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Tuesday, March 21, 2017

महिलाएं और चर्च आमने-सामने

पिछले दिनों केरल से खबर आई थी कि चर्च के एक वरिष्ठ पादरी को एक नाबालिग से रेप के आरोप में गिरफ्तार किया गया था । पीड़ित नाबालिग के एक बच्ची को जन्म देने के बाद ये मामला खुला था । चर्च में पादरी के यौन अपराध की यह पहली घटना नहीं थी, चर्च और उसके पादरी से जुड़ी इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर सुर्खियां बनती रही हैं । इन घटनाओं को चर्च के कर्ताधर्ता, कानून व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा बताकर दरकिनार करने की कोशिश करते रहे हैं । अब केरल में ईसाइयों के समूहों ने चर्च के पादरियों से जुड़ी इन घटनाओं का प्रतिवाद शुरू कर दिया है । हाल ही में केरल के कोच्चि में आर्कबिशप के घर के बाहर केरल कैथोलिक रिफॉर्म मूवमेंट से जुड़े लोगों ने धरना-प्रदर्शन किया । उनकी मांग है कि महिलाओं और लड़कियों का कन्फेशन पादरियों की बजाए नन्स के सामने करवाया जाए । ईसाई संगठन के लोगों का कहना है कि कन्फेशन के वक्त पादरी महिलाओं और लड़कियों से ना केवल असुविधाजनक सवाल पूछते हैं बल्कि उनकी हालात का फायदा भी उठाकर धर्म की आड़ में यौन शौषण करते हैं । केरल में आर्क बिशप के घऱ के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों का दावा है कि बाइबिल में इस बात का कहीं भी जिक्र नहीं है कि कन्फेशन या सैक्रामेंट सिर्फ पादरी ही करवा सकते हैं । इस संगठन के मुताबिक अगर महिलाओं को नन्स के सामने कन्फेशन की इजाजत दे दी जाती है तो पादरियों से जुड़े यौन अपराध की घटनाएं कम हो सकती हैं । केरल में ईसाई संगठनों के इस प्रदर्शन का चर्च प्रशासन पर कोई खास असर दिख नहीं रहा है । केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल ने नन के सामने महिलाओं या लड़कियों की कन्फेशन की मांग को ठुकरा दिया है । उनका कहना है कि छिटपुट घटनाओं के आधार पर बाइबिल के आधारभूत सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जा सकता है । उनका कहना है कि महिलाओं को पादरी या प्रीस्ट का दर्जा नहीं दिया जा सकता है क्योंकि यह धर्म सम्मत नहीं है ।
चर्च में पादरियों द्वारा कन्फेशन के दौरन यौन शोषन की घटनाओं की पुष्टि सात- आठ साल पहले पहले कैथोलिक चर्च में छब्बीस साल तक नन रही सिस्टर जेसमी की आत्मकथा- आमीन, एन ऑटोबॉयोग्राफी ऑफ ए नन, से भी हुई थी । सिस्टर जेसमी ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि जब वो कन्फेशन के लिए गई थी तो उसको वहां का वातावरण बेहद रहस्यमयी लगा था । उसकी साथी कुलसुम और मारिया ने उसको बताया था कि जो भी लड़की कन्फेशन के लिए प्रीस्ट के कमरे में जाती है, फादर उसको किस करता है । जब जेसमी कन्फेशन रूम में जाती है तो वहां मौजूद फादर उससे किस करने की इजाजत मांगता है । वो बाहर निकल आती है।  दूसरी बार भी उसको दबाव डालकर उसी प्रीस्ट के पास कन्फेशन के लिए भेजा जाता है जहां वो अपना विरोध जताते हुए कहती है कि किस को लेकर कांग्रेगेशन की लड़कियों में रोष है । फादर का तर्क है – मैंने हर किसी से किस करने की इजाजत ली है और जिसने मना किया है उसको मैंने किस नहीं किया। और ये सब तो बाइबिल के अनुरूप है । लेकिन जेसमी के सवाल जवाब से फादर खफा हो जाते हैं और कन्फेशन के सत्र को खत्म कर देते हैं । बाद में जेसमी को अपने कमरे में बुलाकर बाइबिल का हवाला देते हैं । सेन्ट पॉल ने कहा है कि एक दूसरे का अभिवादन पवित्र चुंबन से करें । पीटर कहते हैं – एक दूसरे को प्यार के चुंबन से विश करो आदि आदि । जब सिस्टर जेसमी की आत्मकथा छपी थी तब भी इस बात को लेकर काफी बखेड़ा हुआ था और देश विदेश मे चर्चों से इस किताब पर आपत्ति आई थी, पाबंदी लगाने की मांग भी की गई थी ।
ऐसा नहीं है कि पादरियों के यौन अपराध की घटनाएं और महिलाओं के अधिकार की मांग पहली बार की जा रही है । पहले भी अंतराष्टीय स्तर पर इस तरह की मांग उठती रही है । चर्च में महिलाओं को पुरुषों के बराबर भूमिका पर कई बार विमर्श हुआ है, पूरे यूरोप में इस पर लंबे समय तक बहस चली है, लेकिन अंतत: बाइबिल का हवाला देकर महिलाओं को प्रीस्ट बनने से रोक दिया जाता रहा है । अपने सुधारवादी रवैये के लिए मशहूर पोप फ्रांसिस ने भी पिछले साल साफ तौर पर कह दिया था कि कोई भी महिला कभी भी रोमन कैथोलिक चर्च में प्रीस्ट नहीं हो सकती है । उन्होंने कहा था कि सेंट पोप जॉन पॉल द्वितीय के शब्द इस मसले पर अंतिम है । उन्होंने उन्नीस सौ चौरानबे के उस दस्तावेज का भी हवाला दिया जिसके मुताबिक महिलाएं कभी भी प्रीस्ट नहीं बन सकती हैं । पोप फ्रांसिस को महिलाओं के हितों के पैरोकार के तौर पर जाना जाता था लेकिन महिलाओं को प्रीस्ट बनाने के मसले पर वो पोप जॉन पॉल द्वितीय की तरह ही परंपरावादी साबित हुए । दरअसल धर्म और धर्मग्रंथों की व्याख्या की आड़ में तकरीबन सभी धर्मों में महिलाओं को उनके हक से दूर रखा जाता है । समय की मांग को देखते हुए सभी धर्म के कर्ताधर्ताओं को बराबरी के मूलभूत सिद्धांत को तवज्जो देते हुए फैसले करने चाहिए । किसी भी धर्म में जबतक महिलाओं को बराबरी का हक नहीं मिलता है और पितृसत्ता कायम रहती है तबतक उस धर्म को लेकर आधी आबादी के मन में संशय बरकरार रहेगा । यह संशय किसी भी धर्म के लिए उचित नहीं है ।      

