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Saturday, June 11, 2022

सत्य को भी चाहिए शक्ति का आधार


शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद देश के कई राज्यों में जिस तरह से उपद्रव और बवाल हुआ उसके बाद हिंदुओं और मुसलमानों के रिश्तों को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। न्यूज चैनलों और इंटरनेट मीडिया पर पर कई स्वयंभू विचारक नए नए सिद्धांत पेश कर रहे हैं। कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हाल में संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष के समापन समारोह में दिए उनके वक्तव्य को उद्धृत कर रहे हैं। कुछ उत्साही विश्लेषक मोहन भागवत के वक्तव्य के उस अंश को उद्धृत करते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं जहां उन्होंने ज्ञानवापी के संदर्भ में अपनी बात रखी। वो लगातार चीख रहे थे कि संघ ने मुसलमानों को लेकर अपना स्टैंड बदल लिया है और अब संघ अपनी मुस्लिम विरोध की छवि में सुधार करना चाहता है। इंटरनेट मीडिया पर हिंदुत्व की ध्वजा लेकर विचरण करनेवाले कई विद्वान तो मोहन भागवत के इस बयान की तुलना लालकृष्ण आडवाणी के जिन्ना के मजार पर लिखी टिप्पणी से कर बैठे। उनकी इन बचकानी टिप्पणियों पर बात करने से पहले जरा देख लेते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा क्या था। 

सरसंघचालक ने कहा था कि ज्ञानवापी का अपना एक इतिहास है जिसको हम बदल नहीं सकते हैं। इसको न आज के हिंदू ने बनाया न आज के मुसलमानों ने बनाया। ये उस समय घटा। इस्लाम बाहर से आया, आक्रामकों के साथ आया। उस आक्रमण में भारत की स्वतंत्रता चाहनेवाले व्यक्तियों का मनोधैर्य खर्च करने के लिए देवस्थान तोड़े गए, जिनकी संख्या हजारों में है। उनमें से कइयों का हिंदुओं की आस्था में विशेष स्थान है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदुओं को लगता है कि पुनर्उत्थान का कार्य करना चाहिए। राममंदिर का एक आंदोलन हुआ अब उस तरह का आंदोलन नहीं करना है। लेकिन इश्यू जो मन में हैं वो उठते तो हैं। वो किसी के विरुद्ध नहीं हैं। ...आपस में मिल बैठकर सहमति से रास्ता निकालना चाहिए। हर बार सहमति से रास्ता नहीं निकलता तो संविधान सम्मत न्याय व्यवस्था को मानना चाहिए और उसपर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहिए। इसी क्रम में वो कहते हैं कि ज्ञानवापी में हिंदुओं की श्रद्धा है लेकिन हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखना। उसके आगे भी उनका वक्तव्य चलता है जिसमें वो बाहर से आई पूजा पद्धति को अपनाने वालों को भी भारतीय बताते हैं। उनके और हिंदुओं के पूर्वजों के एक होने की बात करते हैं। लेकिन उनका पूरा जोर शक्ति पर होता है। 

अपने वक्तव्य के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बहुत स्पष्टता के साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात रखी। विस्तार से धर्म और स्व को परिभाषित किया। समन्वय, संतुलन, सबको साथ लेकर चलने, सबकी उन्नति करना ही स्व है और उसके आधार पर ही देश के तंत्र को स्थापित करने की बात होती है। धर्म के संरक्षण के लिए मोहन भागवत जी ने स्पष्ट किया कि वो दो प्रकार से होता है। एक तो जब धर्म पर आक्रमण होता है तो उसको आक्रमण से बचाना होता है, बलिदान देना होता है। लड़ाई भी करनी पड़ती है। इसके अलावा धर्माचरण के माध्यम से धर्म की अभिवृद्धि की बात भी उन्होंने की। संघ प्रमुख ने जो बात रखी वो कोई नई बात नहीं कही है। नए विचारकों के लिए ये नई बात हो सकती है लेकिन मुसलमानों को लेकर संघ का ये विचार वर्षों से रहा है। हिंदुत्व और आक्रामक हिंदुत्व को परिभाषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषक गुरुजी गोलवलकर का नाम लेना नहीं भूलते हैं और ना ही भूलते हैं उनकी पुस्तक ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ को। इस पुस्तक के आधार पर वो मुसलमानों के प्रति संघ की सोच को व्याख्यायित करते हैं। लेकिन हिंदुत्व को या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सोच को विश्लेषित करनेवाले नए विचारक इस तथ्य से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर उसको जानबूझकर उजागर नहीं करते कि जिस वक्त गुरु गोलवलकर ने ये पुस्तक लिखी थी वो न तो संघ के पदाधिकारी थे और न ही सरसंघचालक। मुसलमानों को लेकर संघ का क्या सोच रहा है इसको जानने के लिए गुरू गोलवलकर और पत्रकार सैफुद्दीन जिलानी की 30 जनवरी 1970 की बातचीत देखनी चाहिए। ये बातचीत नरेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण में संकलित है। इसमें जब सैफउद्दीन साहब ने मुसलमानों को लेकर उनके दृष्टिकोण के बारे में पूछा तो गुरुजी का कहना था कि हमें ये बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि हम सबके पूर्वज एक ही हैं। हम सब उनके वंशज हैं। आप अपने-अपने धर्मों का प्रामाणिकता से पालन करें परंतु राष्ट्र के मामले में हम सबको एक रहना चाहिए। राष्ट्रहित के लिए बाधक सिद्ध होनेवाले अधिकारों और सहूलियतों की मांग बंद होनी चाहिए। हम हिंदू हैं, इसलिए हम विशेष सहूलियतों या अधिकारों की कभी बात नहीं करते। इसी बातचीत में गुरूजी एक जगह कहते हैं कि भारतीयकरण का अर्थ सबको हिंदू बनाना तो नहीं है। तो अगर गुरू गोलवलकर की बातों को ध्यान से देखें तो यही लगेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत उन्हीं बातों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ा रहे हैं। संघ अपनी नीति पर कायम है, न तो कोई स्टैंड बदला है और न ही राष्ट्रविरोधियों को लेकर साफ्ट हुआ है। 

हिंदू धर्म और संघ की नीतियों के नए विश्लेषकों को मोहन भागवत जी के हाल के भाषण को फिर से सुनना समझना चाहिए। इस भाषण में मोहन भागवत ने एकाधिक स्थान पर शक्ति की महत्ता को रेखांकित किया है। वो तो यहां तक कहते हैं कि सत्य को भी शक्ति का आधार चाहिए होता है। बिना शक्ति के दुनिया नहीं मानती। उनके वक्तव्य की बारीकियों को समझे बिना किसी तरह का विश्लेषण अधूरा लगता है। वो हिंदू समाज को शक्ति देने की बात कर रहे हैं। बार बार कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि बगैर शक्ति के दुनिया आपकी बात मानना तो दूर सुनेगी भी नहीं। आज अगर भारत में हिंदुओं की बात सुनी जा रही है तो उसके पीछे समाज की शक्ति है। वो स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि दुनिया में दुष्ट लोग हैं जो हमको जीतना चाहेंगे इसलिए शक्ति की आराधना करनी चाहिए। उनके लगभग इकतीस मिनट के भाषण में हिंदू समाज को शक्ति देने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार आती है। मोहन भागवत की आलोचना करनेवाले व्याख्याकारों और टीकाकारों को उनके वक्तव्य को समग्रता में देखना चाहिए। संघ प्रमुख ने न तो संघ का कोई स्टैंड बदला है न ही वो मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी बात कर रहे हैं। संघ हमेशा से भारतीय मुलमानों को यहां का मानता है। उनको आक्रमणकारियों के साथ जोड़कर नहीं देखता है और यही अपेक्षा करता है कि इतिहासकार और भारतीय मुसलमान भी अपने को भारतीय मानें और आक्रांताओं के साथ खुद को जोड़कर नहीं देखें। नए नए संघ विचारक बने टीवी चैनलों की खिड़कियों पर रात दिन टंगे रहनेवाले स्वयंभू विद्वान किसी भी चीज को समग्रता में नहीं देख पाते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी वक्तव्य के एक छोटे हिस्से के आधार पर उसका मूल्यांकन करके निर्णय देने लग जाते हैं और दोष के शिकार हो जाते हैं। हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने का जो बयान है उसके पहले भी काफी देर तक हिंदू समाज को शक्ति देने की, धर्म की, स्व की, धर्माचरण के बारे में कहा गया लेकिन न तो उसको सुनने की किसी को फुर्सत है और न ही उसकी बारीकियों को विश्लेषित करने की कला। इसका नुकसान ये होता है कि समाज में गलत संदेश जाता है और भ्रम की स्थिति बनती है। इससे बचा जाना चाहिए।  


Saturday, June 4, 2022

सत्य होती सत्यजित राय की चिंताएं


प्रख्यात फिल्मकार सत्यजित राय के शताब्दी वर्ष में उनकी फिल्मों पर चर्चा हो रही है। फिल्म  निर्माण की उनकी कला के बारे में सेमिनार और गोष्ठियां आदि आयोजित हो रही हैं। फ्रांस में आयोजित होनेवाले कान फिल्म फेस्टिवल से लेकर देश के फिल्म उत्सवों में उनकी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है। कुछ फिल्मकार उनके जीवन और उनकी कला पर डाक्यूमेंट्री भी बना रहे हैं। लेकिन सत्यजित राय के जन्म शताब्दी वर्ष में फिल्मों को लेकर उन्होंने जो चिंताएं व्यक्त की थीं उनपर भी बात होनी चाहिए। फिल्मों की कहानियों और फिल्म और साहित्य के रिश्ते पर उन्होंने जो चिंता व्यक्त की थीं, उसपर कम बात होती है। 1980 में सत्यजित राय ने एक सेमिनार में कहा था कि इन दिनों लेखन में एक खास तरह की गिरावट देखी जा सकती है। अब जिस तरह के उपन्यास प्रकाशित हो रहे हैं या कहानियां छप रही हैं वो फिल्मकारों को फिल्म बनाने के लिए उकसा नहीं पा रही हैं। लेखकों ने एक खास किस्म की लेखन प्रविधि अपना ली है । वो अपने लेखन में जोखिम नहीं उठा रहे हैं और किसी प्रकार का प्रयोग भी नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा ये हुआ है कि उनके लेखन में एक ठहराव आ गया है। सत्यजित राय के समकालीन लेखन पर इस टिप्पणी का बंगाल के लेखकों ने प्रतिवाद किया था और फिर कहा था कि ये लेखकों का दायित्व नहीं है कि वो फिल्मकारों को ध्यान में रखकर कहानियां या उपन्यास लिखे। लेखकों और सत्यजित राय के बीच इस विषय पर लंबा संवाद हुआ था। करीब चालीस वर्ष बाद आज भी सत्यजित राय के प्रश्न चुनौती बनकर लेखकों के सामने खड़े हैं। इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना चाहिए कि समकालीन लेखन में ऐसे उपन्यास या कहानियां क्यों नहीं लिखी जा रही हैं जो फिल्मकारों को प्ररित कर सकें कि वो उसपर उत्साहित होकर फिल्म बनाने के लिए आगे आएं। 

इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने के लिए हमें अतीत में जाना होगा। हमें ये देखना होगा कि कैसे लेखकों ने एक विचारधारा का दामन थामा और वो फार्मूलाबद्ध लेखन के जाल में फंसते चले गए। 1967 में जब नक्सबाड़ी आंदोलन का आरंभ हुआ तो उससे बंगाल के अलावा हिंदी प्रदेश के लेखक भी प्रभावित हुए। नक्सलवाद के रोमांटिसिज्म में हिंदी लेखन भी फंसा और इसमें भी नक्सलवाद का या मार्क्सवाद का प्रभाव दिखने लगा। इस आंदोलन के प्रभाव में ही समांतर सिनेमा का आरंभ हुआ जिसको न्यू वेव सिनेमा भी कहा गया। हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा और यहां भी इस समानंतर सिनेमा की छतरी के नीचे फिल्मकारों ने फिल्में बनानी शुरू की। उस वक्त की सरकार की तरफ से भी इन फिल्मकारों को मदद मिली थी। फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन ने इस तरह की फिल्म बनाने वालों को आर्थिक मदद की । मुनाफा या फिल्म पर आनेवाले खर्चे की चिंता नहीं होने की वजह से समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों ने कला को छोड़कर विचारधारा को दिखाना आरंभ कर दिया। सरकारी खर्चे से बबनेवाली फिल्मों की चर्चा तो बहुत हुई लेकिन दर्शकों का प्यार कम मिला। ये दौर बहुत लंबे समय तक चला। अपनी विचारधारा के फिल्मकारों को फिल्म समीक्षकों ने बढ़ाना और स्थापित करना आरंभ कर दिया। सत्यजित राय जब तक जीवित रहे वो इस इस तरह की फिल्मो के चक्कर में नहीं पड़े। उनपर हमले भी हुए, उनकी फिल्मों की आलोचना भी होने लगी। उनपर बंगाल की संस्कृति से दूर जाने के आरोप भी लगाए गए लेकिन वो हर तरह की फिल्म बनाते रहे और वैश्विक स्तर पर उनकी फिल्मों को सराहना मिली। आज भी कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान सत्यजित राय की फिल्मों का न केवल प्रदर्शन होता है बल्कि उनकी फिल्म कला पर चर्चा होती है। जैसे जैसे विचारधारा का प्रभाव कम हुआ उसके आधार पर बनी फिल्में भी नेपथ्य में चली गईं। उपन्यास और कहानी के नाम पर वैचारिकी परोसनेवाले लेखक भी पिछड़ गए। 

