली-मोहल्ले के मवालियों के साथ बैठकर शराब पीते हैं ।' तो उदय प्रकाश की जब भी आलोचना होती है तो वो बिफर जाते हैं । रविभूषण ने जब इनकी कहानी पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था ।
लेकिन बीजेपी सांसद के हाथों सम्मानित होकर इस बार उदय बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं । उदय की सफाई के बाद हिंदी के दो दर्जन से ज्यादा महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने अपने हस्ताक्षर से एक बयान जारी कर उदय की भर्त्सना की । बयान जारी करनेवालों में प्रमुख नाम हैं- ज्ञानरंजन, विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बार रब्बी, मदन कश्यप, देवीप्रसाद मिश्र आदि । चौतरफा घिरता देख उदय प्रकाश ने एक बार फिर से अपने ब्लॉग पर एक सफाई लिखी लेकिन ये सफाई कम धमकी ज्यादा है । इसके बाद उदय प्रकाश की ओर से व्लॉग चलानेवाले पत्रकार अविनाश ने मोर्चा संभला और जनसत्ता में 'और अंत में घृणा' के नाम से एक लेख लिखकर उदय की दलीलों को आगे बढा़या । उदय के समर्थन में उतरे अविनाश के तर्क भी उतने ही लचर हैं जितने उनके अंतरराष्ट्रय ख्याति के प्रिय रचनाकार की । तर्क पर गौर फरमाइये- जिन नरेन्द्र जी की स्मृति में उदय प्रकाश को योगी ने सम्मानित किया, वे नरेन्द्र जी उदय प्रकाश के फुफेरे भाई थे । दोनों में तीन दशकों की वैचारिक दूरी थी, जो हर मुलाकात में बहसों की शक्ल लेकर परिवारवालों का जीना दूभर करती रही थी । एक बरस पहले कुंवर नरेन्द्र की मृत्यु के बाद की शोकाकुल स्थियों में उदय प्रकाश उपस्थित नहीं हो सके । लेकिन पहली बरसी पर वो गए । इस बरसी में वे भी मौजूद थे, जो कुंवर साहब की जीवन की छटाओं में बिखरे थे । योगी भी इसलिए आए । लेकिन उस वक्त उदय प्रकाश अपनी मौजूदगी के राजनीतिक अर्थ नहीं निकाल पाए । अबोध बने रहे ।' अब अविनाश को कौन बताए कि उदय प्रकाश को वो जितने अबोध समझ रहे हैं या साबित करना चाह रहे हैं वो उतने अबोध हैं नहीं । मृत्यु के मौके पर ना जाकर बरसी पर जाना और सम्मानित होना भी मंशा पर सवाल तो खड़े करता ही है ।लेकिन अविनाश ने जाने अनजाने एक काम ये कर डाला कि जो विवाद अबतक ब्लॉग तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय दैनिक में उजागर कर दिया ।

उदय प्रकाश एक बेहतर कवि हो सकते हैं, कहानियां भी हो सकता है कि उन्होंने अच्छी लिखी हों, लेकिन उनकी कहानियां व्यक्तियों पर केंद्रित होकर लोगों को दुखी करती रही हैं । जब उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो उसपर पटना से प्रकाशित 'प्रभात खबर' में एक लंबी परिचर्चा छपी थी । जिसमें सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था । पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया । फिर वामपंथी गीतकार असफल प्रेमकथा का साडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी । किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अद्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उचालनेवाली शैली में कविताएं भी लिख डाली । किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है । उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा । हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं । यह लेखक दरअसल स्वयं एक 'माचोसाडिस्ट' है जो दूसरों को अपने 'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप' में जलील करता और सताता आया है । यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है । शठ को शठता से ही सबक दिया है ।' संयोग ऐसा कि तब प्रभात खबर के साहित्य पृष्ठ के प्रभारी अविनाश ही थे ।
उदय प्रकाश की राजनीति और जोड़-तोड़ और दंद-फंद को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है । इन सबको देखकर मुक्तिबोध की आत्मा कराहती हुई पूछ रही होगी - पार्टनर ! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?

Monday, July 6, 2009

कहां चला राहुल गांधी का जादू ?

अब जबकि लोकसभा चुनावों को शोरगुल खत्म हो चुका है, पखवाड़े भर की माथापच्ची के बाद कांग्रेस मंत्री और मंत्रालय तय करने में कामयाबी हासिल कर चुकी है । मंत्री अपने मंत्रालयों के सौ दिन के एजेंडा घोषित करने में जी जान से जुटे हैं । मीडिया के कई हिस्सों में राहुल गांधी के जादू और करिश्मे का कोलाहल भी थोडा़ कम होने लगा है, तो अब वक्त आ गया है कि दो हजार नौ में हुए लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के जादू और करिश्मे की थ्योरी को कसौटी पर कसा जाए । जीत के बाद जब सोनिया गांधी रायबरेली की जनता को धन्यवाद देने अपने लोकसभा क्षेत्र पहुंची तो उन्होंने लोकसभा चुनाव में पार्टी की जीत का सेहरा राहुल के सर बांधा । कांग्रेस के रणनीतिकारों की तरफ से लगातार इस बात को प्रचारित प्रसारित किया ,करवाया गया कि कांग्रेस को मिली सफलता के पीछे राहुल गांधी के करिश्मे और उनके व्यक्तित्व के जादू का हाथ है ।
उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिली आशातीत सफलता का श्रेय भी राहुल गांधी की रणनीति को दिया गया । मीडिया में ये बात भी आई कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने का फैसला राहुल गांधी का था, जिसकी वजह से पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली और राहुल के इस फैसले ने पार्टी को प्रदेश में पुनर्जीवित कर दिया, आदि आदि । लेकिन अगर हम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी रणनीति और राहुल गांधी के तथाकथित होमवर्क की गहराई से पड़ताल करें तो राहुल की रणनीति के साथ साथ उनके जादू और करिश्मे का मुलम्मा भी उतर जाता है । सबसे पहले हम उत्तर प्रदेश के दो जिलों रायबरेली और अमेठी की ही बात करें जिन जिलों की लोकसभा सीट से राहुल और उनकी मां कांग्रेस अध्यक्षा चुनाव लड़ती हैं । रायबरेली और सुल्तानपुर दो जिले हैं जिनमें तीन लोकसभा क्षेत्र आते हैं । यह सर्वविदित तथ्य था कि अमेठी से स्वयं राहुल और रायबरेली से सोनिया गांधी चुनाव लड़ेगी । लेकिन इसी जिले की तीसरी लोकसभा क्षेत्र सुल्तानपुर से कौन चुनाव लड़ेगा इसका फैसला अंतिम समय तक नहीं हो पाया था । ये कैसी रणनीति थी या फिर कैसा होमवर्क था जिसमें सूत्रधार अपने ही गृहजिले के उम्मीदावर तय करने में दुविधा का शिकार था । अगर होमवर्क किया गया होता तो ना तो ये दुविधा की स्थिति होती और ना ही मामला आखिरी वक्त तक लटकता । इस मामले में कभी भी ऐसा नहीं लगा कि राहुल या फिर उनके रणनीतिकारों ने उनके अपने ही गृह जिले के लिए कोई होमवर्क किया हो । बिल्कुल आखिरी वक्त तक संजय सिंह ही अपनी उम्मीदवारी को लेकर आशंकित थे और पार्टी में मचे घमासान की वजह से कार्यकर्ताओं में जबदस्त भ्रम की स्थिति थी।
अब एक और नमूना देखते हैं - सूबे की राजधानी लखनऊ की प्रतिष्ठित सीट, जहां से बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई चुने जाते थे, को लेकर भी कांग्रेस के पास कोई योजना नहीं दिखाई दी । इस सीट पर सबसे पहले समाजवादी पार्टी ने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की उम्मीदवारी का ऐलान कर सबको चौंका दिया । सुप्रीम कोर्ट से इजाजत नहीं मिलने की वजह से संजय दत्त चुनाव नहीं लड़ सके । इसके बाद भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों का भी ऐलान हो गया । लेकिन सूबे में अपनी खोई जमीन की तलाश में लगी कांग्रेस को कोई उम्मीदवार नहीं मिल पा रहा था । सुप्रीम कोर्ट के झटके से सकते में आई समाजवादी पार्टी ने मास्टर स्ट्रोक लगाया और कल तक कांग्रेस की समर्पित कार्यकर्ता रही ग्लैमरस नफीसा अली को लखनऊ से अपना उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया । बेहतर चुनावी रणनीति और राहुल गांधी के होमवर्क की बात करनेवाली पार्टी को उस वक्त लखनऊ जैसी प्रतिष्ठित सीट के लिए कोई उम्मीदवार नहीं सूझ रहा था । जब कोई विकल्प नहीं मिला तो पार्टी ने अपने प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी को ही अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया । इस अफरातफरी से राहुल गांधी की तथाकथित रणनीति और फॉर्वर्ड प्लानिंग के दावों की हवा निकल गई । सूबे और लखनऊ की राजनीति को बेहद करीब से देखने और जाननेवालों की राय है कि अगर रीता बहुगुणा जोशी को थोड़ा वक्त मिलता तो वो लखनऊ की ये प्रतिष्ठित सीट कांग्रेस की झोली में डाल सकती थी ।
अगर हम सूबे की एक और सीट मुरादाबाद पर नजर डालें तो यहां भी कांग्रेस की लचर प्लानिंग दिखाई देती है । इस सीट पर भी जब कांग्रेस को कोई उम्मीदवार नहीं मिला तो आंध्र प्रदेश से पू्र्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन को आनन फानन में यहां से टिकट दे दिया गया । अजहरुद्दीन वही क्रिकेट खिलाड़ी हैं, जिनपर मैच फिक्सिंग के मामले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आजीवन प्रतिबंध लगाया हुआ है । ये दीगर बात है कि जातिगत समीकरणों और ग्लैमर के सहारे अजहरुद्दीन चुनाव जीत गए । यह तो तीन सीटों की बानगी है, उत्तर प्रदेश में इनके अलावा भी कई सीटें गिनाई जा सकती हैं, जहां कांग्रेस की ना तो कोई योजना थी, ना ही कोई व्यूह रचना और ना ही किसी का कोई जादू चला । जीत की वजह कहीं स्थानीय फैक्टर रहा तो कहीं सूबे की राजनीति में चुनाव के वक्त बना गठबंधन रहा, जिसकी वजह से वोट बैंक शिफ्ट हुआ ।
अब अगर हम बिहार के चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो यहां इस बार पार्टी को एक सीट का नुकसान हुआ । कांग्रेसियों का तर्क है कि बिहार में पार्टी के वोट प्रतिशत में बढो़तरी हुई है और वोटर राहुल गांधी के करिश्मे की वजह से पार्टी की ओर आकृष्ट हुए हैं । लेकिन अगर आंकड़ों पर गौर करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बिहार में कांग्रेस का वोट प्रतिशत इस वजह से बढ़ा है कि पार्टी ने लगभग सभी चालीस सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए । पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से तालमेल की वजह से कम सीटों पर चुनाव लड़ा था । जाहिर है कि कोई भी पार्टी अगर ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो उसके वोट प्रतिशत में वृद्धि तो होगी ही, इसके लिए ना तो किसी जादू की जरूरत है और ना ही किसी करिश्मे की ।
बिहार की ही तरह अगर हम आंध्र प्रदेश और गुजरात का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वहां भी राहुल गांधी का कोई करिश्मा नहीं चला । आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की जीती तैंतीस सीटों में से पच्चीस सीट ऐसी हैं जहां अगर तेलगू देशम के चार पार्टियों के गठजोड़ और प्रजाराज्यम को मिले वोट जोड़ दिए जाएं तो वह कांग्रेस से ज्यादा है । इन पच्चीस में से सत्रह सीटें तो ऐसी हैं जहां तेलगू देशम गठजोड़ और प्रजाराज्यम का कुल वोट कांग्रेस के वोट से एक लाख से भी ज्यादा है । राज्य में कांग्रेस को भले ही तैंतीस सीटें मिली हों और तेलगू देशम गठबंधन को आठ, लेकिन दोनों के वोट प्रतिशत में एक फीसदी से कुछ ही ज्यादा का अंतर है । इसी तरह अगर हम गुजरात पर नजर डालें तो नरेन्द्र मोदी का अड़ियल रवैया और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने की वजह से कांग्रेस को फायदा हुआ । मोदी ने पिछली बार जीते चौदह में से ग्यारह सांसदों का टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया और ये सभी नए चेहरे चुनाव हार गए । इस वजह से राज्य में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट का ही नुकसान हुआ । तो उत्तर, दक्षिण और पश्चिम के राज्यों में हमने देखा कि राहुल का जादू कहीं नहीं चला । हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि राजीव गांधी के बाद पहली बार कांग्रेस ने चुनाव के पहले अपने प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के नाम का ऐलान कर दिया था । मनमोहन सिंह की छवि आम जनता में एक ईमानदार और कर्मठ प्रधानमंत्री के अलावा एक एक ऐसे राजनेता की रही है जो काम करता है और फालतू की बयानबाजी से बचता है । राहुल गांधी की प्रशस्ति करनेवालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पिछले पांच साल में मनमोहन सिंह का कद बहुत बढ़ा है ।
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Friday, July 3, 2009

