Translate

Thursday, October 29, 2009

संविधान को चुनौती

अभी कुछ दिनों पहले एक खबर पढ़कर चौंक गया । चित्तौड़गढ़ के वाणमाता में एक कुंवारी मां के दो साल के बच्चे के पिता का पता लगाने के लिए पंचायत बैठी । बगरिया समाज के इस पंचायत में युवती के मां बनने पर चली सुनवाई में ये सच सामने आई कि उसका जीजा ही उसके बच्चे का बाप है । युवक के इस सच को स्वीकारने के बाद पंचायत ने उसपर पंद्रह हजार का दंड लगाया और दो साल के बच्चे को उसे सौंप दिया । सवाल ये उठता है कि इस अपराध के लिए इतनी छोटी सी सजा माकूल है । लेकिन पंचायत का फैसला सर माथे पर लेते हुए लड़की ने अपने दो साल के बच्चे को उसके पिता को सौंप तो दिया लेकिन एक अनब्याही मां के दर्द को कौन समझेगा, जिसने ना केवल अपना कौमार्य गंवाया बल्कि जिंदगीभर समाज की जिल्लत झेलने को अभिशप्त हो गई । लेकिन पुरुष प्रधान समाज में महलाओं की फिक्र किसे हैं । ये सिर्फ चित्तौड़गढ़ की कहानी ही नहीं है बल्कि पंचायत का अलग कानून, राजस्था के अलावा, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदस्तूर जारी है ।
कुछ दिनों पहले बिजनौर में हुई एक पंचायत के बाद हुई रंजिश में बाप बेटी ने दो लोगों को गोलियों से भून दिया था । दरअसल उस पंचायत के बीच खड़े सत्तर साल के बाप और उसकी बाइस साल की बेटी के बीच नाजायज रिश्तों का आरोप लगा था । इससे पहले कि वो दोनों अपनी सफाई में कुछ कह पाते पंचायत ने फरमान सुना दिया कि दोनों सुधर जाएं नहीं तो गांव से निकाल दिया जाएगा... इस मसले को लेकर तीन बार पंचायत हुई लेकिन चौथी पंचायत में भी जब इनकी सफाई नहीं सुनी गई तो आजिज आ कर बाप बेटी पंचों को गोली मार दी । लेकिन ये दुस्साहस कम ही लोग कर पाते हैं ।
हरियाणा में तो प्रेमी जोडों पर बहुधा पंचायत का कहर मौत बन कर बरपती है । लेकिन वोट बैक की राजनीति में उलझे नेताओं को ना तो कानून की फिक्र है और ना ही संविधान की । जाति के आधार पर बनी पंचायतें खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाती रहती हैं और संविधान को चुनौती देती रहती हैं लेकिन कानून के रखवाले उनके आगे बेबस और लाचार नजर आते हैं । आजादी के साठ साल बाद भी पंचायतों का ये रुख आरतीय लोकतंत्र पर एक ऐसा घाव है जिसकी सर्जरी अगर जल्द नहीं की गई तो वो नासूर बनकर हमारे समाज को लहलुहान करता रहेगा ।

Monday, October 26, 2009

सितारों पर लगाओ लगाम

देश के दक्षिणी राज्यों में फिल्मी सितारों का अच्छा खासा प्रभाव है । जनता चाहती है तो जाहिर है राजनेता और राजनीतिक दलों के बीच भी उनकी धाक है । पिछले दिनों जब तमिल दैनिक दिनामलार के न्यूज एडीटर बी लेनिन को अखबार में छपी एक रिपोर्ट के आधार पर बगैर किसी रंट के पुलिस ने उनके दफ्तर से गिरफ्तार किया और रात में ही जज के घर पर पेश कर रिमांड पर लिया तो पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए । दरअसल दिनामलार में एक तमिल अभिनेत्री के सेक्स रैकेट में होने की खबर छापी गई थी । जिससे पूरा तमिल फिल्म उद्योग एकजुट होकर चेन्नई पुलिस कमिश्नर के दफ्तर के सामने धरने पर बैठे । तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने उक्त अभिनेत्री पर लगाए गए आरोपों को फिल्म फैटरनिटी पर लगा आरोप मानकर एकजुटता दिखाई । तमिल फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत भी धरने पर बैठे और मीडिया को जमकर नसीहत दी । लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन की इजाजत सबको है लेकिन जिस तरह से तमिल फिल्मी सितारों ने जहर उगला उसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है । दिनामलार के संपादक पर तो अखबार में छपी रिपोर्ट के आदार पर हैरेसमेंट ऑफ वूमन एक्ट लगा दिया गया लेकिन सरेआम लेनिन के परिवारवालों के खिलाफ जहर उगलने वाले फिल्मी सितारों पर कोई कार्रवाई करने की हिम्मत चेन्नई पुलिस नहीं जुटा पाई ।
जो विरोध प्रदर्शन हुआ उसमें तमिल सितारों ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी । श्रीप्रिया तो जोश में होश खो बैठी और दिनामलार अखबार के मालिकों के परिवार की औरतों के बारे में जमकर बुराभला कहा । विवेख ने तो यहां तक कह डाला कि अगर लेनिन की परिवार की औरतों की तस्वीरें उन्हें मिल जाए तो कंम्प्यूटर ग्राफिक्स के जरिए वो अश्लील तस्वीरो के उपर उनका चेहरा लगाकर पूरे राज्य में दीवारों पर चिपकवा देंगे । वो यहीम रुके और मीडिया को बगैर फिल्मों के सीन इस्तेमाल किए पत्रकारिता करने की चुनौती दे डाली । अब इस कॉमेडियन को कौन समझाए कि सितारों की लोकप्रियता मीडिया की बदौलत ही है । किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले उनके पब्लिक रिलेशन एजेंट किस कदर मीडिया का सामने गिड़गिड़ाते हैं ये बताने की जरूरत नहीं है ।
अभिनेता विजय कुमार ने तो सरेआम यहां तक कह डाला कि दिनामलार के उस रिपोर्ट को देखने के बाद उनका खून खौल उठा और वो अखबार के दफ्तर में घुसकर हंगामा करने की सोचने लगे थे । हो सकता है कि दिनामलार में छपी वो रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ियां हो और जनता के हित की कोई बात नहीं हो । इसके लिए पीड़ित पक्ष को अदालत की शरण लेनी चाहिए या फिर अखबार और पत्रकार के खिलाफ प्रेस काइंसिल जाना चाहिए था । लेकिन विरोध प्रदर्शन का ये कौन सा तरीका है जहां आप सरेआम गाली गलौच की भाषा इस्तामाल करते हैं । ये एक ऐसा तरीका है जिसको अपनाकर सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है और सरकार फिल्मी सितारों की लोकप्रियता का दबाव में बगैर सोचे समझे कानूनी कार्रवाई कर मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कर रही है ।
पिछले कुछ सालों से मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले लगातार बढ़े हैं । अगर हम गौर करें तो मीडिया संस्थानों, चाहे वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमले के कई वारदात हुए हैं । अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब एक अनाम से संगठन- हिंदू राष्ट्र सेना - के तीस चालीस गुंडे सरिए और हथौड़े से लैस मुंबई के एक टीवी न्यूज चैनल के दफ्तर में घुस गए और जमकर न केवल उत्पात मचाया बल्कि पत्रकारों के साथ मारपीट भी की । इतने पर भी जब उन गुंडों का गुस्सा ठंढा नहीं हुआ तो दफ्तर के फर्नीचर और नीचे पार्किंग में खड़ी गाड़ियां तक तोड़ डाली । इन लोगों के गुस्से की वजह बना उक्त न्यूज चैनल पर दिखाई गई एक खबर जिसमें एक मुस्लिम लड़के ने एक हिंदू लड़के से शादी कर ली थी और समाज के ठेकेदारों के डर से वहां आकर आत्मसमर्पण किया था । इस हमले की जब राष्ट्रीय स्तर पर घोर निंदा हुई तब जाकर सरकार हरकत में आई और अठारह लोगों की गिरफ्तारी हुई । बाद में पता चला कि हमला करने वाले इस अनाम से गैंग का मुखिया धनंजय देसाई था जिसके खिलाफ पहले ही चोरी के तेरह मामले दर्ज थे ।
उस वारदात के ठीक अगले ही दिन राजधानी दिल्ली में एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के रिपोर्टर से मारपीट की गई । दरअसल राजधानी के रोहिणी इलाके में एक डाक्टर को महिला मरीज के साथ छेड़छाड़ के आरोप में पकड़ा गया और जब रिपोर्टर मौके पर पहुंचकर तस्वीर लेने लगा तो ड़ाक्टर के समर्थकों ने वहां मौजूद मीडियाकर्मियों पर हमला कर दिया और उनके साथ मारपीट की । इन वारदातों से सकते में आई मीडिया अभी उबर भी नहीं पाया था कि सुदूर दक्षिण के शहर मदुरै से खबर आई कि कुछ उत्पाती लोगों ने तमिल दैनिक दिनाकरण के दफ्तर को फूंक डाला है । इस घटना में तीन लोगों की मौत भी हुई । आरोप लगा था तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के बड़े बेटे और अब केंद्रीय मंत्री अझागिरी के समर्थकों पर । गुस्से की वजह दिनाकरण में छपा एक सर्वे था, जिसमें जनता से ये सवाल पूछा गया था कि करुणानिधि के बाद डीएमके की बागडोर कौन संभालेगा । और अझागिरी के समर्थक इस बात से भड़क गए कि उनका नाम इस सर्वे में नीचे आया । उनका यही गुस्सा आगजनी और तीन लोगों की मौत की वजह बना । इस घृणित कृत्य के पीछे करुणानिधि के परिवार में चल रहा आपसी विवाद हो सकता है लेकिन खुलेआम तो एक मीडिया संस्थान को जला कर राख कर दिया गया, उसमें काम करने वाले तीन लोगों को जिंदा जला दिया गया था।
अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले और भी जगहों और और तरीकों से भी हो रहे हैं । अभी कुछ महीने पहले शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने सामना में लिखे अपने संपादकीय में शिवसैनिकों को हुक्म दिया था कि जेम्स लेन की किताब - शिवाजी, हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया- की प्रति जहां कहीं भी मिले इसे जला दिया जाए और शिवसैनिकों के लिए तो बाला साहब का हुक्म पत्थर की लकीर होता है । गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस किताब पर लगाए प्रतिबंध को हटा दिया था । इसक पहले संभाजी ब्रिगेड के लोगों ने जनवरी दो हजार चार में पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में घुसकर ऐतिहासिक महत्व के कई दस्तावेजों को नष्ट करने के अलावा संस्थान में तोड़ फोड़ भी किया था । संभाजी ब्रिगेड का गुस्सा इस बात को लेकर था कि जेम्स लेन की शिवाजी पर लिखी किताब में शोध में सहयोग देने के लिए लेखक ने इस संस्थान का आभार प्रकट किया था । संभाजी ब्रिगेड और हिंदू राष्ट्र सेना जैसे अनाम संगठनों को बाल ठाकरे के इस तरह के उकसाने वाले संपादकीय से बल मिलता है और वो मीडिया पर हमला करने का दुस्साहस कर पाते हैं ।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद उन्नीस में अन्य बातों के अलावा संघ के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता( राइट टू फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन एंड स्पीच) का अधिकार प्रदान करता है । लेकिन साथ ही संविधान अभिव्यक्ति की इस हद तक स्वतंत्रता प्रदान करता है जबतक कि वो दूसरों की आजादी का हनन न करे । लोग, यहां तक कि सरकारें भी इसी की आड़ में अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का यत्न करती है । जिसे बाद में अदालत बहुधा गैरजरूरी करार देती है । लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना गया है और वर्षों के अपने लंबे संघर्ष के बाद मीडिया ने अपना एक मुकाम हासिल किया है और लोकतंत्र के सजह प्रहरी के रूप में अपने को स्थापित भी किया है । लेकिन अपनी आलोचनाओं से नाराज होकर लोग कानून खुद हाथ में लेने लगे हैं या अपने समर्थों को उकसाने लगे हैं और मीडिया संगठनों को डराने धमकाने की कोशिश शुरु हो जाती है ।
अब वक्त आ गया है कि मीडिया को खुद पर हो रहे हमलों के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए और संगठित होकर अपनी आवाज उठानी चाहिए । दिनामलार के न्यूज एडिटर पर हुए पुलिसिया जुर्म के खिलाफ सिर्फ कुछ पत्रकार संगठनों ने बयीन जारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली लेकिन पत्रकारों को तमिलनाडु के फिल्मी सितारों से एक जुटता का सबक लेना चाहिए और सरकार पर सख्त कानून बनाने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए ।

Friday, October 16, 2009

बंद करो किताबों की सरकारी खरीद

इस वर्ष के साहित्य के नोबेल पुरस्कार का ऐलान हुआ और रोमानिया में पैदा हुई जर्मन लेखिका हेर्ता म्यूलर को ये सम्मान मिला तो उनके लेखन के बारे में जानने की इच्छा हुई । काम से वक्त निकालकर दिल्ली और आसपास के पुस्तकों की दुकानों की खाक छानी लेकिन हेर्ता म्यूलर की कोई किताब कहीं नहीं मिल पाई । तकरीबन हर जगह पुस्तक विक्रेताओं ने कहा कि कुछ दिनों में पुस्तक उपलब्ध हो पाएगी । निराश होकर वापस लौट आया लेकिन कुछ सवाल बेहद परेशान करनेवाले रहे और लगातार मुंह बाए मेरे सामने खड़े हैं । पहला तो ये कि हमारे समाज में किताबों को लेकर ये उपेक्षा भाव क्यों है । उपेक्षा भाव मैं इसलिए कह रहा हूं कि राजधानी दिल्ली, जिसे दूर दराज के साहित्यप्रेमी और लेखक साहित्य की भी राजधानी कहते हैं, में भी किताबों की दुकान ढूंढने में आपको श्रम करना पड़ेगा । ढूंढे से किताब नहीं मिल पाएगी । कोई भी ऐसी दुकान नहीं जहां आप इस विश्वास के साथ जा सकें कि आपकी मनपसंद किताब आपको मिल जाएगी । अगर हम पुस्तकों की उपलब्धता की बात करें तो दिल्ली और आसपास के शहरों के हालात बेहद निराशाजनक हैं । पूरी दिल्ली में किताबों की दुकानें उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं और आपको उनतक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ेगी । अगर आप तमाम संघर्षों के बाद किताबों की दुकान तक पहुंच भी जाते हैं तो आपको अंग्रेजी कि किताबें तो मिल जाएंगी लेकिन हिंदी की किताबें नहीं मिल पाएंगी । हिंदी की किताबों के लिए आपको प्रकाशकों से संपर्क करना पड़ेगा या फिर दिल्ली के दरियागंज इलाके की खाक छाननी होगी । दरियागंज का आलम ये है कि आप अगर वहां अपनी कार से चले गए तो कार अक्षत वापस नहीं आ सकती, उसपर खरोंच लगना तय है । साथ ही गाड़ी पार्क करने में आपको इतनी मशक्कत करनी पड़ेगी कि आपके किताब पढ़ने का भूत सर से उतर जाएगा । ये हाल सिर्फ पुस्तकों को लेकर ही नहीं है , पत्र- पत्रिकाएं भी सहज सुलभ उपलब्ध नहीं हैं ।
सवाल ये उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है । क्या पूरा हिंदी समाज इसके लिए जिम्मेदार है या फिर प्रकाशकों को पाठकों की फिक्र ही ही नहीं है । दरअसल मुझे लगता है कि इसके लिए प्रकाशकों के साथ- साथ वामपंथी विचारधारा के लेखकों और प्रकाशकों पर उनका प्रभाव जिम्मेदार है । ना तो लेखक और ना ही प्रकाशक किताबों को प्रोडक्ट की तरह समझकर व्यवहार करते हैं । प्रोडक्ट नाम सुनते ही वामपंथी लेखक ऐसे भड़कते हैं जैसे लगता है कि किसी सांढ को लाल कपड़ा दिखा दिया गया हो । प्रोडक्ट शब्द से उनको बाजारवाद और पूंजीवाद की बू आने लगती है और वो इसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं । उन्हें लगता है कि अगर पुस्तकों को प्रोडक्ट की श्रेणी में रख दिया जाएगा तो उनका श्रम व्यर्थ चला जाएगा, उनकी मेहनत पर पूंजीवाद और बाजारवाद पानी फेर देगा । लेकिन प्रोडक्ट वही तो होता है जिसपर मेहनत की जाती है, जिसके उत्पादन पर पैसा खर्च किया जाता है और उससे कुछ लाभ की अपेक्षा की जाए । लेखक भी कई महीनों तक किसी कृति पर मेहनत करते हैं और फिर प्रकाशक उसे किताब की शक्ल देने में उसपर पैसे खर्च करता है और लाभ की अपेक्षा लेखक और प्रकाशक दोनों को होती है। तो मानव श्रम, पैसा और लाभ की आंकाक्षा तीनों चीजें हैं तो फिर प्रोडक्ट मानने में हर्ज क्या है । अगर प्रोडक्ट को बाजार नहीं मिलेगा तो ना केवल मानव श्रम व्यर्थ जाएगा बल्कि जिस लक्ष्य और उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी खास विषय पर लिखा गया है वो जाया चला जाएगा । लेखकों की रचनाओं से ये अपेक्षा होती है कि वो समाज में बदलाव लाएगी लेकिन अगर रचनाएं टार्गेट ग्रुप तक पहुंच ही नहीं पाएंगी तो ना तो समाज में बदलाव आ पाएगा और ना ही किसी विचार का प्रसार हो पाएगा ।
दूसी बात ये कि अगर हम पुस्तकों को एक उत्पाद मानने लगेंगे तो प्रकाशकों के साथ साथ लेखकों का भी भला होगा । अभी हालात ये है कि रॉयल्टी को लेकर हर लेखक के मन में मलाल होता है । हिंदी के लेखकों के इस मलाल से ये तो साबित हो ही जाता है कि उनको अपनी किताब से लाभ की अपेक्षा है । आपने श्रम किया, आपको लाभ की आकांक्षा है और प्रकाशक का पैसा लगा तो फिर किताब को उत्पाद मानने में दिक्कत क्या है ।
दूसरी अहम बात है कि प्रकाशकों की रुचि भी सरकारी थोक खरीद में ज्यादा होती है और पाठकों तक पहुंचाने में होनेवाले मेहनत और खर्चे से वह बचना चाहता है । प्रकाशकों के लिए प्रकाशन व्यवसाय किसी भी दूसरे अन्य कारोबार की तरह ही है जहां उसका उद्देश्य कम खर्चे में ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना है । और अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वो प्रयास भी करता रहता है, करना भी चाहिए । प्रकाशकों को लगता है कि सरकारी खरीद में अफसरों को रिश्वत देकर अगरी अपनी किताबें बेच दी तो बल्ले –बल्ले । हर्रे लगे ना फिटकरी रंग चोखा होए । कई प्रकाशक मेरे मित्र हैं, उनसे जब भी बात होती है तो उनकी चिंता सिर्फ सरकारी थोक खरीद को लेकर रहती है । फुटकर बिक्री में उनकी रुचि बेहद कम होती है , जब भी उनसे बात करो तो पाठकों की कमी का रोना रोकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं । लेकिन ये बात बार-बार उठती रही है और हर बार गलत भी साबित होती रही है कि हिंदी में पाछक नहीं हैं । आज हिंदी का विसाल पाठकों का बड़ा बाजार है जिसपर कब्जे की होड़ दिखाई दे रही है । लेकिन हिंदी के प्रकाशक इसको या तो समझ नहीं पा रहे हैं या फिर जानबूझकर समझना नहीं चाहते ।
तीसरी अहम बात है कि लेखक भी प्रकाशक पर ये दबाव बना पाने की स्थिति में नहीं हैं कि उनके किताबों के प्रचार प्रसार के लिए काम किया जाए । ये किसी व्यक्तिगत प्रयास से संभव नहीं है । क्योंकि आज हिंदी के लेखक इस हैसियत में नहीं हैं कि वो प्रकाशकों पर दबाव बना सकें । जो दो तीन लेखक इस हैसियत में हैं उनपर प्रकाशक इतने मेहरबान होते हैं कि वो अपने साथी लेखकों के हितों के लिए उठनेवाली आवाज का समर्थन नहीं कर सकते । उल्टे प्रयासपूर्वक मामले को सुलझाने के नाम पर प्रकाशकों की तरफदारी करने लग जाते हैं । लेखक संगठन लगभग मृतप्राय है जिनकी भूमिका कुछ रह नहीं गई है । लेखकों की शोकसभा और एकाध रचाना पाठ आयोजित करने के अलावा संगठन कुछ कर नहीं पाते हैं ।
तो ऐसे में सावल ये उठता है कि हम जैसे पाठकों का क्या होगा, क्या किसी खास किताब को पढ़ने की हमारी लालसा मन में दबी रह जाएगी । या फिर इस समस्या का हल भी सरकार को ही करना पड़ेगा । मुझे तो लगता है कि पुस्तकों की सरकारी थोक खरीद बंद कर देनी चाहिए और प्रकाशकों और लेखकों को पाठकों के रहमोकरम पर छोड़ देना चाहिए तभी प्रकाशक पाठकों तक पहुंचने की कोशिश करेंगे और हिंदी समाज में पुस्तक संस्कृति बन पाएगी ।

