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Monday, May 3, 2010

स्त्री के विद्रोह की कहानियां

बात अस्सी के शुरुआती दशक की है । उस वक्त मैं बिहार के जमालपुर के रेलवे हाई स्कूल का छात्र था । यह वो दौर था जब टेलीविजन सूदूर शहरी और ग्रामीण इलाकों में नहीं पहुंच पाया था । खबरों के लिए हमलोग आकाशवाणी के पटना और दिल्ली केंद्र पर निर्भर रहते थे । शाम साढे़ सात बजे पटना आकाशवाणी से प्रादेशिक समाचार का प्रसारण होता था, जिसे हमारे घर में नियमित सुना जाता था । इसके अलावा रात पौने नौ बजे राष्ट्रीय समाचार आता था जिसे सुनकर हमलोग सो जाते थे । लेकिन आकाशवाणी से ज्यादा हमारा भरोसा उस वक्त बीबीसी की हिंदी प्रसारण सेवा पर था । वक्त ठीक से याद नहीं है लेकिन अगर मेरा स्मृति ठीक है तो शाम सात बजकर चालीस मिनट पर बीबीसी से हिंदी में खबरों का प्रसारण होता था । ओंकार नाथ श्रीवास्तव, रमा पांडे आदि की आवाज में खबरों का जब प्रसारण होता था तो उनके बोलने के अंदाज से खबरों में गहराई आ जाती थी । आकाशवाणी के समाचार वाचको की आवाज भी बेहद अच्छी और डिक्शन एकदम साफ होता था लेकिन बीबीसी में प्रसारण का तरीका और बैकग्राउंड म्यूजिक से प्रस्तुतिकरण जानदार हो जाती थी । तो हमारी शाम खबरों को सुनकर बीता करता था ।

बीबीसी की हिंदी सेवा से एक और रोचक याद जुड़ी हुई है । साल के अंत और नए वर्ष के शुरुआत में प्रसारण के वक्त समाचारवाचक ये ऐलान करता था कि अगर आपको बीबीसी का कैलेंडर चाहिए तो अमिक पते पर हमें लिखें । ये दिल्ली का पता होता था और पोस्ट बॉक्स नंबर लिखना होता था । मैंने भी जब इसको सुना तो सोचा क्यों ना एक पोस्टकार्ड लिख दिया जाए । उस वक्त पोस्टकार्ड पांच पैसे का आता था । मैंने बेहद विनम्रता से कैलेंडर भेजने का अनुरोध पत्र बीबीसी के बताए पते पर भेज दिया । लगभग दस दिनों के बाद ए फोर साइज के एक खूबसूरत लिफाफा मेरे पते पर आया जिसमें प्रेषक की जगह बीबीसी हिंदी सेवा का नाम लिखा था । जब मैं स्कूल से लौटा तो अपने कमरे में वो लिफाफा देखकर बेहद खुश हुआ । जल्दबाजी में उसे खोला तो एकदम चमकदार कागज पर एक पन्ने का कैलेंडर था । उपर एक ग्रुप फोटो था जिसमें बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़े लोगों की तस्वीर थी । लगभग तीन दशक बाद स्मृति में अब दो ही नाम हैं- ओंकार नाथ श्रीवास्तव और रमा पांडे । तत्काल लिफाफे से निकालकर उसे स्टडी टेबल के सामने लगा लिया । लेकिन फिर एक खुराफात सूझा कि अगर एक पांच पैसे के पोस्टकॉर्ड भेजने पर इतने खूबसूरत कागज पर छपा कैलेंडर मिल सकता है तो क्यों ना कुछ और अनुरोध पत्र भेजकर और कैलेंडर मंगवा लिए जाएं और दोस्तों में बांटकर रौब गालिब किया जाए । फिर तो मुझे याद है कि अपने परिवार के हर व्यक्ति के नाम से अनुरोध पत्र बीबीसी हिंदी सेवा को भेज दिया । चूंकि अनुरोध पत्र एक साथ नहीं भेजकर थोड़े अंतराल पर भेजा था इसलिए उसी हिसाब से कुछ अंतराल के बाद कैलेंडर मिलने शुरू हो गए । पहले तो डाकिया भी चौंका कि हर एक दो दिन बाद लंदन के पते से मेरे घर क्या आ रहा है । दबी जुबान से वो ये दरियाफ्त भी करने की कोशिश करने लगा कि इस लिफाफे में होता क्या है । एक दिन मैंने उसकी जिज्ञासा खत्म करते हुए उसके सामने ही लिफाफा कोलकर उपहार स्वरूप वो कैलेंडर उसे ही दे दिया । अब तो ये हर साल का नियम सा बन गया था ।