वैचारिक लेखन के कई नुकसान सामने आए। विशेष रूप से अगर हम हिंदी में उपन्यास और कहानी लेखन को देखें तो वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में जिस तरह से यथार्थ के नाम पर लेखन आरंभ हुआ वो एकांगी होता चला गया। कहानी में किस्सागोई का स्थान नारेबाजी ने ले लिया। गांव-देहात, किसान-मजदूर के नाम पर लिखी जानेवाली कहानियों में परोक्ष रूप से विचारधारा को मजबूत करनेवाली बातें कही जाने लगीं। विचारधाऱा के खूंटे से बंधे लेखकों की कृतियों में कथित यथार्थवाद जड़ हो गया। मजदूरों, गरीबों और किसानों की समस्याएं बदलीं, उनका संकट बदला लेकिन हिंदी के अधिकांश लेखक उन समस्याओं को या संकट को पकड़ने में नाकाम रहे। लगातार एक तरह के लेखन से पाठक भी दूर होते गए और साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनानेवालों के सामने भी संकट आ खड़ा हो गया। जिसको सत्यजित राय ने अस्सी के शुरुआती दशक में ही भांप कर प्रकट कर दिया था। सत्यजित राय ने जब कहानियों में विविधता और प्रयोगात्मकता की ओर संकेत किया था तो उसके करीब एक दशक बाद देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर आरंभ हुआ। वामपंथ के किले ढहने लगे थे, वामपंथी विचारधारा के सामने बड़ी चुनौती आकर खड़ी हो गई थी। रूस और चीन में भी खुलेपन की बयार बहने लगी। लेकिन विचारधारा वाले लेखक इस बदलाव को भांप नहीं पा रहे थे। भारतीय समाज भी पर आर्थिक उदारीकरण का गहरा प्रभाव पड़ा। भारत में एक नया मध्यवर्ग पैदा हो गया। भारत में गरीबों का किसानों का, मजदूरों का जीवन स्तर बेहतर होने लगा था। 

आर्थिक उदारीकरण के बाद नए मध्यवर्ग की आशा और आकांक्षाएं बदलने लगी थीं। मध्यवर्ग की बदलती आशा और आकांक्षाओं का प्रकटीकरण साहित्य में आनुपातिक रूप में कम हो रहा था। भारत के इस मध्यवर्ग की जीवनशैली को अंधाधुंघ शहरीकरण ने भी प्रभावित किया। युवाओं और महिलाओं की समस्याओं और सपने भी अलग हो गए। विचारधारा की गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हिंदी के लेखक यथार्थ के नाम पर जो परोस रहे थे वो इस बदले हुए यथार्थ से कोसों दूर था। परिणाम यह हुआ कि ऐसे लेखन के पाठक कम होते चले गए और तब हिंदी के लेखकों ने हिंदी में पाठकों की कमी का रोना आरंभ कर दिया। लेखकों के इस रुदन में कई प्रकाशक भी शामिल हो गए। उन्होंने भी पुस्तकों की कम होती बिक्री के बारे में कहना शुरु कर दिया। इस स्थिति पर अगर समग्रता से विचार किया जाए तो इस समस्या के मूल में हिंदी लेखकों का अपने पाठकों की रुचि को समझ पाने में नाकामी बड़ी वजह है। अब भी अगर स्वाधीनता क बाद के समय में किसानों और मजदूरों की समस्या का समकालीन बताकर पाठकों के सामने पेश किया जाएगा तो पाठक उसको स्वीकार करेंगे इसमें संदेह है। अब कुछ युवा लेखकों ने अपने समय को अपने उपन्यासों में या अपनी कहानियों में स्थान देना शुरू किया है तो उनको पाठक मिलने लगे हैं। हिंदी में पाठक नहीं है, यह अवधारणा गलत है। पाठक हैं और वो खरीदकर पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन जरूरत इस बात की है कि उनकी रुचि की पुस्तकें लिखी जाएं और वो अपने पाठकों तक पहुंचने का उपक्रम करें। फिल्मकार भी साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाना चाहते हैं। फिल्म एक ऐसा माध्यम है जो समय के साथ चलता है और अपने समय के यथार्थ को दर्शकों के सामने पेश करता है।  साहित्यिक कृतियों से कहानियां उठाकर निर्देशक उसको इस तरह से पेश करता है कि कई बार कहानी बदली हुई लगती है लेकिन वो माध्यम की मांग होती है। सत्यजित राय ने भी प्रेमचंद की कृति शतरंज के खिलाड़ी में कई बदलाव किए थे। आज अगर साहित्य को व्यापक दर्शक/पाठक वर्ग तक पहुंचना है तो उसको फिल्म के साथ साहचर्य स्थापित करने के बारे में सोचना चाहिए। 


Saturday, May 28, 2022

औरंगजेब पर अज्ञान का प्रदर्शन


काशी में ज्ञानवापी परिसर स्थित मस्जिद के सर्वे और अदालती कार्यवाही के बाद कई तरह के इतिहासकार सामने आने लगे हैं। वामपंथी रुझान और वामपंथी विचारधारा के पोषक कुछ साहित्यकार और लेखक भी इस विषय पर अपने अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं। कई तो मुगल बादशाह औरगंजेब के समर्थन में भी तर्क खोजकर ला रहे हैं। इंटरनेट मीडिया पर इस तरह के मनोरंजक टिप्पणियां देखी जा सकती हैं। एक लेखक महोदय तो किसी किताब से हवाले से ये तक लिख गए कि मंदिर के तहखाने में बलात्कार हुआ था और औरंगजेब को पता चला तो उसने उस जगह को अपवित्र मानकर मंदिर को ध्वस्त करवा दिया। इस मनोरंजक तर्क को लिखते समय लेखक महोदय ये भूल गए कि अगर कोई जगह अपवित्र हो गई तो वहां मंदिर गिराकर मस्जिद कैसी बनवाई जा सकती है। क्या मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाकर किसी जगह को पवित्र किया जा सकता है? बलात्कार को लेकर अगर औरंगजेब इतना ही संवेदनशील था तो बीजापुर और गोलकुंडा आक्रमण के समय बलात्कर की असंख्य घटनाओं पर उसका दिल क्यों नहीं पसीजा था। दक्षिण भारत पर औरंगजेब के आक्रमण के समय जितनी बलात्कार की घटनाएं हुई उसकी तुलना सिर्फ 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) में पाकिस्तानी सैनिकों की क्रूरता से की जा सकती है। दरअसल वामपंथियों का और स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बतानेवाले लेखकों और इतिहासकारों का ये पुराना शौक रहा है। उनके लेखन में विदेशी आक्रांताओं को लेकर एक खास किस्म की उदारता दिखाई देती है। इसके पीछे की वजह क्या है ये पता नहीं लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस प्रकार के स्वयंभू इतिहासकार समाज के लिए खतरनाक हैं। इनकी अज्ञानता की वजह से और गलत स्थापनाओं के कारण दो समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है। 

औरंगजेब को लेकर वामपंथी लेखकों को सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक पढ़नी चाहिए जिससे इस क्रूर शासक के बारे में सबकुछ स्पषट हो जाएगा। पांच खंडों में प्रकाशित सरकार की पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ औरंगजेब’ में जदुनाथ सरकार ने सप्रमाण बताया है कि किस फरमान के अंतर्गत काशी के मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने फरमान का स्त्रोत भी बताया है, छद्म इतिहासकार की तरह सिर्फ मनगढ़ंत बातें नहीं की है । एजेंडा के तहत इतिहास लेखन या टिप्पणी करनेवालों ने सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक या तो पढ़ी नहीं या पढ़कर भी अनभिज्ञ बने रहते हैं। हिंदुओं से घृणा करनेवाले शासक औरंगजेब के पक्ष में वामपंथी इतिहासकार पहले भी अनेक तरह के छद्म रचते रहे हैं। कुछ दशक पहले ये थ्योरी पेश करने की कोशिश की गई थी औरंगजेब हिंदुओं को लेकर उदार था। इसके लिए ये तर्क दिया जाता था कि उसने मनसबदारी प्रथा को बढ़ावा दिया। उसके कालखंड में अकबर के समय से अधिक हिंदू मनसबदार थे। यह सही है कि औरंगजेब के कालखंड में हिंदू मनसबदारों की संख्या अधिक थी लेकिन इसकी वजह उसका हिंदू प्रेम नहीं बल्कि मनसबदारी को बढ़ावा देना था। औरंगजेब के समय हिंदू मनसबदारों की संख्या जरूर अधिक दिखाई देती है लेकिन अगर इसको आनुपातिक तौर पर देखा जाए तो वो कम थी। अर्धसत्य बताना मार्क्सवादियों की पुरानी आदत रही है। तभी तो किसी ने व्यग्यात्मक लहजे में कहा था कि मार्क्सवादी इतिहासकारों के पास ईश्वर से भी अधिक ताकत होती है क्योंकि ईश्वर अतीत नहीं बदल सकता है लेकिन इस विचारधारा के इतिहास लेखकों के पास अतीत को बदलने की शक्ति होती है। हिंदुओं पर लगनेवाला कर जजिया को अकबर ने खत्म किया था लेकिन औरंगजेब ने उस कर को फिर से लागू कर दिया था। उसने हिंदुओं की तीर्थयात्रा पर भी कर लगा दिया था। जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक में श्रमपूर्वक औरंगजेब के सारे कारनामों को कलमबद्ध किया है। इस वजह से मार्क्सवादी इतिहासकार सामूहिक रूप से एजेंडे के तहत जदुनाथ सरकार का नाम सुनते ही अलग रास्ते पर चले जाते हैं। 

दरअल अगर हम उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों को समग्रता में देखते हैं तो ये पता चलता है कि विदेश से आए मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं पर कितना और किस तरह से घृणित अत्याचार किए। 1953 में केंद्र सरकार की सहमति के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने फारसी और अरबी में उपलब्ध ऐतिहासिक महत्व की सामग्री और स्त्रोत का हिंदी में अनुवाद और प्रकाशन आरंभ किया था। हिंदी में अनुवाद का कार्य सैयद अतहर अब्बास रिजवी ने किया था। इस योजना के अंतर्गत तुगलककालीन भारत के नाम से 1956 में पहली बार पुस्तक छपी। बाद में राजकमल प्रकाशन ने 2008 और 2016 में इन पुस्तकों का पुर्नप्रकाशन किया। 1320 से लेकर 1359 तक का तुगलक वंश का इतिहास तमाम तरह के अरबी फारसी के ऐतिहासिक पुस्तकों और यात्रियों के विवरणों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। तीन खंडों में प्रकाशित इस पुस्तक के पहले खंड में इब्ने बत्तूता का यात्रा विवरण भी है। इसमें बत्तूता ने मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में ईद के विशेष दरबार  की चर्चा की है। वो कहते हैं, ‘ईद के दिन महल में फर्श बिछाए जाते हैं और उन्हें बड़े सुंदर ढंग से सजाया जाता है। दरबार के कक्ष के बाहर वारगाह खड़ी की जाती है । यह एक बहुत बड़े मंडप के समान होती है (पृ 188)।‘ इसमें आगे दरबार और अवसर विशेष पर लगनेवाले सिंहासन की भव्यता का वर्णन है। आगे वो लिखते हैं, ‘हाजिब तथा नकीब अपने स्थानों पर खड़े होते हैं। तत्पश्चात गायक तथा नर्तकियां प्रविष्ट होती हैं। सर्वप्रथम काफिर (हिंदू) राजाओं की पुत्रियां जो उस वर्ष युद्ध में बंदी बनाई जाती हैं, आकर गाती नाचती हैं। तत्पश्चात वो अमीरों और मुख्य परदेशियों को प्रदान कर दी जाती हैं। इसके उपरांत अन्य काफिरों की पुत्रियां आकर नाचती गाती हैं। जब वे नाच गा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें अपने भाइयों, संबंधियों और मलिकों के पुत्रों आदि को दे देता है। सुल्तान ये दरबार अस्त्र की नमाज के पश्चात करता है। दूसरे दिन पुन: इसी प्रकार अस्त्र के उपरांत दरबार होता है। इसमें गायकायें लाई जाती हैं। जब वे नाच जा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें ममलूक के अमीरों (मुख्य दासों) को दे देता है (पृ 189)।‘ आगे बत्तूता सातवें दिन तक का विवरण देता है। ईद के समय लगनेवालों इन दरबारों में हिंदू राजाओं की बेटियों के साथ तुगलक क्या सलूक करता है वो स्पष्ट है। इस पुस्तक में इस तरह की कई घटनाओं का वर्णन है। सुल्तान के कर्मचारियों के खाने के लिए चावल कूटने के लिए लाई जानेवाली स्त्रियों की मृत्य का प्रसंग भी ह्रदय विदारक है। वो लिखते हैं कि सुल्तान के महल में सैकड़ों स्त्रियां नित्य मृत्यु को प्राप्त होती थीं।... जब वो रुग्ण हो जाती थीं धूप में पड़ जाती थीं और मर जाती थीं। (पृ.297)। क्या कभी इसपर मार्क्सवादियों ने समग्रता में विचार किया। क्या स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों ने इसपर ध्यान दिया। 

