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Saturday, January 28, 2023

संघ बहाना, मोदी निशाना


इन दिनों पूरे देश में प्रमुख रूप से दो चर्चा हो रही है। एक बीबीसी की डाक्यूमेंट्री इंडिया, द मोदी क्वेश्चन की और दूसरी शाह रुख खान की फिल्म पठान की। वामपंथी छात्र संगठन बीबीसी की डाक्यूमेंट्री का सार्वजनिक प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। इसपर विवाद हो रहे हैं। फिल्म पठान को सफल बताकर उसी ईकोसिस्टम के लोग भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। बीबीसी की डाक्यूमेंट्री की आड़ में वो दल भी हमलावर हैं जिनके नेता ऐश्वर्या राय से लेकर क्रिकेट की अधिक चर्चा होने पर पर मीडिया को घेरते रहे हैं। अगर डाक्यूमेंट्री की ही चर्चा करनी थी तो ‘आल दैट ब्रीथ्स’ और ‘द एलिफेंट व्हिस्पर्स’ की चर्चा करते। उनका सार्वजनिक प्रर्दर्शन करते। ये दोनों आस्कर अवार्ड के लिए शार्टलिस्टेड हैं। इसकी चर्चा नहीं करके वामदलों का ईकोसिस्टम एक ऐसी डाक्यूमेंट्री की चर्चा करने में लगा है जिसका रिसर्च तो दोषपूर्ण है ही उसकी मंशा पर भी प्रश्नचिन्ह है। द मोदी क्वेश्चन में गुजरात हिंसा के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जा रहा जिसपर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आ चुका है। 

बीबीसी की डाक्यूमेंट्री अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने का एक प्रयास है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का प्रयास पहली बार हुआ है। पिछले महीने ‘द इकोनामिस्ट’ में एक लेख प्रकाशित हुआ था, द मिथ आफ अ होली काउ। इस लेख में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गाय और हिंदू राष्ट्र को जोड़कर देखा गया। इस लेख के लेखक ने गिनकर ये बताया कि ऋगवेद में 700 जगहों पर गाय का उल्लेख है लेकिन गोमांस नहीं खाने की बात कहीं नहीं है। ग्रंथों से खोज-खोजकर बताया गया है कि प्राचीन काल में गोमांस खाने का उल्लेख मिलता है। लेख में आर्य समाज को हिंदू फंडामेंटलिस्ट समूह बताया गया है। आर्यसमाजियों ने भारत की हिंदू पहचान को फिर से स्थापित करने के लिए गोरक्षा को औजार बनाया था। वो हिंदू पहचान जो मुस्लिम आक्रांताओं की वजह से धूमिल पड़ गया था। लेख में देश की स्वतंत्रता के लिए भी गोरक्षा के उपयोग का तर्क दिया गया है।  इस संदर्भ में गांधी को उद्धृत किया गया है। गांधी गोरक्षा को विश्व को हिदुत्व का तोहफा मानते थे और कहते थे कि हिंदुत्व तबतक रहेगा जबतक गाय की रक्षा करनेवाले हिंदू रहेंगे। कहना न होगा कि लेखक ने गोरक्षा को हिदुंत्व से जोड़कर उसपर राजनीति करनेवालों और घटनाओं को गिनाया। फिर उसको मोदी और मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से जोड़ा। यहां लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दक्षिण पंथी अर्धसैनिक संगठन तक बता दिया। ये तो एक उदाहरण मात्र है जबकि ऐसे कई लेख ‘द इकोनामिस्ट’ जैसी पत्रिकाएं में प्रकाशित होते रहे हैं। इस तरह के लेखों को आधार बनाकर वामपंथी ईकोसिस्टम छाती कूटने लगता है। 

अगले वर्ष देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अभी जिस तरह का माहौल है और चुनावी सर्वे और चुनावी पंडित जो संकेत दे रहे हैं उससे लगता है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाएगी। एक तरफ विपक्षी दल यात्राओं आदि के माध्यम से सरकार पर हमलावर हैं तो दूसरी तरफ ईकोसिस्टम को काम पर लगाया गया है। पिछले दिनों कन्नड के लेखक देवनूरु महादेवा की एक पुस्तिका पर नजर पड़ी। इस पुस्तिका का नाम है आरएसएस, द लांग एंड द शार्ट आफ इट। पुस्तिका मूल रूप से कन्नड में लिखी गई है। पुस्तक के बारे में बात करने के पहले जान लेते हैं कि देवनूरु महादेवा कौन हैं। पुस्तिका में ही लिखा है कि इन्होंने 2015 में पुरस्कार वापसी अभियान के दौरान साहित्य अकादमी और पद्मश्री पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी। ये भी बताया गया है कि छात्र जीवन में देवानूरु महादेवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव में थे। बाद में उनका कई कारणों से मोहभंग हो गया। छोटी सी पुस्तिका की भूमिका रामचंद्र गुहा ने लिखी है और अंत में योगेन्द्र यादव की एक लंबी टिप्पणी भी है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि एक लंबे लेख को पुस्तिका की शक्ल दी गई। कई भाषाओं में इसको अनुदित कर प्रकाशित करवाया गया। 

अपनी इस पुस्तिका में देवानूरु महादेवा की स्थापना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मनुस्मृति के चातुर्वण के आधार पर समाज को बांटकर रखना चाहता है। इस्लाम और ईसाई धर्म का विरोध संघ इस वजह से करता है क्योंकि इन दोनों धर्मों में चतुर्वण का निषेध है। संघ को ये निषेध स्वीकार नहीं । संघ चहता है कि समाज में जाति व्यवस्था बनी रहे। देवानूरु महादेवा अपनी इस स्थापना के लिए गुरुजी गोलवलकर और वीर सावरकर के लेखों और पुस्तकों को उद्धृत करते हैं। उनका दावा है कि झूठ संघ का कुलदेवता है। एक जगह वो सुरुचि प्रकाशन से 1997 में प्रकाशित पुस्तक ‘परम वैभव के पथ पर’ को उद्धृत करते हुए बताते हैं कि उसमें संघ से जुड़े 40 संगठनों का उल्लेख है। फिर कहते हैं कि उस समय ये स्थिति थी तो अब न जाने कितने संगठन इसकी छत्रछाया में पल रहे होंगे। जब किसी चीज को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना होता है तो तथ्यों के साथ इसी तरह से छेड़छाड़ की जाती है। डा सदानंद दामोदर सप्रे की इस पुस्तक में 31 संगठनों का विवरण है जिसको देवानूरु महादेवा 40 बता रहे हैं। यहां तक कि वो धर्म संसद को भी संघ की संस्था के तौर पर उल्लिखित करते हैं। एक जगह लेखक विरोधी दल के नेता की तरह हर भारतीय को 15 लाख के वादे और करोड़ों को नौकरी आदि का प्रश्न उठाते हैं। लेखक या गुहा और यादव जैसे उनके समर्थकों को ये बताना चाहिए कि उनकी पालिटिक्स क्या है।  

अपनी इस पुस्तिका में लेखक चतुर्वण को लेकर भी भ्रमित हैं। वो व्यवसाय आधारित जाति व्यवस्था और जन्म आधारित जाति व्यवस्था का घालमेल करते हुए दोषपूर्ण निष्कर्ष देते हैं। भारत रत्न से सम्मानित लेखक डा पांडुरंग वामन काणे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास के पहले खंड में विस्तार से वर्ण पर विचार किया है। काणे ने एक जगह कहा है कि ‘जन्म और व्यवसाय पर आधारित जाति व्यवस्था प्राचीन काल में फारस रोम और जापान में भी प्रचलित थी। किंतु जैसी परंपराएं भारत में चलीं और उनके व्यावहारिक रूप जिस प्रकार भारत में खिले, वे अन्यत्र दुर्लभ थे और यही कारण था कि अन्य देशों में पाई जानावेली व्यवस्था खुल-खिल न सकी और समय के प्रवाह में पड़कर समाप्त हो गई।‘ पता नहीं देवानूरु महादेवा ने कौन सी मनुस्मृति और कौन सा अनुवाद पढ़ा । अगर इसका उल्लेख कर देते तो स्पष्ट होता। मनुस्मृति के कई अंग्रेजी अनुवाद हुए। डा बुहलर के अनुवाद को बेहतर माना जाता है। काणे बुहलर की उस स्थापना का भी निषेध करते हैं जिसमें वो कहते हैं कि मनुस्मृति, मानवधर्मसूत्र का रूपांतर था। काणे मानवधर्मसूत्र को कोरी कल्पना कहते हैं। संभव है कि देवानूरु ने कोई ऐसा ही भ्रामक अनुवाद पढ़कर अपनी राय बना ली हो। 

दरअसल अगले वर्ष लोकसभा चुनाव तक कई ऐसी पुस्तकें और पर्चे छपेंगे जिनमें इसी तरह की भ्रामक बातों की ओट में राजनीति की जाएगी। कुछ फिल्में भी आएंगी जिनमें इस तरह के संवाद होंगे जो वर्तमान परिस्थिति में परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नरेन्द्र मोदी की नीतियों के खिलाफ होंगे। जैसे अभी एक फिल्म आई मिशन मजनू। इसमें एक लंबा संवाद है जिसमें नायक कहता है कि हम इंडिया हैं, नफरत पर नहीं प्यार पर पलते हैं। इसको सुनकर राहुल गांधी की यात्रा के दौरान के उनके बयान याद आते हैं। दरअसल ईकोसिस्टम प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमला दिखता है लेकिन असली निशाना नरेन्द्र मोदी हैं।  


Saturday, January 21, 2023

पीएम की नसीहत के बाद बोलती बंद


भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। बैठक के दूसरे दिन पार्टी के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल अगले वर्ष जून तक के लिए बढ़ाया जा चुका था। हर तरफ राजनीतिक बातें हो रही थीं। इस वर्ष नौ राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव की संभावनाओं पर कार्यकारिणी के सदस्य आपस में चर्चा कर रहे थे। बैठक समापन की ओर था। सबको प्रधानमंत्री के भाषण की प्रतीक्षा थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने चिरपरिचित अंदाज में उन्होंने अपना भाषण आरंभ किया। राष्ट्र और राजनीति की बातें करते हुए उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की बातें की। अचानक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिनेमा से जुड़ा एक बड़ा संदेश दे दिया। प्रधानमंत्री ने अपने दल के नेताओं को कहा कि प्रतिदिन सिनेमा पर बोलने की आवश्यकता नहीं है। प्रधानमंत्री ने उन नेताओं को भी नसाहत दी जो हर दिन फिल्मों या फिल्मों से जुड़े मसलों पर विवाद खड़े करनेवाले बयान देते रहते हैं। फिल्म पर अपनी बात कहने के बाद प्रधानमंत्री अन्य मुद्दों पर चले गए। प्रधानमंत्री का संदेश ये था कि नेताओं को हर चीज के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और आवश्कता पड़ने पर गंभीरता के साथ अपनी बात कहनी चाहिए। प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हुआ। कार्यकारिणी की बैठक भी समाप्त हुई। खबरों में प्रधानमंत्री के भाषण के अन्य बिंदुओं पर जमकर चर्चा हुई। सामाजिक समरसता से लेकर बुद्धिजीवियों तक से पार्टी के नेताओं को संपर्क बढ़ाने की बात पर काफी चर्चा हुई। सिनेमा पर विवादित बयान देनेवाले अपनी पार्टी के नेताओं को दी गई उनकी नसीहत पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कम लोगों का ही ध्यान प्रधानमंत्री के सिनेमा पर दिए गए बयान पर गया। हलांकि हिंदी फिल्म से जुड़े बड़े सितारों को राजनीतिक बातों पर प्रतिक्रिया देने में काफी वक्त लगता है।  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस बयान के बाद मध्यप्रदेश के मंत्री नरोत्तम मिश्रा का एक बयान जागरण समूह के समाचारपत्र नईदुनिया/नवदुनिया में प्रकाशित हुआ है। प्रकाशित बयान के मुताबिक नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया है। प्रधानमंत्री की हर बात हमारे लिए शिरोधार्य है। सारे कार्यकर्ता वहां से प्रेरणा लेकर आए हैं। हमारा आचरण और व्यवहार हमेशा उनके मार्गदर्शन में उर्जा से भरते हैं।‘ नरोत्तम मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं में से हैं जो फिल्मों या वेब सीरीज पर लगातार बयान देते रहते हैं। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री होने के कारण कई बार उन्होंने आपत्तिजनक माने जानेवाले दृष्यों को लेकर सिर्फ बयान ही नहीं दिए बल्कि सख्त कदम उठाने की बात भी की थी। अब उनका ये कहना कि नेतृत्व का आदेश शिरोधार्य होगा, इस बात का संकेत दे रहा है कि प्रधानमंत्री का फिल्मों को लेकर दी गई नसीहत का उनकी पार्टी के बयानवीर नेताओं पर असर हुआ है। दरअसल इंटरनेट मीडिया पर शाह रुख खान की फिल्म पठान के बेशर्म रंग गाने के रिलीज होने के बाद उसके बायकाट को लेकर चर्चा हो रही है। पक्ष विपक्ष में ट्वीट हो रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का सिनेमा पर हर दिन बयानबाजी से बचने की सलाह महत्वपूर्ण हो जाती है।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ फिल्म से जुड़े लोगों की बैठक में अभिनेता सुनील शेट्टी ने योगी जी से फिल्मों के बायकाट की मुहिम को लेकर अपनी बात रखी थी। उन्होंने तब ये भी आग्रह किया था कि वो इंडस्ट्री की भावना को प्रधानमंत्री तक पहुंचा दें। योगी जी ने ये बात प्रधानमंत्री तक पहुंचाई या नहीं ये तो नहीं मालूम लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में सिनेमा को लेकर अपनी बात कही उससे लगता है कि प्रधानमंत्री का सूचना तंत्र बेहद सक्रिय है। उनतक हर छोटी बड़ी बात पहुंचती है। फिल्मों की बायकाट की अपील का मसला पिछले कुछ दिनों से काफी बढ़ा है। कई बार ये स्वत:स्फूर्त होता है तो कई बार अभियान चलाया जाता है। कई बार फिल्म के कलाकारों के व्यवहार के कारण दर्शक खिन्न हो जाते हैं और इंटरनेट मीडिया पर उसके खिलाफ अपनी बात कहते लिखते हैं। कई बार अभिनेता, अभिनेत्री या निर्देशक के राजनीतिक बयानों का असर भी फिल्म पर पड़ता है। उनके बयानों से नाराज होकर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपना विरोध जताने के लिए उनकी फिल्म का विरोध करते हैं। इसमें कोई गलत बात नहीं है। जब तक विरोध शांतिपूर्ण ढंग से होता है तबतक किसी को इसपर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आप नरेन्द्र मोदी का विरोध भी करेंगे, आप विरोधी दलों के लिए प्रचार भी करेंगे और ये अपेक्षा करेंगे कि मोदी के समर्थक या भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता आपकी फिल्म भी देखें। अब ऐसा संभव नहीं दिखता। अब अगर कोई अभिनेत्री जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आंदोलनकारी छात्रों के साथ जाकर खड़ी होती है तो उसका असर उसकी फिल्म के कारोबार पर पड़ता है। हिंदी फिल्म के कर्ताधर्ताओं को ये बात समझनी होगी। कलाकारों को अगर राजनीति करनी है तो राजनीति के मैदान में आना चाहिए। अब अगर कोई फिल्मकार अपनी फिल्म में राजनीतिक संदेश देता है और अपेक्षा करता है कि उस राजनीतिक संदेश का असर जिस समूह पर पड़ेगा वो उसकी फिल्म देखे तो यह अपेक्षा व्यर्थ है। अब जनता जागरूक हो गई है। वो अपनी पसंद और नापसंद को खुलकर व्यक्त भी करती है। खैर ये अलग मुद्दा है।