लेखिकाओं का प्यारा खलनायक

नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की बात है, संभवत: उन्नीस सौ बानवे की गर्मियों की । मैं अपने शहर जमालपुर से दिल्ली शिफ्ट होने आया था, आगे की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में । दिल्ली में ही कार्यरत अपने चाचा भारत भारद्वाज के आरामबाग के सरकारी फ्लैट में रुककर दिल्ली विश्विद्यालय के आसपास रहने की जगह तलाश कर रहा था । भारत जी के फ्लैट में माहौल पूरा साहित्यिक था । रेलवे स्टेशन के पास होने की वजह से उनके घर साहित्यकारों का जमावड़ा लगा करता था । वो राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका हंस में समकालीन सृजन संदर्भ के नाम से एक स्तंभ भी लिखा करते थे । मेरे अंदर भी साहित्य का कीड़ा कुलबुला रहा था । रोजाना रात में साहित्य पर लंबी लंबी बहसें हुआ करती थी । एक दिन मैंने भारत जी से कहा कि क्या ये संभव है कि मैं राजेन्द्र जी से मिल सकूं । मेरी इच्छा को देखते हुए उन्होंने हां कर दी और अगले दिन दो बजे के करीब हमलोग सरकारी एंबेसडर कार से अंसारी रोड पर हंस के दफ्तर पहुंचे । बंद गली के आखिरी मकान में हंस का दफ्तर था । पहले कमरे से गुजरकर हम राजेन्द्र जी के कमरे तक पहुंचे । जिनकी कहानियां और उपन्यास पढ़कर बड़ा हुआ था वो सामने बैठे थे । पूरे कमरे में सिगरेट का धुंआ तैर रहा था और काला चश्मा लगाए राजेन्द्र यादव अपनी कुर्सी पर विराजमान थे । अब ठीक से याद नहीं है कि उस वक्त कमरे में और कौन कौन था । भारत जी ने राजेन्द्र यादव से परिचय करवाया । इस बात को अठारह साल बीत चुके हैं और इन अठारह वर्षों में यादव जी से हजारों बार फोन पर बातें हुई लेकिन उस दिन की मुलाकात मुझे अब भी याद है और एक दिलचस्प वाकया भी । हमलोग राजेन्द्र जी के दफ्तर में बैठे चाय पी रहे थे, फिर भारत जी और राजेन्द्र यादव के बीच तय हुआ कि श्रीराम सेंटर चला जाए । हमलोग कमरे से बाहर निकले और जब दरवाजे तक पहुंचे ही थे कि एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला ने दप्तर में प्रवेश किया । वो बेहद आत्मीयता के साथ राजेन्द्र यादव जी से मिली । राजेन्द्र यादव जी स्नेहवश उस महिला लेखिका की पीठ पर हाथ रख दिया - छूटते ही लेखिका ने यादव जी से कहा कि अगर आप इस तरह से मेरे पीठ पर हाथ रखेंगे तो संभव है कि मैं उत्तेजित हो जाऊं, मैं जवान हूं और अगर उत्तेजित हो गई तो आपकी खैर नहीं । खूबसूरत लेखिका की इस बात पर राजेन्द्र जी एक जोरदार ठहाका लगाया और फिर आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया । कस्बाई शहर की मानसिकता लिए महानगर पहुंचा मैं इस संवाद को सुनकर हतप्रभ था, लेकिन ये सबकुछ इतनी सहजता से बीता, लगा कुछ हुआ ही नहीं हो ।
बाद के दिनों में कई बार राजेन्द्र जी के दफ्तर गया, कई बार उन्हें महिला लेखिकाओं को गले लगाकर आशीर्वाद देते देखा, लेकिन उस दिन का वाकया भुलाए नहीं भूलता । कई बार राजेन्द्र जी से फोन पर लंबी लंबी बातें हुई है, महिलाओं भी बातचीत का विषय बनीं । जब भी स्त्री विमर्श पर बात होती मैं उन्हें छेड़ते हुए कहता कि विमर्श की डोर तो आपके हाथ से छूट गई है, बच गई है सिर्फ स्त्री । जब भी मैं ये बात उनके मुंह से गाली की गंगोत्री प्रवाहित होने लगती । हिंदी जगत में राजेन्द्र जी का महिला प्रेम जगजाहिर है, उनकी महिला मित्र मंडली भी । उस मंडली को एक बार ममता कालिया ने घाघरा पलटन नाम दिया था ।
राजेन्द्र यादव की मंडली की ही युवा पत्रकार गीताश्री ने यादव को केंद्र में रखकर एक किताब संपादित की है- तेइस लेखिकाएं और राजेन्द्र यादव( किताबघर प्रकाशन, दिल्ली ) । इस किताब के बनने की बेहद दिलचस्प कहानी गीताश्री ने अपनी भूमिका में बताई है- जयंती की छत के दीवान-ए-खास में उस शाम राजेन्द्र यादव के अलावा डॉ मनीषा तनेजा, अमृता ठाकुर, सीमा झा-श्रीनंद झा, गीताश्री, कमलेश जैन के अलावा शिवकुमार शिव भी मौजूद थे । बातचीत के क्रम में ये बात निकली कि राजेन्द्र यादव पर गीताश्री एक किताब संपादित करें, एक ऐसी किताब जिसमें सिर्फ स्त्रियां यादव के बारे में लिखे । प्रस्ताव राजेन्द्र यादव के सम्मुख उनकी स्वीकृति हेतु पेश किया गया । उस प्रस्ताव पर राजेन्द्र यादव ने ना तो हां की और ना ही मना किया । लगभग दो ढाई वर्षों बाद अचानक एक दिन अचानक गीताश्री को फोन करके राजेन्द्र यादव ने किताब छापने की अनुमति दे दी । शायद इन दो वर्षों में वो गीताश्री को परख रहे थे ।
उसके ठीक विपरीत अगर हम राजेन्द्र यादव के छिहत्तरवें जन्मदिन पर साधना अग्रवाल और भारत भारद्वाज के संपादन में प्रकाशित पुस्तक- हमारे युग का खलनायक- की भूमिका देखें तो वहां अपने उपर पुस्तक संपादित करने की योजना को यादव जी ने चंद क्षणों में अनुमति दे दी थी । ये हैं राजेन्द्र यादव के व्यक्तित्व के अलग अलग शेड्स ।
तेइस लेखिकाएं और राजेन्द्र यादव नामक इस पुस्तक में तीन खंड हैं, जिनमें अलग अलग लेखिकाओं के समय समय पर लिखे लेख और साक्षात्कार हैं । जयंती रंगनाथन के साक्षात्कार के अलावा सारे विचार और साक्षात्कार पूर्व प्रकाशित हैं । लेकिन इस संग्रह की खासियत यह है कि स्त्री विमर्श के इस झंडाबरदार के बारे में तमाम स्त्री लेखिकाओं के विचार एक जगह उपलब्ध हैं । इन तमाम लेखों और साक्षात्कारों में जो एक सामान्य बात प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उभरकर सामने आती है वो ये है कि राजेन्द्र यादव से चाहे आप जितनी भी मतभिन्नता रखें, उनसे चाहे आपके विचार कतई नहीं मिलते हों , लेकिन फिर भी आप उनसे प्यार करते हैं । राजेन्द्र जी के व्यक्तित्व में जो खिलंदड़ापन, जिंदादिली और हर उम्र के लोगों से खुलकर बात करने का जो हुनर उनके पास है वो इस किताब में शिद्दत से रेखांकित होता है ।
मेरे सामने राजेन्द्र यादव पर संपादित दोनों किताबें - हमारे युग का खलनायक राजेन्द्र यादव( संपादक- भारत भारद्वाज/साधना अग्रवाल) और तेइस लेखिकाएं और राजेन्द्र य़ादव रखी हैं । दोनों पुस्तकों के कवर पर एक ही तस्वीर है लेकिन मुद्राएं अलग हैं। खलनायक वाली किताब में मुंह में पाइप डालकर, चेहरे पर गंभीरता का आवरण हिंदी साहित्य के डॉन की छवि को पुख्ता करता है। वहीं गीताश्री वाली किताब के कवर पर पाइप मुंह से बाहर और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान है जो तेइस लेखिकाओं से घिरे होने पर स्वत: आ जाती है । लेकिन किताबघर से प्रकाशित इस किताब (पेपरबैक) का प्रोडक्शन स्तरहीन है । हर पृष्ठ पर राजेन्द्र यादव की अलग अलग तस्वीर लगी है, लेकिन कागज की खराब क्वालिटी की वजह से फोटो भी बदतर हो गए हैं, जो किताबघर की प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं हैं । यहीं पर आप हिंदी और अंग्रेजी में छपनेवाली किताबों की क्वालिटी का फर्क महसूस कर सकते हैं । अंग्रेजी के प्रकाशक प्रोडक्शन क्वालिटी से कभी समझौता नहीं करते, काश हिंदी में भी ऐसा हो पाता ।

Thursday, June 25, 2009

चलता हूं दोस्त...देख लेना

हर दिन की तरह बुधवार को भी मैं अपने दफ्तर में रन डाउन की बगल की अपनी सीट पर बैठा था । अचानक पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और पीछे से आवाज आई- अच्छा दोस्त चलता हूं, तड़का के दो सेगमेंट निकल गए हैं, बाकि देख लेना । मैं जबतक पीछे मुड़ता तबतक शैलेन्द्र जी हाथ हिलाते हुए न्यूजरूम से बाहर की तरफ चल पड़े थे । तड़का फिल्मी दुनिया पर हामरे चैनल पर चलनेवाल एक शो है जिसे शैलेन्द्र जी प्रोड्यूस करते थे । उस दिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि शैलेन्द्र घर जाते वक्त मुझे कहें कि देख लेना । सबकुछ सामान्य ढंग से खत्म हुआ । फाइनल बुलेटिन रोल करने के बाद मैं लगभग एक बजे घर पहुंचा । लगभग ढाई बजे तक रात की पाली के प्रोड्यूसर से सुबह की बुलेटिन की प्लानिंग पर बात होती रही और फिर अखबार आदि पलटने के बाद सो गया। सुबह साढे चार बजे के करीब मोबाइल की घंटी बजी और दफ्तर के एक सहयोगी ने सूचना दी कि नोएडा एक्सप्रेस वे पर शैलेन्द्र जी का एक्सीडेंट हो गया है और वो ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में भर्ती हैं । इस सूचना के बाद दफ्तर में फोन मिलाया तो जानकारी मिली कि रात तकरीबन ढाई बजे शैलेन्द्र जी की गाड़ी की टक्कर ट्रक से हो गई है । टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि उनकी कार ड्राइवर की सीट तक ट्रक के नीचे तक घुस गई थी । राह चलते लोगों ने जब शैलेन्द्र जी को उनकी कार से निकालकर पास के अस्पताल में पहुंचाया तबतक बहुत देर हो चुकी थी और खून इतना बह चुका था कि उनको बचाना नामुमकिन था ।

सुबह लगभग साढे पांच बजे शैलेन्द्र जी ने अंतिम सांसे लीं । शैलेन्द्र जी की मौत से हम सब लोग स्तब्ध थे और किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था । अस्पताल में जरूरी कागजी कार्रवाई के बाद शैलेन्द्र जी का शव पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचा । लेकिन पोस्टमॉर्टम हाउस में ताला लटका था और पहले से ही तीन लाश वहां पोस्टमॉर्टम के इंतजार में रखी थी । चूंकि पत्रकारों की पूरी बिरादरी वहां मौजूद थी इसलिए नोएडा पुलिस ने पोस्टमॉर्टम हाउस का ताला तो तोड़ डाला लेकिन अंदर के हालात ऐसे नहीं थे कि शैलेन्द्र जी को अंदर लिटाया जा सके । सो तय हुआ कि शव को एंबुलेंस में ऱखा जाए और डॉक्टर को तलाशने के अलावा अन्य सरकारी कागजी कार्रवाई शुरू की जाए । कुछ लोग डॉक्टर को बुलाने में जुटे, तो एक कांस्टेबल पोस्टमॉर्टम के कागजात पर मुक्य चिकित्सा अधिकारी के दस्तखत करवाने रवाना हुआ । दो घंटे बीत चुके थे । धूप तेज होने लगी थी । जरूरी कागजातों पर सरकारी अधिकारियों के दस्तखत लेने गया कांस्टेबल लापता हो चुका था । इंसपेक्टर विनय राय उसको फोन लगाकर परेशान,लेकिन फोन पहुंच से बाहर । घंटेभर बाद कांस्टेबल नमूदार तो हुआ लेकिन अब कागजात थे लेकिन डॉक्टर नहीं । आधे घंटे बाद डॉक्टर आए और अगले बीस पच्चीस मिनट में पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया खत्म हो गई ।

