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Saturday, April 24, 2021

उपेक्षा के भंवर में फंसी धरोहर


कोरोना की दूसरी लहर का असर कला और कलाकारों पर फिर से पड़ने लगा है। पिछले सालभर से कोरोना संक्रमण के बढ़ने की वजह से सार्वजनिक कार्यक्रमों के रद्द होने से कलाकारों के सामने जीविका का संकट उत्पन्न हो गया था। मंच पर परफॉर्म करने वाले घर बैठे थे। बड़े कलाकारों के साथ तबले और हारमोनियम आदि पर संगत करनेवालों के लिए संकट अधिक गहरा था। इस वर्ष के आरंभ से कोरोना संक्रमण के संकट के कम होने से एक उम्मीद जगी थी, लेकिन अब संक्रमण की दूसरी लहर ने उसपर पानी फेर दिया। हाल ही में साहित्य और संस्कृति के लिए काम करनेवाली कोलकाता की संस्था प्रभा खेतान फाउंडेशन ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ एक बातचीत का आयोजन किया था। विषय था ‘इकोनॉमी इन कल्चर’। इस बातचीत में वित्त मंत्री ने भी कलाकारों की स्थिति पर चिंता प्रकट की। उन्होंने माना कि परफॉर्मिंग आर्ट के कलाकारों के सामने चुनौती बड़ी है । उन्होंने कलाकारों से ये अपेक्षा की कि वो सरकार को बताएं कि इस क्षेत्र की चुनौतियों से कैसे निबटा जाए ताकि इस क्षेत्र की समस्याओं का निदान हो सके। इस बातचीत में आगे निर्मला सीतारमण ने माना कि संस्कृति के क्षेत्र में कई संस्थाएं सांस्थानिक उपेक्षा का शिकार हो रही हैं। वित्त मंत्री ने सांस्कृतिक संस्थाओं की बेहतरी के संदर्भ में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा कि धन के साथ-साथ इनको बेहतर करने के लिए ‘सही व्यक्तियों’ की भी जरूरत होती है। 

जब मैं ये कार्यक्रम सुन रहा था तो अचानक त्रिपुरा के उनकोटि की छवियां दिमाग में कौंधी। इस वर्ष जब कोरोना संक्रमण थोड़ा कम हुआ था तो मार्च के अंतिम सप्ताह में त्रिपुरा जाने का अवसर मिला था। उनकोटि में पत्थरों पर तराशी गई मूर्तियों की कलात्मकता की प्रशंसा सुनी थी। शिव को मानने वालों के लिए ये आस्था का बड़ा केंद्र भी है। उनकोटि का अर्थ होता है एक करोड़ से एक कम। इसके नाम के साथ भी एक बेहद दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। मान्यता ये है कि भगवान शिव एक करोड़ देवी देवताओं के साथ काशी जा रहे थे। जब त्रिपुरा के इस स्थान पर पहुंचे तो रात हो गई। शिवजी ने सबके साथ वहीं रात बिताने का निर्णय लिया और सभी देवी-देवताओं को कहा कि रात्रि विश्राम के पश्चात सूर्योदय के पहले सबको काशी के लिए प्रस्थान करना है। अगले दिन पौ फटने के पहले भगवान शंकर जब उठे तो उन्होंने देखा कि सभी देवी देवताएं सो रहे हैं और कोई भी काशी जाने के लिए समय से तैयार नहीं हो पाए हैं। शिव अकेले ही वहां से नियत समय पर चल दिए लेकिन अपने साथ के सभी देवी देवताओं को श्राप दिया कि वो पत्थर के हो जाएं। मान्यता है कि इसी वजह से इस स्थान का नाम ‘उनकोटि’ पड़ा और वहां एक करोड़ से एक कम पत्थर की मूर्तियां या पत्थर पर उकेरे चित्र बने हैं। 

अगरतला से करीब पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी तय करके जब उनकोटि पहुंचा तो वहां की सुंदरता और पत्थर के मूर्तियों की भव्यता और कलाकारी देखकर आह्लादित हो गया। इस परिसर में नीचे उतरते ही सबसे पहले करीब तीस फीट के ‘उनकोटेश्वर कालभैरव’ की पत्थर की मूर्ति मिलती है। इस मूर्ति का मुकुट ही करीब दस फीट के पत्थर पर बना है जिसपर अद्भुत कलाकारी है। उनके आसपास दो देवियों के चित्र पत्थर पर उकेरे हुए हैं और इसी के पास नंदी की पत्थर की दो मूर्ति भी मिलती है। काफी सीढ़ियां चढ़कर आपको अन्य मूर्तियों को देखने जाना पड़ता है। पत्थर की कई मूर्तियों को उसी परिसर में बने कमरे में बंद करके रखा गया है। काल भैरव की मूर्ति की दूसरी तरफ एक विशाल पत्थर पर गणेश जी की मूर्ति बनी हुई है जिसके दोनों तरफ पत्थर पर हाथी की मुखाकृति वाले चित्र उकेरे हुए हैं। इस परिसर के बारे में संक्षेप में बताने की जरूरत इसलिए है ताकि इसकी भव्यता और कलात्मकता का अंदाज हो सके। ये पूरा परिसर संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाली संस्था भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण की देखरेख में है। वित्त मंत्री ने सही कहा था कि संस्कृति से जुड़ी जगहों को सहेजने के लिए धन से ज्यादा सुरुचि संपन्न मानव संसाधन की आवश्यकता है। भले ही उन्होंने ये बातें कोलकाता की सांस्कृतिक संस्थाओं के बारे में कही हो, लेकिन ये उनकोटि पर भी लागू होता है। इतने बड़े और भव्य परिसर में नागरिक सुविधाओं के नाम पर शौचालय तो बना है लेकिन ऐसा लगा कि उसमें वर्षों से पानी नहीं आया था। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए भी किसी तरह की सुविधा मुझे नहीं दिखी। इनको अगर थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दिया जाए तो जो पत्थर पर बनी मूर्तियां हैं या कला कृतियां हैं वो भी देखरेख के आभाव में जगह जगह से खराब हो रही हैं। कालभैरव की प्रतिमा के नीचे कुछ लोग कपड़े धो रहे थे। उपर के हिस्से में जाने के लिए बनी सीढ़ियां बुरी हालत में हैं। उस परिसर में उगनेवाले जंगली घास भी लंबे समय से काटे नहीं जा सके थे। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण बस परिसर के गेट पर बोर्ड लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री माने बैठा है। 

यह स्थिति तब है जबकि इस वर्ष के बजट में भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण के हिस्से में संस्कृति मंत्रालय के बजट से हजार करोड़ रुपए से अधिक का आवंटन है। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय की अन्य योजनाओं के अंतर्गत पूर्वोत्तर के लिए एक सौ दो करोड़ की राशि भी आवंटित की गई है। संस्कृति के साथ-साथ पर्यटन मंत्रालय के बजट का कुछ हिस्सा भी जोड़ दें तो एक अलग ही तस्वीर बनती है। ‘देखो अपना देश’ (डीएडी) योजना के तहत ही उनकोटि जैसे स्थानों के बारे में लोगों को बताया जाए और जब इन स्थानों के बारे में बताया जाए तब वहां उपलब्ध सुविधाओं के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है। उनकोटि को तो दो तरह से विकसित किया जा सकता है। एक तो इसको धार्मिक पर्यटन के तौर पर प्रचारित किया जा सकता है। एक ही स्थान पर एक करोड़ से बस एक कम देवताओं का दर्शन लाभ लिया जा सकता है। दूसरे इसको भारतीय मूर्तिकला के अप्रतिम उदाहरण के तौर पर पूरी दुनिया में पेश किया जा सकता है। पूर्वोत्तर भारत में इतनी तरह की कलाओं के उदाहरण मिलते हैं जिनसे न केवल भारतीय कला की समृद्ध परंपरा सामने आती है बल्कि हमारे इतिहास का वो पन्ना भी दुनिया के सामने आ सकता है जो कि हमारी प्राचीन सभ्यता की सुरुचि संपन्नता  को भी सामने ला सकती है।   

दरअसल हम अपनी विरासत को लेकर उत्साहित ही नहीं होते हैं। उनको सहेजने और उसको पूरी दुनिया के सामने लाने के उपक्रम में भी पिछड़ जाते हैं। उनकोटि जैसी विरासत या कला का नायाब नमूना अगर पश्चिम के किसी देश के पास होता तो वो इसकी इतनी मार्केटिंग करता कि पूरी दुनिया उस स्थान की दीवानी हो जाती। प्रश्न सिर्फ मार्केंटिंग का नहीं है, सवाल तो ये भी कि हम अपने इतिहास को भी इन कलाओं के माध्यम से और इनसे जुड़ी कहानियों से जान सकते हैं। अगर पूरे देश में फैले विरासत के इन अनमोल हीरों को एक माला में पिरो सकें तो यह एक बड़ा काम होगा। इन हीरों को एक माला में पिरोने के लिए एक देश को एक संस्कृति नीति की आवश्यकता है। जितनी जल्दी संस्कृति नीति बनेगी उतनी जल्दी हम ने केवल अपनी गौरवशाली विरासत को सहेज पाएंगे बल्कि नई पीढ़ी के अंदर भी आत्मगौरव का संचार कर पाएंगे। 

Sunday, April 18, 2021

साहित्य का शीर्ष कलश


पिछले दिनों नरेन्द्र कोहली की एक पुस्तक आई थी, ‘समाज जिसमें मैं रहता हूं’। उस पुस्तक की आरंभिक प्रतियों में से एक उन्होंने मुझे भिजवाई थी। ये उनके संस्मरणों और भाषा आदि को लेकर लिखे लेखों का संग्रह है। उनकी इच्छा थी कि मैं इस पुस्तक को पढ़कर उनसे चर्चा करूं। मैंने पुस्तक को तत्काल पढ़कर उनको फोन किया और पुस्तक के बारे में खूब अच्छी अच्छी बातें उनसे कहीं, कई उल्लिखित प्रसंगों पर उनसे चर्चा भी की। बातचीत के दौरान मुझे लगा कि वो अपनी तारीफ से इतर वो कुछ सुनना चाह रहे थे। मेरे पास वो बातें थीं लेकिन मैं कह नहीं पा रहा था। बात आई गई हो गई। इस बीच मैंने उनके प्रकाशक को फोन करके बता दिया कि कोहली जी की उक्त पुस्तक में प्रूफ की अनेक गलतियां हैं जो उनकी प्रतिष्ठा के विपरीत हैं। अभी पांच अप्रैल को उनसे बहुत लंबी बात हुई, देश दुनिया, समाज, राजनीति और साहित्यिक जगत की। उस दौरान भी मेरे दिमाग में ये बात आई कि पुस्तक की खामियों की ओर उनका ध्यान दिला दूं , लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी। लेकिन मेरे मन के किसी कोने में अंतरे में ये बात अटकी हुई थी कि कोहली जी को ये तो बताना ही होगा कि उनकी पुस्तक में भी कमियां हैं। ये इस वजह से भी था कि वो हमेशा शब्दों के प्रयोग और उसको लिखने के तरीके को लेकर सचेत रहते थे। अगले दिन उनको व्हाट्सएप पर संदेश भेजा, ‘आपकी पुस्तक में प्रूफ की कई गलतियां हैं जो नहीं होनी चाहिए थीं’। तुरंत जवाबी संदेश आया, ‘तुमने सही प्रतिक्रिया देने में बहुत देर कर दी, पता नहीं क्यों?’ मैंने लिखा, ‘आपसे डरकर’ । उनका उत्तर, ‘सत्य कहने में भय किस बात का और तुम कब से डरकर सत्य बोलने से बचने लगे?’ मैंने हाथ जोड़ लिए। मेरी कोहली जी से ये अंतिम बातचीत थी, लेकिन इस बातचीत ने मुझे बहुत शक्ति दी थी। वो इसी तरह से बातचीत के दौरान और कभी कभार संदेश भेजकर मुझे शब्दों के प्रयोग और मेरे लेख पर प्रतिक्रिया दिया करते थे, ये उनका सिखाने का तरीका था। 

नरेन्द्र कोहली से मेरा परिचय मेरे मित्र और वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने करवाया था। वर्ष ठीक से याद नहीं है लेकिन करीब दस साल से अधिक तो हो ही गए होंगे। फिर हम लोगों ने देश-विदेश की कई यात्राएं साथ-साथ कीं। इन यात्राओं के भी कई दिलचस्प किस्से हैं, प्रसंग हैं। कोहली जी की श्रीराम में जबरदस्त आस्था थी। वो हर बात में ये कहा करते थे कि रामजी की यही इच्छा रही होगी। उनकी इस आस्था का प्रकटीकरण तब हुआ जब वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में अयोध्या गया। कार्यक्रम की आयोजक मालिनी अवस्थी के सामने उन्होंने शर्त रखी कि वो अयोध्या तभी जाएंगें जब रामलला के दर्शन की व्यवस्था हो पाएगी। आयोजकों ने उनकी बात मानी। वो अयोध्या गए। रामलला के दर्शन भी किए। दर्शन के बाद कोहली जी फफक फफक कर रोने लगे। उन्होंने अपने जीवनकाल में पहली बार अयोध्या में रामलला के दर्शन तक किए जब सुप्रीम कोर्ट का राम जन्मभूमि पर फैसला आ गया। मालिनी अवस्थी और युवा कवि राहुल नील इस पल के गवाह बने थे। बाद में पता चला कि उन्होंने ये तय किया हुआ था कि रामलला के दर्शन करने अयोध्या तभी जाएंगे जब जन्मभूमि के तमाम विवाद समाप्त हो जाएंगे। 

दैनिक जागरण में जब हमने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान का आरंभ किया तो नरेन्द्र कोहली जी पहले कार्यक्रम के अतिथि थे। दैनिक जागरण बेस्टसेलर की जब शुरुआत हुई तो पहली सूची नरेन्द्र कोहली ने जारी की थी। संवादी लखनऊ से लेकर बिहार संवादी तक में कोहली जी की भागीदारी रही थी। अपनी भाषा हिंदी को लेकर उनमें एक जबरदस्त प्रेम था और उनका यह प्रेम बहुधा गोष्ठियों में दिख भी जाता था। उनके निधन से हिंदी को अपूरणीय क्षति हुई है। वो हिंदी साहित्य के शीर्ष कलश थे।  


Saturday, April 17, 2021

आपदा में विरासत सहेजने का अवसर


कोरोना की दूसरी लहर की वजह से लोगों ने फिर से अपने-अपने घरों से निकलना कम कर दिया है। स्थितियां इस तरह की बनने लगी हैं कि पिछले साल की घटनाएं और स्थितियां याद आने लगी हैं। एक बार फिर से इलेक्ट्रानिक या ई-फॉर्मेट में प्राचीन पुस्तकों का आदान-प्रदान शुरू हो गया है। कुछ ऐसी पुस्तकें भी इस दौरान देखने को मिल रही हैं जो अब अप्राप्य हैं या जिनका प्रकाशन अब नहीं हो रहा है। पिछले साल जब कोरोना का कहर था तब भी एक ऐसी ही दुर्लभ पुस्तक ई फॉर्मेट में प्राप्त हुई थी। पुस्तक का नाम था ‘सनातन धर्म, एन एलिमेंट्री टेक्स्टबुक ऑफ हिंदी रिलीजन एंड एथिक्स’। इस पुस्तक के लेखक का नाम नहीं था लेकिन इसके कवर पर प्रकाशन वर्ष उन्नीस सौ सोलह और प्रकाशक के तौर पर सेंट्रल हिंदू कॉलेज बनारस के मैनेजिंग कमेटी का उल्लेख था। पिछले साल ये पुस्तक काफी उपयोगी मानी गई थी और कई लोगों ने इसका अध्ययन भी किया था। अभी एक ऐसी ही महत्वपूर्ण पुस्तक प्राप्त हुई है जिसका नाम है ‘जन जनक जानकी’ जिसके संपादक है सच्चिदानंद वात्स्यायन। वात्स्यायन जी को ज्यादातर लोग अज्ञेय के नाम से जानते हैं। इस पुस्तक के प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं है लेकिन ये उन्नीस सौ तिरासी के एक या दो वर्षों के बाद प्रकाशित हुई थी। ये पुस्तक इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें हिंदी के सत्रह महत्वपूर्ण लेखकों के विचार हैं जो एक यात्रा के दौरान उपजे थे। दरअसल उन्नीस सौ तिरासी में अज्ञेय जी की अगुवाई में लेखकों के एक दल ने बाइस जनवरी से लेकर अठारह मार्च तक दो चरणों में यात्रा की थी। इस यात्रा को ‘जानकी जीवन यात्रा’ का नाम दिया गया था और यात्रा के रूट को ‘सीयराममय पथ’ कहा गया था। पहले चरण में जनकनंदिनी के जन्मस्थान बिहार के सीतामढ़ी से लेकर श्रीराम प्रभु के जन्मस्थान अयोध्या तक और फिर दूसरे चरण में अयोध्या से लेकर चित्रकूट तक की यात्रा की गई थी। इस पुस्तक की भूमिका में इस यात्रा का उद्देश्य भी स्पष्ट किया गया है, ‘यह यात्रा केवल राम-जानकी की कथा से जुड़े स्थलों को देखने के लिए नहीं की गई थी, न ही उसका उद्देश्य रामायण की कथा के भौगोलिक विस्तार के प्रमाण को खोजने के लिए की गई थी। रामायण की, राम-जानकी की कथा का, भारत के जन जीवन में जो महत्वपूर्ण स्थान है, लोक चित्त जिस प्रकार उस कथा से जुड़कर ही अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान बनाता है उसको रेखांकित करने का प्रयास था।‘ इस यात्रा में शामिल सत्रह लेखकों ने अपने अपने अनुभवों को कलमबद्ध किया था जो ‘जन जनक जानकी’ नाम के पुस्तक में संकलित किया गया था। अब यह पुस्तक अपने मूल स्वरूप में उपलब्ध नहीं है।