Friday, October 9, 2009

धुंधली छवि का विशेषांक

साहित्य संस्कृति और कला का समग्र मासिक होने का दावा करनेवाली मासिक पत्रिका कथादेश ने अगस्त में मीडिया पर केंद्रित भारी भरकम विशेषांक निकाला । इस अंक का संपादन पूर्व पत्रकार और अब शिक्षक अनिल चमड़िया ने किया है । अनिल चमड़िया पिछले कई सालों से कथादेश में इलेक्ट्रानिक मीडिया पर स्तंभ लिखते रहे हैं और यदा कदा उसके संपादकों के नाम खुला पत्र लिककर इस माध्यम को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते रहे हैं । कथादेश के मीडिया विशेषांक में भी अनिल ने मीडिया के पतन पर अपनी गहरी चिंता जताई है । मीडिया के अधोपतन पर अतिथि संपादक इतने विचलित हो गए कि आखिरकार उनकी भी चिंता की सुई टीआरपी पर आकर टिक गई । टीवी पत्रकारों पर लिखते हुए चमड़िया ने लिखा- “पूंजीवाद ने उनके बीच कई हिस्से तैयार कर दिए. एक हिस्सा वह है जो चांदी काट रहा है . मीडिया मालिकों की तरह राजसभा (संभवत : वो राज्यसभा लिखना चाह रहे हों ) में रंगरेलियां मना रहा है । इनकी रंगरेलियों का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि ये चंद वर्षों में सैकड़ों करोड़ों डालर के मालिक बन गए । चैनल चला रहे हैं और उसी तरह से चला रहे हैं जैसे रुपर्ट मर्डोक और दूसरे साम्राज्यवाद समर्थक चैनल चलते हैं । जो चैनल मालिक नहीं बन पाया वह जिस तरह चैनल चल रहे हैं उनके उसी तरह चलने की बेशर्मी से वकालत करता है । टीआरपी वो कह अपने कुकर्मों का सुरक्षा कवच बनाता है और ये नहीं बताता है कि टीआरपी क्या है । टीआरपी खास तरह की विचारों को थोपने और अपनी मौलिकता को भुला देने वाला सांगठिक हथियार है । यह सांस्कृतिक वर्चस्व को बढावा देने के उद्देश्य से तैयार हुआ है । इसमें पूंजी किसी संस्थान की नहीं बल्कि पूंजीवादी विचारधारा की लगी हुई है । इसके वर्चस्ववादी सांस्कृतिक हथियार होने का प्रमाण तब मिलेगा जब टीआरपी के ढांचे के रहस्य को खाला जाए ।“
यहां अनिल चमडिया ने टीआरपी की बेहद मनोरंजक और मौलिक व्याख्या की है - टीआरपी खास तरह की विचारों को थोपने और अपनी मौलिकता को भुला देने वाला सांगठिक हथियार है- लेकिन अपने इस फतवा के समर्थन में उन्होंने कोई उदाहरण या तर्क प्रस्तुत नहीं किया है । अपनी इस प्रस्थापना को पूंजीवाद, बाजारवाद. संकट का समय, संगठन जैसे शब्दों की चाशनी में डुबोकर पाठकों पर अपनी विद्वता का परचम लहरा दिया है । टीआरपी को बगैर जाने समझे उसे गाली देने का फैशन बन गया है और अनिल उस फैशन के शिकार हो गए हैं । ऐसा नहीं है कि अनिल चमड़िया ने सिर्फ न्यूज चैनलों की आलोचना की है । इन्होंने समानभाव से अखबारों के गिरते स्तर पर भी अपनी चिंता जताते हुए पत्रकारों को कोसा है । अनिल इस बात का खतरा भी उठाते हुए चलते हैं कि उनके आलोचक उनपर एक ऐसे संत का ठप्पा लगा सकते हैं कि जो गांधी आश्रम में बैठकर पत्रकारिता में व्याप्त भ्रष्टाचार और गंदगी को अपनी लेखनी से साफ करना चाहता है । लेकिन मैं उनके आलोचकों को ये कहना चाहता हूं कि संत तो संत होता है जो सिर्फ प्रेरित कर सकता है पहल नहीं ।
अनिल चूंकि इस अंक के संपादक हैं इसलिए रचनाओं पर भी उनके विचारों की छाप साफ दिखाई देती है । कई लेखक टीआरपी को लेकर रंडी रोना करते हुए दिखाई दे रहे हैं । सिर्फ उमेश चतुर्वेदी ने अपने लेख में टीआरपी को समझने और समझाने की कोशिश की है । उमेश ने टीआरपी की तथाकथित गुत्थी को खोला है । श्रमपूर्वक लिखे गए इस लेख से टीआरपी की कई भ्रांतियां दूर होती है ।
इस अंक में लेखों की भरमार है । यहां वहां जहां तहां से लेखों को इकट्ठा कर, अनुवाद कर प्रकाशित कर दिया गया है । वरिष्ठ टीवी पत्रकार अजीत अंजुम का पिछले साल पत्रकारिता संस्थान में दिए गए एक भाषण को छाप दिया गया है । भाषण देने की शैली और लिखने की शैली बिल्कुल अलग होती है । अजीत अंजुम के भाषण को लगता है, जस का तस छाप दिया गया है । यहीं पर संपादक का दायित्व बनता है कि वो भाषण को लेख के रूप में संपादित कर दे । लेकिन ये नहीं हुआ और साल भर पुराना भाषण छपा । जब अजीत अंजुम की बात चली तो बरबस जनवरी 2007 में उनके संपादन में हंस के मीडिया विशेषांक की याद आ गई । हंस का वह अंक भी लगभग ढाई सौ पृष्ठों का था । हंस का वह अंक संपादन कौशल का बेहतरीन नमूना था । चिंताएं वहां भी थी लेकिन उन चिंताओं का जबाव भी था । राजदीप सरदेसाई, कमर वहीद नकवी, उदय शंकर के विचार इन चिंताओं से टकरा रहे थे । न्यूज चैनलों को लेकर जो कहानियां छपी थीं वो वहां काम करनेवालों पत्रकारों के दर्द और प्रेम की प्रतिनिधि कहानियां थी । मेरे जानते मीडिया पर हंस का वो अंक अबतक का सबसे अच्छा अंक है जिसका एप्रोच एकदम फोकस्ड है ।
कथादेश के इस अंक में एक गुमनाम लेख छपा है जिसमें स्टार न्यूज के संपादक शाजी जमां पर बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं । इस लेख के बारे में संपादक ने कहा है कि – इंटरनेट के जरिए स्टार न्यूज के न्यूजरूम में घूमता एक पत्र हमारे हाथ लगा है । और विद्वान और पत्रकारिता में शुचिता की बात करनेवाले संपादक अनिल चमड़िया ने इंटरनेट पर घूमते एक गुमनाम खत को मीडिया विशेषांक में छापकर मान्यता प्रदान कर दी । लेख के पहले अवश्य एक टिप्पणी संपादक की ओर से है लेकिन ये लेख बेहद घटिया और स्तरहीन है जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है । स्टार न्यूज के संपादक शाजी जमां पत्रकार के साथ-साथ एक संवेदनशील लेखक भी है । इनके लिखे को पढने के बाद कथादेश में छपे इस लेख को पढ़कर ये लगता है कि कोई व्यक्ति शाजी को बदनाम करने की मंशा से ऐसा कर रहा है और कथादेश जाने अनजाने बदनाम करने की उस मुहिम में उसका साथ देता नजर आ रहा है ।
कुल मिलाकर अगर कथादेश के मीडिया विशेषांक पर समग्रता में विचार करें तो ये बेहद हल्का और उथला है । ढाई सौ पृष्ठों का ये भारी भरकम विशेषांक डी फोकस्ड लगता है जिसमें से कोई साफ तस्वीर सामने नहीं आती है । इस अंक की पहली रचना पंकज श्रीवास्तव की है – मी लॉर्ड ! आप समझ रहे हैं ना । इसमें पंकज ने मुन्नाभाई औरह गांधी की शैली में अपने अनुभवों को बेहद रोचक शैली में पेश किया है । इसे इस अंक की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है ।

Saturday, October 3, 2009

हंस के पन्नों पर जिन का चमत्कार

जनचेतना का प्रगतिशील मासिक हंस ने जब युवा रचनाशीलता पर पर अंक केंद्रित करने का एलान किया था तो पाठकों के साथ-साथ लेखकों में इस अंक को लेकर खासी उत्सुकता थी । हंस संपादक राजेन्द्र यादव ने युवा रचनाशीलता पर केंद्रित अंक के संपादन की जिम्मेदारी युवा दलित लेखक और हंस खेमे के खास सिपहसालार अजय नावरिया को सौंपा । संपाद सौंपने के निर्णय के बारे में राजेन्द्र यादव ने अपने संपादकीय में लिखा- बात तब सूझी जब समय नहीं रह गया था. सहसा अजय नावरिया में अलादीन का वह चिराग दिखाई दिया, जिसे घिसकर जिन पैदा किया जा सकात है । जिन पैदा हुआ और उसके कुछ पूछने से पहले उसे चमत्कार करने का काम सौंप दिया गया - महीने भर में हंस का युवा रचनाशीलता पर केंद्रित अंक तैयार हो जाना चाहिए । य़ादव जी को अपने जिन पर भरोसा था कि वो चमत्कार कर देगा । अतिथि संपादक के रूप में प्रकट हुए यादव जी के जिन ने चमत्का किया भी और महीने भर में ही इतनी सामग्री जमा कर दी कि वो एक अंक में नहीं समा पाया और उसे दो अंकों में समेटना पड़ा । सामग्री इकट्ठा करना और स्तरीय सामग्री जुटाना दो अलग अलग बातें हैं जिसपर हम आगे विचार करेंगे ।

राजेन्द्र यादव को भले ही लगता हो कि अजय नावरिया ने अपने संपादकीय में सौंदर्यशास्त्र को नए ढंग से परिभाषित करने की कोशिश की है लेकिन सिर्फ चैबर्स डिक्शनरी में से एसथेटिक्स का मतलब ढूंढ निकालना ही सौंदर्यशास्त्र को नए सिरे से परिभाषित करना नहीं है । इसके अलावा सौंदर्य़शाश्त्रपर अजय ने अपने संपादकीय में कोई नई बात नहीं की है । कहीं संस्कृत के श्लोकों और कहीं मार्क्स को आधार बनाकर सौंदर्यशास्त्र पर टिप्पणी करते चलते हैं । अंतत: वो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि - मानव सभ्यता का विकास जरूरत के टुच्चे सिद्धांत के चलते नहीं बल्कि सौंदर्यबोधात्मक चेतना के कारण हुआ है । राजेन्द्र यादव को यह निष्कर्ष नया लग सकता है लेकिन मैं यह फैसला पाठकों के विवेक पर छोड़ता हूं कि वो इस बात को परखें कि इसमें नया क्या है ।

अब बात दोनों अंकों में प्रकाशित कहानियों की । युवा रचनाशीलता पर केंद्रित इस अंक की पहली कहानी पत्रकार गीताश्री की है । प्रार्थना से बाहर नाम की यह कहानी संभवत: गीताश्री की पहली प्रकाशित कहानी है । गीताश्री की यह कहानी बेहद शानदार और पठनीय है । सचमुच में ये युवा रचनाशीलता की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है । इसमें युवावस्था के दौर हर पहलू, हर भटकाव, हर विचलन पर विचार किया गया है । जब किसी छोटे शहर की लड़की राजधानी पहुंचती है तो वहां की चमक दमक और तेज रफ्तार जिंदगी उसे अपने आगोश में लेने को बेचैन होती है । इस बेचैनी में जब लड़की की महात्वाकांक्षा शामिल होती है तो कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसकी कल्पना उसने अपने शहर से चलते वक्त तक नहीं की थी । इस कहानी में गीताश्री ने युवाओं के इस मानसिक कॉकटेल को बेहद शिद्दत से उभारा है । लेकिन एक जगह कहानीकार से चूक हो गई है वो ये कि उसने एक उपन्यास की बेहद शानदार थीम को सस्ते में निपटा दिया । धैर्य और श्रमपूर्वक अगर इस विषय पर उपन्यास लिखा जाए और छोटे शहर की लड़कियों के संघर्ष को सूक्ष्मता से विश्लेषित किया जाए तो एक बेहतर कृति सामने आ सकती है । गीताश्री की भाषा में रवानगी है, अनुभव भी है बस जरूरत है धैर्य की । इसके अलावा अश्विनी पंकज की कहानी पेनाल्टी कॉर्नर भी उल्लेखनीय है ।

पहले अंक में यतीन्द्र मिश्र की कविता फैज को पढ़ते हुए में हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सियात पर तल्ख टिप्पणी है । कवि जब कहता है - आज भी कि फैज होते/जितने कि वो हैं अभी भी/ अपनी नज्मों की तरक्कीपसंद आवाजाही में/उम्मीद की तरह सुलगे हुए । यतीन्द्र मिश्र ने कम उम्र में ही कविता की प्रौढता को हासिल कर लिया है । इसके अलावा आकांक्षा पारे की दो छोटी कविताएं भी उल्लेखनीय हैं । आठ कहानियों और कुछ कविताओं के अलावा इस अंक में लेखों की भरमार है । अपने नजरिए में नामवर सिंह और मैनेजर पांडे ने ई भी नई बात नहीं कही है, क्योंकि कोई नई बात पूछी ही नहीं गई है । घिसे पिटे प्रश्नों के रटे-रटाए जबाव । इस अंक में अल्पना मिश्र की कहानी पुष्पक विमान अच्छी है ।

नयी नजर का नया नजरिए के दूसरे अंक में राजेन्द्र यादव का संपादकीय बेहद सुलझा हुआ और आक्रामक भी है । आमतौर पर हंस का संपादकीय बौद्धिकता के के बोझ तले दबा होता है, लेकिन इस बार राजेन्द्र यादव के हमलावर तेवर ने बौद्धिकता को परे रख दिया है । नामवर सिंह पर हमला करते हुए यादव जी लिखते हैं - अपने युवाकाल में यही नामवर थे जो अपनी मेधा और तेजस्विता से सुननेवालों को झकझोर डालते थे । प्लेइंग टु द गैलरी की मानसिकता ने उन्हें कहां का ला छोड़ा है ? इधर उन्होंने यह सोचना भी छोड़ दिया है कि विमोचन वो अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का कर रहे हैं या वरवर राव की ... सत्ता वंदना के साथ थोड़ी बहुत क्रांति भी होती रहे तो क्या मुज़ायका । संकेत हाल ही में नामवर द्वारा भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवंत सिंह की किताब के विमोचन करने की ओर है ।

कहानियों के अलावा दूसेर अंक में भी एक परिचर्चा है जिसमें लेखक, पत्रकार, प्रकाशक आदि के विचारों को प्रमुखता दी गई है । नयी नजर का नया नजरिया होने का दावा करनेवाला हंस का दोनों अंक बेहद सामान्य और साधारण अंक है । इसमें युवा रचनाशीलता की झलकभर दिखाई देती है । राजेन्द्र यादव के जिन ने चमत्कार तो किया लेकिन ये चमत्कार रचनाओं को जुटाने भर तक और परिचर्चाओं को आयोजित करने तक ही सीमित रह गया । समय की कमी और महीने भर में अंक निकालने की हड़बड़ी भी साफतौर पर दिखती है । किन इतने कम समय में इतनी ढेर सारी रचनाएं जुटाने के लिए अजय की तारीफ तो करनी ही पड़ेगी ।

