बहुत ही दिलचस्प वाकया है । राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकों की सूची उनके बेवसाइट पर जाकर देख रहा था । कई किताबें पसंद आई । यह सोचकर नाम लिखता गया कि उन पुस्तकों को मंगवाकर पढूंगा और अगर मन बना तो उनपर अपने स्तंभ में या अन्यत्र कुछ लिखूंगा भी । सूची बनाते बनाते एक किताब दिखाई दी- मरजानी, लेखिका वर्तिका नंदा । मैंने अशोक महेश्वरी जी को जो किताबों की सूची भेजी उसमें मरजानी का नाम भी भेज दिया। मेरे पत्र के कुछ दिनों बाद ही झा जी घर पर आकर किताबें दे गए । मैंने किताबें देखनी शुरू की । पलटते-पलटते मरजानी की बारी आई । जैसे ही मैंने किताब खोली तो हैरान रह गया । मरजानी, वर्तिका नंदा का नया कविता संग्रह निकला । अपनी अज्ञानता में मैंने उसे उपन्यास समझ कर मंगवा लिया था । मेरी ज्यादातर रुति उपन्यास या फिर कहानी संग्रह में ही रहती है । खैर हाल के दिनों में जिस तरह से वर्तिका नंदा ने अपने ताबड़तोड़ लेखन से हिंदी में सारा आकाश छेकने की कोशिश की है उसके बाद से ही उनके लेखन को लेकर पाठकों के मन में दिलचस्पी बढ़ी है । मेरे मन में भी । अखबारों में लगातार लेखन करके भी वर्तिका ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है । दो हजार दस में राजकमल प्रकाशन से ही नंदा की किताब टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग को मैं उलटपुलट कर देख चुका था, लिखना चाह रहा था लेकिन काहिली की वजह से लिख नहीं पाया । गद्य में मेरी रुचि है लेकिन पद्य में मेरी रुचि जरा कम या यों कहें कि बेहद कम है । मैं यह स्वीकार करता हूं कि मुझे पुराने कवियों जैसे दिनकर, अज्ञेय, निराला, नागार्जुन, आदि को पढ़ने में आनंद आता है । आनंद इस वजह से आता है कि वो कविताएं मेरी समझ में आती है । मुक्तिबोध को कोर्स में होने की वजह से पढ़ा, पहले अंधेरे में बहुत ही दुरूह कविता लगी थी लेकिन बाद में जब उस कविता पर कई आलोचकों की राय पढ़ी तो समझ में आई । लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह की कविता लिखी जा रही है वो उसको मेरी अल्पबुद्धि जरा कम ही समझ पाती है । समझने की बहुत कोशिश की, कई कवियों की कविताओं को पढ़ा भी लेकिन समझ ना पाने की वजह से उनपर लिख नहीं पाया । वर्तिका की इस किताब को पलटते हुए मैंने सोचा कि एक पत्रकार और अब पत्रकारिता के शिक्षक की कविताएं पढ़ लेनी चाहिए । संग्रह को दो बार पढ़ा ।
कवयित्री ने अपनी भूमिकानुमा लेख- कविता से पहले लिखा है –वैसे कविताएं निजी दस्तावेज की तरह होती है । आमतौर पर वो तकिए के नीचे छिपी रहती हैं या अकेलेपन का साथी बनती हैं और जब हवाओं का रुख आसमान की तरफ ले जा रहा होता है, तब भी ये घास की तरह जमीन पर रहकर मजबूत बनी रहती है । कवयित्री ने कविता को भावुकता की जमीन दे दी है – मन के करीब रहनेवाली, साथ साथ चलनेवाली, ओढनी बनी और तकिया भी । कविता को ओढनी बताने का उनका निहितार्थ क्या है इसके साफ संकेत कहीं नहीं मिल पा रहे हैं लेकिन प्रचलित अर्थ में ओढनी लड़कियां और औरतें अपने को ढकने के लिए इस्तेमाल करती है । मुझे ये समझ नहीं आया कि कविता ओढनी कैसे बन सकती है और किस लाज को ढ़कने के काम आ सकती है । कविता में शब्दों का चयन उसे चमका देती है लेकिन अगर वही शब्द अगर जबरदस्ती ठूंसे जाते हैं तो स्पीड ब्रेकर की तरह झटके भी देते हैं । अपनी कविता को लेकर इमोशनल कवयित्री इतने पर ही नहीं रुकती हैं- पाठकों से भी आग्रह करती है कि – इन्हें मैंने नजाकत से रखा था । आप भी इन्हें नजाकत से ही पढ़िएगा । कवयित्री का यह आग्रह उनकी कविताओं में एक जबरदस्त मोह के रूप में लामने आता है – ख्याल ही तो है- में वो कहती है – क्या वो कविता ही थी/ जो उस दिन कपड़े धोते-धोते/साबुन के साथ घुलकर बह निकली थी/एक ख्याल की तरह आई /ख्याल की ही तरह/धूप की आंच के सामने बिछ गई/पर बनी रही नर्म ही/ । यहां भी वर्तिका के लिए कविता नर्म और नाजुक है ।
एक कवयित्री का अपनी कविताओं को लेकर मोह तो जायज है लेकिन पाठक तो कविता को कविता की कसौटी पर कसेंगे ही । वर्तिका नंदा की कविताओं को पढ़ते हुए एक बार फिर से मेरे मन में पुराना सवाल कौंधा - कविता क्या है । जवाब में फिर से कविता के नए प्रतिमान में नामवर सिंह का लिखा याद आया- किसी काव्य कृति का कविता होने के साथ ही नई होना अभीष्ट है । वह नई हो और कविता ना हो, यह स्थिति साहित्य में कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती । वर्तिका की कविताएं पढ़ते हुए मुझे कुछ भी नया नहीं लगा, ना तो कविता की भावभूमि और ना ही कथन और ना ही बिंब । इनकी कविताओं में अक्सर घूमफिर कर घर,परिवार और उनका पेशा और परिवेश आता रहता है और कवयित्री, लगता है, उसके ही चारो ओर चक्कर लगाती रहती है । वर्तिका की कविताओं को पढ़ते हुए मुझे लगा कि अपनी कविताओं में वो कई बार बेहद सपाट हो जाती है और कविता और नारो के बीच का फर्क भी भूल जाती है । उदाहरण के तौर पर अगर हम उसकी कविता –क्यों भेजूं स्कूल को देखें- नहीं भेजनी अपनी बेटी मुझे स्कूल /नहीम बनाना उसे पत्रकार/क्या करेगी वह पत्रकार बनकर/अगर नाम कमा लेगी तो नहीं बन पाएगी पूरी औरत/ । यह एक कवि का अपने पेशे से मोहभंग की अभिवयक्ति है जो उसकी कविताओं में नारे की शक्ल में उपस्थित होता है । नारे भीड़ में जोश तो भर सकते हैं लेकिन जब वो कविता की जमीन पर पहुंचते हैं तो औंधे मुंह गिर जाते हैं । समीक्ष्य संग्रह में यह कई बार घटता है । इसके अलावा मरजानी की अन्य कविताओं में भी जो बिंब उठाए गए हैं वो भी पहली नजर में वास्तविकता को मूर्त करती प्रतीत होती है लेकिन अगर उसपर गंभीरता से विचार किया जाए तो वास्तविकता का अनावश्यक भार उठाते हुए कविताएं हांफती नजर आती है –चाहे वो टीवी एंकर और तुम हो या फिर कसाईगिरी । निष्कर्ष यह कि बिंब के बोझ तले कविता इतनी दब गई है कि वो उठ ही नहीं पाई ।
वर्तिका नंदा की छोटी बड़ी कविताओं को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि इन कविताओं में जो भावुकता है या जो वैयक्तिकता है वह संरचना में शिथिलता और काव्यानुभूति की कमजोरी का परिणाम है । इस संग्रह में जिस तरह से तात्कालिक परिवेश की जमीन पर कवयित्री ने सपाटबयानी की है उससे भी उनकी कविताओं की दुर्बलता सामने आती है । घटनाओं को यथार्थपरकता की चाशनी में डुबाकर कविता गढ़ने की जो एक प्रवृत्ति हाल के दिनों में सामने आई हैं, वर्तिका की कविताएं उसका सर्वोत्तम उदाहरण है । वर्तिका नंदा का यह कविता संग्रह एक कमजोर और सपाट कविताओं का संग्रह है जो हिंदी साहित्य में जगत में अगर अननोटिस्ड रह जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा । अंत में एक और चौंकाने वाली बात राजकमल प्रकाशन ने अब अपनी किताबों का मूल्य डॉलर में भी देना शुरू कर दिया है । इस संग्रह का दाम है आठ डॉलर ।
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Wednesday, August 31, 2011
Saturday, August 13, 2011
मंजिल से भटका सफर
आज देश आजादी का जश्न भले ही मना रहा हो लेकिन देश की जनता के बीच अपनी इस आजादी को लेकर एक संदेह, एक आशंका, एक रोष पैदा हो गया है । इस संदेह की वजह यह है कि पूर् देश में इस वक्त भ्रष्टाचार का बोलबाला है । समाज के सबसे निचले स्तर से लेकर देश के शीर्ष स्तर को भ्रष्टाचार की विषबेल ने जकड़ लिया है । चाहे वो पौने दो लाख करोड़ का टेलीकॉम घोटाला हो, सत्तर हजार करोड़ का कॉमनवेल्थ घोटाला हो, हजारों करोड़ का अंतरिक्ष घोटाला हो, चाहे देश के शहीदों के परिवारों को मिलने वाले घर का आदर्श घोटाला हो या फिर आईपीएल घोटाला । आज जिधर नजर दौड़ाइये घोटाले उधर ही मुंह बाए खड़े हैं । सारे घोटालों के केंद्र में या यों कहें कि हर भ्रष्टाचार की धुरी या तो कोई कांग्रेस का नेता है या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार को समर्थन दे रही पार्टी का नेता । हर घोटाले के बाद कांग्रेस पार्टी यह दलील देती नजर आती है कि अमुक घोटाले के लिए फलां नेता और मंत्री जिम्मेदार है । लेकिन इस बात को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठता कि जिस मंत्रिमंडल के सदस्य घोटाले कर रहे हैं उनके मुखिया की कोई जिम्मेदारी बनती भी है या नहीं । हर कोई इस बात की दुहाई देता नजर आता है कि देश के प्रधानमंत्री बहुत साफ सुथरे छवि के हैं । उनके दामन पर दाग नहीं है । अरे भाई उस साफ सुथरी छवि को लेकर देश की जनता क्या करे । देश छवि से नहीं चलता । देश चलाने के लिए कड़े फैसले लेने होते हैं । उस भले और ईमानदार आदमी का हम क्या करें जिनकी नाक के नीचे घोटाले हो रहे हैं लेकिन वो और उनके कारिंदे कहते हैं ये सब उनकी जानकारी में नहीं हुआ । क्या हम यह मान लें कि आजादी के लगभग साढ़े छह दशक बाद प्रधानमंत्री नाम की संस्था को गठबंधन की राजनीति ने कमजोर कर दिया है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बहुत ईमानदार हैं, होंगे, लेकिन जिस तरह उन्होंने भ्रष्टाचार की तरफ से आंखें मूंद ली है उससे एक संदेह का वातावरण तो उनके इर्द गिर्द भी बन ही जाता है । आप लाख ईमानदार हों लेकिन आपके सहयोगी भ्रष्टाचारी हैं तो उसके छींटे तो आपके दामन पर भी पड़ेंगें ही । अंग्रेजी में एक मशहूर कहावत है – अ मैन इज नोन बाइ हिज कंपनी, ही कीप्स ।
ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ कांग्रेस पार्टी और उसके नेता ही भ्रष्ट हैं । देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में भी येदुरप्पा जैसे लोग हैं जिनका दामन दागदार है । येदुरप्पा पर जमीन घोटाले के आरोप लगे लेकिन बीजेपी को उनपर कार्रवाई करने में लोकायुक्त की रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ा । सार्वजनिक जीवन में शुचिता और उच्च सामाजिक मानदंड की वकालत करनावली पार्टी बीजेपी, झारखंड में शिबू सोरेने के साथ मिलकर सरकार चला रही है । शिवू सोरेन पर पहले भी भ्रष्टाचार समेत हत्या और हत्य़ा की साजिश रचने के संगीन इल्जाम लग चुके हैं । उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की सरकार पर भी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन समेत कई सरकारी योजनाओं में घपले घोटाले की जांच चल रही है । मायावती पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा विचाराधीन है । उत्तर प्रदेश सरकार पर कैग की ताजा रिपोर्ट में बेहद गंभीर आरोप लगे हैं । तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता पर भी भ्रष्टाचार का मुकदमा चल रहा है । समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और हरियाणा के चौटाला पिता पुत्र के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक संपत्ति का केस जारी है । लालू यादव और कई सूबों के और नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही है, यह सूची बहुत लंबी है । अभी-अभी आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी की संपत्ति की जांच के आदेश दिए हैं ।
यह अकारण नहीं है कि देश के तीस मुख्यमत्रियों की कुल संपत्ति करीब ढाई सौ करोड़ रुपये हैं । इस अनुमान के मुताबिक राज्यों के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति आठ करोड़ रुपये है । लेकिन अगर उसमें से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और तमिलनाडू के मुख्यमंत्री(अब पूर्व) करुणानिधि की संपत्ति हटा दी जाए तो देश के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति घटकर करीब चार करोड़ रुपए रह जाएगी । तकरीबन 87 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और दलित नेता मायावती देश की सबसे अमीर मुख्यमंत्री हैं । दो हजार दस में मायावती ने बताया था कि उनकी संपत्ति तीन साल में 35 करोड़ रुपये बढ़ गई है यानि की तीन साल में बावन करोड़ से बढ़कर सत्तासी करोड़, तकरीबन सड़सठ फीसदी का इजाफा । केंद्रीय मंत्रियों की लिस्ट पर भी अगर नजर डालेंगे तो यह अमीरी नजर आएगी । कहां से आ रहे हैं ये पैसे, ये तो घोषित संपत्ति है, क्या कोई अघोषित संपत्ति भी है । इस तरह के सवाल पूरे देश को मथ रहे हैं । कोई कहता है कि उनके समर्थक चंदा देते हैं तो कोई अपने कारोबार के बूते करोड़पति बनने की बात कर रहा है । नतीजा यह हो रहा है कि पूरे देश में इस वक्त पॉलिटिकल क्लास को लेकर जनता के मन में एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है । आजादी के तकरीबन चौंसठ साल बाद भी आज देश की जनता अपने चुने हुए नेताओं पर भरोसा नहीं कर पा रही है तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बात है । देश की आजादी की वर्षगांठ पर पॉलिटिकल क्लास के लोगों के लिए आत्ममंथन का भी वक्त है ।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि सत्ताधरी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करनेवाली संस्थाओं पर ही हमले करने लगे हैं । जब सीएजी की रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री के खिलाफ आता है तो कांग्रेस के प्रवक्ता उस संस्था को ही सवालों के घेरे में ले लेते हैं । उसके पहले टेलीकॉम घोटाले में कैग की रिपोर्ट की जांच कर रही संसद की लोकलेखा समिति पर भी कांग्रेस के लोगों ने इस तरह से ही सवाल खड़े कर दिए थे । भ्रष्टाचारियों को बचाने या फिर उनके समर्थन के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले से ऐसा लगता है कि कांग्रेस को भ्रष्ट लोगों की ज्यादा चिंता है बजाए संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा की । आजादी के बाद जिस तरह से उन्नीस सौ पचास में सीएजी को बनाकर उसे संवैधानिक आजादी दी गई और जिसे जवाहरलाल नेहरू ने अपने शासनकाल में मजबूकी दी आज उसपर ही इस वक्त के कांग्रेसी उंगली उठा रहे हैं ।
पूरा देश यह भी देख रहा है कि किस तरह से अन्ना हजारे, जो कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक बन चुके हैं, को परेशान किया जा रहा है । उनकी आवाज को दबाने या फिर उनको या उनकी टीम को परेशान करने का कोई मौका सरकार नहीं छोड़ रही है । चाहे वो दिल्ली में अनशन करने देने के लिए जगह देना का मामला हो या फिर लोकपाल बिल में मनमानी करने का । अन्ना के खिलाफ खड़े होकर सरकार ने इतनी बड़ी गलती कर दी है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं है । दरअसल आज कांग्रेस के पास आजादी के आंदोलन से तपकर निकले जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, एस राधाकृष्णन और डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जौसे नेता नहीं हैं जो एक नैतिक उदाहरण पेश कर सकें । अन्ना ने ईमानदारी की जो नैतिक चुनौती सरकार को दी है उसका जवाब देने के लिए कांग्रेस के पास कोई नेता नहीं है । कपिल सिब्बल हों या फिर चिदंबरम या फिर विवादित बयानों के लिए चर्चित दिग्विजय सिंह- इन सबमें वो नैतिक ताकत नहीं है जो अन्ना हजारे का मुकाबला कर सके । लेकिन उससे भी चिंता की बात यह है कि देश में इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई ना होते देख जनता क्षुब्ध होने लगी है, उनका धैर्य जवाब देने लगा है । आज जश्ने आजादी के बीच पॉलिटिकल क्लास को जनता की इस नाराजगी का संज्ञान लेना चाहिए ।
ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ कांग्रेस पार्टी और उसके नेता ही भ्रष्ट हैं । देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में भी येदुरप्पा जैसे लोग हैं जिनका दामन दागदार है । येदुरप्पा पर जमीन घोटाले के आरोप लगे लेकिन बीजेपी को उनपर कार्रवाई करने में लोकायुक्त की रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ा । सार्वजनिक जीवन में शुचिता और उच्च सामाजिक मानदंड की वकालत करनावली पार्टी बीजेपी, झारखंड में शिबू सोरेने के साथ मिलकर सरकार चला रही है । शिवू सोरेन पर पहले भी भ्रष्टाचार समेत हत्या और हत्य़ा की साजिश रचने के संगीन इल्जाम लग चुके हैं । उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की सरकार पर भी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन समेत कई सरकारी योजनाओं में घपले घोटाले की जांच चल रही है । मायावती पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा विचाराधीन है । उत्तर प्रदेश सरकार पर कैग की ताजा रिपोर्ट में बेहद गंभीर आरोप लगे हैं । तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता पर भी भ्रष्टाचार का मुकदमा चल रहा है । समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और हरियाणा के चौटाला पिता पुत्र के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक संपत्ति का केस जारी है । लालू यादव और कई सूबों के और नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही है, यह सूची बहुत लंबी है । अभी-अभी आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी की संपत्ति की जांच के आदेश दिए हैं ।
यह अकारण नहीं है कि देश के तीस मुख्यमत्रियों की कुल संपत्ति करीब ढाई सौ करोड़ रुपये हैं । इस अनुमान के मुताबिक राज्यों के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति आठ करोड़ रुपये है । लेकिन अगर उसमें से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और तमिलनाडू के मुख्यमंत्री(अब पूर्व) करुणानिधि की संपत्ति हटा दी जाए तो देश के मुख्यमंत्रियों की औसत संपत्ति घटकर करीब चार करोड़ रुपए रह जाएगी । तकरीबन 87 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और दलित नेता मायावती देश की सबसे अमीर मुख्यमंत्री हैं । दो हजार दस में मायावती ने बताया था कि उनकी संपत्ति तीन साल में 35 करोड़ रुपये बढ़ गई है यानि की तीन साल में बावन करोड़ से बढ़कर सत्तासी करोड़, तकरीबन सड़सठ फीसदी का इजाफा । केंद्रीय मंत्रियों की लिस्ट पर भी अगर नजर डालेंगे तो यह अमीरी नजर आएगी । कहां से आ रहे हैं ये पैसे, ये तो घोषित संपत्ति है, क्या कोई अघोषित संपत्ति भी है । इस तरह के सवाल पूरे देश को मथ रहे हैं । कोई कहता है कि उनके समर्थक चंदा देते हैं तो कोई अपने कारोबार के बूते करोड़पति बनने की बात कर रहा है । नतीजा यह हो रहा है कि पूरे देश में इस वक्त पॉलिटिकल क्लास को लेकर जनता के मन में एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है । आजादी के तकरीबन चौंसठ साल बाद भी आज देश की जनता अपने चुने हुए नेताओं पर भरोसा नहीं कर पा रही है तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बात है । देश की आजादी की वर्षगांठ पर पॉलिटिकल क्लास के लोगों के लिए आत्ममंथन का भी वक्त है ।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि सत्ताधरी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करनेवाली संस्थाओं पर ही हमले करने लगे हैं । जब सीएजी की रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री के खिलाफ आता है तो कांग्रेस के प्रवक्ता उस संस्था को ही सवालों के घेरे में ले लेते हैं । उसके पहले टेलीकॉम घोटाले में कैग की रिपोर्ट की जांच कर रही संसद की लोकलेखा समिति पर भी कांग्रेस के लोगों ने इस तरह से ही सवाल खड़े कर दिए थे । भ्रष्टाचारियों को बचाने या फिर उनके समर्थन के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले से ऐसा लगता है कि कांग्रेस को भ्रष्ट लोगों की ज्यादा चिंता है बजाए संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा की । आजादी के बाद जिस तरह से उन्नीस सौ पचास में सीएजी को बनाकर उसे संवैधानिक आजादी दी गई और जिसे जवाहरलाल नेहरू ने अपने शासनकाल में मजबूकी दी आज उसपर ही इस वक्त के कांग्रेसी उंगली उठा रहे हैं ।
पूरा देश यह भी देख रहा है कि किस तरह से अन्ना हजारे, जो कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक बन चुके हैं, को परेशान किया जा रहा है । उनकी आवाज को दबाने या फिर उनको या उनकी टीम को परेशान करने का कोई मौका सरकार नहीं छोड़ रही है । चाहे वो दिल्ली में अनशन करने देने के लिए जगह देना का मामला हो या फिर लोकपाल बिल में मनमानी करने का । अन्ना के खिलाफ खड़े होकर सरकार ने इतनी बड़ी गलती कर दी है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं है । दरअसल आज कांग्रेस के पास आजादी के आंदोलन से तपकर निकले जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, एस राधाकृष्णन और डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जौसे नेता नहीं हैं जो एक नैतिक उदाहरण पेश कर सकें । अन्ना ने ईमानदारी की जो नैतिक चुनौती सरकार को दी है उसका जवाब देने के लिए कांग्रेस के पास कोई नेता नहीं है । कपिल सिब्बल हों या फिर चिदंबरम या फिर विवादित बयानों के लिए चर्चित दिग्विजय सिंह- इन सबमें वो नैतिक ताकत नहीं है जो अन्ना हजारे का मुकाबला कर सके । लेकिन उससे भी चिंता की बात यह है कि देश में इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई ना होते देख जनता क्षुब्ध होने लगी है, उनका धैर्य जवाब देने लगा है । आज जश्ने आजादी के बीच पॉलिटिकल क्लास को जनता की इस नाराजगी का संज्ञान लेना चाहिए ।
Friday, August 12, 2011
...किसी से हो नहीं सकता
हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद खास दिन होता है । इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है । लेकिन हिंदी पट्टी में अपने इस गौरव को लेकर कोई उत्साह देखने को मिलता हो यह ज्ञात नहीं है । प्रेमचंद के गांव लमही में कुछ सरकारी टाइप के कार्यक्रम हो जाते हैं जिसमें मंत्री वगैरा भाषण आदि देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं । इस बार भी वहां कुछ वैसा ही हुआ । लेकिन तकरीबन पिछले पच्चीस साल से हंस पत्रिका प्रेमचंद के जन्मदिन पर दिल्ली में एक विचार गोष्ठी का आयोजन करती रही है । इस बार भी किया । राजेन्द्र यादव के संपादन में निकलते हुए इस पत्रिका के पच्चीस साल हो गए हैं, लिहाजा मौका खास था । हंस की रजत जयंती वर्ष और प्रेमचंद की जयंती । दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब के हॉल में हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था । हर साल की तरह इस वर्ष भी साहित्यक जमात का ठीक-ठाक जमावड़ा लगा था । हर तबके के लेखक वहां मौजूद थे। दो तीन पीढ़ी के लेखक तो थे ही । मैं जब पहुंचा तो उसके कुछ देर बाद बांग्लादेश की विवादास्पद लेखिका तस्लीमा नसरीन भी वहां आईं । तसलीमा के साथ एक सुरक्षाकर्मी भी था । लेकिन मैं ये देखकर हैरान रह गया कि तसलीमा को काफी देर तक खड़ा रहकर इधर उधर देखना पड़ा । उनको लेकर वहां मौजूद लोगों में कोई उत्साह नहीं दिखा । लेकिन कुछ देर जब वो अकेली खड़ी रहीं तो फिर किसी ने उन्हें हॉल का रास्ता दिखाया । ये वही तसलीमा थी जो तकरीबन दस साल पहले वाणी प्रकाशन के एक कार्यक्रम में दिल्ली आई थी तो लगा था कि राजधानी में कोई घटना घटी हो । दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के हॉल में तिल रखने की जगह नहीं थी । देशी-विदेशी मीडिया के दर्जनों कैमरे और पत्रकार तो वहां मौजूद थे ही, हिंदी का बड़ा से बड़ा लेखक भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को बेताब था । तस्लीमा की एक झलक पाने के लिए लोग उतावले हो रहे थे, तस्लीमा के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लोग सिफारिश कर रहे थे । हमारे मित्र अरुण महेश्वरी से । लेकिन उस वक्त अपने आयोजन की सफलता से गदगद अरुण जी ने लोगों को छोड़ दिया और तसलीमा के साथ अशोक वाजपेयी और कुंवर नारायण को लेकर लंच के लिए चले गए । जबतक तसलीमा वहां रही कैमरे का फ्लैश बंद होने का नाम नहीं ले रहा था । जींस और टी शर्ट पहने छरहरी काया की तस्लीमा अपने स्वागत से भाव विभोर थी । लेकिन सिर्फ दस साल में माहौल कितना बदल गया । तस्लीमा दिल्ली की उसी साहित्यिक जमात के बीच खड़ी थी लेकिन उनका कोई नोटिस नहीं ले रहा था । वजह चाहे जो भी हो । खैर ये एक अलग बात है जो प्रसंगवश मैं कह गया ।
हम बात कर रहे थे हंस के 25 साल पूरे होने की ।राजेन्द्र यादव जी ने कार्यक्रम की शुरूआत की और हंस के शुरुआती दिनों के अपने दोस्तो- लालानी जी और गौतम नवलखा आदि को शिद्दत से याद किया । छोटा सा भाषण भी दिया और टॉलस्टॉय की एक कहानी भी सुनाई । मैं लंबे समय से राजेन्द्र जी को सुनते आ रहा हूं उस दिन पहली बार लगा कि पाइप और सिगरेट के कश ने उनको काफी कमजोर कर दिया है । हिंदी साहित्य का अस्सी साल का ये जवान शारीरिक रूप से भले ही कमजोर लग रहा हो लेकिन हौसले अब भी बुलंद नजर आ रहे थे । राजेन्द्र यादव ने अपना भाषण समाप्त कर हिंदी के दलित लेखक अजय नावरिया को मंच संचालन के लिए बुला लिया । यहीं से समारोह की गरिमा के खत्म होने की शुरूआत हो गई । अजय नावरिया ने बेहद मसखरेपन के साथ मंच संचालन शुरू किया । मंच संचालन इतना खराब था कि उसकी चर्चा करना समय बर्बाद करना है । लेकिन जिस अपमानजनक तरीके की टिप्पणी अजय ने अपने मंच संचालन के दौरान की उसके लिए उसे कम से कम दुर्गा से तो माफी मांगनी ही चाहिए । दुर्गा प्रसाद राजेन्द्र जी के पुराने सहयोगी हैं । उन्हें भी इस मौके पर सम्मानित किया गया । स्मृति चिन्ह के साथ एक लिफाफा दिया गया । गिफ्ट देते वक्त अजय ने कहा – दुर्गा जी तो दो पैंट शर्ट के कपड़ा दिया जा रहा है जो उनके लिए उपयोगी है । वो इतने पर ही नहीं रुके उन्होंने सार्वजनिक रूप से दुर्गा की खुराक के बारे में टिप्पणी कर डाली। काफी देर तक साहित्यिक जमात ने अजय तो झेला लेकिन जब लोगों का धैक्य जवाब दे गया तो कुछ उत्साही लोगों ने उसे हूट कर बैठा दिया । भीड़ जबतक इंसाफ कर पाती तबतक अजय नावरिया ने साहित्यिक समारोह की गरिमा को समूल रूप से नष्ट कर दिया था । काफी देर तक चले मसखरेपन के बाद लालानी जी ने बोलना शुरू किया । उन्होंने राजेन्द्र यादव के साथ अपने शुरुआती दिनों को याद किया । बोले तो गौतम नवलखा और अर्चना वर्मा भी । दोनों ने बेहद संक्षिप्त बोला और सिर्फ हंस की तारीफों के पुल बांधे । अर्चना वर्मा ने हंस के साथ के अपने दिनों को बताया कि किस तरह से वो सिर्फ परख देखने के लिए हंस में आई थी और किस तरह से उन्हें कहानी और फिर कम पड़ रहे लेख भी लिखवाया जाने लगा ।
