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Friday, August 6, 2010

काश पूछो कि मुद्दआ क्या है / विभूति नारायण राय

नया ज्ञानोदय के अगस्त 2010 अंक मे छ्पे मेरे इंटरव्यू पर हुई प्रतिक्रियाओ से एक बात स्पष्ट हो गयी कि मैने अपनी लापरवाही से एक गम्भीर विमर्श का हेतु बन सकने का मौका गवां दिया ।मैने कुछ ऐसे शब्दो का प्रयोग किया जिनसे बचा जा सकता था ।मुझे जैसे ही यह अहसास हुआ कि मेरी भाषा से हिन्दी की बहुत सी लेखिकाओं को कष्ट हुआ है मैने अपनी गल्ती का अहसास किया और बिना शर्त माफी मांग ली ।मैं शर्मिन्दा हूँ कि मेरी असावधानी से बहुत से ऐसे लोग आहत हुए जो मेरे वर्षों पुराने मित्र रहे है,इनमे बडी सख्यां में लेखिकायें भी हैं पर मेरे मन मे उनके लिये सम्मान भी बढा है कि मित्रता की परवाह किये बगैर उन्होने मेरी मजम्मत की । हालाकि कुछ लोग जो इस मामले को अन्य कारणों से जिन्दा रखना चाह्ते हैं, इन्टरव्यू में उठाये गये मुद्दों पर बहस न कर के अभी भी उन शब्दों के वाक्जाल मे उलझे हुए हैं जिनपर मै खुद खेद प्रकट कर माफी मांग चुका हूँ । मै मानता हूं कि इन लोगों की उपेक्षा कर अब मै मुद्दों पर बहस की अपेक्षा कर सकता हूं ।
इंटरव्यू पर शुरुआती प्रतिक्रिया उन लोगों की तरफ से आयी जिन्होने उसे पढा ही नही था ।अब जब कि अधिकतर लोगों नें इंटरव्यू पढ लिया है मुझे लगता है उसमें उठाये गये प्रश्नों पर बातचीत होनी चाहिये । संक्षेप में कहूँ तो मेरे मन में मुख्य शकां यह है कि महिला लेखन मे देहकेन्द्रित लेखन को कितना स्थान मिलना चाहिए । एक मित्र ने आपत्ति की कि यह प्रश्न पुरुषों के लेखन पर भी उठना चाहिये । सही है पर विमर्श सिर्फ वंचित या हाशिये पर पहुचे हुए तबकों के लेखन से निर्मित होता है । मसलन दलित लेखन जैसा विमर्श निर्मित करता है वैसा विमर्श ब्राह्मण लेखन नही कर सकता । दलित लेखन जहाँ मानव मुक्ति की कामना करता है या उसका मुख्य संघर्ष दबे कुचलों को उनका खोया सम्मान वापस लौटाने के लिये होगा वहीं यदि ब्राह्मण लेखन जैसा कोई लेखन किया जाय तो स्वाभाविक है कि उसकी चिंता का केन्द्र मनुष्य विरोधी वर्ण व्यवस्था को वैध ठहराने के लिये तर्क तलाशना होगा और मुझे नही लगता कि ऐसे लेखन से कोई उल्लेखनीय विमर्श निर्मित होगा । इसी प्रकार महिला लेखन के केन्द्र मे स्त्री मुक्ति के प्रश्न महत्वपूर्ण होंगे । स्त्री मुक्ति में अपनी देह पर स्त्री का अधिकार एक महत्वपूर्ण तर्क है पर और भी गम है जमानें में मोहब्बत के सिवा । मेरा मानना है कि स्त्री देह पर अंतिम अधिकार उसका है पर साथ मे मै यह भी मानता हूँ कि भारत के सदंर्भ में स्त्री मुक्ति से जुडे और भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं । आज भी परिवारों में निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ पुरुषों को है , स्त्रियाँ केवल उन्हें लागू करती हैं । तमाम बहस मुबाहिसों के बावजूद घरेलू श्रम के लिये उसका पारिश्रमिक तय नही हो पा रहा है । पंचायती राज्य की संस्थाओं में आरक्षण के बल पर चुनी गयी महिलाओं मे से बहुत सी अभी भी घरों में कैद हैं और उनके प्रधान पति कागजों पर उनकी मुहरें लगाते हैं । बहुत से ऐसे मुद्दे है जिनपर बहस होनी चाहिये । अंत मे , इन सबसे महत्वपूर्ण यह प्रश्न कि क्या स्त्री मुक्ति आइसोलेशन मे हो सकती है ? क्या आदिवासियों , अल्पस्ंख्यकों या दलितों के प्रश्नों से जोडे बिना इस मुद्दे पर कोई बडी बहस खडी की जा सकती है । अगर एक बार यह सहमति बन सके तो गुजरात जैसी स्थिति से बचा जा सकता है जिसमे महिलाओं ने भी अल्पसख्यकों के सहांर मे हिस्सा लिया था ।मुझे 1990 का इलाहाबाद याद आ रहा है जहां मैं नियुक्त था और जो मडंल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के खिलाफ चल रहे आन्दोलन का केन्द्र था । मैने आन्दोलनकारियों के साथ सख्ती की तो बहुत सारे दूसरे तबकों के अतिरिक्त विश्वविद्यालय की सवर्ण लड्कियों ने मेरे खिलाफ मोर्चा निकाला और अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं उन्हें यह नही समझा पाया कि उन्हें पिछ्डों के साथ खडा होना चाहिये । यदि उनके अन्दर यह समझ होती कि वे तो पिछडों में भी पिछ्डी हैं तो सम्भवत: उन्हे मेरी बात ज्यादा आसानी से समझ मे आ जाती। एक बार फिर अपने शब्दों के लिये माफी मांगते हुये मै अनुरोध करूंगा कि इन मुद्दों पर भी बातचीत की जाय।

Thursday, August 5, 2010

विवादित इंटरव्यू के बाद निभूति नारायण राय की सफाई

विभूति नारायण राय के इंटरव्यू पर पूरे हिंदी साहित्य में घमासान मचा है । कुलपति विभूति नारायण राय के माफी मांगने के बावजूद उनकी बर्खास्तगी की मांग हो रही है । हमें लगता है कि अगर किसी को उसकी गलती का एहसास हो जाए और वो उसपर सार्वजनिक रूप से लिखित और मौखिक माफी मांग ले तो उसे माफ कर दिया जाना चाहिए । इस पूरे मसले पर विभूति नारायण राय ने हाहाकार के लिए एक लेख लिखने का वादा किया है । जो जल्द ही प्रकाशित होगा । विवादित इंटरव्यू के बाद विभूति नारायण राय का ये पहला लेख जल्द ही हाहकार पर प्रकाशित होगा

Tuesday, August 3, 2010

'छिनाल' और 'लफंगे' से शर्मसार हिंदी साहित्य

पिछले वर्षों में हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्यरूप से शरीर केंद्रित है । यह भी कह सकते हैं कि वह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है । लेखिकाओं में होड़ लगी है यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है । मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक कितनी बिस्तरों पर कितनी बार हो सकता है । इस तरह के उदाहरण बहुत सी लेखिकाओं में मिल जाएंगे - यह कहना है महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का । विभूति का यह विवादास्पद साक्षात्कार भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक पत्रिका नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुआ है । तकरीबन हफ्तेभर पहले जब पत्रिका का अंक बाजार में आया तो हिंदी के लेखकों के बीच इस साक्षात्कार को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई थी लेकिन खुला विरोध नहीं हो रहा था । अचानक से एक दिन दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर विवाद खड़ा कर दिया । अंग्रेजी अखबार के नादान संवाददाता ने छिनाल शब्द का अंग्रेजी अनुवाद प्रोस्टीट्यूट कर दिया । जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया । दरअसल छिनाल शब्द भोजपुरी के छिनार शब्द का परिष्कृत रूप है । यह एक आंचलिक शब्द है जिसका प्रयोग बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में किया जाता है । छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है जो कुलटा होती हैं या फिर स्त्रियोचित मर्यादा को भंग कर अपनी मर्जी से कई पुरुषों से संबंध बनाती है । लेकिन वो किसी भी हाल में वेश्या नहीं होती । बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी इलाकों में शादी ब्याह के मौके पर गाए जानेवाले लोकगीतों में महिला और पुरुष दोनों को छिनाल या छिनार कहा जाता है । शादी ब्याह के मौके पर जब महिलाएं मंगलगीत गाती हैं तो उसमें दूल्हे की मां और मौसी और फूआ को गाली दी जाती है तो उनमें छिनार शब्द का प्रयोग किया जाता है । तो यह शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है । यह गाली है और किसी भी लेखक को अपनी बिरादरी की महिलाओं के लिए इस शब्द के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है ।
जैसा कि उपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है । और अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़ा दिया । लेखिलाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय ने किया उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वो अखबार कर रहे हैं जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं । न्यूज चैनलों को भी इस मसालेदार खबर में संभावना दिखी और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में उन्होंने छिनाल और वेश्या के अंतर को मिटा दिया। किसी ने भी यह जांचने –परखने की कोशिश नहीं की कि दोनों में क्या अंतर है । मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया । हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की मांग होने लगी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी ये मामाला पहुंच गया । लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया । राय ने लेखिकाओं के खिलाफ बेहद अपमानजनक और अर्मायदित टिप्पणी की है । इस बात के लिए उनको लेखिकाओं से खेद प्रकट करना ही चाहिए ।
लेकिन इस इंटरव्यू और उसके बाद उसपर उठे विवाद ने एक बार फिर से हिंदी साहित्य में लेखिकाओं के आत्मकथाओं में अश्लील प्रसंगों की बहुतायत पर बहस का एक व्यापक आधार तैयार कर दिया है । पिछले दिनों कई लेखिकाओं की आत्मकथा प्रकाशित हुई जिसमें मैत्रेयी पुष्पा की – गुड़िया भीतर गुड़िया, प्रभा खेतान की अन्या से अनन्या , मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी के अलावा कृष्णा अग्निहोत्री की लगता नहीं है दिल मेरा और ....और और औरत प्रमुख हैं । मन्नू जी की आत्मकथा को छोड़कर इन आत्मकथाओं में सेक्स प्रसंगों का उल्लेख मिलता है । विभूति नारायण राय जैसे हिंदी के शुद्धतावादियों को इन सेक्स प्रसंगों पर एतराज है और उन्हें लगता है कि ये जबरदस्ती ठूंसे और गढ़े गए हैं ताकि किताबों को चर्चा और पाठक दोनों मिले । ये लोग अपने तर्कों के समर्थन में जॉर्ज बर्नाड शॉ के एक प्रसिद्ध लेख का सहारा लेते हैं जिस लेख में उन्होंने आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन विश्व साहित्य में कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । हिंदी में भी कई ऐसे आत्मकथा हैं जो सचाई के करीब हैं और झूठ का सिर्फ झौंक लगाया गया है । हो सकता है कि इन एतराज में सचाई हो लेकिन लेखक क्या लिखेगा यह तो वही तय करेगा । शुद्धतावादियों और आलोचक तो ये तय नहीं करेंगे । कुछ आलोचकों का तर्क है कि महिला लेखिकाओं की आत्मकथाएं भी दलित लेखकों की आत्मकथाओं की तरह टाइप्ड होती जा रही हैं- जहां कि समाज के दबंग, लेखकों के परिवार की महिलाओं के साथ लगातार बदसलूकी करते हैं । इस तर्क में कुछ दम हो सकता है लेकिन दलित और महिलाओं की जो स्थिति भारतीय समाज में है उसमें यौन शोषण की स्थितियां भी तो सामान्य हैं । इन दोनों पक्षों के तर्कों पर साहित्य में एक लंबे और गंभीर विमर्श की गुंजाइश है ।
दूसरा बड़ा सवाल जो यह इंटरव्यू खड़ा करती है वो यह कि किसी भी पत्रिका के संपादक का क्या दायित्व होता है । अगर छिनाल शब्द कहने पर विभूति नारायण राय की चौतरफा आलोचना हो रही है तो उतनी ही तीव्रता से नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया को भी विरोध होना चाहिए । किसी भी पत्रिका में क्या छपे और क्या नहीं छपे इसकी जिम्मेदारी तो पूरे तौर पर संपादक की होती है । विभूति ने लेखिकाओं के लिए जो आपत्तिजनक शब्द कहे उसे रवीन्द्र कालिया को संपादित कर देना चाहिए था । अगर उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया तो उनकी मंशा इस साक्षात्कार को विवादित करने और नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को चर्चित करने की थी । अगर संपादक की यह मंशा नहीं थी और असावधानीवश वो शब्द छूट गया तो विभूति के साथ-साथ उन्हें भी खेद प्रकट करना चाहिए ।
अंत में विनम्रतापूर्वक इतना कहना चाहूंगा कि हिंदी साहित्य में विमर्श के स्तर को इतना नहीं गिराइये जहां कोई लेखक अपनी साथी लेखिकाओं को छिनाल कहे और कोई लेखिका अपने साथ के लेखकों को लफंगा । गुस्से में या जानबूझकर दोनों ही स्थितियों में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को लांघना अनुचित है ।
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Wednesday, July 28, 2010

उग्र और आक्रामक विमर्श

1.लीडर बनना औरतों का काम नहीं है, उनका काम लीडर पैदा करना है । कुदरत ने अल्लाह ने उन्हें इसलिए बनाया है कि वो घर संभालें, अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा करें – शिया धर्म गुरू कल्बे जव्वाद

2.महिलाओं को अकेले मंदिर, मठ या देवालय में नहीं जाना चाहिए । अगर वो मंदिर, मठ या देवालय जाती हैं तो उन्हें पिता, पुत्र या भाई के साथ ही जाना चाहिए । नहीं तो उनकी सुरक्षा को खतरा है ।- राम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंथ नृत्यगोपाल दास

3.महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं की महती भूमिका है और उन्हें आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए । -गोवा के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत
4. अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला और वो संसद में आईं तो वहां जमकर सीटियां बजेंगी- सामजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव
ये चार बयान अलग-अलग धर्म और विचारधारा के लोगों के हैं जो किसी समुदाय, वर्ग या सूबे की रहनुमाई करते हैं । दरअसल ये सारे बयान घोर सामंती व्यवस्था की पुरुषवादी मानसिकता का बेहद कुरुप चेहरा है । उस व्यवस्था का जहां महिलाएं बच्चा पैदा करने की मशीन हैं, बच्चा पालना उनका परम धर्म है । परिवार की देखभाल और अपने पति की हर तरह की जरूरतों पर जान न्योछावर करने की घुट्टी उसे जन्म से पिलाई जाती है । उस आदिकालीन वयव्स्था में महिलाएं गुलाम हैं जिनका परम कर्तव्य है अपने स्वमी की सेवा और स्वामी है पुरुष । इस पाषाणकालीन व्यवस्था में यकीन रखनेवाले पुरुषों को यह कतई मंजूर नहीं है कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करें । महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक और दर्जा मिले । महिलाएं देश की नीति नियंता बने । उपर बयान देने वाले चारो महापुरुष इसी सामंती और पुरुष प्रधान व्यवस्था के प्रतिनिधि पुरुष हैं । महिलाओं का विरोध है किसी सिद्धांत, धर्म, आस्था, विश्वास या वाद के परिधि से परे है । जब भी महिलाओं की बेहतरी की बात होती है तो सभी सिद्धांत, वाद, समुदाय, धर्म धरे रह जाते हैं । प्रबल हो जाता है कठोर पुरातनपंथी विचारधारा जो महिलाओं को सदियों से दबा कर रख रहा है और आगे भी चाहता है कि वो उसी तरह दासता और पिछड़ेपन की बेड़ियों में जकड़ी रहें ।

लेकिन अब स्थितियां बदलने लगी हैं और पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्व के विरोध में स्त्रियां उठ खड़ी होनी लगी हैं । राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श की जो आग सुलगाई थी अब वो लगभग दावानल बनता जा रहा है । स्त्री लेखिकाओं ने पुरुष की सत्ता को चुनौती देनी शुरू कर दी है । इन्हीं चुनौतियों के बीच पत्रकार गीताश्री की किताब– नागपाश में स्त्री- का प्रकाशन हुआ है । गीताश्री ने इस किताब का संपादन किया है जिसमें पत्रकारिता, थिएटर, साहित्य. कला से जुड़ी महिलाओं ने पुरुषों की मानसिकता और स्त्रियों को लेकर उनके विचारों को कसौटी पर कसा है । गीताश्री की छवि भी स्त्रियों के पक्ष में मजबूती से खड़े होने की रही है और पिछले कुछ वर्षों से उन्होंने अपने लेखन से स्त्री विमर्श को एक नया आयाम दिया है । गीताश्री का बेबाक और आक्रामक लेखन पुरुषों की स्त्री विरोधी मानसिकता को शिद्दत से चुनौती देता है । अपनी इस किताब की भूमिका में लेखिका ने लिखा- आज बाजार के दबाव और सूचना-संसार माध्यमों के फैलाव ने राजनीति, समाज और परिवार का चरित्र पूरी तरह से बदल डाला है, मगर पितृसत्ता का पूर्वाग्रह और स्त्री को देखने का उसका नजरिया नहीं बदला है, जो एक तरफ स्त्री की देह को ललचायी नजरों से घूरता है तो दूसरी तरफ उससे कठोर यौन-शुचिता की अपेक्षा भी रखता है । पितृसत्ता का चरित्र भी वही है । हां समाज में बड़े पैमाने पर सक्रिय और आत्मनिर्भर होती स्त्री की स्वतंत्र चेतना पर अंकुश लगाने के उसके हथकंडे जरूर बदले हैं । गीताश्री ने अपने इस कथन ते समर्थन में कई उदाहरण दिए हैं । कमोबेश यही स्थिति समाज में व्याप्त है । यह हमारे समाज की एक कड़वी हकीकत है कि पुरुष चाहे जितने स्त्रियों के साथ संबंध बनाए उसकी इज्जत पर बट्टा नहीं लगता है बल्कि वो फख्र से सीना चौड़ा कर इसे एक उपलब्धि की तरह से पेश करता है । लेकिन वहीं अगर स्त्री ने अपनी मर्जी से अपने पति के अलावा किसी और मर्द के साथ संबंध बना लिया तो इसके चरित्र, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, उसकी शिक्षा-दीक्षा सभी सवालों के घेरे में आ जाते हैं । वो कुलटा तक करार दे दी जाती हैं ।