Monday, September 7, 2009

दो जन्मदिन, दो अहसास

पिछले हफ्ते साहित्य से जुड़ी दो हस्तियों के जन्मदिन के अवसर पर जाना हुआ । दिल्ली के ऑफिसर्स क्लब में हंस संपादक राजेन्द्र यादव का जन्मदिन समारोह मनाया गया गया जिसमें साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े सौ से ज्यादा लोग मौजूद थे । राजेन्द्र यादव के जन्म दिन समारोह का एक बेहद दिलचस्प निमंत्रण पत्र मिला था जो उनकी बेटी रचना यादव ने भेजा था । रचना ने लिखा था- 28 अगस्त को राजेन्द्र यादव यानि मेरे पापू अस्सी वर्ष पूरे कर रहे हैं । उन्हें इस बात का एहसास दिलाने के लिए मुझे आपका सहयोग चाहिए । मुझे बहुत खुशी होगी यदि पापा के खास दोस्त होने के नाते आप मेरे निमंत्रण को स्वीकार करें । चाहे प्रशंसा करते हुए आएं या भर्त्सना लेकिन आएं जरूर । बेहद सुरुचिपूर्ण कागज और हाथ से लिखा था ये पत्र । जाहिर था वहां जाना ही था । वहां पहुंचा तो महफिल सज चुकी थी और रसरंजन का दौर जारी था । कई साहित्यकार अपनी रौ में आ चुके थे । इस बीच यादव जी के मित्र डॉ रमेश सक्सेना ने एक पगड़ी निकाली और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जी के हाथ में थमा दिया । प्रभाष जी ने राजेन्द्र यादव को पगड़ी पहनाई और उनका पांव छू कर कहा कि आप महान हैं । इसके बाद कवि अजीत कुमार ने राजन्द्र जी के साथ के अपने पुराने संस्मरणों को याद करते हुए कि कहा कि जब हम पतिदेव हुआ करते थे उस वक्त राजेन्द्र विपत्तिदेव थे । अजीत कुमार ने बेहद संक्षिप्त लेकिन उतना ही दिलचस्प संस्मरण राजेन्द्र यादव के बारे में सुनाया । राजेन्द्र यादव का जन्मदिन दिल्ली के साहित्यिक हलके में एक सालाना उत्सव की तरह होता है और राजेन्द्र जी से जुड़े लोग बगैर निमंत्रण के भी वहां जुटते हैं और इस बहाने लोगों की एक दूसरे से मुलाकातें और बातें होती है । कई समीकरण बनते बिगड़ते हैं । इस बार कई नए चेहरे भी देखने को मिले । उनसे बात करने पर पता चला कि वो उत्सुकतावश इस जन्मदिन समारोह में आ गए । वो देखना चाहते थे कि राजेन्द्र यादव का जन्मदिन कैसे मनाया जाता है । पत्रकारिता की एक प्रशिक्षु छात्रा से जब मैंने पूछा कि तुम यहां कैसे तो उसका जबाव सुनकर मैं हैरान रह गया । उसने कहा कि वो वर्तिका नंदा और उदय सहाय की किताब के विमोचन समारोह में पहुंची थी । विमोचन के पहले जब चाय-पान चल रहा था तो कुछ साहित्यकार आपस में यादव जी के जन्मदिन के बारे में बात कर रहे थे वहीं उसे पता चला कि ऑफिसर्स क्लब में हंस संपादक का जन्मदिन समारोह मनाया जा रहा है । जिज्ञासावश, बगैर निमंत्रण के यहां पहुंची उस लड़की से जब मैंने पूछा कि तुम्हें यहां आकर कैसा लगा तो उसका जबाव और भी हैरान करनेवाला था । उसने कहा कि जिनकी कहानियां और लेख पढ़कर मैं बड़ी हुई उन्हें नजदीक से देखना सुखद तो लगा लेकिन कुछ लोगों को जब मैंने शराब से सराबोर होश खोते देखा तो मेरा विश्वास दरक गया । जब मैं ये सुन रहा था तो मृदुला गर्ग के नए उपन्यास मिलजुल मन का एक प्रसंग याद आ रहा था जहां लेखिका ने लिखा है - हिंदी के लेखक शराब पीकर फूहड़ मजाक से आगे नहीं बढ़ पाते । मैं सोचा करती थी, लिक्खाड़ हैं,सोचविचार करनेवाले दानिशमंद । पश्चिम के अदीबों की मानिंद, पी कर गहरी बातें क्यों नहीं करते, अदब की, मिसाइल की, इंसानी सरोकार की । अब समझी वहां दावतों में अपनी शराब खुद खरीदने का रिवाज क्यों है । न मुफ्त की पियो और न सहने की ताकत से आगे जाकर उड़ाओ । अपने यहां मुफ्त की पीते हैं और तब तक चढ़ाते हैं जबतक अंदर बैठा फूहर मर्द बाहर ना निकल आए । दूसरा जन्मदिन था बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन का । ये एक बेहद ही निजी अवसर था जहां कुल जमा छह लोग मौजूद थे । जब रात के तकरीबन ग्यारह बजे मैं तसलीमा के घर पहुंचा तो उनका ड्राइंग रूम गुब्बारों और फ्रिल्स से सजा हुआ था, केक काटा जा चुका था और वहां मौजूद दो तीन लोग खाना खा रहे थे । मैंने घुसते ही उन्हें विश किया तो वो वेहद गर्मजोशी से मिली और तुरत ही खाना खाने का अनुरोध कर डाला । तस्लीमा ने खुद से कई वेज और नॉनवेज डिशेज तैयार की थी । इसमें हिलसा मछली और पॉमप्रेट बेहद स्वादिष्ट था । तस्लीमा मछली के अलावा चिकेन और मूंग दाल खिलाने पर ज्यादा जोर दे रही थी । खाना बेहद स्वादिष्ट बना था । तस्लीमा वहां मौजूद अपने दोस्तों को पूछ-पूछकर खाना खिला रही थी । दो ढाई घंटे तक रुक रुक कर खाना चलता रहा और साहित्य संसकडति पर बता होती रही । उनकी रचनाओं और नया क्या लिख रही हैं इसपर लंबी बात हुई । पूरे दक्षिण एशिया में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा हुई । वहीं मौजूद एक पत्रकार मित्र ने तस्लीमा की रचनाओं का हिंदी में पाठ कर माहौल को गमगीन बना दिया । तस्लीमा की कविताओं का भी पाठ हुआ । अपनी रचनाओं को सुनते हुए तस्लीमा सिगरेट पर सिगरेट फूंकती जा रही थी । लग रहा था कि निर्वासन झेल रही ये बहादुर लेखिका कुछ छुपाना चाह रही है । जाहिर तौर पर निर्वासन का दर्द । रचनाओं के पाठ के बाद जब बातचीत शुरू हुई तब भी तस्लीमा के चेहरे पर कई बार गम और दुख की छाया आती जाती रही लेकिन कभी भी गम और दर्द की वजह को अपने लब पर नहीं आने दिया । बातों का सिलसिला इस कदर चल रहा था किसी को भी उठने का मन नहीं कर रहा था । नीचे बैठा मेरा ड्राइवर लगातार मुझे एसएमएस भेज रहा था कि चलो । आखिरकार लगभग एक बजे मैंने ही पहल कर इस गंभीर चर्चा को विराम लगवाया । और रात लगभग एक बजे हमलोग वहां से निकले । अगले दिन तस्लीमा को विदेश जाना था । एक बार फिर हैप्पी बर्थ डे बोलेत हुए हमने उनसे विदा ली और जब मैं उनके मकान से बाहर निकल रहा था तो ये सोच रहा था कि आखिरकार कब तक तस्लीमा कैदियों जौसी जिंदगी बिताएंगी । कबतक अभिव्यक्ति की आजादी की कीमत उसे अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखकर चुकानी पड़ेगी ।

Tuesday, August 18, 2009

टीआरपी के लिए सबका सामना

क्या आपके मन में कभी अपने पति की हत्या का ख्याल आया ? टीवी प्रस्तोता के इस सवाल के जबाव में जब दो बच्चों की मां हां कहती है तो दर्शकों के साथ साथ उसके पति और सास को भी झटका लगता है । या फिर जब राखी सावंत कहती है कि मैंने काम पाने के लिए सबकुछ किया पर वह नहीं किया, यहां तक कि मैंने छोटे कपड़े भी पहने या फिर जब सलमान खान अपने शो में ये सवाल पूछते हैं कि कितने प्रतिशत भारतीय जोड़े सुहागरात को यौन संबंध नहीं बनाते हैं या फिर टीवी प्रस्तोता उर्वशी ढोलकिया से पूछता है कि क्या कम उम्र में गर्भवती होने की वजह से आपको कॉलेज से निकाल दिया गया ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो टीवी पर पूछे जा रहे हैं जो बारतीय समाज की परंपरा और वर्जनाओं को छिन्न भिन्न करते हैं और दर्शकों को शॉक देते हैं जिसकी वजह से वो टीवी चैनलों से चिपके रहने को मजबूर हो जाते हैं । इन सवालों और रियलिटी के नाम पर हाल के दिनों में मनोरंजन चैनलों पर जो दिखाया जा रहा है उसेन समाज में एक जबरदस्त बहस छेड़ दी है । हम अगर मनोरंजन चैनलों पर विचार करें तो पाते हैं कि हाल के दिनों में इस तरह के सवालों से भरपूर कार्यकर्मों की बाढ़ सी आ गई है । अगर हम शीर्ष के पांच चैनलों की बात करें तो हर जगह अपने अपने तरीके का अनोखा रियलिटी शो या तो चल रहा है या फिर अभी-अभी खत्म हुआ जिससे जुड़ी जिज्ञासा अब भी दर्शकों के मन में है । लगभग आठ सालों से मनोरंजन चैनलों के बीच नंबर वन की कुर्सी पर काबिज स्टार प्लस की बादशाहत को नए नवेले चैनल कलर्स ने ना केवल चुनौती दी बल्कि उसकी बादशाहत को खत्म कर नंबर वन की कुर्सी पर काबिज भी हो गया । चैनल ने शुरू से ही बिग बॉस और खतरों के खिलाड़ी जैसे शानदार रियलिटी शो पेश कर दर्शकों को अपनी ओर खींचा और दनादन एक से बढ़कर एक शानदार कार्यक्रम पेश कर भारतीय मनोरंजन बाजार की दिशा ही बदल दी ।
इसके शो बालिका वधू ने मनोरंजन चैनलों से सास बहू के आठ साल के रुदन काल को खत्म कर दिया । घर घर की तुलसी का स्थान जगदीश और आनंदी के चटपटे किस्सों ने ले लिया । अपनी कुर्सी हिलती देख स्टर प्लस ने अमेरिका के बेहद लोकप्रिय शो – द मोमेंट ऑफ ट्रूथ के हिंदी संस्करण, ‘सच का सामना’ लॉंच कर दर्शको और मीडिया विशेषज्ञों के साथ संसद को भी हिला दिया । स्टार प्लस पर दिखाए जानेवाले इस शो में पूछे जाने वाले सवालों को लेकर जोरदार बहस शुरू हो गई । ये बहस मीडिया और इंटरनेट के सोशल नेटवर्किंग साइट से होती हुई संसद तक पहुंच गई और समाजवादी पार्टी से सांसद ने राज्यसभा में इस शो में पूछे जानेवाले सवालों को भारतीय सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ करार दिया । हंगामा बढ़ता देखकर सूचना प्रसारण मंत्री ने चैनल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया । लेकिन इस हल्ला गुल्ला का फायदा इस शो को हुआ और ये अपने टाइस स्लॉट में नंबर वन बन गया ।
इस तरह के रियलिटी शो का सहारा मनोरंजन चैनलों की दौड़ में लगातार पिछड़ रहे एनडीटीवी इमेजिन को भी मिला और उसने आइटम गर्ल राखी सावंत का स्वयंवर करवा कर अपनी लोकप्रियता में खासा इजाफा किया । टीआरपी इतनी बढ़ी कि उसने सोनी को पीछे धकेल दिया और नंबर चार पर काबिज हो गया । इस शो की लोकप्रियता से उत्साहित होकर इस चैनल ने अब राहुल महाजन के लिए आदर्श पत्नी तलाशने के कार्यक्रम बनाने की योजना बना ली है । अपनी हालत पतली होती देख सोनी टीवी ने भी छोटे मोटे सेलिब्रिटीज को लेकर एक नया रियलिटी शो शुरू कर दिया- इस जंगल से मुझे बचाओ । इस शो की शूटिंग मलेशिया के जंगलों में हुई और इसकी शूटिंग के लिए तेरह देशों से लगभग तीन सौ तकनीशियनों की टीम लगातार काम कर रही है । इस शो में नायिकाएं कम कपड़ों में जंगल में झरनों के नीचे नहाते दिखी साथ ही कुछ ऐसे संवाद भी सुनने को मिले जो दर्शकों के झटका देने वाले थे । सोनी के इस शो को भी सवा तीन की टीआरपी मिली जो नीचे गिरते चैनल के लिए सुकून देनेवाली है ।
शाम के वक्त मनोरंजन चैनलों पर जो मारकाट मची है दरअसल वो टीआरपी हासिल करने की होड़ है। लेकिन ये टीआरपी आखिर क्या बला है , क्या है टीआरपी का तिलिस्म जिसकी चाहत ने मनोरंजन चैनलों को इस कदर दीवाना बना दिया है कि वो एक के बाद एक रिएलिटी शो की भरमार कर रहे हैं। हर बहस मुहाबिसे में टीआरपी का जिक्र जरूर आता है। लेकिन कोई ये बताने को तैयार नहीं है कि आखिर टीआरपी किस चिड़िया का नाम है और ये क्यों इतना अहम है । टीआरपी दरअसल टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट है जिसे टैम ( टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट ) नाम की संस्था हर हफ्ते जारी करती है । ये रेटिंग हर कार्यक्रम की होती है और टाइमबैंड के हिसाब से जारी की जाती है । मसलन रात दस बजे कौन सा चैनल सबसे ज्यादा देखा गया । इस रेटिंग में पूरे हफ्ते की औसत रेटिंग तो होती ही है साथ ही हर दिन की अलग अलग टाइम बैंड की भी रेटिंग दी जाती है । रेटिंग के अलावा ये संस्था किसी भी चैनल के दर्शकों के बीच उसकी पहुंच (रीच) को भी बताती है कि अमुक कार्यक्रम या अमुक चैनल की पहुंच कितने भारतीय घरों में है ।
अब दूसरा सवाल ये उठता है कि इस रेटिंग की जरूरत क्या है और ये इतना अहम क्यों है । ये अहम इसलिए है कि इसके आधार पर ही चैनलों को मिलनेवाले विज्ञापन और उसकी दर तय होती है । भारतीय टेलीविज़न बाजार लगभग चौबीस हजार करोड़ रुपये का है, इसमें विज्ञापन से होनी वाली आय और ग्राहकों से मिलनेवाली सब्सक्रिप्शन फीस भी शामिल है और इंडस्ट्री पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि मंदी के बावजूद अगले पांच साल में ये चालीस हजार करोड़ को पार कर जाएगी । देश के लगभग साढे सात करोड़ घरों में केबल कनेक्शन है और अगले पांच साल में इसके दस करोड़ के पार पहुंच जाने का अनुमान है । दरअसल इन घरों में टीवी चैनलों के कार्यक्रमों की पहुंच और उसकी लोकप्रियता को मापने का औजार टीआरपी ही है ।
लेकिन टैम जो रेटिंग जारी करती है वो कितना विश्वसनीय हैं, इन आंकड़ों का आधार क्या है और इनकी गणना कैसे की जाती है और इस गणना के लिए सैंपल साइज कितना है । रेटिंग जारी करनेवाली एजेंसी टैम का दावा है कि देशभर में रेटिंग दर्ज करनेवाले आठ हजार बक्से लगे हैं और रिसर्च करनेवालों की एक पूरी टीम हफ्ते भर इसपर काम करती है, उसके बाद ही रेटिंग जारी की जाती है । रेटिंग पर नजर रखनेवालों का ये भी कहना है कि भारत में टीआरपी की जो व्यवस्था है वो विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था है । किसी भी और देश में रेटिंग को रिकॉर्ड करने के लिए इतने बक्से नहीं लगे हैं, जितने भारत में । लेकिन यहां सवाल ये खड़ा हो जाता है कि क्या आठ हजार बक्सों के आधार पर देशभर में किसी कार्यक्रम की लोकप्रियता को आंका जा सकता है और अगर आंका जा सकता है तो वो कितना प्रामाणिक है । देश में टीआरपी की ये व्यवस्था उसी तरह की है जैसे कि चुनाव पू्र्व सर्वेक्षण होते है । चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में दस बीस हजार के सैंपल साइज को आधार बनाकर देशभर के प्रमुख दलों को मिलने वाली सीटों की भविष्यवाणी कर दी जाती है और उसका हश्र सबके सामने है कि हर चुनाव में ये सर्वे औंधे मुहं गिरते हैं और गलत साबित होते हैं । दरअसल ये पूरी की पूरी धारणा पश्चिम के देशों से आयात की गई है जहां कि जनसंख्या बेहद कम होती है और पूरे देश की संसकृति लगभग एक जैसी होती है । पश्चिम से आयातित इस तरह के फॉर्मूलों को भारत में लागू करने से बहुधा गड़बड़ियां होती है । भारत विविधताओं का देश है, जहां हर कोस पर बोली बदल जाती है और हर प्रांत और सूबे की अपनी एक संस्कृति और पसंद है । यहां ये दावा नहीं किया जा सकता है कि हिंदी भाषी राज्यों में लोगों की पसंद में भी समानता हो सकती है । जो चीज बिहार के लोगों को पसंद हो वो मध्य प्रदेश या फिर हरियाणा के लोगों को पसंद आ जाए ये जरूरी नहीं है । तो ऐसे में टेलीविजन रेटिंग का ये फंडा दोषपूर्ण लगता है । अखबारों की प्रसार संख्या जानने के लिए जो संस्था ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन है उसमें ऑडिटरों की टीम हर अखबार के रिकॉर्ड की जांच करती है जिसमें डिस्पैच और भुगतान की भी जांच की जाती है । लेकिन टैम के बक्से कहां लगे हैं ये रहस्य है और टैम का कहना है कि रेटिंग की पवित्रता को बचाए रखने के लिए ये जरूरी है ।
लेकिन विडंबना ये है कि इस संस्था के द्वारा दिए गए रेटिंग के आधार पर ही हजारों करोड़ रुपये का विज्ञापन तय होता है और रेटिंग में अव्वल स्थान हासिल करनेवाले कार्यक्रमों में दस सेकेंड के विज्ञापन के लिए एक लाख से सवा लाख रुपये तक का रेट है । टैम के विकल्प के रूम में ए-मैप नाम की एक संस्था खड़ी करने की कोशिश की गई लेकिन उसे अबतक विज्ञापन दाताओं से मान्यता नहीं मिल पाई है ।
टीआरपी सिस्टम की एक और विडंबना पर नजर डालते चलते हैं । कुछ महीनों पहले तक हिंदी मार्केट की रेटिंग में बिहार और छत्तीसगढ़ की कोई अहमियत ही नहीं थी । इन राज्यों के लोगों की पसंद नापसंद के बगैर ही हिंदी मार्केट में खबरिया चैनलों का शेयर तय होता था । हिंदी न्यूज चैनल को हिंदी मार्केट पर कब्जा जमाने के लिए गुजरात और महाराष्ट्र के अखाड़े में लड़ाई लड़नी होती थी । कई सालों के बाद अब बिहार और छत्तीसगढ़ के दर्शकों की पसंद को अहमियत दी गई और बताते हैं कि अब इन दोनों सूबे में न्यूज चैनलों की लोकप्रियका मापने के लिए टैम ने बक्से लगा दिए हैं । तो जिस टीआरपी के लिए मनोरंजन चैनल समाज की वर्जनाओं और देश की परंपराओं को छिन्न भिन्न कर रहे हैं उसका आधार ही दोषपूर्ण है और आठ दस हजार लोगों की पसंद के आधार पर सवा करोड़ हिंदी दर्शकों की पसंद के आधार पर करोड़ों रुपये के विज्ञापन तय होते हैं । और इस विज्ञापन के अर्थशास्त्र में सबसे ज्यादा हिस्सा झटकने या हासिल करने के लिए मची होड़ में कभी कभी सीमाओं का अतिक्रमण भी हो जाता है ।