तपती गर्मी में पोस्टमॉर्टम के लिए तीन से चार घंटे का इंतजार । ये हाल उत्तर प्रदेश के सबसे विकसित शहर नोएडा का था तो और शहरों में क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है । ये एक ऐसी संवेदनहीन व्यवस्था का बदसूरत चेहरा था जो हर दिन दुखी परिवार को मुंह चिढ़ाता है । अव्यवस्था का आलम ये कि शव को रखने का कोई इंतजाम नहीं । ना ही साफ सफाई और ना ही शव को सुरक्षित रखने के कोई उपकरण या फिर बर्फ का ही इंतजाम । संवेदनहीनता इतनी कि डॉक्टर को देर से आने का मलाल नहीं, वो तो पत्रकारों की वजह से थोड़ा जल्दी यानि लगभग घंटेभर पहले पहुंचा था ।पोस्टमॉर्टम होने के बाद शैलेन्द्र जी के शव को कैलाश अस्पताल के शवगृह में रखवा दिया गया । तय ये हुआ कि जब उनके रिश्तेदार आ जाएंगे तो शुक्रवार की सुबह निगमबोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा ।

शाम को जब दफ्तर पहुंचा तो वहां अजीब सी मुर्दनी छाई थी, सबके चेहरे पर गहरे अवसाद को साफ तौर पर परलक्षित किया जा सकता था । मैं अपनी सीट पर बैठा था । पीछे से शैलेन्द्र जी की ओबिच्युरी तैयार होने की आवाजें आ रही थी । जो ये स्टोरी कटवा रहा था उसने बताया कि पैकेज का वॉयस ओवर करनेवाले साथी फफक-फफक कर रो रहे थे । दफ्तर में अजीब सा माहौल था, सब एक दूसरे को देख रहे थे और अपना गम छुपाने की कोशिश भी कर रहे थे । अचानक से मेरे सीनियर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि शैलेन्द्र को हेडलाइन में ले लीजिए । ये वाक्य ऐसा था जिसे सुनकर मन अंदर तक कांप गया । कल तो जो हमारे साथ बैठा करते थे आज उनपर हेडलाइन लिखनी पड़ेगी । मन बेचैन था, कंप्यूटर खुला था, पांच बजने में कुछ मिनट रह गए थे, मुझे शैलेन्द्र जी को हेडलाइन में लेना था । घड़ी की सुई बढ़ती जा रही थी, हाथ को जैसे लकवा मार गया था, कुछ भी नहीं सूझ रहा था- नहीं रहे शैलेन्द्र जी - के बाद लिखने के लिए शब्द नहीं सूझ रहे थे । इस बीच हमारे संपादक आशुतोष मेरे पास आए और मेरा हौसला बढ़ाने लगे । किसी तरह से शैलेन्द्र जी पर हेडलाइन भी लिखा, उनपर बुलेटिन भी प्लान किया और जब पहली बार उनकी ना रहने की खबर बुलेटिन में चली तो पूरे न्यूजरूम में सन्नाटा और उसको चीरती हुई सिसकियां सुनाई दे रही थी । ये हमारे पेशे की एक ऐसी बिडंबना है जिसपर हम सिर्फ रो सकते हैं रुक नहीं सकते । क्योंकि चाहे जो हो जाए बुलेटिन नहीं रुक सकता ।

शुक्रवार को हमलोग उनके अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के निगम बोध घाट पहुंचे । स्नानादि करवा कर जब मंत्रोच्चार के बीच शैलेन्द्र जी की शव को चिता पर ऱखा जा चुका था । मैं किसी काम से उपर चला गया था और जब वापस घाट पर लौट रहा था तो देखा दो तीन लोग शैलेन्द्र जी के छह साल के छोटे बेटे को सफेद कुर्ता पायजामा पहनाने और बाल काटने पर आमादा थे । और वो मासूम बच्चा जो अबतक ये नहीं समझ पाया था कि उसको बेहद प्यार करने और उसकी हर ख्वाहिश पूरी करनेवाला उसका पापा इस दुनिया से जा चुका है, उसको अपने पिता को मुखाग्नि देने के लिए तैयार किया जा रहा था । और वो कह रहा था कि मैं क्यूं बदलूं कपड़े, मैंने तो अच्छी जींस पहन रखी है, मुझे नहीं पहनना कुर्ता-पायजामा, मुझे नहीं कटवाने अपने बाल । वो रो रहा था और कुछ लोग उसके साथ जबरदस्ती तो कुछ प्यार मनुहार कर रहे थे । सदमे में मैं नीचे आया और अपने वरिष्ठ सहयोगी प्रबल जी और संजीव को कहा कि उस बच्चे के साथ जो हो रहा है उसको रोकिए । दोनों ने धर्म के नाम पर हो रहे इस कर्मकांड को रोकने की भरसक कोशिश की लेकिन वहां मौजूद एक व्यक्ति ने लगभग चीखते हुए कहा कि हिंदू मायथालॉजी में बेटा इसलिए पैदा किया जाता है कि वो अपने पिता को मुखाग्नि दे सके । विरोध का स्वर भी तीखा था लेकिन समाज के कुछ धर्मभीरू लोग डटे थे । बीच का रास्ता निकाला गया और बच्चे को सिर्फ सफेद कुर्ता पहनाकर चिता का स्पर्श करवा दिया गया ।

शैलेन्द्र जी की मौत ने एक बार फिर से धर्म के नाम पर खेल खेलने वालों को बेनकाब किया । हिंदू धर्म और उसके ग्रंथों को व्याख्यायित कर हर रोज धर्म पर कार्यक्रम बनानेवाले शैलेन्द्र जी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके प्यारे बेटे के साथ धर्म के नाम पर उनके ही रिश्तेदार संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर जाएंगे । शैलेन्द्र जी आपके धर्म का तो ये मतलब नहीं ही रहा होगा । हिंदू धर्म के नाम पर अनपढ़ लोग हमेशा कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जिससे धर्म में हमारे जैसे लोगों की आस्था जरा कम हो जाती है । आज जब मैं अपनी उसी सीट पर बैठकर शैलेन्द्र जी के निधन के बहाने संवेदनहीन व्यवस्था और अत्याचारी धार्मिक कर्मकांड पर लिख रहा हूं तो लगता है कि शायद पीछे से फिर शैलेन्द्र जी आकर कंधे पर हाथ रखेंगे और कहेंगे - चलता हूं दोस्त, देख लेना ।

Wednesday, June 24, 2009

धार्मिक खिलवाड़ को बेनकाब करती कृति

आस्था का जब धर्म से मिलन हो जाता है तो वो श्रद्धा में बदल जाती है और जहां श्रद्धा हो वहां सवाल नहीं हो सकते । यही बात भारत में लेखन को लेकर भी कही जा सकती है । हिंदू देवी देवताओं और मान्यताओं और रूढ़ियों पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं, सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । मुझे याद है बचपन में जब मैं ‘चंपक’ पढ़ा करता था तो उसमें दिल्ली बुक कंपनी की एक पुस्तक – हिंदू समाज पथभ्रष्टक तुलसीदास- का विज्ञापन उसमें प्रमुखता से छपा करता था । चूंकि हिंदू धर्म में सहिष्णुता की गुंजाइश है इसलिए इसपर उठने वाले सवालों और तीखी आलोचनाओं पर बवाल नहीं मचता ।

हाल के दिनों में कुछ संगठन राजनैतिक लाभ के लिए विरोध और हिंसा पर उतारू हो जाते हैं लेकिन उन्हें ज्यादा समर्थन नहीं मिलता । लेकिन भारत मे किसी और धर्म के साथ ये स्थिति नहीं है । जैसे आप इस्लाम, जैन या फिर ईसाई धर्म पर सावल खड़े नहीं कर सकते । अगर किसी कोने से कोई सवाल खड़ा होता है तो उसके खिलाफ लगभग पूरा समुदाय खडा़ हो जाता है । कोई उदाहरण देने की जरूरत नहीं है । हर धर्म में अच्छाइयां और बुराइयां होती है लेकिन कोई भी धर्म ‘क्वेशचनिंग’ के उपर नहीं हो सकता । प्रगतिशीलता की पहली शर्त ही संदेह है । जो है उसपर संदेह करो, सवाल खड़े करो और बगैर बहस के किसी भी सिद्धांत को ना मानो । लेकिन मेरे जानते हिंदी में इस्लाम और जैन धर्म पर सवाल करते रचनात्मक लेखन जरा कम ही हुआ है ।

पिछले दिनों कथाकार मधु कांकरिया का उपन्यास ‘सेज पर संस्कृत’ प्रकाशित हुआ । उपन्यास के शीर्षक से मैं चौंका जरूर, लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो तमाम संदेह दफन होते गए और लेखिका के साहस से मैं हतप्रभ रह गया । ‘सेज पर संस्कृत’ जैन धर्म के अंदर व्याप्त कुरीतियों को तार्किक आधार पर जोखिम मोल लेते हुए साहसपूर्ण तरीके से उठाता है । यह उपन्यास एक ऐसी जवान लड़की की यातना गाथा जो अपने और अपने परिवार के भविष्य के सुंदर सपने देखती है और उसे पूरा करने के लिए संघर्ष भी करती है लेकिन धार्मिक आस्थाओं में जकड़ी उसकी ही मां उसके सपनों पर ग्रहण लगाने को आमादा है । दरअसल ये पूरा उपन्यास एक ऐसी लड़की या यों कहें कि परिवार के इर्द गिर्द घूमता है जिसमें पिता की मौत के बाद दो बेटियां अपनी मां के साथ अकेली रह जाती है । रिश्तेदारों की नजर उनकी संपत्ति पर है । बड़ी लड़की संघमित्रा कॉलेज की अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर के लिए आवश्यक खर्च जुटाने के लिए दिन रात मेहनत करती है, लेकिन आर्थिक विपन्नता में जकड़े इस परिवार में मां अपने आप को धर्म को समर्पित कर देती है, साथ ही उसकी इच्छा दोनों बेटियां को भी धर्म पर कुर्बान कर देने की है । इस कथा के बहाने लेखिका जैन धर्म के अंदर चल रही अनैतिक कृत्यों को भी बेनकाब करती चलती है । इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र संघमित्रा लगातार बार बार जैन धर्म पर सावल करती है, जिसका उत्तर उसे किसी भी साधु से नहीं मिल पाता है और उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है । संघमित्रा की मां अपनी छोटी बेटी- छुटकी को जैन धर्म में दीक्षित कराने के लिए कटिबद्ध है । छुटकी की उम्र इतनी कम होती है कि उसे इन चीजों की समझ ही नहीं है और वो दीक्षा के मौके पर होने वाले समारोह को लेकर ही उत्साहित है । लेखिका ने श्रमपूर्वक दीक्षा के वक्त ‘केश-लुंचन’ का बेहद ही मार्मिक चित्रण किया है ।

धर्म के नाम पर एक मासूम बच्ची की भावनाओं के साथ खिलवाड़ और अत्याचार को श्रद्धा समारोह में तब्दील कर सामूहिक हर्ष का अवसर बना दिया जाता है वो शर्मनाक है । दीक्षा समारोह के बाद लेखिका ने कथा के माध्यम से संघ के अंदर के मुनियों की कुंठित यौनाकांक्षा का वर्णन किया है । संघ में जो बच्चियां दीक्षित होती हैं, कलांतर में वो जब जवान होती हैं तो उनके अंदर भी सांसारिक सुख सुविधाओं को भोगने की आंकांक्षा हिलोरें लेने लगती है । धर्म और मर्यादा के बंधन में जकड़े जवान साधु- साध्वियों के दिलों में एक दूसरे के प्रति दैहिक आकर्षण उभरती है उसका एक नमूना विजयेन्द्र मुनि और छुटकी, जो दीक्षा के बाद साध्वी दिव्यप्रभा हो चुकी है, के बीच पनपे प्रेम से लगाया जा सकता है । दिव्यप्रभा और विजयेन्द्र संघ को छोड़कर नई जिंदगी शुरू करना चाहते हैं लेकिन विजयेन्द्र एक गलती कर बैठते हैं और अपने दिल की बात अपने ही एक साथी साधु अभयमुनि को बता देते हैं । अभयमुनि खुद ही काम की अग्नि में जल रहा होता है और उसे जब इस प्रेम-प्रसंग के बारे में जानकारी मिलती है तो उसकी यौन लिप्सा इस कदर बेकाबू हो जाती है कि वो छल से साध्वी दिव्यप्रभा का रेप कर डालता है . साध्वी के इंतजार में खड़े विजयेन्द्र मुनि को झूठी खबर दे कर विक्षिप्त भी कर देता है ।