इसके बाद बारी थी हिंदी के हिरामन नामवर सिंह की । नामवर जी को हंस और साहित्यिक पत्रकारिता पर बोलना था लेकिन बोले वो सिर्फ हंस पर । शुरुआत तो उन्होंने – मेरे दुश्मन राजेन्द्र यादव से की लेकिन उसके बाद उन्होंने राजेन्द्र यादव के हौसले की जबरदस्त तारीफ की । सार्वजनिक रूप से अपनी तारीफ सुनकर मंच पर बैठे यादव जी का चेहरा लाल-लाल हो रहा था । शरमा इस तरह रहे थे जैसे कोई नई नवेली दुल्हन शर्माती है । लेकिन नामवर जी तो अपनी रौ में थे । अपने विरोधियों को अपनी पत्रिका में जगह देने के लिए भी उन्होंने यादव जी की नामवरी अंदाज में सराहना की । उसी नामवरी अंदाज में अशोक वाजपेयी पर हमला भी बोला । नामवर जी ने कहा कि अशोक जब पूर्वग्रह के संपादक थे तो अपने पूर्वग्रहों के साथ उसका संपादन करते थे । उन्होंने कभी राजेन्द्र यादव को पत्रिका में नहीं छापा लेकिन राजेन्द्र ने हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक में अशोक वाजपेयी से ही लिखवाया । बोलते बोलते नामवर सिंह ने अशोक वजपेयी को कायर और यादव जी को बहादुर करार दे दिया । नाम तो रवीन्द्र कालिया और अखिलेश का भी आया है । नामवर सिंह बहुत कम बोले । साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रकाश डालते तो मौजूद श्रोताओं का ज्ञानवर्धन होता । उसके बाद कुछ सवाल जवाब भी हुए । लेकिन नामवर सिंह ने एक जोरदार शेर के साथ अपनी बात खत्म की – जो हो सकता है इससे वो किसी से हो नहीं सकता, मगर देखो तो जो हो सकता है वो आदमी से हो नहीं सकता ।
दिल्ली में हुए इस साहित्यक जलसे से एक बात साफ हो गई कि राजेन्द्र यादव हर उम्र के बीच खासे लोकप्रिय हैं । कार्यक्रम से बाहर निकलते हुए मैं एक बार फिर से सोच रहा था कि अंग्रेजी में अगर किसी लिटरेरी मैगजीन के प्रकाशन के पच्चीस साल पूरे होते तो क्या इस तरह का ही समारोह मनाया जाता । जवाब मिला नहीं । तो फिर हम हिंदी के लोग क्यों नहीं अपने गौरव का सम्मान कर पाते हैं । क्यों नहीं हमारा मीडिया इस तरह की समारोह को कवरेज देता है । इन सवालों से जूझता हुआ मैं घर लौट आया । सवाल अब भी मेरा पीछा कर रहे हैं ।
Friday, August 5, 2011
सफलता के नशे में बेअंदाज धोनी
भारतीय क्रिकेट टीम को बुलंदी के शिखर पर पहुंचाने वाला शख्स- महेन्द्र सिहं धौनी । पहले टी 20 में देश को विश्वविजेता बनाने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । तकरीबन अट्ठाइस साल बाद भारतीय क्रिकेट के लिए विश्वविजेता का ताज हासिल करने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया को नंबर वन की कुर्सी तक पहुंचाने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । अबतक अपने देश की धरती या फिर विदेश में कोई भी टेस्ट सीरीज नहीं हारने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । बहुत कम समय में इतनी सारी सफलताओं का स्वाद चखना और उसको जज्ब करके शांत चित्त रहकर दुनिया भर में अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा लेना वाला शख्स महेन्द्र सिंह धोनी। लेकिन अब लगता है कि सफलता के शीर्ष पर बैठा भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान पर वही सफलता उनके सर चढ़कर बोलने लगी है । सफलात के नशे में वो इतना चूर हो गए हैं कि अपने अलावा उन्हें कुछ और दिखता ही नहीं है । पिछले दिनों लंदन में भारत के उच्चायोग की पार्टी में समय देकर महेन्द्र सिंह धोनी नहीं गए । वह अपनी पत्नी के फाइंडेशन के लिए धन इकट्ठा करने के लिए एक होटल में नीलामी के लिए मौजूद थे । मौजूद तो वहां सचिन तेंदुलकर समेत पूरी टीम इंडिया भी थी । इस वजह से उच्चायोग को अंतिम समय में क्रिकेटरों के सम्मान में आयोजित अपनी पार्टी रद्द करनी पड़ी । डिप्लोमैटिक सर्किल में देश की ना सिर्फ बेइज्जती हुई बल्कि उच्चायोग के लिए यह एक बेहद शर्मिंदगी लेकर भी आया। लंदन के भारतीय उच्चायोग की यह पार्टी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के नियमों और परंपराओं के मुताबिक ही थी । नियम ये कहता है कि विदेश यात्रा पर जा रही टीम इंडिया को उच्चायोग या राजदूतावास के दावत में सम्मिलित होना आवश्यक है । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि क्रिकेट के मैदान में प्रचलित मान्यताओं की धज्जी उड़ानेवाले धौनी को यह याद नहीं रहा कि डिप्लोमेसी में इस तरह के कदम पूरे देश की किरकिरी हो सकती है । हुई भी । क्रिकेट के मैदान पर विकेट कीपर को गेंदबाजी करते हुए नहीं देखा गया है । लेकिन इंगलैंड के खिलाफ टेस्ट सिरीज में धौनी ने प्रचलिक मान्यताओं को धता बता दिया। दस्ताने उतार कर भारत के इस विकेटकीपर को दुनिया ने गेंदबाजी करते हुए देखा। भारतीय टीम के पूर्व कप्तान कपिलदेव और सौरव गांगुली ने धौनी के इस कदम को क्रिकेट का माखौल उड़ानेवाला कदम करार दिया था ।
जब लंदन के भारतीय उच्चायोग ने विदेश मंत्रालय से धौनी के इस वर्ताव की शिकायत की तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड धौनी के बचाव में उतर आया । दरअसल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार तर्क गढ़ता रहता है । जब उस संस्था पर मनोरंजन कर और इंकम टैक्स लगाने की बात होती है तो वह अपने आपको देश के गौरव से जोड़कर इन करों में रियायत की वकालत करता है । लेकिन जब यही अपेक्षा देश उनसे करता है तो वो अपने आपको निजी संस्था बताने में लग जाते हैं । इस तरह के कई वाकए हुए हैं जब बीसीसीआई ने अलग अलग वक्त पर अलग अलग स्टैंड लिया है । जहां तक मुझे याद है कि किसी मामले में अदालत में भी बीसीसीआई ने इस तर्क का सहारा लिया था कि वह एक निजी संस्था है और लोकहित के नाम पर उसपर दबाव नहीं बनाया जा सकता है । देश के लिए गौरव की बात करनेवाले क्रिकेट बोर्ड को देश के गौरव की अगर फिक्र होती तो धौनी और टीम इंडिया को उच्चायोग के डिनर में जाना होता । लेकिन खिलाड़ियों को भी लगता है कि जब बोर्ड को ही देश की फिक्र नहीं है तो उन्हें क्यों हो । हमारे क्रिकेट के खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ पैसा के लिए खेलते हैं । देश के गौरव का तो वो पैसा कमाने के लिए एक प्लेटफॉर्म की तरह इस्तेमाल करते हैं और यह सीख उन्हें उनके संस्था यानि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से मिलती है । दरअसल क्रिकेट खेलनेवाले खिलाड़ी पैसा कमाने की अंधी दौड़ में इस कदर मुब्तिला हो चुके हैं कि उन्हें विदेशों में भी देश के गौरव और सम्मान की चिंता नहीं रहती । महेन्द्र सिंह धौनी देश के पिछड़े राज्यों में एक झारखंड से आते हैं और बेहद संघर्षों के बाद अपनी काबिलियत के बूते पर एक मुकाम हासिल किया लेकिन अब लगता है कि सफलता के शीर्ष पर पहुंचकर या तो वो असुरक्षा बोध से ग्रस्त हो गए हैं या फिर सफलता का ऐसा नशा उनपर चढ़ा है कि वो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं है । ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब पद्म पुरस्कार वितरण समारोह में भी महेन्द्र सिंह धौनी नहीं पहुंचे थे । जिस दिन महामहिम राष्ट्रपति महेन्द्र सिंह धौनी समेत देश के अन्य विशिष्ट वयक्तियों को पद्म पुरस्कारों से नवाजनेवाली थी उस दिन धोनी साहब के किसी विज्ञापन फिल्म की शूटिंग में वयस्त होने की खबर आई थी । उस वक्त भी महेन्द्र सिंह धौनी के पद्म पुरस्कार नहीं लेने के लिए पहुंचने पर खासी आलोचना हुई थी । तब भी बीसीसीआई ने धौनी का बचाव किया था और अब भी वो लचर दलीलों के साथ अपने कप्तान का बचाव कर रही है ।
लेकिन ऐसा लगता है कि धोनी को पैसे के आगे ना तो अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल है और ना ही देश और उसकी संवैदानिक मान्यताओं और संस्थाओं का । अब वक्त आ गया है कि देश के कर्ता-धर्ताओं को या भारत सरकार को बीसीसीआई को एकदम से नितांत निजी संस्था की तरह ट्रीट करना चाहिए और ना तो उन्हें टैक्स में किसी तरह की रियायत मिलनी चाहिए और ना ही आईपीएल के तमाशे में मनोरंजन कर में छूट मिलनी चाहिए । दरअसल इतना कड़ा स्टैंड हम तभी ले पाएंगे जब देश के शीर्ष नेतृत्व में दृढ राजनैति इच्छा शक्ति हो । अबतक बीसीसीआई पर उन्हीं लोगों का कब्जा है जो या तो सरकार में शामिल रहे हैं या फिर सरकार में शामिल लोगों के पिट्ठू रहे हैं । नतीजा यह होता है कि देश की एक निजी संस्था को पैसा कमाने के लिए देश का नाम का इस्तेमाल करने की छूट मिली हुई है । उनसे तत्काल यह छूट वापस ली जानी चाहिए और उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम की बजाए बीसीसीआई की टीम माना जाना चाहिए । और सिर्फ देश की सरकार को नहीं बल्कि देश की जनता को भी क्रिकेटरों को किसी निजी संस्था के लिए खेलनेवाले खिलाड़ियों की तरह मानना चाहिए और उनके साथ भी उसी तरह का व्यवहार करना चाहिए । वो किसी क्लब के हीरो हो सकते हैं किसी देश के नहीं । देश का नायक होने के लिए देश की इज्जत, उसकी मान मर्यादा, उसकी मान्यताओं, उसकी परंपराओं में ना केवल विश्वास और आस्था होना जरूरी है बल्कि समय आने पर यह दिखाना भी पडता है कि मान्यताओं में आस्था और विश्वास भी है
जब लंदन के भारतीय उच्चायोग ने विदेश मंत्रालय से धौनी के इस वर्ताव की शिकायत की तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड धौनी के बचाव में उतर आया । दरअसल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार तर्क गढ़ता रहता है । जब उस संस्था पर मनोरंजन कर और इंकम टैक्स लगाने की बात होती है तो वह अपने आपको देश के गौरव से जोड़कर इन करों में रियायत की वकालत करता है । लेकिन जब यही अपेक्षा देश उनसे करता है तो वो अपने आपको निजी संस्था बताने में लग जाते हैं । इस तरह के कई वाकए हुए हैं जब बीसीसीआई ने अलग अलग वक्त पर अलग अलग स्टैंड लिया है । जहां तक मुझे याद है कि किसी मामले में अदालत में भी बीसीसीआई ने इस तर्क का सहारा लिया था कि वह एक निजी संस्था है और लोकहित के नाम पर उसपर दबाव नहीं बनाया जा सकता है । देश के लिए गौरव की बात करनेवाले क्रिकेट बोर्ड को देश के गौरव की अगर फिक्र होती तो धौनी और टीम इंडिया को उच्चायोग के डिनर में जाना होता । लेकिन खिलाड़ियों को भी लगता है कि जब बोर्ड को ही देश की फिक्र नहीं है तो उन्हें क्यों हो । हमारे क्रिकेट के खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ पैसा के लिए खेलते हैं । देश के गौरव का तो वो पैसा कमाने के लिए एक प्लेटफॉर्म की तरह इस्तेमाल करते हैं और यह सीख उन्हें उनके संस्था यानि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से मिलती है । दरअसल क्रिकेट खेलनेवाले खिलाड़ी पैसा कमाने की अंधी दौड़ में इस कदर मुब्तिला हो चुके हैं कि उन्हें विदेशों में भी देश के गौरव और सम्मान की चिंता नहीं रहती । महेन्द्र सिंह धौनी देश के पिछड़े राज्यों में एक झारखंड से आते हैं और बेहद संघर्षों के बाद अपनी काबिलियत के बूते पर एक मुकाम हासिल किया लेकिन अब लगता है कि सफलता के शीर्ष पर पहुंचकर या तो वो असुरक्षा बोध से ग्रस्त हो गए हैं या फिर सफलता का ऐसा नशा उनपर चढ़ा है कि वो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं है । ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब पद्म पुरस्कार वितरण समारोह में भी महेन्द्र सिंह धौनी नहीं पहुंचे थे । जिस दिन महामहिम राष्ट्रपति महेन्द्र सिंह धौनी समेत देश के अन्य विशिष्ट वयक्तियों को पद्म पुरस्कारों से नवाजनेवाली थी उस दिन धोनी साहब के किसी विज्ञापन फिल्म की शूटिंग में वयस्त होने की खबर आई थी । उस वक्त भी महेन्द्र सिंह धौनी के पद्म पुरस्कार नहीं लेने के लिए पहुंचने पर खासी आलोचना हुई थी । तब भी बीसीसीआई ने धौनी का बचाव किया था और अब भी वो लचर दलीलों के साथ अपने कप्तान का बचाव कर रही है ।
लेकिन ऐसा लगता है कि धोनी को पैसे के आगे ना तो अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल है और ना ही देश और उसकी संवैदानिक मान्यताओं और संस्थाओं का । अब वक्त आ गया है कि देश के कर्ता-धर्ताओं को या भारत सरकार को बीसीसीआई को एकदम से नितांत निजी संस्था की तरह ट्रीट करना चाहिए और ना तो उन्हें टैक्स में किसी तरह की रियायत मिलनी चाहिए और ना ही आईपीएल के तमाशे में मनोरंजन कर में छूट मिलनी चाहिए । दरअसल इतना कड़ा स्टैंड हम तभी ले पाएंगे जब देश के शीर्ष नेतृत्व में दृढ राजनैति इच्छा शक्ति हो । अबतक बीसीसीआई पर उन्हीं लोगों का कब्जा है जो या तो सरकार में शामिल रहे हैं या फिर सरकार में शामिल लोगों के पिट्ठू रहे हैं । नतीजा यह होता है कि देश की एक निजी संस्था को पैसा कमाने के लिए देश का नाम का इस्तेमाल करने की छूट मिली हुई है । उनसे तत्काल यह छूट वापस ली जानी चाहिए और उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम की बजाए बीसीसीआई की टीम माना जाना चाहिए । और सिर्फ देश की सरकार को नहीं बल्कि देश की जनता को भी क्रिकेटरों को किसी निजी संस्था के लिए खेलनेवाले खिलाड़ियों की तरह मानना चाहिए और उनके साथ भी उसी तरह का व्यवहार करना चाहिए । वो किसी क्लब के हीरो हो सकते हैं किसी देश के नहीं । देश का नायक होने के लिए देश की इज्जत, उसकी मान मर्यादा, उसकी मान्यताओं, उसकी परंपराओं में ना केवल विश्वास और आस्था होना जरूरी है बल्कि समय आने पर यह दिखाना भी पडता है कि मान्यताओं में आस्था और विश्वास भी है
Wednesday, August 3, 2011
आतंक के आका की जीवनी
पाकिस्तानके मिलिट्री शहर एबटाबाद में जब इस साल दो मई को दुनिया केसबसे दुर्दांत और खूंखार आतंकवादी को अमेरिकी नेवी सील्स ने मार गिरायातो पूरे विश्व में मौत के इस सौदागर ओसामा बिन लादेन के बारे में जाननेकी जिज्ञासा लोगों में बेतरह बढ़ गई । अमेरिकी कार्रवाई के बाद जिस रह सेएबटाबाद के ओसामा के ठिकाने से उसके और उसकी बेगम, उसके बच्चे, उसकेपरिवार और उसके रहन सहन के तौर तरीकों के बारे में खबरें निकल कर आ रहीथी उसने ओसामा और उसकी निजी जिंदगी में लोगों की रुचि और बढ़ा दी । पूरीदुनिया के लोग ये जानने के लिए बेताब हो रहे थे कि ओसामा का बचपन कहांबीता, उसका पारिवारिक जीवन कैसा था, उसकी परवरिश किस तरह के परिवेश मेंहुई, वो कैसे आतंकवादी बना, उसने कितनी शादियां की, कैसे उसनेअफगानिस्तान की तोरा बोरा की पहाड़ियों की गुफाओं में अपने दिन बिताए ।आदि आदि । ओसामा अपने जीते जी ही एक जिंदा किवदंती बन चुका था । उशने चारशादियों की और दर्जनों बच्चे पैदा किए । इतने बड़े परिवार को लेकर येशख्स आतंकवादी गतिविधियों को कैसे मैनेज करता था इसको लेकर तरह तरह कीहैरतअंगेज बातें छन छन कर बाहर निकलती थी । जब उसके आंतकवादी संगठन नेविश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में घुसकर 11 सितंबर जैसी दिल दहलादेनेवाली घटना को अंजाम दिया तो उसके बारे में जानने की जिज्ञासा और बढ़ीथी । उसके दिमाग को पढ़ने की ललक में कई लेखकों और मनोवैज्ञानिकों नेखासी मशक्कत की । मैं चौथी दुनिया के इस स्तंभ समेत कई जगहों पर पहले भीइस बात को कई बार कह चुका हूं कि अंग्रेजी के प्रकाशकों में पाठकों की इसजिज्ञासा को भांपने और फिर उसे पूरा करने की गजब की क्षमता और इच्छाशक्तिहै । जैसे ही कोई घटना होती है या फिर कोई बड़ी वारदात होती है उसे भीमार्केट करने की अद्भुत क्षमता अंग्रेजी के प्रकाशकों में है । यहां हमहिंदी जगत के लोग बेहद पिछड़े हुए नजर आते हैं । अब अगर हम ओसामा का हीउदाहरण लें तो पाते हैं कि उसके जीवन काल में और उसके मरणोपरांत अंग्रेजीमें उसको केंद्र में रखकर कई किताबें लिखी गई और पाठकों के बीच खासीलोकप्रिय भी हुई । खूब बिकी भी । लेकिन मेरे जानते हिंदी प्रकाशन जगत मेंओसामा को लेकर कोई हलचल ही नहीं हुई । आप दो मई के बाद के अखबार और न्यूजचैनलों को देख लीजिए वो ओसामा बिन लादेन के व्यक्तिगत जीवन से लेकर आतंकीसंगठन चलाने की उसकी क्षमता को लेकर भरे पड़े हैं । लेकिन अगर आप हिंदीप्रकाशकों की पुस्तक सूची देखें तो शायद ही ओसामा पर केंद्रित कोई किताबआपको नजर आए । इस तरह के कई उदाहरण आपको विश्व साहित्य में मिल जाएंगे ।चंद साल पहले की बात है ऑस्ट्रिया की एक दिल दहला देने वाली क्राइमस्टोरी दुनियाभर के अखबारों में सुर्खियां बनी थी । ऑस्ट्रिया में जोशफ्रिट्ज नाम के एक शख्स ने अपनी बेटी को चौबीस साल तक बंधक बनाकर रखा औरइस दौरान लगातार उसके साथ बलात्कार करता रहा । उसके अपनी बेटी से सातबच्चे भी पैदा हुए । यह एक साधारण अपराध की कहानी नहीं थी बल्कि यह एकऐसे जुर्म की दास्तां थी जिसने दुनियाभर के लोगों में पापी पिता के खिलाफघृणा भर दी । जब एमा डोनोग का उपन्यास-रूम- प्रकाशित हुआ तो उसे पश्चिमीदेशों के अखबारों ने जोश फ्रिट्ज के जुर्म से जोड़ दिया । उपन्यासकार परआरोप लगा कि उसने अपने उपन्यास का प्लॉट जोश फ्रिट्ज के जुर्म की कहानीसे उठाया है । इन आरोपों में चाहे जितना दम हो लेकिन प्रकाशकों ने पहलकरके-रूम- को जबरदस्त प्रचार दिलवाया । लेकिन हमारे हिंदी के प्रकाशककिसी तरह की कोई फॉर्वर्ड प्लानिंग नहीं करते । कारोबार को देसी अंदाजमें चलाते हैं, कारोबार को प्रोफेशनल तरीके से चलाने का चलन अभी हिंदीप्रकाशन जगत में है नहीं । जिस वक्त जो पांडुलिपि आ जाए उसे प्रकाशित करदेने का चलन ज्यादा है । खैर यह एक अवांतर विषय है जो विस्तार की मांगकरता है । इस पर फिर कभी बात होगी ।फिलहाल हम बात कर रहे थे ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद उस शख्सियत मेंपैदा हुए जन जिज्ञासा की । इसी जन जिज्ञासा के चलते दो हजार नौ मेंप्रकाशित ओसामा बिन लादेन की जीवनी को भारत में नए सिरे से लॉंच किया गयाहै । ओसामा की इस लगभग प्रामाणिक जीवनी को जीन सासन ने उसकी पहली पत्नीनजवा और उसके बेटे ओमर से बातचीत के आधार पर लिखा है । इस किताब के साथएक विडंबना है - दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी की यह जीवनी समर्पित है उनलोगों को जिनके अपने आतंकी हमले में मारे गए । उनलोगों को भी समर्पित हैयह किताब जो आतंकवादी वारदात के शिकार हुए ।दरअसल ओसामा के बारे में लिखना लगभग नामुमकिन था क्योंकि जब से आतंकीगतिविधियों में भाग लेना शुरू कर किया तो उसने खुद को जन-गतिविधियों सेदूर कर लिया । जब 1980 में सोवियत सेना ने अफगानिस्तान पर हमला किया तोओसामा और उसके रहनुमा अब्दुल्ला आजम ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप सेमुजाहिदीनों की मदद शुरू कर दी । उस वक्त तक ओसामा आतंकी संगठनों कोसिर्फ आर्थिक मदद कर रहा था । इस तरह की कई कहानियां जो ओसामा से जुड़ीहैं वो लगभग ज्ञात हैं लेकिन इस जीवनी में उसके बेटे ओमर और उसकी पहलीपत्नी नजवा ने कई राज खोले हैं । मसलन ओसामा के बारे में यह धारणा है किवो इंजीनियर था लेकिन उसकी पत्नी नजवा ने ये खुलासा किया है कि ओसामा नेकभी भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई नहीं की । ओसामा का पारिवारिक जीवन बेहदसंपन्न था । उसके पिता बहुत बड़े बिल्डर थे और 1966 में उन्होंने अपनापहला निजी विमान खरीदा था । ओसामा की इस जीवनी में उसके कई निजी प्रसंगोंको लेखक ने उसके बेटे और उसकी पत्नी से बातचीत और ईमेल से सवाल जबाव केआधार पर सामने लाकर कहानी की शक्ल दी है । अगर नजवा की माने तो ओसामा औरउसके बीच चौदह साल की उम्र के पहले ही प्यार हो गया था । नजवा को ओसामाकी आंखों में अपने लिए प्यार तो दिखता था लेकिन ओसामा उसको खुलकर बोलनहीं पाते थे । उसके मुताबिक ओसामा बेहद इंट्रोवर्ट था । नजवा ओसामा काचुप रहना बुरा भी लगता था। आखिरकार चौदह साल की उम्र में ओसामा ने अपनीअम्मी से अपने विवाह की इच्छा जाहिर कर दी । हलांकि नजवा की मां इस शादीके खिलाफ थी लेकिन परिवारवालों के दबाव के आगे दोनों के बीच शादी हुई ।ओसामा ने आगे चलकर तीन और शादियां की । नजवा और ओमर ने ओसामा को एकसंवेदनशील पारिवारिक इंसान से एक खूंखार आतंकवादी बनते देखा और उसे इसकिताब में बयान किया । अफगानिस्तान की तोरा-बोरा की पहाड़ी में एके 47 कीतड़तड़ाहट के बीच की जिंदगी को बेहद ही रोचक तरीके से पेश किया गया है ।ओसामा की इस जीवनी को उसकी पत्नी और बेटे से बातचीत के आधार पर एक सूत्रमें पिरोना बेहद मुश्किल काम था । जीन सासन ने काफी मशक्कत की है लेकिनकिताब के संपादन में उनसे चूक हो गई है उसमें से वेवजह के विस्तार और कुछघटनाओं के दोहराव को संपादित किया जा सकता था । शुरुआती अध्याय मेंमुस्लिम समाज में लड़कियों की स्थिति को बताने के लिए बेवजह का विस्तारदिया गया है । लगभग चार सौ पन्नों की यह किताब इस लिहाज से अहम है किइसमें ओसामा के बारे में उसके बेटे और बीबी ने विस्तार से बताया है जोलगभग प्रामाणिक माना जा सकता है ।
Tuesday, August 2, 2011
साहित्यिक “डॉन” का कारनामा
साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने के लिए अक्सर मैं दिल्ली के मयूर विहार इलाके में जाता हूं । जहां लोक शॉपिंग सेंटक के पास फुटपाथ पर तीन दुकानें लगती है । बिपिन के बुक स्टॉल पर मैं तकरीबन डेढ दशक से जा रहा हूं । इस बीच वहां पत्र-पत्रिकाओं की तीन दुकानें सजने लगी । जैसे ही मैं उसके पास पहुंचता हूं तो बिपन की दुनकान पर मौजूद शख्स मुझे या तो हंस या कथा देश या फिर पाखी पतड़ा देगा । जबतक मैं मयूर विहार इलाके में रहा तो उसकी दुकान पर नियमित जाता रहा । उसके बाद अब तो हफ्ते में एक बार ही जाना हो पाता है । वो भी इस वजह से कि इंदिरापुरम इलाके में कोई अच्छी दुकान नहीं हैं जहां साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध हो । यह एक बड़ी समस्या है । किस तरह से किसी खास पत्रिका या अखबार खरीदने के लिए दस बारह किलोमीटर जाना और फिर लौटना पड़ता है । खैर अगर मौका मिला तो इस विषय पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा । अभी तो जब मैं मयूर विहार के बुक स्टॉल पर गया तो उसने मुझे हंस शुक्रवार, समेत कई पत्र-पत्रिकाएं पकड़ा दिया । घर लौटकर जब उन पत्र-पत्रिकाओं को उलटना पलटना शुरू किया तो हंस के ताजा अंक पर छब्बीसवें वर्ष का पहला अंक देखकर चौंका । अगस्त दो हजार ग्यारह का अंक का मुखपृष्ठ गर्व से इसकी उद्घोषणा कर रहा था कि हमने अपने प्रकाशन के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं । है भी यह गर्व की ही बात । जब हमारे देश में एक-एक करके सारी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो रही थी तो उस माहौल में हंस ने अपने आपको शान से जिंदा रखा । ना केवल जिंदा रखा बल्कि हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं को सेठाश्रयी पत्रिकाओं की भाषा, कलेवर और तेवर तीनों से मुक्त कर एक नया रास्ता गढ़ा । नए रास्ते पर चलना हमेशा से खतरनाक माना जाता है । राजेन्द्र जी की इस बात के लिए तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हंस के लिए ना केवल नया कास्ता तलाश किया बल्कि निर्भीक होकर, आलोचनाओं के तीर झेलते हुए उसे नए रास्ते पर ही चलाए रखा ।
हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक को देखकर मैं थोड़ा नॉस्टेलिक भी हो गया । मुझे अपने कॉलेज के दिनों और अपने शहर जमालपुर की याद आ गई । हमाके शहर में रेलवे स्टेशन पर ए एच व्हीलर का स्टॉल ही हमारे लिए उम्मीद की एकमात्र किरण हुआ करता था । अस्सी के दशक के अंत में जमालपुर का व्हीलर स्टॉल इलाहाबाद के पांडे जी का हुआ करता था । वो साहित्यप्रेमी थे इस वजह से उनके स्टॉल पर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थी । राजस्थान से निकलनेवाली पत्रिका मधुमती तक उनके पास पहुंचती थी, पहल, वसुधा इंद्रपर्स्थ भारती आदि-आदि तो आती ही थी । मैंने पहली बार हंस वहीं से खरीदा था । महीना और साल ठीक से याद नहीं है । लेकिन फिर तो हंस का हर अंक खरीदने लगा, पढ़ने लगा । मंडल आंदोलन के दौरान और उसके बाद राजेन्द्र यादव के स्टैंड से घनघोर असहमतियां रही लेकिन कभी हंस खरीदना बंद नहीं किया । जमालपुर में हंस की दस प्रतियां आती थी जो महीने ती सात या फिर आठ तारीख को पहुंचती थी । दिल्ली से प्रतियां वी पी पी से आया करती थी । इस पद्धति में डाकघर जाकर वहां पैसे जमा करने के बाद ही बंडल मिलता था । व्हीलर के हमारे पंडित जी के लिए हंस का बंडल भी अन्य किताबों के बंडल की तरह से होता था । जब वक्त मिलता था तो किसी को भेजकर डाकघर से बंडल मंगवा लेते थे । लेकिन होता ये था कि पटना में हंस रेल से आता था जो दो तीन दिन पहले आ जाया करता था । वहां से मित्रों का फोन आना शुरू हो जाता था कि हंस में फलां लेख या फलां कहानीकार की कहानियां देखी । जो हमारी बेचैनी बढ़ा दिया करती थी । मुझे याद है कि कई बार मैं खुद डाकघर जाकर हंस के बंडल छुड़वा कर व्हीलर के स्टॉल पर पहुंचाया करता था । बाद में हमने हमने हंस को जल्दी पाने का एक विकल्प निकाला । हमने डाकिया को पटाया और उससे अनुरोध किया कि वो अपनी साइकिल पर हंस के बंडल डाकघर से उठा लाया करे और व्हीलर के पंडित जी को सौंप दे । फायदा यह हुआ कि हंस जिस दिन हमारे शहर के डाकघर में आता उस दिन ही हमें उपलब्ध हो जाता था । लेकिन फिर भी पटना से लेट ही मिलता था । हंस को खरीदने की यह बेचैनी अबतक बरकरार है । महीने की 23-24 तारीख से ही राजेन्द्र जी के प्राण लेने लग जाता हूं कि हंस जनहित में कब जारी हो रहा है । जनहित का मतलब है कि बिक्री के लिए दिल्ली के स्टॉल्स पर कब पहुंच रहा है । कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि हंस लेने राजेन्द्र जी के दफ्तर या फिर घर तक पहुंच गया ।
हंस ने छब्बीसवें साल में कदम रखते हुए जो पहला अंक निकाला है उसमें हंस और साहित्यिक पत्रिकाओं पर अशोक वाजपेयी, रवीन्द्र कालिया, जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी, पंकज बिष्ट, अखिलेश और शैलेन्द्र सागर के लेख छपे हैं । लगभग सभी लेखों का केंद्रीय भाव एक ही है । अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि – इसे भी निसंकोच स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी में नारी विमर्श और दलित विमर्श की आज जो जगह है, लगभग केंद्रीय, उसे वह दिलाने में हंस ने बड़ी भूमिका निभाई है । ऐसा करके उसने ना सिर्फ हिंदी साहित्य में इन दोनों विमर्शों और उनसे जुड़ी और प्रेरित रचनात्मकता को स्थापित किया, पोसा और बढाया । आगे लिखते हैं- यह नोट करना सुखद है कि पच्चीस वर्षों तक चलने के बाद भी हंस एक पठनीय पत्रिका है, वह आज भी प्रासंगिक बनी हुई है । ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया ने लिखा है – हंस के अवदान को नजरअंदाज किया ही नहीं जा सकता । हंस दीर्घजीवी ना होता तो आज हिंदी कहानी बुत पिछड़ चुकी होती । हिंदी कहानी को जिंदा रखने और बोल्डनेस को डिफेंड करने में राजेन्द्र जी की अपूर्व भूमिका है । .....राजेन्द्र जी ने यथास्थितिवाद पर लगातार प्रहार किए और दलित तथा नारी विमर्श को सामने लाने और निरंतर उसे गतिशीलता प्रदान करने में अपनी पूरी उर्जा लगा दी । तद्भव के संपादक अखिलेश भी यह मानते हैं कि- कह सकते हैं कि हंस ने हिंदी साहित्य का एजेंडा बदल दिया । दलित,स्त्री, पिछड़ा और अल्पसंख्यक यदि आज समाज और साहित्य के सरोकार बने हैं तो इसके पीछे हंस का भी पसीना है । तो हम यह देख रहे हैं कि हंस के बारे में हिंदी जगक की कमोबेश एक ही राय है । पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को ना केवल एक नई दिशा दी बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के संपादकों के हाथ पांव फूल जाते थे उसे राजेन्द्र यादव ने हंस में जोरदार तरीके से उठाया । खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर-भय और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया । अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय किस्म का माहौल था उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए । इसके अलावा हंस ने कहानीकारों की कई पीढियां भी तैयार कर दी । हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी थी । कालांतर में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
तो हंस को पच्चीस साल पूरे करने पर बधाई और उसके संपादक की जिजिविषा और उनकी दृढ इच्छा शक्ति को सलाम । ईश्वर से प्रार्थना इस बात की कि राजेन्द्र यादव जी को लंबी उम्र मिले और हंस निर्बाध गति से निकलता रहे ।
हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक को देखकर मैं थोड़ा नॉस्टेलिक भी हो गया । मुझे अपने कॉलेज के दिनों और अपने शहर जमालपुर की याद आ गई । हमाके शहर में रेलवे स्टेशन पर ए एच व्हीलर का स्टॉल ही हमारे लिए उम्मीद की एकमात्र किरण हुआ करता था । अस्सी के दशक के अंत में जमालपुर का व्हीलर स्टॉल इलाहाबाद के पांडे जी का हुआ करता था । वो साहित्यप्रेमी थे इस वजह से उनके स्टॉल पर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थी । राजस्थान से निकलनेवाली पत्रिका मधुमती तक उनके पास पहुंचती थी, पहल, वसुधा इंद्रपर्स्थ भारती आदि-आदि तो आती ही थी । मैंने पहली बार हंस वहीं से खरीदा था । महीना और साल ठीक से याद नहीं है । लेकिन फिर तो हंस का हर अंक खरीदने लगा, पढ़ने लगा । मंडल आंदोलन के दौरान और उसके बाद राजेन्द्र यादव के स्टैंड से घनघोर असहमतियां रही लेकिन कभी हंस खरीदना बंद नहीं किया । जमालपुर में हंस की दस प्रतियां आती थी जो महीने ती सात या फिर आठ तारीख को पहुंचती थी । दिल्ली से प्रतियां वी पी पी से आया करती थी । इस पद्धति में डाकघर जाकर वहां पैसे जमा करने के बाद ही बंडल मिलता था । व्हीलर के हमारे पंडित जी के लिए हंस का बंडल भी अन्य किताबों के बंडल की तरह से होता था । जब वक्त मिलता था तो किसी को भेजकर डाकघर से बंडल मंगवा लेते थे । लेकिन होता ये था कि पटना में हंस रेल से आता था जो दो तीन दिन पहले आ जाया करता था । वहां से मित्रों का फोन आना शुरू हो जाता था कि हंस में फलां लेख या फलां कहानीकार की कहानियां देखी । जो हमारी बेचैनी बढ़ा दिया करती थी । मुझे याद है कि कई बार मैं खुद डाकघर जाकर हंस के बंडल छुड़वा कर व्हीलर के स्टॉल पर पहुंचाया करता था । बाद में हमने हमने हंस को जल्दी पाने का एक विकल्प निकाला । हमने डाकिया को पटाया और उससे अनुरोध किया कि वो अपनी साइकिल पर हंस के बंडल डाकघर से उठा लाया करे और व्हीलर के पंडित जी को सौंप दे । फायदा यह हुआ कि हंस जिस दिन हमारे शहर के डाकघर में आता उस दिन ही हमें उपलब्ध हो जाता था । लेकिन फिर भी पटना से लेट ही मिलता था । हंस को खरीदने की यह बेचैनी अबतक बरकरार है । महीने की 23-24 तारीख से ही राजेन्द्र जी के प्राण लेने लग जाता हूं कि हंस जनहित में कब जारी हो रहा है । जनहित का मतलब है कि बिक्री के लिए दिल्ली के स्टॉल्स पर कब पहुंच रहा है । कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि हंस लेने राजेन्द्र जी के दफ्तर या फिर घर तक पहुंच गया ।
हंस ने छब्बीसवें साल में कदम रखते हुए जो पहला अंक निकाला है उसमें हंस और साहित्यिक पत्रिकाओं पर अशोक वाजपेयी, रवीन्द्र कालिया, जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी, पंकज बिष्ट, अखिलेश और शैलेन्द्र सागर के लेख छपे हैं । लगभग सभी लेखों का केंद्रीय भाव एक ही है । अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि – इसे भी निसंकोच स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी में नारी विमर्श और दलित विमर्श की आज जो जगह है, लगभग केंद्रीय, उसे वह दिलाने में हंस ने बड़ी भूमिका निभाई है । ऐसा करके उसने ना सिर्फ हिंदी साहित्य में इन दोनों विमर्शों और उनसे जुड़ी और प्रेरित रचनात्मकता को स्थापित किया, पोसा और बढाया । आगे लिखते हैं- यह नोट करना सुखद है कि पच्चीस वर्षों तक चलने के बाद भी हंस एक पठनीय पत्रिका है, वह आज भी प्रासंगिक बनी हुई है । ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया ने लिखा है – हंस के अवदान को नजरअंदाज किया ही नहीं जा सकता । हंस दीर्घजीवी ना होता तो आज हिंदी कहानी बुत पिछड़ चुकी होती । हिंदी कहानी को जिंदा रखने और बोल्डनेस को डिफेंड करने में राजेन्द्र जी की अपूर्व भूमिका है । .....राजेन्द्र जी ने यथास्थितिवाद पर लगातार प्रहार किए और दलित तथा नारी विमर्श को सामने लाने और निरंतर उसे गतिशीलता प्रदान करने में अपनी पूरी उर्जा लगा दी । तद्भव के संपादक अखिलेश भी यह मानते हैं कि- कह सकते हैं कि हंस ने हिंदी साहित्य का एजेंडा बदल दिया । दलित,स्त्री, पिछड़ा और अल्पसंख्यक यदि आज समाज और साहित्य के सरोकार बने हैं तो इसके पीछे हंस का भी पसीना है । तो हम यह देख रहे हैं कि हंस के बारे में हिंदी जगक की कमोबेश एक ही राय है । पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को ना केवल एक नई दिशा दी बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के संपादकों के हाथ पांव फूल जाते थे उसे राजेन्द्र यादव ने हंस में जोरदार तरीके से उठाया । खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर-भय और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया । अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय किस्म का माहौल था उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए । इसके अलावा हंस ने कहानीकारों की कई पीढियां भी तैयार कर दी । हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय का तलछट का कोरस, रमाकांत का कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्रकिशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढे आदमी के कमरे में छापकर हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी थी । कालांतर में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां – और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उर्फ..., सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था ।
तो हंस को पच्चीस साल पूरे करने पर बधाई और उसके संपादक की जिजिविषा और उनकी दृढ इच्छा शक्ति को सलाम । ईश्वर से प्रार्थना इस बात की कि राजेन्द्र यादव जी को लंबी उम्र मिले और हंस निर्बाध गति से निकलता रहे ।
Wednesday, July 27, 2011
साहित्य की क्लियोपेट्राएं
विश्व राजनीति के पटल पर क्लियोपेट्रा एक ऐसा नाम है जिसने अपनी खूबसूरती और अपने शरीर का इस्तेमाल अपने करियर को बढ़ाने में बेहतरीन तरीके से किया । उसने सेक्स पॉवर को पहचानते हुए खुलकर उसका उपयोग किया और उसे अपनी सफलता की सीढ़ी बना कर बुलंदी पर पहुंची । उसने सत्ता और शक्ति हासिल करने के लिए अपने भाई से ही विवाह किया और मिस्त्र की सत्ता हासिल की । लेकिन भाई से मनमुटाव के चलते उसे देश छोड़कर निर्वासित होना पड़ा । निर्वासन के बाद उसने सीजर को अपनी खूबसूरती के जाल में फंसाया और ना केवल उसके साथ सत्ता का सुख हासिल किया बल्कि कई सालों तक तानाशाह की तरह का जीवन भी जिया। जब सीजर की हत्या कर दी गई तो क्लियोपेट्रा ने पूर्वी रोम के मॉर्क एंटोनी को अपने सम्मोहन के जाल में फंसाकर अकूत संपत्ति हासिल की। क्लियोपेट्रा बहुत खूबसूरत नहीं थी लेकिन वो इस बात को जानती थी किस तरह से अपने शरीर का इस्तेमाल कर मर्दों को गुलाम बनाया जा सकता है । उसे उस हुनर का पता था जिसके बल पर वो बड़े-बड़े लोगों को अपने मोहजाल में फंसा सकती थी । साफ है कि क्लेयोपेट्रा ने सेक्स और अपने शरीर को एक कमॉडिटी की तरह अपने हक में सता हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया । उसने सेक्स को अंतराष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा भी बना दिया था । विश्व परिदृश्य में सिर्फ क्लियोपेट्रा ही नहीं बल्कि कई और महिलाएं हैं जिसने अपने महिला होने का, अपने देह का इस्तेमाल करके , जबरदस्त रूप से फायदा उठाया और सफलता हासिल की । रूस की महान साम्राज्ञी कैथरीन ने सत्ता हासिल करने के लिए अपने पति का कत्ल किया और फिर अपने आशिक के साथ देश पर लगभग तीस साल तक शासन किया । उसने भी सेक्स और सेक्सुअल पॉवर को सत्ता से जोड़कर अपनी स्थिति मजबूत की । उसके कितने आशिक थे या फिर उसने अपने कितने सुरक्षा गार्ड के साथ शारीरिक संबंध बनाए यह कहना बेहद कठिन है । कहनेवाले तो यहां तक कहते हैं कि अपने प्रेमी से शारीरिक संबंध बनाने के पहले वो नियमित तौर पर अपने एक सुरक्षाकर्मी तो चुनती थी और उसके साथ एकांत में काफी देरतक रोमांस करने के बाद अपने प्रेमी के पास पहुंचकर सेक्स करती थी । इस तरह से उसने कई सुरक्षाकर्मियों के साथ एक ऐसा रिश्ता बना लिया था जिसी काट नामुमकिन था । इस तरह की महिलाओं की लिस्ट और लंबी हो सकती है ।
ऐसा नहीं है कि इस तरह की महिलाएं, जो अपनी देह को सत्ता हासिल करने का जरिया बनाती हैं, सिर्फ विदेशों या पश्चिमी देशों में ही हैं । इस तरह के कई उदाहरण हमारे देश में भी मिल जाएंगे लेकिन हमारे यहां सेक्स या फिर इस तरह के संबंधों पर बातें तो खूब की जाती हैं लेकिन उसके बारे में लिखना गुनाह माना जाता है । अपने राजनेताओं और उनकी महिला मित्र के बारे में सत्ता के गलियारे में खूब चर्चा होती है लेकिन उसके बारे में सार्वजनिक रूप से कोई बहस नहीं होती । हमारे यहां यह समझा जाता है कि यह उनका वयक्तिगत जीवन है जिसमें झांकना उनकी निजता के अधिकार का हनन होगा । लेकिन उस वक्त हम भूल जाते हैं कि जिस वयक्ति का जीवन ही सार्वजनिक हो गया है उसका निजी कुछ नहीं रह जाता । गांधी जी भी कहा करते थे कि सार्वजनिक जीवन व्यतीत करनेवालों का निजी कुछ भी नहीं रह जाता । खैर यह एक अलग विषय है जिसपर विस्तार से बहस की जा सकती है ।
राजनीति के अलावा अगर हम हिंदी साहित्य की बात करें तो यहां भी आपको कई क्लियोपेट्रा मिल जाएंगी । जिन्होंने अपनी देह का इस्तेमाल साहित्य में अपने करियर को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में बखूबी किया । यहां मैं भी किसी एक या दो का नाम लेकर नाहक विवाद खड़ा करना नहीं चाहता लेकिन साहित्य के हलके में लोग इस तरह की क्लियोपेट्राओं को बखूबी जानते हैं । हिंदी साहित्य में देह मुक्ति आंदोलन के प्रणेता हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव तो इन क्लियोरेट्राओं से घिरे ही रहे है, कई को तो बढ़ावा भी दिया है (क्षमा सहित ये बात कह रहा हूं,लेकिन पूरा साहित्य जगत उन नामों से वाकिफ है ) । मैं यह नहीं कह रहा राजेन्द्र जी साहित्य के सीजर हैं लेकिन उनके दरबार में समय समय पर इस तरह की एक दो महिला लेखिका हमेशा से रही हैं । कई ने तो, जिनमें कुछ प्रतिभा थी, आगे चलकर लेखन में खूब नाम और यश दोनों कमाया । लेकिन जिनमें प्रतिभा नहीं सिर्फ महात्वाकांक्षा थी वो कुछ समय के लिए हिंदी साहित्य के आकाश पर धूमकेतु की तरह चमककर गायब हो गई। किसी के एक संग्रह आए तो किसी को कोई छोटा मोटा पुरस्कार मिल गया । उनके साहित्य के आकाश पर चमकने के साहित्येत्तर कारण रहे हैं । इन वजहों को राजेन्द्र जी चाहें तो खोल सकते हैं और साहित्य के क्लियोपेट्राओं का नाम भी बता सकते हैं, बता देना भी चाहिए । लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्थितियों और नामों को काल्पनिक रूप देकर वास्तविकता को छुपा दिया उसके बाद उनसे तो यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की जा सकती है कि वो हिंदी साहित्य की क्लियोरेट्राओं का नाम उजागर करें । जानते वो सबकुछ हैं । राजेन्द्र यादव के बाद लोगों की उम्मीद अशोक वाजपेयी से भी हो सकती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर अशोक जी की जो छवि है उसमें उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वो हिंदी की इन क्लियोपेट्राओं का नाम लेंगे । अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जानेवाले प्रसिद्ध उपन्यासकार और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय जिस तरह से छिनाल विवाद में अपना हाथ जला चुके हैं उसके बाद तो उनसे इस स्त्रियों के मामले में कुछ भी अपेक्षा नहीं की जा सकती है ।
हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में अब काफी बदलाव देखा जा सकता है । कई लेखिकाएं तो खुले तौर पर दैहिक उदारवाद की बात करती हैं । बातचीत में जो बिंदासपन और खुलापन है वो उनके स्वभाव में भी देखा जा सकता है । उनके लिए सेक्स अब टैबू नहीं है, देह उनके लिए भी उसकी तरह उपभोग की वस्तु है जिस तरह से मर्दों के लिए । अपने परुष मित्रों के साथ सेक्स संबंध बनाने में उन्हें ना तो कोई एतराज होता है और ना ही झिझक । लेकिन नाम और यश कमाने के लिए जिस तरह से उसका उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है वो चिंता की बात है । हमारे यहां क्लियोपेट्रा अब एक नाम नहीं रही बल्कि यह एक प्रवृत्ति के तौर पर स्थापित हो चुकी है । एक संज्ञा के प्रवृत्ति में बदलने की जो प्रक्रिया है वो चिंता की बात है । कई नवोदित लेखिकाएं इस राह पर चलकर शॉर्टकट में सफलता हासिल करना चाहती हैं जो साहित्य के लिए चिंता की बात है । लेकिन उन लेखिकाओं को शॉर्टकट में सफलता की राह दिखाने के लिए कई कवि मित्र सदैव तत्पर रहते हैं । उन्हें तो तलाश रहती है बस मौके की । मेरा यह कहने का मतलब कतई नहीं है कि साहित्य में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए सभी लेखिकाएं अपने शरीर का इस्तेमाल करती हैं । ना ही मैं स्त्रियों या लेखिकाओं को अपमानित करने के लिए ये लेख लिख रहा हूं । मेरी मंशा उस तरह की लेखिकाओं को हतोत्साहित करने की है जो बगैर किसी प्रतिभा के सिर्फ अपनी देह के बूते हिंदी साहित्य का सारा आकाश झेकना चाहती है ।
ऐसा नहीं है कि इस तरह की महिलाएं, जो अपनी देह को सत्ता हासिल करने का जरिया बनाती हैं, सिर्फ विदेशों या पश्चिमी देशों में ही हैं । इस तरह के कई उदाहरण हमारे देश में भी मिल जाएंगे लेकिन हमारे यहां सेक्स या फिर इस तरह के संबंधों पर बातें तो खूब की जाती हैं लेकिन उसके बारे में लिखना गुनाह माना जाता है । अपने राजनेताओं और उनकी महिला मित्र के बारे में सत्ता के गलियारे में खूब चर्चा होती है लेकिन उसके बारे में सार्वजनिक रूप से कोई बहस नहीं होती । हमारे यहां यह समझा जाता है कि यह उनका वयक्तिगत जीवन है जिसमें झांकना उनकी निजता के अधिकार का हनन होगा । लेकिन उस वक्त हम भूल जाते हैं कि जिस वयक्ति का जीवन ही सार्वजनिक हो गया है उसका निजी कुछ नहीं रह जाता । गांधी जी भी कहा करते थे कि सार्वजनिक जीवन व्यतीत करनेवालों का निजी कुछ भी नहीं रह जाता । खैर यह एक अलग विषय है जिसपर विस्तार से बहस की जा सकती है ।
राजनीति के अलावा अगर हम हिंदी साहित्य की बात करें तो यहां भी आपको कई क्लियोपेट्रा मिल जाएंगी । जिन्होंने अपनी देह का इस्तेमाल साहित्य में अपने करियर को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में बखूबी किया । यहां मैं भी किसी एक या दो का नाम लेकर नाहक विवाद खड़ा करना नहीं चाहता लेकिन साहित्य के हलके में लोग इस तरह की क्लियोपेट्राओं को बखूबी जानते हैं । हिंदी साहित्य में देह मुक्ति आंदोलन के प्रणेता हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव तो इन क्लियोरेट्राओं से घिरे ही रहे है, कई को तो बढ़ावा भी दिया है (क्षमा सहित ये बात कह रहा हूं,लेकिन पूरा साहित्य जगत उन नामों से वाकिफ है ) । मैं यह नहीं कह रहा राजेन्द्र जी साहित्य के सीजर हैं लेकिन उनके दरबार में समय समय पर इस तरह की एक दो महिला लेखिका हमेशा से रही हैं । कई ने तो, जिनमें कुछ प्रतिभा थी, आगे चलकर लेखन में खूब नाम और यश दोनों कमाया । लेकिन जिनमें प्रतिभा नहीं सिर्फ महात्वाकांक्षा थी वो कुछ समय के लिए हिंदी साहित्य के आकाश पर धूमकेतु की तरह चमककर गायब हो गई। किसी के एक संग्रह आए तो किसी को कोई छोटा मोटा पुरस्कार मिल गया । उनके साहित्य के आकाश पर चमकने के साहित्येत्तर कारण रहे हैं । इन वजहों को राजेन्द्र जी चाहें तो खोल सकते हैं और साहित्य के क्लियोपेट्राओं का नाम भी बता सकते हैं, बता देना भी चाहिए । लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्थितियों और नामों को काल्पनिक रूप देकर वास्तविकता को छुपा दिया उसके बाद उनसे तो यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की जा सकती है कि वो हिंदी साहित्य की क्लियोरेट्राओं का नाम उजागर करें । जानते वो सबकुछ हैं । राजेन्द्र यादव के बाद लोगों की उम्मीद अशोक वाजपेयी से भी हो सकती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर अशोक जी की जो छवि है उसमें उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वो हिंदी की इन क्लियोपेट्राओं का नाम लेंगे । अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जानेवाले प्रसिद्ध उपन्यासकार और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय जिस तरह से छिनाल विवाद में अपना हाथ जला चुके हैं उसके बाद तो उनसे इस स्त्रियों के मामले में कुछ भी अपेक्षा नहीं की जा सकती है ।
हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में अब काफी बदलाव देखा जा सकता है । कई लेखिकाएं तो खुले तौर पर दैहिक उदारवाद की बात करती हैं । बातचीत में जो बिंदासपन और खुलापन है वो उनके स्वभाव में भी देखा जा सकता है । उनके लिए सेक्स अब टैबू नहीं है, देह उनके लिए भी उसकी तरह उपभोग की वस्तु है जिस तरह से मर्दों के लिए । अपने परुष मित्रों के साथ सेक्स संबंध बनाने में उन्हें ना तो कोई एतराज होता है और ना ही झिझक । लेकिन नाम और यश कमाने के लिए जिस तरह से उसका उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है वो चिंता की बात है । हमारे यहां क्लियोपेट्रा अब एक नाम नहीं रही बल्कि यह एक प्रवृत्ति के तौर पर स्थापित हो चुकी है । एक संज्ञा के प्रवृत्ति में बदलने की जो प्रक्रिया है वो चिंता की बात है । कई नवोदित लेखिकाएं इस राह पर चलकर शॉर्टकट में सफलता हासिल करना चाहती हैं जो साहित्य के लिए चिंता की बात है । लेकिन उन लेखिकाओं को शॉर्टकट में सफलता की राह दिखाने के लिए कई कवि मित्र सदैव तत्पर रहते हैं । उन्हें तो तलाश रहती है बस मौके की । मेरा यह कहने का मतलब कतई नहीं है कि साहित्य में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए सभी लेखिकाएं अपने शरीर का इस्तेमाल करती हैं । ना ही मैं स्त्रियों या लेखिकाओं को अपमानित करने के लिए ये लेख लिख रहा हूं । मेरी मंशा उस तरह की लेखिकाओं को हतोत्साहित करने की है जो बगैर किसी प्रतिभा के सिर्फ अपनी देह के बूते हिंदी साहित्य का सारा आकाश झेकना चाहती है ।
Monday, July 25, 2011
भ्रष्टाचार पर कांग्रेस का दोहरा रवैया
हाल में ही में बांबे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के पशुधन मंत्री और कांग्रेस के दलित नेता नितिन राउत के खिलाफ कार्रवाई ना करने पर महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई । कांग्रेस के इस नेता पर नागपुर के बेजनबाग इलाके में जमीन कब्जाने और हड़पने का संगीन इल्जाम है । हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को एक अगस्त से पहले अतिक्रमण हटाने और जमीन पर कब्जा करनेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके हलफनामा दायर करने को का हुक्म दिया है । इस लेख का उद्देश्य नितिन राउत पर हाईकोर्ट के निर्देश के बारे में बताना नहीं है बल्कि यह बताना है कि भ्रष्टाचार पर कांग्रेस में दोहरा रवैया अपनाया जाता है । सामाजिक जीवन में उच्च मानदंडों की रक्षा करने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का दंभ भरनेवाली कांग्रेस पार्टी ने भी अब तक नितिन राउत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है । दरअसल कांग्रेस पार्टी के साथ यह बड़ी दिक्कत है वह पार्टी ईमानदार दिखना तो चाहती है लेकिन बेईमानों के खिलाफ कार्रवाई करके नहीं बल्कि सिर्फ बयानबाजी और इक्का दुक्का कमजोर नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का दिखावा करके । जिस भी नेता का जरा भी जनाधार होता है या फिर वो वोट बैंक की राजनीति की बिसात पर सधा हुआ मोहरा होता है उसके खिलाफ कांग्रेस कार्रवाई का दिखावा भी नहीं करती है । भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतरफा घिरी कांग्रेस पार्टी में इस तरह के नेताओं की लंबी फेहरिश्त है जिनपर घोटालों और घपलों के संगीन आरोप के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई ।