Sunday, August 9, 2009

हिंदी अकादमी में संग्राम

दिल्ली की हिंदी अकादमी इन दिनों खासी चर्चा में है । जब से हास्य कवि और जामिया के पूर्व प्रोफेसर अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया है तब से ये बवाल खड़ा करने की कोशिश की जा रही है । पहले अकादमी की संचालन समिति की कई वर्षों से सदस्या रही और दिल्ली विश्विद्यालय की एक कॉलेज में हिंदी की शिक्षिका अर्चना वर्मा ने इस्तीफा दे दिया । इस्तीफे की वजह उन्होंने गिनाई कि एक विदूषक को अकादमी का उपाध्यक्ष बना दिया गया है और वो उनके रहते अकादमी में काम नहीं कर सकती । इसके बाद अकादमी के सात-आठ महीने पहले ही सचिन नियुक्त किए गए डॉ ज्योतिष जोशी ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया और कमोबेश वही वजहें गिनाईं जो अर्चना वर्मा ने गिनाई थी । बात यहीं नहीं रुकी । इसके बाद अकादमी से संबद्ध और वरिष्ठ आलोचक नित्यानंद तिवारी ने भी ये कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि अकादमी में स्थितियां ठीक नहीं और ऐसे में उनका अकादमी से जुड़े रहना उचित नहीं है । तिवारी जी ने सीधे-सीधे अशोक चक्रधर पर तो निशाना नहीं साधा लेकिन इशारा उधर ही था । दरअसल तिवारी जी के व्यक्तित्व में ये सब है भी नहीं । अशोक चक्रधर की नियुक्ति से खिन्न साहित्यकारोंम ने अकादमी में हुए इन इस्तीफों को खूब प्रचारित भी करवाया, मीडिया में दोनों पक्षों की बातें जमकर आई । लेकिन इन इस्तीफों के पीछे की कहानी कुछ और ही है । कुछ लोगों की व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा तो कुछ लोगों का अपना अहम इस बवाल के पीछे है जिसे नैतिकता या यों कहें कि गंभीर साहित्य और अगंभीर साहित्य का जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है । अशोक चक्रधर से पहले अकादमी के उपाध्यक्ष हिंदी के बेहद अहम साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के बेटे मुकुंद द्विवेदी थे । साहित्य को उनका क्या योगदान है ये अबतक सामने तो नहीं आया है लेकिन वो लंबे समय तक अकादमी के उपाध्यक्ष रहे और अर्चना वर्मा और नित्यानंद तिवारी दोनों किसी ना किसी रूप में अकादमी से जुड़े रहे । उन वर्षों में किसी को साहित्य की याद नहीं आई क्योंकि मुकुंद जी शरीफ आदमी थे और इनमें से किसी की योजना में अड़ंगा नहीं लगाते थे । इसलिए उनका काल निर्विवाद चलता रहा । मुंकुद द्विवेदी के पहले जर्नादन द्विवेदी अकादमी के उपाध्यक्ष हुआ करते थे या तो उनका कद या फिर कांग्रेस के मजबूत नेता होने की वजह से किसी ने भी कभी भी उनके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई । जनार्दन द्विवेदी का भी साहित्यक लिखा-पढ़ा अभी सामने आना शेष है । तो उस वक्त जब कोई आवाज नहीं उठाई गई तो अब अचानक से क्या हो गया कि एक भूतपू्र्व प्रोफसर को अकादमी का उपाध्यक्ष नियुक्त करने पर बखेड़ा खड़ा किया जा रहा है । नित्यानंद तिवारी ने ये बयान दिया कि ज्योतिष के कार्यकाल में हिंदी अकादमी में जितना काम हुआ उतना पहले कभी नहीं हुआ । नित्यानंद तिवारी जी मेरे गुरू रह चुके हैं, मैं उनकी पूरी इज्जत करता हूं लेकिन गुरूजी से ये सवाल पूछने का मन तो करता ही है कि ज्योतिष के पहले अगर अकादमी में काम नहीं हो रहा था तो आपने उन वर्षों में आवाज क्यों नहीं उठाई । तब क्यों चुपचाप अकादमी की संचालन समिति में बने रहे । हिंदी अकादमी को वर्षों से जाननेवाले लोगों का कहना है कि इस विवाद के पीछे वो है ही नहीं जो मीडिया में प्रचारित प्रासरित किया करवाया जा रहा है । इस विवाद के पीछे दरअसल एक दूसरी कहानी है । अकादमी से जुडे़ सूत्रों का कहना है कि इस विवाद की जड़ में कॉमनवेल्थ गेम्स के वक्त विश्व कविता सम्मेलन के प्रस्ताव को दिल्ली सरकार द्वारा ठुकराया जाना है । अब पूरी कहानी सुनिए दिल्ली की मुख्यमंत्री को कॉमनवेल्थ गेम्स के वक्त राजधानी में विश्व कविता सम्मेलन करवाने का मौखिक प्रस्ताव दिया गया जो उन्होंने भी मौखिक रूप से स्वीकार कर लिया । कहा ये गया कि हिंदी अकादमी ये कार्यक्रम आयोजित करवाएगी और इसपर तकरीबन ढाई करोड़ रुपये खर्च आएंगे । नए-नए सचिव बने और पहला प्रशासनिक दायित्व संभाल रहे ज्योतिष जोशी ने बगैर लिखा-पढ़ी में दिल्ली सरकार की स्वीकृति लिए इस आयोजन के लिए एक कमिटी का गठन कर दिया, जिसके सदस्य कवि कुंवर नारायण, कवि-लेखक अशोक वाजपेयी और हिंदी अकादमी से ही जुड़े प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी के अलावा दो और लोग बना दिए गए । कार्यक्रम का अप्रूवल अभी सरकार से आया नहीं लेकिन भाई लोग ललित कला अकादमी में बैठकर इस कार्यक्रम की रूपरेखा और विश्व कवि सम्मेलन में निमंत्रित किए जाने वाले कवियों के नाम पर मगजमारी में जुट गए । एक-दो नहीं कई बैठकें हो गई । अब बैठकें हो रही हैं तो सदस्यों को यात्रा भत्ता तो दिया ही जाएगा । कमिटी के सदस्यों को यात्रा भत्ता के मद में लगभग पचास रुपये खर्च कर दिए गए । आरोप तो ये भी है कि स्थानीय सदस्यों को अकादमी की नियत राशि से ज्यादा के यात्रा भत्ता का भुगतान किया गया । ये सबकुछ चल ही रहा था कि एक साथ दो घटनाएं घटी । एक तो दिल्ली सरकार ने विश्व कविता सम्मेलन के प्रस्ताव को साफ-साफ मना कर दिया और जो ढ़ाई करोड़ रुपये का बजट दिया गया था उसे भी मना कर दिया गया । दूसरे अशोक चक्रधर हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष बना दिए गए । इन दो घटनाओं के बाद हिंदी अकादमी में हड़कंप मच गया । सवाल ये खड़ा हो गया कि राज्य सरकार ने जिस कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति दी नहीं वैसे कार्यक्रम के लिए आयोजन समिति का गठन कैसे हो गया । आयोजन समिति का गठन हो भी गया तो उसकी बैठकें कैसे होने लगी और यात्रा का भुगतान किस मद से किया करवाया गया । बेचारे नए नवेले सचिव यहीं गच्चा खा गए । ऐसा प्रतीत होता है कि उनके सलाहकारों ने उन्हें गलत सलाह देकर फंसा दिया । दूसरे अकादमी को पर्दे के पीछे से चलानेवाले कर्ताधर्ताओं को ये अंदाज नहीं था कि अशोक चक्रधर की नियुक्ति हो जाएगी । उन्हें लग रहा था कि उनके ही खेमे का कोई साहित्यकार इस गद्दी को सुशोभित करेगा । लेकिन ये हो ना सका । जब ये हो ना सका तो फिर इन सबसे से बचने के लिए नैतिकता का ताना बाना बुना गया । और इस बात पर साहित्यकार बिरादरी में कनफुसकी शुरू करवाई गई कि एक विदूषक या फिर मंचीय कवि को अकादमी का उपाध्यक्ष बना दिया गया जो एक पवित्र संस्था को डुबो देगा । लेकिन जब सरकार की तरफ से हर साल दिए जाने वाले पुरस्कारों की संख्या में कटौती का प्रस्ताव आया तो सभी ने इसे स्वीकार कर लिया । किसी ने भी जरा भी विरोध नहीं किया । गौरतलब है कि हिंदी अकादमी हर साल कृति और साहित्यकार सम्मान के नाम पर हर साल लगभग दो दर्जन पुरस्कार देकर लेखकों को सम्मानित करती रही है और इसी बहाने किताबों की खरीद हो जाती थी जो बाद में अकादमी अपने कार्यक्रमों के बहाने बंटवा देती थी और इस तरह प्रचार प्रसार होता था । उधर अशोक चक्रधर ने खुद मोर्चा संभाला और अखबारों में बयान देने लगे । पिछले दिनों एक राष्ट्रीय दैनिक को दिए एक साक्षात्कार में अशोक चक्रधर ने ये स्वीकार किया कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए चुनाव पूर्व कैंपेन के लिए गाने लिखे । ये कहकर वो सत्ताधारी दल से अपनी नजदीकी का एहसास साहित्यकारों को करवा कर उन्हें दबाव में लेना चाहते हैं । अच्छा होता अगर वो ये बातें अपने साक्षात्कार में नहीं कहते । लेकिन अब सवाल ये खड़ा हो गया है कि राजधानी में सक्रिय इस अकादमी का भविष्य क्या होगा । सचिव ज्योतिष जोशी के इस्तीफे के बाद अकादमी का कामकाज ठप है । गतिविधियों पर विराम सा लग गया है । साहित्यकारों के आपसी झगड़े ने एक अच्छे भले संस्था का भट्ठा बैठा दिया । और अब इस बात की संभावना प्रबल हो गई है कि इस संस्था पर अफसरों का कब्जा हो जाए और राजधानी की इस अकादमी का हश्र भी अन्य सूबे के अकादमियों जैसा हो जाए और अफसरों की ऐशगाह बन जाए ।

Saturday, July 25, 2009

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?

हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं । विवाद की जड़ में है - पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथो पहला 'नरेन्द्र स्मृति सम्मान' लेना । जबसे ये खबर छपी है पूरे साहित्य जगत में उदय की जमकर आलोचना शुरू हो गई । उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं । लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुधंला होकर भगवा हो गया है । दरअसल उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है । परिस्थितियों के अनुसार उदय अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं और एक रणनीति के तहत उसपर अमल भी करते हैं ।
अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही है तो उदय प्रकाश ने अपने कहानी संग्रह- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था, जिसमें नामवर भी थे और काशीनाथ सिंह भी और नंदकिशोर नवल भी थे और भारत भारद्वाज भी । जाहिर तौर पर ये एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश थी । बाद में जब शिवनारायण सिंह संस्कृति मंत्रालय में थे तो उनको भी अपना एक कविता संग्रह समर्पित कर दिया । संयोगवश उसी वक्त उदय को मंत्रालय की फैलोशिप भी मिली । इसके अलावा उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुडे़ रहे हैं, ये वो वक्त था जब अशोक वाजपेयी मध्य प्रदेश में साहित्य और संस्कृति के कर्ताधर्ता हुआ करते थे । लेकिन जब किसी वजह से वो पूर्वग्रह से बाहर हुए तो अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को 'भारत भवन के अल्सेशियंस' तक कह डाला था । उसके बाद से अशोक और उदय साहित्य के दो अलग-अलग छोर पर रहे । लेकिन वाजपेयी के पिछले जन्मदिन पर उदय ने जिस अंदाज में वाजपेयी को शुभाकमनाएं अर्पित की उसके बाद दोनों के बीच जमी बर्फ पिघली और बताते हैं कि एक मुलाकात के बाद उदय को लखटकिया वैद सम्मान मिला । ये हैं उदय की प्राथमिकता और प्रतिबद्धता ।
बीजेपी सांसद और कट्टर हिंदुत्ववाद के स्वयंभू मसीहा योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मान ग्रहण करने के बाद जब उदय पर चौतरफा हमले शुरू हुए तो अपने बचाव में उन्होंने बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया - एक नियोजित तरीके से मुझ पर आक्रमण करके बदनाम करने की घृणित जातिवादी राजनीति की जा रही है.....दरअसल इस हिंदू जातिवादी समाज में विचारधाराओं से लेकर राजनीति और साहित्य का जैसा छद्म और चतुर खेल खेला गया है, उसके हम सब शिकार हैं । मेरे परिवार में यह सच है कि कि कोई भी एक सदस्य ऐसा नहीं है ( इनमें मेरी पत्नी, बच्ची, बहू और पोता तक शामिल हैं और मेरे मित्र तथा पाठक भी ) जो किसी एक धर्म, क्षेत्र, जाति, नस्ल आदि से जुडे़ हों । लेकिन हिंदी साहित्य और ब्लॉगिंग में सक्रिय सवर्ण हिंदू उसी कट्टर वर्णाश्रम -व्यवस्थावदी माइंडसेट से प्रभावित पूर्व आधुनिक सामंती, अनपढ़ और घटिया लोग हैं -जिनके भीतर जैन, बौद्ध, नाथ, सिद्ध, ईसाइयत, दलित, इस्लाम आदि तमाम आस्थाओं और आइडेंटिटीज़ के प्रति घृणा और द्वेष है इसे वे भरसक ऊपर-ऊपर छिपाए रखने की चतुराई करते रहते हैं । मैंने जीवनभर इनका दंश और जहर झेला है और अभी भी झेल रहा हूं ।' अपनी लंबी सफाई के आखिर में धमकाने के अंदाज में सवर्ण लुटेरों के साम्राज्य को ध्वस्त करने का दावा भी करते हैं । उदय पर पहले भी जब-जब उनकी व्यक्तिवादी कहानियों को लेकर उंगली उठी थी तो किसी को मथुरा का पंडा, तो किसी को घनघोर अनपढ़ घोषित किया तो किसी को अफसर होकर साहित्य की दुनिया में अनाधिकार प्रवेश के लिए लताड़ा ।

इसके पहले जब वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो अच्छा खास विवाद खड़ा हो गया था । उस वक्त भी सफाई देते हुए उदय प्रकाश ने कहा था कि- दरअसल ऐसा है कि दिल्ली में गृह मंत्री के भ्रष्ट अधिकारियों का एक क्लब है जो नाइट पार्टी का आयोजन करता है । इसमें शराब पी जाती है और अश्लील चर्चा होती है । जो इसमें शामिल नहीं होता है, ये लोग उसपर हमला करते हैं । ये साहित्येतर लोग हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध तो करते हैं मगर गली-मोहल्ले के मवालियों के साथ बैठकर शराब पीते हैं ।' तो उदय प्रकाश की जब भी आलोचना होती है तो वो बिफर जाते हैं । रविभूषण ने जब इनकी कहानी पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था ।
लेकिन बीजेपी सांसद के हाथों सम्मानित होकर इस बार उदय बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं । उदय की सफाई के बाद हिंदी के दो दर्जन से ज्यादा महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने अपने हस्ताक्षर से एक बयान जारी कर उदय की भर्त्सना की । बयान जारी करनेवालों में प्रमुख नाम हैं- ज्ञानरंजन, विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बार रब्बी, मदन कश्यप, देवीप्रसाद मिश्र आदि । चौतरफा घिरता देख उदय प्रकाश ने एक बार फिर से अपने ब्लॉग पर एक सफाई लिखी लेकिन ये सफाई कम धमकी ज्यादा है । इसके बाद उदय प्रकाश की ओर से व्लॉग चलानेवाले पत्रकार अविनाश ने मोर्चा संभला और जनसत्ता में 'और अंत में घृणा' के नाम से एक लेख लिखकर उदय की दलीलों को आगे बढा़या । उदय के समर्थन में उतरे अविनाश के तर्क भी उतने ही लचर हैं जितने उनके अंतरराष्ट्रय ख्याति के प्रिय रचनाकार की । तर्क पर गौर फरमाइये- जिन नरेन्द्र जी की स्मृति में उदय प्रकाश को योगी ने सम्मानित किया, वे नरेन्द्र जी उदय प्रकाश के फुफेरे भाई थे । दोनों में तीन दशकों की वैचारिक दूरी थी, जो हर मुलाकात में बहसों की शक्ल लेकर परिवारवालों का जीना दूभर करती रही थी । एक बरस पहले कुंवर नरेन्द्र की मृत्यु के बाद की शोकाकुल स्थियों में उदय प्रकाश उपस्थित नहीं हो सके । लेकिन पहली बरसी पर वो गए । इस बरसी में वे भी मौजूद थे, जो कुंवर साहब की जीवन की छटाओं में बिखरे थे । योगी भी इसलिए आए । लेकिन उस वक्त उदय प्रकाश अपनी मौजूदगी के राजनीतिक अर्थ नहीं निकाल पाए । अबोध बने रहे ।' अब अविनाश को कौन बताए कि उदय प्रकाश को वो जितने अबोध समझ रहे हैं या साबित करना चाह रहे हैं वो उतने अबोध हैं नहीं । मृत्यु के मौके पर ना जाकर बरसी पर जाना और सम्मानित होना भी मंशा पर सवाल तो खड़े करता ही है ।लेकिन अविनाश ने जाने अनजाने एक काम ये कर डाला कि जो विवाद अबतक ब्लॉग तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय दैनिक में उजागर कर दिया ।

उदय प्रकाश एक बेहतर कवि हो सकते हैं, कहानियां भी हो सकता है कि उन्होंने अच्छी लिखी हों, लेकिन उनकी कहानियां व्यक्तियों पर केंद्रित होकर लोगों को दुखी करती रही हैं । जब उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो उसपर पटना से प्रकाशित 'प्रभात खबर' में एक लंबी परिचर्चा छपी थी । जिसमें सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था । पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया । फिर वामपंथी गीतकार असफल प्रेमकथा का साडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी । किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अद्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उचालनेवाली शैली में कविताएं भी लिख डाली । किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है । उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा । हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं । यह लेखक दरअसल स्वयं एक 'माचोसाडिस्ट' है जो दूसरों को अपने 'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप' में जलील करता और सताता आया है । यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है । शठ को शठता से ही सबक दिया है ।' संयोग ऐसा कि तब प्रभात खबर के साहित्य पृष्ठ के प्रभारी अविनाश ही थे ।
उदय प्रकाश की राजनीति और जोड़-तोड़ और दंद-फंद को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है । इन सबको देखकर मुक्तिबोध की आत्मा कराहती हुई पूछ रही होगी - पार्टनर ! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?

Monday, July 6, 2009

कहां चला राहुल गांधी का जादू ?