Monday, March 20, 2017

पस्त संगठन, मस्त नेता

दो हजार चौदह के बाद से जब भी कोई चुनाव होता है और उसमें कांग्रेस को हार मिलती है तो राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े होने लगते हैं । राजनीतिक विश्लेषकों के अलावा कांग्रेस के नेता भी उनके नेतृत्व को लेकर प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं लेकिन संगठन की चूलें आदि कसने के नाम पर सवाल उठाने लगते हैं । इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी में एक सौ तीस साल पुरानी पार्टी की अगुवाई को लेकर कोई स्पार्क नहीं दिखा है । ना ही किसी तरह की कोई ठोस रणनीति के दर्शन हुए हैं । हालिया विधानसभा चुनावों खासकर यूपी में कांग्रेस की हार के बाद एकबार फिर से कांग्रेस के नेता तरह तरह के सवाल खड़े करने लगे हैं । कोई शल्य चिकित्सा की बात कर रहा है तो कोई संगठन मजबूत करने की बात कर रहा है । यह सही है कि पार्टी को सही तरीके से चलाने और उसको संसदीय प्रणाली में जीत दिलवाने की जिम्मेदारी नेतृत्व पर होती है परंतु यह भी उतना ही सच है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने मजबूत नेतृत्व के साथ साथ समर्पित अन्य नेताओं के कंधों पर ही चल सकता है । अब कांग्रेस को देखें तो इस वक्त पार्टी को लेकर जो ज्यादा चिंतित नजर आ रहे हैं उनमें से ज्यादातर राज्यसभा के सदस्य हैं । इसके अलावा कांग्रेस ने यूपी में जिनको जिम्मेदारी भीदी वो सारे के सारे राज्यसभा वाले नेता थे चाहे वो गुलाम नबी आजाद हों, प्रमोद तिवारी हों, राज बब्बर हों या फिर संजय सिंह, पीएल पूनिया हों या फिर राजीव शुक्ला ।  जनता के बीच जाकर संघर्ष का उनका कोई हालिया इतिहास नहीं रहा है । हम अगर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को ही देखें तो भारतीय जनता पार्टी ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दर्जनों रैलियां की, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने करीब दो सौ रैलियां की । इसके अलावा करीब बीस केंद्रीय मंत्री उत्तर प्रदेश में पार्टी के पक्ष में रात-दिन एक किए हुए थे । एक केंद्रीय महासचिव को पार्टी ने महीने भर से ज्यादा के लिए लखनऊ में तैनात कर दिया था । अब इसकी तुलना में कांग्रेस के नेताओं को देखें । बड़ी बड़ी बातें करनेवाले, टीवी कैमरों के आगे चिंता जताने वाले किस कांग्रेस नेता ने उत्तर प्रदेश में प्रचार किया । सत्यव्रत चतुर्वेदी, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और गठबंधन होने के बाद तो गुलामनबी आजाद और राज बब्बर भी अपेक्षाकृत कम दिखाई देने लगे थे । कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी जैसे नेता यूपी चुनाव के दौरान कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे । हिंदी में एक पुरानी कहावत है कि अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ता है । कांग्रेस के साथ इन दिनों वही हो रहा है ।
आज के अखबारों में कमलनाथ का साक्षात्कार छपा है जिसमें उन्होने कहा है कि राहुल गांधी को नेतृत्व संभाल लेना चाहिए । दरअसल कमलनाथ हर हार के बाद बाहर आते हैं और राहुल गांधी के बारे में अपनी अपेक्षा जाहिर कर नेपथ्य में चले जाते हैं । पिछले दिनों मुंबई लिटो फेस्ट में एक सत्र में कांग्रेस की पूर्व सांसद प्रिया दत्त से संवाद का अवसर मिला था । मैंने उनसे जब पूछा कि क्या कांग्रेस को नेतृत्व में बदलाव की जरूरत है तो उन्होंने साफ जवाब तो नहीं दिया लेकिन इतना जरूर कहा कि कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता के साथ कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है । प्रिया दत्त ने बगैर कहे भी सबकुछ कह दिया था । दरअसल कांग्रेस के नेता अपनी कमजोरियों को ढांपने के लिए राहुल की कमजोरी को अपनी ढाल बना लेते हैं । दिग्विजय सिंह बहुधा ज्ञान देते रहते हैं लेकिन गोवा कांग्रेस के नेता उनपर जो इल्जाम लगा रहे हैं उसपर ध्यान देने की जरूरत है । गोवा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने वाली कांग्रेस समर्थन का पत्र टाइप नहीं करवा पाई। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने उतने वक्त में ही समर्थन भी जुटा लिया और अपने रक्षा मंत्री का इस्तीफा दिलवाकर दावा भी पेश कर दिया। बावजूद इस भ्रम के दिग्विजय सिंह से किसी तरह की कोई पूछताछ की गई हो, लगता नहीं है ।

