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Saturday, June 18, 2011

कांग्रेस का संघ ऑब्सेशन

काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़नेवाले योद्धाओं और केंद्र सरकार के बीच तलवारें खिंच गई हैं । लोकपाल बिल पर टीम अन्ना ने सरकार पर सीधे-सीधे धोखाधड़ी का आरोप लगया । सरकार ने भी अन्ना और उनके सहयोगियों के प्रति कड़ा रुख अपना लिया है । दोनों पक्षों के बीच जारी रस्साकशी के बीच अन्ना हजारे ने फिर से जंतर-मंतर पर अनशन करने का ऐलान कर दिया है। सरकार इस बात पर अमादा है कि लोकपाल बिल में उसकी ही चले । जनलोकपाल के कड़े प्रावधानों को डाल्यूट कर दिया जाए । अगर कांग्रेस के प्रधानमंत्री बेहद ईमानदार हैं तो उन्हें लोकपाल के दायरे में आने में दिक्कत क्या है । अगर जजों से ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है तो उनको लोकपाल के दायरे में लाने में सरकार घबरा क्यों रही है । दरअसल सरकार की मंशा ही उसे फिर से लटका देने की है और उसका ठीकरा वो टीम अन्ना पर ठोंकना चाहती है । इसकी पृष्ठभूमि कुछ दिनों पहले से तैयार हो रही थी । बाबा रामदेव के अनशन पर पुलिसिया कार्रवाई करने के बाद से ही सरकार के हौसले बुलंद हो गए थे। उसके बाद के कांग्रेस नेताओं के बयानों को एक साथ जोड़कर देखें तो कांग्रेसी रणनीति की तस्वीर साफ तौर पर नजर आती है । रामदेव के अनशन खत्म होने के चंद घंटों के भीतर ही कांग्रेस के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने बाबा के अनशन को नाटक करार दिया । दिग्विजय के बयान के कुछ ही देर बाद कांग्रेस के बड़े नेता और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी उनसे भी आगे बढ़ते हुए बाबा रामदेव के आंदोलन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रायोजित बता कर उनपर जोरदार हमला बोला । सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी यहीं नहीं रुके उन्होंने ये दावा भी कर डाला कि रामदेव के पीछे पूरी भगवा ब्रिगेड है । उन्होंने यहां तक कह डाला कि जो पार्टी चुनावों में हार गई है वो अब बाबा को आगे बढ़ाकर आंदोलन चला रही है । आंदोलन के पीछे सरकार को अस्थिर करने की साजिश है । जाहिर सी बात है कि वित्त मंत्री का इशारा भारतीय जनता पार्टी की ओर था । हैरत की बात है कि प्रणब मुखर्जी जैसा मंझा हुआ राजनेता बाबा के अनशन खत्म होने के बाद यह बात कहता है कि उनके आंदोलन को संघ का समर्थन था । यही बात अब कुछ कांग्रेसी अन्ना और उनेक सहयोगियों के बारे में कहने लगे हैं । टीम अन्ना पर भी भगवा ब्रिगेड का एजेंडा आगे बढाने का आरोप लगा है । लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रणब मुखर्जी को यह बात तब नहीं पता थी जब वो अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ बाबा रामदेव की अगुवाई करने दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे थे । क्या सरकार को अन्ना के अतीत के बारे में पता नहीं था जब रातों रात लोकपाल कमेटी के बारे में सरकारी गजट जारी किया गया । क्या दिल्ली के पांच सितारा होटल में बाबा रामदेव के साथ बैठने वाले केंद्रीय मंत्रियों को इस बात का पता नहीं था कि बाबा संघ के इशारे पर सरकार को अस्थिर करने की साजिश रच रहे हैं । क्या अन्ना के साथ बैठकों का दौर जारी होने तक यह पता नहीं था कि वो बीजेपी और संघ के मुखौटा है । क्या ये मान लिया जाए कि पूरी यूपीए सरकार संघ का एजेंडा चला रहे अन्ना और बाबा की चाल भांपने में नाकाम रही ।
दरअसल ऐसा है नहीं । ये कांग्रेस पार्टी की पुरानी फितरत है । जब भी किसी व्यक्ति या संगठन को डिस्क्रेडिट करना हो तो उसका नाम संघ के साथ जोड़कर ये संदेश दो कि ये लोग सांप्रदायिक ताकतों के हाथ खेल रहे हैं ।संघ का हौवा दिखाकर कांग्रेस वर्षों से वोट बैंक की राजनीति करती रही है । कांग्रेस की यह एक बड़ी ट्रेजडी है । आजादी के आंदोलन में जो राष्ट्रवाद कांग्रेस की ताकत हुआ करती थी उसको पार्टी ने थाली में परोस कर संघ और बीजेपी को पेश कर दिया । राष्ट्रवाद को सांप्रदायिक बनाने के चक्कर में कांग्रेस ने अपनी ताकत खो दी । अब कांग्रेस में कोई राष्ट्रवाद की बात नहीं करता । उनके नेताओं ने यह मान लिया है कि देश, देशहित, देशप्रेम आदि आदि की बात करना सांप्रदायिकता है और जो इन बातों की पैरोकारी करेगा वो सांप्रदायिक है या फिर सांप्रदायिक ताकतों के हाथ की कठपुतली ।
अगर यह मान भी लिया जाए कि अन्ना और बाबा को संघ का समर्थन हासिल है तो उससे क्या आंदोलन का उद्देश्य कमजोर हो जाता है । क्या जिन सवालों को लेकर अन्ना हजारे या बाबा रामदेव आंदोलन कर रहे हैं वो बेमानी हो जाते हैं । क्या आज हमारे देश में भ्रष्टाचार और काला धन राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है । क्या देश और जनता से जुड़े इन मुद्दों को राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने का हक नहीं है ।
बात यह भी नहीं है । दरअसल कांग्रेस की इस रणनीति को समझने के लिए हमें कुछ पहले चलना होगा । अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद जब लोकपाल को लेकर सरकार दबाव में आ गई थी और उसने यह मान लिया था कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों के साथ मिल बैठकर लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार किया जाएगा और उस बिल को संसद के मॉनसून सत्र में पेश कर दिया जाएगा । लोकपाल कमेटी के साथ दो तीन बैठकों के बाद सरकारी नुमाइंदो को यह अहसास हो गया कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों से आसानी से अपनी बातें नहीं मनवा पाएगी । फिर वही खेल शुरू हुआ । सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर व्यक्तिगत हमले शुरू हुए । उनकी संपत्ति और उनके आंदोलन को चलाने के आय के स्त्रोत को लेकर खबरें सामने आने लगी । सावधान अन्ना की टोली ने अपने संगठन की बेवसाइट पर अपने व्यक्तिगत संपत्ति और सहयोग राशि के स्त्रोत का खुलासा कर कांग्रेस के षडयंत्र की हवा निकाल दी । उसी तरह से बाबा रामदेव और उनके योग ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर सवाल खड़े किए गए । मकसद सिर्फ बाबा को डिस्क्रेडिट करना था, जिसमें कुछ हद तक सरकार कामयाब भी रही । बाबा रामदेव ने अगर गलत तरीके से संपत्ति अर्जित की है तो उसकी जांच अबतक हो हो जानी चाहिए थी। लेकिन मंशा जांच कराने की नहीं बदनाम करने की है । सरकार ने काले धन के खिलाफ अनशन का ऐलान कर चुके बाबा रामदेव को ज्यादा तवज्जो देकर अन्ना और उनकी टोली को दरकिनार करने का खेल भी खेला । बाबा को अहमियत देने के फैसले के बाद ही प्रणब मुखर्जी समेत सरकार के चार कैबिनेट मंत्री बाबा से मिलने एयरपोर्ट जा पहुंचे । जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बाबा सरकार के लिए बेहद अहम हैं और सरकार काला धन के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध है । लेकिन बाबा रामदेव के साथ बात नहीं बनी । जो सरकार अन्ना के खिलाफ बाबा को खड़ा करना चाहती थी उसकी ही कार्रवाई ने बाबा और अन्ना को और मजबूती से एक कर दिया । बाबा रामदेव के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के विरोध में अन्ना हजारे एक दिन के लिए राजघाट पर उपवास पर बैठे । तपती दोपहरी में लोगों की भीड़ ने सरकार को यह संकेत दे दिया कि भ्रष्टाचार और काला धन के मुद्दे को सरकार हल्के में नहीं ले सकती । काला धन और भ्रष्टाचार आज देश में एक ऐसा मुद्दा बन चुका है जिसको लेकर जनता सरकार से कोई ठोस कार्रवाई चाहती है । वक्त आ गया है कि सरकार अपनी हरकतों से बाज आए, कांग्रेस पार्टी बजाए हमलावर होने के लोगों की सुने । जिन मुद्दों को अन्ना हजारे या बाबा रामदेव उठा रहे हैं उनको तवज्जो दे और उसके सर्वमान्य हल खोजने की दिशा में सार्थक पहल करे, ताकि जनता के बीच सरकार को लेकर विश्वास कायम हो सके । लोकतंत्र में सरकार से लोक का भरोसा उठना अच्छा संकेत नहीं होता । सोनिया गांधी और प्रणब मुखर्जी से बेहतर इसे कोई नहीं समझ सकता क्योंकि दोनों लंबे समय तक इंदिरा गांधी के साथ रहे हैं, इमरजेंसी लगाने के दौरान भी और इमरजेंसी खत्म के होने के बाद भी ।

Friday, June 10, 2011

नक्सलियों को रोकने की कवायद

अभी कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार की तरफ से वनवासियों और आदिवासियों के कल्याण और उनके हितों का ध्यान रखने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए गए हैं और अनेक पहल के संकेत भी मिले हैं । भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतरफा घिरी और विपक्ष के हमलों से हलकान केंद्र सरकार को अब देश के जंगलों और पिछड़े इलाके में रहनेवाले आदिवासियों और जंगल आधारित उत्पादों पर आधारित जीवन बसर करनेवाले लोगों की याद आई है। केंद्र सरकार की तरफ से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वो जंगली पेड़ों और उससे जुड़े उत्पाद को छोड़कर अन्य जंगली उत्पादों जैसे बांस, महुआ तेंदू पत्ता आदि का समर्थन मूल्य तय करने के बारे में गंभीरता से विचार कर रही है । सरकार इनकी बिक्री और भंडारण के लिए कृषि उत्पाद और बिक्री कमीशन के अलावा फूड कॉर्पेरेशन ऑफ इंडिया की तर्ज पर संस्थाएं बनाना चाहती है । ये जंगली उत्पाद लाखों वनवासियों के जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है लेकिन पुरानी सरकारी नीतियों में इतनी खामियां हैं कि वनवासियों को अपने वाजिब हक के लिए भी खासी मशक्कत करनी पड़ती है। सरकार के इस फैसले के पीछे राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक वजहें तो हैं ही,पर्यावरण संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण कारक हैं । पहली बात तो यह कि सरकार ऐसा करके राजनैतिक तौर पर यह संदेश देना चाहती है कि वो आदिवासियों और जंगल में रहनेवाले लोगों के हितों को लेकर गंभीर है । इस राजनैतिक कारण के पीछे हम सोनिया गांधी के कुछ दिनों पहले पार्टी के मुखपत्र कांग्रेस संदेश लिखे उनके लेख में इसके संकेत पकड़ सकते हैं । अपने लेख में सोनिया गांधी ने सरकार को जंगली इलाकों में समावेशी विकास करने की सलाह दी थी । सोनिया गांधी का उक्त लेख छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के जवानों की जघन्य हत्या के बाद छपा था । सोनिया गांधी के अपने लेख में नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास के कामों पर जोर देने की सलाह दी थी । ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने वहीं से क्यू लेते हुए जंगली उत्पादों का समर्थन मूल्य तय करने की योजना बनाई ।
अब तक जंगल के इलाकों में ठेकेदार और वहां सक्रिय दलाल अपने इलाके के उत्पादों की खरीद फरोख्त में मनमानी कर रहे हैं । जंगल के उन उत्पादों के बारे में कोई ठोस सरकारी नीति नहीं होने या फिर दोषपूर्ण सरकारी नियमों की वजह से दलाल चांदी काट रहे हैं और आदिवासियों का जमकर शोषण हो रहा है । उन इलाकों में बिचौलिए ही जंगली उत्पादों की कीमतें तय करते हैं और भोले-भाले गरीब आदिवासियों को उनकी मेहनत के उचित मूल्य से महरूम कर देते हैं । बिचौलियों की यही भूमिका और ज्यादती उन इलाके में माओवादियों को वनवासियों के बीच अपनी जमीन पुख्ता करने का मौका देती है । आदिवासियों के हक की बात करके और उनके शोषण के खिलाफ आवाज उठाकर माओवादियों ने आदिवासियों का दिल जीता और उनके बीच अपनी पकड़ भी मजबूत बनाई । अगर सरकार उन इलाकों में जंगली उत्पादों की बिक्री व्यवस्था को दुरुस्त कर और उसके भंडारण के लिए उचित इंतजाम कर सके तो यह एक बड़ी सफलता होगी । फूड कॉर्पोरशेन जैसी कोई संस्था बनाकर अगर जंगली उत्पादों के उन्हीं इलाकों में भंडारण की व्यवस्था हो सके तो आदिवासियों को उनके उत्पादों पर ज्यादा दाम मिल पाएगा । इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि उन इलाकों में नक्सलियों और माओवादियों की लोकप्रियता कम होगी और उनको कमजोर किया जा सकेगा ।
इस तरह की योजना बनाते समय सरकार को देश के अलग-अलग इलाकों के लिए अलहदा योजना बनानी होगी । पूरे देश में अगर एकीकृत समर्थन मूल्य की नीति बनाई जाती हो तो वह दोषपूर्ण होगी क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में इन उत्पादों की सप्लाई और उसका बाजार अलग है । इसके अलावा यह भी जरूरी है कि कास इलाके को ध्यान में रखकर वहां इन उच्पादों के भंडारण का इंतजाम किया जा सके ताकि जब बाजार में मूल्य अधिक मिल रहा हो उस वक्त उन उत्पादों को बेचकर आदिवासियों को ज्यादा मुनाफा हो । इस वयवस्था को बनाते वक्त सरकार को यह भी द्यान देना होगा कि फूड कॉर्पोरेशन की तरह यहां अमियमितताएं और भ्रष्टाचार नहीं हो । अगर सरकार इस तरह की वयवस्था बनाने में नाकाम रहती है तो आदिवासी और उनके उत्पाद निजी ठेकेदारों और दलालों के चंगुल से मुक्त होकर सरकारी और अर्धसरकारी दलालों के चंगुल में फंस जाएगी ।
दूसरी अहम बदलाव जिसपर सरकार विचार कर रही है या यों कहें कि केंद्रीय कैबिनेट ने फैसला ले लिया है लह ये कि बांस को लकड़ी ना मानकर घास माना जाए लेकिन इसका नोटिफिकेशन होना अभी शेष है । भारतीय वन अधिनियम के तहत अब तक बांस को लकड़ी माना जाता रहा है जिसकी वजह से किसी को भी बांस को काटने के लिए तमाम सरकारी महकमों से इजाजत लेनी पड़ती है । इस इजाजत की जड़ से भ्रष्टाचार पनपता है और शोषण की भी नींव पड़ती है । बांस को घास मानने की बहस बेहद लंबी है और काफी समय से चल रही है । वनस्पति विज्ञान में भी बांस को घास ही माना गया है । लेकिन अंग्रेजो के जमाने के कानून में बदलाव की फिक्र हमें आजादी के 40 साल बाद हो रही है । अगर बांस को लकड़ी मानने के कानून से आजाद कर दिया जाता है तो तकरीबन दस हजार करोड़ की बांस आधारित उद्योग से बनवासियों से काफी लाभ मिलेगा और देश में नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा ।

Tuesday, June 7, 2011

विचारों की 'परिक्रमा'

