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Saturday, June 30, 2012

लुगदी साहित्य की दुर्दशा

सूरजमुखी, प्सासी नदी, प्यासे रास्ते, पतझड़ का सावन, झील के उस पार, शर्मीली, चिंगारी, पाले खां, चैंबूर का दादा, लाल निशान, नरक का जल्लाद, पिशाच का प्यार, वर्दी वाला गुंडा ये कुछ ऐसे नाम थे जो साठ के दशक से लेकर अस्सी के दशक हिंदी पट्टी में लोकप्रियता का पैमाना हुआ करता था । ये नाम थे उन उपन्यासों के जिनको रानू, गुलशन नंदा, सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लेखक लिखा करते थे । इन उपन्यासों की बिक्री सबसे ज्यादा रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के बुक स्टॉल से हुआ करती थी । उस दौर में इन किताबों की इतनी धूम रहती थी कि लेखकों को अग्रिम रॉयल्टी दी जाती थी । उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग होती थी । कई छोटे शहरों के रेलवे स्टेशन पर तो इन उपन्यासों को छुपाकर रखा जाता था और दुकानदार अपने खास ग्राहकों को काउंटर के नीचे से निकालकर देते थे । लेकिन जब से नब्बे के दशक में टीवी ने दबे पांव लोगों के घरों में दस्तक दी तो उसका सबसे ज्यादा असर इन उपन्यासों पर ही पड़ा । धीरे धीरे टीवी ने हिंदी मध्यवर्गीय पाठकों औप परिवारों पर अपना कब्जा कर लिया और उनकी उस झुधा को शांत करने लगे जिनकी पूर्ति उक्त इपन्यास किया करते थे । कुछ चर्चित टीवी कार्यक्रमों के नाम भी इस तरह के ही होने लगे जुर्म, हत्यारा कौन, सनसनी, सीआईडी, सास बहू और साजिश, बनेगी अपनी बात, तारा आदि । क्राइम और सेक्स की जो भूख लुगदी साहित्य से मिटती थी उसे अब टीवी पूरा करने लग गया था । लिहाजा धीरे-धीरे इस तरह के उपन्यासों की मांग कम होती चली गई और अब तो यह इंडस्ट्री मरणासन्न है ।