दरअसल मुगलों समेत तमाम विदेशी आक्रांताओं ने हिन्दुस्तान की जनता पर भयानक अत्याचार किए। कईयों के शासन काल में सैकड़ों मंदिर तोड़े गए और इन सबके प्रमाण उपलब्ध हैं। जरूरत इस बात की है कि उन उपलब्ध प्रमाणों को जनता के सामने लाया जाय। सत्य और तथ्य के सामने आने से कई तरह की गलतफहमियां दूर होती हैं। जो लोग औरंगजेब से लेकर तुगलक और बाबर का गुणगान करके देश की जनता को बरगलाने का काम करते हैं वो एक्सपोज होंगे। जो भ्रमित होकर औरंगजेब को अपना पूर्वज मानते हैं उनके सामने भी अपने अतीत पर पुनर्विचार करने का अवसर पैदा होगा। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में अगर इतिहास को तथ्यों के आधार पर लिखने और उसके प्रकाशन का कार्य आरंभ हो सके तो अच्छा रहेगा। इसको एक मिशन के तौर पर आरंभ करके पूरा करना चाहिए। ये कार्य देशहित में आवश्यक है। 

संघर्ष का नया आयाम


स्वाधीनता का आंदोलन जब अपने चरम की ओर बढ़ रहा था तब अंग्रेजों ने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए ब्रिटिश संसद के सदस्यों की एक कमेटी जान साइमन की अध्यक्षता में भेजी थी, जिसको साइमन कमीशन के नाम से जाना जाता है। ये वर्ष 1928 था। साइमन कमीशन का पूरे देश में काफी विरोध हुआ था। एक आठ साल की बच्ची, जिसके पिता ब्रिटिश राज में जज थे, भी साइमन कमीशन के विरोध में आंदोलन में कूद पड़ी थीं। उसके पिता बहुत नाराज हुए, कई तरह की पाबंदियां लगाने की कोशिश की लेकिन वो बच्ची नहीं मानी। जज साहब का नाम था हरिप्रसाद मेहता और उनकी बेटी का नाम था उषा मेहता। कौन जानता था कि जिस आठ साल की बच्ची ने साइमन कमीशन का विरोध किया था वो बड़ी होकर स्वाधीनता की लड़ाई में एक नया आयाम जोड़ देगी। गुजरात में अपनी आरंभिक पढ़ाई करने के बाद उषा मेहता मुंबई के विल्सन कालेज में आ गई थीं। उषा की आंखों में एक अलग ही सपना था। जब गांधी जी ने नौ अगस्त 1942 को  मुंबई में अंग्रेजों भारत छोड़ो का आरंभ किया उस वक्त उषा मेहता ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गईं। भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के बाद गांधी जी समेत कई कांग्रेसी नेता गिरफ्तार कर लिए गए। कुछ युवा नेता इस आंदोलन की अलख जगा रहे थे लेकिन उनकी आवाज जनता तक नहीं पहुंच पा रही थी और वो बापू के संदेश को पूरे देश में पहुंचाने के लिए प्रयत्न कर रहे थे 

संदेश पहुंचाने की इसी बेचैनी में बांबे (अब मुंबई) में कुछ युवाओं ने एक बैठक की जिसमें उषा मेहता, विट्ठलदास झवेरी के अलावा नरीमन अबराबाद प्रिंटर भी शामिल थे। इस मीटिंग में भारत छोड़ो का संदेश वृहत्तर जनसुमदाय तक पहुंचाने के लक्ष्य पर चर्चा हो रही थी। आरंभ में वो लोग समाचार पत्र निकालने पर चर्चा कर रहे थे और लगभग तय हो गया था कि एक अखबार निकाला जाए। पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि उषा मेहता ने बैठक में अखबारों को लेकर अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की चर्चा की। फिर विकल्प पर विचार आरंभ हुआ। उषा मेहता ने रेडियो की चर्चा की तो सबका ध्यान नरीमन प्रिंटर की ओर गया। कुछ ही समय पहले नरीमन ब्रिटेन से रेडियो की तकनीक सीखकर भारत लौटा था। थोड़ी देर बाद तय हुआ कि स्वाधीनता के विचार को जनता तक पहुंचाने के लिए गुप्त रेडियो आरंभ किया जाए। उषा मेहता को समाचार पढ़ने की जिम्मेदारी दी गई। नरीमन और उषा नेहता ने साथ मिलकर पुराने ट्रांसमीटरों को जोड़कर गुप्त रेडियो सेवा आरंभ किया। कहा जाता है कि पुराने ट्रांसमीटर आदि जुटाने में शिकागो रेडियो के उस समय के मालिक ननका मोटवाणी ने इन युवाओं की मदद की थी। हौसले को पंख लगते देर नहीं लगी और 14 अगस्त 1942 को किसी अज्ञात स्थान पर इस गुप्त रेडियो की स्थापना की गई। 27 अगस्त को इसका पहला प्रसारण हुआ। उषा मेहता की आवाज गूंजी, ये कांग्रेस की रेडियो सेवा है जो भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है। इस पहले प्रसारण में उषा मेहता ने रेडियो की फ्रीक्वेंसी भी बताई थी।  

इस गुप्त रेडियो के प्रसारण से अंग्रेजों के कान खड़े हो गए। उन्होंने इसके बारे में पता लगाना आरंभ कर दिया। गुप्त रेडियो के प्रसारणकर्ता एक प्रसारण के बाद जगह बदल देते थे। इसपर गांधी के विचारों का प्रसारण भी होने लगा। अंग्रेजो की परेशानी बढ़ने लगी और उन्होंने खोजबीन तेज कर दी। आखिरकार तीन महीने से कुछ अधिक समय बाद अंग्रेजों ने नवंबर 1942 में प्रसारण स्थान का पता लगा लिया और उषा मेहता को साथियों समेत गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदतमा चला और उनको चार साल की जेल की सजा हुई। इस गुप्त रेडियो का प्रसारण तीन महीने ही हुआ लेकिन इन तीन महीनों में उषा मेहता ने अपने प्रसारण से जनता को जागरूक करने का कार्य किया। .वाओं में ये विश्वास भी भर दिया कि आजादी के आंदोलन में तकनीक का सहारा लिया जा सकता है। 1946 में जेल से उनकी रिहाई हुई। उषा मेहता का योगदान इस मायने में विशिष्ट है कि उन्होंने उस समय तकनीक का सहारा लिया जब इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। स्वाधीनता के बाद उषा मेहता ने मुंबई विशश्वविद्यालय से जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया। 25 मार्च 1920 को सूरत के पास एक गांव में जन्मी उषा मेहता का निधन अस्सी वर्ष की उम्र में 2000 में हुआ। 

Saturday, May 21, 2022

भारत के भविष्य का उत्सव


फ्रांस में आयोजित विश्व प्रसिद्ध कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदी के कालजयी कवि जयशंकर प्रसाद की कविता।  यह सोचना या कल्पना करना थोड़ा कठिन था लेकिन फेस्टिवल के इस संस्करण में ये हुआ। इंडिया फोरम के एक कार्यक्रम में अभिनेत्री वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियों से एक चर्चा सत्र का समापन किया। जब वाणी ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियां, हिमाद्री तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढे चलो, सुनाई तो हाल तालियों से गूंज उठा। वाणी ने ‘बढ़े चलो’ से भारतीय दर्शन को जोड़कर आगे बढ़ने की बात कही। कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान हिंदी के कई वाक्य और मुहावरे गूंजे। सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इंडिया फोरम के मुख्य मंच से अपनी बात ही हिंदी गीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं’ से आरंभ की। गीतकार और लेखक प्रसून जोशी ने भी भारत की रचनात्मकता को ‘बेचैन सपने’ जैसे पद से जोड़ा और कुछ कर गुजरने की बात की। लगभग इसी समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वडोदरा के युवा शिविर को संबोदित कर रहे थे। उन्होंने भी कुछ इसी तरह की बात की। उन्होंने भारत को दुनिया की नई उम्मीद बताते हुए कहा था कि कोरोनाकाल में संकट के बीच दुनिया को वैक्सीन और दवाईयां पहुंचाने से लेकर बिखरी हुई सप्लाई चेन के बीच आत्मनिर्भर भारत की उम्मीद तक, वैश्विक अशांति और संघर्षों के बीच शांति के लिए एक सामर्थ्यवान राष्ट्र की भूमिका तक, भारत आज दुनिया की नई उम्मीद है। ऐसे वक्त में जब देश में कुछ राजनीतिज्ञ हिंदी और भाषा को लेकर राजनीति कर रहे हों तो वैश्विक मंच पर भारत के गौरव को, भारतीय दर्शन को, भारत के युवाओं के सपनों को हिंदी में अभिव्यक्त करना न सिर्फ हिंदी बल्कि भारतीय भाषाओं का भी सम्मान है। वोट की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बनाकर समाज को बांटने की जुगत में लगे नेताओं को ये बात समझनी होगी कि भारत की आकांक्षाओं को  वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए वैश्विक मंचों पर भारतीय भाषा में बात करनी होगी। हिंदी के लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि हिंदी की उन्नति का रास्ता भी भारतीय भाषाओं के आंगन से होकर जाता है। इस बार कान फिल्म महोत्सव में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस सोच को पूरी दुनिया के सामने रखा। यह अनायास नहीं था कि मंत्री अनुराग ठाकुर जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ रेड कार्पेट पर चल रहे थे तो उनकी शेरवानी के बटन पर हिंदी, मराठी, गुजराती समेत अन्य भारतीय भाषाओं में भारत लिखा था। 

भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान को गाढ़ा करना है तो उसको भारत की कहानियों पर ध्यान देना होगा। अभिनेता माधवन ने ठीक कहा कि उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश तक में भारतीय समाज के नायकों की, उनकी सफलताओं की कहानियां बिखरी हैं। उन कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो भारतीय फिल्मों की व्याप्ति पूरी दुनिया में होगी। आर्यभट्ट से लेकर सुंदर पिचाई तक भारतीयों की सफलता की कहानी पूरी दुनिया को बताने की जरूरत है। माधवन ने इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की जिंदगी पर आधारित फिल्म राकेट्री, द नंबी इफेक्ट बनाई है जिसका प्रदर्शन कान में हुआ। ये फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगू समेत कई भारतीय भाषाओं में बनाई गई है। वैज्ञानिकों और तकनीक के महारथियों के जीवन पर बनी फिल्मों में अलग-अलग देशों के दर्शकों की रुचि इस वजह से संभव है कि उनके कार्य को कई देश के लोग जानते हैं। आज अगर गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और माइक्रोसाफ्ट के सत्य नडेला की सफलता की कहानी को फिल्मों में चित्रित किया जाता है तो वो न केवल दुनिया के युवाओं को आकर्षित करेगी बल्कि भारत के गौरव को भी दुनिया में स्थापित कर सकेगी। आज अगर कोई फिल्मकार कोरोनाकाल में भारत की महामारी से लड़ने की जिजीविषा को केंद्र में रखकर फिल्म बनाता है तो पूरी दुनिया उसको ध्यान से देखेगी। कोरोनाकाल में जिस तरह से भय का वातावरण बना था और उस वातावरण में भारत ने वैक्सीन बनाया। भयंकर भय के उस माहौल में इस विशाल देश में वैक्सीन को अलग अलग राज्यों तक पहुंचाना और करोड़ों लोगों का टीकाकरण कराना किसी थ्रिलर से कम नहीं है। 

यह भी एक सुखद संयोग है कि कान फिल्म महोत्सव अपनी स्थापना के पचहत्तरवें साल में है, भारत अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है और भारत और फ्रांस के राजनयिक संबंध के भी 75 साल हो रहे हैं। इस संयोग को कान फिल्म फिल्म फेस्टिवल ने उत्साह के साथ समरोहपूर्वक मनाने का निर्णय लिया। भारत को फेस्टिवल के दौरान सम्मानित देश (कंट्री आफ आनर) का दर्जा दिया गया। ये पहली बार हो रहा है कि फिल्म फेस्टिवल के दौरान किसी भी देश को सम्मानित देश के तौर पर आमंत्रित किया गया है। कान फिल्म फेस्टिवल में चेतन आनंद की 1946 की फिल्म ‘नीचा नगर’ को सम्मानित किया जा चुका है, सत्यजित राय की फिल्म पाथेर पंचाली को भी । 2013 में अमिताभ बच्चन और लियेनार्दो द कैप्रियो ने संयुक्त रूप से कान फिल्म फेस्टिवल के औपचारिक शुरुआत की घोषणा की थी। भारत के फिल्मकार समय समय पर कान फिल्म फोस्टिवल की जूरी में नामित होते रहे हैं। अब कान फिल्म फेस्टिवल ने भारत की फिल्मों को,यहां की कहानियों को लेकर विशेष रुचि दिखाई है। कान फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों और फिल्मकारों को इतना महत्व मिलना ये साबित करता है कि पूरी दुनिया भारतीय मनोरंजन जगत को बहुत संजीदगी से देख रही है। मशहूर फिल्मकार और भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे के चेयरमैन शेखर कपूर ने कान फिल्म फेस्टिवल के मंच से कहा कि ये भविष्य का उत्सव है। 

