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Saturday, January 29, 2022

पद्म सम्मान पर सियासी विवाद


हर वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार पद्म सम्मानों की घोषणा करती है। पद्म सम्मान उन लोगों को दिया जाता है जो अपने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हैं। ये राष्ट्रीय सम्मान है। पिछले कुछ वर्षों से पद्म सम्मान ऐसे लोगों को दिए गए हैं जिससे इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ी है। कई बार इस पुरस्कार पर राजनीतिक कारणों से विवाद उठते रहते हैं। इस वर्ष के पद्म सम्मानों की घोषणा को लेकर भी विवाद उठा। भारत सरकार ने इस वर्ष कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेता और बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को पद्मभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की। इस घोषणा के चंद घंटे के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य की पार्टी की तरफ बयान आया कि उन्होंने पद्म सम्मान लेने से मना कर दिया है। एक और समाचार भी बंगाल से ही आया। बंगाली की मशहूर गायिका और बंगाल की लता मंगेशकर कही जानेवाली संध्या मुखर्जी की बेटी की तरफ से एक बयान आया। उसमें कहा गया कि उनकी मां ने पद्मश्री सम्मान लेने से मना कर दिया है। उस बयान के मुताबिक जब गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उनकी सहमति लेने के लिए फोन किया तो उन्होंने ये कहकर इंकार कर दिया कि 90 वर्ष की अवस्था में पद्मश्री उनके लिए अपमान जैसा है। ये सम्मान अपेक्षाकृत कम उम्र के कलाकार को दिया जाना चाहिए। यह उनकी राय है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। जब पद्म सम्मानों की सूची जारी हुई तो उसमें संध्या मुखर्जी का नाम नहीं था। संध्या मुखर्जी की पुत्री की तरफ से दिए गए बयान से एक बात स्पष्ट होती है कि पद्म सम्मान के पहले गृह मंत्रालय के अधिकारी संबंधित व्यक्ति को फोन कर उनकी सहमति लेते हैं।

अब एक बार फिर से लौटते हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य के मामले पर। बुद्धदेव भट्टाचार्य का नाम पद्म सम्मान के लिए घोषित सूची में आया। कुछ घंटे के बाद उनकी तरफ से उनकी पार्टी ने सम्मान के अस्वीकार करने की बात कही। सवाल यही उठता है कि क्या बुद्धदेव भट्टाचार्य को सम्मानित करने के फैसले के पहले उनकी सहमति नहीं ली गई। क्या गृह मंत्रालय के किसी अधिकारी ने बुद्धदेव भट्टाचार्य को फोन नहीं किया। जब पद्मश्री से सम्मानित करने के लिए संध्या मुखर्जी की सहमति के लिए उनको फोन किया गया तो यह मानने की कोई वजह नहीं है कि सरकार की तरफ से बुद्धदेव भट्टाचार्य को फोन नहीं किया गया होगा। इस वर्ष पद्म सम्मान से सम्मनित होनेवालों में फिल्म निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी का भी नाम है। उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने उनको सूची जारी होने के पहले फोन किया और पूछा कि क्या आप सम्मान ग्रहण करने की स्वकृति देते हैं। जब चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने सहमति दी तो उस अधिकारी ने अपना फोन नंबर भी दिया और कहा कि अगर कोई बात हो उनको सूचित करें । सहमति के बाद ही द्विवेदी का नाम पद्मश्री सम्मान के लिए घोषित किया गया। सवाल ये उठता है कि यही प्रक्रिया बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ भी अपनाई गई होगी। उनकी सहमति के लिए भी फोन किया गया होगा। उनके पास भी गृह मंत्रालय के अधिकारी ने फोन नंबर छोड़ा होगा। तो फिर पद्मभूषण अस्वीकार करने की बात सूची में नाम आने के बाद क्यों की गई? क्या पहले सहमति दी गई और जब कम्युनिस्ट पार्टी को ये बात पता चली तो उन्होंने बुद्धदेव बाबू का निर्णय बदलवा दिया? मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता इस तरह के द्वंद्व के शिकार होते रहे हैं

1996 में बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया गया था। उस वक्त भी पार्टी के नेताओं ने ज्योति बसु पर दबाव बनाकर उनसे प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार करवा दिया था। तब सीपीएम क नेताओं ने तर्क दिए थे कि गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री बनकर ज्योति बसु मार्क्सवादी एजेंडे को लागू नहीं करवा पाएंगे। ज्योति बाबू ने पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता की तरह उस निर्णय को स्वीकार कर लिया था लेकिन मन मसोस कर। चंद महीने बाद ही ज्योति बाबू का दर्द छलक आया था। उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं के निर्णय को ऐतिहासिक भूल करार दिया था। ज्योति बाबू लंबे समय तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे, पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता रहे लेकिन इस मसले पर उन्होंने पार्टी की आलोचना की थी। कहा जाता है कि ज्योति बाबू ने एक ही बार पार्टी के निर्णय को सार्वजनिक रूप से गलत बताया था। बाद में सीपीएम के कई नेताओं ने पार्टी के उस फैसले से असहमति जताते हुए गलती मानी। दरअसल सीपीएम अपने स्थापना काल से ही द्वंद्वात्मक राजनीति का शिकार होती रही है। स्वाधीनता के आंदोलन में  जब बापू ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया था तब कम्युनिस्टों ने उसका विरोध किया था। इसी तरह से अमेरिका के साथ परमाणु करार के समय पार्टी की लाइन नहीं मानने पर सीपीएम ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। ये हास्यास्पद फैसला था क्योंकि सोमनाथ चटर्जी उस समय लोकसभा के स्पीकर थे। स्पीकर किसी पार्टी का सदस्य नहीं होता है। बाद में सोमनाथ चटर्जी ने अपनी संस्मणात्मक पुस्तक कीपिंग द फेथ, मेमोयर्स आफ अ पार्लियामेंटेरियन में अपनी पूर्व पार्टी की द्वंद्वात्मक राजनीति पर विस्तार से लिखा। संभव है सीपीएम को कई सालों बाद बुद्धदेव के पद्मभूषण सम्मान लौटाने के फैसले पर अफसोस हो। 

दूसरा विवाद उठा गुलाम नबी आजाद पद्म भूषण से सम्मानित करने के निर्णय को लेकर। इस सूचना के सार्वजनिक होते ही कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री जयराम रमेश ने बुद्धदेव भट्टाचार्य के पद्मभूषण अस्वीकार के एक ट्वीट को रिट्वीट करते हुए लिखा कि वो आजाद रहना चाहते हैं गुलाम नहीं। उनकी इस टिप्पणी को गुलाम नबी आजाद पर सीधा हमला माना गया। उसके बाद पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार, कपिल सिब्बल के साथ साथ पूर्व मंत्री कर्ण सिंह भी गुलाम नबी आजाद के समर्थन में आ गए। कर्ण सिंह ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय सम्मान को पार्टी के अंदरुनी कलह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। विवाद के बीच कांग्रेस के एक नेता ने तो दूरदर्शन पर हुई एक चर्चा में गुलाम नबी आजाद को गद्दार तक कह दिया। गुलाम नबी पर बीजेपी से साठगांठ का आरोप तक जड़ दिया। जब कि कांग्रेस के नेता ये भूल गए कि पिछले ही वर्ष कांग्रेस के नेता और असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई को मरणोपरांत पद्म सम्मान से सम्मानित किया गया था। कांग्रेस के ही नेता रहे नगालैंड के पूर्व मुख्यमंत्री एस सी जमीर को भी पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। इन दोनों को सम्मानित करने पर तो कांग्रेस के नेताओं को कोई आपत्ति नहीं हुई। 

सवाल यह उठता है कि पद्म पुरस्कार को राजनीति के अखाड़े में क्यों घसीटा जाता है। पद्म पुरस्कार कोई दल या कोई व्यक्ति नहीं देता है। भारत के इस प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान को दलगत राजनीति से उपर उठकर देखा जाना चाहिए। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि पिछले कुछ सालों से जिस तरह के लोगों का चयन पद्म सम्मानों के लिए हो रहा है उसने इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ी है। उसको एक दो नामों के आधार पर विवादित करने या उसके आधार पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। आज पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव वर्ष में सभी दलों के नेताओं को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समाज के अपने नायकों का सम्मान करना चाहिए। बुद्धदेव भट्टाचार्य या गुलाम नबी आजाद को पद्म सम्मान से सम्मानित करने के समावेशी निर्णय को स्वीकार करते हुए सभी दलों को सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए था। 

Saturday, January 22, 2022

सम्राट अशोक पर अनावश्यक विवाद


बिहार के स्कूल में पढ़ाई के दौरान की एक स्मृति अबतक मानस पटल पर है। कक्षा में छात्रों से बात करते हुए हमारे प्राथमिक विद्यालय के मास्टर साहब कौवा और कान का उदाहरण देकर छात्रों को समझाया करते थे । वो हमेशा कहते थे कि अगर कोई कहे कि कौवा कान लेकर भाग गया तो कौवा के पीछे मत भागो पहले अपने कान को देखो। बिहार में इसका प्रयोग कहावत की तरह भी होता है। अपने गृह राज्य बिहार में सम्राट अशोक पर उठे विवाद के बाद अपने प्राथमिक विद्यालय के इस प्रसंग की लगातार याद आ रही है। बुजुर्ग लेखक दया प्रकाश सिन्हा को उनके नाटक सम्राट अशोक के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिया गया। उनपर आरोप है कि उन्होंने सम्राट अशोक की तुलना मुगल आततायी औरंगजेब से की। उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के बिहार के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने केस दर्ज करवाया। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया है कि पुस्तक में सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से की गई है। यह आश्चर्य का विषय है कि दया प्रकाश सिन्हा ने अपनी पुस्तक सम्राट अशोक में कहीं भी औरंगजेब का नामोल्लेख तक नहीं किया है। अब कोई ये बताए कि बगैर नामोल्लेख के अशोक की तुलना औरंगजेब से कैसे की जा सकती है। सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही नहीं बल्कि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता उपेन्द्र कुशवाहा भी दया प्रकाश सिन्हा से पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इन दिनों जेडीयू में हैं इसके पहले वो इस पार्टी में आते जाते रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा 2014 से लेकर करीब चार साल तक केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) में राज्यमंत्री रह चुके हैं। उपेन्द्र कुशवाहा इस बात से खिन्न हैं कि दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखी हैं। 

दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक जिन बातों का उल्लेख किया है उसके बारे में इतिहासकार लंबे समय से लिखते रहे हैं। ए एल बैशम, राम शरण शर्मा, रोमिला थापर, डी एन झा, के एम श्रीमाली से लेकर रमाशंकर त्रिपाठी तक ने अपनी पुस्तकों में इन बातों का उल्लेख किया है। करीब चार साल तक उपेन्द्र कुशवाहा केंद्र में शिक्षा राज्य मंत्री रहे ।उनके मातहत एक संस्था है राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद। यहां से राम शरण शर्मा लिखित ग्यारहवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक एनसिएंट इंडिया प्रकाशित है। इसकी पृष्ठ संख्या 100-01 पर इस बात का उल्लेख है कि बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक अपनी आरंभिक जिंदगी में बहुत निर्दयी था और उसने राजगद्दी पाने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या की थी। हलांकि लेखक ये भी कहते हैं कि ये गलत भी हो सकता है क्योंकि बौद्ध लेखकों ने उनकी जीवनी में कई काल्पनिक बातें डाली हैं। सवाल ये उठता है कि अगर ये तथ्य गलत थे तो इसका उल्लेख क्यों किया गया ? छात्रों को सालों से ये क्यों पढाया जा रहा है? शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने इसको पाठ्य पुस्तक से हटवाने का उपक्रम क्यों नहीं किया? 

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी माध्यम कार्यन्वयन निदेशालय की एक पुस्तक है प्राचीन भारत का इतिहास। इस पुस्तक के संपादक हैं इतिहासकार डी एन झा और के एम श्रीमाली। इस पुस्तक के एक लेख के अनुसार, अशोक के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के प्रमुख साधन उसके शिलालेख तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख हैं। किंतु ये अभिलेख अशोक के प्रारंभिक जीवन पर कोई प्रकाश नहीं डालते। इनके लिए हमें संस्कृत तथा पालि में लिखे हुए बौद्ध ग्रंथों पर निर्भर करना पड़ता है। परंपरानुसार अशोक ने अपने भाइयों का हनन करके सिंहासन प्राप्त किया था (पृ. संख्या 178)। ये पुस्तक पहली बार 1981 में प्रकाशित हुई थी। क्या शिक्षा राज्य मंत्री रहते हुए उपेन्द्र कुशवाहा ने दिल्ली विश्वविद्यालय को इस सबंध में कोई आपत्ति पत्र भेजा था। पहली बार 1942 में प्रकाशित अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट इंडिया में रमा शंकर त्रिपाठी भी लिखते हैं कि सिंहली परंपराओं के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या करने और खून की नदियां बहाकर गद्दी हासिल की थी। त्रिपाठी भी इस बात का उल्लेख करते हैं कि कुछ विद्वानों को इस पर संदेह है। अपनी पुस्तक ‘द वंडर दैड वाज इंडिया’ में इतिहासकार ए एल बैशम भी बौद्ध सूत्रों के आधार पर लिखते हैं कि अशोक ने विरोधियों की हत्या करके गद्दी हथियाई थी। एक तानाशाह के रूप में अपना शासन किया था (पृ संख्या 53)। बैशम भी यहां जोड़ते हैं कि अशोक के शिलालेखों में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता । 

रोमिला थापर ने 1963 में एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है ‘अशोक एंड द डिक्लाइन आफ द मौर्याज’। ये आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित है। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 20 से लेकर 30 तक में रोमिला थापर ने विभिन्न बौद्ध सूत्रों के आधार पर अशोक के बारे में विस्तार से लिखा है। रोमिला थापर लिखती हैं कि अशोक अपने आरंभिक दिनों में सुंदर नहीं दिखते और उनके पिता बिंदुसार उनको पसंद नहीं करते थे। बाद के पृष्ठों पर लिखा है कि दिव्यावदान के मुताबिक जब अशोक के पिता बिंदुसार की मृत्यु हो रही थी तो वो अपने पुत्र सुसीम को राजा बनाना चाहते थे लेकिन उनके मंत्रियों ने अशोक को गद्दी पर बिठा दिया। महावंस और दीपवंस के अनुसार अशोक ने बिंदुसार की अन्य पत्नियों से जन्मे अपने 99 भाइयों की हत्या करवाई। तारानाथ के अनुसार अशोक ने अपने जीवन के आरंभिक वर्ष आनंद और मनोरंजन में व्यतीत किए जिसकी वजह से उनको कामाशोक आदि कहा गया। अपनी इस पुस्तक में रोमिला थापर ने विस्तार से अशोक के स्वभाव, महिलाओं के प्रति उनके व्यवहार,परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों आदि को बौद्ध सूत्रों के आधार पर पाठकों के समक्ष रखा है। रोमिला थापर की इस पुस्तक के दस से अधिक रिप्रिंट हो चुके हैं। रोमिला थापर ने ये पुस्तक 1963 में लिख दी थी अन्यथा अब तो उनको भी केस मुकदमा झेलना पड़ता।

इस देश में तो भगवान राम के बारे में भी जाने लोग क्या क्या कहते रहे हैं। सीता निर्वासन के प्रसंग को लेकर फूहड़ बातें भी लिखी गईं। एम एफ हुसैन तो देवी देवताओं के नग्न चित्र तक बनाते रहे। महात्मा गांधी के बारे में कितनी तरह की बातें कही जाती रही हैं। करीब दस साल पहले तेलुगू के एक लेखक वाई लक्ष्मण प्रसाद को साहित्य अकादमी ने उनकी पुस्तक द्रौपदी पर पुरस्कृत किया था। उस पुस्तक में द्रौपदी को लेकर अमर्यादित टिप्पणी की गई थी। भाषा बेहद निम्न स्तर की थी। जब इन मसलों का विरोध होता था तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों के पेट में दर्द होने लगता था। चूंकि दया प्रकाश सिन्हा कभी भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं तो अभिव्यक्ति के सारे पहरेदार अचानक खामोश हो गए हैं। दया प्रकाश सिन्हा ने अपने नाटक में सम्राट अशोक के बारे में कोई नई बात नहीं बात लिखी है। इतिहासकार ये लिखते रहे हैं।उनके विरोध की वजह अकादमिक न होकर राजनीतिक प्रतीत होती है। क्या बिहार की राजनीति में कुछ नया घटित होनेवाला है जिसकी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है या उपेन्द्र कुशवाहा अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं। इतिहास अशोक को सम्राट अशोक मानता है और अंग्रेजी में उनको ‘अशोक द ग्रेट’ कहा जाता है। उनके बारे में तमाम तरह के तथ्य खुलेंगे लेकिन अशोक ने जिस तरह से ‘दिग्विजय’ के स्थान पर ‘धम्मविजय’ के सिद्धांतों को अपनाया वो अतुलनीय है। 