दरअसल कांग्रेस के नेताओं को यह लगता है कि उनकी पार्टी अपने बूते पर कम विपक्षी दलों की गलतियों की वजह से सत्ता में आती रही है । चाहे वो इमरजेंसी के बाद बनी मोरारजी देसाई सरकार की नाकामियां हो जिसकी वजह से उन्नीस सौ अस्सी में इंदिरा गांधी की वापसी हुई या फिर चौरासी में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर हो । या फिर 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद मिला जनादेश हो । इसी तरह से दो हजार चार में शाइनिंग इंडिया को लेकर भारतीय जनता पार्टी के आंकलन में हुई गलती से कांग्रेस को सत्ता मिली । अभी पंजाब भी इसका सर्वेत्तम उदाहरण है जहां अकालियों की वजह से कांग्रेस को सत्ता मिली । इस लंबे कालखंड में सत्ता मिलते रहने से कांग्रेस के नेता आराम तलब हो गए हैं । उनके ज्यादातर नेता जमीन से भी कटने लगे और उनको लगता है राज्यसभा का रूट सबसे अच्छा है, चुनाव लड़ना नहीं है लेकिन सत्ता सुख हासिल होता रहता है । संघर्ष से दूर होते जाने से पार्टी आम जनता से भी दूर होती चली गई । लोगों से उसका कनेक्ट लगभग खत्म हो गया । संसदीय प्रणाली में चुनावी जीत बहुत अहम होती है । दो हजार नौ से लेकर दो हजार बारह तक भारतीय जनता पार्टी के माहौल को भी याद करना चाहिए । कितनी निराशा थी, लेकिन उसी वक्त गुजरात से पार्टी को आशा की किरण दिखाई दी । नरेन्द्र मोदी ने अपने कुशल नेतृत्व से पार्टी को लगातार जीत दिलाई । अमित शाह जैसे कुशल संगठनकर्ता ने उस जीत को आगे बढ़ाया । अब अगर कांग्रेस को अपनी खोई जमीन हासिल करनी है तो उसको जमीन पर आना होगा । सोनिया और राहुल गांधी के बीच के पार्टी का असली बॉस कौन के भ्रम को भी दूर करना होगा ।  