अब जबकि लोकसभा चुनावों को शोरगुल खत्म हो चुका है, पखवाड़े भर की माथापच्ची के बाद कांग्रेस मंत्री और मंत्रालय तय करने में कामयाबी हासिल कर चुकी है । मंत्री अपने मंत्रालयों के सौ दिन के एजेंडा घोषित करने में जी जान से जुटे हैं । मीडिया के कई हिस्सों में राहुल गांधी के जादू और करिश्मे का कोलाहल भी थोडा़ कम होने लगा है, तो अब वक्त आ गया है कि दो हजार नौ में हुए लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के जादू और करिश्मे की थ्योरी को कसौटी पर कसा जाए । जीत के बाद जब सोनिया गांधी रायबरेली की जनता को धन्यवाद देने अपने लोकसभा क्षेत्र पहुंची तो उन्होंने लोकसभा चुनाव में पार्टी की जीत का सेहरा राहुल के सर बांधा । कांग्रेस के रणनीतिकारों की तरफ से लगातार इस बात को प्रचारित प्रसारित किया ,करवाया गया कि कांग्रेस को मिली सफलता के पीछे राहुल गांधी के करिश्मे और उनके व्यक्तित्व के जादू का हाथ है ।
उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिली आशातीत सफलता का श्रेय भी राहुल गांधी की रणनीति को दिया गया । मीडिया में ये बात भी आई कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने का फैसला राहुल गांधी का था, जिसकी वजह से पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली और राहुल के इस फैसले ने पार्टी को प्रदेश में पुनर्जीवित कर दिया, आदि आदि । लेकिन अगर हम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी रणनीति और राहुल गांधी के तथाकथित होमवर्क की गहराई से पड़ताल करें तो राहुल की रणनीति के साथ साथ उनके जादू और करिश्मे का मुलम्मा भी उतर जाता है । सबसे पहले हम उत्तर प्रदेश के दो जिलों रायबरेली और अमेठी की ही बात करें जिन जिलों की लोकसभा सीट से राहुल और उनकी मां कांग्रेस अध्यक्षा चुनाव लड़ती हैं । रायबरेली और सुल्तानपुर दो जिले हैं जिनमें तीन लोकसभा क्षेत्र आते हैं । यह सर्वविदित तथ्य था कि अमेठी से स्वयं राहुल और रायबरेली से सोनिया गांधी चुनाव लड़ेगी । लेकिन इसी जिले की तीसरी लोकसभा क्षेत्र सुल्तानपुर से कौन चुनाव लड़ेगा इसका फैसला अंतिम समय तक नहीं हो पाया था । ये कैसी रणनीति थी या फिर कैसा होमवर्क था जिसमें सूत्रधार अपने ही गृहजिले के उम्मीदावर तय करने में दुविधा का शिकार था । अगर होमवर्क किया गया होता तो ना तो ये दुविधा की स्थिति होती और ना ही मामला आखिरी वक्त तक लटकता । इस मामले में कभी भी ऐसा नहीं लगा कि राहुल या फिर उनके रणनीतिकारों ने उनके अपने ही गृह जिले के लिए कोई होमवर्क किया हो । बिल्कुल आखिरी वक्त तक संजय सिंह ही अपनी उम्मीदवारी को लेकर आशंकित थे और पार्टी में मचे घमासान की वजह से कार्यकर्ताओं में जबदस्त भ्रम की स्थिति थी।
अब एक और नमूना देखते हैं - सूबे की राजधानी लखनऊ की प्रतिष्ठित सीट, जहां से बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई चुने जाते थे, को लेकर भी कांग्रेस के पास कोई योजना नहीं दिखाई दी । इस सीट पर सबसे पहले समाजवादी पार्टी ने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की उम्मीदवारी का ऐलान कर सबको चौंका दिया । सुप्रीम कोर्ट से इजाजत नहीं मिलने की वजह से संजय दत्त चुनाव नहीं लड़ सके । इसके बाद भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों का भी ऐलान हो गया । लेकिन सूबे में अपनी खोई जमीन की तलाश में लगी कांग्रेस को कोई उम्मीदवार नहीं मिल पा रहा था । सुप्रीम कोर्ट के झटके से सकते में आई समाजवादी पार्टी ने मास्टर स्ट्रोक लगाया और कल तक कांग्रेस की समर्पित कार्यकर्ता रही ग्लैमरस नफीसा अली को लखनऊ से अपना उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया । बेहतर चुनावी रणनीति और राहुल गांधी के होमवर्क की बात करनेवाली पार्टी को उस वक्त लखनऊ जैसी प्रतिष्ठित सीट के लिए कोई उम्मीदवार नहीं सूझ रहा था । जब कोई विकल्प नहीं मिला तो पार्टी ने अपने प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी को ही अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया । इस अफरातफरी से राहुल गांधी की तथाकथित रणनीति और फॉर्वर्ड प्लानिंग के दावों की हवा निकल गई । सूबे और लखनऊ की राजनीति को बेहद करीब से देखने और जाननेवालों की राय है कि अगर रीता बहुगुणा जोशी को थोड़ा वक्त मिलता तो वो लखनऊ की ये प्रतिष्ठित सीट कांग्रेस की झोली में डाल सकती थी ।
अगर हम सूबे की एक और सीट मुरादाबाद पर नजर डालें तो यहां भी कांग्रेस की लचर प्लानिंग दिखाई देती है । इस सीट पर भी जब कांग्रेस को कोई उम्मीदवार नहीं मिला तो आंध्र प्रदेश से पू्र्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन को आनन फानन में यहां से टिकट दे दिया गया । अजहरुद्दीन वही क्रिकेट खिलाड़ी हैं, जिनपर मैच फिक्सिंग के मामले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आजीवन प्रतिबंध लगाया हुआ है । ये दीगर बात है कि जातिगत समीकरणों और ग्लैमर के सहारे अजहरुद्दीन चुनाव जीत गए । यह तो तीन सीटों की बानगी है, उत्तर प्रदेश में इनके अलावा भी कई सीटें गिनाई जा सकती हैं, जहां कांग्रेस की ना तो कोई योजना थी, ना ही कोई व्यूह रचना और ना ही किसी का कोई जादू चला । जीत की वजह कहीं स्थानीय फैक्टर रहा तो कहीं सूबे की राजनीति में चुनाव के वक्त बना गठबंधन रहा, जिसकी वजह से वोट बैंक शिफ्ट हुआ ।
अब अगर हम बिहार के चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो यहां इस बार पार्टी को एक सीट का नुकसान हुआ । कांग्रेसियों का तर्क है कि बिहार में पार्टी के वोट प्रतिशत में बढो़तरी हुई है और वोटर राहुल गांधी के करिश्मे की वजह से पार्टी की ओर आकृष्ट हुए हैं । लेकिन अगर आंकड़ों पर गौर करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बिहार में कांग्रेस का वोट प्रतिशत इस वजह से बढ़ा है कि पार्टी ने लगभग सभी चालीस सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए । पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से तालमेल की वजह से कम सीटों पर चुनाव लड़ा था । जाहिर है कि कोई भी पार्टी अगर ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो उसके वोट प्रतिशत में वृद्धि तो होगी ही, इसके लिए ना तो किसी जादू की जरूरत है और ना ही किसी करिश्मे की ।
बिहार की ही तरह अगर हम आंध्र प्रदेश और गुजरात का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वहां भी राहुल गांधी का कोई करिश्मा नहीं चला । आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की जीती तैंतीस सीटों में से पच्चीस सीट ऐसी हैं जहां अगर तेलगू देशम के चार पार्टियों के गठजोड़ और प्रजाराज्यम को मिले वोट जोड़ दिए जाएं तो वह कांग्रेस से ज्यादा है । इन पच्चीस में से सत्रह सीटें तो ऐसी हैं जहां तेलगू देशम गठजोड़ और प्रजाराज्यम का कुल वोट कांग्रेस के वोट से एक लाख से भी ज्यादा है । राज्य में कांग्रेस को भले ही तैंतीस सीटें मिली हों और तेलगू देशम गठबंधन को आठ, लेकिन दोनों के वोट प्रतिशत में एक फीसदी से कुछ ही ज्यादा का अंतर है । इसी तरह अगर हम गुजरात पर नजर डालें तो नरेन्द्र मोदी का अड़ियल रवैया और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने की वजह से कांग्रेस को फायदा हुआ । मोदी ने पिछली बार जीते चौदह में से ग्यारह सांसदों का टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया और ये सभी नए चेहरे चुनाव हार गए । इस वजह से राज्य में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट का ही नुकसान हुआ । तो उत्तर, दक्षिण और पश्चिम के राज्यों में हमने देखा कि राहुल का जादू कहीं नहीं चला । हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि राजीव गांधी के बाद पहली बार कांग्रेस ने चुनाव के पहले अपने प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के नाम का ऐलान कर दिया था । मनमोहन सिंह की छवि आम जनता में एक ईमानदार और कर्मठ प्रधानमंत्री के अलावा एक एक ऐसे राजनेता की रही है जो काम करता है और फालतू की बयानबाजी से बचता है । राहुल गांधी की प्रशस्ति करनेवालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पिछले पांच साल में मनमोहन सिंह का कद बहुत बढ़ा है ।
-----------------------------------------

Friday, July 3, 2009

लेखिकाओं का प्यारा खलनायक

नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की बात है, संभवत: उन्नीस सौ बानवे की गर्मियों की । मैं अपने शहर जमालपुर से दिल्ली शिफ्ट होने आया था, आगे की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में । दिल्ली में ही कार्यरत अपने चाचा भारत भारद्वाज के आरामबाग के सरकारी फ्लैट में रुककर दिल्ली विश्विद्यालय के आसपास रहने की जगह तलाश कर रहा था । भारत जी के फ्लैट में माहौल पूरा साहित्यिक था । रेलवे स्टेशन के पास होने की वजह से उनके घर साहित्यकारों का जमावड़ा लगा करता था । वो राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका हंस में समकालीन सृजन संदर्भ के नाम से एक स्तंभ भी लिखा करते थे । मेरे अंदर भी साहित्य का कीड़ा कुलबुला रहा था । रोजाना रात में साहित्य पर लंबी लंबी बहसें हुआ करती थी । एक दिन मैंने भारत जी से कहा कि क्या ये संभव है कि मैं राजेन्द्र जी से मिल सकूं । मेरी इच्छा को देखते हुए उन्होंने हां कर दी और अगले दिन दो बजे के करीब हमलोग सरकारी एंबेसडर कार से अंसारी रोड पर हंस के दफ्तर पहुंचे । बंद गली के आखिरी मकान में हंस का दफ्तर था । पहले कमरे से गुजरकर हम राजेन्द्र जी के कमरे तक पहुंचे । जिनकी कहानियां और उपन्यास पढ़कर बड़ा हुआ था वो सामने बैठे थे । पूरे कमरे में सिगरेट का धुंआ तैर रहा था और काला चश्मा लगाए राजेन्द्र यादव अपनी कुर्सी पर विराजमान थे । अब ठीक से याद नहीं है कि उस वक्त कमरे में और कौन कौन था । भारत जी ने राजेन्द्र यादव से परिचय करवाया । इस बात को अठारह साल बीत चुके हैं और इन अठारह वर्षों में यादव जी से हजारों बार फोन पर बातें हुई लेकिन उस दिन की मुलाकात मुझे अब भी याद है और एक दिलचस्प वाकया भी । हमलोग राजेन्द्र जी के दफ्तर में बैठे चाय पी रहे थे, फिर भारत जी और राजेन्द्र यादव के बीच तय हुआ कि श्रीराम सेंटर चला जाए । हमलोग कमरे से बाहर निकले और जब दरवाजे तक पहुंचे ही थे कि एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला ने दप्तर में प्रवेश किया । वो बेहद आत्मीयता के साथ राजेन्द्र यादव जी से मिली । राजेन्द्र यादव जी स्नेहवश उस महिला लेखिका की पीठ पर हाथ रख दिया - छूटते ही लेखिका ने यादव जी से कहा कि अगर आप इस तरह से मेरे पीठ पर हाथ रखेंगे तो संभव है कि मैं उत्तेजित हो जाऊं, मैं जवान हूं और अगर उत्तेजित हो गई तो आपकी खैर नहीं । खूबसूरत लेखिका की इस बात पर राजेन्द्र जी एक जोरदार ठहाका लगाया और फिर आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया । कस्बाई शहर की मानसिकता लिए महानगर पहुंचा मैं इस संवाद को सुनकर हतप्रभ था, लेकिन ये सबकुछ इतनी सहजता से बीता, लगा कुछ हुआ ही नहीं हो ।
बाद के दिनों में कई बार राजेन्द्र जी के दफ्तर गया, कई बार उन्हें महिला लेखिकाओं को गले लगाकर आशीर्वाद देते देखा, लेकिन उस दिन का वाकया भुलाए नहीं भूलता । कई बार राजेन्द्र जी से फोन पर लंबी लंबी बातें हुई है, महिलाओं भी बातचीत का विषय बनीं । जब भी स्त्री विमर्श पर बात होती मैं उन्हें छेड़ते हुए कहता कि विमर्श की डोर तो आपके हाथ से छूट गई है, बच गई है सिर्फ स्त्री । जब भी मैं ये बात उनके मुंह से गाली की गंगोत्री प्रवाहित होने लगती । हिंदी जगत में राजेन्द्र जी का महिला प्रेम जगजाहिर है, उनकी महिला मित्र मंडली भी । उस मंडली को एक बार ममता कालिया ने घाघरा पलटन नाम दिया था ।
राजेन्द्र यादव की मंडली की ही युवा पत्रकार गीताश्री ने यादव को केंद्र में रखकर एक किताब संपादित की है- तेइस लेखिकाएं और राजेन्द्र यादव( किताबघर प्रकाशन, दिल्ली ) । इस किताब के बनने की बेहद दिलचस्प कहानी गीताश्री ने अपनी भूमिका में बताई है- जयंती की छत के दीवान-ए-खास में उस शाम राजेन्द्र यादव के अलावा डॉ मनीषा तनेजा, अमृता ठाकुर, सीमा झा-श्रीनंद झा, गीताश्री, कमलेश जैन के अलावा शिवकुमार शिव भी मौजूद थे । बातचीत के क्रम में ये बात निकली कि राजेन्द्र यादव पर गीताश्री एक किताब संपादित करें, एक ऐसी किताब जिसमें सिर्फ स्त्रियां यादव के बारे में लिखे । प्रस्ताव राजेन्द्र यादव के सम्मुख उनकी स्वीकृति हेतु पेश किया गया । उस प्रस्ताव पर राजेन्द्र यादव ने ना तो हां की और ना ही मना किया । लगभग दो ढाई वर्षों बाद अचानक एक दिन अचानक गीताश्री को फोन करके राजेन्द्र यादव ने किताब छापने की अनुमति दे दी । शायद इन दो वर्षों में वो गीताश्री को परख रहे थे ।
उसके ठीक विपरीत अगर हम राजेन्द्र यादव के छिहत्तरवें जन्मदिन पर साधना अग्रवाल और भारत भारद्वाज के संपादन में प्रकाशित पुस्तक- हमारे युग का खलनायक- की भूमिका देखें तो वहां अपने उपर पुस्तक संपादित करने की योजना को यादव जी ने चंद क्षणों में अनुमति दे दी थी । ये हैं राजेन्द्र यादव के व्यक्तित्व के अलग अलग शेड्स ।
तेइस लेखिकाएं और राजेन्द्र यादव नामक इस पुस्तक में तीन खंड हैं, जिनमें अलग अलग लेखिकाओं के समय समय पर लिखे लेख और साक्षात्कार हैं । जयंती रंगनाथन के साक्षात्कार के अलावा सारे विचार और साक्षात्कार पूर्व प्रकाशित हैं । लेकिन इस संग्रह की खासियत यह है कि स्त्री विमर्श के इस झंडाबरदार के बारे में तमाम स्त्री लेखिकाओं के विचार एक जगह उपलब्ध हैं । इन तमाम लेखों और साक्षात्कारों में जो एक सामान्य बात प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उभरकर सामने आती है वो ये है कि राजेन्द्र यादव से चाहे आप जितनी भी मतभिन्नता रखें, उनसे चाहे आपके विचार कतई नहीं मिलते हों , लेकिन फिर भी आप उनसे प्यार करते हैं । राजेन्द्र जी के व्यक्तित्व में जो खिलंदड़ापन, जिंदादिली और हर उम्र के लोगों से खुलकर बात करने का जो हुनर उनके पास है वो इस किताब में शिद्दत से रेखांकित होता है ।
मेरे सामने राजेन्द्र यादव पर संपादित दोनों किताबें - हमारे युग का खलनायक राजेन्द्र यादव( संपादक- भारत भारद्वाज/साधना अग्रवाल) और तेइस लेखिकाएं और राजेन्द्र य़ादव रखी हैं । दोनों पुस्तकों के कवर पर एक ही तस्वीर है लेकिन मुद्राएं अलग हैं। खलनायक वाली किताब में मुंह में पाइप डालकर, चेहरे पर गंभीरता का आवरण हिंदी साहित्य के डॉन की छवि को पुख्ता करता है। वहीं गीताश्री वाली किताब के कवर पर पाइप मुंह से बाहर और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान है जो तेइस लेखिकाओं से घिरे होने पर स्वत: आ जाती है । लेकिन किताबघर से प्रकाशित इस किताब (पेपरबैक) का प्रोडक्शन स्तरहीन है । हर पृष्ठ पर राजेन्द्र यादव की अलग अलग तस्वीर लगी है, लेकिन कागज की खराब क्वालिटी की वजह से फोटो भी बदतर हो गए हैं, जो किताबघर की प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं हैं । यहीं पर आप हिंदी और अंग्रेजी में छपनेवाली किताबों की क्वालिटी का फर्क महसूस कर सकते हैं । अंग्रेजी के प्रकाशक प्रोडक्शन क्वालिटी से कभी समझौता नहीं करते, काश हिंदी में भी ऐसा हो पाता ।

Thursday, June 25, 2009

चलता हूं दोस्त...देख लेना

हर दिन की तरह बुधवार को भी मैं अपने दफ्तर में रन डाउन की बगल की अपनी सीट पर बैठा था । अचानक पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और पीछे से आवाज आई- अच्छा दोस्त चलता हूं, तड़का के दो सेगमेंट निकल गए हैं, बाकि देख लेना । मैं जबतक पीछे मुड़ता तबतक शैलेन्द्र जी हाथ हिलाते हुए न्यूजरूम से बाहर की तरफ चल पड़े थे । तड़का फिल्मी दुनिया पर हामरे चैनल पर चलनेवाल एक शो है जिसे शैलेन्द्र जी प्रोड्यूस करते थे । उस दिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि शैलेन्द्र घर जाते वक्त मुझे कहें कि देख लेना । सबकुछ सामान्य ढंग से खत्म हुआ । फाइनल बुलेटिन रोल करने के बाद मैं लगभग एक बजे घर पहुंचा । लगभग ढाई बजे तक रात की पाली के प्रोड्यूसर से सुबह की बुलेटिन की प्लानिंग पर बात होती रही और फिर अखबार आदि पलटने के बाद सो गया। सुबह साढे चार बजे के करीब मोबाइल की घंटी बजी और दफ्तर के एक सहयोगी ने सूचना दी कि नोएडा एक्सप्रेस वे पर शैलेन्द्र जी का एक्सीडेंट हो गया है और वो ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में भर्ती हैं । इस सूचना के बाद दफ्तर में फोन मिलाया तो जानकारी मिली कि रात तकरीबन ढाई बजे शैलेन्द्र जी की गाड़ी की टक्कर ट्रक से हो गई है । टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि उनकी कार ड्राइवर की सीट तक ट्रक के नीचे तक घुस गई थी । राह चलते लोगों ने जब शैलेन्द्र जी को उनकी कार से निकालकर पास के अस्पताल में पहुंचाया तबतक बहुत देर हो चुकी थी और खून इतना बह चुका था कि उनको बचाना नामुमकिन था ।