लेकिन अब हालात तेजी से बदलने लगे हैं, स्त्रियां भी अपने मन की करने लगी हैं । इसी किताब के अपने एक लेख में उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा है – औरत करती वही है जो उसका दिल करता है, दिखावा चाहे वो जो करे । समाज के लिए स्त्री के प्रेम संबंध अनैतिक हो सकते हैं मगर स्त्री के लिए नैतिकता की पराकाष्ठा है । मैत्रेयी पुष्पा ने माना है कि आवारा लड़कियां ही प्यार कर सकती हैं । अपने लेख में मैत्रेयी पुष्पा ने इस बात का खुलासा नहीं कि वो किस प्यार की बात करती हैं- दैहिक या लौकिक । क्योंकि उन्होंने लिखा है कि मेरे पांच सात प्रेमी रहे तो उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर मुझे मिले । लेकिन लेख में नायब साहब और एदल्लला के साथ तो प्यार जैसी कोई चीज थी, देह तो बीच में कभी आई ही नहीं । इस किताब में बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता का भी एक बेहद लंबा और उबाऊ लेख है । रमणिका गुप्ता ने बेवजह अपने लेख को लंबा किया है । किताब की संपादक को इस पर ध्यान देने की जरूरत थी । अपने लंबे और उबाऊ लेख के अंत में रमणिका गुप्ता ने भारतीय समाज में स्त्रियों की बदतर हालत के लिए धर्म और सामाजिक परंपरा को जिम्मेदार ठहराया है । अपने इस तर्क के समर्थन में गुप्ता ने दो उदाहरण भी दिए हैं । पहला उड़ीसा और दूसरा मध्यप्रदेश का है जहां अठारह बीस साल की लड़कियों का विवाह बालकों से कर दिया जाता है । परंपरा की आड़ में तर्क यह दिया जाता है कि खेतों में और घर का काम करने के लिए जवान लड़की चाहिए । लेकिन इस तरह के विवाह में योग्यता ससुर की परखी जाती है । पति के जवान होने तक बहू ससुर के साथ देह संबंध बनाने के लिए अभिशप्त होती है । मनुस्मृति में भी कहा गया है – पति की पूजा विश्वसनीय पत्नी द्वारा भगवान की तरह होनी चाहिए, यदि वह अपनी ‘सेवाएं’ देने में किसी तरह की भी कोई कोताही बरते तो उसे राजा से कहकर कुत्तों के सामने फिंकवा देना चाहिए । अपने इसी लेख में रमणिका गुप्ता ने यह भी कहा है कि दलित स्त्रियां सवर्ण स्त्रियों की तुलना में ज्यादा स्वतंत्र होती है । इस बात तो साबित करने के लिए भी रमणिका के अपने तर्क हैं ।

जैसा कि उपर बताया गया है कि इस किताब में साहित्य के अलावा अन्य क्षेत्र की महिलाओं के भी लेख हैं । आमतौर पर सारे लेख वयक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख गए हैं । मशहूर गायिका विजय भारती का भी एक दिलचस्प लेख इस किताब में संग्रहीत है । विजय भारती ने अपने लेख में यह साबित करने की कोशिश की है कि समाज और परिवार में किस तरह से बचपन से ही लड़कियों को यौन शुचिता की घुट्टी पिलाई जाती है । जब बचपन में लड़कियां खेलने जाती हैं तो उनको यह कहा जाता है कि देखना लड़कों के साथ मत खेलना माने लड़कों के साथ खेलने से उसकी शुचिता नष्ट हो जाएगी । बचपन की बात क्यों जवान लड़कियां भी दजब घर से बाहर निकलती हैं तो परिवार के लोग उसके साथ छह सात साल के उसके भाई को लगा देते हैं, जो उसकी रक्षा करेगा । यह एक ऐसी हकीकत है जिससे आपको हर रोज दो चार होना पड़ता है । विजय भारती ने अपनी एरक कविता के जरिए अपनी बात रखी है – हैं कई गरमागरम उसके फसाने शहर में/घात के मेले लगे हैं इस बहारे शहर में/रुख हवाओं के, उसे लूटा किए हर कदम पे/बने अपने ही लुटेरे, कितने जाने शहर में/दुश्मनी उसकी किसी से कुछ न थी, कुछ नहीं है/आग लेकर क्यों खड़े हैं लोग अपने शहर में/

इनके अलावा फायरब्रांड और अपनी लेखनी को एके 47 की तरह इस्तेमाल करनेवाली मनीषा ने अपनी खास शैली में अपनी बात कही है । मनीषा लिखती हैं कि भारत में चालीस साल के उपर के लगभग नौ करोड़ आदमी स्वीकृत रूप से नपुंसक हैं, जाहिरा तौर पर उनकी सेक्स जाती रही हो । पर सामाजिक पारिवारिक दबावों में इनकी पत्नियां चूं तक नहीं कर पाती । ...और अगर स्त्री बच्चा नहीं जन सकती तो भी उसकी शारीरिक संरचना पुरुष को भरपूर यौनानंद देने के काबिल तो रहती ही है । मनीषा की जो शैली है वो बेहद तीखी और खरी-खरी कहने की है – लड़की बिन ब्याह के अगर किसी लड़के का लिंग छू ले तो ये भ्रष्ट हो जाएगी पर आप अपनी कोहनियां उसके स्तनों में खोंसते फिरें तो यह धार्मिकता मानी जाएगी । इसके अलावा जयंती, निर्मला भुराड़िया, असीमा भट्ट के भी पुरुष सत्ता के खिलाफ आग उगलते लेख इस किताब में हैं ।

कुल मिलाकर अगर हम स्त्री विमर्श के प्रथम पुरुष राजेन्द्र यादव को समर्पित इस किताब पर समग्रता से विचार करें तो यह लगता है कि राजेन्द्र यादव की पीढ़ी ने जिस विमर्श की शुरुआत की थी वो अब विरोध से आगे बढ़कर विद्रोह की स्थिति में जा पहुंचा है । इस लिहाज से गीताश्री की यह किताब अहम है कि युवा लेखिकाओं के विचार बेहद उग्र और आक्रामक हैं । जो बात स्त्री विमर्श का झंडा बुलंद करनेवाली लेखिकाएं खुलकर नहीं कह पा रही थी वो बात अब युवा लेखिकाओं के लेख में सामने आने लगी है । इन युवा लेखिकाओं के तेवरों से यह लगता है कि स्त्री विमर्श ने एक नया मुकाम और नई शब्दावली भी तैयार कर ली है । लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या सदियों पुरानी परंपराओं और मानसिकता को बदलना इतना आसान है जबाव है नहीं लेकिन इस वजह से प्रयास तो छोड़े नहीं सकते, और उसी का नतीजा है – नागपाश में स्त्री

Sunday, July 25, 2010

बेवफाई का सुपर धमाका

हिंदी साहित्य में रवीन्द्र कालिया की ख्याति उपन्यासकार, कहानीकार और संस्मरण लेखक के अलावा एक ऐसे बेहतरीन संपादक के रूप में भी है जो लगभग मृतप्राय पत्रिकाओं में भी जान फूंक देते हैं । रवीन्द्र कालिया हिंदी के उन गिने चुने संपादकों नें से एक हैं जिनको पाठकों की नब्ज और बाजार का खेल दोनों पता है । धर्मयुग में जब रवीन्द्र कालिया थे तो पत्रिका के तेवर और कलेवर में उनका भी योगदान था लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि हर बड़ी-छोटी जीत का सेहरा टीम के कप्तान के सर बंधता है । बाद के दिनों में जब कालिया जी की धर्मवीर भारती से खटपट हुई तो वो लौटकर इलाहाबाद चले आए । यह वही दौर था जब कालिया जी ने काला रजिस्टर लिखा था । इलाहाबाद लौटकर रवीन्द्र कालिया ने जब गंगा-जमुना निकाला तो उसने भी साहित्य जगत में धूम मचा दी थी । हिंदी के पाठकों को उन्नीस सौ इक्यानबे में निकले वर्तमान साहित्य के दो कहानी महाविशेषांक अब भी याद होंगे । वर्तमान साहित्य के दो भारी भरकम अंक अप्रैल और मई उन्नीस सौ इक्यानवे में प्रकाशित हुए थे । उस दौर में मैं कॉलेज का छात्र था और मुझे याद है कि जमालपुर के व्हीलर के स्टॉल चलानेवाले पांडे जी ने हमें वर्तमान साहित्य के वो अंक चुपके से इस तरह सौंपे थे जैसे कोई बेहद कीमती चीज छुपाकर देता हो । उस वक्त मुझे अजीब लगा था । कई दिनों बाद जब मैंने पांडे जी से पूछा तो उन्होंने बताया था कि उक्त अंक की दस ही प्रतियां आई थी और साहित्यानुरागी पांडे जी के मुताबिक उसके ज्यादा खरीदार हो सकते थे । सो उन्होंने अपने चुनिंदा ग्राहकों को छुपाकर वर्तमान साहित्य का कहानी महाविशेषांक दिया था । यह हिंदी में पहली बार हुआ था जब किसी भी विशेषांक को महाविशेषांक बताया गया हो । जैसा कि मैं उपर कह चुका हूं कि कालिया जी को पाठकों की रुचि के साथ-साथ बाजार की भी समझ है । वर्तमान साहित्य से पहले इस तरह का आयोजन उन्नीस सौ अट्ठावन –साठ में कहानी पत्रिका ने किया था, जिसके संपादक श्रीपत राय थे । कहानी के उन अंकों में अमरकांत की डिप्टी कलेक्टरी , कमलेश्वर की राजा निरवंसिया, मार्केंडेय की हंसा जाई अकेला जैसी बेहद प्रसिद्ध रचनाएं छपी थी ।
यही बात वर्तमान साहित्य के कहानी विशेषांक के साथ भी हुई । कालिया जी ने उन दो अंकों में लगभग संपूर्ण हिंदी साहित्य का समेट कर रख दिया था । कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ए लड़की वर्तमान साहित्य के उस महाविशेषांक में ही छपी थी । बाद में स्पीड पोस्ट में उसपर तीन गंभीर टिप्पणियां छपने से कहानी को खासी चर्चा मिली । बाद में यह उपन्यास के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हुई । साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मशहूर लेखिका अलका सरावगी की पहली कहानी – आपकी हंसी भी वर्तमान साहित्य के महाविशेषांक में ही प्रकाशित हुई थी । उस अंक में उपेन्द्र नाथ अश्क का एक बेहद धमाकेदार लेख- महिला कथा लेखन की अर्धशती भी प्रकाशित हुई थी । किसी भी संपादक की दृष्टि पत्रिका को एक उंचाई देती है । और कालिया ने इसे एक बार नहीं कई बार साबित किया ।
जब रवीन्द्र कालिया वागर्थ के संपादक होकर कोलकाता गए तो भारतीय भाषा परिषद की उस दम तोड़ती पत्रिका को भी ना केवल खड़ा कर दिया बल्कि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में लाकर उसे एक अहम पत्रिका बना दिया । वागर्थ का संपादन छोड़कर जब वो नया ज्ञानोदय आए तो इस पत्रिका का हाल भी बेहाल था और साहित्य के नाम पर बेहद ठंढी और विचारोत्तेजक सामग्री के आभाव में ज्ञानोदय एक सेठाश्रयी पत्रिका बनकर रह गई थी जो इस लिए निकल पा रही थी क्योंकि उसका प्रकाशन टाइम्स जैसे बड़े ग्रुप से हो रहा था । लेकिन कालिया ने संपादक का दायित्व संभालते ही ज्ञानोदय को हिंदी साहित्य की अनिवार्य पत्रिका बना दिया । रवीन्द्र कालिया के ज्ञानोदय के संपादक बनने के पहले हंस और उसके संपादक राजेन्द्र यादव समकालीन हिंदी साहित्य का एजेंडा सेट किया करते थे । लेकिन जब मई दो हजार सात में कालिया के संपादन में युवा पीढी विशेषांक निकला तो पहली बार ऐसा लगा कि हंस के अलावा कोई और पत्रिका है जो साहित्य का एजेंडा सेट कर सकती है । संपादक ने दावा किया कि दो हजार सात में छपे युवा पीढी विशेषांक की मांग इतनी ज्यादा हुई थी कि उसे पुनर्मुद्रित करना पडा़ था । नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को लेकर उस वक्त अच्छा खासा बवाल भी मचा था लेकिन आखिरकार रचना ही बची रहती है सो उस अंक का एक स्थायी महत्व बना रहा । धीरे धीरे पहले नवलेखन अंकों से कहानीकारों की एक नई फौज खड़ी कर दी । उसके बाद चार लगातार अंकों में प्रेम विशेषांक निकालकर बिक्री के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले । संपादक के दावे के मुताबिक प्रेम विशेषांकों की कड़ी के पहले अंक को पाठकों की मांग पर कई बार प्रकाशित करना पड़ रहा है । आज जब हिंदी के साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पाठकों की कमी और बिक्री ना होने का रोना रो रहे हैं ऐसे में कालिया का ये दावा एक सुखद आश्चर्य की तरह है ।
अब कालिया जी ने नया ज्ञानोदय का बेवफाई सुपर विशेषांक-1 निकाला है । कहानी महाविशेषांक वो पहले ही निकाल चुके हैं । पाठकों को हर बार कोई नई चीज देनी होती है लिहाजा अब सुपर विशेषांक । संपादकीय की पहली ही लाइन है- अगर वफा का अस्तित्व ना होता तो बेवफाई नहीं होती । कई शायरों के मार्फत भी कालिया जी ने बेवफाई को परिभाषित किया है । तकरीबन सवा दौ सौ पन्नों के इस महाविशेषांक में वह हर रचना मौजूद है जो पाठकों को ना केवल बांधे रखेगी बल्कि उसकी साहित्यिक वफा को और मजबूत करेगी । इस विशेषांक में प्रेमचंद, मंटो, इस्मत चुगताई से लेकर ओ हेनरी, मोपासां, हेमिंग्वे तक मौजूद हैं । बेवफाई पर गुलजार ने जब ज्ञानोदय संपादक को अपनी नज्में भेजी तो लिखा- जनाब रविन्द्र कालिया साहब । बे-वफायी पर कुछ नज्में । मेरे यहां कुछ इल्जाम-देही और गिले शिकवे नहीं हैं । मेरा ख्याल है वो बे-वफायी भी नहीं । बस अलग हो गए । बे-वफायी कैसी । नज्में ज्यादा है ताकि आप कुछ रद्द कर सकें । बे-वफायी को बस अलग हो गए मानने वाले गुलजार की नज्म देखिए – और तुम ऐसे गई जैसे /शहर की बिजली चली जाए अचानक जैसे/और मुझको/बंद कमरे में बहुत देर तलक कुछ भी दिखायी नहीं दिया/आंखें तारीकी से मानूस हुई तो.../फिर से दरवाजे का खाका सा नजर आया/ । सिर्फ गुलजार ही नहीं बेवफायी पर बशीर बद्र की नज्में भी बेहतरीन हैं । इसके अलावा विदेशी उपन्यासों में, मीडिया में, फिल्मों में और इंटरनेट की बेवफाइयों पर भी अहम लेख हैं । कुल मिलाकर यह अंक पठीनय तो है ही संग्रहणीय भी है । बेवफाई सुपर विशेषांक -2 का भी ऐलान है जिसमें नोवोकोब का प्रसिद्ध उपन्यास लोलिता भी प्रकाश्य है । आखिरकार लोलिता भी तो अंत में बेवफाई पर ही खत्म होती है । कालिया जी का यह प्रयोग काबिल-ए-तारीफ है ।

Friday, July 16, 2010

समकालीन साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है । दरअसल हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत छठे दशक में व्यावसायिक पत्रिका के जवाब के रूप में की गई । इस आंदोलन का श्रेय हम हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा को दे सकते हैं । उन्होंने 1957 में बनारस से कवि का संपादन प्रकाशन शुरू किया था । कालांतर में और भी कई लघु पत्रिकाएं वयक्तिगत प्रयासों और प्रकाशन संस्थानों से निकली जिसने हिंदी साहित्य की तामम विधाओं को ना केवल समृद्ध किया बल्कि उसका विकास भी किया । 1967 में नामवर सिंह के संपादन में आलोचना, सत्तर के दशक में विश्वनाथ तिवारी के संपादन में दस्तावेज, ज्ञानरंजन के संपादन में पहल । बाद में देश निर्मोही के संपादन में पल-प्रतिपल के शुरुआती अंको ने उम्मीद जगाई थी लेकिन बाद के उसके अंक कमजोर निकले । अब भी रुक-रुक कर उसका प्रकाशन हो रहा है । लेकिन 1986 में राजेन्द्र यादव के संपादन में निकली पत्रिका हंस ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया । इसी महीने हंस के प्रकाशन के पच्चीस साल पूरे हो रहे हैं । व्यक्तिगत प्रयासों से इतने लंबे समय तक नियमित रूप से मेरे जानते हिंदी साहित्य की कोई पत्रिका नहीं निकली । अखिलेश के संपादन मे तद्भव के अंक ने भी पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी ओर खींचा ।

लेकिन मुझे लगता है कि साठ के दशक में शुरु हुआ लघु पत्रिका आंदोलन अपनी राह से भटक गया है । उसने ना केवल अपना चरित्र बल्कि स्वरूप भी खो दिया है । लघु पत्रिका आंदोलन और उसकी विरासत से अनजान अबोध लोग संपादक बने जा रहे हैं । लेकिन उन्हें ना तो लघु पत्रिकाओं के दायित्व की परवाह है और ना ही इसके चरित्र की । दरअसल संपादन एक बेहद कठिन कर्म है । इसमें व्यक्तिगत संबंधों को तरजीह दिए बगैर काम करना पड़ता है लेकिन आज तो साहित्यिक पत्रिकाओं में तुम मेरी मैं तेरी वाली स्थिति व्याप्त है । पत्रिकाएं सौदेबाजी का अखाड़ा बनती जा रही है । आज किसी भी लघु पत्रिका के संपादक में इतना साहस है कि वो किसी भी स्थापित साहित्यकार की रचना को लौटा सके । बड़े नाम को छापने के चक्कर में हो यह रहा कि किसी का रिसर्च पेपर, किसी का भाषण, किसी का वक्तव्य छप रहा है । इससे संपादकों की दृष्टि की दयनीयता और दरिद्रता का पता चलता है । आज अगर हम कुछ लघु पत्रिका संपादकों को छोड़ दें तो अधिकांश में रचनाओं के चयन की दृष्टि का घोर अभाव दिखाई देता है ।तकरीबन हर संपादक संयोजन कर रहा है लेकिन इस सत्य को स्वीकार करने का साहस कितने लोगों के पास है । अगर संपादक की दृष्टि सुलझी हुई हो तो पत्रिका का एक स्वरूप बनता है लेकिन अगर आप सिर्फ संयोजन कर रहे हों तो उसकी एक स्पष्ट रूपरेखा आपके दिमाग हो वर्ना पूरी पत्रिका बिखर जाती है ।