जब अज्ञेय जी ने इस यात्रा की योजना बनाई थी तब इसको लेकर कई तरह की चर्चा भी चली थी। इसपर सवाल भी खड़े हुए थे। वो वामपंथ का दौर था और वामपंथी इतिहासकार भारतीय पौराणिक चरित्रों को लगातार मिथक कहकर प्रचारित और स्थापित कर रहे थे। वैसे समय में अज्ञेय ने सीतामढी से लेकर अयोध्या और फिर अयोध्या से चित्रकूट तक की ‘जानकी जीवन यात्रा’ का आयोजन करके एक तरह से वामपंथियों को सांस्कृतिक मोर्चे पर चुनौती भी दी थी। यात्रा के पहले अज्ञेय ने पटना में आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा भी था कि, ‘महाकाव्य-चेतना राष्ट्र एवं मनुष्य मात्र की भावनात्मक एकता को सार्थक और गतिशील बनाती है। लोकजीवन की प्रेरणा हमेशा से शाश्वत काव्य की उदगम भूमि रही है, आज भी राष्ट्र और मनुष्य मात्र की भावनात्मक एकता को शाश्वत सांस्कृतिक धरातल पर प्रतिष्ठित करने के लिए महाकाव्य-चेतना की अंतर्निहित शक्ति की पुन: खोज करनी पड़ेगी। ‘सीयराममय पथ’ पर अग्रसर होने का सामूहिक संकल्प इसी दिशा में प्रगति का एक संकल्प है।‘ एक लेख में जितेन्द्र सिंह ने लिखा था- ‘आजकल प्राचीन भारतीय इतिहास के विख्यात विद्वान इस विषय पर तीखी बहस चला रहे हैं कि क्या वाल्मीकि रामायण या तुलसीकृत रामचरितमानस में वर्णित मूल कथा अधिक ऐतिहासिक और पुरातन है अथवा वेदव्यास रचित महाभारत की कथा?’ इसके अलावा इस बात पर भी चर्चा हो रही थी कि क्या साहित्य से या पौराणिक ग्रंथों से इतिहास के संकेत मिलते हैं? अज्ञेय इन प्रश्ऩों से सीधे तो नहीं टकरा रहे थे लेकिन परोक्ष रूप से वो ये संकेत करना चाहते थे कि ‘हमारे रचनाकार इतिहास के घटनाचक्र और उसके अनुक्रम से अधिक महत्व माहाकाव्यों के गाथाओं में गुंफित लोकजीवन के शाश्वत सत्य को मानते हैं।‘ इन बातों से ये भी स्पष्ट होता है कि हमारे रचनाकारों में अपने लोक जीवन के तत्वों को लेकर कितनी गहरी आस्था हुआ करती थी। 

‘जानकी जीवन यात्रा’ को ज्यादा समय नहीं बीता है। अड़तीस साल पहले की गई इस महत्वपूर्ण यात्रा और उस यात्रा के बाद लिखे गए लेखों पर आधारित पुस्तक का उपलब्ध ना होना भी कई प्रश्न खड़े करता है। मन में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठता है कि क्या साहित्य के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना को हाशिए पर डालकर उसको विस्मृत करने का षडयंत्र तो नहीं रचा गया। यह अनायस नहीं है कि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के ‘कल्याण’ पत्रिका में छपे लेखों पर चर्चा नहीं होती, उसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। निराला को वामपंथी साबित करने के लिए उनकी कविताओं की तमाम तरह की व्याख्या हमारे सामने है लेकिन ‘कल्याण’ के ‘कृष्ण भक्ति अंक’ में लिखा उनका लेख नहीं मिलता। दो साल पहले पटना पुस्तक मेला के दौरान हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी ने एक अनौपचारिक बातचीत में बताया था कि वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘श्रृंगार हाट’ नाम से एक पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक में पौराणिक काल में स्त्रियों के श्रृंगार की विधियों का वर्णन है।  ये पुस्तक भी उपलब्ध नहीं है। इस तरह के कई और उदाहरण हैं जहां हिंदी के पूर्वज लेखकों की उन रचनाओं को दरकिनार करने की कोशिश की गई जिसमें भारतीयता और हिंदू धर्म प्रतीकों के बारे में बात की गई हो। हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों पर वामपंथियों का लंबे समय से कब्जा है लिहाजा इन विषयों पर शोध कार्य भी नहीं हो सका। नतीजा यह हुआ कि जो पुस्तकें वामपंथी विचारधार का पोषण नहीं करती थीं और जिनमें भारतीयता और यहां के लोक-तत्व मिलते थे वो ओझल होते चले गए। जब पुस्तकें पाठकों के सामने आएंगीं नहीं तो उनको कोई पढ़ेगा कैसे, जब पढ़ेगा नहीं तो उसकी चर्चा कैसे होगी और जब चर्चा नहीं होगी तो उसकी व्याप्ति कैसे होगी, जब व्याप्ति नहीं होगी तो प्रकाशकों की रुचि नहीं होगी और अंतत: उसका पुनर्प्रकाशन नहीं होगा और वो अनुपलब्ध हो जाएंगी। नई पीढ़ी को पता ही नहीं चल पाएगा कि उनकी समग्र साहित्यिक विरासत क्या है, उऩके सामने जो होगा उसको ही वो साहित्यिक विरासत मान लेगें। अपनी देश के लेखन की विरासत से पीढ़ियों को दूर करने का या उसके बारे में उनको अंधेरे में रखने का जो अपराध पूर्व में हुआ है, उसके लिए किसी को दंडित तो नहीं किया जा सकता है। उसका प्रायश्चित तो किया ही जा सकता है। प्रायश्चित इस रूप में कि उन अनुपलब्ध पुस्तकों को आधुनिक रूप में प्रकाशित करके युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का उपक्रम हो । अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल हमारी नई पीढ़ी अपनी ज्ञान परंपरा से परिचित होगी और वो समग्र ज्ञानार्जन से अपेक्षाकृत बेहतर कर पाने में सक्षम हो पाएगी। इस काम में सरकार की सांस्कृतिक संस्थाओं को पहल करनी चाहिए और इस संकट के समय में जितनी पौराणिक पुस्तकें लोगों के पास पहुंच रही हैं उसको जमा कर, उसकी प्रामाणिकता जांचने के बाद उसको प्रकाशित करने की दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। 

Saturday, April 10, 2021

परंपरा के पुनर्स्थापन का हो प्रयास


देशभर में कला, संस्कृति और भाषा से जुड़ी कई इमारतें हैं जिनका अपना एक इतिहास है। चाहे वो दिल्ली का त्रिवेणी कला संगम हो, श्रीराम सेंटर हो, रवीन्द्र भवन हो या भोपाल का भारत भवन हो, मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी या पृथ्वी थिएटर हो। ये सूची बहुत लंबी हो सकती है। इस तरह की इमारतों से या इनमें होनेवाली गतिविधियों से उस शहर की कला और संस्कृति प्रेम का एक लैंडस्केप बनता है। एक ऐसा लैंडस्केप जिससे वहां के लोगों की रुचियों का आभास भी मिलता है। दिल्ली में अभी हाल ही में एक कला संकुल का लोकार्पण हुआ, नाम है संस्कार भारती कला संकुल। इसमें कला दीर्घा से लेकर कई हॉल हैं जहां बैठकर कला संस्कृति के विभिन्न विषयों पर चर्चा आदि हो सकती है। ये उम्मीद की जानी चाहिए कि इस कला संकुल से देश की राजधानी का सांस्कृतिक लैंडस्केप और बेहतर होगा। भविष्य में जो होगा उसके बारे में तो उम्मीद ही जताई जा सकती है लेकिन जो सामने घटता है उसपर चर्चा की जा सकती है। संस्कार भारती कला संकुल के लोकार्पण समारोह के दौरान जो बातें कही गईं उस पर ध्यान गया ।संस्कार भारती कला संकुल का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने किया था। कोरोना की वजह से कला संकुल के परिसर में ही समारोह हुआ था। इसके लोकार्पण समारोह में मोहन भागवत ने भारतीय कला और कला परंपरा को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। मोहन भागवत ने कहा कि भारत की कला रंजन मात्र नहीं है। वो इसके उद्गम को ओमकार के उच्चरण से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने कला को परिभाषित करते हुए न केवल इसको एक दार्शनिक रूप दिया बल्कि उसको समकालीन समस्याओं से जोड़ने का प्रयास भी किया। कला को परिभाषित करने के क्रम में मोहन भागवत ने इतिहास में भी आवाजाही की और उसको सत्य और शिवत्व की अभिव्यक्ति और अनुभूति से जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम के देशों में मनोरंजन को सुख से जोड़ा गया जबकि हमारे यहां इसको आंतरिक अनुभूति से जोड़कर एक पूर्णता का दर्शन प्रतिपादित किया गया। पश्चिम में कला से जो रंजन होता है उससे भौतिक सुख की प्राप्ति होती है लेकिन उस भौतिक सुख में एक अधूरापन भी महसूस होता है। जबकि भारतीय कला में जो शक्ति है वो मनुष्य को उसके मूल तक ले जाती है और वहां जो सुख की भावना पैदा होती है वो मानव मन में उपजनेवाले अधूरेपन को दूर करने का रास्ता दिखाती है। यह उल्लास से शांति की ओर ले जाती है। मोहन भागवत ने विस्तार से कला के संस्कारों और समाज पर उसके प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। 

कला संकुल के शुभारंभ के अवसर पर कला को लेकर कही गई बातों पर अगर हम विचार करें तो इसके सूत्र हमको काफी पीछे लेकर जाते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ने भी भारतीय कला पर विचार करते हुए लिखा है, ‘वैदिक काल से धर्म और कला का घनिष्ठ संबंध बना रहा है। धर्म और दर्शन के उदार क्षेत्र में संयम और तप के जिन आदर्शों की कल्पना समय-समय पर प्रकट होती रही, उसी को मूर्तिमान रूप में जनता के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कलाकारों ने प्रयत्न किया। एक प्रकार से भारतीय धर्म, जीवन की पूर्णता को लिए हुए, नृत्य, गीत, अभिनय और कला की प्रवृत्तियों में फला-फूला। इसका प्रभाव धर्म और जीवन दोनों पर अच्छा हुआ। धर्म के प्रांगण में वसंत लक्ष्मी की शोभा का अवतार कला से हुआ। दूसरी ओर धर्म के निर्मल आदर्शों को प्राप्त करके कला का स्वरूप निखर गया।‘ वासुदेव शरण अग्रवाल भी ये मानते हैं कि ‘शिव की सत्ता मणि-दीप की तरह कला के प्रासाद को आलोकित करती है।‘ वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारत की कला और संस्कृति को लेकर विपुल लेखन किया है और स्थापना दी है कि कला, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समाज को उस दिशा में ले जाने का काम करती है जहां पूर्णता की अनुभूति हो। 

कला का यह स्वरूप हमारे समाज में बहुत लंबे समय तक चला। जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ तो अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए लेकिन हम उनकी जीवन शैली की बहुत सारी बातों को आधुनिकता मानकर या समझकर अपनाने लगे थे। बाद के वर्षों में ये और भी ज्यादा बढ़ा। हमने पश्चिम के देशों का अंधानुकरण करना आरंभ किया। ये अंधानुकरण इस वजह से भी होने लगा कि हमारा समाज नए के प्रति आस्थावान होने लगा था। नए के प्रति आसक्ति गलत नहीं है लेकिन नए और पुराने में एक संतुलन होना चाहिए था। नए को अपनाने और पुरान को छोड़कर आगे बढ़ने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से हमसे हमारी परंपरा का सिरा छूटने लगा था। हम आधुनिकता के नाम पर और बाद के दिनों में उत्तर आधुनिकता के नाम पर अपनी कला को भी उधर मोड़ने लगे थे। जब देश में मार्क्सवाद का जोर बढ़ा तो इस दर्शन से प्रभावित लोगों ने उसकी मान्यताओं को, सिद्धातों को साहित्य और कला में भी लागू करना शुरू कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हमारी कला की जो आधारभूत मान्यताएं थीं वो नेपथ्य में चली गईं। इसको कई उदाहरणों से समझा जा सकता है। हमारे देश में चित्रकला या मूर्तिकला की जो परंपरा रही है उसमें सौंदर्य और प्रेम का स्पष्ट चित्रण दिखाई देता है, इसको हिमाचल की चित्र शैली से लेकर राजस्थानी चित्र शैली में देखा जा सकता है। मंदिरों के प्रांगण में बनी मूर्तियों में लक्षित किया जा सकता है। राजस्थानी शैली के कई चित्रों में स्त्री मन के प्रेम का एक अटूट प्रवाह दिखाई देता है। कालांतर में इसकी जगह ऐसी चित्रकलाओं ने ले लिया जिनको समझने के लिए जतन करना पड़ता था। उसी दौर में कुछ ऐसे चित्रकार भी हुए जो मार्क्सवाद के दर्शऩ से प्रभानित थे, उन्होंने देश की आस्था को अपमानित करनावाले चित्र भी बनाए। उन चित्रों पर विवाद तो हुआ, चित्रकार ने सुर्खियां भी बटोरीं लेकिन कला समृद्ध न हो पाई। कुछ इसी तरह की बात साहित्य में भी रेखांकित की जा सकती है। हमारे यहां जिस तरह की कविताएं लिखी जाती थीं जिसमें एक गेयता होती थी बाद में आधुनिकता के नाम पर या नए के नाम पर ऐसी कविताएं लिखी जाने लगीं जो गद्य जैसी होती थीं। कविता से लय गायब कर दिया गया। एक दौर में तो भूखी पीढ़ी के नाम से ऐसे लेखक आए जिन्होंने कविता के नाम पर स्तरहीन लेखन किया। आधुनिकता के नाम पर इस तरह के लेखन के बाद साहित्य और कला में उत्तर आधुनिकता का दौर भी आया। ये तो और भी समझ से परे था। आधुनिकता की इस प्रवृत्ति ने कला को अनुभूति से दूर कर दिया। 

संस्कार भारती कला संकुल के शुभारंभ के अवसर पर जिस भारतीय कला और संस्कृति की बात हुई है उसपर कलाप्रेमियों को, कलारसिकों को गंभीरता से विचार करना होगा। भारतीय कला के उस गौरवशाली परंपरा को बढ़ाने के लिए जतन करने होंगे। नए और पुराने के बीच समन्वय और संतुलन बनाकर कला को समृद्ध करना होगा। इस तरह का एक इकोसिस्टम बनाना होगा जिसमें नवोदित कलाकारों का अपनी कला परंपरा से परिचय हो सके। उन बाधाओं को या तत्वों को चिन्हित करना होगा जो आधुनिकता के नाम पर हमारी कला परंपरा को नेपथ्य में धकेलने का काम अब भी कर रहे हैं। संस्कार भारती कला संकुल अगर इस उपक्रम का केंद्र बन पाती है तो ये इमारत न सिर्फ दिल्ली के कला जगत के लैंडस्केप को खूबसूरत बना पाएगी बल्कि पूरे देश के कला जगत को भी एक राह दिखा पाएगी। अन्यथा हमारे महानगरों में उगनेवाले कंक्रीट के जंगलों में तो कई इमारतें बगैर किसी पहचान के निर्जीव खड़ी ही हैं। 