बात हो रही थी प्रधानमंत्री के पार्टी नेताओं को दिए गए संदेश और उसके असर की । ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री ने पहली बार इस तरह से सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी के नेताओं को नसीहत दी है। इसके पहले भी पार्टी की संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री ने मध्यप्रदेश के नेता कैलाश विजयवर्गीय का नाम लिए बगैर बेहद कठोर टिप्पणी की थी। दरअसल हुआ ये था कि इंदौर नगर निगम के किसी कर्मचारी को बैट से पीटते हुए कैलाश विजयवनर्गीय के पुत्र आकाश का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो गया था। उसके बाद संसदीय दल की एक बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा था कि बेटा किसी का भी ऐसा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। तब प्रधानमंत्री ने पार्टी की मर्यादा की भी याद दिलाई थी और कहा था कि ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जो पार्टी की प्रतिष्ठा को कम करे। अगर कोई गलत काम करता है तो उसपर कार्रवाई होनी चाहिए। प्रधानमंत्री की उस नसीहत का असर कैलाश विजयवर्गीय और उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय पर दिखा। प्रधानमंत्री मोदी का संदेश देने का ये तरीका एक और बैठक में दिखा था। जब उन्होंने अपनी पार्टी के उन बयानवीर नेताओं को चेतावनी दी थी जो हर दिन सुबह टीवी चैनलों के कैमरे पर अपने घर के सामने खड़े होकर किसी भी समस्या पर बयान दे देते थे। छापस रोग से ग्रस्त पार्टी के नेताओं का इलाज उनके एक बयान हो गया था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काम करने का अपना तरीका है। वो संचार की उस शैली को अपनाते हैं जिसमें संप्रेषण के साथ असर भी हो। इस बात को लगातार कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की लेकिन जिस तरह से उन्होंने जनता और दुनिया से संवाद बनाए रखने के लिए इंटरनेट मीडिया का प्रयोग किया है वो उल्लेखनीय है। संचार का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि बात सही व्यक्ति तक पहुंच जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने भी पारंपरिक संचार शैली से अलग हटकर अपनी शैली विकसित की है। इस शैली को इंटरनेट मीडिया पर तो देखा ही जा सकता है, उनके वकतव्यों में भी रेखांकित किया जा सकता है। तीन उदाहरण तो ऊपर ही दिए गए हैं।

Saturday, January 14, 2023

सांस्कृतिक धरोहरों की उपेक्षा


कुछ समय पूर्व ओडिशा स्थित कोणार्क के सूर्य मंदिर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। सूर्य मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार से विशाल मंदिर बेहद भव्य लग रहा था। परिसर में अंदर जाते ही एक शिलालेख पर इस मंदिर के बारे में जानकारी दिखी। स्थापत्य कला की इस अनुपम कृति का निर्माण 1250 ईसवी में गंग राजा नरसिंहदेव प्रथम के राज्यकाल में सूर्य प्रतिमा की स्थपना के लिए किया गया था। इस संपूर्ण स्थापत्य को एक विशाल रथ के रूप में अनुकृत किया गया था। इस कृति में बारह जोड़ी अंलकृत पहिए लगे हुए हैं और उसे सात घोड़े खींच रहे हैं। शिलालेख के मुताबिक यह मंदिर ओडिशा के स्थापत्य कला के चरमोत्कर्ष का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का गर्भगृह और नाट्य मंदिर भग्न रूप में हैं, जबकि जगमोहन सुरक्षित स्थिति में है। मंदिर की भित्तियों पर दैवीय मानव , पेड़, पौधों और जीव जंतुओं के साथ साथ ज्यामितीय अलंकरण बहुतायत में हैं। कन्याओं, नर्तकियों और वादकों की शारीरिक संरचना, अलंकरण एवं भाव भंगिमाएं विशेष दर्शनीय हैं। 

शिलालेख को पढ़ने के बाद मंदिर को पास से देखने की उत्सुकता और बढ़ गई। शिलालेख के विवरण को पढ़कर जो छवि बनी थी उसके साक्षात अवलोकन के लिए मंदिर के पास पहुंचा। मुख्य मंदिर की तरफ जाने के लिए सामने की तरफ से सीढ़ियां बनी हुई हैं। उन सीढ़ियों के पहले भी एक प्रवेश द्वार है। वहां विशाल शिलाओं से बनी हाथी की आकृति है। अचानक मेरी नजर एक तरफ के हाथी की आकृति वाले शिला पर पड़ी तो तो उसके एक पांव पर सीमेंट और बालू का लेप लगा दिखा। पास जाने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि मूर्ति में आई दरार को पाटने के लिए उसको सीमेंट और बालू से भर दिया गया था। ये भी लग रहा था कि इसके ऊपर सीमेंट का घोल डाल दिया गया है। हाथी पर घोले हुए सीमेंट के निशान स्पष्ट दिख रहे थे। ये निशान उस कलाकृति को भद्दा बना रहे थे। मंदिर के चारो तरफ घूमने और सूर्य मंदिर में पत्थर पर उकेरी गई कलाकृतियों को देखकर मंदिर की स्थापत्य कला से बेहद प्रभानित हुआ अपने देश की मंदिर निर्माण कला के बारे में जानना और उसको प्रत्यक्ष देखना अविस्मरणीय था। 

कोणार्क का ये सूर्य मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल है। इसकी देखरेख की जिम्मेदारी आर्कियोलाजी सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) पर है। इस संगठन का काम ही सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का है। यह संस्था भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है। इतने उत्कृष्ट कला के संरक्षण में इतनी लापरवाही हो रही है कि किसी कलाकृति की दरार को बेहद भद्दे तरीके भर दिया जा रहा है। दरार को पाटने वाली सामग्री के घोल को उसपर उड़ेल देना जिससे उसकी खूबसूरती नष्ट हो जा रही हो। प्रश्न उठता है कि एएसआई कोणार्क के सूर्य मंदिर के संरक्षण को लेकर इतनी लापरवाह क्यों है। क्या इन संरक्षित धरोहरों का रखरखाव विशेषज्ञों की देख-रेख में नहीं होता है। क्या इन सांस्कृतिक धरोहरों के रखरखाव का कोई वार्षिक आडिट नहीं होता है। करीब डेढ़ वर्ष पहले कुछ ऐसा ही अनुभव त्रिपुरा के उनकोटि परिसर में जाकर भी हुआ था। अगरतला से करीब पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित उनकोटि में पत्थर पर उकेरी गई बेहतरीन कलाकृतियां हैं। इस परिसर में करीब तीस फीट के ‘उनकोटेश्वर कालभैरव’ की पत्थर की मूर्ति है। इस मूर्ति का मुकुट करीब दस फीट के पत्थर पर बना है जिसपर अद्भुत कलाकारी है। उनके आसपास दो देवियों के चित्र पत्थर पर उकेरे हुए हैं। पास ही में नंदी की पत्थर की दो मूर्तियां हैं। काल भैरव की मूर्ति की दूसरी तरफ एक विशाल शिला पर गणेश जी की मूर्ति बनी हुई है जिसके दोनों तरफ हाथी की मुखाकृति वाले चित्र उकेरे हुए हैं। उनकोटि परिसर के देखभाल का दायित्व भी एएसआई पर है। वहां भी उन मूर्तियों के संरक्षण के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं दिखा था। कुछ मूर्तियां भले ही एक कमरे में बंद कर दी गई हैं लेकिन हजारों मूर्तियां ऐसे रखी हुई हैं और लोग उसपर चढ़कर आते जाते हैं। एक जगह तो एक मूर्ति पर कपड़े धोए जा रहे थे। इस स्तंभ में विस्तार से इसपर चर्चा हो चुकी है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में लाल किले की प्राचीर से पांच प्रण की घोषणा करते हुए विरासत पर गर्व की बात करते हैं। अपने उसी गर्व को सहेजने के लिए प्रधानमंत्री की पहल पर काशी विश्वनाथ मंदिर का नव्य स्वरूप, उज्जैन का महाकाल लोक का भव्य परिसर का निर्माण हुआ। अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण हो रहा है। इसके पहले केदारनाथ धाम से लेकर गुजरात के मंदिरों की पौराणिकता को भव्यता के साथ सहेजा गया। इसको देश में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के तौर पर देखा जा रहा है। विरासत पर गर्व करने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि हम अपनी विरासत को संरक्षित करें। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाली संस्था एएसआई की अपनी विरासत को सहेजने में लापरवाही और उदासीनता दिखाई देती है। संसद के पिछले सत्र में 13 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संसद की इस समिति ने अपनी रिपोर्ट संख्या 330 में एएसआई के कामकाज को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। रिपोर्ट में समिति ने मंत्रालय/एएसआई में धनराशि के उपयोग को लेकर बेहद कठोर टिप्पणी की है। समिति के मुताबिक मंत्रालय ने अपने उत्तर में इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि एएसआई को जो धनराशि आवंटित की गई थी उसका आगे आवंटन और उपयोग किस तरह से किया गया। इसके अलावा एएसआई में खाली पदों को भरने में हो रहे बिलंब पर भी समिति ने टिप्पणियां की है। संस्कृति मंत्रालय के विभिन्न संस्थानों में खाली पदों की स्थिति को रेखांकित करते हुए स्थिति को बेहद दयनीय बताया। समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि एएसआई के आर्कियोलाजी काडर में 420 पद स्वीकृत हैं जिसमें से 166 पद खाली हैं। संरक्षण काडर में कुल स्वीकृत पद 918 हैं दिनमें से 452 पद खाली हैं। समिति की इन टिप्पणियों पर संस्कृति मंत्रालय ने सफाई दी लेकिन समिति मंत्रालय के उत्तर से संतुष्ट नहीं हो सकी। उसने अपना असंतोष रिपोर्ट में दर्ज भी कर दिया। संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को लेकर संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में इस बात पर नाराजगी जताई गई है कि करीब पचास फीसद पद कैसे खाली हैं। क्या मंत्रालय या एएसआई इस बात का आकलन नहीं कर सकी कि भविष्य में कितने पद खाली होनेवाले हैं। समय रहते अगर ऐआसा हो जाता तो ये स्थिति नहीं बनती।

संस्कृति मंत्रालय में ऐसी स्थिति क्यों बनती हैं कि उससे संबद्ध कई संस्थाएं वर्षों से तदर्थ तरीके से चल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक देश की संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को लेकर संवेदनशील हैं, बावजूद इसके संस्कृति अगर मंत्रालयों की प्राथमिकता में नहीं आ रही है तो इसके कारणों पर विचार करने की आवश्यकता है। क्या नौकरशाही संस्कृति को लेकर संवेदनशील नहीं है। संस्कृति और उसके संरक्षण के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और अधिकारियों का विशेष तौर पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। आवश्यक है कि संस्कृति मंत्रालय के मंत्रियों का कला, संस्कृति और संरक्षण में रुचि लेकर उसके प्रति संवदेशनशील होना। कलाकारों और उनके हुनर का सम्मान करना। इस स्तंभ में कई बार इस बात की चर्चा की गई है कि संस्कृति को सरकार की प्राथमिकता में लाने के लिए देश में एक समग्र सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता है।एक ऐसी नीति जिसमें संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और आयोजनों के बीच सामंजस्य हो।  


Saturday, January 7, 2023

अनियमितताओं के भंवर में अकादमी


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है, ललित कला अकादमी। इस संस्था का मुख्यालय नई दिल्ली में है। देशभर में इस संस्था के कई क्षेत्रीय केंद्र हैं। इसकी स्थापना 1954 में हुई थी। इसकी परिकल्पना राष्ट्रीय कला अकादमी के रूप में की गई थी। अकादमी के गठन का उद्देश्य सृजनात्मक दृश्य कलाओं के क्षेत्र में क्रियाकलापों को प्रोत्साहित और समन्वित करते हुए देश की सांस्कृतिक एकता का प्रोन्नयन करना है। अपने स्थापना के बाद के दशकों में ललित कला अकादमी ने काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। अकादमी के संग्रह में कई अनमोल कलाकृतियां हैं। पिछले करीब तीन दशक से ललित कला अकादमी विवादों में घिरी रही है। कभी उसके संग्रह की कलाकृतियों के गायब होने की खबर आती रही तो कभी उचित रखरखाव के आभाव में कलाकृतियों के खराब होने की। नई दिल्ली के गढ़ी केंद्र में अवैध कब्जे के समाचार भी आए थे। इसके पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के कवि अशोक वाजपेयी पर सीबीआई की जांच भी हुई थी या हो रही है। इस जांच का निष्कर्ष क्या रहा ये सार्वजनिक नहीं हो पाया है। अकादमी के सचिव रहे सुधाकर शर्मा भी विवाद में घिरे थे। अशोक वाजपेयी के कार्यकाल में पहले हटाए गए फिर बहाल किए गए। अशोक वाजपेयी के बाद के के चक्रवर्ती को ललित कला अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया था। इनका कार्यकाल भी बेहद विवादित रहा। विवाद इतना बढ़ा था कि मंत्रालय ने इनको बर्खास्त करके ललित कला अकादमी को अपने अधीन कर लिया था। उसके बाद मंत्रालय ने कृष्णा शेट्टी को ललित कला अकादमी का प्रशासक नियुक्त किया था। फिर मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रोटेम चेयरमैन बनाए गए। प्रोटेम चेयरमैन बनाए जाने को लेकर भी विवाद हुआ था। 

इन विवादों के बीच महाराष्ट्र के उत्तम पचारणे को ललित कला अकादमी का चेयरमैन नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति और उनके कार्यकाल में वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर विवाद उठा और पूरा मामला अदालत तक गया। जो अभी विचाराधीन है। इस बीच उत्तम पचारणे का कार्यकाल समाप्त हो गया। उनको छह महीने का सेवा विस्तार मिला था ताकि नए अद्यक्ष का चययन हो सके। लेकिन ऐसा नहीं हो सका तो संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी को मंत्रालय ने ललित कला अकादमी की चेयरमैन का कार्यभार सौंप दिया। अकादमी की इस पृष्ठभूमि का बताने का आशय सिर्फ इतना है कि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध इस संस्था में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। उपरोक्त सारी बातें तो मीडिया में आईं थीं लेकिन अभी कुछ दिनों पहले भारत सरकार के लेखा परीक्षा के महानिदेशक कार्यालय ने ललित कला अकादमी की आडिट की थी। 14 अक्तूबर 2022 को ओबीएस 446867 के अंतर्गत लेखा परीक्षकों ने जो रिपोर्ट दी उसमें भारी वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितता की बात सामने आई है। 

लेखा परीक्षक ने अपने आडिट रिपोर्ट में वाहन किराए पर लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि बगैर किसी टेंडर के गाड़ियों को किराए पर लिया जाता रहा। जबकि नियमानुसार बगैर टेंडर के अकादमी वाहन किराए पर नहीं ले सकती है। कोविड के समय भी स्टाफ को लाने और छोड़ने के लिए जिन गाड़ियों को किराए पर लिया गया उसमें भी आडिट रिपोर्ट में खामियां पाई गई हैं। संस्कृति राज्य मंत्री के नाम पर ललित कला अकादमी ने एक गाड़ी किराए पर ली जिसका प्रतिमाह किराया 52 से 55 हजार रुपए भुगतान किया गया। लेखा परीक्षक के मुताबिक ये नियम विरुद्ध है। इस मद में अकादमी ने साढे छह लाख रुपए खर्च किए हैं। रिपोर्ट में इसको अविलंब रोकने की सलाह दी गई है। गाड़ियों के अलावा बिजली बिल के भुगतान में भी अनियमितता पाई गई है। लेखा परीक्षक की रिपोर्ट में जो सबसे बड़ी खामी पाई गई है वो ये है कि अकादमी ने सांस्कृतिक संस्थाओं को बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक सहयोग दिया। नियम के मुताबिक जब किसी सांस्कृतिक संस्था को किसी प्रकार की आर्थिक मदद दी जाती है तो उसको अकादमी में उस धनराशि के उपयोग का प्रमाण पत्र जमा करना होता है । उसके बाद ही उसको फिर से आर्थिक सहायता दी जाती है लेकिन इस नियम की धज्जियां उड़ा दी गई। करीब 25 करोड़ की धनराशि का उपयोग प्रमाण पत्र अकादमी के रिकार्ड में नहीं है। 

वित्तीय अनियमितताओं की कहानी यही नहीं रुकती है। अकादमी अपने कर्मचारियों को किसी कार्य के लिए अग्रिम धनराशि देती है। नियम है कि बगैर इस राशि का हिसाब दिए दूसरी बार किसी को अग्रिम धनराशि नहीं दी जा सकती है। लेकिन अकादमी में 31.3.2022 तक 133 केस पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया था। लेखा परीक्षकों ने इसपर प्रश्न उठाए हैं। पूर्व अध्यक्ष उत्तम पचारणे से लेकर क्षेत्रीय सचिवों और कई कर्मचारियों के नाम भी अग्रिम धनराशि पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया है। लेखा परीक्षकों की इस रिपोर्ट में गड़बड़ियों की लंबी फेहरिश्त है जिसमें लैपटाप खरीद में गड़बड़ी, वकीलों की फीस में अनियमितता, बिना किसी अनुमति के मुख्यालय और गढ़ी केंद्र पर 173 सुरक्षा गार्डों को काम पर रखना, 12 लाख से अधिक के ओवरटाइम में गड़बड़ी, नियम विरुद्ध नियुक्तियां और वेतन निर्धारण, विज्ञापन पर एक करोड़ से अधिक खर्च आदि आदि। एक बड़ा ही गंभीर मसला इस रिपोर्ट में है। इस वक्त ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव रामकृष्ण वेडाला हैं। रिपोर्ट में है कि 2019 में ये बगैर मंत्रालय की अनुमति के मैक्सिको की यात्रा पर गए। जबकि मंत्रालय ने अकादमी को पत्र लिखकर निर्देश दिया था कि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बगैर वो विदेश नहीं जाएं। लेकिन ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव ने भारत सरकार के दिशा निर्देश की अनदेखी की। इसका संज्ञान भी मंत्रालय को लेना चाहिए। अकादमी के स्टाक पर भी लेखा परीक्षकों ने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