हिंदू वोटरों को रिटर्न गिफ्ट

प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के तमाम दिग्गजों की मौजूदगी में गोरक्षपीठ के महंत और पांच बार से लगातार गोरखपुर से सांसद चुने जा रहे योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली । चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जिस केसरिया होली की बात की थी वो उत्तर प्रदेश में योगी के शपथ ग्रहण के साथ संपन्न हो गई । योगी आदित्यनाथ के तौर पर बीजेपी ने एक ऐसे चेहरे पर दांव लगाया है जो अपनी वेशभूषा और बयानों से प्रखर हिंदूत्व की पैरोकारी करता रहा है । योगी आदित्यनाथ पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते हैं जहां बीजेपी को लोकसभा और विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला था । इसके पहले शनिवार को जब भारत माता की जय के नारों के बीच लखनऊ के लोकभवन के सभागार में योगी आदित्यनाथ के नाम को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर जब विधायकों ने सर्वसम्मति से चुना तो वहां से एक साथ कई संदेश निकले । प्रखर और कट्टर हिंदूवादी छवि के नेता की पूर्वांचल में बेहद दबंग छवि है । कहा जाता है कि योगी अपनी दबंगई की वजह से प्रशासन को भी अपने इलाके में सही से काम करने के लिए मजबूर करते रहे हैं । जब गोरखपुर विकास प्राधिकरण ने इलाके के मुसलमानों की जमीन अधिग्रहित की थी तो योगी ने उनके अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी।  इसके अलावा योगी गोरखपुर से हिंदू वाहिनी नाम की एक संस्था भी चलाते हैं जिसके माध्यम से समाजसेवा का काम तो करते ही रहते हैं अपनी राजनीतिक जमीन भी मजबूत रखते हैं । दो हजार दो में जब वो अपनी पार्टी से खफा हो गए थे तो उसके बाद ही उन्होंने इस संगठन को बनाया था ।
योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे की कमान सौंपकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश के हिद्ओं को विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत का रिटर्न गिफ्ट दे दिया है । जिस तरह से जातियों के बंधन को तोड़कर उत्तर प्रदेश की हिंदू आबादी ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भरोसा जताया था उस भरोसे को योगी का राजतिलक और गाढ़ा करेगा । योगी ने चुनाव पूर्व अपने भाषणों में साफ साफ कहा था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में सत्य का संतुलन कायम कर दिया गया है और यही संतुलन पूरे प्रदेश में लाना है । उनका इशारा बहुत साफ था । कैराना से पलायन और लव जेहाद जैसे मुद्दों को योगी प्रमुखता से उठाते रहे हैं ।  
दरअसल अगर योगी के राजतिलक पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि वहां अब भारतीय जनता पार्टी हिदुत्व और विकास की समन्यवादी राजीनीति के रास्ते पर चलेगी । हिदुत्व और विकास की इस समन्वयवादी राजनीति का मानचित्र दो हजार चौदह में लोकसभा चुनाव के वक्त तय किया गया था जब नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश को छोड़कर बनारस को अपना लोकसभा क्षेत्र चुना था । बनारस का सनातन परंपरा में अपना एक अलग स्थान है और उसी प्रतीकात्मकताकी वजह से बनारस का चयन हुआ था । नरेद्र मोदी की उम्मीदवारी मात्र ने उस वक्त पूर्वांचल औप बिहार के सटे इलाकों में बीजेपी के लिए कम से कम तीन दर्जन लोकसभा सीट पर जीत तय कर दी थी । उसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी मुसलमान को अपना प्रत्याशी नहीं बनाकर अपने कोर वोटरों को एक संदेश भी दिया । इस बात की लाख आलोचना हुई लेकिन उन आलोचनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया गया, बल्कि उस पार्टी के नेताओं से जब इस बारे में सवाल पूछा जाता था तब वो कहते थे कि उनकी पार्टी सबका साथ सबका विकास में यकीन रखती है और तुष्टीकरण को किसी भी कीमत पर तरजीह नहीं देगी । विधायक दल के नेता के चुनाव में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर मौजूद केंद्रीय मंत्री वैकेंया नायडू ने पत्रकारों से बात करते हुए साफ कहा कि विकास के अलावा जाति और मजहब की राजनीति के पैरोकारों को जनता ने जिस तरह से सबक सिखाया है उसका बीजेपी ध्यान रखेगी ।
अपने हिंदू वोट को मजबूत करने के लिए भारतीय जनता पार्टी बहुत सधे हुए तरीके से उनको इस बात का संदेश दे रही थी और चुनावी नतीजों ने यह साबित किया कि बीजेपी के लक्षित वोटरों ने इन संदेशों को ग्रहण भी किया । अब योगी के हाथ में यूपी की कमान देकर बीजेपी नेतृत्व ने वोटों के इस समूह को और मजबूत करने का प्रयास किया है । इस प्रयास को दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के पहले अन्य राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों की तैयारी से भी जोड़कर देखा जा सकता है। आनेवाले दिनों में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं ।