हिंदी में पत्रिकाओ का बेहद लंबा इतिहास रहा है । उन्नीसवीं सदी हिंदी भाषा और लाहित्य में नवजागरण का काल माना जाता है । यह भी तथ्य है कि हिंदी का पहला समाचार पत्र उदंत मार्तंड 30 मई, 1826 का प्रकाशन कलकत्ता से हुआ था, जिसके प्रथम संपादक बाबू जुगुल किशोर सुकुल थे । लेकिन हिंदी की पहली साहित्यिक पत्रिका कवि वचन सुधा थी जिसे संपादक भारतेंदु हरिश्चंद्र थे । भारतेंदु ने जब इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया उसके बाद से हिंदी में कई साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हो गया । भारतेंदु युग में साहित्यिक पत्रिका के दो प्रमुख केंद्र- बनारस और पटना थे । भारतेंदु युग के बाद जब साहित्यिक पत्रिका का प्रसार और विकास हुआ तो ना केवल कलकत्ता बल्कि इलाहाबाद भी पत्रिकाओं के नए केंद्र बने जहां से कई कालजयी पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जो बाद में हिंदी की थाती बने । बिहार में हिंदी पत्रिकारिता की शुरुआत का बेहद दिलचस्प इतिहास है । बिहार में माना जाता है कि हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 1874 में हुई जिसके जनक पंडित केशवराम भट्ट थे । पंडित केशवराम भट्ट ने 1872 में कलकत्ता से बिहार बंधु का प्रकाशन शुरू किया था । तब उस पत्रिका को कलकत्ता से प्रकाशित करने की वजह बिहार में हिंदी छापाखाना का नहीं होना था । उस दौर में बिहार में सिर्फ उर्दू प्रेस हुआ करते थे जिसकी वजह से पंडित केशवराम भट्ट को कलकत्ता से बिहार बंधु का प्रकाशन प्रारंभ करना पड़ा था । लेकिन उससे भी दिलचस्प कहानी इस पत्रिका के बिहार लौटने की है । दो साल तक कलकत्ता से प्रकाशन होने के बाद जब पंडित भट्ट को यह महसूस हुआ कि कलकत्ता में हिंदी के प्रूफ रीडर नहीं मिल रहे तो उन्होंने यह तय किया किया कि अब बिहार की राजधानी पटना से ही उसका प्रकाशन किया जाए । इस निर्णय के बाद 1874 से पटना से बिहार बंधु का प्रकाशन शुरू हुआ । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी विस्तार से बात होगी । हम बात हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं की कर रहे थे । भारतेंदु युग से द्विवेदी युग तक देश में हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं के चार केंद्र विकसित हो चुके थे । इसके बाद देश के अन्य इलाकों से भी साहित्यिक पत्रिकाओं की शुरुआत हुई ।
लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब हिंदी में लघु पत्रिकाओं की शुरुआत हुई तो 1957 में बनारस से विष्णुचंद्र शर्मा ने कवि का प्रकाशन शुरू किया । कालांतर में हिंदी में कई पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ जि्सने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया । जिसमें आलोचना, पहल, सिर्फ, ध्वजभंग, दस्तावेज, समीक्षा, तद्वभव आदि प्रमुख हैं । जैसे जैसे समय बीतता गया साहित्यिक पत्रिकाओं का केंद्र भी देश की राजधानी दिल्ली की ओर बढ़ने लगा । जब 1986 में राजेन्द्र यादव ने दिल्ली से हंस का पुनर्प्रकाशन शुरू किया तो साहित्यिक पत्रकारिता के केंद्र में दिल्ली का स्थान अहम हो गया । हंस ने नई कहानी आंदोलन के अवांगार्द राजेन्द्र यादव के संपादन में साहित्यक पत्रकारिता को एक नई धार और तेवर दोनों दिए। पिछले ढाई दशक में हंस ने ना केवल हिंदी की सबसे अच्छी कहानियां छापी बल्कि दलित और स्त्री विमर्श के साथ अपने समय की प्रासंगिक मुद्दों और बहसों को उठाकर हिंदी साहित्यक पत्रकारिता का एक नया इतिहास रच दिया । हंस और उसके संपादक से तमाम असहमतियों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि – आप उसे पसंद ना करें लेकिन आप उसको इग्नोर नहीं कर सकते । दूसरी एक पत्रिका जिससे उम्मीद जगी थी वो थी समयांतर जिसके यशस्वी संपादक पंकज विष्ठ हैं । पंकज विष्ठ के लेखन में एक आग है लेकिन बाद के दिनों में पंकज जी ने वयक्तिगत राग द्वेष को अपने संपादकीय का विषय बना दिया । नतीजा यह हुआ कि जो एक पूरी पीढ़ी पंकज जी की ओर उम्मीद भरी दृष्टि लगाए बैठी थी उसका मोहभंग हुआ । और अब तो दरबारी लाल की वजह से समयांतर यह हालत हो गई है जैसी कि अभिनेताओं के बीच राजू श्रीवास्तव की है ।
साहित्यक पत्रिकाओं की इस भीड़ में एक बात जो दब कर रह गई । हुआ यह कि कहानी कविता और आलोचना की आंधी में वैचारिक लेख और साहित्येतर विषय इन पत्रिकाओं से गायब होते चले गए । हिंदी में गंभीर वैचारिक पत्रिका की कमी अखरने लगी । साहित्येतर विषयों पर केंद्रित होने या फिर उन विषयों पर विचार विमर्श का मंच देनेवाली पत्रिता नहीं रही । हिंदी के गंभीर पाठकों को हमेशा से लगता रहा कि उनकी भाषा में भी मेनस्ट्रीम या फिर सेमिनार जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हो । लेकिन कई बार कोशिश भी हुई लेकिन वो परवान नहीं चढ़ सकी । पहले तो वैचारिक पत्रिका के दावे किए गए लेकिन बाद में वो समाचार पत्रिका में तब्दील हो गए या फिर एक दो अंकों के बाद अमियतकालीन हो गए । यहां मैं जानबूझकर उन पत्रिकाओं के नाम नहीं दे रहा और उनको अनियतकालीन इस वजह स कह रहा हूं क्यों उनके बंद होने का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ ।
लेकिन दिल्ली से अप्रैल 2008 में हिंदी में एक ऐसी पत्रिका की शुरुआत हुई जिसने वैचारिक पत्रिका की उस कमी को पूरा किया और तब से लेकर अब तक यह पत्रिका लगातार निकल रही है । इस पत्रिका का नाम है विचार परिक्रमा() और इसके संपादक हैं शरद गोयल । पत्रिका ने पूर्व में कई अंक विषय विशेष पर फोकस किए जिनमें मीडिया और विकलांगों पर निकले विशेषांक की खासी चर्चा हुई । पत्रिका का ताजा अंक किन्नरों पर केंद्रिंत है । किन्नर हमारे समाज के ही अंग हैं लेकिन समाज से मिल रहे उपेक्षा की उनकी जो पीड़ा है उसके इस अंक में सामने लाने की कोशिश की गई है । किन्नरों को हमारे समाज में किसी तरह का कोई अधिकार नहीं प्राप्त है । आमतौर पर उनको या तो अपराधी या फिर सेक्स ट्रेड में लिप्त समझकर हेय दृष्टि से देखा जाता है । उनको छक्का कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता है । मजाक उड़ाने वाले उनकी पीड़ा को नहीं समझ सकते । ये वो लोग हैं जो अपने ही समाज के बीच उपेक्षा का दंश झेलने को अभिशप्त हैं । लेकिन हमारे समाज में कहीं कहीं किन्नरों को खुशी के मौके पर शुभ मानकर उनका आशीर्वाद भी लिया जाता है । बच्चों के जन्म या फिर नए घर में प्रवेश के वक्त किन्नरों का गाया गीत बेहद शुभ माना जाता है । पिछले दिनों कई किन्नरों ने समाज के कई क्षेत्र में अपना एक मुकाम हासिल कर यह साबित कर दिया उनको अगर मौका मिले और उनमें हौसला हो तो वो भी किसी तरह की उचांई हासिल कर सकते हैं । चाहे वो शबनम मौसी हों या फिर टेलीविजन शो में सलमान के साथ ठुमके लगा रही लक्ष्मी हो । विचार परिक्रमा के इस अंक में ज्योति और शशिकांत के लेख खासतौर पर इस अंक की उपल्बधि हैं । इसके अलावा की कई विचारोत्तेजक लेख इस पत्रिका में प्रकाशित हैं जो हमारे समाज के इस उपेक्षित समुदाय के दर्द को उभारता हुआ है । उम्मीद की जानी चाहिए कि यह पत्रिका इसी तरह से निकलती रहे और हिंदी में वैचारिक लेखन में जो एक वैक्यूम आ गया था उसको सफलतापूर्व भरता रहे । लेकिन इस बात की भी जरूरत है कि इस पत्रिका को हिंदी के गंभीर पाठकों तक पहुंचाने की और बेहतर कोशिश की जानी चाहिए ताकि एक विशाल पाठक वर्ग को इसका लाभ मिल सके ।

Sunday, June 5, 2011

प्रकाशकों को चुनौती

हिंदी में इस बात को लेकर हाल के दिनों में लागतार चिंता प्रकट की जा रही है कि इंटरनेट और सूचना क्रांति के विस्फोट में छपी हुई किताबों की महत्ता या यों कहें उनका वर्तमान स्वरूप खत्म हो जाएगा । इस चिंता ने हिंदी में एक नई बहस को जन्म दिया था कि क्या हिंदी से छपी हुई किताबें खत्म हो जाएंगी। इसके पक्ष और विपक्ष में कई तरह के विचार आए हैं और इसपर पत्रिकाओं, अखबारों और खुद इंटरनेट और ब्लॉग पर जोरदार बहस जारी है। लेकिन अभी अमेरिका से आई एक खबर ने हिंदी साहित्य की चिंता और बढ़ा दी है और छपी हुई किताबों के पक्ष में बात करने वालों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं और विरोधियों के हौसले बुलंद हो गए हैं। इंटरनेट के जरिए किताबों का कारोबार करनेवाली कंपनी अमेजन ने ऐलान किया है कि उसकी बेवसाइट पर छपी हुई किताबों को ई बुक्स ने बिक्री के लिहाज से मात दे दी है । अमेजन के मुताबिक अगर छपी हुई सौ किताबें बिक रही हैं तो ई बुक्स एक सौ पांच की संख्या में बिक रही हैं। ई बुक्स पढ़ने की सबसे मशहूर और लोकप्रिय डिवाइस किंडल बुक्स की छपी पुस्तकों की बिक्री को पीछे छोड़ना एक ऐतिहासिक घटना के तौर पर रेखांकित की जा रही है । दरअसल चार साल पहले ही अमेजन ने अपने बेवसाइट पर किंडल के जरिए ई बुक्स की बिक्री का अनूठा प्रयोग शुरू किया था । चार महीने पहले ही किंडल एडिशन ने पेपरबैक किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया था और अब समग्रता में उसने यह सफलता हासिल की है । अमेरिकी बेवसाइट अमेजन के मुताबिक यह हालत तो तब है जबकि कई पुस्तकों के किंडल संस्करण बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं हैं । अमेजन के सीईओ जेफ बेजोस को भी पाठकों की रुचि में इस तरह के बदलाब की अपेक्षा तो थी पर यह इतनी जल्दी घटित हो जाएगा इसका अमुमान उन्हें नहीं था । दरअसल टेबलेट कंप्यूटर आने की वजह से लोगों के बीच ई बुक्स की लोकप्रियता काफी बढ़ी हैं और अब तो एप्पल के आई पैड की वजह से भी इसकी बिक्री को पंख लग सकते हैं ।
सवाल यह उठता है कि क्या आनेवाले दिनों में छपी हुई किताबों का भविष्य खत्म हो जाएगा । छपी किताबों का कारोबार करनेवाले प्रकाशकों पर संकट आनेवाला है। क्या अबतक कंप्यूटर पर लिखनेवाले लेखक भी ई बुक्स के ही जरिए पाठकों के बीच जाएंगे । कई उत्साही लोग तो इन सारे प्रश्नों के सकारात्मक जबाव दे रहे हैं । संभव है कि पश्चिम के विकसित देशों में यह बात आंशिक रूप से सच भी हो । आंशिक इस वजह से कि पश्चिमी देशों में सूचना के संजाल के तमाम विकास के बावजूद अब भी लाखों में किताबें बिक रही हैं । चाहे वो जोनाथन फ्रेंजन की फ्रीडम हो या टोनी ब्लेयर की आत्मकथा- अ जर्नी । इन सबने किताबों की बिक्री के पिछले सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया । अमेजन ने भले ही यह ऐलान किया है कि ई बुक्स ने किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया है लेकिन उसने बिक्री का कोई ठोस आंकड़ा पेश नहीं किया, उसने सिर्फ तुलनात्मक आंकड़ों के आधार पर ई बुक्स को ज्यादा लोकप्रिय बताया है । ना ही अमेजन ने इस बात का ऐलान किया कि बिक्री का यह आंकड़ा किस और कितनी अवधि का है । दूसरा अहम प्रश्न जो अमेजन की इस घोषणा के बाद मन में उठता है वह यह है कि अमेजन तक कितने लोगों की पहुंच है । अमेजन पर खरीद बिक्री वही लोग कर सकते हैं जिनते पास इंटरनेट हो या फिर जिन्हें इंटरनेट का एक्सेस हो । बेवसाइट के जरिए होनेवाले कारोबार में ग्राहकों की संख्या अवश्य बढ़ी है लेकिन अभी उस माध्यम के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी । जल्दबाजी इस वजह से क्योंकि यह पूरे ग्राहक वर्ग के मूड और स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है । इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि ई बुक्स बिक्री और लोकप्रियता में किताबों को पटखनी दे देगा ।
लेकिन इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव और पहुंच को लेकर कुछ लोग साहित्य पर भी संकट देखने लगे हैं । उनका तर्क है सूचना संजाल के विस्तार से साहित्य नष्ट हो जाएगा । ऐसा नहीं है कि इस तरह के तर्क देनेवाले लोग नए हैं । इस तरह के लोग हर युग और काल में पाए जाते हैं । कुछ दशक पहले भारत में जब सिनेमा काफी लोकप्रिय होने लगा और पूरे देश में आम लोगों की जुबान पर इसकी चर्चा हुई तो उसमें भी साहित्य का दुश्मन माना गया और उसके खिलाफ मुकम्मल अभियान भी चला। उसके बाद भारत में टेलीविजन का अभ्युदय हुआ तो उसमें भी साहित्य के अंत का दु:स्वपन देखा गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्यकारों की एक पूरी जमात टेलीविजन के खिलाफ खड़ी हो गई और जबरदस्त तरीके से उसको खारिज करने की कोशिश की गई । टेलीविजन कैमरा का विकास हुआ तो यथार्थवादी रचनाकारों को यह लगने लगा कि उनका भोगा हुआ यथार्थ जिन्हें वो अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के सामने लाते हैं उसे कैमरा सीधे पाठकों को दिखा देगा । उसी खतरे को भांपते हुए और बगैर माध्यम को समझे कैमरे का विरोध शुरू हो गया । लेकिन उस विरोध का कोई असर नहीं दिखा और टेलीविजन की लोकप्रियता और विस्तार इतना हुआ कि आज घर घर में टेलीविजन लगे हैं । टेलीविजन के बाद जब कंप्यूटर आया तो बकायदा उसके खिलाफ वैचारिक आंदेलन शुरू किया गया । कई कवियों ने अपनी कविता में कंप्यूटर को दानव कहते हुए उसका मजाक उड़ाया । लेकिन अब वही कवि और लेखक कंप्यूटर पर काम करते हुए अपने को सहज महसूस करते हैं । उन्हें अब ना तो उस माध्यम से कोई परहेज हैं और ना ही विरोध । दरअसल चाहे वो सिनेमा हो,टेलीविजन हो या फिर कंप्यूटर हो या फिर कोई अन्य तकनीकी या वैज्ञानिक अविष्कार, उनका मूल उद्देश्य मानव समाज की बेहतरी ही होता है। किसी भी बेहतर तकनीक का मुकाबला बेहतरीन तकनीक से ही किया जा सकता है ना कि पुरातन और समय के पीछे रह गए तकनीक से । जो लोग भी नई और बेहतर तकनीक का मुकाबला पुरानी तकनीक से करना चाहते हैं, इतिहास गवाह है कि वो हमेशा मुंह की ही खाते रहे हैं ।
किताबों के बरक्श ई बुक्स को खड़ा करनेवाले लोग चाहे अनचाहे किताबों की अंतरवस्तु को हाशिए पर धकेलते हैं।दोनों माध्यमों के बीच संघर्ष को रेखांकित करनेवाले लोग दरअसल यह भूल जाते हैं कि दोनों की अपनी अलग महत्ता है और अंतत वह महत्ता उसके अंतर्वस्तु को लेकर है उसके माध्यम को लेकर नहीं । किताबों में जो लेख, कहानी, उपन्यास या फिर कविता है, लोकप्रियता उसकी होती है । फिर चाहें वो कागज पर छपी हो या फिर वो कंप्यूटर पर मौजूद हो है तो वो रचना ही।

Thursday, May 26, 2011

कुंठा @ प्रेम डॉट कॉम

विमल कुमार हिंदी पाठकों के बीच एक जाना पहचाना नाम है । लिक्खाड़ पत्रकार हैं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य और साहित्येतर विषयों पर लेख और टिप्पणियां प्रकाशित होती रहती है । अच्छे कवि भी हैं और कविता के लिए 1987 में ही भारत भूषण पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं । इसके अलावा हिंदी अकादमी भी उनको पुरस्कृत कर चुकी है लेकिन अपने उसूलों की खातिर वो पुरस्कार ठुकरा भी चुके हैं । पत्रकारिता और कविता लेखन के अलावा व्यंग्य और कहानियां भी लिखते हैं और कई संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं । अब उनका नया उपन्यास आया है,जिसका शीर्षक उत्तर आधुनिक है – चांद@ आसमान डॉट कॉम । इस उपन्यास के शीर्षक से ये भ्रम होता है कि यह तकनीक की दुनिया में आ रही क्रांति और बदलाव को केंद्र में रखकर लिखी गई कृति होगी लेकिन उपन्यास पढ़ने के बाद यह भ्रम टूट जाता है । इस उपन्यास के ब्लर्ब पर लिखा है - चांद@ आसमान डॉट कॉम का रूपक कल्पना और यथार्थ के बीच मनुष्य की आवाजाही का रूपक है जहां मनुष्य अपने लिए कुछ हासिल कर भी कुछ हासिल कर नहीं पाता है । वह त्रिशंकु की तरह फंसा रहता है । विमल कुमार ने अपने इस उपन्यास में प्रेम की गहरी तड़प के जरिए मनुष्य की इस त्रिशंकु स्थिति को अपने वक्त के आइने में ढूंढने की कोशिश की है । यह एक प्रेमकथा ही नहीं बल्कि अपने समय की एक त्रासद कथा भी है । ब्लर्ब में मैं सिर्फ यह जोड़ना चाहता हूं कि विमल कुमार का यह उपन्यास प्रेम में असफल होने की कुंठा कथा है और इसे समय की त्रासद कथा बनाने की लेखक ने जो कोशिश की है, उसमें वो सफलता प्राप्त नहीं कर पाया है । इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र मिहिर में साहस का घोर अभाव है । पत्नी और बच्चों के घर में होते हुए वह प्रेम की तलाश में भटकता रहता है लेकिन प्रेम को परणिति तक पहुंचाने का साहस उसमें नहीं है । उसकी पत्नी नंदिता का एक वाक्य उसके पूरे व्यक्तित्व को परिभाषित कर देता है – मिहिर तुम्हारे साथ सबसे बड़ी बात यह है कि तुम कल्पना में जीते हो। यह क्यों नहीं देखते कि तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन है या नहीं । यह पूरा वाक्य इस उपन्यास पर भी लागू होता है जहां कल्पना के आधार पर बगैर किसी जमीन के सिर्फ व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर कथा कहने की कोशिश की गई है ।
दरअसल इस उपन्यास की कथा इसके केंद्रीय पात्र मिहिर उसकी पत्नी नंदिता और उसकी प्रेमिका सुगन्धा के इर्द-गिर्द चलती है । उपन्यास में बहुधा यह लगता है रहता है कि मिहिर के बहाने लेखक अपनी बात कह रहा है, अपने जीवनानुभवों को बांट रहा है । इस उपन्यास में लेखक ने पत्र या डायरी के अंशों का इस्तेमाल करके पाठकों को एक नए तरह के कथास्वाद देने की कोशिश की है । यह माना जाता है कि पत्र और डायरी की जो प्रकृति होती है वह लेखक की आत्मकथा की तरह की ही होती है । पत्र और डायरी अपने स्वभाव से ही निजी होते हैं और वो ज्यादातर अपने बेहद करीबियों को ही संबोधित किए जाते हैं । पत्रों में कोई भी व्यक्ति अपनी भावनाओं और विचारों को बगैर किसी लाग-लपेट के अभिवयक्त करता है जिसके केंद्र में वह स्वंय होता है । उपन्यास में जब इस टूल का इस्तेमाल किया जाता है तो लेखक की कोशिश या मंशा यह होती है कि खुद को नेपथ्य में रखकर पत्र तथा डायरी के माध्यम से अपनी बात पाठकों के सामने रखे । पत्रों और डायरी का इस्तेमाल इस तरह से करता है कि पाठकों से एक कनेक्ट स्थापित हो सके । विमल कुमार ने भी अपने इस उपन्यास में अपनी बात डायरी और पत्रों के माध्यम से बखूबी कहने का प्रयास किया है । कुछ बेहद रूमानी पत्र इस उपन्यास में हैं ।
एक दूसरी बात जो इस उपन्यास की उल्लेखनीय है वह यह कि विमल कुमार लिखते वक्त बेहद अंतरंग क्षणों में भी राजनीति के प्रसंगों को ले आते हैं । उदाहरण के तौर पर जब वो उनकी प्रेमिका सुंगंधा की बांहों में होते हैं और उनके दिमाग में राजनीति की सौदेबाजी या आज की भाषा में कहें तो व्यावहारिकता का एक जबरदस्त द्वंद चलता है । लेखक या यों कहें कि उपन्यास के नायक का यह द्वंद उन अंतरंग क्षणों भी उसे शिबू सोरेन और भाजपा की सौदेबाजी की ही याद दिलाता है । दूसरे जब वह अपनी पत्नी के साथ विस्तर पर होते हैं तो भी उनके दिमाग में रूमानियत के बजाए संसद की बहस का ही स्मरण होता है । आखिर पच्चीस साल से पत्रकारिता कर रहे लेखक का कल्पना लोक भी उसे आसपास के वातावरण के इर्द गिर्द ही रहेगा। कुल मिलाकर अगर हम विमल कुमार के इस उपन्यास चांद@ आसमान डॉट कॉम पर विचार करें तो लगता है कि लेखक ने एक नए तरीके से आत्मकथा कहने का प्रयास अवश्य किया है जिसमें डायरी और पत्रों का प्रयत्नपूर्वक इस्तेमाल किया है । लेकिन नई शैली के बावजूद यह उपन्यास महानगरीय जीवन की एक बेहद साधारण कहानी भर बन कर रह गई है जो एक पत्रकार की असफल प्रेम कहानी जैसी लगती है । जिस प्रेम को लेकर खुद लेखक ही आश्वस्त नहीं है ।