केंद्रीय व्यय के महानिदेशक लेखा परीक्षक कार्यालय ने ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों में जो अनियमितताएं पाईं है वो बेहद गंभीर हैं। संस्कृति मंत्रालय को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। साहित्य, कला और संगीत के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं को स्वायत्ता दी जानी चाहिए लेकिन जब करदाताओं के पैसे का अपव्यय सामने आए या उसका दुरुपयोग दिखे तो सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। इस वक्त अकादमी के अध्यक्ष का कार्यभार संभाल रहीं संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी से ये अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट में जिन अनियमितता और गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है उनपर कार्रवाई करेंगी। बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक मदद का हिसाब किताब लिया जाएगा। इन गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ भी नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। 

संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संस्थाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया भी तेज करनी होगी। कई महीनों से ललित कला अकादमी में अध्यक्ष और सचिव का पद खाली है। इसको अविलंब भरने की आवश्यकता है। दरअसल इन संस्थाओं के नियमित चेयरमैन, सचिव या निदेशक के नहीं होने के कारण वहां अराजकता का माहौल बन जाता है। ललित कला अकादमी के अलावा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में नियमित निदेशक नहीं होने की वजह से अराजकता जैसा माहौल है। कुछ दिनों पहले प्रभारी निदेशक ने कुलसचिव को सेवामुक्त करने का आदेश दे दिया था जिसकों कुछ ही घंटों में वापस लेना पड़ा था। राष्ट्रीय महत्व के इस संस्थान में नियमित निदेशक नहीं होने के कारण नियमित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। नुकसान छात्रों और संस्था का हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई संस्थाएं ऐसी हैं जहां कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। संस्कृति मंत्री को स्वयं रुचि लेकर इन पदों को भरने का उपक्रम आरंभ करना चाहिए। 


Saturday, December 31, 2022

समय और भूमिका में बदलाव आवश्यक


नववर्ष का आरंभ हो गया है। हिंदी फिल्म जगत नववर्ष को उम्मीदों से देख रहा है। इन उम्मीदों की वजह भी है। बीते वर्ष 2022 में हिंदी फिल्में दर्शकों की तलाश कर रही थीं। निर्माता और कलाकार सफल फिल्मों की प्रतीक्षा कर रहे थे। हिंदी फिल्मों में सफलता की गारंटी माने जाने वाले शाह रुख खान, आमिर खान और सलमान खान की फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। सिनेमा की भाषा में अगर कहें तो शाह रुख खान की आखिरी ब्लाकबस्टर फिल्म 2013 में प्रदर्शित ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ थी। उसके अगले साल सुपर हिट फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ रही लेकिन उसके बाद उनकी कोई फिल्म सुपरहिट या ब्लाकबस्टर नहीं रही। 2017 और 2018 में आई उनकी फिल्में ‘जब हैरी मेट सेजल’ और ‘जीरो’ फ्लाप हो गई। 2018 के बाद से शाह रुख की कोई फिल्म नहीं आई।चार वर्षों के बाद इस वर्ष उनकी फिल्म ‘पठान’ आ रही है जो लगातार विवाद में घिरी हुई है। सिर्फ शाह रुख खान ही नहीं बल्कि आमिर खान की फिल्में भी दर्शकों को पसंद नहीं आ रही हैं। उनकी 2016 की फिल्म ‘दंगल’ के बाद कोई भी फिल्म ब्लाकबस्टर नहीं हो पाई। 2018 की ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान बुरी तरह से पिटी। उनकी भी फिल्में नहीं आ रही थीं। चार साल बाद पिछले वर्ष ‘लाल सिंह चडढा’ सिनेमाघरों में पहुंची तो उसको दर्शकों ने बुरी तरह से नकार दिया। तीसरे खान सलमान के बारे में कहा जाता था कि उनका अपना एक अलग ही दर्शक वर्ग है जो उनकी फिल्मों की प्रतीक्षा करता है लेकिन आंकड़े कुछ अलग ही कहानी कहते हैं। 2017 में ही उनकी भी ब्लाकबस्टर फिल्म आई थी ‘टाइगर जिंदा है’। उसके बाद से सलमान खान भी सुपर हिट फिल्म के लिए तरस रहे हैं। रेस-3, भारत, दबंग-3 आदि फिल्में भी औसत कारोबार ही कर पाईं। इन आंकड़ों को देख कर तो लगता है कि हिंदी फिल्मों से इन अभिनेताओं के दौर समाप्त होने के संकेत मिलने लगे हैं। सलमान खान की फिल्म राधे, योर मोस्ट वांटेंड भाई की कमाई के आंकड़ों को लेकर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि ये ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) पर रिलीज हुई थी। इसके अलावा अक्षय कुमार की भी एक के बाद एक लगातार चार फिल्में फ्लाप हुईं।

शाह रुख, आमिर और सलमान की फिल्मों के नहीं चलने से हिंदी फिल्मों को लेकर एक निराशा का माहौल बनाया गया। कहा जाने लगा कि हिंदी फिल्मों की कहानियां अच्छी नहीं होती हैं, ट्रीटमेंट अच्छा नहीं होता है इसलिए दर्शक उनको नकार रहे हैं। नकार और निराशा के इस बनाए गए वातावरण में एक युवा अभिनेता और एक निर्देशक ने अपने हुनर और कौशल से उम्मीद की लौ जलाए रखी। इस युवा अभिनेता का नाम है कार्तिक आर्यन। कार्तिक आर्यन की फिल्म भूल भुलैया-2 ने जबरदस्त सफलता हासिल की। दर्शकों ने कार्तिक आर्यन के अभिनय को खूब पसंद किया। पिछले वर्ष मई में प्रदर्शित इस फिल्म ने दुनियाभऱ में अच्छा कारोबार किया। हिंदी फिल्मों के आंकड़ों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर करीब 266 करोड़ का कारोबार किया, जबकि इस फिल्म की लागत करीब 65 करोड़ रुपए थी। इस तरह से अगर हम देखें तो विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचार और उनके पलायन को केंद्र में रखकर बनाई गई फिल्म की लागत करीब 25-30 करोड़ रुपए बताई जाती है। वैश्विक स्तर पर इस फिल्म ने करीब 341 करोड़ रुपए का बिजनेस किया। इस फिल्म की मुख्य भूमिका में अनुपम खेर हैं। तीसरी एक और सफल फिल्म रही अजय देवगन की दृश्यम- 2। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस फिल्म की लागत 50 करोड़ रुपए है जबकि अबतक इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर करीब 330 करोड़ रुपए की कमाई कर ली है। उपरोक्त तीनों फिल्में ब्लाकबस्टर की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। अनुपम खेर, कार्तिक आर्यन और अजय देवगन, इन तीन अभिनेताओं ने तीनों खानों की कमी महसूस नहीं होने दी। हलांकि रणबीर कपूर की फिल्म ब्रह्मास्त्र के भी अच्छा कारोबार करने की बात सामने आई थी। लेकिन इस फिल्म के काराबोर के आंकड़ों पर लगातर प्रश्न उठे। इस कारण उसके बारे में ठोस रूप से कुछ कह पाना संभव नहीं है।

2023 में हिंदी फिल्मों का स्वरूप कैसा होगा? क्या हिंदी फिल्मों के दर्शक नए कलाकारों को पसंद करेंगे? क्या हिंदी फिल्मों के उन कलाकारो को दर्शक पसंद करेगी जो राजनीतिक बयान देकर सुर्खियां बटोरने की फिराक में रहते हैं? इस बारे में विचार करना होगा। इस दौर में आमतौर पर ये देखा गया है कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों को विशुद्ध मनोरंजन चाहिए। उनका पसंदीदा अभिनेता या अभिनेत्री या फिल्म का टीजर भी अगर उनको किसी प्रकार की राजनीति से प्रेरित नजर आता है तो वो कन्नी काट जाते हैं। फिल्म छपाक के पहले दीपिका पादुकोण दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों को मौन समर्थन देने चली गई थी। उनकी फिल्म छपाक बुरी तरह से फ्लाप हो गई। इसके अलावा एक और प्रवृत्ति देखने को मिली। जब भी हिंदी फिल्मों के निर्माताओं ने ऐतिहासिक या पौराणिक कहानियों पर फिल्में बनाईं और वो स्थापित मान्यताओं से अलग गए तो दर्शकों ने फिल्म को को नकार दिया। फिल्म आदिपुरुष के साथ यही हुआ। जबकि इसका तो सिर्फ टीजर रिलीज हुआ था। ये फिल्म इस महीने ही प्रदर्शित होनेवाली थी लेकिन उसका प्रदर्शन जून तक के लिए टाल दिया गया। निर्माता-निर्देशक ने इस फिल्म में प्रभु श्रीराम के चरित्र को स्थापित मान्यताओं के विपरीत जाकर उनको आक्रामक दिखाने का प्रयास किया था। जिसका विरोध हुआ। आसन्न खतरे को भांपते हुए फिल्मकार ने रिलीज की तिथि आगे बढ़ा दी। फिल्म में बदलाव आदि की बातें भी सामने आईं हैं। फिल्म के प्रदर्शित होने पर ही वास्तविक स्थिति का पता चलेगी।   

इन दिनों बहुधा ये कहा जाता है कि अच्छी हिंदी फिल्में नहीं बन रही हैं। इस कारण ही दर्शक दूर हो रहे हैं। हिंदी फिल्मों के इतिहास में हर दौर में खराब और अच्छी दोनों तरह की फिल्में बनती रही हैं। क्या दादा कोंडके अच्छी फिल्में बनाते थे। क्या 1980 के बाद के दस वर्षों में बनी सभी फिल्में अच्छी फिल्मों की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। उत्तर है नहीं। फिल्मों की सफलता और असफलता भी साथ साथ चलती रही है। 2023 में फिल्म निर्माताओं को हिंदी फिल्मों की नई प्रतिभाओं के साथ आगे बढ़ना होगा। दर्शक लंबे समय तक चंद अभिनेताओं को और उनकी अदाकारी को देखकर बोर हो चुके हैं। शाह रुख खान, आमिर खान और सलमान खान की काफी उम्र हो गई है। उनको अपनी उम्र का ध्यान रखते हुए उसी तरह की भमिकाओं की तलाश करनी चाहिए। अब ये लोग अपने से आधी उम्र की नायिकाओं के साथ रोमांस करते हुए दर्शकों को अच्छे नहीं लगते हैं। अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना का उदाहरण इनके सामने है। अमिताभ बच्चन ने समय को भांपा और अपना ट्रैक बदल दिया। अबतक न केवल प्रासंगिक बने हुए हैं बल्कि उनकी अवस्था को ध्यान में रखकर भूमिकाएं भी लिखी जा रही हैं। राजेश खन्ना को ये समझने में देर हुई। वो अपनी अवस्था को समझ कर भी उसके अनुरूप कार्य नहीं कर पाए तो दर्शकों ने उनको नकार दिया। जब उन्होंने अवतार और सौतन जैसी फिल्मों में अभिनय किया तो उनको भी सफलता मिली। नए वर्ष में हिंदी फिल्मों के स्थापित नायकों या सुपरस्टार्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं के आकलन की है। जिसने भी खुद को आंक लिया वो सफल रहेगा और जो चूक गया वो हाशिए पर चला जाएगा। 

Sunday, December 25, 2022

कथेतर के विविध रंग


वर्ष 2022 बीतने को आया। साहित्य सृजन की दृष्टि से इस वर्ष कुछ उल्लेखनीय पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। कथेतर विधा में प्रकाशित पुस्तकों पर मेरी टिप्पणी 

हिंदी साहित्य के इतिहास में जब छायावाद पर बात होती है तो जयशंकर प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत का नाम लिया जाता है। जयशंकर प्रसाद की कृति कामायनी पर मुक्तिबोध से लेकर रामस्वरूप चतुर्वेदी तक ने विस्तार से लिखा है। उनकी रचनाओं को समग्रता में समझने के लिए इस वर्ष एक पुस्तक आई है, जयशंकर प्रसाद, महानता के आयाम। जयशंकर प्रसाद की रचनाओं से गुजरते हुए पाठकों को ये अनुभूति होती है कि कवि/लेखक खुद को लगातार परिष्कृत करता चलता है। इस पुस्तक के लेखक ने अपनी इस पुस्तक में प्रसाद के इस गुण को भी रेखांकित करने का प्रयास किया है। 

पुस्तक- जयशंकर प्रसाद, महानता के आयानम, लेखक- करुणाशंकर उपाध्याय, प्रकाशक- राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली, मूल्य- रु. 1495

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संस्कृत काव्यशास्त्र के अध्येता राधावल्लभ त्रिपाठी का मानना है कि साहित्य का उत्स जीवन है। कविता और उसकी व्याख्या के सिद्धांतों के मूल में लोक और जीवन है। इसलिए वो कहते हैं कि जीवन में रस है, रीति है, वक्रोक्ति है तो ये सारे तत्व कविता में भी हैं। अपनी पुस्तक भारतीय साहित्यशास्त्र की नई रूपरेखा में त्रिपाठी संस्कृत काव्यशास्त्र की प्राचीन परंपरा का परीक्षण करते हैं। साथ ही भारतीय काव्यशास्त्र के संदर्भों से वैश्विक साहित्य के मूल्यांकन की एक पीठिका भी तैयार करते हैं। इसमें साहित्य की उपादेयता के साथ रस और अलंकार का भी विवेचन है।

पुस्तक- भारतीय साहित्यशास्त्र की नई रूपरेखा, लेखक- राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रकाशक- सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, मूल्य- रु. 895

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नाम और कवर के चित्रों से ये लग सकता है कि ये फिल्मी पुस्तक है। दरअसल ये पुस्तक एक साहित्यिक कृति के फिल्म बनने की बेहद दिलचस्प कहानी है। ‘दो गुलफामों की तीसरी कसम’ नाम की इस पुस्तक के लेखक हैं अनंत। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत ही रोचक अंदाज में फणीश्वर नाथ रेणु की कृति ‘मारे गए गुलफाम अर्थात तीसरी कसम’ के पात्रों के चयन पर लिखा है। गाड़ीवान हिरामन और नर्तकी हीराबाई की भूमिका निभाने वाले कलाकार से लेकर फिल्म के निर्देशक चुनने की रोचक कहानी है, जिसको अनंत ने सधे अंदाज में लिखा है। 

पुस्तक- दो गुलफामों की तीसरी कसम, लेखक- अनंत, प्रकाशक- कीकट प्रकाशन, पटना, मूल्य- रु 650 

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कश्मीर साहित्य और संस्कृति को लेकर बेहद समृद्ध रहा है। भारत की इस भूमि पर ऐसे ऐसे दार्शनिक, कवि और लेखक हुए हैं जिन्होंने भारतीय प्रज्ञा को अपनी लेखनी से नई ऊंचाई दी। कश्मीरी काव्य में रामकथा, कश्मीर के कृष्णभक्त कवि परमानंद, कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री अलखेश्वरी रूपभवानी और हिंदी और कश्मीरी के अंतर्संबंधों पर केंद्रित एक पुस्तक आई, कश्मीर साहित्य और संस्कृति। इसमें कश्मीरी साहित्य के अलावा वहां की संस्कृति पर भी लेखक शिबन कृष्ण रैणा ने प्रकाश डाला है। कश्मीरी नववर्ष नवरेह से लेकर कश्मीरी शिवरात्रि के बारे में विस्तार से लिखा गया है। कश्मीर की संस्कृति और साहित्य को जानने के लिए यह उपयोगी पुस्तक है। 

पुस्तक- कश्मीर, साहित्य और संस्कृति, लेखक- शिबन कृष्ण रैणा, प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, मूल्य – रु 199

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स्वाधीनता के अमृत महोत्व वर्ष में कई गुमनाम नायकों या कम ज्ञात नायकों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई। ऐसी ही एक पुस्तक है महाराणा, सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध । इस पुस्तक में लेखक ने मेवाड़ के योद्धाओं की वीरगाथा को कमलबद्ध किया है। लेखक ने मुस्लिम आक्रांताओं से लोहा लेनेवाले और हिंदू समाज की रक्षा करनेवाले मेवाड़ के शूरवीरों और जौहर की ज्वाला में अपने को होम करनेवाली रानियों के बारे में लिखते हुए लेखक सत्य को भी उद्घाटित करते चलते हैं। 