Saturday, April 3, 2021

अकादमिक स्वतंत्रता का खोखला नैरेटिव


2014 में जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी थी तब से कई शब्द प्रचारित किए गए, उसमें सबसे प्रचलित हुआ ‘नेरैटिव’। नैरेटिव खड़ा करने के लिए कई तरह के सिद्धांतों और विश्व प्रसिद्ध विद्वानों के कथन भी बार-बार उद्धृत किए जाते रहे हैं। मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण नैरेटिव खड़ा किया गया वो था ‘असहिष्णुता’ का। इस शब्द को सरकार और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को घेरने के लिए उपयोग में लाया गया। इसकी आड़ ही में कई छोटे-छोटे नैरेटिव और बनाए गए। ‘मॉब लिंचिंग’ से लेकर ‘पोस्ट ट्रूथ’ जैसे शब्दों को प्रचलित कर मोदी सरकार को या यों कहें कि भारतीयता के विचारों के पैरोकारों को, राष्ट्रीयता की बात करनेवालों को नीचा दिखाने की कोशिशें हुईं। असहिष्णुता की आड़ में ही पुरस्कार वापसी का प्रपंच रचा गया और उसका इतना शोर मचाया गया कि सरकार के बड़े मंत्रियों को इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ी थी। असहिष्णुता का जो नैरेट्व खड़ा किया वो ‘मैनफैक्चरिंग कसेंट’ के सिद्धांत के करीब नजर आता है। उन्नीस सौ अठासी में एडवर्ड हरमन और नोम चोमस्की की एक किताब आई थी जिसका नाम था, ‘मैनुफैक्चरिंग कसेंट, द पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ द मास मीडिया’। इस किताब में ‘व्यवस्थित प्रोपगैंडा’ और ‘मैनफैक्चरिंग कसेंट’ यानि सहमति निर्माण के बारे में बात की गई है। किसी विषय विशेष को लेकर इस तरह का माहौल बनाया जाए या प्रोपगैंडा किया जाए ताकि आम जनता की उस मुद्दे को लेकर सहमति निर्मित की जा सके। असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी को इस विचार की कसौटी पर कसते हैं तो साफ तौर पर ये सिद्ध होता है कि ये पूरा नैरेटिव व्यवस्थित और सुनियोजित प्रोपगैंडा पर आधारित था। असहिष्णुता का मुद्दा दो हजार पंद्रह के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले उठाया गया था और बेहद सुनियोजित तरीके से उसको इस तरह से फैलाया गया था कि परोक्ष रूप से उसका राजनीति लाभ उठाया जा सके। विधान सभा चुनाव के बाद ये मुद्दा शांत भी हो गया था। नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान सहमति निर्माण करने की कई कोशिशें हुईं। इस तरह के प्रोपगैंडा को अंतराष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाले संगठनों और व्यक्तियों का भी साथ मिलता है। पीईन इंटरनेश्नल और रैंकिंग देने वाले अन्य अंतराष्ट्रीय संगठन इस तरह के प्रोपगैंडा में शामिल होते रहे हैं। अपनी रिपोर्टों के माध्यमों से वो सहमति निर्माण के लिए जमीन तैयार करते हैं। 

असहिष्णुता के बाद सरकार के विरोधियों, जिनमें वामपंथियों और अशोक वाजपेयी जैसे नव-वामपंथी भी शामिल रहे हैं, ने ‘फासीवाद’ से लेकर ‘अघोषित आपातकाल’ जैसे मसलों पर नैरेटिव खड़ा करने की कोशिशें कीं। दरअसल इस तरह के लोग अपने राजनीतिक आकाओं के लिए परोक्ष रूप से राजनीति का औजार बनते रहे हैं। जब भी कोई चुनाव आता है तो इनको देश में फासीवाद की आहट सुनाई देने लगती है, देश में अघोषित आपातकाल जैसा माहौल दिखने लगता है। और इन सबके लिए उनको भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा जिम्मेदार लगने लगती है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान इन सब लोगों ने बहुत जोर शोर से नैरेटिव बनाने का काम किया और कई बार सरकार को बैकफुट पर लाने की कोशिश भी की, लेकिन राष्ट्रीयता और भारतीयता की विचारधारा की ताकत के आगे उनकी ज्यादा चल नहीं पाई। बावजूद इसके खुद को लिबरल विचारधारा के कोष्टक में रखनेवाले ये लोग हार नहीं मानते हैं और जब भी कोई अवसर दिखाई देता है तो नैरेटिव खड़ा करने के काम में लग जाते हैं। असहिष्णुता के बाद जो सबसे मजबूत नैरेटिव बनाने की कोशिश हुई वो थी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर खतरे को लेकर। इसको कला और साहित्य जगत से जोड़कर इस तरह से पेश किया गया कि जैसे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार बाधित की जा रही हो या फिर कलात्मक स्वतंत्रता को रोका जा रहा हो। इसके लिए मसखरी करनेवाले हास्य कवियों या कॉमेडियनों को लेकर हुए केस मुकदमों को आधार बनाने की कोशिशें भी हुईं। सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने वालों को उम्मीद थी कि दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी कमजोर होगी। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया और राष्ट्रवादी विचारधारा को देश की जनता ने और मजबूती प्रदान की और भारतीय जनता पार्टी दो हजार चौदह के मुकाबले ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करके और मजबूत हुई। 

दो हजार उन्नीस के चुनावों में मोदी की अगुवाई में हुई जीत से इन कथित उदारवादियों को धक्का तो लगा लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी। वो लगातार अपने काम में लगे रहे। विधान सभा चुनावों के वक्त भी उन्होंने फिर से अघोषित आपातकाल से लेकर दलितों के खिलाफ अत्याचारों को लेकर नैरेटिव बनाने का खेल खेला और उनको सहमति निर्माण में आंशिक सफलता मिली। कुछ राज्यों में भारतीय जनता पार्टी चुनाव हार गई। ये हिदुत्व के खिलाफ भी माहौल बनाते हैं लेकिन जब उग्र हिंदुत्व की पैरोकारी करनेवाली शिवसेना और कांग्रेस महाराष्ट्र में साथ मिलकर सरकार बनाती है तो इन कथित उदारवादियों के मुंह सिल जाते हैं, कलम खामोश हो जाती है। दरअसल ये इस तरह का भावनात्मक मुद्दा उठाते हैं कि जनता इनके झांसे में आ जाती है। ‘लव जिहाद’ जैसे मुद्दे को इन्होंने प्यार पर पहरे से जोड़ने की कोशिश की लेकिन जब उसका विकृत रूप लगातार समाज के सामने आने लगा तो उन्होंने बेहद चतुराई के साथ इस मुद्दे पर अपनी मुखरता कम कर दी। उदारवाद के नाम पर जिस तरह की स्वच्छंदता ये चाहते हैं वो भारतीय संस्कृति या परंपराओं के खिलाफ जाती है और हमारा समाज अभी इसको स्वीकृत नहीं करता है। 

अब जब पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं तब इन कथित उदारवादियों ने एक बार फिर से प्रोपगैंडा के तहत सहमति निर्मित करने की कोशिशें आरंभ कर दी हैं। इस बार इन लोगों ने जो विषय उठाया है वो है ‘अकादमिक स्वतंत्रता’ का। अब ये आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालयों से लेकर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) तक के काम काज में दखल दे रही हैं और अपने विरोधियों को किनारे लगाने का संगठित काम कर रही है। हद तो तब हो गई जब इन लोगों ने एक निजी विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के इस्तीफे को भी अकादमिक स्वतंत्रता से जोड़कर केंद्र सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए। दरअसल अकादमिक स्वतंत्रता का मुद्दा इनके लिए एक ऐसा प्रोपगैंडा है जिसकी आड़ में ये भारतीय जनता पार्टी के विरोधियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। आज ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर शिक्षा जगत में हस्तक्षेप का आरोप लगा रहे हैं लेकिन ये लोग वो दिन भूल गए जब विश्वविद्यालयों में उनकी ही नियुक्तियां हुआ करती थीं जो लेफ्ट पार्टी के कार्ड होल्डर होते थे या उनके संगठनों के सक्रिय सदस्य हुआ करते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर देश के ज्यादातर सरकारी विश्वविद्यालयों ने वर्षों तक ये दौर देखा है। कई प्रतिभाशाली व्यक्तियों को सिर्फ इसलिए उचित जगह नहीं मिल पाई क्योंकि वो वाम का डंडा-झंडा लेकर नहीं चले। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद और ऐसे ही अन्य संस्थानों में किस तरह की अकादमिक स्वतंत्रता रही है ये अब पूरे देश को मालूम हो चुका है। नेशनल प्रोफेसरों से लेकर संस्थानों के अध्यक्षों तक की नियुक्तियों में क्या क्या हुआ है वो सब अभिलेखों में दर्ज है। इसलिए जब अकादमिक स्वतंत्रता की बात होती है तो वो खोखली लगती है। ‘कसेंट मैनुफैक्चरिंग’ के ये औजार अब भोथरे हो चुके हैं क्योंकि ये देश अब कथित उदारवादियों की इन चालों को समझ चुका है और उनके झांसे में आनेवाला नहीं है। 

Tuesday, March 30, 2021

समकालीन लेखन के केंद्र में पौराणिक चरित्र


पिछले दिनों दो पुस्तकें एक साथ आईं जिसने बरसबस अपनी ओर ध्यान खींचा। एक पुस्तक है लेखिका कोरल दास गुप्ता की ‘अहिल्या’ और दूसरी है ‘उर्मिला: सीता की बहन की गाथा’ जिसे कविता काणे ने लिखा है। इन दो पुस्तकों के अलावा भी कई ऐसी पुस्तकें आई हैं जो भारतीय पौराणिक चरित्रों को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं। दरअसल पिछले कई सालों में अंग्रेजी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में पौराणिक चरित्रों पर ढेरों पुस्तकें लिखी गई हैं। हिंदी में भी लेखकों ने इन चरित्रों को विषय बनाना शुरू कर दिया है। समकालीन साहित्यिक परिदृष्य के विश्लेषण से पौराणिक लेखन की ये प्रवृत्ति साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है, ये एक नया ट्रेंड है। आज से अगर तीन दशक पहले के हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य को याद करें तो नरेन्द्र कोहली और मनु शर्मा जैसे लेखक ही थे जो पौराणिक कथाओ और चरित्रों को अपने लेखन का विषय बनाते थे। हिंदी में नरेन्द्र कोहली के अलावा कन्नड़, मलयालम और तमिल में पौराणिक पात्रों पर विपुल और उच्च स्तरीय लेखन हुआ है। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में साहित्य सृजन के आकाश पर अमीश त्रिपाठी का उदय होता है। उन्होंने शिवत्रयी की पहली किताब ‘द इममॉर्टल्स ऑफ मेलुहा’ लिखा। अंग्रेजी में लिखी इस औपन्यासिक कृति की सफलता ने अमीश को चर्चित लेखक के तौर पर स्थापित कर दिया। 

इन दिनों ये भी लक्षित किया जा सकता है कि भारतीय भाषाओं में पौराणिक पात्रों को लेकर स्वतंत्र पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन हो रहा है। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में वर्णित पात्रों पर स्वतंत्र रूप से किताबें लिखी जा रही हैं। ना केवल पात्रों बल्कि घटनाओं और स्थानों को केंद्र में रखकर भी लेखन हो रहा है। इन पुस्तकों को पाठक भी मिल रहे हैं। पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए प्रकाशकों ने भी पौराणिक कथाओं और स्थितियों पर पुस्तकें लिखवाने का कार्य आरंभ कर दिया, निवेश भी किया। इससे उत्साहित होकर कई नए लेखक भी पौराणिक चरित्रों में कथालेखन का सूत्र ढूंढने लगे। डॉ विनीत अग्रवाल ने ‘परशुराम’ और ‘विश्वामित्र’ जैसे पौराणिक पात्रों को केंद्र में रखकर स्वतंत्र पुस्तकें लिखी। इस तरह की लगभग सारी पुस्तकें पौने दो सौ से लेकर तीन सौ पृष्ठों की होती है। पौराणिक चरित्रों को लेकर जितना भी लेखन हो रहा है उनमें से ज्यादातर के मूल में हमारे दो पौराणिक ग्रंथ हैं- रामायण और महाभारत। रामायण में तो पात्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन महाभारत में ढेर सारे पात्र हैं जिनपर अलग पुस्तक लिखी जा रही है। शिखंडी, शकुनि, अश्वत्थामा से लेकर द्रौपदी और दुर्योधन तक पर औपन्यासिक कृति सामने आ रही है। आशुतोष नाड़कर ने ‘शकुनि’ पर किताब लिखी। इस किताब में उन्होंने शकुनि के चरित्रों के विभिन्न आयामों पर लिखा है। प्रेरणा लिमड़ी ने अश्वत्थामा पर एक मुक्कमल किताब लिख दी ‘श्रापित यात्री की अंतहीन यात्रा अश्वत्थामा’। ये पुस्तक पहले गुजराती में प्रकाशित होकर चर्चित हो चुकी थी। बाद में इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ। अश्वत्थामा के चरित्र के साथ कई किवदंतियां भी जुड़ी हैं। इस किताब में उसको भी लेखिका ने छुआ है। कुछ ऐसी पुस्तकें भी आ रही हैं जो ये दावा करती हैं कि वो काल्पनिक हैं लेकिन अपने शीर्षक और अपनी कथावस्तु,कथाभाषा और कालखंड से पाठकों को ये एहसास दिलाती है कि वो कोई पौराणिक कथा है। जैसे विवेक कुमार ने पिछले दिनों एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था ‘अर्थला’। इसको संग्राम सिंधु गाथा के तौर पर पाठकों के सामने पेश किया। लेखक ने लिखा कि ‘यह कथा किसी पुराण में नहीं मिलेगी। यह मेरी कथा है। मैं आपको कोई लोकप्रचलित इतिहास नहीं बताने जा रहा । मैं आपको अपनी कल्पना के धरातल पर खड़ा करना चाहता हूं। वह कल्पना जो मुझे प्रेरित करती है, उत्तेजित करती है, नई सुगंध देती है और इस संसार को देखने का एक विस्तृत, सुंदर और निष्पक्ष दृष्टिकोण सौंपती है।‘ लेखक भले ही कहानी के काल्पनिक होने का दावा करे लेकिन इसको जम्बूद्वीप की सबसे बड़ी रणगाथा बताया गया। देवासुर संग्राम भी कहा गया। कहना ना होगा कि बाजार पौराणिक कथाओं में रुचि ले रहा है लिहाजा लेखक भी उसकी ओर उन्मुख हो रहे हैं। और अब तो वेदों और पुराणों तक में वर्णित पात्रों को लेकर लिखने की भी शुरुआत हो चुकी है। वेद में वर्णित स्त्री पात्रों मैत्रेयी, गार्गी और अपाला पर स्वतंत्र पुस्तकों के आने की चर्चा है। ना सिर्फ वीर और दैवीय चरित्रों पर पुस्तकें आ रही हैं बल्कि असुरों पर भी किताबें लिखी जा रही हॆं। आनंद नीलकंठन ने तो अपने लेखन से एक नया जॉनर ही विकसित कर लिया। वो तो असुर श्रृंखला के अंतर्गत पुस्तकें लिख रहे हैं जिसको आलोचक एक वैकल्पिक साहित्यिक विमर्श के तौर पर भी देख रहे हैं। 

सवाल यह उठता है कि हाल के दिनों में वो क्या वजहें रहीं जिससे इस तरह के लेखन को बढ़ावा भी मिला और पसंद भी किया जाने लगा। अगर हम इसपर गंभीरता से विचार करें तो देश का जो माहौल होता है और जिसकी व्यापक चर्चा होती है लोग उसके बारे में जानना चाहते हैं। उनके अंदर उन बातों को जानने की उत्सुकता पैदा होती है। एक दौर वो भी था जब देश में वामपंथी-समाजवादी सोच का डंका बजा करता था। उस सोच के अंतर्गत इस तरह की चर्चा होती थी जिसमे देसी से अधिक विदेशी लेखकों विद्वानों विचारकों और स्थितियों रिस्थितियों के बारे में विमर्श होता था। विदेशी ज्ञान परंपरा पर अधिक बातें होती थीं।  तब लोग वैश्विक चरित्रों के बारे में ज्यादा जानना चाहते थे इस वजह से उन दिनों उस तरह का लेखन होता था। फिर देश ने सोवियत रूस की सस्ती और अनुदित किताबों को पढ़ना शुरू किया। ये पुस्तकें एक खास मकसद से खास विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध करवाई जा रही थी। यह अकारण नहीं है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में जब प्रेमचंद पढ़ाया जाता है तो मैक्सिम गोर्की भी साथ याद किए जाते हैं खास तौर पर अपनी पुस्तक मां को लेकर। इस दौर में भारतीय पौराणिक पात्रों और चरित्रों को मिथक कहकर इस अवधारणा को स्थापित करने की कोशिशें भी हुईं। 