Tuesday, May 17, 2011

गांधी को भुनाने की कोशिश

कुछ दिनों पहले ही हिंदी-अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित बेवसाइट फेस एंड फैक्ट्स के प्रबंध संपादक जय प्रकाश पांडे का बेहद गुस्से में फोन आया । उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक जोसेफे लेलीवेल्ड ने महात्मा गांधी का अपमान करते हुए एक किताब लिखी है -ग्रेट सोल- महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया- जिसमें गांधी को समलैंगिक करार दिया है । जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें यह बात कहां से पता चली तो उन्होंने कहा कि ब्रिटेन के अखबार डेली मेल ने एक लेख छापा है जिसका शीर्षक है - गांधी लेफ्ट हिज वाइफ टू लिव विद मेल लवर । यह लेख जोसेफ लेलीवेल्ड की नई किताब के हवाले से छापी गई थी । उन्होंने तत्काल मुझसे प्रतिक्रिया मांगी ताकि उसको प्रकाशित किया जा सके । चूंकि मैंने ना तो किताब पढ़ी थी और ना ही डेली मेल का लेख पढ़ा था इसलिए मैंने गांधी से जुड़ी एक कहानी सुना दी-एक बार गांधी जी ट्रेन से सफर कर रहे थे, किसी स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो गांधी ने देखा कि एक आदमी उनसे मिलने की कोशिश कर रहा है और उनके समर्थक उसे रोक रहे हैं वो लगातार मिन्नतें कर रहा था लेकिन लोग उनको गांधी तक पहुंचने नहीं दे रहे थे । गांधी ने जब यह देखा तो उन्होंने अपने पास के लोगों से मामले की जानकारी चाही । गांधी को बताया गया कि जो आदमी उनसे मिलने की जिद कर रहा है, दरअसल वह एक लेखक है और उसने गांधी को केंद्र में रखकर एक किताब- ROGUE OF INDIA - लिखी है । वह उस किताब पर गांधी जी के दस्तखत चाहता है । लोगों को लग रहा था जिस किताब का शीर्ष की इतना अपमानित करनेवाला है उसमें भीतर तो और भी विषवमन होगा । इस वजह से उसे गांधी से मिलने से रोका जा रहा था । गांधी को जब पूरी बात पता चली तो उन्होंने उस वयक्ति को अपने पास बुलाया, प्यार से बिठाया और हाल-चाल पूछने के बाद उसकी लिखी किताब पर अपने हस्ताक्षर कर उसको वापस लौटा दिया । उसके जाने के बाद गुस्साए गांधी के समर्थकों ने बापू से पूछा कि उन्होंने उस वयक्ति की किताब पर हस्ताक्षर क्यों किए जो आपको ROGUE OF INDIA बता रहा है । गांधी जी ने मुस्कुराते हुए जबाव दिया कि सबको अपनी राय बनाने और उसे व्यक्त करने का हक है । यह कहानी सुनाकर तो मैं उस वक्त निकल गया लेकिन मेरे मन में गांधी पर लिखी लेलीवेल्ड की किताब पढ़ने की इच्छा बढ़ने लगी । दो तीन किताब की दुकानों पर फोन करने पर पता चला कि यह किताब अभी भारत में उपलब्ध नहीं है । फिर मैंने डेली मेल का लेख पढ़ा । उसको पढ़ने के बाद पूरा तो नहीं लेकिन माजरा कुछ-कुछ समझ में आने लगा । इस बीच मुंबई के एक अखबार ने डेली मेल के लेख के हवाले से यह खबर छाप दी कि एक जर्मन व्यक्ति गांधी का 'सेक्रेट लव' था । इस लेख के छपने के बाद बवाल मचना था सो मचा । बगैर पढ़े-देखे आनन-फानन में गुजरात विधानसभा ने सूबे में किताब पर पाबंदी लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी । महाराष्ट्र में भी ऐसी ही मांग उठी कि लेलीवेल्ड की किताब पर बैन लगा दिया जाए । केंद्र सरकार के मंत्री भी इसमें राष्ट्रपिता का अपमान देखने लगे । यह सबकुछ सिर्फ एक लेख की बिना पर होने लगा, बगैर किताब पढ़े । लेकिन अब यह किताब भारत में उपलब्ध है । मुझे लग रहा था कि गांधी के बारे में इस किताब में कुछ नया खुलासा होगा लेकिन पढ़ने के बाद निराशा हुई और लगा कि डेली मेल का लेख बेहद सनसनीखेज और सत्य से परे था । दरअसल पश्चिमी देशों में किताब को हिट कराने का यह घिसा पिटा फॉर्मूला है । किताब के बाजार में आते ही उसके बारे में उत्सुकता का एक ऐसा वातावरण तैयार किया गया और प्रकाशक या फिर लेखक के रणनीतिकारों ने बिक्री बढ़ाने के लिए गांधी की इस जीवनी के कुछ चुनिंदा अंश लीक किए ताकि मीडिया में खबर बन सके और वो लोग ऐसा करने में कामयाब भी हो गए । गांधी और हरमन कैलेनबाख के संबंध के बारे में गांधी के कुछ पत्रों को इस तरह से प्रचारित किया गया कि लेखक लेलीवेल्ड ने कुछ महान खोज कर डाली हो । गांधी के बारे में कुछ ऐसा सत्य उद्घाटित कर दिया हो जो पहले से ज्ञात नहीं था । जबकि गांधी के जिन पत्रों को आधार बनाकर लेलीवेल्ड ने कुछ बातें की है वो पत्र सालों से राष्ट्रीय अभिलेखागार में और साबरमती आश्रम में मौजूद हैं । जब गांधी और कैलेनबाख के संबंधों को आधार बनाकर अखबारों में लेख और समीक्षाएं छपी तो दुनियाभर में गांधी के प्रशंसको ने इसका विरोध शुरू कर दिया । यह विरोध जितना तीव्र होता गया किताब की बिक्री उतनी ही ज्यादा बढ़ती चली गई ।
आधुनिक भारत के इतिहास में या यों कहें कि बीसवीं शताब्दी के विश्व इतिहास में महात्मा गांधी एक ऐसी शख्सियत है जिसके व्यक्तित्व की गुत्थी सुलझाना विद्वानों के लिए एक बड़ी चुनौती है । महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है । गांधी विश्व के इकलौते ऐसे शख्स हैं जिनकी मृत्यु के साठ साल बाद भी उनपर और उनके विचारों और लेखन पर लगातार शोध और लेखन हो रहा है । न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक ने भी गांधी और उनके व्यक्तित्व को अपने तरीके से उद्धाटित करने का असफल प्रयास किया है । साठ के दशक में लेलीवेल्ड भारत में न्यूयॉर्क टाइम्स के प्रतिनिधि थे । चूंकि वो भारत को नजदीक से देख समझ चुके थे इसलिए उनसे गांधी को और उनके पत्रों के आधार पर इस तरह के सनसनीखेज निष्कर्षों की उम्मीद नहीं थी । अब हम जोसेफ लेलीवेल्ड की किताबों के कुछ अंश पर नजर डालते हैं जिससे लेखक की मंसा साफ हो जाती है -गांधी अगर प्रेम में नहीं थे तो भी वो आर्किटेक्ट हरमन कैलेनबाख के प्रति आकर्षित थे । 1909 में लंदन से भेजे एक पत्र में गांधी ने कैलेनबाख को लिखा था- तुम्हारी तस्वीर मेरे शयनकक्ष में मैंटलपीस पर रखी है जो मेरे बिस्तर के ठीक सामने है । फिर वो आगे लिखते हैं कि रुई के फाहे और वैसलीन नियमित तौर पर याद दिलाते हैं । इसके आगे गांधी ने लिखा कि मुद्दा तुम्हें और मुझे यह दिखाने का है कि तुमने कितनी पूर्णता से मेरे शरीऱ पर कब्जा कर लिया है, यह एक प्रतिशोधपूर्ण गुलामी है (पृ-89)” अब हम कब्जा शब्द का क्या अर्थ निकालें या फिर पेट्रोलियम जेली के इस्तेमाल का क्या अर्थ निकालें जो आज की तरह उस वक्त भी किसी भी काम के लिए मरहम के तौर पर उपयोग में आता था । विश्वसनीय अनुमान तो यह हो सकता है कि लंदन के होटल के कमरे में वैसलीन एनीमा के लिए रही होगी जो गांधी की नियमित दिनचर्या में शामिल था या फिर फिर यह किसी और उमंग के पहले की छाया रहा हो जो उत्साह गांधी ने बूढे होने पर मालिश के लिए दिखाया था । मालिश के प्रति गांधी का लगाव सर्वज्ञात था और देश भर के दौरों के बीच वो महिलाओं से मालिश करवाने में रुचि रखते थे । मालिश की भी उनके जीवनकाल में काफी चर्चा होती थी और वह चर्चा कभी खत्म नहीं हुई ।
तकरीबन दो बर्ष बाद विनोदी स्वभाव के गांधी ने अपने दोस्त से समझौते के लिए एक अर्ध-सहमति पत्र बनाया था जिसमें वैसे नामों का प्रयोग किया गया था जिसे हम मजाकिया कह सकते हैं । उम्र में अपने से दो वर्ष छोटे कैलेनबाख को लोअर हाउस और खुद को अपर हाउस कहते थे ।.....कैलेनबाख के यूरोप दौरे के पहले 29 जुलाई 1911 को आपसी सहमति पत्र में अपर हाउस ने लोअर हाउस से यह वादा करवाया था कि उनकी गैरहाजिरी में कोई विवाह नहीं करेगा और ना ही किसी महिला की ओर ललचाई नजरों से देखेगा । इसके बाद दोनों हाउसों ने आपस में ज्यादा प्रेम और फिर और ज्यादा प्रेम का वादा किया । यह उस वक्त की बात है जब 1908 में गांधी की जेल यात्राओं और 1909 में उनकी लंदन यात्रा की अवधि को छोड़कर साथ रहते हुए तकरीबन तीन बर्ष बीत चुके थे । यहां यह बात स्मरणीय है कि हमारे पास सिर्फ गांधी के पत्र हैं जो हमेशा से डियर लोअर हाउस से शुरू होते हैं । हम अगर गांधी के पत्रों में लिखे गए अन्य संदर्भों और घटनाओं को छोड़ दें तो उससे ही दोनों के बीच के प्रेम के सूत्र निकलते हैं । पत्रों की व्याख्या हमेशा से दो तरह से की जा सकती है - एक तो हम अनुमानों के समंदर में डूब उतरा सकते हैं और दूसरा तरीका यह हो सकता है कि यह देखें कि दो व्यक्ति अपनी यौन इच्छाओं ते दमन के लिए अपने प्रयासों के बारे में क्या कहते सोचते हैं ।
जोसेफ लेलीवेल्ड ने इन्हीं पत्रों को आधार बनाकर गांधी के सेक्स जीवन के बारे में लिखा है लेकिन लिखते वक्त लेलीवेल्ड यह भूल गए कि गांधी में अपनी कामुकता को लेकर सार्वजनिक रूप से बात करने का अद्वितीय साहस था । 1906 में गांधी ने बह्मचर्य को अपना लिया था और उसके बाद से वो अपनी कामेच्छाओं के बारे में खुलकर लिखते बोलते थे और अपनी निजता का त्याग कर चुके थे । मालिश कराने के उनके शौक को लेलीविल्ड ने कामेच्छा से जोड़ने की कोशिश की है । लेकिन उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि मालिश कराना और एनीमा लेना गांधी की दिनचर्या में उनकी जिंदगी के आखिर तक बना रहा । सिर्फ इन बातों को आधार बनाकर गांधी के सेक्स जीवन की इस गलीज व्याख्या के लिए जोसेफ लेलीवेल्ड को जीवनी लिखने की जरूरत नहीं थी । अगर गांधी पर लिखी जीवनियों से इस किताब की तुलना करें तो यह एक बेहद कमजोर कृति है । दरअसल यह कृति गांधी की सही मायने में जीवनी भी नहीं है और ना ही गांधी के बारे में जानने की इच्छा रखनेवाले शुरुआती पाठकों के लिए उपयोगी किताब है । इस पूरी किताब में पढ़ते वक्त यह महसूस होता है कि लेखक यह मानकर चल रहा है कि पाठक को गांधी के बारे में उनके क्रियाकलापों के बारे में जानकारी है और अपनी इसी आग्रह के बिनाह पर किताब चलती रहती है । अंत में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि जोसेफ लेलीवेल्ड ने अपने तरीके से गांधी के पुरुष मित्रों के संबंध को व्याख्यायित किया है और इसका उन्हें हक भी है । किताब पर पाबंदी लगाने या देश भर इसे प्रतिबंधित करने की कोई आवश्यकता नहीं है । खुद गांधी भी अगर जीवित होते तो इसपर पाबंदी के खिलाफ होते ।

Sunday, May 8, 2011

तद्भव और अन्य पत्रिकाएं

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक समृद्ध इतिहास रहा है और हिंदी के विकास में इनकी एक ऐतिहासिक भूमिका भी रही है । व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरोध में शुरू हुआ लघु पत्रिकाओं के इस आंदोलन ने एक वक्त हिंदी साहित्य में विमर्श के लिए एक बड़ा और अहम मंच प्रदान किया था । लेकिन बदलते वक्त के साथ इन पत्रिकाओं की भूमिका भी बदलती चली गई । नब्बे के दशक में तो आलम यह था कि कई ऐसे व्यक्ति जो लेखक के रूप में हिंदी जगत में मान्यता नहीं पा सके उन्होंने किसी तरह से जुगाड़ लगा कर एक पत्रिका छाप ली । लेखक ना बन पाने की टीस संपादक बनकर दूर होने लगी । फिर तो यह फॉर्मूला चल निकला और एकल अंकी पत्रिका के संपादकों की हिंदी में बाढ़ आ गई । लगभग एक दशक में इस तरह की सभी पत्रिकाएं कहां बिला गई यह पता भी नहीं चला । उस दौर में कई पत्रिकाएं ऐसी भी निकली जिसने हिंदी साहित्य को गहरे तक प्रभावित ही नहीं किया बल्कि अपनी उपस्थिति से उसमें सार्थक हस्तक्षेप भी किया । इस तरह की एक गंभीर पत्रिका का प्रकाशन लखनऊ से कहानीकार अखिलेश ने शुरू की-तद्भव ( संपादक अखिलेश,18/20 इंदिरानगर, लखनऊ-226016, उत्तर प्रदेश) । अबतक इस पत्रिका के तेइस अंक निकल चुके हैं और हर अंक ने अपनी सामग्री की वजह से हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया । अपने संवादकीय में अखिलेश हर बार कोई विचारोत्तजक मुद्दा उठाते रहे हैं जिसपर पर्याप्त बहस की गुंजाइश भी रहती है ।
इस बार के अपने संपादकीय में अखिलेश ने इंटरनेट पर छप रहे लेखों और साहित्य को पुस्तकों की उपयोगिता का तुलनात्मक विवेचन किया है । अपने संपादकीय की शुरुआत ही अखिलेश करते हैं - इन दिनों कुछ लोगों द्वारा इस बात की चिंता प्रकट की जाती है कि इंटरनेट का विस्तार किताबों के वर्तमान स्वरूप को समाप्त कर देगा जाहिर है यहां आशय छपी हुई पुस्तकों से है । इस बात के समर्थन और विरोध की बातें कहते हुए अखिलेश फिल्मों तक पहुंचते हैं और कहते हैं कि - सिनेमा के अभ्युदय में भी साहित्य की समाप्ति का दुस्वपन देखा गया था । टेलीविजन को सिनेमा और साहित्य दोनों का संहारक माना गया । रंगीन टेलीविजन के खिलाफ तो बकायदा वैचारिक संघर्ष हुआ था और कंप्यूटर की भर्त्सना में बौद्धिक दुनिया ने विराट प्रतिरोध दर्ज किया था । इतना ही नहीं हमारे कुछ महत्वपूर्ण कवियों ने कंप्यूटर की निंदा करते हुए अपनी कविता में उसे ना छूने तक की प्रतिज्ञा की थी । अपने इस पूरे संपादकीय में अखिलेश तकनीक को लेकर हिंदी के द्वंद को सामने लाते हैं । इसके साथ ही इशारों-इशारों में इंटरनेट और ब्लॉग में फैली अराजकता पर भी सवाल खड़े करते हैं । यह सही है कि इंटरनेट और ब्लाग की दुनिया एक वैकल्पिक मीडिया के तौर पर सामने आया, साथ ही विचारों को अभिवयक्त करने का एक मंच प्रदान किया । इंटरनेट पर हिंदी में काफी महत्वपूर्ण काम किया जा रहा है लेकिन चंद लोग इसका इस्तेमाल व्यक्ति विशेष को बदनाम करने से लेकर लाभ-लोभ की आशा में ब्लैकमेलिंग के हथियार के तौर पर करते हैं । ब्लाग जगत के मूर्धन्य लोगों को आत्म नियंत्रण जैसा कोई मैकेनिज्म विकसित करना होगा । अगर ऐसा नहीं होता है तो सरकारी नियंत्रण की मांग उठेगी जो इसके हित में नहीं होगी ।
तद्भव के नए अंक में प्रसिद्ध कथाकार और अपनी धर्मनिरपेक्षता के लिए मशहूर विभूति नारायण राय की आनेवाली किताब के दो अंश छपे हैं - हाशिमपुरा 22 मई । 1987 में मेरठ के भीषण दंगों के दौरान विभूति नारायण राय बगल के जिले गाजियाबाद के पुलिस कप्तान थे । उन दंगों के दौरान उत्तर प्रदेश की पीएसी ने अंल्पसंख्यकों पर जिस तरह से जुल्म किए थे, उसके बारे में विभूति नारायण राय किताब लिख रहे हैं । यह पूरी घटना दिल दहला देने वाली है कि किस तरह 22-23 मई 1987 की रात को दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर पर स्थित मकनपुर गांव के पास ट्रकों में भरकर लाए गए लोगों को पीएसी के जवानों ने अपनी गोली का शिकार बनाया था । पुलिस कप्तान के तौर पर जब राय सूचना मिलने के बाद उस जगह पहुंचे तो लाशों के ढेर के बीच सरकंडे को पकड़ कर नहर में झूलता एक जीवित व्यक्ति उन्हें मिला जिसका नाम बाबूदीन था । उसने पूरी घटना पुलिस कप्तान और उस वक्त के जिलाधिकारी नसीम जैदी को बतलाई । इस पूरे लेख में दो अधिकारियों के भय के उस मनोदशा का भी चित्रण है जहां उन्हें लगता है कि सुबह अफवाह फैलने के बाद उनके जिले में भी दंगा भड़क सकता है । यहां यह भी बताते चलें कि 1987 में चौथी दुनिया में सबसे पहले इस नरसंहार का खुलासा हुआ था । इसके अलावा तद्भव के इस अंक में वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह की दो कहानियां खरोंच और पायल पुरोहित प्रकाशित है । काशीनाथ सिंह ने इस बार अपनी कहानियों में एक अलग ही तरह का प्रयोग किया है जो पाठकों को चौंकाती है । कविताओं में बद्री नारायण और प्रेम रंजन अनिमेष की कविताएं उल्लेखनीय हैं जबकि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं उनकी तुलना में काफी कमजोर है । जितेन्द्र अपनी कविताओं को संभाल नहीं पा रहे हैं और उनके कथन में भटकाव को साफ तौर पर देखा जा सकता है ।
पुस्तक समीक्षाओं पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका- समीक्षा ( संपादक-सत्यकाम, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज नई दिल्ली-110002) का भी नया अंक आया है । मैं लंबे अरसे से इस पत्रिका को देख पढ़ रहा हूं । जब से सामयिक प्रकाशन ने इस पत्रिका का अधिग्रहण किया है तो कुछ बदलाव तो लक्षित किए जा सकते हैं लेकिन लेकिन घूम फिर कर वही-वही लेखक फिर से छप रहे हैं जो सालों से छपते आ रहे हैं । हां इतना अवश्य हुआ है कि महेश भारद्वाज ने कुछ नए लेखकों के लिए पत्रिका का सिंहद्वार खोल दिया है । अप्रैल में प्रकाशित अंक में वर्ष 2010 में प्रकाशित किताबों का लेखा-जोखा प्रकाशित होना चकित करता है । 2011 के तकरीबन चार महीने बीत जाने के बाद पिछले वर्ष का लेखा-जोखा छापना मेरी समझ से बाहर है । इन चार महीनों में तो हिंदी में कई अहम किताबें छपकर आ गई, खुद समायिक से ही कई किताबें छप गई । इस तरह के लेख से एक तो यह लगता है कि प्लानिंग के स्तर पर कुछ खामियां है जिसे दूर किया जा सकता है ताकि पत्रिका की ताजगी और लेखों की प्रासंगिकता बनी रही । इस पत्रिका के संस्थापक संपादक गोपाल राय जी ने इस बार प्रेमचंद की किताबों के बहाने एक अच्छा लेख लिखा है । संपादकीय में सत्यकाम ने कई हल्की बातें कह दी हैं,गौर करिए - पत्रिकाओं के दम पर आज साहित्य जिंदा है, वर्ना पुस्तकें पुस्तकालयों में जाकर कैद होने के लिए अभिशप्त हैं । ऐसी ही एक पत्रिका है नया पथ । यह जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय पत्रिका है । लेखक संघों में जनवादी लेख संघ ही सर्जानत्मक रूप से सक्रिय है और इसी पर साहित्य की आशा टिकी है । पता नहीं सत्यकाम किस आधार पर कह रहे हैं कि जलेस ही सर्जनात्मक रूप से सक्रिय है और साहित्य की आशा उसपर ही टिकी है । यहां सत्यकाम फतवेबाजी के दोष के शिकार हो गए हैं । उन्हें यह बताना चाहिए था कि किस तरह से साहित्य की आशा जलेस पर टिकी है । सत्यकाम की छवि एक समझदार शिक्षक की है उनसे इस तरह की बचकानी टिप्पणी की उम्मीद नहीं थी । लेखक संघ किस तरह से अपने कर्तव्य से च्युत हो चुके हैं यह पूरा हिंदी साहित्य जानता है । उनकी साहित्य जगत में अब कोई भूमिका शेष नहीं रह गई है क्योंकि लेखकों से जुडे़ किसी भी बड़े मसले पर वो हमेशा खामेश ही रहते हैं ।
पिछले दिनों एक गोष्ठी में एक मित्र ने आधारशिला ( संपादक दिवाकर भट्ट, बड़ी मुखानी,हलद्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड -263139) का कवि त्रिलोचन पर केंद्रित अंक-बारंबार त्रिलोचन की प्रति दी । इस अंक का संपादन वाचस्पति ने किया है । इस अंक के संपादकीय से पता चला कि इसके पहले भी आधारशिला ने अपना एक अंक त्रिलोचन पर फोकस करते हुए निकाला था और दिवाकर भट्ट की मानें तो - आधारशिला का त्रिलोचन विशेषांक -एक त्रिलोचन इतने अपने पास, अपनी सामग्री व प्रस्तुति की दृष्टि से देश-विदेश में खासा चर्चित रहा । मुझे इस बात का अफसोस है कि देश-विदेश में चर्चित उक्त अंक मैं देख नहीं पाया । अगर इस अंक को देखें तो अतिथि संपादक ने पहले ही मान लिया है कि - कुछ निजी और सार्वजनिक कारणों से त्रिलोचन विषयक अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री अभी हम नहीं दे पा रहे हैं । इस याचित सामग्री का उपयोग हम यथासमय अवश्य करेंगे । बावजूद इसके इस अंक में कई महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हैं । कथाकार उदय प्रकाश का संस्मरणात्मक लेख-पथ पर बिखरा जीवन-बेहतरीन लेखों में से एक है । इस लेख के अलावा हिंदी के तमाम लेखकों के त्रिलोचन पर समय समय पर लिखे लेख इस अंक में हैं जिसमें शमशेर बहादुर सिंह, राजेश जोशी, लीलाधर जगूड़ी, रामविलास शर्मा, रमेशचंद्र शाह आदि के नाम शामिल हैं । त्रिलोचन पर केंद्रित य़ह अंक हिंदी में सानेट के जनक को जानने के लिहाज से अहम है ।
पिछले दिनों डाक में एक ऐसी पत्रिका मिली जिसके शीर्षक के मुझे चौंकाया । प्रवासी भारतीयों की मासिक पत्रिका- पत्रिका गर्भनाल ( संपादक सुषमा शर्मा, डीएक्सई-23, मीनाल रेसीडेंसी, जे के रोड भोपाल-462023) । मैं इसके कवर और शार्षक से यह अनुमान नहीं लगा पाया कि यह किस तरह की पत्रिका है । लेकिन उलटने पुलटने के बाद पता चला कि यह पत्रिका कमोबेश साहित्यक ही है । इसमे विदेशो में बसे कुछ भारतीयों के लेखों के अलावा देसी लेखकों की भी रचनाएं प्रकाशित हैं लेकिन दो अंक देखने के बाद भी मेरी यही राय है कि अभी इस पत्रिका का कोई ठोस स्वरूप नहीं बन पाया है ।

