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Saturday, May 7, 2016

प्रासंगिक बने रहने का दबाव

जब कोई लेखक अपने सर्वश्रेष्ठ दौर में होता है, उस वक्त लिखना छोड़ दे ऐसा सुनने में कम ही आता है, हिंदी में तो और भी कम । हिंदी के लेखक जब तक जीवित रहते हैं तब तक लिखते रहते हैं । ज्यादातर हिंदी के लेखकों को लगता है किताबों की संख्या से ही उनको अमरत्व प्राप्त होता उसकी गुणवत्ता से नहीं, लिहाजा वो पचनात्मक तौर पर चुक जाने के बाद भी कुछ ना कुछ लिखते रहते हैं । नतीजा यह होता है कि पूर्व में जो प्रतिष्ठा उन्होंने अर्जित की होती है वो भी छीजने लगती है । इस रोग से हिंदी का शायद ही कोई लेखक अछूता रहा है । पहले उपन्यास लिखकर साहित्य जगत में अपना डंका बजाने वाले लेखक से जब उपन्यास छूटता है तो वो संस्मरण लिखने लगते हैं । यहां भी जब उनकी थाती खत्म हो जाती है तो वो आत्मकथा की ओर मुड़ते हैं । बीच बीच में छिटपुट लेखों के संग्रह आदि छपवा लेते हैं । इसका फायदा यह होता है कि उनके किताबों की संख्या बढ़ती चली जाती है । प्रकाशक लेखक की प्रसिद्धि के दबाव में किताबें छाप भी देते हैं । उम्र के छिहत्तरवें पड़ाव पर आकर राजेन्द्र यादव ने किशोरावस्था में लिखा अपना उपन्यास एक था शैलेन्द्र छपवा लिया था जो बेहद अनगढ़ और उनकी प्रतिष्ठा को कम करनेवाला था । उसपर से तुर्रा ये कि इसको अविकल और असंपादित कहकर प्रचारित भी किया गया था । इस उपन्यास ने राजेन्द्र यादव के किताबों की संख्या में अवश्य इजाफा कर दिया था लेकिन उनकी लेखकीय प्रतिष्ठा इससे धूमिल ही हुई थी । दो हजार छह में उन्होंने ये किताब मुझे दी थी और समीक्षा लिखने का आदेश दिया था । किताब पढ़कर मैंने उन्हें फोन किया कि अगर मैं इसकी समीक्षा लिख दूंगा तो आप खफा हो जाएंगे । साथ ही मैंने विस्तार से अपनी आपत्तियों को उनको बताया था । खैर यादव जी इतने लोकतांत्रिक थे कि वो सामनेवाले की ना केवल बात सुनते थे बल्कि उसकी राय का सम्मान भी करते थे । अपने अंदाज में उन्होंने मुझे हड़काया भी था लेकिन उसके बाद एक बार भी मुझे समीक्षा लिखने के लिए उन्होंने नहीं कहा था । इसके पहले राजेन्द्र जी ने हंस के अपने संपादकीय को भी संकलित कर प्रकाशित करवाया था । दो हजार एक में उनका लगभग आत्मकथ्य मुड़ मुड़ के देखता हूं...प्रकाशित हुआ था । तब उस किताब में उन्होंने अपनी जिंदगी को कठघरे में खड़ा किया था और व्यक्तिगत अर्थहीनता का प्रश्न भी उछाला था । चेखव के नाटक तीन बहनों की एक पात्र, जो कि व्यर्थता बोध की मारी थी, का एक संवाद उद्धृत किया था – काश ! जो कुछ हमने जिया है, वह सिर्फ जिंदगी का रफ ड्राफ्ट होता और इसे फेयर करने का एक अवसर हमें और मिलता । दरअसल ये लाइन हिंदी के उन तमाम लेखकों की बाद की रचनाओं को देखते हुए बरबस याद आ जाती है कि काश उनको एक बार फिर से रचनात्मक जीवन मिलता और वो अपनी कमजोर रचनाओं को पुनर्लेखन कर पाते । यहां राजेन्द्र यादव का नाम सिर्फ इसलिए ले सका कि उनसे जुड़ा एक प्रसंग स्मरण में था । अन्यथा तो हिंदी के बहुतेरे लेखक यही कर रहे हैं । कई लेखक तो अपनी चंद कहानियों को बार बार अलग अलग नाम से प्रकाशित करवा कर किताबों की संख्या बढाते रहते हैं – मेरी प्रिय कहानियां, मेरी चुनिंदा कहानियां, मेरी दस कहानियां, मेरी पच्चसी कहानियां, फलां और अन्य कहानियां आदि आदि ।