योगी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपकर एक बार फिर से प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने राजनीतिक विश्लेषकों के आंकलन को गलत साबित कर दिया है । जो लोग पारंपरिक तरीके से राजनीति का विश्लेषण करते हैं उनको यह बात गले ही नहीं उतर रही थी कि उत्तराखंड में भी राजपूत जाति का मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश में भी राजपूत सीएम । जातियों से जकड़े विश्लेषकों को यह समझ ही नहीं आ रहा था । परंपरागत राजनीति विश्लेषक तो यहां तक कह रहे थे कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से पीएम और सीएम दोनों नहीं हो सकते । पत्रकारों की टोली, जो खबरों के मामले में खुद को तीस मार खां समझती है, लगातार अलग अलग नामों पर कयास लगा रही थी । न्यूज चैनलों पर तो हर पांच मिनट में यूपी का नया सीएम घोषित हो रहा था । शनिवार सुबह तो मनोज सिन्हा का नाम तय माना जा रहा था । मनोज सिन्हा तो बनारस क मंदिर-मंदिक जाकर आशीर्वाद भी लेने लगे थे । योगी की ताजपोशी ने इन सब अटकलों को गलत साबित कर दिया । दरअसल अगर हम देखें तो नरेन्द्र मोदी ने बिल्कुल नई तरह की राजनीति शुरू की है जिसमें जातिगत समीकरणों का ध्यान तो रखा जाता है लेकिन उसको परोक्ष तरीके से अपनी राजनीति का हिस्सा बनाते हैं । जैसे योगी के साथ केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाकर सोशल इंजीनियरिंग को भी साधने की कोशिश की गई है । केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ी जाति से आते हैं और दिनेश शर्मा ब्राह्मण हैं । अब इस समीकरण पर नजर डालें तो साफ है कि गैर यादव पिछड़ा, ब्राह्मणों को संदेश दे दिया गया । इसके बाद मंत्रियों के चयन में भी अन्य जातियों और क्षेत्रीय संतुलन का ख्याल रखा जाना तय है । योगी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने पर कुछ लोगों को लग रहा है कि विकास से ज्यादा विवाद होगा । कुछ उत्साही स्तंभकारों ने तो यूपी को हिंदू राज्य तक घोषित करते हुए योगी को मुसलमानों को साथ लेकर चलने की नसीहत तक दे डाली है । योगी के अबतक के बयानों और उनकी छवि के मद्देनजर यह आशंका व्यक्त की जा रही है लेकिन उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसपर पीएमओ की सीधी नजर रहेगी । योगी के नाम के ऐलान के दो दिन पहले ही पीएमओ के आला अफसरों की टीम लखनऊ पहुंचकर सुशासन का खाका खींचने के काम में जुटी है । ऐसे में विवाद की आशंका से एकदम इंकार तो नहीं किया जा सकता है लेकिन मुख्यमंत्री बनने और उसके पहले के नेताओं के आचार व्यवहार में फर्क इस देश ने पहले भी देखा है । दूसरे योगी को साथ देने या साधने के लिए केशव मौर्या और दिनेश शर्मा को भी लगाया गया है, इस बात को नहीं भूलना चाहिए । 

Saturday, March 18, 2017

विकास और हिन्दुत्व की समन्वयवादी सियासत

भारत माता की जय के नारों के बीच लखनऊ के लोकभवन के सभागार में योगी आदित्यनाथ के नाम को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर जब विधायकों ने सर्वसम्मति से चुना तो वहां से एक साथ कई संदेश निकले । योगी आदित्यनाथ प्रखर और कट्टर हिंदूवादी छवि के नेता है । योगी पांच बार के सांसद हैं और पूर्वांचल में उनकी छवि बेहद दबंग नेता की है । कहा जाता है कि योगी अपनी दबंगई की वजह से प्रशासन को भी अपने इलाके में सही से काम करने के लिए मजबूर करते रहे हैं । इसके अलावा योगी गोरखपुर से हिंदू वाहिनी नाम की एक संस्था भी चलाते हैं ।  उनको देश के सबसे बड़े सूबे की कमान सौंपकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश के हिद्ओं को विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत का रिटर्न गिफ्ट दे दिया है । जिस तरह से जातियों के बंधन को तोड़कर उत्तर प्रदेश की हिंदू आबादी ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भरोसा जताया था उस भरोसे को योगी का राजतिलक और गाढ़ा करेगा । योगी ने चुनाव पूर्व अपने भाषणों में साफ साफ कहा था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में संतुलन कायम कर दिया गया है और यही संतुलन पूरे प्रदेश में लाना है । उनका इशारा बहुत साफ था । कैराना से पलायन और लव जेहाद जैसे मुद्दों को योगी प्रमुखता से उठाते रहे हैं ।  
दरअसल अगर योगी के राजतिलक पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि वहां अब भारतीय जनता पार्टी हिदुत्व और विकास की समन्यवादी राजीनीति के रास्ते पर चलेगी । हिदुत्व और विकास की इस समन्वयवादी राजनीति का मानचित्र दो हजार चौदह में लोकसभा चुनाव के वक्त तय किया गया था जब नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश को छोड़कर बनारस को अपना लोकसभा क्षेत्र चुना था । बनारस का सनातन परंपरा में अपना एक अलग स्थान है और नरेद्र मोदी की उम्मीदवारी मात्र ने उस वक्त वहां बीजेपी के लिए कम से कम तीन दर्जन लोकसभा सीट पर जीत तय कर दी थी । उसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी मुसलमान को अपना प्रत्याशी नहींबनाकर अपने कोर वोटरों को एक संदेश भी दिया । इस बात की लाख आलोचना हुई लेकिन उन आलोचनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया गया, बल्कि उस पार्टी के नेताओं से जब इस बारे में सवाल पूछा जाता था तब वो कहते थे कि उनकी पार्टी सबका साथ सबका विकास में यकीन रखती है और तुष्टीकरण को किसी भी कीमत पर तरजीह नहीं देगी । विधायक दल के नेता के चुनाव में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर मौजूद केंद्रीय मंत्री वैकेंया नायडू ने पत्रकारों से बात करते हुए साफ कहा कि विकास के अलावा जाति और मजहब की राजनीति के पैरोकारों को जनता ने जिस तरह से सबक सिखाया है उसका बीजेपी ध्यान रखेगी । यह सब करके पार्टी बहुत सधे हुए तरीके से अपने हिंदू वोटरों को संदेश दे रही थी और चुनावी नतीजों ने यह साबित किया कि बीजेपी के लक्षित वोटरों ने इन संदेशों को ग्रहण भी किया । अब योगी के हाथ में यूपी की कमान देकर बीजेपी नेतृत्व ने वोटों के इस समूह को और मजबूत करने का प्रयास किया है । इस प्रयास को दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के पहले अन्य राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों की तैयारी से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