Monday, April 25, 2011

इज्जत की जमींदारी

शादी के ग्यारह साल बाद ससुराल जाने का मौका मिला । लंबा अंतराल इस वजह से कि ससुराल के सबलोग बिहार के ऐतिहासिक शहर गया में बस गए थे । शादी भी वहीं से हुई और जब भी जाना हुआ गया ही गया । पत्नी के पैतृक गांव यानि अपनी असली ससुराल जाने का अवसर, जैसा कि उपर बता चुका हूं शादी के ग्यारह साल बाद मिला । इतने लंबे अंतराल के बाद वहां पिछले साल दिवंगत हुए अपने श्वसुर की बरसी में गया था। हमें जाना था गया से तकरीबन साठ-सत्तर किलोमीटर दूर औरंगाबाद जिले के रायपुर बंधवा गांव में, हमलोग गया से चलकर दो घंटे में वहां पहुंचे । बिहार की सड़के पिछले सालों में बेहद अच्छी हो गई हैं और रास्ते में पड़नेवाले आजादी के पूर्व बने सारे सड़क पुल के समांतर नए पुल बन रहे थे । जब मैं रास्ते में था तो सोच रहा था कि लगभग एक दशक पूर्व अपनी शादी में मुझे जमालपुर से गया के लगभग सौ एक सौ दस किलोमीटर का सफर तय करने में ग्यारह घंटे लगे थे । तब बिहार में लालू राज था और सड़कें लगभग गायब हो चुकी थी । खैर यह अवातंर प्रसंग है । मैं बात कर रहा था अपने बंधवा सफर की । औरंगाबाद जिले के बंधवा तक जाने का रास्ता पूरी तरह से नक्सल प्राभवित इलाका गोह, हसपुरा से होकर जाता था । लेकिन टाटा मैजिक से दो घंटे का सफर बेखौफ होकर तय किया । रास्ते में सबकुछ सामान्य लग रहा था । रास्ते में मिलनेवाले कस्बानुमा बाजार में खूब भीड़ भाड़ और चहल पहल थी, किसी भी तरह के डर का वातावरण नहीं दिख रहा था, कहीं कोई पुलिसवाला भी नहीं दिखा, अर्धसैनिक बल के जवान तो दूर की बात । हमलोग दोपहर बाद बंधवा पहुंचे । वहां का घर पुराने जमाने का बना था, मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारें और खूब उंचाई पर छत । गांव में घुसते ही एक बोर्ड दिखाई दिया - यह गांव राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत उर्जाकृत ग्राम है । लेकिन घर पहुंचते ही राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की पोल खुल गई । वहां तक बिजली के तार-खंभे तो हैं लेकिन बिजली नहीं है । कई घरों में सोलर एनर्जी से काम चल रहा था । मेरे लिए बिना बिजली के रहने का यह नया अनुभव नहीं था लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद बगैर बिजली के चार-पांच दिन गुजारा था । यह एक संयोग ही बना कि जब पहली बार भारत ने क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता था तब भी मैंने रेडियो पर ही भारत के जीत की दास्तां सुनी थी और इस बार भी क्रिकेट के महायुद्ध में जब भारत श्रीलंका को पराजित कर रहा था तो मैं रेडियो से ही चिपक कर बैठा था । लेकिन सबसे मजेदार बात यह थी कि एक ओर जहां टीवी और बिजली से दूर था वहीं मेरा मोबाइल मुझे बाहर की दुनिया से जोड़े हुथा और मुझे अपडेट रख रहा था । उन पांच दिनों में मैंने मोबाइल इंटरनेट का जमकर इस्तेमाल किया, फेसबुक और ट्विटर से वर्ल्ड कप पाइनल के दौरान लोगों के जोश और उत्साह का अंदाज मिल रहा था ।
रायपुर बंधवा के अपने बंगले पर जब हमलोग शाम को बैठे तो लोगों के आने जाने का सिलसिला शुरू हो गया । चूंकि मैं घर का दामाद था इस लिए मुझे खास तौर पर इज्जत बख्शी जा रही थी। गांव में मेरे दिवंगत श्वसुर प्रोफेसर प्रियव्रत नारायण सिंह की काफी इज्जत थी । गांव से बाहर रहने के बावजूद उनका दिल गांव में ही बसता था । हर साल दो तीन बार गांव जरूर जाते थे । शाम को जब मैं और मेरी पत्नी के बड़े भाई राजेश जी गांव में घूमने निकले तो इस इज्जत का एहसास और गहरा हो गया । रास्ते में हर छोटा बडा़ आदमी राजेश जी को सलाम मालिक कह रहा था । जमींदारी तो 1953 में ही चली गई थी लेकिन इज्जत की जमींदारी अब भी कायम थी । कई लोग जो हमसे मिलने आ रहे थे वो राजेश जी और उनके चाचा के सामने कुर्सी या बेंच पर बैठने की बजाए जमीन पर बैठ रहे थे । मुझे यह सामंती लग रहा था लेकिन जब उनसे बात हुई तो पता चला कि यह उनके सम्मान देने का एक तरीका है, उन्हें कोई इसके लिए फोर्स नहीं करता है । यह सदियों से चली आ रही एक परंपरा है जिसे निभाया जा रहा है । यहां मेरे दिमाग में एक बात बार-बार उठ रही थी कि सुदूर गांव में हर कोई एक दूसरे को विश करने के लिए सलाम का इस्तेमाल कर रहा था । बोलचाल में उर्दू के लफ्जों का जमकर इस्तेमाल हो रहा था। उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहने वालों को उन इलाकों में जाकर देखना चाहिए कि जहां कोई मुस्लिम आबादी नहीं है वहां भी बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के, सिर्फ परंपरा के सहारे लोग उर्दू का इस्तेमाल कर रहे थे । भाषा के बीच दरार पैदा करनेवाले लोगों को एसी कमरों से बाहर निकलकर लोगों के बीच जाने की जरूरत है।
इन पांच दिनों तक वहां रहने के दौरान कई अनुभव हुए । एक दिन अचानक दोपहर में घर के बरामदे पर बैठा था तो दर्जनों बच्चे थाली पीटते हुए सामने से गुजरे । पूछने पर पता चला कि ये बच्चे मिड डे मील स्कीम के तहत खाना खाने स्कूल जा रहे हैं । और दरियाफ्त की तो आगे पता चला कि बच्चों का नामांकन तो स्कूल में कर दिया गया है लेकिन उनकी पढ़ाई और उनके स्कूल में उपस्थिति ज्यादातर रजिस्टर में ही दर्ज होती है । बच्चे स्कूल में पढ़ने की बजाए दोपहर का खाना खाने आते हैं । दस बजे के करीब से स्कूल में खाना बनना शुरू हो जाता है और बारह-एक बजे तक बच्चों को खाना खिलाकर स्कूल के मास्टर लोग फारिग हो जाते हैं । उसी तरह से आंगनबाड़ी केंद्र का काम भी चल रहा था । लेकिन गांव के ही लोगों ने बताया कि मिड डे मील में जमकर घपला होता है । रजिस्टर में फर्जी छात्रों के नाम भी दर्ज होते हैं और जिले के आला शिक्षा अधिकारियों की मिलीभगत से यह फर्जीवाड़ा धड़ल्ले से चलता है । बातों -बातों में बता चला कि वहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी है जिसमें तैनात डॉक्टर घंटे -डेढ़ घंटे के लिए केंद्र में आते हैं । गांव के लोग इस बात से ही खुश दिखे कि कम से कम घंटे भर के लिए तो डॉक्टर गांव में होता है । नीतीश राज के पहले तो स्वास्थ्य केंद्र का ताला ही महीनों में खुलता था । यह भी पता नहीं चलता था कि किसी डॉक्टर की तैनाती वहां है या नहीं । लेकिन बड़ा सवाल अब भी है कि क्या नीतीश कुमार शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में और सुधार कर पाएंगे । क्या केंद्र पर तैनात डॉक्टर पूरे समय तक मौजूद रहेंगे । क्या होटल में तब्दील हो रहे स्कूलों को विद्या का मंदिर बना पाएंगे । नितीश कुमार को प्रदेश की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ जिताकर दुबारा सत्ता तो सौंप दी लेकिन अब जनता की प्रचंड अपेक्षा भी है जिसपर नीतीश कुमार को खड़ा उतरना होगा । अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास पुरुष हो जाएंगे और इगर उसमें कोई कमी रह जाती है तो इतिहास पुरुष बनने की बजाए इतिहास में खो जाने का खतरा भी उत्पन्न हो जाएगा ।
बंधवा में चार पांच दिन रहने के बाद हमलोग दोपहर बाद फिर से गया के लिए रवाना हो गए । देवकुंड, अमझरशरीफ से होते हुए हमलोग हसपुरा के रास्ते जा रहे थे । शाम घिरने लगी थी लेकिन डर कहीं नहीं था, खुली गाड़ी में अंधेरे में सफर जारी था । मुझे याद है जब शादी के बाद मैं अपने ससुराल गया जाया करता था तो शाम ढलने के बाद भी मेरे श्वसुर जी पास के बाजार में भी नहीं जाने देते थे । एक अजीब तरह का डर और अपराधियों का खौफ लोगों के मन में इतने अंदर तक था कि हर कोई शाम ढ़लने के पहले घर लौट आता था लेकिन सिर्फ पांच साल में एक वयक्ति ने पूरी फिजां ही बदल दी । अंत में मैं एक मजेदार वाकया सुनाता हूं जो वहीं किसी ने मुझे सुनाया - हसपुरा से एक लड़का गोह जाने के लिए बस में चढ़ा और उसने किराए के तौर पर पंद्रह रुपए निकाल कर दिए । कंडक्टर ने कहा कि किराए के बीस रुपए बनते हैं । दोनों मे बकझक होने लगी । रंगदार टाइप के उस लड़के ने कंडक्टर पर धौंस जमाते हुए कहा कि तुम मुझे जानते नहीं मैं तो पंद्रह रुपए ही दूंगा । तो कंडक्टर ने जबाब दिया कि तुम भूल गए हो कि लालू यादव का राज खत्म हुए छह साल हो गए हैं और अगर तुम तत्काल से किराए के बाकी पैसे नहीं दोगे तो या तो बस से उतार दूंगा और अगर रंगदारी करोगो तो थाने में बंद करवा दूंगा । तो समाज के आम आदमियों में कानून के प्रति जो यह विश्वास कायम हुआ है है वो बहुत कुछ कह जाता है ।

Saturday, April 23, 2011

लोकतंत्र को शर्मसार करता वाकया

अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता के जश्न और उसके बाद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर आरोपों की बौछार ने पूरे देश में ऐसा माहौल बना दिया जैसे की वही देश की सबसे बड़ी समस्या हो । इस पूरे विवाद में सीडी के सरताज अमर सिंह की एंट्री ने उस गंभीर मुद्दे को मनोरंजक बना दिया । सीडी के शोर के बीच एक ऐसी खबर दबकर रह गई जिसने पूरे देश को शर्मसार कर दिया, साठ साल से ज्यादा के हमारे गणतंत्र पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया । देश में सबसे ज्यादा साक्षर लोगों के प्रदेश केरल में एक ऐसा वाकया हुआ जो सभ्य समाज के मुंह पर करारा तमाचा है । केरल सरकार में एक वरिष्ठ दलित अधिकारी के रिटायर होने के दिन ही उनके दफ्तर में काम करनेवाले लोगों ने पूरे दफ्तर का शुद्धीककरण किया । सूबे के रजिस्ट्री विभाग में इंसपेक्टर जनरल के पद पर काम करनेवाले ए के रामकृष्णन जब इकत्तीस मार्च को सेवानिवृत्त हुए तो उस दिन उनकी विदाई के बाद उनके ही दफ्तर में काम करनेवाले कुछ लोगों ने उनकी कार को पहले पानी से धोया गया और फिर मंत्रोच्चार के बीच सार्वजनिक रूप से कार का शुद्धीकरण किया गया । बात इतने पर ही नहीं रुकी अगले दिन तो रजिस्ट्रार के दफ्तर के लोगों ने और आगे बढ़कर रामकृष्णन के बैठनेवाले कमरे और उनकी कुर्सी को भी पवित्र पानी में गाय के गोबर को घोलकर उससे साफ किया । पानी में गाय के गोबर को मिलाकर शुद्धीकरण करने की केरल में पुरानी मान्यता है । एक सरकारी दफ्तर में सरेआम इस तरह का वाकया हो और पूरा दफ्तर खामोश रहकर देखता रहे तो इस बात का पता चलता है कि हमारे समाज में जाति व्यवस्था कितने अंदर तक पैठ चुकी है । केरल की राजधानी में यह सब कुछ तब घटित हो रहा था जब कि लगभग एक पखवाड़े बाद सूबे में विधानसभा का चुनाव होनेवाला था। अफसोस की किसी भी राजनीतिक दल ने इस शर्मनाक वाकए को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया । उस कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर कोई जनआंदोलन नहीं छेड़ा ना ही कोई मुहिम चलाई जो अपने आपको महात्मा गांधी की विरासत का वारिस कहते नहीं थकती । उस कांग्रेस पार्टी के नेताओं को भी यह मुद्दा नहीं लगा जिसके केरल के ही नेता और अब केंद्र में मंत्री व्यालार रवि के बेटे के विवाह के बाद गुरुवयूर मंदिर को शुद्ध किया गया था । सामाजिक समानता की बात करनेवाली वामपंथी पार्टी जो कि इस वक्त तक केरल में सत्ता में है,उसने भी इस मामले के सामने आने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की। इस मामले में शिकायत मिलने के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने सरकार के राजस्व विभाग से पूरे मामले की रिपोर्ट तलब की है । रिपोर्ट आने के बाद क्या कोई कार्रवाई हो पाएगी इस सवाल का जबाव तो अभी समय के गर्भ में ही है । एक जमाने में केरल के समाज में जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता समाज में गहरे तक धंसा था । स्वामी विवेकानंद ने केरल के समाज में भेदभाव की उस स्थिति पर गहरी चिंता जताई थी और महात्मा गांधी ने भी केरल के मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए सत्याग्रह भी किए थे । केरल के प्रसिद्ध गुरुवयूर मंदिर में भी दलितों और गैर हिंदुओं के प्रवेश को लेकर लंबे समय तक जनआंदोलन चला था । लेकिन तमाम आंदलनों और समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार ने भी इस सामजिक बुराई को कम किया हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है । ऐसा नहीं है कि दलितों के साथ भेदभाव सिर्फ केरल में ही हो रहा हो । चंद साल पहले उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारी ने भी इसी तरह के आरोप लगाए थे कि उनके दफ्तर के सहयोगी ने उनके बैठने की जगह का शुद्धीकरण किया था । उस मामले में भी शिकायत हुई थी लेकिन क्या कार्रवाई हुई यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है ।
केरल के अलावा हिमाचल प्रदेश के एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर में अब भी एक बोर्ड प्रमुखता से मंदिर के बाहर टंगा है - लंगर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित है । यह किस तरह के समाज की तस्वीर जहां उसके ही लोगों का प्रवेश किसी धार्मिक स्थान में वर्जित है । देश की आजादी के चौंसठ साल बाद भी सार्वजनिक रूप से इस तरह के बोर्ड मंदिरों में लगे हैं और प्रशासन सो रहा है, सरकारों को इसकी फिक्र नहीं है । इससे तो यही प्रतीत होता है कि सरकार की मूक सहमति इस तरह की मान्यताओं के पक्ष में है या फिर वो इस तरह की समाजिक कुरीतियों को हचाने के प्रति उदासीन है । मंदिर में दलितों को प्रवेश नहीं मिलेगा, मंदिर के गर्भ गृह में महिलाओं को भी प्रवेश नहीं मिलेगा, लेकिन हम प्रगतिशील समाज हैं, हम आधुनिक हैं । इस तरह के दकियानूसी और घटिया विचार के लिए हमारे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए । आज हमारा देश विश्व में सुपर पॉवर बनने का सपना देख रहा है । विश्व में हमारी अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी अर्थवयवस्था होने का ख्बाब देख रही है ,लेकिन समाज में इन विसंगतियों की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है । आज पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ा आंदोलन किया जा रहा है । तथाकथिकत सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे और सरकार के आला मंत्री भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए लोकपाल बिल के ड्राफ्ट बनाने में जुटे हैं । कांग्रेस के हाई प्रोफाइल नेता दिग्विजय सिंह लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं । लेकिन किसी के पास यह सोचने की फुरसत नहीं है कि समाज के निचले पायदान पर जीवन जी रहे लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और वो किस तरह जहालत और अपमानजनक जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं । दलितों के घर में रात बिताने और उनके हाथ का खाना खाने वाले कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गांधी को भी देश में दलितों के उत्थान की चिंता हो सकती है लेकिन उनकी तरफ से दलितों के उत्थान के लिए कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है । क्या दलितों के घर में खाना भर खा लेने या उनके घर में रात बिता लेने से समाज में उनको मान्यता या फिर बराबरी का हक मिल पाएगा । दलितों के उत्पीड़न के खिलाफ कड़े कानून भर बना देने से उनका हित हो जाएगा या फिर उनपर अत्याचार रुक जाएंगे यह सोचना भी गलत है । कानून को सख्ती से लागू करना और समाज में उसका भय होना जरूरी है और यह तभी हो पाएगा जब ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई होगी और दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलेगी ।
समाज से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जारी जंग जायज है, इस मुहिम को हर तरह का और हर तबके का समर्थन मिलना चाहिए । लेकिन देश में भ्रष्टाचार से बड़ी समस्या अब भी दलितों की समाज में दयनीय स्थिति है । इस दिशा में देश के कर्ताधर्ताओं के साथ साथ सिविल सोसाइटी को भी विचार करना होगा । गांधी जी ने अप्रैल 1921 में अहमदाबाद में सप्रेस्ड क्लास कॉंफ्रेंस के अपने भाषण में कहा था- जबतक देश का हिंदू समाज छूआछूत को अपने धर्म का हिस्सा मानता रहेगा, जब तक हिंदू समाज अपने समाज के साथ रहनेवाले कुछ लोगों को छूना पाप समझता रहेगा तबतक स्वराज को पाना मुमकिन नहीं है । गांधी का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है । हम चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी बड़ी लड़ाई लड़ लें, उसमें चाहे हमें कितनी भी बड़ी सफलता हासिल हो जाए लेकिन जब तक हमारे समाज में केरल जैसी घटनाएं घटती रहेंगी, तबतक हमारी उस जीत का कोई मतलब नहीं रह जाएगा ।