अब जब पूरी दुनिया भारतीय फिल्मों की ओर एक उम्मीद भरी नजरों से देख रही है तो भारतीय फिल्मकारों खासतौर पर हिंदी के फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के सामने उन उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है। ऊलजलूल कहानियों से आगे जाकर, बेवजह की मारधाड़ और यौनिकता से आगे जाकर भारत के गौरव को स्थापित करनेवाली कहानियों को लेकर फिल्में बनानी होंगी। फिल्मकारों के लिए मुनाफा पहली प्राथमिकता है, होनी भी चाहिए लेकिन सिर्फ मुनाफे के लिए फिल्म बनाकर इस कला को समृद्ध नहीं किया जा सकता है। कला की उत्कृष्टता को बरकरार रखकर भी मुनाफा कमाया जा सकता है। पूर्व में कई फिल्मकारों ने ऐसा किया भी है। फिल्म ‘रंग दे बसंती’ और ‘तारे जमीं पर’ आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। राजमौली ने अपनी फिल्मों में साबित किया है कि कला की भव्यता से भी जमकर पैसा कमाया जा सकता है। इस काम में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की महती भूमिका हो सकती है। भारत सरकार की इस संस्था को आगे आकर उन फिल्मकारों की पहचान करनी होगी जो भारतीय भूभाग पर बिखरी कहानियों की खोज करें। साथ ही उन फिल्मकारों को चिन्हित करें जो इन कहानियों पर उत्कृष्ट फिल्में बनाकर दर्शकों के सामने पेश कर सकें। इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय फिल्म विकास निगम के पुनर्गठन के कार्य में तेजी लाई जाए। इसको अफसरशाही और लालफीताशाही की जकड़न से मुक्त किया जाए। फिल्म की समझ रखनेवाले, भारतीय कहानियों को, भारतीय भाषाओं में समझने और उसको भारतीय भाषाओं में ही अभिव्यक्त करनेवालों की भूमिका बढ़ाई जाए। अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल भारतीय फिल्मों का भला होगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया जिस ‘नई उम्मीद’ की बात कर रहे हैं वो भारतीय फिल्म जगत में भी साकार हो सकेगा। 


Tuesday, May 17, 2022

दृढ इच्छाशक्ति से सिक्किम का विलय


स्वाधीनता के बाद जब रजवाड़ों के भारत में विलय के समय का इतिहास देखा जाए तो जवाहरलाल नेहरू अपने मित्रों को लेकर उदार दिखते हैं। कश्मीर में वो शेख अब्दुल्ला को लेकर साथ चलने पर लगातार बल देते थे। कश्मीर को लेकर उनके बयानों से उलझन भी पैदा होती थी। सरदार कई बार नेहरू के कदमों से खिन्न भी हो जाते थे। जून 1946 में नेहरू शेख अब्दुल्ला के समर्थन में कश्मीर जाना चाहते थे। सरदार पटेल ने उसका विरोध किया था। 11 जुलाई 1946 को डी पी मिश्रा को पटेल ने लिखा, ‘उन्होंने (नेहरू ने) हाल में बहुत सी ऐसी बातें कही हैं, जिनसे जटिल उलझनें पैदा हुई हैं। कश्मीर के संदर्भ में उनकी गतिविधियां, संविधान सभा में सिख चुनाव में हस्तक्षेप, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के तुरंत बाद प्रेस कांफ्रेंस बुलाना, ये सभी कार्य भावनात्मक पागलपन के थे और इनसे हम सभी को इन मामलों को हल करने में बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ा था। किंतु इन सभी निष्कलंक एवं अविवेकपूर्ण बातों को उनके स्वतंत्रता प्राप्ति के आवेश का असमान्य उत्साह माना जा सकता है।‘ महाराजा हरि सिंह से नेहरू के अच्छे संबंध नहीं थे इस वजह से उनको कश्मीर के भारतीय गणतंत्र में विलय के लिए सरदार पटेल पर निर्भर रहना पड़ रहा था। लेकिन ऐसी कोई मजबूरी सिक्किम को लेकर नहीं थी। आजादी के समय सिक्किम का राजा थोंडुप नामग्याल, नेहरू के मित्र थे। 1947 मे जब भारत को आजादी मिली तो सरदार पटेल और संविधान सभा के सलाहकार बी एन राव इस मत के थे कि सिक्किम का भारत में विलय किया जाना चाहिए लेकिन नेहरू ने इसका विरोध किया था। 

सिक्किम के भारत में विलय पर प्रामाणिक पुस्तक लिखने वाले जी बी एस सिद्धू ने अपनी पुस्तक, सिक्किम, डान आफ डेमोक्रेसी में उपरोक्त प्रंसग का भी उल्लेख किया है। प्रामाणिक इस वजह से कि वो इस अभियान का हिस्सा थे। उनके मुताबिक जवाहरलाल नेहरू अपने आदर्शवाद, एशिया को लेकर अपनी दृष्टि और चीन की स्थिति को ध्यान में रखकर इस विलय का विरोध कर रहे थे। नेहरू चाहते थे कि सिक्किम को विशेष दर्जा मिले। ये सब तब हो रहा था जब सिक्किम स्वाधीनता के पहले चैंबर आफ प्रिसेंस और संविधान सभा का सदस्य भी था। बावजूद इसके थोंडुप नामग्याल सिक्किम को स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर कायम रखना चाहता था। उसने तो आजादी के करीब एक पखवाड़े पहले दार्जिलिंग को सिक्किम में मिलाने की चाल भी चली थी जो नाकाम हो गई थी। इस मामले में नेहरू की चली और सिक्किम को विशेष दर्जा दिया गया। फरवरी 1948 में सिक्किम के साथ भारत सरकार ने एक समझौता किया जिसमें 11 मामलों को छोड़कर सभी अधिकार सिक्किम के राजा को दिए गए। इसमें विदेश और रक्षा मामले भारत सरकार के पास रहे। 1950 में सिक्किम के राजा और भारत सरकार के बीच एक और समझौता हुआ। सिक्किम की जनता इससे खुश नहीं थी और वहां लगातार लोकतंत्र के पक्ष में आंदोलन चल रहा था। तत्कालीन भारत सरकार इसको दबाने में नामग्याल का सहयोग कर रही थी। राजा ने एक अमेरिकी महिला से शादी कर ली थी जिसके बारे में ये धारणा थी वो सीआईए की एजेंट है। 

कालांतर में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं नामग्याल दिल्ली आए। उनसे मिले और भारत के साथ सिक्किम की जारी संधि से मुक्त होकर स्वतंत्र राष्ट्र की अपेक्षा जाहिर की। यही वो निर्णायक मोड़ था जब इंदिरा गांधी ने फैसला किया कि सिक्किम का पूर्ण रूप से भारत में विलय होना चाहिए। इस बीच बंग्लादेश की समस्या सामने आई लेकिन साथ ही साथ सिक्किम को लेकर कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर तैयारी आरंभ हो चुकी थी। टी एन कौल उस समय विदेश सचिव थे। वो सिक्किम के भारत में पूर्ण विलय की बजाए चाहते थे कि पूर्व में हुए समझौते के आधार पर एक स्थायी संधि की जाए। इस स्थायी संधि के लिए कौल ने एक ड्राफ्ट तैयार किया और उसपर मंत्रियों के समूह में चर्चा हुई। इस चर्चा में तत्ताकलीन सेनाध्यक्ष जनरल मानिक शा को भी बुलाया गया था। सिद्धू की पुस्तक के मुताबिक किसी मंत्री ने इसपर कुछ नहीं बोला लेकिन जनरल मानिक शा ने कहा कि आपलोग चाहे जो भी निर्णय लें लेकिन मुझे तो सैनिकों की तैनाती और आपरेशन की स्वतंत्रता है।  जनरल शा के इस वाक्य से संदेश स्पष्ट था। इंदिरा गांधी ने अपने पिता नेहरू की सोच के उलट सिक्किम को पूरी तरह से भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाने का जिम्मा रिसर्च एंड एनलैसिस विंग( आरएडब्लू) के चीफ आर एन काव को सौंपा। ये वो दौर था जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हो चुके थे और बंग्लादेश अस्तित्व में आ चुका था। काव ने रा के ही एक अधिकारी जी बी एस सिद्धू को इसका जिम्मा सौंपा। 

सिक्किम का ये आपरेशन आम खुफिया आपरेशन की तरह नहीं था। इसमें राजनीतिक तंत्र का उपयोग करके लक्ष्य हासिल करना था। सिद्धू ने सिक्किम में लोकतंत्र के समर्थक नेताओं के साथ संपर्क बढ़ाना आरंभ किया। उन्होने सिक्किम नेशनल कांग्रेस के दोरजी काजी और जनता कांग्रेस के महासचिव एस के राय को विश्वास में लिया और उनको हर तरह की मदद देने लगे। उद्देश्य था कि नामग्याल को अलग थलग करना, लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत करना और चुनाव करवाकर विलय को अंजाम देना। सिद्धू को काव का स्पष्ट निर्देश था कि वो अपनी गतिविधियों की जानकारी किसी भारतीय अधिकारी के साथ भी साझा न करें। इस मिशन की जानकारी सिर्फ तीन लोगों को थी, सिद्धू, कोलकाता में रा के अफसर पी एन बनर्जी और काव। इंदिर जी को को तो थी ही।  सिद्धू उस वक्त के सिक्किम कांग्रेस के नेता दोरजी काजी को मजबूत कर रहे थे। वो भारत के साथ विलय के लिए जनमत तैयार कर रहे थे। अप्रैल 1973 में राजा के विरोध की आग इतनी तेज हो गई कि उसको भारत सरकार के साथ एक समझैता करना पड़ा। तय हुआ कि भारत के निर्वाचन आयोग की देखरेख में राज्य में विधानसभा के चुनाव होंगे। अप्रैल 1974 में सिक्किम में चुनाव करवाए गए जिसमें सिक्किम कांग्रेस को 32 में 31 सीटें मिली। 

अब इस आपरेशन का दूसरा चरण आरंभ हुआ। रा के सामने ये चुनौती थी कि सिक्किम के सभी नवनिर्वाचित सदस्य काजी के पक्ष में एकजुट रहें और भारत के साथ विलय का प्रस्ताव पारित हो। नई दिल्ली से कोई निर्देश आने तक राजा की साजिशों पर ध्यान रखा जाए। सिक्किम के अन्य नेता के सी प्रधान और बी बी गुरुंग पर भी नजर रखी जा रही थी। नई दिल्ली से हरी झंडी मिलते ही विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित हुआ कि भारत के साथ सक्रिय संबंध बनाए जाएं और संवैधानिक संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया जाए। नामग्याल ने इसका कड़ा विरोध किया। लेकिन तबतक तय हो चुका था कि सिक्किम में  जनमत संग्रह करवाया जाए। नामग्याल जनमत संग्रह के लिए राजी नहीं हो रहा था। वो इसको किसी तरह फेल करना चाहता था। उसकी संदिग्ध गतिविधियां तेज हो गई थीं। तब भारतीय सेना को उसके महल में हल्की सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी थी। उसके कुछ दिनों जनमत संग्रह हुआ और 97 फीसदी ने सिक्किम के भारत में विलय को मंजूरी दी। इसके बाद पहले लोकसभा और फिर राज्यसभा में विलय को मंजूरी दी और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही सिक्किम भारत का अंग बन गया। नेहरू ने ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के आवेश के असमान्य उत्साह’ में जो गलती की थी उसको उनकी बेटी की दृढ़ इच्छाशक्ति ने सुधारा। 