Saturday, January 15, 2022

साहित्य में दयनीय महानता का दौर


इन दिनों हिंदी साहित्य में एक अजीब किस्म का सन्नाटा दिखाई देता है। कुछ रचनाकार कई बार अपने लेखन से तो कई बार अपनी टिप्पणियों से इस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश करते हैं। वरिष्ठ लेखिका मैत्रेयी पुष्पा नियमित तौर पर फेसबुक पर कोई टिप्पणी लिखकर साहित्य के ठहरे पानी में कंकड़ फेंकती रहती हैं। कई बार उस पर विवाद भी होता है। बीच-बीच में लेखक संगठनों के नाम पर कुछ नए पुराने लेखक अपील आदि जारी करते रहते हैं लेकिन उसका भी कहीं कोई असर दिखाई नहीं देता है। ऐसी अधिकतर अपील किसी न किसी चुनाव के पहले ही जारी की जाती हैं। अब तो इसका असर इंटरनेट मीडिया पर भी नहीं होता।  जमीनी स्तर पर तो शायद अपील पहुंचती भी नहीं है। कुछ ऐसे भी लेखक हैं जो साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में फासीवाद को लेकर चिंतित ही नहीं रहते हैं बल्कि उसके खतरों से लोगों को आगाह भी करते रहते हैं। उधर सरकार के विभिन्न मंत्रालय और विभाग साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक विरोधियों को लगातार स्थान देती रहती है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका आजकल के आवरण पर धुर वामपंथी कवि की तस्वीर छपती है। इसके पहले भी वामपंथी विचारधारा के लेखकों के चित्र आजकल पत्रिका के आवरण पर नियमित तौर पर छपते रहे हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार मोदी सरकार के घोषित विरोधियों को दिया जाता है। फिल्म फेस्टिवल से लेकर युवा महोत्सव तक में सरकार विरोधियों की फिल्में और वक्ता के तौर पर उनको आमंत्रित करके सरकार लगातार अपने लोकतांत्रिक होने का प्रमाण देने में जुटी है। बावजूद इसके विचारधारा विशेष के लेखकों को 2014 के बाद से ही फासीवाद का डर सता रहा है। 

अब वामपंथियों में एक नई प्रवृत्ति स्पष्ट दिखने लगी है। पहले वो अपनी विचारधारा से संबद्ध राजनीतिक दलों के लिए काम करते थे । पिछले तीन चार साल से हो रहे चुनावों में वामपंथी दलों की हालत बहुत खराब हो गई है। अब अधिकतर वामपंथी लेखकों को कांग्रेस में संभावना नजर आने लगी। वामपंथी लेखक अब खुलकर कांग्रेस पार्टी के लिए काम करते हुए नजर आने लगे हैं। इंटरनेट मीडिया पर उनके लिखे को देखने से ये स्पष्ट हो जाता है। उनको अब इंदिरा गांधी के फासीवाद की बिल्कुल याद नहीं आती। उनको आपातकाल के दौर की ज्यादातियों की भी याद नहीं आती। निर्मल वर्मा ने तमिल लेखक पी कृष्णन से एक बातचीत में स्पष्ट रूप से इंदिरा गांधी की फासीवादी नीतियों और हिंदी के लेखकों पर अपनी राय रखी थी। निर्मल वर्मा ने कहा था, सबसे अधिक चौंकानेवाली बात थी इंदिरा गांधी की अलोकतांत्रिक तथा अत्याचारी नीतियों का बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा जरा भी विरोध न किया जाना। वैसे तो इंदिरा गांधी की तानाशाही हल्की थी लेकिन इस हल्के संस्करण ने भी  हमारे बुद्धिजीवी वर्ग को खासा भयभीत कर दिया था और उन्होंने घुटने टेक दिए थे। इस क्रम में निर्मल ने रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती तक का नाम लिया था। निर्मल ने बहुत कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा था कि उन्हें इस बात का अंदाज नहीं था कि हिंदी के बड़े साहित्यकार इतने भंगुर और सारहीन सिद्ध होंगे। अब जब वामपंथी लेखक भय से नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से इंदिरा गांधी की विरासत की प्रशंसा कर रहे हैं। संभव है इस वजह से प्रभाव नहीं पैदा कर पा रहे हैं। 

साहित्य के राजनीतिक दांवपेंच से अलग हटकर अगर रचनात्मक स्तर पर भी देखें तो हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक नहीं लगता है। अब भी वरिष्ठ और बुजुर्ग साहित्यकार ही अपनी सक्रियता से रचनात्मक संसार को जीवंत बनाने के प्रयास में लगे हुए हैं, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। हिंदी के अधिकतर युवा लेखक आत्ममुग्धता के शिकार हो गए हैं। छोटे-मोटे उपन्यास लिखनेवाले भी खुद को प्रेमचंद से बड़ा कथाकार मानने लगा है। उसकी अपेक्षा भी होती है कि साहित्य समाज उनको प्रेमचंद से अधिक सम्मान भी दे। इसी अहंकार में वो आलोचना से लेकर समीक्षा विधा को खारिज करने लगते हैं। इंटरनेट माध्यम पर होनेवाली फूहड़ या प्रशंसात्मक चर्चा को सत्य मानकर वो अपनी कृति को महान समझ लेते हैं। कवियों के तो कहने ही क्या, वो तो खुद की रचनाओं पर मुग्ध रहते ही हैं। साहित्य के इस दौर को देखकर एक मित्र की टिप्पणी सटीक लगती है। उसने एक दिन कहा था कि हिंदी साहित्य में ये दयनीय महानता का दौर है। ,

आज अगर हिंदी साहित्य में किसी प्रकार का कोई विमर्श नहीं हो रहा है तो उसके पीछे के कारणों की पहचान करनी होगी। राजेन्द्र यादव से हमारा वैचारिक स्तर पर काफी विरोध रहता था लेकिन उनकी इस बात के लिए उनके विरोधी भी प्रशंसा करते थे कि वो साहित्य में अछूते प्रश्न उठाते थे। नामवर सिंह धुर वामपंथी थे, कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे लेकिन जब वो लिखते थे तो उससे साहित्य जगत में हलचल होती थी, उनके लिखे के पक्ष विपक्ष में बातें होती थीं। अशोक वाजपेयी भी जबतक वामपंथ की राजनीति में नहीं उलझे थे तबतक उनके लेखन में एक वैचारिक उष्मा होती थी। इनके बाद की पीढ़ी में भी देखें तो ज्ञानरंजन से लेकर रवीन्द्र कालिया तक के लेखन में कुछ ऐसे तत्व अवश्य होते थे जो पाठकों के बीच चर्चा की वजह बनते थे। नरेन्द्र कोहली के लेखन में लगातार प्रयोग होते थे जो पाठकों को नई तरह से सोचने का आधार देते थे। कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद को समझने की नई दृष्टि हिंदी साहित्य जगत को दी। इन लोगों में अहंकार नहीं था और वो अपने पूर्वज लेखकों को कभी खारिज नहीं करते थे। उनको साहित्य की परंपरा का भी ज्ञान था और उसपर वो गुमान भी करते थे। कविता में भी देखें तो आधुनिक काल के कवियों ने काफी प्रयोग किए। स्वाधीनता के बाद भी कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से भारतीय समाज की जड़ता पर प्रहार किया। आज ज्यादातर कविताएं गद्य में लिखी जा रही हैं। पहले कवियों पर संपादक नाम की संस्था का एक फिल्टर होता था लेकिन अब इंटरनेट मीडिया ने उस फिल्टर को समाप्त कर दिया। परिणाम यह हो रहा है कि कविता के नाम पर अंट शंट लिखा जा रहा है। लेकिन अहंकार इतना कि खुद को दिनकर और बच्चन से कम मानने को राजी नहीं। 

एक जमाना होता था जब साहित्यकारों की निजी गोष्ठियां हुआ करती थीं। जिसमें साहित्य की प्रवृत्तियों से लेकर नए लिखे जा रहे पर चर्चा होती थी। लोग खुलकर नई रचनाओं पर अपनी बातें रखते थे। आलोचना या प्रशंसा दोनों होती थी। इसमें बैठनेवाले वरिष्ठ साहित्यकार नए लेखकों की टिप्पणियों को ध्यान से सुनते थे और अगर आवश्यकता होती थी तो उसमें सुधार भी करते थे। इसका फायदा ये होता था कि नए लेखकों की समझने की दृष्टि का विस्तार होता था।  इंटरनेट मीडिया के विस्तार के बाद इस तरह की गोष्ठियां कम हो गईं। लोगों में पढ़ने की भी आदत कम होती जा रही हैं। रचनाओं पर टिप्पणी के स्थान पर लाइक के बटन अधिक दबने लगे हैं। दूसरी एक बात जो युवा लेखकों में देखने को मिल रही है कि वो अपनी लेखकीय परंपरा से अनजान हैं, उनको इस बात का भान ही नहीं है कि वो जिस भारतीय लेखन परंपरा में आना चाह रहे हैं वो कितना समृद्ध है। जब अपनी परंपरा के वैराट्य का अनुमान नहीं होता है तो व्यक्ति अहंकार का शिकार हो जाता है। उसको लगता है कि उसने जो लिख दिया है वही सबसे अच्छा है। युवा लेखकों को अपनी इस कमी को दूर करना होगा तभी जाकर हिंदी साहित्य जगत का वैचारिक सन्नाटा दूर होगा।  

Saturday, January 8, 2022

भाषा के बीच की खाई भरती फिल्में


कोरोना की तीसरी लहर के आरंभ होने के पहले एक बड़ी हिंदी फिल्म रिलीज हुई, जिसका नाम है 83। रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण जैसे बड़े सितारों और कबीर खान जैसे निर्देशक के होने के बावजूद यह फिल्म बुरी तरह असफल रही। इतनी बड़ी स्टार कास्ट के बावजूद फिल्म का लागत भी नहीं निकाल पाना कई सवाल खड़े करता है। फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को चार उसके अधिक स्टार दिए थे, लेकिन ये फिल्म नहीं चली। समीक्षा को फिल्म की सफलता से नहीं जोड़ा जा सकता है। मुझे याद है मैं बहुत छोटा था तब फिल्म शोले रिलीज हुई थी। उसकी प्रकाशित समीक्षा का शीर्षक अबतक याद है। शीर्षक था, शोले जो भड़क न सका। शोले ऐसा भड़का कि उसने सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। फिल्म 83 को समीक्षकों ने सर पर चढ़ाया लेकिन दर्शकों पर जादू नहीं चल सका। कुछ लोगों का तर्क है कि फिल्म 83, जो कि 1983 में भारत के क्रिकेट विश्व कप जीतने पर आधारित है, का क्लाइमैक्स दर्शकों को मालूम है इस वजह से फिल्म नहीं चली। इस तरह के तर्क देनेवालों के सामने रामलीलाओं के मंचन का उदाहरण है। रामलीला का क्लाइमैक्स सभी को पता है। बावजूद इसके रामलीला में भारी भीड़ उमड़ती है। इसलिए यह तर्क सही प्रतीत नहीं होता है कि क्लाइमैक्स पता होने की वजह से फिल्म नहीं चली। कुछ लोगों का तर्क है कि लोग क्रिकेट देखने सिनेमा हाल में नहीं जाते हैं और निर्देशक ने फिल्म में क्रिकेट बहुत अधिक दिखाई है। अलग अलग लोग अलग अलग तर्क। पर मुझे लगता है कि इसपर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या दिल्ली के जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी दीपिका की तस्वीर अब भी दर्शकों के मन पर अंकित है?  2020 के जनवरी में दीपिका की फिल्म छपाक आई थी तब वो अपने फिल्म के प्रमोशन को ध्यान में रखते हुए दीपिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़ी हो गई थी। तब उनकी फिल्म छपाक पिट गई थी। अब एक बार फिर 83 में दीपिका की उपस्थिति और फिल्म का असफल होना, कहीं कोई संकेत तो नहीं है? अगर ये संकेत सही है तो फिल्मी दुनिया के कलाकारों को सावधान हो जाना चाहिए। उनको ये बात समझ में आ जानी चाहिए कि फिल्म और राजनीति दोनों अलग अलग हैं। दोनों का घालमेल नुकसान पहुंचा सकता है।  

इसी समय एक दूसरी फिल्म आई पुष्पा, जो मूलरूप से तेलुगू में बनी है। इस फिल्म को हिंदी में डब करके रिलीज की गई। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया। इसके नायक अल्लू अर्जुन हैं। फिल्म भले ही एक्शन ड्रामा है लेकिन पूरा परिवेश दक्षिण भारतीय है, फिर भी हिंदी के दर्शकों को भाया। इस फिल्म को दर्शकों ने 83 से अधिक पसंद किया। कमाई भी अधिक रही। वजह है फिल्म की कहानी और उसको कहने का अंदाज। पुष्पा फिल्म के निर्देशक सुकुमार ने फिल्म 83 के निर्देशक कबीर खान से बेहतर तरीके से अपनी कहानी को दर्शकों के सामने रखी। दर्शकों ने उसको पसंद किया। कबीर खान फिल्म 83 को भव्य और ग्लैमरस बनाने के चक्कर में कहानी को यथार्थ से दूर ले गए। नतीजा यह हुआ कि दर्शकों ने फिल्म को नकार दिया। दंगल हो या फिर सुल्तान दोनों फिल्में भव्य भी थीं, ग्लैमर भी था लेकिन निर्देशक ने यथार्थ की डोर नहीं छोड़ी। दूसरी एक बात जो फिल्म 83 को अति साधारण फिल्म बना देती है वो यह कि इस फिल्म से दर्शकों की भावनाएं नहीं जुड़ पाई। 1983 की विश्व कप जीत के बाद पैदा और जवान हुई पीढ़ी खुद को इस फिल्म के साथ आईडेंटिफाई नहीं कर पाई। निर्देशक इसमें चूक गए। फिल्म चक दे इंडिया के निर्देशक शमित अमीन अपनी फिल्म को दर्शकों की संवेदना से जोड़ने में सफल रहे थे। फिल्म भी सुपरहिट रही थी। 

फिल्म 83 के फ्लॉप होने की को दर्शकों की बदलती पसंद से जोड़कर भी देखा जा सकता है। ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म के लोकप्रिय होने के बाद से फिल्मी सितारों से अधिक लोग कहानी को पसंद करने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी फिल्मों से स्टार और सुपरस्टार वाली व्यवस्था खत्म हो जाएगी । दरअसल ओटीटी ने दर्शकों की रुचि का विस्तार किया है। अब हिंदी भाषी दर्शक अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्में अपेक्षाकृत अधिक देखने लगे हैं। ओटीटी के पहले ये विकल्प मौजूद नहीं था। पहले होता ये था कि तमिल भाषा की फिल्म सिर्फ तमिलनाडु या पडुचेरी में दिखाई जाती थी। अन्य प्रदेशों में उसको दिखाने के लिए उस प्रदेश की भाषा में डब करना पड़ता था। एक दौर में टीवी पर दक्षिण भारतीय भाषाओं की हिंदी में डब की गई फिल्में खूब दिखाई जाती थीं। ओटीटी के प्रचलन में आने के बाद से अब दर्शक मूल भाषा में फिल्में देखना पसंद करने लगे हैं। अभी पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी जिसमें ये बताया गया था कि मलयालम में बनी फिल्म को केरल के बाहर के दर्शकों ने अधिक देखा। अब मलयालम या मराठी फिल्मों को गैर मलयाली और गैर मराठी दर्शक भी देख रहे हैं। जिनको पहले क्षेत्रीय फिल्में कहा जाता था आज वो मुख्यधारा की फिल्में बन रही हैं। अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा हो या मलयाली फिल्म कुरुथी हो या फिर तमिल फिल्म सरपता परमबराई हो। इन सबकी सफलता ने ये साबित किया है कि क्षेत्रीय फिल्में अपनी भौगोलिक सीमा से बाहर निकलकर दूसरी भाषा के लोगों को भी पसंद आ रही हैं। अमेजन प्राइम वीडियो के एक अधिकारी का बयान प्रकाशित हुआ था कि तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्म के पाचस प्रतिशत दर्शक उनके अपने प्रदेशों के बाहर के होते हैं। भाषाई फिल्मों की व्याप्ति बढ़ने से जो सबसे महत्वपूर्ण घटित हो रहा है वो ये कि भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्यता कम हो रही है। हिंदी को लेकर अन्य भारतीय भाषा के कुछ लोगों के मन में जो दुर्भाव था वो कम हो रहा है। जब इस तरह के लोग ये जानते पढ़ते हैं कि हिंदी भाषी लोग अन्य भारतीय भाषाओं की फिल्मों को उनसे अधिक संख्या में देख रहे हैं तो उनके मन से हिंदी प्रति दुर्भावना कम या खत्म हो रही है। इस तरह से अगर हम देखें तो भाषाई वैमनस्यता दूर करने में फिल्में अब बड़ी भूमिका निभा रही हैं।ये बहुत बड़ी बात है। 

