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Saturday, June 2, 2012

सियासत का खूनी खेल !

केरल के मार्क्सवादी नेता के एक बयान ने सीपीएम के चेहरे से नकाब हटा दिया है और पूरी पार्टी के कठघरे में खड़ा कर दिया है । केरल के इडुक्की जिला सीपीएम के अध्यक्ष और राज्य कमेटी के सदस्य एम एम मणि ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि उनकी पार्टी राजनैतिक विरोधियों की हत्या करवाने में यकीन रखती है । मणि ने ये बातें खुलेआम एक रैली में की । इस बयान को जोश में होश खो देने वाला बयान बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है क्योंकि मणि ने अपने मरने मारनेवाले बयान के बाद उसके समर्थन में उदाहरण देकर उसी सही भी ठहराया और कहा कि पार्टी को उन हत्याऔं की जिम्मेदारी लेने से कोई गुरेज भी नहीं है जो उसने करवाई है । पहले तो मणि ने खुलेआम ये कहा कि हमें मरने और मार डालने की आदत है । इसलिए उनकी पार्टी सीपीएम और उसके कार्यकर्ताओं को कोई धमकी ना दे । उन्होंने सरेआम ये ऐलान किया कि जो भी पार्टी के खिलाफ काम करेगा उसे रास्ते से हटा दिया जाएगा । मणि के मुताबिक सीपीएम ने 1982 में तेरह लोगों की सूची बनाई थी जिन्हें कत्ल करना था । इस सूची में से एक को गोली मारकर हत्या कर दी गई । दूसरे की सरेआम पीट-पीट कर हत्या कर दी गई और तीसरे शख्स को तो चाकुओं से गोदकर मार डाला गया । आरोपों को मुताबिक कत्ल किए गए दो लोगो कांग्रेस के कार्यकर्ता थे और एक भारतीय जनता पार्टी के लिए काम करता था । इंतहां तो तब हो गई थी जब इनमें से एक हत्या के चश्मदीद का भी कत्ल हो गया । इन हत्याओं के आरोप उस वक्त भी सीपीएम पर लगे थे । लेकिन उन हत्याओं में पड़ताल कहां तक पहुंची इसका पता ही नहीं चल पाया ।

मणि के इस बयान के बाद केरल समेत देश की राजनीति में भूचाल आ गया है । केरल सीपीएम के ताकतवर नेता पिनयारी विजयन ने इस बयान पर सफाई दी और कहा कि मणि ने सार्वजनिक रूप से बयान देकर गलत किया है और यह पार्टी के स्थापित मानदंडों के खिलाफ है । यहां यह बात गौर करने लायक है कि विजयन ने मणि के बायन को गलत नहीं ठहराया बल्कि सार्वजनिक रूप से बयान देने को गलत करार दिया । तो क्या यह मान लिया जाए कि विजयन की मणि के बयानों से सहमति हैं । केंद्रीय नेतृत्व को ये साफ करना होगा । मणि के इस बयान और विजयन की सफाई को केरल में हाल ही में सीपीएम छोड़कर अपनी पार्टी बनाने वाले टी पी चंद्रशेखरन की हत्या से जोड़कर देखा जाने लगा है । चंद्रशेखरन की हत्या के बाद पिनयारी विजयन के बयान को देखें तो उससे भी हिंसा की इस राजनीति की तस्वीर थोड़ी और साफ होती है । चंद्रशेखरन के कत्ल के बाद विजयन ने कहा था कि वो दलबदलू और विश्वासघाती थे । विजयन ने ये बयान उस वक्त दिय़ा था जब केरल के कद्दावर कम्युनिस्ट नेता वी एस अच्युतानंदन उनको श्रद्धांजली दे रहे थे । पिनयारी विजयन के इस बयान के अपने निहितार्थ हैं जिसको मणि के बयानों ने उजागर कर दिया है । एम एम मणि के बयान को सीपीएम के आला केंद्रीय नेता यह कहकर दबा देने के चक्कर में हैं कि वो पार्टी का एक बहुत छोटा नेता है लिहाजा उसके बयान को पार्टी की विचारधारा नहीं मानी जानी चाहिए । ये सही भी है कि किसी भी ऱाष्ट्रीय पार्टी(अगर सीपीएम अब भी है तो) के एक जिले के अध्यक्ष के बयान को पार्टी की विचारधारा नहीं माना जा सकता है लेकिन अगर उस जिलाध्यक्ष का इतना रुतबा हो कि विधानसभा चुनाव के वक्त अपनी पार्टी के शीर्ष नेता और सूबे के मुख्यमंत्री को प्रचार के लिए अपने इलाके में नहीं आने दे तो उसके रुतबे का अंदाजा लगाया जा सकता है । पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त मणि ने अच्युतानंदन को इडुक्की नहीं आने दिया था । ये है मणि की पार्टी में हैसियत और ताकत । उसके अलावा एम एम मणि पच्चीस साल से ज्यादा वक्त से जिलाध्यक्ष हैं और पार्टी में कोई कार्यकर्ता उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर सकता । क्यों नहीं कर सकता, इसकी वजह मणि ने खुद साफ कर दी है ।