दरअसल जब हम लेखन में आ रहे अवरोध की बात करते हैं तो यह बात साफ है कि लेखक भी एक तय सीमा तक ही लिख पाते हैं और उसके बाद वो खुद को या तो दोहराने लगते हैं या फिर अपने बनाए लेखकीय मानदंड को ही पार नहीं कर पाते हैं । हिंदी के कथाकार सृंजय की कहानी कामरेड का कोट इतना चर्चित हुआ कि उसके बाद सृंजय की कोई रचना उनको वो प्रसिद्धि नहीं दिला पाई और फिर कालांतर में वो साहित्य की दुनिया से लगभग विस्मृत हो गए । इसी तरह से अगर हम देखें तो हिंदी के बड़े कवियों में से एक आलोक धन्वा का लेखन भी लगभग स्थगित है । आलोक धन्वा का अबतक एक ही कविता संग्रह प्रकाशित है, हलांकि बाद में उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट कविताएं लिखी । एक आलोचक के मुताबिक आलोत धन्वा का लंबा मौन अपनी कविता को विकास के नए धरातल पर पहुंचाने की तैयारी थी । इसी तरह से अगर हम हिंदी की मशहूर उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा की कृतियों पर विचार करें तो देखते हैं कि जो धार या जो पैनापन उनके लेखन में इदन्नम से लेकर अल्मा कबूतरी तक था या जिस तरह की रचनात्मक ऊंचाई उनकी आत्मकथा से दो खंड- कस्तूरी कुंडल बसै और गुड़िया भीतर गुड़िया में दिखाई दिए वह उसके बाद के लिखे उपन्यासों में नहीं मिलता है । मैत्रेयी पुष्पा के पहले लिखे गए उपन्यास उनके बाद के उपन्यासों के लिए अबतक चुनौती बनकर खड़े हैं । मेरा मानना है कि अल्मा कबूतरी उनकी अबतक प्रकाशिक रचनाओं में सबसे श्रेष्ठ है ।
दऱअसल लेखकों की ना लिख पाने की जो समस्या है वो विश्वव्यापी है । पश्चिम में इसको राइटर्स ब्लॉक कहते हैं । वहां यह माना जाता है कि किसी भी रचना पर सालों तक काम करते रहो, उसको लगातार संपादित करते रहो, उसमें जोड़ो घटाओ और जब संतुष्ट हो तो प्रकाशित करवाओ । यह सवाल भी पश्चिम में लगातार उठता रहा है कि कविता कहानी या उपन्यास लिखना शुरू करना आसान है लेकिन लेखक को अपना लेखन कब रोक देना चाहिए ये बड़ा सवाल है । उस सवाल से अमेरिका के लेखक लगातार मुठभेड़ करते रहे हैं । अमेरिका के ही एक मशहूर लेखक थे राल्फ एलिसन जिनकी एक बेहतरीन कृति द इनविजिबल मैन उन्नीस सौ बावन में प्रकाशित होकर खूब चर्चित हुई थी । नस्लीय राष्ट्रवाद पर केंद्रित ये किताब जब प्रकाशित हुई थी तब अमेरिका के आलोचकों ने इसको मास्टरपीस करार दिया था । लेकिन इस उपन्यास के प्रकाशन के चालीस साल बाद तक राल्फ एलिसन अगली कृति को लिखने को लेकर संघर्ष करते रहे थे । इन चालीस वर्षों तक वो अपना एक उपन्यास फनटीन्थ लिखते रहे थे  । उस दौरान अमेरिका में राल्फ एलिसन को लेकर मजाक भी होता था कि अनिश्चित काल तक ये उपन्यास लिखा जाएगा । अपनी मृत्यु तक राल्फ एलिसन ने अपने दूसरे उपन्यास को प्रकाशित नहीं करवाया क्योंकि वो इससे संतुष्ट नहीं थे । उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवारवालों ने उनके लिखे दो हजार पृष्ठ प्रकाशक को छपने के लिए दे दिए । प्रकाशक ने उसको संपादित करके पांच सौ पन्नों का उपन्यास बना दिया । राल्फ एलिसन का उपन्यास था, जिसके बारे में साहित्य जगत में ये चर्चा थी कि इसको चालीस साल से लिखा जा रहा है और और उनकी मृत्यु भी हो चुकी थी लिहाजा किताब को लेकर पाठकों और आलोचकों में उत्सुकता थी। किताब छपी, बिकी भी खूब लेकिन इसने पाठकों को भी निराश किया और आलोचकों ने तो विनम्रता के साथ इसको खारिज ही कर दिया । इसके बाद अमेरिका में इस बात को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी कि आखिरकार राल्फ एलिसन इस किताब को क्यों नहीं छपवाना चाहते थे । राल्फ एलिसन के कुछ मित्रों ने उस वक्त ये बताया था कि वो इसके ड्राफ्ट से असंतुष्ट थे । यही हाल हिंदी में भी होता है । कई लेखक अपने जीवन काल में अपनी कुछ रचनाओं को नहीं छपवाते हैं लेकिन उनके मूर्ख वारिस चंद पैसों की लालच में उनकी कमजोर कृतियों को छपवाकर उनकी प्रतिष्ठा कम करते हैं । क्या ऐसी कुछ व्यवस्था बननी चाहिए कि जो लेखक अपनी किसी रचना को प्रकाशित नहीं करवाना चाहते हैं उसके बारे में वसीयत करके जाएं । इससे उनकी प्रतिष्ठा बची रह सकती है ।