Sunday, April 17, 2011

महानगरीय जीवन की त्रासदी

राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के एक बेहद पॉश इलाके की बहुमंजिला इमारत के एक फ्लैट में सात महीने से दो बहनें गुमनाम जिंदगी जी रही थी । ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्तिगत अवसाद और असुरक्षा बोध की वजह से दोनों बहनें अनुराधा और सोनाली ने खुद को अपने फ्लैट में कैद कर लिया था । पिछले सात महीनों से दोनों बहनें ना तो घर से बाहर निकल रही थी और ना ही बाहर की दुनिया से या फिर अपने नाते रिश्तेदारों से कोई संपर्क रख रही थी । यह भी बेहद हैरान करनेवाला और चौंकानेवाल तथ्य सामने आया है कि चंद फीट के फासले पर मौजूद दूसरे फ्लैट में रह रहे परिवारों से भी उनका किसी तरह का कोई नहीं संबंध था । सात महीने बाद जब मीडिया में खबर प्रकाशित होने के बाद पुलिस की मौजूदगी में गैर सरकारी संगठन की मदद से फ्लैट को दोनों बहनों के विरोध के बावजूद ताला तोड़ कर खोला गया तो अंदर का मंजर दिल दहला देनेवाला था । फ्लैट में भयानक बदबू के बीच जिंदगी जी रही दोनों बहनों की हालत बेहद खराब थी । पूरे फ्लैट में खाने पीने का कोई सामान मौजूद नहीं था । जाने कब से दोनों बहनों ने खाना नहीं खाया था। महीनों की तन्हाई और कुछ नहीं खाने-पीने की वजह से एक बहन तो नरकंककाल में तब्दील हो चुकी थी और दूसरी चलने फिरने लायक तो थी लेकिन अस्पताल पहुंचते ही उसकी हालत भी खराब हो गई । बड़ी बहन तो खुलेपन में चौबीस घंटे भी जिंदा नहीं रह सकी जबकि दूसी भी सदमे में और तमाम बीमारियों की वजह से अस्पताल में बेंटिलेटर पर मौत और जिंदगी के बीच झूल रही है । नोएडा की इन बहनों की यह काहनी बेहद डरावनी लगती है लेकिन उससे भी भयावह है समाज का और हमारा आपका संवेदनाशून्य हो जाना । आपके पड़ोस में दो अकेली लड़की रहती है, उसके माता-पिता की मौत हो चुकी है, भाई वयक्ति कारणों से घर छोड़कर जा चुका होता है । दोनों की नौकरी चली जाती है । आर्थिक और समाजिक असुरक्षा का बोध इतना गहरा हो जाता है कि वो खुद को अपने घर में कैद कर लेती है । इतना सबकुछ होने के बाद भी आस पड़ोस के लोग दोनों बहनों की हालात से बेखबर रहते हैं, दो घरों के बीच की दीवार इतनी मोटी हो जाती है कि दीवार के उस पार तिल तिल कर मर रही दो जिंदगियों की सिसकियां भी पड़ोसियों को सुनाई नहीं देती या फिर हम उन्हें सुनना नहीं चाहते । इन दोनों की कारुणिक दास्तान से हमको, हमारे समाज को लेकर कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं । क्या इन बहनों की हालत के लिए हम और आप जिम्मेदार नहीं है । एक बहन की मौत खुदकुशी नहीं बल्कि हत्या है । समाज की संवेदनाशून्यता ने उनकी हत्या कर दी । सवाल यह उठ खड़ा होता है कि हम और आप इतने संवेदनहीन क्यों हो गए हैं । क्यों समाज और आस पड़ोस को लेकर हमारी संवेदनाएं मर गई हैं । वसुधैव कुटुम्बकम की हमारी परंपरा से हम इतने दूर क्यों चले गए हैं । इन सवालों का जबाव ढूंढने की अगर हम कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि महानगर की भागदौड़ की जिंदगी और पैसा कमाने की हवस ने हमको ना केवल संवेदनशून्य बना दिया बल्कि हम स्वकेंद्रित भी होते चले गए । इस आपाधापी में हमारा परिवार और हमारा समाज हमसे दूर होता चला गया । हम महानगर की भाग दौड़ की जिंदगी में अपने को स्थापित करने की होड़ में इतने डूब गए कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह चुराने लगे । पश्चिमी सभ्यता के आक्रमण और उसके बाद उसके अंधानुकरण ने हमसे हमारे समाज को अलग कर दिया । नतीजा यह हुआ कि महानगरों में न्यूक्लियर फैमिली की अवधारणा को बल मिलता चला गया है । मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे की अवधारणा ने परिवार के बाकी बचे लोगों को अलग-थलग कर दिया । इस अलगाव की वजह से परिवार के अन्य लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा होती गई । इस असुरक्षा की भावना ने उनको डिप्रेशन का शिकार बना दिया जिससे वो मनोरोग के शिकार होते चले गए । हाल ही में एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली में सिर्फ दस फीसदी लोग संयुक्त परिवार में रहते हैं जबकि 76 फीसदी लोग एकल परिवार का हिस्सा हैं । इस एकाकीपन का जो खौफ होता है, अपने परिवार से अलग होने या रहने का जो एक अजीब अनुभूति होती है जिसे हर कोई वयक्त नहीं कर पाता है, अंदर ही अंदर घुटते रहने से और अपनी भावनाओं को जज्ब करने से मानसिक रोगी होने का खतरा बढ़ जाता है। महानगरों में एकल परिवार की अवधारणा को बढावा देने के दो अहम कारण हैं- पहला तो काम करने या फिर पढ़ाई लिखाई के जगह का दूर होना और दूसरा परिवार में पर्सनल स्पेस की कमी । अभी कुछ दिनों पहले इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के तीन महानगरों में कराए गए सर्वे का नतीजा भी बेहद हैरान करनेवाला है । आईसीएमआर के उस सर्वे के मुताबिक दिल्ली में रहनेवाले आठ प्रतिशत लोग तनाव के शिकार हैं जबकि चंडीगढ़ और पुणे में स्थिति थोड़ी सी बेहतर है जबकि चेन्नई में हालात बेहद खराब हैं और वहां तकरीबन सोलह फीसदी लोग मानसिक रोगी हैं । अगर हम पूरे देश पर नजर डालें तो तकरीबन सवा करोड़ लोग किसी ना किसी तरह के मानसिक रोग के शिकार हैं । सिर्फ दिल्ली में ही दो हजार एक के मुकाबले दो हजार दस में मानसिक रोगियों की संख्या में छह फीसदी का इजाफा हुआ है । यहां हमें यह याद रखना होगा कि इसी दस साल में देश ने आधुनिकता का दामन कसकर पकड़ा और उन्मुक्त अर्थवयवस्था ने देश में अपने पांव पसारे । इसके अलावा अगर हम इंडियम साइकेट्रिक सोसाइटी की सालाना रिपोर्ट पर गौर करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि एकांत अवसाद का प्रमुख कारक है और तकरीबन पचपन फीसदी लोगों की सामाजिक भागीदारी नग्णय है । इसमें ज्यादातर वो लोग हैं जो अन्य शहरों या सूबों से नौकरी की तलाश में यहां आए और अपना कोई समाज नहीं बना पाए । सामाजिक सहभागिता कम होने की वजह से लोग अवसाद के शिकार होते चले गए । अगर मनोचिकित्सकों की मानें तो सामाजिक या पारिवारिक या फिर आर्थिक असुरक्षा बोध में महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा जल्दी डिप्रेशन की शिकार हो जाती हैं और अकेलापन इस डिप्रेशन को और बढ़ा देता है । महिलाओं के अलावा महानगरों में बुजुर्गों में भी असुरक्षा का बोध ज्यादा होता है । अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर योग्य बनाने के बाद उनके बच्चे उन्हें ही छोड़ जाते हैं । कई परिवारों के साथ तो यह भी देखने को मिलता है कि बेटे-बहू एक ही शहर में अलग रहते हैं और बुजुर्ग मां-बाप भी उसी शहर में अलग मकान में रहते हैं । मां-बाप को उम्र के उस मुकाम पर जब अपने औलाद के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तभी वो अलग हो जाते हैं । इसल अलगाव से जो मानसिक तनाव या फिर बच्चों की संवेदनहीनता से एकाकीपन का जो गहरा एहसास होता है वो उन्हें अंदर से तोड़ देता है जिसकी भरपाई ताउम्र नहीं हो पाती है। नोएडा में दोनों बहनों की इस घटना ने हमारे समाज को एक बार फिर से झकझोर दिया है और यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि महानगरों की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में एकाकी से बढ़ रहे अवसाद या फिर डिप्रेशन को कैसे रोका जाए ।

Friday, April 15, 2011

जश्न में दबे बड़े सवाल

चार दिनों से दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल को लेकर जारी आमरण अनशन खत्म हो गया । अन्ना के अनशन और देशभर में उसको मिल रहे अपार जनसमर्थन को देखकर सरकार के हाथ पांव फूल गए । भारत सरकार के कर्ता-धर्ता और वरिष्ठ मंत्रियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद अन्ना की सभी मांगे मान ली गई । चार दिन तक चले एक व्यक्ति के आंदोलन ने भारत सरकार को जनता की भावनाओं को समझने और अन्ना की मांग मानने के लिए मजबूर कर दिया । दो दिन पहले जिस सरकार की एक वरिष्ठ मंत्री अंबिका सोनी दहाड़ते हुए बयान दे रही थी कि चंद मुट्ठी भर लोगों के दबाव में सरकार झुकने वाली नहीं है । उन्हीं चंद मुट्ठीभर लोगों ने सरकार से अपनी सभी मांगे मनवा ली । अन्ना के आह्वान पर देशभर में जिस तरह से हर वर्ग के लोग स्वत:स्फूर्त घर से बाहर आंदोलन के लिए निकले वो इस अनशन की सबसे बड़ी उपलब्धि है । वैश्वीकरण के इस दौर में कई विद्वानों की राय थी कि जिस तरह से देश का नया मध्यवर्ग बाजार के प्रभाव में है उसमें वो सिर्फ अपने बारे में सोचती है और उनके सामाजिक सरोकार खत्म हो गए हैं । आम जनता से जनआंदोलन की अपेक्षा करने की तो वो सोच भी नहीं सकते थे । नतीजा यह हुआ कि देश के नेताओं के मन में जनादेश को लेकर जो आदर होना चाहिए था वो खत्म होने लगा था । जनता का डर कम होने के इस भाव से नेताओं के मन में यह बैठ गया कि वो कुछ भी करके बेदाग निकल सकते हैं । जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों-करोड़ों रुपए डकार कर भी वो मजे में रह सकते हैं । उनके मन से जनता का डर और आमजन के प्रति आदर का भाव खत्म होने लगा था जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत था । लेकिन अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि अगर कोई विश्वसनीय व्यक्ति जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर खड़ा होता है तो देश की जनता का ना केवल उसे समर्थन मिलता है बल्कि देश के हर तबके का आदमी उसकी एक आवाज पर घर से निकल कर उसके कदम से कदम मिलाकर सरकार से लोहा लेने तो भी तैयार हो जाते हैं । अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से देश के नेताओं में जनता के लिए आदर और जनता का डर कायम कर दिया । अन्ना का अनशन खत्म हो गया देशभर में अभी जीत का जश्न मनाया जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जंग जीत ली है । दरअसल पूरा भारतीय मानस जो है वो बेहद इमोशनल है, एक छोटी सी उपलब्धि में भी वह मानस जश्न में डूब जाता है । लेकिन जीत के इस जस्न के बीच कई सवाल भी मुंह बाए खड़े हो गए हैं । सबसे पहला और बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अन्ना के इस अनशन से हासिल क्या हुआ । अगर हम उपरी तौर पर देखें तो लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता को बड़ी जीत और कामयाबी हासिल हुई है । देश में इस तरह का एक वातावरण बन गया है जिसमें आम जनता को लगने लगा है कि लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बडा़ हथियार होने जा रहा है जिसे भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का वध संभव हो सकेगा । लेकिन क्या सचमुच ऐसा संभव हो पाएगा । अगर कुछ देर के लिए यह मान लिया जाए कि जनदबाव में प्रधानमंत्री, मंत्री और देश के आला अफसर लोकपाल के दायरे में आ जाते हैं और लोकपाल को किसी को मुजरिम करार देकर सजा देने का अधिकार भी दे दिया जाता है तो क्या इससे भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा । अगर यह भी मान लिया जाए कि माथापच्ची के बाद बिल ोक कानूनी जामा पहना कर लागू कर दिया जाता है । तो क्या सिर्फ कानून बना देने भर से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा । लेकिन सिर्फ कानून बना देने भर से जुर्म कम नहीं होता । जरूरत होती है कानून को सही तरीके से लागू करने की और ऐसा वातावरण तैयार करने की जिसमें मुजरिमों के मन में कानून का भय पैदा हो जाए । भ्रष्टाचार से निबटने के लिए हमारे देश में पहले से प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट है । उसमें भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कई सख्त प्रावधान हैं तो कई खामियां भी हैं । जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए एक नया कानून बनाने के बजाए वर्तमान में लागू कानून की कमियों को दूर किया जाए । जैसे अफसरों या मंत्रियों को आरोपी बनाने के पहले जो इजाजत लेने का प्रावधान है उसको खत्म किया जाना चाहिए । वर्तमान कानून में स्पेशल जज से सुनवाई का प्रावधान है लेकिन बहुधा ऐसा हो नहीं पाता है । जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जाए और दोषी को जल्द से जल्द सजा दिलवाया जाए । एक और अहम सवाल उठता है कि क्या इसती आसानी से लोकपाल को इतने तरह के अधिकार दे दिए जा सकते हैं । देश के मौजूदा कानून और संवैधानिक संस्थाओं को संविधान से मिले अधिकारों के मद्देनजर यह इतना आसान नहीं है । इसमें कई संवैधानिक अड़चनें आएंगी – ड्राफ्ट कमिटी का गठन जितनी आसानी से नोटिफाई हो गया है प्रस्तावित बिल का मसौदा बनाने में उतनी ही दिक्कतें आएंगी । लोकपाल बिल के कानून बनने के बाद भी हर आरोपी के पास राइट टू अपील तो होगा ही । किसी भी तरह के कानून से अपील के इस अधिकार को ना तो खत्म किया जा सकता है और ना ही ऐसा किया जाना चाहिए । क्योंकि अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक बात होगी । राइट टू अपील आरोपी के हाथ एक ऐसा अधिकार है जिसका इस्तेमाल करके वो लंबे समय तक खुला घूम सकता है, संसद और विधानसभा का सदस्य बन सकता है । देश का कोई भी कानून आरोपी को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता है । एक अजीब विडंबना और भी है कि अगर कोई संसद सदस्य या मंत्री या विधानसभा का सदस्य किसी जुर्म में दोषी भी करार दे दिया जाता है तो उसकी सदस्यता खत्म नहीं होती है और सिर्फ आरोपी है तो वह ठाठ से लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का सम्मानित सदस्य बना रह सकता है । जरूरत इस बात की है कि इस तरह के कानूनों में संशोधन किया जाए । अगर भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी है तो न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने और मुकदमों के जल्द से जल्द निबटारे की आवश्यकता है, जिसकी ओर अन्ना को ध्यान देना चाहिए था । इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेहद अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है । वहां के अपराधियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाकर जल्द से जल्द मुकदमे का निबटारा करवाया और मुजरिमों को सजा मिली । नतीजा यह हुआ कि सूब में लोगों के मन में कानून के प्रति एक विश्वास जगा और अपराधियों के मन में कानून का भय । अंत में एक बात और कि अन्ना को इस अनशन के दौरान कई उत्साही लोगों ने छोटे गांधी कह डाला लेकिन गांधी और अन्ना में बुनियादी अंतर है । गांधी हमेशा व्यक्ति में बदलाव की बात करते थे और अन्ना संस्थागत बदलाव की बात करते हैं । गांधी हमेशा आदर्श स्थिति और रामराज्य की कल्पना करते थे । उनका मानना था कि लोगों का मन इतना साफ हो कि वो भ्रष्टाचारी बनें ही ना जबकि अन्ना हजारे कानून बनाकर उसे रोकने की बात करते हैं ।गांधी का लक्ष्य और आदर्श दोनों बेहद बड़े थे । इसलिए गांधी से अन्ना की तुलना बेमानी है । लेकिन उत्साह में बहुधा तुलना में गलती हो जाती है