पुस्तक- महाराणा,सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध, लेखक- ओमेन्द्र रत्नू, प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य- रु 500     


Saturday, December 24, 2022

निर्देशकों का कौशल सफलता की कुंजी


वर्ष 2022 में सिनेमा और वेब सीरीज की सफलता और असफलता के बीच उसके कंटेंट को लेकर जमकर चर्चा हुई। फिल्मों की असफलता और वेबसीरीज की सफलता के बीच इस बहस ने और जोर पकड़ा जब ये बताया जाने लगा कि वेबससीरीज ने कंटेंट यानि विषयवस्तु के स्तर पर दर्शकों को संतुष्ट किया और उनके नजदीक गए। कटेंट इज किंग का जुमला बार-बार सुनाई देने लगा। फिल्म निर्माण के संबंध में इस बात को निरंतर रेखांकित किया जा रहा है कि अगर किसी फिल्म की विषयवस्तु रोचक होगी तो ही फिल्म सफल होगी। कहानी को लेकर भी कई तरह की बातें कही गईं। इस संदर्भ में बरेली की बर्फी, जोर लगा के हइशा, विक्की डोनर जैसी फिल्मों का नाम लिया जाता है। इस वर्ष जिन तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों ने अपार लोकप्रियता हासिल की उसकी सफलता का श्रेय भी फिल्मों की विषय वस्तु को ही दिया गया। कहा गया कि कहानी ने दर्शकों को बांधे रखा। अधिकतर समीक्षकों ने फिल्मों की समीक्षा करते समय कटेंट को ही ध्यान में रखा। समीक्षा में फिल्मों को तारे देते समय समीक्षकों ने प्रमुखता से कटेंट को और कलाकारों के अभिनय को ध्यान में रखा। गाहे बगाहे फिल्मों के गाने की चर्चा हुई। प्रश्न ये उठता है कि क्या कंज्यूमर इज द किंग की अवधारणा पर आधारित कंटेंट इज द किंग फिल्मों के लिए या फिल्म निर्माण की कला के लिए कितना उचित है। 

अगर हम आक्सफोर्ड शब्दकोश में देखें तो किसी भी पुस्तक, लेख, टेलीविजन प्रोग्राम आदि का मुख्य विषय या आयडिया को कंटेंट बताया गया है। ये कई अन्य अर्थों में से एक अर्थ है। अब अगर इस अर्थ के आधार पर विचार करें तो क्या कोई फिल्म सिर्फ अपने मुख्य विषय या आयडिया के आधार पर सफल हो सकती है। ये एक कारण हो सकता है लेकिन कंटेंट को ही एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता है। फिल्म निर्माण के कई आयाम होते हैं और सफल फिल्मकार वही होता है जो इन सारे आयामों को साधकर विषय के साथ न्याय करे। पिछले दिनों फिल्मकार बिमल राय के बारे में पढ़ रहा था। फिल्म निर्माण को लेकर उनका सोच अलग ही स्तर पर था। वो फिल्मों के एक एक दृश्य को लेकर काफी मेहनत करते थे। साथी कलाकारों के साथ विमर्श करते थे, लेकिन फिल्म निर्देशन के समय वो अपने हिसाब से कैमरा के कोण से लेकर संवाद अदायगी और दृश्यों की लाइटिंग पर बेहद बारीकी से ध्यान देते थे। 

अगर हम 1959 की बिमल राय की फिल्म सुजाता के एक दृश्य को याद करें। उस दृष्य में अधीर (सुनील दत्त) सुजाता(नूतन) से मिलने पहुंचते हैं तो सुजाता पौधों के बीच होती हैं। जब सुनील दत्त वहां आते हैं तो नूतन मुड़ती है। जब वो मुड़ती हैं उनकी साड़ी का आंचल लाजवंती के पौधे को छूती है। उस वक्त नूतन के चेहरे पर जो भाव हैं उसको कैमरे ने कितनी खूबसूरती से पकड़ा है। इस तरह के सीक्वेंस में कैमरे से बिमल राय जो प्रयोग करते हैं वो कटेंट को बेहद संवेदनशील और अविस्मरणीय बना देता है। अब इस एक दृष्य को फिल्माने के लिए बिमल राय ने चार दिन तक शूट किया था। पंखों से लाजवंती के पौधे पर हवा दी जा रही थी लेकिन उनके मन मुताबिक दृश्य पकड़ में नहीं आ रहा था। चौथे दिन अचानक से बिमल राय अपने मन मुताबिक दृष्य का फिल्मांकन कर पाए। आज के जमाने में जब अक्षय कुमार चालीस दिनों में एक पूरी फिल्म शूट कर लेते हैं तो इस तरह के शाट्स की अपेक्षा करना ही व्यर्थ है। प्रोफेशनलिज्म और अनुशासन के नाम पर आज फिल्म मेकिंग को बहुत ही ज्यादा मैकेनिकल बना दिया गया है। तकनीक के उपयोग से आपत्ति नहीं होनी चाहिए, है भी नहीं लेकिन तकनीक से कई बार उस तरह की प्रभावोत्पकदता पैदा नहीं होती है जो मानवीय गुणों के कारण आती है।

सिर्फ बिमल राय ही नहीं बल्कि कई ऐसे फिल्मकार हुए हैं जिन्होंने विषयवस्तु को अपनी कला और हुनर से इतना समृद्ध किया कि वो कालजयी हो गया। चाहे वो सत्यजित राय हों, के आसिफ हों या वी शांताराम हों। मुगले आजम की कहानी तो दर्शकों को ज्ञात थी। उस कहानी पर पहले भी फिल्म बन चुकी थी। लेकिन के आसिफ ने जब मुगले आजम बनाई तो उसके कंटेंट को इतना समृद्ध कर दिया कि आज भी जब हिंदी फिल्मों की चर्चा होती है तो बासठ साल पहले रिलीज हुई इस फिल्म को याद किया जाता है। वी शांताराम की एक फिल्म है दहेज। इस फिल्म का एक दृश्य जिसमें ठाकुर (पृथ्वीराज कपूर) की बाहों में उनकी बेटी चंदा (जयश्री) दम तोड़ती है। ये दृष्य अविस्मरणीय बन पड़ा है। इसमें क्लोजअप शाट्स के जरिए जो प्रयोग वी शांताराम करते हैं उसकी चर्चा आजतक होती है। फिल्म निर्माण के छात्रों को बार-बार ये दृष्य दिखाया जाता है। कहना न होगा कि निर्देशक का कौशल और हुनर कटेंट को समृद्ध करके दर्शकों के मानस को प्रभावित करता है।  

इन दिनों दक्षिण भारतीय फिल्मों कि सफलता की भी चर्चा रही। आरआरआर से लेकर कंतारा तक जिन फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया उनपर बारीकी से नजर डालने पर ये स्पष्ट होता है कि कहानी दिखाने का उनका अंदाज दर्शकों को पसंद आ रहा है। आरआरआर में जो भव्यता है या आरआरआर के जो संवाद हैं वो उस कहानी को एक अलग ही स्तर पर ले जाकर खड़ा कर देती है। कंटेंट किसी फिल्म का आधार होती है लेकिन उसपर अगर भव्य इमारत खड़ी करनी हो तो उसमें कई अन्य अवयवों की संरचना भई करनी होती है।फिल्मों की कहानी को लेकर राज कपूर कहा करते थे कि हिंदी फिल्मों में तो एक ही कहानी होती है कि राम थे, सीता थी और रावण आ गया। इसी कहानी को कई बार दोहराया गया और कई निर्देशकों ने उसको अलग अलग तरीके से दिखाया। कई निर्देशकों को सफलता मिली और कइयों को दर्शकों ने नकार दिया। फिल्म देवदास के कई वर्जन बन चुके हैं, उसमें कंटेंट तो सबका लगभग एक जैसा ही है लेकिन कहानी को हने का अंदाज औऐर निर्देशक की रचनात्मकता किसी फिल्म को सफल बना देती है और किसी को असफल। एक और चीज जो कंटेंट को समृद्ध बनाती है वो है कलाकारों का चयन और संवाद लेखन। मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर जब बासु चटर्जी ने रजनीगंधा फिल्म बनाई। मूल कहानी को पढ़ने के बाद फिल्म स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद पता चलता है कि निर्देशक ने कैसे उसको अपनी कल्पनाशीलता से ऊंचाई प्रदान कर दी। 

सिर्फ कहानी ही किसी फिल्म को हिट करवा सकती तो प्रेमचंद की कहानी पर बनी फिल्म हिट ही हो जाती। प्रेमचंद तो फिल्म को लेकर इतने आहत हो गए थे कि 1934 में उन्होंने बांबे (अब मुंबई) में रामवृक्ष बेनीपुरी से कहा था कि अगर तुम मेरी इज्जत करते हो तो मेरी फिल्म मजदूर मत देखना। उन दिनों बेनीपुरी जी कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने बांबे गए हुए थे। प्रेमचंद से उनके फिल्म मजदूर के पोस्टर देखकर चर्चा की थी। अगर सिर्फ गानों से फिल्में हिट हो जाती तों सुमित्रानंदन पंत कुछ ही गाने लिखकर बांबे से वापस क्यों लौट आए थे। कंटेंट इज किंग कहकर सिर्फ उसको ही किसी फिल्म की सफलता के लिए जिम्मेदार बतानेवालों को फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र पर विचार करना चाहिए। दृश्यांकन, संवाद, गीत, संगीत, कहानी कहने का अंदाज, कलाकारों का चयन, कलाकारों का अभिनय, उनकी संवाद अदायगी और निर्देशक की कल्पनाशीलता एक फिल्म को ऊंचाई प्रदान करती है। इनमें से किसी एक की कमजोरी भी फिल्म को फ्लाप करवा सकती है। 

Saturday, December 17, 2022

समग्रता में प्रश्न उठाने से चूके बच्चन


कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह का मंच सजा था। मंच पर बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्यपाल के अलावा सुपरस्टार अमिताभ बच्चन, शाह रुख खान, अभिनेत्री रानी मुखर्जी, निर्देशक महेश भट्ट, पूर्व क्रिकेटर सौरभ गांगुली समेत अन्य फिल्मी सितारे बैठे थे। भव्य आयोजन था। इन दिनों शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान को लेकर चर्चा में हैं। उनकी फिल्म के एक गाने बेशरम रंग में नायिका दीपिका पादुकोण के वस्त्र के रंग पर विवाद है। ट्विटर पर बायकाट पठान हैशटैग बेहद प्रचलित होकर कई घंटों तक ट्रेंड हो चुका है। भारतीय फिल्मों के संवाद और फिल्मांकन को लेकर इस वर्ष विवाद उठते रहे हैं। सबको उम्मीद थी कि शाह रुख खान अपनी फिल्म पठान पर उठे विवाद पर अवश्य बोलेंगे। वो बोले भी। उन्होंने इंटरनेट मीडिया की नकारात्मकता को रेखांकित किया। अपने वक्तव्य के अंत में कहा कि कोई कुछ भी कर ले लेकिन आप और हम सब जिंदा हैं। शाह रुख से इस तरह की बात की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन जब बच्चन साहब मंच पर आए तो उन्होंने सेंसरशिप, मानवाधिकार, काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद, मोरल पुलिसिंग आदि पर बात करके सबको चौंका दिया। 

अमिताभ बच्चन के बोलने के पहले उनकी पत्नी और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा की सदस्य जया बच्चन ने बेहद संक्षिप्त वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि उनको पता है कि बच्चन साहब पिछले तीन साल से जिन बातों पर मंथन कर रहे हैं या जो बातें सोच रहे हैं उसको आज सबके सामने रखनेवाले हैं। इतना कहने के बाद जया बच्चन ने ममता बनर्जी की ओर देखकर कहा कि वो हमेशा उनके साथ हैं। ये बताने के पीछे उद्देश्य सिर्फ इतना है कि अमिताभ बच्चन ने बहुत सोच समझकर अपनी बातें कोलकाता इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल के मंच से कही। बच्चन साहब को कई बार सुनने का अवसर मिला है। लेकिन जिस तरह से कोलकाता में वो लिखित भाषण पढ़ रहे थे वो उनके पूर्व की भाषण शैली से अलग था। ऐसा लग रहा था कि उनका भाषण श्रमपूर्वक तैयार किया गया था, जिसमें शब्दों के चयन को लेकर सावधानी बरती गई थी। उन्होंने अंग्रेजों के जमाने के सेंसरशिप पर बात की। स्वाधीनता पूर्व किस तरह से भारतीय फिल्मकारों को प्रताड़ित किया जाता था, विस्तार से उसकी क्रोनोलाजी बताई। सेंसरशिप पर क्रोनोलाजी बताते हुए वो भारत की स्वाधीनता तक पहुंचे। बताया कि 1952 में सिनेमेटोग्राफी एक्ट बना दिया गया। इसके बाद उन्होंने जो कहा उसपर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज भी नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। ये कहने के क्रम में उन्होंने कहा कि मंच पर बैठे महानुभाव उनकी बात से सहमत होंगे। इसके बाद बच्चन साहब फिल्मों के कंटेंट पर चले गए और उसकी विविधता का कालखंड गिना दिया। कंटेंट की विविधता की बात करते हुए काल्पनिक कट्टर राष्ट्रवाद और मोरल पुलिसिंग पर जा पहुंचे।

बच्चन साहब को आज देश में नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़े होते हुए दिख रहे हैं। लेकिन जब वो स्वाधीनता के बाद के परिदृष्य पर पहुंचे तो उससके बाद वो फिल्मों के विषयों पर चले गए। स्वाधीन देश में फिल्मकारों पर लगाई जानेवाली पाबंदियों पर बोलने से बचकर निकल गए। भारत में जब फिल्मों के सेंसरशिप पर बात होगी और जब उसकी क्रोनोलाजी बताई जाएगी तो क्या इमरजेंसी के दौर में हुई ज्यादतियों पर बात नहीं होगी? क्या जब नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात होगी तो इमरजेंसी के दौर में हुई घटनाओं से बचकर निकला जा सकता है? बच्चन साहब ने देश की आजादी के पहले के दौर की फिल्म भक्त विदुर पर अंग्रेजों की पाबंदी पर विस्तार से बताया कि कैसे और किन दृष्यों की वजह से उस फिल्म को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। बच्चन साहब ने वी शांताराम की फिल्म स्वराज्य पर लगी पाबंदी के कारणों को गिनाया। ये भी बताया कि किस तरह से दबाव डालकर इस फिल्म का नाम बदलकर उदय काल करवाया गया था। इसके बाद वो आज के नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्नों की बात करने लगे। क्या पिछले तीन साल से इन विषयों पर मंथन करनेवाले अमिताभ बच्चन को फिल्म आंधी और उसके निर्माताओं के साथ जो हुआ उसकी याद नहीं आई। किस तरह से फिल्म आंधी की रील को मुंबई के स्टूडियो से उठाकर नष्ट करवा दिया गया था। किस तरह से इमरजेंसी के दौरान देवानंद को धमकाया गया था, किशोर कुमार के गानों के आकाशवाणी पर बजाए जाने पर प्रतिबंध लगाया गया था। नेहरू के खिलाफ लिखने पर किस तरह से मजरूह सुल्तानपुरी को प्रताड़ित किया गया था। 

अगर हम नागरिक स्वतंत्रता की बात करें तो स्वाधीनता के बाद क्या पहली बार अब नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है? क्या पहली बार मानवाधिकार की हनन हो रहा है। अमिताभ बच्चन जिस बंगाल की जमीन पर खड़े होकर मानवाधिकार और नागरिकता स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह की बात कर रहे थे उसी जमीन पर 1967 से लेकर 1972 तक  क्या हुआ था। इसकी याद उनको नहीं आई। अमिताभ बच्चन तो 1912 तक चले गए थे लेकिन उनको 1970 की याद नहीं आई जब बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त कांग्रेस की सरकार ने औपनिवेशिक काल के बंगाल सप्रेशन आफ टेररिस्ट आउटरेजस एक्ट 1932 को लागू कर दिया था। तब नागरिक स्वतंत्रता का हनन हुआ था। ऐसे कई उदाहरण हैं जो अमिताभ बच्चन को याद नहीं आए। बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद किस तरह की घटनाएं हुईं वो पूरी दुनिया को पता हैं। क्या उसमें किसी प्रकार का मानवाधिकार हनन हुआ था। अमिताभ बच्चन को शायद पता हो। 