लघु पत्रिकाओं का एक अहम दायित्व स्थानीय पत्रिकाओं को मौका देकर उसे साहित्य के परिदृश्य पर उभारने का भी होता है । पर आज के तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक नए लेखकों की रचनाओं को तरजीह नहीं देते हैं । उन्हें तो बड़े नाम चाहिए ताकि पाठक उसके प्रभाव में आकर पत्रिका खरीद सके । अच्छा होता अगर लघु पत्रिका के संपादक बडे़ नामों को छापने का मोह छोड़कर स्थानीय और नई प्रतिभाओं को उभारते । लेकिन साहस की कमी और बाजार की नासमझी उन्हें ऐसा करने से रोक देती है । हिंदी के वामपंथी लेखक हमेशा से बाजार और उसके प्रभाव का शोर मचाते रहते हैं । लेकिन उन्हें ना तो बाजार की समझ है और ना ही बाजार की ताकत का एहसास । उन्हें तो हिंदी की ताकत का भी एहसास नहीं है । अगर हिंदी का बाजार बन रहा है तो तकलीफ किस बात की । क्या लेखकों को यह अच्छा नहीं लगेगा कि उनकी कृतियां हजारों में बिके । आज हिंदी में कोई भी किताब पांच सौ से ज्यादा नहीं छपती है और उसको भी बिकने में सालभर लग जाते हैं । पांच सौ किताबों के बिकने की बात प्रकाशक मानकर अगर दूसरा संस्करण छाप देता है तो लेखकों के पांव जमीन पर पड़ते ही नहीं है । हिंदी में बाजारवाद का शोर मचानेवालों से मेरा अनुरोध है कि पहले वो बाजार को समझें, उसपर विचार करें और उसके बाद अपने विचार वयक्त करें । ऐसा नहीं है कि साहित्यकि पत्रिकाएं खूब बिक रही हैं । इनका भी वही हाल है । अगर हंस, ज्ञनोदय, कथादेश और तद्भव को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई लघु पत्रिका होगी जो हजार प्रति छपती होगी । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।

अभी-अभी हिंदी में एक नई पत्रिका लेखक-पत्रकार अशोक मिश्र के संपादन में आई है- रचना क्रम । पहले अंक में इस बात के संकेत हैं कि पत्रिका छमाही निकला करेगी । यह अंक ओम भारती के अतिथि संपादन में निकली है । तकरीबन डेढ सौ पन्नों की इस पत्रिका में तमाम तरह की रचनाएँ हैं । नामवर के भाषण से लेकर चंद्रकांत देवताले की कविताएं, अरुंधति राय का लंबा साक्षात्कार, रवीन्द्र कालिया और तेजिंदर के उपन्यास अंश के अलावा कई वैचारिक लेख भी हैं । लगता है कि इस अंक की योजना काफी पहले बन गई थी इस वजह से रवीन्द्र कालिया के उपन्यास अंश के इंट्रो में शीघ्र प्रकाश्य छप गया है । जबकि कालिया जी का उपन्यास 17 रानाडे रोड काफी पहले प्रकाशित होकर धूम मचा रहा है । महेश कटारे की कहानी इस अंक की बेहतरीन कहानियों में से एक है । जबकि मुशरर्फ आलम जौकी की कहानी इस अंक की सबसे कमजोर कहानी है । मुशर्रफ के साथ जो एक बड़ी दिक्कत है वो यह है कि कहानियों के विषय का चुनाव तो ठीक-ठाक करते हैं लेकिन जब कहानी लिखते हैं तो वो उनसे संभलता नहीं है और पूरा का पूरा बिखर जाता है । यही वजह है कि दर्जनों कहानियां लिखने के बाद मुशर्ऱफ आलम जौकी की पहचान एक कहानीकार के रूप में बन नहीं पा रही है । रचना क्रम में पत्रकार उमेश चतुर्वेदी की कहानी श्रद्धांजलि छपी है और पत्रिका की ओर से यह दावा किया गया है कि उमेश की यह पहली कहानी है । उमेश चतुर्वेदी की यह पहली कहानी नहीं है इसके पहले भी उनकी तीन-चार कहानियां प्रकाशित होकर पुरस्कृत हो चुकी हैं । संपादक को इनमें सावधानी बरतनी चाहिए नहीं तो आनेवाली पीढ़ी और शोधार्थियों के बीच भ्रम फैलेगा । कुल मिलाकर अशोक मिश्र की इस पत्रिका से एक उम्मीद जगती है और इसने समकालीन हिंदी परिदृ्शय में एक सार्थक हस्तक्षेप तो किया ही है । लेकिन संपादक से मेरा एक आग्रह है कि वो नए लोगों को तरजीह दें और स्थापित और बड़े साहित्यकारों की कूड़ा रचनाएं छापने से परहेज करें । विश्वास मानिए पत्रिका को एक बड़ा बाजार मिलेगा और साहित्य को कई प्रतिभाएं ।

Wednesday, June 30, 2010

बिखरा ‘तहलका’ का पठन पाठन

तरुण तेजपाल देश के ख्यातिप्राप्त पत्रकार हैं । तहलका के बैनर से स्टिंग ऑपरेशन कर काफी शोहरत कमा चुके हैं । अब दिल्ली से हिंदी और अंग्रेजी में तहलका पत्रिका निकालते हैं । अंग्रेजी तहलका ने तो कई वर्षों में अपनी एक अलग पहचान बनाई लेकिन हिंदी तहलका पत्रिकाओं की भीड़ के बीच अपना स्थान और पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही है । कुछ अलग करने की चाहत में तहलका ने हिंदी साहित्य का रुख किया और जून में पठन पाठन के नाम पर साहित्य विशेषांक निकाला । आमतौर पर जैसा इस तरह की पत्रिकाओं के साथ होता है तहलका का साहित्य विशेषांक भी उसका शिकार हो गया है । साहित्य विशेषांक के नाम पर निकली इस पत्रिका का कोई साहित्यिक स्वरूप ही नहीं बन पाया है । सबकुछ समेट लेने की चाहत और नामचीन लोगों को बेवजह स्थान देने से में पत्रिका का पूरा स्वरूप बिखर गया । अपने संपादकीय में पत्रिका के वरिष्ठ संपादक संजय दुबे ने लिखा है- समाचार पत्रिका के साहित्य विशेषांक के अपने कुछ फायदे भी हैं । इस अंक में ना केवल दस्तावेज और अन्यान्य जैसी बहुपयोगी श्रेणियां मौजूद हैं बल्कि इसे लोकतांत्रिक और सर्वसमावेशी बनाने की ओर भी विशेष ध्यान रखा गया है । इसमें अनुभवी दिग्गजों को समुचित सम्मान देते हुए साहित्यिक संभावनाओं के नए संकेतों का भी उतनी ही गर्मजोशी से स्वागत किया है । वरिष्ठ संपादक का यह दावा है तो ठीक लेकिन इस अंक में कविता और कवियों को लेकर एक उपेक्षाभाव साफ तौर पर दिखता है । एक तरफ जहां कहानीकारों और लेखकों को प्रमुखता के साथ छापा गया है वहीं कवियों और कविताओं को रनिंग मैटर की तरह एक के बाद एक छाप कर रस्म अदायगी की गई है । ना तो किसी का कोई परिचय दिया गया है और ना ही किसी के फोटो छापे गए हैं । या तो पत्रिका के कर्ता-धर्ता यह समझते हैं कि उन्होंने जितने कवियों को छापा है वो इतने प्रसिद्ध हैं और वो किसी परिचय के मोहताज नहीं है । नाम ही काफी है की अगर सोच है तो नाम तो सही छपना चाहिए था । वरिष्ठ कवि विमल कुमार बेचारे विपल कुमार हो गए, शुक्र है विफल कुमार नहीं हुए । कई अच्छी कविताएं छपी हैं लेकिन खराब डिस्पले की वजह से वो उबर नहीं पाई । चर्चित कवि संजय कुंदन की छोटी कविता- ठीक है- आज की नई पीढ़ी की मानसिकता और उसकी सोच को प्रतिबिंबित करती है । गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता - जाना सुनो मेरा जाना – भी इस अंक की उपलब्धि है । गीत की कविता में एक गहराई होती है जिसे पढ़कर महसूस किया जा सकता है ।
आज हिंदी साहित्य में नई पीढ़ी के कहानीकारों की रवीन्द्र कालिया ने एक फौज खड़ी कर दी है । जैसा कि आमतौर पर होता है कि अगर आप फौज बनाते हैं तो उसमें कई जांबाज के साथ साथ कुछ सुस्त भी भर्ती हो जाते हैं, कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो जंग से बचकर शॉर्चकट से निकल भागने के चक्कर में लगे रहते हैं । हिंदी कहानी की इस नई पीढ़ी में भी तीनों तरह के लोग हैं । कई नए कहानीकार बेहतरीन लिख रहे हैं और उन्होंने हिंदी को एक नई भाषा दी है । क्या कहानी लेखन में नयी पीढ़ी को लेकर मच रहा शोर रचनात्मकता है इसको केंद्र में रखकर इस अंक में- समकालीन कहानी कितना जोर कितना शोर- एक लेख छपा है । इसके लेखक दिनेश कुमार ने वरिष्ठ कहानीकारों की राय के आधार पर लेख लिखा है । काशीनाथ सिंह कहते हैं कि – ये युवा लेखक विज्ञापन की ऐसी विधियां जान गए हैं, जिनसे पुराने लेखक अपरिचित थे । वे लोग लेखन पर कम ध्यान देकर विज्ञापन की आधुनिक सुविधाओं का लाभ अधिक उठा रहे हैं । काशीनाथ जी की इस बात में दम है लेकिन ये पूरी पीढ़ी पर लागू नहीं होता । दिल्ली में कई ऐसे लेखक हैं जो संपादकों के दरबार में हाजिरी लगाकर साहित्य में अपने आपको स्थापित करने में लगे हैं । उनमें से कई कहानीकारों की कहानियां इस अंक में छपी भी हैं । ज्ञानरंजन भी नई पीढ़ी को बाजार की मांग के अनुरूप लिखनेवाला करार दे रहे हैं । युवा कहानी में एक नई भाषा और कंटेंट सामने आ रहा है जिसे ये लोग बाजार की देन मांगते हैं । मेरा इन वरिष्ठ लेखकों से यही सवाल है कि हिंदी साहित्या का बाजार कितना बड़ा है । कितने लेखकों को हिंदी साहित्य के बजार से फायदा पहुंच रहा है । आज तो हिंदी में यह हालत है कि वरिष्ठ से वरिष्ठ लेखकों की कृतियां एक हजार से ज्यादा नहीं बिक पाती हैं । उधर अंग्रेजी में अद्वैत काला जैसी नई और युवा लेखिका का उपन्यास पचास हजार प्रतियों से ज्यादा बिकता है । किस भ्रम और किस मानसिकता में जी रहे हैं हमारे बुजुर्ग साहित्यकार । इस अंक में वंदना राग की कहानी देवा- देवा अच्छी है । दूसरी तरफ उमाशंकर चौधरी की कहानी बेवजह खिंची हुई लगती है, नतीजा यह हुआ कि ना केवल कहानी बिखर गई बल्कि उबाऊ भी हो गई ।
संजय दुबे ने अपने लेख में अपने सहयोगी गैरव सोलंकी को विलक्षण लेखन प्रतिभा बताया गया है लेकिन इस अंक में छपी कहानी और कविता में विलक्षणता दिखाई तो नहीं देती ।
अपने संपादकीयमुमा लेख में संजय दुबे ने एक और दावा किया है – शायद हिंदी के किसी भी साहित्य विशेषांक के लिए यह पहला प्रयास होगा कि इस अंक में हमने विभिन्न प्रकाशकों, साहित्यकारों और समालोचकों आदि से अनुरोध करके,उनसे बात करके तमाम तरह की सर्वेक्षणनुमा जानकारियां भी संकलित की हैं । संजय दुबे ने शायद शब्द लिखकर अपने बचने का रास्ता छोड़ दिया है । उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि हिंदी में इस तरह के आयोजन कई बार हो चुके हैं चाहे वो अवध नारायण मुदगल के संपादन में निकला छाया मयूर का अंक हो. या फिर धीरेन्द्र अस्थाना के संपादन में निकला जागरण उदय का अंक हो । कई बार इस तरह के सर्वेक्षण प्रकाशित हो चुके हैं और इसमें नया कुछ नहीं है । तहलका में नया है तो सिर्फ उनमें छपी अशुद्धियां – बेस्य सेलर में कथा सतीसर को गांताजलिश्री का उपन्यास बता दिया गया है जबकि ये चंद्रकांता की कृति है । अन्यान्य पर भी संपादक को गर्व है लेकिन इसमें विभूति नारायण राय ने कहा है कि गोविंद शुक्ल को मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार । गोविंद मिश्र को गोविंद शुक्ल लिखकर लेखक का अपमान किया गया है । उदय प्रकाश का बड़बोलापन भी यहां है, वो कहते हैं कि 99.9 फीसदी लेखन ऐसा ही है । हिंदी जगत में सबसे चमकदार चेहरे सबसे अयोग्य हैं । मुझे लगता है कि उदय ने जो दशमलव एक फीसदी छोड़ा है वो अपने लिए छोड़ा है क्योंकि हिंदी में वही सबसे उत्तम लिख रहे हैं । इसके अलावा भारत भारद्वाज के लेख में भी प्रतीक का प्रकाशन 1943 बताया गया है जबकि उसका प्रकाशन 1945 में शुरू हुआ था ।
संपादकीयनुमा लेख में निस्वार्थ सहयोग के लिए उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल का आबार प्रकट किया गया है । हमें यह नहीं मालूम कि मोरवाल की भूमिका इस अंक में कितनी दूर तक थी लेकिन अंक की परिकल्पना चाहे जो भी हो अंक बेहद औसत निकला है । इसने ना तो हिंदी साहित्य की किसी विधा में कोई हलचल पैदा की है और ना ही इस अंक का कोई स्थायी महत्व है । तहलका के सामने इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक का उदाहरण तो था ही उसे पार करने की एक चुनौती भी थी लेकिन चुनौती स्वीकार करना तो दूर की बात यह अंक इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक के आस-पास भी नहीं पहुंच पाया है । मुझे यह भी नहीं मालूम कि तरुण तेजपाल की इस अंक में कितनी भूमिका है लेकिन इतना तो तय है कि संपादक के रूप में उसका नाम छपने की वजह से उनकी ही दृष्टि पर सवाल खडे़ होंगे ।

Tuesday, June 29, 2010

हिरासत में कैसे हो हिफाजत

हाल में पंजाब से खबर आई कि पुलिस ने एक प्रेमी युगल को पार्क से पकड़ कर थाने ले आई । अगले दिन सुबह लड़की पूछताछ के बाद नारी निकेतन भेज दिया गया और लड़के की मौत हो गई । उसके पहले उत्तर प्रदेश के औरैया में थाने में एक खुदकुशी की खबर से लोगों का गुस्सा इतना भड़ा कि पूरे शहर में आगजनी और विरोध प्रदर्शन हुए । लोगों के बढ़ते गुस्से की वजह से हरकत में आई राज्य सरकार ने पूरे थाने के सारे पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया और थानेदार के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया । एक इसी तरह की खबर दिल्ली से आई जहां चोरी के मामूली इल्जाम में एक नाबालिग को पकड़ कर थाने लाया गया और जब उसकी मां जब उसे छुडाने थाने आई तो पुलिसवालों ने लड़के को नंगाकर कर अपनी मां से शारीरिक संबंध बनाने का तालिबानी हुक्म सुनाया । ऐसा नहीं करने पर लड़के की जबरदस्त पिटाई की गई । यह तो देश की राजधानी दिल्ली की पुलिस है जो आपके लिए सदैव का दावा करती है । जिस दिल्ली पुलिस को देश की श्रेष्ठ पुलिस फोर्स में से एक माना जाता है । ऐसी कई खबरें देशभर के अन्य हिस्सों से बहुधा आती रहती हैं । लेकिन आमतौर पर पुलिवालों को ऐसे मामलों में सजा होने की खबरे नहीं आती ।
कुछ दिनों पूर्व एशिएन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की एक रिपोर्ट - टॉर्चर इन इंडिया 2010 प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि भारत में पुलिस हिरासत में होनेवाली मौत की संख्या में लगातार इजाफ हो रहा है । उस रिपोर्ट के मुताबिक दो हजार चार से लेकर दो हजार आठ तक में हिरासत में मौत का प्रतिशत लगभग पचपन फीसदी बढ गया । एशिएन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है । एक ओर जब हम आधुनिक होने की राह पर चल रहे हैं वैसे में हमारे देश की पुलिस के इस तरह के कारनामे लोकतंत्र पर बदनुमा दाग की तरह हैं ।
सरकार को भी पुलिसिया जुल्म का एहसास है इसलिए सरकार ने संसद के पिछले सत्र में प्रीवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल पेश किया था जो अब राज्यसभा की मंजूरी का इंतजार कर रहा है । हलांकि इस बिल की कई धाराओं को लेकर कानून के जानकारों के बीच मतभेद है । कुछ लोगों का मानना है कि यह कानून सिर्फ अंतराष्ट्रीय दबाव में बनाया जा रहा है क्योंकि भारत ने यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर पर हस्ताक्षर किए हैं । लेकिन यहां सवाल इस बात का नहीं है कि भारत में यह कानून किसके दबाव में बनाया जा रहा है । उससे बड़ा सवाल यह है कि कानून बनाकर क्या इस तरह के पुलिसिया जुल्म को रोका जा सकता है । क्या कानून के रखवालों को कानून का भय है । अगर भय होता तो वो इस तरह की हरकतों से बाज आते । गांधी जी ने बहुत पहले इस बात को महसूस किया था और लिखा था – इन इंडिया वी नीड अ पुलिस टू पुलिस द पुलिस । मतलब कि भारत में हमें एक ऐसे पलिस बल की आवश्यकता है जो पुलिस फोर्स पर नजर रख सके । गांधी जी ने आज से लगभग पचास साल पहले यह टिप्पणी की थी लेकिन गांधी के देश में गांधी की आवाज अनसुनी कर दी गई ।
दरअसल पुलिसिया जुल्म की यह समस्या सामाजिक ज्यादा है । हमारे यहां पुलिसवालों को यह मानसिकता हो गई है कि गाली-गलौच और लाठी डंडे की भाषा में ही बात करने से अपराध कम होंगे । यहां हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि पुलिस की इस मानसिकता को कैसे बदला जाए । दूसरी जो समस्या है वो है सिस्टम की जो पुलिसिया जुल्म के बढने के लिए उतना ही जिम्मेदार है । देश में बढ़ते अपराध से निबटने के लिए हमारे पास पर्याप्त संख्या में पुलिस बल नहीं है । नतीजा यह होता है कि कांसटेबल से लेकर इंसपेक्टर तक पर केस को जल्द से जल्द निबटाने का भयानक दबाव होता है । इस दबाब से निबटने के लिए उनके पास कोई ट्रेनिंग नहीं होती । समुचित ट्रेनिंग के आभाव में होता यह है कि केस को जल्दी निबटाने के चक्कर में वो कई बार आरोपियों को ही निबटा देते हैं । एक बार भर्ती होने के बाद सिपाहियों और उसके उपर के हवलदार या फिर सब इंसपेक्टर किसी को भी पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया जाता । रिफ्रेशर कोर्स नहीं होते । आरोपियों से सच उगलवाने के नए वैज्ञानिक तकनीक के बारे में उन्हें बताया नहीं जाता । उन्हें तो लगता है कि सच उगलवाने का एकमात्र उपाय थर्ड डिग्री है । आज देश में जरूरत इस बात की है कि कानून व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर हैं उनको विशेष रूप से ट्रेनिंग दी जाए और समय समय पर उनकी काउंसिलिंग भी की जाए, ताकि दिल्ली, पंजाब और औरैया जैसी घटनाएं ना हों । और किसी बेटे को इस बात के लिए मजबूर ना किया जाए कि वो अपनी मां के साथ शारिरिक संबंध बनाए ।