सुबह लगभग साढे पांच बजे शैलेन्द्र जी ने अंतिम सांसे लीं । शैलेन्द्र जी की मौत से हम सब लोग स्तब्ध थे और किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था । अस्पताल में जरूरी कागजी कार्रवाई के बाद शैलेन्द्र जी का शव पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचा । लेकिन पोस्टमॉर्टम हाउस में ताला लटका था और पहले से ही तीन लाश वहां पोस्टमॉर्टम के इंतजार में रखी थी । चूंकि पत्रकारों की पूरी बिरादरी वहां मौजूद थी इसलिए नोएडा पुलिस ने पोस्टमॉर्टम हाउस का ताला तो तोड़ डाला लेकिन अंदर के हालात ऐसे नहीं थे कि शैलेन्द्र जी को अंदर लिटाया जा सके । सो तय हुआ कि शव को एंबुलेंस में ऱखा जाए और डॉक्टर को तलाशने के अलावा अन्य सरकारी कागजी कार्रवाई शुरू की जाए । कुछ लोग डॉक्टर को बुलाने में जुटे, तो एक कांस्टेबल पोस्टमॉर्टम के कागजात पर मुक्य चिकित्सा अधिकारी के दस्तखत करवाने रवाना हुआ । दो घंटे बीत चुके थे । धूप तेज होने लगी थी । जरूरी कागजातों पर सरकारी अधिकारियों के दस्तखत लेने गया कांस्टेबल लापता हो चुका था । इंसपेक्टर विनय राय उसको फोन लगाकर परेशान,लेकिन फोन पहुंच से बाहर । घंटेभर बाद कांस्टेबल नमूदार तो हुआ लेकिन अब कागजात थे लेकिन डॉक्टर नहीं । आधे घंटे बाद डॉक्टर आए और अगले बीस पच्चीस मिनट में पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया खत्म हो गई ।

तपती गर्मी में पोस्टमॉर्टम के लिए तीन से चार घंटे का इंतजार । ये हाल उत्तर प्रदेश के सबसे विकसित शहर नोएडा का था तो और शहरों में क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है । ये एक ऐसी संवेदनहीन व्यवस्था का बदसूरत चेहरा था जो हर दिन दुखी परिवार को मुंह चिढ़ाता है । अव्यवस्था का आलम ये कि शव को रखने का कोई इंतजाम नहीं । ना ही साफ सफाई और ना ही शव को सुरक्षित रखने के कोई उपकरण या फिर बर्फ का ही इंतजाम । संवेदनहीनता इतनी कि डॉक्टर को देर से आने का मलाल नहीं, वो तो पत्रकारों की वजह से थोड़ा जल्दी यानि लगभग घंटेभर पहले पहुंचा था ।पोस्टमॉर्टम होने के बाद शैलेन्द्र जी के शव को कैलाश अस्पताल के शवगृह में रखवा दिया गया । तय ये हुआ कि जब उनके रिश्तेदार आ जाएंगे तो शुक्रवार की सुबह निगमबोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा ।

शाम को जब दफ्तर पहुंचा तो वहां अजीब सी मुर्दनी छाई थी, सबके चेहरे पर गहरे अवसाद को साफ तौर पर परलक्षित किया जा सकता था । मैं अपनी सीट पर बैठा था । पीछे से शैलेन्द्र जी की ओबिच्युरी तैयार होने की आवाजें आ रही थी । जो ये स्टोरी कटवा रहा था उसने बताया कि पैकेज का वॉयस ओवर करनेवाले साथी फफक-फफक कर रो रहे थे । दफ्तर में अजीब सा माहौल था, सब एक दूसरे को देख रहे थे और अपना गम छुपाने की कोशिश भी कर रहे थे । अचानक से मेरे सीनियर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि शैलेन्द्र को हेडलाइन में ले लीजिए । ये वाक्य ऐसा था जिसे सुनकर मन अंदर तक कांप गया । कल तो जो हमारे साथ बैठा करते थे आज उनपर हेडलाइन लिखनी पड़ेगी । मन बेचैन था, कंप्यूटर खुला था, पांच बजने में कुछ मिनट रह गए थे, मुझे शैलेन्द्र जी को हेडलाइन में लेना था । घड़ी की सुई बढ़ती जा रही थी, हाथ को जैसे लकवा मार गया था, कुछ भी नहीं सूझ रहा था- नहीं रहे शैलेन्द्र जी - के बाद लिखने के लिए शब्द नहीं सूझ रहे थे । इस बीच हमारे संपादक आशुतोष मेरे पास आए और मेरा हौसला बढ़ाने लगे । किसी तरह से शैलेन्द्र जी पर हेडलाइन भी लिखा, उनपर बुलेटिन भी प्लान किया और जब पहली बार उनकी ना रहने की खबर बुलेटिन में चली तो पूरे न्यूजरूम में सन्नाटा और उसको चीरती हुई सिसकियां सुनाई दे रही थी । ये हमारे पेशे की एक ऐसी बिडंबना है जिसपर हम सिर्फ रो सकते हैं रुक नहीं सकते । क्योंकि चाहे जो हो जाए बुलेटिन नहीं रुक सकता ।

शुक्रवार को हमलोग उनके अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के निगम बोध घाट पहुंचे । स्नानादि करवा कर जब मंत्रोच्चार के बीच शैलेन्द्र जी की शव को चिता पर ऱखा जा चुका था । मैं किसी काम से उपर चला गया था और जब वापस घाट पर लौट रहा था तो देखा दो तीन लोग शैलेन्द्र जी के छह साल के छोटे बेटे को सफेद कुर्ता पायजामा पहनाने और बाल काटने पर आमादा थे । और वो मासूम बच्चा जो अबतक ये नहीं समझ पाया था कि उसको बेहद प्यार करने और उसकी हर ख्वाहिश पूरी करनेवाला उसका पापा इस दुनिया से जा चुका है, उसको अपने पिता को मुखाग्नि देने के लिए तैयार किया जा रहा था । और वो कह रहा था कि मैं क्यूं बदलूं कपड़े, मैंने तो अच्छी जींस पहन रखी है, मुझे नहीं पहनना कुर्ता-पायजामा, मुझे नहीं कटवाने अपने बाल । वो रो रहा था और कुछ लोग उसके साथ जबरदस्ती तो कुछ प्यार मनुहार कर रहे थे । सदमे में मैं नीचे आया और अपने वरिष्ठ सहयोगी प्रबल जी और संजीव को कहा कि उस बच्चे के साथ जो हो रहा है उसको रोकिए । दोनों ने धर्म के नाम पर हो रहे इस कर्मकांड को रोकने की भरसक कोशिश की लेकिन वहां मौजूद एक व्यक्ति ने लगभग चीखते हुए कहा कि हिंदू मायथालॉजी में बेटा इसलिए पैदा किया जाता है कि वो अपने पिता को मुखाग्नि दे सके । विरोध का स्वर भी तीखा था लेकिन समाज के कुछ धर्मभीरू लोग डटे थे । बीच का रास्ता निकाला गया और बच्चे को सिर्फ सफेद कुर्ता पहनाकर चिता का स्पर्श करवा दिया गया ।

शैलेन्द्र जी की मौत ने एक बार फिर से धर्म के नाम पर खेल खेलने वालों को बेनकाब किया । हिंदू धर्म और उसके ग्रंथों को व्याख्यायित कर हर रोज धर्म पर कार्यक्रम बनानेवाले शैलेन्द्र जी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके प्यारे बेटे के साथ धर्म के नाम पर उनके ही रिश्तेदार संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर जाएंगे । शैलेन्द्र जी आपके धर्म का तो ये मतलब नहीं ही रहा होगा । हिंदू धर्म के नाम पर अनपढ़ लोग हमेशा कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जिससे धर्म में हमारे जैसे लोगों की आस्था जरा कम हो जाती है । आज जब मैं अपनी उसी सीट पर बैठकर शैलेन्द्र जी के निधन के बहाने संवेदनहीन व्यवस्था और अत्याचारी धार्मिक कर्मकांड पर लिख रहा हूं तो लगता है कि शायद पीछे से फिर शैलेन्द्र जी आकर कंधे पर हाथ रखेंगे और कहेंगे - चलता हूं दोस्त, देख लेना ।

Wednesday, June 24, 2009

धार्मिक खिलवाड़ को बेनकाब करती कृति

आस्था का जब धर्म से मिलन हो जाता है तो वो श्रद्धा में बदल जाती है और जहां श्रद्धा हो वहां सवाल नहीं हो सकते । यही बात भारत में लेखन को लेकर भी कही जा सकती है । हिंदू देवी देवताओं और मान्यताओं और रूढ़ियों पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं, सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । मुझे याद है बचपन में जब मैं ‘चंपक’ पढ़ा करता था तो उसमें दिल्ली बुक कंपनी की एक पुस्तक – हिंदू समाज पथभ्रष्टक तुलसीदास- का विज्ञापन उसमें प्रमुखता से छपा करता था । चूंकि हिंदू धर्म में सहिष्णुता की गुंजाइश है इसलिए इसपर उठने वाले सवालों और तीखी आलोचनाओं पर बवाल नहीं मचता ।

हाल के दिनों में कुछ संगठन राजनैतिक लाभ के लिए विरोध और हिंसा पर उतारू हो जाते हैं लेकिन उन्हें ज्यादा समर्थन नहीं मिलता । लेकिन भारत मे किसी और धर्म के साथ ये स्थिति नहीं है । जैसे आप इस्लाम, जैन या फिर ईसाई धर्म पर सावल खड़े नहीं कर सकते । अगर किसी कोने से कोई सवाल खड़ा होता है तो उसके खिलाफ लगभग पूरा समुदाय खडा़ हो जाता है । कोई उदाहरण देने की जरूरत नहीं है । हर धर्म में अच्छाइयां और बुराइयां होती है लेकिन कोई भी धर्म ‘क्वेशचनिंग’ के उपर नहीं हो सकता । प्रगतिशीलता की पहली शर्त ही संदेह है । जो है उसपर संदेह करो, सवाल खड़े करो और बगैर बहस के किसी भी सिद्धांत को ना मानो । लेकिन मेरे जानते हिंदी में इस्लाम और जैन धर्म पर सवाल करते रचनात्मक लेखन जरा कम ही हुआ है ।

पिछले दिनों कथाकार मधु कांकरिया का उपन्यास ‘सेज पर संस्कृत’ प्रकाशित हुआ । उपन्यास के शीर्षक से मैं चौंका जरूर, लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो तमाम संदेह दफन होते गए और लेखिका के साहस से मैं हतप्रभ रह गया । ‘सेज पर संस्कृत’ जैन धर्म के अंदर व्याप्त कुरीतियों को तार्किक आधार पर जोखिम मोल लेते हुए साहसपूर्ण तरीके से उठाता है । यह उपन्यास एक ऐसी जवान लड़की की यातना गाथा जो अपने और अपने परिवार के भविष्य के सुंदर सपने देखती है और उसे पूरा करने के लिए संघर्ष भी करती है लेकिन धार्मिक आस्थाओं में जकड़ी उसकी ही मां उसके सपनों पर ग्रहण लगाने को आमादा है । दरअसल ये पूरा उपन्यास एक ऐसी लड़की या यों कहें कि परिवार के इर्द गिर्द घूमता है जिसमें पिता की मौत के बाद दो बेटियां अपनी मां के साथ अकेली रह जाती है । रिश्तेदारों की नजर उनकी संपत्ति पर है । बड़ी लड़की संघमित्रा कॉलेज की अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर के लिए आवश्यक खर्च जुटाने के लिए दिन रात मेहनत करती है, लेकिन आर्थिक विपन्नता में जकड़े इस परिवार में मां अपने आप को धर्म को समर्पित कर देती है, साथ ही उसकी इच्छा दोनों बेटियां को भी धर्म पर कुर्बान कर देने की है । इस कथा के बहाने लेखिका जैन धर्म के अंदर चल रही अनैतिक कृत्यों को भी बेनकाब करती चलती है । इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र संघमित्रा लगातार बार बार जैन धर्म पर सावल करती है, जिसका उत्तर उसे किसी भी साधु से नहीं मिल पाता है और उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है । संघमित्रा की मां अपनी छोटी बेटी- छुटकी को जैन धर्म में दीक्षित कराने के लिए कटिबद्ध है । छुटकी की उम्र इतनी कम होती है कि उसे इन चीजों की समझ ही नहीं है और वो दीक्षा के मौके पर होने वाले समारोह को लेकर ही उत्साहित है । लेखिका ने श्रमपूर्वक दीक्षा के वक्त ‘केश-लुंचन’ का बेहद ही मार्मिक चित्रण किया है ।

धर्म के नाम पर एक मासूम बच्ची की भावनाओं के साथ खिलवाड़ और अत्याचार को श्रद्धा समारोह में तब्दील कर सामूहिक हर्ष का अवसर बना दिया जाता है वो शर्मनाक है । दीक्षा समारोह के बाद लेखिका ने कथा के माध्यम से संघ के अंदर के मुनियों की कुंठित यौनाकांक्षा का वर्णन किया है । संघ में जो बच्चियां दीक्षित होती हैं, कलांतर में वो जब जवान होती हैं तो उनके अंदर भी सांसारिक सुख सुविधाओं को भोगने की आंकांक्षा हिलोरें लेने लगती है । धर्म और मर्यादा के बंधन में जकड़े जवान साधु- साध्वियों के दिलों में एक दूसरे के प्रति दैहिक आकर्षण उभरती है उसका एक नमूना विजयेन्द्र मुनि और छुटकी, जो दीक्षा के बाद साध्वी दिव्यप्रभा हो चुकी है, के बीच पनपे प्रेम से लगाया जा सकता है । दिव्यप्रभा और विजयेन्द्र संघ को छोड़कर नई जिंदगी शुरू करना चाहते हैं लेकिन विजयेन्द्र एक गलती कर बैठते हैं और अपने दिल की बात अपने ही एक साथी साधु अभयमुनि को बता देते हैं । अभयमुनि खुद ही काम की अग्नि में जल रहा होता है और उसे जब इस प्रेम-प्रसंग के बारे में जानकारी मिलती है तो उसकी यौन लिप्सा इस कदर बेकाबू हो जाती है कि वो छल से साध्वी दिव्यप्रभा का रेप कर डालता है . साध्वी के इंतजार में खड़े विजयेन्द्र मुनि को झूठी खबर दे कर विक्षिप्त भी कर देता है ।

इस बलात्कार की परिणति साध्वी के मां बनने में होती है और धर्म की पवित्रता की आड़ लेकर वही धर्मगुरू, साध्वी को संघ से निष्कासित कर देते हैं जहां कभी समारोहपूर्व उसे दीक्षित किया गया था । जिंदगी से हर तरह से ठुकराई साध्वी दिव्यप्रभा एक वेश्या बना दी जाती है जहां वो अपनी बेटी ऋषिकन्या का भरण पोषण करने लग जाती है । कहानी में एक बेहद नाटकीय मोड़ आता है और छुटकी से साध्वी बनी दिव्यप्रभा की मुलाकात उसकी बड़ी बहन संघमित्रा से होती है, जो एक बड़ी एनजीओ चला रही होती है । छुटकी अपनी बेटी को बहन को सौप कर दम तोड़ देती है । लेकिन मरने के पहले वो पूरी आपबीती जीजी को सुना जाती है । इंतकाम की आग में जल रही संघमित्रा बेहद ही योजनाबद्ध तरीके से अभयमुनि का कत्ल कर अपनी बहन के साथ हुए अन्याय का बदला लेती है।

समीक्ष्य पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे केरल की सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा- एन ऑटोबॉयोग्राफी ऑफ अ नन – के कई प्रसंगों की याद आ जाती है – कि किस तरह से ‘होली किस’ के नाम पर फादर ननों का चुंबन लेते हैं और अपने इस कृत्य के लिए धर्म और धर्मग्रंथ की आड़ लेते हैं । ऐसा नहीं है कि ये कुरीतियां सिर्फ जैन और ईसाई धर्म में ही है । हिंदू धर्म में तो देवदासी प्रथा से लेकर शादी के बाद पंडितों के द्वारा लड़कियों के शुद्धिकरण की प्रथा रही है । दरअसल धर्म के नाम पर स्त्रियों के शोषण की ये दास्तां बेहद पुरानी हे लेकिन जिस साहस के साथ मधु कांकरिया ने अपने उपन्यास सेज पर संस्कृत में उसे उजागर किया है उसके लिए उन्हें दाद देनी पड़ेगी ।

Sunday, June 7, 2009

नहीं रहे हबीब तनवीर

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर भोपाल में लंबी बीमारी के बाद भोपाल में निधन हो गया । कुछ दिनों पहले उन्हें सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद निजी अस्पताल दाखिल कराया गया था जहां वो वेंटिलेटर पर थे । असपताल के डॉक्टरों के मुताबिक तनवीर को अस्थमा का दौरा पड़ा था, जिसके चलते उन्हें साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। उनके फेफड़ों में पानी भर गया था और सीने एवं खून में संक्रमण की वजह से तबीयत बिगड़ गई थी ।
किसी भी विधा में ये देखने को कम ही मिलता है कि अपने जीवन काल में ही उसमें काम करनेवाला लीजेंड बन जाता है । लेकिन हबीब के साथ यही हुआ और वो रंगमकर्म की दुनिया के लीविंग लीजेंड बन गए थे . बावजूद इसके हबीब तनवीर का लोगों से जुड़ाव कम नहीं हुआ और वो लोक के कलाकार के तौर पर मशहूर हुए । हबीब ने जब रंगकर्म की दुनिया में कदम रखा तो उस वक्त रंगमंच की दुनिया में लोक की बात कम होती थी । लेकिन इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ के साथ बहीह के जुड़ाव ने उन्हें लोक से जुड़ने के लिए ना केवल प्रेरित किया बल्कि उनके विचारों को भी गहरे तक प्रभावित किया । एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्मे हबीब तनवीर को पद्म भूषण, पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कार मिले थे. रायपुर में हुआ और स्कूली शिक्षा वहां से पूरी करने के बाद वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन किया और फिर 1945 में वो मुंबई चले गए जहां उनकता जुड़ा इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से हुआ । लेकिन हबीब ने नाटक की दुनिया में कदम दिल्ली में आने के बाद ही रखा- सन 1954 में जहां पहली बार उन्होंने आगरा बाजार का मंचन किया, लिखा भी । दिल्ली में ये वो दौर था जब रंगमंच की दुनिया यूरोपियन मॉडल से प्रभावित थी और यहां अंग्रेजी वालों का बोलबाला था । लेकिन अपने इस नाटक से तनबीर ने ना केवल अंग्रेजी का आधिपत्य तोड़ा बल्कि रंगमंच की दुनिया के लिए एक नया आकाश उद्धाटित किया । ये नाटक अटारहवीं शताब्दी के मशहूर उर्दू शायद अकबर नजीराबादी पर केंद्रित था । इस नाटक में हबीब तनवीर ने ओखला गांव के कलाकारों को लेकर रंगमंच के आभिजात्य को चुनौती देते हुए एक नई भाषा भी गढ़ी । इसके बाद हबीब इंगलैंड चले गए जहां तीन साल तक रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में रंगमंच और उसकी बारीकियों को समझा . फिर 1959 में तनबीन ने अपनी रंगकर्मी पत्नी मोनिका मश्रा के साथ मिलकर नया थिएटर नास से एक ग्रुप बनाया जिसने भारतीय और यूरोपियन क्लासिक का मंचन किया । रंगमंच की दुनिया को तनबीर ने अंग्रेजी आभिजात्य से तो आजादी दिलाई साथ ही उन्होंने लोक कलाकारो को स्थानीय बोली बानी में नाटक करने के लिए प्रोत्साहित किया ।
1975 में हबीब तनबीर ने अपना मशहूर नाटक चरणदास चोर का मंचन किया जो आजतक इतना लोकप्रिय है कि जहां भी, जब भी इसका मंचन होता है, लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है । इसके बाद तनबीर ने कई विश्व क्लासिक का मंचन किया जिसमें – गोर्की की एनेमीज पर आधारित दुश्मन, असगर वजाहत की जिन लाहौर नहीं बेख्या के अलावा कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना, शाजापुर की शांतिबाई आदि ने रंगमंच को एक नई उंचाई दी । हबीब तनवीर ने थिएटर के साथ बालीवुड की फिल्मों में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उन्होंने नाना पाटेकर अभिनीत चर्चित फिल्म 'प्रहार' और निर्देशक सुभाष घई की 'ब्लैक एंड ह्वाइट' में भी काम किया।
हबीब तनबीर के प्रगतिशील विचारों को जब नाटकों में जगह मिलने लगी तो भगवा ब्रिगेड के कान खड़े हुए और जब मध्य प्रदेश में सन दो हजार तीन में पोंगा पंडित और लाहौर का मंचन शुरु हुआ तो भगवा ब्रगेड के कार्यकर्ताओं ने जमकर विरोध प्रदर्शन कर इन दोनों नाटको के मंचन को रुकवाने की कोशिश की । लेकिन हबीब की जिजीविषा पर कोई असर नहीं हुआ और अपने नाटकों के माध्यम से वो अलख जगाते रहे, बगैर डरे, बगैर घबराए । रंगमंच की इस महान विभूति को हमारी श्रद्धांजलि ।