अगर हम थोड़ा पीछे जाएं तो हम मान सकते हैं कि हिंदी में पल्प फिक्शन की शुरुआत इब्ने सफी के उपन्यासों से हुई । इब्ने सफी, इब्ने सईद और राही मासूम रजा तीनों दोस्त थे । एक दिन बातचीत में उनके बीच जासीसी उपन्यासों पर चर्चा हो रही थी । बातों बातों में रजा ने कहा कि बगैर सेक्स का तड़का डाले जासूसी उपन्यास लोकप्रिय नहीं हो सकता है । इब्ने सफी ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और बगैर सेक्स प्रसंग के पहला उपन्यास लिखा । वह उपन्यास जबरदस्त हिट हुआ । फिर तो इब्ने सफी ने जासूसी उपन्यासों की दुनिया में तहलका मचा दिया । इब्ने सफी के इमरान सीरीज के उपन्यासों की बदौलत उनके मित्र अली अब्बास हुसैनी ने एक प्रकाशन गृह खोल लिया । अभी कुछ दिनों पहले एक बार फिर से हॉर्पर कॉलिंस ने इब्ने सफी के उपन्यासों को प्रकाशित करना शुरू किया है । उसी वक्त के आसपास इलाहाबाद से जासूसी पंजा नाम की पत्रिका में अकरम इलाहाबादी भी एक जासूसी सीरीज लिखा करते थे जो उन दिनों बेहद लोकप्रिय था । जासूसी पंजा की लोकप्रियता के मद्देनजर डायमंड पॉकेट बु्क्स और हिंद पॉकेट बुक्स ने एक रुपए की सीरीज की किताबें छापनी शुरू की । लेकिन इस तरह के रहस्य और रोमांच से भरे कथानक वाले उपन्यासों की धूम मची साठ के दशक के बाद जब जब गुलशन नंदा, रानू, सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, कर्नल रंजीत और मनोज जैसे लेखकों ने इस साहित्य को एक नई उंचाई तक पहुंचा दिया । रानू और गुलशन नंदा तो हिंदी पट्टी के तकरीबन हर घर तक पहुंच रहे थे । रानू और गुलशन नंदा महिलाओं और नए नए जवान हुए कॉलेज छात्र-छात्राओ की पहली पसंद हुआ करते थे । गुलशन नंदा तो इतने लोकप्रियय हुए कि उनके उपन्यास- झील के उस पार, शर्मीली और चिंगारी पर फिल्म भी बनी जो हिट रही । गुलशन नंदा ने जब 1962 में अपना पहला उपन्यास लिखा तो उसकी दस हजार प्रतियां छपी । ये प्रतियां बाजार में आते ही खत्म हो गई और मांग के मद्देनजर दो लाख प्रतियां छपवानी पड़ी थी । पहले उपन्यास  की सफलता से उत्साहित प्रकाशक ने फिर तो गुलशन नंदा के उपन्यासों का पहला संस्करण ही पांच लाख का छपवाना शुरू कर दिया । जो कि ऐताहिसक आंकड़ा था । उस दौर में उन उपन्यासों की कीमत पांच रुपय़े हुआ करती थी और सारा खर्चा काटकर भी प्रकाशक को हर प्रति पर एक रुपए का मुनाफा होता था जो कि उस वक्त के लिहाज से बेहतरीन मुनाफा माना जाता था ।  इस तरह के उपन्यासों की मांग यात्राओं के दौरान बेहद ज्यादा होती थी । छोटी और लंबी यात्रा करनेवाले पांच से दस रुपए तक का यह उपन्यास खरीद लेते थे । इनकी लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सुरेन्द्र मोहन पाठक का उपन्यास पैंसठ लाख की डकैती की अबतक पच्चीस लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं । भले ही चालीस साल में ये आंकड़ा हासिल हुआ हो लेकिन हिंदी के लिए यह स्थिति अकल्पनीय है । इस तरह के उपन्यासों की लोकप्रियता को देखते हुए कई घोस्ट राइटर्स ने भी पैसे की खातिर लिखना शुरू कर दिया । मनोज ऐसा ही काल्पनिक नाम था जिसकी आड़ में कई लेखक लिखा करते थे ।