योगी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपकर एक बार फिर से प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने राजनीतिक विश्लेषकों के आंकलन को गलत साबित कर दिया है । जो लोग पारंपरिक तरीके से राजनीति का विश्लेषण करते हैं उनको यह बात गले ही नहीं उतर रही थी कि उत्तराखंड में भी राजपूत जाति का मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश में राजपूत सीएम । परंपरागत राजनीति विश्लेषक तो यहां तक कह रहे थे कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से पीएम और सीएम दोनों नहीं हो सकते । पत्रकारों की टोली लगातार अलग अलग नामों पर कयास लगा रही थी । न्यूज चैनलों पर तो हर पांच मिनट में यूपी का नया सीएम घोषित हो रहा था । शनिवार सुबह तो मनोज सिन्हा का नाम तय माना जा रहा था । पर योगी की ताजपोशी ने इन सब अटकलों को गलत साबित कर दिया । दरअसल अगर हम देखें तो नरेन्द्र मोदी ने बिल्कुल नई तरह की राजनीति शुरू की है जिसमें जातिगत समीकरणों का ध्यान तो रखा जाता है लेकिन उसको परोक्ष तरीके से अपनी राजनीति का हिस्सा बनाते हैं । जैसे योगी के साथ केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाकर सोशल इंजीनियरिंग को भी साधने की कोशिश की गई है । केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ी जाति से आते हैं और दिनेश शर्मा ब्राह्मण हैं । अब इस समीकरण पर नजर डालें तो साफ है कि गैर यादव पिछड़ा, ब्राह्मणों को संदेश दे दिया गया । इसके बाद मंत्रियों के चयन में भी अन्य जातियों और क्षेत्रीय संतुलन का ख्याल रखा जाना तय है । योगी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने पर कुष लोगों को लग रहा है कि विकास से ज्यादा विवाद होगा । योगी के अबतक के बयानों और उनकी छवि के मद्देनजर यह आशंका व्यक्त की जा रही है लेकिन उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जिसपर पीएमओ की सीधीनजर रहेगी । योगी के नाम के ऐलान के दो दिन पहले ही पीएमओ के आला अफसरों की टीम लखनऊ पहुंचकर सुशासन का खाका खींचने के काम में जुटी है । ऐसे में विवाद की आशंका से एकदम इंकार तो नहीं किया जा सकता है लेकिन मुख्यमंत्री बनने और उसके पहले के नेताओं के आचार व्यवहार में फर्क इस देश ने पहले भी देखा है । 