इस बलात्कार की परिणति साध्वी के मां बनने में होती है और धर्म की पवित्रता की आड़ लेकर वही धर्मगुरू, साध्वी को संघ से निष्कासित कर देते हैं जहां कभी समारोहपूर्व उसे दीक्षित किया गया था । जिंदगी से हर तरह से ठुकराई साध्वी दिव्यप्रभा एक वेश्या बना दी जाती है जहां वो अपनी बेटी ऋषिकन्या का भरण पोषण करने लग जाती है । कहानी में एक बेहद नाटकीय मोड़ आता है और छुटकी से साध्वी बनी दिव्यप्रभा की मुलाकात उसकी बड़ी बहन संघमित्रा से होती है, जो एक बड़ी एनजीओ चला रही होती है । छुटकी अपनी बेटी को बहन को सौप कर दम तोड़ देती है । लेकिन मरने के पहले वो पूरी आपबीती जीजी को सुना जाती है । इंतकाम की आग में जल रही संघमित्रा बेहद ही योजनाबद्ध तरीके से अभयमुनि का कत्ल कर अपनी बहन के साथ हुए अन्याय का बदला लेती है।

समीक्ष्य पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे केरल की सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा- एन ऑटोबॉयोग्राफी ऑफ अ नन – के कई प्रसंगों की याद आ जाती है – कि किस तरह से ‘होली किस’ के नाम पर फादर ननों का चुंबन लेते हैं और अपने इस कृत्य के लिए धर्म और धर्मग्रंथ की आड़ लेते हैं । ऐसा नहीं है कि ये कुरीतियां सिर्फ जैन और ईसाई धर्म में ही है । हिंदू धर्म में तो देवदासी प्रथा से लेकर शादी के बाद पंडितों के द्वारा लड़कियों के शुद्धिकरण की प्रथा रही है । दरअसल धर्म के नाम पर स्त्रियों के शोषण की ये दास्तां बेहद पुरानी हे लेकिन जिस साहस के साथ मधु कांकरिया ने अपने उपन्यास सेज पर संस्कृत में उसे उजागर किया है उसके लिए उन्हें दाद देनी पड़ेगी ।

Sunday, June 7, 2009

नहीं रहे हबीब तनवीर

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर भोपाल में लंबी बीमारी के बाद भोपाल में निधन हो गया । कुछ दिनों पहले उन्हें सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद निजी अस्पताल दाखिल कराया गया था जहां वो वेंटिलेटर पर थे । असपताल के डॉक्टरों के मुताबिक तनवीर को अस्थमा का दौरा पड़ा था, जिसके चलते उन्हें साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। उनके फेफड़ों में पानी भर गया था और सीने एवं खून में संक्रमण की वजह से तबीयत बिगड़ गई थी ।
किसी भी विधा में ये देखने को कम ही मिलता है कि अपने जीवन काल में ही उसमें काम करनेवाला लीजेंड बन जाता है । लेकिन हबीब के साथ यही हुआ और वो रंगमकर्म की दुनिया के लीविंग लीजेंड बन गए थे . बावजूद इसके हबीब तनवीर का लोगों से जुड़ाव कम नहीं हुआ और वो लोक के कलाकार के तौर पर मशहूर हुए । हबीब ने जब रंगकर्म की दुनिया में कदम रखा तो उस वक्त रंगमंच की दुनिया में लोक की बात कम होती थी । लेकिन इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ के साथ बहीह के जुड़ाव ने उन्हें लोक से जुड़ने के लिए ना केवल प्रेरित किया बल्कि उनके विचारों को भी गहरे तक प्रभावित किया । एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब तनवीर को पद्म भूषण, पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कार मिले थे. रायपुर में हुआ और स्कूली शिक्षा वहां से पूरी करने के बाद वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन किया और फिर 1945 में वो मुंबई चले गए जहां उनकता जुड़ा इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से हुआ । लेकिन हबीब ने नाटक की दुनिया में कदम दिल्ली में आने के बाद ही रखा- सन 1954 में जहां पहली बार उन्होंने आगरा बाजार का मंचन किया, लिखा भी । दिल्ली में ये वो दौर था जब रंगमंच की दुनिया यूरोपियन मॉडल से प्रभावित थी और यहां अंग्रेजी वालों का बोलबाला था । लेकिन अपने इस नाटक से तनबीर ने ना केवल अंग्रेजी का आधिपत्य तोड़ा बल्कि रंगमंच की दुनिया के लिए एक नया आकाश उद्धाटित किया । ये नाटक अटारहवीं शताब्दी के मशहूर उर्दू शायद अकबर नजीराबादी पर केंद्रित था । इस नाटक में हबीब तनवीर ने ओखला गांव के कलाकारों को लेकर रंगमंच के आभिजात्य को चुनौती देते हुए एक नई भाषा भी गढ़ी । इसके बाद हबीब इंगलैंड चले गए जहां तीन साल तक रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में रंगमंच और उसकी बारीकियों को समझा . फिर 1959 में तनबीन ने अपनी रंगकर्मी पत्नी मोनिका मश्रा के साथ मिलकर नया थिएटर नास से एक ग्रुप बनाया जिसने भारतीय और यूरोपियन क्लासिक का मंचन किया । रंगमंच की दुनिया को तनबीर ने अंग्रेजी आभिजात्य से तो आजादी दिलाई साथ ही उन्होंने लोक कलाकारो को स्थानीय बोली बानी में नाटक करने के लिए प्रोत्साहित किया ।
1975 में हबीब तनबीर ने अपना मशहूर नाटक चरणदास चोर का मंचन किया जो आजतक इतना लोकप्रिय है कि जहां भी, जब भी इसका मंचन होता है, लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है । इसके बाद तनबीर ने कई विश्व क्लासिक का मंचन किया जिसमें – गोर्की की एनेमीज पर आधारित दुश्मन, असगर वजाहत की जिन लाहौर नहीं बेख्या के अलावा कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना, शाजापुर की शांतिबाई आदि ने रंगमंच को एक नई उंचाई दी । हबीब तनवीर ने थिएटर के साथ बालीवुड की फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उन्होंने नाना पाटेकर अभिनीत चर्चित फिल्म 'प्रहार' और निर्देशक सुभाष घई की 'ब्लैक एंड ह्वाइट' में भी काम किया।
हबीब तनबीर के प्रगतिशील विचारों को जब नाटकों में जगह मिलने लगी तो भगवा ब्रिगेड के कान खड़े हुए और जब मध्य प्रदेश में सन दो हजार तीन में पोंगा पंडित और लाहौर का मंचन शुरु हुआ तो भगवा ब्रगेड के कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध प्रदर्शन कर इन दोनों नाटको के मंचन को रुकवाने की कोशिश की । लेकिन हबीब की जिजीविषा पर कोई असर नहीं हुआ और अपने नाटकों के माध्यम से वो अलख जगाते रहे, बगैर डरे, बगैर घबराए । रंगमंच की इस महान विभूति को हमारी श्रद्धांजलि ।

टूटते सपनों की दास्तां

एक रचनाकार के तौर पर मृदुला गर्ग आज हिंदी साहित्य में किसी परिचय की मोहताज नहीं है । मृदुला गर्ग लगभग चार दशक से लेखन में सक्रिय हैं । कहानी और उपन्यास के अलावा पत्र-पत्रिकाओं भी उन्होंने विपुल लेखन किया है । लेकिन तेरह साल बाद मृदुला गर्ग का नया उपन्यास मिलजुल मन, सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से छपकर आ रहा है । मृदुला गर्ग के दो उपन्यास- चितकोबरा और कठगुलाब की  साहित्यिक जगत में खासी चर्चा हुई थी और लेखिका को प्रसिद्धि भी मिली थी । चितकोबरा में जो संवेदनशील स्त्री अपने नीरस जीवन से उबकर सेक्स के प्रति असामान्य आकर्षण दिखाती है वो कठगुलाब तक पहुंचकर संवेदना के स्तर पर अधिक प्रौढ़ नजर आती है । और इस उपन्यास मिलजुल मन में वो और मैच्योरिटी के साथ सामने आती है । 
इस उपन्यास मिल जुल मन की नायिका गुलमोहर उर्फ और उसकी सहेली मोगरा है । अपने इस उपन्यास में लेखिका ने आजादी के बाद के दशक में लोगों के मोहभंग के दौर को बेहद शिद्दत के साथ उठाया है । आजादी मिलने पर लोगों के मन में एक सपना था , एक सुनहरे भविष्य की कल्पना थी, बेहतर जीवन प्राप्ति की ललक थी । देश का हर नागरिक खुशहाली की चाह लिए था । युवक-युवतियों के मन में सफल होने की चाहत हिलोरें ले रही थी । एक खुशनुमा जिंदगी और समाज की उन्नति का सपना देख रहे लोगों ने आजादी की लड़ाई में संघर्ष किया था और जब आजादी मिली तो पूरे देश ने एक सपना देखा था । इस सपने के टूटने और विश्वास के दरकने की कहानी है मृदुला गर्ग का नया उपन्यास - मिलजुल मन । इस उपन्यास की भूमिका में लेखिका कहती हैं - दुविधा के अलावा और कई मायनों में अजब था वह वक्त । सदी भर पहले देखा , आजादी का सपना पूरा हुआ था । पर आजादी का जो सुंदर, सजीला, अहिंसक चेहरा हमने ख्यालों में तैयार किया था, मुल्क के तक्सीम होने के साथ, सपने की तरह तड़क कर बिखर गए । सपने के टूटने पर हमने असलियत में जीना कबूल नहीं किया, नया सपना पाल लिया । दुविधा में आ मिला मासूमियत भरा यकीन कि हम गुटनिरपेक्ष और मिली जुली अर्थव्यवस्था का ऐसा संसार बसाएंगे कि दुनिया हमारा लोहा मानेगी और हम विश्वगुरु कहलाएंगें । तो ये जो आजादी के बाद का मासूमियत और दुविधा के घालमेल से बना सपना था, जो आजादी के बाद कुछ वर्षों तक जनता ने देखा था, टूटकर बिखरने लगा । और सपने के इस टूटने और बिखरने को ही लेखिका ने इस उपन्यास का विषय बनाया । लगभग चार सौ पृष्ठों के इस वृहदाकार उपन्यास में गुल और मोगरा के बहाने मृदुला गर्ग ने आजादी के बाद के दशकों में लोगों की जिंदगी और समाज में आनेवाले बदलाव की पड़ताल करने की कोशिश करती है । मोगरा के पिता बैजनाथ जैन के अलावा डॉ कर्ण सिंह, मामा जी, बाबा, दादी और कनकलता के चरित्र चित्रण के बीच गल बड़ी होती है और इस परिवेश का उसेक मन पर जो मनोवैज्ञानिक असर होता है उसका भी लेखिका ने कथानक में इस्तेमाल किया है । 
अपने इस नए उपन्यास में मृदुला गर्ग अपने पात्रों के माध्यम से हिंदी के लेखकों पर बेहद ही कठोर टिप्पणी करती है - तभी हिंदी के लेखक शराब पीकर फूहड़ मजाक से आगे नहीं बढ़ पाते । मैं सोचा करती थी, लिक्खाड़ हैं,सोचविचार करनेवाले दानिशमंद । पश्चिम के अदीबों की मानिंद, पी कर गहरी बातें क्यों नहीं करते, अदब की, मिसाइल की, इंसानी सरोकार की । अब समझी वहां दावतों में अपनी शराब खुद खरीदने का रिवाज क्यों है । न मुफ्त की पियो और न सहने की ताकत से आगे जाकर उड़ाओ । अपने यहां मुफ्त की पीते हैं और तब तक चढ़ाते हैं जबतक अंदर बैठा फूहर मर्द बाहर ना निकल आए । ये लेखिका का प्रिय विषय भी रहा है । हिंदी लेखकों को बेनकाब करता इनका एक उपन्यास 1984 में प्रकाशित हो चुका है । मैं और मैं भी एक धूर्त लेखक द्वारा एक नई लेखिका के शोषण को विषय बनाकर महानगरीय परिवेश में  लेखक समाज की विकृतियों को उद्घघाटित किया था । 
इसके अलावा इस उपन्यास में गुल के व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं - एक लड़की, एक प्रेमिका, एक पत्नी, एक कथाकार को विस्तार से विश्लेषित किया है । हर पहलू का मनोविज्ञान उसके मन में चलनेवाले विचार और उसका उसके व्यक्तित्व पर असर सबकुछ लिखा गया है । इस उपन्यास की भाषा में रवानगी तो है लेकिन खालिस उर्दू के शब्दों का ज्यादा प्रयोग भाषा के प्रवाह को गाहे बगाहे बाधित करता है । इसके अलावा इस उपन्यास की एक बड़ी कमजोरी इसका आकार और घटनाओं का अनावश्यक विस्तार है, जिसे कुशल संपादन के जरिए कसा जा सकता था । इससे ना केवल पाठकों को बांधा जा सकता था बल्कि कथा भी सधती । इस उपन्यास को लेखिका ने जिस बड़े फलक पर उठाया है उसको संभालने में काफी मशक्कत भी की है, श्रमपूर्वक घटनाओं को समेटा है, लेकिन हर घटना को बढ़ाते रहने का लोभ मृदुला गर्ग संवरित नहीं कर पाई है । नतीजा ये हुआ है कि उपन्यास विस्तृत होता चला गया और कहानी में बार- बार ये एहसास होने लगा कि जबरदस्ती विस्तार दिया जा रहा है । घटनाओं के अलावा संवाद भी काफी लंबे-लंबे हैं जिसमें पाठकों के उलझने का खतरा है ।  