अमिताभ 1984 में लोकसभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। कुछ वर्षों के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी थी। तब से अबतक वो विवादित मुद्दों से बचते रहे थे। उनकी पत्नी जया बच्चन गाहे-बगाहे राजनीतिक बयान देकर विवादों में घिरती रही हैं लेकिन अमिताभ इससे अलग रहते हैं। अमिताभ बच्चन के राजनीति से दूर रहने की वजह से एक प्रतिष्ठा रही है। जब उनको दादा साहब फाल्के अवार्ड देने कि घोषणा की गई थी तो वो पुरस्कार ग्रहण के लिए विज्ञान भवन के समारोह में नहीं आए थे। उनके लिए सरकार ने अलग से राष्ट्रपति भवन में पुरस्कार अर्पण समारोह आयोजित किया था। तब भी किसी ने समानता के सिद्धांत का प्रश्न नहीं उठाया था। इस तरह के न जाने कितने प्रश्न हैं जो अमिताभ बच्चन की वरिष्ठता को ध्यान में रखकर कभी नहीं उठे। जया बच्चन का फिल्म समारोह के मंच से ममता बनर्जी को उनके साथ रहने का आश्वसान देना और उसके बाद अमिताभ बच्चन का सधे हुए अंदाज में परोक्ष रूप से राजनीतिक भाषण देना क्या संकेत करता है। अमिताभ बच्चन ने जिस दिन ये बोला उसके एक या दो दिन पहले केरल के फिल्मकार अदूर गोपालकृष्णन ने भी सुपर सेंसरशिप का मुद्दा उठाया था। उन्होंने भी कहा था कि सरकारी सेंसर के बाद इंटरनेट मीडिया का अदृष्य इकोसिस्टम फिल्मों को सेंसर करता है। ऐसा करनेवाले लोग असामाजिक हैं। क्या अदूर और अमिताभ बच्चन के बयानों में लगभग समानता एक संयोग है या फिर प्रयोग है। ये तो आनेवाले दिनों में ही स्ष्ट हो पाएगा। लेकिन इतना तय है कि अमिताभ बच्चन जैसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ कलाकार को किसी भी कलामंच से इस तरह की बातें करने के पहले काफी सोच विचार करना चाहिए। उनके कहे गए शब्दों के क्या मायने निकाले जाएंगे और उसका असर कितना गहरा होगा। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर उसको कैसे विश्लेषित किया जाएगा, आदि। प्रतीत होता है कि अमिताभ बच्चन ने अपने वक्तव्य के शब्दों के बारे में गंभीरता से मंथन नहीं किया। 

Saturday, December 10, 2022

कला पर भारी अभिनेताओं की छवि


वर्ष 2022 समाप्त होने को है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में इस वर्ष को हिंदी फिल्मों पर आए संकट के तौर पर याद किया जाएगा। इस संकट के कारणों को लेकर भी वर्ष भर चर्चा हुई। सिनेमा हाल में दर्शकों की कमी पर लगातार चिंता प्रकट की जा रही है। फिल्मों के जानकार अलग अलग कारणों की पड़ताल करने में जुटे हुए हैं। अभिनय के अलावा कहानी, पटकथा, निर्देशन से लेकर एडिटिंग की कमजोरी तक को हिंदी फिल्मों के नहीं चल पाने की वजह बताई जा रही है। कलाकारों के अभिनय में अति नाटकीयता को भी कुछ फिल्म समीक्षक रेखांकित कर रहे हैं। जो लेखक-समीक्षक हिंदी फिल्मों में कलाकारों की अति नाटकीयता को रेखांकित कर रहे हैं वो दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों के हिट होने की कारणों को जब गिनाते हैं तो उसमें कलाकारों की अति नाटकीयता को नजरअंदाज कर देते हैं। दक्षिण भारतीय फिल्मों में अति नाटकीयता आम है। हिंदी फिल्मों को किसी एक कारण से कम दर्शक नहीं मिल रहे हैं बल्कि उसके अनेक कारण हैं। 

हिंदी फिल्मों के निर्माण के दौरान पहले निर्देशक अपने साथी कलाकारों के साथ फिल्म की कहानी, उसके संवाद, उसके गीत और दृष्यों को लेकर खूब चर्चा करते थे। अपने साथी कलाकारों के साथ चर्चा करने से फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेता और निर्देशक के बीच एक सहज रिश्ता कायम हो जाता था। चूंकि अभिनेता या अभिनेत्री फिल्मों के दृष्यों पर या संवाद पर चर्चा में शामिल रहते थे इस वजह से उनके अभिनय में एक खास किस्म की स्वाभाविकता दिखाई देती थी। आर के स्टूडियो में राज कपूर की कुटिया में होने वाली बैठकी प्रसिद्ध है। पूरी पूरी रात वो अपने साथी कलाकारों के साथ फिल्म निर्माण पर, फिल्म के संगीत पर, फिल्म के संवाद पर बातें करते थे। इससे साथी कलाकारों और निर्देशकों के बीच एक रागात्मक संबंध विकसित होता था। सभी का सोच एक ही दिशा में जाता था। निर्देशक जिस फिल्म की परिकल्पना करता था, साथी कलाकार उस कल्पना को साकार करने में जुटते थे। वी शांताराम जैसे प्रसिद्ध निर्देशक भी अपने साथ काम करनेवाले कलाकारों के साथ फिल्म को लेकर लगातार बैठकें करते थे। के आसिफ जब मुगल ए आजम बना रहे थे तो उस दौरान अभिनेता चंद्रमोहन का निधन हो गया। प्रोड्यूसर सिराज अली हाकिम ने पाकिस्तान जाने का निर्णय किया जिसके कारण शूटिंग बंद हो गई थी। कई वर्षों के के बाद जब के आसिफ को दूसरे प्रोड्यूसर मिले और फिल्म पर नए सिरे से नए कलाकारों के साथ काम आरंभ हुआ तो तय किया गया कि फिल्म को अंग्रेजी और तमिल में भी बनाया जाएगा। आसिफ ने निणय लिया कि फिल्म की पटकथा नए सिरे से लिखी जाएगी। उन्होंने हिंदी फिल्म के लिए एहसान रिजवी, कमाल अमरोही, अमान और वजाहत मिर्जा को हिंदी पटकथा के लिए अनुबंधित किया। ये कलाकारों के साथ बैठकर मंथन का ही परिणाम था कि फिल्म मुगल ए आजम में जोधाबाई के संवाद के लिए हिंदी और उर्दू के शब्दों के साथ ब्रजभाषा के भी कई शब्दों का उपयोग किया गया। इस तरह के संवाद ने जोधाबाई के किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया था। जब फिल्म की शूटिंग आरंभ हुई थी तो उसके पहले पृथ्वीराज कपूर के चलने के शाही अंदाज पर भी चर्चा हुई थी। तय किया गया था कि वो सीना तान कर अपेक्षाकृत धीरे-धीऱे चला करेंगे। इससे अकबर के व्यक्तित्व के चित्रण में सहायता मिली थी। हिंदी फिल्मों से जुड़े इस तरह के कई किस्से पुस्तकों में दर्ज हैं।    

अब हिंदी फिल्म निर्माण में स्थितियां लगभग पूरी तरह से बदल गई हैं। निर्देशकों और कलाकारों के साथ बैठक की परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों से फिल्म मेकिंग की कला सीखकर आए निर्देशकों ने फिल्म निर्माण की बारीकियां तो सीखी हीं फिल्म निर्माण का कथित प्रोफेशनल अप्रोच भी सीख लिया। अब हो ये रहा है कि निर्देशक फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को एक्सेल शीट पर बनाते हैं। इसको काल शीट कहते हैं। काल शीट में तिथि के अनुसार फिल्म निर्माण की गतिविधियां दर्ज होती हैं। कितने बजे कौन आएगा, कौन सा दृष्य फिल्माया जाएगा। अभिनेता कौन है, वो कितने बजे आएंगे, मेकअप में कितना समय लगेगा, कितने बजे शूट आरंभ होगा, कास्ट्यूम क्या होगा आदि के अलावा नजदीकी अस्पताल, एंबुलेंस के नंबर के साथ साथ सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भी लिखा होता है। फिल्म निर्माण में अनुशासन और खर्च को व्यवस्थित करने के लिए काल शीट आवश्यक है। लेकिन जब काल शीट के अनुसार अभिनेताओं को अभिनय करने पर मजबूर किया जाता है तो उसका असर फिल्म पर पड़ता है। इस दौर के प्रसिद्ध अभिनेता ने एक किस्सा सुनाया। एक बार उनको काफी बुखार था। काल शीट के अनुसार उनको बारह बजे सेट पर पहुंचना था। उनपर काफी दबाव बनाया गया कि वो शूटिंग के लिए पहुंचे। सेट पर डाक्टर और एंबुलेंस की व्यवस्था रहेगी। वो दवा लेकर सेट पर पहुंचे। हर शाट के बीच डाक्टर उनकी नब्ज देखते थे और कहते थे कि सब ठीक है आप शूटिंग करिए। दवा खाकर तीन घंटे तक काल शीट के अनुसार उन्होंने अभिनय किया। बुखार का असर अभिनय पर फिल्म बनने के बाद भी दिखा। सुपर स्टार्स ने इसकी काट निकाल ली है। जब वो काल शीट के अनुसार नहीं आ पाते हैं तो कई शाट्स के लिए वो निर्माताओं से कहते हैं कि बाडी डबल का उपयोग कर लें। बाद में फेस रिप्लेसमेंट की तकनीक का उपयोग करके उसको स्वाभाविक दिखा दिया जाता है। 

हिंदी फिल्मों के निर्माण को जो एक दूसरी बात नुकसान पहुंचा रही है वो है स्टारडम। बड़े स्टार अब निर्देशकों की नहीं सुनते हैं। वो अपनी मर्जी से स्क्रिप्ट से लेकर सीन तक में बदलाव करवा लेते हैं। इतना ही नहीं वो इससे आगे जाकर अपनी वेशभूषा के बारे में भी निर्णय करने लगे हैं। कई सुपरस्टार को तो सेट पर निर्देशकों को निर्देशित करते हुए देखा जा सकता है। वो निर्देशक को बताते हैं कि फलां सीन को इस तरह से शूट किया जाए। इसका नुकसान ये होता है कि निर्देशक ने फिल्म के बारे में जो समग्र सोच बनाया है उसको सुरस्टार बाधित कर देते हैं। कुछ सुपर स्टार तो फिल्म के एडिट होने के बाद उसमें दृष्य जुड़वाते और कटवाते तक हैं। ये पहले भी होता था लेकिन उस समय अधिकतर सुपरस्टार अपने साथी कलाकारों के चयन में हस्तक्षेप करते थे। वो अपने मन मुताबिक नायिका का चयन करने के लिए निर्माता निर्देशक पर दबाव डालते थे। कई बार लोकेशन को लेकर भी। पर फिल्म निर्माण में दखल कम होता था। अब तो इन सुपरस्टार्स का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। उनको लगता है कि दर्शक उनके अभिनय को पसंद कर रहे हैं तो वो फिल्म को भी अपने हिसाब से बनवाएं। फिल्म निर्देशक बेचारगी में हथियार डाल देते हैं। उनको भी बड़ा बैनर और बड़ी फिल्म का नाम चाहिए होता है।  

आज जब आमिर खान और अक्षय कुमार जैसे सुपरस्टार्स की फिल्में एक के बाद एक फ्लाप हो रही हैं तो निर्माताओं को इन कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है। खुद को फिल्म में सबसे उत्तम दिखने की सुपरस्टार्स की मानसिकता निर्देशकों को महत्वहीन कर रही है। इस प्रवृत्ति को कम करना होगा। निर्देशकों को छूट देनी होगी कि वो अपने हिसाब से फिल्म बनाएं। काल शीट को लचीला बनाया जाए, कलाकारों के साथ फिल्म निर्माण को लेकर, उसको बेहतर बनाने को लेकर संवाद हो। सुपरस्टार्स निर्देशकों की सुनें और अपनी मनमानी कम करें। ये फिल्म जगत के लिए भी अच्छा होगा और कलाकारों के लिए भी। इन प्रवृत्तियों पर बात होनी चाहिए। 


Saturday, December 3, 2022

विवाद का कारण बनते गुलामी के चिह्न


स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने पांच प्रण बताए थे। इसमें से एक प्रण गुलामी के चिह्नों को समाप्त करने का है। अमृत काल में अपेक्षा की गई कि इन पांच प्रण को आत्मसात किया जाए। प्रधानमंत्री ने जब गुलामी के चिह्नों को हटाने की बात की तो उनको इस बात का अंदाज होगा कि सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहने के कारण इसके चिह्न हमारे जीवन और सरकारी क्रियाकलापों में रच-बस गए हैं। उनको हटाना कठिन है। इसका ताजा उदाहरण है गोवा में आयोजित 53वें अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया (इफ्फी) में विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स को लेकर उठा विवाद। अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन और इजरायल के फिल्मकार नादव लैपिड ने इस फिल्म को भद्दा और प्रोपगंडा फिल्म बताया। ये कहने के लिए उन्होंने इफ्फी के समापन समारोह के मंच का उपयोग किया। जहां उनके सामने केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, कई मंत्री और जूरी के अन्य सदस्य उपस्थित थे। ये भी गुलामी के एक चिह्न के बने रहने के कारण ही हुआ। कैसे ? इसको समझने के लिए फिल्म समारोह के नियमों को देखते हैं। 

इस वर्ष फिल्म समारोह का आयोजन राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) ने किया। एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक की तरफ से जारी नियम के बिंदु संख्या 3 (1) में कहा गया है कि फीचर फिल्म के अंतराष्ट्रीय कंपटीशन में कुल 15 फिल्में होंगी। इनमें से तीन भारतीय फिल्में होंगी। फिक्शन फिल्म की अवधि 70 मिनट या उससे अधिक होनी चाहिए। इसी नियमावली के 4.4 में कहा गया है कि अंतराष्ट्रीय कंपटीशन के लिए एक जूरी होगी जिसमें चेयरमैन और कम से कम दो सदस्य या अधिकतम चार सदस्य होंगे। इसके अगले बिंदु में ये स्पष्ट किया गया है कि फिल्मों के बारे में जूरी का फैसला उपस्थित सदस्यों के सामान्य बहुमत के आधार पर होगा। जूरी फिल्मों की प्रविष्टियों के बारे में निर्णय लेने के लिए अपने नियम बना सकती है। इसी में आगे कहा गया है कि एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक और/या उनके प्रतिनिधि जूरी के साथ फिल्मों पर मंथन के दौरान उपस्थित रहेंगे, लेकिन उनको वोट देने का अधिकार नहीं होगा। अब इस पूरी नियमावली में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि अंतराष्ट्रीय जूरी का चेयरमैन कैसे नियुक्त किया जाता है। बताया जा रहा है कि इफ्फी के अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन का चयन एनएफडीसी करती है। इस वर्ष आयोजित मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल, जिसका आयोजन भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत होता है, की अंतराष्ट्रीय जूरी का मैं सदस्य था। मेरे साथ इजरायल के डान वोलमैन, फ्रांस में बस गई ईरानी फिल्मकार मीना राड, फ्रांस के ही जेएन पियरे और भारत से नल्लामुत्थू सदस्य थे। इसमें सभी सदस्यों ने आम सहमति के आधार पर मीना राड का चुनाव जूरी के चेयरमैन के तौर पर किया था। इस पूरी प्रक्रिया और फिल्मों के चयन के दौरान फिल्म डिवीजन के एक सहयोगी निरंतर उपस्थित थे। सारी बातें सुन रहे थे और नोट्स भी ले रहे थे। जो नियमवाली थी उसमें भी ये स्पष्ट लिखा गया था कि सदस्य आम सहमति के आधार पर चेयरमैन का चयन करेंगे। किसी कारणवश अगर सहमति नहीं बन पाती है तो फेस्टिवल डायरेक्टर चेयरमैन की नियुक्ति करेगा। मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की अंतराष्ट्रीय जूरी के चेयरमैन भारतीय फिल्मकार भी होते रहे हैं। आमतौर पर वरिष्ठता को आधार बनाया जाता है।      

इफ्फी ने जो 53वें फिल्म फेस्टिवल के लिए नियमावली जारी की उसमें इस बात का भी उल्लेख नहीं है कि अंतराष्ट्रीय जूरी का सदस्य कोई भारतीय नहीं हो सकता है। लंबे समय से ये एक अलिखित सा नियम या कहें कि परंपरा चल रही है कि इंटरनेशनल जूरी का सदस्य कोई विदेशी फिल्मकार ही होगा। फिल्म फेस्टिवल में जब से अंतराष्ट्रीय जूरी बनने लगी होगी तब किसी ने कह या तय कर दिया होगा कि अंतराष्ट्रीय जूरी का सदस्य कोई विदेशी होगा। तब से ही ये चला आ रहा है। किसी ने इस पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी। इस बर्ष भी यही हुआ होगा और फेस्टिवल डायरेक्टर ने किसी की अनुशंसा पर इजरायली फिल्मकार नादव लैपिड को चेयरमैन नियुक्त कर दिया होगा। यहां ये देखा जाना चाहिए कि किसने नादव लैपिड की अनुशंसा किसने की थी। इसी तरह की स्थितियों के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुलामी के चिह्न हटाने की बात अपने पांच प्रण में की थी।