हिंदी के हक की पहल


दो हजार चौदह में जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में आई है तब से हिंदी को लेकर एक खास तरह के उत्साह का माहौल देखने को मिल रहा है । दो हजार चौदह में ही केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों को अन्य भाषाओं के साथ हिंदी में भी जानकारी जारी करने का आदेश दिया गया था । केंद्र सरकार की सूचनाएं हिंदी में उपलब्ध भी होने लगीं । वो हिंदी कैसी हैं इसपर बाद में विचार किया जा सकता है । हिंदी के उपयोग को लेकर उत्साह का माहौल है लेकिन इसमें सरकारी कामकाज और रोजगार की भाषा बनाने की दिशा में अभी बहुत ठोस कदम उठाने की जरूरत है । आजादी के सत्तर साल बाद भी देश के उच्च और सर्वोच्च न्यायलयों में भारतीय भाषाओं में काम-काज नहीं हो पा रहा है । कई बार हाईकोर्ट में स्थानीय भाषाओं में सुनवाई और फैसलों का प्रस्ताव सामने आया लेकिन वो योजना परवान नहीं चढ़ पाई और इन अदालतों में अब भी अंग्रजी में ही कामकाज हो रहा है ।
अब इस दिशा में भी कुछ हलचल नजर आ रही है । भारतीय जनता पार्टी के महासचिव और सांसद भूपेन्द्र यादव ने देश के पिछले सप्ताह उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की स्वतंत्रता के लिए राज्यसभा में निजी विधेयक - उच्च न्यायालय, (राजभाषाओं का प्रयोग) विधेयक-2016 पेश किया। इस बिल में उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की अनुमति, एक अधिकार के रूप में प्रस्तावित किया गया है । भूपेन्द्र यादव ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा - उच्च न्यायालयों में वादी अपनी भाषा में न्याय की गुहार लगा सके और प्रतिवादी को भी अपनी भाषा में अपनी बात रखने का अधिकार हो यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यह सर्वथा अनुचित है कि हमारे देशवासी अपने ही देश में अपनी भाषाओं में अपने उच्च न्यायालयों में न्याय की गुहार नहीं लगा सकते हैं। वर्तमान प्रावधानों के मुताबिक़ उच्च न्यायालयों की न्यायिक प्रक्रियाओं में भारतीय भाषाओं की स्वीकार्यता नहीं है और समूची प्रक्रिया अंग्रेजी में ही होती है। अगर अपनी अदालत में अपनी भाषाओं में अपनी बात रखने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तो यह किसी भी ढंग से निश्पक्ष न्याय मिलने के अधिकार और वास्तविक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मानकों पर खरी उतरने वाली बात नहीं कही जा सकती है जो कि हमारे देश के संविधान का मूल है। पारदर्शी ढंग से अदालती सुनवाई को सुनिश्चित करने के लिए यह अनिवार्य है कि भारतीय भाषाओं को उच्च न्यायालयों में स्वीकार्यता प्रदान की जाए। अगर देश की संसद में एवं अन्य संवैधानिक कार्यों में देश की सभी भाषाओं में बोलने की स्वतंत्रता है तो फिर न्यायपालिका इससे अलग क्यों हैं ? किसी को उसकी भाषा में न्याय मांगने से रोकना, यह साबित करता है कि हम स्वतंत्रता के मूल्यों को सही ढंग से अभी भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। न्याय की गुहार से लेकर न्याय की सुनवाई एवं प्राप्ति तक की प्रक्रिया वादी-प्रतिवादी की अपनी भाषाओं में ही होनी चाहिए तभी सही मायने में न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता एवं न्याय की स्वतंत्रता को हासिल किया जा सकेगा। भारत अकेला ऐसा देश है जहां की जनता को यह अधिकार नहीं है।‘
भूपेन्द्र यादव के इस निजी विधेयक के पहले इस दिशा में एक और ठोस पहल सामने आई थी । उच्च न्यायलयों में अंग्रेजी के दबदबे को खत्म करने की दिशा में कानून मंत्रालय की संसदीय समिति ने बेहद अहम प्रस्ताव रखा था । संसदीय समिति ने देश के सभी चौबीस उच्च न्यायलयों में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में कामकाज करने की सिफारिश की है । संसदीय समिति के प्रस्ताव के मुताबिक संविधान में केंद्र सरकार को इस बारे में फैसला लेने का अधिकार दिया गया है । संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश में इस बात पर भी जोर दिया है कि इस मसले पर अदालतों की सलाह लेने की जरूरत नहीं है । संसदीय समिति ने न्यायिक सलाह नहीं लेने पर जोर इस वजह से दिया, लगता, है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर दो हजार बारह में गुजरात, तमिलनाडू, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के उच्च न्यायलयों में स्थानीय भाषाओं में कामकाज के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था ।