चंद महीनों पहले जब मुंबई में कारगिल के शहीदों के लिए बनने वाले आदर्श सोसाइटी घोटाला सामने आया था । उस घोटाले में महाराष्ट्र कांग्रेस के कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं की संलिप्तता की बात सामने आई । उस वक्त के सूबे के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे समेत कई कांग्रेस के नेताओं के दामन पर घोटाले के दाग लगे थे । लेकिन आदर्श घोटाले में कार्रवाई हुई सिर्फ युवा मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पर । मीडिया के दबाव में कांग्रेस पार्टी ने उनसे इस्तीफा ले लिया । लेकिन उतने ही संगीन इल्जाम के बावजूद विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे का बाल भी बांका नहीं हुआ था । बल्कि पिछले मंत्रिमंडल फेरबदल में विलासराव देशमुख को भारी उद्योग मंत्रालय से ग्रामीण विकास जैसा अहम मंत्रालय सौंप दिया गया । अब यह बात तकरीबन साफ हो गई है कि आदर्श सोसाइटी मामले में विलासराव देशमुख ने अतिरिक्त रुचि लेकर फाइलों को क्लीयरेंस दिया था । आदर्श के पहले भी विलासराव देशमुख का अपने गृह जिले में जमीन विवाद में नाम आया था । देशमुख के अलावा केंद्रीय उर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई उल्टे हाल में उन्होंने देश का उपराष्ट्रपति बनने की इच्छा जता दी । अशोक चव्हाण के खिलाफ कार्रवाई होने और देशमुख और शिंदे के खिलाफ कोई एक्शन नहीं होने के पीछे की कई राजनीतिक वजहें हैं । विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के मजबूत मराठा नेता हैं और कांग्रेस पार्टी उन्हें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार के बरख्श खड़ा करके मराठा वोट बैंक की राजनीति करती है । अशोक चव्हाण भी मराठा नेता हैं लेकिन पार्टी में उनका कद विलासराव देशमुख जितना बड़ा नहीं है । दूसरे अशोक चव्हाण अपने विरोधियों की राजनैतिक चाल नहीं समझ पाए और पार्टी की अंदरुनी राजनीति के शिकार हो गए । सुशील कुमार शिंदे महाराष्ट्र के मजबूत दलित नेता हैं । कांग्रेस उन्हें आगे कर दलितों को लुभाती है । शिंदे का दलित होना उनकी ताकत है और कांग्रेस की कमजोरी । अभी अगर कांग्रेस अपने नेता नितिन राउत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है तो वह भी साफ है । नितिन राउत महाराष्ट्र की राजनीति में पार्टी का नया दलित चेहरा है । खैरलांजी कांड के बाद से नितिन राउत सूबे में एक आक्रामक युवा दलित नेता के तौर पर उभरे हैं । पार्टी उनमें भविष्य की दलित राजनीति तलाश रही है इस वजह से वो जमीन हड़पने और कब्जाने जैसे संगीन आरोपों के बाद भी महफूज हैं । महाराष्ट्र के ही एक और कांग्रेस नेता हैं सुरेश कलमाडी जो इन दिनों कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हुए घोटाले के आरोपों में जेल की सलाखों के पीछे हैं । लंबे समय तक आलोचना झेलने के बाद जब सीबीआई ने कलमाडी को गिरफ्तार किया तो पार्टी नींद से जागी और कलमाडी को पार्टी के पद से हटा दिया गया । लेकिम मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष कृपा शंकर सिंह के बेटे पर टेलीकॉम घोटाले के आरोपी शाहिद बलवा की कंपनी से लेनदेन के आरोप लगे । मामला अदालत तक पहुंचा । मीडिया में खबरें आने के बाद लगा कि कृपाशंकर सिंह की मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष पर से छुट्टी हो जाएगी लेकिन वह हो ना सका । कृपाशंकर सिंह दिल्ली के अपने आकाओं की कृपा से अब भी अपने पद पर बने हैं । कांग्रेस पुरबिया लोगों के वोट बैंक के टूट जाने के खतरे को भांपते हुए कृपा पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है ।
अब अगर हम महाराष्ट्र से बाहर निकल कर देश की राजधानी दिल्ली आएं तो वहां भी पार्टी का इसी तरह का दोहरा रवैया दिखाई देता है । कॉमनवेल्थ घोटाले में कलमाडी को तो पार्टी ने पद से हटा दिया लेकिन घोटाले में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का नाम आने के वावजूद उनको मुख्यमंत्री पद से हटाना तो दूर की बात उनसे पार्टी ने सफाई तक नहीं मांगी । कॉमनवेल्थ घोटाले की जांच के लिए प्रधानमंत्री द्वारा गठित शुंगलू कमिटी ने सीधे सीधे शीला दीक्षित को कठघरे में खड़ा किया है । दिल्ली के ही एक और मंत्री राजकुमार चौहान पर लोकायुक्त की पद से हटाने की सिफारिश के बाद भी कोई कड़ा कदम नहीं उठाया जा सका । बल्कि बहुत ही बेशर्मी से उनका बचाव भी किया गया । यह भ्रष्टाचार पर कांग्रेस के दोहरे रवैये की एक बानगी भर है । साथ ही लोकायुक्त और उनकी सिफारिशों को लेकर पार्टी के स्टैंड को भी साफ करती है । कर्नाटक में वहां के लोकायुक्त संतोष हेगड़े की सिफारिशों और टिप्पणियों को लेकर सूबे के मुख्यमंत्री वी एस येदुरप्पा को घेरनेवाली कांग्रेस अपने मंत्री के खिलाफ लोकायुक्त की सिफारिश पर खामोश रह जाती है । भ्रष्टाचार के आरोप तो पार्टी के हाईप्रोपाइल महासचिव दिग्विजय सिंह पर भी लगे हैं । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए इंदौर में एक मॉल मालिक को जमीन के मामले में फायदा पहुंचाने के आरोप हैं । इन आरोपों की सूबे की आर्थिक अपराध शाखा जांच कर रही है और कुछ ही दिनों में उस केस में चालान भी पेश होने वाला है । लेकिन इन सबसे आंखें मूंदे कांग्रेस पार्टी ने दिग्विजय सिंह को छुट्टा छोड़ रखा है । संघ फोबिया से ग्रसित दिग्विजय सिंह पूरे देश में घूम घूमकर कांग्रेस पार्टी के लिए अलख जगा रहे हैं, पार्टी के युवराज राहुल गांधी के मुख्य सलाहकार बने हुए है । क्या कांग्रेस पार्टी दिग्विजय सिंह, शीला दीक्षित, विलासराव देशमुख या फिर सुशील कुमार शिंद पर वही मानदंड लागू कर पाएगी जो उसने बेचारे अशोक चव्हाण पर लागू कर उन्हें पद से च्युत कर दिया । क्या कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में वो इच्छाशक्ति है जो भ्रष्टाचार के आरोपो से घिरे अपने इन दिग्गज नेताओं पर कार्रवाई या उसका दिखावा मात्र भी कर सके । ऐसा प्रतीत होता नहीं है । कांग्रेस में कार्रवाई सिर्फ दो तरह के लोगों के खिलाफ ही होती है । पहले जो पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की बात करें और गांधी-नेहरू परिवार को चुनौती दें और दूसरे जिनका कोई जनाधार नहीं है । इन दो मसलों पर पार्टी त्वरित गति से कड़े से कड़ा कदम उठा सकती है । इन दो मामलों के अलावा अगर कोई बड़ा घोटाला भी हो जाए तो देर तक उसे लटकाए रखना ही कांग्रेस का सिद्धांत बन गया है । सोचना देश की जनता को है कि क्या वो दिखावे की कार्रवाई पर भरोसा करती रहेगी या फिर असली मुलजिमों के खिलाफ कार्रवाई होते देखना चाहेगी ।
चंद महीनों पहले जब मुंबई में कारगिल के शहीदों के लिए बनने वाले आदर्श सोसाइटी घोटाला सामने आया था । उस घोटाले में महाराष्ट्र कांग्रेस के कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं की संलिप्तता की बात सामने आई । उस वक्त के सूबे के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे समेत कई कांग्रेस के नेताओं के दामन पर घोटाले के दाग लगे थे । लेकिन आदर्श घोटाले में कार्रवाई हुई सिर्फ युवा मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पर । मीडिया के दबाव में कांग्रेस पार्टी ने उनसे इस्तीफा ले लिया । लेकिन उतने ही संगीन इल्जाम के बावजूद विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे का बाल भी बांका नहीं हुआ था । बल्कि पिछले मंत्रिमंडल फेरबदल में विलासराव देशमुख को भारी उद्योग मंत्रालय से ग्रामीण विकास जैसा अहम मंत्रालय सौंप दिया गया । अब यह बात तकरीबन साफ हो गई है कि आदर्श सोसाइटी मामले में विलासराव देशमुख ने अतिरिक्त रुचि लेकर फाइलों को क्लीयरेंस दिया था । आदर्श के पहले भी विलासराव देशमुख का अपने गृह जिले में जमीन विवाद में नाम आया था । देशमुख के अलावा केंद्रीय उर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई उल्टे हाल में उन्होंने देश का उपराष्ट्रपति बनने की इच्छा जता दी । अशोक चव्हाण के खिलाफ कार्रवाई होने और देशमुख और शिंदे के खिलाफ कोई एक्शन नहीं होने के पीछे की कई राजनीतिक वजहें हैं । विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के मजबूत मराठा नेता हैं और कांग्रेस पार्टी उन्हें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार के बरख्श खड़ा करके मराठा वोट बैंक की राजनीति करती है । अशोक चव्हाण भी मराठा नेता हैं लेकिन पार्टी में उनका कद विलासराव देशमुख जितना बड़ा नहीं है । दूसरे अशोक चव्हाण अपने विरोधियों की राजनैतिक चाल नहीं समझ पाए और पार्टी की अंदरुनी राजनीति के शिकार हो गए । सुशील कुमार शिंदे महाराष्ट्र के मजबूत दलित नेता हैं । कांग्रेस उन्हें आगे कर दलितों को लुभाती है । शिंदे का दलित होना उनकी ताकत है और कांग्रेस की कमजोरी । अभी अगर कांग्रेस अपने नेता नितिन राउत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है तो वह भी साफ है । नितिन राउत महाराष्ट्र की राजनीति में पार्टी का नया दलित चेहरा है । खैरलांजी कांड के बाद से नितिन राउत सूबे में एक आक्रामक युवा दलित नेता के तौर पर उभरे हैं । पार्टी उनमें भविष्य की दलित राजनीति तलाश रही है इस वजह से वो जमीन हड़पने और कब्जाने जैसे संगीन आरोपों के बाद भी महफूज हैं । महाराष्ट्र के ही एक और कांग्रेस नेता हैं सुरेश कलमाडी जो इन दिनों कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हुए घोटाले के आरोपों में जेल की सलाखों के पीछे हैं । लंबे समय तक आलोचना झेलने के बाद जब सीबीआई ने कलमाडी को गिरफ्तार किया तो पार्टी नींद से जागी और कलमाडी को पार्टी के पद से हटा दिया गया । लेकिम मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष कृपा शंकर सिंह के बेटे पर टेलीकॉम घोटाले के आरोपी शाहिद बलवा की कंपनी से लेनदेन के आरोप लगे । मामला अदालत तक पहुंचा । मीडिया में खबरें आने के बाद लगा कि कृपाशंकर सिंह की मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष पर से छुट्टी हो जाएगी लेकिन वह हो ना सका । कृपाशंकर सिंह दिल्ली के अपने आकाओं की कृपा से अब भी अपने पद पर बने हैं । कांग्रेस पुरबिया लोगों के वोट बैंक के टूट जाने के खतरे को भांपते हुए कृपा पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है ।
अब अगर हम महाराष्ट्र से बाहर निकल कर देश की राजधानी दिल्ली आएं तो वहां भी पार्टी का इसी तरह का दोहरा रवैया दिखाई देता है । कॉमनवेल्थ घोटाले में कलमाडी को तो पार्टी ने पद से हटा दिया लेकिन घोटाले में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का नाम आने के वावजूद उनको मुख्यमंत्री पद से हटाना तो दूर की बात उनसे पार्टी ने सफाई तक नहीं मांगी । कॉमनवेल्थ घोटाले की जांच के लिए प्रधानमंत्री द्वारा गठित शुंगलू कमिटी ने सीधे सीधे शीला दीक्षित को कठघरे में खड़ा किया है । दिल्ली के ही एक और मंत्री राजकुमार चौहान पर लोकायुक्त की पद से हटाने की सिफारिश के बाद भी कोई कड़ा कदम नहीं उठाया जा सका । बल्कि बहुत ही बेशर्मी से उनका बचाव भी किया गया । यह भ्रष्टाचार पर कांग्रेस के दोहरे रवैये की एक बानगी भर है । साथ ही लोकायुक्त और उनकी सिफारिशों को लेकर पार्टी के स्टैंड को भी साफ करती है । कर्नाटक में वहां के लोकायुक्त संतोष हेगड़े की सिफारिशों और टिप्पणियों को लेकर सूबे के मुख्यमंत्री वी एस येदुरप्पा को घेरनेवाली कांग्रेस अपने मंत्री के खिलाफ लोकायुक्त की सिफारिश पर खामोश रह जाती है । भ्रष्टाचार के आरोप तो पार्टी के हाईप्रोपाइल महासचिव दिग्विजय सिंह पर भी लगे हैं । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए इंदौर में एक मॉल मालिक को जमीन के मामले में फायदा पहुंचाने के आरोप हैं । इन आरोपों की सूबे की आर्थिक अपराध शाखा जांच कर रही है और कुछ ही दिनों में उस केस में चालान भी पेश होने वाला है । लेकिन इन सबसे आंखें मूंदे कांग्रेस पार्टी ने दिग्विजय सिंह को छुट्टा छोड़ रखा है । संघ फोबिया से ग्रसित दिग्विजय सिंह पूरे देश में घूम घूमकर कांग्रेस पार्टी के लिए अलख जगा रहे हैं, पार्टी के युवराज राहुल गांधी के मुख्य सलाहकार बने हुए है । क्या कांग्रेस पार्टी दिग्विजय सिंह, शीला दीक्षित, विलासराव देशमुख या फिर सुशील कुमार शिंद पर वही मानदंड लागू कर पाएगी जो उसने बेचारे अशोक चव्हाण पर लागू कर उन्हें पद से च्युत कर दिया । क्या कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में वो इच्छाशक्ति है जो भ्रष्टाचार के आरोपो से घिरे अपने इन दिग्गज नेताओं पर कार्रवाई या उसका दिखावा मात्र भी कर सके । ऐसा प्रतीत होता नहीं है । कांग्रेस में कार्रवाई सिर्फ दो तरह के लोगों के खिलाफ ही होती है । पहले जो पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की बात करें और गांधी-नेहरू परिवार को चुनौती दें और दूसरे जिनका कोई जनाधार नहीं है । इन दो मसलों पर पार्टी त्वरित गति से कड़े से कड़ा कदम उठा सकती है । इन दो मामलों के अलावा अगर कोई बड़ा घोटाला भी हो जाए तो देर तक उसे लटकाए रखना ही कांग्रेस का सिद्धांत बन गया है । सोचना देश की जनता को है कि क्या वो दिखावे की कार्रवाई पर भरोसा करती रहेगी या फिर असली मुलजिमों के खिलाफ कार्रवाई होते देखना चाहेगी ।
Saturday, July 23, 2011
जागो हिंदी के प्रकाशको !
हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति- उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है जिस तरह से अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है । क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं । हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है । यह स्थिति पहले मुर्गी या पहले अंडा जैसी है । लेकिन इसमें हम हिंदीवालों का नुकसान हो रहा है । अपनी भाषा को लेकर जिस तरह का गर्व हमारे मन में होना चाहिए या फिर जिस तरह का लगाव दिखना चाहिए उसका नितांत अभाव दिखाई देता है । दरअसल इसके लिए हिंदी के लेखक भी कम जिम्मेदार नहीं है । हिंदी के लेखकों में एक दूसरे को नीचा दिखाने की जो प्रवृत्ति है उससे उसका बड़ा नुकसान हो रहा है । इस स्थिति से उबरने के लिए हिंदी के लेखक, उनके तीन संगठन और जाहिर सी बात है प्रकाशक भी कोई ज्यादा प्रयास नहीं कर रहे हैं । अब हम अंग्रेजी को देखें । हाल ही में अग्रेजी के भारतीय लेखक अमिताभ घोष की महात्वाकांक्षी ट्रायोलॉजी के तहत लिखा जा रहा दूसरा उपन्यास प्रकाशित हुआ । कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पुरस्कारो से नवाजे जा चुके अमिताभ घोष के उपन्यास रिवर ऑफ स्मोक के प्रकाशित होने के पहले और बाद में हमारे देश के अंग्रेजी अखबारों ने एक ऐसा माहौल बनाया जैसे लगा कि साहित्यिक जगत में कोई विशेष घटना घटी हो । अंग्रेजी के कई राष्ट्रीय अखबारों ने आधे पन्ने पर अमिताभ घोष के इंटरव्यू छापे । अखबारों के रविवारीय सप्लिमेंट में लेखक पर कवर स्टोरी प्रकाशित हुई । बात यहीं तक नहीं रुकी । उपन्यास के प्रमोशन के लिए लेखक का वर्ल्ड टूर आयोजित किया गया । ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ अमिताभ घोष के लिए ही किया गया। ये अंग्रेजी प्रकाशन जगत के लिए सामान्य सी बात है । कोई भी उपन्यास या अहम कृति प्रकाशित होती है तो उसको लेकर योजनाबद्ध तरीके से एक समन्वित प्रयास किया जाता है। इस प्रयास में अंग्रेजी के अखबार भी सहयोग करते हैं । अमिताभ घोष या फिर अन्य अंग्रेजी लेखकों को जिस तरह से उनकी कृति के बहाने प्रचारित किया जा रहा है या जाता रहा है उससे हिंदी समाज को सीख लेनी चाहिए । लेकिन बजाए उनसे कुछ सीख लेने की हम अपनी जड़तो को लेकर ही बैठे रहते हैं ।
हमें तो यह याद नहीं पड़ता कि हिंदी के किसी लेखक को उसकी कृति के प्रकाशन के बाद इतना प्रचार मिला हो । चाहे वो हमारे स्टार लेखक राजेन्द्र यादव हो, कमलेश्वर हों, निर्मल वर्मा हो या फिर आज की पीढ़ी का कोई नया लेखक हो । सवाल प्रचार का नहीं है एक समन्वित प्रयास का है । क्या हिंदी के प्रकाशकों ने कभी अपने लेखकों को प्रचारित करने, उनकी कृति को प्रमोट करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास किया गया। मैं तो बहुत नजदीक से हिंदी प्रकाशन को तकरीबन डेढ दशक से देख रहा हूं, उस तरह का कोई प्रयास मुझे नजर नहीं आया । मैं यह कह सकता हूं कि इस मामले में हिंदी प्रकाशन की स्थिति बेहद दयनीय है ।
हिंदी का इतना विशाल पाठक वर्ग है, सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी पट्टी में अपने बाजार का विस्तार कर रही है लेकिन हमारे हिंदी के प्रकाशक अब भी सरकारी खरीद के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें हिंदी के पाठकों पर भरोसा नहीं है । हिंदी के प्रकाशक किताबों के प्रचार प्रसार पर खर्च नहीं करना चाहते । किसी लेखक का विदेश यात्रा की बात तो दूर हिंदी पट्टी में भी पाठकों से संवाद का कार्यक्रम आयोजित नहीं करवाया जाता । हमारे प्रकाशक किताब का विमोचन, वो भी लेखकों के साझा प्रयास से, करवाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं । कई बार तो लेखकों को विमोचन पर आए खर्च को भी साझा करना पड़ता है । उसके पीछे यह मनोविज्ञान काम करता है कि ये सब फिजूलखर्ची है । जबकि प्रकाशकों को ये समझना चाहिए कि ये एक लंबी अवधि का निवेश है जिसमें जमकर रिटर्न मिलने की संभावना है। लेकिन इसके लिए हिंदी के प्रकाशकों को तात्कालिक लाभ का मोह छोड़ना होगा। हिंदी के पाठकों के बीच एक संस्कार विकसित करने की दिशा में प्रयास करना होगा । इसके लिए हमें अपने लेखकों को उनके बीच लेकर जाना होगा । ऐसा नहीं है कि हमारे प्रकाशकों के पास पैसे की कमी है लेकिन उसे खर्च करने की इच्छाशक्ति का अभाव जरूर है ।
दरअसल अंग्रेजी और हिंदी के प्रकाशकों में एक बुनियादी फर्क है । अंग्रेजी के प्रकाशक भविष्य की योजना बनाकर काम करते हैं जबकि हिंदी के प्रकाशकों की कोई भी फॉर्वर्ड प्लानिंग नहीं होती । उदाहरण के तौर पर आपका बताऊं कि जब 1857 की क्रांति की डेढ सौ साल पूरे हो रहे थे तो अंग्रेजी के प्रकाशकों ने धड़ाधड़ कई किताबें छापी लेकिन हिंदी प्रदेश में हुई इस घटना से हिंदी के प्रकाशक उदासीन रहे । कोई भी बड़ी घटना या फिर अहम तिथि आती है तो अंग्रेजी में धड़ाधड़ किताबें आ जाती है । देश में कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन हुआ तो अंग्रेजी में कई किताबें आईं लेकिन हिंदी में ऐसे इक्का दुक्का प्रयास ही देखने को मिले । अंग्रेजी और हिंदी प्रकाशन में इस तरह के अंतर के कई उदाहरण मौजूद हैं ।
अंग्रेजी प्रकाशकों का तंत्र बेहद मजबूत और प्रोफेशन है जबकि हिंदी का प्रकाशन व्यवसाय अब भी पारिवारिक कारोबार है । किसी भी हिंदी प्रकाशन गृह में प्रोफेशनलिज्म का घोर अभाव है । प्रोफेशनल काम करनेवाले लोग किसी भी हिंदी प्रकाशन गृह में लंबे समय तक टिक नहीं सकते । अंग्रेजी के मुकाबले में हिंदी का प्रचार-प्रसार तंत्र बेहद लचर है । अंग्रेजी प्रकाशन गृह में एक सूची होती है जिसमें वैसे चुनिंदा लोग होते हैं जिनको किताब छपने से पहले ही उसके अंश और बाजार में किताब आने के पहले उनको किताब मुहैया करवा दिया जाता है । पाठकों में रुचि जगाने के लिए किताब के चुनिंदा अंशों को लीक करवाकर पाठकों के मन में जिज्ञासा पैदा करवाया जाता है । इसके दो बेहतरीन उदाहरण हैं एक तो टोनी ब्लेयर की आत्मकथा- अ जर्नी और दूसरा जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब द ग्रेट सोल । ब्लेयर और उनकी पत्नी के पूर्व प्रकाशित सेक्स प्रसंग और गांधी और कैलनबाख के संबंध को सनसनीखेज तरीके से प्रचारित किया गया जैसे कोई नया खुलासा हो । जबकि दोनों प्रसंग पहले से ही ज्ञात थे । नतीजा यह हुआ कि किताब आने के पहले ही उसका एक बाजार तैयार हो गया । प्रकाशकों को भी लाभ हुआ और लेखकों को भी रॉयल्टी में लाखों रुपए मिले । मैं अपने देश के भी दो तीन अंग्रेजी लेखकों को जानता हूं जिन्हें उनकी किताब पर लाखों रुपए की रॉयल्टी मिली । लेकिन हिंदी के शीर्ष लेखकों को भी साल में एक कृति पर लाख रुपए की रॉयल्टी मिलती हो उसमें मुझे संदेह है । जबकि हिंदी में समीक्षकों को किताबें देने में , कुछ अपवाद को छोड़कर, अधिकतर प्रकाशक आनाकानी करते हैं ।
अब वक्त आ गया है कि हिंदी के प्रकाशक अपनी संकुचित मानसिकता से उठकर विचार करें और एकल या सामूहिक रूप से लेखकों और उनकी कृतियों को पाठकों के बीच ले जाने का प्रयास करें । कृतियों को प्रचारित या प्रसारित करने के लिए एक प्रोफेशनल तंत्र का विकास करें। हिंदी के अग्रणी प्रकाशन गृह होने की वजह से राजकमल और वाणी प्रकाशन समूह की यह जिम्मादरी बनती है कि वो इसमें पहल करें । ऐसा करने से उनका और लेखक दोनों का भला होना निश्चित है । सिर्फ प्रकाशकों की नहीं हिंदी मीडिया की भी जिम्मेदारी बनती है कि हम हमारे लेखकों को उचित सम्मान और स्थान दें ।
हमें तो यह याद नहीं पड़ता कि हिंदी के किसी लेखक को उसकी कृति के प्रकाशन के बाद इतना प्रचार मिला हो । चाहे वो हमारे स्टार लेखक राजेन्द्र यादव हो, कमलेश्वर हों, निर्मल वर्मा हो या फिर आज की पीढ़ी का कोई नया लेखक हो । सवाल प्रचार का नहीं है एक समन्वित प्रयास का है । क्या हिंदी के प्रकाशकों ने कभी अपने लेखकों को प्रचारित करने, उनकी कृति को प्रमोट करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास किया गया। मैं तो बहुत नजदीक से हिंदी प्रकाशन को तकरीबन डेढ दशक से देख रहा हूं, उस तरह का कोई प्रयास मुझे नजर नहीं आया । मैं यह कह सकता हूं कि इस मामले में हिंदी प्रकाशन की स्थिति बेहद दयनीय है ।
हिंदी का इतना विशाल पाठक वर्ग है, सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी पट्टी में अपने बाजार का विस्तार कर रही है लेकिन हमारे हिंदी के प्रकाशक अब भी सरकारी खरीद के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें हिंदी के पाठकों पर भरोसा नहीं है । हिंदी के प्रकाशक किताबों के प्रचार प्रसार पर खर्च नहीं करना चाहते । किसी लेखक का विदेश यात्रा की बात तो दूर हिंदी पट्टी में भी पाठकों से संवाद का कार्यक्रम आयोजित नहीं करवाया जाता । हमारे प्रकाशक किताब का विमोचन, वो भी लेखकों के साझा प्रयास से, करवाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं । कई बार तो लेखकों को विमोचन पर आए खर्च को भी साझा करना पड़ता है । उसके पीछे यह मनोविज्ञान काम करता है कि ये सब फिजूलखर्ची है । जबकि प्रकाशकों को ये समझना चाहिए कि ये एक लंबी अवधि का निवेश है जिसमें जमकर रिटर्न मिलने की संभावना है। लेकिन इसके लिए हिंदी के प्रकाशकों को तात्कालिक लाभ का मोह छोड़ना होगा। हिंदी के पाठकों के बीच एक संस्कार विकसित करने की दिशा में प्रयास करना होगा । इसके लिए हमें अपने लेखकों को उनके बीच लेकर जाना होगा । ऐसा नहीं है कि हमारे प्रकाशकों के पास पैसे की कमी है लेकिन उसे खर्च करने की इच्छाशक्ति का अभाव जरूर है ।
दरअसल अंग्रेजी और हिंदी के प्रकाशकों में एक बुनियादी फर्क है । अंग्रेजी के प्रकाशक भविष्य की योजना बनाकर काम करते हैं जबकि हिंदी के प्रकाशकों की कोई भी फॉर्वर्ड प्लानिंग नहीं होती । उदाहरण के तौर पर आपका बताऊं कि जब 1857 की क्रांति की डेढ सौ साल पूरे हो रहे थे तो अंग्रेजी के प्रकाशकों ने धड़ाधड़ कई किताबें छापी लेकिन हिंदी प्रदेश में हुई इस घटना से हिंदी के प्रकाशक उदासीन रहे । कोई भी बड़ी घटना या फिर अहम तिथि आती है तो अंग्रेजी में धड़ाधड़ किताबें आ जाती है । देश में कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन हुआ तो अंग्रेजी में कई किताबें आईं लेकिन हिंदी में ऐसे इक्का दुक्का प्रयास ही देखने को मिले । अंग्रेजी और हिंदी प्रकाशन में इस तरह के अंतर के कई उदाहरण मौजूद हैं ।
अंग्रेजी प्रकाशकों का तंत्र बेहद मजबूत और प्रोफेशन है जबकि हिंदी का प्रकाशन व्यवसाय अब भी पारिवारिक कारोबार है । किसी भी हिंदी प्रकाशन गृह में प्रोफेशनलिज्म का घोर अभाव है । प्रोफेशनल काम करनेवाले लोग किसी भी हिंदी प्रकाशन गृह में लंबे समय तक टिक नहीं सकते । अंग्रेजी के मुकाबले में हिंदी का प्रचार-प्रसार तंत्र बेहद लचर है । अंग्रेजी प्रकाशन गृह में एक सूची होती है जिसमें वैसे चुनिंदा लोग होते हैं जिनको किताब छपने से पहले ही उसके अंश और बाजार में किताब आने के पहले उनको किताब मुहैया करवा दिया जाता है । पाठकों में रुचि जगाने के लिए किताब के चुनिंदा अंशों को लीक करवाकर पाठकों के मन में जिज्ञासा पैदा करवाया जाता है । इसके दो बेहतरीन उदाहरण हैं एक तो टोनी ब्लेयर की आत्मकथा- अ जर्नी और दूसरा जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब द ग्रेट सोल । ब्लेयर और उनकी पत्नी के पूर्व प्रकाशित सेक्स प्रसंग और गांधी और कैलनबाख के संबंध को सनसनीखेज तरीके से प्रचारित किया गया जैसे कोई नया खुलासा हो । जबकि दोनों प्रसंग पहले से ही ज्ञात थे । नतीजा यह हुआ कि किताब आने के पहले ही उसका एक बाजार तैयार हो गया । प्रकाशकों को भी लाभ हुआ और लेखकों को भी रॉयल्टी में लाखों रुपए मिले । मैं अपने देश के भी दो तीन अंग्रेजी लेखकों को जानता हूं जिन्हें उनकी किताब पर लाखों रुपए की रॉयल्टी मिली । लेकिन हिंदी के शीर्ष लेखकों को भी साल में एक कृति पर लाख रुपए की रॉयल्टी मिलती हो उसमें मुझे संदेह है । जबकि हिंदी में समीक्षकों को किताबें देने में , कुछ अपवाद को छोड़कर, अधिकतर प्रकाशक आनाकानी करते हैं ।
अब वक्त आ गया है कि हिंदी के प्रकाशक अपनी संकुचित मानसिकता से उठकर विचार करें और एकल या सामूहिक रूप से लेखकों और उनकी कृतियों को पाठकों के बीच ले जाने का प्रयास करें । कृतियों को प्रचारित या प्रसारित करने के लिए एक प्रोफेशनल तंत्र का विकास करें। हिंदी के अग्रणी प्रकाशन गृह होने की वजह से राजकमल और वाणी प्रकाशन समूह की यह जिम्मादरी बनती है कि वो इसमें पहल करें । ऐसा करने से उनका और लेखक दोनों का भला होना निश्चित है । सिर्फ प्रकाशकों की नहीं हिंदी मीडिया की भी जिम्मेदारी बनती है कि हम हमारे लेखकों को उचित सम्मान और स्थान दें ।