Sunday, May 17, 2009

बचपन पर हमला


कुछ दिनों पहले की बात है कि हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी ने बताया कि एक दिन वो अपनी छह सात साल की बिटिया के साथ आईपीएल मैच देख रहे थे, इस बीच अचानक ब्रेक में गर्भ निरोधक गोली आई -पिल का विज्ञापन आया । उनकी बिटिया ने मासूमियत से ऐसे-ऐसे सवाल पूछे कि पिता को जबाव देते नहीं बन रहा था । बिटिया उस विज्ञापन में कहे गए शब्दों की जानकारी लेने पर उतारू थी और पिता के सामने गंभीर संकट । किसी तरह से मामला निबटा । लेकिन बच्चों की जिज्ञासा को आप बहला फुसला कर टाल नहीं सकते, क्योंकि वो फौरन इस बात को भांप लेते हैं कि उनको टरकाया जा रहा है । इसी तरह का एक और वाकया हमारी एक महिला सहयोगी ने बताया । यह वाकया बेहद दिलचस्प था- हुआ यूं कि एक दिन वो पूरे परिवार के साथ टीवी देख रही थी कि अचानक उसका साढ़े पांच का साल का बच्चा चिल्लाया- देखो मम्मियों का डायपर आया । दरअसल उसवक्त टीवी पर सैनेटरी नैपकिन का विज्ञापन आ रहा था, बच्चा बगैर कुछ सोचे समझे चिल्ला रहा था, और  ड्राइंग रूम में एक साथ बैठ कर टीवी देख रहा पूरा परिवार सन्न । सब एक दूसरे से नजरें छिपा रहे थे । ये तो उस वक्त हुआ जब बच्चे परिवार के साथ या फिर अपने मां-बाप के साथ टीवी देख रहे थे, और उनके मन में विज्ञापनों को देखकर जो भी सवाल उठते हैं उसे वो जानने की कोशिश कर रहे थे । उस वक्त की कल्पना करिए जब बच्चे घर में अकेले टीवी देखते हैं और ऐसे विज्ञापनों को देखकर उनके मन में जो सवाल उठते हैं, उस वक्त इसका जबाव देने वाला कोई होता नहीं है और बाल मन पर इसका क्या असर पड़ता होगा, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है । 
इस बात को ज्यादा अरसा नहीं बीता है । मैं अपने परिवार के साथ दिल्ली के पास के एक मॉल में घूम रहा था । अपनी बिटिया के लिए कपड़ों की तलाश में भटकते हुए बच्चों के कपड़ों के सेक्शन में चला गया । मेरी बेटी को स्कर्ट और लंहगा बेहद पसंद है इसलिए हमलोग उसकी तलाश में जुट गए । हम जहां  कपड़े देख रहे थे वहीं पर कुछ और युवा मां भी अपनी छोटी छोटी बेटियों के साथ खरीदारी कर रही थी । सबलोग अपने बच्चों की पसंद नापसंद का ध्यान रख रहे थे और बच्चे थे कि बड़ों की तरह कपड़ों को रिजेक्ट किए जा रहे थे । मां-बाप अपने-अपने बच्चों को मनाने में जुटे थे । अचानक तीन चार साल की एक लड़की ट्रायल रूम से अपनी मम्मी के साथ रोती हुई बाहर आई और अपने पापा की ओर मुखातिब होकर कहा कि पापा मुझे ये स्कर्ट पसंद नहीं है, मुझे ये नहीं लेना है । युवा पापा ने अपनी युवा पत्नी से पूछा कि क्या हो गया ये रो क्यों रही है । मम्मी ने रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ कहा कि अपनी बिटिया से ही पूछ लो । जब उसने अपनी छोटी और प्यारी सी बिटिया से पुचकार कर पूछा तो उसने सुबकते हुए कहा कि पापा इसमें नेवल नहीं दिखता, इसलिए मुझे ये नहीं लेना है । उसकी ये बात सुनते ही मेरे समेत वहां मौजूद कई लोग चौंके, लेकिन उस छोटी बच्ची की मां ने कहा कोई बात नहीं बेटा दूसरा ट्राई कर लेते हैं ।उस बच्ची ने इतनी बड़ी बात कह दी लेकिन उनके मां-बाप ने इसे बेहद सहजता से लिया ।  इतनी बड़ी बात उस छोटी सी लड़की ने कहा और उसके मां बाप ने जिस अंदाज में लिया वो मेरे लिए न  सिर्फ चौंकाने वाला था बल्कि चकित करनेवाला भी । मैं जब उस सुपर स्टोर से बाहर निकला तो मेरे जेहन में बार बार उस छोटी सी बच्ची की प्रतिक्रिया गूंज रही थी । मैं लगातार अपने आप से ये जानने की कोशिश कर रहा था कि क्या वजह थी जो उस छोटी सी बच्ची ने कहा कि मम्मा नेवल नहीं दिखता । उसके लिए इसके मायने क्या थे, कहां से ये सोच उसके अंदर आई, किससे प्रभावित होकर उसने ये कहा और उसके मां बाप ने इसे उतनी सहजता से कैसे लिया । ये बात मुझे इतना परेशान कर रही थी कि मैं वापस उस स्टोर में गया तो वो लोग बाहर निकलते हुए मिल गए । मैंने उस बच्ची के पिता को रोका और उनसे पूछा कि उस बच्ची ने नेवल नहीं दिखने जैसी बात क्या सोचकर कही और उसके लिए इसके मायने क्या हैं । उसके पिता ने छूटते ही कहा अरे भाई साहब आप किस चक्कर में पड़े हो ये बिल्कुल नई पीढ़ी है और इनकी सारी सोच  टेलीविजन के हिसाब से चलती है ,आजकल ये टीवी पर आनेवाले डांस शो के ड्रेसेस देखकर अपनी ड्रेस तय कर रही हैं । ये कहकर वो युवा दंपत्ति सहज भाव से आगे बढ़ गया ।  
ये तीन घटनाएं ऐसी हैं जो हमें ये सोचने पर विवश करती हैं कि टेलीविजन ने हमारे समाज को, हमारे जीवन, हमारे रहन सहन को किस कदर प्रभावित कर दिया है कि तीन चार साल की बच्ची भी, जो देश का भविष्य है, इसके प्रभाव से अछूती नहीं रह सकी हैं । 
हमसे और हमारी पीढ़ी के पहले के लोग सिनेमा से जबरदस्त रूप से प्रभावित होते थे । अमिताभ बच्चन से लोग इतने प्रभावित हुए थे कि कई लोगों ने अपने बच्चों का नाम विजय रख दिया था जो आमतौर पर अमिताभ की हर फिल्मों में उसका नाम होता था । अमिताभ के बोलने के अंदाज भी लोगों को खूब भाया और उसकी भी जमकर नकल हुई । राजेश खन्ना के स्कार्फ का जादू भी उस जमाने के लड़कों के सर चढकर बोलता था । ऋषि कपूर की फिल्म बॉबी के बाद तो कपड़े के एक खास डिजाइन का नाम ही बॉबी प्रिंट हो गया । फिर सलमान की एक फिल्म आई थी- मैंने प्यार किया- जिसमें उसने एक टोपी पहनी थी जिपर फ्रेंड लिखा था और बाजार में हर दूसरा लड़का उसी तरह की फ्रेंड लिखी टोपी पहने नजर आने लगा था । लेकिन फिल्मों से आमतौर पर युवा वर्ग प्रभावित होता रहा है, बल्कि अच्छी बुरी चीजें अपनाता भी रहा है । लेकिन ये तो टेलीविजन का ही कमाल है कि उसने घर-घर में बच्चों को भी अपनी जद में ले लिया । बच्चे ना केवल टीवी पर आनेवाले सिरियल से प्रबावित होते हैं बल्कि विज्ञापन भी उन्हें बेहद पसंद आते हैं और नवो उनकी नकल भी करते हैं । रियल्टी शो की नकल करने में कई बच्चों की जान भी जा चुकी है । ये सबकुछ एक सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है और देश के   भविष्य पर भी टीवी के माध्यम से प्रभाव कायम करने की कोशिश की जा रही है। 
मुझे तरस आ रहा है समाज में नैतिकता के उन तथाकथित ठेकेदारों पर जो लड़कियों के पहनावे पर पहरा लगाने की कोशिश में गाहे बगाहे हंगामा बरपाते रहते हैं । लड़कियों के बीयर बार में मौजूदगी पर उनपर हमले करते हैं और उनके साथ मार पीट भी करते हैं । तरस उन स्कूल कॉलेज प्रशासन पर भी आता है जो ड्रेस कोड के नाम पर गाहे बगाहे जींस और स्कर्ट पर प्रतिबंध लगाने की नाकाम कोशिश कर हंगामा को आमंत्रण देते हैं । उनकी इन हरकतों से कुछ भी नहीं होनेवाला है क्योंकि उनको ये नहीं पता कि टीवी के मार्फत कब हमारी पूरी की पूरी संस्कृति खामोशी से बदल गई इसका  इल्म न तो भारतीयता के नाम पर अपनी दुकान चलाने वालों को है और न ही स्कूल कॉलेज में बैठे प्रशासकों को । भारतीय संस्कृति के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले भगवा ब्रिगेड की अज्ञानता पर तरस आता है । अब भी वो सतयुग में जी रहे हैं, दुनिया कहां से कहां चली गई और वो धोती कुर्ते और साड़ी में ही उलझे हुए हैं, समाज में हुई खामोश क्रांति का ना तो उन्हें इल्म है ना ही अंदाज । वो तो विश्वविद्यालय के उन आलोचकों की तरह हैं जो अब भी निराला और मुक्तिबोध में ही उलझे हुए हैं, कुछ तो मीरा और कबीर की रचनाओं में ही नया अर्थ ढूंढ रहे हैं । 
मुझे तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 'संस्कृति के चार अध्याय' में लिखी वो पंक्ति याद आ रही जहां दिनकर जी ने लिखा है -- "विद्रोह क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है....घाव भी फूटने के पहले काफी दिनों तक पकता रहता है " तो हमारी संस्कृति में जो खामोश बदलाव या कहें खामोश क्रांति आई वो भी अचानक नहीं आई है । इस खामोश बदलाव के पीछे भी कई सालों तक फिल्मों या टीवी का प्रभाव रहा जो कि अपनी सभ्यता और संस्कृति को छोड़ पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में जुटे रहे और आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता परोसते रहे । नतीजा ये हुआ कि जो उम्र बच्चों के खेलने और मासूमियत भरी शैतानी करने की होती है उसमें वो अपने ड्रेस के बारे में सोच रहे है । 
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Sunday, May 10, 2009

पत्रिकाओं के बहाने...