इफ्फी की नियमावली में एक और बात लिखी हुई है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है कि फिल्मों पर जब जूरी के सदस्य मंथन करेंगे तो एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक या उनके प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे। अब यहां प्रश्न ये उठता है कि मंच से जो बात नादव लैपिड ने कही क्या उसपर मंथन के दौरान चर्चा नहीं हुई। उन्होंने तो एक साक्षात्कार में ये भी कहा कि स्पेन और फ्रांस के जूरी सदस्य से बात कर ली जाए वो भी इसी मत के थे। अंतराष्ट्रीय जूरी के एकमात्र भारतीय सदस्य सुदोप्तो सेन ये दावा कर रहे हैं कि नादव लैपिड ने जो मंच से बोला ये उनकी व्यक्तिगत राय है। एनएफडीसी को मंथन के दौरान उपस्थित अपने प्रतिनिधि से बात करनी चाहिए और सच की तह तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने मंथन के दौरान नोट्स लिए होंगे या जूरी के सदस्यों की राय भी दर्ज हुई होगी, उसको देखा जाना चाहिए कि उन्होंने क्या लिखकर दिया है। उससे राय स्पष्ट हो जाएगी। ऐसा क्यों हुआ इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आगे क्या किया जाए जिससे ऐसी अप्रिय घटनाएं न हों । एक तो जूरी चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया एकदम स्पष्ट हो और दूसरा जिनको बनाया जाए उनकी पृष्ठभूमि के बारे में भी चयनकर्ता या अनुशंसा करनेवाले को जानकारी हो। 

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इस वर्ष 4 जुलाई को 53वें इफ्फी के लिए मंत्री की अध्यक्षता में एक संचालन समिति का गठन किया था। इसमें कुल 26 सदस्य थे, जिनमें से 13 गैर सरकारी सदस्य थे। संचालन समिति के गठन के साथ ही इस समिति का उत्तरदायित्व और उसकी भूमिका तय की गई थी। इसमें 13वें बिंदु पर स्पष्ट है कि ये समिति इंटरनेशनल जूरी सदस्यों का चयन करेगी। गैर सरकारी सदस्यों में करण जौहर समेत कई बड़े नाम हैं। यह जानना दिलचस्प होगा कि जूरी के चयन में संचालन समिति के सदस्यों की कोई भूमिका थी या नहीं? अगर थी तो नादव लैपिड का नाम किसने सुझाया था। इफ्फी के लिए संचालन समिति को अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय करने की आवश्यकता है। कई नाम तो ऐसे हैं जो बस सूची में हैं। देखा जाना चाहिए कि सदस्यों की जो भूमिका और उत्तरदायित्व तय किए गए हैं उसको लेकर वो कितने गंभीर हैं। 

फिल्मों से जुड़े आयोजनों और पुरस्कारों के बारे में मंत्रालय को गंभीरता से विचार करना होगा। इनको पुराने ढर्रे पर चलते हुए काफी समय हो गया है। बदलते वक्त के साथ चलना होगा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। उसमें इतनी अधिक श्रेणियां और पुरस्कार हैं कि पुरस्कार वितरण समारोह काफी लंबा हो जाता है। इसको तर्कसंगत बनाना होगा। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फीचर फिल्म और लेखन का पुरस्कार एक साथ कर देना चाहिए। गैर फीचर फिल्म और अन्य पुरस्कार को मुंबई अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल से जोड़ देना चाहिए क्योंकि वो फेस्टिवल गैर-फीचर फिल्मों का ही है। फिल्म समारोहों के नियमों पर पुनर्विचार करके उसको स्पष्ट करना होगा। एक पूर्णकालिक फेस्टिवल निदेशक की नियुक्ति करनी होगी ताकि वो पूरे वर्ष फेस्टिवल को लेकर कार्ययोजना बनाकर अमल कर सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अह्वान के अनुसार जहां जहां गुलामी के चिह्न हैं उनको हटाने का प्रयास सरकारी स्तर पर भी करना होगा।

हिंदी फिल्मों को दिशा देनेवाला निर्माता


प्रसंग 2017 का है। मैं राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में श्रेष्ठ लेखन की जूरी का चेयरमैन था। ये जूरी फिल्मों पर श्रेष्ठ लेखन के लिए और संबंधित वर्ष में फिल्म पर प्रकाशित पुस्तकों को पुरस्कृत करती है। जूरी ने पुरस्कार के लिए पुस्तकों का चन कर लिया और उसकी घोषणा भी कर दी गई। घोषणा के करीब एक पखवाड़े के बाद एक अनजान नंबर से फोन आया। फोन करनेवाले ने चयन समिति के अध्यक्ष होने के नाते मुझे पुस्तक चयन के लिए बधाई दी। फिर अपना नाम बताया सुरेश जिंदल। फिर तो करीब दस मिनट पर फिल्म और फिल्म लेखन पर बातचीच होती रही। सुरेश जी ने फोन रखने के पहले बताया कि उनकी पुस्तक , माई एडवेंचर विद सत्यजित राय, द मेकिंग आफ शतरंज के खिलाड़ी को भी राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भेजा गया था। फिर उस पुस्तक और शतरंज के खिलाड़ी की मेकिंग पर बात हुई। सत्यजित राय से मिलने का प्रसंग बेहद रोचक था।  मुंबई में टीनू आनंद के घर पर बात हो रही थी, बातों बातों में सत्यजित राय को फोन मिला दिया गया। उनसे समय मिला और सुरेश जिंदल और टीनू आनंद उनसे मिलने कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंच गए। उनके पास कई दिलचस्प किस्से थे। उन्होंने मिलने को कहा था। तय हुआ कि किसी दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में मिला जाए। वो दक्षिण दिल्ली में रहते थे इसलिए आईआईसी उनके लिए सुविधाजनक होता। अफसोस कि उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। पिछले दिनों उनका निधन हो गया। 

सुरेश जिंदल ने कई बेहतरीन फिल्में बनाईं। उनकी पहली फिल्म मन्नू भंडारी की कहानी यही सच पर आधारित थी जिसको बासु चटर्जी ने निर्देशित किया था। ये फिल्म सुपरहिट रही थी। इसके बाद उन्होंने सत्यजित राय के साथ उनकी पहली हिंदी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी बनाई। आज से करीब चालीस साल पहले 30 नवंबर को दिल्ली में फिल्म गांधी रिलीज हुई थी। रिचर्ड अटनबरो की इस क्लासिक फिल्म के भी सहयोगी सुरेश जिंदल थे। इसके अलावा भी सुरेश जिंदल ने कई फिल्में बनाई। सुरेश जिंदल दिल्ली के पंजाबी परिवार के थे। उन्होंने अमेरिका के युनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फिर कई वर्षों तक वहीं नौकरी भी की। फिल्मों से गहरे जुड़े होने के बावजूद वो दिल्ली में ही रहना पसंद करते थे। बीच में करीब तीन चार वर्षों के लिए मुंबई शिफ्ट हुए थे लेकिन फिर वो दिल्ली आ गए। वो कहते थे कि दिल्ली में उनको एक विशेष प्रकार की रचनात्मक उर्जा मिलती थी। पिछले करीब दो दशक से सुरेश जिंदल आध्यात्मिक हो गए थे और अधिक समय धर्म और अध्यात्म में ही व्यतीत करते थे। दिल्ली में रहकर इस श्रेष्ठ निर्माता ने हिंदी फिल्मों में जो योगदान किया है वो फिल्म इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है।   

Saturday, November 26, 2022

प्रगतिशीलता के झंडाबरदार खामोश


हाल में तीन घटनाएं लगभग एक साथ घटी। दिल्ली के जामा मस्जिद में एक नोटिस लगा जिसपर लिखा था कि मस्जिद में लड़की या लड़कियों का अकेले दाखिला मना है। दूसरी घटना में अभिनेत्री ऋचा चड्ढा ने भारतीय सेना का मजाक उड़ाते हुए एक ट्वीट किया। हुआ ये कि लेफ्टिनेंट जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने एक बयान दिया कि भारतीय सेना गुलाम कश्मीर को वापस भारत में मिलाने के आदेश को पूरा करने के लिए तैयार है। इसपर ऋचा चड्ढा ने मजाक उड़ाते हुए टिप्पणी की थी। जामा मस्जिद वाली घटना में दिल्ली के उपराज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद मस्जिद प्रबंधन ने अपना निर्णय वापस ले लिया। ट्विटर पर जब चौतरफा हमला होने लगा तो अभिनेत्री ऋचा चड्ढा को भी बात समझ में आई होगी। उसने भी अपनी टिप्पणी पर खेद प्रकट कर दिया। अपने नाना के सेना में होने की बात कहने लगी। तीसरी खबर दारुल उलूम देवबंद से आई। एक ताजा फतवे में कहा गया कि इस्लाम में जन्मदिन मनाना गुनाह है। फतवे में कहा गया कि जन्मदिन मनाना एक खुराफात है क्योंकि इस्लाम और शरीयत में इसका कोई जिक्र नहीं है। जन्मदिन मनाने की परंपरा ईसाइयों की है और मुसलमान उसकी नकल करते हैं। मुसलमानों को इससे बचना चाहिए और शरीयत के बताए रास्ते पर चलना चाहिए।  

जामा मस्जिद में नोटिस वापसी और ऋचा के खेद प्रकट करने के बाद मामले का पटाक्षेप हो गया प्रतीत होता है। लेकिन इन दो घटनाओं के बाद कई प्रश्न उत्पन्न हो गए हैं। जिसपर भारतीय समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए। जामा मस्जिद में अकेली लड़कियों के प्रवेश पर प्रतिबंध का जब इंटरनेट मीडिया पर विरोध आरंभ हुआ तो मस्जिद की ओर से सफाई आई। उस सफाई में मस्जिद के प्रवक्ता ने कहा कि लड़कियां अपने पुरुष मित्रों से मिलने के लिए मस्जिद में आती हैं, डांस करती हैं, वीडियो बनाती हैं, इस वजह से उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि एक वेबसीरीज में जब एक मंदिर के अंदर नायक-नायिका का चुंबन दृष्य फिल्माया गया था तो उसका विरोध हुआ था। केस मुकदमे भी गुए थे। तब कथुत उदारवादियों की तरफ से ये तर्क दिया गया था कि प्रेम तो पवित्र होता है और वो कहीं भी किया जा सकता है। उसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जोड़ा गया था। तब इस तरह के तर्क देने वाले जामा मस्जिद वाले मसले पर कन्नी काट गए हैं। जबति यहां न तो कोई चुंबन दृश्य था और न ही रोमांटिक नृत्य का वीडियो बना था। 

हिंदुओं और मुसलमानों के बारे में दो अलग अलग मानदंडों पर विचार किया जाना चाहिए। नारी स्वतंत्रता की बात करनेवाली और खुद को उदारवादी प्रचारित करनेवाली क्रांतिकारी महिलाएं भी इन मसलों पर खामोश रहीं। कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश पर कितना हंगामा मचा था, ये अब भी पाठकों के स्मरण में होगा। उस वक्त जितनी महिलाएं पक्ष में खड़ी हुई थीं, इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर जिस तरह का गुस्सा या विरोध देखने को मिला था वो जामा मस्जिद के फैसले के समय कहीं भी नहीं दिखा। वो फिल्मी अभिनेत्रियां भी नहीं दिखाई दीं जो महिला अधिकारों के लिए हाथ में तख्तियां लेकर ट्विटर पर खड़ी हो जाया करती हैं। उनके पास जामा मस्जिद में लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी की खबरें नहीं पहुंच पाती हैं लेकिन शणि शिंगणापुर की आहट से भी परेशानी हो जाती है। इन तथाकथित उदारवादी, प्रगतिशील या महिला अधिकारों की झंडा-डंडा लेकर चलनेवाली महिलाओं की इस तरह की चुनी हुई चुप्पियां उनके सार्वजनिक स्टैंड को सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है। इनके इस तरह के स्टैंड से समाज में एक अलग ही किस्म की सांप्रदायिक स्थितियां बनती हैं जिसका असर काफी लंबे समय के बाद देखने को मिलता है। यह स्थिति समाज के लिए घातक है। 

पिछले दिनों जब फिल्मों का बहिष्कार होने लगा था तो इसके विरोध में देशभर में एक चर्चा का वातावरण बनाने की कोशिश की गई थी। उसमें इस तरह की बातें भी की गई थीं कि बहिष्कार की अपील के कारण हमारा समाज हिंदू और मुसलमान के आधार पर बंट रहा है। ऐसा तब नहीं कहा गया था जब आमिर खान ने नरेन्द्र मोदी के विरोध में चलते फिरते इंटरव्यू दिया था। तब आमिर खान को साहसी अभिनेता के तौर पर रेखांकित किया गया था। जब आमिर की फिल्म के बहिष्कार की बात आई तो उसको हिंदू मुसलमान का रंग देकर भारतीय समाज को अपमानित करने की कोशिश की गई। ऋचा चड्ढा ने भारतीय सेना का अपमान किया है, उसका मजाक उड़ाया है। सवाल यही उठता है कि कोई अपने देश की सेना का मजाक कैसे उड़ा सकता है। कहां से दिमाग में इस तरह की सोच आती है। क्यों ये लोग बात-बात में सेना को अपनी क्षुद्र राजनीति का शिकार बना लेते हैं। कल को अगर ऋचा को कोई फिल्म मिलती है या वो किसी वेबसीरीज में नजर आती है और दर्शकों की ओर से उसके बहिष्कार की अपील की जाती है तो उसकी आलोचना का अधिकार किसी को नहीं होगा। बहिष्कार तो विरोध जताने का एक शांतिपूर्ण तरीका भी है। इंटरनेट मीडिया पर ऋचा चड्ढा की टिप्पणियां पढ़कर लगता है कि वो खुद को उदारवादी मानती हैं, सेक्यूलर भी। इंटरनेट मीडिया पर खूब सक्रिय भी हैं लेकिन जामा मस्जिद में लड़कियों के प्रवेश पर पाबंदी के मामले में वो भी चुप्पी को ही चुन लेती हैं। इस तरह का छद्म उदारवाद ज्यादा दिनों तक चल नहीं सकता। 

अब बात कर लेते हैं उस फतवे की जिसमें जन्मदिन के उत्सव को इस्लाम में गुनाह माना गया है। इसपर आगे बढ़ने के पहले फतवे के बारे में कुछ जानकारी। समय समय पर जारी होनेवाला फतवा संकलित होता रहा है। इसके बाद उसको संकलित कर प्रकाशित करवा दिया जाता है। जब किसी आम मुसलमान के मन में अपनी जिंदगी, शरीयत या स्वभाव के बारे में कोई शंका पैदा होती है या उसका किसी मसले पर विवाद हो जाता है तो वो मौलवी के पास जाता है। उनसे अपने शंका का समाधान चाहता है। मौलवी पूर्व में जारी किए गए फतवों के संकलन को देखकर शंका समाधान की कोशिश करते हैं। दारुल उलूम देवबंद के जारी फतवों के कई खंड अबतक प्रकाशित हो चुके हैं। इस तरह के देखा जाए तो फतवे कानून बन जाते हैं। जन्मदिन तो लेकर जो फतवा जारी किया गया है उसका भी दूरगामी असर होगा। इस फतवे पर भी किसी भी प्रगतिशील कामरेड ने मुंह नहीं खोला और चुपचाप इसको गुजर जाने दिया गया। 

साहित्य जगत में भी कई लेखक और लेखिकाएं महिला अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर चीखती रहती हैं लेकिन उनमें से भी ज्यादातर लेखिकाएं चुप रहीं। कहीं कुछ नहीं लिखा। हिंदी साहित्य में भी खुद को प्रगतिशील कहनेवाले लेखक भी इन मसलों पर खामोश हैं। प्रगतिशील लेखक जितना मुखर हिंदू धर्म से जुड़ी घटनाओ पर होते हैं उतनी ही गहरी चुप्पी इस्लाम के मसले पर साध लेते हैं। अपने लेखन में भी और अपने बयानों और भाषणों में भी। ये कैसी प्रगतिशीलता है जो धर्म के आधार पर अपना रास्ता तय करती है। ये कैसी प्रगतिशीलता है जो देश के सैनिकों को अपमानित करनेवालों का विरोध करने की हिम्मत नहीं कर पाता है। दरअसल ये छद्म प्रगतिशीलता है जो अपने राजनीतिक आकाओं के कहने पर अपना स्टैंड लेती है। राजनीति करनेवाले अपने वोटबैंक की चिंता करते हैं, करनी भी चाहिए लेकिन जब लेखक या बुद्धिजीवी खुद को राजनीतिक औजार के तौर पर इस्तेमाल करने की छूट देते नजर आते हैं तो समाज में उनकी प्रतिष्ठा कम होती है। 