Friday, July 22, 2011
किताबों में बनता इतिहास
प्रभाष जोशी हमारे समय के बड़े पत्रकार थे । उनके सामजिक सरोकार भी उतने ही बड़े थे । समाज और पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता का दायरा भी बेहद विस्तृत था । हिंदी पट्टी और हिंदी समाज में प्रभाष जी की काफी इज्जत भी थी । उनके निधन के बाद हिंदी पत्रकारिता में एक खालीपन आ गया है । जिस तरह से प्रभाष जोशी समाज को लेकर चिंतित रहा करते थे या फिर पत्रकारिता के गिरते स्तर को बचाने के लिए उन्होंने जिस तरह से एक अभियान की अगुवाई की थी वो हम सबके लिए अनुकरणीय है । प्रभाष जी जो भी सोचते थे बेखौफ होकर उसे या तो अपने स्तंभ में व्यक्त करते थे या फिर सभाओं या गोष्ठियों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाते थे । देश भर की यात्राओं के बावजूद प्रभाष जोशी अपने स्तंभ लेखन को लेकर बेहद सतर्क रहते थे और बिना नागा उसको लिखते थे।हर हफ्ते हमलोग रविवार का इंतजार इस बात के लिए करते थे कि कागद कारे पढ़ने को मिलेगा । प्रभाष जी के स्तंभ से पाठकों का जो एक अपनापा कायम हुआ था वही उनकी ताकत थी । अपने स्तंभ के माध्यम से प्रभाष जी का पाठकों से सीधा संवाद था । लेकिन उनके निधन के बाद ये संवाद टूट गया । जनसत्ता और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लिखे उनके स्तंभ हिंदी समाज के लिए थाती हैं और पाठकों के लिए सहेजकर रखनेवाला धरोहर ।
प्रभाष जी के जीवन काल में ही 2003 में राजकमल प्रकाशन ने उनके लेखों का संग्रह -हिंदू होने का धर्म- छापा था जिसकी खासी चर्चा हुई थी । अब एक बार फिर से राजकमल प्रकाशन से ही उनके लेखों के दो संग्रह- आगे अन्धी गली है और 21वीं सदी पहला दशक- छपे हैं । इन दोनों पुस्तकों का संपादन वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा ने किया है । आगे अन्धी गली है में प्रभाष जोशी के प्रथम प्रवक्ता और तहलका हिंदी में छपे लेख संकलित हैं । अपने संपादकीय में सुरेश शर्मा ने लिखा है कि – आगे अन्धी गली प्रभाष जी के अंतिम दिनों का लेखन है । ....वे प्रथम प्रवक्ता और तहलका में में कॉलम लिख रहे थे । ये कॉलम अपने समय की धड़कनों के जीवन्त दस्तावेज हैं । इस पुस्तक के संपादकीय में सुरेश शर्मा ने प्रभाष जी की जिंदगी के अंतिम दिनों पर विस्तार से लिखा है । सुरेश शर्मा के इस लेख से आम पाठकों के मन पर प्रभाष जी के व्यक्तित्व की तस्वीर और साफ होती है । बीमारी में भी समाज और पत्रकारिता के अपने पेशे के उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए प्रभाष जी ने अपनी जान को भी दांव पर लगा दिया । तबीयत खराब होने के बावजूद उन्होंने हिंद स्वराज पर आयोजित गोष्ठी में हिस्सा लिया और अपनी बात श्रोताओं के साथ साझा की । सुरेश शर्मा ने प्रभाष जी की अंतिम घड़ी को उनकी अदम्य जिजिविषा से जोड़कर एक बेहद संजीदा तस्वीर पेश की है । इस किताब में कई ऐसे लेख हैं जो वर्तमान परिस्थितियों में भी प्रासंगिक है । जैसे मई 2008 में प्रथम प्रवक्ता में प्रभाष जी ने लिखा- राहुल के अंदेशे से दुबलीं मायावती । प्रभाष जी का यह लेख उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में आज भी उतना ही मौजूं है जितना तीन साल पहले था । उस वक्त दलितों के घर राहुल के खाना खाने और रात बिताने को लेकर मायावती परेशान थी और आज भट्टा पारसौल में राहुल के धरने ने मायावती को परेशानी में डाल रखा है । मायवती की परेशानी पर प्रभाष जी विस्मित होते हुए लिखते हैं – राहुल गांधी के दलित प्रेम से मायावती इतनी घबरा क्यों गई हैं । दूसरे नेताओं की तरह वो कोई जड़विहीन हवाई नेता नहीं जो मीडिया में लगातार बने रहने के कारण नेता हो गई हैं । मई 2008 में ही प्रभाष जी ने एक और लेख लिखा था- चूके अवसरों की महादेवी । इस लेख के केंद्र में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी है । उस लेख में प्रभाष जी ने निराशा भरे लहजे में लिखा था- इस त्याग ( प्रधानमंत्री पद ठुकराना) ने सोनिया गांधी को भारत ते जनमानस में वह जगह दी जो उन्हें अपनी पार्टी कांग्रेस में प्राप्त थी । ....उन्हें ऐसा नैतिक आभामंडल मिला जो उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी के पास भी नहीं था । पअपने इस लेख में सोनिया की रहनुमाई में चल रही सरकार के चार साल के कार्यकाल से प्रभाष जी निराश थे, निराश तो वो सोनिया गांधी के प्रदर्शन से भी थे । उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस को फिर से सरकार बनाने का मौका मिलेगा । लेकिन वो हो नहीं सका और कांग्रेस ने सोनिया की अगुवाई में 2004 के मुकाबले ज्यादा सीटें हासिल की । प्रभाष जी के लेखों में विभिन्न विषयों की जो रेंज थी वो उनकी विद्वता और अध्ययन को दिखाता है । समाज और राजनीति के अलावा प्रभाष जी साहित्य के भी गहरे अध्येता थे । राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का शताब्दी वर्ष जिस तरह से हिंदी समाज में मनाया गया और जो लापरवाहियां हुई उसपर भी प्रभाष जी ने एक बेहद तल्ख टिप्पणी लिखी । जिस तरह से दिनकर शताब्दी समारोह में बिहार के एक मंत्री ने बाद में मंच पर आकर उलजलूल बातें की उससे प्रभाष जी बेहद खिन्न थे । दिनकर जन्म शताब्दी वर्ष में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार और बिहार सरकार की लापरवाही से भी प्रभाष जी दुखी थे । इसी तरह से एक और अन्य विषय समलैंगिकता पर भी इसमें प्रभाष जी का एक लेख संकलित है । कुल मिलाकर यह किताब प्रभाष जी की विचारधारा और अपने समय, समाज और राजनीति को जानने की एक कुंजी है जिस इसके संपादक सुरेश शर्मा ने श्रमपूर्वक तैयार किया है ।
दूसरी किताब -21वीं सदी पहला दशक है जिसमें प्रभाष जोशी के दो हजार एक से लेकर 2009 तक के बीच में जनसत्ता में लिखे लेख संकलित हैं । संपादक का कहना है कि इस जनसत्ता में प्रकाशित इस कालखंड के तकरीबन सारे लेख इस किताब में संकलित किए गए हैं । यह संकलन इस लिहाज से अहम है कि इसमें लगभग एक दशक की राजनीति गतिविधयां की एक मुकम्मल तस्वीर बनती है । प्रभाष जी के लेखों को पढकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और बीजेपी के काम करने के तरीकों को समझने में मदद मिल सकती है । लेकिन दोनों किताबों के कुछ लेखों में मोहभंग को भी साफ तौर रेखांकित किया जा सकता है । मई 2004 में जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री मनोनीत किया था तो प्रभाष जी को उनमें एक उम्मीद की किरण दिखाई दी थी । उन्होंने एक लेख लिखा था- आइए सोनिया जी, अनन्त संभावनाओं की दहलीज पर । इस लेख में प्रभाष जी ने सोनिया गांधी की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी । उस लेख की दो लाइन देखिए- किन्हीं भी कारणों और कैसे भी इराजदों से सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ा हो पर सच बताइये कितने माई के लाल ऐसा कर सकते हैं और कितनों ने ऐसा किया है ? जिसने किया है, उठिए और उनको सलाम कीजिए । लेकिन चार साल में ही प्रभाष जी का सोनिया से मोहभंग हो गया और 2008 में मई में लिख डाला- चूके अवसरों की महादेवी । जिसका जिक्र मैं उपर कर चुका हूं । इस तरह के कई लेख देखकर आप इस बात का अंदाज लगा सकते हैं कि देश और पत्रकारिता का मूड कैसा रहा होगा । प्रभाष जी के वस्तुनिष्ठ लेखों से समाज की उस सोच का भी पता चलता है जिसमें लोग राजनेताओं के बारे में क्या विचार रखते हैं । प्रभाष जोशी के इन लेखों को एक साथ सामने लाने के लिए सुरेश शर्मा ने जो श्रम किया उसके लिए वो साधुवाद के पात्र हैं ।
प्रभाष जी के जीवन काल में ही 2003 में राजकमल प्रकाशन ने उनके लेखों का संग्रह -हिंदू होने का धर्म- छापा था जिसकी खासी चर्चा हुई थी । अब एक बार फिर से राजकमल प्रकाशन से ही उनके लेखों के दो संग्रह- आगे अन्धी गली है और 21वीं सदी पहला दशक- छपे हैं । इन दोनों पुस्तकों का संपादन वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा ने किया है । आगे अन्धी गली है में प्रभाष जोशी के प्रथम प्रवक्ता और तहलका हिंदी में छपे लेख संकलित हैं । अपने संपादकीय में सुरेश शर्मा ने लिखा है कि – आगे अन्धी गली प्रभाष जी के अंतिम दिनों का लेखन है । ....वे प्रथम प्रवक्ता और तहलका में में कॉलम लिख रहे थे । ये कॉलम अपने समय की धड़कनों के जीवन्त दस्तावेज हैं । इस पुस्तक के संपादकीय में सुरेश शर्मा ने प्रभाष जी की जिंदगी के अंतिम दिनों पर विस्तार से लिखा है । सुरेश शर्मा के इस लेख से आम पाठकों के मन पर प्रभाष जी के व्यक्तित्व की तस्वीर और साफ होती है । बीमारी में भी समाज और पत्रकारिता के अपने पेशे के उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए प्रभाष जी ने अपनी जान को भी दांव पर लगा दिया । तबीयत खराब होने के बावजूद उन्होंने हिंद स्वराज पर आयोजित गोष्ठी में हिस्सा लिया और अपनी बात श्रोताओं के साथ साझा की । सुरेश शर्मा ने प्रभाष जी की अंतिम घड़ी को उनकी अदम्य जिजिविषा से जोड़कर एक बेहद संजीदा तस्वीर पेश की है । इस किताब में कई ऐसे लेख हैं जो वर्तमान परिस्थितियों में भी प्रासंगिक है । जैसे मई 2008 में प्रथम प्रवक्ता में प्रभाष जी ने लिखा- राहुल के अंदेशे से दुबलीं मायावती । प्रभाष जी का यह लेख उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में आज भी उतना ही मौजूं है जितना तीन साल पहले था । उस वक्त दलितों के घर राहुल के खाना खाने और रात बिताने को लेकर मायावती परेशान थी और आज भट्टा पारसौल में राहुल के धरने ने मायावती को परेशानी में डाल रखा है । मायवती की परेशानी पर प्रभाष जी विस्मित होते हुए लिखते हैं – राहुल गांधी के दलित प्रेम से मायावती इतनी घबरा क्यों गई हैं । दूसरे नेताओं की तरह वो कोई जड़विहीन हवाई नेता नहीं जो मीडिया में लगातार बने रहने के कारण नेता हो गई हैं । मई 2008 में ही प्रभाष जी ने एक और लेख लिखा था- चूके अवसरों की महादेवी । इस लेख के केंद्र में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी है । उस लेख में प्रभाष जी ने निराशा भरे लहजे में लिखा था- इस त्याग ( प्रधानमंत्री पद ठुकराना) ने सोनिया गांधी को भारत ते जनमानस में वह जगह दी जो उन्हें अपनी पार्टी कांग्रेस में प्राप्त थी । ....उन्हें ऐसा नैतिक आभामंडल मिला जो उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी के पास भी नहीं था । पअपने इस लेख में सोनिया की रहनुमाई में चल रही सरकार के चार साल के कार्यकाल से प्रभाष जी निराश थे, निराश तो वो सोनिया गांधी के प्रदर्शन से भी थे । उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस को फिर से सरकार बनाने का मौका मिलेगा । लेकिन वो हो नहीं सका और कांग्रेस ने सोनिया की अगुवाई में 2004 के मुकाबले ज्यादा सीटें हासिल की । प्रभाष जी के लेखों में विभिन्न विषयों की जो रेंज थी वो उनकी विद्वता और अध्ययन को दिखाता है । समाज और राजनीति के अलावा प्रभाष जी साहित्य के भी गहरे अध्येता थे । राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का शताब्दी वर्ष जिस तरह से हिंदी समाज में मनाया गया और जो लापरवाहियां हुई उसपर भी प्रभाष जी ने एक बेहद तल्ख टिप्पणी लिखी । जिस तरह से दिनकर शताब्दी समारोह में बिहार के एक मंत्री ने बाद में मंच पर आकर उलजलूल बातें की उससे प्रभाष जी बेहद खिन्न थे । दिनकर जन्म शताब्दी वर्ष में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार और बिहार सरकार की लापरवाही से भी प्रभाष जी दुखी थे । इसी तरह से एक और अन्य विषय समलैंगिकता पर भी इसमें प्रभाष जी का एक लेख संकलित है । कुल मिलाकर यह किताब प्रभाष जी की विचारधारा और अपने समय, समाज और राजनीति को जानने की एक कुंजी है जिस इसके संपादक सुरेश शर्मा ने श्रमपूर्वक तैयार किया है ।
दूसरी किताब -21वीं सदी पहला दशक है जिसमें प्रभाष जोशी के दो हजार एक से लेकर 2009 तक के बीच में जनसत्ता में लिखे लेख संकलित हैं । संपादक का कहना है कि इस जनसत्ता में प्रकाशित इस कालखंड के तकरीबन सारे लेख इस किताब में संकलित किए गए हैं । यह संकलन इस लिहाज से अहम है कि इसमें लगभग एक दशक की राजनीति गतिविधयां की एक मुकम्मल तस्वीर बनती है । प्रभाष जी के लेखों को पढकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और बीजेपी के काम करने के तरीकों को समझने में मदद मिल सकती है । लेकिन दोनों किताबों के कुछ लेखों में मोहभंग को भी साफ तौर रेखांकित किया जा सकता है । मई 2004 में जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री मनोनीत किया था तो प्रभाष जी को उनमें एक उम्मीद की किरण दिखाई दी थी । उन्होंने एक लेख लिखा था- आइए सोनिया जी, अनन्त संभावनाओं की दहलीज पर । इस लेख में प्रभाष जी ने सोनिया गांधी की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी । उस लेख की दो लाइन देखिए- किन्हीं भी कारणों और कैसे भी इराजदों से सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ा हो पर सच बताइये कितने माई के लाल ऐसा कर सकते हैं और कितनों ने ऐसा किया है ? जिसने किया है, उठिए और उनको सलाम कीजिए । लेकिन चार साल में ही प्रभाष जी का सोनिया से मोहभंग हो गया और 2008 में मई में लिख डाला- चूके अवसरों की महादेवी । जिसका जिक्र मैं उपर कर चुका हूं । इस तरह के कई लेख देखकर आप इस बात का अंदाज लगा सकते हैं कि देश और पत्रकारिता का मूड कैसा रहा होगा । प्रभाष जी के वस्तुनिष्ठ लेखों से समाज की उस सोच का भी पता चलता है जिसमें लोग राजनेताओं के बारे में क्या विचार रखते हैं । प्रभाष जोशी के इन लेखों को एक साथ सामने लाने के लिए सुरेश शर्मा ने जो श्रम किया उसके लिए वो साधुवाद के पात्र हैं ।
Tuesday, July 19, 2011
दिलचस्प अनुभवों की शाम
बात अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है । पुस्तकों को पढ़ते हुए बहुधा मन में विचार आता था कि उसपर कुछ लिखूं । लेकिन संकोचवश कुछ लिख नहीं पाता था, ज्यादा पता भी नहीं था कि क्या और कैसे लिखूं और कहां भेजूं । अपने इस स्तंभ में मैं पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि किताबों को पढ़ने के बाद चाचा भारत भारद्वाज को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था । फिर पत्रों में सहमति और असहमतियां भी होने लगी । इस पत्र व्यवहार से मुझे समीक्षा का एक संस्कार मिला । जमालपुर में रहता था वहां के कुछ साहित्यक मित्रों के साथ उठना बैठना होने लगा । फिर विनोद अनुपम के कहने पर जमालपुर प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़ा, पदाधिकारी भी बना । प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद कई गोष्ठियों बैठकों में बोलने का मौका मिलना शुरू हो गया । लिहाजा पुस्तकों और रचनाओं पर तैयारी करने लगा, जिसका फायदा बाद में मुझे समीक्षा लेखन में हुआ । फिर मित्रों के आग्रह पर लघु पत्रिकाओं में कुछ समीक्षाएं भेजी जो प्रकाशित भी हुई । इन सबके पहले मैं हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह की कई किताबें पढ़ चुका था । सबसे पहले मैंने उनकी किताब - कहानी नयी कहानी पढ़ा, फिर कविता के नए प्रतिमान । उनपर केंद्रित पत्र-पत्रिकाओं और समीक्षा ठाकुर द्वारा संपादित किताब कहना ना होगा भी पढ़ा । नामवर जी के लेखन और उनकी समीक्षकीय दृष्टि से गहरे तक प्रभावित था । कहानी नयी कहानी में लिखी नामवर सिंह की एक पंक्ति अबतक याद है – आज की ग्राम जीवन पर लिखी हुई कहानियां प्रेमचंद की स्वस्थ और प्रवृत्त प्रवृति का अस्वाभाविक, परिवर्तित, कृत्रिम और डिस्टॉर्टेड पुन:प्रस्तुतीकरण है । वेद में जिसतरह सबकुछ है, उसी चरह प्रेमचंद की कहानियों में सबकुछ है । जगत ब्रह्म का विवर्त है तो आज की ग्राम कथाएं प्रेमचंद की विकृति है । कहानी नयी कहानी में जो लेख संकलित हैं वो नामवर सिंह ने 1956 से 1965 के बीच लिखे थे । लेकिन उनका उपरोक्त कथन आज भी पूरी तरह से समीचीन है । आज भी ग्रामीण जीवन पर लिखी जा रही कहानियों के संदर्भ में इस बात को कहा जा सकता है और मुझे लगता है कि यह टिप्पणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. जितनी उस वक्त थी । खैर मैं वर्तमान कहानी पर चर्चा नहीं कर रहा । बात नामवर सिंह की हो रही थी । जमालपुर में जब रह रहा था तो नामवर सिंह को पढ़ते हुए यह लगता था कि काश उनसे परिचय होता, उनसे बातें कर पाता । कई बार उनको पत्र लिखा लेकिन डाक में डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाया । लेकिन नामवर और उनसे जुड़ा कुछ भी मिल जाता तो फौरन पढ़ लेता ।
समय के चक्र ने मुझे देश की राजधानी दिल्ली पहुंचा दिया । एक गोष्ठी में नामवर जी को सुना तो उनके वक्तृत्व कला से खासा प्रभावित हुआ । फिर फ्रीलांसिंग का दौर शुरु हुआ । मित्र संजय कुंदन ने राष्ट्रीय सहारा के रविवारीय पृष्ठ के लिए कई परिचर्चाएं करवाई । उसी के सिलसिले में दो एक बार नामवर जी से बात हुई । जितनी बार उनसे बात होती तो मुझे कुछ ना कुछ नया हासिल हो जाता । नामवर जी से आमना सामना नहीं हुआ । हिंदी भवन में एक गोष्ठी में नामवर जी ने अपने भाषण के क्रम में बोलते हुए ये कह डाला कि आजकल हिंदी साहित्य में अनंत विजय भी तलबारबाजी कर रहे हैं । संदर्भ मुझे अब याद नहीं है लेकिन इतना याद है कि उसी दौरान आलोचना पर एक परिचर्चा में मैंने नामवर सिंह की राय को शामिल नहीं किया था। फिर धीरे-धीरे नौकरी की व्यस्तता में लिखना कुछ कम हो गया । नामवर जी से बात करने की इच्छा मन में बनी रही । कई बार उन व्यक्तिगत पार्टी में बैठा जिसमें नामवर जी थे, उनको और उनके संस्मरणों और टिप्पणियों को सुनकर हमेशा से उनकी स्मृति और उनके अपडेट रहने की क्षमता पर ताज्जुब होता था ।
हाल ही में एक अनौपचारिक कवि गोष्ठी में नामवर सिंह जी से मुलाकात हो गई । ये कवि गोष्ठी हिंदी कवि तजेन्द्र लूथरा के पहल पर हुई थी । जिसमें वरिष्ठ कवि विष्णु नागर, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ,मदन कश्यप, लीलाधर मंडलोई, पंकज सिंह, सविता सिंह के अलावा राजेन्द्र शर्मा, रोहतक की कवियित्री शबनम, रमा पांडे और हरीश आनंद और ममता किरण भी थी । कवि मित्र अरुण आदित्य भी । उस दिन संयोग से विष्णु नागर जी का जन्मदिन भी था । सभी कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया । हमेशा की तरह अरुण आदित्य की कविताएं व्यंग्यात्मक लहजे में बड़ी बातें कह जाती है । उनकी कविताज- डर के पीछे कैडर है- सुनकर आनंद आ गया। तजेन्द्र लूथरा ने अपनी बेहतरीन कविता-अंतराल का डर- सुनाई। यह किवता मैं पहले ही पढ़ चुका था । इसमें कवि के अनुभव संसार का व्यापक फलक और उसको देखने समझने की उनकी दृष्टि सामने आती है । लक्ष्मी शंकर वाजपेयी और ममता किरण की खासियत यह है कि वो बिना पढ़े कविता बोलते हैं। सुनाते हैं। उनकी शैली उनके काव्य पाठ को एकदम से उपर उठा देती है । राजेन्द्र शर्मा की हुसैन पर लिखी कविता एकदम से मौजूं थी । लेकिन मंडलोई की दो लाइन ने महानगरीय जीवन की त्रासदी को एकदम से नंगा कर दिया- सांप काटने से नहीं हुई है देह नीली, कल रात मैं अपने दोस्त के साथ था । सभी कवियों ने दो-दो कविताएं सुनाई लेकिन चूंकि विष्णु नागर जी का जन्मदिन था इसलिए उन्होंने अपने संग्रह से कई कविताओं का पाठ किया । सविता सिंह ने लंबी कविता सुनाई लेकिन दूर बैठे होने की वजह से मैं कविता ठीक से सुन नहीं पाया । संभवत कविता का शीर्षक था- चांद, तीर और अनश्वर स्त्री । इस कवि गोष्ठी के बाद सबको उम्मीद थी कि नामवर जी कुछ बोलेंगे । संचालन कर रहे तजेन्द्र लूथरा और रमा पांडे समेत कई लोगों ने उनसे आग्रह किया लेकिन नामवर जी ने अपने अंदाज में मुंह में पान दबाए सिर्फ इतना कहा- आनंद आ गया ।
गोष्ठी के बाद नामवर जी से मेरी पहली बार बेहद लंबी बात हुई । उन्होंने ये कहकर मुझे चौंका दिया कि चौथी दुनिया के अपने स्तंभ में तुम अच्छा लिख रहे हो । चौंकते हुए मैंने कहा कि सर आप देखते हैं तो उन्होंने फौरन मेरे स्तंभों की कई बातें बता कर अचंभे में डाल दिया । अपनी प्रशंसा सुनना हमेशा अच्छा लगता है लेकिन खुद से उसकी चर्चा अश्लीलता हो जाती है । नामवर जी से फिर हिंदी की रचनाओं पर बात शुरू हुई । हमारी लंबी चर्चा हिंदी के रचनात्मक लेखन में डीटेलिंग के नहीं होने पर हुई । उन्होंने इस बात पर सहमति जताई कि हिंदी के लेखक डिटेलिंग नहीं करते हैं इस वजह से बहुधा रचनाएं सतही हो जाती है । फिर हमारी चर्चा हुसैन पर हुई । नामवर जी ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया । एक बार वो, श्रीकांत वर्मा, हुसैन और कुछ मित्र दिल्ली में टी हाउस के बाहर खड़े हो कर बातें कर रहे थे, अचानक से एक वयक्ति दौड़ता हुआ आया और हुसेन को एक थप्पड़ मारकर भाग गया । सारे लोग हतप्रभ । यह दौर वही रहा होगा जब हुसेन हिंदू देवी देवताओं के चित्र बनाकर विवादित हो चुके थे । इससे हम हुसेन के भारत छोड़ने के डर का सूत्र पकड़ सकते हैं । हलांकि हुसेन के भारत छोड़ने को लेकर मेरी काफी असहमतियां रही हैं । नामवर जी ने एक और बात बताई कि कल्पना के हर अंक में हुसेन के रेखाचित्र छपा करते थे और उसके संपादक बदरी विशाल पित्ती हुसेन के गहरे मित्रों में से थे । हुसेन के बाद नामवर जी से भारतीय राजनीति, लोकपाल बिल, भ्रष्टाचार आदि पर भी बातें हुई । नामवर जी का मानना था कि आज भारतीय राजनीति बेहद खतरनाक दौर से गुजर रही है । कांग्रेस और बीजेपी पर उन्होंने ख्रुश्चेव के बहाने से एक टिप्पणी- एक बार ख्रुश्चेव से ग्रेट ब्रिटेन की दोनों पार्टियां- लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बारे में उनकी राय पूछी गई । ख्रुश्चेव ने उत्तर दिया कि एक बाएं पांव का जूता है और दूसरा दाएं पांव का जूता है । कहने का अर्थ यह कि दोनों आखिरकार जूते ही हैं ।
नामवर जी से तकरीबन घंटे भर की बातचीत उनको जानने समझने के लिए काफी था और यह मेरे लिए एक लाइफ टाइम एचीवमेंट जैसा था । जिनके लिखे को पढ़कर लिखना सीखा हो उनके सामने अपनी बात कहना मेरे लिए एक स्वपन के सच होने जैसा था ।नामवर जी से इतनी लंबी बात करने का अवसर सुलभ करवाने के लिए मित्र तजेन्द्र लूथरा का आभार ।
समय के चक्र ने मुझे देश की राजधानी दिल्ली पहुंचा दिया । एक गोष्ठी में नामवर जी को सुना तो उनके वक्तृत्व कला से खासा प्रभावित हुआ । फिर फ्रीलांसिंग का दौर शुरु हुआ । मित्र संजय कुंदन ने राष्ट्रीय सहारा के रविवारीय पृष्ठ के लिए कई परिचर्चाएं करवाई । उसी के सिलसिले में दो एक बार नामवर जी से बात हुई । जितनी बार उनसे बात होती तो मुझे कुछ ना कुछ नया हासिल हो जाता । नामवर जी से आमना सामना नहीं हुआ । हिंदी भवन में एक गोष्ठी में नामवर जी ने अपने भाषण के क्रम में बोलते हुए ये कह डाला कि आजकल हिंदी साहित्य में अनंत विजय भी तलबारबाजी कर रहे हैं । संदर्भ मुझे अब याद नहीं है लेकिन इतना याद है कि उसी दौरान आलोचना पर एक परिचर्चा में मैंने नामवर सिंह की राय को शामिल नहीं किया था। फिर धीरे-धीरे नौकरी की व्यस्तता में लिखना कुछ कम हो गया । नामवर जी से बात करने की इच्छा मन में बनी रही । कई बार उन व्यक्तिगत पार्टी में बैठा जिसमें नामवर जी थे, उनको और उनके संस्मरणों और टिप्पणियों को सुनकर हमेशा से उनकी स्मृति और उनके अपडेट रहने की क्षमता पर ताज्जुब होता था ।
हाल ही में एक अनौपचारिक कवि गोष्ठी में नामवर सिंह जी से मुलाकात हो गई । ये कवि गोष्ठी हिंदी कवि तजेन्द्र लूथरा के पहल पर हुई थी । जिसमें वरिष्ठ कवि विष्णु नागर, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ,मदन कश्यप, लीलाधर मंडलोई, पंकज सिंह, सविता सिंह के अलावा राजेन्द्र शर्मा, रोहतक की कवियित्री शबनम, रमा पांडे और हरीश आनंद और ममता किरण भी थी । कवि मित्र अरुण आदित्य भी । उस दिन संयोग से विष्णु नागर जी का जन्मदिन भी था । सभी कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया । हमेशा की तरह अरुण आदित्य की कविताएं व्यंग्यात्मक लहजे में बड़ी बातें कह जाती है । उनकी कविताज- डर के पीछे कैडर है- सुनकर आनंद आ गया। तजेन्द्र लूथरा ने अपनी बेहतरीन कविता-अंतराल का डर- सुनाई। यह किवता मैं पहले ही पढ़ चुका था । इसमें कवि के अनुभव संसार का व्यापक फलक और उसको देखने समझने की उनकी दृष्टि सामने आती है । लक्ष्मी शंकर वाजपेयी और ममता किरण की खासियत यह है कि वो बिना पढ़े कविता बोलते हैं। सुनाते हैं। उनकी शैली उनके काव्य पाठ को एकदम से उपर उठा देती है । राजेन्द्र शर्मा की हुसैन पर लिखी कविता एकदम से मौजूं थी । लेकिन मंडलोई की दो लाइन ने महानगरीय जीवन की त्रासदी को एकदम से नंगा कर दिया- सांप काटने से नहीं हुई है देह नीली, कल रात मैं अपने दोस्त के साथ था । सभी कवियों ने दो-दो कविताएं सुनाई लेकिन चूंकि विष्णु नागर जी का जन्मदिन था इसलिए उन्होंने अपने संग्रह से कई कविताओं का पाठ किया । सविता सिंह ने लंबी कविता सुनाई लेकिन दूर बैठे होने की वजह से मैं कविता ठीक से सुन नहीं पाया । संभवत कविता का शीर्षक था- चांद, तीर और अनश्वर स्त्री । इस कवि गोष्ठी के बाद सबको उम्मीद थी कि नामवर जी कुछ बोलेंगे । संचालन कर रहे तजेन्द्र लूथरा और रमा पांडे समेत कई लोगों ने उनसे आग्रह किया लेकिन नामवर जी ने अपने अंदाज में मुंह में पान दबाए सिर्फ इतना कहा- आनंद आ गया ।