25 जून 1999 को समीक्षक और स्तंभकार भारत भारद्वाज ने मुझे एक भारी भरकम पत्रिका का प्रवेशांक भेंट किया जो आकार प्रकार और अपने सादे कवर की वजह से आकर्षक लग रहा था । उस पत्रिका का नाम था- बहुवचन, प्रकाशक था महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और पत्रिका के प्रधान संपादक थे विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अशोक वाजपेय़ी, जिनके संपादक के रूप में नाम छपा था पीयूष दईया का । आज से लगभग दस वर्षों पूर्व जब ये पत्रिका छपी थी तब पीयूष दईया का नाम हिंदी में नया और अनजाना सा था । बहुवचन के साथ ही विश्विविद्यालय ने दो और पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया था- पुस्तक वार्ता जिसके भी प्रधान संपादक अशोक वाजपेयी थे और पत्रकार थे पत्रकार राकेश श्रीमाल । तीसरी पत्रिका थी अंग्रेजी में - हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग, इसके संपादक थे रुस्तम सिंह । 
जब इन पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ था तो तो हिंदी साहित्य में इसपर जमकर बहस चली थी । अशोक वाजपेयी के विरोधियों का आरोप था कि विश्विविद्यालय का काम पत्रिकाएं छापना नहीं है । लेकिन इन आरोप लगानेवालों को ये ज्ञान नहीं था कि देश-विदेश की लगभग सभी विश्विविद्यालयों से पत्रिकाएं निकलती हैं, चाहे वो कैंब्रिज हो , ऑक्सफोर्ड हो या फिर लखनऊ या भागलपुर विश्विविद्यालय । ये अवश्य है कि भारत में विश्वविद्यालयों की पत्रिकाएं सिर्फ रस्मी तौर पर निकलती हैं जिसे छपने के बाद गोदामों में ठूंस दिया जाता है, जिसे कालांतर में रद्दी के भाव बेच दिया जाता है। क्या मुझे यहां ये कहने की जरूरत है कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज से निकलने वाली पत्रिकाओं की विश्व में क्या प्रतिष्ठा है ? 
लंबे समय से विश्विद्यालय के हिंदी विभागों में कुंडली मारकर बैठे साहित्य के आचार्यों को ये बात हजम नहीं हो रही थी कि हिंदी के नाम पर खुले विश्विविद्यालय में उनकी कोई पूछ नहीं हो रही है । नए-नए 'लौंडे लफाड़ों' को पत्रिका का संपादक बना दिया गया है और वर्षों से साहित्य साधना में लीन आचार्यों की प्रतिष्ठा और निष्ठा को दरकिनार कर दिया गया है । अशोक वाजपेयी पर जमकर हमले हुए लेकिन पांच वर्षों 'बहुवचन' और 'पुस्तक वार्ता' नियमित रूप से निकलती रही । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का प्रकाशन अवश्य बाधित हुआ, वजह तो तत्कालीन कुलपति ही बता सकते हैं । अशोक वाजपेयी के बाद जी गोपीनाथन कुलपति बने, जिनके कार्यकाल में धीरे-धीरे इन पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया, साहित्य जगत को खबर भी नहीं लगी । 
अब नए कुलपति विभूति नाराय़ण राय के प्रभार संभालने के बाद फिर से इन तीनों पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ है । बहुवचन (संपादक- राजेन्द्र कुमार), पुस्तक वार्ता(संपादक- भारत भारद्वाज), हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग(संपादक- ममता कालिया) । दस वर्षों में बहुवचन का टैग लाइन भी बदल गया है जो पत्रिका के बदले हुए मिजाज का संकेत है । प्रवेशांक में लिखा था- बहुवचन, साहित्य भाषा शोध विचार की पत्रिका । लेकिन अब बहुवचन- बहुसुमन, बहुरंग निर्मित एक सुंदर हार- हो चुका है । इन दोनों टैग लाइन पर ही अगर हम विचार करें तो पत्रिका के चरित्र में बदलाव को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । पहले अंक में - यह प्रवेशांक- शीर्षक से एक टिप्पणी थी, जिसमें लिखा गया था कि 'यह प्रयत्न हिंदी में सक्रिय अनेक पीढ़ियों, अनेक दृष्टियों और शैलियों के लेखकों को एकत्र करने का है ।' जो उस अंक में दिखा भी था । बहुवचन के नए अंक में संपादकीय का शीर्षक देखिए - 'यह नवोन्मेषांक ।' ये हिंदी इतनी कठिन है कि आम पाठकों को भी समझ नहीं आएगी । संपादकीय में भी जिस शास्त्रीय शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इसको न सिर्फ जटिल बना देता है बल्कि बोझिल भी । महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का एक उद्देश्य पूरे विश्व में हिंदी को इंटरनेशनल भाषा के तौर पर मान्यता दिलवाना भी है । लेकिन अगर पत्रिका के संपादक ही इस तरह की जटिलतम भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो हिंदी पढ़ने समझनेवाले ही इससे दूर हो जाएंगे, गैर हिंदी भाषी के तो पास आने का सवाल ही नहीं उठता । 
बहुवचन के संपादक राजेन्द्र कुमार ने अपने संपादकीय में लिखा है- 'यह शिकायत प्राय सुनने को मिलती है कि हमारे विश्वविद्यालय अकादमिक जड़ता के 'भव्य ठिकाने' होते जा रहे हैं । खासतौर से हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन 
में लगे लोगों के बारे में आम धारणा यह है कि भाषा और साहित्य उनके लिए वहीं तक महत्वपूर्ण जहां तक वह उनकी आजीविका का विषय बनता हो । जिज्ञासा का विषय वो बने, इसका क्या लाभ । अपने ज्ञान के स्तर को अद्यतन बनाने में उनकी अधिक रुचि नहीं, जितनी अपनी सुख सुविधाओं को अद्यतन बनाने में ।' और बहुवचन का ये पूरा अंक इस आम धारणा को पूरी तरह से नहीं तो आंशिक तौर पर अवश्य ही मजबूत करता है । इसके अलावा अगर हम बहुवचन के जनवरी-मार्च 2009 के अंक के लेखकों की सूची पर नजर डालें तो ये पत्रिका महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की कम जन संस्कृति मंच की पत्रिका ज्यादा लगती है । 
दूसरी पत्रिका- पुस्तक वार्ता- के संपादक भारत भारद्वाज हैं जो पिछले दो दशकों से हंस में के अपने लोकप्रिय स्तंभ और अन्य पत्र पत्रिकाओं में लेखकों की खबर लेते रहे हैं । इस पत्रिका के चरित्र में कोई ज्यादा बदलाव नहीं किया गया है । लेकिन संपदकीय में भविष्य में इसकी प्रकृति में बदलाव के संकेत साफ हैं- 'यह मुख्यत समीक्षा (रिव्यू) की पत्रिका है । कुछ कुछ अंग्रेजी की 'बिब्लियो' और 'द वीक रिव्यू' की तरह । लेकिन भविष्य़ में इसकी प्रकृति में  बदलाव करते हुए सृजनात्मकता और समकालीन वैचारिक विमर्श का उन्मुक्त मंच बनाने की मेरी आकांक्षा है ।' लोकार्पण समारोह में विश्वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने भारत भारद्वाज को बहुपठित और अद्यतन सूचनाओं से लैस लेखक बताते हुए अपनी अपेक्षाएं भी जाहिर की थी । पुस्तक वार्ता के ताजे अंक में कुंवर नारायण पर पठनीय सामग्री है । बजुर्ग आलोचक नंदकिशोर नवल ने अपनी याददाश्त के आधार पर पुस्तकों की एक लंबी सूची गिना दी है, कुछ रोचक प्रसंगों के साथ । इस अंक की एक विशेषता साहित्य कोलाहल है, जिसे प्रज्ञाचक्षु के छद्म नाम से कोई लिख रहा/रही है । ये स्तंभ काफी रोचक और दिलचस्प जानकारियों से भरा है । लेकिन पुस्तक वार्ता की आत्मा भी बिहार की ओर झुकी नजर आती है, बावजूद इसके आनेवाले दिनों में ये पत्रिका हिंदी में सार्थक हस्तक्षेप की आहट तो दे ही रही है । 
वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने  हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का संपादन किया है । इस पत्रिका पर हिंदी में जो कुछ महत्वपूर्ण लिखा जा रहा है या लिखा जा चुका है उसे अंग्रेजी में अनूदित करवा कर विश्व पटल पर पेश करना है । ममता कालिया जब इस पत्रिका की संपादक बनी थीं तब विश्वविद्यालय से जुड़ी गगन गिल ने अच्छा खासा विवाद खड़ा कर दिया था, जिसे जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने भी हवा दी थी । लेकिन अब जब पत्रिका छपकर आई तो तमाम विवादों पर विराम लगा गया । इस पूरी पत्रिका में रचनाओं और रचनाकारों के चयन में बेहतरीन संपादकीय दृष्टि को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । रचनाकारों के चयन में ममता कालिया पर ये आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्रिका में अपने पति रवीन्द्र कालिया की रचना का अनुवाद छापा । लेकिन आलोचना करनेवाले ये भूल जाते हैं कि रवीन्द्र कालिया हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं और कोई भी संपादक उनकी रचनाएं छापने को उत्सुक रहता है । लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या रिश्तेदार होने की वजह से ही सिर्फ लेखक को दरकिनार करने का हक संपादको को है । कतई नहीं । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग की सबसे बड़ी कमजोरी अनुवाद है । ज्यादातर अनुवाद में वो प्रवाह और रवानगी नहीं है जो मूल रचनाओं में है । इसके अलावा इस पत्रिका में अगर तीन महीनों में हिंदी की महत्वपूर्ण गतिविधियों को शामिल किया जा सके तो गैंर हिंदी भाषियों की जानकारी समृद्ध होगी और विश्विविद्यालय के उद्देश्य की पूर्ति भी ।  

Thursday, May 7, 2009

एक खामोश मौत

भोजपुरी फिल्मों के शेक्सपियर कहे जानेवाले मोती ने गुमनामी में दम तोड़ दिया । मीडिया में कम ही लोग इस नाम से परिचित हैं । मोती बीए की खामोश मौत पर इकबाल रिजवी ने हाहाकार के लिए खासतौर पर ये लेख लिखा है ।

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आज़ादी से पहले उन्होंने एमए कर लिया था लेकिन कविता के मंच पर अपनी क्रांतिकारी रचनाओं की वजह से वे तब देश भर में चर्चित हो गए जब उन्होंने बीए किया था और तभी से उनके नाम के आगे बीए ऐसा जुड़ा कि वे हमेशा मोती बीए के नाम से ही जाने गए। वे मोती बीए ही थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा में भोजपूरी की सर्वप्रथम जय जयकार करायी। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और भोजपुरी पर समान अधिकार रखने वाला और भोजपुरी के शेक्सपियर के नाम से याद किया जाने वाला वह गीतकार लंबी गुमनामी के बाद चुपके से सबको छोड़ कर चला गया।  

        मोती लाल बीए का पूरा नाम मोती लाल उपाध्याय था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले के बरेजी नाम के गांव में 1 अगस्त 1919 को हुआ। बचपन से ही कविता में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी। वे मनपसंद कविताओं को ज़बानी याद कर लेते थे। फिर उन्होंने खुद कविताएं लिखनी शुरू कर दीं। उनकी पढ़ाई वाराणसी में हुई। 16 साल की उम्र में पहली बार उनकी कविता दैनिक आज में प्रकाशित हुई। जिसके बोल थे " बिखरा दो ना अनमोल - अरि सखि घूंघट के पट खोल "  जब उन्होंने बीए करा तब तक वे कवि सम्मेलनो में एक गीतकार के रूप में पहचान बना चुके थे। उन्होंने अपने नाम के आगे बीए लगाना शुरू कर दिया। उस समय आज़ादी की जंग जोरो पर थी। अंग्रेज़ों के खिलाफ़ पूरे देश में माहौल बहुत गर्म था। मोती जी भोजपुरी भाषा में क्रांतिकारी गीत लिख लिख कर लोगों को सुनाया करते थे। उसी दौर का उनका एक गीत था

"भोजपुरियन के हे भइया का समझेला

खुलि के आवा अखाड़ा लड़ा दिहे सा

तोहरी चरखा पढ़वले में का धईल बा

तोहके सगरी पहाड़ा पढ़ा दिये सा "

      धीरे धीरे मोती की सक्रियता कलम के सहारे क्रांतिकारी विचारों को गति देने में बढ़ने लगी। सन् 1939 से 1943 तक "अग्रगामी संसार" तथा "आर्यावर्त" जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में कार्य के दौरान राष्ट्रीय विचारों एवं उससे जुडे़ लेखन के चलते कई बार जेल भी जाना पड़ा। 1943 में वे दो महीने की सज़ा काट कर जेल से रिहा किये गए फिर उन्होंने टीचर्स ट्रेनिंग कालेज वाराणसी में दाखिला ले लिया। इसी दौरान जनवरी 1944 में वाराणसी में हुए एक कवि सम्मेलन में पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था के निर्देशक रवि दवे ने उन्हें सुना। मोती का गीत "रूप भार से लदी तू चली" उन्हें बहुत पसंद आए और उन्होंने मोती को फ़िल्मों में गीत लिखने के लिये निमंत्रण दिया। लेकिन मोती जी अचानक मिले इस निमंत्रण को फ़ौरन स्वीकार नहीं पाए और साहित्य रचना में ही जुटे रहे। 945 में वे फिर गिरफ़्तार कर लिये गए। उन्हें वाराणसी सेंट्रल जेल में भारत रक्षा क़ानून के तहत नज़र बंद कर दिया गया लेकिन पहले की ही तरह कुछ हफ़्तों बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

      मोती जी पत्रकारिता ओर साहित्य से ही जुड़े रहना चाहते थे। फ़िल्मों में जाना उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रही फिर भी जेल से रिहाई के बाद रोज़गार के अवसर की तलाश में उन्हें रवि दवे का फ़िल्मों में गीत लिखने का निमंत्रण फिर याद आया। मोती जी ने लाहौर का रूख किया जहां पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था थी। उनकी मुलाक़ात संस्ता के मालिक दलसुख पंचोली से हुई और पंचोली ने उन्हें 300 रूपए महीना वेतन पर गीतकार के रूप में रख  लिया। मोती को गीत लिखने के लिये पहली फ़िल्म मिली "कैसे कहूं"। इसके संगीतकार थे पंडित अमरनाथ। इस फ़िल्म में मोती ने पांच गीत लिखे शेष गीत डी एन मधोक ने लिखे। इसके बाद आयी किशोर साहू निर्देशित और दिलीप कुमार अभीनीत फ़िल्म " नदिया के पार(1948)" जिसमें सात गीत मोती बीए ने लिखे। इस फ़िल्म के गीतों की सारे देश में धूम मच गयी। खास कर इसका एक गीत "मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार " मोती बीए  की पहचान बन गया। पहली बार किसी गीतकार ने हिंदी फ़िल्मों में भोजपुरी को प्रमुखता से स्थान दिया था।