Saturday, November 19, 2022

हिंदू शासकों के पराक्रम की अनदेखी


भुवनेश्वर में आयोजित ओडिशा लिटरेरी फेस्टिवल के एक सत्र में इतिहास पर चर्चा थी। उसमें भाग ले रही इतिहासकार नंदिता कृष्णा ने इतिहास लेखन में असंतुलन का प्रश्न उठाया। इस प्रश्न पर कम या नहीं के बराबर चर्चा हुई है। नंदिथा के अनुसार भारत के इतिहासकारों ने दक्षिण भारत के हिंदू राजाओं के शौर्य, पराक्रम और सनातन संस्कृति से प्रेम के बारे में अपेक्षाकृत कम लिखा। इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में मुगलों के शासन काल, ब्रिटिश औपनिवेशिकता और स्वाधीनता आंदोलन के बारे में विस्तार से लिखा गया लेकिन महान भारतीय राजाओं या सम्राटों के बारे में संक्षेप में। 1206 से लेकर 1526 तक चला सल्तनत काल सिर्फ दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक सीमित था लेकिन उनको या फिर 1526 से लेकर 1739 तक के मुगल काल को इतिहास की पुस्तकों में प्रमुखता से स्थान दिया गया। उन्होंने इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद से लेकर आर सी मजुमदार तक की पुस्तकों का उदाहरण दिया। उनका दावा था कि ईश्वरी प्रसाद की पुस्तक में वैदिक काल, उत्तर वैदिक काल, जैन, बुद्ध, मौर्य सम्राज्य, शक, हूण, कुषाण, गुप्त काल और राजपूत राजाओं के बारे में 115 पृष्ठों में विवरण है लेकिन दक्षिण भारत के राजाओं और शासकों के बारे में सिर्फ सात पृष्ठों में। इसी तरह से मध्यकालीन इस्लामिक काल, जिसमें गजनी, गोरी के भारत पर आक्रमण गुलाम राजवंश, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी और मुगलों के बारे में विवरण है, को 190 पृष्ठ दिए गए हैं। जबकि उसी काल में दक्षिण भारत के बारे में कोई विवरण इस पुस्तक में नहीं है। 

सिर्फ ईश्वरी प्रसाद की पुस्तक ही नहीं बल्कि उन्होंने आर सी मजुमदार और रोमिला थापर की पुस्तकों का उदाहरण भी दिया। आर सी मजुमदार की पुस्तक में भी उत्तर भारत के इतिहास के बारे में 171 पृष्ठ हैं जबकि सातवाहन, राष्ट्रकूट, पल्लव और चालुक्यों के बारे में सिर्फ नौ पृष्ठ। मध्यकाल में मुस्लिम आक्रांताओं के भारत आक्रमण पर 146 पेज, मुगल अफगान आक्रमणकारियों पर 192 पेज और विजयनगर के बारे में 77 पेज और ओडिशा में उस काल में घट रही घटनाओं पर सिर्फ 3 पेज। इसी तरह से रोमिला थापर की पुस्तक में उत्तर भारत के इतिहास पर 195 पृष्ठ और दक्षिण भारत के इतिहास पर सिर्फ 17 पेज।  

नंदिता कृष्णा ने इतिहास की पुस्तकों के इस असंतुलन को रेखांकित किया था। प्रश्न ये उठता है कि इतिहास की पुस्तकों के लेखकों ने ऐसा क्यों किया। जितनी जगह बादशाहों या मुस्लिम आक्रांताओं को दी गई उतना वर्णन दक्षिण भारत के हिंदू राजाओं के शासनकाल का क्यों नहीं किया गया। इस संदर्भ में दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य का जिक्र आवश्यक प्रतीत होता है। चोल साम्राज्य के शासक भारतवर्ष के पहले शासक थे जिन्होंने नौसेना का उपयोग करके अपने साम्राज्य को विस्तार दिया था। आज के श्रीलंका, मालदीव और इंडोनेशिया तक अपनी सत्ता कायम की थी। चोल सम्राट राजेन्द्र चोल प्रथम के पास कुशल नौसैनिकों और जहाजों का बहुत ही मजबूत बेड़ा था। उनके नौसैनिकों इतने कुशल थे कि वो हवा के रुख का भी अनुमान लगा लेते थे। इसी अनुमान पर आक्रमण की रणनीति बनती थी। इसी शक्ति के बल पर राजेन्द्र चोल प्रथम ने आज के सुमात्रा तक अपनी विजय पताका फहराई थी। राजेन्द्र चोल प्रथम के पिता राजराजा ने श्रीलंका पर आक्रमण करके उसको जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया था। इतना ही नहीं उन्होंने आज के मालदीव को भी अपने साम्राज्य का हिस्सा बना लिया था। आज के इंडोनेशिया और उस समय के श्रीविजय के राजा का 14 बंदरगाहों पर आधिपत्य था। वो समुद्री रास्ते से होनेवाले कारोबार पर न केवल अपनी शर्तें थोपते थे बल्कि कारोबार को नियंत्रित भी करते थे। राजेन्द्र चोल को श्रीविजय के राजा संग्राम विजयतुंगबर्मन की ये नीतियां रास नहीं आ रही थी। लिहाजा उन्होंने एक साथ उनके चौदह बंदरगाहों पर हमला कर उनपर अपना आधिपत्य कायम कर लिया। उन्होंने राजा संग्राम को बंदी बना लिया था। कुछ इतिहास पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि राजेन्द्र चोल प्रथम ने राजा संग्राम विजयतुंगबर्मन की पुत्री से विवाह भी किया था। संभव है कि राजेन्द्र चोल ने अपने साम्राज्य से होनेवाले व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए सुमात्रा पर हमला किया हो लेकिन इससे उनके शौर्य और पराक्रम को कम नहीं किया जा सकता है। नंदिथा कृष्णा ने भी इस बात को रेखांकित किया था कि चोल साम्राज्य के राजा भारत के पहले हिंदू शासक थे जिन्होंने समुद्री रास्ते से जाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था और उसको श्रीलंका से लेकर सुमात्रा तक फैलाया था। 

तंजावुर के शिलालेख में भी राजेन्द्र चोल प्रथम के इस नौसैनिक अभियान का उल्लेख मिलता है। राजेन्द्र ने इस आक्रमण के लिए अपने जहाज के माध्यम से हाथियों को भी रणभूमि में भेजा था। हाथियों पर सवार सैनिक श्रीविजय के बंदरगाहों पर धावा बोला था और विजय में निर्णाय़क भूमिका निभाई थी।  इतिहास में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि चोल राजवंश ने बहुत लंबे समय तक शासन किया। पूरी दुनिया में इतने लंबे समय तक एक भूभाग पर एक ही राजवंश के शासन का उदाहरण कम मिलता है। कहा जाता है कि चोल राजवंश सबसे लंबे कालवधि तक राज करनेवाला वंश था। चोल राजवंश के बारे में अशोक के शिलालेखों में भी उल्लेख मिलता है और उनको मौर्य शासकों का मित्र बताया गया है। चोल राजवंश के हिंदू राजाओं के शौर्य और पराक्रम की चर्चा इतिहास की पुस्तकों में कम है। इतना ही नहीं उनके कला और संस्कृति प्रेम और इस क्षेत्र में उनके योगदान को भी रेखांकित करने का उपक्रम नहीं किया बल्कि वामपंथी इतिहासकारों ने तो इसको प्रयासपूर्वक ओझल किया। 

इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि इतने बड़े तथ्य या इतनी बड़ी ऐतिहासिक घटना को इतिहासकारों ने अपने लेखन के केंद्र में क्यों नहीं रखा। दरअसल इसके पीछे अपने विचारधारा को पुष्ट करने की मंशा दिखाई देती है। वामपंथी और नेहरूवादी इतिहासकारों ने स्वाधीनता के बाद इतिहास लेखन की जो पद्धति अपनाई वो इतिहास लेखन कम वैचारिक प्रोपगैंडा अधिक था। चाहे वो प्राचीन भारत का इतिहास लिख रहे थे या मध्यकालीन भारत का या फिर आधुनिक भारत का उन्होंने एजेंडा और प्रोपगैंडा को महत्व दिया। स्कूली पाठ्यक्रम लिखने का जिम्मा इन्हीं वामपंथी इतिहासकारों को मिला। वामपंथी इतिहासकारों ने जनता की दृष्टि से इतिहास को देखने का प्रचार तो किया लेकिन जन इतिहास लेखन की पद्धति के पीछे पार्टी की विचारधारा थी। वामपंथी इतिहासकारों ने लेखन के समय एक और छल किया कि उन्होंने हिंदू धर्म सिद्धांतों की अनदेखी की। उसकी मौलिकता को रेखांकित करने की बजाए वो आक्रांताओं की संस्कृति और कला को महत्व देने लगे। यहां भी चोल राजवंश का उदाहरण देना उपयुक्त रहेगा। चोल राजवंश के समय कला और संस्कृति को खूब बढ़ावा मिला। स्थापत्य कला की दृष्टि से भी अनेक उत्कृष्ट मंदिरों का निर्माण हुआ। मंदिरों पर जिस तरह की कलाकारी की गई वो अप्रतिम है। कहा जाता है कि नटराज की जो मूर्ति प्रचलन में है उसको चोल राजवंश के ही किसी राजा ने बनवाया था। उसके पहले शिव की उस मुद्रा की मूर्ति के साक्ष्य नहीं मिलते हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने जिस तरह से इतिहास लिखा उससे समाज के विभाजित होने का खतरा है। आर्य-अनार्य की अवधारणा ,जाति और वर्ग के आधार पर किसी कालखंड का मूल्यांकन करके वामपंथी इतिहासकारों ने विभाजन के बीज डाले। इतिहास लेखन में जो असंतुलन दिखाई देता है उसे दूर करने के लिए भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद को पहल करनी चाहिए। इस समय राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का कार्य चल रहा है। पाठ्य पुस्तक तैयार करते समय भी इस असंतुलन को दूर किया जाना चाहिए। 

Monday, November 14, 2022

राष्ट्र सर्वप्रथम पर अडिग फिल्मकार


आज हिंदी फिल्म के विषयों को लेकर निरंतर विवाद होते हैं। कई बार फिल्मों में राजनीति और राजनीतिक दलों के एजेंडा भी दिखाई पड़ते हैं। आज बहुत ही कम फिल्मकार राष्ट्र सर्वप्रथम के सोच के साथ फिल्म बनाते नजर आते हैं। बीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में कई ऐसी फिल्में आईं जिसने आतंकवाद और सांप्रदायिकता का विषय तो फिल्म के लिए चुना लेकिन मंशा विचारधारा विशेष का पोषण था। कई बार राजनीति भी। लेकिन हमारे देश में ऐसे कई फिल्मकार हुए जिन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता को शक्ति देनेवाली फिल्में बनाईं। ऐसे ही एक फिल्मकार थे व्ही शांताराम। देश की स्वाधीनता के बाद वो दहेज पर फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे। फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम चल रहा था। उसी वक्त दक्षिण भारत में भाषा के आधार पर अलग आंध्र प्रदेश की मांग को लेकर आंदोलन चलने लगा। स्वाधीनता सेनानी श्रीरामलु आमरण अनशन पर थे। उनकी मौत हो गई। आंदोलन भड़क गया। इस आंदोलन ने शांताराम को व्यथित कर दिया। उन्होंने दहेज पर फिल्म बनाने की योजना रोक दी। तय किया कि वो अपना देश के नाम से एक फिल्म बनाएंगे। फिल्म हिंदी और तमिल दोनों भाषा में बनाई जाएगी। उनके मित्रों ने बहुत समझाया कि फिल्म दहेज की योजना को रोककर ‘अपना देश’ बनाने की योजना में लाभ नहीं होगा। उस समय शांताराम धनाभाव से गुजर रहे थे। पैसे के आगे उन्होंने देश को रखा। 

फिल्म अपना देश का पहला दृश्य स्वाधीनता के उत्सव का रखा गया। शांताराम ने इसमें एक डांस सीक्वेंस रखा। जिसमें भारत माता को बेड़ियों में जकड़ा दिखाया गया। भारत माता के आसपास नृत्यांगनाएं और उनके साथी परफार्म कर रहे थे। वो विभिन्न प्रदेशों की पोशाक पहने थे। नृत्य करते करते सबने मिलकर भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कर दिया। अचानक एक व्यक्ति भारत के नक्शे से एक टुकड़ा उठा लेता है। सभी के बीच उसको लेकर झगड़ा शुरु हो जाता है। विभिन्न प्रदेशों के पोशाक पहने लोगों के बीच हो रहे इस झगड़े के दृश्यांकन से शांताराम ये संदेश दे रहे थे कि किस तरह भूमि के टुकड़े को लेकर भारत के लोग आपस में लड़ रहे हैं। झगड़े के बीच उन्होंने भारत माता को दुखी दिखाया था। भारत माता को दुखी देखकर सब फिर से एक होने लगते हैं। जमीन के जिस टुकड़े को लेकर विवाद हो रहा था उसको नक्शे पर सही जगह लगा दिया जाचा है। सब प्रसन्नतापूर्व डांस करने लगते हैं। सब एक हो जाते हैं। शांताराम इस नृत्य के माध्यम से ये संदेश देना चाहते थे कि जमीन के टुकड़े को लेकर आपस में लड़ाई झगड़ा अच्छी बात नहीं है। इससे न केवल भारत माता को दुख पहुंचता है बल्कि देश की एकता कमजोर होती है। शांताराम ने इस नृत्य सीक्वेंस में भारत के नक्शे को लेकर जिस तरह का दृश्यांकन किया गया था, उनके मन में ये आशंका पैदा हो गई थी कि फिल्म पर पाबंदी लग सकती है। मोरार जी देसाई की मदद से फिल्म सेंसर से पास हो गई। 

शांताराम की मुश्किल खत्म नहीं हुई थी। उस समय की प्रमुख पत्रिका फिल्मइंडिया के सपादक बाबूराव पटेल शांताराम की फिल्म के विरोध में थे। उन्होंने सभी राज्य सरकारों को पत्र लिखकर फिल्म पर पाबंदी लगाने की मांग की। उनके पत्र के बाद कई राज्य सरकारों ने रिलीज के पहले शांताराम से फिल्म की एक कापी मांगी। शांताराम थोड़े विचलित हुए। लेकिन उनको अपनी कला पर भरोसा था। दिल्ली में इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले बाबूराव पटेल के दोस्तों ने इसके विरोध में पोस्टर लगाए थे। लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल फिल्म के पक्ष में खड़े हो गए। उन्होंने इसके निर्बाध प्रदर्शन की व्यवस्था कर दी। इन सारे विवाद का फायदा हुआ और फिल्म ने कई जगहों पर सिल्वर जुबली मनाई। 1949 में हिंदी और तमिल में प्रदर्शित इस फिल्म ने देश की एकता और अखंडता को लेकर पूरे देश में एक संदेश दिया था लेकिन अफसोस कि इस देश में भाषा के नाम पर राज्यों का बंटवारा रोका न जा सका। 

Saturday, November 12, 2022

सांप्रदायिकता की शिकार अकादमियां


महारानी वेबसीरीज में एक संवाद है, जैसे ही मुझे लगता है कि मैंने बिहार को समझ लिया है, वैसे ही बिहार एक और झटका देता है। हो सकता है शब्दों में कुछ बदलाव हो लेकिन भाव यही है। इस संवाद में बिहार की जगह अगर वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिख दिया जाए तब भी इस संवाद के अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता दिखेगा। कुछ दिनों पहले की बात है बिहार में उर्दू अनुवादकों को समारोहपूर्वक नियुक्ति पत्र बांटा जा रहा था। मुख्य सचिव ने अपने उद्बोधन में विभाग को कई सुझाव दिए। बारी आई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बोलने की। उन्होंने मुख्य सचिव पर तंज कसते हुए कहा कि प्रवचन तो आपने बहुत अच्छा दिया। आप तो 2007 से मेरे साथ थे। 2008 से ही हम उर्दू अनुवादकों की बहाली (नियुक्ति) के लिए कह रहे हैं लेकिन अबतक नहीं हो पाया है। अभी भी पूरा बहाली नहीं हुआ है। जल्दी से सब पता करके काम पूरा करवाइए। पूरा सभागार पहले ठहाकों से और फिर तालियों से गूंज उठा। वेबसीरीज महारानी के पात्र मिश्रा जी की तर्ज पर बिहार के मुख्य सचिव अमीर सुब्हानी भी सोच रहे होंगे कि जैसे ही उनको लगता है कि वो नीतीश कुमार को समझने लगे हैं तो वो एक झटका देते हैं। प्यार से ही सही लेकिन नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्य सचिव को सार्वजनिक तौर पर झटका तो दे ही दिया।

