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Wednesday, July 27, 2011

साहित्य की क्लियोपेट्राएं

विश्व राजनीति के पटल पर क्लियोपेट्रा एक ऐसा नाम है जिसने अपनी खूबसूरती और अपने शरीर का इस्तेमाल अपने करियर को बढ़ाने में बेहतरीन तरीके से किया । उसने सेक्स पॉवर को पहचानते हुए खुलकर उसका उपयोग किया और उसे अपनी सफलता की सीढ़ी बना कर बुलंदी पर पहुंची । उसने सत्ता और शक्ति हासिल करने के लिए अपने भाई से ही विवाह किया और मिस्त्र की सत्ता हासिल की । लेकिन भाई से मनमुटाव के चलते उसे देश छोड़कर निर्वासित होना पड़ा । निर्वासन के बाद उसने सीजर को अपनी खूबसूरती के जाल में फंसाया और ना केवल उसके साथ सत्ता का सुख हासिल किया बल्कि कई सालों तक तानाशाह की तरह का जीवन भी जिया। जब सीजर की हत्या कर दी गई तो क्लियोपेट्रा ने पूर्वी रोम के मॉर्क एंटोनी को अपने सम्मोहन के जाल में फंसाकर अकूत संपत्ति हासिल की। क्लियोपेट्रा बहुत खूबसूरत नहीं थी लेकिन वो इस बात को जानती थी किस तरह से अपने शरीर का इस्तेमाल कर मर्दों को गुलाम बनाया जा सकता है । उसे उस हुनर का पता था जिसके बल पर वो बड़े-बड़े लोगों को अपने मोहजाल में फंसा सकती थी । साफ है कि क्लेयोपेट्रा ने सेक्स और अपने शरीर को एक कमॉडिटी की तरह अपने हक में सता हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया । उसने सेक्स को अंतराष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा भी बना दिया था । विश्व परिदृश्य में सिर्फ क्लियोपेट्रा ही नहीं बल्कि कई और महिलाएं हैं जिसने अपने महिला होने का, अपने देह का इस्तेमाल करके , जबरदस्त रूप से फायदा उठाया और सफलता हासिल की । रूस की महान साम्राज्ञी कैथरीन ने सत्ता हासिल करने के लिए अपने पति का कत्ल किया और फिर अपने आशिक के साथ देश पर लगभग तीस साल तक शासन किया । उसने भी सेक्स और सेक्सुअल पॉवर को सत्ता से जोड़कर अपनी स्थिति मजबूत की । उसके कितने आशिक थे या फिर उसने अपने कितने सुरक्षा गार्ड के साथ शारीरिक संबंध बनाए यह कहना बेहद कठिन है । कहनेवाले तो यहां तक कहते हैं कि अपने प्रेमी से शारीरिक संबंध बनाने के पहले वो नियमित तौर पर अपने एक सुरक्षाकर्मी तो चुनती थी और उसके साथ एकांत में काफी देरतक रोमांस करने के बाद अपने प्रेमी के पास पहुंचकर सेक्स करती थी । इस तरह से उसने कई सुरक्षाकर्मियों के साथ एक ऐसा रिश्ता बना लिया था जिसी काट नामुमकिन था । इस तरह की महिलाओं की लिस्ट और लंबी हो सकती है ।
ऐसा नहीं है कि इस तरह की महिलाएं, जो अपनी देह को सत्ता हासिल करने का जरिया बनाती हैं, सिर्फ विदेशों या पश्चिमी देशों में ही हैं । इस तरह के कई उदाहरण हमारे देश में भी मिल जाएंगे लेकिन हमारे यहां सेक्स या फिर इस तरह के संबंधों पर बातें तो खूब की जाती हैं लेकिन उसके बारे में लिखना गुनाह माना जाता है । अपने राजनेताओं और उनकी महिला मित्र के बारे में सत्ता के गलियारे में खूब चर्चा होती है लेकिन उसके बारे में सार्वजनिक रूप से कोई बहस नहीं होती । हमारे यहां यह समझा जाता है कि यह उनका वयक्तिगत जीवन है जिसमें झांकना उनकी निजता के अधिकार का हनन होगा । लेकिन उस वक्त हम भूल जाते हैं कि जिस वयक्ति का जीवन ही सार्वजनिक हो गया है उसका निजी कुछ नहीं रह जाता । गांधी जी भी कहा करते थे कि सार्वजनिक जीवन व्यतीत करनेवालों का निजी कुछ भी नहीं रह जाता । खैर यह एक अलग विषय है जिसपर विस्तार से बहस की जा सकती है ।