गोष्ठी के बाद नामवर जी से मेरी पहली बार बेहद लंबी बात हुई । उन्होंने ये कहकर मुझे चौंका दिया कि चौथी दुनिया के अपने स्तंभ में तुम अच्छा लिख रहे हो । चौंकते हुए मैंने कहा कि सर आप देखते हैं तो उन्होंने फौरन मेरे स्तंभों की कई बातें बता कर अचंभे में डाल दिया । अपनी प्रशंसा सुनना हमेशा अच्छा लगता है लेकिन खुद से उसकी चर्चा अश्लीलता हो जाती है । नामवर जी से फिर हिंदी की रचनाओं पर बात शुरू हुई । हमारी लंबी चर्चा हिंदी के रचनात्मक लेखन में डीटेलिंग के नहीं होने पर हुई । उन्होंने इस बात पर सहमति जताई कि हिंदी के लेखक डिटेलिंग नहीं करते हैं इस वजह से बहुधा रचनाएं सतही हो जाती है । फिर हमारी चर्चा हुसैन पर हुई । नामवर जी ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया । एक बार वो, श्रीकांत वर्मा, हुसैन और कुछ मित्र दिल्ली में टी हाउस के बाहर खड़े हो कर बातें कर रहे थे, अचानक से एक वयक्ति दौड़ता हुआ आया और हुसेन को एक थप्पड़ मारकर भाग गया । सारे लोग हतप्रभ । यह दौर वही रहा होगा जब हुसेन हिंदू देवी देवताओं के चित्र बनाकर विवादित हो चुके थे । इससे हम हुसेन के भारत छोड़ने के डर का सूत्र पकड़ सकते हैं । हलांकि हुसेन के भारत छोड़ने को लेकर मेरी काफी असहमतियां रही हैं । नामवर जी ने एक और बात बताई कि कल्पना के हर अंक में हुसेन के रेखाचित्र छपा करते थे और उसके संपादक बदरी विशाल पित्ती हुसेन के गहरे मित्रों में से थे । हुसेन के बाद नामवर जी से भारतीय राजनीति, लोकपाल बिल, भ्रष्टाचार आदि पर भी बातें हुई । नामवर जी का मानना था कि आज भारतीय राजनीति बेहद खतरनाक दौर से गुजर रही है । कांग्रेस और बीजेपी पर उन्होंने ख्रुश्चेव के बहाने से एक टिप्पणी- एक बार ख्रुश्चेव से ग्रेट ब्रिटेन की दोनों पार्टियां- लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बारे में उनकी राय पूछी गई । ख्रुश्चेव ने उत्तर दिया कि एक बाएं पांव का जूता है और दूसरा दाएं पांव का जूता है । कहने का अर्थ यह कि दोनों आखिरकार जूते ही हैं ।
नामवर जी से तकरीबन घंटे भर की बातचीत उनको जानने समझने के लिए काफी था और यह मेरे लिए एक लाइफ टाइम एचीवमेंट जैसा था । जिनके लिखे को पढ़कर लिखना सीखा हो उनके सामने अपनी बात कहना मेरे लिए एक स्वपन के सच होने जैसा था ।नामवर जी से इतनी लंबी बात करने का अवसर सुलभ करवाने के लिए मित्र तजेन्द्र लूथरा का आभार ।
Wednesday, July 13, 2011
'सांस्कृतिक क्रांति' पर बवाल
चौथी दुनिया के अपने स्तंभ में कुछ दिन पहले मैंने बिहार सरकार के कला और संसकृति मंत्रालय के कॉफी टेबल बुक बिहार विहार के बहाने सूबे में सांस्कृतिक संगठनों की सक्रियता, उसमें आ रहे बदलाव और सरकारी स्तर पर उसके प्रयास की चर्चा की थी । अपने उस लेख में मैंने बिहार सरकार के हाल-फिलहाल में किए गए कामों को रेखांकित करते हुए लालू-राबड़ी राज को इन कला और सांस्कृतिक संस्थाओं की दुर्गति के लिए जिम्मेदार ठहराया था । मेरे इस लेख पर कई लोगों को सख्त आपत्ति है । उस लेख के जबाव में कई लेख लिखे गए । लेख के बहाने मुझ पर व्यक्तिगत टिप्पणियां की गई । लेकिन प्रतिलेख लिखनेवाले विद्वतजनों ने अपनी आपत्ति में जो तर्क दिए वो उनकी विद्वता के अनुकूल नहीं है । मेरे लेख की जबाव में लिखा गया लेख चूंकि प्रतिक्रिया में लिखे गए हैं इसलिए वो हल्के हैं । हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है लेकिन जब प्रतिक्रिया में बदले की भावना और वयक्तिगत राग-द्वेष शामिल हो जाए तो वह नरेन्द्र मोदी वाली प्रतिक्रिया हो जाती है । लोगों ने मुझपर ये भी आरोप लगाए कि मैं अपनी सवर्ण ग्रंथि के तहत लालू यादव को बिहार की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराता हूं और नीतीश कुमार को उसी ग्रंथि के तहत शीर्ष पर पहुंचाता हूं । लालू यादव के बारे में लिखी गई मेरी टिप्पणी से वो इतने आहत हो गए कि उनलोगों ने यह भी पता लगा लिया कि मैं कितने पानी में हूं । मेरे लेख को सावधानी के पढ़े बगैर मेरी जाति और मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर राय बना लेनेवाले इन विद्वानों की समझ पर सिर्फ मुस्कुराया जा सकता है । हंसी तो कतई नहीं आती । बिहार में लालू यादव के शासनकाल के दौरान सूबे की क्या दुर्गति हुई थी इस बारे में किसी को कुछ कहने की या कुछ साबित करने की जरूरत ही नहीं है । जिस तरह से हर साल कोसी में बाढ़ आती है और पूरे इलाके में तबाही मचा देती है उसी तरह सरकारी विभागों में चारा,अलकतरा, बीएड घोटालों की बाढ़ ने पूरे सूबे के विकास की राह को तबाह कर दिया था । क्या लालू यादव की जय जयकार करनावालों को यह बताने की जरूरत है कि लालू-राबड़ी शासनकाल के दौरान बिहार में ग्रोथ रेट कहां से कहां तक पहुच गया था । क्या उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि किस तरह से सूबे के अफसरों को खुलेआम उनके दफ्तर में घुसकर उनके साथ बदतमीजी की जाती थी । क्या उन्हें यह याद दिलाना पड़ेगा कि लालू के राज में अपहरण एक उद्योग में तब्दील हो चुका था । क्या उन्हें यह भी याद दिलाना होगा कि लालू की शह पर शहाबुद्दीन जैसे नेता बिहार में फल फूल रहे थे । क्या उन्हें यह भी याद दिलाना होगा कि उन पंद्रह सालों में अस्पतालों से डॉक्टर, स्कूल से शिक्षक और दफ्तरों से बाबू गायब रहा करते थे । क्या उन्हें यह भी याद नहीं कि पंद्रह साल में बिहार में परिवहन वयवस्था चंद चुनिंदा लोगों की बपौती बनकर रह गई । बिहार परिवहन निगम की खूबसूरत इमारत खंडहर में तब्दील हो गई। उस वक्त के कानून व्यवस्था की बात करने से शरीर में सिहरन हो जाती है । लालू यादव के शासन काल में बिहार सिर्फ निगेटिव ग्रोथ और छवि हासिल कर पाया । जिन लोगों लालू यादव सामजिक क्रांति के मसीहा और समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों के मसीहा नगर आते हैं उनको मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि उन दबे कुचलों ने ही उनको सत्ता से च्युत कर दिया । शासन सिर्फ नारों और जुमलों और मसखरेपन से नहीं चलता । उसके लिए ठोस कार्य और अहम फैसले करने होते हैं । दरअसल लालू यादव के बिहार विधानसभा में करारी हार के बाद कुछ लोगों को लालू में अपना भविष्य नजर आने लगा है और वो उनमें संभावना तलाशने लगे है। अब अगर मैं ये कहूं कि उनकी जातिवादी मानसिकता उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है तो मैं भी उसी ग्रंथिदोष का शिकार हो जाऊंगा जिसका आरोप मुझपर लगाया गया है ।
मेरे उस लेख की प्रतिक्रिया में जिसतरह से बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह और बाबा साहब भीराव अंबेडकर का उल्लेख किया गया वो भी बेहद हास्यास्पद और मनोरंजक है । उसपर मैं कुछ नहीं कहना चाहता ।
दूसरी बात जो साबित करने की कोशिश की गई वो यह कि लालू यादव के शासनकाल में बिहार में जमकर सांस्कृतिक गतिविधियां होती थी । इस क्रम में यह बताया गया कि लालू यादव के समय में बिहार विधान परिषद की साहित्यिक गतिविधियां ‘सुगढ़’ फ थी । इस सुगढ़ता के लिए दो उदाहरण दिए गए–एक तो उस वक्त की परिषद पत्रिका साक्ष्य और संवाद राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रही थी । अब इस कथन का क्या किया जाए । राष्ट्रीय स्तर की तो बात छोड़िए मैं तो सिर्फ इतना कह सकता हूं कि ये पत्रिकाएं अब भी साहित्यिक हलके में अपनी जगह और पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं । जाबिर हुसैन हमारे मित्र हैं, मैं भी उन पत्रिकाओं को लगातार देखता रहा हूं । लेकिन राष्ट्रीय लोकप्रियता का कथन अति उत्साह में दिया गया प्रतीत होता है। दूसरे ये कि विधान परिषद में राजेन्द्र यादव, गुलजार, सीताराम येचुरी जैसे बौद्धिक वहां की गतिविधियों में शामिल होते थे । ये सच है कि जाबिर हुसैन के बिहार विधानसभा के सभापति रहते परिषद में कुछ साहित्यिक गतिविधियां हुई थी । उसकी तारीफ भी हुई थी । खुद जाबिर हुसैन की किताब पर लिखते हुए मैंने भी उनकी साहित्यिक सक्रियता को सराहा था । लेकिन क्या उतना भर ही काफी है । क्या मुझपर आरोप लगानेवाले यह जानते हैं कि उस वक्त कला और संसकृति मंत्री कौन थे या फिर उस मंत्रालय की पहल पर क्या सार्वजनिक कार्य किए गए ।
दिल्ली के एक समाजवादी कवि-उपन्यासकार ने भी फोन करके मुझसे बहस की । उनकी पहली लाइन थी – बेबसाइट्स पर चौथी दुनिया में छपे आपके लेख पर खूब बहस हो रही है । मैंने पढ़ा नहीं है लेकिन जैसा कि लोगों ने मुझे बताया कि आपने बिहार की सांस्कृतिक हलचल पर लिखा है । पहले तो वो फेसबुक पर लिखत-पढ़त में बहस करना चाहते थे लेकिन बाद में मौखिक बहस हुई । उनका कहना था कि बिहार की अकादमियां बहुत बुरे हाल में है । मैं उनकी राय से सौ फीसदी सहमत हूं । अकादमियों की हालत बुरी है । लेकिन फिर से मैं उसी तर्क पर लौटता हूं कि वर्तमान हालत को पिछले शासनकाल के बरक्श रखकर देखिए आपको हकीकत का पता चल जाएगा । क्या उन अकादमियों की बेहतरी की दिशा में सोचा नहीं जा रहा । क्या उनके कर्मचारियों के वेतन और अन्य सुविधाओं के बारे में सरकार ने धन मुहैया कराने की कार्ययोजना नहीं बनाई । उनको सक्रिय करने की दिशा में पहल नहीं हो रही । ये सच है कि बिहार सरकार की प्राथमिकता में कला संस्कृति नहीं है । लेकिन ये प्राथमिकता तो किसी भी सरकार की नहीं रही है और ना ही आगे रहेगी । हिंदी के नाम पर राजनीति करनेवालों को यह भी याद नहीं कि विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन होता है । हम सिर्फ बिहार की अकादमियों के बारे में ही क्यों सोचते हैं । आप देशभर की अकादमियों की तफ्तीश करके देख लीजिए- कमोबेश हर जगह आपको एक जैसे हालात नजर आएंगे । लेकिन इस तर्क पर बिहार के अकादमियों की बदहाली को जायज नहीं ठहराया जा सकता है । बिहार सरकार की कला और संस्कृति मंत्रालय की इस बात के लिए तो सराहना करनी ही चाहिए कि उसने सुधार की दिशा में कदम उठाए हैं । कवि मित्र मुझे यह भी समझाने की कोशिश करने लगे कि वो बिहार की मंत्री सुखदा पांडे की समझ को जानते हैं और उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है । मैंने उनसे निवेदन भी किया कि किसी की वयक्तिगत क्षमता को उसकी विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि उसके काम के आधार पर आंका जाना चाहिए । लेकिन उनका गुस्सा चरम पर था और वो कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं थे और वही संवाद टूटने की वजह बना । बातचीत खत्म होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने तो बगैर मेरे लेख को पढ़े किसी के कहने के आधार पर अपनी राय बना ली । खैर हिंदी की दुर्दशा के लिए यही चीज- बिना पढ़े राय बनाना- बहुत हद तक जिम्मेदार है ।
अंत में सिर्फ इतनी बात कहना चाहूंगा कि किसी विचार पर सार्थक बहस हो, तर्कों का सहारा लेकर एक दूसरे पर हमले हों। लेकिन लेखन में एक न्यूनतम मर्यादा का पालन तो हो । आजकल बेवसाइट पर हर किसी को गाली गलौच करने और व्यक्तिगत जीवन पर कीचड़ उछालने की हासिल छूट को जो बेजा इस्तेमाल हो रहा है वो चिंता की बात है । मैं उस तरह के लोगों का नाम लेकर उनको वैधता नहीं प्रदान करना चाहता लेकिन उन कुंठित लोगों के बारे में हिंदी समाज को गंभीरता से सोचना होगा, नहीं तो आनेवाले दिनों में ये लंपटई हम सब पर भारी पड़ सकती है ।
मेरे उस लेख की प्रतिक्रिया में जिसतरह से बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह और बाबा साहब भीराव अंबेडकर का उल्लेख किया गया वो भी बेहद हास्यास्पद और मनोरंजक है । उसपर मैं कुछ नहीं कहना चाहता ।
दूसरी बात जो साबित करने की कोशिश की गई वो यह कि लालू यादव के शासनकाल में बिहार में जमकर सांस्कृतिक गतिविधियां होती थी । इस क्रम में यह बताया गया कि लालू यादव के समय में बिहार विधान परिषद की साहित्यिक गतिविधियां ‘सुगढ़’ फ थी । इस सुगढ़ता के लिए दो उदाहरण दिए गए–एक तो उस वक्त की परिषद पत्रिका साक्ष्य और संवाद राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रही थी । अब इस कथन का क्या किया जाए । राष्ट्रीय स्तर की तो बात छोड़िए मैं तो सिर्फ इतना कह सकता हूं कि ये पत्रिकाएं अब भी साहित्यिक हलके में अपनी जगह और पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं । जाबिर हुसैन हमारे मित्र हैं, मैं भी उन पत्रिकाओं को लगातार देखता रहा हूं । लेकिन राष्ट्रीय लोकप्रियता का कथन अति उत्साह में दिया गया प्रतीत होता है। दूसरे ये कि विधान परिषद में राजेन्द्र यादव, गुलजार, सीताराम येचुरी जैसे बौद्धिक वहां की गतिविधियों में शामिल होते थे । ये सच है कि जाबिर हुसैन के बिहार विधानसभा के सभापति रहते परिषद में कुछ साहित्यिक गतिविधियां हुई थी । उसकी तारीफ भी हुई थी । खुद जाबिर हुसैन की किताब पर लिखते हुए मैंने भी उनकी साहित्यिक सक्रियता को सराहा था । लेकिन क्या उतना भर ही काफी है । क्या मुझपर आरोप लगानेवाले यह जानते हैं कि उस वक्त कला और संसकृति मंत्री कौन थे या फिर उस मंत्रालय की पहल पर क्या सार्वजनिक कार्य किए गए ।
दिल्ली के एक समाजवादी कवि-उपन्यासकार ने भी फोन करके मुझसे बहस की । उनकी पहली लाइन थी – बेबसाइट्स पर चौथी दुनिया में छपे आपके लेख पर खूब बहस हो रही है । मैंने पढ़ा नहीं है लेकिन जैसा कि लोगों ने मुझे बताया कि आपने बिहार की सांस्कृतिक हलचल पर लिखा है । पहले तो वो फेसबुक पर लिखत-पढ़त में बहस करना चाहते थे लेकिन बाद में मौखिक बहस हुई । उनका कहना था कि बिहार की अकादमियां बहुत बुरे हाल में है । मैं उनकी राय से सौ फीसदी सहमत हूं । अकादमियों की हालत बुरी है । लेकिन फिर से मैं उसी तर्क पर लौटता हूं कि वर्तमान हालत को पिछले शासनकाल के बरक्श रखकर देखिए आपको हकीकत का पता चल जाएगा । क्या उन अकादमियों की बेहतरी की दिशा में सोचा नहीं जा रहा । क्या उनके कर्मचारियों के वेतन और अन्य सुविधाओं के बारे में सरकार ने धन मुहैया कराने की कार्ययोजना नहीं बनाई । उनको सक्रिय करने की दिशा में पहल नहीं हो रही । ये सच है कि बिहार सरकार की प्राथमिकता में कला संस्कृति नहीं है । लेकिन ये प्राथमिकता तो किसी भी सरकार की नहीं रही है और ना ही आगे रहेगी । हिंदी के नाम पर राजनीति करनेवालों को यह भी याद नहीं कि विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन होता है । हम सिर्फ बिहार की अकादमियों के बारे में ही क्यों सोचते हैं । आप देशभर की अकादमियों की तफ्तीश करके देख लीजिए- कमोबेश हर जगह आपको एक जैसे हालात नजर आएंगे । लेकिन इस तर्क पर बिहार के अकादमियों की बदहाली को जायज नहीं ठहराया जा सकता है । बिहार सरकार की कला और संस्कृति मंत्रालय की इस बात के लिए तो सराहना करनी ही चाहिए कि उसने सुधार की दिशा में कदम उठाए हैं । कवि मित्र मुझे यह भी समझाने की कोशिश करने लगे कि वो बिहार की मंत्री सुखदा पांडे की समझ को जानते हैं और उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है । मैंने उनसे निवेदन भी किया कि किसी की वयक्तिगत क्षमता को उसकी विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि उसके काम के आधार पर आंका जाना चाहिए । लेकिन उनका गुस्सा चरम पर था और वो कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं थे और वही संवाद टूटने की वजह बना । बातचीत खत्म होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने तो बगैर मेरे लेख को पढ़े किसी के कहने के आधार पर अपनी राय बना ली । खैर हिंदी की दुर्दशा के लिए यही चीज- बिना पढ़े राय बनाना- बहुत हद तक जिम्मेदार है ।
अंत में सिर्फ इतनी बात कहना चाहूंगा कि किसी विचार पर सार्थक बहस हो, तर्कों का सहारा लेकर एक दूसरे पर हमले हों। लेकिन लेखन में एक न्यूनतम मर्यादा का पालन तो हो । आजकल बेवसाइट पर हर किसी को गाली गलौच करने और व्यक्तिगत जीवन पर कीचड़ उछालने की हासिल छूट को जो बेजा इस्तेमाल हो रहा है वो चिंता की बात है । मैं उस तरह के लोगों का नाम लेकर उनको वैधता नहीं प्रदान करना चाहता लेकिन उन कुंठित लोगों के बारे में हिंदी समाज को गंभीरता से सोचना होगा, नहीं तो आनेवाले दिनों में ये लंपटई हम सब पर भारी पड़ सकती है ।
Tuesday, July 12, 2011
बिहार में 'सांस्कृतिक क्रांति'
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि – विद्रोह, क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका विस्फोट अचानक होता है । घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है । दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृह राज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती है। बिहार में लालू यादव और उनकी पत्नी श्रीमती रावड़ी देवी के तकरीबन डेढ दशक के शासन काल में सूबे की सारी संस्थाएं एक एक कर नष्ट होती चली गई या फिर प्रयासपूर्वक उनको बरबाद कर दिया गया । जो बिहार में एक जमाने में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में विश्व में मशहूर था, जहां नालंदा विश्वविद्यालय जैसे उच्च कोटि के शिक्षा केंद्र हुआ करते थे, उन पंद्रह सालों के दौरान सबकुछ खत्म सा हो गया । जिस बिहार में कला संस्कृति की एक समृद्ध परंपरा थी वहां कला –संस्कृति मजाक बनकर रह गए । जो सूबा शिक्षा का अप्रतिम केंद्र हुआ करता था वहां से हर साल उच्च शिक्षा के लिए हजारो छात्र पलायन कर दिल्ली और अन्य शहरों का रुख करने लगे । जिस सूबे में ज्ञान की गंगा बहा करती थी वहां अपराध और रंगदारी का बोलबाला हो गया । राज्य के संवैधानिक मुखिया होने के नाते यह सारी जिम्मेदारी लालू-रावड़ी की की बनती है कि उन्होंने बिहारी गौरव को बिहारी गाली में तब्दील कर दिया । लालू यादव का फूहड़पन और उनके रिश्तेदारों के रंगदारी के किस्सों पर फिल्में बननी लगी और उन फिल्मों के अहम किरदारों में आपको उन लोगं की झलक साफ तौर पर दिखाई देने लगी । बिहारी शब्द हास्य और व्यंग्य का प्रतीक बन गया । लेकिन जैसा कि दिनकर जी ने लिखा है कि विद्रोह क्रांति या बगावत कोई ऐसी चीज नहीं कि उसका विस्फोट अचानक होता है । उसी तरह जनता के गुस्से का विस्फोट होने में सालों लग गए । बिहार की जनता ने समझदारी दिकाते हुए सूबे में सरकार बदल दी । पहले तो कुछ अंदेशे के साथ लेकिन दूसरी बार जब भरोसा हो गया तो प्रचंड बहुमत के साथ। इस प्रचंड बहुमत के साथ ही जनता की आशाएं और आकांक्षाएं भी सातवें आसमान पर जा पहुंची है ।
यह वर्ष बिहार राज्य के स्थापना के सौ वर्ष के रूप में साल भर जश्न के रूप में मनाया जा रहा है । राज्य की नीतीश सरकार ने साल भर के कई कार्यक्रम बनाए हैं जिनमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर गोष्ठी सेमिनार तो हैं ही उसके अलावा कई पुस्तकों का प्रकाशन और सांस्कृतिक रूप से लुप्त हो रही कलाओं के संरक्षण का काम भी शुरू किया गया है । इस काम में बिहार का कला संस्कृति मंत्रालय बेहद शिद्दत से जुटा है । इसी कड़ी में मंत्रालय ने बिहार विहार नाम से एक कॉफी टेबल बुक का प्रकाशन किया है । इस किताब में बिहार की कला संस्कृति एवं युवा विभाग की मंत्री सुखदा पांडे ने मर्म पर चोट की है – मैकाले के हवाले से उन्होंने लिखा है – हिंदुस्तानी यदि अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक इतिहास को जान जाएं तो हम उनको गुलाम नहीं कर पाएंगे इस लिए उन्हें उनके इतिहास को नहीं जानने दो । बिहार में तकरीबन डेढ दशत में यही हुआ । बिहार की नई पीढ़ी को उसके सांसक्कृति और वैचारिक इतिहास की जानकारी से वंचित रखने का षडयंत्र रचा जाता रहा और प्रयासपूर्वक ऐसा किया भी गया । लेकिन अब सुखदा पांडे के नेतृत्व में बिहार का यह मंत्रालय मैकाले के इस सिद्धांतो को झुठलाने में लगा है । सुखदा पांडे शिक्षण कार्य से जुड़ी रही हैं और उनसे .ह उम्मीद भी की जा सकती है कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में बिहार के गौरव को वापस लाने में महती भूमिका निभाएंगी ।
बिहार के गौरवशाली इतिहासल को सामने लाने के लिए संस्कृकि मंत्रालय ने एक किताब बिहार-विहार छापी है य़ इस किताब का संपादन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखक विनोद अनुपम ने किया है । विनोद अनुपम ने अएपने संपादकीय में बिहारकी होने की पीड़ा से ही सुरुआत की है कि किस तरह से जब वो 1992 में फिल्म एप्रिशिएशन का कोर्स करने के लिए पुणे गए थे तो उनके साथ के लोगों को इस बात का आश्चर्य होता था और व्यंग्यात्मक लहजे में पूछते थे कि कैसा है आपका बिहार । विनोद अनुपम के मुताबिक - अब बदलते वक्त में भी लोग बिहार के बारे में जानना चाहते हैं लेकिन अब वो लोग बिहार के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं, बिहार में हो रहे नवीनतम बदलाव के बारे में जानना चाहते हैं । जनता वह सबकुछ जानना चाहती है जो शायद हम भी नहीं जानते। शायद इसलिए कि उन्हें पता है कि बदलाव की इबारत बिहार से ही लिखी जानी है , देश में भविष्य की रोशनी बिहार से ही आनी है । बिहार को करीब से जानने की इसी क्षुधा की पूर्ति की छोटी सी कोशिश है – बिहार विहार । दरअसल इस कॉफी टेबल बुक से बिहार की संस्कृति और समृद्ध लोक कलाओं की एक छोटी से झलक भर ही मिलती है । संकेत मिलते हैं कि हमारे बिहार की कला परंपराएं कितनी समृद्ध रही है । बिहार का होने के बावजूद इस किताब को पढ़ने के बाद मेरी जानकारी में भी जबरदस्त इजाफा हुआ । इस किताब से भी एक दिलचस्प प्रसंग जुड़ा है । विनोद अनुपम ने जब फोन पर मुझे कहा कि बिहार की कला संस्कृति पर वो बिहार सरकार की तरफ से प्रकाशित होनेवाली कॉफी टेबल बुक का संपादन कर रहे हैं तो मुझे लगा था कि वो मजाक कर रहे हैं । पहले तो मुझे लगा था कि सरकार की कला संस्कृति में क्यों दिलचस्पी होगी । और उसपर से कॉफी टेबल बुक । जब भी हमारी बातचीत होती थी तो विमोद अनुपम उलके बारे में बताते थे लेकिन हर बार मैं सोचता था कि वो दिवास्वप्न देख रहे हैं और मैं सपने तोड़ने में यकीन नहीं रखता हूं इसल वजह से उनको कुछ कहता नहीं था लेकिन कालांतर में पता चला कि बिहार विहार को जो सपना था और जिसे मैं दिवा-स्वपन सोच समझ रहा था, दरअसल वो हकीकत था और सपना पूरा भी हुआ ।
कॉफी टेबल बुक की योजना के बारे में विवेक कुमार सिंह ने अपनी पूर्व पीठिका में लिखा है – देश विदेश में घूमते हुए मुझे कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता का एहसास हुआ। विषय विशेष में रुचि जगाने के लिए कॉफी टेबल बुक हमेशा से एक बेहतर माध्यम रही है । यह विषय की विस्तार से जानकारी भले ही ना दे, उसके प्रति दिलचस्पी अवश्य जगाती है । बिहार विहार की परिकल्पना बिहार के प्रति दुनिया की दिलचस्पी जगाने के लिए ही की गई है । विवेक कुमार सिंह को नजदीक से जानने वाले यह बताते हैं कि इस प्रशासनिक अधिकारी ने बिहार में कला संस्कृति के विकास के लिए बहुच कार्य किए हैं और कई मृत प्राय संस्थाओं में नई जान फूंक दी थी । लेकिन कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता उसकी उपलब्धता पर भी निर्भर करती है । अगर बिहार सरकार सिर्फ किताब छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेगी तो इसका उद्देश्य पराजित हो जाएगा । जरूरत इस बात की है कि इस किताब को उन खास लोगों तक पहुंचाया जाए जहां से किसी भी सूबे की छवि निर्मित होती है । अन्यथा यह किताब भी अन्य सरकारी प्रकाशनों की तरह गोदाम में धूल फांक रही होगी और इसके प्रकाशम से जुड़े लोग अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे ।
इस किताब में बेहद श्रमपूर्वक सामग्री का चयन किया गया है लेकिन इसमें जो चित्र लगे हैं वो इस किताब की कमजोरी हैं । हो सकता है वक्त की कमी के चलते ऐसा हुआ हो या फिर कोई और कारण रहे हों लेकिन सामग्री के हिसाब से ना तो चित्रण कमजोर हैं चाहे वो रामलीला के पहले के चित्र हों राजाओं का चित्रण हो । लेकिन हमें इस प्रयास की सराहना करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की और सामग्री सामने आएं, कमजोरियां तो दूर हो ही जाती है । बस जैसा कि मैंने उपर भी कहा कि इसे टारगेट पाठक वर्ग तक पहुंचावने का काम होना चाहिए ।
यह वर्ष बिहार राज्य के स्थापना के सौ वर्ष के रूप में साल भर जश्न के रूप में मनाया जा रहा है । राज्य की नीतीश सरकार ने साल भर के कई कार्यक्रम बनाए हैं जिनमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर गोष्ठी सेमिनार तो हैं ही उसके अलावा कई पुस्तकों का प्रकाशन और सांस्कृतिक रूप से लुप्त हो रही कलाओं के संरक्षण का काम भी शुरू किया गया है । इस काम में बिहार का कला संस्कृति मंत्रालय बेहद शिद्दत से जुटा है । इसी कड़ी में मंत्रालय ने बिहार विहार नाम से एक कॉफी टेबल बुक का प्रकाशन किया है । इस किताब में बिहार की कला संस्कृति एवं युवा विभाग की मंत्री सुखदा पांडे ने मर्म पर चोट की है – मैकाले के हवाले से उन्होंने लिखा है – हिंदुस्तानी यदि अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक इतिहास को जान जाएं तो हम उनको गुलाम नहीं कर पाएंगे इस लिए उन्हें उनके इतिहास को नहीं जानने दो । बिहार में तकरीबन डेढ दशत में यही हुआ । बिहार की नई पीढ़ी को उसके सांसक्कृति और वैचारिक इतिहास की जानकारी से वंचित रखने का षडयंत्र रचा जाता रहा और प्रयासपूर्वक ऐसा किया भी गया । लेकिन अब सुखदा पांडे के नेतृत्व में बिहार का यह मंत्रालय मैकाले के इस सिद्धांतो को झुठलाने में लगा है । सुखदा पांडे शिक्षण कार्य से जुड़ी रही हैं और उनसे .ह उम्मीद भी की जा सकती है कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में बिहार के गौरव को वापस लाने में महती भूमिका निभाएंगी ।
