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Sunday, July 26, 2026

हिंदी का संवादप्रिय आलोचक


हिंदी अकादमिक और साहित्य जगत में नामवर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जन्म शताब्दी वर्ष में उनके लेखन और भाषणों पर समग्रता में विचार करने की आवश्कता है। नामवर सिंह पर अधिकांश लेख भक्ति भाव से लिखे जाते रहे हैं। बहुत कम लेख ऐसे लिखे गए जो उनकी रचनात्मकता के आधार पर उनका मूल्यांकन करने जैसा हो। या तो प्रशंसात्मक लिखा गया या उनकी व्यक्तिगत आलोचना की गई। नामवर सिंह ने अपने आरंभिक दिनों में विपुल लेखन किया। बाद में उन्होंने वाचन विधा को अपना लिया। मनसा वाचा कर्मणा वो आजीवन कम्युनिस्ट रहे। उनके लेखों में कभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा से विचलन देखने को नहीं मिलता है। नामवर सिंह एक सच्चे पार्टी कार्यकर्ता की तरह साहित्य में भी अपनी विचारधारा के कार्यकर्ता थे। लेनिन का एक लेख है ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’। इस लेख में वो पार्टी लेखकों से पक्षधरता का आग्रह करते हैं। नामवर सिंह के लेखन में लेनिन का वो आग्रह साकार दिखाई देता है। आलोचक होने के नाते उनका दायित्व था कि खोज-खोजकर हिंदी साहित्य के कवियों-लेखकों को मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित बताना और स्थापित करना। निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए थे। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद पर भी लेनिन का प्रभाव देखा और कहा भी। दिनकर की किसी कविता में लेनिन का नाम आया तो उनको कम्युनिस्ट बताने लगे थे। प्रेमचंद को तो कम्युनिस्ट बता ही चुके थे। नामवर सिंह ने जो राह दिखाई थी उनके कम्युनिस्ट चेले उसी पर चलकर इन लेखकों कवियों के बारे में बोलने-लिखने लगे। परिणाम ये हुआ कि इन लेखकों का इकहरा और दोषपूर्ण मूल्यांकन हुआ। 

जब नामवर सिंह लेखन से वाचन की ओर आए तो उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा पर भी प्रहार किया। विचारधारा को लेकर चलनेवाले इस नामवर आलोचक ने किसी गोष्ठी में कह दिया कि विचारधारा हमें अमानवीकृत करती है। फिर किसी गोष्ठी में कह दिया कि शुक्र है कि हमारे देश में कम्युनिष्टों का शासन नहीं है वर्ना हम सभी यानि उनसे असहमति रखनेवाले जेलों में बंद होते। एक और इसी तरह का बयान था-भारतीय समाज में जो दुर्गति समाजवाद की है साहित्य में वही प्रतिबद्धता की। इन बयानों पर प्रगतिशील जमात के लेखकों ने खूब हो हल्ला मचाया था। एक बार मैंने राजेन्द्र यादव से पूछा था कि नामवर सिंह इस तरह के बयान क्यों देते हैं? उन्होंने छूटते ही कहा कि वो प्रचार-प्रिय आलोचक हैं। उनको पता है कि कैसे चर्चा के केंद्र में रहा जाता है। नामवर सिंह ने भी अशोक वाजपेयी के साथ एक बातचीत में कहा था कि विवादों के माध्यम से सिद्धांत का विकास हो सकता है और इनके माध्यम से ठोस साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन की दिशा में भी हम पाठकों की समझ ज्यादा बढ़ा सकते हैं, विकसित कर सकते हैं। उसी बातचीत में ये भी कहा था कि विवाद आलोचना कर्म और आलोचना धर्म में ही निहित है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है। उन व्याख्यानों से नामवर सिंह की जो तस्वीर बनती है वो लेखक नामवर सिंह से अलग है। ऐसा प्रतीत होता है कि नामवर सिंह लिखे हुए शब्दों और बोले गए शब्दों के महत्व को समझते थे। लिखे हुए को संशोधित करना या बदलना या अपनी स्थापना से पलट जाना कठिन होता है जबकि व्याख्यानों में ये सुविधा होती है। नामवर सिंह का जिस समय हिंदी साहित्य में डंका बज रहा था उस समय संचार के माध्यम बहुत ही कम थे। नामवर सिंह ने इसका लाभ उठाया। 

नामवर सिंह की आलोचना में तमाम विचलन होने के बावजूद इतना तो स्वीकार करना होगा कि उनके अध्ययन का दायरा बहुत विशाल था। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू और विदेशी साहित्य बहुत पढ़ा था। एक तरफ अपने व्याख्यानों में वो श्रीरामचरितमानस की पंक्ति उद्धृत करते थे तो मीर और गालिब की शायरी का भी धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। अपनी स्थापना के समर्थन में विदेशी आलोचकों और लेखकों को उद्धृत करते थे। उनके व्याख्यानों से ये लगता है कि वो हर गोष्ठी में पूरी तैयारी के साथ जाते थे और कुछ न कुछ नया देने की कोशिश करते। जब भी वो विचारधारा और राजनीति से मुक्त होकर अकादमिक स्तर पर बोलते तो उनका व्याख्यान सुनने योग्य होता था। उनकी आलोचना का जो वाचिक स्वरूप था वो विमर्शात्मक होता था लेकिन जब वो लिखते थे तो सृजनात्मक हो जाते थे। नामवर सिंह ने कभी स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि सिद्धांत निर्माण की जगह मूल्ययांकन पर प्रतिक्रिया देकर संवाद बढ़ाया जाना अधिक बेहतर है। नामवर सिंह ने छायावाद पर जो पुस्तक लिखी थी उसने अपने समय में छायावाद पर नए सिरे से साहित्य जगत को सोचने पर मजबूर किया था। कविता के नए प्रतिमान और कहानी नई कहानी उनकी दो पुस्तकों ने हिंदी साहित्य पर विचार करने की एक नई जमीन तैयार की थी। उसी तरह से जैसे डा रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ लिखकर हिंदी नवजागरण को समझने की नई दृष्टि दी थी। नामवर सिंह क्रिया केवलम उत्तरम को अपना आदर्श वाक्य मानते थे और जीवन के अंतिम दिनों तक वो इसपर डटे रहे। बाद के दिनों में जब उनपर बहुत व्यक्तिगत हमले होने लगे थे तो एक दिन मैंने उनसे इस बाबत पूछा था। उन्होंने कहा- चढ़िए हाथी ज्ञान को, सहज दुलीचा डाल/स्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार। 


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