टूटते सपनों की दास्तां

एक रचनाकार के तौर पर मृदुला गर्ग आज हिंदी साहित्य में किसी परिचय की मोहताज नहीं है । मृदुला गर्ग लगभग चार दशक से लेखन में सक्रिय हैं । कहानी और उपन्यास के अलावा पत्र-पत्रिकाओं भी उन्होंने विपुल लेखन किया है । लेकिन तेरह साल बाद मृदुला गर्ग का नया उपन्यास मिलजुल मन, सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से छपकर आ रहा है । मृदुला गर्ग के दो उपन्यास- चितकोबरा और कठगुलाब की  साहित्यिक जगत में खासी चर्चा हुई थी और लेखिका को प्रसिद्धि भी मिली थी । चितकोबरा में जो संवेदनशील स्त्री अपने नीरस जीवन से उबकर सेक्स के प्रति असामान्य आकर्षण दिखाती है वो कठगुलाब तक पहुंचकर संवेदना के स्तर पर अधिक प्रौढ़ नजर आती है । और इस उपन्यास मिलजुल मन में वो और मैच्योरिटी के साथ सामने आती है । 
इस उपन्यास मिल जुल मन की नायिका गुलमोहर उर्फ और उसकी सहेली मोगरा है । अपने इस उपन्यास में लेखिका ने आजादी के बाद के दशक में लोगों के मोहभंग के दौर को बेहद शिद्दत के साथ उठाया है । आजादी मिलने पर लोगों के मन में एक सपना था , एक सुनहरे भविष्य की कल्पना थी, बेहतर जीवन प्राप्ति की ललक थी । देश का हर नागरिक खुशहाली की चाह लिए था । युवक-युवतियों के मन में सफल होने की चाहत हिलोरें ले रही थी । एक खुशनुमा जिंदगी और समाज की उन्नति का सपना देख रहे लोगों ने आजादी की लड़ाई में संघर्ष किया था और जब आजादी मिली तो पूरे देश ने एक सपना देखा था । इस सपने के टूटने और विश्वास के दरकने की कहानी है मृदुला गर्ग का नया उपन्यास - मिलजुल मन । इस उपन्यास की भूमिका में लेखिका कहती हैं - दुविधा के अलावा और कई मायनों में अजब था वह वक्त । सदी भर पहले देखा , आजादी का सपना पूरा हुआ था । पर आजादी का जो सुंदर, सजीला, अहिंसक चेहरा हमने ख्यालों में तैयार किया था, मुल्क के तक्सीम होने के साथ, सपने की तरह तड़क कर बिखर गए । सपने के टूटने पर हमने असलियत में जीना कबूल नहीं किया, नया सपना पाल लिया । दुविधा में आ मिला मासूमियत भरा यकीन कि हम गुटनिरपेक्ष और मिली जुली अर्थव्यवस्था का ऐसा संसार बसाएंगे कि दुनिया हमारा लोहा मानेगी और हम विश्वगुरु कहलाएंगें । तो ये जो आजादी के बाद का मासूमियत और दुविधा के घालमेल से बना सपना था, जो आजादी के बाद कुछ वर्षों तक जनता ने देखा था, टूटकर बिखरने लगा । और सपने के इस टूटने और बिखरने को ही लेखिका ने इस उपन्यास का विषय बनाया । लगभग चार सौ पृष्ठों के इस वृहदाकार उपन्यास में गुल और मोगरा के बहाने मृदुला गर्ग ने आजादी के बाद के दशकों में लोगों की जिंदगी और समाज में आनेवाले बदलाव की पड़ताल करने की कोशिश करती है । मोगरा के पिता बैजनाथ जैन के अलावा डॉ कर्ण सिंह, मामा जी, बाबा, दादी और कनकलता के चरित्र चित्रण के बीच गल बड़ी होती है और इस परिवेश का उसेक मन पर जो मनोवैज्ञानिक असर होता है उसका भी लेखिका ने कथानक में इस्तेमाल किया है । 
अपने इस नए उपन्यास में मृदुला गर्ग अपने पात्रों के माध्यम से हिंदी के लेखकों पर बेहद ही कठोर टिप्पणी करती है - तभी हिंदी के लेखक शराब पीकर फूहड़ मजाक से आगे नहीं बढ़ पाते । मैं सोचा करती थी, लिक्खाड़ हैं,सोचविचार करनेवाले दानिशमंद । पश्चिम के अदीबों की मानिंद, पी कर गहरी बातें क्यों नहीं करते, अदब की, मिसाइल की, इंसानी सरोकार की । अब समझी वहां दावतों में अपनी शराब खुद खरीदने का रिवाज क्यों है । न मुफ्त की पियो और न सहने की ताकत से आगे जाकर उड़ाओ । अपने यहां मुफ्त की पीते हैं और तब तक चढ़ाते हैं जबतक अंदर बैठा फूहर मर्द बाहर ना निकल आए । ये लेखिका का प्रिय विषय भी रहा है । हिंदी लेखकों को बेनकाब करता इनका एक उपन्यास 1984 में प्रकाशित हो चुका है । मैं और मैं भी एक धूर्त लेखक द्वारा एक नई लेखिका के शोषण को विषय बनाकर महानगरीय परिवेश में  लेखक समाज की विकृतियों को उद्घघाटित किया था । 
इसके अलावा इस उपन्यास में गुल के व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं - एक लड़की, एक प्रेमिका, एक पत्नी, एक कथाकार को विस्तार से विश्लेषित किया है । हर पहलू का मनोविज्ञान उसके मन में चलनेवाले विचार और उसका उसके व्यक्तित्व पर असर सबकुछ लिखा गया है । इस उपन्यास की भाषा में रवानगी तो है लेकिन खालिस उर्दू के शब्दों का ज्यादा प्रयोग भाषा के प्रवाह को गाहे बगाहे बाधित करता है । इसके अलावा इस उपन्यास की एक बड़ी कमजोरी इसका आकार और घटनाओं का अनावश्यक विस्तार है, जिसे कुशल संपादन के जरिए कसा जा सकता था । इससे ना केवल पाठकों को बांधा जा सकता था बल्कि कथा भी सधती । इस उपन्यास को लेखिका ने जिस बड़े फलक पर उठाया है उसको संभालने में काफी मशक्कत भी की है, श्रमपूर्वक घटनाओं को समेटा है, लेकिन हर घटना को बढ़ाते रहने का लोभ मृदुला गर्ग संवरित नहीं कर पाई है । नतीजा ये हुआ है कि उपन्यास विस्तृत होता चला गया और कहानी में बार- बार ये एहसास होने लगा कि जबरदस्ती विस्तार दिया जा रहा है । घटनाओं के अलावा संवाद भी काफी लंबे-लंबे हैं जिसमें पाठकों के उलझने का खतरा है ।  

Sunday, May 17, 2009

बचपन पर हमला


कुछ दिनों पहले की बात है कि हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी ने बताया कि एक दिन वो अपनी छह सात साल की बिटिया के साथ आईपीएल मैच देख रहे थे, इस बीच अचानक ब्रेक में गर्भ निरोधक गोली आई -पिल का विज्ञापन आया । उनकी बिटिया ने मासूमियत से ऐसे-ऐसे सवाल पूछे कि पिता को जबाव देते नहीं बन रहा था । बिटिया उस विज्ञापन में कहे गए शब्दों की जानकारी लेने पर उतारू थी और पिता के सामने गंभीर संकट । किसी तरह से मामला निबटा । लेकिन बच्चों की जिज्ञासा को आप बहला फुसला कर टाल नहीं सकते, क्योंकि वो फौरन इस बात को भांप लेते हैं कि उनको टरकाया जा रहा है । इसी तरह का एक और वाकया हमारी एक महिला सहयोगी ने बताया । यह वाकया बेहद दिलचस्प था- हुआ यूं कि एक दिन वो पूरे परिवार के साथ टीवी देख रही थी कि अचानक उसका साढ़े पांच का साल का बच्चा चिल्लाया- देखो मम्मियों का डायपर आया । दरअसल उसवक्त टीवी पर सैनेटरी नैपकिन का विज्ञापन आ रहा था, बच्चा बगैर कुछ सोचे समझे चिल्ला रहा था, और  ड्राइंग रूम में एक साथ बैठ कर टीवी देख रहा पूरा परिवार सन्न । सब एक दूसरे से नजरें छिपा रहे थे । ये तो उस वक्त हुआ जब बच्चे परिवार के साथ या फिर अपने मां-बाप के साथ टीवी देख रहे थे, और उनके मन में विज्ञापनों को देखकर जो भी सवाल उठते हैं उसे वो जानने की कोशिश कर रहे थे । उस वक्त की कल्पना करिए जब बच्चे घर में अकेले टीवी देखते हैं और ऐसे विज्ञापनों को देखकर उनके मन में जो सवाल उठते हैं, उस वक्त इसका जबाव देने वाला कोई होता नहीं है और बाल मन पर इसका क्या असर पड़ता होगा, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है । 
इस बात को ज्यादा अरसा नहीं बीता है । मैं अपने परिवार के साथ दिल्ली के पास के एक मॉल में घूम रहा था । अपनी बिटिया के लिए कपड़ों की तलाश में भटकते हुए बच्चों के कपड़ों के सेक्शन में चला गया । मेरी बेटी को स्कर्ट और लंहगा बेहद पसंद है इसलिए हमलोग उसकी तलाश में जुट गए । हम जहां  कपड़े देख रहे थे वहीं पर कुछ और युवा मां भी अपनी छोटी छोटी बेटियों के साथ खरीदारी कर रही थी । सबलोग अपने बच्चों की पसंद नापसंद का ध्यान रख रहे थे और बच्चे थे कि बड़ों की तरह कपड़ों को रिजेक्ट किए जा रहे थे । मां-बाप अपने-अपने बच्चों को मनाने में जुटे थे । अचानक तीन चार साल की एक लड़की ट्रायल रूम से अपनी मम्मी के साथ रोती हुई बाहर आई और अपने पापा की ओर मुखातिब होकर कहा कि पापा मुझे ये स्कर्ट पसंद नहीं है, मुझे ये नहीं लेना है । युवा पापा ने अपनी युवा पत्नी से पूछा कि क्या हो गया ये रो क्यों रही है । मम्मी ने रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ कहा कि अपनी बिटिया से ही पूछ लो । जब उसने अपनी छोटी और प्यारी सी बिटिया से पुचकार कर पूछा तो उसने सुबकते हुए कहा कि पापा इसमें नेवल नहीं दिखता, इसलिए मुझे ये नहीं लेना है । उसकी ये बात सुनते ही मेरे समेत वहां मौजूद कई लोग चौंके, लेकिन उस छोटी बच्ची की मां ने कहा कोई बात नहीं बेटा दूसरा ट्राई कर लेते हैं ।उस बच्ची ने इतनी बड़ी बात कह दी लेकिन उनके मां-बाप ने इसे बेहद सहजता से लिया ।  इतनी बड़ी बात उस छोटी सी लड़की ने कहा और उसके मां बाप ने जिस अंदाज में लिया वो मेरे लिए न  सिर्फ चौंकाने वाला था बल्कि चकित करनेवाला भी । मैं जब उस सुपर स्टोर से बाहर निकला तो मेरे जेहन में बार बार उस छोटी सी बच्ची की प्रतिक्रिया गूंज रही थी । मैं लगातार अपने आप से ये जानने की कोशिश कर रहा था कि क्या वजह थी जो उस छोटी सी बच्ची ने कहा कि मम्मा नेवल नहीं दिखता । उसके लिए इसके मायने क्या थे, कहां से ये सोच उसके अंदर आई, किससे प्रभावित होकर उसने ये कहा और उसके मां बाप ने इसे उतनी सहजता से कैसे लिया । ये बात मुझे इतना परेशान कर रही थी कि मैं वापस उस स्टोर में गया तो वो लोग बाहर निकलते हुए मिल गए । मैंने उस बच्ची के पिता को रोका और उनसे पूछा कि उस बच्ची ने नेवल नहीं दिखने जैसी बात क्या सोचकर कही और उसके लिए इसके मायने क्या हैं । उसके पिता ने छूटते ही कहा अरे भाई साहब आप किस चक्कर में पड़े हो ये बिल्कुल नई पीढ़ी है और इनकी सारी सोच  टेलीविजन के हिसाब से चलती है ,आजकल ये टीवी पर आनेवाले डांस शो के ड्रेसेस देखकर अपनी ड्रेस तय कर रही हैं । ये कहकर वो युवा दंपत्ति सहज भाव से आगे बढ़ गया ।  
ये तीन घटनाएं ऐसी हैं जो हमें ये सोचने पर विवश करती हैं कि टेलीविजन ने हमारे समाज को, हमारे जीवन, हमारे रहन सहन को किस कदर प्रभावित कर दिया है कि तीन चार साल की बच्ची भी, जो देश का भविष्य है, इसके प्रभाव से अछूती नहीं रह सकी हैं । 
हमसे और हमारी पीढ़ी के पहले के लोग सिनेमा से जबरदस्त रूप से प्रभावित होते थे । अमिताभ बच्चन से लोग इतने प्रभावित हुए थे कि कई लोगों ने अपने बच्चों का नाम विजय रख दिया था जो आमतौर पर अमिताभ की हर फिल्मों में उसका नाम होता था । अमिताभ के बोलने के अंदाज भी लोगों को खूब भाया और उसकी भी जमकर नकल हुई । राजेश खन्ना के स्कार्फ का जादू भी उस जमाने के लड़कों के सर चढकर बोलता था । ऋषि कपूर की फिल्म बॉबी के बाद तो कपड़े के एक खास डिजाइन का नाम ही बॉबी प्रिंट हो गया । फिर सलमान की एक फिल्म आई थी- मैंने प्यार किया- जिसमें उसने एक टोपी पहनी थी जिपर फ्रेंड लिखा था और बाजार में हर दूसरा लड़का उसी तरह की फ्रेंड लिखी टोपी पहने नजर आने लगा था । लेकिन फिल्मों से आमतौर पर युवा वर्ग प्रभावित होता रहा है, बल्कि अच्छी बुरी चीजें अपनाता भी रहा है । लेकिन ये तो टेलीविजन का ही कमाल है कि उसने घर-घर में बच्चों को भी अपनी जद में ले लिया । बच्चे ना केवल टीवी पर आनेवाले सिरियल से प्रबावित होते हैं बल्कि विज्ञापन भी उन्हें बेहद पसंद आते हैं और नवो उनकी नकल भी करते हैं । रियल्टी शो की नकल करने में कई बच्चों की जान भी जा चुकी है । ये सबकुछ एक सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है और देश के   भविष्य पर भी टीवी के माध्यम से प्रभाव कायम करने की कोशिश की जा रही है। 
मुझे तरस आ रहा है समाज में नैतिकता के उन तथाकथित ठेकेदारों पर जो लड़कियों के पहनावे पर पहरा लगाने की कोशिश में गाहे बगाहे हंगामा बरपाते रहते हैं । लड़कियों के बीयर बार में मौजूदगी पर उनपर हमले करते हैं और उनके साथ मार पीट भी करते हैं । तरस उन स्कूल कॉलेज प्रशासन पर भी आता है जो ड्रेस कोड के नाम पर गाहे बगाहे जींस और स्कर्ट पर प्रतिबंध लगाने की नाकाम कोशिश कर हंगामा को आमंत्रण देते हैं । उनकी इन हरकतों से कुछ भी नहीं होनेवाला है क्योंकि उनको ये नहीं पता कि टीवी के मार्फत कब हमारी पूरी की पूरी संस्कृति खामोशी से बदल गई इसका  इल्म न तो भारतीयता के नाम पर अपनी दुकान चलाने वालों को है और न ही स्कूल कॉलेज में बैठे प्रशासकों को । भारतीय संस्कृति के नाम पर अपनी दुकान चलानेवाले भगवा ब्रिगेड की अज्ञानता पर तरस आता है । अब भी वो सतयुग में जी रहे हैं, दुनिया कहां से कहां चली गई और वो धोती कुर्ते और साड़ी में ही उलझे हुए हैं, समाज में हुई खामोश क्रांति का ना तो उन्हें इल्म है ना ही अंदाज । वो तो विश्वविद्यालय के उन आलोचकों की तरह हैं जो अब भी निराला और मुक्तिबोध में ही उलझे हुए हैं, कुछ तो मीरा और कबीर की रचनाओं में ही नया अर्थ ढूंढ रहे हैं । 
मुझे तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 'संस्कृति के चार अध्याय' में लिखी वो पंक्ति याद आ रही जहां दिनकर जी ने लिखा है -- "विद्रोह क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है....घाव भी फूटने के पहले काफी दिनों तक पकता रहता है " तो हमारी संस्कृति में जो खामोश बदलाव या कहें खामोश क्रांति आई वो भी अचानक नहीं आई है । इस खामोश बदलाव के पीछे भी कई सालों तक फिल्मों या टीवी का प्रभाव रहा जो कि अपनी सभ्यता और संस्कृति को छोड़ पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में जुटे रहे और आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता परोसते रहे । नतीजा ये हुआ कि जो उम्र बच्चों के खेलने और मासूमियत भरी शैतानी करने की होती है उसमें वो अपने ड्रेस के बारे में सोच रहे है । 
----------------------------------------------------- 

Sunday, May 10, 2009

पत्रिकाओं के बहाने...