Tuesday, June 22, 2010

हरे जख्म पर मुआवजे का मरहम

भोपाल गैस कांड पर केंद्र सरकार अपनी खाल बचाने में जुटी है । चार दिनों तक लगातार मंत्रियों के समूह की बैठक हुई । इस बैठक में भोपाल के गैस पीड़ितों के जख्मों पर मुआवजे का मरहम लगाने की कोशिश की गई । छब्बीस साल तक कुंभकर्णी नींद सो रही केंद्र सरकार को अब भोपाल गैस पीड़ितों की सुध लेने की सूझी । इस बात पर सहमति बनी कि सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन यानि सुधार याचिका दाखिल की जाएगी और वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए नए सिरे से प्रक्रिया शुरू की जाएगी । यह फैसला भी देश की आवाम को बरगलाने की एक कोशिश है । एंडरसन पर सिर्फ लापरवाही के आरोप हैं और अमेरिका की अदालत ने इस मामले में इंटेंट साबित नहीं हो पाने की वजह से प्रत्यर्पण की अर्जी खारिज कर दी है। अब भारत सरकार को इसके लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी। प्रत्यार्पण के लिए अपने अनुरोध पत्र को बदलना होगा । एंडरसन नब्बे की उम्र पार कर चुका है और अमेरिकी कानून में प्रत्यर्पण के लिए आरोपी की उम्र को भी ध्यान में रखा जाता है । कुल मिलाकर यह एक ऐसी कोशिश है जिसका कोई नतीजा नहीं निकलना लगभग तय है । तकरीबन चालीस हजार लोगों की मौत के बाद अचानक सरकार के सक्रिय दिखने की वजह कुछ और है । अदालत के फैसले के बाद केंद्र सरकार चौतरफ दबाव में थी । कांग्रेस अपने दामन पर लगे दाग को धोने और आरोपों के दलदल से निकलने के लिए बेचैन है । अदालती फैसले के बाद एंडरसन के भारत से भागने को लेकर जिस तरह से मीडिया ने सरकार को घेरा और उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आरोप लगे उससे कांग्रेस सकते में आ गई । पार्टी नेताओं ने बचाव में अलग-अलग तर्क देने शुरू किए जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी में पहले भ्रम की स्थिति बनी । पार्टी के महासचिव और दस जनपथ के करीबी महासचिव दिग्विजय सिंह ने एंडरसन के भारत से भगाने को लेकर राजीव गांधी को घेरे में ले लिया । पार्टी के एक और नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने अलग राग अलापते हुए अर्जुन सिंह पर सवाल खड़े कर दिए । मामला बिगड़ता देख पार्टी डैमेज कंट्रोल में जुटी और नेताओं को भोपाल मसले पर मुंह बंद करने का फरमान जारी कर दिया गया । अब पार्टी के बड़बोले प्रवक्ता मनीष तिवारी यह तर्क दे रहे हैं कि अगर वॉरेन एंडरसन को नहीं भगाया जाता तो देश की जनता उसे मार डालती । मनीष के तर्क बेहद लचर और तथ्यहीन हैं । अगर भोपाल की जनता में गैस लीक कांड को लेकर गुस्सा था और इस बात की आशंका थी वो हिंसक हो सकती थी तो तो एंडरसन को वहां से निकाल कर देश के किसी भी हिस्से में रखा जा सकता था । देश में इतने खुफिया ठिकाने हैं जिसमें से कहीं भी एंडरसन को रखा जा सकता था लेकिन उसे तो शाही ठाठ-बाट के साथ भारत से विदा किया गया । भारत से भागने के पहले उसने देश के राष्ट्रपति के साथ बैठकर चाय पी । एयरपोर्ट पर हंसते हुए कहा कि अब मैं आजाद हूं । उस वक्त एंडरसन के बॉडी लैंगवेज से यह साफ तौर पर झलकता है कि वो अपने भारत से निकल जाने को लेकर बहुत आश्वस्त था और जाहिर सी बात है कि यह आश्वासन देश के सर्वोच्च नेतृत्व से ही मिला होगा । और इस आश्वासन के पीछे का राज खुलता है तो यह बोफोर्स से बड़ा कांड साबित हो सकता है ।
भोपाल के मसले पर पर साफ तौर पर कानून को एंडरसन और यूनियन कार्बाइड के पक्ष में तोड़ा मरोड़ा गया । देश का कानून मंत्री इस बात को सरेआम स्वीकार कर चुका है कि कोर्ट ने इस मामले को हल्का कर दिया लेकिन खुद वकील होने के बावजूद हमारे कानून मंत्री यह भूल गए कि उस वक्त क्योरेटिव पीटीशन या सुधार याचिका ना डालकर केंद्र सरकार ने बड़ी गलती की थी । दरअसल इस पूरे मामले में शुरू से ही कांग्रेस के नेतृत्ववाली केंद्र और राज्य सरकार दोनों शक के घेरे में है । भोपाल गैस कांड के बाद जब मुआवजे और हजारों लोगों की मौत के लिए जिम्मेदारियां तय करने संबंधित मुकदमे अलग-अलग अदालतों में दर्ज होने लगे तो फौरन से केंद्र सरकार हरकत में आई । उसने एक कानून बनाकर भोपाल गैस पीडितों की लडाई लड़ने का सारा अधिकार अपने हाथ में ले लिया । अचानक केंद्र सरकार को यह बात याद आ गई कि वो देश के गरीबों के हितों का रक्षक है और उसे इस केस में कस्टोडियन बनना चाहिए । जब केंद्र के इस नए कानून को देश की सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गई तो सरकार ने संप्रभु सरकार के पेरेंस पाट्रिए के सिद्धांत की आड़ में अपना बचाव किया । मतलब यह कि एक संप्रभु राष्ट्र को अपनी जनता के अभिभावकत्व का हक है और उसका यह दायित्व भी है कि जनता के साथ किसी भी तरह से अन्याय नहीं हो । लिहाजा वो जो भी फैसला लेगी वो सही होगा । यह उसी तरह है जैसे कि कोई माता-पिता अपने बच्चों के बारे में फैसला लेते हैं । इस कानून की आड़ में सरकार ने भोपाल के गैस पीड़ितों के साथ बड़ा छल किया । सरकार ने यूनियन कार्बाइड के साथ एक समझौता किया जिसमें तकरीबन आठ सौ करोड़ मुआवजा की बात तय की गई । भोपाल के गुनहगार एंडरसन को भारत से भगा दिया गया । आम आदमी के हितों की रक्षा का ढोल पीटकर सारा अधिकार अपने हाथ में लेने के बाद भी केंद्र सरकार चालीस हजार लोगों की मौत के मुजरिमों को सिर्फ दो साल की सजा दिलवा पाने में कामयाब हो पाई । सजा भी उन धाराओं में हुई जिसमें कि हाथ के हाथ जमानत भी मिल जाती है । यह देश के साथ केंद्र सरकार का बड़ा धोखा है । एक सोची समझी रणनीति के तहत कानून बनाकर भोपाल गैस पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ने का अधिकार केंद्र सरकार ने अपने हाथ में लिया । ताकि मनमाफिक फैसले हो सकें । क्या भोपाल गैस कांड में पीड़ितों की हक की लड़ाई का अधिकार अपने हाथ में लेने वाली कांग्रेस पार्टी को चंद दिनों पहले दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के नरसंहार मामले में इस कानून को बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई । क्या गुजरात दंगें में हजारों की ह्त्या के बाद केंद्र सरकार को एक संप्रभु राष्ट्र की जिम्मेदारियों का एहसास नहीं हुआ । इससे एक बात तो साफ है कि केंद्र सरकार अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड और उसके कर्ता-धर्ता को साफ तौर बचाना चाहती थी । जीओएम की कचरा साफ करने के फैसले को लेकर लिया गया निर्णय साफ तौर पर यूनियन कार्बाइड को खरीदनेवाली कंपनी डाउ केमिकल को जवाबदेही से बचाने की एक चाल है ।
लेकिन इससे भी बड़ा एक खतरा देश पर मंडरा रहा है । अमेरिका से परमाणु समझौता होने के बाद से देश में न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने की तैयारी जोर शोर से हो रही है । विदेशों से रिएक्टर की खरीददारी की बात भी चल रही है । लेकिन अमेरिका समेत कई देशों की कंपनियों ने किसी हादसे की सूरत में किसी भी तरह के मुआवजा की शर्तों का पालन ना करने की बात कही है । अगर सरकार विदेशी कंपनियों की शर्तों को मान लेती है और किसी भी तरह के हादसे की स्थिति में हर्जाने की बात के बगैर उनको रिएक्टर लगाने की इजाजत दे देती है तो देश एक बड़े खतरे के मुहाने पर बैठा रहेगा । सरकार को यह सुनिश्चित करना पडे़गा कि उसके देश की आम जनता ना केवल सुरक्षित रहे बल्कि उसे यह भरोसा भी रहे कि सरकार उसकी सुरक्षा को लेकर सतर्क है । अगर ऐसा नहीं होता है तो देश की गरीब जनता का सरकार और कानून दोनों पर से विश्वास उठ जाएगा जो देश के लिए गंभीर मसला होगा और लोकतंत्र के लिए खतरा ।

Thursday, June 17, 2010

धोखे का सरकारी दस्तावेज

मनमोहन सिंह सरकार ने अपनी दूसरी पारी में एक साल पूरे होने पर समारोहपूर्वक अपने कामकाज का लेखा-जोखा पेश किया । इस लेखा-जोखा को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की जनता के लिए रिपोर्ट के तौर पर पेश किया गया । इस रिपोर्ट कार्ड में मनमोहन सरकार ने मुख्यतया तेरह क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों का बखान किया । रिपोर्ट कार्ड की प्रस्तावना में प्रधानमंत्री ने बढ़ती महंगाई पर काबू पाने में अपनी सरकार की नाकामी सीधे तौर पर तो नहीं मानी लेकिन शब्दों की बाजीगरी को अगर डिकोड करें को यह साफ तौर पर सामने आती है । यह रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक आर्थिक मंदी का सामना हमारी अर्थव्यवस्था ने बेहतर ढंग से किया । आर्थिक संकट से निबटने और सरकार की मानें तो उबरने में उसकी वृहद आर्थिक प्रबंधन की सरकार की कार्यनीति की सफलता साफ झलकती है । पता नहीं मनमोहन सिंह किस कार्यनीति और किस वृहद आर्थिक प्रबंधन की बात कर रहे हैं । सरकार अरना राजकोषीय घाटा पूरा करने के लिए थ्री जी मोबाइल सेवा से जुटाए गए लगभग एक लाख करोड़ का सहारा ले रही है । बेहतर आर्थिक प्रबंघन के नाम पर सरकार ने अभी चुपके से एक फरमान जारी कर दिया । सरकार ने इस बात को अनिवार्य कर दिया है कि शेयर बाजार में लिस्टेड सभी कंपनियों को अपने पच्चीस प्रतिशत शेयर जनता के लिए जारी करने होंगे । इसके पीछे की मंशा यह है कि सरकारी कंपनियों के शेयर भी बेचे जा सकें ताकि बढ़ते राजकोषीय घाटे को पाटा जा सके । अपनी संपत्ति बेचकर घाटा कम करना कैसा वित्तीय प्रबंधन है,आप अनुमान लगा सकते हैं ।
उधर पूरा देश महंगाई से त्रस्त है । जिस आम आदमी की बेहतरी के नाम पर कांग्रेस ने पिछले चुनाव में वोट मांगे थे वो त्राहिमाम कर रही है । जरूरी सामनों के अलावा हर चीज के दामों में जोरदार बढो़तरी हुई है । बीते सप्ताह में फूड इंफ्लेशन पौनै सत्रह फीसदी पहुंच गई है । सरकार विकास दर के बेहतर होने के नाम पर आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी है । जनता को सुनहरे सपने दिखाए जा रहे हैं । लेकिन दरअसल जनता को विकास का सपना दिखाकर उसके साथ छल किया जा रहा है । सरकार के पास महंगाई पर लगाम लगाने के लिए ना तो कोई ठोस योजना है और ना ही इसपर काबू पाने के लिए दृढ इच्छा । हर बार केंद्र सरकार महंगाई के लिए राज्य सरकारों के सर ठीकरा फोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करती है ।
अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में मनमोहन सिंह हर तरह की विपदा का इस्तेमाल अपनी नाकामियों को ढकने में करते दिख रहे हैं । महंगाई के लिए सरकार ने दो हजार नौ के में देश में आए सूखे को भी ढाल बनाने की कोशिश की है । यहां भी सरकार ने सूखे से निपटने के सरकार के कदमों को लेकर अपनी पीठ थपथापाई है । मनमोहन सिंह शायद यह भूल गए कि सूखे के बावजूद देश में अनाज के गोदाम भरे रहे । फूड कॉर्पोरेशन के गोदामों में अनाज खुले में सड़ते रहे और जनता के बीच पहुंच ही नहीं पाए । कीमतें आसमान छूती रही लेकिन सरकार है कि बेहतर प्रबंधन का ढोल पीट रही है । चीनी की कीमतों पर ही बात करें तो पहले देश से चीनी निर्यात में छूट दी गई फिर जब कीमतें बेकाबू होने लगी तो चीनी आयात किया गया । चीनी के आयात-निर्यात का खेल अलग से जांच का विषय है, जिसमें अगर ईमानदारी से तफ्तीश की जाए तो एक बड़ा घोटाला सामने आएगा । इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने बढ़ती महंगाई पर नजर रखने की बात कही है लेकिन सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अंतराष्ट्रीय मूल्य की आड़ में बढाने के लिए भी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है । सरकार के वित्त और पेट्रोलियम मंत्री लगातार इस बात की वकालत कर रहे हैं कि पारिख कमेटी की रिपोर्ट जल्द से जल्द मानकर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम बढाए जाएं । बेहतर आर्थिक प्रबंधन का दावा करनेवाली सरकार को क्या यह नहीं मालूम है कि पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से हर क्षेत्र में इसका असर पड़ेगा ।
बच्चो को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिए जाने और प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में सुधार को लेकर सरकार अपने उठाए कदमों से गदगद है । शिक्षा का अधिकार कानून बना देने से ही सबको शिक्षा मिलनी शुरू हो जाएगी यह जरूरी नहीं है । यह कानून बना देना आसान है, यह भी मान लिया जा सकता है कि आपकी मंशा भी साफ है लेकिन इस बात पर विचार किया गया कि इस कानून को देशभर में लागू कैसे किया जाएगा, इसके लिए वांछित संसाधन कहां से जुटाए जाएंगें । बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्य इस बात की आशंका जता चुके हैं कि धनाभाव की वजह से इस कानून को लागू करने में मुश्किल होगी । उच्च शिक्षा में सुधार के नाम पर विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश में आने का रास्ता खोल दिया गया । लेकिन शिक्षा के नाम पर व्यवसाय करनेवाले विदेशी विश्वविद्यालय ही यहां अपना कारोबार चलाएंगी । अभी तक इस बात के कोई संकेत नहीं है कि कैंब्रिज या ऑक्सफोर्ड जैसी प्रतिष्टित युनिवर्सिटी यहां अपना कैंपस खोलेंगी । देश में मेडिकल शिक्षा की क्या गत हुई है ये मेडिकल काउंसिल के मुखिया केतन देसाई की गिरफ्तारी के बाद साफ हो गया । अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सरकार ने स्कूली छात्रों को मिड डे मील देने का दंभ भी भरा है । लेकिन इस योजना की जमीनी हकीकत आए दिन सामने आती रहती है ।
ग्रामीण विकास के नाम पर भी सरकार ने बेहद बेशर्मी से अपनी उपलब्धियां गिनाई हैं । आज देश के ग्रामीण इलाकों में क्या हालत है ये किसी रिपोर्ट कार्ड से सामने नहीं आ सकता । इसके लिए उन इलाकों में जाने की जरूरत है । ग्रामीण विकास में ऐतिहासिक काम करने का दावा करनेवाली मनमोहन सरकार को विदर्भ के किसानों की खुदकुशी नजर नहीं आती । अगर मनमोहन सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल में सिर्फ विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को जोडा़ जाए तो यह एक सभ्य सरकार के मुंह पर तमाचा होगा । खाद पर सब्सिडी हटाने की भी साजिश रची जा रही है । कृषि प्रधान देश और अर्थवयवस्था में किसानों को सहूलियत देने के बजाए सरकार बडे़ उद्योगपतियों को सहूलियतें दे रही है । उनको टैक्स हॉलीडे के नाम पर अरबो रुपये की छूट दी गई लेकिन किसानों से ऋण वसूली के लिए बैंक के बाबू उसकी जान के पीछे पड़ जाते हैं । दो बड़ी विमान कंपनियों ने तेल के सात सौ करोड़ रुपए सरकार को नहीं चुकाए हैं लेकिन अबतक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है । ये कुछ ऐसे मसले हैं जो समेकित विकास का दावा करनेवाली इस सरकारी रिपोर्ट कार्ड की चमक को फीका कर देते हैं ।
इस रिपोर्ट कार्ड में सुरक्षा के भी बड़े दावे किए गए हैं । सरकार ने कहा है कि वामपंथी उग्रवादियों से निपटने के लिए सुरक्षा विकास और जन धारणा जैसे क्षेत्रों में समेकित दृष्टिकोण अपनाया गया है । लेकिन सरकार और कांग्रेस पार्टी में वामपंथी उग्रवादियों से निपटने में जिसतरह का मतभेद दिखाई देता है उससे भ्रम की स्थिति बनती है । गृहमंत्री नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की वकालत करते हैं तो कांग्रेस का महासचिव और पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने लेखों में कार्रवाई के साथ नरमी के भी संकेत देती है । नतीजा यह है कि पिछले दो महीने में वामपंथी उग्रवादियों ने तकरीबन तीन बड़े हमले कर तीन सौ से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया । नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है ।
अपनी उपलब्धियों को गिनाते-गिनाते सरकार ने एक बेहद दिलचस्प उपलब्धि को अपनी इस रिपोर्ट कार्ड में सम्मिलित कर लिया । सरकार ने गिनाया है कि – प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में पंद्रह सौ प्रवासी भारतीयों ने शिरकत की । सरकार ने इसमें से चौदह को प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार दिए । सत्तर पृष्ठ की उपलब्धि पुस्तिका में इस तरह के उपलब्धियों की भरमार है । दरअसल यह पूरी पुस्तिका जनता के साथ छल है और उसे भरमाने की एक सोची समझी चाल भी ।
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Sunday, June 13, 2010