Saturday, May 14, 2022

फिल्मों के स्वावलंबन का सफर


आज पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव के अवसर पर हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि भारतीय फिल्मों ने स्वाधीनता के बाद जो स्वावलंबन की राह पकड़ी वो कैसी थी, उनमें किस तरह की बाधाएं आ रही थीं। स्वाधीनता के बाद के भारतीय फिल्म के परिदृश्य पर विचार करने से पहले फिल्मों को लेकर दो बयान पर नजर डाले लेते हैं। पहला बयान रूस के कम्युनिस्ट नेता लेनिन का और दूसरा है महात्मा गांधी का। रूस की क्रांति के बाद लेनिन ने कहा था कि ‘हमारे लिए सिनेमा सभी कलाओं से अधिक महत्वपूर्ण है। सिनेमा केवल लोगों के मन बहलाव का नहीं बल्कि सामाजिक शिक्षा, संवाद स्थापित करने तथा हमारी विशाल जनसंख्या को एकसूत्र में बांधने का सशक्त साधन भी है।‘ रूसी क्रांति के दो साल बाद वहां के फिल्म उद्योग का राष्ट्रीयकरण करके उसको एक मंत्रालय के अधीन कर दिया गया था। इसके ठीक दस साल बाद भारत में स्वाधीनता संग्राम तेज हुआ। गांधी इसके सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित हुए। उस वक्त तक गांधी फिल्म की शक्ति को पहचान नहीं पाए। पहचान तो वो बाद में नहीं पाए। गांधी फिल्मों को एक बुराई की तरह देखते थे। 1929 में वो बर्मा (अब म्यांमार) गए थे। वहां उनको एक नाटक देखना पड़ा। देखना पड़ा इस वजह से क्योंकि वो सोच कर गए थे कि मजदूरों की किसी सभा में जाना पड़ा रहा है। लेकिन जब वहां पहुंचे तो  नाटक का मंचन हो रहा था। गांधी ने वहां एक भाषण दिया जो गांधी वांग्मय में संकलित है। गांधी ने कहा, ‘सार्वजनिक नाटकघरों में जाने के अन्य जो भी परिणाम हो यह तो निश्चित ही है कि नाटकों ने अनेकानेक युवकों का आचरण और चरित्र भ्रष्ट कर दिया है। आप पक्की उम्र के लोग चाहे अपने को नाटकों के दुष्प्रभाव से बिल्कुल बरी मान लें, लेकिन आपको अपने छोटे-छोटे बच्चों का भी खयाल करना चाहिये जिनको आपत्तिजनक नाटकों में ले जाकर आप उनके निर्दोष, निष्पाप मन के साथ कितना बड़ा अनाचार कर रहे हैं।  आप चारों ओर नजर तो डालिये वर्तमान व्यवस्था के कुप्रभाव में पनपने वाले सिनेमा, नाटक, घुड़दौड़, शराबखाने और अफीमघर इत्यादि के रूप में समाज के ये सभी शत्रु चारों और से मुंह बाए हमारी घात में खड़े हैं।‘  सिनेमा को गांधी समाज का शत्रु मानते थे लेकिन लेनिन उसको सामाजिक शिक्षा का माध्यम मानते थे।  एक तरफ सिनेमा को लेकर लेनिन के विचार तो दूसरी तरफ गांधी के। 

स्वतंत्रता के बाद भारतीय फिल्मों की चुनौतियों पर बात करने के पहले गांधी के विचारों का ध्यान ऱखना होगा। 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो फिल्म उद्योग के लोगों ने महात्मा गांधी को एक कार्यक्रम में आमंत्रित करना चाहा। उस समय गांधी के सचिव ने आयोजकों को उत्तर दिया था कि फिल्म से संबंधित किसी भी कार्यक्रम में गांधी जी को बुलाने के बारे में सोचिए भी नहीं क्योंकि फिल्मों को लेकर बापू की राय अच्छी नहीं है। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी फिल्मों को पाप फैलाने का माध्यम मानते थे और कहा करते थे कि फिल्में पश्चिम के घटिया मूल्यों को भारतीय समाज पर थोपतीं है। ये ठीक है कि दूसरे विश्वयुद्ध के पहले और बाद में भी विदेशी फिल्में बड़ी संख्या में भारत में आ रही थीं। उनका प्रदर्शन भी सफलतापूर्वक होता था। उनमें से कई फिल्मों में नग्नता होती थी। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि दर्जनों भारतीय निर्माता निर्देशक अपने पौराणिक चरित्रों और संत महात्माओं को केंद्र में रखकर फिल्में बना रहे थे। जो काफी सफल भी हो रही थी। 1917 में दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। 1918 में श्रीनाथ पाटणकर ने ‘राम वनवास’ के नाम से एक ऐतिहासिक फिल्म बनाई। पाटणकर ने इसके बाद ‘सीता स्वंयवर’, ‘सती अंजनि’ और ‘वैदेही जनक’ नाम से फिल्में बनाईं थीं। मूक फिल्मों के दौर में तकरीबन हर वर्ष राम कथा पर केंद्रित फिल्में बनती थीं, इनमें से अहिल्या उद्धार, श्रीराम जन्म, लव कुश, राम रावण युद्ध, सीता विवाह, सीता स्वयंवर और सीता हरण आदि प्रमुख फिल्में हैं। बोलती फिल्मों के दौर में भी रामकथा को आधार बनाकर कई फिल्में बनीं। प्रकाश पिक्चर्स ने वाल्मीकि रामयाण पर आधारित चार फिल्में बनाईं, ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘राम वाण’ और ‘सीता स्वयंवर’। इन फिल्मों में राम का किरदार प्रेम अदीब और सीता की भूमिका शोभना समर्थ ने निभाई थी। बावजूद फिल्मों को लेकर गांधी के विचार नहीं बद सके थे। उसका असर प्रत्यक्ष और परोक्ष असर भारत के फिल्म उद्योग पर पड़ा। फिल्मों को लेकर सरदार पटेल और नेहरू के विचार गांधी से अलग थे। गांधी के जीवनकाल में ही पटेल ने मुंबई (तब बांबे) में फिल्म उद्योग के लोगों की एक सभा में उनको भरपूर सहयोग का वादा किया था। गांधी के निधन के बाद नेहरू ने भी फिल्मों को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया था। 

इस पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय फिल्म उद्योग लगातार बढ़ता रहा तो इसके पीछे की वजह फिल्मों को लेकर इससे जुड़े लोगों का इस विधा में विश्वास था। स्वाधीनता के बाद 1948 में एक फिल्म रिलीज हुई थी, जिसका नाम था चंद्रलेखा। इस फिल्म का निर्माण मद्रास की जैमिनी स्टूडियो ने किया था और इसके निर्देशक एस एस वासन थे। ये भव्य फिल्म तीस लाख रुपए की लागत से तैयार हुई थी। सालभर में करीब दो करोड़ रुपए का कारोबार इस फिल्म ने किया था। यहीं से हिंदी फिल्मों को सफलता का एक सूत्र मिला जिसको कई फिल्म निर्माताओं ने अपनाया। ये सूत्र था एक नायिका और उसको चाहनेवाले दो अभिनेता। ये फार्मूला कई सालों तक चलता रहा। अब भी गाहे बगाहे किसी न किसी फिल्म में ये कथानक देखने को मिल जाता है। 1950 के आसपास कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिसने भारतीय फिल्मों के स्वरूप को बहुत हद तक प्रभावित किया। भारत सरकार ने 1949 में एस के पाटिल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसको फिल्म उद्योग की स्थिति के बारे में आकलन करने और उसमें बेहतकी के लिए सुझाव का जिम्मा सौंपा गया। 1951 में राजकपूर की फिल्म अवारा रिलीज हुई। इस फिल्म को देश के अलावा विदेश खासतौर पर रूस में अपार लोकप्रियता मिली। इसके सालभर बाद 1952 में देश के चार महानगरों में फिल्म फेस्टिवल का आरंभ हुआ। बांबे ( तब मुंबई ), दिल्ली, चेन्नई (तब मद्रास) और कोलकाता (तब कलकत्ता) में भारतीय के साथ साथ विदेशी फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। इसने भारतीय फिल्म उद्योग को विदेश की कलात्मक फिल्मों से परिचय करवाया। जापान, रूस और इंगलैंड से फिल्में आईं। इस आयोजन से हमारे देश में फिल्म संस्कृति के विकास की नींव पड़ी। 

स्वाधीनता के पहले जिस स्टूडियो व्यवस्था की नींव पड़ी थी वो आज बहुत सफल है। आज फिल्मों के निर्माण की दर्जन भर से अधिक कंपनियां करोड़ों और कुछ तो अरबों रुपए का कारोबार कर रही हैं। अगर हम स्टूडियो के व्यावसायीकरण की बात करें तो इसका आरंभ स्वाधीनता के पहले ही हो गया था। फरवरी 1934 में हिमांशु राय ने बम्बई टाकीज के लिए पच्चीस लाख रुपए जुटाने के लिए सौ रुपए के पच्चीस हजार शेयर जारी किए थे। देविका रानी ने लिखा था कि ‘1935 में जब हमने बम्बई के मलाड में बम्बई टाकीज स्थापित किया तो तो उसे एक व्यापार की तरह चलाया। हमारी कंपनी के पास श्रेष्ठ उपकरण थे- बेल एंड हावेल कंपनी के कैमरे थे और आरसीए ध्वनि पद्धति थी।‘ इसके पहले भी फिल्म कंपनियां फिल्मों का निर्माण कर रही थीं लेकिन हिमांशु राय ने उसको एक अलग आयाम दिया। आज भारतीय फिल्म उद्योग जगत दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में शामिल हो चुका है और निरंतर मजबूत हो रहा है। 


Saturday, May 7, 2022

विदेशी सिद्धांत से उथला विमर्श


हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनपर नियमित अंतराल के बाद विमर्श होते रहते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा है स्त्री विमर्श का। स्त्री विमर्श के मुद्दे पर हिंदी के छोटे-मंझोले से लेकर बड़े लेखक तक टिप्पणियां करके सुर्खियां बटोरते रहते हैं। जब इंटरनेट मीडिया के प्लेटफार्म्स नहीं थे तो राजेन्द्र यादव अपनी पत्रिका हंस के माध्यम से इस मुद्दे को हवा देते रहते थे। हंस में होनेवाली चर्चा की देखा-देखी अन्य साहित्यिक पत्रिकाएँ भी स्त्रियों के मुद्दे पर बहस करवाते थे। अब हिंदी साहित्य की चर्चा का मंच फेसबुक हो गया है। राजेन्द्र यादव ने जिस स्त्री विमर्श को हिंदी साहित्य में चर्चित किया था अब वो विमर्श उससे आगे निकल गया है। राजेन्द्र यादव ने जिस स्त्री गाथा को आरंभ किया था अब उसकी उत्तर गाथा या उत्तर आअधुनिक गाथा लिखी जा रही है। फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द बोउवा की 1949 में प्रकाशित पुस्तक ‘द सेकेंड सेक्स’ से यादव बहुत प्रभावित थे। उसके आधार पर ही उन्होंने हिंदी में विमर्श चलाया। इसकी नकल पर बाद में हिंदी के कई लेखक स्त्री विमर्श का झंडा उठाकर चलने लगे। सीमोन विवाह संस्था का विरोध करती थीं। अल्जीरिया के मुक्ति संग्राम के समय कनाडा की सरकार ने उनके एक साक्षात्कार पर इस वजह से प्रतिबंध लगा दिया था कि वो विवाह संस्था का विरोध करती थीं। राजेन्द्र यादव ने सीमोन के लेख से स्त्री विमर्श के सूत्र निकाले और हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श को परोक्ष रूप से देह विमर्श में तब्दील कर दिया। वही देह विमर्श अब विद्रूप रूप में सर्वजनिक बहस का हिस्सा बनने लगा है। पश्चिमी समाज और सिद्धांत के अंधानुकरण से हिंदी में  स्त्री विमर्श भारतीय संदर्भों से कटता चला गया। 

भारतीय संस्कृति में स्त्री हमेशा से सबल रही हैं। उनको तमाम तरह के अधिकार प्राप्त रहे हैं। यहां की स्त्रियों की आदर्श तो सावित्री रही हैं। वो सावित्री जिनको मालूम होता है कि सत्यवान की आयु एक वर्ष ही बची है, बावजूद इसके उसने सत्यवान से ही विवाह किया। पति से उनके प्रेम के आगे यमराज को भी झुकना पड़ा था। हमारे यहां तो कुंती और द्रोपदी जैसी स्त्रियां हैं जिनके आचार और व्यवहार के आधार पर स्त्री विमर्श की बात की जानी चाहिए। प्राचीन काल से ये परंपरा रही है कि स्त्रियां अपना वर खुद चुनेंगी। स्वयंवरों की परंपरा लंबे समय तक चलती रही है। तमाम तरह की बाधाओं को झेलते हुए भी पिता और भाई भी अपने परिवार की स्त्री की इच्छा का मान रखते थे। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस तरह की अनेक कहानियां मिलती हैं। जब हम भारतीय समाज और भारतीय स्त्रियों के व्यवहार को विदेशी समाज और विदेशी मान्यताओं और सिद्धांतों के आधार पर आकलन करने लगते हैं तो विमर्श का भटकना स्वाभाविक है। ये मानसिकता की बात है। इस संदर्भ में एक आधुनिक उदाहरण देना चाहूंगा। फिल्म मदर इंडिया का नामांकन आस्कर पुरस्कार हेतु हुआ था। ये फिल्म जूरी के सामने पहुंची और जूरी ने इसको देखकर इस फिल्म को पुरस्कार योग्य नहीं माना। उनका तर्क था कि कहानी बहुत हल्की और हास्यास्पद है। नायिका राधा, जिसकी भूमिका नर्गिस ने निभाई थी, अपने बेटों को खाना नहीं खिला पाने की वजह से परेशान थी। वो मदद के लिए सुखीलाला, जिसको कन्हैया लाल ने अभिनीत किया, के पास जाती है। सुखीलाला उसपर आसक्त है और उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है, नर्गिस उसकी पिटाई करके वहां से निकल जाती है। इस दृश्य को देखकर उस समय जूरी के सदस्य ने कहा था कि जब नायिका इतनी परेशान थी तो उसको लाला की सेक्सुअल फेवर की मांग मानने में दिक्कत क्या थी। जूरी के एक और सदस्य ने नर्गिस के अपने बेटे को गोली मार देने के दृश्य का उपहास उड़ाया था। उसने कहा था कि अगर किसी के बेटे ने किसी लड़की को छेड़ दिया तो उसको जान से मारने की क्या जरूरत थी, ये दृश्य हास्यास्पद हैं। जूरी के सदस्य नर्गिस के उस संवाद की गहराई या भारतीय समाज की मानसिकता को समझ ही नहीं पाए जहां वो कहती है कि बेटा दे सकती हूं, लाज नहीं। ये भारतीय समाज है, ये भारत की स्त्री है, ये भारतीय स्त्री का मन है, जिसको विदेशी कभी नहीं समझ पाएंगे। मदर इंडिया को आस्कर नहीं मिला।  

