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Saturday, December 3, 2022

हिंदी फिल्मों को दिशा देनेवाला निर्माता


प्रसंग 2017 का है। मैं राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में श्रेष्ठ लेखन की जूरी का चेयरमैन था। ये जूरी फिल्मों पर श्रेष्ठ लेखन के लिए और संबंधित वर्ष में फिल्म पर प्रकाशित पुस्तकों को पुरस्कृत करती है। जूरी ने पुरस्कार के लिए पुस्तकों का चन कर लिया और उसकी घोषणा भी कर दी गई। घोषणा के करीब एक पखवाड़े के बाद एक अनजान नंबर से फोन आया। फोन करनेवाले ने चयन समिति के अध्यक्ष होने के नाते मुझे पुस्तक चयन के लिए बधाई दी। फिर अपना नाम बताया सुरेश जिंदल। फिर तो करीब दस मिनट पर फिल्म और फिल्म लेखन पर बातचीच होती रही। सुरेश जी ने फोन रखने के पहले बताया कि उनकी पुस्तक , माई एडवेंचर विद सत्यजित राय, द मेकिंग आफ शतरंज के खिलाड़ी को भी राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भेजा गया था। फिर उस पुस्तक और शतरंज के खिलाड़ी की मेकिंग पर बात हुई। सत्यजित राय से मिलने का प्रसंग बेहद रोचक था।  मुंबई में टीनू आनंद के घर पर बात हो रही थी, बातों बातों में सत्यजित राय को फोन मिला दिया गया। उनसे समय मिला और सुरेश जिंदल और टीनू आनंद उनसे मिलने कलकत्ता (अब कोलकाता) पहुंच गए। उनके पास कई दिलचस्प किस्से थे। उन्होंने मिलने को कहा था। तय हुआ कि किसी दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में मिला जाए। वो दक्षिण दिल्ली में रहते थे इसलिए आईआईसी उनके लिए सुविधाजनक होता। अफसोस कि उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। पिछले दिनों उनका निधन हो गया। 

सुरेश जिंदल ने कई बेहतरीन फिल्में बनाईं। उनकी पहली फिल्म मन्नू भंडारी की कहानी यही सच पर आधारित थी जिसको बासु चटर्जी ने निर्देशित किया था। ये फिल्म सुपरहिट रही थी। इसके बाद उन्होंने सत्यजित राय के साथ उनकी पहली हिंदी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी बनाई। आज से करीब चालीस साल पहले 30 नवंबर को दिल्ली में फिल्म गांधी रिलीज हुई थी। रिचर्ड अटनबरो की इस क्लासिक फिल्म के भी सहयोगी सुरेश जिंदल थे। इसके अलावा भी सुरेश जिंदल ने कई फिल्में बनाई। सुरेश जिंदल दिल्ली के पंजाबी परिवार के थे। उन्होंने अमेरिका के युनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फिर कई वर्षों तक वहीं नौकरी भी की। फिल्मों से गहरे जुड़े होने के बावजूद वो दिल्ली में ही रहना पसंद करते थे। बीच में करीब तीन चार वर्षों के लिए मुंबई शिफ्ट हुए थे लेकिन फिर वो दिल्ली आ गए। वो कहते थे कि दिल्ली में उनको एक विशेष प्रकार की रचनात्मक उर्जा मिलती थी। पिछले करीब दो दशक से सुरेश जिंदल आध्यात्मिक हो गए थे और अधिक समय धर्म और अध्यात्म में ही व्यतीत करते थे। दिल्ली में रहकर इस श्रेष्ठ निर्माता ने हिंदी फिल्मों में जो योगदान किया है वो फिल्म इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है।   

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