अपनी तमाम कमियों और राजनीतिक एजेंडा के बावजूद ओटीटी पर दिखाई जानेवाले कंटेट ने मनोरंजन की दुनिया को पहले से अधिक समावेशी बनाया है। अब फिल्मों में पहले की अपेक्षा अधिक प्रयोग हो रहे हैं। एक और बात जो रखांकित की जानी चाहिए वो ये कि ओटीटटी पर भारतीय फिल्मों को वैश्विक दर्शक भी मिलने लगे हैं। इसके भी कई फायदे हैं। अब वैश्विक मंचों पर भारतीय फिल्मों की चर्चा होने लगी है। पूरी दुनिया का ध्यान भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की ओर जाने लगा है। भारत कहानियों का देश है, कथावाचकों का देश है। कहानियां भी हैं और कहने का अलग अलग अंदाज भी है। कहने के विविध अंदाज को भी वैश्विक दर्शक मिले हैं। कोरोना के संकट ने एक बार फिर से सिनेमा हाल के जरिए फिल्म के व्यवसाय को बाधित किया है। फिर से फिल्मों के ओटीटी पर दिखाने का दौर आरंभ होगा। ओटीटी पर आनेवाली फिल्मों के निर्माता और निर्देशकों को भारतीय दर्शकों की रुचियों में आ रहे बदलाव का ध्यान रखना होगा। कहानी को यथार्थ के रास्ते पर चलाकर ही प्रयोग करने होंगे। सफलता की कुंजी वहीं हैं।  


Saturday, January 1, 2022

रचनात्मकता से भरपूर होगा नववर्ष


नववर्ष 2022। हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत को इस वर्ष से बहुत उम्मीदें हैं। समकालीन साहित्यिक और प्रकाशन परिदृश्य से जिस तरह का समाचार प्राप्त हो रहा है वो बेहद उत्साहजनक है। इस समय हिंदी साहित्य में कई पीढ़ियां एक साथ सृजनरत हैं। एक तरफ रामदरश मिश्र और विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे बुजुर्ग लेखक हैं तो दूसरी तरफ नवीन चौधरी और भगवंत अनमोल जैसे युवा लेखक अपनी रचनाशीलता से हिंदी साहित्य जगत की रचनात्मकता को जीवंत रखे हुए हैं। इनके बीच में यतीन्द्र मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ, रजनी गुप्त, रत्नेश्वर और संजय कुंदन की पीढ़ी के लेखक भी लगातार लिख रहे हैं। मैत्रेयी पुष्पा और उषाकिरण खान की भी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। हिंदी साहित्य की रचनाशीलता के हिसाब से ये वर्ष बेहद आश्वस्तिकारक लग रहा है। वाणी प्रकाशन से वरिष्ठ लेखिका पुष्पा भारती की एक महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन इस वर्ष होगा जिसका नाम है अमिताभ बच्चन एक जीवनगाथा। पुष्पा भारती हिंदी की समर्थ लेखिका और धर्मवीर भारती की पत्नी हैं। धर्मवीर भारती और हरिवंशराय बच्चन के परिवार में निकटता रही है। पुष्पा भारती ने अमिताभ बच्चन के संघर्ष और सफलता को बहुत करीब से देखा है। उनके इस पुस्तक की साहित्य जगत को उत्सुकता से प्रतीक्षा है। हिंदी फिल्मों से जुड़े एक और व्यक्तित्व पर पुस्तक इस वर्ष प्रकाशित होगी। गीतकार, पटकथा लेखक और निर्देशक गुलजार के जीवन पर यतीन्द्र मिश्र की बहुप्रतीक्षित पुस्तक का प्रकाशन भी वाणी प्रकाशन से ही होगा। यतीन्द्र मिश्र ने हिंदी में पुस्तक लेखन की एक शैली विकसित की है जिसमें वो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से लंब समय तक बातचीत रिकार्ड करते हैं फिर उसके आधार पर पुस्तक लिखते हैं। गुलजार से भी यतीन्द्र पिछले 15 साल से उनके जीवन और फिल्मों पर बातचीत रिकार्ड कर रहे थे। पिछले दो साल से वो इसको पुस्तक का स्वरूप देने में लगे थे। अब इस वर्ष उसका प्रकाशन होता दिख रहा है। यतीन्द्र मिश्र के मुताबिक इस पुस्तक में गुलजार और उनकी कला के बारे में, उनके कवि रूप के बारे में पाठकों को कई नई जानकारियां मिलेंगी। गुलजार ने जो फिल्में बनाई हैं या जो गीत लिखे हैं उसमें उन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं। यतीन्द्र ने उन प्रयोगों को अपनी इस पुस्तक में संजोया है। 

इक्कसवीं शताब्दी के आरंभ में हिंदी में कई महत्वपूर्ण उपन्यास प्रकाशित हुए थे। इसमें मैत्रेयी पुष्पा का अल्मा कबूतरी, चित्रा मुद्गल का आवां, असगर वजाहत का कैसी आगी लगाई आदि प्रमुख हैं। उसके बाद भी उपन्यासों का प्रकाशन होता रहा लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उपन्यास लेखन कम हुआ। नई वाली हिंदी के सत्य व्यास ने अपने उपन्यासों से हिंदी साहित्य जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप किया। लेकिन लंबे समय तक याद रखे जानेवाले उपन्यासों की कमी को आलोचक लगातार रेखांकित करते रहे। इस वर्ष कई महत्वपूर्ण उपन्यास आनेवाले हैं। एक तो चित्रा मुदगल का उपन्यास नकटौरा जो सामयिक प्रकाशन से प्रकाश्य है। लड़के के विवाह के लिए जब घर के पुरुष बारात चले जाते थे तो उस रात को घर की स्त्रियां नकटौरा आयोजित करती थीं। इसमें पास पड़ोस की स्त्रियां भी शामिल होती थीं। इसमें स्त्रियां एक तरह से स्वांग रचाती थीं और अपने मन की बातें किया करती थीं। कुछ महिलाएं, पुरुष का वेश बनाकर संवाद किया करती थीं। इसमें स्त्रियां उन प्रसंगों की चर्चा भी करती थीं जो आमतौर पर वो नहीं करती थीं। गाली से लेकर स्त्री पुरुष संबंध भी नकटौरा का विषय हुआ करती थी। नकटौरा में सिर्फ महिलाएं ही हुआ करती थीं। परंपरा ये थी कि जब सारे पुरुष बारात चले जाते थे तो नकटौरा के बहाने महिलाएं सारी रात जागती थीं ताकि किसी प्रकार की चौरी आदि की घटनाएं न हों। कुछ सालों पहले तक ये बेहद चर्चित परंपरा थी। चित्रा मुदगल के उपन्यास के नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इस पंरपरा को ही केंद्र में रखकर लिखा है। इस उपन्यास के कवर पर लिखा है कि हमारा समाज जैसा दिखाई पड़ता है वैसा है नहीं। वह अपने तमाम दुर्गुणों , विकृतियों, विडंबनाओं और विद्रूपताओं के बावजूद मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों की परंपरा को पुरस्कृत करनेवाली विरासत का उत्तराधिकारी भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चित्रा मुदगल ने नकटौरा के बहाने अपने विरासत में से सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को खोजकर पाठकों के लिए पेश किया होगा। 

चित्रा मुदगल  के अलावा राजकमल प्रकाशन समूह से ह्रषिकेश सुलभ का एक उपन्यास दातापीर भी इस वर्ष प्रकाशित होगा। इस उपन्यास में सुलभ ने कब्रिस्तान में काम करनेवालों को केंद्र में रखा है। उस उपन्यास में पटना शहर के पुराने इलाकों की भी कहानी साथ चलती रहती है।  लंबे समय तक कहानी और नाटक लिखने वाले सुलभ का ये दूसरा उपन्यास है। रत्नेश्वर ने भी एक उपन्यास त्रयी लिखी है जिसका नाम है महायुग। इसका पहला खंड है 32000 साल पहले, दूसरा खंड होगा हिमयुग में प्रेम और तीसरा खंड होगा प्रार्थना का आरंभ। इसका प्रकाशन भी इस वर्ष संभव है। उषाकिरण खान हिंदी और मैथिली की ऐसी लेखिका हैं जो अपनी लेखनी के माध्यम से लगातार युवा लेखकों को टक्कर देती रहती हैं। रचनाकर्म में वो कई युवा लेखकों और लेखिकाओं से अधिक सक्रिय हैं। उषाकिरण खान का मैथिली में एक बहुत चर्चित उपन्यास है पोखरि रजोखरि। इस वर्ष सामयिक प्रकाशन से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित होने जा रहा है जिसका नाम है कथा रजोखर। मैथिली से इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद मीना झा ने किया है। रजोखर मिथिला का एक बड़ा जल स्त्रोत है जिसके माध्यम से मिथिला की सत्तर साल की दशा-दुर्शा की कथा कही गई है। पुस्तक के कवर पर ये बताया गया है कि उषाकिरण खान ने कथा रजोखर में स्वतंत्रता आंदोलन, नेहरू-गांधी के स्वप्न, चरखा, खादी ग्रामोद्योग का गठन और उसके विघटनकारी तत्व, स्वातंत्र्योत्तर मिथिला के नवनिर्माण की सरकारी योजनाएं और उसका परिणाम, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वार्थ की राजनीति, राजनीति का अपराधीकरण, छूआछूत, विधवा विवाह और पलायन जैसी समस्याओं पर सवाल उठाया है। 

एक और महत्वपूर्ण अनुवाद पुस्तक का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन से होने जा रहा है। इस पुस्तक का नाम है छत्रपति शिवाजी महाराज। अंग्रेजी में ये पुस्तक शिवाजी द ग्रैंड रेबल के नाम से इस प्रकाशित है जिसके लेखक हैं डेनिस किनकेड। एक और रोचक पुस्तक प्रभात प्रकाशन से आ रही है रामायण से स्टार्टअप सूत्र, इसको लिखा है प्राची गर्ग ने। इसी कड़ी में एक और पुस्तक आएगी वेदांत व जीवन प्रबंधन जिसको कलमबद्ध किया है विक्रांत सिंह तोमर ने। पौराणिक ग्रंथों से प्रबंधन के सूत्र निकालकर पाठकों के सामने पेश करना एक श्रमसाध्य कार्य है। लेकिन ये हिंदी साहित्य के क्षितिज का विस्तार करनेवाली पुस्तकें हैं।

हिंदी के अलावा अगर हम अंग्रेजी की बात करें तो कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद की आत्मकथा भी इस वर्ष प्रकाशित होनेवाली है। इस पुस्तक की प्रतीक्षा राजनीति से जुड़े लोग उत्सुकता से कर रहे हैं। लंबे समय तक गांधी परिवार के साथ रहे गुलाम नबी आजाद का परिवार से मोहभंग हुआ। सब लोगों की निगाह इस पर टिकी है कि अपनी इस पुस्तक में वो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में क्या लिखते हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन रूपा पब्लिकेशंस से होनेवाला है। दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के सौवें वर्ष में प्रवेश करनेवाला है। समाचारों के मुताबिक इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी के संपादन में दिल्ली विश्वविद्यालय पर केंद्रित एक पुस्तक प्रकाशित होगी जिसमें विश्विद्यालय के पूर्व छात्र अपने अनुभवों को लिखेंगे। अंग्रेजी में कई अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों के प्रकाशन की खबर है, रामविलास पासवान और जार्ज फर्नांडिस की जीवनी के अलावा पत्रकार नीरजा चौधरी के राजनीतिक संस्मरणों की किताब भी इस वर्ष आएगी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वर्ष 2022 रचनात्मकता से भरपूर होगा।   



Saturday, December 25, 2021

आत्मकथा और जीवनियों का वर्ष


वर्ष 2021 बीतने को आया। कुछ दिनों बाद ये वर्ष इतिहास हो जाएगा। इस वर्ष का उत्तरार्ध कोरोना महामारी के भय में गुजरा। चारो ओर कोरोना संक्रमण की बातें हो रही थीं। संक्रमण के फैलने की आशंका से जो भय का वातावरण बना था उसने सिनेमा जगत को भी प्रभावित किया। सिनेमा हाल लंबे समय तक बंद रहे, नई फिल्मों के निर्माण पर असर पड़ा, फिल्म जगत के सामने ओटीटी (ओवर द टाप) प्लेटफार्म चुनौती बनकर खड़े हो गए। सिनेमा हाल की व्यवस्था पर ऐसा ही बड़ा असर तब पड़ा था जब 1980 के बाद के वर्षों में देश में वीसीआर और कैसेट पर फिल्में देखने का चलन बढ़ा था। 2020 में फिल्म जगत का जो परिदृश्य बदलने लगा था वो बदलाव 2021 में और गाढ़ा हुआ। वीसीआर के दौर में तकनीक की वजह से सिनेमा दर्शकों का स्वभाव बदला था और अब भय की वजह से फिल्में देखने का माध्यम बदला। सिनेमा से जुड़े लोग अब भी दर्शकों के सिनेमा हाल में वापसी को लेकर आशंकित हैं। फिल्म निर्माण, वितरण और उसके अर्थशास्त्र को लेकर तमाम तरह की आशंकाओं के बीच वर्ष 2021 में फिल्म से जुड़ी एक विधा में उम्मीद की किरण नजर आई।  वर्ष 2021 में फिल्मों से जुड़े लोगों की आत्मकथाएं और जीवनियां प्रकाशित हुई। इनमें से कई पुस्तकें काफी चर्चित रही और बेहद लोकप्रिय भी हुईं। आत्मकथा या जीवनी या संस्मरण ऐसी विधा है जिसके ज्यादातर लेखक अपने को कसौटी पर नहीं कसते या अपने से जुड़े अप्रिय प्रसंगों को छोड़ देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि फिल्मी आत्मकथाएं या जीवनियां उबाऊ और बोझिल हो जाती हैं। 2021 में इस विधा की कई पुस्तकें ऐसी आईं जिनमें बहुत हद तक लेखक ने खुद को कसौटी पर कसा है और अपने से जुड़े अप्रिय प्रसंगों को भी लिखा है। ज्यादातर लेखकों ने ईमानदारी बरती। 