हिंदी साहित्य में फेसबुक जैसे माध्यमों पर स्त्री विमर्श करने वाले अपने पौराणिक ग्रंथों को संदर्भ से काटकर उद्धृत करते रहे हैं। पिछले दिनों ये पढ़ने को मिला कि मनुस्मृति में ये उल्लिखित है कि वर पक्ष से धन देकर कन्या का विवाह किया जाता था। बलात्कारियों से शादी का प्रविधान भी मनुस्मृति में मिलता है, आदि आदि। अब ये बातें बिल्कुल संदर्भ से काटकर और अज्ञानतावश की जाती हैं। मनुस्मृति में आठ तरह के विवाह का उल्लेख मिलता है। ब्राह्मविवाह, दैव विवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह, गांधर्व विवाह, असुर विवाह, राक्षस विवाह और पैशाच विवाह। फेसबुक पर जिन दो विवाहों की चर्चा की गई उसका नाम है असुर विवाह और पैशाच विवाह। वर पक्ष से धन लेकर कन्या को विवाह के लिए सौंपने को मनु संहिता में असुर विवाह कहा गया है। इसी तरह बलात्कारियों के साथ कन्या का विवाह का प्रस्ताव या विवाह करने को पैशाच विवाह कहा गया है। विवाह के लिए हत्या करने और उसके बाद होनेवाली शादी को राक्षस विवाह कहा गया है। बाकी पांचों प्रकार के विवाह में स्त्री का सम्मान होता है। कन्या का विवाह सुयोग्य वर से, माता पिता की इच्छा से, कन्यादान से और स्त्री पुरुष के व्यक्तिगत फैसले को समाजिक वैधता देना आदि रहा है। शकुंतला दुश्यंत, नल-दमयंती आदि की कहानियां हमारे सामने हैं। अज्ञानियों को तो बस नकारात्मक चीजें ही दिखती हैं। फेसबुक के स्त्री विमर्शकारों को भारतीय समाज और इसकी परंपराओं को पढ़ने और समझने की आवश्यकता है।

हमारे देश में वामपंथियों ने भी स्त्री विमर्श के नाम पर खूब नारेबाजी की लेकिन उनकी कथनी और करनी में अंतर रहा है। कम्यून में स्त्रियों पर किस तरह के अत्याचार होते रहे हैं इसको कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी ने अपने संस्मरणों में स्पष्ट किया है। यहां तक कि सीमोन ने भी माना था कि स्त्रियों की समस्याएं साम्यवाद से नहीं सुलझ सकती हैं। भारत में स्त्रियों को लेकर हमेशा से एक आदर और समानता का भाव रहा है लेकिन जब हम परतंत्र हुए और विदेशी आक्रांताओं ने अपनी संस्कृति को हमारे देश पर थोपी तब यहां की महिलाओं की स्थिति बदतर हुई। हमारे पौराणिक ग्रंथों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि महिलाओं के लिए समाज में खुलापन था। भारतीय राजाओं के दरबार में रानियों के अलग से बैठने की व्यवस्था होती थी और वो दरबार के दैनंदिन क्रियाकलापों में अपनी राय रख सकती थीं, अपनी असहमतियां प्रकट कर सकती थीं। मुगल सम्राज्य की स्थापना के बाद ये खुलापन खत्म हो गया। विदेशियों के राज में ये संभव नहीं रहा। स्त्री विमर्शकारों के साथ भी वही दिक्कत है जो हिंदी के कुछ फिल्मकारों के साथ है। वो जेम्स हेडली चेज या मिल्स एंड बून के उपन्यास पढ़कर रोमांस गढ़ते हैं। उनको कालिदास के ग्रंथों में वर्णित रोमांस का पता ही नहीं है। उनको विद्यापति की नायिकाओं के प्रणय प्रसंगों का उसके प्रभावों के बारे में जानकारी ही नहीं है। विदेशी उपन्यासों के आधार पर गढ़े गए रोमांटिक दृश्य जिस तरह से फूहड़ और अश्लील हो जाते हैं उसी तरह पश्चिमी स्त्री विमर्श की नकल के आधार पर भारतीय स्त्रियों को लेकर किया जाना वाला विमर्श भी फूहड़ और उथला होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय स्त्री की समस्याओं को भारतीय संदर्भों में समझने की कोशिश की जाए।

Saturday, April 30, 2022

कलाकारों के सम्मान की संस्कृति


पिछले दिनों मुंबई जाने का अवसर मिला । महानगर के अलग अलग हिस्सों से गुजरते हुए सड़कों के नाम ने ध्यान आकृष्ट किया। मुंबई के बांद्रा इलाके से गुजरते हुए सबसे पहले नजर पड़ी एक विशाल पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर। चबूतरा छोटे छोटे सफेद पत्थरों से सजा था। उन पत्थरों के बीच उगे पौधों के बीच कलात्मक तरीके से लिखी गई एक पट्टिका लगी थी। उस पर लिखा था बिमल राय पथ। स्थानीय लोगों ने बताया कि वहां पास ही में भारतीय फिल्मों के महानतम निर्देशकों में से एक बिमल राय का घर हुआ करता था। ये वही बिमल राय हैं जिन्होंने दो बीघा जमीन, मधुमती, देवदास जैसी कालजयी फिल्मों का निर्माण किया था। थोड़ा आगे बढ़ने पर ब्रांद्रा रिक्लमेशन के एक तिराहे पर मशहूर गजल गायक पद्मभूषण जगजीत सिंह का नाम दिखा। बताया गया कि उनकी पांचवीं पुण्यतिथि पर इस तिराहे को जगजीत सिंह की स्मृति में समर्पित किया गया। ब्रांद्रा के ही पाली हिल इलाके में अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री नरगिस दत्त के नाम भी एक सड़क दिखी। फिर तो मुंबई घूमते हुए सड़कों के नाम पर नजर जाने लगी। नरीमन प्वाइंट से उपनगरीय इलाकों की तरफ बढते हुए संगीतकार नौशाद अली मार्ग दिखा। सांताक्रूज इलाके में आर डी बर्मन और खार इलाके में एस डी बर्मन साहब के नाम की पट्टिका दिखी। जुहू इलाके में कैफी आजमी के नाम पर पार्क, हास्य कलाकार महमूद के नाम पर चौक, ख्वाजा अहमद अब्बास के नाम पर एक सड़क। ये सूची बहुत लंबी है। मुंबई में परिचितों ने बताया कि पूरे महानगर में कलाकारों, लेखकों के नाम पर सड़कों और चौराहों का नामकरण किया गया है। अब भी किया जाता है।  

मुंबई में गीतकार, संगीतकार, गायक, अभिनेता, फिल्म निर्देशक आदि के नाम पर बनी सड़कों के नाम देखकर अचानक दिल्ली की सड़कों के नाम याद आने लगे। दिल्ली की सड़कों के नाम याद करने पर बाबर रोड, अकबर रोड, लोधी रोड, औरंगजेब लेन, तुगलक रोड, शेरशाह रोड, शाहजहां रोड, अशोक रोड, हुमांयू रोड, महात्मा गांधी मार्ग, इंदिरा चौक, राजीव गांधी चौक आदि का नाम जेहन में आता रहा। लेखकों आदि के नाम पर सड़कों के नाम याद करने की कोशिश करने लगा। सबसे पहले स्मरण हुआ तमिल लेखक कवि सुब्रह्मण्य भारती मार्ग का,अमृता शेरगिल मार्ग, रविशंकर लेन  का फिर याद आया रूस के प्रसिद्ध लेखक टालस्टाय के नाम बनी सड़क का और हिंदी लेखिका दिनेश नंदिनी डालमिया मार्ग का। ढाई दशक से अधिक समय से दिल्ली में रहने के बावजूद याद नहीं पड़ता कि कहीं प्रेमचंद मार्ग हो, निराला मार्ग हो या भारतीय रंगमंच के दिग्गज इब्राहिम अल्काजी के नाम पर ही किसी सड़क का नाम हो। दिल्ली देश की राजधानी है, यहां तो पूरे देश के बड़े लेखकों, कलाकारों के नाम पर सड़कों के नाम होने चाहिए। दिल्ली में रवीन्द्र नाथ टैगोर के नाम पर कोई सड़क नहीं है लेकिन इजरायल के शहर तेल अवीव में टैगोर स्ट्रीट है। दिल्ली में तेलुगू के महान लेखक वी सत्यनारायण या मलयालम के महत्वपूर्ण लेखकों में से एक जी शंकर कुरुप के नाम पर भी कोई सड़क नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानेवाले मध्यप्रदेश के माखनलाल चतुर्वेदी के नाम भी कोई मार्ग दिल्ली में नहीं है। 

प्रश्न ये उठता है कि दिल्ली और मुंबई में ये अंतर क्यों है? दिल्ली अपने नायकों को लेकर इतनी उदासीन क्यों है और मुंबई अपने लेखकों और कलाकरों को लेकर इतना उदार क्यों है?  इसके पीछे के कारणों को देखने पर ये प्रतीत होता है कि मुंबई मराठों की संस्कृति से प्रभावित रहा और दिल्ली मुगलों की संस्कृति के प्रभाव में रहा। मराठा राजाओं के शासनकाल के दौरान अपने कौशल या अपनी कला से समाज को प्रभावित करनेवालों को सम्मान देने की परंपरा रही है। पूरा समाज उनके प्रति एक ऋणभाव में रहता है। मुगलों के दरबार में भी कला और कलाकारों का सम्मान होता था लेकिन सर्वोच्च सम्मान  बादशाह को ही मिलता था। मुगलिया शासन के दौरान इमारतों और स्मारकों के नाम भी बादशाह या बादशाह के परिवारवालों के नाम पर ही बनाए गए। भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना भले ही जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने की लेकिन इस देश में मुगलों की सांस्कृतिक सत्ता का संस्थापक हुमांयू था। जब हुमांयू दूसरी बार दिल्ली की गद्दी पर बैठा तब उसने भारत में फारसी कलाओं को बढ़ाना आरंभ किया था। उसने फारसी वास्तुकला, चित्रकला, स्थापत्य कला को प्राथमिकता देकर भारतीय कलाजगत को नेपथ्य में धकेलने का कार्य किया। उसने इस कार्य के लिए फारस के वास्तुविद, चित्रकार आदि हिन्दुस्तान बुलाए थे। समय के साथ भले ही मुगल सल्तनत का अंत हो गया लेकिन जिस सांस्कृतिक सल्तनत की स्थापना हुमांयू ने की थी वो अब भी किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं दिखता ही रहता है। 