Thursday, April 14, 2011

सवालों के घेरे में ललित कला अकादमी

क्रिकेट के विश्वकप के शोरगुल में एक अहम घटना दब कर रह गई । यह एक ऐसी घटना है जो सरकार पोषित संस्था के कार्यकलापों पर सवालिया निशान खड़ा करती है । मैं बात कर रहा हूं ललित कला अकादमी की जिसके अध्यक्ष हिंदी के वरिष्ठ कवि, आलोचक और कला प्रेमी अशोक वाजपेयी हैं । सवाल इस लिए खड़े हो रहे हैं कि एक मशहूर चित्रकार डॉक्टर प्रणब प्रकाश ने अकादमी पर मनमानी का आरोप लगाया है । प्रणब प्रकाश का आरोप है कि उसने अरुंधति की एक न्यूड पेंटिग बनाई जिसकी वजह से ललित कला अकादमी ने उसकी पेंटिंग प्रदर्शनी की इजाजत नहीं दी । प्रणब का कहना है कि ललित कला अकादमी के अधिकारियों ने उन्हें मौखिक रूप से इस प्रदर्शनी की इजाजत दे दी थी और दो मार्च को उन्हें अकादमी के दफ्तर में आकर पैसे जमाकर प्रदर्शनी लगाने का आदेश पत्र लेने के लिए बुलाया गया था । लेकिन जब वो दो मार्च को अकादमी के दफ्तर में पहुंचे तो उन्हें मना कर दिया गया । पहले तो यह बताया गया कि उन्हें प्रदर्शनी के लिए गैलरी नहीं मिल सकती है क्योंकि बांग्लादेश के कुछ कलाकार उन्हीं तारीख को अपनी पेंटिग्स की नुमाइश करना चाहते हैं । लेकिन प्रणब प्रकाश का आरोप है कि जब उन्होंने कहा कि अगर बांग्लादेश के चित्रकारों की प्रदर्शनी उन्हीं तारीखों में लगनी थी तो पहले ही अनुरोध आया होगा ऐसे में उन्हें क्यों बुलाया गया । इस बात पर अकादमी के उपसचिव ने गैलरी के एसी खराब होने की बात बताई, साथ ही उन्हें इशारों-इशारों में यह भी बता दिया गया कि सचिव और अकादमी के आला अफसर उनके अरुंधति के न्यूड पेंटिग से खफा हैं और इस वजह से उनको प्रदर्शनी की इजाजत नहीं दी जा सकती है । हलांकि ललित कला अकादमी के सचिव सुधाकर शर्मा का कहना है कि प्रणब प्रकाश को कभी प्रदर्शनी की इजाजत दी ही नहीं गई थी, लिहाजा मनमानी का कोई सवाल ही नहीं उठता है । उन्होंने तो यह भी कहा कि अगर प्रणब प्रकाश के पास ललित कला अकादमी से किसी भी तरह का कोई पत्र व्यवहार हुआ हो या अकादमी ने हामी भरी हो तो वो फैरन दिखाएं । अगर ऐसा होता है तो सुधाकर शर्मा अपने अधिकारियों के खिलाफ जांच की बात भी करते हैं । दरअसल यह पूरा विवाद है बड़ा ही दिलचस्प । पढ़ाई से डॉक्टर, पेशे से शिक्षक और अपनी पेंटिग्स के जरिए मशहूर हुए प्रणब प्रकाश ने एक बेहद ही विवादास्पद पेंटिग बनाई जिसका शीर्षक दिया – गॉडेस ऑफ फिफ्टीन मिनट्स ऑफ फेम । इस पेंटिंग का नाम भी अरुंधति की मशहूर किताब गॉड ऑफ स्माल थिंग्स से ही उठाया गया है । इस विवादास्पद पेंटिंग में प्रणब प्रकाश ने लेखिका अरुंधति राय को न्यूड तो पेंट किया ही साथ ही एक ही बिस्तर पर उन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन और चीन के नेता माओ के साथ दिखाया । प्रणब ने अपनी इस पेंटिग में बेहद चटख रंगों का इस्तेमाल करके अपने विरोध को मुखरता के साथ चित्रित किया है । प्रणब का कहना है कि अरुंधति एक बेहद प्रचार प्रिय लेखिका और तथाकथित समाजसेवी हैं जो प्रचार के लिए एक तरफ तो नक्सलियों के पक्ष में खड़ा होती हैं दूसरी तरफ कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ भी अपनी एकजुटता दिखाती हैं । प्रणब प्रकाश के इस पेंटिंग्स के बाद तो भूचाल आ गया । कई वामपंथी लेखकों और विचारकों और कलाकारों ने इसे घोर आपत्तिजनक माना और उसको प्रचार का हथकंडा करार दिया । अरुंधित के न्यूड पेंटिंग पर आपत्ति जताते हुए उक्त पेंटिग को वयक्ति विशेष की निजता का हनन और अभिवयक्ति की आजादी का दुरुपयोग करार दिया गया । उन्होंने इसे एक लेखक का अपमान बताते हुए इस तरह की चीजों को गैरजरूरी बताया । अभिवयक्ति की आजादी के बेजा इस्तेमाल पर शोर मचाने वाले यही लोग तब एम एफ हुसैन का समर्थन कर रहे थे जब उन्होंने सरस्वती, दुर्गा और सीता की आपत्तिजनक तस्वीरें बनाई थी । दरअसल मुझे लगता है कि प्रणब प्रकाश तो एस एफ हुसैन के दिखाए रास्ते पर ही चलने की कोशिश कर रहे हैं । एक बार हुसैन साहब ने भी आइंस्टीन, हिटलर और गांधी की तस्वीर बनाई थी जिसमें उन्होंने हिटलर को नंगा दिखाया था । जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने तीनों में सिर्फ हिटलर को उन्होंने नंगा पेंट किया तो एम एफ हुसैन ने जवाब दिया था कि किसी को अपमानित करने का यह उनका अपना तरीका है । और प्रणब प्रकाश बी यही कर रहे हैं । खैर यह एक अलग और अवांतर प्रसंग है जिसपर मैंने चौथी दुनिया के अपने इसी स्तंभ में कई लेख लिखे हैं । अब यहां सवाल यह उठता है कि प्रणब प्रकाश की पेंटिंग्स पर विवाद हो सकता है लेकिन क्या ललित कला अकादमी को किसी भी पेंटर के प्रदर्शनी को रोकने की इजाजत दी जा सकती है । ललित कला अकादमी देश की शीर्ष संस्था है जिसपर देश और विदेश में भारतीय कला को प्रोत्साहित करने और प्रचार प्रसार की महती जिम्मेदारी है । अगर यह संस्था किसी चित्रकार को उसके चित्रों के आधार पर दरकिनार करता है तो यह उसके घोषित उद्देश्य से भटकने जैसा होगा । ललित कला अकादमी पर इस तरह के आरोप पहले भी लग चुके हैं । कुछ दिनों पहले कार्टूनिस्ट इरफान ने भी अकादमी पर आखिरी वक्त पर प्रदर्शनी के लिए गैलरी देने से इंकार करने का इल्जाम लगाया था । उनका आरोप था कि चूंकि उनकी प्रदर्शनी का उद्घाटन बीजेपी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी को करना था इस वजह से उसको जगह देने से मना कर दिया गया । बाद में वह प्रदर्शनी प्रेस क्लब ऑप इंडिया में लगाई गई थी । तब भी अकादमी की तरफ से यही बताया गया था कि इरफान को इजाजत नहीं दी गई थी । अगर एक ही तरह के आरोप कई लोग लगाते हैं तो ललित कला अकादमी की कार्यप्रणाली के बारे में उसके कर्ताधर्ताओं को सोचना चाहिए । किसी विचारधारा विशे, से ताल्लुक रखनेवाले कलाकार पर पाबंदी लगाकर तो सिर्फ फासीवाद का उदाहरण ही प्रस्तुत किया जा सकता है । लोकतंत्र में इस तरह से विचारधारा पर पाबंदी लगाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है । इस तरह के काम वामपंथी प्रभाव वाले संस्थानों में जमकर हुआ है । जबतर वामपंथ का जोर रहा राष्ट्रवादी विचारधारा या फिर उनका विरोध करनेवाले को भगवा विचारधारा का पोषक करार देकर अछूत जैसा व्यवहार किया जाता रहा । इस बात को ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी से बेहतर कोई नहीं समझ सकता । अशोक वाजपेयी पर भी कलावादी कहकर जाने कितने हमले हुए । लेकिन अंतत बचता है तो लेखन और कला ही । अगर अशोक वाजपेयी के ललित कला अकादमी का अध्यक्ष रहते हुए कलाकारों के साथ उनकी विचारधारा के आधार पर भेदभाव किया जाता है, पावंदियां लगाई जाती हैं तो यह हिंदी जगत को किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा । ललित कला अकादमी पर इस तरह के आरोप से बचाने के महती जिम्मेदारी उसके अध्यक्ष अशोक वाजपेयी पर है और पूरे देश को उनसे वस्तुनिष्ठता की उम्मीद है ।

Saturday, April 9, 2011

निराशा का संपादकीय

पिछले पच्चीस साल से राजेन्द्र यादव के संपादन में प्रकाशित हंस का संपादकीय होता है- मेरी तेरी उसकी बात । मैं पिछले पच्चसी साल से तो नहीं लेकिन सत्तरह अठारह साल से नियमित राजेन्द्र जी का संपादकीय पढ़ता रहा हूं । मुझे यह कहने या मानने में कोई संकोच नहीं है कि हंस के संपादकीय ने मुझे चीजों को देखने समझने की एक अलग दृष्टि दी । राजेन्द्र यादव का संपदकीय बहुधा उर्जा से लबरेज और व्यवस्था से लड़ने भिड़ने पर उतारू या सामाजिक रूढियों पर चोट करता हुआ रहता था । यादव जी की तीखी भाषा और तर्क गढ़ने की शक्ति का कायल हो गया था । कई बार हंस संपादक से उनके संपादकीय में प्रकट किए गए विचारों को लेकर असहमतियां भी रही जो लिखकर या फिर मौखिक दर्ज करवाई । लोग संपादकीय के बारे में बेशक अनाप शनाप बोलते रहे हों, कई नामवर लोग तो -मेरी तेरी उसकी बात- को कूड़े की बात कहकर मजाक भी उड़ाते रहे हैं लेकिन अगर ईमानदारी से कहूं तो मुझे उनका संपादकीय हमेशा से विचारोत्तेजक लगता रहा है । अभी पिछले दो तीन अंकों का संपादकीय बेहद अच्छा था,पसंद इसलिए आ रहा था क्योंकि कम डिप्लोमैटिक था । साफ बातें हमेशा से लोगों को पसंद आती हैं, मुझे भी । लेकिन फरवरी अंक का संपादकीय पढ़कर मुझे जाने क्यों बेहद कोफ्त हुई । मैं उनको पत्र लिखना चाह रहा था लेकिन अपनी व्यस्तताओं की वजह से लिख नहीं पाया । लेकिन अगले ही अंक में संपादकीय की भूल-गलतियों पर साधना अग्रवाल का एक लंबा पत्र और राजेन्द्र यादव का खेद भी प्रकाशित है । लेकिन वो तो तथ्यात्मक भूल की बातें थी लेकिन फरवरी अंक के संपादकीय से जो निराशा का भाव सामने आता है वो ना केवल चिंता जनक है बल्कि उस निराशा के अंधकार में यादव जी इतना डूब जाते हैं कि उन्हें पूरी दुनिया, समाज का हर तबका(लेखक को छोड़कर) भ्रष्ट और टुच्चा नजर आता है । उनके संपादकीय को देखिए- “घूस, घोटालों और घपलों का एक साल (2010) बीत गया, शायद यह साल स्वतंत्र भारत के सबसे काले दिनों के रूप में याद किया जाएगा, जहां निरंकुश सत्ता भारतीय संविधान से कारपोरेट हाउसों ने छीन ली और देश के सारे शक्ति स्तंभ चरमरा कर ढह गए हैं । पांचवां स्तंभ यानी मीडिया या तो पेड न्यूज के हाथों बिक गया है या नीरा राडिया जैसों के माध्यम से दोनों हाथों से दलाली खा रहा है ।“ यादव जी के इस संपादकीय ने मीडिया को लोकतंत्र में एक पायदान नीचे ठेल दिया अब तक चौथा स्तंभ माना जाता था लेकिन राजेन्द्र जी ने इसे पांचवा स्तंभ करार दिया । निराशा के घोर आलम में राजेन्द्र यादव जी ने पूरी मीडिया को बिका हुआ या दलाल करार दे दिया । यादव जी जैसे जिम्मेदार और बुजुर्ग लेखक से इस तरह की फतवेबाजी की उम्मीद नहीं की जा सकती है । अगर किसी एक दो अखबार में पेड न्यूज छप रहा है या फिर कुल जमा चार पत्रकारों के नीरा राडिया से संवंध सामने आए हैं वैसे में पूरी मीडिया को दलाल कहना गैरजरूरी ही नहीं गैर जिम्मेदाराना भी है । यादव जी जैसे सम्मानित लोगों को इस तरह के स्वीपिंग रिमार्क से बचना चाहिए । उन्हें शायद इस बात का एहसास होगा कि लोग उनकी बात सुनते हैं, उनके कहे का समाज पर असर पड़ता है । इसलिए अगर वो कोई बात कहते हैं तो उसमें सब्सटैंस होना चाहिए । लेकिन वो तो एक डंडा लेकर निकल पड़े हैं और उससे ही सभी को हांकने पर आमादा हैं । मीडिया पर यहीं नहीं रुकते उसी में आगे कहते हैं – देश की राजधानी में हर रोज दर्जनों हत्याएं, बलात्कार और लूट-पाट की घटनाएं आम हो चुकी हैं – गरीबी अमीरी के बीच की खाई अपराधों और हत्याओं से पाटी जा रही है । गरीब और वंचित आदमी आखिर कब तक उपर वालों की हजारों-लाखों करोड़ की हेर-फेर को चुपचाप बैठा देखता रहे ? टीवी चैनलों और अखबारों के पास इन सनसनीखेज खबरों के सिवा परोसने को कुछ नहीं बचा है । वे इन्हें ही कूट पीस रहे हैं । गांव और गरीबी का वहां कोई नामोनिशान नहीं रह गया है । यहां भी यादव जी का संपादकीय समान्यीकरण के दोष का शिकार हो गया है । यादव जी जिन घपलों –घोटालों की बात कर रहें हैं उसे किसने उजागर किया । जिस एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टेलीकॉम घोटाले में पूर्व मंत्री ए राजा जेसल में हैं उसका पर्दाफाश किसने किया । क्या एक अखबार के रिपोर्टर ने आजाद भारत के इस सबसे बड़े घोटाले का पर्दाफाश नहीं किया । क्या कमजोर के हक की लडाई मीडिया नहीं लड़ता है । क्या यादव जी जेसिका के इंसाफ की लड़ाई भूल गए या फिर प्रियदर्शिनी मट्टू कांड में मीडिया की सामाजिक भूमिका को भुला दिया या फिर अभी अभी दिल्ली के एक कॉलेज की लड़की राधिका की सरेआम हत्या पर मीडिया ने सरकार और पुलिस पर दबाव नहीं बनाया । यह फेहरिश्त बड़ी लंबी है । लेकिन यादव जी देखना चाहें तब तो उन्होंने तो पहले से ही तय कर लिया है कि सबका नाश करना है और फिर उसपर पिल पड़े । लेकिन जब आप सामान्यीकरण की बीमारी से ग्रस्त होते हैं तो आप सिर्फ वही देख सकते हैं जो आप देखना चाहते हैं । आगे अपने संपादकीय में यादव जी अपने पसंदीदा विषय नक्सली और उसके हमदर्द विनायक सेन पर पहुंचते हैं और टिप्पणी करते हैं – उधर काश्मीर, असम और महाराष्ट्र में रोज बंद होते हैं । घर बसें और सार्वजनिक संपत्तियां फूंकी जाती हैं । गोली लाठी पत्थर चलाए जाते हैं ऐसे में आदिवासियों, किसानों के हितों के लिए लड़नेवाले माओवादी, नक्सली देश के दुश्मन नंबर वन घोषित ही नहीं किए जाते, फौजों और हवाई जहाजों से वहां शांति स्थापित की जाती है । भगवान जाने किसने माओवादियों को देश का दुश्मन नंबर वन घोषित किया है लेकिन यादव जी इतना तो तय मानिए कि जिसे आप आदिवासियों और किसानों के हितों के लिए लड़नेवाला नक्सली और माओवादी बता रहे हैं वो अब सिर्फ अपने हित की सोचते हैं । अब वो अपराधी बन चुके हैं । अब वो फिरौती के लिए अपहरण करते हैं और धन नहीं मिलने पर मासूमों को जान से मार डालते हैं । किसानों के हितों की आड़ में अपराध का नंगा खेल खेला जा रहा है । उससे भी चिंता की बात है कि उनका संपर्क आतंकवादी और अलगाववादी संगठनों से होने लगा है । लेकिन यादव जी आप जिस लाल चश्मे से नक्सलियों को देखते हैं उससे तो वो किसानों और गरीबों के हितों का रक्षक ही नजर आएगा । जरा आंखों से लाल चश्मा हटाकर देखिए आपको अपराध की काली दुनिया नजर आएगी । जिस बिनायक सेन को आप गरीबों का चिकित्सक बता रहे हैं वो देशद्रोह की सजा काट रहे हैं । देश के तमाम नामी गिरामी वकीलों और गैर सरकारी संस्थाओं का पैसा भी बिनायक सेन को हाईकोर्ट से जमानत नहीं दिलवा सका । आपलोगों का तर्क होगा कि अदालत भी तो राज्य सत्ता का एक अंग ही होता है । देश की न्यायपालिका पर भी आपका भरोसा नहीं रहा । आपने लिखा- न्यायपालिकाएं खुलेआम अपने फैसले अपराधी के पक्ष में बेच रही हैं । यहां भी जनरलाइजेशन । अगर हमारी न्यायपालिका अपने फैसले बेच रही होती तो विदेशों से आर्थिक मदद पानेवाली देशी एनजीओ बिनायक सेन के लिए फैसला खरीद चुकी होती । लेकिन यकीन मानिए यादव जी हमारी देश की न्यायपालिका आपको अवस्य बिकी हुई नजर आ रही हो लेकिन एक दो अपवादों को छोड़कर, कमोबेश ईमानदार है । राजेन्द्र जी के अपने इस छाती पीट रंडी रोना पर क्षमा मांगते हुए भविष्य को और काला देख रहे हैं । लेकिन असलियत में यादव जी जितना काला देख पा रहे हैं उतना है नहीं । समाज के हर क्षेत्र में गड़बड़ लोग हैं, गड़बड़ियां भी हो रही है लेकिन उससे ज्यादा अच्छा काम भी हो रहा है । जरूरत है कि हम अपने अप्रोच और आउटलुक में पॉजेटिव हों । अगर इतना हो गया तो यकीन मानिए यादव जी की निराशा की काली छाया भी छंट जाएगी ।