सुप्रीम कोर्ट ने उन्नीस सौ सत्तानवे और उन्नीस सौ निन्यानबे के अपने पुराने फैसलों के हवाले से इन प्रस्तावों को खारिज किया था । पिछले दिनों भी इस मसले पर एक याचिका दायर की गई थी जिसपर उस वक्त के मुख्य न्यायधीश ने याचिकाकर्ता पर कठोर टिप्पणी की थी । अब संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर संबंधित राज्य सरकारें इस तरह का प्रस्ताव देती है तो केंद्र सरकार संविधान में मिले अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए उसको लागू करने का फैसला ले सकती है । इस मसले पर संविधान में तो प्रावधान है लेकिन उन्नीस सौ पैंसठ में कैबिनेट के एक फैसले से न्यायलयों से इस बारे में सलाह लेने की परंपरा की शुरुआत हुई थी जो अबतक चली आ रही है । अब अगर केंद्र सरकार संसदीय समिति की सिफारिशों को लागू करना चाहती है तो उसको कैबिनेट के फैसले पर पुनर्विचार करना होगा । मौजूदा सरकार को इस मसले पर संजीदा रुख अख्तियार करना होगा ।
अदालतों में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में कामकाज करने का विरोध यह कहकर किया जाता है कि इससे न्यायधीशों को दिक्कत होगी और उच्च न्यायलयों में किसी प्रदेश के जज को किसी भी प्रदेश में स्थानांतरण की प्रक्रिया बाधित होगी । संभव है कि ऐसा हो, लेकिन इसके लिए कोई मैकेनिज्म बनाया जा सकता है ताकि न्यायाधीशों को दिक्कत ना हो और उनके स्थानांतरण को लेकर भी प्रक्रिया बाधित ना हो ।लेकिन न्यायलयों में हिंदी में काम नहीं होने पर कई बार केस मुकदमे में अदालत पहुंचे पीड़ितों को अदालत की भाषा या वहां जारी बहस समझ नहीं आती है और वो मूकदर्शक बने रहते हैं । निर्भया के मामले में भी ऐसा हो रहा था । उसकी मां लगातार सुप्रीम कोर्ट जाती थी और कई बार बगैर कुछ समझे बूझे वहां से वापस हो लेती थी । बाद में उनकी मदद की गई और उनको हिंदी में अदालती कार्यवाही समझाने के लिए एक शख्स को लगाया गया ।
अगर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को उच्च न्यायलयों में कामकाज की एक भाषा बनाने का फैसला होता है तो इससे भाषा का गौरव बढ़ेगा, साथ ही ज्यादातर पीड़ितों को भी इंसाफ की भाषा समझ में आ सकेगी । भूपेन्द्र यादव के निजी विधेयक पर संसद को विचार करना चाहिए । अगर इस विधेयक पर बहस होती है तो भाषा के सवाल पर सभी दलों के नेताओं के विचार सामने आ सकेंगे । यह सिर्फ हिंदी का मामला नहीं है,यह सभी भारतीय भाषाओं से जुड़ा मसला है, लिहाजा हिंदी को थोपने जैसे तर्क भी बेमानी साबित होंगे । काफी लंबे समय से हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के सामने दुश्मन की तरह पेश करके हिंदी की राह में बाधा खड़ी की जाती रही है । यह तर्क दिया जाता रहा है कि हिंदी अगर बढ़ी को अन्य भारतीय भाषाओं को दबा देगी या उसके अस्तित्व को संकट में डाल देगी । आजादी के सत्तर साल में यह तो साबित हो ही गया है कि हमारे देश में हिंदी की वजह से किसी भी भाषा के दबे रह जाने या उसके अविकसित होने की आशंका गलत थी ।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने तो काफी पहले लिखा था- हिंदी का आंदोलन सभी भाषाओं का आंदोलन है । हिन्दी यदि बढ़ी तोसभी भाषाएं बढ़ेंगी । हिन्दी यदि रोक दी गई तो देश की बहुत सी भाषाएं अवरुद्ध हो जाएंगीं । तब दिनकर ने कहा था- प्रत्येक के लिए अपनी मातृभाषा और सबके लिए हिंदी । लेकिन यह अबतक हो नहीं सका है । अंग्रेजी का दबदबा अबतक कायम है और अंग्रेजी की भाषाई औपनिवेश को कहीं से कोई चुनौती नहीं मिल पा रही है । उल्टे अब ये हो रहा है कि बोलियों को भाषा के बरक्श खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। बोलियों को भाषा बनाने के पीछे की राजनीति को भी चिन्हित किया जाना आवश्यक है । यहां एक और उदाहरण देना समीचीन होगा । बिहार में जब अदालतों की भाषा के रूप में हिंदी को भी मान्यता देने का आंदोलन शुरू हुआ था तब उस आंदोलन के सबसे प्रबल समर्थक भूदेव चौधरी थे जो उस समय स्कूलों के इंसपेक्टर के पद पर काम कर रहे थे । इसी तरह से सभी भाषाओं को देवनागरी में लिखे जाने की शुरुआत भी बंगाल में हुई थी । जस्टिस शारदाचरण मित्र बंगाली थे जिन्होंने नागरी के व्यापक प्रचार प्रसार के लिए ‘देवनागर’ नाम से एक पत्र भी निकाला था ।
अगर अदालतों के अलावा भी भाषा के सवाल पर विचार करें तो हमें लगता है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी हम अपनी भाषा को लेकर कोई ठोस नीति नहीं बना पाए । अब वक्त आ गया है कि भाषा संबंधी ठोस नीति बने और उसको बगैर किसी सियासत के लागू किया जा सके ।