सबसे पहले चर्चा करना चाहूंगा कबीर बेदी की आत्मकथा स्टोरीज आई मस्ट टेल, द इमोशनल लाइफ आफ एन एक्टर की। कबीर बेदी ने इसमें काफी हद तक ईमानदारी से अपनी जिंदगी से जुड़ी बातें लिखी हैं। कबीर बेदी अपने बचपन की यादों को भी इस पुस्तक में लेकर आते हैं। 1970 के बाद के वर्षों में मुंबई में फिल्मों से जुड़े कई युवाओं का एक ‘बोहेमियन जूहू गैंग’ होता था, जिसमें कबीर के अलावा शेखर कपूर, डैनी, महेश भट्ट, परवीन बाबी और शबाना आजमी आदि हुआ करते थे। कबीर बेदी ने उन वर्षों को रोचक अंदाज में याद किया है। इस पुस्तक में अपने कई संबंधों के बारे में भी बेबाकी से लिखा है। अपने पहले प्यार और पत्नी प्रतिमा बेदी के साथ साथ परवीन बाबी से अपने अफेयर पर भी लिखा है। हलांकि प्रतिमा बेदी ने अपनी पुस्तक टाइमपास, द मेमोरीज आफ प्रतिमा बेदी में इन प्रसंगों को अलग तरीके से लिखा है। कबीर ने परवीन बाबी की मानसिक स्थिति पर भी तटस्थ होकर लिखा है। इसमें उन्होंने परवीन बाबी के पत्रों का उल्लेख भी किया है। कबीर बेदी जब अपने युवा पुत्र की आत्महत्या के बारे में लिखते हैं तो पाठक उनकी संवेदना के साथ खुद को एकाकार कर लेता है। अपनी पीड़ा और संत्रास को उन्होंने कोमल गद्य के सहारे अपनी पुस्तक में आगे बढ़ाया है। कबीर बेदी के माता पिता स्वाधीनता सेनानी थी और उनका चिंतन गहरा था। अपनी इस पुस्तक में कबीर बेदी ने कई जगहों पर अपने अभिभावकों की सीख को भी उद्धृत किया है। बेदी धर्म को लेकर भी अपनी राय पाटकों के सामने रखते हैं। एक अध्याय में तो गुरू नानक, कबीर और सूफी संतों के हवाले से कई दार्शनिक बातें भी कहते हैं। इसमें वो गीता और बुद्ध के ज्ञान को भी अपने तरीके से पाठकों के सामने रखते हैं। अगर समग्रता में देखें तो कबीर बेदी की ये पुस्तक फिल्म से जुड़े किस्से तो बताती है लेकिन साथ ही इसमें एक पूरा कालखंड भी जीवंत होता है।   

फिल्मों से जुड़ी एक और शख्सियत नीना गुप्ता की आत्मकथा ‘सच कहूं तो’ भी इस वर्ष प्रकाशित हुई। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई पुस्तक अंग्रेजी में प्रकाशित हो और उसका शीर्षक हिंदी के शब्दों का हो। नीना गुप्ता ने ये किया। नीना गुप्ता की आत्मकथा से पाठकों को ये उम्मीद रही होगी कि इसमें उनकी और विवियन रिचर्ड्स की लव स्टोरी का किस्सा  होगा। इस पुस्तक में नीना ने रिचर्ड्स से अपने संबंधों के बारे में नहीं बताया लेकिन उनको पाठकों की अपेक्षा का अंदाज रहा होगा। उन्होंने इस बारे में लिखा कि वो उन स्थितियों को अपने और रिचर्ड्स की बेटी मसाबा गुप्ता की खातिर दोहराना नहीं चाहती हैं। वो नहीं चाहती हैं कि एक बार फिर से उन स्थितियों को लेकर उनकी बेटी के सामने अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो। पर उन्होंने मातृत्व के अपने अनुभवों को और एक अनव्याही मां को लेकर समाज की प्रतिक्रियाओं के बारे में लिखा है। अपनी जिंदगी के उतार चढ़ाव को भी उन्होंने स्वीकार किया है। इस पुस्तक में एक बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि नीना ने अपने आसपास के लोगों का नाम लेकर उनको शर्मिंदा नहीं किया। संकेतों में बात करके निकल गई हैं। जब नीना गुप्ता अपनी फिल्म बाजार सीताराम बना रही थीं तो वो उन्होंने श्याम बेनेगल से बात की थी। बेनेगल ने उनको सलाह दी थी कि हमेशा इस बात को याद रखना कि किसी भी कहानी का एक निश्चित आरंभ हो, उसका सुगठित मध्य भाग हो और उसका तार्किक अंत हो। अगर किसी कहानी में ये तीनों चीजें हैं तो वो कहानी कभी पिट नहीं सकती। ये सीख उनके जीवन में बहुत काम आई। नीना गुप्ता ने इसमें अपने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दिनों को बेहद संजीदगी से याद किया है। इस पुस्तक में भी छिपाया कम बताया ज्यादा गया है। 

तीसरी पुस्तक जिसकी चर्चा की जानी चाहिए वो है अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा जोनस के संस्मरणों की किताब, अनफिनिश्ड । इस पुस्तक को लेकर इंटरनेट मीडिया पर जबरदस्त उत्सुकता का माहौल बना था। आनलाइन बुक स्टोर में अपने प्रकाशन के कई महीनों बाद तक ये पुस्तक लोकप्रियता के शीर्ष पर बनी रही थी। इस पुस्तक की शुरुआत उसके दस साल के भाई के अपनी बहन को मिस इंडिया प्रतियोगिता में भेजने के प्रसंग से होती है। प्रियंका के घर में दो बेडरूम थे। एक उसका था और एक माता पिता का। भाई को एक छोटे से कमरे में जगह दी गई थी और दस साल का बच्चा अपना बड़ा और अच्छा बेडरूम चाहता था। इसलिए उसने अपनी बहन को मिस इंडिया में भेजने की योजना बनाई ताकि वो उसके बेडरूम में रह सके। प्रियंका ने अमेरिकी फिल्मों में काम करने के लिए जो संघर्ष किया वो भी लिखा है। हिंदी फिल्मों की दुनिया से जुड़े प्रसंग भी हैं। दो अन्य पुस्तकों का उल्लेख भी आवश्यक है। एक है संजीव कुमार की आधिकारिक जीवनी, एन एक्टर्स एक्टर।  इसको हनीफ जरीवाला और सुमंत बत्रा ने लिखा है। संजीव कुमार पर कम लिखा गया और ये पुस्तक उस कमी को पूरा करती है। एक और पुस्तक अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है, राज कपूर द मास्टर एट वर्क। ये पुस्तक राहुल रवैल और प्रियंका शर्मा की है। राहुल रवैल लंबे समय तक राज कपूर के सहायक रहे हैं, लिहाजा उन्होंने राज कपूर से जुड़े कई दिलचस्प प्रसंग लिखे हैं, कुछ व्यक्तिगत संसमरणों को भी जगह मिली है। महामारी की आशंका के बीच फिल्मों से जुड़े इन व्यक्तित्वों ने पाठकों के सामने स्तरीय पठनीय सामग्री पेश की है। आनलाइन बुक स्टोर में लोकप्रियता की सूची में इन पुस्तकों की रैकुंक देखकर इस बात का संकेत मिलता है कि पाठकों ने भी इन आत्मकथाओं और जीवनियों को पसंद किया है। 

Monday, December 20, 2021

मंदिरों की राष्ट्र संवर्धन में बड़ी भूमिका


काशी विश्वनाथ धाम के नव्य और भव्य स्वरूप के लोकार्पण के बाद भारतीय समाज और संस्कृति में मंदिरों के स्थान को लेकर भी चर्चा होनी चाहिए। मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र के ऐतिहासिक स्वरूप पर बात होनी चाहिए। मंदिरों से जुड़ी कलाओं पर भी चर्चा होनी चाहिए। हमारीभारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर किया। समाज की ताकत पर प्रहार किया। मुगलों के शासनकाल में विदेशों से चित्रकार आदि भारत आए। मुगलों की कला में और उसके पहले के भारतीय कला में एक आधारभूत अंतर था। मुगल कला का केंद्र बिंदु बादशाह का निजी जीवन और निजी पसंद था। भारतीय कला लोक के बीच व्याप्त थी। मंदिर उसके केंद्र हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न कलाओं में खुलते और खिलते थे।

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। इसी काल में मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में माने जाने पर जोर दिया जाने लगा। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया। जब देश स्वाधीन हुआ तो पहले प्रधानमंत्री का वैचारिक झुकाव साम्यवाद की ओर था। सोमनाथ मंदिर पर देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्रीजवाहरलाल नेहरू के बीच ऐतिहासिक मतभेद हुआ था। राजेन्द्र बाबू सोमनाथ मंदिर को सिर्फ धर्म से जोड़कर नहीं देख रहे थे लेकिन साम्यवाद के प्रभाव में नेहरू उसको धार्मिक केंद्र मानते थे। यह भारतीय दृष्टि और विदेशी प्रभाव की दृष्टि की टकराहट भी थी। स्वाधीनता के कुछ वर्षों के बाद संस्कृति और शिक्षा पर साम्यवादियों की पकड़ मजबूत होने लगी थी। इंदिरा गांधी के शासनकाल में साम्यवादियों ने संस्कृति और शिक्षा पर अपनी सत्ता लगभग स्थापित कर ली। धर्म को अफीम मानने वाले साम्यवादियों का मंदिरों के प्रति क्या रुख रहा है ये सार्वजनिक है। साम्यवादियों ने विदेशी कलाओं से लेकर विदेशी नाटककारों के नाटकों को भारत में खूब बढ़ाया। कहना न होगा कि साम्यवादियों के इसी उपेक्षा भाव की वजह से भारतीय कला पर विदेशी कलाओं को प्राथमिकता दी गई। धर्म से दूरी की वजह से मंदिर कलाओं के साधकों को हाशिए पर डालने की कोशिशें हुईं। उनको सांप्रदायिक तक करार दिया गया, क्योंकि साम्यवादी कला को भी धर्म से मुक्त करवाकरध़र्मनिरपेक्ष बनाना चाहते थे। 

पिछले दिनों प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मानसिंह से संवाद पर आधारित यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक देवप्रिया (वाणी प्रकाशन)पढ़ रहा था। अचानक मेरी नजर एक प्रश्न पर चली गई।यतीन्द्र ने सोनल जी से उनपर सांप्रदायिक होने के लगनेवाले आरोपों के बारे में पूछा। सोनल मानसिंह ने लंबा उत्तर दिया। उसका एक अंश, ‘मैंने जिस विधा में जीवन गुजारा है वो संस्कृति से उपजा है और नृत्य जैसी महान परंपरा का स्थायी अंग है। आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की ज्यादातर नृत्य परंपराएं मंदिर कलाओं के उदाहरण हैं। ये मठ, मंदिरों से जन्मी हैं और उनमें ज्यादातर कार्य व्यवहार देवता के प्रति आभार प्रदर्शन के अर्थ में होता आया है। पुराण, धर्म ग्रंथ, संत साहित्य, भजनावलियों और मंदिरों के महात्म्य का वर्णन ही नृत्य विधा में होता रहा है। यही मैंने जीवनभर किया है। । अब अगर ओडिसी या भरतनाट्यम के नृत्य करने से, गीत-गोविंद की चर्चा या आदर करने से कोई सांप्रदायिक ठहराया जाए तो मैं क्या कर सकती हूं। इस लिहाज से यदि आप या कोई व्यक्ति किसी कला या कलाकार का सरलीकरण करेगा, तब यह देखना मुश्किल हो जाएगा कि क्या क्या सांप्रदायिक हो सकता है? शास्त्रीय संगीत में भी अधिकांश गायन भक्तिपदों का होता है तो क्या सारे गायक सांप्रदायिक हो गए। भारतीय संस्कृति को उजागर करनेवाली कलाओं में खासकर नृत्य में कोई मार्क्सवादी विचार, मेरे देखने में नहीं आया है। आपको कहीं मिले तो ढूंढकर मुझे भी दीजिएगा।‘ 

सोनल मानसिंह के उत्तर के कई आयाम हैं और उसमें उन्होंने कई ऐसी बातें कही हैं जिसपर चर्चा होनी चाहिए। पहली बात तो ये कि भारत की ज्यादातर नृत्य परंपराएं मंदिर कलाओं के उदाहरण हैं। इससे यह बात पुष्ट होती है कि मंदिर भारतीय कलाओं का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। यहां हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय साहित्य में नटराज यानि शिव सबसे अच्छे नर्तक के रूप में स्थापित हैं। शिव का ये स्वरूप नृत्य कला का आधार भी कहा जाता है। सोनल जी अपने उत्तर का अंत एक प्रश्न से करती हैं और जानना चाहती हैं कि नृत्य में कोई मार्क्सवादी विचार हैं क्या? नृत्य और कला में मार्क्सवादी विचार के बारे में कल्पना करना भी व्यर्थ है। मार्क्सवादियों का तो नृत्य संगीत से ही कोई लेना देना रहा नहीं है। उनके हिसाब से तो ये सब बुर्जुआ से जुड़ी विधाएं हैं। काफी समय तक तो सिनेमा को लेकर भी उनकी यही राय थी।गीत संगीत को लेकर भी। वो कला की विभिन्न विधाओं से चिढ़ते हैं। उसकी उपेक्षा करते हैं। मार्क्सवादियों को लगता है कि हिंदू धर्म या सनातन धर्म नृत्य, गीत, अभिनय और कला की अन्य प्रवृत्तियों की वजह से जीवंत है। आततायियों के आक्रमण और मंदिरों को तोड़े जाने के बावजूद भारतीय धर्म के निर्मल आदर्शों के कारण भारतीय कला बची रही। आज जब एक बार फिर से मंदिरों को सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्रों के रूप में स्थापित किया जा रहा है तो मार्क्सवादी असहज हो रहे हैं। उनको लग रहा होगा अगर ये मंदिर फिर से सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर शक्तिशाली हो गए तो धर्म का प्रभाव बढ़ेगा। धर्म का प्रभाव बढ़ेगा तो भारतीय संस्कृति मजबूत होगी। प्रसिद्ध लेखक वासुदेव शरण अग्रवाल ने स्वाधीनता के बाद अपने एक लेख में कहा था, ‘राष्ट्र संवर्धन का सबसे प्रबल कार्य संस्कृति की साधना है। उसके लिए बुद्धिपूर्वक प्रयत्न करना होगा, हमारे देश की संस्कृति की धारा अति प्राचीन काल से बहती आई है, उसके प्राणवंत तत्त्व को अपनाकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं।‘ मंदिरों के सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पुनर्स्थापना राष्ट्र संवर्धन का उपक्रम है इसको सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में देखना गलत है। मंदिरों के प्राचीन वैभव की वापसी के उपक्रम से किसी अन्य मतावलंबियों को कोई खतरा नहीं है।मार्क्सवादी बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने के लिए समाज में कई तरह से भ्रम फैलाते हैं। इस भ्रम का परोक्ष लक्ष्य अपनी वैचारिकी से जुड़े राजनीतिक दलोंको फायदा पहुंचाना होता है। आगामी महीनों में कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होनेवाले हैं । मार्क्सवादियों को लगता है कि मंदिर के नाम पर वो समाज में ध्रुवीकरण करने में सफल हो जाएंगे और चुनाव में उनको फायदा मिल जाएगा। ऐसी ही परिस्थतियों को ध्यान में रखकर वासुदेव शरण अग्रवाल ने बुद्धिपूर्वक प्रयत्न की सलाह दी थी।


Saturday, December 11, 2021

स्त्री विमर्श का समग्र स्वरूप


इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से स्त्री विमर्श चर्चा के केंद्र में है। एक लेखिका को उठाने और दूसरे को गिराने के लिए स्त्री विमर्श के विविध रूपों की आड़ ली जा रही है।  रचना से अधिक व्यक्तिगत संबंधों पर बातें हो रही हैं। इसमें युवा लेखिकाएं भी शामिल हैं तो बुजुर्ग लेखिका भी मनोयोगपूर्वक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने की होड़ में लगी दिखाई दे रही हैं। जो गंभीरता के साथ स्त्री विमर्श को समझती और बरतती हैं वो चुप हैं। राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य में जिस तरह के स्त्री विमर्श की नींव रखी थी उसको ही धुरी बनाकर कुछ लेखिकाएं तलवारबाजी करती रहती हैं। किसी का निधन हो तब, कोई विचार गोष्ठी हो तब, कोई समारोह हो तब स्त्री को लेकर उसी तरह का विमर्श किया जाता है जैसा राजेन्द्र यादव करते थे या करने के लिए अपने खेमे की लेखिकाओं को उकसाते रहते थे। राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य के स्त्री विमर्श को देह विमर्श के वृत्त में समेट दिया था। उस वृत्त की परिधि को क्रांतिवीर लेखिकाएं अब भी नहीं तोड़ पाई हैं। बल्कि अब तो स्त्री विमर्श के उस वृत्त के अंदर अज्ञान का भी प्रवेश हो गया है। ऐसी राय बनने के पीछे एक दो नहीं कई साहित्यिक गोष्ठियों का अनुभव है। कई लेखिकाएं वामपंथी विचार से अपनी करीबी प्रदर्शित करती रहती हैं। इस प्रदर्शन के चक्कर में वो भारतीय पौराणिक ग्रंथों के हवाले से स्त्रियों की चर्चा करती हैं।इस तरह की चर्चाओं में पौराणिक काल में भारतीय स्त्रियों की स्थिति पर आलोचनात्मक टिप्पणियां करती हैं। जब भी अवसर मिलता है तो गोष्ठियों में ऋगवेद से लेकर रामचरितमानस तक को उद्धृत कर डालती हैं। पौराणिक ग्रंथों से बगैर संदर्भ के एक दो पंक्तियां उठा लेती हैं। उन पंक्तियों के आधार पर उस समय के पूरे भारतीय समाज को स्त्री विरोधी और दकियानूसी साबित कर डालती हैं। 