जासूसी और हल्की रोमांटिक कथाओं का बड़ा बाजार बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और कुछ कुछ राजस्थान के अलावा दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर भी थे । इन रोमांटिक उपन्यासों में जिस तरह का हल्का फुल्का सेक्स प्रसंग होता था उसने भी इन्हें लोकप्रिय बनाया ।  सा सत्तर के दशक में भारतीय समाज में सेक्स प्रसंगों को लेकर इस तरह का खुलापन नहीं था । लोग बाग घर परिवार में भी सेक्स प्रसंगों के बारे में बातें करते हुए कतराते थे । घर की लड़कियां और महिलाएं तो इस बारे में सिर्फ सोचकर ही रह जाती थी । उस माहौल में रोमांस और सेक्स प्रसंगों की चर्चा करके लेखकों ने अपनी कृतियों को पठनीय बना दिया था । कई घरों में तो किशोरवय के लड़के लड़कियां रानू और गुलशन नंदा को अपने अभिभावकों से छिपकर पढ़ते थे । उस दौर में इन उपन्यासों के लोकप्रिय होने के सामाजिक कारण थे । लेकिन जब नब्बे के दशक में टीवी आया तो रोमांस और सेक्स प्रसंगों पर सीरियल्स में खुलकर बातें होने लगी थी । इससे गुलशन नंदा और रानू के उपन्यासों के पाठक कम होने लगे । टीवी में इन प्रसंगों की जैसे जैसे बढ़ोतरी हुई वैसे वैसे पल्प फिक्शन खत्म होने लगा । दर्शक में तब्दील हो चुके पाठकों को टीवी में उपन्यास से ज्यादा मसाला मिलने लगा । सास बहू सीरियल्स के रूप में महिलाओं को एक नया स्वाद मिला और वो अपने आप को उन पात्रों से आईडेंटिफाई करने लगी । हम कह सकते हैं कि पल्प फिक्शन या लुगदी साहित्य का आखिरी लोकप्रिय उपन्यास वर्दी वाला गुंडा था । इसके लेखक वेद प्रकाश शर्मा हैं । राजीव गांधी की हत्या को केंद्र में रखकर लिखे गए इस उपन्यास के लिए उत्तर भारत के शहरों में होर्डिंग लगे थे, एडवांस बुकिंग हुई थी । नतीजा यह हुआ कि जब यह उपन्यास बाजार में आया तो आते ही खत्म हो गया । रीप्रिंट पर रीप्रिंट करने पड़े । वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का बाजार अब भी थोडा़ बहुत बचा है । लेकिन वो स्वर्णिम दौर खत्म हो गया लगता है । इसके साथ ही खत्म हो गया मेरठ से चलनेवाला यह कारोबार । हिंदी के ये उपन्यास मेरठ से छपा करते थे और वहीं से देशभर में भेजे जाते थे । टेलीविजन ने भारत में इस लोकप्रिय विधा को लगभग समाप्त कर दिया कई लोगों को इस बात पर आपत्ति है लेकिन तमाम आपत्तियों और तर्कों के बावजूद इतना तो तय है कि टीवी ने इनकी लोकप्रियता को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया । हाल के दिनों में जिस तरह से कुछ नए प्रकाशकों ने इन पुराने उपन्यासों को छापकर बेचने की योजना बनाई है उससे एक बार इसके फिर से जी उठने की उम्मीद जगी है । उम्मीदें कितनी कामयाब होती है यह अभी समय के गर्भ में हैं ।

5 comments:

veethika said...

पढ़ कर अच्छा लगा।
जमशेदपुर में भी कोई स्टॉल वाला साहित्यिक पत्रिका नहीं रखना चाहता है। सो मैंने यह बीड़ा उठाया हुआ है। मेरे पास कुछ पत्रिकाओं की १५-२० प्रतियाँ आती हैं और साहित्य प्रेमी ले जाते हैं। अगर स्टॉल पर होतीं तो शायद और अधिक लोग लेते पढ़ते।

veethika said...

पढ़ कर अच्छा लगा।
जमशेदपुर में भी कोई स्टॉल वाला साहित्यिक पत्रिका नहीं रखना चाहता है। सो मैंने यह बीड़ा उठाया हुआ है। मेरे पास कुछ पत्रिकाओं की १५-२० प्रतियाँ आती हैं और साहित्य प्रेमी ले जाते हैं। अगर स्टॉल पर होतीं तो शायद और अधिक लोग लेते पढ़ते।

veethika said...

पढ़ कर अच्छा लगा।
जमशेदपुर में भी कोई स्टॉल वाला साहित्यिक पत्रिका नहीं रखना चाहता है। सो मैंने यह बीड़ा उठाया हुआ है। मेरे पास कुछ पत्रिकाओं की १५-२० प्रतियाँ आती हैं और साहित्य प्रेमी ले जाते हैं। अगर स्टॉल पर होतीं तो शायद और अधिक लोग लेते पढ़ते।

Vikas Nainwal said...

एक अच्छा लेख। पढ़कर अच्छा लगा।

Abhishek kumar Sonu said...

लुगदी साहित्य अनमोल है। कौन कहता है इसका पतन हो गया है और ये मरणासन्न है। लुगदी साहित्य की एक अपनी ही अलग, अद्भुत और बहुत बड़ी दुनिया है । वेड प्रकाश और सुरेन्द्र मोहन पाठक जी को पढ़नेवाओं की अभी भी कमी नहीं है। लोग अभी भी उन्हें बड़े चाव से पढ़ते हैं ।।