गुलजार ने चेतन भगत को धोया

अभी ज्यादा दिन नहीं हीते हैं जब थ्री इडियट्स फिल्म में क्रेडिट को लेकर लेखक चेतन भगत ने खासा बवाल खड़ा कर दिया था । चेतन भगत के दो हजार चार में लिखे उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन- व्हाट नॉट टू डू एट आई आई टी – पर विधु विनोद चोप़ड़ा ने फिल्म बनाई जो सुपर हिट रही थी । लेखकीय जगत में प्रतिष्ठा पाने के लिए संघर्ष कर रहे चेतन भगत को उस विवाद से हिंदी जगत में एक पहचान मिल गई थी । चेतन के अंग्रेजी में लिखी किताबें हिंदी में अनूदित होकर हजारों की संख्या में बिकी । इससे चेतन को आर्थिक लाभ अवश्य हुआ होगा लेकिन ना तो उनके हिंदी ज्ञान में कोई इजाफा हुआ और ना ही हिंदी समाज के मन मिजाज को समझने में कोई मदद मिली । लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है कि सफलता मिलते ही लोग खुद को ज्ञानी समझने लगते हैं, चेतन भी उसी सक्सेस सिंड्रोम के शिकार हो गए । ट्विटर और ब्लॉग की दुनिया में छोटी बड़ी टिप्पणी कर लोकप्रियता हासिल करनेवाले चेतन भगत एक समारोह में फंस गए ।
किस्सा बेहद दिलचस्प है । मुंबई में एक समारोह के दौरान चेतन भगत और गुलजार साथ बैठे थे । चेतन को सभी अतिथियों का स्वागत तो करना ही था, समारोह का संचालन भी करना था । चेतन ने अपने अंदाज में ठसक के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की । अतिथियों का परिचय करवाते हुए बारी गुलजार साहब की आई । यहीं पर चेतन भगत से चूक हो गई । ऑस्कर पुरस्कार विजेता और हिंदी के बेहद प्रतिष्ठित लेखक-गीतकार गुलजार का परिचय करवाते हुए चेतन भगत ने कहा- मुझे कजरारे-कजरारे गीत बेहद पसंद है । गुलजार साहब ने इस गीतो को लिखा है । यह बेहतरीन कविता का एक नमूना है । जिस तरह से चेतन यह बात कही वो गुलजार साहब को चुभ गई । गुलजार को नजदीक से जानने वाले इस बात को बेहद अच्छी तरह से जानते हैं कि उनकी वाणी विरोधियों के खिलाफ तेजाब उगलती है । शायद चेतन को यह पता नहीं रहा होगा और उसने गीतकार गुलजार पर टिप्पणी कर डाली जो गुलजार को अखर गई । चेतन बोल ही रहे थे कि उन्होंने इशारा कर माइक अपने पास मंगवाया और बोलने की इच्छा जाहिर की । किसी भी कार्यक्रम में जब गुलजार साहब बोलना चाहें तो किसी की मजाल नहीं कि उन्हें रोक सके । गुलजार ने माइक हाथ में लिया और खचाखच भरे हॉल में बोलना शुरु किया- चेतन मुझे यह बात बेहद अच्छी लगी और मैं खुश हूं कि आप जैसे महान लेखक को कजरारे –कजरारे गीत अच्छा लगा । लेकिन मुझे लगता है कि आप जिस कविता की यहां बात कर रहे हैं उसे समझ भी पाए हैं । अगर आपको फिर भी लगता है कि आपने उस कविता को समझा है तो मैं आपके लिए उसकी दो लाइन गाकर सुनाता हूं आप भरे हॉल में उसका अर्थ बता दीजिए । गुलजार साहब यहीं पर नहीं रुके और उन्होंने कजरारे-कजरारे गीत से दो लाइन गाकर सुना दी – तेरी बातों में किवाम की खुशबू है, तेरा आना भी गर्मियों की लू है । इसके बाद सीधे चेतन की तरफ मुखातिब होकर पूछा कि इसका अर्थ बताइये । अब चेतन को काटो तो खून नहीं । गुलजार जैसा सीनियर लेखक भरी सभा में कविता की दो लाइन का अर्थ पूछ रहा है । गुलजार के वार से सन्न रह गए चेतन बगलें झांकने लगे । चेतन को चुप देखकर भी गुलजार नहीं रुके । उन्होंने भरी सभा में चेतन को झिड़कना शुरू कर दिया । गुलजार ने कहा – जिस चीज के बारे में पता नहीं हो उसके बारे में कुछ भी बोलना उचित नहीं है । जिसके बारे में जानते हो उसी के बारे में बोलो । हाथ में माइक लिए पोडियम पर खडे़ चेतन की स्थिति का अंदाज आप लगा सकते हैं । गुलजार ने चेतन की ठसक और हेकड़ी चंद पलों में हवा कर दी ।
मैं विश्वास के साथ तो यह नहीं कह सकता कि चेतन को उन दो पंक्तियों का अर्थ पता नहीं था लेकिन चेतन भगत जिस पीढ़ी को और जिस तरह की अंग्रेजीदां जनरेशन का प्रतिनिधित्व करते हैं उनके लिए ‘किवाम की खुशबू’ और ‘गर्मियों की लू’ का अर्थ ना जानना कोई हैरत की बात नहीं है । किसी तरह से मामला निबटा और समारोह खत्म हुआ । इस वाकए से एक बात तो साफ हो गई कि हिंदी को जाने बगैर भी हिंदी के बाजर को भुनाने की लगातार कोशिश हो रही है । चेतन के अलावा हिंदी फिल्मों की सफलतम नायिका कटरीना कैफ इतने दिनों बाद भी हिंदी बोल नहीं पाती है । इतना वक्त बिताने के बाद हिंदी समझ जरूर लेती है । अब इसे बिडंबना ही कहा जाएगा कि कटरीना हिंदी फिल्मों की सफलतम हिरोइन है । हिंदी के बूते कमाने-खाने वाले लोग हिंदी बोलना तक नहीं जानते ।
चेतन के उपन्यास खासे लोकप्रिय हैं और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में हजारो की संख्या में बिके हैं । लेकिन व्यावसायिक सफलता को गुणवत्ता की गारंटी नहीं माना जा सकता है । मेरठ से निकलने वाले प्लप फिक्शन भी हिंदी में खासे लोकप्रिय हुए हैं और हो भी रहे हैं लेकिन उनके लेखकों को कोई स्थायी पहचान हिंदी में नहीं बन पाई । रानू और मनोज को अब कितने लोग याद करते हैं । वेद प्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत भी कुछ ही दिनों की बात हैं । होता यह है कि पल्प फिक्शन राइटर पैसा तो बहुत कमा लेता है, पाठकों के बीच लोकप्रियता भी हासिल कर लेता है लेकिन लेखकीय प्रतिष्ठा उसे हासिल नहीं हो पाती है ।
गुलजार चेतन विवाद से एक बात तो साफ हो गई है कि भारत में अंग्रेजीदां युवक युवतियों की एक ऐसी फौज तैयार हो गई है जिसे ना तो हिंदी की समझ है और ना ही अंगेजी को समझते हैं । पटर-पटर अंग्रेजी बोलनेवाले लोगों को भी अंग्रेजी की परंपरा और उसके व्याकरण का ज्ञान नहीं होता है । लेकिन उन्हें इसका रिमोर्स भी नहीं होता । अगर आप किसी चीच को नहीं जानते हैं तो आपको उसका अफसोस होना चहिए लेकिन आज की युवा पीढ़ी – हू केयर्स के सिद्धांतो पर चलती है जहां अपनी अज्ञानता पर उन्हें फख्र होता है । प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध को नहीं जानने को वो अपनी शान समझते हैं । अज्ञेय, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, रवीन्द्र कालिया का नाम नहीं सुनने को उन्हें जरा भी मलाल नहीं । एक और दिलचस्प प्रसंग बताता हूं – न्यूज चैनल की एक बड़ी एंकर हैं । किसी जमाने में साहित्य कला की बीट कवर करती थी । दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला चल रहा था, मोहतरमा उसे कवर कर रही थी ।संपादक ने फोन कर कहा कि ‘गीतांजलि’ लेते आना । मेले से लौटने के बाद बेहद बेतकुल्लफी से वो अपने संपादक के पास गई और कहा कि गीतांजली को मेले में बहुत ढूंढा लेकिन वो कहीं दिखाई नहीं दी । मैंने उसके लिए मैसेज छोड़ दिया है कि वो तुरंत आपको फोन करे । बेचारे संपादक महोदय... लाने को कहा था रविन्द्रनाथ टैगोर की किताब ‘गीतांजलि’ लेकिन उनकी खोजी रिपोर्टर ने ढूंढ लिया किसी लड़की गीतांजलि को । संपादक मुंह ताकते रहे और वो रिपोर्टर वहां से इस तरह चली गई जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो ।

Monday, June 7, 2010

बीमार विपक्ष, कमजोर लोकतंत्र

कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार की दूसरी पारी के सालभर पूरा होने पर हर तरफ सरकार के कामकाज को कसौटी पर कसा गया । किसी ने फेल किया तो किसी ने पास तो किसी ने औसत नंबर दिए । प्रधानमंत्री ने भी मीडिया से बात कर अपनी और सरकार की पीठ थपथपाई । लेकिन इन तमाम कोलाहल के बीच हम यह भूल गए कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष का होना भी जरूरी है । जब यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले साल की समीक्षा हो रही है तो यह भी आवश्यक है कि मुख्य विपक्षी दल के सालभर के कामकाज को भी परखा जाए। दो हजार नौ में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद बीजेपी में लगभग विद्रोह जैसी स्थिति हो गई थी । दो हजार चार में लोकसभा चुनाव में बीजेपी की इतनी बुरी गत नहीं बनी थी । कांग्रेस की एक सौ पैंतालीस सीटों की तुलना में उसे कुछ ही कम सीटें मिली थी । लेकिन दो हजार नौ में पार्टी का जनादेश और कम हो गया । नतीजा यह हुआ कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर ही सवाल खड़े होने लगे । अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा सरीखे नेताओं ने अपने बयानों से केंद्रीय नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर दिया । अरुण शौरी ने पार्टी के आला नेतृत्व को हम्फ्टी-डम्फ्टी तक बता डाला । इन बयानबाजी का असर यह हुआ कि पार्टी दिशाहीन हो गई । पार्टी विद ए डिफरेंस का नारा बुलंद करनेवाली पार्टी में अनुशासनहीनता चरम पर जा पहुंची ।

जब वक्त हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर पार्टी में एक संदेश देने का था तो पार्टी के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने नेता विपक्ष की कुर्सी पर बने रहने का इरादा जता दिया था । नेता विपक्ष को मिलनेवाली सुविधाएं छोड़ने को वो राजी नहीं थे । लेकिन देर से ही सही संघ के दबाव में आडवाणी ने नेता विपक्ष की कुर्सी छोड़ दी । बीजेपी ने सुषमा स्वराज को लोकसभा में और अरुण जेटली को राज्यसभा में नेता चुना तो लगा कि पार्टी में नए नेतृत्व से स्थितियां बदलेगी और अपेक्षाकृत युवा नेता नई जान फूंक पाएंगें । लेकिन बूढे होते आडवाणी का गद्दी मोह नहीं छूटा और संसदीय दल पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए वो उसके चेयरमैन पद पर आसीन हो गए ।

बीजेपी में चल रहा ड्रामा यहीं खत्म नहीं हुआ । राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की दखल के बाद महाराष्ट्र की राजनीति करनेवाले नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। देशभर में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच नितिन गडकरी की काबिलियत को लेकर एक संदेह का वातावरण बना । इसकी वजह से पार्टी से जुडे़ कार्यकर्ताओं में किसी तरह का उत्साह पैदा नहीं हो सका । लंबे जद्दोजहद के बाद नितिन गडकरी ने दो महीने पहले तेरह उपाध्यक्ष और पंद्रह महासचिव समेत पार्टी पदाधिकारियों की एक बड़ी फौज का ऐलान किया । टीम के ऐलान के साथ ही पार्टी प्रवक्ता बनाए गए शाहनवाज हुसैन और राजीव प्रताप रुडी खफा हो गए । शाहनवाज ने तो कुछ दिनों तक पार्टी की बैठकों का बहिष्कार कर नेतृत्व को चुनौती भी दी । शाहनवाज हुसैन का तर्क था कि जब रविशंकर प्रसाद केंद्र में राज्य मंत्री थे तो वो कैबिनेट मंत्री थे, लिहाजा पार्टी में रविशंकर प्रसाद का जूनियर बनाकर अध्यक्ष ने उन्हें अपमानित किया है । दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया पार्टी पदाधिकारियों का एलान हुए लेकिन गडकरी अब तक उनके बीच काम का बंटवारा नहीं कर पाए हैं । हां इस बीच यह जरूर हुआ कि गडकरी ने लालू और मुलायम सिंह यादव को सोनिया का तलवा चाटने वाला कुत्ता बताकर खासी आलोचना झेली । जिस पार्टी का अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सलीकेदार वक्ता रहा वहां गडकरी के इस छिछले बयान ने बीजेपी की छवि पर दाग लगा दिया जिसकी निकट भविष्य में भारपाई मुश्किल है ।

अगर हम पार्टी अध्यक्ष के तौर पर गडकरी के राजनैतिक पैसलों पर नजर डालें तो वहां भी वो बुरी तरह से अपरिपक्व नजर आए । झारखंड में शिबू सोरेन और उसके बेटे हमंत सोरेन की चाल में फंसकर पार्टी की खासी भद पिटी । सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान फिर साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला और फिर समर्थन वापसी के फैसले से पार्टी की किरकिरी हुई । राजनीति में शुचिता और पवित्रता की बात करनेवाली पार्टी झारखंड में बुरी तरह से एक्सपोज हो गई ।

लोकतंत्र में विपक्षी दल की एक महती जिम्मेदारी यह भी होती है वह सरकार की गलत नीतियों को उजागर करे, साथ ही सरकार के जन विरोधी कदमों का पुरजोर विरोध करते हुए आंदोलन करे । लेकिन अगर हम पिछले सालभर के बीजेपी के क्रियाकलापों पर नजर डालें तो अपनी अंतर्कलह से जूझ रही पार्टी कोई भी बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई । महंगाई और गन्ने के मूल्य पर संसद में विपक्षी दलों के बीच अभूतपूर्व एकता दिखाई दी थी । उन्नीस सौ नवासी में वीपी सिंह की सरकार गठन के बाद पहली बार बीजेपी, वामपंथी दल और लालू-मुलायम एक साथ नजर आए थे । लेकिन विपक्षी दलों की यह एकता ज्यादा समय तक चल नहीं पाई । कांग्रेस के राजनीतिक दांव के आगे विपक्षी एकता तार-तार हो गई । इससे भी बीजेपी के सरकार को घेरने के सपने पर ग्रहण लग गया । प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते इस बिखराव को ना रोक पाने का ठीकरा भी बीजेपी ही सर ही फूटा ।

संसद में बिखरी विपक्षी एकता को कांग्रेस ने बजट पर कटौती प्रस्ताव के दौरान जमकर भुनाया और एक बार फिर से साबित कर दिया कि गठबंधन की सरकार को कोई खतरा नहीं है । देश में महंगाई चरम पर है, जनता त्राहिमाम कर रही है, गैस के बाद अब पेट्रोल डीजल के दाम बढाने की सरकार तैयारी कर रही है । किसानों को सब्सिडी की रियायत खत्म करने की भी कवायद चल रही है । आम आदमी के नाम पर सत्ता में वापस लौटी कांग्रेस को आम आदमी की ही फिक्र नहीं है लेकिन बीजेपी को भी कहां फिक्र है । दिल्ली में पार्टी ने महंगाई पर एक प्रतीकात्मक रैली अवश्य की लेकिन महंगाई के मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन झेड़ने में बुरी तरह नाकाम रही । इसकी वजह है कि संगठन और काडर जिस बीजेपी की मजबूती हुआ करती थी आज वही संगठन और कार्यकर्ता द्वंद में हैं । राज्य इकाइयों के अध्यक्ष या तो चुने नहीं जा सके हैं या फिर जहां चुने गए हैं वहां वो पदाधिकारी बनाने और रूठे नेताओं को मनाने में लगे हैं । जनता और उसकी समस्या के लिए उनके पास वक्त ही नहीं है । दिल्ली की रैली में गर्मी से गश खाकर गिर पड़ने वाले बीजेपी अध्यक्ष विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं । हालात तो यह है कि राज्यसभा के चुनाव होने हैं लेकिन अभी तक पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति का गठन नहीं हो पाया है । सबकुछ एडहॉक तरीके से चल रहा है । लोकतंत्र के लिए प्रमुख विपक्षी दल का इस तरह से बिखरा हुआ और दिशाहीन होना अच्छा नहीं है । जरूरत इस बात की है कि पार्टी हार के सदमे से उबरे, अंतर्कलह को दरकिनार करे और जनता के बीच जाकर फिर से अपनो खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश करे, तभी पार्टी मजबूत होगी और देश में लोकतंत्र भी मजबूत होगा ।

Friday, May 28, 2010

शर्म इनको मगर....