मेरे देश पर मुगलों ने तीन सौ साल से अधिक समय तक शासन किया। उसके बाद अंग्रजी राज स्थापित हुआ लेकिन उसका कालखंड मुगलों की तुलना में कम रहा। भारतीय समाज और संस्कृति को अंग्रेजों ने भी प्रभावित किया लेकिन जिस योजनाबद्ध तरीके से मुगलों ने यहां की संस्कृति को बदलने का कार्य किया वो अंग्रेज नहीं कर पाए। दिल्ली की संस्कृति बादशाहों और शासकों से प्रभावित रही। स्वाधीनता के बाद भी वही हाल रहा। पहले तो कई वर्षों तक सड़कों और इमारतों के नाम अंग्रेजों और मुगल शासकों के  नाम पर रहे। स्वाधीनता के बाद जब सड़कों और इमारतों के नाम आदि बदलने आरंभ हुए तो नेताओं को ही प्राथमिकता मिली। नई दिल्ली का मंडी हाउस इलाका सांस्कृतिक केंद्र माना जाता है लेकिन वहीं पर पास में बाबर रोड है, बाबर लेन है। कलाकारों के नाम पर सिर्फ सफदर हाशमी और तानसेन मार्ग है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में दिल्ली के इस सांस्कृतिक इलाके के गोल चक्कर का नाम किसी भारतीय लेखक या कलाकार के नाम पर किया जाना चाहिए। बेहतर होता कि इंडिया गेट गोलचक्कर से निकलनेवाले मार्गों के नाम भी मुगल बादशाहों की जगह भारतीय समाज के नायकों के नाम पर रख पाते। यह अल्कपनीय है कि जिस बाबर ने हमें गुलाम बनाया, जिस हुमांयू ने हमारी संस्कृति को नष्ट करने का षडयंत्र रचा उन आततायियों के नामों को हम आज भी अपनी यादों में संजोए हुए हैं। जिस तरह से धीरे-धीरे अंग्रजों के नाम हटाकर सड़कों के नाम भारतीय नेताओं के नाम पर रखे गए उसी तरह से मुगलों के नाम पर बने सड़कों के नाम भारतीयों के नाम पर होने चाहिए। दरअसल मुगलों का नाम हटाने को लेकर राजनीति आरंभ हो जाती है और सरकारें बैकफुट पर आ जाती हैं। यह अनायास नहीं है कि दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलकर ए पी जे अब्दुल कलाम तो कर दिया गया लेकिन औरंगजेब लेन का नाम नहीं बदला जा सका। केंद्र सरकार को सड़कों के नामकरण को लेकर एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। एक ऐसी नीति जिसमें ये प्रविधान हो कि लेखकों और कलाकारों के नाम पर भी सड़कों के नाम रखे जा सकें। अगर हम आनेवाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सौंपना चाहते हैं तो सबसे पहले उनके मानस पर उन कला मनीषियों का नाम अंकित करना होगा। उसका सबसे आसान तरीका है सड़कों और इमारतों का नाम उनके नाम पर रखे जाएं। इससे हमारी सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित होगी और आततातियों के नाम भी धीरे-धीरे इतिहास की पुस्तकों में कैद होकर रह जाएंगे। लेखकों और कलाकारों के सम्मान की सस्कृति भी विकसित होगी।  

Saturday, April 23, 2022

समृद्ध बने प्रधानमंत्री संग्रहालय


हाल ही में दिल्ली के तीन मूर्ति भवन परिसर में प्रधानमंत्री संग्रहालय का शुभारंभ किया गया ।  स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में देश के सभी प्रधानमंत्रियों को याद किया गया। इस संग्रहालय में उन सभी के योगदान को एक स्थान पर देखने समझने का अवसर उपलब्ध करवाया गया। देश की राजधानी दिल्ली में पहले से तीन प्रधानमंत्रियों की स्मृति को सहेज कर रखा गया था। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद उनके निवास स्थान तीन मूर्ति भवन को ही नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय बना दिया गया था । नई दिल्ली के ही 1, सफदरजंग रोड को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में समर्पित कर दिया गया। ये वही स्थान है जहां इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। नेहरू स्मारक संग्रहालय में नेहरू जी से जुड़ी रखी गई हैं और इंदिरा गांधी स्मृति में उनसे जुड़ी सामग्रियों के अलावा महत्वपूर्ण अवसरों के चित्र आदि हैं। इस भवन में इंदिरा गांधी के पारिवारिक अवसरों के चित्र भी सहेज कर रखे गए हैं। इसके अलावा नई दिल्ली क्षेत्र में ही पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति में भी एक भवन है। इस भवन मे शास्त्री जी से जुड़ी चीजों को रखा गया है। ये भवन नई दिल्ली के 1 मोतीलाल नेहरू पैलेस, मान सिंह रोड के पास स्थित है। ये तीनों भवन बहुत बड़े भूखंड में फैले हैं। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी स्मृति की जिम्मेदारी एक निजी ट्रस्ट के पास है जिसकी प्रमुख सोनिया गांधी हैं। लाल बहादुर शास्त्री स्मृति की देखभाल भी एक निजी ट्रस्ट ही करता है।

तीन मूर्ति भवन में प्रधानमंत्री संग्रहालय के शुभारंभ के आसपास इस तरह के समाचार आए कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से जुड़ी चीजें नेहरू-गांधी परिवार से मांगी गई थी, ताकि उनको संग्रहालय में संजा जा सके। नए बने संग्रहालय को गांधी परिवार की ओर से कोई सहयोग नहीं मिल पाया। खबरें तो इस तरह की भी आई थीं कि जिस परिवार ने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए उस परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय के शुभारंभ के अवसर पर उपस्थित नहीं हो सका था। संस्कृति मंत्रालय के मुताबिक गांधी परिवार को इस समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। सोनिया गांधी परिवार का प्रधानमंत्री संग्रहालय को लेकर उदासीनता के कारण स्पष्ट नजर आते हैं। गांधी-नेहरू परिवार के दो प्रधानमंत्रियों की स्मृति में बड़े-बड़े संग्रहालय बनाए गए लेकिन अन्य प्रधानमंत्रियों को लेकर उपेक्षा भाव बना रहा। यह अकारण नहीं है कि मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, आई के गुजराल और अन्य प्रधानमंत्रियों की स्मृतियों को सहेजने और उनकी उपलब्धियों को प्रदर्शित करने का कोई संस्थागत प्रयास नहीं दिखाई देता है। जबकि इन सभी प्रधानमंत्रियों का किसी न किसी रूप में देश के विकास में योगदान रहा है। नरसिम्हा राव की याद में भी कोई संग्रहालय दिल्ली में हो, ऐसा ज्ञात तो नहीं है। जबकि नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री के तौर पर देश के आर्थिक विकास को एक नई दिशा दी थी। प्रकांड विद्वान थे। कई भाषाओं के ज्ञाता थे। उनकी समृद्ध लाइब्रेरी भी थी। प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल स्वाधीन भारत के इतिहास में कई अहम घटनाओं का गवाह रहा है। 

नरसिम्हाराव के निधन के बाद की घटनाओं को अगर याद किया जाए तो परिवार से बाहर के प्रधानमंत्रियों को लेकर उपेक्षा भाव का कारण साफ समझ आता है। 23 दिसंबर 2004 को नरसिम्हा राव का दिल्ली में निधन हुआ। उसके बाद क्या क्या घटा उसके बारे में विनय सीतापति ने अपनी पुस्तक ‘हाफ लायन, हाऊ पी वी नरसिम्हा राव ट्रासफार्म्ड इंडिया’ में लिखा है। नरसिम्हा राव का पार्थिव शरीर उनके मोतीलाल नेहरू वाले सरकारी घर में लाया गया तो उस समय के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने  उनके पुत्र प्रभाकर को सलाह दी कि अंतिम संस्कार हैदराबाद में किया जाना चाहिए। प्रभाकर ने जब दिल्ली में अंतिम सस्कार की बात की तो शिवराज पाचिल ने बेहद रूखे अंदाज में उनसे कहा कि कोई आएगा नहीं। बाद में उस वक्त के आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी ने भी प्रभाकर को फोन करके हैदराबाद में राव के अंतिम संस्कार की बात की थी और इसके लिए उनको तैयार करने के लिए दिल्ली भी आए थे। ये प्रसंग यहीं खत्म नहीं हुआ था। उस शाम को सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के साथ राव के अंतिम दर्शन के लिए पहुंची थीं। तब मनमोहन सिंह ने भी प्रभाकर राव से जानना चाहा था कि परिवार का राव के अंतिम संस्कार के बारे में क्या विचार है। प्रभाकर ने सोनिया गांधी की उपस्थिति में मनमोहन सिंह को दिल्ली में अपने पिता के अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई थी। बाद में अहमद पटेल ने भी परिवार को हैदराबाद में राव का अंतिम संस्कार करने के लिए के लिए राजी करने की कोशिश की थी। राव के परिवारवालों पर जब हैदराबाद के लिए दबाव बनने लगा तो उन्होंने दिल्ली में राव का एक भव्य स्मारक बनाने की शर्त रखी थी। राव का पार्थिव शरीर घर में रखा हुआ था और उनके अंतिम संस्कार को लेकर राजनीति हो रही थी। उसी रात को राव के परिवारवालों की तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात करवाई गई। शिवराज पाटिल ने राव के परिवार वालों की मौजूदगी में मनमोहन सिंह को दिल्ली में राव के स्मारक की बात बताई। मनमोहन सिंह ने सुनते ही स्वीकृति दे दी और परिवारवालों को भरोसा दिया कि राव का स्मारक दिल्ली में बनेगा उसमें कोई दिक्कत नहीं है। पूरे प्रकरण के दौरान प्रभाकर राव को महसूस हुआ था कि सोनिया गांधी राव का दिल्ली में अंतिम संस्कार नहीं होने देना चाहती थीं। वो दिल्ली में राव का स्मारक बनाने के पक्ष में भी नहीं थीं। इसका दबाव परिवार पर था। आखिरकार परिवार हैदराबाद में अंतिम संस्कार के लिए तैयार हो गया। लेकिन महत्वपूर्ण बात ये कि सोनिया गांधी दिल्ली में राव के स्मारक को लेकर अनिच्छुक बनी रहीं। राव के प्रति उपेक्षा भाव का असर रहा कि उनका कोई स्मारक दिल्ली में नहीं बन पाया।

यही अनिच्छा और उपेक्षा भाव दिल्ली में अन्य प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय बनने की राह में बाधा हो सकती है। नरेन्द्र मोदी ने पार्टी और मत से ऊपर उठकर इस कार्य को किया। अब जब कि दिल्ली में सभी प्रधानमंत्रियों का संग्रहालय एक स्थान पर निर्मित हो गया है तो केंद्र सरकार को एक काम और करना चाहिए। दिल्ली में इंदिरा गांधी स्मृति और लालबहादुर शास्त्री स्मारक का भी प्रधानमंत्री संग्रहालय में विलय करने के बारे में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सभी लोगों से सलाह मशविरा करके इसको अंतिम रूप दिया जा सकता है। इंदिरा जी को जिस स्थान पर गोली मारी गई थी उसको एक स्वरूप दिया जा सकता है और उस भवन का अन्य उपयोग किया जा सकता है। बाबरी विध्वंस के बाद श्रीरामजन्मभूमि  पर जो लोग अस्पताल और स्कूल खोलने का तर्क दे रहे थे उनको भी इन भवनों के खाली होने से अच्छा लगेगा। संभव है कि वो स्कूल और अस्पताल वाला तर्क फिर से दोहरा दें। लेकिन अगर ऐसा हो पाता है तो इसके दो लाभ होगें। एक तो देश विदेश के पर्यटकों को इंदिरा जी और लालबहादुर शास्त्री से जुड़ी सभी जानकारियां एक जगह पर उपलब्ध होंगी और उनको एक स्थान पर देखने की सहूलियत भी होगी।  तीन मूर्ति भवन में जिस भव्यता के साथ संग्रहालय का निर्माण हुआ है उसमें तकनीक का बेहतरीन उपयोग हुआ है। एक कनमी खटकती है कि सभी प्रधानमंत्रियों से जुड़ी चीजें वहां उपलब्ध नहीं है। अगर इंदिरा स्मृति और शास्त्री स्मारक को वहां शिफ्ट कर दिया जाता है तो ये कमी भी पूरी हो सकती है। 

Saturday, April 16, 2022

हिंदी को देशभाषा बनाने का हो प्रयास


कुछ दिनों पहले ‘द कपिल शर्मा शो’ पर फिल्म आर आर आर के अभिनेता एनटीआर जूनियर, राम चरण, फिल्म के निर्देशक राजामौली और अभिनेत्री आलिया भट्ट आए थे। कपिल शर्मा के शो का नाम भले ही अंग्रेजी में है, इसमें ज्यातार बातचीत हिंदी में ही होती है। दक्षिण भारतीय फिल्मों के दोनों अभिनेता न केवल हिंदी समझ रहे थे बल्कि अच्छी हिंदी बोल भी रहे थे। उस शो में उन दोनों अभिनेताओं को अच्छी हिंदी बोलते देख अर्चना पूरन सिंह ने उनसे जानना चाहा कि उन्होंने इतनी अच्छी हिंदी कहां से और कैसे सीखी जबकि वो दोनों तो दक्षिण भारत में पले बढे हैं। एनटीआर जूनियर ने तपाक से इसका उत्तर दिया कि स्कूल में। उन्होंने कहा कि स्कूल में उनकी प्रथम भाषा हिंदी थी जिससे उनको बहुत मदद मिली। इसके अलावा अब जिस तरह से क्रास पालिनेशन (परागण) मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई के बीच हो रहा है, उससे। वो भाषाई परागण की बात कर रहे थे जिसमें देश के अलग अलग हिस्सों में बनने वाली फिल्में अलग अलग भाषाओं में डब होकर रिलीज हो रही हैं। एनटीआर की बात सुनकर आलिया ने एक और दिलचस्प तथ्य बताया कि एनटीआर जूनियर ने पूरी फिल्म में अपने संवाद को अपनी आवाज में ही हिंदी में डब किया है। आलिया के मुताबिक इससे दर्शकों को एक प्रामाणिक अनुभव मिलता है। एक घंटे से अधिक के इस शो में राम चरण और एनटीआर जूनियर ने हिंदी और अंग्रेजी में अपनी बात रखी लेकिन हिंदी समझ सब रहे थे। दक्षिण भारत की फिल्में डब होकर हिंदी में जितनी सफल हो रही हैं उसने वहां की भाषा में बनने वाली फिल्मों को सफलता का नया क्षितिज दिया है। अब वहां बनने वाली कई फिल्में तमिल और तेलुगू के साथ-साथ हिंदी में भी बन रही हैं। हिंदी में बनने वाली कुछ फिल्में भी दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनकर एक साथ सब जगह रिलीज होती हैं।  