हाल ही में एक गोष्ठी में एक लेखिका ने बेहद क्रांतिकारी अंदाज में टेबल पर मुक्का मारते हुए ये साबित करने की कोशिश की कि ऋगवेद में स्त्रियों के बारे में आपत्तिजनक बातें हैं। इस सबंध में उन्होंने ऋगवेद के पुरुरवा- उर्वशी संवाद से एक पंक्ति बताई। उसमें उर्वशी कहती है कि ‘स्त्रियों से स्थायी मैत्री होना संभव नहीं है। स्त्रियों का ह्रदय भेड़िए के समान होता है।‘ ये बताते हुए उन्होंने कई बार  मेज पर मुक्का मारा। जब वो बोल रही थीं तो मुझे भारतीय जनता पार्टी के नेता स्वर्गीय अरुण जेटली का राज्यसभा में दिया एक भाषण याद आ रहा था। जेटली ने कहा था, इफ यू हैव द फैक्ट, बैंग द फैक्ट, इफ यू डू नाट हैव द फैक्ट, बैंग द टेबल (अगर आपके पास तथ्य हैं तो तथ्य पर जोर दो और अगर तथ्य नहीं है तो टेबल पीटो)।  ऋगवेद के आधार पर वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति पर बोलनेवाली लेखिका के पास तथ्य नहीं था लिहाजा वो टेबल पर मुक्का मारकर अपने कहे को प्रभावी बनाना चाह रही थीं। दरअसल ये वामपंथियों की पुरानी प्रविधि है कि भारतीयता और सनातन धर्म को बदनाम करो। इसके लिए वो पौराणिक ग्रंथों से संदर्भों के बिना पंक्तियां उद्धृत करके भ्रम का वातावरण बनाते रहे हैं। यही काम तुलसीदास के साथ किया गया, यही काम वेद और पुरणों के अलावा स्मृतियों के साथ भी किया। ऋगवेद में जिस पुरुरवा-उर्वशी संवाद की उपरोक्त बातें कही गई उसका प्रसंग भी जानना समझना होगा। प्रसंग ये है कि जब उर्वशी, पुरुरवा से पीछा छुड़ाना चाहती है तो वो स्वयं ही स्त्रियों के स्वभाव की निंदा करती है। उसको लगता है कि ऐसा करने से उसको लाभ होगा। बगैर इस संदर्भ को समझे और समग्रता में श्रोताओं के सामने रखे क्रांतिकारी लेखिकाएं यहां तक कह देती हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों की तुलना भेड़िए से की जाती थी, जो आपत्तिजनक है। इसी तरह स्मरण आता है दिल्ली की एक गोष्ठी में वामपंथी लेखिका ने राम की इस वजह से आलोचना की थी कि उन्होंने सीता को गर्भवती होने के बावजूद घर से निकाल दिया था। जब मैंने उनसे पूछा था कि ऐसा कहां उल्लिखित है तो उन्होंने बहुत ताव के साथ मुझे श्रीरामचरितमानस पढ़ने की सलाह दी थी। उस वक्त उनको बता नहीं पाया था कि श्रीरामचरितमानस श्रीराम के राज्याभिषेक के साथ खत्म हो जाता है। उसमें ये प्रसंग है ही नहीं।     

वेदों को बिना पढ़े, उनको बिना समझे, उनमें वर्णित पंक्तियों को संदर्भ से काट कर किसी निर्णय पर पहुंचनेवालों को ये देखना चाहिए कि वेदों में महिलाओं को कितना उच्च स्थान दिया गया है। ऋगवेद में तो कन्या, पत्नी और माता के रूप में नारी का समाज में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान था। विश्ववारा, घोषा, अपाला, लोपामुद्रा जैसी तेजस्वी नारियों का वर्णन ऋगवेद में मिलता है। ऋगवेद में विवाह योग्य कन्या की तुलना सूर्य के प्रकाश से की गई है, जो कि अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि लड़कियों का कितना सम्मान था । उनको कितने उच्च स्थान पर रखा जाता था। विवाह के बाद जब लड़की ससुराल आती थी तो उसको गृह स्वामिनी का अधिकार दिया जाता था। उसका अधिकार सिर्फ पति पर नहीं बल्कि घर से जुड़ी हर चीज पर होता था। वह सभी धार्मिक कार्यों में पति के साथ बराबरी से भाग लेती थी। उस काल में भी पुरुष का एक विवाह आदर्श माना जाता था और परस्त्री गमन को पाप समझा जाता था। माता का स्थान समाज में बेहद प्रतिष्ठित था। देवताओं की जननी के तौर पर पृथ्वी को रखा गया है और पृथ्वी को माता कहा गया है। पृथ्वी माता की उदारता और सहिष्णुता से जुड़े प्रसंग पौराणिक ग्रंथों में बहुतायत में मिलते हैं। माता रूपी इस प्रतीक को स्त्री विमर्श की क्रांतिकारी झंडाबरदार समझ पाएंगी या समझकर भी न समझने का स्वांग करेंगी यह कहना कठिन है। 

भारतीय समाज में सनातन काल से स्त्रियों का बहुत ही श्रेष्ठ स्थान रहा है और वो पुरुषों के साथ बराबरी का अधिकार रखती थीं। जब हमारे देश पर विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण हुआ तो उन्होंने न सिर्फ भारत की भौगोलिक भूमि पर कब्जा जमाया बल्कि संस्कृति और समाज को प्रभावित किया। विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव में या उनके भय का असर ये हुआ कि महिलाएं पर्दा करने लगीं, शिक्षा से दूर हो गईं, पुरुषों से बराबरी का अधिकार खत्म सा होने लगा। मुगलों के शासनकाल में भारत की महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित किया जाने लगा। अंग्रेजों के काल में भी ये जारी रहा। ऐसे कई उदाहरण हैं कि जब किसी राजघराने में पुरुष वारिस नहीं होता था तो अंग्रेज उस राज पर कब्जा कर लेते थे। भारतीय समाज में महिलाओं को गैरबराबरी का दर्जा आक्रांताओं के काल में ही आरंभ होकर स्थापित होता है। स्त्री विमर्श का झंडा उठानेवाली अधिकतर लेखिकाएं इस बात का न तो उल्लेख करती हैं और न ही इसको रेखांकित करती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि स्त्री विमर्श पर जब भी बात हो तो कथित क्रांतिकारिता के साथ साथ अपनी विरासत और परंपराओं पर भी बात हो। उन अधिकारों की भी चर्चा हो जो हमारे देश की नारियों को आक्रांताओं के भारत आगमन के पूर्व मिला हुआ था। अगर ऐसा होता है तो भारतीय स्त्री विमर्श पश्चिम के स्त्री विमर्श से अलग नजर आएगा। देह विमर्श के वृत्त से बाहर निकलकर स्त्रियों के मूल अधिकारों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित हो पाएगा। वामपंथी या वामपंथी दिखने की कोशिश में लगी लेखिकाओं को अब सत्य का संधान करना चाहिए ताकि स्त्री विमर्श का एक समग्र रूप समाज के सामने आ पाए। 


Saturday, December 4, 2021

ललित कला अकादमी में विद्रोह


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वयायत्त संस्था है ललित कला अकादमी। इस संस्था का शुभारंभ 5 अगस्त 1954 को उस समय के शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने किया था। इसका उद्देश्य चित्रकला, मूर्तिकला आदि के क्षेत्र में अध्ययन और शोध को बढ़ावा देना है। इसके अलावा क्षेत्रीय कला और कलाकारों के बीच संवाद का मंच प्रदान करना भी एक उद्देश्य है। इस वक्त इस संस्था के प्रोटेम (अस्थायी) अध्यक्ष उत्तम पचारणे हैं। इनका तीन वर्ष का कार्यकाल खत्म होने के बाद इनको इस वर्ष जून में छह महीने के लिए अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ललिता कला अकादमी के संविधान में छह महीने के अस्थाई अध्यक्ष का प्रावधान है ताकि वो नए अध्यक्ष के चयन की औपचारिकताएं पूरी करवा सकें। ललित कला अकादमी पिछले कई वर्षों से अपने उद्देश्यों से भटक गई प्रतीत होती है। पिछले कई वर्षों से अकादमी लगातार विवादों में रही है। अकादमी से एम एफ हुसैन की पेंटिंग गायब होने की घटना सुर्खियों में रही थीं। अकादमी से मूल्यवान पेंटिंग्स के गुम होने को लेकर आरोप प्रत्यारोप का लंबा सिलसिला चला। पूर्व के चेयरमैन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। इस संस्था के अध्यक्ष रहे अशोक वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान अनियमितताओं को लेकर सीबीआई जांच चल रही है। विवादों की इस शृंखला में इस संस्था का प्रशासन केंद्र सरकार ने अपने हाथ में भी लिया था। कुछ समय तक केंद्र से नियुक्त प्रशासक ने इसको चलाया। उस वक्त भी विवाद थम नहीं सका। 

ताजा विवाद अस्थाई अध्यक्ष के खिलाफ कार्यकारिणी के सदस्यों के विद्रोह का है। पिछले महीने की 25 तारीख को उपाध्यक्ष नंदलाल ठाकुर और कार्यकारिणी के सदस्यों ने संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव को एक पत्र लिखकर अध्यक्ष के असंवैधानिक कामों के बारे में उनका ध्यान आकृष्ट किया। अपने पत्र में इन लोगों में स्पष्ट रूप से अकादमी के अध्यक्ष उत्तम पचारणे पर ललित कला अकादमी के संविधान के हिसाब से काम नहीं करने का आरोप लगाया है। उस पत्र में आरोप है कि उत्तम पचारणे कार्यकारिणी के निर्णयों को बदलकर कार्यक्रम आयोजित करवा रहे हैं। कार्यकारिणी ने जिन कार्यक्रमों को तय किया है उसको नहीं करवा कर दूसरे कार्यक्रम करवा रहे हैं। उपाध्यक्ष और कार्यकारिणी के सदस्यों ने अपने पत्र में मंत्रालय को लिखा है कि उत्तम पाचरणे ने दिल्ली में आयोजित होनेवाले प्रिंट बिनाले को बगैर कार्यकारिणी की मंजूरी के मुंबई में कराने का आदेश जारी कर दिया है। अकादमी का संविधान उनको ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है।  इसके अलावा स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर मुंबई में किए जानेवाले आर्ट कैंप का नाम बदलकर अनसंग हीरो-छत्रपति शिवाजी के नाम से कराने का फैसला किया है। कार्यकारिणी के सदस्यों ने छत्रपति शिवाजी को अनसंग हीरो कहे जाने का विरोध किया लेकिन अस्थाई अध्यक्ष सुनने को राजी नहीं थे।अस्थाई अध्यक्ष ने बैठक में घोषणा की कि वो इसको मुंबई के जे जे स्कूल आफ आर्ट में अपनी जिम्मेदारी पर आयोजित करवा रहे हैं। यह भी अकादमी के संविधान के खिलाफ निर्णय है। 

इस पत्र में ये आरोप भी लगाया गया है अस्थायी अध्यक्ष कार्यक्रमों के आयोजन में मनमानी करते हैं और कार्यकारिणी को विश्वास में नहीं लेते हैं। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर मंत्रालय जांच करेगी या नहीं ये भविष्य में पता चलेगा। अगर जांच होती भी है तो संभव है कि जांच  आरंभ होने तक अस्थायी अध्यक्ष का छह महीने का कार्यकाल समाप्त हो जाए। उनका छह महीने का कार्यकाल इस महीने ही पूरा हो रहा है। जिस काम, नए अध्यक्ष के चुनाव, के लिए अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति की गई थी उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। सर्च कमेटी बनी या नहीं इस बारे में भी अकादमी की बेवसाइट पर कोई जानकारी नहीं है। अगर दिसंबर में अस्थाई अध्यक्ष का कार्यकाल बगैर नए अध्यक्ष के चयन के खत्म हो जाता है तो क्या एक बार फिर से अस्थाई अध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी। क्या संस्कृति मंत्रालय फिर से उत्तम पचारणे के नाम की सिफारिश राष्ट्रपति से करेगी और राष्ट्रपति उसको मान लेंगे। अगर ऐसा होता है तो यह नियमों की खामियों की आड़ लेना होगा। तब सवाल ये भी उठेगा कि क्या उत्तम पचारणे तबतक ललित कला अकादमी के अस्थाई अध्यक्ष बने रहेंगे जबतक कि नए अध्यक्ष का चयन नहीं हो जाता है। नियमों की खामियों की आड़ लेकर ऐसा होता है तो फिर अस्थाई अध्यक्ष नए अध्यक्ष का चयन क्यों होने देगा। इसके पहले जब उत्तम पचारणे नियमित अध्यक्ष थे तब भी उन्होंने अपना कार्यकाल तीन साल से पांच साल करने का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा था जिसपर संस्कृति मंत्रालय की मुहर नहीं लग पाई थी। तब उत्तम पचारणे को पद छोड़ना पड़ा था लेकिन कुछ ही दिन बाद संस्कृति मंत्रालय ने अस्थाई अध्यक्ष के तौर पर उत्तम पचारणे के नाम का अनुमोदन कर राष्ट्रपति को भेज दिया था। 

दरअसल अगर देखा जाए तो उत्तम पचारणे की नियुक्ति के समय से ही विवाद आरंभ हो गया था। इनकी नियुक्ति में तय प्रक्रिया के पालन नहीं होने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक केस चल रहा है। पर लंबी कानूनी प्रक्रिया की वजह से उसपर निर्णय कब आएगा इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर अन्य कई केस भी अदालत में लंबित हैं। करदाताओं के पैसे का जो सदुपयोग कला के विकास में होना चाहिए वो कानूनी पचड़ों में खर्च हो रहा है। नियुक्तियों में भी अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं। ललित कला अकादमी में काम रही एक महिला को बिना किसी आरोप पत्र के सस्पेंड कर दिया गया, वो केस भी अदालत में लंबित है। ललित कला अकादमी को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि अकादमी जितना धन मुकदमों की पैरवी में खर्च कर रही है उसमें तो कई कार्यक्रम या कार्यशाला आयोजित किए जा सकते हैं। 

ललित कला अकादमी में विवादों की शुरुआत एक तरह से नौकरशाह और कवि अशोक वाजपेयी के कार्यकाल से हुई। उन्होंने अपने कार्यकाल में कला के विकास के नाम पर कई ऐसे कार्यक्रम आरंभ किए जिसमें उन्होंने अपने मित्रों को बढ़ावा दिया। उनपर विदेशी कला प्रर्दर्शनियों में हिस्सा लेने को लेकर भी विवाद है। नियुक्तियों और गैलरी आवंटन को लेकर भी विवाद उठे थे। उसके बाद से तो जो भी इस पद पर आया उसमें से अधिकतर ने मनमानी की। ललित कला अकादमी का संविधान है. जिसके हिसाब से इसके अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को काम करना होता है। दिक्कत तब होती है जब इस संविधान के हिसाब से काम नहीं होता है। उत्तम पचारणे का कार्यकाल खत्म होने के पहले ही संस्कृति मंत्रालय ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए सक्रियता क्यों नहीं दिखाई। क्यों इस बात का इंतजार करते रहे कि अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त करने की नौबत आए। संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाहों ने इस मंत्रालय से जुड़ी संस्थाओं का बेड़ा गर्क करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अगर इन संस्थाओं में सही समय पर नियमित नियुक्तियां हों जाएंगी तो अफसरों को मनमानी का अवसर नहीं मिलेगा।  रिटायरमेंट के बाद राघवेन्द्र सिंह को सालभर के लिए संस्कृति सचिव बनाया गया था। उनसे उम्मीद थी कि वो कुछ बेहतर करेंगे लेकिन उन्होंने अपने सालभर के कार्यकाल में इन स्वायत्त संस्थाओं में कोई नियुक्ति नहीं की या नहीं होने दी। अगर इन संस्थाओं को विवादों से दूर रखना है तो इसके लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे। मंत्रियों को यह देखना होगा कि सही समय पर नियुक्तियां हों। संसद के चालू सत्र में राज्यसभा में सोनल मानसिंह ने संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं के शीर्ष पदों के खाली रहने का विषय उठाया है, देखते हैं उसका क्या असर होता है। 