25 जून 1999 को समीक्षक और स्तंभकार भारत भारद्वाज ने मुझे एक भारी भरकम पत्रिका का प्रवेशांक भेंट किया जो आकार प्रकार और अपने सादे कवर की वजह से आकर्षक लग रहा था । उस पत्रिका का नाम था- बहुवचन, प्रकाशक था महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और पत्रिका के प्रधान संपादक थे विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अशोक वाजपेय़ी, जिनके संपादक के रूप में नाम छपा था पीयूष दईया का । आज से लगभग दस वर्षों पूर्व जब ये पत्रिका छपी थी तब पीयूष दईया का नाम हिंदी में नया और अनजाना सा था । बहुवचन के साथ ही विश्विविद्यालय ने दो और पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया था- पुस्तक वार्ता जिसके भी प्रधान संपादक अशोक वाजपेयी थे और पत्रकार थे पत्रकार राकेश श्रीमाल । तीसरी पत्रिका थी अंग्रेजी में - हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग, इसके संपादक थे रुस्तम सिंह । 
जब इन पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ था तो तो हिंदी साहित्य में इसपर जमकर बहस चली थी । अशोक वाजपेयी के विरोधियों का आरोप था कि विश्विविद्यालय का काम पत्रिकाएं छापना नहीं है । लेकिन इन आरोप लगानेवालों को ये ज्ञान नहीं था कि देश-विदेश की लगभग सभी विश्विविद्यालयों से पत्रिकाएं निकलती हैं, चाहे वो कैंब्रिज हो , ऑक्सफोर्ड हो या फिर लखनऊ या भागलपुर विश्विविद्यालय । ये अवश्य है कि भारत में विश्वविद्यालयों की पत्रिकाएं सिर्फ रस्मी तौर पर निकलती हैं जिसे छपने के बाद गोदामों में ठूंस दिया जाता है, जिसे कालांतर में रद्दी के भाव बेच दिया जाता है। क्या मुझे यहां ये कहने की जरूरत है कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज से निकलने वाली पत्रिकाओं की विश्व में क्या प्रतिष्ठा है ? 
लंबे समय से विश्विद्यालय के हिंदी विभागों में कुंडली मारकर बैठे साहित्य के आचार्यों को ये बात हजम नहीं हो रही थी कि हिंदी के नाम पर खुले विश्विविद्यालय में उनकी कोई पूछ नहीं हो रही है । नए-नए 'लौंडे लफाड़ों' को पत्रिका का संपादक बना दिया गया है और वर्षों से साहित्य साधना में लीन आचार्यों की प्रतिष्ठा और निष्ठा को दरकिनार कर दिया गया है । अशोक वाजपेयी पर जमकर हमले हुए लेकिन पांच वर्षों 'बहुवचन' और 'पुस्तक वार्ता' नियमित रूप से निकलती रही । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का प्रकाशन अवश्य बाधित हुआ, वजह तो तत्कालीन कुलपति ही बता सकते हैं । अशोक वाजपेयी के बाद जी गोपीनाथन कुलपति बने, जिनके कार्यकाल में धीरे-धीरे इन पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया, साहित्य जगत को खबर भी नहीं लगी । 
अब नए कुलपति विभूति नाराय़ण राय के प्रभार संभालने के बाद फिर से इन तीनों पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरु हुआ है । बहुवचन (संपादक- राजेन्द्र कुमार), पुस्तक वार्ता(संपादक- भारत भारद्वाज), हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग(संपादक- ममता कालिया) । दस वर्षों में बहुवचन का टैग लाइन भी बदल गया है जो पत्रिका के बदले हुए मिजाज का संकेत है । प्रवेशांक में लिखा था- बहुवचन, साहित्य भाषा शोध विचार की पत्रिका । लेकिन अब बहुवचन- बहुसुमन, बहुरंग निर्मित एक सुंदर हार- हो चुका है । इन दोनों टैग लाइन पर ही अगर हम विचार करें तो पत्रिका के चरित्र में बदलाव को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । पहले अंक में - यह प्रवेशांक- शीर्षक से एक टिप्पणी थी, जिसमें लिखा गया था कि 'यह प्रयत्न हिंदी में सक्रिय अनेक पीढ़ियों, अनेक दृष्टियों और शैलियों के लेखकों को एकत्र करने का है ।' जो उस अंक में दिखा भी था । बहुवचन के नए अंक में संपादकीय का शीर्षक देखिए - 'यह नवोन्मेषांक ।' ये हिंदी इतनी कठिन है कि आम पाठकों को भी समझ नहीं आएगी । संपादकीय में भी जिस शास्त्रीय शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इसको न सिर्फ जटिल बना देता है बल्कि बोझिल भी । महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का एक उद्देश्य पूरे विश्व में हिंदी को इंटरनेशनल भाषा के तौर पर मान्यता दिलवाना भी है । लेकिन अगर पत्रिका के संपादक ही इस तरह की जटिलतम भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो हिंदी पढ़ने समझनेवाले ही इससे दूर हो जाएंगे, गैर हिंदी भाषी के तो पास आने का सवाल ही नहीं उठता । 
बहुवचन के संपादक राजेन्द्र कुमार ने अपने संपादकीय में लिखा है- 'यह शिकायत प्राय सुनने को मिलती है कि हमारे विश्वविद्यालय अकादमिक जड़ता के 'भव्य ठिकाने' होते जा रहे हैं । खासतौर से हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन 
में लगे लोगों के बारे में आम धारणा यह है कि भाषा और साहित्य उनके लिए वहीं तक महत्वपूर्ण जहां तक वह उनकी आजीविका का विषय बनता हो । जिज्ञासा का विषय वो बने, इसका क्या लाभ । अपने ज्ञान के स्तर को अद्यतन बनाने में उनकी अधिक रुचि नहीं, जितनी अपनी सुख सुविधाओं को अद्यतन बनाने में ।' और बहुवचन का ये पूरा अंक इस आम धारणा को पूरी तरह से नहीं तो आंशिक तौर पर अवश्य ही मजबूत करता है । इसके अलावा अगर हम बहुवचन के जनवरी-मार्च 2009 के अंक के लेखकों की सूची पर नजर डालें तो ये पत्रिका महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की कम जन संस्कृति मंच की पत्रिका ज्यादा लगती है । 
दूसरी पत्रिका- पुस्तक वार्ता- के संपादक भारत भारद्वाज हैं जो पिछले दो दशकों से हंस में के अपने लोकप्रिय स्तंभ और अन्य पत्र पत्रिकाओं में लेखकों की खबर लेते रहे हैं । इस पत्रिका के चरित्र में कोई ज्यादा बदलाव नहीं किया गया है । लेकिन संपदकीय में भविष्य में इसकी प्रकृति में बदलाव के संकेत साफ हैं- 'यह मुख्यत समीक्षा (रिव्यू) की पत्रिका है । कुछ कुछ अंग्रेजी की 'बिब्लियो' और 'द वीक रिव्यू' की तरह । लेकिन भविष्य़ में इसकी प्रकृति में  बदलाव करते हुए सृजनात्मकता और समकालीन वैचारिक विमर्श का उन्मुक्त मंच बनाने की मेरी आकांक्षा है ।' लोकार्पण समारोह में विश्वविद्यालय के कुलाधिपति नामवर सिंह ने भारत भारद्वाज को बहुपठित और अद्यतन सूचनाओं से लैस लेखक बताते हुए अपनी अपेक्षाएं भी जाहिर की थी । पुस्तक वार्ता के ताजे अंक में कुंवर नारायण पर पठनीय सामग्री है । बजुर्ग आलोचक नंदकिशोर नवल ने अपनी याददाश्त के आधार पर पुस्तकों की एक लंबी सूची गिना दी है, कुछ रोचक प्रसंगों के साथ । इस अंक की एक विशेषता साहित्य कोलाहल है, जिसे प्रज्ञाचक्षु के छद्म नाम से कोई लिख रहा/रही है । ये स्तंभ काफी रोचक और दिलचस्प जानकारियों से भरा है । लेकिन पुस्तक वार्ता की आत्मा भी बिहार की ओर झुकी नजर आती है, बावजूद इसके आनेवाले दिनों में ये पत्रिका हिंदी में सार्थक हस्तक्षेप की आहट तो दे ही रही है । 
वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने  हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग का संपादन किया है । इस पत्रिका पर हिंदी में जो कुछ महत्वपूर्ण लिखा जा रहा है या लिखा जा चुका है उसे अंग्रेजी में अनूदित करवा कर विश्व पटल पर पेश करना है । ममता कालिया जब इस पत्रिका की संपादक बनी थीं तब विश्वविद्यालय से जुड़ी गगन गिल ने अच्छा खासा विवाद खड़ा कर दिया था, जिसे जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने भी हवा दी थी । लेकिन अब जब पत्रिका छपकर आई तो तमाम विवादों पर विराम लगा गया । इस पूरी पत्रिका में रचनाओं और रचनाकारों के चयन में बेहतरीन संपादकीय दृष्टि को साफ तौर पर परिलक्षित किया जा सकता है । रचनाकारों के चयन में ममता कालिया पर ये आरोप है कि उन्होंने अपनी पत्रिका में अपने पति रवीन्द्र कालिया की रचना का अनुवाद छापा । लेकिन आलोचना करनेवाले ये भूल जाते हैं कि रवीन्द्र कालिया हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं और कोई भी संपादक उनकी रचनाएं छापने को उत्सुक रहता है । लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या रिश्तेदार होने की वजह से ही सिर्फ लेखक को दरकिनार करने का हक संपादको को है । कतई नहीं । हिंदी- लैंग्वेज, डिस्कोर्स एन्ड रायटिंग की सबसे बड़ी कमजोरी अनुवाद है । ज्यादातर अनुवाद में वो प्रवाह और रवानगी नहीं है जो मूल रचनाओं में है । इसके अलावा इस पत्रिका में अगर तीन महीनों में हिंदी की महत्वपूर्ण गतिविधियों को शामिल किया जा सके तो गैंर हिंदी भाषियों की जानकारी समृद्ध होगी और विश्विविद्यालय के उद्देश्य की पूर्ति भी ।  

Thursday, May 7, 2009

एक खामोश मौत

भोजपुरी फिल्मों के शेक्सपियर कहे जानेवाले मोती ने गुमनामी में दम तोड़ दिया । मीडिया में कम ही लोग इस नाम से परिचित हैं । मोती बीए की खामोश मौत पर इकबाल रिजवी ने हाहाकार के लिए खासतौर पर ये लेख लिखा है ।

-------------------------------

आज़ादी से पहले उन्होंने एमए कर लिया था लेकिन कविता के मंच पर अपनी क्रांतिकारी रचनाओं की वजह से वे तब देश भर में चर्चित हो गए जब उन्होंने बीए किया था और तभी से उनके नाम के आगे बीए ऐसा जुड़ा कि वे हमेशा मोती बीए के नाम से ही जाने गए। वे मोती बीए ही थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा में भोजपूरी की सर्वप्रथम जय जयकार करायी। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और भोजपुरी पर समान अधिकार रखने वाला और भोजपुरी के शेक्सपियर के नाम से याद किया जाने वाला वह गीतकार लंबी गुमनामी के बाद चुपके से सबको छोड़ कर चला गया।  

        मोती लाल बीए का पूरा नाम मोती लाल उपाध्याय था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले के बरेजी नाम के गांव में 1 अगस्त 1919 को हुआ। बचपन से ही कविता में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी। वे मनपसंद कविताओं को ज़बानी याद कर लेते थे। फिर उन्होंने खुद कविताएं लिखनी शुरू कर दीं। उनकी पढ़ाई वाराणसी में हुई। 16 साल की उम्र में पहली बार उनकी कविता दैनिक आज में प्रकाशित हुई। जिसके बोल थे " बिखरा दो ना अनमोल - अरि सखि घूंघट के पट खोल "।  जब उन्होंने बीए करा तब तक वे कवि सम्मेलनो में एक गीतकार के रूप में पहचान बना चुके थे। उन्होंने अपने नाम के आगे बीए लगाना शुरू कर दिया। उस समय आज़ादी की जंग जोरो पर थी। अंग्रेज़ों के खिलाफ़ पूरे देश में माहौल बहुत गर्म था। मोती जी भोजपुरी भाषा में क्रांतिकारी गीत लिख लिख कर लोगों को सुनाया करते थे। उसी दौर का उनका एक गीत था

"भोजपुरियन के हे भइया का समझेला

खुलि के आवा अखाड़ा लड़ा दिहे सा

तोहरी चरखा पढ़वले में का धईल बा

तोहके सगरी पहाड़ा पढ़ा दिये सा "

      धीरे धीरे मोती की सक्रियता कलम के सहारे क्रांतिकारी विचारों को गति देने में बढ़ने लगी। सन् 1939 से 1943 तक "अग्रगामी संसार" तथा "आर्यावर्त" जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में कार्य के दौरान राष्ट्रीय विचारों एवं उससे जुडे़ लेखन के चलते कई बार जेल भी जाना पड़ा। 1943 में वे दो महीने की सज़ा काट कर जेल से रिहा किये गए फिर उन्होंने टीचर्स ट्रेनिंग कालेज वाराणसी में दाखिला ले लिया। इसी दौरान जनवरी 1944 में वाराणसी में हुए एक कवि सम्मेलन में पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था के निर्देशक रवि दवे ने उन्हें सुना। मोती का गीत "रूप भार से लदी तू चली" उन्हें बहुत पसंद आए और उन्होंने मोती को फ़िल्मों में गीत लिखने के लिये निमंत्रण दिया। लेकिन मोती जी अचानक मिले इस निमंत्रण को फ़ौरन स्वीकार नहीं पाए और साहित्य रचना में ही जुटे रहे। 945 में वे फिर गिरफ़्तार कर लिये गए। उन्हें वाराणसी सेंट्रल जेल में भारत रक्षा क़ानून के तहत नज़र बंद कर दिया गया लेकिन पहले की ही तरह कुछ हफ़्तों बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

      मोती जी पत्रकारिता ओर साहित्य से ही जुड़े रहना चाहते थे। फ़िल्मों में जाना उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रही फिर भी जेल से रिहाई के बाद रोज़गार के अवसर की तलाश में उन्हें रवि दवे का फ़िल्मों में गीत लिखने का निमंत्रण फिर याद आया। मोती जी ने लाहौर का रूख किया जहां पंचोली आर्ट पिक्चर संस्था थी। उनकी मुलाक़ात संस्ता के मालिक दलसुख पंचोली से हुई और पंचोली ने उन्हें 300 रूपए महीना वेतन पर गीतकार के रूप में रख  लिया। मोती को गीत लिखने के लिये पहली फ़िल्म मिली "कैसे कहूं"। इसके संगीतकार थे पंडित अमरनाथ। इस फ़िल्म में मोती ने पांच गीत लिखे शेष गीत डी एन मधोक ने लिखे। इसके बाद आयी किशोर साहू निर्देशित और दिलीप कुमार अभीनीत फ़िल्म " नदिया के पार(1948)" जिसमें सात गीत मोती बीए ने लिखे। इस फ़िल्म के गीतों की सारे देश में धूम मच गयी। खास कर इसका एक गीत "मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार " मोती बीए  की पहचान बन गया। पहली बार किसी गीतकार ने हिंदी फ़िल्मों में भोजपुरी को प्रमुखता से स्थान दिया था।

      नदिया के पार के बाद मोती जी की व्यस्तताएं बढ़ गयीं उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत लिखे। उनकी चर्चित फ़िल्में रहीं "सुभद्रा (1946)", भक्त ध्रुव (1947)", "सुरेखा हरण(1947)", "सिंदूर(1947)",  "साजन(1947)", "रामबान(1948)","राम विवाह(1949)", और "ममता(1952)",। साजन में लिखा उनका एक गीत "हमको तुम्हारा है आसरा तुम हमारे हो न हो" अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय रहा।  

      मोती बीए को फ़िल्मों में काम की कमी नहीं थी। उनके लिखे गीतों को शांता आप्टे, शमशाद बेगम, गीता दत्त, लता मंगेशक, मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, और ललिता देवलकर जैसे गायकों ने स्वर दिये। लेकिन उन्हें एहसास होने लगा था कि  मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया में सम्मान की रक्षा के साथ वहां अधिक समय तक टिक पाना संभव नहीं होगा। और एक दिन अचानक उन्होंने फ़ैसला किया वे अपने घर लौट जाएंगे। फिर यही हुआ। 1952 में मुम्बई से लौटकर वे देवरिया के श्रीकृष्ण इंटरमीडियेट कालेज में इतिहास के प्रवक्ता के रूप में पढ़ाने लगे। मुम्बई में रहने के दौरान उनकी अंतिम फ़िल्म ममता थी। कुछ सालों बाद जब चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन, सुजीत कुमार और कुछ दूसरे कलाकारों ने भोजपूरी फ़िल्मों के निर्माण की गति को तेज़ किया तो मोती बीए फिर याद किये गए। मोती जी ने कई भोजपूरी फ़िल्मों "ई हमार जनाना" (1968), ठकुराइन (1984), गजब भइले रामा (1984),  चंपा चमेली (1985), ममता आदि में गीत लिखे।  1984 में प्रदर्शित गजब भइले रामा में उन्होंने अभिनय भी किया। यह आखरी फ़िल्म थी जिससे मोती जी किसी रूप में जुड़े।

      देवरिया में अध्यापन के दौरान मोती जी साहित्य सृजन में लगे रहे। उन्होंने शेक्सपियर के सानेट्स का हिंदी में सानेट्स की शैली में ही अनुवाद किया। कालीदास के संस्कृत में लिखे मेघदूत का भोजपूरी में अनिवाद किया इसेक अलावा हिंदी में 20 पुस्तकें और उर्दू में शायरी के तीन संग्रह "रश्के गुहर", "दर्दे गुहर" और "एक शायर" की रचना की। उन्होंने भोजपूरी में भी काव्य रचना की और पांच संग्रह सृजित किये। उनकी करीब चार कृतियां अभी अप्रकाशित हैं। अध्यापन से सेवा निवृत्त होने के बाद मोती बीए जैसा गीतकार गुमनामी के अंधेरों में खोता चला गया। मोती बीए को कई सम्मान मिले लेकिन भोजपूरी के विद्वान के रूप में उनका मूल्यांकन कभी नहीं हुआ। उनके पुत्र भाल चंद्र उपाध्याय उनकी कृतियों को सहेज कर रखने का काम तो करते रहे लेकिन वे अपने पिता को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिलाने में नाकाम रहे। 

      शोहरत, सम्मान और अपनी शर्तों पर काम, सब कुछ मोती बीए को मिला लेकिन नौकरशाही ने अंत तक उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं दिया। हांलाकि इस बात का उल्लेख अनेक संवतंत्रता सेनानी और साहित्यकार समय समय पर करते रहे कि मोती बीए को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से कई बार अंग्रेज़ी शासन ने गिरफ़्तार कर जेल भेजा फिर भी उन्हें जेल भेजे जाने का रिकार्ड आज़ाद हिंदुस्तान की नौकरशाही को नहीं मिल पाया।

      पिछले कुछ सालों से मोती जी की बोलने की ताकत खत्म हो गयी थी। उन्होंने 23 जनवरी 2009 को दुनिया से विदा लेली। उत्तर प्रदेश के एक दैनिक को छोड़ उनकी मौत किसी के लिये ख़बर तक नहीं बन सकी।