समय बदला देश की राजनीति ने करवट ली । पिछले दो दशक से भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में बातें शुरू हो गईं। अपने पौराणिक ग्रंथों के बारे में विचार और शोध होने लगे। भारतीय प्राच्य विद्या को लेकर एक उत्सुकता का माहौल बना। भारतीय राजनीति में जब वामपंथी विचार को वैकल्पिक विचार से चुनौती मिली तो कई राजनेताओं की तुलना पौराणिक चरित्रों से होने लगीं। इन सबका सामूहिक असर ये हुआ कि लोगों के मन में इन सबके बारे में जानने की इच्छा उत्पन्न हुई। लोग खोजने लगे कि अमुक चरित्र कौन था और उसका नाम अमुक नेता से क्यों जोड़ा जा रहा है। जानने की इस कोशिश का एहसास जब भारतीय लेखकों को और प्रकाशकों को हुआ तो पुस्तकों का प्रकाशन शुरू हो गया। आज ना केवल इन चरित्रों को लेकर काल्पनिक कथाएं सामने आ रही हैं बल्कि इनमे से कई चरित्रों को लेकर शोध भी किए जाने लगे हैं। विश्वविद्यालयों में जहां एक दौर में रामायण और महाभारत के चरित्रों को मिथक करार देकर उनको हाशिए पर डाला गया था उन्हीं विश्वविद्यालयों में अब इन चरित्रों को लेकर गोष्ठियां और सेमिनार हो रहे हैं। यह हिंदी साहित्य जगत के लिए या यों कहें कि भारतीय सृजनात्मकता के लिए बेहतर स्थिति है। लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि पौराणिक चरित्रों के बारे में गंभीरता से शोध हो, हमारे प्राचीन ग्रंथों को पाठ्यक्रमों में शामिल करके आनेवाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित करवाया जाए। 

Saturday, March 20, 2021

लोककलाओं के नाम पर मुनाफे का खेल


कुछ दिनों पहले बिहार पुलिस ने अश्लील भोजपुरी गाने की रचना करने और उसको प्रचारित प्रसारित करने के आरोप में गायक अजीत बिहारी के खिलाफ केस दर्ज करके उनको गिरफ्तार किया। इसके पहले बिहार सरकार ने गानों के माध्यम से अश्लीलता फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया था। दरअसल इंटरनेट मीडिया के फैलाव के बाद कला के नाम पर अराजकता बहुत अधिक बढ़ गई है। ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर भी इस तरह की बातें सामने आ रही थीं। काफी दिनों तक चले विमर्श और हाल के दिनों में मचे बवाल के बाद सरकार ने वेब सीरीज या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले कार्यक्रमों को लेकर दिशा निर्देश जारी किए थे। इन दिशा निर्देशों को सर्वोच्च न्यायालय ने नख-दंत विहीन बताया था और उसको और अधिक प्रभावी बनाने की अपेक्षा की थी। इस पर कार्य चल रहा है। अब जब बिहार सरकार ने इंटरनेट मीडिया पर अश्लील सामग्री को लेकर कार्रवाई की है तो इस बात पर बहस होनी चाहिए कि कला के नाम पर इंटरनेट पर चल रहे विभिन्न प्लेटफॉर्म पर किस हद तक छूट मिलनी चाहिए। सिनेमा और गानों के नाम पर इन माध्यमों पर अश्लीलता परोसने को लेकर सरकार को नए सिरे से दिशा निर्देश जारी करने की भी जरूरत है। विचार इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि वीडियो प्लेटफॉर्म्स पर लोड किए जानेवाले वीडियो में इसके निर्माता किस हद तक जा सकते हैं। असीमित आजादी बहुधा अराजकता को जन्म देती है। 

विचार भोजपुरी फिल्मों और गानों से जुड़े लोगों को भी करना चाहिए कि आज भोजपुरी सिनेमा किस राह पर चल रही है। भोजपुरी सिनेमा का एक समृद्ध इतिहास रहा है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने एक जलसे के दौरान भोजपुरी में फिल्म निर्माण की बात की थी। नकी प्रेरणा से ही भोजपुरी में पहली फिल्म बनी थी जिसका नाम था गंगा ‘मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’। इस फिल्म में भोजपुरी की संस्कृति जीवंत हो उठी थी। इस फिल्म का निर्माण नाजिर हुसैन ने विश्वनाथ शाहाबादी के साथ मिलकर किया था। ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’ में लोक संस्कृति के विविध आयाम दिखाई देते हैं।कालांतर में भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता का पर्याय बन कर रह गई। भोजपुरी फिल्मों में लोक संस्कृति को इतना विकृत कर दिया गया कि कई बार गैर-भोजपुरी लोग ये सवाल पूछने लगे कि भोजपुरी की संस्कृति में इस तरह की बातें होती हैं क्या? लोक संस्कृति के नाम पर भद्दे और द्विअर्थी संवाद लिखे जाने लगे, गानों में भी इसी तरह की प्रविधि अपनाई गई। संबंधों की गरिमा को भी भोजपुरी फिल्मों में तार-तार कर दिया गया। भाभी और देवर का संबंध इतना पवित्र होता है कि लोक में भाभी को मां समान दर्जा प्राप्त है। भाभी और देवर के बीच मजाक या हंसी-ठट्ठा के प्रसंग लोकगाथाओं में मिलते हैं लेकिन उसको अश्लीलता की छौंक लगाकर बदनाम कर दिया गया। आज भी बिहार की लोक संस्कृति में गाली का रिवाज है। विवाह के अवसर पर ‘गारी’ गाई जाती है, लेकिन जब ‘गारी’ यानि गालियों से भरे गीत गाए जाते हैं तो उससे अश्लीलता का एहसास नहीं होता। जब इन्हीं गालियों को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए और मुनाफा कमाने के लिए अश्लील दृश्यों के साथ पेश किया जाता है तो लोक संस्कृति विकृत रूप में सामने आती है। 

अंग्रेजी में एक जुमला बार बार कहा जाता है कि कंटेंट (सामग्री) और उसको पेश करने के इंटेंट (मंशा) को साथ मिलाकर ही किसी कला का मूल्यांकन किया जाता है। जब ऐसा होता है तभी किसी कला की वैसी तस्वीर उभर कर सामने आती है जो समग्र मूल्यांकन का आधार बनती है। यहां इंटेंट मुनाफा कमाना है, कला तो कहीं आती ही नहीं है। लोक में व्याप्त रीति-रिवाजों को विकृत करके मुनाफा कमाना कितना उचित है, इसपर बहुत गंभीरता से विचार करना चाहिए। देशभर में लोक कला और संस्कृति के लिए काम करनेवाली कई संस्थाएं और संगठन हैं। इनके कर्ताधर्ताओं को इस बात को लेकर उद्वेलित होना चाहिए कि भोजपुरी जैसी महान संस्कृति को भ्रष्ट करने का ये उपक्रम क्यों चल रहा है। कलात्मक आजादी की वकालत करनेवालों ने कला के नाम पर अश्लीलता और फूहड़ता को बढावा देनेवाले इस तरह के गानों और फिल्मों पर कभी चिंता प्रकट की हो, ज्ञात नहीं हो सका। 

फिल्मों के अलावा जब इंटरनेट का विस्तार हुआ और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर चलनेवाले चैनलों को हिट्स के हिसाब के पैसे मिलने लगे तो इस अश्लीलता और फूहड़ता को पंख लग गए। यौनिकता को फिल्मी आवरण या अश्लीलता को परंपरा का बाना पहनाकर बेचना आसान हो गया था। चूंकि इस माध्यम पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध या नियम नहीं है लिहाजा ये प्रवृत्ति और बढ़ती चली गई। एक जमाना था जब लता मंगेशकर और रफी जैसे समर्थ गायक भोजपुरी के गाने गाते थे और शैलेन्द्र और मजरूह जैसे गीतकार भोजपुरी के गाने लिखा करते थे।1965 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था ‘भौजी’ । इसका एक गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था जिसके बोल थे, ‘ए चंदा मामा आरे आबा पारे आबा नदिया किनारे आबा’ जिसको स्वर दिया था लता मंगेशकर ने। ये गाना बेहद खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है। लता मंगेशकर ने संगीत निर्देशक चंद्रगुप्त के साथ कई बेहतरीन भोजपुरी गाने गाए हैं। 

हर देश की हर समाज की अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं, पहली जिम्मेदारी तो लोगों की होती है कि वो अपनी परंपराओं और विरासत को बचाकर रखें लेकिन अगर ये नहीं हो पाता है तो सरकार की भूमिका शुरू होती है। कानून बनाने की जरूरत तभी होती है जबकि अपराध बढ़ने लगता है। इस माध्यम पर कला के नाम पर फैल रही अश्लीलता को रोकने के लिए फिल्मों और मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोगों को भी आगे आना होगा। अश्लीलता बेचकर मुनाफा कमाने की प्रवृत्तिवाले लोगों की पहचान करके उनको रोकने के लिए उनपर दबाव भी बनाना होगा। अन्यथा फिल्म और गीत संगीत के नाम पर जारी ये खेल लोक संस्कृति को इतना नुकसान पहुंचा देगा कि इसकी भारपाई संभव नहीं हो पाएगी। 

Saturday, March 13, 2021

विवादों से दूर जाते साहित्यिक पुरस्कार


साहित्य अकादमी ने हिंदी कवयित्री अनामिका को उनके कविता संग्रह ‘टोकरी में दिगंत, थेरीगाथा’ पर पुरस्कार देने की घोषणा की है। इसी तरह अंग्रेजी कवयित्री अरुंधति सुब्रहमण्यम को भी साहित्य अकादमी सम्मान की घोषणा की गई है। हिंदी कविता में तो स्त्री स्वर को पहली बार साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया है। अनामिका और अरुंधति का नाम जब पुरस्कृत होनेवाले रचनाकारों की सूची में देखा तो मेरा ध्यान अकादमी की उस आलोचना की ओर चला गया जिसमें बार बार ये कहा जाता है कि अकादमी अब कृति को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि लेखकों की उम्र को ध्यान में रखकर पुरस्कृत करती है। पिछले कई वर्ष के पुरस्कारों पर लिखते हुए ऐसा लगा भी था। इस स्तंभ में भी इसका उल्लेख किया जा चुका है। ये प्रश्न दशकों से उठ रहे हैं। उन्नीस सौ तिरासी में जब गुजराती के लेखक सुरेश जोशी को उनकी पुस्तक ‘चिंतयामि मनसा’ के लिए पुरस्कार देने की गोषणा की गई तो उन्होंने पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। सुरेश जोशी का कहना था कि उनकी किताब में छिटपुट लेख हैं, जो पुरस्कार के लायक नहीं हैं। उन्होंने ये भी कहा था कि अकादमी सामान्यतया उन्हीं लोगों को पुरस्कृत करती है जो ‘चुके हुए लेखक’ हैं। तब इसका प्रतिवाद अकादमी के अध्यक्ष वी के गोकाक ने किया था। उन्होंने कहा था कि ‘यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि एक लेखक अपनी रचनात्मक शक्तियों के शिखर पर कब कार्यरत होता है। कब वह बिना चुकी हुई शक्ति होता है? यह कहना मुश्किल होगा। आयु वर्ग को ध्यान में रखते हुए, हम नहीं कह सकते कि मनुष्य तीसवें वर्ष में, चालीसवें वर्ष में, पचासवें या साठवें में अपने लेखन के प्रखर रूप में होता है। हो सकता है कि कुछ अद्भुत ‘लड़के’ चट्टान की तरह हों या थोड़ा उम्रदराज शेली या किट्स की तरह हों। वर्ड्सवर्थ की प्रतिभा का उम्र बढ़ने के साथ ह्रास हुआ लेकिन रवीन्द्रनाथ जैसे लेखक भी थे जिनकी रचनात्मक ऊर्जा सत्तर पार भी अक्षुण्ण रही। उम्र के आधार पर इस तरह प्रतिभा का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। हम अकादमी से यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि लोगों को वह पता लगाने के लिए तैयार करें कब कोई साहित्यिक शक्ति नीचे की ओर जाए और उसे ऊंचाई पर पकड़ ले। साल दर साल पैनल बदलता रहता है और उन्हें उन्हीं साहित्यिक कृतियों को चुनना पड़ता है जो उस खास वर्ष में प्रकाशित पुस्तकों में उत्कृष्ट होती है।‘  अनामिका और अरुंधति को पुरस्कार ‘चुके हुए लेखकों’ को पुरस्कृत करने की धारणा का निषेध करते हैं। अनामिका साठ साल की हैं और अरुंधति तो और भी युवा हैं।

अगर हम सिर्फ हिंदी की कृतियों को देखें जिनको पुरस्कृत करने पर विचार हुआ तो स्थिति और साफ होती है। इस वर्ष पुष्पा भारती की कृति यादें, यादें और यादें, सूर्यबाला की कौन देस को वासी: वेणु की डायरी, ममता कालिया की कल्चर वल्चर, श्रीप्रकाश मिश्र की कि जैसे होना-एक खतरनाक संकेत, केंद्रीय शिक्षा मंत्री की पुस्तक भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपरा, ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास पागलखाना. पंकज चतुर्वेदी का कविता संग्रह रक्तचाप और अन्य कविताएं, दया प्रकाश सिन्हा का नाटक सम्राट अशोक, जानकी प्रसाद शर्मा की आलोचनात्मक कृति उर्दू अदब के सरोकार, नीरजा माधव की पुस्तक देनपा:तिब्बत की डायरी, विजय बहादुर सिंह का कविता संग्रह अर्धसत्य का संगीत, मदन कश्यप का कविता संग्रह अपना ही देश और अनामिका के कविता संग्रह पर जूरी के सदस्यों ने विचार किया। बताया जा रहा है कि इस बार जूरी के सदस्यों के बीच लंबे समय तक मंथन होता रहा। खासतौर पर अनामिका और दयाप्रकाश सिन्हा की कृतियों की उत्कृष्टता को लेकर लंबा विमर्श हुआ। अंतत: जूरी ने सर्वसम्मति से अनामिका की कृति को पुरस्कृत करने का फैसला लिया।  

वर्ष दो हजार बीस की सूची को देखकर ऐसा लगता है कि इसमें हर उम्र के लेखकों की अपेक्षाकृत बेहतर कृतियां हैं, एक दो को छोड़कर। इस वजह से इस बार साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर विवाद नहीं उठा है। 

पूर्व में साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर जिस तरह के प्रसंग उसके इतिहास में दर्ज हैं उससे तो लगता है कि विवाद सही ही उठते रहे हैं। हिंदी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार में अपने-अपनों को उपकृत करने के कई उदाहरण हैं। सबसे बड़ा तो यही है कि उन्नीस सौ इकहत्तर में नामवर सिंह को उनकी कृति ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए जब पुरस्कार दिया गया तो उनके गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी भाषा के संयोजक थे। दो साल बात जब उन्नीस सौ तिहत्तर में हजारी प्रसाद द्विवेदी को उनके निबंध संग्रह ‘आलोक पर्व’ के लिए पुरस्कृत किया गया तो नामवर सिंह हिंदी भाषा के संयोजक थे। गुरू शिष्य परंपरा का शानदार उदाहरण है। हजारी बाबू जब हिंदी के संयोजक थे तब उनपर कई तरह के आरोप लगे थे। यशपाल को उनके उपन्यास झूठा सच पर जब उन्नीस सौ बासठ में पुरस्कार नहीं मिला तब भी द्विवेदी जी पर ऊंगली उठी थी। उस विवाद में अपने गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी का दामन साफ करने के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपनी कृति ‘व्योमकेश दरवेश’ में दिनकर पर आरोप लगाया था। उन्होंने अपनी इस पुस्तक के पहले संस्करण में लिखा कि ‘यशपाल के विषय में विवाद हुआ। कहते हैं कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि ‘झूठा सच’ के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है। नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है ।‘ हलांकि दैनिक जागरण में जब इस सबंध में डी एस राव की पुस्तक फाइव डिकेड्स को उद्धृत किया गया तो दूसरे संस्करण में त्रिपाठी जी ने दिनकर का नाम हटा दिया ।