ऐसा नहीं है कि वामपंथी दलों के शासन वाले राज्यों में पहली बार राजनीतिक हिंसा की बात सामने आ रही है । पश्चिम बंगाल में भी दशकों तक मार्क्सवादियों ने राज किया किया लेकिन उनका दामन भी सियासी हत्याओं से दागदार रहा है । ममता बनर्जी की पार्टी के नेता तो उस दौरान पचास हजार से ज्यादा राजनीतिक हत्या का आरोप लगाते रहे हैं । हो सकता है उसमें अतिशोक्ति हो लेकिन तटस्थ विश्लेषकों की मानें तो वामपंथी शासनकाल के दौरान तकरीबन चार हजार राजनैतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई । उन्नीस सौ सतहत्तर से लेकर अब तक पंद्रह सौ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की हत्या हुई और तकरीबन बीस हजार परिवारों को घर छोड़कर भागना पड़ा । तृणमूल कांग्रेस के भी दो हजार कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोप सीपीएम पर लगे। जब ममता बनर्जी सूबे में सत्तारूढ हुई तो कई सीपीएम नेताओं घर के पिछवाड़े में बने गार्डन से नरकंकाल बरामद होने से इन आरोपों को और बल मिला है ।  

दरअसल मणि के बयानों ने पार्टी की एक सचाई को उजागर कर दी । सीपीएम की बुनियाद और विचारधारा का आधार ही हिंसा रहा है । उन्नीस सौ साठ में जब कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हुआ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्कसवादी का गठन हुआ तो उनकी आत्मा और विचारधारा चीन की तरफ झुकी हुई थी । सीपीआई तो सिस्टम में बनी रही लेकिन सीपीएम सशस्त्र संघर्ष के जरिए भारतीय गणतंत्र को हथियार के बल पर जीतने की ख्वाहिश पाल बैठी । उनके सामने माओवादी चीन का मॉडल था और वो बड़े फख्र के साथ नारा लगाया करते थे चीन का चेयरमैन, हमारा चेयरमैन । जाहिर तौर पर बात माओ की होती थी । माओ ने चीन में जिस विचारधारा की बुनियाद रखी चीन कमोबेश उसी पर आगे चलता रहा है । हलांकि माओ के विचारधारा पर डेंग जियाओपिंग ने उन्नीस सौ सत्तर में लगाम लगा दी थी लेकिन थियेन अन मन चौक पर जिस तरह से प्रदर्शनकारियों को टैंकों से कुचल दिया गया वह माओ की ही विचारधारा की परिणति थी। चीन में भी राजनीतिक विरोध करनेवालों को कुचला गया, सामूहिक नरसंहार किया गया । उसी चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की बुनियाद पर बनी पार्टी भारत में अब खुलेआम अपने राजनैतिक विरोधियों के कत्ल की बात करने लगी है ।

लेकिन चीन के चेयरमैन माओ की विचारधारा को सही मानने वाले लोग यह भूल गए कि भारत गांधी का देश है और यहां हिंसा और नफरत की राजनीति करनेवाले लोग सियासत में ज्यादा दिन टिक नहीं पाते हैं । बंगाल और केरल में में हार के बाद सीपीएम जिस तरह से पूरे देश में सिमट गई है उससे यह लगने लगा है कि हिंसा की बुनियाद पर राजनीति करने वाले कुछ वक्त के लिए तो प्रासंगिक हो सकते हैं लेकिन फिर जनता उनको नकार ही देती है । देश में कम्युनिस्टों के लाल झंडे को लहराने के पचहत्तर साल हो गए हैं । बाइस मई उन्नीस सौ सैंतीस को अलापुझा के राधा थिएटर में पहली बार हशिया और हथौड़ा वाला लाल झंडा फहराया गया ता लेकिन सिर्फ पचहत्तर साल में लाल रंग फीका पड़ने लगा है । दिक्कत ये है कि हमारे यहां के मार्कसवादी भारत को माओ के सिद्धांतो के अनुरूप बदलना चाहते हैं । उनको ये बिल्कुल गंवारा नहीं कि माओ के सिद्धांतों को भारतीयता के अनुरूप बदला जाए । जिस दिन वो इस बात को समझ पाएंगे उस दिन से सियासत का खूनी खेल बंद हो जाएगा और उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ जाएगी ।  

1 comment:

manoj rohilla said...

Thought provoking and analytically article. As suggested by you, this is just the tip of the iceberg of such problems BJP has to grapple with in near future. I believe one of the reason for this trend is the diminishing Stature of the leaders holding the command of BJP. Rajnath singh and Nitin Gadkari don't really inspire masses.