Saturday, November 27, 2021

कम्युनिस्टों से क्यों चिढ़ते थे आंबेडकर


अभी-अभी संविधान दिवस बीता है। जब भी संविधान दिवस (26 नवंबर) आता है या संविधान से जुड़ी बातों पर देशव्यापी विमर्श होता है तब वामपंथी धारा में बहने वाले लेखक और बौद्धिक बाबा साहेब आंबेडकर की कई बातों को संदर्भ से काटकर उद्धृत करते हैं। आंबेडकर के विचारों की आड़ में वो भारत और भारतीयता के साथ साथ हिंदू धर्म और दर्शन पर प्रहार करते हैं। उनके विचारों को इस तरह से पेश करते हैं जैसे कि आंबेडकर हिंदू धर्म के विरोधी थे। वो ये नहीं बताते हैं कि आंबेडकर हिंदू धर्म की कुरीतियों के विरोधी थे और उनका मत था कि इन कुरीतियों को दूर किया जाए। ऐसा करते हुए कम्युनिस्ट इस बात को भी छिपा ले जाते हैं कि उनको लेकर आंबेडकर के क्या विचार थे। मार्क्स और मार्क्सवाद से लेकर उनके अनुयायियों के बारे में बाबा साहेब की सोच क्या थी। 12 दिसंबर 1945 को नागपुर की एक सभा में आंबेडकर ने देशवासियों को कम्युनिस्टों से बचकर रहने की सलाह दी थी। आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘मैं आप लोगों को आगाह करना चाहता हूं  कि आप कम्युनिस्टों से बच कर रहिए क्योंकि अपने पिछले कुछ सालों के कार्यों से वो कामगारों का नुकसान कर रहे हैं। वे उनके (कामगारों) दुश्मन हैं, इस बात का मुझे पूरा यकीन हो गया है। कम्युनिस्ट कहते हैं कि कांग्रेस पूंजीपतियों की संस्था है। साथ ही वे कामगारों को उसमें जाने की सलाह भी देते हैं। हिन्दुस्तान के कम्युनिस्टों की अपनी कोई नीति नहीं है, उन्हें सारी चेतना रूस से मिलती है।‘ अपने इस कथन से आंबेडकर ने स्पष्ट कर दिया था कि अपने देश के कम्युनिस्टों की चेतना का आधार रूस से आयातित विचार है और वो कामगारों या मजदूरों को भ्रमित कर कांग्रेस को मजबूत करना चाहते हैं। आंबेडकर की ये बातें स्वाधीनता के बाद भी सही साबित हुई। कम्युनिस्टों को जब भी मौका मिला उन्होंने कांग्रेस का समर्थन किया, सरकार बनाने से लेकर देश में इमरजेंसी लगाने तक में। आज भी कर रहे हैं। आज जब कम्यनिस्ट पार्टियां अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं तो उनको कांग्रेस में ही अपना भविष्य नजर आ रहा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुयायी  लगातार कांग्रेस को मजबूत करने की बात इंटरनेट मीडिया के अलग अलग मंचों पर लिख रहे हैं। 

आंबेडकर ने नागपुर की ही सभा में देश के दलितों को भी कम्युनिस्टों से आगाह किया था। आंबेडकर ने कम्युनिस्टों के बारे में कहा था कि ‘वे अब हमारे संगठन में घुसकर अपनी हरकतें करने लगे हैं। इसलिए मैं आपलोगों से यही कहना चाहता हूं कि आपलोग कम्यनिस्टों से बचकर रहिए। उन्हें अपने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का उपयोग अपने प्रचार के लिए मत करने दीजिए।‘ अब 1945 में कहे गए बाबा साहेब के शब्दों पर गौर करें तो स्थिति और स्पष्ट होती है। उनको इस बात की आशंका थी कि अगर कम्युनिस्ट उनके संगठन में घुस गए तो संगठन कमजोर होगा लिहाजा इसलिए वो सार्वजनिक रूप से शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के कार्यकर्ताओं को कम्युनिस्टों की ‘हरकतों’ से बचकर रहने की सलाह दे रहे थे। आंबेडकर की इन बातों की चर्चा कभी भी कम्युनिस्ट नहीं करते हैं। अपने बौद्धिक विमर्शों में भी अंबेडकर की आलोचना पर ध्यान नहीं देते हैं। बाद के दिनों में या आंबेडकर के निधन के बात तो वो समानता के सिद्धांत के आधार पर उनको भी वामपंथी विचारधारा के करीब दिखाने और प्रचारित करने की कोशिश करते रहते  हैं। वामपंथी कभी भी इस बात की चर्चा नहीं करते हैं कि आंबेडकर की राय मार्क्स या उनके सिद्धांतों को लेकर क्या थी। 20 नवंबर 1956 को आंबेडकर का नेपाल में दिया गया एक भाषण है जिसमें उन्होंने बुद्ध और कार्ल मार्क्स पर विचार किया था। अपने उस भाषण में आंबेडकर ने मार्क्सवाद की तुलना में बौद्ध दर्शन को श्रेष्ठ और स्थायी माना है। आंबेडकर ने साम्यवादी जीवन मार्ग और बौद्ध जीवन मार्ग को लेकर अपने विचार रखे थे। उसमें आंबेडकर कहते हैं कि जो जीवनमार्ग अल्पजीवी होगा, गुमराह करनेवाला होगा या अराजकता की ओर ले जानेवाला होगा ऐसे जीवन मार्ग का समर्थन करना उचित नहीं होगा। साफ है कि वो साम्यवादी जीवन मार्ग का निषेध कर रहे थे। उनके इस कथन को नागपुर में कम्युनिस्टों पर व्यक्त किए गए उनके विचारों से जोड़कर देखते हैं तो यह साफ हो जाता है कि कि साम्यवाद के बारे में उनकी राय एक अराजक विचारधारा की रही है और उसको वो भारत के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे। 

आंबेडकर ने मार्सवादी सोच को व्याख्यायित करते हुए कहा था कि ‘ साम्यवादी विचारधारा का मूल सूत्र यह है कि दुनिया में शोषण है। यहां अमीरों की ओर से गरीबों का शोषण हो रहा है क्योंकि धनवानों में धन बटोरने की होड़ लगी हुई है। इसी होड़ की वजह से पूंजीपति लोग मेहनतकश वर्ग को गुलाम बना रहे हैं और इसी प्रकार की गुलामी दरिद्रता और निर्धनता का कारण बनती है। कार्ल मार्क्स ने गरीबों के संबंध में या मजदूरों के शोषण के संबंध में सवाल उपस्थित कर अपने साम्यवाद की नींव रखी।‘ लेकिन आंबेडकर इसके सूत्र की तलाश में बौद्ध दर्शन में जाते हैं और वहां से अपनी बात उठाते हैं। उनका मानना है कि बुद्ध दुनिया में दुख की बात करते हैं और बुद्ध ने भी शोषण से पैदा हुए दुख और दरिद्रता के आधार पर अपने दर्शन की नींव रखी। यहां आंबेडकर बहुत स्पष्ट रूप से मानते हैं कि मार्क्स कुछ नया प्रतिपादित नहीं करते हैं बल्कि उनके सिद्धांत के सैकड़ों साल पहले बुद्ध ऐसा कह चुके हैं और इससे मुक्ति का मार्ग भी सुझा चुके हैं। अंबेडकर बुद्ध और मार्क्स के सुझाए मुक्ति के मार्ग के बुनियादी अंतर को भी बहुत साफगोई से जनता के सामने रखते हैं। उनका मानना है कि साम्यवाद की स्थापना के लिए मार्क्सवादियों का रास्ता हिंसा का है और वो अपने विरोधियों को नष्ट कर लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। बुद्ध का रास्ता इससे बिल्कुल अलग है। आंबेडकर के शब्दों को देखते हैं, ‘बुद्धिज्म की स्थापना के लिए लोगों के दिलो दिमाग को परिवर्तित करना यही बुद्ध का संवैधानिक रास्ता है। बुद्ध अपने विरोधियों को डरा धमका कर या सत्ता के बल पर पराजित करना नहीं बल्कि प्यार और अपनत्व की भावना से अपना बना लेना है।‘ 

बाबा साहेब साम्यवाद के गैर संवैधानिक तरीकों को रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि साम्यवादी मनुष्य को खत्म करने के सिद्धांत पर अमल करना चाहते हैं लेकिन अगर मनुष्य ही नहीं रहेगा तो न तो कोई प्रतिकार कर पाएगा न ही विरोध तो ऐसी सफलता तो सिर्फ दिखावा बन कर रह जाती है।‘ आंबेडकर ने साम्यवादियों के ‘मजदूरों की तानाशाही’ ( डिक्टेटरशिप आफ प्लोरेतेरियत) और उसको स्थापित करने के खूनी क्रांति के सिद्धांत को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। आंबेडकर के प्रश्नों का उत्तर वामपंथियों के पास नहीं है लिहाजा वो संदर्भ से काटकर सिर्फ ये कहते हैं कि अंबेडकर ने मार्क्स और बुद्द के सिद्धांतों में कई समानताएं थीं। पर इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि लक्ष्य तक पहुंचने का दोनों का रास्ता बिल्कुल अलग है। बाबा साहेब ने हमेशा ही साम्यवादियों के रास्तों को खारिज किया, उसके लिए वो बुद्ध के सिद्दांतों को अपनी वैचारिकी का आधार बनाते हैं। अंबेडकर ने साम्यवाद के विदेशी दर्शन पर भारतीय दर्शन या भारतीय सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की देश की माटी से उपजे विचारों को समग्रता में एक बार फिर से देश की जनता के सामने लाना चाहिए। 

Saturday, November 20, 2021

श्रद्धांजलि के बहाने विवाद को हवा


हाल ही में हिंदी की उपन्यासकार और कहानीकार मन्नू भंडारी का निधन हुआ। कुछ लेखिकाओं ने मन्नू भंडारी को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित किए जानेवाले कार्यक्रमों में मन्नू जी के अवदानों पर चर्चा न करके उसको अपनी भड़ास निकालने का मंच बना दिया। जमकर व्यक्तिगत खुन्नस निकाले गए। इस तरह की बातें की गईं जो न होतीं तो साहित्य की गरिमा बनी रहती। इंटरनेट मीडिया के अराजक मंच फेसबुक पर भी पक्ष विपक्ष में टिप्पणियां देखने को मिलीं। कई बुजुर्ग लेखिकाओं ने मन्नू भंडारी के निधन के बाद चर्चित लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को निशाने पर लिया और परोक्ष रूप से उनको मन्नू जी से विश्वासघात का आरोप तक लगा दिया। आरोप की शक्ल में पेश की गई बातों से ये लग रहा था कि जैसे मैत्रेयी पुष्पा ने राजेन्द्र यादव को बरगला दिया था, जिससे मन्नू भंडारी को बेहद मानसिक पीड़ा हुई थी। आरोपों  को इस तरह से पेश किया गया कि सारी गलती सिर्फ मैत्रेयी पुष्पा की थी और राजेन्द्र यादव बेचारे बहुत ही मासूम थे। उनकी कोई गलती थी ही नहीं, वो तो भटक गए थे। यह सही है कि राजेन्द्र यादव ने मैत्रेयी पुष्पा को अवसर दिया लेकिन अगर मैत्रेयी में प्रतिभा नहीं होती तो क्या वो इतने लंबे समय तक साहित्य में टिकी रह सकती थीं। राजेन्द्र यादव ने दर्जनों प्रतिभाहीन लेखिकाओं को मैत्रेयी पुष्पा से अधिक अवसर अपनी साहित्यिक पत्रिका हंस में दिए। उनकी पुस्तकों पर प्रायोजित समीक्षाएं भी प्रकाशित की लेकिन आज उनमें से कोई भी लेखिका मैत्रेयी जैसी ऊंचाई पर नहीं पहुंच पाईं। दरअसल जब कोई महिला सफल होती है और वो पुरुषों के साथ काम करती है तो उसको इस तरह के अपमान का विष पीना पड़ता है। मैत्रेयी पुष्पा ने देर से लिखना आरंभ किया लेकिन उनके कई उपन्यास इतने सधे हुए हैं कि वो साहित्याकाश पर छा गईं। उस वक्त भी मैत्रेयी पुष्पा पर तमाम तरह के लांछन लगे थे। राजेन्द्र यादव की भी आलोचना हुई थी लेकिन इतने सालों के बाद अब जब मन्नू भंडारी नहीं रहीं तो उन बातों को एक बार फिर से उभार कर बुजुर्ग लेखिकाएं क्या हासिल करना चाहती हैं, पता नहीं।  मत्रैयी पुष्पा ने अपनी सफाई में कई बातें कहीं जो वो पहले भी अपनी आत्मकथा या राजेन्द्र यादव पर लिखी अपनी पुस्तक में कह चुकी हैं। काफी कुछ मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा में भी लिख दिया है। लेकिन फिर से वातावरण कुछ ऐसा बना कि लगा कि ये लेखिकाएं कुछ नया रहस्योद्घाटन कर रही हैं। 

मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव पति पत्नी थे लेकिन इनके संबंध सहज नहीं थे, ये बात ज्ञात है। इन दोनों ने समय समय पर अपने साक्षात्कारों में इस तरह की बातें भी की थीं जिसको लेकर हिंदी जगत इनके संबधों के बारे में परिचित है। इन दोनों से रचनात्मक लेखन का सिरा काफी पहले छूट गया था। वर्षों बाद जब मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा लिखी तो हिंदी के आलोचकों को उसमें साहस का आभाव दिखा। मन्नू भंडारी अपनी आत्मकथा में राजेन्द्र यादव से आब्सेस्ड दिखती हैं। आज मन्नू भंडारी के निधन के बाद ऐसी बातें हो रही हैं जिनको सुनकर 2009 का साहित्यिक परिदृश्य सहसा याद आ जाता है। इस वर्ष राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी ने अपनी शादी को लेकर या अपने दांपत्य जीवन को लेकर एक साहित्यिक पत्रिका में कई ऐसी बातें कहीं थीं जिसने हिंदी साहित्य जगत को शर्मसार किया था। जहां तक मुझे याद पड़ता है कि 2009 में साहित्यिक पत्रिका कथादेश के मार्च अंक में मन्नू भंडारी ने एक लंबा लेख लिखा था। उस लेख में मन्नू जी ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि सच का सामना करने का साहस हो तभी साक्षात्कार दें। परोक्ष रूप से वो  ये नसीहत राजेन्द्र यादव को दे रही थीं। इस पूरे लेख में मन्नू भंडारी ने ये साबित करने की कोशिश की थी कि राजेन्द्र यादव ने उनकी शादी के विषय में जो गलत बातें की उसको वो ठीक कर रही हैं। यहां यह बताना आवश्यक है कि कथादेश के 2009 के जनवरी अंक में राजेन्द्र यादव का एक लंबा साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने अपनी और मन्नू भंडारी की शादी की परिस्थितियों का उल्लेख किया था। राजेन्द्र यादव के उस साक्षात्कार के उत्तर में मन्नू भंडारी ने लेख लिखा था और किन परिस्थितियों में दोनों की शादी हुई थी इसको अपने हिसाब से हिंदी साहित्य जगत के सामने रखा था। अपने उस लेख में मन्नू भंडारी राजेन्द्र यादव से सच कहने की अपेक्षा करती हैं लेकिन जब उकी बारी आती है तो वो खुद राजेन्द्र यादव की प्रेमिका मीता का असली नाम बताने से कन्नी काट लेती हैं। मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा में उन स्थितियों का भी उल्लेख नहीं किया जिसकी वजह से उन्होंने राजेन्द्र यादव को घर से निकाला था। उसका नाम लेने से भी परहेज कर गईं जिसकी वजह से उन्होंने राजेन्द्र यादव को घर से निकाला था। दोनों ने अपने जीवन काल में जमकर एक दूसरे के बारे में जितना बताया उससे अधिक छिपाया भी। आज से बारह-तेरह वर्षों पहले तक यादव-भंडारी दंपति के बारे में हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में जमकर लिखा जाता था। उस दौर में तो यहां तक चर्चा होती थी कि दोनों कुछ लिख नहीं पा रहे हैं तो अपने दांपत्य के विवादित स्वर को उभार कर चर्चा में बने रहते हैं। लेकिन समय के साथ इस तरह की बातें कम होने लगीं। कालांतर में राजेन्द्र यादव का निधन हो गया और मन्नू भंडारी बीमार रहने लगीं तो इस लेखक दंपति के बीच के विवाद को साहित्य जगत लगभग भूल चुका था। 