इसी तरह से अशोक वाजपेयी को जब उनके कविता संग्रह ‘कहीं नहीं वहीं’ पर पुरस्कृत किया गया तो वो संस्कृति मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे। साहित्य अकादमी संस्कृति मंत्रालय से ही संबद्ध स्वायत्त संस्था है। तब इसको लेकर काफी विवाद हुआ था और वामपंथियों ने भी खूब हो हल्ला मचाया था। उस वक्त अशोक वाजपेयी वामपंथियों पर लगातार हमले करते रहते थे और वामपंथी भी उनको घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। जब भी वामपंथियों का साहित्य अकादमी में दबदबा रहा, जो कि बहुत लंबे समय तक रहा, तब उन्होंने अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को पुरस्कृत किया। इन सबके पीछे हिंदी भाषा के उस वक्त के संयोजकों की प्रमुख भूमिका रहती थी। यह अकारण नहीं है कि हिंदी के शीर्ष कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को, मैथिलीशरण गुप्त को, महादेवी वर्मा को अकादमी ने पुरस्कार योग्य नहीं समझा। और तो और हिंदी कहानी को अपनी लेखनी से एक नई दिशा देनेवाले कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु को भी साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत नहीं किया। वीरेन डंगवाल, उदय प्रकाश, राजेश जोशी आदि को दिए गए पुरस्कार किसी न किसी वजह से विवादित हुए। किसी में जूरी पहुंच वहीं पाए तो फोन पर राय ले ली गई तो किसी में अपताल से जूरी के सदस्य ने लिखकरर भेज दिया आदि आदि। पूर्व में साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर इतने विवाद उठे हैं कि उसपर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। अब अगर पिछले कुछ सालों से अकादमी के पुरस्कारों को लेकर विवाद नहीं उठ रहे हैं तो ये अच्छा संकेत है और अकादमी की साख को गाढ़ा भी करता है। 


Thursday, March 11, 2021

जीवन का 'आनंद'


किसी भी फिल्म को अगर क्लासिक का दर्जा मिलता है तो उसके पीछे कई कारण होते हैं, कई लोगों की मेहनत होती है। फिल्म ‘आनंद’ को अगर आज 50 साल बाद भी लोग पसंद कर रहे हैं तो इसके पीछे कहानी, संवाद, निर्देशन, अभिनय, गीत, संगीत और संपादन का समुच्चय है। ‘आनंद’ एक ऐसी फिल्म है जिसके निर्माण को लेकर कई बेहद रोचक किस्से हैं। इस फिल्म के निर्देशक ह्रषिकेश मुखर्जी ने जब पहली बार एक कैंसर के युवा मरीज और उसके दोस्त को केंद्र में रखकर फिल्म बनाने की सोची थी तब उनके दिमाग में आनंद सहगल की भूमिका के लिए राज कपूर का नाम था। दोनों गहरे मित्र भी थे। तय भी हो गया था कि राज कपूर इस फिल्म में काम करेंगे। ये साल था 1955। लेकिन उसके बाद ह्रषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की अन्य व्यस्तताओं की वजह से फिल्म का निर्माण टलता रहा। जब ह्रषिकेश मुखर्जी और एन सी सिप्पी ने फिल्म निर्माण के लिए हाथ मिलाया तो मुखर्जी ने सिप्पी को कैंसर मरीज वाली कहानी सुनाई। उनको कहानी बेहद पसंद आई। फिल्म पर काम शुरू हुआ। लेकिन तबतक राज कपूर की उम्र चालीस पार हो चुकी थी और वो युवा मरीज के रोल में फिट नहीं बैठ रहे थे। शशि कपूर के बारे में विचार चल रहा था कि एक दिन अचानक ह्रषिकेश मुखर्जी के घर राजेश खन्ना पहुंचे और इस फिल्म में काम करने की इच्छा जताई। मुखर्जी ने साफ तौर पर राजेश खन्ना को कहा कि वो उनकी फीस नहीं दे पाएंगे क्योंकि फिल्म का बजट बहुत कम है। तब राजेश खन्ना एक फिल्म के पांच लाख रुपए लेते थे। राजेश खन्ना ने कहा कि उनको फीस नहीं चाहिए इसके बदले में उनको बांबे(अब मुंबई) क्षेत्र में फिल्म वितरण का अधिकार दे दिया जाए। मुखर्जी ने कहा कि वो सिप्पी से बात करके बताएंगे। उनके घऱ से निकलने के पहले राजेश खन्ना ने उनसे एक वादा ले लिया कि अब वो शशि कपूर से बात नहीं करेंगे। इसी तरह से अभिनेता ओमप्रकाश ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था और अमिताभ से मिलने के बाद ह्रषिकेश मुखर्जी उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। 

सिप्पी की स्वीकृति के बाद फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। राजेश खन्ना सेट पर हर रोज देर से आते थे। एक दिन जब राजेश खन्ना देर से आए तो ह्रषिकेश मुखर्जी भन्नाए हुए बैठे हुए थे। उन्होंने राजेश खन्ना को खूब खरी-खोटी सुनाई, कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि उन्होंने खन्ना को जमकर गालियां भी दी और फिल्म बंद करने की घोषणा करके घर चले गए। राजेश खन्ना परेशान थे, परेशान तो बाकी के कलाकार भी थे ही। दो तीन दिन बाद इस फिल्म के ही एक और कलाकार रमेश देव ह्रषिकेश दा के घर पहुंचे। अपने साथ राजेश खन्ना को लेकर भी गए थे, बगैर ह्रषिकेश मुखर्जी को बताए। राजेश खन्ना को नीचे बैठकर वो दादा के पहली मंजिल के कमरे में पहुंचे और उनसे बातचीत करने लगे।बातचीत के क्रम में उन्होंने पूछा कि क्या वो सच में फिल्म बंद करना चाहते हैं? दादा बोले नहीं यार! मैं को ये सोच रहा हूं कि गुस्से में राजेश खन्ना को बहुत बुरा भला कह दिया, क्या वो फिर से फिल्म में काम करने को तैयार होगा। जब ये बात हो रही थी तो राजेश खन्ना पहली मंजिल पर पहुंच गए थे और कमरे के बाहर खड़े होकर सुन रहे थे। जैसे ही उन्होंने ह्रषिकेश मुखर्जी की बात सुनी तो कमरे में घुसे और जाकर दादा के चरण पकड़ कर फर्श पर लेट गए। कहने लगे कि क्षमा कर दीजिए अब कभी शूटिंग के लिए लेट नहीं करूंगा। ह्रषिकेश मुखर्जी पिघल गए। लेकिन राजेश खन्ना नहीं माने और बोले कि जबतक आप सिप्पी साहब को फिर से फिल्म शुरू करने के लिए फोन नहीं करेंगे तबतक वो पांव नहीं छोड़ेगे। दादा ने सिप्पी को फोन कर दिया और फिल्म फिर से शुरू हो गई। राजेश खन्ना दो तीन दिन तो समय से शूटिंग के लिए आए लेकिन फिर वही रवैया लेकिन तबतक मुखर्जी समझ चुके थे कि इस मसले पर कुछ हो नहीं सकता। राजेश खन्ना देर से आते रहे और शूटिंग चलती रही, फिल्म पूरी हो गई।

राजेश खन्ना इस फिल्म के नायक जरूर थे लेकिन पूरी फिल्म में ह्रषिकेश दा ने इस बात का ध्यान रखा कि कहानी पर नायकत्व हावी न हो सके। कहीं भी राजेश खन्ना अपने स्टाइल में अभिनय करते नजर नहीं आते हैं, न तो गरदन झटकते हैं न ही हाथ मोड़ कर अपने विशेष अंदाज में संवाद अदायगी करते हैं। 11 मार्च 1971 को फिल्म रिलीज हुई और आज पचास साल होने के बाद भी ‘आनंद’ को उतना ही प्यार मिल रहा है।  


Saturday, March 6, 2021

हिंदू नवजागरण के अनुत्तरित प्रश्न


पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के सामने भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी चुनौती लेकर खड़ी है। कांग्रेस और वामपंथियों का गठबंधन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्षरत दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव देश के अन्य राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव से थोड़ा अलग हटकर है। यहां बंगाल की संस्कृति और बंगाली अस्मिता भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बनते हैं। भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस लगातार वहां की संस्कृति की बात कर रही है। तृणमूल कांग्रेस खुद को बंगाल की संस्कृति का ध्वजवाहक बताते हुए चुनाव मैदान में है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कई नेता लेखकों, कलाकारों और फिल्म अभिनेताओं के संपर्क में हैं। उधर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी सोनार बांगला के नारे के अंतर्गत बंगाल की खोई हुई अस्मिता को वापस लाने की बात करते हुए लगातार बुद्धिजीवियों के संपर्क में हैं। जब ममता बनर्जी बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ पहली बार चुनाव लड़ रही थीं तब कोलकाता की सड़कों पर कई होर्डिंग लगे थे जिसमें महाश्वेता देवी समेत कई लेखकों कलाकारों के चित्र लगे थे और उसमें बांग्ला में लिखा था ‘परिवर्तन’। तब ये माना गया था कि इन होर्डिंग्स का मतदताओं पर असर पड़ा था। पश्चिम बंगाल में अब भी लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को गंभीरता से लिया जाता है और लोग उनका आदर भी करते हैं। इस आदर की ऐतिहासिक वजहें हैं। माना जाता है कि बंगाल के महापुरुषों ने सबसे पहले एक राष्ट्र का स्वप्न देखा था। भारतीयता के अराधक राजा राममोहन राय बंगाल की धरती पर पैदा हुए थे। राजा राममोहन राय से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर तक जो परंपरा चली जिसे नवजागरण के नाम से जानते हैं उसमें केंद्र में भी भारत और भारतीयता है। इस नवजागरण का जब विश्लेषण किया जाता है तो इस बात को छोड़ दिया जाता है कि दरअसल ये नवजागरण, हिंदू नवजागरण था। इस राष्ट्रवादी चेतना के उत्थान के सूत्र राजा राममोहन राय से लेकर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लेखन और उनके कार्यों में स्पष्ट रूप में दिखाई देते हैं।

जब राममोहन राय बंगाल में सक्रिय हो रहे थे तो उनका उद्देश्य हिंदू धर्म के यथार्थ और वास्तविक स्वरूप से बंगाल की जनता का परिचय करवाना था। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और कर्मकांडों के विरोध में उन्होंने बड़ा अभियान चलाया, उनको सफलता भी मिली। बंगाल में इस हिंदू नवजागरण का आरंभ करनेवाले राममोहन राय को समाज सुधारक के तौर पर पेश कर उनकी इसी छवि को मजबूत किया गया। उनके कृतित्व का वो पक्ष सायास ओझल कर दिया जिसमें वो हिंदू धर्म को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। उनको हिंदू धर्म से इतना लगाव था कि वो धर्म के नाम पर हो रहे विचलन को दूर करने के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे। अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदू धर्म के सामने उपस्थित खतरों को लेकर जनता को सावधान कर रहे थे। उन्होंने न केवल वेद और उपनिषदों को आधार बनाकर विपुल लेखन किया बल्कि 1820 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई ‘हिंदू धर्म की रक्षा’। अपनी इस पुस्तक में राममोहन राय ने हिंदू धर्म को लेकर अपनी सोच और इसको मजबूती प्रदान करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की चर्चा की थी। राममोहन राय के अलावा अगर हम बंकिमचंद्र के लेखन को देखें तो उसमें भी हिंदू धर्म को लेकर एक चिंता दिखाई देती है। उनकी रचना वंदे मातरम और उपन्यास ‘आनंदमठ’ की तो खूब चर्चा होती है, इन रचनाओं में व्याप्त देशभक्ति की भावना को लेकर भी बहुत कुछ लिखा गया है। परंतु बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘सीताराम’ की इतनी चर्चा नहीं होती है। बंकिम की इस रचना के बिना उनका समग्र मूल्यांकन संभव नहीं है। इस उपन्यास में बंकिम ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में विस्तार से लिखकर इस बात के संकेत दिए थे कि हिंदूओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। कहना ना होगा कि बाद के दिनों में बंकिम के इस उपन्यास पर इसलिए अधिक चर्चा नहीं की गई क्योंकि इसमें हिंदुओं पर आक्रांताओं के अत्याचार और फिर उसके प्रतिकार की कहानी है। अगर समग्रता में बंकिम के लेखन पर विचार हो तो उनको राष्ट्रीयता का ऋषि कहने में कोई संकोच नहीं होगा। बंकिम की परंपरा में ही केशवचंद्र सेन जैसे हिंदू धर्म और दर्शन के विद्वान को भी रखना होगा। बंगाल की धरती पर कई ऐसे सपूत पैदा हुए या उस धरती को अपनी कर्मभूमि बनाया, जिन्होंने हिंदू धर्म और दर्शन की चिंता की जिनमें रमेशचंद्र दत्त, माइकल मधुसूदन दत्त, दीनबंधु मित्र, भूदेव मुखोपाध्याय से लेकर विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर प्रमुख हैं।इस हिंदू नवजागरण की चर्चा तब तक पूर्ण नहीं होती जबतक कि हम 1867 में स्थापित ‘हिंदू मेला’ नामक संस्था की चर्चा नहीं करते। इसकी स्थापना गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने की थी। इस संस्था का उद्देश्य अंग्रेजों के सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार तो था ही, भारतीयता को मजबूती के साथ स्थापित करना था। ‘हिंदू मेला’ ने ही भारत में स्वदेशी आंदोलन के लिए जमीन भी तैयार की थी।

आज पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के समय एक बार फिर से वही हिंदू अस्मिता विमर्श के केंद्र में है। यह अनायास नहीं है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक अनिर्वाण गांगुली पिछले कई महीनों से बंगाल के कोने कोने में जाकर स्थानीय स्तर के लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों आदि के साथ संवाद कर रहे हैं। ममता बनर्जी के लिए भी कई सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। कई जगहों पर उन्होंने भाषा और कला को लेकर भी अपनी बात रखी। दरअसल स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद जब बंगाल में वामपंथियों का शासन आरंभ हुआ तो इस हिंदू नवजागरण की परंपरा थोड़ी धूमिल पड़ने लगी। सायास नवजागरण के दौर के लेखकों की उन रचनाओं को भुलाने की कोशिशें तेज हो गईं जिनमें हिंदू अस्मिता की चर्चा थी या उन पुस्तकों को ओझल करने का खेल शुरू हुआ जिनमें हिंदू धर्म और उसपर होनेवाले प्रहारों का उल्लेख था या इस पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। यह अनायास नहीं है कि जब ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री थे तो 28 अप्रैल 1989 को पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने पत्रांक एसवाईएल/89/1 के जरिए एक निर्देश जारी किया। इस पत्र में सभी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्यों को निर्देश दिया गया था कि ‘मुस्लिम काल की कोई निंदा या आलोचना नहीं होनी चाहिए, मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने का जिक्र कभी नहीं किया जाना चाहिए।‘ इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि इतिहास की पुस्तकों से क्या क्या हटाया जाना है। स्पष्ट है कि वामपंथी शासन की मंशा क्या रही होगी। वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल में चौंतीस साल तक शासन किया और उसके बाद से ममता बनर्जी वहां की मुख्यमंत्री हैं। क्या अब ये प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि हिंदू नवजागरण के नायकों की स्मृति को मिटाने या उनको विस्मृत करने या उसको नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक कार्य क्यों नहीं किया गया? क्यों वामपंथी शासनकाल में हुई गलतियों को पिछले दस साल में ठीक करने की कोशिशें नहीं की गईं। क्या बंगाल के सांस्कृतिक नायकों का स्मरण सिर्फ चुनावों के समय किया जाएगा या फिर उस धरती के जिन राष्ट्रवादी मनीषियों ने जो स्वप्न देखा था उसको पूरा करने का उपक्रम भी किया जाएगा। लोकतंत्र में चुनाव एक ऐसा ही अवसर होता है जब जनता इन प्रश्नों को पूछ सकती है। बंगाल की जनता जरूर इन प्रश्नों के उत्तर मतदान के दिन तलाशेगी भी और उम्मीद की जानी चाहिए कि जिन्होंने गलतियां की उनको सबक भी सिखाएगी।