गोवा के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत महिलाओं के एक सम्मेलन में बोलते-बोलते जोश में होश खो बैठे । यह जानते हुए भी कि वो जिस पार्टी के सदस्य हैं उसकी अध्यक्षा एक महिला है- कामत ने महिलाओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर डाली । कामत ने यह टिप्पणी यह जानते हुए भी की कि उनकी पार्टी के एजेंडे में महिलाओं को लोकसभा और राज्यसभा में आरक्षण दिलाना प्राथमिकता पर है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यूपीए- 2 के दो साल पूरे होने पर महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण देने पर सरकार की पीठ ठोंकी । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि गोवा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री को यह सब चीजें याद नहीं है । महिलाओं के सम्मेलन में कामत ने कहा कि महिलाओं को राजनीति में नहीं आना चाहिए क्योंकि इससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । अब यह बात तो कामत ही बता सकते हैं कि किस तरह के नकारात्मक प्रभाव की बात वो कर रहे हैं । लेकिन उनके भाषण का जो भाव था वह महिलाओं को लेकर उनकी घटिया मानसिकता को प्रदर्शित कर गया ।

दिगंबर कामत यह भूल गए कि भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि महिलाओं ने राजनीति में अमिट छाप छोड़ी है । चाहे वो दिगंबर कामत की पार्टी की इंदिरा गांधी हों, राजकुमारी अमृत कौर, सुचेता कृपलानी, गीता मुखर्जी हों, या फिर पूर्व मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा, कृष्णा शाही हों । अब के परिदृश्य में भी सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज, मीरा कुमार, मायावती, जयललिता से लेकर कई महिला नेत्री हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और भारत के राजनीतिक परिदृश्य इनकी मजबूत उपस्थिति है । भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं के योगदान को गिनाने की जरूरत नहीं है, लंबे समय से राजनीति से जुड़े कामत याहब को संभवत: यह पता होगा ।

गोवा के मुख्यमंत्री राजनीति में महिलाओं के आने के नकारात्मक प्रभाव पर ही बोलकर नहीं रुके । वो आगे बढ़े और यहां तक कह गए कि- “राजनीति महिलाओं को क्रेजी बना देती है । समाज के बदलाव में महिलाओं की महती भूमिका है और उन्हें आनेवाली पीढ़ी का ध्यान रखना चाहिए ।“ बोलने के उत्साह में कामत जो कह गए उससे उनकी राजनीति और उनके करियर पर दूरगामी असर पड़ सकता है । लेकिन सवाल यह उठता है कि किसी राज्य का एक चुना हुआ मुख्यमंत्री एक सार्वजनिक समारोह में इस तरह के वक्तव्य कैसे दे सकता है । एक सूबे के सबसे जिम्मेदार पद पर बैठा आदमी, जिसने संविधान के नाम पर शपथ लेकर पद संभाला है वह इस तरह का अपमानजनक वक्तव्य देने के बाद भी अपने पद पर बना हुआ है । क्या कामत की संविधान में आस्था खत्म हो गई है । कामत शायद यह भूल गए हैं कि आज वो एक महिला की कृपा की वजह से ही गोवा के मुख्यमंत्री हैं, विधायकों की पसंद की वजह से नहीं ।

दरअसल कामत का यह बयान एक घोर सामंती व्यवस्था की पुरुषवादी मानसिकता का बेहद कुरुप चेहरा है । उस व्यवस्था का जहां महिलाएं बच्चा पैदा करने की मशीन हैं, बच्चा पालना उनका परम धर्म है । परिवार की देखभाल और अपने पति की हर तरह की जरूरतों पर जान न्योछावर करने की घुट्टी उसे जन्म से पिलाई जाती है । उस आदिकालीन वयव्स्था में महिलाएं गुलाम हैं जिनका परम कर्तव्य है अपने स्वमी की सेवा और स्वामी है पुरुष । इस पाषाणकालीन व्यवस्था में यकीन रखनेवाले पुरुषों को यह कतई मंजूर नहीं है कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करें । महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक और दर्जा मिले । महिलाएं देश की नीति नियंता बने । गोवा के मुख्यमंत्री इसी सामंती और पुरुष प्रधान व्यवस्था के प्रतिनिधि पुरुष हैं । उनका वक्तव्य पुरुषों के महिला विरोधी मानसिकता के मनोविज्ञान का नमूना है । ।

महिला विरोधी इसी मनोविज्ञान और मानसिकता में मुलायम सिंह भी कह जाते हैं कि अगर संसद में महिलाओं को आरक्षण मिला तो सीटियां बजेंगी । इसी मनोविज्ञान के तहत मुस्लिम धर्म गुरू कल्बे जब्बाद भी महिलाओं के प्रति अपमानजनक बोल बोलते हैं । यही मनोविज्ञान है जो तुलसीलास से भी लिखवा लेता है – ढोल, गंवार...पशु नारी ये सब है तारण के अधिकारी । तो महिलाओं का जो विरोध है वह किसी सिद्धांत, धर्म, आस्था, विश्वास या वाद के परिधि से परे है । जब भी महिलाओं की बेहतरी की बात होती है तो सभी सिद्धांत, वाद, समुदाय, धर्म धरे रह जाते हैं । प्रबल हो जाता है कठोर पुरातनपंथी विचारधारा जो महिलाओं को सदियों से दबा कर रख रहा है और आगे भी चाहता है कि वो उसी तरह दासता और पिछड़ेपन की बेड़ियों में जकड़ी रहें । लेकिन अब वक्त काफी आगे बढ़ गया है पर पीछे छूट गए हैं इस तरह के सामंती और दकियानूसी विचारधारा के लोग ।

Friday, May 21, 2010

कांग्रेस का माइनरिटी प्लान

हाल के दिनों में भारतीय राजनीति में कई ऐसी घटनाएं घटी जिसे अगर हम सिलसिलेवार ढंग से देखें तो केंद्र में शासन कर रही कांग्रेस पार्टी का एक गेमप्लान सामने आता है । यह गेम प्लान अगले दो तीन सालों में सूबों में होनेवाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर तैयार किया गया प्रतीत होता है। दरअसल इन कड़ियों को जोड़ने के लिए हमें कुछ पीछे जाना होगा । कुछ महीनों पहले पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह आजमगढ़ के संजरपुर पहुंचकर बाटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े देते हैं । इशारों-इशारों में दिग्विजय सिंह ने बटला हाउस एनकांउटर के फर्जी होने की बात कर डाली । बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादियों के फोटोग्राफ्स की बिनाह पर उन्होंने दावा किया कि एनकाउंटर में उस तरह से सर में गोली लगना नामुमकिन है। सवाल यह भी उठा कि बटला हाउस एनकांटर पर सवाल खड़े करने के लिए दिग्विजय सिंह ने संजरपुर को क्यों चुना । इस बयान के कुछ ही दिनों बाद ही पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के फोटोग्राफ्स और उनकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट लीक की गई जिसको आधार बनाकर बटला हाउस एनकाउंटर पर मीडिया में सवाल खड़े किए गए और एनकाउंटर को शक के दायरे में ला दिया गया । वोट की ओछी राजनीति के लिए दिल्ली पुलिस के जाबांज इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा की शहादत को भुला दिया गया । गौरतलब है कि मोहन चंद्र शर्मा को कांग्रेस पार्टी ने ही मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सम्मान दिया था । एक बार फिर से बटला हाउस का जिन्न बोतल से बाहर आ गया और साथ ही आजमगढ़ भी सुर्खियों में आ गया । जाहिर सी बात है इस पूरे घटना क्रम को अगर हम चंद महीनों पहले दिग्विजय सिंह के संजरपुर में दिए गए बयान से जोड़कर देखें तो तस्वीर कुछ साफ होती नजर आती है । अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए फेंका गया यह पहला चारा था ।
इसमें सफलता पाने के बाद कांग्रेस ने अपना निशाना बनाया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को । गुजरात दंगों के बाद मोदी को भारतीय मुसलमानों के बीच खलनायक की तरह पेश किया गया और उनकी छवि घोर सांप्रदायिक बना दी गई । सचाई चाहे जो हो वो तो अदालत से तय होगा लेकिन आज की तारीख में देश का मुसलमान मोदी के बारे में बेहद खराब राय रखता है । तो कांग्रेस ने फिर से देश के अल्पसंख्यकों के बीच मोदी के बहाने एक संदेश देने की कोशिश की, संदेश यह कि जो भी मोदी के साथ है वो हमारा दुश्मन है । आपको याद होगा कि मुंबई में एक समारोह में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण एक मंच पर साथ दिखे थे जिसके बाद पार्टी में अशोक चव्हाण के खिलाफ मोर्चा खुल गया था । उनको उस अमिताभ के साथ बैठने के लिए आलोचना का शिकार होना पड़ा जो गुजरात पर्यटन के ब्रांड अंबेस्डर हैं और नरेन्द्र मोदी के साथ भी मंच शेयर करते हैं । लेकिन इस आलोचना के पीछे की असली वजह वो नहीं है जो सतह के उपर दिखाई देती है बल्कि वजह वह है जो सतह के नीचे है । कांग्रेस पार्टी अशोक चव्हाण और अमिताभ बच्चन के बहाने देश के अल्पसंख्यकों को यह संदेश देना चाहती थी कि जो भी मोदी के साथ है वो हमें बर्दाश्त नहीं है और पार्टी यहां भी सफल रही क्योंकि अमिताभ का नाम आने से मीडिया में उक्त घटना को लगातार कई दिनों तक प्रमुखता से कवरेज मिलता रहा ।
तीसरी घटना जो हुई वो जुड़ी तो हुई है आईपीएल और ललित मोदी से लेकिन उसके पीछे भी नरेन्द्र मोदी का ही नाम है । आईपीएल में जब तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर और आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के बीच जुबानी जंग जारी था तो उस विवाद में अचानक से कोच्चि टीम में हिस्सेदारी को लेकर गुजरात के उद्योगपतियों के साथ नरेन्द्र मोदी का नाम भी उछला । जैसे ही नरेन्द्र मोदी, वसुंधरा राजे और ललित मोदी के तार जुड़ते नजर आए अचानक से वित्त मंत्रालय के अधीन काम करनेवाला आयकर विभाग सक्रिय हो गया और देशभर में ताबड़तोड़ छापे डाले जाने लगे । ललित मोदी को भी बीजेपी कनेक्शन मंहगा पड़ा । यहां भी कांग्रेस देश के अल्पसंख्यकों को यह संदेश देने में सफल हो गई कि जो भी नरेन्द्र मोदी के साथ वह हमें बर्दाश्त नहीं ।
कांग्रेस की तरफ से देश के अल्पसंख्यकों को लगातार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सिर्फ वही इकलौती पार्टी है जो उनके हितों का ख्याल रख सकती है । इसका एक और उदाहरण अभी सामने आया है- पार्टी में अल्पसंख्यकों के नए-नए बने पैरोकार दिग्विजय सिंह ने अब मालेगांव, गोवा, जयपुर और हैदराबाद धमाकों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित करने का राग छेड़ा हुआ है । यह इसलिए कि इन जगहों पर धमाका कराने का शक कुछ हिंदूवादी संगठनों पर है और उन संगठनों से जुड़े लोग या तो जेल में हैं या फिर पुलिस हिरासत में । उनके ट्रायल के लिए दिग्विजय सिंह को भारतीय न्यायिक वयवस्था की रफ्तार पर भरोसा नहीं हो रहा है और वह इसके लिए तेज गति से सुनवाई चाहते हैं । दिग्विजय सिंह या उनकी पार्टी ने कभी भी देश भर में हुए आतकंवादी हमलों के लिए अलग से अदालत की मांग की हो ऐसा सुनने में नहीं आया । यहां भी अल्पसंख्यकों को संदेश देने की कोशिश ना कि आतंकवादी गतिविधियों पर काबू पाने की ईमानदार कोशिश ।
अब अगर हम उपर के सभी वाकयों को जोड़ते हैं तो एक मुकम्मल तस्वीर सामने आती है । यह तस्वीर बनती है कांग्रेस पार्टी द्वारा देश के अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिश और इस कोशिश का लक्ष्य है बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव । इस साल बिहार में, अगले साल पश्चिम बंगाल में और उसके अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं । कांग्रेस इस प्रयास में है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जिस तरह से अल्पसंख्यक समुदाय उनसे बिदक गया था उसे लुभाकर, रिझाकर अपने पाले में लाया जाए । दो हजार एक की जनगणना के आधार पर अगर हम देखें तो ये तीन ऐसे राज्य हैं जहां मुसलमानों की संख्या की संख्या काफी ज्यादा है । दो हजार एक के जनगणना के मुताबिक देश की कुल मुस्लिम आबादी का बाइस फीसदी उत्तर प्रदेश में है । बिहार में तकरीबन दस फीसदी और पश्चिम बंगाल में ---फीसदी मुस्लिम आबादी है । उत्तर प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों में से 17 के भाग्य का फैसला मुस्लिम वोटर करते हैं जहां कि उनकी आबादी तकरीबन बीस फीसदी है । इसे इस तरह भी देख सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में बीस ऐसे जिले हैं जहां की मुस्लिम आबादी बीस फीसदी से ज्यादा है । आजमगढ़, बहराइच, गोंडा, श्रावस्ती, वाराणसी और डुमरियागंज के अलावा पश्चिम उत्तर प्रदेश के अमरोहा, मुजफ्फरनगर, मोरादाबाद में तो उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला मुस्लिम वोटों के आधार पर ही होता है ।
बिहार में भी सात जिलों में यही हालत है, किशनगंज, कटिहार अररिया और पूर्णिया में तो पैंतीस फीसदी से ज्यादा आबादी है जो दर्जनों विधानसभा क्षेत्र के नतीजों को प्रभावित करते हैं । यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलमान एकमुस्त वोट करते हैं । पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों ने कांग्रेस के पक्ष में वोट डालकर उसको बीस सीटों का आंकड़ा हासिल करने में मदद की । पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में भी मुसलमानों की निर्णायक संख्या है । क्लासलेस और कास्टलेस सोसायटी का दावा करनेवाली पश्चिम बंगाल प्रगतिशील सरकार ने भी इन्हीं वोटों को ध्यान में ऱखकर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को सूबे से बाहर निकाल दिया । अब सरकार को यह डर सता रहा है कि मुस्लिम वोट बैंक ममता बनर्जी की ओर जा रहा है तो उसे फिर से अपने पाले में लाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रही है । उधर कांग्रेस भी उन्हें अपनी तरफ खींचने की जुगत में लगी है ।
सवाल यह उठता है कि आजादी के बाद से दशकों तक मुस्लिम वोट कांग्रेस को जाता रहा लेकिन उनके उत्थान के लिए कितना और क्या किया गया । मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए कितनी कोशिश की गई । मुस्लिम इलाकों में कितने सरकारी स्कूल खोले गए । अगर ये सारे आंकड़े सामने आ जाएं तो कांग्रेस की पोल खुल जाएगी । इस देश में उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति तो मुसलमान बन सकता है लेकिन उनका सरकारी दफ्तर में चपरासी बनना मुश्किल है । यह एक कड़वी सचाई है जिसके लिए सिर्फ और सिर्फ इस देश में आजादी के बाद पांच दशक तक राज करनेवाली पार्टी जिम्मेदार है । मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करनेवाली कांग्रेस पर क्या इस समुदाय के समुचित विकास की जिम्मेदारी नहीं है । अब वक्त आ गया है कि देश की अल्पसंख्यक जनता को ऐसी पार्टियों की राजनीति और हमदर्दी के झूठे दिखावे को समझना चाहिए और मौका मिलने पर उनको सबक भी सिखाना चाहिए ।

Monday, May 17, 2010

शीला, श्लाका और छीछालेदार

हिंदी के वरिष्ठ और बेहद प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद के अपमान का संगीन इल्जाम झेल रही दिल्ली की हिंदी अकादमी ने आखिरकार अपना पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित कर ही लिया । लेकिन इस बार पुरस्कार अर्पण समारोह की भव्यता और लोगों की सहभागिता के बगैर आयोजित की गई । राजधानी के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में से किसी एक में आयोजित होने वाला अकादमी का यह सालाना समारोह इस बार दिल्ली सचिवालय के एक कमरे में आयोजित हुआ। सबकुछ बेहद सरकारी और गुपचुप तरीके से किया गया । हिंदी अकादमी की यह परंपरा रही है कि वो किसी भी कार्यक्रम के लिए दिल्ली के लेखकों-पत्रकारों को आमंत्रित करती है । अकादमी की अपनी एक मेलिंग लिस्ट है जिनको हर कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाता है । लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ । यहां तक कि अकादमी के गवर्निंग वॉडी के सदस्यों तक को सिर्फ कार्ड भेजकर रस्म अदायगी कर ली गई । नतीजा यह हुआ कि जन कार्यक्रम होने की बजाए यह आयोजन सरकारी कार्यक्रम में तब्दील होकर रह गया । वरिष्ठ साहित्यकार और हंस के संपादक ने बेहद सटीक टिप्पणी की और कहा कि अगर अकादमी को पुरस्कार वितरण की रस्म अदायगी ही करनी थी तो लेखकों को कूरियर से चेक और स्मृति चिन्ह भेज देती । समारोह में शीला दीक्षित ने हिंदी अकादमी की स्वायत्ता को लेकर बड़ा लंबा चौड़ा भाषण दिया लेकिन अकादमी की स्वायत्ता का जिस तरह से गला घोंटा गया उसके लिए शीला दीक्षित ही जिम्मेदार हैं । दरअसल हिंदी अकादमी अब पूरी तरह से सरकार का भोंपू बनकर रह गया है । हिंदी के प्रचार प्रसार की आड़ में सरकार के मंत्रियों और विधायकों को खुश करने और जनता के बीच उनकी छवि बनाने का काम होता है । इसके अलावा बड़े और रसूखदार लोगों की साहित्यिक लिप्सा को भी दिल्ली की हिंदी अकादमी संतुष्ट करती है । इसका एक उदाहरण आपको देते चलें । इसी पुरस्कार वितरण समारोह में हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती के एक अंक का लोकार्पण भी किया गया । इस अंक में एक बड़े बिल्डर को खुश करने के लिए अंत समय में हिंदी के एक वरिष्ठ कवि की कविता हटाकर उनकी कविता प्रमुखता से छाप दी गई । इस खेल का अंदाज तो पाठक स्वयं लगा सकते हैं कि बिल्डर की कविता को अंत समय में क्यों शामिल किया गया । अगर कविता उतनी ही अच्छी थी तो क्या अगले अंक का इंतजार नहीं किया जा सकता था । तो अकादमी में जिस तरह के खेल चल रहे हैं उसको देखते हुए यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि ये सरकार की छवि को बिगाड़ने का काम ज्यादा कर रहे हैं, बनाने का कम ।
दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा । वर्ष 2008-09 के लिए अकादमी की कार्यकारिणी ने हिंदी के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान देने की संस्तुति की थी । उसके बाद अकादमी की अध्यक्ष की हैसियत से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने तत्कालीन कार्यकारिणी के फैसलों पर मुहर लगा थी । लेकिन बाद के दिनों में हिंदी अकादमी में प्रशासनिक अराजकता की वजह से उस वर्ष के सम्मान नहीं दिए जा सके । लेकिन अब जब अकादमी ने वर्ष 2009-10 के पुरस्कारों के साथ 2008-09 के पुरस्कारों का ऐलान किया तो 2008-09 के लिए श्ललाका सम्मान के लिए किसी का नाम घोषित नहीं किया गया । सूची से कृष्ण बलदेव वैद का नाम गायब था । बताया जा रहा है कि एक अनाम से कांग्रेसी नेता ने अकादमी की अध्यक्ष दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान नहीं देने का अनुरोध किया था । कांग्रेसी नेता का आरोप है कि वैद के उपन्यास नसरीन में कई जगह अश्लील शब्दों और स्थितियों का चित्रण किया गया है । कांग्रेसी नेता की आपत्ति को तरजीह देते हुए शीला दीक्षित की अध्यक्षता वाली कमिटी ने वैद जी का नाम रोक दिया ।
कृष्ण बलदेव वेद को श्ललाका सम्मान नहीं दिए जाने पर हिंदी साहित्य में विरोध के स्वर उठने लगे थे । हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल, पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिट्ठी के बाद 2009-10 के श्ललाका कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया । केदार जी के इस कदम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकरानेवालों की लाइन लग गई । कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्रि और स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल, रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है । लेकिन हैरानी की बात है कि पहले सार्वजनिक तौर पर विरोध जताने के बाद भी गगन ना केवल समारोह में पहुंची बल्कि मंच पर शीला दीक्षित के हाथों पुरस्कार भी ग्रहण किया । तमाम हिंदी दैनिकों ने गगन गिल की तस्वीर को प्रमुखता से छापा । गगन गिल का वहां पहुंचान हैरानी की बात थी क्योकि उनको अशोक वाजपेयी खेमे का माना जाता है और वैद जी भी उसी स्कूल ऑफ राइटर्स हैं । गगन के अलावा असगर वजाहत भी पुरस्कार लेने पहुंचे । असगर वजाहत ने शुरू से ही अपना स्टैंड साफ रखा था इस वजह से उनकी मौजूदगी को लेकर किसी को हैरानी नहीं हुई ।
इस पुरस्कार वितरण समारोह के आयोजन से कुछ बेहद अहम और बड़े सवाल खड़े हिंदी के साहिय और साहित्यकार के सामने खड़े हो गए हैं । हिंदी लेखकों का ढुलमुल चरित्र एक बार फिर से उजागर हुआ है । अकादमी के कर्ताधर्ताओं को यह मालूम है कि हिंदी के लेखकों का विरोध फौरी होता है और वो ज्यादा समय तक अपने स्टैंड पर कायम नहीं रह सकते हैं । इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने पर हिंदी के कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी । अशोक चक्रधर को मसखरा और मंचीय कवि कहकर खिल्ली उड़ाई थी, लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन नजर आने लगे थे । चाहे वो राजेन्द्र यादव हों या फिर नामवर सिंह या फिर कोई और वरिष्ठ लेखक । वजह ये थी कि अशोक चक्रधर सत्ता प्रतिष्ठान के करीब है, हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के अलावा वो केंद्रीय हिंदी संस्थान के भी कर्ता-घर्ता हैं । हिंदी के लेखक सरकारी लाभ का चाहे जितना विरोध करें लेकिन वो इसका लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं । छोटे –मोटे फायदे के लिए बड़े सिद्धांतो को तिलांजलि देने में इन्हें वक्त नहीं लगता । वैद जी का अपमान पूरे साहित्य जगत का अपमान है और हिंदी समाज को पूरी ताकत के साथ इसका विरोध करना चाहिए था । अफसोस की बात है कि हिंदी के लेखक पुरजोर तरीके से शीला दीक्षित सरकार का विरोध नहीं कर सके और सरकार ने अपनी मनमानी कर ली । लेकिन इससे दिल्ली सरकार की जमकर किरकिरी हुई । आज नहीं तो कल शीला दीक्षित को इस बात का एहसास होगा लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी होगी ।