मन्नू भंडारी के बहाने हिंदी की चंद बुजुर्ग लेखिका जिस तरह की बातें कर रही हैं उससे तो स्त्री विमर्श के उनके प्रतिपादित सिद्धांतों पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। उनके तर्क हैं कि राजेन्द्र यादव ने किसी अन्य स्त्री के चक्कर में मन्नू भंडारी की उपेक्षा की। यहां तक तो इन बुजुर्ग लेखिकाओं के स्त्री विमर्श पर आंच नहीं आती है लेकिन जब एक ऐसे पुरुष से साथ और संबल की अपेक्षा की जाती है जो वफादार नहीं होता है तो फिर प्रश्न तो उठेंगे। क्या स्त्री मुक्ति और स्त्री चेतना की बातें सिर्फ किस्से कहानियों में ही ठीक लगते हैं। क्या सिर्फ कहानियों के पात्र ही क्रांतिकारी फैसले ले सकती हैं क्या सिर्फ कहानियों की शादीशुदा नायिकाएं ही अपने दांपत्य से त्रस्त आकर विकल्प की ओर बढ़ती हैं। अगर इस तरह की बातें सिर्फ किस्से कहानियों तक सीमित हैं तो फिर स्त्री विमर्श की बातें खोखली हैं। दूसरी बात ये कि हमारे यहां मृत व्यक्ति को लेकर स्तरहीन बातें कहने की परंपरा नहीं रही है।व्यक्ति की मृत्यु के बाद तुरंत उसकी आलोचना या उसके संबंधों के बहाने से उसको विवादित करने को हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता है। लेकिन मन्नू भंडारी की तथाकथित मित्रों ने उनके निधन के तुरंत बाद उनके और राजेन्द्र यादव के बीच के तनावपूर्ण संबंध की बात उठाकर इस परंपरा का ना सिर्फ निषेध किया बल्कि नए लेखकों के सामने एक खराब उदाहरण प्रस्तुत किया। बेहतर होता कि ये बुजुर्ग लेखिकाएं मन्नू भंडारी के साहित्यिक योगदान या अवदान पर चर्चा करतीं। उनकी रचनाओं के बारे में नई पीढ़ी को अवगत करवाती या फिर उसको नए सिरे से व्याख्यायित करने का उपक्रम करतीं। विवादित प्रसंगों की बजाय अगर उनकी संयुक्त कृति एक इंच मुस्कान के लिखे जाने की प्रक्रिया पर चर्चा होती तो उनकी प्रयोगधर्मिता का पता चलता। ये भी पता चलता कि दो अलग अलग व्यक्ति कैसे इतना प्रवाहपूर्ण उपन्यास लिख पाए। काश! ऐसा हो पाता। 


Saturday, November 13, 2021

भारतीयता से मार्क्सवादियों की चिढ़ पुरानी


लंबे समय से साहित्यिक बैठकों या साहित्यिक सम्मेलनों में कुबेरनाथ राय की चर्चा सुनता रहा था। उनके निबंधों की खूब चर्चा होती थी। कई लोग तो उनके निबंधों को जमकर तारीफ करते हैं । उनके निबंध में शब्दों के चयन को रेखांकित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के ध्वजवाहक के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। लंबे समय से प्रशंसा सुन कर मन में उनके निबंधों को पढ़ने की इच्छा थी। साहित्य अकादमी से प्रकाशित कुबेरनाथ राय का संचयन लाकर पढ़ने लगा। जो कुछ लेख पढ़ पाया उसके आधार पर ये राय बनी कि कुबेरनाथ राय का अध्ययन बहुत व्यापक था और वो अपने निबंधों में भारतीय पौराणिक ग्रंथों और प्रतीकों का बहुत ही सटीक उपयोग करते थे। उनके निबंधों को पढ़ते हुए ये भी संकेत मिला कि इतना महत्वपूर्ण लेखन करने के बावजूद हिंदी साहित्य में मार्क्सवादी लेखकों या आलोचकों ने उनकी रचनाओं पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया। क्यों मार्क्सवादी आलोचकों ने कुबेरनाथ राय की रचनाओं की उपेक्षा की। कुबेरनाथ राय की रचनाओं का मूल स्वर भारतीयता है और उनके लेखन में रामायण , महाभारत या पुराणों के संदर्भ बहुधा आते हैं।  साहित्य अकादमी से प्रकाशित पुस्तक की भूमिका में हनुमान प्रसाद शुक्ल ने राय के हवाले से कई दिलचस्प जानकारियां दी हैं। एक प्रसंग में कुबेरनाथ राय लिखते हैं, ई एम एस नंबूदरीपाद और वी के कृष्ण मेनन भारत के जाने माने कम्युनिस्ट रहे हैं। आल इंडिया रिपोर्टर (1970 दिसंबर पृ.2015 पैरा 31-33) में ई एम एस नंबूदरीपाद बनाम टी नांबियार (फौजदारी अपील नंबर 56, 1968ई, डी 31.7.70) के मुकदमे का विवरण छपा है। नंबूदरीपाद और उनके वकील कृष्ण मेनन ने मार्क्सवाद की जो व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की उसपर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एम हिदायतुल्ला और जस्टिस ए एन राव की खंडपीठ ने अपने फैसले में टिप्पणी की, हमें शंका है कि इन्होंने मार्क्सवादी साहित्य को ठीक से समझा है अथवा कभी भी पढ़ा है।...या तो ये मार्क्स के बारे में कुछ जानते नहीं अन्यथा जानबूझकर मार्क्स, एंगेल्स एवं नेनिन की रचनाओं की अपव्याख्या कर रहे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीशों की मार्सवादियों पर की गई इस महत्वपूर्ण टिप्पणी को दबा दिया गया। यह कोई मामूली केस और टिप्पणी नहीं थी। ई एम एस नंबूदरीपाद भारतीय कम्यिनुस्टों के सिरमौर माने जाते हैं। उन्होंने केरल में कम्युनिस्टों की सरकार बनाई थी और लंबे समय तक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पोलित ब्यूरो के महासचिव रहे थे। कम्युनिस्टों की ये चालाकी पुरानी है जिसमें वो अपने पक्ष की बात को, चाहे वो कमजोर ही क्यों न हो, छद्म तरीके से बहुत प्रचारित करते हैं और जो उनके पक्ष की बात नहीं होती है उसको वो योजनाबद्ध तरीके से दबा देते हैं। यही काम उन्होंने साहित्य में किया और फिर इतिहास लेखन में भी किया। वो इतने पर ही नहीं रुकते हैं बल्कि जो स्थापना या लेखन उनके विचार के अनुरूप नहीं होता है उसकी उपेक्षा कर उसको बौद्धिक विमर्श के परिदृश्य से ओझल भी करते रहे हैं। हिंदी साहित्य में तो इस तरह के दर्जनों उदाहरण हैं जहां उन्होंने अपनी उपेक्षा से कई लेखकों की अहम रचनाओं पर चर्चा तक नहीं होने दी। स्वाधीनता के बाद जब नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने तो कम्युनिस्ट विचारधारा देश में मजबूत होने लगी।

पहले जवाहरलाल नेहरू और बाद के दिनों में इंदिरा गांधी ने वामपंथी विचार को पल्लवित और पुष्पित होने का अवसर दिया। जब देश को स्वाधीनता मिली और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने देश को समाजवादी गणतंत्र की राह पर आगे बढ़ाने का काम किया। नेहरू के साम्यवादी सोच से प्रभावित होने के कई प्रमाण मिलते हैं। 1927 में ब्रसेल्स में दुनियाभर के कम्युनिस्टों का एक सम्मेलन हुआ था जिसमें भारत से जवाहरलाल नेहरू गए थे। वहां श्रम और श्रमिकों की समस्या के अलावा पूंजीवाद और उपनिवेशवाद को लेकर भी चर्चा हुई थी। वहां की चर्चाओं को सुनकर वो बेहद प्रभावित हुए और उनका झुकाव साम्यवाद की ओर हो गया। उसी वर्ष वो अपने पिता मोतीलाल नेहरू के साथ सोवियत रूस गए थे। सोवियत रूस की यात्रा के दौरान जवाहलाल नेहरू ने कई लेख आदि लिखे थे जो बाद में एक पुस्तिका के रूप में संकलित होकर प्रकाशित हुई। इसका नाम है सोवियत रूस, सम रैंडम स्केचेज एंड इंप्रेशंस। इस पुस्तिका से नेहरू के साम्यवादी विचारों से निकटता के संकेत मिलते हैं। देश के प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने, शीतयुद्ध के समय, भारत को गुटनिरपेक्ष देशों के चंद अगुवा देशों के तौर पर स्थापित करने का प्रयत्न किया।  पर एक वक्त ऐसा आया जिसने पूरी दुनिया में नेहरू की सोच को उजागर कर दिया। 1956 में जब सोवियत रूस ने हंगरी पर हमला किया तो गुटनिरपेक्ष के अगुवा देशों से ये अपेक्षा की जा रही थी वि वो सोवियत रूस के आक्रमण और उसकी विस्तारवादी कदम की पुरजोर तरीके से आलोचना करेंगे लेकिन आलोचना का स्वर बेहद धीमा था। 

नेहरू का झुकाव साम्यवाद की ओर था लिहाजा सत्ता का साथ पाकर इस विचारधारा को, उसके लेखकों को उसके अनुयायियों को मजबूती मिलनी आरंभ हो गई। परिणाम ये हुआ कि हिंदी साहित्य में मार्क्सवाद पर आधारित साहित्य लेखन और आलोचना मुख्यधारा के लेखन के तौर पर स्थापित हो गया। जिन भारतीय लेखकों ने मार्क्सवाद की जगह भारतीयता को अपने लेखन का आधार बनाया उनकी न केवल उपेक्षा की गई बल्कि उनके लेखन को दकियानूसी, रूढिवादी लेखन कह कर खारिज किया जाने लगा । मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में हो रहे लेखन को प्रगतिशील कहकर स्थापित किया जाने लगा। साहित्य में प्रगतिशीलता का पर्याय मार्क्सवादी लेखन हो गया। जबकि भारतीय लेखन परंपरा हमेशा से प्रगतिशील रही है। मार्क्सवादी विचारधारा के असर ने साहित्य में समूह भी पैदा किए जो अपने साथी सदस्यों की रचनाओं का ख्याल रखने लगे। बहुधा रचना की आलोचना का आधार रचना की जगह लेखक की विचारधारा होने लगी। परिणाम ये हुआ कि ज्यादातर लेखन एकांगी होने लगा। जब कोई लेखन एकांगी होने लगता है तो विषयों की कमी होने लगती है । जब विषयों की कमी होने लगी तब इस विचारधारा के लेखकों ने ‘न लिखने का कारण’ ढूंढना आरंभ किया। इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ के वर्षों में हिंदी साहित्य में ‘न लिखने के कारण’ का जमकर शोर मचा था। लेकिन मार्क्सवादी ये भूल गए कि कोई भी विचार या दर्शन साहित्य लेखन का आधार नहीं हो सकता है। ये सिर्फ साहित्य में लेखन को आधार तो प्रदान कर सकते हैं लेकिन साहित्य की अंतर्वस्तु नहीं हो सकते हैं। कुबेरनाथ राय वाली पुस्तक की भूमिका में हनुमान प्रसाद शुक्ल ने ठीक से इस अवधारणा को व्याख्यायित किया है, साहित्य मनुष्य के चित्त को समृद्ध करता है. उसका परिष्कार करता है, उसके क्षितिज का विस्तार करता है, उसकी झुधा-तृषा को परिशांत करता है, मनोग्रंथियों को खोलता और मनोरोगों का उपचार करता है। मार्क्सवादी इसको समझ नहीं पाए और वो मार्क्स के दर्शन को साहित्य की अंतर्वस्तु बनाने में जुट गए। परिणाम ये हुआ कि सर्जनात्मक लेखन नारेबाजी या फिर राजीनितक दल का घोषणा पत्र बनने लगा। पाठक इससे ऊबने लगे और साहित्य से दूर होने लगे। अब समय है कि साहित्य में मार्क्सवादियों की लेखन प्रविधि को चुनौती दी जाए और उन लेखकों पर गंभीरता से काम हो जिन्होंने मार्क्सवादी चिंतन की तुलना में भारतीय चिंतन परंपरा को अपनाया और साहित्य में भारतीयता को जीवित रखा। कुबेरनाथ राय से लेकर नरेन्द्र कोहली तक ऐसे लेखकों की लंबी सूची है जिनको मार्क्सवादियों ने छलपूर्वक मुख्यधारा में आने से रोके रखा। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास जैसी संस्थाओं को भारतीय चिंतन परंपरा के लेखकों की रचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने का उपक्रम करना चाहिए ताकि भारतीय लेखन की समग्र तस्वीर पाठकों के सामने हो। 

Saturday, November 6, 2021

चयन की पारदर्शिता पर उठे सवाल


फिल्मकारों और फिल्मों से जुड़ी एक संस्था है जिसका नाम है फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया (एफएफआई)। अन्य कामों के अलावा ये संस्था हमारे देश की उस फिल्म का चयन भी करती है जो आस्कर अवार्ड के लिए भेजी जाती है। आस्कर के लिए भेजी जानी वाली फिल्मों के चयन को लेकर बहुधा विवाद होते रहते हैं। इस वर्ष भी हुआ। इस वर्ष फिल्म फेडरेशन ने तमिल फिल्म ‘कुझंगल’ का चयन किया और हिंदी फिल्म ‘सरदार उधम’ को नहीं भेजा गया। तर्क ये दिया गया कि फिल्म सरदार उधम बहुत लंबी है और इसमें अंग्रेजों के प्रति घृणा का भाव दिखाया गया है। वैश्वीकरण के इस दौर में घृणा का ये भाव अपेक्षित नहीं है। किसी फिल्म को आस्कर में नहीं भेजने के ये कारण समझ से परे है। स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म शिंडलर्स लिस्ट जिसने आस्कर में कई पुरस्कार जीते थे वो तीन घंटे से अधिक अवधि की फिल्म है। इस फिल्म की लंबाई पर कभी आस्कर की जूरी ने सवाल नहीं उठाया। इस फिल्म को लेकर कभी प्रश्न नहीं उठा कि इसमें नाजियों का चित्रण आपत्तिजनक है। इसके अलावा फिल्म गान विद द विंड की लंबाई भी तीन घंटे अट्ठावन मिनट थी। फिल्म मेरा नाम जोकर की लंबाई के बारे में सबको ज्ञात ही  है। इस फिल्म की अवधि इतनी अधिक थी इसमें दो मध्यांतर थे। हमारे यहां से भी पूर्व में कई ऐसी फिल्में हैं जो आस्कर में भेजी जा चुकी है जो फिल्म सरदार उधम से लंबी है।  इसलिए एफएफआई की तरफ से जो तर्क दिए गए वो बचकाने तो हैं ही अपने देश के इतिहास को भी सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देखने के दोष का शिकार हो गया। जलियांवाला बाग नरसंहार का जब चित्रण होगा तो उसको इसी तरह से देखा जाएगा। दरअसल इस तरह की बचकानी दलीलों की वजह से एफएफआई की साख लगातार छीजती चली गई है। आज भले ही ये संस्था दावा करे कि वो भारतीय फिल्मकारों की प्रतिनिधि संस्था है लेकिन वर्तमान दौर के बड़े फिल्मकार या तो इससे जुड़े नहीं हैं या यहां सक्रिय नहीं हैं। भारत सरकार को इस संस्था को मान्यता पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है।