Saturday, February 27, 2021

कलात्मक(?) अराजकता पर अंकुश


हाल के दिनों में दो तीन ऐसी खबरें आईं जो मनोरंजन की दुनिया की दशा और दिशा दोनों बदल सकती है। एक खबर है कि अमेजन प्राइम वीडियो से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित का पुलिस ने बयान दर्ज करवाया। ये बयान वेब सीरीज ‘तांडव’ में आपत्तिजनक कटेंट को लेकर दर्ज कराए गए केस के संबंध में लिया गया है। साढे तीन घंटे तक अपर्णा पुरोहित से लखनऊ के हरतगंज कोतवाली में पुलिस ने पूछताछ की। इससे ही जुड़ी एक और खबर आई प्रयागराज से। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपर्णा पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया। अपर्णा पुरोहित पर वेब सीरीज ‘तांडव’ तो लेकर नोएडा में भी केस दर्ज हुआ था, उस सिलसिले में वो हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत चाहती थीं। पिछले कई सालों से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट, जिसको ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म भी कहते हैं, पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री को लेकर तो कई बार वहां दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। पिछले तीन साल से इन वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाली सामग्री में हिंसा, यौनाचार, मनोरंजन की आड़ में विचारधारा की पैरोकारी, हिंदू धर्म प्रतीकों का गलत चित्रण से लेकर अन्य कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। जब भी इन बातों को लेकर विवाद उठते थे तो सरकार से ये मांग भी की जाती थी कि ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के संदर्भ में विनियमन नीति लागू की जानी चाहिए। इस स्तंभ में भी लगातार इस बारे में चर्चा जाती रही है कि इस क्षेत्र में बढ़ रही अराजकता पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को दिशा निर्देश या कटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार के स्तर पर विनियमन लागू करने के लिए इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर के  संवाद भी हुए थे, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर 2018 में सख्त टिप्पणी की थी, संसद में भी ये मामला कई बार उठा । इस पृष्ठभूमि में सरकार ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर अब एक दिशा निर्देश जारी कर दिया है।

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश में ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के लिए स्वनियमन की बात की गई है। स्वनियमन की बात तो की गई है लेकिन ये नियमन कैसे हो और इसका दायरा क्या हो इसको सरकार ने स्पष्ट कर दिया है। ये स्पष्ट कर दिया गया है कि कोई भी प्लेटऑर्म भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को आघात पहुंचानेवाले दृश्य और संवाद नहीं दिखाएंगें। कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में कोई भी ऐसी सामग्री दिखाने की अनुमति नहीं होगी जो कानून सम्मत नहीं है। लेकिन सरकार ने दिशा निर्देश जारी करते हुए सेवा प्रदताओं को इसका तंत्र विकसित करने को कहा है। अच्छी बात ये है कि सरकार ने जो व्यवस्था बनाई है उसमें कार्यक्रमों को दिखाने के पहले किसी से अनुमति लेने की बात नहीं है यानि की प्री सेंसरशिप का रास्ता सरकार ने नहीं अपनाया। उन्होंने सबकुछ इन प्लेटफॉर्म पर छोड़ दिया है। नए नियमों के अनुसार सेवा प्रदाता कंपनियों को खुद अपनी सामग्रियों का वर्गीकरण करना होगा। बच्चों के देखने लायक सामग्री से लेकर अलग अलग उम्र की मनोरंजन सामग्रियों का वर्गीकरण कर दिया गया है। सेवा प्रदाता कंपनियों को इसका पालन करना होगा। अगर किसी को शिकायत होती है या किसी प्रकार से इन नियमों का उल्लंघन होता है तो उससे निबटने के लिए तीन स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है। ये व्यवस्था लगभग उसी तर्ज पर है जिस तर्ज पर टेलीविजन के कार्यक्रमों का स्वनियमन होता है। 

सरकार के इस स्वनियम के दिशा निर्देशों को लेकर तमाम तरह की शंकाएं जताई जा रही हैं। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ स्वयंभू निर्देशक इस कदम की आलोचना कर रहे हैं और इसको कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करनेवाला कदम बता रहे हैं। दरअसल जब वो कलात्मक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि ये स्वतंत्रता असीमित नहीं है। भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं को भी स्पष्ट किया गया है। ऐसा भी नहीं है कि इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले इन मनोरंजन के माध्यमों के लिए दिशानिर्देश जारी करनेवाला भारत दुनिया का पहला देश है। कई देशों में ओटीटी के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। सिंगापुर में तो बकायदा इसके लिए एक प्राधिकरण है जिसको इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी कहते है। इसकी स्थापना ब्राडकास्टिंग एक्ट के तहत की गई थी। इसमें सभी सेवा प्रदताओं को ब्राडकास्टिंग एक्ट के अंतर्गत इस प्राधिकरण से लाइसेंस लेना पड़ता है। ओटीटी, वीडियो ऑन डिमांड और विशेष सेवाओं के लिए एक विशेष कंटेंट कोड है। इसमें सामग्रियों के वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था है। सिंगापुर की इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट प्राधिकरण को अधिकार है कि वो ओटीटी प्लेटऑर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री को अगर कानून सम्मत नहीं पाती है तो उसका प्रसारण रोक दे।इसके अलावा नियम विरुद्ध सामग्री दिखाने पर जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। सिर्फ सिंगापुर ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया में भी इस तरह के प्लेटऑर्म पर नजर रखने के लिए ई सेफ्टी कमिश्नर हैं। उनका दायित्व है वो डिजीटल मीडिया पर चलनेवाली सामग्रियों पर नजर रखें। वहां तो विनियमन इस हद तक है कि ई सेफ्टी कमिश्नर अगर पाते हैं कि किसी मनोरंजन सामग्री का वर्गीकरण अनुचित है या गलत तरीके से उसको किया गया है तो वो दंड के तौर पर उसको प्रतिबंधित भी कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री की शिकायत मिलने पर उसके निस्तारण की एक तय प्रक्रिया है। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में किसी न किसी तरह के दिशा निर्देश लागू हैं। हमारे देश में अबतक ओटीटी की सामग्री को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं था। इसका नतीजा यह था कि कई प्लेटफॉर्म पर तो बेहद अश्लील सीरीज भी परोसे जा रहे थे, बिना किसी वर्गीकरण के। कहीं किसी कोने में छोटा सा अठारह प्लस लिख दिया जाता था लेकिन किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं थी। कोई भी उसको देख सकता था।

जहां तक कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करने की बात है उसको लेकर जो लोग प्रश्न खड़े कर रहे हैं वो यह भूल रहे हैं कि हमारे देश में फिल्मों को भी रिलीज के पहले प्रमाणन करवाना होता है। क्या इस प्रमाणन की व्यवस्था से हमारे देश में फिल्मों की कलात्मक स्वतंत्रता बाधित हुई? टीवी चैनलों को लेकर स्वनियमन लागू है क्या टीवी चैनलों पर दिखाई जानेवाली सामग्रियों में कलात्मक स्वतंत्रता बाधित दिखती है? दरअसल इस तरह के नियमनों से अराजकता पर रोक लगती है। ये कौन सी कलात्मक स्वतंत्रता है जिसमें वेब सीरीज की आड़ में राजनीति की जाती हो, भारतीय सेना की छवि को धूमिल किया जाता हो, कश्मीर में सेना के क्रियाकलापों को गलत तरीके से पेश किया जाता हो, हिंसा, गाली गलौच और यौनिकता के दृश्यों को प्रमुखता से दिखाया जाता हो। कोई भी माध्यम समाज सापेक्ष होना चाहिए, समाज से, संस्कृति से, निरपेक्ष होकर कला का विकास नहीं हो सकता है। समाज और संस्कृति को छोड़कर कोई भी कला अपने उच्च शिखर को प्राप्त नहीं कर सकती है। और इस मामले में तो सरकार ने बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा की कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अपनी तरफ से कोई स्वनियमन की नीति बनाकर देंगे लेकिन जब उनके बीच सहमति नहीं बन सकी तो सरकार ने दिशा निर्देश जारी कर दिए। जो लोग इसको बाधा मान रहे हैं उनको ये पता होना चाहिए कि कला भी अनुशासन की मांग करती है। सरकार ने ओटीटी के लिए दिशा निर्देश जारी करने में थोड़ी देरी अवश्य की लेकिन अब जब ये जारी हो गा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ओटीटी पर हम वाक्य में गाली गलौच नहीं होगी और अश्लीलता की सीमाएं भी नहीं टूटेंगीं।  

Saturday, February 20, 2021

पूर्वज नायकों के सम्मान का सही समय


हाल ही में महाराज सुहेलदेव पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इतिहास लेखन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी उस टिप्पणी में भारतीय इतिहास लेखन को लेकर भी टिप्पणी की। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘देश का इतिहास वो नहीं जो भारत को गुलाम बनाने वालों और गुलाम मानसिकता वालों ने लिखा। इतिहास वो है जो लोककथाओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है।‘ नरेन्द्र मोदी ने इस ओर भी स्पष्ट तौर पर संकेत किया भारत में हमने कई महापुरुषों को अपनी इतिहास की पुस्तकों में भुला दिया। उन्होंने कई उदाहरण भी दिए। भारतीय इतिहास लेखन के संदर्भ में देखें तो अबतक तो यही दिखाई देता है कि हमारे देश का ज्यादातर इतिहास गुलाम बनाने वालों ने या गुलाम मानसिकता वालों ने ही लिखा। मार्क्सवादियों ने जिस प्रकार से इतिहास लेखन किया उसको देखने के लिए ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की स्थापना के उद्देश्यों की पड़ताल कर ली जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। जब 1972 में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की स्थापना की गई थी तब इसका प्रमुख उद्देश्य था ‘वस्तुपरक और वैज्ञानिक इतिहास लेखन को बढ़ावा देना, जिससे देश की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विरासत की समझ बढ़े व सही मूल्यांकन भी हो सके।‘  अपने स्थापना काल से ही भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, मार्क्सवादी इतिहासकारों के कब्जे में चला गया। परिणाम यह हुआ कि भारतीय इतिहास लेखन में छल की प्रविधि का उपयोग होने लगा। यह अनायास नहीं है कि प्राचीन भारत के इतिहास से लेकर मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत के इतिहास में भारतीय नायकों को परिधि पर रखने की एक कोशिश दिखाई देती है। इतिहास लेखन के लिए औपनिवेशिक और मार्क्सवादी पद्धति अपनाई गई। वही पद्धति जिसने रूस के लेनिन-त्रॉतस्की शासन को लेनिन-स्तालिन शासन बना दिया। रूस के इतिहास से त्रॉतस्की को प्रयासपूर्वक ओझल कर दिया गया। इस पद्धति के अलावा ब्रिटिश इतिहासकारों के लिखे को भी आधार बनाकर लेखन किया गया। लेकिन ब्रिटिश इतिहासकार किस तरह से सोचते हैं इसका एक उदाहरण डेविड वॉशब्रुक की आधुनिक भारत के संबंध में की गई एक टिप्पणी है। इस टिप्पणी से भारत को लेकर उनकी दृष्टि और मानसिकता का संकेत मिलता है। आधुनिक भारत का इतिहास लिखते वक्त वो एक जगह टिप्पणी करते हैं कि ‘1895 और 1916 के बीच मद्रास की सड़क पर शायद ही कोई ब्रिटिश विरोधी कुत्ता भौंका हो।‘ 

अब जब हमारा देश अपनी स्वतंत्रता के पचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है तो भारत के वस्तुनिष्ठ इतिहास का प्रश्न एक बार फिर से हमारे सबके सामने चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की है कि हम अपने नायकों को याद करें, उनको पुनर्स्थापित करें और आनेवाली पीढ़ियों को उनके बारे में बताएं। आज आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही है, उस दिशा में गंभीर काम भी हो रहे हैं। एक बार फिर से स्वदेशी बनाने और उसको अपनाने पर जोर दिया जा रहा है लेकिन क्या हम आधुनिक भारत में स्वदेशी को लेकर अपना पूरा जीवन होम करनेवाले नायकों को याद कर पा रहे हैं। अंग्रेजों को चुनौती देनेवाले चिदंबरम पिल्लई, जिनको ‘स्वदेशी पिल्लई’ कहा जाता है, को याद करते हैं?  चिंदबरम पिल्लई हमारी धरती का ऐसा साहसी सपूत है जिसने अंग्रेजों को स्वदेशी के नाम पर खुली चुनौती दी थी। तूतीकोरन में 1872 में जन्मे चिदंबरम पिल्लई की कहानी बेहद प्रेरणादायक है, लेकिन मार्क्सवादी इतिहासकारों ने उनको हाशिए पर रखा। चिदंबरम पिल्लई पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने दक्षिण में स्वदेशी का आंदोलन चलाया। उन्होंने ‘ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन शिपिंग कंपनी’ के मुकाबले अपनी शिपिंग कंपनी बनाकर उनको चुनौती दी थी। उनकी कंपनी का नाम ही ‘स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी’ था और उनके जहाज पर स्वदेशी लिखा होता था। उनकी कंपनी की इतनी लोकप्रियता थी ब्रिटिश कंपनी के लोग अपनी जहाज पर यात्रा करनेवालों को कम किराए का प्रलोभन तो देते ही थे, यात्रा करने वालों को मुफ्त में छाता आदि भी देते थे। बावजूद इसके पिल्लई की कंपनी का मुनाफा इतना बढ़ा कि उन्होंने दो और जहाज आयात किए। ‘स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी’ के बढ़ते कारोबार से अंग्रेज इतना घबरा गए थे कि उन्होंने ब्रिटिश इंडिया नेविगेशन कंपनी के जहाजों पर भी ‘स्वदेशी’ लिखकर यात्रियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश की थी। इसी समय से दक्षिण भारत में चिदंबरम पिल्लई को लोग ‘स्वदेशी पिल्लई’ कहने लगे थे। ये समय 1905 के आसपास का था। 

अब अगर हम पिल्लई की विकास यात्रा को देखते हैं तो उसमें तमिलनाडू में चलनेवाले ‘शैव सभाओं’ का बड़ा योगदान रहा है। इन सभाओं में जब पिल्लई सक्रिय हुए थे तब उनके संपर्क का दायरा बढ़ा था और इलाके के बुद्धिजीवियों से उनका संवाद आरंभ हुआ था। इन्हीं सभाओं के सदस्यों के मार्फत उनका परिचय लोकमान्य तिलक के लेखन और कार्य ये हुआ। उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को अपना गुरू मान लिया था। वर्षों बाद 1907 में सूरत में आयोजित कांग्रेस की वार्षिक बैठक में पिल्लै अपने गुरू बाल गंगाधर तिलक से मिले थे। 1907 का ये अधिवेशन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा था। इस बैठक में ही कांग्रेस उदारवादी और अतिवादी समूह में विभाजित हुई थी। इस बैठक के बाद ही पिल्लई के काम को कांग्रेस ने मान्यता दी और उनको दक्षिण भारत का प्रभार सौंपा। उसके बाद उनकी सक्रियता बहुत बढ़ गई थी। इस बात के भी उल्लेख मिलते हैं कि जब 1911 में उनकी गिरफ्तारी हुई थी तब उनके एक समर्थक ने उस अंग्रेज अफसर की हत्या कर दी थी जिन्होंने इनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे। इन आरोपों के मद्देनजर पिल्लई को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी लेकिन जनता के गुस्से को देखते हुए सजा को छह साल की कैद में बदल दिया गया था। अब अगर स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर पिल्लई के संघर्षों का आकलन किया जाता तो वो एक राष्ट्रीय नायक के तौर पर बाद की पीढ़ियों में जाने जाते। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उनपर 1961 में तमिल भाषा में एक फिल्म जरूर बनी लेकिन उनके लेखन को, उनके योगदान को, उनके संघर्षों को वो स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी हैं। 

स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्ष में प्रवेश को एक अवसर के तौर पर देखा जाना चाहिए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों के काम को सामने लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अलावा अन्य अकादमियों को भी इस काम में आगे आकर पहल करनी चाहिए। इन स्वतंत्रता सेनानियों के लेखन को सामने लाने के लिए साहित्य अकादमी से लेकर देश के विश्वविद्यालयों को भी पहल करनी चाहिए। उनको इतिहास और राजनीति में रुचि रखनेवाले विद्वानों और शोधार्थियों को चिन्हित करके प्राथमिकता के आधार पर ये काम सौंपा जाना चाहिए। शोधार्थियों और विद्वानों के सामने एक समय सीमा हो जिसके अंदर इस तरह के प्रोजेक्ट पूरे किए जाएं। जब पूरा राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाए तो इन पुस्तकों का प्रधानमंत्री के हाथों विमोचन हो और उसका खूब प्रचार प्रसार किया जाए। इन सकारात्मक प्रयासों को अलावा जो गलत इतिहास लेखन हुआ है उसको भी चिन्हित करके उसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए। जैसे ब्रिटिश सरकार के उस ट्रांसफर ऑफ पॉवर नाम के उस दस्तावेज का प्रतिकार आवश्यक है जिसमें उन्होंने ये मान्यता दी है कि वो भारत को गुलाम बनाने नहीं आए थे बल्कि सभ्य बनाने आए थे। वो भारत का विभाजन नहीं चाहते थे आदि आदि। ये तभी संभव है जब सरकार के स्तर पर इन कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध करवाया जाए और इसको पूरा करने की इच्छाशक्ति हो। 