बिहार के गौरवशाली इतिहासल को सामने लाने के लिए संस्कृकि मंत्रालय ने एक किताब बिहार-विहार छापी है य़ इस किताब का संपादन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखक विनोद अनुपम ने किया है । विनोद अनुपम ने अएपने संपादकीय में बिहारकी होने की पीड़ा से ही सुरुआत की है कि किस तरह से जब वो 1992 में फिल्म एप्रिशिएशन का कोर्स करने के लिए पुणे गए थे तो उनके साथ के लोगों को इस बात का आश्चर्य होता था और व्यंग्यात्मक लहजे में पूछते थे कि कैसा है आपका बिहार । विनोद अनुपम के मुताबिक - अब बदलते वक्त में भी लोग बिहार के बारे में जानना चाहते हैं लेकिन अब वो लोग बिहार के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं, बिहार में हो रहे नवीनतम बदलाव के बारे में जानना चाहते हैं । जनता वह सबकुछ जानना चाहती है जो शायद हम भी नहीं जानते। शायद इसलिए कि उन्हें पता है कि बदलाव की इबारत बिहार से ही लिखी जानी है , देश में भविष्य की रोशनी बिहार से ही आनी है । बिहार को करीब से जानने की इसी क्षुधा की पूर्ति की छोटी सी कोशिश है – बिहार विहार । दरअसल इस कॉफी टेबल बुक से बिहार की संस्कृति और समृद्ध लोक कलाओं की एक छोटी से झलक भर ही मिलती है । संकेत मिलते हैं कि हमारे बिहार की कला परंपराएं कितनी समृद्ध रही है । बिहार का होने के बावजूद इस किताब को पढ़ने के बाद मेरी जानकारी में भी जबरदस्त इजाफा हुआ । इस किताब से भी एक दिलचस्प प्रसंग जुड़ा है । विनोद अनुपम ने जब फोन पर मुझे कहा कि बिहार की कला संस्कृति पर वो बिहार सरकार की तरफ से प्रकाशित होनेवाली कॉफी टेबल बुक का संपादन कर रहे हैं तो मुझे लगा था कि वो मजाक कर रहे हैं । पहले तो मुझे लगा था कि सरकार की कला संस्कृति में क्यों दिलचस्पी होगी । और उसपर से कॉफी टेबल बुक । जब भी हमारी बातचीत होती थी तो विमोद अनुपम उलके बारे में बताते थे लेकिन हर बार मैं सोचता था कि वो दिवास्वप्न देख रहे हैं और मैं सपने तोड़ने में यकीन नहीं रखता हूं इसल वजह से उनको कुछ कहता नहीं था लेकिन कालांतर में पता चला कि बिहार विहार को जो सपना था और जिसे मैं दिवा-स्वपन सोच समझ रहा था, दरअसल वो हकीकत था और सपना पूरा भी हुआ ।
कॉफी टेबल बुक की योजना के बारे में विवेक कुमार सिंह ने अपनी पूर्व पीठिका में लिखा है – देश विदेश में घूमते हुए मुझे कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता का एहसास हुआ। विषय विशेष में रुचि जगाने के लिए कॉफी टेबल बुक हमेशा से एक बेहतर माध्यम रही है । यह विषय की विस्तार से जानकारी भले ही ना दे, उसके प्रति दिलचस्पी अवश्य जगाती है । बिहार विहार की परिकल्पना बिहार के प्रति दुनिया की दिलचस्पी जगाने के लिए ही की गई है । विवेक कुमार सिंह को नजदीक से जानने वाले यह बताते हैं कि इस प्रशासनिक अधिकारी ने बिहार में कला संस्कृति के विकास के लिए बहुच कार्य किए हैं और कई मृत प्राय संस्थाओं में नई जान फूंक दी थी । लेकिन कॉफी टेबल बुक की उपयोगिता उसकी उपलब्धता पर भी निर्भर करती है । अगर बिहार सरकार सिर्फ किताब छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेगी तो इसका उद्देश्य पराजित हो जाएगा । जरूरत इस बात की है कि इस किताब को उन खास लोगों तक पहुंचाया जाए जहां से किसी भी सूबे की छवि निर्मित होती है । अन्यथा यह किताब भी अन्य सरकारी प्रकाशनों की तरह गोदाम में धूल फांक रही होगी और इसके प्रकाशम से जुड़े लोग अपनी पीठ थपथपा रहे होंगे ।
इस किताब में बेहद श्रमपूर्वक सामग्री का चयन किया गया है लेकिन इसमें जो चित्र लगे हैं वो इस किताब की कमजोरी हैं । हो सकता है वक्त की कमी के चलते ऐसा हुआ हो या फिर कोई और कारण रहे हों लेकिन सामग्री के हिसाब से ना तो चित्रण कमजोर हैं चाहे वो रामलीला के पहले के चित्र हों राजाओं का चित्रण हो । लेकिन हमें इस प्रयास की सराहना करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की और सामग्री सामने आएं, कमजोरियां तो दूर हो ही जाती है । बस जैसा कि मैंने उपर भी कहा कि इसे टारगेट पाठक वर्ग तक पहुंचावने का काम होना चाहिए ।
Saturday, June 18, 2011
कांग्रेस का संघ ऑब्सेशन
काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़नेवाले योद्धाओं और केंद्र सरकार के बीच तलवारें खिंच गई हैं । लोकपाल बिल पर टीम अन्ना ने सरकार पर सीधे-सीधे धोखाधड़ी का आरोप लगया । सरकार ने भी अन्ना और उनके सहयोगियों के प्रति कड़ा रुख अपना लिया है । दोनों पक्षों के बीच जारी रस्साकशी के बीच अन्ना हजारे ने फिर से जंतर-मंतर पर अनशन करने का ऐलान कर दिया है। सरकार इस बात पर अमादा है कि लोकपाल बिल में उसकी ही चले । जनलोकपाल के कड़े प्रावधानों को डाल्यूट कर दिया जाए । अगर कांग्रेस के प्रधानमंत्री बेहद ईमानदार हैं तो उन्हें लोकपाल के दायरे में आने में दिक्कत क्या है । अगर जजों से ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है तो उनको लोकपाल के दायरे में लाने में सरकार घबरा क्यों रही है । दरअसल सरकार की मंशा ही उसे फिर से लटका देने की है और उसका ठीकरा वो टीम अन्ना पर ठोंकना चाहती है । इसकी पृष्ठभूमि कुछ दिनों पहले से तैयार हो रही थी । बाबा रामदेव के अनशन पर पुलिसिया कार्रवाई करने के बाद से ही सरकार के हौसले बुलंद हो गए थे। उसके बाद के कांग्रेस नेताओं के बयानों को एक साथ जोड़कर देखें तो कांग्रेसी रणनीति की तस्वीर साफ तौर पर नजर आती है । रामदेव के अनशन खत्म होने के चंद घंटों के भीतर ही कांग्रेस के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने बाबा के अनशन को नाटक करार दिया । दिग्विजय के बयान के कुछ ही देर बाद कांग्रेस के बड़े नेता और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी उनसे भी आगे बढ़ते हुए बाबा रामदेव के आंदोलन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रायोजित बता कर उनपर जोरदार हमला बोला । सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी यहीं नहीं रुके उन्होंने ये दावा भी कर डाला कि रामदेव के पीछे पूरी भगवा ब्रिगेड है । उन्होंने यहां तक कह डाला कि जो पार्टी चुनावों में हार गई है वो अब बाबा को आगे बढ़ाकर आंदोलन चला रही है । आंदोलन के पीछे सरकार को अस्थिर करने की साजिश है । जाहिर सी बात है कि वित्त मंत्री का इशारा भारतीय जनता पार्टी की ओर था । हैरत की बात है कि प्रणब मुखर्जी जैसा मंझा हुआ राजनेता बाबा के अनशन खत्म होने के बाद यह बात कहता है कि उनके आंदोलन को संघ का समर्थन था । यही बात अब कुछ कांग्रेसी अन्ना और उनेक सहयोगियों के बारे में कहने लगे हैं । टीम अन्ना पर भी भगवा ब्रिगेड का एजेंडा आगे बढाने का आरोप लगा है । लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रणब मुखर्जी को यह बात तब नहीं पता थी जब वो अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ बाबा रामदेव की अगुवाई करने दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे थे । क्या सरकार को अन्ना के अतीत के बारे में पता नहीं था जब रातों रात लोकपाल कमेटी के बारे में सरकारी गजट जारी किया गया । क्या दिल्ली के पांच सितारा होटल में बाबा रामदेव के साथ बैठने वाले केंद्रीय मंत्रियों को इस बात का पता नहीं था कि बाबा संघ के इशारे पर सरकार को अस्थिर करने की साजिश रच रहे हैं । क्या अन्ना के साथ बैठकों का दौर जारी होने तक यह पता नहीं था कि वो बीजेपी और संघ के मुखौटा है । क्या ये मान लिया जाए कि पूरी यूपीए सरकार संघ का एजेंडा चला रहे अन्ना और बाबा की चाल भांपने में नाकाम रही ।
दरअसल ऐसा है नहीं । ये कांग्रेस पार्टी की पुरानी फितरत है । जब भी किसी व्यक्ति या संगठन को डिस्क्रेडिट करना हो तो उसका नाम संघ के साथ जोड़कर ये संदेश दो कि ये लोग सांप्रदायिक ताकतों के हाथ खेल रहे हैं ।संघ का हौवा दिखाकर कांग्रेस वर्षों से वोट बैंक की राजनीति करती रही है । कांग्रेस की यह एक बड़ी ट्रेजडी है । आजादी के आंदोलन में जो राष्ट्रवाद कांग्रेस की ताकत हुआ करती थी उसको पार्टी ने थाली में परोस कर संघ और बीजेपी को पेश कर दिया । राष्ट्रवाद को सांप्रदायिक बनाने के चक्कर में कांग्रेस ने अपनी ताकत खो दी । अब कांग्रेस में कोई राष्ट्रवाद की बात नहीं करता । उनके नेताओं ने यह मान लिया है कि देश, देशहित, देशप्रेम आदि आदि की बात करना सांप्रदायिकता है और जो इन बातों की पैरोकारी करेगा वो सांप्रदायिक है या फिर सांप्रदायिक ताकतों के हाथ की कठपुतली ।
अगर यह मान भी लिया जाए कि अन्ना और बाबा को संघ का समर्थन हासिल है तो उससे क्या आंदोलन का उद्देश्य कमजोर हो जाता है । क्या जिन सवालों को लेकर अन्ना हजारे या बाबा रामदेव आंदोलन कर रहे हैं वो बेमानी हो जाते हैं । क्या आज हमारे देश में भ्रष्टाचार और काला धन राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है । क्या देश और जनता से जुड़े इन मुद्दों को राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने का हक नहीं है ।
बात यह भी नहीं है । दरअसल कांग्रेस की इस रणनीति को समझने के लिए हमें कुछ पहले चलना होगा । अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद जब लोकपाल को लेकर सरकार दबाव में आ गई थी और उसने यह मान लिया था कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों के साथ मिल बैठकर लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार किया जाएगा और उस बिल को संसद के मॉनसून सत्र में पेश कर दिया जाएगा । लोकपाल कमेटी के साथ दो तीन बैठकों के बाद सरकारी नुमाइंदो को यह अहसास हो गया कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों से आसानी से अपनी बातें नहीं मनवा पाएगी । फिर वही खेल शुरू हुआ । सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर व्यक्तिगत हमले शुरू हुए । उनकी संपत्ति और उनके आंदोलन को चलाने के आय के स्त्रोत को लेकर खबरें सामने आने लगी । सावधान अन्ना की टोली ने अपने संगठन की बेवसाइट पर अपने व्यक्तिगत संपत्ति और सहयोग राशि के स्त्रोत का खुलासा कर कांग्रेस के षडयंत्र की हवा निकाल दी । उसी तरह से बाबा रामदेव और उनके योग ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर सवाल खड़े किए गए । मकसद सिर्फ बाबा को डिस्क्रेडिट करना था, जिसमें कुछ हद तक सरकार कामयाब भी रही । बाबा रामदेव ने अगर गलत तरीके से संपत्ति अर्जित की है तो उसकी जांच अबतक हो हो जानी चाहिए थी। लेकिन मंशा जांच कराने की नहीं बदनाम करने की है । सरकार ने काले धन के खिलाफ अनशन का ऐलान कर चुके बाबा रामदेव को ज्यादा तवज्जो देकर अन्ना और उनकी टोली को दरकिनार करने का खेल भी खेला । बाबा को अहमियत देने के फैसले के बाद ही प्रणब मुखर्जी समेत सरकार के चार कैबिनेट मंत्री बाबा से मिलने एयरपोर्ट जा पहुंचे । जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बाबा सरकार के लिए बेहद अहम हैं और सरकार काला धन के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध है । लेकिन बाबा रामदेव के साथ बात नहीं बनी । जो सरकार अन्ना के खिलाफ बाबा को खड़ा करना चाहती थी उसकी ही कार्रवाई ने बाबा और अन्ना को और मजबूती से एक कर दिया । बाबा रामदेव के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के विरोध में अन्ना हजारे एक दिन के लिए राजघाट पर उपवास पर बैठे । तपती दोपहरी में लोगों की भीड़ ने सरकार को यह संकेत दे दिया कि भ्रष्टाचार और काला धन के मुद्दे को सरकार हल्के में नहीं ले सकती । काला धन और भ्रष्टाचार आज देश में एक ऐसा मुद्दा बन चुका है जिसको लेकर जनता सरकार से कोई ठोस कार्रवाई चाहती है । वक्त आ गया है कि सरकार अपनी हरकतों से बाज आए, कांग्रेस पार्टी बजाए हमलावर होने के लोगों की सुने । जिन मुद्दों को अन्ना हजारे या बाबा रामदेव उठा रहे हैं उनको तवज्जो दे और उसके सर्वमान्य हल खोजने की दिशा में सार्थक पहल करे, ताकि जनता के बीच सरकार को लेकर विश्वास कायम हो सके । लोकतंत्र में सरकार से लोक का भरोसा उठना अच्छा संकेत नहीं होता । सोनिया गांधी और प्रणब मुखर्जी से बेहतर इसे कोई नहीं समझ सकता क्योंकि दोनों लंबे समय तक इंदिरा गांधी के साथ रहे हैं, इमरजेंसी लगाने के दौरान भी और इमरजेंसी खत्म के होने के बाद भी ।
दरअसल ऐसा है नहीं । ये कांग्रेस पार्टी की पुरानी फितरत है । जब भी किसी व्यक्ति या संगठन को डिस्क्रेडिट करना हो तो उसका नाम संघ के साथ जोड़कर ये संदेश दो कि ये लोग सांप्रदायिक ताकतों के हाथ खेल रहे हैं ।संघ का हौवा दिखाकर कांग्रेस वर्षों से वोट बैंक की राजनीति करती रही है । कांग्रेस की यह एक बड़ी ट्रेजडी है । आजादी के आंदोलन में जो राष्ट्रवाद कांग्रेस की ताकत हुआ करती थी उसको पार्टी ने थाली में परोस कर संघ और बीजेपी को पेश कर दिया । राष्ट्रवाद को सांप्रदायिक बनाने के चक्कर में कांग्रेस ने अपनी ताकत खो दी । अब कांग्रेस में कोई राष्ट्रवाद की बात नहीं करता । उनके नेताओं ने यह मान लिया है कि देश, देशहित, देशप्रेम आदि आदि की बात करना सांप्रदायिकता है और जो इन बातों की पैरोकारी करेगा वो सांप्रदायिक है या फिर सांप्रदायिक ताकतों के हाथ की कठपुतली ।
अगर यह मान भी लिया जाए कि अन्ना और बाबा को संघ का समर्थन हासिल है तो उससे क्या आंदोलन का उद्देश्य कमजोर हो जाता है । क्या जिन सवालों को लेकर अन्ना हजारे या बाबा रामदेव आंदोलन कर रहे हैं वो बेमानी हो जाते हैं । क्या आज हमारे देश में भ्रष्टाचार और काला धन राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है । क्या देश और जनता से जुड़े इन मुद्दों को राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने का हक नहीं है ।
बात यह भी नहीं है । दरअसल कांग्रेस की इस रणनीति को समझने के लिए हमें कुछ पहले चलना होगा । अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद जब लोकपाल को लेकर सरकार दबाव में आ गई थी और उसने यह मान लिया था कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों के साथ मिल बैठकर लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार किया जाएगा और उस बिल को संसद के मॉनसून सत्र में पेश कर दिया जाएगा । लोकपाल कमेटी के साथ दो तीन बैठकों के बाद सरकारी नुमाइंदो को यह अहसास हो गया कि सिविल सोसाइटी के सदस्यों से आसानी से अपनी बातें नहीं मनवा पाएगी । फिर वही खेल शुरू हुआ । सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर व्यक्तिगत हमले शुरू हुए । उनकी संपत्ति और उनके आंदोलन को चलाने के आय के स्त्रोत को लेकर खबरें सामने आने लगी । सावधान अन्ना की टोली ने अपने संगठन की बेवसाइट पर अपने व्यक्तिगत संपत्ति और सहयोग राशि के स्त्रोत का खुलासा कर कांग्रेस के षडयंत्र की हवा निकाल दी । उसी तरह से बाबा रामदेव और उनके योग ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर सवाल खड़े किए गए । मकसद सिर्फ बाबा को डिस्क्रेडिट करना था, जिसमें कुछ हद तक सरकार कामयाब भी रही । बाबा रामदेव ने अगर गलत तरीके से संपत्ति अर्जित की है तो उसकी जांच अबतक हो हो जानी चाहिए थी। लेकिन मंशा जांच कराने की नहीं बदनाम करने की है । सरकार ने काले धन के खिलाफ अनशन का ऐलान कर चुके बाबा रामदेव को ज्यादा तवज्जो देकर अन्ना और उनकी टोली को दरकिनार करने का खेल भी खेला । बाबा को अहमियत देने के फैसले के बाद ही प्रणब मुखर्जी समेत सरकार के चार कैबिनेट मंत्री बाबा से मिलने एयरपोर्ट जा पहुंचे । जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि बाबा सरकार के लिए बेहद अहम हैं और सरकार काला धन के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध है । लेकिन बाबा रामदेव के साथ बात नहीं बनी । जो सरकार अन्ना के खिलाफ बाबा को खड़ा करना चाहती थी उसकी ही कार्रवाई ने बाबा और अन्ना को और मजबूती से एक कर दिया । बाबा रामदेव के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के विरोध में अन्ना हजारे एक दिन के लिए राजघाट पर उपवास पर बैठे । तपती दोपहरी में लोगों की भीड़ ने सरकार को यह संकेत दे दिया कि भ्रष्टाचार और काला धन के मुद्दे को सरकार हल्के में नहीं ले सकती । काला धन और भ्रष्टाचार आज देश में एक ऐसा मुद्दा बन चुका है जिसको लेकर जनता सरकार से कोई ठोस कार्रवाई चाहती है । वक्त आ गया है कि सरकार अपनी हरकतों से बाज आए, कांग्रेस पार्टी बजाए हमलावर होने के लोगों की सुने । जिन मुद्दों को अन्ना हजारे या बाबा रामदेव उठा रहे हैं उनको तवज्जो दे और उसके सर्वमान्य हल खोजने की दिशा में सार्थक पहल करे, ताकि जनता के बीच सरकार को लेकर विश्वास कायम हो सके । लोकतंत्र में सरकार से लोक का भरोसा उठना अच्छा संकेत नहीं होता । सोनिया गांधी और प्रणब मुखर्जी से बेहतर इसे कोई नहीं समझ सकता क्योंकि दोनों लंबे समय तक इंदिरा गांधी के साथ रहे हैं, इमरजेंसी लगाने के दौरान भी और इमरजेंसी खत्म के होने के बाद भी ।
Friday, June 10, 2011
नक्सलियों को रोकने की कवायद
अभी कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार की तरफ से वनवासियों और आदिवासियों के कल्याण और उनके हितों का ध्यान रखने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए गए हैं और अनेक पहल के संकेत भी मिले हैं । भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतरफा घिरी और विपक्ष के हमलों से हलकान केंद्र सरकार को अब देश के जंगलों और पिछड़े इलाके में रहनेवाले आदिवासियों और जंगल आधारित उत्पादों पर आधारित जीवन बसर करनेवाले लोगों की याद आई है। केंद्र सरकार की तरफ से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वो जंगली पेड़ों और उससे जुड़े उत्पाद को छोड़कर अन्य जंगली उत्पादों जैसे बांस, महुआ तेंदू पत्ता आदि का समर्थन मूल्य तय करने के बारे में गंभीरता से विचार कर रही है । सरकार इनकी बिक्री और भंडारण के लिए कृषि उत्पाद और बिक्री कमीशन के अलावा फूड कॉर्पेरेशन ऑफ इंडिया की तर्ज पर संस्थाएं बनाना चाहती है । ये जंगली उत्पाद लाखों वनवासियों के जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन है लेकिन पुरानी सरकारी नीतियों में इतनी खामियां हैं कि वनवासियों को अपने वाजिब हक के लिए भी खासी मशक्कत करनी पड़ती है। सरकार के इस फैसले के पीछे राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक वजहें तो हैं ही,पर्यावरण संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण कारक हैं । पहली बात तो यह कि सरकार ऐसा करके राजनैतिक तौर पर यह संदेश देना चाहती है कि वो आदिवासियों और जंगल में रहनेवाले लोगों के हितों को लेकर गंभीर है । इस राजनैतिक कारण के पीछे हम सोनिया गांधी के कुछ दिनों पहले पार्टी के मुखपत्र कांग्रेस संदेश लिखे उनके लेख में इसके संकेत पकड़ सकते हैं । अपने लेख में सोनिया गांधी ने सरकार को जंगली इलाकों में समावेशी विकास करने की सलाह दी थी । सोनिया गांधी का उक्त लेख छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के जवानों की जघन्य हत्या के बाद छपा था । सोनिया गांधी के अपने लेख में नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास के कामों पर जोर देने की सलाह दी थी । ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने वहीं से क्यू लेते हुए जंगली उत्पादों का समर्थन मूल्य तय करने की योजना बनाई ।
अब तक जंगल के इलाकों में ठेकेदार और वहां सक्रिय दलाल अपने इलाके के उत्पादों की खरीद फरोख्त में मनमानी कर रहे हैं । जंगल के उन उत्पादों के बारे में कोई ठोस सरकारी नीति नहीं होने या फिर दोषपूर्ण सरकारी नियमों की वजह से दलाल चांदी काट रहे हैं और आदिवासियों का जमकर शोषण हो रहा है । उन इलाकों में बिचौलिए ही जंगली उत्पादों की कीमतें तय करते हैं और भोले-भाले गरीब आदिवासियों को उनकी मेहनत के उचित मूल्य से महरूम कर देते हैं । बिचौलियों की यही भूमिका और ज्यादती उन इलाके में माओवादियों को वनवासियों के बीच अपनी जमीन पुख्ता करने का मौका देती है । आदिवासियों के हक की बात करके और उनके शोषण के खिलाफ आवाज उठाकर माओवादियों ने आदिवासियों का दिल जीता और उनके बीच अपनी पकड़ भी मजबूत बनाई । अगर सरकार उन इलाकों में जंगली उत्पादों की बिक्री व्यवस्था को दुरुस्त कर और उसके भंडारण के लिए उचित इंतजाम कर सके तो यह एक बड़ी सफलता होगी । फूड कॉर्पोरशेन जैसी कोई संस्था बनाकर अगर जंगली उत्पादों के उन्हीं इलाकों में भंडारण की व्यवस्था हो सके तो आदिवासियों को उनके उत्पादों पर ज्यादा दाम मिल पाएगा । इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि उन इलाकों में नक्सलियों और माओवादियों की लोकप्रियता कम होगी और उनको कमजोर किया जा सकेगा ।
इस तरह की योजना बनाते समय सरकार को देश के अलग-अलग इलाकों के लिए अलहदा योजना बनानी होगी । पूरे देश में अगर एकीकृत समर्थन मूल्य की नीति बनाई जाती हो तो वह दोषपूर्ण होगी क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में इन उत्पादों की सप्लाई और उसका बाजार अलग है । इसके अलावा यह भी जरूरी है कि कास इलाके को ध्यान में रखकर वहां इन उच्पादों के भंडारण का इंतजाम किया जा सके ताकि जब बाजार में मूल्य अधिक मिल रहा हो उस वक्त उन उत्पादों को बेचकर आदिवासियों को ज्यादा मुनाफा हो । इस वयवस्था को बनाते वक्त सरकार को यह भी द्यान देना होगा कि फूड कॉर्पोरेशन की तरह यहां अमियमितताएं और भ्रष्टाचार नहीं हो । अगर सरकार इस तरह की वयवस्था बनाने में नाकाम रहती है तो आदिवासी और उनके उत्पाद निजी ठेकेदारों और दलालों के चंगुल से मुक्त होकर सरकारी और अर्धसरकारी दलालों के चंगुल में फंस जाएगी ।
दूसरी अहम बदलाव जिसपर सरकार विचार कर रही है या यों कहें कि केंद्रीय कैबिनेट ने फैसला ले लिया है लह ये कि बांस को लकड़ी ना मानकर घास माना जाए लेकिन इसका नोटिफिकेशन होना अभी शेष है । भारतीय वन अधिनियम के तहत अब तक बांस को लकड़ी माना जाता रहा है जिसकी वजह से किसी को भी बांस को काटने के लिए तमाम सरकारी महकमों से इजाजत लेनी पड़ती है । इस इजाजत की जड़ से भ्रष्टाचार पनपता है और शोषण की भी नींव पड़ती है । बांस को घास मानने की बहस बेहद लंबी है और काफी समय से चल रही है । वनस्पति विज्ञान में भी बांस को घास ही माना गया है । लेकिन अंग्रेजो के जमाने के कानून में बदलाव की फिक्र हमें आजादी के 40 साल बाद हो रही है । अगर बांस को लकड़ी मानने के कानून से आजाद कर दिया जाता है तो तकरीबन दस हजार करोड़ की बांस आधारित उद्योग से बनवासियों से काफी लाभ मिलेगा और देश में नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा ।
अब तक जंगल के इलाकों में ठेकेदार और वहां सक्रिय दलाल अपने इलाके के उत्पादों की खरीद फरोख्त में मनमानी कर रहे हैं । जंगल के उन उत्पादों के बारे में कोई ठोस सरकारी नीति नहीं होने या फिर दोषपूर्ण सरकारी नियमों की वजह से दलाल चांदी काट रहे हैं और आदिवासियों का जमकर शोषण हो रहा है । उन इलाकों में बिचौलिए ही जंगली उत्पादों की कीमतें तय करते हैं और भोले-भाले गरीब आदिवासियों को उनकी मेहनत के उचित मूल्य से महरूम कर देते हैं । बिचौलियों की यही भूमिका और ज्यादती उन इलाके में माओवादियों को वनवासियों के बीच अपनी जमीन पुख्ता करने का मौका देती है । आदिवासियों के हक की बात करके और उनके शोषण के खिलाफ आवाज उठाकर माओवादियों ने आदिवासियों का दिल जीता और उनके बीच अपनी पकड़ भी मजबूत बनाई । अगर सरकार उन इलाकों में जंगली उत्पादों की बिक्री व्यवस्था को दुरुस्त कर और उसके भंडारण के लिए उचित इंतजाम कर सके तो यह एक बड़ी सफलता होगी । फूड कॉर्पोरशेन जैसी कोई संस्था बनाकर अगर जंगली उत्पादों के उन्हीं इलाकों में भंडारण की व्यवस्था हो सके तो आदिवासियों को उनके उत्पादों पर ज्यादा दाम मिल पाएगा । इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि उन इलाकों में नक्सलियों और माओवादियों की लोकप्रियता कम होगी और उनको कमजोर किया जा सकेगा ।
इस तरह की योजना बनाते समय सरकार को देश के अलग-अलग इलाकों के लिए अलहदा योजना बनानी होगी । पूरे देश में अगर एकीकृत समर्थन मूल्य की नीति बनाई जाती हो तो वह दोषपूर्ण होगी क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में इन उत्पादों की सप्लाई और उसका बाजार अलग है । इसके अलावा यह भी जरूरी है कि कास इलाके को ध्यान में रखकर वहां इन उच्पादों के भंडारण का इंतजाम किया जा सके ताकि जब बाजार में मूल्य अधिक मिल रहा हो उस वक्त उन उत्पादों को बेचकर आदिवासियों को ज्यादा मुनाफा हो । इस वयवस्था को बनाते वक्त सरकार को यह भी द्यान देना होगा कि फूड कॉर्पोरेशन की तरह यहां अमियमितताएं और भ्रष्टाचार नहीं हो । अगर सरकार इस तरह की वयवस्था बनाने में नाकाम रहती है तो आदिवासी और उनके उत्पाद निजी ठेकेदारों और दलालों के चंगुल से मुक्त होकर सरकारी और अर्धसरकारी दलालों के चंगुल में फंस जाएगी ।