आस्कर में भारतीय फिल्म की प्रविष्टि को लेकर विवाद अभी ठंडा भी हुआ नहीं था कि एक और विवाद सामने आ गया है। इसमें भी फिल्म फेडरेशन का नाम आ रहा है। ये विवाद उठा है गोवा में आयोजित होनेवाले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (आईआईएफआई) के दौरान दिखाई जाने वाली एक फिल्म डिक्शनरी को लेकर। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया का आयोजन गोवा में 20 से 28 नवंबर तक है। इसका आयोजन सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक संस्था फिल्म समारोह निदेशालय करती है। इस अंतराष्ट्रीय फेस्टिवल के दौरान इंडियन पैनोरमा के अंतर्गत दिखाई जानेवाली फिल्मों की सूची जारी की गई। इस सूची में आमतौर पर चौबीस फिल्में होती हैं जो फेस्टिवल के दौरान दिखाई जाती हैं। इन फिल्मों का चयन एक जूरी करती है। जूरी सदस्यों और अध्यक्ष का चयन फिल्म समारोह निदेशालय करती है। इस बार भी बारह सदस्यों की एक जूरी ने इंडियन पैनोरमा के तहत दिखाई जानेवाली फिल्मों का चयन किया। इस जूरी के अध्यक्ष कन्नड फिल्मकार एस वी राजेन्द्र सिंह बाबू थे। राजेन्द्र सिंह बाबू के बारे में बताते चलें कि उन्होंने पिछले चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार किया था। उनकी अध्यक्षता वाली जूरी ने 24 फिल्मों का चयन किया और अपनी संस्तुति फिल्म समारोह निदेशालय को भेज दी। जब निदेशालय ने इंडियन पेनोरामा के फिल्मों की घोषणा की तो उसमें 24 की जगह 25 फिल्मों के नाम थे। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार में मंत्री ब्रत्य बसु की फिल्म डिक्शनरी को इसमें शामिल किया गया। जब इस बारे में जानकारी ली गई तो पता चला कि फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया ने एकमात्र इसी फिल्म की संस्तुति की थी और इंडियन पैनोरमा के नियमों के अंतर्गत फिल्म समारोह निदेशालय की आतंरिक समिति ने इस फिल्म का चयन किया। 

यहां तक तो सबकुछ सामान्य लगता है कि एफएफआई ने एकमात्र फिल्म की संस्तुति की और निदेशालय की समिति ने उसका चयन कर लिया। लेकिन इसके तह में जाने पर एक असामान्य कहानी सामने आई। ममता बनर्जी सरकार में मंत्री और फिल्मकार ब्रत्य बसु की फिल्म डिक्शनरी की प्रविष्टि इंडियन पैनोरमा के लिए आई थी। इंडियन पैनोरमा की जूरी ने आरंभिक दौर में ही इस फिल्म को देखकर उसको फेस्टिवल के दौरान प्रदर्शित करने योग्य नहीं पाया। इस बीच फिल्म फेडरेशन ने डिक्शनरी को लेकर अपनी संस्तुति फिल्म समारोह निदेशालय को भेज दी। निदेशालय की आतंरिक कमेटी ने इसका चयन कर 25 फिल्मों की सूची जारी कर दी। ये ज्ञात नहीं हो सका कि निदेशालय ने फिल्म फेडरेशन से ये बात जाननी चाही कि नहीं उनकी तरफ से एकमात्र फिल्म की संस्तुति ही क्यों आई, जबकि आमतौर पर वो पांच फिल्मों की संस्तुति करते हैं।  नतीजा यह हुआ कि एक ऐसी फिल्म जिसको जूरी ने रिजेक्ट कर दी थी वो प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों की सूची में आ गई। प्रश्न ये उठता है कि अगर इस तरह की कार्यप्रणाणी है तो फिर जूरी की राय का क्या अर्थ है? क्यों बीस पच्चीस दिन तक जूरी के सदस्य दो सौ बीस फिल्मों को देखकर उसमें से 24 फिल्मों का चयन करते हैं। हर फिल्म पर माथापच्ची होती है। फिल्म समारोह निदेशालय को इस पूरे प्रकरण पर स्थिति साफ करनी चाहिए। फिल्मों के चयन को लेकर पारदर्शिता होनी चाहिए अन्यथा चयन की प्रक्रिया से फिल्मकारों का विश्वास डिग जाएगा। 

इसके पहले भी फिल्म समारोह निदेशालय के फैसलों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2017 के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में फिल्म एस दुर्गा और फिल्म न्यूड के प्रदर्शन को लेकर अच्छा खासा विवाद उठा था। फिल्म एस दुर्गा और फिल्म न्यूड को इंडियन पैनोरमा से बाहर करने के फैसले के खिलाफ जूरी के अध्यक्ष सुजय घोष ने इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि बिना उनको बताए इन फिल्मों को प्रदर्शित होनेवाली फिल्मों की सूची से बाहर कर दिया गया । ऐसी अप्रिय स्थिति इस बार भी हो सकती है कि जूरी के अध्यक्ष या सदस्य इस बात को लेकर इस्तीफा दे दें कि उनकी राय के खिलाफ फिल्म का प्रदर्शन होने जा रहा है।  एस दुर्गा के प्रदर्शन को लेकर तो विवाद इतना बढ़ा था कि इस फिल्म के निर्माता सूचना और प्रसारण मंत्रालय के खिलाफ केरल हाईकोर्ट चले गए थे। उस वक्त भी फिल्म समारोह निदेशालय की कार्यपद्धति को लेकर सवाल उठे थे। अब एक बार फिर से नियमों की आड़ में एक ऐसी फिल्म को जोड़ा गया जिसको जूरी ने खारिज किया था। विवाद बढ़ने के बाद अगर निदेशालय इस फिल्म को सूची से हटाती भी है तो उससे एक राजनीतिक विवाद जन्म ले सकती है। ममता बनर्जी की पार्टी को भारतीय जनता पार्टी पर या मोदी सरकार पर निशाना साधने का एक मौका मिल जाएगा। वो ये आरोप लगा सकती हैं कि उनकी पार्टी के नेता की फिल्म को जानबूझकर हटा गया। एक ऐसा मुद्दा खड़ा हो सकता है जिसमें राजनीति नहीं है सिर्फ अफसरों की लापरवाही या कुछ और है। केंद्र सरकार ने कुछ दिनों पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्रालय की फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं के पुनर्गठन की बात की थी, अब वक्त आ गया है कि उस घोषणा पर अमल किया जाए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं का पुनर्गठन हो और नियमों को पारदर्शी बनाकर जिम्मेदारियां भी तय की जाएं ताकि भविष्य में विवाद न हों और फेस्टिवल की लोकप्रियता भी बढ़े। 

Sunday, October 31, 2021

अर्थहीन अतिसक्रियता के अराजक मंच


पिछले दिनों अंग्रेजी के एक स्तंभकार ने कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का आकलन करते हुए अंग्रेजी में एक लेख लिखा। अपने लेख के लिंक को उन्होंने ट्विटर पर साझा किया और उसमें उन्होंने राहुल गांधी की जगह राजीव गांधी लिखा। थोड़ी ही देर में उन्होंने अपने उस ट्वीट को डिलीट कर दिया। फिर से लिंक साझा किया, इस थोड़ी लंबी टिप्पणी लिखी लेकिन फिर उन्होंने राहुल गांधी की जगह राजीव गांधी लिख दिया। फिर डिलीट कर दिया और तीसरी बार में उन्होंने अपने लेख के अनुसार ट्वीटर टिप्पणी में राहुल गांधी और कांग्रेस लिखा। तबतक कुछ लोग उनसे मजे ले चुके थे। उनको राजीव गांधी की भक्ति से बाहर निकलने की सलाह दे चुके थे। कई ने उनके पहले ट्वीट का स्क्रीन शॉट लेकर उनको राजीव गांधी के प्रभाव से मुक्त होने की सलाह भी दे डाली थी। ट्वीटर की दुनिया में ऐसा कई बार कई लोगों के साथ होता है। दरअसल इंटरनेट मीडिया की इस दुनिया का स्वभाव बिल्कुल अलग है। कई काम जो इंटरनेट मीडिया ने किया उसको रेखांकित करना तो आवश्यक है लेकिन इसके प्रभाव पर भी विचार करना चाहिए। इंटरनेट मीडिया के इन मंचों ने वैसे सभी लोगों को उनके मूल स्वभाव और रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिया। इस मीडिया ने वैसे सभी स्तंभकारों के पक्ष को भी सामने ला दिया जो ये दावा करते नहीं थकते थे कि वो निष्पक्ष हैं। निष्पक्ष होने का दावा करनेवाले लगभग सभी स्तंभकार, टिप्पणीकारों की सोच का परत दर परत सामने आ गया। ट्वीटर, फेसबुक और अन्य इंटरनेट माध्यम को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि इसने निष्पक्षता की आड़ में इस या उस राजनीतिक दल या विचारधारा का समर्थन करनेवालों के सामने से आड़ हटा दी । 

पिछले दिनों शाह रुख खान के पुत्र आर्यन खान पर नशाखोरी का आरोप लगा। वो जेल गए। अदालती कार्यवाही चली और आखिर में बांबे हाई कोर्ट ने उनको जमानत दे दी। गिरफ्तारी से लेकर जमानत पर बांबे हाईकोर्ट के फैसले तक इंटरनेट मीडिया के माध्यमों पर ट्वीटर और फेसबुक वीरों ने जमकर तलबारबाजी की। अदालत पर सवाल उठाए। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और उसके अधिकारियों की मंशा पर प्रश्न खड़े किए गए। केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास हुआ। परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री मोदी को भी इस विवाद में शामिल करने का प्रयास हुआ। अदालत से पहले इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय लोगों ने अपना निर्णय सुना दिया कि आर्यन बेगुनाह है। ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि अगर शाह रुख खान के बेटे को विशेष अदालत ने जमानत नहीं दी तो उसका कोई आधार होगा। उस न्यायाधीश के बारे में विचार नहीं किया गया जिसके फैसले पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं। ये भी नहीं सोचा गया कि मुंबई हाईकोर्ट ने तीन दिनों तक केस की दलीलों को क्यों सुना? केस के मेरिट पर बहस करना वकीलों और उसपर निर्णय सुनाना अदालत का काम है। ट्वीटरवीरों को धैर्य कहां है। वो तो अपने मन का फैसला सुनना चाहते हैं। अगर उनके मनमुताबिक निर्णय नहीं आया या किसी जांच एजेंसी का कोई कदम उनके हिसाब  नहीं है तो बगैर कुछ सोचे समझे आलोचना शुरु कर देते हैं। निर्णयात्मक टिप्पणियां करने लग जाते हैं। यह एक नया ट्रेंड है जो इंटरनेट मीडिया के ये अराजक मंच अपने उपयोगकर्ताओं को देते हैं। लोकतंत्र में आलोचना करने का अधिकार सभी नागरिकों को है, लेकिन उसका कोई आधार तो होना चाहिए। जब मंच ही अराजक होने की छूट देता है तो उपयोगकर्ता क्यों परहेज करें। 

इंटरनेट मीडिया के मंचों पर एक तीसरी प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है। ये प्रवृति है समाज में जहर घोलने की कोशिश। जैसे ही शाह रुख खान का पुत्र गिरफ्तार होता है तो इस तरह के ट्वीट आने लगते हैं कि देश के मुस्लिम सुपरस्टार को तंग किया जा जा रहा है। मुस्लिम सुपरस्टार को चुप कराने की साजिश की जा रही है। अब ये प्रवृत्ति कितनी घातक है इसपर विचार किया जाना चाहिए। शाह रुख खान की कला का सम्मान इस देश के हिंदुओं ने भी किया। उन्होंने भी शाह रुख खान की फिल्में देखीं। शाह रुख खान को क्या सिर्फ मुसलमानों ने सुपरस्टार बनाया। क्या सिर्फ मुस्लिम दर्शक शाह रुख खान की फिल्मों के प्रशंसक हैं। बिना ये सोचे समझे कला को भी सांप्रदायिकता का शिकार बनाने की जो मानसिकता है वो भी इसी इंटरनेट मीडिया के मंच पर दिखाई देती है। इस तरह के ट्वीट से समाज बंटता है। समाज में वैमनस्यता फैलती है जो किसी भी तरह से न तो देशहित में है और न ही हमारे अपने हित में । इंटरनेट मीडिया के इन मंचों के अराजक स्वभाव को न तो देशहित की चिंता है और न ही समाज हित की। सांप्रदायिक सोच का खुले आम प्रकटीकरण और उस सोच को मुखर और मौन दोनों तरह का समर्थन मिलता है। क्या इंटरनेट मीडिया के उपयोगकर्ताओं ने कभी ये सोचा कि किसी भी कला को हिंदू मुसलमान में विभक्त करके वो कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। नहीं सोचा। सोचने का समय आ गया है। 

इंटरनेट मीडिया खासकर ट्वीटर पर इन दिनों कुछ लोग अति सक्रियता के शिकार भी नजर आते हैं। छोटी छोटी बातों पर कैंपेन चला देना और फिर संबंधित व्यक्ति या समूह  कंपनी पर हमलावर अंदाज में अपनी बातें करना इसी अति सक्रियता का उदाहरण है। ऐसे कई छोटे छोटे समूह खासतौर पर ट्वीर पर देखे जा सकते हैं जो हर दिन ये ढूंढते हैं कि आज क्या ट्रेंड करवाया जाए। इस अति सक्रियता से कई बार नकारात्मकता का भाव सामने आता है। एक ऐसा नकार जो समाज और देश हित में नहीं होता। लेकिन ट्रेंड करवाने वाले इन समूहों को इसका भान नहीं होता है कि उनके तथाकथित कैंपेन का असर कितना गहरा होता है। पिछले दिनों एक विज्ञापन एजेंसी के बड़े अधिकारी से बात हो रही थी तो उन्होंने बताया कि अब तो विज्ञापन एजेंसियां क्रिएटिव बनाते समय कई बार इस बात को ध्यान में रखकर काम करती हैं कि ये विवादित होगा कि नहीं। कई बार जानबूझ कर विवाद पैदा करनेवाले विज्ञापन बनाए जाते हैं। ट्वीटर पर अतिसक्रिय समूह बहुधा इस तरह के विज्ञापनों को लेकर हो हल्ला मचाने लगते हैं और विज्ञापन एजेंसी का काम पूरा हो जाता है। फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर इस तरह के विवादित कैंपेन आपको ट्वीटर पर नियमित अंतराल पर देखने को मिलते हैं। किसी कार्यक्रम में किसी को बुलाने को लेकर आए दिन हो हल्ला मचता ही रहता है। किसी समिति में किसी के नामांकन पर भी पक्ष विपक्ष में टीका टिप्पणी होती ही रहती है।  इसके अलावा इन दिनों इंटरनेट मीडिया पर धर्म को लेकर भी तरह तरह की टिपणियां देखने को मिलती हैं। कई बार कट्टर हिंदू जैसे शब्द भी पढने को मिलते हैं। हिंदू और कट्टरता दोनों नदी के दो किनारे हैं जो कभी मिल ही नहीं सकते। हिंदू विचार  या हिंदू दर्शन से अनभिज्ञ लोग इस तरह की शब्दावली का उपयोग कर खुद को हास्यास्पद बनाते हैं। ट्वीटर पर कोई छोटा मोटा कैंपेन भी चलता है तो ट्विटर पर सक्रिय लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। वो ये भूल जाते हैं कि एक सौ तीस करोड़ से अधिक आबादी वाले इस देश में ट्वीटर पर सिर्फ सवा दो करोड़ लोग सक्रिय हैं। फेसबुक पर करीब चौंतीस करोड़। इसमें भी कितने लोग सक्रिय हैं वो देखने पर संख्या और कम हो जाती है। इसलिए ट्वीटर और फेसबुक पर चलनेवाली बहसों का इसका कोई अखिल भारतीय प्रभाव होता होगा, इसमें संदेह है।