      नदिया के पार के बाद मोती जी की व्यस्तताएं बढ़ गयीं उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत लिखे। उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं "सुभद्रा (1946)", भक्त ध्रुव (1947)", "सुरेखा हरण(1947)", "सिंदूर(1947)",  "साजन(1947)", "रामबान(1948)","राम विवाह(1949)", और "ममता(1952)",। साजन में लिखा उनका एक गीत "हमको तुम्हारा है आसरा तुम हमारे हो न हो" अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय रहा।  

      मोती बीए को फ़िल्मों में काम की कमी नहीं थी। उनके लिखे गीतों को शांता आप्टे, शमशाद बेगम, गीता दत्त, लता मंगेशक, मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, और ललिता देवलकर जैसे गायकों ने स्वर दिये। लेकिन उन्हें एहसास होने लगा था कि  मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया में सम्मान की रक्षा के साथ वहां अधिक समय तक टिक पाना संभव नहीं होगा। और एक दिन अचानक उन्होंने फ़ैसला किया वे अपने घर लौट जाएंगे। फिर यही हुआ। 1952 में मुम्बई से लौटकर वे देवरिया के श्रीकृष्ण इंटरमीडियेट कालेज में इतिहास के प्रवक्ता के रूप में पढ़ाने लगे। मुम्बई में रहने के दौरान उनकी अंतिम फ़िल्म ममता थी। कुछ सालों बाद जब चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन, सुजीत कुमार और कुछ दूसरे कलाकारों ने भोजपूरी फ़िल्मों के निर्माण की गति को तेज़ किया तो मोती बीए फिर याद किये गए। मोती जी ने कई भोजपूरी फ़िल्मों "ई हमार जनाना" (1968), ठकुराइन (1984), गजब भइले रामा (1984),  चंपा चमेली (1985), ममता आदि में गीत लिखे।  1984 में प्रदर्शित गजब भइले रामा में उन्होंने अभिनय भी किया। यह आखरी फ़िल्म थी जिससे मोती जी किसी रूप में जुड़े।

      देवरिया में अध्यापन के दौरान मोती जी साहित्य सृजन में लगे रहे। उन्होंने शेक्सपियर के सानेट्स का हिंदी में सानेट्स की शैली में ही अनुवाद किया। कालीदास के संस्कृत में लिखे मेघदूत का भोजपूरी में अनिवाद किया इसेक अलावा हिंदी में 20 पुस्तकें और उर्दू में शायरी के तीन संग्रह "रश्के गुहर", "दर्दे गुहर" और "एक शायर" की रचना की। उन्होंने भोजपूरी में भी काव्य रचना की और पांच संग्रह सृजित किये। उनकी करीब चार कृतियां अभी अप्रकाशित हैं। अध्यापन से सेवा निवृत्त होने के बाद मोती बीए जैसा गीतकार गुमनामी के अंधेरों में खोता चला गया। मोती बीए को कई सम्मान मिले लेकिन भोजपूरी के विद्वान के रूप में उनका मूल्यांकन कभी नहीं हुआ। उनके पुत्र भाल चंद्र उपाध्याय उनकी कृतियों को सहेज कर रखने का काम तो करते रहे लेकिन वे अपने पिता को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिलाने में नाकाम रहे। 

      शोहरत, सम्मान और अपनी शर्तों पर काम, सब कुछ मोती बीए को मिला लेकिन नौकरशाही ने अंत तक उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं दिया। हांलाकि इस बात का उल्लेख अनेक संवतंत्रता सेनानी और साहित्यकार समय समय पर करते रहे कि मोती बीए को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से कई बार अंग्रेज़ी शासन ने गिरफ़्तार कर जेल भेजा फिर भी उन्हें जेल भेजे जाने का रिकार्ड आज़ाद हिंदुस्तान की नौकरशाही को नहीं मिल पाया।

      पिछले कुछ सालों से मोती जी की बोलने की ताकत खत्म हो गयी थी। उन्होंने 23 जनवरी 2009 को दुनिया से विदा लेली। उत्तर प्रदेश के एक दैनिक को छोड़ उनकी मौत किसी के लिये ख़बर तक नहीं बन सकी।

Sunday, May 3, 2009

लेखकों का शोषण करते संपादक

चंद दिनों पहले की बात है , सुबह सुबह फोन की घंटी बजी । फोन उठाने पर आवाज आई कि मैं पुष्प बोल रहा हूं । चूंकि सोते- सोते फोन उठाया था इसलिए अनायास मुंह से निकला कौन पुष्प ? उलाहने भरे स्वर में पुष्प जी ने बताया कि वो ‘साहित्य केसरी’ के संपादक विनोद पुष्प बोल रहे हैं । तबतक मैं कुछ व्यवस्थित हो चुका था और उनके उलाहना भरे स्वर के बाद सचेत भी । इधर-उधर की बातचीत के बाद पुष्प जी कहा कि उनकी पत्रिका साहित्य केसरी के लिए मुझसे एक लेख चाहिए । मैंने छूटते ही पूछा कि लेख लिखने के कितने पैसे मिलेंगे । इतना सुनते ही पुष्प जी हत्थे से उखड़ गए और कहने लगे कि – “मेरी पत्रिका साहित्य केसरी एक आंदोलन है और मैं आपसे एक आंदोलन में भागीदारी चाहता हूं और आप हैं कि आंदोलन में भागीदारी के एवज में पैसे मांग रहे हैं । मैं पिछले पच्चीस वर्षों से अनियतकालीन पत्रिका निकाल रहा हूं और आजतक किसी ने आप जैसी बेशर्मी से लेख लिखने के पैसे नहीं मांगे । चूंकि पुष्प जी मेरे पैतृक शहर से हैं और वरिष्ठ साहित्यकार भी इसलिए मैं उनकी सुनता रहा और वो मुझे तमाम सिद्धांतों की घुट्टी पिलाने में जुटे रहे, मेरे जमीर, मेरी प्रतिबद्धता आदि आदि को झकझोरने की नाकाम कोशिश करते रहे । जब वो थोड़ा रुके तो मैंने उनसे पूछा कि आप पत्रिका निकालने के लिए जो कागज खरीदते हैं उसका भुगतान करते हैं ? क्या छपाई के लिए प्रेस वाले को पैसे देते हैं ? क्या पैकिंग और पोस्टिंग पर खर्च करते हैं ? जब इन सवालों के जबाव मुझे सकारात्मक मिले, तो फिर मैंने उनसे पूछा कि लेखकों को पैसा क्यों नहीं देते ? मेरे इस सवाल का उनके पास कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं था, जाहिर था उन्होंने फोन काट दिया । इस घटना ने मुझे विचलित कर दिया और मैं काफी देर तक इसपर विचार करता रहा कि कि क्या लेख लिखने के लिए पैसे मांगकर मैंने गलत किया । इस घटना ने मेरे सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था वो सवाल जो हिंदी लेखकों की अस्मिता से जुड़ा था । मैं काफी देर तक हिंदी में निकल रहे सैकड़ों साहित्यिक पत्रिका के बारे में सोचता रहा और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि लेखकों को मानदेय तो सिर्फ दो तीन पत्रिकाएं ही देती हैं ।
आज जब कि साहित्य में कोई भी व्यावसायिक पत्रिका नहीं बची है, लेकिन लघु पत्रिकाएं धड़ाधड़ निकल रही हैं, तो इसके पीछे के गणित पर विचार करना बी जरूरी है । साहित्यिक रुझानवाला और एक लेखक के रूप में स्थापित ना होने की कुंठा मन में संजोए लोगों के बीच संपादक बनने की होड़ सी लगी है । संपादक बनने का गणित है भी बेहद आसान । व्यक्तिगत संपर्कों और मित्रों की मदद से किसी तरह एक अंक निकालिए और बन जाइए संपादक । चूंकि साहित्यिक पत्रिकाएं अनियतकालीन होती है इसलिए यहां भूतपूर्व होने का खतरा भी नहीं है ।
लघु पत्रिकाओं के ज्यादातर संपादक आज आर्थिक तंगी का रोना रोकर लेखकों को पैसे नहीं देते लेकिन पत्रिकाओं के संपादकों के ठाठ में कोई कमी नहीं दिखाई देती है । इन साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के सरोकार भी बेहद संकुचित और व्यक्ति केंद्रित हो गए हैं । लेखकीय गरिमा या फिर साथी लेखकों की प्रतिष्ठा का उन्हें कोई ख्याल नहीं है । साथी लेखकों को ये साहित्यिक संपादक ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ समझते हैं । न तो उनकी मेहनत का ध्यान रखते हैं और ना ही उनके लेख लिखने के दौरान हुए खर्चे, मसलन- कागज, स्याही, कंप्यूटर, प्रिंटर- आदि का । संपादक नामक ये जीव अपने सहयोगी लेखकों को पहले तो इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं और जब उससे उनका स्वार्थ नहीं सधता तो फिर विचारधारा की धौंस देकर अपना काम निकालने की तिकड़म करते हैं ।
पत्रिका निकालने के साथ ये साहित्यिक संपादक एक और खेल खलते हैं । अब उनपर भी एक नजर डाल लेते हैं । आजकल आपको साहित्यिक पत्रिकाओं के मोटे-मोटे विशेषांक दिख जाएंगें – कोई समकालीन कविता पर, कोई उपन्यास पर , कोई कहानियों पर, कोई आलोचना की वर्तमान दशा-दिशा पर, तो कोई फिल्म पर तो कोई किसी लेखक विशेष पर केंद्रित होता है ।
दरअसल इन विशेषांको के पीछे भी धन कमाने की जुगत होती है । विशेषांक की योजना बनाते समय ही किसी प्रकाशक को इसका सहभागी बना लिया जाता है और उनसे तय हो जाता है कि पत्रिका प्रकाशन के कुछ दिनों बाद उसे पुस्तकाकार छाप दिया जाए । प्रकाशक तय होते ही किसी विषय विशेष पर पत्रिका का अंक प्रकाशित होता है । मोटी पत्रिका के प्रकाशन में आने वाला खर्च प्रकाशक वहन करते हैं । पत्रिका का मूल्य इतना अधिक होता है या रखा जाता है कि पाठक उसको कम से कम खरीदें । बची हुई पत्रिका को पहले से तय सौदे के आधार पर प्रकाशक हार्ड कवर में डालकर पुस्तक का रूप दे देते हैं । जिसे उंचे दामों पर थोक सरकारी खरीद में खपा दिया जाता है । बिक्री से जो रॉयल्टी मिलती है उसे संपादक खुद डकार जाता है और अगर लेखक किस्मतवाला हुआ तो उसे पुस्तक की एक प्रति मिल जाती है । इस प्रवृति के लाभ भी हैं लेकिन लेखकों को ईमानदारी से रायल्टी में हिस्सा तो मिलना ही चाहिए ।
इस खेल में छोटे मोटे संपादकों के अलावा कई नामचीन लेखक/ संपादक भी सक्रिय हैं और साथी लेखकों का जमकर शोषण कर रहे हैं । खुद तो पत्रिका के नाम पर ऐश करते हैं और साथी लेखकों को उनका वाजिब हक भी देना गंवारा नहीं । मेरे जानते ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो अपने लेखकों को एकन्नी भी नहीं देते उल्टे उनसे ये अपेक्षा रखते हैं कि कुछ विज्ञापन का जुगाड़ कर दें या फिर कुछ प्रतियां बेचने का इंतजाम करें ।
ये एक ऐसा सवाल है जिसपर पूरी लेखक बिरादरी को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । आज हिंदी के प्रकाशकों पर गाहे बगाहे लेखकों की रॉयल्टी हड़पने का आरोप लगता है । कुछ लेखक तो बकायदा लिखकर भी इसके खिलाफ अपनी आवाज उठा चुके हैं, कुछ विवाद मित्रों के बीचबचाव की वजह से सामने आने से रह जाते हैं । लेकिन मेरे जानते किसी ने भी साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के संपादकों द्वारा लेखकों के शोषण को विषय बनाकर इसे किसी भी मंच पर उठाने की कोशिश नहीं की है । संपादकों के इस छलात्कार का जोरदार विरोध लेखकों को हर उपलब्ध मंच पर करना चाहिए ताकि शोषण के खिलाफ अपनी रचनाओं में आवाज उठानेवाले खुद के शोषण को बेनकाब कर सके । अंत में मुझे वरिष्ठ साहित्यकार उपेन्द्र नाथ अश्क से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग याद आ रहा है । अश्क जी को एक बार एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक ने समीक्षा के लिए एक पुस्तक भिजवाई । पत्रिका के साथ लिखे पत्र में संपादक ने आग्रह किया कि पुस्तक प्राप्ति की सूचना दें । अश्क जी ने पुस्तक प्राप्ति की सूचना का जो पत्र लिखा वो कुछ यों था – प्रिय भाई समीक्षा के लिए आप द्वारा प्रेषित पुस्तक प्राप्त हुई, आभार । लेकिन पुस्तक के साथ यदि आप समीक्षा लेखन के मानदेय का चेक भी संलग्न कर देते तो मैं हुलसकर समीक्षा लिखता और उत्साह के साथ उसे आपको प्रेषित करता, सादर आपका, अश्क ।