राइटर्स ब्लॉक का दूसरा उदाहरण है द न्यूयॉर्कर में काम करनेवाले जोसेफ मिशेल का जो सालों तक दफ्तर जाते रहे लेकिन कुछ लिख नहीं पाए । उनके बारे में कहा जाता है कि उनके दफ्तर से जाने के बाद उनके मित्र डस्टबिन खंगालते थे कि किस तरह का ड्राफ्ट फाड़ कर जोसेफ मिशेल ने फेंका है । दरअसल इस राइटर्स ब्लॉस से हर लेखक का सामना होता है जब उसके सामने रचनात्मकता का संकट उत्पन्न हो जाता है लेकिन अपने को समीचीन बनाए रखने की ललक भी जोर मारती है । हिंदी के लेखक इस चुनौती को झेल नहीं पाते हैं और राइटर्स ब्लॉक पर खुद को रेलिवेंट बनाए रखने की ललक भारी पड़ जाती है और इसी ललक में कमजोर कृतियों का प्रकाशन कर अपनी प्रतिष्ठा को कम करते चले जाते हैं। रचनात्मकता के चुक जाने पर ई एम फोस्टर ने उचित ही कहा था कि वो सुबह से लेकर शाम तक कुछ नहीं करते हैं और फिर शाम को बैठकर दिनभर के अपने कामों पर लिखना शुरू कर देते हैं । यह एक लेखक की पीड़ा है लेकिन राइटर्स ब्लॉक पर सटीक टिप्पणी भी है । 

5 comments:

Divik Ramesh said...

बहुत अच्छा ऒर सटीक आलेख। बधाई।

अजित वडनेरकर said...

बढ़िया है। हिन्दी की मिसालें और भी दी जा सकती थीं। नासिर शर्मा के बारे में भी यही है।

अखिल said...

बेबाकी और साफगोई को सलाम। आपको कल ही एक कार्यक्रम में हिन्दी कविता और कवियों की धुलाई करते सुना था।

Mahima Shree said...

बहुत ही सार्गभित आलेख सर ..बहुत बधाई

Govind Sen said...

हाहाकार के कुछ आलेख पढ़े हैं, इनमें सच्चाई कि ऐसी लौ जिसे बस देखती रहने का मन करता है.