ठहाकों और तालियों के बीच एक महत्वपूर्ण बात दब सी गई वो ये कि ये समारोह उर्दू के अनुवादकों को नियुक्ति पत्र देने का था। जिसमें नीतीश कुमार ने कहा कि वो 2008 में जिसकी घोषणा की गई थी उसको चौदह साल बाद भी पूरी तरह से संपन्न नहीं किया जा सका। उर्दू को लेकर नीतीश कुमार की चिंता की प्रशंसा की जानी चाहिए। यह अपेक्षा की जाती है कि किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री या उनके अधीन कार्य करनेवाले मंत्रालय या विभाग किसी भी भाषा के साथ भेदभाव नहीं करेंगे। संविधान भी यही कहता है। लेकिन क्या बिहार सरकार इस अपेक्षा को पूरा कर रही है। नीतीश कुमार ने जब तेजस्वी यादव के साथ मिलकर सरकार बनाई तो महागठबंधन की सरकार ने  बिहार की दो और स्थानीय भाषाओं के लिए अकादमियां खोलने की घोषणा की। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि वैशाली के आसपास के जिले में बोली जानेवाली बज्जिका और सीमांचल में बोली जानेवाली सुरजापुरी को संरक्षित और समृद्ध करने के लिए दो नई अकादमियों का गठन किया जाएगा। ये घोषणा स्वागतयोग्य है। उर्दू अनुवादकों की नियुक्ति पत्र वितरण समारोह में मुख्यमंत्री स्वयं कह चुके हैं कि उर्दू को लेकर 2008 में जो घोषणाएं की गई थीं वो अबतक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। तो क्या माना जाए कि इन अकादमियों की घोषणाओं को भी पूरा होने में काफी समय लगेगा। ये कब तक हो पाएगा ये तो भविष्य के गर्भ में है।

नीतीश सरकार ने दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा की लेकिन जो भाषा और सांस्कृतिक अकादमियां बिहार में पहले से चल रही हैं वो लगभग मृतप्राय हैं। बिहार में पहले से भोजपुरी अकादमी, मगही अकादमी, मैथिली अकादमी और संस्कृत अकादमी अस्तित्व में हैं। पटना के शास्त्री नगर इलाके के सरकारी कर्माचरियों के आवासीय फ्लैट्स में इन सभी अकादमियों का कार्यालय है। इन अकादमियों की हालत इतनी खराब है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। इनकी आधारभूत जरूरतें पूरी हो सकें, इतनी व्यवस्था भी बिहार सरकार का शिक्षा विभाग नहीं कर पा रहा है। अकादमियों में इतने कम नियमित कर्मचारी हैं कि किसी नए काम के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। कुछ दिनों पूर्व मगही अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के महत्वपूर्ण कवि रामगोपाल रुद्र से संबंधित सामग्री की तलाश में एक मित्र मगही अकादमी पहुंचे थे। कार्यालय में एक कर्मचारी अकेले बैठा था। कुछ सामग्री मिली लेकिन अकादमी कार्यालय बुरी  हालत में थी। इनकी हालत देखकर ही किसी के मन में ये प्रश्न भी नहीं उठेगा कि इनकी स्थापना किन उद्देश्यों के लिए की गई थी। ये अकादमियां स्थापना के समय निश्चित किए गए उद्देश्यों की पूर्ति में कितनी सफल रहीं। आंकलन तो उन संस्थानों का हो सकता है जो सक्रिय हों और साधन संपन्न हों। संसाधन की कमी वाले संस्थानों के कार्यों का आकलन लगभग असंभव है। अन्य भाषा अकादमियों की बदहाली के बीच दो नई भाषा अकादमियों की घोषणा का कोई अर्थ नहीं है। दूसरी तरफ उर्दू को लेकर पूरी बिहार सरकार सक्रिय नजर आ रही है। मुख्यमंत्री स्वयं प्रदेश के मुख्य सचिव को सार्वजनिक रूप से सभी बहालियां जल्द करने के लिए कह रहे हैं। क्या अन्य अकादमियां भाषाई सांप्रदायिकता का शिकार हो रही हैं।    

समग्रता में बिहार के कला और संस्कृति के परिदृश्य को देखा जाए तो उसको लेकर शासन के स्तर पर एक उदासीनता नजर आती है। भाषा अकादमियों के अलावा शिक्षा विभाग के अंतर्गत बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का संचालन भी होता है। इन दोनों संस्थाओं का बेहद समृद्ध इतिहास रहा है। यहां से अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था लेकिन अब उन पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। इन दोनों संस्थाओं का कार्यालय ऐसी जगह पर है जहां से शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी हर दिन गुजरते हैं लेकिन इनकी बदहाली पर किसी की नजर नहीं जाती है या देखकर अनदेखा किया जाता है। अगर ये दोनों संस्थाएं सिर्फ पूर्व प्रकाशित पुस्तकों का प्रकाशन कर दें तो उनकी बिक्री से ही आगे की योजनाओँ पर काम करने लायक धन मिलने की संभावना बन सकती है। संस्कृति विभाग के अंतर्गत बिहार संगीत नाटक अकादमी और बिहार ललित कला अकादमी का संचालन होता है। ये दोनों संस्थाओं में लंबे समय से न तो अध्यक्ष हैं और न ही उपाध्यक्ष। प्रविधान है कि दोनों संस्थाओं में एक अध्यक्ष और दो उपाध्यक्ष को बिहार सरकार नामित करेगी। सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी विभाग के अधिकारियों के पास है। ऐसी स्थिति में इन संस्थाओं के क्रियाकलाप लगभग ठप हैं। बिहार में एक और अनूठी घटना हुई। पटना में एक हिंदी भवन बना, लोगों की उम्मीदें जगीं कि वहां हिंदी के प्रोन्नयन को लेकर कार्य हुआ करेंगे। लेकिन पहले वहां एक मैनेजमेंट संस्थान और अब जिलाधिकारी का कार्यालय चल रहा है।    

बिहार रचनात्मक रूप से बेहद उर्वर प्रदेश है। पहले भी और अब भी प्रदेश के कई लेखकों की राष्ट्रीय ख्याति रही है। रेणु से लेकर दिनकर तक, रामवृक्ष बेनीपुरी, शिवपूजन सहाय से लेकर उषाकिरण खान तक। वर्तमान में भी कई लेखक रचनात्मक रूप से खूब सक्रिय हैं। इन रचनाकारों और कलाकारों के साथ मिल कर ये भाषा संस्थान प्रदेश के गौरव को और विस्तार दे सकते थे लेकिन अफसोस कि शासन के स्तर पर इनपर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है। जिस तरह से उर्दू को लेकर नीतीश सरकार उत्साहित दिखाई देती है और उसके विस्तार के लिए योजनाएं बन रही है, नियुक्तियां हो रही हैं उस अनुपात में सरकार का ध्यान न तो मैथिली, न मगही और न ही भोजपुरी अकादमियों की ओर जा रहा है। अगर इन चार भाषा अकादमियों को कुछ स्थायी कर्मचारी भी मिल जाते तो इनका दैनंदिन कार्य सुचारू रूप से चल पाता। 2015 में पुरस्कार वापसी का जो प्रपंच रचा गया था, उसके कर्ताधर्ता बिहार की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि फिर से विश्व कविता समारोह जैसे किसी आयोजन की रचना हो जाए और कोई अशोक वाजपेयी उसके आयोजन के लिए आगे न आ जाएं। करोड़ों का बजट आवंटन हो और कला संस्कृति के नाम पर मेला लगे।   

Saturday, November 5, 2022

हिंदी पर अदालत का महत्वपूर्ण निर्णय


कुछ दिनों पहले दिल्ली के पटियाला हाउस स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने हिंदी को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर किसी भी पक्ष से अदालत के सामने अनुरोध आता है कि साक्ष्य या किसी अन्य कार्यवाही को हिंदी में दर्ज किया जाए तो राष्ट्रीय राजधानी की अदालतें ऐसा करने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य हैं। प्रधान जिला न्यायाधीश ने अपने में यह भी कहा कि, यह समझ में नहीं आता कि विद्वान मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट को किस लाजिस्टिक समस्या से परेशानी है। गवाहों के बयान कंप्यूटर पर दर्ज किए जा सकते हैं। जिसके लिए स्टेनोग्राफर के पास हिंदी फांट होता है। अगर स्टेनोग्राफर हिंदी टाइपिंग नहीं जानता है तो हिंदी टाइप करनेवाले स्टेनोग्राफर के लिए अनुरोध किया जा सकता है। उनकी व्यवस्था की जा सकती है। उन्होंने इससे भी एक कदम आगे जाकर अपने आदेश में कहा कि अगर हिंदी में टाइप करनेवाला स्टेनोग्राफर उपलब्ध नहीं हो सकता है तो मजिस्ट्रेट खुद या अदालत के कर्मचारियों की मदद से गवाहों के बयान हिंदी में दर्ज कर सकते हैं। उन्होंने अपने निर्णय में कानूनी प्रविधानों का उल्लेख भी किया। हिंदी में साक्ष्य दर्ज करने के लिए पक्षकार के अनुरोध को अस्वीकार करना आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 272 और दिल्ली उच्च न्यायालय के नियमों का उल्लंघन होगा। दिल्ली उच्च न्यायालय का नियम है कि देवनागरी लिपि में हिंदी दिल्ली उच्च न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालयों की भाषा होगी। 

इस निर्णय की पृष्ठभूमि ये है कि दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में एक केस में चल रहा था। जिसमें एक पक्ष ने मजिस्ट्रेट से अनुरोध किया था कि गवाहों से बहस के दौरान सवाल हिंदी में पूछे जाएं और उनके उत्तर भी हिंदी में ही दर्ज किए जाएं। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने हिंदी में प्रश्न उत्तर और उसको हिंदी में ही दर्ज करने की याचिका को खारिज कर दिया था। खारिज करते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने कहा था कि अदालत में इससे संबंधित सुविधा नहीं है। इस कारण उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अपनी याचिका के खारिज होने के बाद गुलशन पाहूजा नाम के व्यक्ति ने इस फैसले के विरुद्ध जिला और सत्र न्यायाधीश की अदालत में अपील की थी। जहां जिला और सत्र न्यायाधीश ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के निर्णय को निरस्त कर दिया। इस निर्णय की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उतनी नहीं हो पाई। इसमें जिस तरह से कहा गया कि संसाधन की कमी या अनुपलब्धता की स्थिति में मजिस्ट्रेट को ये प्रयास करना होगा कि गवाहों के बयान या साक्ष्य हिंदी में दर्ज किए जा सकें। यह निर्णय मजिस्ट्रेट और जज की जिम्मेदारी को भी स्पष्ट रूप से व्याख्यित करने वाला है । आज जब हिंदी को लेकर अकारण राजनीति की जा रही है वैसे में इस तरह के अदालती निर्णय भारतीय भाषाओं में न्याय की दिशा में बढ़नेवाले कदम को शक्ति देनावाला है। दिल्ली उच्च न्यायालय की अधीनस्थ अदालतों में समय समय पर हिंदी के प्रयोग को लेकर विभिन्न प्रकार की पहल की जाती रही है। कुछ वर्षों पूर्व दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने भी हिंदी को लेकर एक पहल की थी और इस तरह का प्रविधान किया गया था कि अदालत के विभिन्न विभागों के बीच लिखित संवाद हिंदी में हो। 

निचली अदालतों में अंग्रेजी के प्रयोग को देखकर कुछ वर्षों पूर्व की एक घटना याद आती है। गाजियाबाद की एक हाउसिंग सोसाइटी में नया-नया रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन बना था। वहां के नोटिस बोर्ड की पर बाहर से सोसाइटी के फ्लैट्स में काम करने आनेवाली घरेलू सहायिकाओं के लिए हर दिन अंग्रेजी में कोई न कोई सूचना लगी होती थी। उसकी पहली पंक्ति होती थी, आल मेड्स आर रिक्वेस्टेड टू...(सभी सहायिकाओं से अनुरोध है कि...)। उसके बाद जो भी दिशा निर्देश होते थे वो अंग्रेजी में लिखकर नोटिस बोर्ड पर चिपका दिए जाते थे। कोई भी सहायिका उसका पालन नहीं करती थी। रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के पदाधिकारियों के पास शिकायत आती थी। वो घरेलू सहायिकाओं से बात करते थे तो फिर नियमों का पालन आरंभ हो जाता था। फिर कोई नया निर्देश और फिर अंग्रेजी में नोटिस और फिर उसका अनुपालन नहीं होता था। रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष बहुत परेशान थे कि इस समस्या का हल कैसे निकले। अचानक एक दिन एक बुजुर्ग महिला ने अध्यक्ष महोदय को परेशान देखकर उनकी परेशानी का कारण जानना चाहा। उन्होंने जब कारण बताया तो बुजुर्ग महिला ने उनसे पूछा कि जिनके लिए नोटिस लगाए जाते हैं क्या वो अंग्रेजी जानती हैं? अध्यक्ष को इस प्रश्न से ही अपनी समस्या का हल मिल गया। उसके बाद सभी नोटिस हिंदी में लगने लगीं। उन नोटिसों को सुरक्षा गार्ड भी पढ़ लेते थे। कुछ घरेलू सहायिकाएं भी पढ़ लेती थीं। आपस में उनकी चर्चा हो जाती थी और अनुपालन भी हो जाता था। हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। जिनको न्याय चाहिए उनको अंग्रेजी नहीं आती और जिनको न्याय देना है वो अंग्रेजी में ही सारी कार्यवाही करते हैं।  

न्याय विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार काफी पहले से ही मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के उच्च न्यायालयों में हिंदी में कार्यवाही और निर्णयों की अनुमति है। जब तमिलनाडू सरकार ने तमिल में, गुजरात सरकार ने गुजराती में, छत्तीसगढ़ सरकार ने हिंदी में, बंगाल सरकार ने बंगाली में और कर्नाटक सरकार ने कन्नड में अपने से संबंधित हाईकोर्ट की कार्यवाही का अनुरोध किया तो उनको केंद्र सरकार की अनुमति नहीं मिल पाई। दरअसल 1965 की कैबिनेट कमेटी का एक निर्णय है कि अगर इस तरह का कोई अनुरोध केंद्र सरकार के पास आता है तो सरकार को उसपर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश की राय लेनी होगी। केंद्र सरकार ने इन राज्यों के प्रस्ताव के आलोक में, 1965 के कैबिनेट के फैसले के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश से उनकी राय मांगी। 2012 में उस समय के मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार को बताया कि पूरी अदालत ने राज्यों के प्रस्ताव पर विचार किया और इसको स्वीकार नहीं करने का निर्णय लिया। उसके बाद कई बार इन राज्यों के प्रतिनिधियों ने संसद में भी इस प्रश्न को उठाया लेकिन अबतक कोई निर्णय नहीं हो पाया और अंग्रेजी में ही कार्यवाही चल रही है। न्याय के आकांक्षी को उसकी भाषा में न्याय नहीं मिल पा रहा है। इसका प्रयास किया जाना चाहिए कि कम से कम देशभर की निचली अदालतों में स्थानीय भारतीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया चले। गवाहों के बयान, साक्ष्य आदि स्थानीय भारतीय भाषा में हो सकें। इससे न्यायिक प्रक्रिया सुदृढ़ होगी और इसमें नागरिकों की भागीदारी बढ़ेगी।  

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता की बात पर और गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली राजभाषा समिति की राष्ट्रपति को सौंपी गई रिपोर्ट को लेकर देशभर में एक भ्रम का वातावरण बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार गैर हिंदी भाषी प्रदेशों पर हिंदी थोपना चाहती है। राजभाषा समिति की रिपोर्ट में किस तरह के सुझाव दिए गए हैं वो अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं। बावजूद इसके अंग्रेजी के पैराकार छाती कूटने में लगे हैं कि सरकार आईआईटी, आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहती है। अभी हाल ही में  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने भी हिंदी थोपने के विरोध की घोषणा की। यह स्पष्ट नहीं है कि कहां हिंदी थोपी जा रही है। भाषा पर राजनीति करने और अंग्रेजी कायम रखने से बेहतर है कि भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता मिले। भारतीय भाषाओं में शिक्षा मिले, भारतीय भाषाओं में न्याय मिले, भारतीय भाषा ही शासन प्रशासन की भाषा हो।