Wednesday, May 5, 2010

विश्वास के कातिल गुरू

अभी एक छोटी सी पर अहम खबर अखबारों में आई जो देश से गद्दारी करनेवाली माधुरी गुप्ता के कवरेज में गुम होकर रह गई । केरल के कोझीकोड जिले के छोटे से कस्बे पुलियाकावू के एक प्राइमरी स्कूल के शिक्षक को चौथी क्लास में पढ़नेवाली छह लड़कियों के यौन शोषण करने का दोषी पाया गया और उसे तीस साल की जेल और बीस हजार रुपये का जुर्माने की सजा सुनाई गई । दरअसल उनतालीस साल के इस गुनहगार ने आज से तेरह साल पहले चौथी क्लास की लड़कियों के साथ क्लारूम और कंप्यूटर लैब में छेड़छाड़ की थी और उन्हें अपने हवस का शिकार बनाने की कोशिश की थी । शिक्षा के मंदिर की पवित्रता को अपनी हरकतों से बदनाम करनेवाले इस शख्स का जब राज खुला था तो केरल में तूफान उठ खड़ा हुआ था । तेरह साल बाद उन छह मासूम लड़कियों को इंसाफ मिला है । संभवत देश का यह पहला मामला है जहां यौन शोषण के मामले में किसी आरोपी को तीस साल की कैद और बीस हजार रुपये का जुर्माना किया गया है । अदालत के इस तरह के रुख से इस तरह की घिनौनी हरकत करनेवालों पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है या फिर इस तरह के कुंठित लोग कानून के खौफ की वजह से इस तरह की नापाक हरकतों को अंजाम ना दें ।
हाल के दिनों में इस तरह की बेचैन करनेवाली खबरें लगातार आने लगी हैं । प्राइमरी स्कूल से लेकर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय तक से शिक्षकों के अपने छात्र-छात्राओं के यौन शोषण की खबरें लगातार सुर्खियां बनती रही हैं । जिस दिन केरल की अदालत में यौन शोषण के जुर्म में आरोपी को तीस साल की सजा की खबर छपी उसी दिन ये खबर भी आई कि देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक - जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक शिक्षक ने एक विदेशी छात्रा के साथ जोर-जबरदस्ती करने की कोशिश की । जब छात्रा ने इसका विरोध किया तो उक्त शिक्षक ने मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन मामला पुलिस तक पहुंच गया । इसके पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एक दलित छात्रा के यौन शोषण के जुर्म में हिंदी विभाग के एक शिक्षक को विश्वविद्यालय ने नौकरी से हटा दिया था । दिल्ली विश्वविद्यालय के ही एक अन्य कॉलेज के एक शिक्षक पर छात्रों के यौन शोषण का आरोप लगा जिसे विश्विद्यालय की कमेटी ने सही पाया और उस केस में भी प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई हुई ।
दरअसल इस तरह के मामले जब राजधानी दिल्ली या फिर कुछ बड़े शहरों में होते हैं तो मीडिया की नजरों में आ जाते हैं और फिर प्रशासन कार्रवाई को मजबूर हो जाता है । लेकिन देश के सूदूर इलाकों में शिक्षकों के इस तरह की नापाक हरकत उजागर ही नहीं हो पाते हैं और यौन शोषण की शिकार लड़कियां और बच्चियां चुप रह जाती हैं । इस देश में गुरू को भगवान या फिर उससे भी उंचा दर्जा प्राप्त है । गुरू को मां-बाप से भी ज्यादा इज्जत इस देश में बख्शी जाती है । छुटपन से ही बच्चों को यह सिखाया जाता रहा है कि – गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पांय. बलिहारी बा गुरू की जिमि गोविंद दियो बताए । यानि कि गुरु भगवान से भी बड़ा होता है और भगवान या गुरू एक साथ खड़े हों तो पहले गुरू को प्रणाम करना चाहिए क्योंकि गुरू ही भगवान के बारे में बताते हैं । लड़कियों के मां-बाप शिक्षकों पर इसी अटूट आस्था और विश्वास के तहत अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि वहां उनकी औलाद महफूज है । लेकिन कुछ स्कूलों में सेक्स कुंठित शिक्षकों की वजह से समाज का शिक्षा के इन मंदिरों पर से विश्वास दरकने लगा है , असुरक्षा की भावना घर करने लगी है, उनके अवचेतन मन में हमेशा अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक चिंता व्याप्त रहती है । अब जरूरत इस बात की है कि एक तरफ तो स्कूलों और कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इस तरह की घटनाओं से निबटने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं और सरकार के कर्ताधर्ता भी मासूमों के यौन शोषण करनेवालों के खिलाफ और सख्त कानून बनाए और उसे जल्दी और सख्ती से लागू करने का मैकेनिज्म भी विकसित करे । वर्ना भगवान से उपर का दर्जा प्राप्त इन गुरुओं को शैतान का दर्जा मिलते देर नहीं लगेगी ।
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Monday, May 3, 2010

स्त्री के विद्रोह की कहानियां

बात अस्सी के शुरुआती दशक की है । उस वक्त मैं बिहार के जमालपुर के रेलवे हाई स्कूल का छात्र था । यह वो दौर था जब टेलीविजन सूदूर शहरी और ग्रामीण इलाकों में नहीं पहुंच पाया था । खबरों के लिए हमलोग आकाशवाणी के पटना और दिल्ली केंद्र पर निर्भर रहते थे । शाम साढे़ सात बजे पटना आकाशवाणी से प्रादेशिक समाचार का प्रसारण होता था, जिसे हमारे घर में नियमित सुना जाता था । इसके अलावा रात पौने नौ बजे राष्ट्रीय समाचार आता था जिसे सुनकर हमलोग सो जाते थे । लेकिन आकाशवाणी से ज्यादा हमारा भरोसा उस वक्त बीबीसी की हिंदी प्रसारण सेवा पर था । वक्त ठीक से याद नहीं है लेकिन अगर मेरा स्मृति ठीक है तो शाम सात बजकर चालीस मिनट पर बीबीसी से हिंदी में खबरों का प्रसारण होता था । ओंकार नाथ श्रीवास्तव, रमा पांडे आदि की आवाज में खबरों का जब प्रसारण होता था तो उनके बोलने के अंदाज से खबरों में गहराई आ जाती थी । आकाशवाणी के समाचार वाचको की आवाज भी बेहद अच्छी और डिक्शन एकदम साफ होता था लेकिन बीबीसी में प्रसारण का तरीका और बैकग्राउंड म्यूजिक से प्रस्तुतिकरण जानदार हो जाती थी । तो हमारी शाम खबरों को सुनकर बीता करता था ।

बीबीसी की हिंदी सेवा से एक और रोचक याद जुड़ी हुई है । साल के अंत और नए वर्ष के शुरुआत में प्रसारण के वक्त समाचारवाचक ये ऐलान करता था कि अगर आपको बीबीसी का कैलेंडर चाहिए तो अमिक पते पर हमें लिखें । ये दिल्ली का पता होता था और पोस्ट बॉक्स नंबर लिखना होता था । मैंने भी जब इसको सुना तो सोचा क्यों ना एक पोस्टकार्ड लिख दिया जाए । उस वक्त पोस्टकार्ड पांच पैसे का आता था । मैंने बेहद विनम्रता से कैलेंडर भेजने का अनुरोध पत्र बीबीसी के बताए पते पर भेज दिया । लगभग दस दिनों के बाद ए फोर साइज के एक खूबसूरत लिफाफा मेरे पते पर आया जिसमें प्रेषक की जगह बीबीसी हिंदी सेवा का नाम लिखा था । जब मैं स्कूल से लौटा तो अपने कमरे में वो लिफाफा देखकर बेहद खुश हुआ । जल्दबाजी में उसे खोला तो एकदम चमकदार कागज पर एक पन्ने का कैलेंडर था । उपर एक ग्रुप फोटो था जिसमें बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़े लोगों की तस्वीर थी । लगभग तीन दशक बाद स्मृति में अब दो ही नाम हैं- ओंकार नाथ श्रीवास्तव और रमा पांडे । तत्काल लिफाफे से निकालकर उसे स्टडी टेबल के सामने लगा लिया । लेकिन फिर एक खुराफात सूझा कि अगर एक पांच पैसे के पोस्टकॉर्ड भेजने पर इतने खूबसूरत कागज पर छपा कैलेंडर मिल सकता है तो क्यों ना कुछ और अनुरोध पत्र भेजकर और कैलेंडर मंगवा लिए जाएं और दोस्तों में बांटकर रौब गालिब किया जाए । फिर तो मुझे याद है कि अपने परिवार के हर व्यक्ति के नाम से अनुरोध पत्र बीबीसी हिंदी सेवा को भेज दिया । चूंकि अनुरोध पत्र एक साथ नहीं भेजकर थोड़े अंतराल पर भेजा था इसलिए उसी हिसाब से कुछ अंतराल के बाद कैलेंडर मिलने शुरू हो गए । पहले तो डाकिया भी चौंका कि हर एक दो दिन बाद लंदन के पते से मेरे घर क्या आ रहा है । दबी जुबान से वो ये दरियाफ्त भी करने की कोशिश करने लगा कि इस लिफाफे में होता क्या है । एक दिन मैंने उसकी जिज्ञासा खत्म करते हुए उसके सामने ही लिफाफा कोलकर उपहार स्वरूप वो कैलेंडर उसे ही दे दिया । अब तो ये हर साल का नियम सा बन गया था ।

कैलेंडर में चश्मा लगाए ओंकार नाथ श्रीवास्तव और बेहद खूबसूरत रमा पांडे अपने बोलने के अंदाज की वजह से भी याद हैं । अभी जब मित्र जयप्रकाश पांडे ने बताया कि रमा पांडे के कथा संग्रह की डीवीडी लंदन के नेहरू ऑडिटोरियम में जारी हुई है तो मैं चौंका, कहानी संग्रह की डीवीडी । बातों –बातों में ही जय प्रकाश जी ने यह भी बताया कि रमा पांडे गायिका इला अरुण और पियूष पांडे की बहन हैं । बात आई गई हो गई । लेकिन अभी कुछ दिनों पहले किसी रेफरेंस के लिए एक किताब ढूंढने में जुटा था तो अचानक फैसले पर नजर गई । लेखिका रमा पांडे थी और दिल्ली के मंजुलिका प्रकाशन से छपी थी किताब । उसे निकालकर अलग रख लिया । फिर उसे पढ़ना शुरू किया । स्त्री विमर्श के इस दौर में पिछले वर्ष प्रकाशित इस किताब की साहित्य जगत में नोटिस ली जानी थी लेकिन अफसोस कि हिंदी के कर्ताधर्ताओं की नजर इस अहम किताब पर नहीं गई । मुस्लिम महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियां इनके संघर्ष और वयवस्था के खिलाफ उठ खडे़ होने की कहानी है । रमा पांडे बहुआयामी प्रतिभा की धनी हैं । वो देश की पहली महिला प्रोड्यूसर हैं जिन्होंने लंबे अरसे तक दूरदर्शन के लिए काम करते हुए अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी ।

जैसा कि मैंने उपर बताया कि फैसले देश की मुस्लिम महिलाओं की संघर्ष की दास्तां है । इसकी एक कहानी दौड़ती हिरणी की नायिका रमा पांडे की दोस्त है । रमा पांडे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में राबिया उनकी दोस्त थी और बेहद प्रतिभाशली एथलीट थी । लेकिन नवी कक्षा में जाते ही राबिया के परिवारवालों ने उसके खेल में भाग लेने पर इसलिए रोक लगा दी क्योंकि वो राबिया का निकाह करना चाहते थे । रमा पांडे तो जब इस बात का पता चला तो उसने राबिया की अम्मी से ये बात करने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ नाकामी लगी । राबिया के परिवारवाले टस से मस होने को तैयार नहीं थे और परिवार के दबाव में राबिया कोई भी कदम उठाने को तैयार नहीं थी । जब रमा ने उसे अपने पांव पर खड़े होने की सलाह दी तो उसका जबाव था – जब दौड़ नहीं सकती तो अपने पांव पर क्या खडी होउंगी । लेकिन फिर भी राबिया ने हौसला नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय खेल में भाग लिया । कई वर्षों तक रमा और राबिया नहीं मिले । लेकिन वर्षों बाद जब वो मिले तो राबिया की उम्र बयालीस की हो चुकी थी और उसने शादी नहीं करने का फैसला कर लिया था । यह एक ऐसी लड़की का विद्रोह था जो एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से आती थी । लेखिका पर इस बात का गहरा असर पड़ा और दौड़ती हिरणी इसी असर के परिणामस्वरूप सामने आया । फैसले में और भी कई कहानियां हैं जिसे लेखिका ने बेहद करीब से इपनी आंखों के सामने घटते हुए देखा है । चाहे वो उनके खुद के रिश्तेदार कू पैरा-जंपर से एक स्कूल के हेडमिस्ट्रेस बनने की कहानी हो या फिर हैदराबाद की शाइस्ता की कहानी हो । फैसले संग्रह की अमूनन सारी कहानियां यथार्थ का चित्रण हैं । इस कहानी संग्रह में जो एक बात रेखांकित की जा सकती है वो है नायिकाओं का समाज और वयवस्था के प्रति विद्रोह । रमा पांडे की भाषा में शास्त्रीयता नहीं है जो इसे बोझिल बनाने की बजाए पठनीय बनाती है । स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों के लिए रमा की कहानियां एक चुनौती की तरह हैं और मुजे लगता है कि देर सबेर उन्हें इस संग्रह का नोटिस लेना ही पड़ेगा ।