Monday, March 21, 2011

संगीन इल्जाम, लचर दलील

भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से चौतरफा घिरी मनमोहन सरकार के लिए विकिलीक्स के खुलासे के बाद मुश्किलें और बढ़ गई हैं । मनमोहन सिंह की सरकार की साख पर लगातार लग रहे बट्टे ने प्रधानमंत्री की छवि को कमजोर किया है । यूपीए वन के दौरान जिस तरह से न्यूक्लियर डील पर सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त का खुलासा हुआ है, उसके बारे में उस वक्त भी काफी चर्चा हुई थी और जांच वगैरह भी हुई थी । लेकिन ताजा खुलासे ने विपक्ष को सरकार पर एक बार फिर हमला करने का मौका दे दिया । खुलासे पर फजीहत होते देख पहले सरकार के कद्दावर मंत्री और संकटमोचक प्रणब मुखर्जी ने मोर्चा संभाला । संसद में विपक्ष के हमलावर तेवर पर पलटवार करते हुए वित्त मंत्री ने यह कहकर विपक्ष के आरोपों की हवा निकालने की कोशिश की यह पूरा मामला चौदहवीं लोकसभा का है और पंद्रहवीं लोकसभा पिछली लोकसभा में हुई घटनाओं पर विचार नहीं कर सकती । इतने संगीन इल्जाम पर सरकार की ओर से वित्त मंत्री और कानून, संसदीय परंपरा और सरकारी नियमों के चलते फिरते इंसाइक्लोपीडिया माने जानेवाले प्रणब मुखर्जी ने बेहद हल्की बात करके पूरे देश को चौंका दिया । प्रणब मुखर्जी की याददाश्त का लोहा पूरा देश मानता है । क्या प्रणब मुखर्जी यह भूल गए कि जब इमरजेंसी के खत्म होने के बाद हुए चुनाव के बाद सातवीं लोकसभा का गठन हुआ थो तो सदन ने इंदिरा गांधी को उसके पहले के लोकसभा के दौरान उनके किए कार्यों पर कार्रवाई की थी । उस वक्त इंदिरा गांधी के निकट सहयोगी रहे प्रणब दा क्या यह भी भूल गए कि जब जनता सरकार के पतन के बाद उन्नीस सौ अस्सी में इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आई और आठवीं लोकसभा का गठन हुआ तो उसने फिर से पिछली लोकसभा के इंदिरा गांधी के मुतल्लिक लिए गए फैसलों को पलट दिया था । इन दोनों उदाहरणों से यह साबित होता है कि सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक से चूक हो गई । क्या प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस पार्टी कुछ ही दिन पहले लिए गए सरकार के निर्णय को ही भूल गई । कुछ ही दिन पहले सरकार ने टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय दल का गठन किया है जो पिछली लोकसभा के दौरान लिए गए निर्णयों को कसौटी पर कसेगा । इन आधारहीन तर्कों को खारिज करते हुए विपक्ष ने सरकार पर अपना हमला जारी रखा और प्रधानमंत्री से सदन में बयान देने का दबाव बढ़ा दिया । नतीजे में प्रधानमंत्री को संसद में बयान देना पड़ा ।
आक्रमण सबसे अच्छा बचाव की तर्ज पर प्रधानमंत्री ने संसद के दोनों सदनों में बयान दिया । अपनी सरकार और पार्टी का जोरदार बचाव करते हुए प्रधानमंत्री ने नोट के बदले वोट के आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर तीखा प्रहार किया । मनमोहन सिंह ने अपनी पिछली सरकार को बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए विपक्ष को यह कहते हुए आईना दिखाने की कोशिश की कि जनता ने आमचुनाव में विपक्ष के इन आरोपों को तवज्जो नहीं दी । कांग्रेस पार्टी को पिछले आमचुनाव में 2004 के चुनाव के मुकाबले ज्यादा सीटें मिली । प्रधानमंत्री मनमोहमन सिंह ने संसद में दिए अपने बयान में बीजेपी और वामदलों को चुनाव में मिली कम सीटें भी गिना दीं । मनमोहन सिंह ने यह तर्क दिया कि विपक्ष जनता द्वारा नकारे गए आरोपों को फिर से हवा देकर बेवजह सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है । अपने वित्त मंत्री की राह पर चलते हुए प्रधानमंत्री ने भी बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया । क्या चुनाव जीत जाने से सारे आरोप और जुर्म खारिज हो जाते हैं । क्या सही गलत का फैसला जनता की अदालत में ही हुआ करेगी, क्या अब जांच एजेंसी और जांच कमेटियां बेमानी हो जाएंगी ।
अगर प्रधानमंत्री के इन बयानों को मान लिया जाए तो तमाम अपराधी और गुंडे जो विधायक या सांसद बन जाते हैं उनके जुर्म चुनाव जीतते ही खत्म हो जाते हैं । इस तर्क के आधार पर बिहार के बाहुबली सांसद रहे शाहबुद्दीन के तमाम जुर्म गलत हैं क्योंकि अदालत द्वारा मुजरिम करार दिए जाने और कोर्ट से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के पहले तो शाहबुद्दीन को जनता लगातार चुनकर लोकसभा में भेजती रही थी । क्या अपने बयान से प्रधानमंत्री यह संदेश देना चाह रहे हैं कि आप चाहें जितना भी बड़ा अपराध करें अगर जनता ने आपको चुन लिया है तो आपके सारे पाप धुल जाते हैं । क्या प्रधानमंत्री अपने इस बयान से डीएमके के नेताओं को यह संदेश देना चाह रहे हैं कि ए राजा पर चाहे एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टेलीकॉम घोटाले का आरोप लगा हो लेकिन अगर वो फिर से चुनाव जीत जाते हैं तो सारे आरोप खारिज हो जाएंगे । देश के शीर्ष पद पर बैठा एक जिम्मेदार व्यक्ति अगर देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस तरह का गैर जिम्मेदाराना बयान देता है तो लोकतंत्र के लिए बेहद चिंता की बात है । चिंता इस बात को लेकर भी होती है कि जिसके हाथ में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाने और उसकी गरिमा को बचाने की जिम्मेदारी है वह लोकतंत्र और जनता के समर्थन को ही घोटालों से बचने की ढाल बना रहा है । संसद में प्रधानमंत्री के उक्त बयान को कांग्रेस के लोग बेहद आक्रामक और हमलावर बयान करार देकर खुद की पीठ थपथपा रहे हैं । आक्रामक दिखने वाले उक्त बयान में ना तो गंभीरता है और ना ही दम ।
जिस तरह की लचर दलील और जनता के समर्थन की आड़ लेकर प्रधनामंत्री मनमोहन सिंह ने नोट के बदले वोट के आरोपों को नकारनेवाला बयान दिया है उसी से मिलता जुलता बयान लंदन में भारत के हाई कमिश्नर रहे बी के नेहरू ने भी दिया था । जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनावी गड़बड़ियों के आधार पर खारिज कर दिया था, तब बी के नेहरू ने कहा था कि अदालत के इस फैसले से इंदिरा गांधी के राजनीतिक भविष्य पर कोई असर नहीं पड़नेवाला है । श्रीमती गांधी को अब भी देश की जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल है और मुझे लगता है कि भारत के प्रधानमंत्री को उस वक्त तक अपने पद पर बने रहना चाहिए जब तक कि जनादेश उनके खिलाफ ना हो । उस वक्त इंदिरा गांधी के चमचों ने उन्हें देश में इमरजेंसी लगाने की सलाह दी थी और पद छोड़ने के भयानक दबाव में श्रीमती गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा थी । उसके बाद क्या हुआ यह इतिहास है । अब वक्त आ गया है कि सरकार देश को गुमराह करना छोड़े, जनता की आड़ लेकर लोकतंत्र को कमजोर करनेवालों लोगों की इमानदारी से पहचान की जाए और उन्हें सख्त सजा मिले ताकि भविष्य में इस तरह की हरकतें नहीं दुहारई जाएं ।

Saturday, March 19, 2011

पत्रकारिता के अभिमन्यु !

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता और ग्लोबल समस्याएं विषय पर एक सेमिनार आयोजित था । कॉलेज के उत्साही शिक्षक डॉ हरीश अरोड़ा ने बेहद श्रमपूर्व दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी । दो दिनों की इस संगोष्ठी के अंतिम दिन और अंतिम सत्र में मुझे भी बोलना था । मेरा साथ वक्ता थी साप्ताहिक आउटलुक की सहायक संपादक गीताश्री और हमारे सत्र के अध्यक्ष थे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के के एएम मुंशी इंस्टीट्यूट ऑफ हिंदी स्टडीज के प्रोफेसर हरिमोहन । दो विद्वान वक्ताओं के बीच में मुझे ही सबसे पहले बोलना था । गीता जी मुझसे वरिष्ठ हैं और नब्बे के शुरुआती दशक में जब मैं दिल्ली आया था और काम और पहचान की तलाश से जूझ रहा था तो गीता जी ने ही मुझे पहला असाइनमेंट दिया था । उस वक्त वो स्वतंत्र भारत अखबार के आईएनएस दफ्तर में बैठती थी । इस अवांतर प्रसंग की चर्चा इस वजह से कर रहा हूं क्योंकि मुझे दोनों से पहले बोलना था और मेरी हालात खराब हो रही थी ।
जब मैं वहां पहुंचा तो सभागार लगभग भरा हुआ था लेकिन यह जानकर आश्चर्य हुआ कि श्रोताओं में दिल्ली विश्वविद्यालय के तमाम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग से जुड़े शिक्षक मौजूद थे । पहले मुझे यह अंदाज था कि कॉलेज के पत्रकारिता विभाग के छात्र होंगे जिनसे बातचीत करनी होगी । खैर समारोह शुरू हुआ और मंच संचालन कर रहे सज्जन ने पत्रकारिता के गिरते स्तर पर चिंता जताते हुए पिछले दिन और पूर्वान्ह के सत्र में हुई बातचीत का संक्षिप्त ब्योरा दिया । पहली बात उन्होंने कही कि पूर्ववर्ती वक्ताओं ने मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के गिरते स्तर पर चिंता जताई । उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यूज चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों ने खुद को अभिमन्यु बताया और कहा कि वो पत्रकारिता के चक्रव्यूह में फंस गए हैं और उससे निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पा रहे हैं लिहाजा वहीं नौकरी करने को अभिशप्त हैं । दूसरी बात उन्होंने ब्लाग के माध्यम से हो रही पत्रकारिता को प्रमुखता से रेखांकित किया । इस भूमिका के बाद उन्होंने मुझे मंच पर आमंत्रित कर लिया । मैंने सबसे पहले खबरिया चैनलों के अभिमन्युयों को पत्रकारिता के चक्रव्यूह में फंसे होने पर दुख प्रकट किया । मेरा साफ तौर पर मानना है कि न्यूज चैनलों में कुछ ऐसे पत्रकारों की जमात है जो न्यूज चैनल के मंच का, उसके ग्लैमर का, उसकी पहुंच का इस्तेमाल कर अपनी छवि भी चमकाते हैं और जब भी जहां भी सार्वजनिक तौर पर बोलने का मौका मिलता है वहां न्यूज चैनलों को गरियाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । उनका यह रूप और चरित्र मुझे हमेशा से परेशान करता है । मेरा मानना है कि यह अपने पेशे से एक तरह का छलात्कार है जो क्षणिक तो मजा देता है लेकिन पत्रकारिता का बड़ा नुकसान कर डालता है । खुद की छवि को चमकाने के लिए पत्रकारिता पर सवाल खड़े करनेवाले इन पत्रकारों की वजह से दूसरे लोगों को आलोचना का मौका और मंच दोनों मिल जाता है । मेरा मीडिया के उन अभिमन्युओं से नम्र निवेदन है कि वो अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फंसकर दम तोड़ने की बजाए युद्ध का मैदान छोड़ दें । अगर न्यूज चैनलों में उनका दम घुटता है तो वो वहां से तत्काल आजाद होकर अपना विरोध प्रकट करें लेकिन जिसकी खाते हैं उसको ही गरियाना कहां तक उचित है यह मेरी समझ से बाहर है । मैं कई न्यूज चैनलों के अभिमन्युओं से वाकिफ हूं और मेरे जानते अब तक ऐसा कोई वाकया सामने नहीं आया जहां इस तरह के पत्रकार वंधुओं ने व्यवस्था का विरोध किया हो । विरोध करना तो दूर की बात कभी अपनी नाखुशी भी जताई हो । मालिकों से सामने भीगी बिल्ली बने रहनेवाले इन पत्रकारों को सार्वजनिक विलाप से बचना चाहिए, यह उनके भी हित में है और पत्रकारिता के हित में भी । किसी भी चीज की स्वस्थ आलोचना हमेशा से स्वागतयोग्य है लेकिन वयक्तिगत छवि चमकाने के लिए की गई आलोचना निंदनीय है ।
दूसरी बात बताई गई कि हिंदी में ब्लाग के माध्यम बड़ा काम हो रहा है । यह बिल्कुल सही बात है कि ब्लाग और नेट के माध्यम से हिंदी के लिए बडा़ काम हो रहा है ।लेकिन कुछ ब्लागर और बेवसाइट जिस तरह से बेलगाम होते जा रहैं वह हिंदी भाषा के लिए चिंता की बात है । ब्लाग पर जिस तरह से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए उलजलूल बातें लिखी जा रही हैं वो बेहद निराशाजनक हैं । कई ब्लाग तो ऐसे हैं जहां पहले किसी फर्जी नाम से कोई लेख लिखा जाता है फिर बेनामी टिप्पणियां छापकर ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता है । कुछ कमजोर लोग इस तरह की ब्लैकमेलिंग के शिकार हो जाते हैं और कुछ ले देकर अपना पल्ला छुडा़ते हैं । लेकिन जिस तरह से ब्लाग को ब्लैकमेलिंग और चरित्रहनन का हथियार बनाया जा रहा है उनसे ब्लाग की आजादी और उसके भविष्य को लेकर खासी चिंता होती है । बेलगाम होते ब्लाग और बेवसाइट पर अगर समय रहते लगाम नहीं लगाया गया तो सरकार को इस दिशा में सोचने के लिए विवश होना पड़ेगा । ब्लाग एक सशक्त माध्यम है, गाली गलौच और बेसिर पैर की बातें लिखकर अपनी मन की भड़ास निकालने का मंच नहीं । इस बात पर हिंदी के झंडाबरदारों को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है । मैंने विनम्रतापूर्वक ब्लाग पर चल रहे इस घटिया खेल पर विरोध जताया और हॉल में फैले सन्नाटे से मुझे लगा कि वहां मौजूद लोग मेरी बातों से सहमत हैं ।
चूंकि उक्त सेमिनार में दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता पढ़ानेवाले शिक्षक उपस्थित थे और वैश्विक समस्या पर मुझे बोलना था । मुझे लगा कि पत्रकारिता की फैक्ट्री में काम करनेवाले लोग वहां मौजूद हैं इस वजह से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के सामने मुझे उनसे जुड़ी बात ही रखनी चाहिए । वैश्विक समस्या पर तो बाद में चर्चा हुई लेकिन सबसे पहले मैंने पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के बाबा आदम जमाने के होने की बात उठाई । कुछ दिनों पहले मैंने देश के सबसे प्रतिष्ठित युनिवर्सिटी में से एक के पत्रकारिता के छात्रों से मिला था जहां उनके सिलेबस पर बात की थी । प्रथम वर्ष में एक पेपर था- लेटर प्रेस और मुद्रण की विधियां । जब मैंने ये विषय देखा तो अपना सर पीट लिया । क्योंकि अखबार भी अब इनसे आगे निकल चुके थे । अब तो सारा कुछ कंप्यूटराइज्ड होता है । वो दिन लदे भी अब सालों हो गए जब लेटर प्रेस पर अखबार छपा करते थे । लेकिन हमारे युनिवर्सिटी के पत्रकारिता के छात्रों को अब भी लेटर प्रेस और मुद्रण की विधियां पढाई जा रही है । इसके अलावा भी अगर पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को देखें तो उसे समय के हिसाब से बिल्कुल नहीं बदला गया है । पता नहीं सालों पहले जब उसको बनाया गया था उसके बाद किसी ने भी उसको अद्यतन करने की जरूरत समझी या नहीं । अगर हम न्यूज चैनलों की कार्यपद्धति की बात करें तो उसमें तकनीक ने क्रातिकारी परिवर्तन किया है और हर रोज कोई ना कोई अपडेट हो रहा है जिसकी छात्रों को तो दूर विश्वविद्यालय में पढानेवाले शिक्षकों को भी जानकारी नहीं । तो पत्रकारिता की फैक्ट्री में जहां से देश के होनहार पत्रकार निकलते हैं वहां यह आधारभूत दोष अब भी कायम है और इसको दूर करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जाना अफसोसनाक है । अपनी इस चिंता को मैंने सेमिनार में जाहिर किया जिसपर बाद में कई शिक्षकों ने कड़ी आपत्ति जताई कि उनके ज्ञान पर सरेआम सवाल कैसे खड़ा किया जा रहा है । लेकिन बातचीत के बाद उन्होंने माना कि तकनीक के अपडेशन के बारे में उनकी जानकारी नहीं के बराबर है । छात्रों को कैमरा पढ़ानेवाले शिक्षक ने शायद ही कभी कैमरा देखा-छुआ हो यह जरूरी भी नहीं है लेकिन कम से कम कैमरा तकनीक में हुए आधुनिकीकरण के बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिए । न्यूजरूम सिस्टम के बारे में तो पता होना ही चाहिए ।
सवाल सिर्फ पत्रकारिता के सिलेबस का नहीं है सवाल अन्य विषयों का भी है जहां के सिलेबस में समय के साथ बदलाव नहीं किया गया । शिक्षा के तमाम कर्ताधर्ताओं को भी कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई । अब वक्त आ गया है कि सरकार को इस ओर तत्काल ध्यान देकर इन खामियों को दूर करना होगा ताकि देश में शिक्षा का स्तर उंचा हो सके और कॉलेजों में दी जानेवाली शिक्षा का उपयोग नौकरी में हो सके ।

Monday, March 14, 2011

लोक से दूर होती कविता !