Monday, February 15, 2021

राजा हरिश्चंद्र नहीं कृष्ण थे पहली पसंद


महाराष्ट्र के नासिक जिले के त्रयंबकेश्वर के एक पुजारी परिवार में 30 अप्रैल 1870 को एक लड़के का जन्म हुआ। उसके पिता अपने बेटे को संस्कृत पढ़ाकर पंडित बनाना चाहते थे। इस बालक का नाम था धुंडीराज गोविंद फाल्के था। जब उसके पिता की मुंबई (तब बांबे) में नौकरी लगी तो वो अपने पिता के साथ नासिक से वहां आ गया। सरकारी नौकरी मिल गई। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव में नौकरी छोड़ दी और फोटोग्राफी करने लगा। उसकी रुचि को देखकर कुछ मित्रों ने उसको फोटोग्राफी सीखने के लिए जर्मनी भेज दिया। वहां से 1909 में वापस लौटा तो बीमारी की वजह से भले ही आंखों की रोशनी चली गई लेकिन सपने आकार लेने लगे थे। सालभर के इलाज के बाद जब आंखों की रोशनी लौटी तो वो एक फिल्म देखने गए जिसका नाम था ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ । इस फिल्म को देख तो रहे थे लेकिन उनके दिमाग में राम और कृष्ण की कथा चल रही थी। अगले दिन वो अपनी पत्नी के साथ इसी फिल्म को देखने पहुंचे। पत्नी ने उनको कृष्ण के चरित्र पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया। पत्नी ने अपने गहने गिरवी रखे और उससे मिले पैसे को लेकर फाल्के लंदन गए। वहां से सिनेमैटोग्राफी सीखकर वापस लौटे। 

अब अपने सपने को साकार करने का समय था। पहले कृष्ण और फिर राम पर फिल्म बनाने की कोशिश की लेकिन संसाधन के अभाव में इसको छोड़ कर राजा हरिश्चंद्र की कहानी पर काम शुरू कर दिया। महिला कलाकार मिलने में मुश्किल हो रही थी। विज्ञापन के बावजूद कोई महिला अभिनय के लिए तैयार नहीं हो रही थी। निराशा बढ़ती जा रही थी। पास की दुकान में चाय पीने गए। वहां चायवाले लड़के, सालुंके, पर उनकी नजर पड़ी को आंखें चमक उठी। उस लड़के को तारामती के रोल के लिए तैयार कर लिया। इस तरह भारतीय फिल्म में एक पुरुष ने पहली अभिनेत्री का रोल किया। ‘राजा हरिश्चंद्र’ फिल्म बन गई। 3 मई 1913 को बांबे के कोरोनेशन हॉल में उसका प्रदर्शन हुआ। फिल्म लगातार बारह दिन चली। 1914 में लंदन में प्रदर्शित हुई। इनकी दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में नाटकों में काम करनेवाली कमलाबाई गोखले ने अभिनय किया। कमला बाई को फिल्म में अभिनय के लिए उस वक्त फाल्के साहब ने आठ तोला सोना, दो हजार रुपए और चार साड़ियां दी थीं। इसके बाद इन्होंने ‘कृष्ण जन्म’ बनाई। कहते हैं कि इस फिल्म ने इतनी कमाई की कि टिकटों की बिक्री से जमा होनेवाले सिक्कों को बोरियों में भरकर ले जाना पड़ता था। सफलता के बाद इनको फाइनेंसर मिल गया और उन्होंने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई। लेकिन पार्टनर ने निभी नहीं तो सब कामकाज छोड़कर बनारस जाकर नाट्य लेखन में जुट गए। फिर नासिक लौटे और ‘सेतुबंध’ नाम की फिल्म बनाई। इस बात का उल्लेख मिलता है कि फाल्के साहब ने अपने जीवन काल में करीब नौ सौ लघु फिल्में और बीस फीचर फिल्में बनाईं। 16 फरवरी 1944 को नासिक में भारतीय फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के का देहावसान हो गया। 

Sunday, February 14, 2021

इश्क बागी न हुए, ख्वाब मुकम्मल न हुए

हिंदी फिल्मों में रोमांटिक जोड़ियों की एक लंबी फेहरिश्त है लेकिन उतनी ही लंबी फेहरिश्त रीयल लाइफ रोमांटिक जोड़ियों की भी रही है। उन्नीस सौ पचास के बाद के वर्षों में अगर देखें तो कई ऐसी रोमांटिक जोड़ियां रहीं है जिनके इश्क के किस्से अबतक बॉलीवुड में सुनाई देते हैं। मोतीलाल और शोभना समर्थ के बीच इश्क इतना गाढ़ा था कि एक बार मोतीलाल बीमार पड़े और उनको ऑक्सीजन लगाना पड़ा। शोभना समर्थ उनको देखने अस्पताल पहुंची तो उन्होंने नर्स को इशारा किया कि मास्क हटा दिया जाए। मास्क हटाते ही उन्होंने कहा कि जब शोभना समर्थ उनके आसपास होती हैं तो उनकी सांसें सामान्य रहती हैं। इसी तरह अशोक कुमार और नलिनी जयवंत के बीच प्यार इतना गाढा था कि अशोक कुमार उनको देखेने के लिए बेचैन रहा करते थे। हिंदी फिल्म जगत में ये किस्सा बहुत प्रसिद्ध है कि अशोक कुमार ने अपने घर की छत पर दूरबीन लगा रखी थी जिसके कि वो पड़ोस में रहनेवाली नलिनी को ठीक तरीके से देख सकें। राज कपूर और नर्गिस, देव आनंद और सुरैया के प्रेम के किस्से भी आम हैं। दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच अफेयर की भी अलग ही दास्तां है। दिलीप कुमार पहले तो कामिनी कौशल के इश्क में डूबे लेकिन जब उनका प्यार परवान नहीं चढ़ सका तो दिलीप कुमार का दिल मधुबाला पर आ गया। प्यार का रंग गाढा होता चला गया। इनका प्यार अपने अंजाम तक पहुंच पाता इसके पहले मधुबाला के पिता इन दोनों के मोहब्बत के बीच आ गए। 

उस जमाने में नायिकाओं के मुंबई (तब बांबे) से बाहर जाने को लेकर उनके माता-पिता बहुत झंझट किया करते थे। खासतौर पर जब उनको अपनी बेटियों के इश्क के बारे में पता होता था। टी जे एस जॉर्ज ने अपनी किताब द ‘लाइफ एंड टाइम्स ऑफ नर्गिस’ में लिखा है कि राज कपूर फिल्म बरसात की शूटिंग कश्मीर में करना चाहते थे लेकिन नर्गिस की मां जद्दनबाई इस बात पर अड़ गईं थीं कि उनकी बेटी राज कपूर के साथ कश्मीर नहीं जाएंगी। आखिरकार फिल्म के उन दृष्यों को महाबालेश्वर में शूट करना पड़ा था। इसी तरह जब बी आर चोपड़ा अपनी फिल्म ‘नया दौर’ की शूटिंग भोपाल में करना चाहते थे लेकिन मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान किसी भी कीमत पर अपनी बेटी को दिलीप कुमार के साथ भोपाल नहीं जाने देने पर अड़े हुए थे। दिलीप कुमार ने मधुबाला से फैसला लेने को कहा लेकिन मधुबाला अपने पिता से बगावत नहीं कर सकी। यहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला का इश्क दरक गया। इसके पहले भी कामिनी कौशल ने अपने परिवार की मर्जी बताकर दिलीप कुमार के साथ प्यार को अंजाम तक पहुंचाने से मना कर दिया था। एक बार फिर अपने और अपनी मोहब्बत के बीच परिवार के आने से दिलीप कुमार बेहद खफा थे। अताउल्लाह खान के मधुबाला के भोपाल जाने से मना करने पर बी आर चोपड़ा ने मधुबाला पर केस कर दिया। मधुबाला की बहन मधुर भूषण ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘नया दौर’ फिल्म से संबंधित कोर्ट केस के दौरान दिलीप कुमार ने बी आर चोपड़ा का साथ दिया था। अदालत में मधुबाला के खिलाफ गवाही दी थी। दिलीप कुमार ने तो कोर्ट में यहां तक कह दिया कि वो मधुबाला से बेहद प्यार करते हैं और अपनी महबूबा के मरने तक उससे प्यार करते रहेंगे। मधुबाला के पिता ने भी अपनी बेटी को इस बात के लिए ताना मारा था कि उसका प्रेमी उसके मरने की कामना कर रहा था। इस केस को बाद में बी आर चोपड़ा ने वापस ले लिया था लेकिन मधुबाला कोर्ट में हुए अपमान को भूल नहीं पाई। वो अंदर से टूट गई थीं। ये अनायास नहीं था कि मधुबाला ने अपनी एक सहेली से कहा था कि उससे शादी मत करना जिससे तुम प्यार करती हो बल्कि उस व्यक्ति से शादी करना जो तुम्हें प्यार करता है। आठ साल की उम्र में फिल्मी दुनिया में कदम, बीस साल में तमाम शोहरत और सत्ताइस साल में फिल्मी दुनिया को अलविदा कहनेवाली मधुबाला को छोटी उम्र मिली लेकिन जीवन भर तो प्यार के लिए तरसती ही रहीं। 

Saturday, February 13, 2021

लोकतंत्र में अपीलजीवियों का पाखंड


यह अनायास नहीं होता है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अचानक से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ कोलाहल आरंभ हो जाता है। यह भी अनायास नहीं होता है कि हमारे देश के कुछ वैसे कलाकार और लेखक आदि जो अपनी प्रासंगिकता तलाश रहे होते हैं, वो इस कोलाहल में शामिल हो जाते हैं। यह भी अनायस नहीं होता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक नियमित अंतराल पर कुछ जाने पहचाने लोग बयान जारी करते हैं। यह भी अनायास नहीं होता कि इस तरह के अपीलजीवी लेखक,कलाकार एकजुट होते दिखते हैं। यही सब लोग आपको दादरी कांड के दौरान भी नजर आएंगे, पुरस्कार वापसी के दौरान भी नजर आएंगे, नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में भी नजर आएंगे, कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भी दिखेंगे। दरअसल ये सब एक सोची समझी रणनीति के तहत होता है, जिनमें बार-बार वही चेहरे होते हैं तो इन दिनों अपने अपने क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति और प्रासंगिकता के लिए संघर्षरत हैं। खुद को प्रगतिशील कहते हैं। इनको साथ मिलता है कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का भी जो भारत को इन्हीं की नजरों से देखते और समझते हैं। ये ताकतें भारतीय कानूनों की उसी व्याख्या को स्वीकार करते हैं जो लेखकों-कलाकारों का ये समूह उनके समक्ष प्रस्तुत करता है। इनको कई बार भारत विरोधी ताकतों का भी प्रत्यक्ष तो कई बार परोक्ष समर्थन मिलता है। कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान भी ये ताकतें दिख रहीं हैं, अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी। 

अब इनको मौका मिला है स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी की गिरफ्तारी को लेकर। फारुकी को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दी है। फारूकी को अंतरिम जमानत मिलने के बाद भारत के कई अज्ञात कुलशील लेखकों-अभिनेत्रियों और विदेशों में रह रहे लेखकों कलाकारों के एक समूह ने अपील जारी की है कि मुनव्वर के खिलाफ आरोप वापस लिए जाएं। ये इन अपीलजीवियों का लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, है भी। इस अपील को जारी करनेवाले संगठनों का नाम देखेंगे तो इनकी मंशा और राजनीति दोनों स्पष्ट हो जाती है। इन संगठनों के नाम हैं पीईएन अमेरिका, प्रोग्रेसिव इंडिया कलेक्टिव, रिक्लेमिंग इंडिया आदि। इनमें से पीईएन को छोड़कर कोई ऐसी संस्था नहीं है जिसके बारे में या जिनके काम के बारे में बहुत कुछ पता हो। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी संस्थाएं अपील करने के लिए ही बनाई जाती हैं ताकि इन अपीलजीवियों की दुकानें चलती रहें। अपीलजीवियों ने जो बयान जारी किया है उसका शीर्षक है, हास्य अपराध नहीं है (कॉमेडी इज नॉट अ क्राइम)। इसको समझने के लिए किसी शब्दकोश की या किसी टीका की आवश्यकता नहीं है। भारत में हास्य-व्यंग्य की बहुत लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। जब से ये स्टैंड अप कॉमेडियन नाम की जमात आई है जिसने हास्य के नाम पर फूहड़ता,अश्लील टिप्पणियां या फिर देवी-देवताओँ के बारे में भद्दी टिप्पणियां शुरू कर दी हैं तब से इनकी आलोचना आरंभ हुई है।

हास्य लोगों को प्रसन्न करने के लिए होता है किसी को अपमानित करने के लिए नहीं। व्यंग्य तो व्यवस्था पर चोट करती है किसी व्यक्ति या समूह की धार्मिक आस्था पर नहीं। लेकिन जब हास्य की आड़ में एजेंडा चलाया जाए, जब हास्य की आड़ में विचारधारा विशेष का पोषण होने लगे, जब हास्य की आड़ में धार्मिक आस्थाओं पर चोट होने लगे तो स्वाभाविक है कि समाज में उद्वेलन होगा। जब उद्वेलन होगा तो विरोध भी होगा, जब विरोध होगा तो कानून के दखल की अपेक्षा भी होगी। कानून जब दखल देगी तो उसके लिए संविधान सर्वोपरि होगा। और संविधान अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में क्या कहता है, उसको देखने की जरूरत पड़ेगी। इस स्तंभ में इस बात को कई बार कहा जा चुका है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं है। जो अनुच्छेद हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है वहीं पर इस बात की भी व्याख्या है कि अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं क्या हैं। इसलिए इन स्टैंडअप कॉमेडियन को भी और इनके लिए झंडा-बैनर लेकर खड़े होनेवाले अपीलजीवियों को भी भारत के संविधान का ज्ञान होना आवश्यक है। 

अब जरा नजर डालते हैं अपीलजीवी संस्थाओं पर। पीईएन इंटरनेशनल और उससे संबद्ध संस्थाएं भारत के बारे में वर्षों से अनर्गल प्रचार करते रहे हैं। दो हजार चौदह में जब नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी थी तो उसके करीब साल डेढ़ साल बाद ही पीईएन इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट का नाम था ‘इंपोजिंग साइलेंस, द यूज ऑफ इंडियाज लॉ टू सप्रेस फ्री स्पीच’। इस रिपोर्ट को पीईएन कनाडा, पीईएन भारत और युनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो की लॉ फैकल्टी ने संयुक्त रूप से जारी किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लेकर स्थिति अच्छी नहीं है। जो शोध पत्र प्रस्तुत किया गया था उसमें दावा किया गया था ‘भारत में इन दिनों असहमत होनेवालों को खामोश कर देना बहुत आसान है। भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है।‘  इस अध्ययन ने अपने निष्कर्ष का आधार बनाया था आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘पी के’ को लेकर उठे विवाद को और अमेरिकी लेखिका वेंडि डोनिगर की पुस्तक को लेकर उठे विवाद पर। उस अध्ययन में भी दोनों ही उदाहरण अनुचित तरीके से पेश किए गए थे। उस वक्त भी भारत के लिबरल अपीलजीवियों ने पीईएन इंटरनेशनल की उस रिपोर्ट को लेकर माहौल बनाने की असफल कोशिश की थी। पीईएन इंटरनेशनल का दावा है कि वो कवियों, लेखकों, उपन्यासकारों की वैश्विक संस्था है और वो पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति और कलात्मक आजादी के लिए काम करती है। परंतु पिछले करीब छह सात साल से तो ये संस्था भारत में राजनीति के औजार की तरह इस्तेमाल हो रही है।