Wednesday, April 21, 2010

आईपीएल में गुम बीपीएल

देशभर में इस वक्त आईपीएल और उसमें लगे हजारों करोड़ पर बात हो रही है । इस बात पर बहस जारी खेल में इतना पैसा कहां से आ रहा है । संसद में भी इस बात पर ही हंगामा हो रहा है कि इंडियन प्रीमियर लीग में हो रहे तथाकथित भ्रष्टाचार और काले धन के निवेश से कैसे निबटा जाए । तमाम दलों के नेता बीजेपी से लेकर वामपंथी तक, आरजेडी से लेकर समाजवादी पार्टी तक इतना शोर मचा रहे हैं गोया ये देश पर आया सबसे बड़ा संकट हो और अगर सरकार इस संकट से जल्द नहीं निपटती है तो देश का बेड़ा गर्क हो जाएगा । कांग्रेस पार्टी भी अपने सबसे काबिल और अनुभवी मंत्री प्रणब मुखर्जी को इस मोर्चे पर तैनात कर चुकी है । सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री समेत कांग्रेस के तमाम दिग्गज रविवार को इस मसले पर दो घंटे तक माथापच्ची कर चुके हैं । लेकिन फटाफटा क्रिकेट पर मचे इस कोलाहल के बीच एक ऐसी अहम खबर आई जो इस शोरगुल में दबकर रह गई । रविवार को खबर आई कि भारत में गरीबों की संख्या में दो हजार चार की तुलना में तकरीबन दस करोड़ का इजाफा हुआ है । दो हजार चार में भारत में भारत में गरीबी की दर कुल जनसंख्या की साढे सत्ताइस फीसदी थी जो अब बढ़कर सैंतीस फीसदी से ज्यादा हो गई है । गरीबी दर में छह साल में लगभग दस फीसदी का इजाफा इस देश के लिए बड़ी चिंता की बात है । लेकिन इस खबर पर ना तो कहीं चर्चा हुई और ना ही मीडिया में इसे तवज्जो मिली । सोमवार को संसद में पूरी ताकत से विरोध दर्ज करनेवाले विरोधी दल के सांसदों को देश में बढ़ रही गरीबी और गरीबों की चिंता कहां हैं । गरीबों और पिछड़ों की राजनीति करनेवाले लालू मुलायम शरद यादव को भी आईपीएल में जारी कथित भ्रष्टाचार देश के सामने बड़ी समस्या नजर आ रही है । गरीबी के इस बढ़ते दानव पर लगाम लगाने में इन नेताओं की रुचि हो ऐसा दिखता नहीं है ।
संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग चालीस करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे अपना जीवन बसर करते हैं जो कि पिछले साल के अनुमान से लगभग दस करोड़ ज्यादा है । इस अनुमान की गणना का आधार किसी भी वयक्ति की दैनिक आय है । संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में तकरीबन चालीस करोड़ लोगों की दैनिक आय साठ रुपये या इससे कम है । अगर इस अनुमान को सही मानें तो पूरे विश्व में गरीबों की कुल संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत में बसती है जिसकी प्रतिदिन आय सौ रुपये या इससे कम है । मनमोहन सिंह की सरकार निकट भविष्य फूड सेक्युरिटी बिल लाने जा रही है । सोनिया गांधी की सलाह पर इस बिल में कुछ तब्दीलियां की जा रही है । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यूपीए सरकार की प्राथमिकता ये बिल कुछ नीचे है । ना तो संसद के अंदर और ना ही संसद के बाहर इस पर बहस हो रही है, जो हमारे लिए चिंता का सबब है । हलांकि सोनिया गांधी के अनुरोध या निर्देश के बाद सरकार हरकत में आई है और इस बिल में गरीबों, महिलाओं के दायरे को विस्तृत करने की कवायद चल रही है । लेकिन सवाल यह उठता है कि जब हम विश्व महाशक्ति होने का सपना देख रहे हों, तकनीक और अंतरिक्ष में लंबी उड़ान के लिए तैयार कर रहे हों ऐसे में देश में गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी हमारे महाशक्ति बनने के सपने पर ग्रहण लगा सकती है । जरूरत इस बात की भी है कि उद्योग और उद्योगपतियों के लिए रियायतों का पिटारा खोल देने में सरकार जिस उदारता का परिचय देती है वो सहृदयता या उदारता गरीबी से निपटने में दिखाई नहीं देती । किसी जमाने में गरीबी हटाओ का नारा देकर इंदिरा गांधी ने सत्ता हासिल की थी । दशकों बाद आम आदमी के साथ होने का दावा कर कांग्रेस फिर से सत्ता में आई । अब वक्त आ गया है कि सरकार अगर समय रहते चेत जाए नहीं तो गरीबी एक ऐसी विकराल समस्या बनकर देश के सामने खड़ी हो जाएगी जिसका बहुत ही दूरगामी असर होगा ।

Monday, April 12, 2010

जज, जस्टिस और भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के आरोप में महाभियोग की प्रक्रिया झेल रहे कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी डी दिनाकरन ने सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को आईना दिखा दिया है । उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली जजों की कमिटी की लंबी छुट्टी पर जाने की सलाह ठुकरा दी । सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे और अपने पद के दुरुपयोग के आरोप में महाभियोग की प्रक्रिया झेल रहे जस्टिस दिनाकरन लंबे समय से न्यायिक कामकाज नहीं देख रहे थे वो सिर्फ कर्नाटक हाई कोर्ट का प्रशासनिक कामकाज संभाल रहे थे । महाभियोग का आरोप झेल रहे जस्टिस के प्रशासनिक कामकाज संभालने पर उनके ही एक साथी जज ने अपनी नाराजगी का खुले आम इंतजार किया था । इस असमंजस की हालत में न्यायमूर्ति दिनाकरन को उनके पद से हटाने की कवायद काफी देर से शुरू की गई । काफी समय बाद शुरू की गई इस कोशिश के तहत सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस दिनाकरन को लंबी छुट्टी पर जाने की सलाह दी थी और उनकी जगह दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस मदन लोकुर को वहां का कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था। लेकिन कॉलेजियम की इस सलाह को जस्टिस दिनाकरन के ठुकराने के बाद उनका तबादला सिक्किम हाई कोर्ट कर दिया गया है ।
अगर हम कानूनी बारिकियों को देखें तो किसी भी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या न्यायमूर्ति लंबी छुट्टी पर जाने के कॉलेजियम की सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं है । लेकिन न्यायिक परंपरा के मुताबिक उच्च न्यायालय के जस्टिस कॉलेजियम की सलाह को आमतौर पर ठुकराते नहीं हैं । लेकिन दिनाकरन के इस कदम के बाद एक बार फिर से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की प्रक्रिया की खामियां और उसकी सीमाएं दोनों उजागर हो गई हैं ।
कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली जजों वाली समिति की सलाह मानने से जस्टिस दिनाकरन के इंकार के बारे में पूछे जाने पर कहा था कोई जज भी कानून से उपर नहीं है । दरअसल यह पूरा मामला बेहद ही पेचीदा है । संविधान के अनुच्छेद दो सौ तेइस,जिसका हवाला कानून मंत्री दे रहे हैं, के मुताबिक – जब किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त है या जब ऐसा मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति के कारण वह अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तब कोर्ट के अन्य जजों में से एक जज जिसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त कर, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा । लेकिन स्वतंत्र भारत न्यायिक इतिहास में ऐसा कोई मौका अबतक आया नहीं जबतक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रहते किसी और को उसी न्यायलय में कार्यकारी मुख्य न्यायधीश बनाया जाए । लेकिन ऐसी नौबत आई नहीं और दिनाकरन को सिक्किम भेज दिया गया ।
जस्टिस दिनाकरन के इस तबादले ने एक बार फिर से कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । सवाल यह उठता है कि अगर कोई न्यायाधीश एक हाईकोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारी निभाने के लायक नहीं हैं तो वो दूसरे हाईकोर्ट में उन्ही जिम्मेदारियों को कैसे निभा सकते हैं । अगर जस्टिस दिनाकरन पर भ्रष्टाचार के इल्जाम हैं और वो कर्नाटक हाईकोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर सकते हैं तो सिक्किम उच्च न्यायालय में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन बगैर किसी लाभ-लोभ के कैसे कर सकते हैं । ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है । ना तो सरकार के पास और ना ही कॉलेजियम के पास ।
इसके पहले भी जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस निर्मल यादव पर आरोप लगे थे तो उन्हें कॉलेजियम ने लंबी छुट्टी पर भेज दिया था और जब मामला शांत हुआ तो उनका तबादला पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट से उत्तरांचल हाईकोर्ट कर दिया गया । इसी तरह जब जनवरी दो हजार सात में गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस पी बी मजुमदार ने अपने ही साथी जस्टिस बी जे सेठना पर बदतमीजी का आरोप लगाया था तो जस्टिस बी जे सेठना का तबादला सिक्किम और पी बी मजुमदार का तबादला राजस्थान कर दिया गया था । हलांकि तब न्यायमूर्ति सेठना ने सिक्किम जाने से इंकार करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था ।
ये कुछ ऐसे उदाहरण है जो भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के मामलों को निबटने की कमियों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं । हमारे यहां सुप्रीम कोर्ट का प्रधान न्यायधीश देश की न्यायिक व्यवस्था का प्रशासनिक मुखिया होता है । वो जजों का तबादला तो कर सकता है लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को सिर्फ और सिर्फ महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है । लेकिन संविधान के मुताबिक महाभियोग की प्रक्रिया बेहद जटिल है और उसका अंजाम तक पहुंचना अत्यंत मुश्किल है । जस्टिस रमास्वामी के मामले में पूरा देश इस जटिल प्रक्रिया को देख चुका है । जस्टिस दिनाकरन के खिलाफ भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और राज्यसभा के सभापति की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज वी एस सिरपुकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की कमेटी इस बारे में तथ्यों की पड़ताल करेगी । न्यायिक इतिहास में यह तीसरा मौका है जब किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है । इसके पहले जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया चली थी लेकिन कांग्रेस के सांसदों के सदन से वॉक आउट करने के बाद ये प्रस्ताव गिर गया था ।
दूसरी ओर हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के क्रियाकलापों पर भी सवाल खड़े हुए हैं । दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति ए पी शाह को सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति ना दिए जाने के कॉलेजियम के फैसले पर प्रश्नचिन्ह लगा था । जस्टिस शाह की छवि बेदाग थी और ये माना जा रहा था कि उनको सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जाएगा । लेकिन मीडिया में ऐसी खबरें आई कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के जी बालाकृष्णनन की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम के एक सदस्य जस्टिस शाह के प्रोन्नति के खिलाफ थे, इस वजह से उनका सुप्रीम कोर्ट का जज बनना संभव नहीं हो सका ।
मेरा मानना है कि देश की सवा सौ करोड़ जनता का देश की न्यायिक प्रक्रिया और न्यायाधीशों पर अटूट विश्वास है । जब किसी एक न्यायधीश के आचरण की वजह से अदालत और अदालत की मर्यादा को ठेस पहुंचती है तो सवा सौ करोड़ लोगों के विश्वास को भी ठेस पहुंचाती है । हमारा मानना है कि जनता के इस विश्वास की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए । इस विश्वास की रक्षा तभी हो सकती है जब हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो और उसका एक तय स्वरूप हो । इसके लिए सरकार को पर्याप्त इच्छाशक्ति दिखानी होगी । सालों से ज्यूडिशियल स्टैंर्ड और अकाउंटिबिलिटी बिल पर बहस चल रही है लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है । अब वक्त आ गया है कि इस बिल में अपेक्षित बदलाव करके संसद में पेश किया जाए और जल्लद से जल्द कानून बनाकर न्यायपालिका की साख को बचाया जाए ।
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Monday, April 5, 2010

अनुवाद से जगती उम्मीदें

हिंदी में अनुवाद की हालत बेहद खराब है । जो अनुवाद हो भी रहे हैं वो बहुधा स्तरीय नहीं होते हैं । अनुवाद इस तरह से किए जाते हैं कि मूल लेखन की आत्मा कराह उठती है । हिंदी के लेखकों में अनुवाद को लेकर बहुत उत्साह भी नहीं है । अमूनन अनुवाद में लेखक तभी जुटते हैं जब उनके पास या तो काम कम होता है या नहीं होता है । जैसे ही काम मिलता है अनुवाद को लेकर वो उदासीन हो जाते हैं । इसलिए हिंदी में अनुवाद एक विधा के रूप में विकसित नहीं पाई और अनुवादक को उचित सम्मान नहीं मिल पाया । नतीजा यह हुआ कि अन्य भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनुवाद नहीं हो पाया और हिंदी के पाठक का परिचय विश्व की अन्यतम कृति से नहीं हो पाया ।
लेकिन अभी हाल के दिनों में हॉर्पर कालिन्स पब्लिकेशंस और पेंग्विन बुक्स ने भारतीय अंग्रेजी लेखकों के अलावा विश्व के अन्य भाषाओं की कृतियों का अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करना शुरू किया है । यह एक स्वागत योग्य कदम है । हॉर्पर कालिन्स से अभी अद्वैत काला के उपन्यास ऑलमोस्ट सिंगल का अनुवाद मनीषा तनेजा ने किया है । लगभग तीन सौ पन्नों का उपन्यास बेहतरीन अनुवाद का एक नमूना है । मनीषा तनेजा दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश पढ़ाती हैं और इसके पहले भी गैबरील गारसिया मारक्वैज का उपन्यास एकाकीपन के सौ साल और पॉउलो नेरुदा के संस्मरण का हिंदी में अनुवाद किया है । अभी-अभी मैंने उनके द्वारा अनूदित अद्वैत काला के उपन्यास का हिंदी अनुवाद लगभग सिंगल पढ़ा । मैंने अद्वैत काला का अंग्रेजी में लिखा मूल उपन्यास भी पढ़ा था । मनीषा के अनुवाद में मूल की आत्मा की रक्षा की गई है जिससे उपन्यास के प्रवाह में बाधा नहीं आती । हिंदी अनुवाद में अंग्रेजी भाषा के शब्दों को लेकर कोई दुराग्रह दिखाई नहीं देता, बल्कि पात्रों के बीच बोलचाल में सहजता से जो अंग्रेजी के शब्द आते हैं उसे हिंदी अनुवाद में बदला नहीं गया है जिस वजह से अनुवाद बेहतर हो पाया है । दारू पीते हुए उपन्यास की बिंदास नायिका और उसकी दोस्त अंग्रेजी के शब्दों का प्रयास करती हैं और अनुवाद में उससे छेड़छाड़ नहीं की गई है ।
कुछ दिनों पहले मैंने वाणी प्रकाशन से प्रकाशित दो हजार चार के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखिका फ्रेडरिक येलनिक के उपन्यास क्लावीयरश्पीलेरिन का हिंदी अनुवाद पियानो टीचर पढ़ा । उक्त उपन्यास का हिंदी अनुवाद विदेशी भाषा साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका सार संसार के मुख्य संपादक और जर्मन भाषा के जानकार अमृत मेहता ने किया था । पहली नजर में हिंदी अनुवाद ठीक-ठाक लगा था । मैंने अपने इस स्तंभ में ही उस उपन्यास पर लिखा भी था । लेकिन बाद में जमशेदपुर से लेखिका विजय शर्मा ने मेरा ध्यान कुछ त्रुटियों की ओर दिलाया तो फिर मैंने उसका अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा । उसको पढ़ने के बाद मुझे पता चला कि अमृत मेहता का अनुवाद बिल्कुल ही स्तरीय नहीं था । ट्रांसलिटरेशन के चक्कर में अमृत मेहता ने कुछ बेहद अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया जो गैरजरूरी था । साथ ही उपन्यास में वर्णित कुछ दृश्यों को भी उन्होंने बदल डाला । अमृत मेहता ने लिखा कि नायिका बाथ टब में अपने हाथ के नस काट लेती है जबकि मूल उपन्यास में येलनिक लिखा है कि नायिका बाथ टब में अपने यौनांग काट लेती है । अनुवाद में शब्दों के चयन की स्वतंत्रता तो अनुवादक ले सकता है लेकिन प्रसंग और घटनाओं को बदलने की छूट वो नहीं ले सकता है । इस तरह के लापरवाह अनुवाद का नतीजा यह होता है कि भविष्य के शोधार्थियों को गलत संदर्भ मिलते हैं और अर्थ का अनर्थ हो जाता है । इस मामले में मनीषा तनेजा ने सावधानी बरती है और उनके द्वारा अनूदिक उपन्यास लगभग सिंगल बेहतर बेहद पठनीय बन पडा है ।
दूसरा अहम उपन्यास हॉर्पर कालिन्स ने प्रकाशित किया वह है - बुकर पुरस्कार प्राप्त लेखक अरविंद अडिगा का द वाइट टाइगर । प्रकाशक का दावा कि इस उपन्यास की सिर्फ भारत में दो लाख प्रतियां बिक चुकी हैं । किताब के बैक पर कवर पर इस सूचना के प्रकाशन से हिंदी प्रकाशन जगत सकते में पड़ सकता है । हिंदी में उपन्यासों का संसकरण पांच सौ या फिर अब तो तीन सौ का ही होता है । और मेरे जानते हाल के दिनों में हिंदी का कोई उपन्यास दस हजार भी नहीं बिका है । दो लाख प्रतियां बिकने की बात तो हिंदी में सोची भी नहीं जा सकती है । जबकि भारत में हिंदी के पाठकों की संख्या अंग्रेजी पाठकों से कई गुणा ज्यादा है । ये एक बेहद अहम सवाल है, जिसपर हिंदी समाज को विचार करने की जरूरत है ।
अब बात अरविंद अडीगा के उपन्यास द वाइट टाइगर की बात । अरविंद के इस उपन्यास का अनुवाद मनोहर नोतानी ने किया है । मनोहर पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन एक लंबे अरसे से अनवाद का काम कर रहे हैं, लेकिन किसी उपन्यास का अनुवाद करने का यह उनका पहला अनुभव है । वाइट टाइगर में मध्य भारत के गांव में जन्मे रिक्शा चालक के बेटे बलराम की कहानी है । लेकिन जब उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है तो वो चाय की दुकान पर सफाई और बरतन धोने का काम करता अपने भविष्य के सपने बुनता है । उसकी तकदीर तब बदलती है जब उसके गांव का एक अमीर जमींदार उसे अपना ड्राइवर बनाकर दिल्ली ले आता है । महानगर की चकाचौंध में बलराम की एक नए तरीके से शिक्षा होती है । इस उपन्यास का अनुवाद थोड़ा शास्त्रीय किस्म का है जो पाठ को बाधित करता है । इस उपन्यास के अनुवाद के क्रम में मनोहर नोतानी ने हिंदी के खांटी शब्दों के इस्तेमाल के साथ-साथ स्थानीय शब्द का भी इस्तेमाल किया है । एक बानगी- उस रात, एक बार फिर आंगन झाड़ने का बहाना करते हुए हम चमरघेंच और उसके बेटों के नजीक जा फटके, वे लोग एक बेंच पर बिराजे बतियाते रहे, हाथ में गिलास और गिलास में चमचम दारू । इस दो वाक्य में तीन शब्दे ऐसे हैं जो बिल्कुल स्थानीय भाषा के हैं - चमरघेंच, नजीक और चमचम दारू । इस तरह के कई शब्दो का इस्तेमाल अनुवादक ने किया है जिससे उनके मेहनत का पता चलता है ।
एक तीसरी किताब जो हाल में प्रकाशित हुई है वो है शिक्षाविद् और सांसद रह चुकी भारती राय की आत्मकथा- ये दिन, वे दिन । ल रूप से बांग्ला में लिखी गई इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद सुशील गुप्ता ने किया । सुशील गुप्ता का नाम हिंदी के पाठकों के लिए जाना पहचाना है । उन्होंने बांग्ला की कई चर्चित लेखकिओं और लेखकों की कृतियों का अनुवाद हिंदी में किया है । भारती राय ने अपनी इस आत्मकथा में पांच पीढियों की कहानी लिखी है । ये कहानी शुरू होती है उनकी परनानी शैलबाला उर्फ सुंदर मां के साथ । कथा के दूसरे पड़ाव पर हैं लेखिका की नानी मां । तीसरे पड़ाव पर लेखिका की मां से पाठकों की मुलाकात होती है और चौथे पड़ाव पर हैं और पांचवें भाग में कई अहम सवाल हैं । इस किताब की प्रस्तावना वरिष्ठ लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखी है । इस किताब से एक लंबे काल खंड का इतिहास सामने आता है । का ने पारिवारिक स्थितियों के बहाने बंगाल और देश की राजनीतिक और साहित्यिक परिदृश्य का सुरुचिपूर्ण चित्र खींचा है । हिंदी में आत्मकथा के बहाने जो एक आत्म प्रचार का दौर चल पड़ा है यह किताब उससे पूरी तरह से अलग है । इस वजह से ही मुझे उम्मीद है कि यह किताब हिंदी के पाठकों को पसंद आएगी । अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित होकर आ रही ये कृतियां एक उम्मीद जगाती हैं ।