कैलेंडर में चश्मा लगाए ओंकार नाथ श्रीवास्तव और बेहद खूबसूरत रमा पांडे अपने बोलने के अंदाज की वजह से भी याद हैं । अभी जब मित्र जयप्रकाश पांडे ने बताया कि रमा पांडे के कथा संग्रह की डीवीडी लंदन के नेहरू ऑडिटोरियम में जारी हुई है तो मैं चौंका, कहानी संग्रह की डीवीडी । बातों –बातों में ही जय प्रकाश जी ने यह भी बताया कि रमा पांडे गायिका इला अरुण और पियूष पांडे की बहन हैं । बात आई गई हो गई । लेकिन अभी कुछ दिनों पहले किसी रेफरेंस के लिए एक किताब ढूंढने में जुटा था तो अचानक फैसले पर नजर गई । लेखिका रमा पांडे थी और दिल्ली के मंजुलिका प्रकाशन से छपी थी किताब । उसे निकालकर अलग रख लिया । फिर उसे पढ़ना शुरू किया । स्त्री विमर्श के इस दौर में पिछले वर्ष प्रकाशित इस किताब की साहित्य जगत में नोटिस ली जानी थी लेकिन अफसोस कि हिंदी के कर्ताधर्ताओं की नजर इस अहम किताब पर नहीं गई । मुस्लिम महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियां इनके संघर्ष और वयवस्था के खिलाफ उठ खडे़ होने की कहानी है । रमा पांडे बहुआयामी प्रतिभा की धनी हैं । वो देश की पहली महिला प्रोड्यूसर हैं जिन्होंने लंबे अरसे तक दूरदर्शन के लिए काम करते हुए अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी ।

जैसा कि मैंने उपर बताया कि फैसले देश की मुस्लिम महिलाओं की संघर्ष की दास्तां है । इसकी एक कहानी दौड़ती हिरणी की नायिका रमा पांडे की दोस्त है । रमा पांडे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में राबिया उनकी दोस्त थी और बेहद प्रतिभाशली एथलीट थी । लेकिन नवी कक्षा में जाते ही राबिया के परिवारवालों ने उसके खेल में भाग लेने पर इसलिए रोक लगा दी क्योंकि वो राबिया का निकाह करना चाहते थे । रमा पांडे तो जब इस बात का पता चला तो उसने राबिया की अम्मी से ये बात करने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ नाकामी लगी । राबिया के परिवारवाले टस से मस होने को तैयार नहीं थे और परिवार के दबाव में राबिया कोई भी कदम उठाने को तैयार नहीं थी । जब रमा ने उसे अपने पांव पर खड़े होने की सलाह दी तो उसका जबाव था – जब दौड़ नहीं सकती तो अपने पांव पर क्या खडी होउंगी । लेकिन फिर भी राबिया ने हौसला नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय खेल में भाग लिया । कई वर्षों तक रमा और राबिया नहीं मिले । लेकिन वर्षों बाद जब वो मिले तो राबिया की उम्र बयालीस की हो चुकी थी और उसने शादी नहीं करने का फैसला कर लिया था । यह एक ऐसी लड़की का विद्रोह था जो एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से आती थी । लेखिका पर इस बात का गहरा असर पड़ा और दौड़ती हिरणी इसी असर के परिणामस्वरूप सामने आया । फैसले में और भी कई कहानियां हैं जिसे लेखिका ने बेहद करीब से इपनी आंखों के सामने घटते हुए देखा है । चाहे वो उनके खुद के रिश्तेदार कू पैरा-जंपर से एक स्कूल के हेडमिस्ट्रेस बनने की कहानी हो या फिर हैदराबाद की शाइस्ता की कहानी हो । फैसले संग्रह की अमूनन सारी कहानियां यथार्थ का चित्रण हैं । इस कहानी संग्रह में जो एक बात रेखांकित की जा सकती है वो है नायिकाओं का समाज और वयवस्था के प्रति विद्रोह । रमा पांडे की भाषा में शास्त्रीयता नहीं है जो इसे बोझिल बनाने की बजाए पठनीय बनाती है । स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों के लिए रमा की कहानियां एक चुनौती की तरह हैं और मुजे लगता है कि देर सबेर उन्हें इस संग्रह का नोटिस लेना ही पड़ेगा ।

2 comments:

शंकर शरण said...

पूर्वार्ध में रचनात्मक साहित्य सी रोचकता है। पठनीय।

शंकर शरण said...

पूर्वार्ध में रचनात्मक साहित्य सी रोचकता है। पठनीय।