Wednesday, April 29, 2009

ख़ामोश हो गयी वो आवाज

इकबाल बानो पर इकबाल रिजवी का लेख हाहाकार के लिए 

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विभाजन से पहले। रोहतक का गवर्मेंट गर्ल्स स्कूल। सब बच्चे पढ़ाई शुरू होने से पहले प्रार्थना गा रहे हैं " लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी "। पांचवीं क्लास में पढ़ने वाली इक़बाल बानो भी हाथ जोड़े आंखें बंद किये तल्लीनता से गा रही है। उसकी आवाज़ अपनी सहेलियों की आवाज़ से जुदा है यह एहसास उसकी सहेलियों को ही नहीं उसकी टीचरों को भी है।

इक़बाल बानो अपने पड़ोस के एक कायस्थ परिवार में बैठी गा रही है। इस परिवार की एक लड़की उसकी स्कूल की दोस्त है उसे संगीत सिखान ेके लिये रोज़ एक शिक्षक आते हैं। इक़बाल भी संगीत सीखना चाहती है लेकिन उसके पिता रूढ़िवादी विचारों के हैं उन्हें लड़कियों का गायकी के मैदान में आना गवारा नहीं यह बात नन्ही इक़बाल बानो जानती है इसलिये घर पर गायकी का शौक़ जाहिर नहीं करती। संगीत के प्रति उसके लगाव और उसकी बेहतरीन आवाज़ से प्रभावित उसकी सहेली के पिता अपने पड़ोसी इक़बाल बानो के पिता के पास जाते हैं और कहते हैं कि उनकी बेटी अच्छा गाती है लेकिन इक़बाल बानो को तो क़ुदरत ने बेहतरीन आवाज़ का तोहफ़ा दिया है अगर उसने मेहनत से रियाज़ कर लिया तो एक दिन वह बहुत मशहूर गायिका बनेगी। उनकी बात सुन कर इक़बाल बानो के पिता धर्म संकट में पढ़ जाते हैं उन्हें अपने खानदान की आलोचनाओं का डर हैं लेकिन बेटी की तारीफ़ के आगे आलोचनाओं का डर ख़त्म हो जाता है और वे इक़बाल बानो को संगीत सीखने की इज़ाज़त दे देते हैं।

हालात बदलेते हैं अब इक़बाला बानो का परिवार रोहतक से दिल्ली आ गया है। दिल्ली में इक़बाल बानो को दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खां साहब के पास भेजा जाता है। आवाज़ सुन कर उस्ताद भी क़ायल हो गए और उनकी कोशिशों से इक़बाल बानो के अंदर वह कलाकार आकार लेने लगा जिसकी आवाज़ को एक दिन लाखों प्रशंसकों की फ़ौज तैयार करनी थी। उस्ताद चांद खां की कोशिशों से ही इक़बाल बानो को पहली बार दिल्ली रेडियों से गाने का मौक़ा मिला। यह मौक़ा उनके लिये तब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

विभाजन के बाद रोहतक की गौहना तहसील के गांव हरसाना में इक़बाल बानो के परिवार की जायदाद पर लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया। खानदान के कई लोग पाकिस्तान जा चुके थे। इक़बाल बानो का परिवार भी पाकिस्तान चला गया। वे लोग मुलतान में बस गए। पड़ोस में ही पटियाला घराने के उस्ताद आशिक अली रहने के लिये पहुंचे । इक़बाल बानो का परिवार भले ही भारी परेशानियों के बीच सब कुछ दिल्ली और रोहतक में छोड़ कर मुलतान पहुंचा था लेकिन इक़बाल बानो की संगीत की तालीम जारी रखी गयी। वे उस्ताद आशिक अली से संगीत की तालीम लेने लगीं। 1952 में 17 साल की उम्र में इक़ाबल बानो की शादी पाकिस्तान के एक जदागीरदार से हो गयी। शादी से पहले ही उनके पति ने वादा किया कि वे इक़बाल बानो को कभी गाने से नहीं रोकेंगे और उन्होंने मरते दम तक अपना वादा निभाया।1980 में उनकी मृत्यु हो गयी।

इक़बाल बानो की आवाज़ सध चुकी थी। दादरा और ठुमरी गाने में उन्हें कमाल हासिल था साथ ही परंपरागत ग़ज़ल गायकी में भी वे परिपक्व होती जा रही थीं फिर भी उन्हें अपना हुनर दिखाने का मौक़ा नहीं मिल पा रहा था लेकिन उनकी आवाज़ की शोहरत ज़रूर फैल रही थी और एक दिन उनके पास रेडियों से बुलावा आया। वह 1955 का समय था। इक़बाल बानो रेडियो लाहौर बुलायी गयीं। उनकी गायी पहली ग़जल ही उनकी पहचान बन गयी। क़तील शिफ़ाई की लिखी हुई इस ग़ज़ल के बोल हैं

उल्फ़त की नई मंज़िल को चला है डाल के बाहें बाहों में
दिल तोड़ने वाले देख के चल हम भी तो पड़े हैं राहों में

वैसे तो बाद में इक़बाल बानो ने सैकड़ों ग़ज़लें, गीत , ठुमरियां दादरे, लोक गीत और सूफ़ियाना कलाम गाए लेकिन यह गज़ल उन्होंने सबस ेज़्यादा गयी , देश विदेश जहां भी गयीं इस ग़ज़ल की फ़रमाइश ज़रूर हुई। उनकी ग़ज़लों के ज़्यादातर कैसटों और रिकार्डों में उनकी यह ग़ज़ल ज़रूर शामिल की जाती थी।

बहरहाल इक़बाल बानो को अपना हुनर दिखाने के लिये एक मौक़े की तलाश थी और यह मौक़ा उन्हें रेडियो ने दे दिया। इसके बाद क़दम दर क़दम वो गायकी और शोहरत की बुलंदियां तय करती चली गयीं। रेडियो ने इक़बाल बानो को ऐसा प्लेटफ़ार्म दिया जिसके सहारे वो जनता के आम और ख़ास दोनो वर्गों तक पहुंचीं। जब 1957 में लाहौर आर्ट काउंसिल ने उनको पहली बार श्रोताओं से रूबरू कराने के लिये कार्यक्रम आयोजित किया तो पुलिस को भीड़ को क़ाबू में रखने के लिये भारी मशक्कत करनी पड़ी। लोगों को उनकी उम्मीद से ज़्यादा बेहतर ग़ज़लें सुनने को मिलीं और जिस आवाज़ में ग़ज़लें सुनी वो सबसे अलग और नयी थी।

फ़ैज़ की शायरी ने तो इकबाल बानो पर जादू कर दिया था। फ़ैज़ के कलाम को उन्होंने इतना डूब कर गाया कि उन्हें गायकी के मैदान में फ़ैज़ की ग़ज़लों के विशेषज्ञ गायक के रूप में पहचाना जाने लगा। फ़ैज़ के निधन के बाद 1985 में उनके जन्म दिन पर इक़बाल बानो ने लाहौर में फ़ैज़ की एक नज़्म " हम देखेंगे जब तख़्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे " गायी। वह सैनिक तानाशाह ज़ियाउल हक की सरकार के दिन थे और उन दिनो चार लोगों से अधिक के एक जगह इकट्ठा होने पर प्रतिबंध था लेकिन इक़बाल बानो को सुनने के लिये 50 हज़ार की भीड़ जमा हो गयी। यह एक नमूना था पाकिस्तान में फ़ैज़ की शायरी और इक़बाल बानो की गायकी के संगम का। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ से अक्सर मुशायरों में लोग फ़रमाइश कर देते कि इक़बाल बानो वाली ग़ज़लें सुनाईये। फ़ैज़ खुद स्वीकार करते थे कि आम लोगों में उनकी शायरी को लोकप्रियाता दिलाने में इक़बाल बानो का बहुत योगदान था।

फ़ैज के अलावा इक़बाल बानो ने क़तील शिफ़ाई, नासिर काज़मी, अहमद फ़राज और पुराने दौर के शायर ग़ालिब, दाग़ सौदा की ग़ज़लें भी गायीं। उनकी गाई हुई कुछ गज़लों के मिसरे बेहतरीन गायिकी की वजह से लोगों की ज़बान पर चढ़ गए।

पचास के दशक में पाकिस्तान की विकसित हुई फ़िल्म इंडस्ट्री में एक पार्श्व गायिका के तौर पर इक़बाल बानो को कई संगीतकारों ने जगह दी। गुमान, क़ातिल, इंतक़ाम, सरफ़रोश, इश्क--लैला और नागिन वो चुनीदा फ़िल्में हैं जो इक़बाल बानो की गायकी की वजह से भी याद की जाती हैं। लेकिन उनकी दिलचस्पी शास्त्रीय संगीत में ही रही। इसलिये जैसे जैसे पाकिस्तानी फ़िल्मी संगीत में सतहीपन आता गया इक़बाल बानो उससे विमुख होती गयीं और 1977 के बाद उन्होंने फ़िल्मों के लिये गाना बंद कर दिया।

उस समय तक पाकिस्तान में ग़ज़ल गायकी के मैदान में मेंहदी हसन सरताज गयाक के रूप में स्थापित हो चुके थे। ग़ुलाम अली और फ़रीदा ख़ानम ने भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था लेकिन ग़ज़ल में राग रागनियों की शुद्धता के साथ अदायगी के मामले में मेंहदी हसन के अलावा इक़बाल बानो का किसी से कोई मुक़ाबला नहीं था। अस्सी के दशक के बाद भारत और पाकिस्तान दोनो जगह उभरी आधुनिक ग़ज़ल गायकी को इक़बाल बानो ग़ज़ल गायकी के रूप में स्वीकार ही नहीं करती थीं। उनका मानना था ग़ज़ल को ऐसा बना दिया गया है कि जो चाहे वो गाने लगता है। कुछ दिनो में उसका कैसेट आजात है और वो ग़ज़ल गायक के तौर पर मशहूर हो जाता है लेकिन ग़ज़ल गाने के लिये रागों की जानकारी उनका कड़ा रियाज़ और ग़ज़ल का चयन सभी पहलुओं पर ध्यान देना पड़ता है। ग़ज़ल गायकों की नौजवान पीढ़ी को सुन कर ज़्यादातर मायूसी होती है।

इक़बाल बानो जितनी सहजता से वो उर्दू ग़ज़लें सुनाती थीं उतनी ही सहजता से फ़ारसी का कलाम भी। इस वजह से ग़ज़ल गायकी के सूरमाओं में इक़बाल बानो एक मात्र ऐसी गायिका थीं जिन्हें जितना उर्दू वालों ने सिर आंखों पर बैठाया उतना ही फ़ारसी जानने वालों ने भी भारत और पाकिस्तान के साथ साथ वे ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में भी आदर से याद की जाती थीं। 1979 से पहले तक अफ़गानिस्तान में हर साल आयोजित होने वाला जश्न--क़ाबुल में अफ़गानिस्तान के शाह ने इक़बाल बानो की मौजूदगी अनिवार्य बना दी थी। गायकी में रागों की शुद्धता पर कड़ा ध्यान रखने वाली इक़बाल बानो को कई संगीत आलोचक बेगम अख़्तर की गायकी के करीब मानते हैं। खुद इक़बाल बानो भी बेगम अख़तर से प्रभावित रहीं।

हांलाकि इक़बाल बानो दिल्ली में पली बढ़ीं लेकिन वे दूसरे पाकिस्तानी कलाकारों की तरह लगातार दिल्ली में गायकी के कार्यक्रमों में भाग लेने नहीं नहीं आ पाती थीं। 1980 से पहले पाकिस्तानी कलाकारों का भारत में आना कम ही हो पाता था। उसी दौर में इक़बाल बानो के पति का निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने ग़ज़ल गायकी के कार्यक्रम बहुत सीमित कर दिये। भारत में अधिकतर इक़बाल बानो निजी तौर पर ही आयीं। 1991 में वे दिल्ली आयीं। होली के दिन शाम को दक्षिणी दिल्ली के तत्कालीन पुलिस उपायुक्त असद फ़ारूक़ी के घर इक़बाल बानो के सम्मान में महफ़िल सजायी गयी। चार दिन को अपने उस दौरे पर इक़बाल बानो पुरानी दिल्ली के उन इलाकों में ख़ूब घूमीं जहां वे बचपन में जाया करती थीं। ख़ासकर चांदनी चौक में मिठाई की मशहूर दुकान घंटेवाले के यहां जहां बचपन में उनके एक नाना उन्हें मिठाई दिलाने ले जाते थे। 1996 में वे फिर दिल्ली आयीं इस बार एक निजी समारोह में ग़ज़ल सुनाने के लिये।
21 अप्रैल को गज़ल गायकी की ये महारानी इस दुनिया को छोड़ गयी। इकबाल बानो के दो बेटे हुमायूं ,अफ़ज़ल और एक बेटी मालिहा है। इसे उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पांच दशक तक गायकी की दुनिया में पाकिस्तान का नाम रोशन करने वाली इक़बाल बानो के जनाज़े में उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों के अलावा सिर्फ़ पाकिस्तानी लोक गायक शौकत अली ही शामिल हुए।