संस्थाओं से अलग हटकर अरुंधति राय जैसों के वक्तव्यों का विश्लेषण करें तो ये साफ दिखता है कि इनको अभिव्यक्ति की आजादी पर संकट तब दिखता है जब इनकी विचारधारा के लोगों का विरोध होता है। अरुंधति राय का तो विदेशी मंचों पर भारत विरोधी बातें कहने का लंबा इतिहास रहा है। अपनी भारत विरोधी बातों को प्रामाणिकता देने के लिए तो वो पाकिस्तान तक की तारीफ कर चुकी हैं। ये सब एक इंटरनेश्नल सिंडिकेट का हिस्सा है। ये लोग तो भारत की छवि को बिगाड़ने के उपक्रम में ही जुटे रहते हैं और ऐसा करने का कोई भी मौका नहीं चूकते। मुनव्वर फारुकी के मामले में उनको एक बार फिर से अवसर नजर आया और वो राग विरोध गाने लगे। लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। इन सबको ये बात समझ लेनी चाहिए कि भारत का लोकतंत्र अब परिवक्व हो गया है, भारत की जनता भी अब बेहद समझदार हो गई है और इन भारत विरोधी बयानों की असलियत समझ चुकी है। अब इनसे ना तो भारत की जनता विचलित होती है और ना ही इनसे उनको बरगलाया जा सकता है। परोक्ष रूप से राजनीति करनेवाले इन लेखकों-कलाकारों को इस देश की जनता ने उनकी सही जगह बता दी है। लगातार दो लोकसभा चुनाव में इस भारत विरोधी विचार को जनता ने ना केवल खारिज किया बल्कि इसके पोषकों को भी नकार दिया। इस नकार को भी वामपंथ के अनुयायी या उनके पोषक समझ नहीं पा रहे हैं और अब भी उन्ही पुराने औजारों से भारत की जनता को भरमाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रसिद्ध रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है, जिससे सब परिचित हैं। लेकिन नाटक के उपकरणों की तरह इसका उपयोग भाषण के मंचों पर होता है। अपीलजीवियों को ये समझना चाहिए कि विचारधारा का पाखंड अब नहीं चलनेवाला है। 

Saturday, February 6, 2021

रचनात्मकता सूखी तो विवाद का सहारा

हिंदी के एक कहानीकार हैं। नाम है उदय प्रकाश। उनकी लंबी कहानी ‘मोहनदास’ को साहित्य अकादमी ने उपन्यास मानते हुए पुरस्कृत किया था। उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार देनेवाली जूरी में अशोक वाजपेयी भी थे। ये वही अशोक वाजपेयी हैं जिनको कभी उदय प्रकाश ने ‘भारत भवन का अल्सेशियंस’ कहा था। ये वही उदय प्रकाश हैं जिनको योगी आदित्यनाथ ने पहला ‘नरेन्द्र स्मृति सम्मान’ दिया था। जब उनको ये पुरस्कार मिला था तब हिंदी के कई लेखकों ने बयान जारी कर उनकी निंदा की थी। इनमें ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन के अतिरिक्त विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, भगवत रावत, मैनेजर पांडे, राजेन्द्र कुमार, इब्बर रब्बी, मदन कश्यप और देवी प्रसाद मिश्र जैसे वामपंथी लेखक शामिल थे। उस वक्त खूब विवाद हुआ था। इसके बाद उदय प्रकाश ने 2015 में पुरस्कार वापसी का शिगूफा छेड़ा था। ये अलग बात है कि अभी तक वो अपनी पुस्तकों पर अपने परिचय में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक लिखते हैं। पुरस्कार वापसी का शिगूफा छोड़नेवाले उदय प्रकाश पहले लेखक थे लेकिन बाद में अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल जैसे लेखकों ने इसको लपक लिया था और वो पुरस्कार वापसी अभियान के अगुआ माने गए थे। उदय प्रकाश इस बात को लेकर अपने वामपंथी साथियों से झुब्ध हुए थे कि पुरस्कार वापसी का पर्याप्त श्रेय उनको नहीं मिल पाया। 

उदय प्रकाश ने लंबे समय से छिटपुट लघु कथाएं और कविताओं को छोड़कर कुछ लिखा नहीं। लेकिन चर्चा में बने रहने की कला में माहिर हैं। कभी रेत माफिया से जान का खतरा तो कभी हिंदी लेखक प्रभात रंजन के साथ इंटरनेट मीडिया पर अनावश्यक विवाद खड़ा करके वो चर्चा में बने रहते हैं। उदय प्रकाश के बारे में इतना लिखने का औचित्य ये है कि वो एक बार फिर से विवादों में हैं। दरअसल पिछले दिनों उदय प्रकाश ने अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के लिए चंदा दिया और उसकी रसीद अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट कर दी। इस टिप्पणी के साथ कि ‘आज की दान दक्षिणा’। इसके नीचे कोष्ठक में लिखा ‘अपने विचार अपनी जगह पर सलामत’। उनकी इस पोस्ट के बाद वामपंथी खेमे से विरोध के स्वर उठने लिखे। कई लोगों ने उदय प्रकाश का नाम लेकर तो कइयों ने बगैर नाम लिए उनपर पाला बदलने का आरोप लगाया। उदय प्रकाश के इस कदम को लेकर हिंदी साहित्य के कई लेखक अबतक उबल रहे हैं। कुछ ने तो सारी हदें पार करते हुए राम मंदिर तक पर मर्यादाहीन टिप्पणी कर डाली। इसके बाद राम मंदिर के पक्षधरों ने भी मोर्चा खोल दिया। परिणाम ये हुआ कि उदय प्रकाश एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गए।  

उदय प्रकाश हिंदी के एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने किसी जमाने में कुछ अच्छी कहानियां और कविताएं लिखी थीं। बाद में जब रचनात्मकता का सिरा उनके हाथ से छूटा तो वो साहित्येतर क्रियाकलापों से खुद को प्रासंगिक बनाने की जुगत में लग गए। कुछ सालों पहले इस बात की चर्चा हुई थी उदय प्रकाश अपना पहला उपन्यास लिखने जा रहे हैं। खुद लेखक ने भी इस आशय की बातें की थीं। उस वक्त कवि केदारनाथ सिंह जीवित थे, उन्होंने भी अपने एक साक्षात्कार में ये बात बताई थी कि उदय प्रकाश ‘चीना बाबा’ के नाम से एक उपन्यास लिख रहे हैं। साहित्यिक हलकों में तो इस बात की भी चर्चा थी कि उदय प्रकाश ने एक विदेशी प्रकाशन गृह से इसके प्रकाशन के लिए अनुबंध कर लिया है और उनको अग्रिम धनराशि भी मिल गई है। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी अबतक हिंदी साहित्य जगत ‘चीना बाबा’ का इंतजार कर रहा है। इस बीच ‘चीना बाबा’ को लेकर कई तरह की बातें हिंदी प्रकाशन की दुनिया में होती रहीं। कभी किसी प्रकाशन से तो कभी किसी प्रकाशन से उसके प्रकाशित होने की चर्चा होती रही। इस बीच करीब दो साल पहले उनका एक कविता संग्रह ‘अंबर में अबाबील’ प्रकाशित हुआ था। इस कविता संग्रह को ना तो पाठकों ने पसंद किया और ना ही आलोचकों ने। हिंदी साहित्य जगत में तो इसकी चर्चा ही नहीं हुई। पिछले दो साल से ही उनके नए कहानी संग्रह के प्रकाशन की चर्चा सुनाई दे रही है लेकिन वो भी अबतक प्रतीक्षित है। इन सालों में तात्कालिक घटनाओं पर उन्होंने जो खबरनुमा लघु कथाएं लिखी हैं वो भी अबतक इतनी नहीं हो पाई हैं कि जिसको एक संग्रह का रूप दिया जा सके।     

रचनात्मकता के स्तर पर चुक जाने के बाद उदय प्रकाश ने अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए या खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए राम के शरण में जाना तय किया। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए उन्होंने चंदा दिया। राम मंदिर को चंदा देने को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। राम को किसी वाद विशेष के अनुयायियों के आराध्य के तौर पर देखनेवालों से इस तरह की गलतियां हो जाती हैं। राम के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करनेवालों से भी अक्सर इस तरह की भूल हो जाती हैं। राम भारतीय संस्कृति में इस तरह से रचे-बसे हैं कि उनके सामने कोई भी वाद अर्थहीन हो जाता है। राम के व्यक्तित्व का जो वैराट्य है वो धर्म,जाति, विचारधारा,तर्क आदि की परिधि से परे है। राम मंदिर निर्माण को किसी संकीर्ण दृष्टि से देखना या उसपर विवाद खड़ा करना अनुचित है। राम मंदिर पर उठने वाले तमाम विवादों को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से विराम दे दिया था। उसके बाद ही अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण आरंभ हुआ है। मंदिर का निर्माण पूरे देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप हो रहा है। ऐसे में एक वामपंथी लेखक का प्रभु श्रीराम के अयोध्या में निर्मित हो रहे मंदिर के लिए योगदान करना कोई ऐसी बात नहीं है जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जाए। वो उनकी आस्था है। यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में नामवर सिंह की ईश्वर में आस्था सार्वजनिक हुई थी। लेकिन उदय प्रकाश ने जिस तरह से मंदिर के लिए दिए गए चंदे की रसीद को सार्वजनिक किया उसको लेकर प्रश्न उठाना सही है। लेकिन वामपंथी लेखक प्रश्न इस बात पर नहीं ख़ड़े कर रहे हैं, उनको आपत्ति इस बात को लेकर है कि उदय प्रकाश ने मंदिर निर्माण के लिए चंदा क्यों दिया? यह अनायास नहीं है कि उदय प्रकाश जैसे विवादाचार्य वामपंथ की इन कमजोरियों का फायदा उठाकर खुद को चर्चा में बनाए रखने का उपक्रम करते हैं। उदय प्रकाश को ये बखूबी पता रहा होगा कि राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा देने से वामपंथी नाहक विवाद खड़ा करेंगे। हुआ भी वैसा ही। 

दरअसल भारत के वामपंथी बुद्धिजीवी अबतक ना तो भारत को समझ पाए हैं और ना ही भारतीय मानस को। अगर भारतीय मानस को समझ जाते तो प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण को लेकर इस तरह की अमर्यादित टिप्पणियां नहीं करते। समझ तो वो भारतीय संस्कृति को भी नहीं पाए, अगर समझ पाते तो राम मंदिर को किसी खास विचारधारा या खास राजनीतिक दल से जोड़कर देखने की गलती नहीं करते। वो बहुधा इस तरह की गलतियां करते रहे हैं और इसी गलत सोच के चलते उनके सारे कदम भारतीय संस्कृति के खिलाफ ही उठते रहे हैं। इन्हीं गलत आकलन के चलते वामपंथ भारत में लगभग अप्रसांगिक हो चुका है। सांस्कृतिक तौर पर भी और राजनीतिक तौर पर भी। आज जब एक बार फिर से पूरा विश्व भारत की ज्ञान परंपरा को, भारतीय संस्कृति को, भारतीय चिकित्सा पद्धति को एक नई उम्मीद के साथ देख रहा है वहीं भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी अब भी विदेशी विचारधारा के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। 


Sunday, January 31, 2021

पचास की 'पाकीजा'


आपके पांव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे। फिल्म ‘पाकीजा’ ये संवाद बहुधा सुनाई देता है। ये भी सुनने को मिलता है कि ये संवाद अमर हो गया है। दरअसल ये संवाद फिल्म ‘पाकीजा’ की मूल स्क्रिप्ट में नहीं था। जब ये सीन फिल्माया जा रहा था और कैमरा मीना कुमारी के पांव पर पहुंचा तो अचानक कमाल अमरोही के दिमाग में एक मुजरे की याद कौंधी। वो मुजरा था चंदेरी नाम की एक खूबसूरत बाई का, जिसे उन्होंने काफी पहले सुना था। मुजरे में वो अपने पांव को अदा से लहराती थी। कमाल अमरोही ने शूटिंग रोकी और स्क्रीनप्ले में बदलाव करके ये पंक्ति जोड़ दी। हिंदी फिल्मों के इतिहास में कई ऐसी फिल्में हैं जिनके बनने के दौरान के कई रोचक किस्से आज भी सिनेमा प्रेमियों के बीच याद किए जाते हैं। कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ इस तरह की फिल्मों में शीर्ष पर है। इसको लेकर सैकड़ों कहानियां कही-सुनी जाती हैं। ये स्वाभाविक भी है क्योंकि 1957 में जिस फिल्म का मूहुर्त हुआ हो और वो पंद्रह साल बाद 1972 में रिलीज हो तो कहानियां तो बनेंगी हीं। इन पंद्रह सालों में इस फिल्म के निर्माता कमाल अमरोही ने कई बार फिल्म का नाम बदला। ‘पाकीजा’ का नाम ‘लहू पुकारेगा’ तो लगभग तय हो गया था, लेकिन जब फिल्म के रिलीज होने का वक्त आया तो वो फिर से ‘पाकीजा’ पर ही जा पहुंचे। कई पुस्तकों में और उस वक्त की पत्रिकाओं में इसका उल्लेख मिलता है कि जब कमाल अमरोही ने फिल्म बनाने की सोची थी उनके दिमाग में अपने जमाने की दो बाइयों का जीवन था। एक तो जद्दनबाई, जिनकी महफिल में जुल्फिकार अली भुट्टो और के एल सहगल जैसे दिग्गज जाते थे और दूसरी थीं गौहर जान, जिसकी आन-बान के किस्से मशहूर हैं। इसके अलावा भी कमाल अमरोही ने कई बाइयों की जिंदगी को नजदीक से देखा था और कइयों के बारे में सुना था। जब मीना कुमारी से उनकी शादी हुई तो कमाल अमरोही ने उनको लीड रोल में लेकर बाइयों की जिंदगी पर एक फिल्म बनाने की सोची जिसका नाम रखा ‘पाकीजा’।

फिल्म शुरू हुई और सबकुछ ठीक चल रहा था इस बीच कमाल अमरोही और उनकी पत्नी और फिल्म की नायिका मीना कुमारी के बीच संबंध खराब हो गए और फिल्म का काम रुक गया। इसको लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन सात साल के व्यवधान के बाद अगर ‘पाकीजा’ फिर से शुरू हो सकी तो उसके लिए संगीतकार खय्याम और उनकी पत्नी जगजीत कौर की भूमिका को रेखांकित करना जरूरी है। ये वो समय था जब कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को साथ काम करने के लिए अनुरोध पत्र भी लिखा था जिसे मीना कुमारी ने ठुकरा दिया था। कमाल अमरोही परेशान थे। इसी दौर में वो एक दिन अपने दोस्त ख्य्याम के घर गए। वहां जगजीत कौर ने ‘पाकीजा’ की चर्चा छेड़ दी और कमाल अमरोही से अनुरोध किया कि वो अब तक शूट की गई फिल्म उनको दिखाएं। कमाल तैयार हो गए। खय्याम, उनकी पत्नी और कमाल अमरोही ने आधी फिल्म देखी। जगजीत फिल्म के अधूरे हिस्से को देखकर इतनी उत्साहित हो गईं कि उसने मीना कुमारी को मनाने का बीड़ा उठाया। खय्याम और उनकी पत्नी मीना कुमारी के भी अच्छे दोस्त थे। जगजीत कौर ने मीना कुमारी से बात की। मीना कुमारी ने उनको बताया कि कमाल से उनकी बोलचाल बंद है, संबंध बहुत खराब हैं इसलिए ये संभव नहीं है। जगजीत ने हार नहीं मानी और मीना कुमारी को मनाने में लगी रहीं। धीरे-धीरे उनको तैयार कर लिया । मीना कुमारी ने फिर खुद ही कमाल अमरोही को संदेश भेजा कि वो पाकीजा को पूरा करने के लिए तैयार हैं। सात साल के व्यवधान के बाद ‘पाकीजा’ की शूटिंग शुरू हो सकी।

फिर वो दिन आया जब फिल्म रिलीज हुई। फिल्म के प्रीमियर पर मीना कुमारी और कमाल अमरोही साथ बैठे थे। मीना कुमारी के साथ ही खय्याम और जगजीत कौर भी थीं। फिल्म खत्म होने के बाद मीना कुमारी ने जगजीत कौर को गले से लगा लिया। सिनेमा हॉल में ही दोनों काफी देर तक आलिंगनबद्ध रहे और फिर मीना कुमारी ने जगजीत से कहा कि ‘तुम्हारी वजह से ही कमाल का ये सपना साकार हो सका है। तुम्हारी वजह से मैं इतनी अच्छी फिल्म को पूरा कर सकी।‘ भावुकता के इन क्षणों की गवाह बहुत सी फिल्मी हस्तियां बनीं। रिलीज के बाद इस फिल्म ने इतिहास रच दिया। आज पचास साल बाद भी इस फिल्म के गीत, संगीत, फिल्मांकन और निर्देशन की बारीकियां इसको क्लासिक की श्रेणी में रखती हैं।