दूसरी अहम बदलाव जिसपर सरकार विचार कर रही है या यों कहें कि केंद्रीय कैबिनेट ने फैसला ले लिया है लह ये कि बांस को लकड़ी ना मानकर घास माना जाए लेकिन इसका नोटिफिकेशन होना अभी शेष है । भारतीय वन अधिनियम के तहत अब तक बांस को लकड़ी माना जाता रहा है जिसकी वजह से किसी को भी बांस को काटने के लिए तमाम सरकारी महकमों से इजाजत लेनी पड़ती है । इस इजाजत की जड़ से भ्रष्टाचार पनपता है और शोषण की भी नींव पड़ती है । बांस को घास मानने की बहस बेहद लंबी है और काफी समय से चल रही है । वनस्पति विज्ञान में भी बांस को घास ही माना गया है । लेकिन अंग्रेजो के जमाने के कानून में बदलाव की फिक्र हमें आजादी के 40 साल बाद हो रही है । अगर बांस को लकड़ी मानने के कानून से आजाद कर दिया जाता है तो तकरीबन दस हजार करोड़ की बांस आधारित उद्योग से बनवासियों से काफी लाभ मिलेगा और देश में नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा ।
Tuesday, June 7, 2011
विचारों की 'परिक्रमा'
हिंदी में पत्रिकाओ का बेहद लंबा इतिहास रहा है । उन्नीसवीं सदी हिंदी भाषा और लाहित्य में नवजागरण का काल माना जाता है । यह भी तथ्य है कि हिंदी का पहला समाचार पत्र उदंत मार्तंड 30 मई, 1826 का प्रकाशन कलकत्ता से हुआ था, जिसके प्रथम संपादक बाबू जुगुल किशोर सुकुल थे । लेकिन हिंदी की पहली साहित्यिक पत्रिका कवि वचन सुधा थी जिसे संपादक भारतेंदु हरिश्चंद्र थे । भारतेंदु ने जब इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया उसके बाद से हिंदी में कई साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हो गया । भारतेंदु युग में साहित्यिक पत्रिका के दो प्रमुख केंद्र- बनारस और पटना थे । भारतेंदु युग के बाद जब साहित्यिक पत्रिका का प्रसार और विकास हुआ तो ना केवल कलकत्ता बल्कि इलाहाबाद भी पत्रिकाओं के नए केंद्र बने जहां से कई कालजयी पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जो बाद में हिंदी की थाती बने । बिहार में हिंदी पत्रिकारिता की शुरुआत का बेहद दिलचस्प इतिहास है । बिहार में माना जाता है कि हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 1874 में हुई जिसके जनक पंडित केशवराम भट्ट थे । पंडित केशवराम भट्ट ने 1872 में कलकत्ता से बिहार बंधु का प्रकाशन शुरू किया था । तब उस पत्रिका को कलकत्ता से प्रकाशित करने की वजह बिहार में हिंदी छापाखाना का नहीं होना था । उस दौर में बिहार में सिर्फ उर्दू प्रेस हुआ करते थे जिसकी वजह से पंडित केशवराम भट्ट को कलकत्ता से बिहार बंधु का प्रकाशन प्रारंभ करना पड़ा था । लेकिन उससे भी दिलचस्प कहानी इस पत्रिका के बिहार लौटने की है । दो साल तक कलकत्ता से प्रकाशन होने के बाद जब पंडित भट्ट को यह महसूस हुआ कि कलकत्ता में हिंदी के प्रूफ रीडर नहीं मिल रहे तो उन्होंने यह तय किया किया कि अब बिहार की राजधानी पटना से ही उसका प्रकाशन किया जाए । इस निर्णय के बाद 1874 से पटना से बिहार बंधु का प्रकाशन शुरू हुआ । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी विस्तार से बात होगी । हम बात हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं की कर रहे थे । भारतेंदु युग से द्विवेदी युग तक देश में हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं के चार केंद्र विकसित हो चुके थे । इसके बाद देश के अन्य इलाकों से भी साहित्यिक पत्रिकाओं की शुरुआत हुई ।
लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब हिंदी में लघु पत्रिकाओं की शुरुआत हुई तो 1957 में बनारस से विष्णुचंद्र शर्मा ने कवि का प्रकाशन शुरू किया । कालांतर में हिंदी में कई पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ जि्सने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया । जिसमें आलोचना, पहल, सिर्फ, ध्वजभंग, दस्तावेज, समीक्षा, तद्वभव आदि प्रमुख हैं । जैसे जैसे समय बीतता गया साहित्यिक पत्रिकाओं का केंद्र भी देश की राजधानी दिल्ली की ओर बढ़ने लगा । जब 1986 में राजेन्द्र यादव ने दिल्ली से हंस का पुनर्प्रकाशन शुरू किया तो साहित्यिक पत्रकारिता के केंद्र में दिल्ली का स्थान अहम हो गया । हंस ने नई कहानी आंदोलन के अवांगार्द राजेन्द्र यादव के संपादन में साहित्यक पत्रकारिता को एक नई धार और तेवर दोनों दिए। पिछले ढाई दशक में हंस ने ना केवल हिंदी की सबसे अच्छी कहानियां छापी बल्कि दलित और स्त्री विमर्श के साथ अपने समय की प्रासंगिक मुद्दों और बहसों को उठाकर हिंदी साहित्यक पत्रकारिता का एक नया इतिहास रच दिया । हंस और उसके संपादक से तमाम असहमतियों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि – आप उसे पसंद ना करें लेकिन आप उसको इग्नोर नहीं कर सकते । दूसरी एक पत्रिका जिससे उम्मीद जगी थी वो थी समयांतर जिसके यशस्वी संपादक पंकज विष्ठ हैं । पंकज विष्ठ के लेखन में एक आग है लेकिन बाद के दिनों में पंकज जी ने वयक्तिगत राग द्वेष को अपने संपादकीय का विषय बना दिया । नतीजा यह हुआ कि जो एक पूरी पीढ़ी पंकज जी की ओर उम्मीद भरी दृष्टि लगाए बैठी थी उसका मोहभंग हुआ । और अब तो दरबारी लाल की वजह से समयांतर यह हालत हो गई है जैसी कि अभिनेताओं के बीच राजू श्रीवास्तव की है ।
साहित्यक पत्रिकाओं की इस भीड़ में एक बात जो दब कर रह गई । हुआ यह कि कहानी कविता और आलोचना की आंधी में वैचारिक लेख और साहित्येतर विषय इन पत्रिकाओं से गायब होते चले गए । हिंदी में गंभीर वैचारिक पत्रिका की कमी अखरने लगी । साहित्येतर विषयों पर केंद्रित होने या फिर उन विषयों पर विचार विमर्श का मंच देनेवाली पत्रिता नहीं रही । हिंदी के गंभीर पाठकों को हमेशा से लगता रहा कि उनकी भाषा में भी मेनस्ट्रीम या फिर सेमिनार जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हो । लेकिन कई बार कोशिश भी हुई लेकिन वो परवान नहीं चढ़ सकी । पहले तो वैचारिक पत्रिका के दावे किए गए लेकिन बाद में वो समाचार पत्रिका में तब्दील हो गए या फिर एक दो अंकों के बाद अमियतकालीन हो गए । यहां मैं जानबूझकर उन पत्रिकाओं के नाम नहीं दे रहा और उनको अनियतकालीन इस वजह स कह रहा हूं क्यों उनके बंद होने का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ ।
लेकिन दिल्ली से अप्रैल 2008 में हिंदी में एक ऐसी पत्रिका की शुरुआत हुई जिसने वैचारिक पत्रिका की उस कमी को पूरा किया और तब से लेकर अब तक यह पत्रिका लगातार निकल रही है । इस पत्रिका का नाम है विचार परिक्रमा() और इसके संपादक हैं शरद गोयल । पत्रिका ने पूर्व में कई अंक विषय विशेष पर फोकस किए जिनमें मीडिया और विकलांगों पर निकले विशेषांक की खासी चर्चा हुई । पत्रिका का ताजा अंक किन्नरों पर केंद्रिंत है । किन्नर हमारे समाज के ही अंग हैं लेकिन समाज से मिल रहे उपेक्षा की उनकी जो पीड़ा है उसके इस अंक में सामने लाने की कोशिश की गई है । किन्नरों को हमारे समाज में किसी तरह का कोई अधिकार नहीं प्राप्त है । आमतौर पर उनको या तो अपराधी या फिर सेक्स ट्रेड में लिप्त समझकर हेय दृष्टि से देखा जाता है । उनको छक्का कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता है । मजाक उड़ाने वाले उनकी पीड़ा को नहीं समझ सकते । ये वो लोग हैं जो अपने ही समाज के बीच उपेक्षा का दंश झेलने को अभिशप्त हैं । लेकिन हमारे समाज में कहीं कहीं किन्नरों को खुशी के मौके पर शुभ मानकर उनका आशीर्वाद भी लिया जाता है । बच्चों के जन्म या फिर नए घर में प्रवेश के वक्त किन्नरों का गाया गीत बेहद शुभ माना जाता है । पिछले दिनों कई किन्नरों ने समाज के कई क्षेत्र में अपना एक मुकाम हासिल कर यह साबित कर दिया उनको अगर मौका मिले और उनमें हौसला हो तो वो भी किसी तरह की उचांई हासिल कर सकते हैं । चाहे वो शबनम मौसी हों या फिर टेलीविजन शो में सलमान के साथ ठुमके लगा रही लक्ष्मी हो । विचार परिक्रमा के इस अंक में ज्योति और शशिकांत के लेख खासतौर पर इस अंक की उपल्बधि हैं । इसके अलावा की कई विचारोत्तेजक लेख इस पत्रिका में प्रकाशित हैं जो हमारे समाज के इस उपेक्षित समुदाय के दर्द को उभारता हुआ है । उम्मीद की जानी चाहिए कि यह पत्रिका इसी तरह से निकलती रहे और हिंदी में वैचारिक लेखन में जो एक वैक्यूम आ गया था उसको सफलतापूर्व भरता रहे । लेकिन इस बात की भी जरूरत है कि इस पत्रिका को हिंदी के गंभीर पाठकों तक पहुंचाने की और बेहतर कोशिश की जानी चाहिए ताकि एक विशाल पाठक वर्ग को इसका लाभ मिल सके ।
लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब हिंदी में लघु पत्रिकाओं की शुरुआत हुई तो 1957 में बनारस से विष्णुचंद्र शर्मा ने कवि का प्रकाशन शुरू किया । कालांतर में हिंदी में कई पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ जि्सने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया । जिसमें आलोचना, पहल, सिर्फ, ध्वजभंग, दस्तावेज, समीक्षा, तद्वभव आदि प्रमुख हैं । जैसे जैसे समय बीतता गया साहित्यिक पत्रिकाओं का केंद्र भी देश की राजधानी दिल्ली की ओर बढ़ने लगा । जब 1986 में राजेन्द्र यादव ने दिल्ली से हंस का पुनर्प्रकाशन शुरू किया तो साहित्यिक पत्रकारिता के केंद्र में दिल्ली का स्थान अहम हो गया । हंस ने नई कहानी आंदोलन के अवांगार्द राजेन्द्र यादव के संपादन में साहित्यक पत्रकारिता को एक नई धार और तेवर दोनों दिए। पिछले ढाई दशक में हंस ने ना केवल हिंदी की सबसे अच्छी कहानियां छापी बल्कि दलित और स्त्री विमर्श के साथ अपने समय की प्रासंगिक मुद्दों और बहसों को उठाकर हिंदी साहित्यक पत्रकारिता का एक नया इतिहास रच दिया । हंस और उसके संपादक से तमाम असहमतियों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि – आप उसे पसंद ना करें लेकिन आप उसको इग्नोर नहीं कर सकते । दूसरी एक पत्रिका जिससे उम्मीद जगी थी वो थी समयांतर जिसके यशस्वी संपादक पंकज विष्ठ हैं । पंकज विष्ठ के लेखन में एक आग है लेकिन बाद के दिनों में पंकज जी ने वयक्तिगत राग द्वेष को अपने संपादकीय का विषय बना दिया । नतीजा यह हुआ कि जो एक पूरी पीढ़ी पंकज जी की ओर उम्मीद भरी दृष्टि लगाए बैठी थी उसका मोहभंग हुआ । और अब तो दरबारी लाल की वजह से समयांतर यह हालत हो गई है जैसी कि अभिनेताओं के बीच राजू श्रीवास्तव की है ।
साहित्यक पत्रिकाओं की इस भीड़ में एक बात जो दब कर रह गई । हुआ यह कि कहानी कविता और आलोचना की आंधी में वैचारिक लेख और साहित्येतर विषय इन पत्रिकाओं से गायब होते चले गए । हिंदी में गंभीर वैचारिक पत्रिका की कमी अखरने लगी । साहित्येतर विषयों पर केंद्रित होने या फिर उन विषयों पर विचार विमर्श का मंच देनेवाली पत्रिता नहीं रही । हिंदी के गंभीर पाठकों को हमेशा से लगता रहा कि उनकी भाषा में भी मेनस्ट्रीम या फिर सेमिनार जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हो । लेकिन कई बार कोशिश भी हुई लेकिन वो परवान नहीं चढ़ सकी । पहले तो वैचारिक पत्रिका के दावे किए गए लेकिन बाद में वो समाचार पत्रिका में तब्दील हो गए या फिर एक दो अंकों के बाद अमियतकालीन हो गए । यहां मैं जानबूझकर उन पत्रिकाओं के नाम नहीं दे रहा और उनको अनियतकालीन इस वजह स कह रहा हूं क्यों उनके बंद होने का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ ।
लेकिन दिल्ली से अप्रैल 2008 में हिंदी में एक ऐसी पत्रिका की शुरुआत हुई जिसने वैचारिक पत्रिका की उस कमी को पूरा किया और तब से लेकर अब तक यह पत्रिका लगातार निकल रही है । इस पत्रिका का नाम है विचार परिक्रमा() और इसके संपादक हैं शरद गोयल । पत्रिका ने पूर्व में कई अंक विषय विशेष पर फोकस किए जिनमें मीडिया और विकलांगों पर निकले विशेषांक की खासी चर्चा हुई । पत्रिका का ताजा अंक किन्नरों पर केंद्रिंत है । किन्नर हमारे समाज के ही अंग हैं लेकिन समाज से मिल रहे उपेक्षा की उनकी जो पीड़ा है उसके इस अंक में सामने लाने की कोशिश की गई है । किन्नरों को हमारे समाज में किसी तरह का कोई अधिकार नहीं प्राप्त है । आमतौर पर उनको या तो अपराधी या फिर सेक्स ट्रेड में लिप्त समझकर हेय दृष्टि से देखा जाता है । उनको छक्का कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता है । मजाक उड़ाने वाले उनकी पीड़ा को नहीं समझ सकते । ये वो लोग हैं जो अपने ही समाज के बीच उपेक्षा का दंश झेलने को अभिशप्त हैं । लेकिन हमारे समाज में कहीं कहीं किन्नरों को खुशी के मौके पर शुभ मानकर उनका आशीर्वाद भी लिया जाता है । बच्चों के जन्म या फिर नए घर में प्रवेश के वक्त किन्नरों का गाया गीत बेहद शुभ माना जाता है । पिछले दिनों कई किन्नरों ने समाज के कई क्षेत्र में अपना एक मुकाम हासिल कर यह साबित कर दिया उनको अगर मौका मिले और उनमें हौसला हो तो वो भी किसी तरह की उचांई हासिल कर सकते हैं । चाहे वो शबनम मौसी हों या फिर टेलीविजन शो में सलमान के साथ ठुमके लगा रही लक्ष्मी हो । विचार परिक्रमा के इस अंक में ज्योति और शशिकांत के लेख खासतौर पर इस अंक की उपल्बधि हैं । इसके अलावा की कई विचारोत्तेजक लेख इस पत्रिका में प्रकाशित हैं जो हमारे समाज के इस उपेक्षित समुदाय के दर्द को उभारता हुआ है । उम्मीद की जानी चाहिए कि यह पत्रिका इसी तरह से निकलती रहे और हिंदी में वैचारिक लेखन में जो एक वैक्यूम आ गया था उसको सफलतापूर्व भरता रहे । लेकिन इस बात की भी जरूरत है कि इस पत्रिका को हिंदी के गंभीर पाठकों तक पहुंचाने की और बेहतर कोशिश की जानी चाहिए ताकि एक विशाल पाठक वर्ग को इसका लाभ मिल सके ।
Sunday, June 5, 2011
प्रकाशकों को चुनौती
हिंदी में इस बात को लेकर हाल के दिनों में लागतार चिंता प्रकट की जा रही है कि इंटरनेट और सूचना क्रांति के विस्फोट में छपी हुई किताबों की महत्ता या यों कहें उनका वर्तमान स्वरूप खत्म हो जाएगा । इस चिंता ने हिंदी में एक नई बहस को जन्म दिया था कि क्या हिंदी से छपी हुई किताबें खत्म हो जाएंगी। इसके पक्ष और विपक्ष में कई तरह के विचार आए हैं और इसपर पत्रिकाओं, अखबारों और खुद इंटरनेट और ब्लॉग पर जोरदार बहस जारी है। लेकिन अभी अमेरिका से आई एक खबर ने हिंदी साहित्य की चिंता और बढ़ा दी है और छपी हुई किताबों के पक्ष में बात करने वालों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं और विरोधियों के हौसले बुलंद हो गए हैं। इंटरनेट के जरिए किताबों का कारोबार करनेवाली कंपनी अमेजन ने ऐलान किया है कि उसकी बेवसाइट पर छपी हुई किताबों को ई बुक्स ने बिक्री के लिहाज से मात दे दी है । अमेजन के मुताबिक अगर छपी हुई सौ किताबें बिक रही हैं तो ई बुक्स एक सौ पांच की संख्या में बिक रही हैं। ई बुक्स पढ़ने की सबसे मशहूर और लोकप्रिय डिवाइस किंडल बुक्स की छपी पुस्तकों की बिक्री को पीछे छोड़ना एक ऐतिहासिक घटना के तौर पर रेखांकित की जा रही है । दरअसल चार साल पहले ही अमेजन ने अपने बेवसाइट पर किंडल के जरिए ई बुक्स की बिक्री का अनूठा प्रयोग शुरू किया था । चार महीने पहले ही किंडल एडिशन ने पेपरबैक किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया था और अब समग्रता में उसने यह सफलता हासिल की है । अमेरिकी बेवसाइट अमेजन के मुताबिक यह हालत तो तब है जबकि कई पुस्तकों के किंडल संस्करण बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं हैं । अमेजन के सीईओ जेफ बेजोस को भी पाठकों की रुचि में इस तरह के बदलाब की अपेक्षा तो थी पर यह इतनी जल्दी घटित हो जाएगा इसका अमुमान उन्हें नहीं था । दरअसल टेबलेट कंप्यूटर आने की वजह से लोगों के बीच ई बुक्स की लोकप्रियता काफी बढ़ी हैं और अब तो एप्पल के आई पैड की वजह से भी इसकी बिक्री को पंख लग सकते हैं ।
सवाल यह उठता है कि क्या आनेवाले दिनों में छपी हुई किताबों का भविष्य खत्म हो जाएगा । छपी किताबों का कारोबार करनेवाले प्रकाशकों पर संकट आनेवाला है। क्या अबतक कंप्यूटर पर लिखनेवाले लेखक भी ई बुक्स के ही जरिए पाठकों के बीच जाएंगे । कई उत्साही लोग तो इन सारे प्रश्नों के सकारात्मक जबाव दे रहे हैं । संभव है कि पश्चिम के विकसित देशों में यह बात आंशिक रूप से सच भी हो । आंशिक इस वजह से कि पश्चिमी देशों में सूचना के संजाल के तमाम विकास के बावजूद अब भी लाखों में किताबें बिक रही हैं । चाहे वो जोनाथन फ्रेंजन की फ्रीडम हो या टोनी ब्लेयर की आत्मकथा- अ जर्नी । इन सबने किताबों की बिक्री के पिछले सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया । अमेजन ने भले ही यह ऐलान किया है कि ई बुक्स ने किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया है लेकिन उसने बिक्री का कोई ठोस आंकड़ा पेश नहीं किया, उसने सिर्फ तुलनात्मक आंकड़ों के आधार पर ई बुक्स को ज्यादा लोकप्रिय बताया है । ना ही अमेजन ने इस बात का ऐलान किया कि बिक्री का यह आंकड़ा किस और कितनी अवधि का है । दूसरा अहम प्रश्न जो अमेजन की इस घोषणा के बाद मन में उठता है वह यह है कि अमेजन तक कितने लोगों की पहुंच है । अमेजन पर खरीद बिक्री वही लोग कर सकते हैं जिनते पास इंटरनेट हो या फिर जिन्हें इंटरनेट का एक्सेस हो । बेवसाइट के जरिए होनेवाले कारोबार में ग्राहकों की संख्या अवश्य बढ़ी है लेकिन अभी उस माध्यम के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी । जल्दबाजी इस वजह से क्योंकि यह पूरे ग्राहक वर्ग के मूड और स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है । इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि ई बुक्स बिक्री और लोकप्रियता में किताबों को पटखनी दे देगा ।
लेकिन इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव और पहुंच को लेकर कुछ लोग साहित्य पर भी संकट देखने लगे हैं । उनका तर्क है सूचना संजाल के विस्तार से साहित्य नष्ट हो जाएगा । ऐसा नहीं है कि इस तरह के तर्क देनेवाले लोग नए हैं । इस तरह के लोग हर युग और काल में पाए जाते हैं । कुछ दशक पहले भारत में जब सिनेमा काफी लोकप्रिय होने लगा और पूरे देश में आम लोगों की जुबान पर इसकी चर्चा हुई तो उसमें भी साहित्य का दुश्मन माना गया और उसके खिलाफ मुकम्मल अभियान भी चला। उसके बाद भारत में टेलीविजन का अभ्युदय हुआ तो उसमें भी साहित्य के अंत का दु:स्वपन देखा गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्यकारों की एक पूरी जमात टेलीविजन के खिलाफ खड़ी हो गई और जबरदस्त तरीके से उसको खारिज करने की कोशिश की गई । टेलीविजन कैमरा का विकास हुआ तो यथार्थवादी रचनाकारों को यह लगने लगा कि उनका भोगा हुआ यथार्थ जिन्हें वो अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के सामने लाते हैं उसे कैमरा सीधे पाठकों को दिखा देगा । उसी खतरे को भांपते हुए और बगैर माध्यम को समझे कैमरे का विरोध शुरू हो गया । लेकिन उस विरोध का कोई असर नहीं दिखा और टेलीविजन की लोकप्रियता और विस्तार इतना हुआ कि आज घर घर में टेलीविजन लगे हैं । टेलीविजन के बाद जब कंप्यूटर आया तो बकायदा उसके खिलाफ वैचारिक आंदेलन शुरू किया गया । कई कवियों ने अपनी कविता में कंप्यूटर को दानव कहते हुए उसका मजाक उड़ाया । लेकिन अब वही कवि और लेखक कंप्यूटर पर काम करते हुए अपने को सहज महसूस करते हैं । उन्हें अब ना तो उस माध्यम से कोई परहेज हैं और ना ही विरोध । दरअसल चाहे वो सिनेमा हो,टेलीविजन हो या फिर कंप्यूटर हो या फिर कोई अन्य तकनीकी या वैज्ञानिक अविष्कार, उनका मूल उद्देश्य मानव समाज की बेहतरी ही होता है। किसी भी बेहतर तकनीक का मुकाबला बेहतरीन तकनीक से ही किया जा सकता है ना कि पुरातन और समय के पीछे रह गए तकनीक से । जो लोग भी नई और बेहतर तकनीक का मुकाबला पुरानी तकनीक से करना चाहते हैं, इतिहास गवाह है कि वो हमेशा मुंह की ही खाते रहे हैं ।
किताबों के बरक्श ई बुक्स को खड़ा करनेवाले लोग चाहे अनचाहे किताबों की अंतरवस्तु को हाशिए पर धकेलते हैं।दोनों माध्यमों के बीच संघर्ष को रेखांकित करनेवाले लोग दरअसल यह भूल जाते हैं कि दोनों की अपनी अलग महत्ता है और अंतत वह महत्ता उसके अंतर्वस्तु को लेकर है उसके माध्यम को लेकर नहीं । किताबों में जो लेख, कहानी, उपन्यास या फिर कविता है, लोकप्रियता उसकी होती है । फिर चाहें वो कागज पर छपी हो या फिर वो कंप्यूटर पर मौजूद हो है तो वो रचना ही।
सवाल यह उठता है कि क्या आनेवाले दिनों में छपी हुई किताबों का भविष्य खत्म हो जाएगा । छपी किताबों का कारोबार करनेवाले प्रकाशकों पर संकट आनेवाला है। क्या अबतक कंप्यूटर पर लिखनेवाले लेखक भी ई बुक्स के ही जरिए पाठकों के बीच जाएंगे । कई उत्साही लोग तो इन सारे प्रश्नों के सकारात्मक जबाव दे रहे हैं । संभव है कि पश्चिम के विकसित देशों में यह बात आंशिक रूप से सच भी हो । आंशिक इस वजह से कि पश्चिमी देशों में सूचना के संजाल के तमाम विकास के बावजूद अब भी लाखों में किताबें बिक रही हैं । चाहे वो जोनाथन फ्रेंजन की फ्रीडम हो या टोनी ब्लेयर की आत्मकथा- अ जर्नी । इन सबने किताबों की बिक्री के पिछले सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया । अमेजन ने भले ही यह ऐलान किया है कि ई बुक्स ने किताबों की बिक्री को पीछे छोड़ दिया है लेकिन उसने बिक्री का कोई ठोस आंकड़ा पेश नहीं किया, उसने सिर्फ तुलनात्मक आंकड़ों के आधार पर ई बुक्स को ज्यादा लोकप्रिय बताया है । ना ही अमेजन ने इस बात का ऐलान किया कि बिक्री का यह आंकड़ा किस और कितनी अवधि का है । दूसरा अहम प्रश्न जो अमेजन की इस घोषणा के बाद मन में उठता है वह यह है कि अमेजन तक कितने लोगों की पहुंच है । अमेजन पर खरीद बिक्री वही लोग कर सकते हैं जिनते पास इंटरनेट हो या फिर जिन्हें इंटरनेट का एक्सेस हो । बेवसाइट के जरिए होनेवाले कारोबार में ग्राहकों की संख्या अवश्य बढ़ी है लेकिन अभी उस माध्यम के आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी । जल्दबाजी इस वजह से क्योंकि यह पूरे ग्राहक वर्ग के मूड और स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है । इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि ई बुक्स बिक्री और लोकप्रियता में किताबों को पटखनी दे देगा ।
लेकिन इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव और पहुंच को लेकर कुछ लोग साहित्य पर भी संकट देखने लगे हैं । उनका तर्क है सूचना संजाल के विस्तार से साहित्य नष्ट हो जाएगा । ऐसा नहीं है कि इस तरह के तर्क देनेवाले लोग नए हैं । इस तरह के लोग हर युग और काल में पाए जाते हैं । कुछ दशक पहले भारत में जब सिनेमा काफी लोकप्रिय होने लगा और पूरे देश में आम लोगों की जुबान पर इसकी चर्चा हुई तो उसमें भी साहित्य का दुश्मन माना गया और उसके खिलाफ मुकम्मल अभियान भी चला। उसके बाद भारत में टेलीविजन का अभ्युदय हुआ तो उसमें भी साहित्य के अंत का दु:स्वपन देखा गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्यकारों की एक पूरी जमात टेलीविजन के खिलाफ खड़ी हो गई और जबरदस्त तरीके से उसको खारिज करने की कोशिश की गई । टेलीविजन कैमरा का विकास हुआ तो यथार्थवादी रचनाकारों को यह लगने लगा कि उनका भोगा हुआ यथार्थ जिन्हें वो अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों के सामने लाते हैं उसे कैमरा सीधे पाठकों को दिखा देगा । उसी खतरे को भांपते हुए और बगैर माध्यम को समझे कैमरे का विरोध शुरू हो गया । लेकिन उस विरोध का कोई असर नहीं दिखा और टेलीविजन की लोकप्रियता और विस्तार इतना हुआ कि आज घर घर में टेलीविजन लगे हैं । टेलीविजन के बाद जब कंप्यूटर आया तो बकायदा उसके खिलाफ वैचारिक आंदेलन शुरू किया गया । कई कवियों ने अपनी कविता में कंप्यूटर को दानव कहते हुए उसका मजाक उड़ाया । लेकिन अब वही कवि और लेखक कंप्यूटर पर काम करते हुए अपने को सहज महसूस करते हैं । उन्हें अब ना तो उस माध्यम से कोई परहेज हैं और ना ही विरोध । दरअसल चाहे वो सिनेमा हो,टेलीविजन हो या फिर कंप्यूटर हो या फिर कोई अन्य तकनीकी या वैज्ञानिक अविष्कार, उनका मूल उद्देश्य मानव समाज की बेहतरी ही होता है। किसी भी बेहतर तकनीक का मुकाबला बेहतरीन तकनीक से ही किया जा सकता है ना कि पुरातन और समय के पीछे रह गए तकनीक से । जो लोग भी नई और बेहतर तकनीक का मुकाबला पुरानी तकनीक से करना चाहते हैं, इतिहास गवाह है कि वो हमेशा मुंह की ही खाते रहे हैं ।
किताबों के बरक्श ई बुक्स को खड़ा करनेवाले लोग चाहे अनचाहे किताबों की अंतरवस्तु को हाशिए पर धकेलते हैं।दोनों माध्यमों के बीच संघर्ष को रेखांकित करनेवाले लोग दरअसल यह भूल जाते हैं कि दोनों की अपनी अलग महत्ता है और अंतत वह महत्ता उसके अंतर्वस्तु को लेकर है उसके माध्यम को लेकर नहीं । किताबों में जो लेख, कहानी, उपन्यास या फिर कविता है, लोकप्रियता उसकी होती है । फिर चाहें वो कागज पर छपी हो या फिर वो कंप्यूटर पर मौजूद हो है तो वो रचना ही।
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