एक दिन दफ्तर के साथियों से कविता पर बात शुरू हुई । मेरे मन में सवाल बार-बार कौध रहा था खि अब कोई दिनकर, बच्चन या श्याम नारायण पांडे जैसी कविताएं कोई क्यों नहीं लिखता । आज जिस तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं वो सिर्फ कुछ खास लोगों की समझ में आती है और एक सीमित दायरे में ही उसका प्रचार प्रसार और सम्मान मिलता है , लोक के बीच ना तो उन्हें प्रियता हासिल होती है और ना ही वो लोगों की जुबान पर चढ़ जाता है । कविता के मामले में मेरी जानकारी बिल्कुल नहीं है लेकिन बहुधा मन में यह सवाल उठता है कि छंद वाली कविता या फिर जोश या जुनून पैदा करनेवाली कविता क्यों नहीं लिखी जा रही है । आज भी दिनकर की पंक्तियां- रे रोक युधिष्ठिर को ना यहां जाने दे उसको स्वर्ग धीर, पर फिरा हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर या फिर बच्चन की – बैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला या फिर श्याम नारायण पांडे की – रण बीच चौकड़ी भर-भर कर,चेतक बन गया निराला था, राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा को पाला था- जैसी कविता क्यों नहीं लिखी जा रही है । मेरे इन सवालों पर मेरे एक मित्र ने कहा कि प्रगतिवादियों के विकास ने और साहित्य पर वामपंथियों के दबदबे ने इस तरह की कविता को बहुत नुकसान पहुंचाया । मैंने जब इसका विरोध किया तो वो और मजबूती से अपनी बात कहने लगे । उनका तर्क था कि जिस तरह से हिंदी में एक खास तरह की विचारधारा वाली कविता का दौर शुरू हुआ और मार्क्सवादी आलोचकों ने उसको जिस तरह से उठाया उसने कविता का बड़ा नुकसान किया । उनका तर्क था कि मार्क्सवादी आलोचकों ने विचारधाऱा वाली कविता को श्रेष्ठ साबित करने के लिए छंद में कविता लिखनेवालों को मंचीय कवि कहकर मजाक उड़ाना शुरू कर दिया । पूरे हिंदी साहित्य में ऐसा परिदृश्य निर्मित कर दिया गया कि अगर आप छंदोबद्ध कविता करते हैं और मंच पर सुर में कविता पाठ करते हैं तो आप प्रतिष्ठित कवि या गंभीर कवि नहीं हैं । उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि इस दुष्प्रचार का नतीजा यह हुआ कि आगे आनेवाली पीढ़ी ने छंद वाली कविता लिखना बंद कर दिया । मंच पर जाना बंद कर दिया । कविता का जो संवाद लोक से होता वह बंद हो गया । मंच पर होनेवाली कवि गोष्ठी से लोगों में पढ़ने का जो एक संस्कार बनता था वह खत्म हो गया । किसी कवि की अगर कोई रचना लोगों को पसंद आती थी तो श्रोता उसकी किताब ढूंढते थे और खोजकर उसको ना केवल खरीदते थे बल्कि पढ़कर उसपर चर्चा करते थे । इस तरह से समाज में कवि और कविता को लेकर एक संस्कार एक समझ विकसित होती थी । लेकिन कवि गोष्ठी के खत्म होने या फिर कमरों में सिमट जाने से कवियों का जो एक वृहत्तर संवाद होता था उसका दायरा भी सिमट गया । इसका नतीजा यह हुआ कि पाठकों में भी कमी आई, रचना का प्रचार प्रसार कम से कमतर होता चला गया । पाठकों को नई रचनाओं के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई जिसके आभाव में कविता संग्रह या तो प्रकाशकों के पास सालों साल रहते रहे या फिर सरकारी खरीद के बूते लाइब्रेरी शोभा बढ़ाते रहे ।
मेर मित्र अपनी बातें इस मजबूती से कह रहे थे कि हम तीन लोग भावविभोर होकर उनको सुन रहे थे । बीच बीच में टोका टाकी उनको और मजबूती प्रदान कर रही थी लेकिन उनके तर्कों में ताकत थी जिस वजह से हम उन्हें सुनना चाह रहे थे । नई पीढ़ी के कवियों के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि नए लड़कों को लगने लगा कि अगर वो विचारधाऱा की या आम आदमी की यथार्थवादी कविता नहीं लिखेंगे तो हिंदी साहित्य में उनकी नोटिस नहीं ली जाएगी, उनकी पहचान नहीं बन पाएगी, उनको पुरस्कार आदि नहीं मिल पाएगा । यह उस माहौल का नतीजा था जो मार्क्सवादी आलोचकों और उस दौर के कर्ता-धर्ताओं ने बनाया था । लेकिन जिस यथार्थवाद और आम आदमी की आड़ में पूरा आंदोलन चल रहा था वही कविता से दूर होता चला गया । हम काफी देर तक उनकी बातें सुनते रहे लेकिन अचानक से मेरे दूसरे मित्र ने हस्तक्षेप किया और उनको रोकते हुए कहा कि वो जिस तरह से पूरे परिदृश्य का सरलीकरण या सामान्यीकरण कर रहे हैं वो उचित नहीं है । अब दोनों थोड़े भिड़ने के अंदाज में बहस करने लगे । दूसरे मित्र का तर्क था कि बाद के दिनों में माहौल बदला और समादज के सामने कोई चुनौती नहीं थी कोई बड़ा लक्ष्य नहीं था । जोश और जुनून बाले दौर में देश की आजादी और उसके बाद की स्थितियां जिम्मेदार थी । बाद में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो भी वीररस से सराबोर कविताएं लिखी गई । उसके बाद इमरजेंसी के दौर में नागार्जुन ने भी कई लोकप्रिय कविताएं लिखी जो जनता की जुबान पर ही नहीं चढ़ी बल्कि जयप्रकाश आंदोलन के दौर में आंदोलनकारियों के लिए प्रेरक भी साबित हुई । कविता पर अच्छी बहस चल रही थी जिसमें मैं अपनी अज्ञानता की वजह से कोई खास हस्तक्षेप नहीं कर पा रहा था । लेकिन फिर भी बार बार मेरे मन में यह सवाल उठ रहा था कि आज की कविता जनता से दूर क्यों हो गई है ।
इस बहस के कुछ दिन बाद कवि मित्र तजेन्द्र लूथरा का संदेश मिला कि वो अपने घर पर एक कवि गोष्ठी का आयोजन कर रहे हैं जो अनौपचारिक होगा जिसमें कुछ कवि मित्र अपनी रचनाएं सुनाएंगे और मिल बैठकर बातें करेंगे । मेरी कवि गोष्ठी में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही लेकिन कुछ दिनों पहले कविता पर हो रही बहस और कवि मित्रों से मिलने का लोभ ने मुझसे हां करवा लिया । दिल्ली की ट्रैफिक से जूझता जब में उनके घर पहुंचा तो कवि गोष्ठी शुरू हो चुकी थी और युवा कवि राजेन्द्र शर्मा अपनी कविता का पाठ कर रहे थे । श्रोताओं में कवियत्रि शबनम, बिपिन चौधरी, गोल्डी मल्होत्रा, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, ममता जी, बरखा सिंह, मदन कश्यप, मिथिलेश श्रीवास्तव और वरिष्ठ कवि विष्णु नागर मौजूद थे । जो श्रोता ते वही कवि भी थे, मेरे जैसे दो लोग और थे जो शुद्ध रूप से श्राता थे । वहां भी साफ तौर पर छंद वाली कविता और यथार्थवादी कविता का फर्क मुझे दिखा लेकिन जिस तरह की कविता शबनम, गोल्डी मल्होत्रा, ममता जी और लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने सुनाई वो समस्याओं के अलावा कर्णप्रिय भी था । उस दिन मुझे जो एक खास बात नजर आई वो यह कि कविता में अब आरटीआई से लेकर पीआईएल जैसे शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है । मौजूद सभी कवियों को तीन तीन कविताएं सुनाने की छूट थी । तजेन्द्र शर्मा की कविता शब्द से बातचीत मुझे बेहद पसंद आई दूसरी कविता लुहार का डर समाज की कई प्रवृतियों पर चोट करती प्रतीत हुई । इस अनौपचारिक गोष्ठी का संचालन पत्रकार-कवि-उपन्यासकार अरुण आदित्य कर रहे थे । उनकी कविता एक फूल का बॉयोडाटा और कागज का आत्मकथ्य बड़े सवाल तो खड़े कर ही रही थी समाज को हकीकत का आईना भी दिखा रही थी । दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह ने भी कुछ गजलें गाकर सुनाई । विष्णु नागर और मदन कश्यप ने भी गंभीरता से अपनी बात अपनी कविता में कही ।उसी कवि गोष्ठी के बाद राजेन्द्र शर्मा ने एक छोटी सी पुस्तिका- गाथा पांवधोई की – मुझे दी । घर आकर जब उसे पलटा तो जानकर खुशी हुई कि सहारनपुर में पांवधोई नदी जो कि नाले में तब्दील हो गई थी उसका जीर्णोद्धार जिलाधिकारी आलोक कुमार ने स्थीनय जनता की मदद से करवाया । उत्तर प्रदेश में यह अपने तरह की अनोखी पहल थी जहां प्रशासन ने जनसहयोग से जनहित के एक ऐसे काम को अंजाम देकर अपनी ऐतिहासिक विरासत को संवारा । इस एक छोटी सी घटना से अगर उत्तर प्रदेश में प्रशासन और जन सहयोग का नया अध्याय शुरू हो सके तो सूबे के लोगों के लिए बेहतर होगा ।

Monday, February 28, 2011

सपने भी सच होते हैं

क्या आपने कभी कोई सपना देखा है । क्या आपने कभी सपने को हकीकत में बदलते देखा है । कम ही ऐसे लोग होते हैं जिनके ख्बाव हकीकत में बदलते हैं, जो अपने सपनों को महसूस करते हुए उसके साथ जीते हैं । अभी कुछ दिनों पहले मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ जो एक सपने के सच होने जैसा था । पिछले दिनों बातों-बातों में तय हुआ कि दफ्तर के कुछ लोग पहाड़ों पर चलें । दफ्तर के दोस्तों के साथ शिमला नारकंडा जाने का कार्यक्रम बना, प्रस्ताव भी हमारे बॉस संजीव पालीवाल की तरफ से आया था और हमारे ग्रुप की अगुवाई भी उन्हें ही करनी थी । मैं तकरीबन पंद्रह साल पहले सड़क मार्ग से अपने परिवार के साथ शिमला गया था । धुंधली सी स्मृति मेरे जेहन में थी । खतरनाक और घुमावदार पहाड़ी रास्ते का अंदाजा भी था । इसलिए जब यह तय हुआ कि अपनी गाड़ियों से नारकंडा चलेंगे तो मन में एक अजीब सा डर था । पहाड़ी रास्तों पर ना जाने का अनुभव इस डर को बढ़ा रहा था । घबराहट इस बात की भी हो रही थी मुझे अपने वरिष्ठ सहयोगी तसलीम खान की गाड़ी में जाना था । खान साहब गाड़ी बेहद तेज चलाते हैं सौ सवा सौ किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से तो आमतौर पर चलाते ही हैं, ड्राइविंग के वक्त एडवेंचरस भी हो जाते हैं । कभी जब भी ऑफिस से उनके साथ घर लौटा हूं, राम-राम करते ही बारह किलोमीटर का रास्ता कटता है । हलांकि गाड़ी पर उनका नियंत्रण रहता है लेकिन फिर भी सांस अटकी रहती है । खैर पहाड़ पर बर्फ देखने का जोश उस डर पर भारी पड़ा और हम सात लोग दो गाड़ियों में भरकर जन्नत देखने निकल पड़े । दिल्ली से निकलते ही खान साहब ने अपनी गाड़ी का एक्सीलेटर दबा दिया और गाड़ी के स्पीडोमीटर का कांटा एक सौ पचास को चूमने को बेताब होने लगा। उसकी बेकरारी लगातार बनी रही और वो डेढ़ सौ के साथ गलबहियां करता रहा और साथ वाली सीट पर बैठा मैं मन ही मन हनुमान चालीसा बुदबुदाता रहा । खैर स्पीडोमीटर और उसकी सुई का रोमांस जारी था लेकिन अंबाला के आसपास कोहरा खलनायक बनकर रास्ते पर आ गया और उसने कांटे और डेढ़ सौ के निशान को काफी समय तक दूर कर दिया । फिर तो इन दोनों का मिलन लौटते वक्त ही सोनीपत में हो पाया ।
दिल्ली से सुबह निकले हम सब लोग तकरीबन ग्यारह बजे जाबली में रुके और वहां एक होटल में रुककर पूड़ी और आलू की सब्जी का नाश्ता किया । हिमाचल में घुसते ही बेहद स्वादिष्ठ खाना इस बात की आश्वस्ति दे रहा था कि आनेवाले दो दिन अच्छा भोजन मिलेगा । थोड़ी देर रुककर हमलोग फिर रवाना हो गए । लेकिन इस बीच मेरी सीट बदल गई थी और मैं पीछे बैठ गया था इसलिए स्पीडोमीटर और सुई के खतरनाक रोमांस को देख नहीं पा रहा था, दूसरी तरफ पहाड़ी रास्ता शुरू होने के बाद इस रोमांस पर ब्रेक भी लग चुका था । जाबली से हम आगे बढ़े तो एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ हजारो फीट गहरी खाई देखकर डर थोड़ा और बढ़ा लेकिन घंटे भर की ड्राइव के बाद ये डर जाता रहा और फिर मैं उस घुमावदार रास्ते को इंज्वॉय करने लगा । नारकंडा पहुंचने के पहले ही, कुफरी से ही बर्फ दिखने लगा था । सड़क के एक तरफ पहाड़ और उस पर जमी बर्फ, हमें पागल बना रहा रहा था । बर्फ को छूने और उसपर खड़े होने का टेंपटेशन पर काबू पाना मुमकिन नहीं था । आखिरकार जगह मिलते ही हमने गाड़ी रास्ते में खड़ी की और बर्फ पर कूद पड़े । मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार इतना बर्फ देखा था । अबतक या तो फ्रिज में जमे बर्फ या फिर स्कूल के दिनों में बर्फ रगड़कर जो गोला मिलता था उसे देखा था । हां जब दिल्ली आया था तो किंग्सवे कैंप से सेंट्रल सेक्रेटेरियट बाली बस में बैठा मलकागंज के बाद बर्फखाना के आसपास ठेले पर लदी बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्ली देखी थी । लेकिन बर्फ का पहाड़ देखकर हमारी खुशी सातवें आसमान पर थी । संजीव जी ने हमारे उत्साह को यह कहकर हवा दे दी कि आगे तो और भी बर्फ मिलेगी ।
चलते चलाते तकरीबन शाम पांच बजे हमलोग नारकंडा पहुंच गए । नारकंडा बाजार में हम थोड़ी देर रुके और खाने-पीने का सारा सामान अपनी गाड़ी में लाद कर वहां से दस बारह किलोमीटर दूर घरयौती के लिए रवाना हो गए । घरयौती में हमें संजीव जी के घर में रुकना था । जैसे ही हम नारकंडा से थोड़ा नीचे उतरे इतनी बर्फ जमा थी कि हम खुद को रोक नहीं पाए । दोनों गाड़ियां रुक गई और हम सात लोग बाहर बर्फ पर । संजीव जी और तसलीम जी हमारी तस्वीरें लेने लगे क्योंकि ये दोनों पहले भी पहाड़ों पर खूब घूम चुके थे । पंकज तो हिमाचल के रहनेवाले ही थे लेकिन बावजूद इसके उनका उत्साह जबदरदस्त था । लेकिन बाकी चार- धीरज, आशुतोष, अमित और मैं तो बर्फ पर चढ़ता ही चला गया । जैसे जैसे आगे जा रहे थे बर्फ बढ़ता जा रहा था । अभी तक मैंने फिल्मों में इतनी बर्फ देखी थी, मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बर्फ पर सोया भी जा सकता है । स्कीइंग करती तस्वीरें तो देखी थी लेकिन बीस फीट की उंचाई से बर्फ पर सरकना..उफ्फ...क्या अनुभव था । सारे बर्फ सूखे थे लेकिन कपड़ों के अंदर जाकर शैतानी पर उतारू थे, पिघलकर हमें गुदगुदाने में लगे थे । खैर तकरीबन आधे घंटे की धींगामुश्ती के बाद हम सूखे बर्फ के ठंडे और सुखद एहसास के साथ घर की ओर रवाना हो गए।
बारह तेरह घंटे की सड़क यात्रा के बाद कोई थकान नहीं, यह तो देवभूमि में ही संभव था, वर्ना दिल्ली में तो अगर आप मयूर विहार से रोहिणी चले जाइये तो आपके दम निकल जाएगा। खैर हम जा पहुंचे घरयौती । नीचे गाड़ी खड़ी करके तकरीबन 25-30 मीटर की उंचाई पर स्थित संजीव जी के घर तक पहुंचना था । मैंने कंधे पर अपना सामान उठाया और हाथ में चिप्स का पैकेट लेकर चढ़ाई चढ़ने लगा । पगडंडियों से चलते हुए उपर पहुंचना था । तसलीम जी जितनी तेज गाड़ी चला कर आए थे उतनी ही धीमी रफ्तार से चढ़ाई चढ़ रहे थे । उन्होंने मुझे भी धीरे चलने की सलाह दी लेकिन मैं जोश में तेज चल गया लेकिन चंद मीटर के बाद ही औकात में आ गया । फिर तो कंधे पर लटका बैग तो भारी लगने ही लगा, हाथ में मौजूद दस ग्राम का चिप्स का पैकेट भी वजनी महसूस होने लगा। अनुरोध कर पंकज को चिप्स का पैकेट थमाया और फिर धीरे-धीरे घर तक पहुंचा । सेब के बगीचे के बीच तीन फ्लोर का लकड़ी का बना मकान बेहद आकर्षक लग रहा था । बॉलकनी में खड़े होकर आप दूर तक फैले पर्वत श्रृंखला को देख सकते हैं । दूर-दूर तक फैला पहाड़, उसपर जमी बर्फ और काफी दूर- दूर बसे घर । मनोहारी दृश्य, हर फ्रेम ऐसा कि जहां मन हो वहां कैमरा क्लिक कर दो, तस्वीर बेहतरीन ही आएगी । इतने लंबे सफर और थोड़े पैदल चढाई के बाद भी हम सबलोग उर्जा से लबरेज । धीरे-धीरे अंधेरा छाने लगा,ठंडी हवा के झोंकों के बीच रसरंजन का कार्यक्रम बना । घर का केयर टेकर नंदू ने बॉन फायर का इंतजाम कर रखा था । चारो तरफ पहाड़, उसपर जमी बर्फ, साफ और खुला आसमान, सामने जल रही आग और साथ में रसरंजन । आसमान के तारे भी हमारे साथ इस माहौल में शामिल होने को बेताब लग रहे थे, तभी तो सितारे बेहद करीब लग रहे थे । लग रहा था कि हाथ उठाकर सितारों को छू सकते हैं । माहौल को आशुतोष ने रूमानी बना दिया । अपने मोबाइल से साठ के दशक के रूमानी गाने बजा कर । बॉन फायर और रसरंजन का यह कार्यक्रम रात के दो बजे तक चलता रहा । आठ हजार फीट की उंचाई पर यह सब जारी था । मैंने तो कभी सपने में भी इस बात की कल्पना नहीं की थी कि सेब की लकड़ी जलाकर आग तापेंगे । जब मैं अपने गांव में रहता था तो सेब घर में तभी आता था जब कोई बीमार पड़ता था । उसी सेब की लकड़ी का बॉन फाय़र । अकल्पनीय लेकिन हो रहा था ।
अगले दिन सुबह हम हाटू पीक जाने के लिए निकले लेकिन रास्ते पर इतनी बर्फ जमी थी कि गाड़ी जा नहीं सकती थी और हम पैदल दो ढाई किलोमीटर से ज्यादा जाने को तैयार नहीं थे । उसी में मस्ती करके धमाल मचा रहे थे । हाटू पीक पर जाने के पहले हम तानी जुब्बर लेक पर भी गए । तकरीबन बीस फीट चौड़े उस झील की खास और चकित कर देनेवाली बात ये थी कि एक किनारे पर धूप और दूसरे किनारे पर तीन फीट तक जमी बर्फ । झील के एक किनारे पर एक छोटा सा मंदिर उस पूरे कैंपस को एक अध्यात्मिक स्वरूप भी दे रहा था । प्राकृतिक सौंदर्य के आगोश में एक और दिन बीत गया और हम फिर लौट आए अपने अड्डे पर । फिर रसरंजन और बॉन फायर का दौर । हम वहां बैठकर नॉस्टेजिक भी हो रहे थे । अपने जमाने के, अपने कॉलेज के, अपने दोस्तो के, अपनी मोहब्बत के किस्से । समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला । सुबह आठ बजे वहां से रवाना हुआ और कुछ देर शिमला में बिताकर रात दस बजे दिल्ली पहुंच गया । लौटने में खान साहब की गाड़ी और तेज चल रही थी लेकिन दो दिन की मस्ती में पहाड़ों में घूमने के बाद रफ्तार के डर काफूर हो चुका था । तीन दिनों तक हिमाचल में घूमने के बाद यह पता चला कि क्यों कहलाता है यह प्रदेश देवभूमि । दफ्तर के तनाव और तमाम पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त ये तीन दिन ऐसे थे जिन्हें भुला पाना मुमकिन नहीं । ऐसे मजेदार ट्रिप के लिए संजीव जी को तहे दिल से शुक्रिया अदा करने के बाद अब मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सपने सच होते हैं ।