राजनीति के अलावा अगर हम हिंदी साहित्य की बात करें तो यहां भी आपको कई क्लियोपेट्रा मिल जाएंगी । जिन्होंने अपनी देह का इस्तेमाल साहित्य में अपने करियर को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में बखूबी किया । यहां मैं भी किसी एक या दो का नाम लेकर नाहक विवाद खड़ा करना नहीं चाहता लेकिन साहित्य के हलके में लोग इस तरह की क्लियोपेट्राओं को बखूबी जानते हैं । हिंदी साहित्य में देह मुक्ति आंदोलन के प्रणेता हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव तो इन क्लियोरेट्राओं से घिरे ही रहे है, कई को तो बढ़ावा भी दिया है (क्षमा सहित ये बात कह रहा हूं,लेकिन पूरा साहित्य जगत उन नामों से वाकिफ है ) । मैं यह नहीं कह रहा राजेन्द्र जी साहित्य के सीजर हैं लेकिन उनके दरबार में समय समय पर इस तरह की एक दो महिला लेखिका हमेशा से रही हैं । कई ने तो, जिनमें कुछ प्रतिभा थी, आगे चलकर लेखन में खूब नाम और यश दोनों कमाया । लेकिन जिनमें प्रतिभा नहीं सिर्फ महात्वाकांक्षा थी वो कुछ समय के लिए हिंदी साहित्य के आकाश पर धूमकेतु की तरह चमककर गायब हो गई। किसी के एक संग्रह आए तो किसी को कोई छोटा मोटा पुरस्कार मिल गया । उनके साहित्य के आकाश पर चमकने के साहित्येत्तर कारण रहे हैं । इन वजहों को राजेन्द्र जी चाहें तो खोल सकते हैं और साहित्य के क्लियोपेट्राओं का नाम भी बता सकते हैं, बता देना भी चाहिए । लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्थितियों और नामों को काल्पनिक रूप देकर वास्तविकता को छुपा दिया उसके बाद उनसे तो यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की जा सकती है कि वो हिंदी साहित्य की क्लियोरेट्राओं का नाम उजागर करें । जानते वो सबकुछ हैं । राजेन्द्र यादव के बाद लोगों की उम्मीद अशोक वाजपेयी से भी हो सकती है लेकिन सार्वजनिक तौर पर अशोक जी की जो छवि है उसमें उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वो हिंदी की इन क्लियोपेट्राओं का नाम लेंगे । अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जानेवाले प्रसिद्ध उपन्यासकार और महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय जिस तरह से छिनाल विवाद में अपना हाथ जला चुके हैं उसके बाद तो उनसे इस स्त्रियों के मामले में कुछ भी अपेक्षा नहीं की जा सकती है ।
हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में अब काफी बदलाव देखा जा सकता है । कई लेखिकाएं तो खुले तौर पर दैहिक उदारवाद की बात करती हैं । बातचीत में जो बिंदासपन और खुलापन है वो उनके स्वभाव में भी देखा जा सकता है । उनके लिए सेक्स अब टैबू नहीं है, देह उनके लिए भी उसकी तरह उपभोग की वस्तु है जिस तरह से मर्दों के लिए । अपने परुष मित्रों के साथ सेक्स संबंध बनाने में उन्हें ना तो कोई एतराज होता है और ना ही झिझक । लेकिन नाम और यश कमाने के लिए जिस तरह से उसका उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है वो चिंता की बात है । हमारे यहां क्लियोपेट्रा अब एक नाम नहीं रही बल्कि यह एक प्रवृत्ति के तौर पर स्थापित हो चुकी है । एक संज्ञा के प्रवृत्ति में बदलने की जो प्रक्रिया है वो चिंता की बात है । कई नवोदित लेखिकाएं इस राह पर चलकर शॉर्टकट में सफलता हासिल करना चाहती हैं जो साहित्य के लिए चिंता की बात है । लेकिन उन लेखिकाओं को शॉर्टकट में सफलता की राह दिखाने के लिए कई कवि मित्र सदैव तत्पर रहते हैं । उन्हें तो तलाश रहती है बस मौके की । मेरा यह कहने का मतलब कतई नहीं है कि साहित्य में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए सभी लेखिकाएं अपने शरीर का इस्तेमाल करती हैं । ना ही मैं स्त्रियों या लेखिकाओं को अपमानित करने के लिए ये लेख लिख रहा हूं । मेरी मंशा उस तरह की लेखिकाओं को हतोत्साहित करने की है जो बगैर किसी प्रतिभा के सिर्फ अपनी देह के बूते हिंदी साहित्य का सारा आकाश झेकना चाहती है ।

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