उपरोक्त प्रसंग बताने का उद्देश्य ये है कि पिछले दिनों हिंदी को लेकर दक्षिण भारत के नेताओं और अंग्रेजी के पैरोकारों ने अकारण विवाद खड़ा किया। हुआ ये था कि कुछ दिनों पहले गृह मंत्री अमित शाह ने राजभाषा समिति की एक बैठक में कहा था कि ‘हमारे देश में अनेक प्रकार की भाषाएं हैं, कुछ प्रकार की बोलियां हैं। कई लोगों को लगता है कि ये देश के लिए बोझ हैं। मुझे लगता है कि अनेक भाषाएं और अनेक बोलियां हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। …परंतु जरूरत है कि देश की एक भाषा हो। जिसके कारण विदेशी भाषाओं को जगह न मिले। देश की एक भाषा हो, इसी दृष्टि को ध्यान में रखते हुए हमारे पुरखों ने हमारे स्वातंत्र्य सेनानियों ने राजभाषा की कल्पना की थी और राजभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किया था।‘  अपने भाषण में अमित शाह ने ना तो कुछ गलत कहा और ना ही कोई नई बात कही। अमित शाह के वक्तव्य का आशय स्पष्ट है कि हिंदी को संपर्क भाषा के तौर पर मजबूती दी जानी चाहिए और भारतीय भाषाओं को मजबूत किया जाना चाहिए। आज से दो साल पहले भी अमित शाह ने भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए आंदोलन करने जैसी बात कही थी। 

जब प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिला की प्राचीर से स्वाधीनता के अमृत महोत्सव की घोषणा की थी उसके बाद भी अमित शाह ने भाषाई आत्मनिर्भरता की बात की थी। उस वक्त गृहमंत्री ने कहा था कि आत्मनिर्भर शब्द केवल उत्पादन के लिए नहीं है, राजनीतिक व्यवस्थाओं के लिए नहीं है बल्कि भाषाओं को लेकर भी आत्मनिर्भर होना होगा। तब जाकर आत्मनिर्भर भारत की कल्पना साकार होगी। बिना भाषाई आत्मनिर्भरता के आत्मनिर्भर भारत अर्थहीन है। उन्होंने उस वक्त स्वाधीनता संग्राम के दौरान तीन ‘स्व’ के महत्ता की भी चर्चा की थी। स्वदेशी, स्वभाषा और स्वराज। इन तीनों को अमित शाह ने स्वाधीनता संग्राम का स्तंभ बताते हुए कहा था कि आजादी मिलते ही स्वराज का सपना पूरा हो गया। स्वदेशी के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अभियान छेड़ा हुआ है लेकिन स्वभाषा के लिए हम सबको मिलकर खासकर नई पीढ़ी को विशेष रूप से आगे आना होगा। तब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक मंचों पर हिंदी में बोलने और बात करने को रेखांकित करते हुए कहा था कि अब अपनी भाषा को लेकर किसी लघुता ग्रंथि में रहने की जरूरत नहीं है। तब भी अमित शाह ने भारतीय भाषाओं की बात की थी। हिंदी की अनिवार्यता या उसको किसी अन्य भारतीय भाषा पर थोपने जैसी कोई बात नहीं कही थी। विवाद तब भी हुए थे क्योंकि कई क्षेत्रीय दलों को लगता है कि भाषा एक भावनात्मक मुद्दा है और उसको भुनाकर राजनीतिक लाभ कमाया जा सकता है। आज भले ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री  स्टालिन हिंदी को लेकर आक्रामक हो रहे हैं लेकिन उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले सालों में हुए चुनाव के दौरान उनकी पार्टी डीएमके ने मदुरैई और उसके आसपास हिंदी में पोस्टर लगाए थे। तब उका हिंदी विरोध कहां गया था।

अमित शाह ने जब स्वतंत्रता सेनानियों और पुरखों की बात की थी तो वो ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित कर रहे थे। स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिंदी को लेकर हमारे पुरखों ने अपनी भावनाओं को सार्वजनिक किया था और उसको ताकत देने का प्रयास भी किया था। आज भले ही बंगाल की मुखख्यमंत्री ममता बनर्जी हिंदी का विरोध कर रही हैं लेकिन उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि भूदेव मुखर्जी, शारदाचरण मित्र, सुनीति कुमार चटर्जी ने कभी हिंदी का विरोध नहीं किया। बंकिमचंद्र चटर्जी ने कहा था, ‘हिंदी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी क्योंकि हिंदी भाषा की सहायता से भारत के विभिन्न प्रदेशों में जो ऐक्य-बंधन स्थापित कर सकेगा वही भारत बंधु कहलाने के योग्य हैं।‘ महर्षि अरविंद ने तो अपने पत्र ‘धर्म’ में स्पष्ट लिखा था कि ‘भाषा-भेष से देश की एकता में बाधा नहीं पड़ेगी। सब लोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए , हिंदी को साधारण भाषा के रूप में अपनाकर, इस भेद को नष्ट कर देंगे।‘  उस समय महर्षि अरविंद हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में देख रहे थे। अमित शाह भी महर्षि अरविंद के सोच को लेकर ही आगे चल रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के कालखंड में हमारे उन पुरखों ने हिंदी को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जो अहिंदी भाषी प्रदेशों से आते थे और जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर, केशव राव पेठे, वेणीमाधव भट्टाचार्य, शारदाप्रसाद सान्याल, रायबहादुर प्रमदादास मित्र, प्यारी मोहन वंधोपाध्याय, नीलकमल मित्र, सी राजगोपालचारी आदि के नाम इसमें प्रमुख हैं। यह सूची बहुत लंबी है। राजगोपालाचारी जब मद्रास(अब चेन्नई) जाकर राजनीति करने लगे तो उन्होंने हिंदी का विरोध आरंभ किया था, उसके पहले वो हिंदी के प्रबल समर्थक थे। 

आज जब पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है. तो हमें अपने पुरखों की हिंदी को लेकर जो सोच था उसका सम्मान करना चाहिए। राजनीति ने भारतीय भाषाओं के बीच जो वैमनस्यता पैदा की उसको दूर करने का उपक्रम करना चाहिए। इस देश में भाषा के नाम पर पहले ही बहुत हिंसा हो चुकी है, राज्यों का विभाजन हो चुका है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जिस तरह से भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की गई है उससे एक उम्मीद जगती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष काशी हिंदू विश्वविद्यालय में महाकवि सुब्रह्णण्य भारती चेयर की स्थापना की घोषणा की थी। जिस भाषाई परागण की बात एनटीआर जूनियर कर रह थे वो इस तरह के कदमों से आगे बढ़ेगा और उसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कभी कहा था ‘प्रत्येक के लिए अपनी मातृभाषा और सबके लिए हिंदी।‘ यही सोच भारतीय भाषाओं को मजबूत करेगा। 


Saturday, April 9, 2022

संस्थाओं में सुधार समय की मांग


मलयालम फिल्म के एक निर्देशक हैं अदूर गोपालकृष्णन। मलयालम में नई तरह की फिल्म बनाने को लेकर उनकी ख्याति रही है। कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। पद्मश्री और पद्मविभूषण से भी सम्मानित हैं। देश विदेश की फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इमरजेंसी के दौर (1975-1977) में पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के निदेशक रह चुके हैं। फिल्मों से जुड़ी कई संस्थाओं की समितियों में भी लंबे समय तक रहे हैं। ये सब बताने का आशय ये है कि अदूर गोपालकृष्णन का फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं के प्रशासन आदि का लंबा अनुभव है। कई बार होता है कि अनुभवों की थाती को लेकर चल रहा व्यक्ति समय के साथ आनेवाले बदलाव की आहट को भांप नहीं पाता है। अदूर गोपालकृष्णन के साथ भी यही होता प्रतीत हो रहा है। वो इन दिनों सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अलग अलग विभागों के पुनर्गठन के फैसले की आलोचना कर रहे हैं। उनको लगता है कि केंद्र सरकार का ये फैसला अनुचित है। उनका मानना है कि इन सभी संस्थाओं को वर्तमान स्वरूप में ही काम करने दिया जाए। दरअसल जब वो इस तरह की बात करते हैं तो ये स्पष्ट हो जाता है कि बदलते हुए समय को पहचान नहीं पा रहे हैं। मनोरंजन की दुनिया या उसके प्रशासन से जुड़े तौर-तरीके अब वो नहीं रहे जो उदारीकरण के पहले हुआ करते थे। उदारीकरण और अब महामारी के दौर के बाद मनोरंजन की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। इस बदले हुए दौर को पहचानना और उसके हिसाब से कार्य करना सरकार का दायित्व है।  

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्मों से सबंधित कई ऐसे विभाग हैं जिनका गठन उदारीकरण के दौर के पहले हुआ था। फिल्म प्रभाग, बाल चित्र समिति (चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी), फिल्म समारोह निदेशालय, नेशनल फिल्म आर्काइव और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम। इनके गठन के समय की मांग के अनुसार इन विभागों के दायित्व तय किए गए थे। समय बदला, सिनेमा के व्याकरण से लेकर उसके तकनीक तक में आमूल चूल बदलाव आया। फिल्मों से संबंधित इन सरकारी संस्थाओं में अपेक्षित बदलाव नहीं हो पाया। समय के साथ नहीं चल पाने की वजह से इनमें से कई संस्थाएं अपने मूल उद्देश्यों से भटक गईं। एक ही काम कई संस्थाएं करने लग गईं। चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी, फिल्म समारोह निदेशालय और फिल्म प्रभाग अलग-अलग तरह से फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करते हैं। कोई संस्था बच्चों की फिल्मों का फेस्टिवल आयोजित करती है तो कोई फीचर फिल्मों और कोई शार्ट फिल्म और एनिमेशन को लेकर फिल्मोत्सव आयोजित करती हैं।देश में फिल्म संस्कृति के विकास और दूसरे देशों के साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान का कार्यक्रम भी दो संस्थाएं चलाती हैं। फिल्म प्रभाग, चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम फिल्मों के निर्माण और उसके प्रोत्साहन का कार्य करती हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाले विभागों में कामों को लेकर दोहराव है। एक ही मंत्रालय के अलग अलग विभाग एक ही काम करते हैं, जिससे करदाताओं के पैसे का अपव्यय होता है। 

अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तब भारत सरकार की एक समिति ने इन संस्थाओं में युक्तिसंगत बदलाव की सिफारिश की थी। उस समय कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका था। कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के दस साल के कार्यकाल में यथास्थिति कायम रही। 2016 में नीति आयोग ने फिल्मों से जुड़ी इन संस्थाओं के क्रियाकलापों का अध्ययन कर उससे संबंधित सुझाव दिए थे। फिर एक समिति बनी। समिति ने सुझाव दिए। लेकिन अमल नहीं हो सका। अब सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इन विभागों के पुनर्गठन के प्रस्ताव को स्वीकार कर इनके कार्यों को युक्तिसंगत बनाने का आदेश दिया है। इसी क्रम में 30 मार्च को फिल्म समारोह निदेशालय से भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजन का काम लेकर फिल्म विकास निगम को सौप दिया गया है। अन्य विभागों को भी पुनर्गठित किया जा रहा है। अदूर गोपालकृष्णन का कहना है कि वो इन संस्थाओं से जुड़े होने की वजह से इनके कामकाज से परिचित हैं। उनका मानना है कि संस्थाओं का विलय करके उसका अस्तित्व समाप्त करने से कला का नुकासन होगा। इस संदर्भ में वो जया बच्चन का उदाहरण देते हैं कि जब वो चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी की अध्यक्ष थीं तो बेहतर फिल्म का निर्माण हुआ था और फिल्म फेस्टिवल भी स्तरीय हुआ था। यहां अदूर गोपालकृष्णन को ये बताना चाहिए था कि उस समय कौन सी ऐसी फिल्म का निर्माण हुआ था जिसने बच्चों की रुचि इस माध्यम में पैदा की थी। क्या अब उन फिल्मों के बारे में किसी को याद है। अगर बनी भी थी तो क्या फिल्म विकास निगम वैसी फिल्में नहीं बना सकता है। अदूर गोपालकृष्णन को ये भी बताना चाहिए कि जब वो पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के अगुवा थे उस समय वो कितनी बार संस्थान गए थे और उसकी कितनी बैठकों में शामिल हुए थे। उस वक्त उनको अनुपस्थित निदेशक क्यों कहा जाता था। 

2011 में जब नेशनल म्यूजियम आफ इंडियन सिनेमा बनाने की योजना बनी थी तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति का गठन किया था। उस समिति में अदूर गोपालकृष्णन भी सदस्य थे। उसके बाद 2017 में सरकार ने प्रोक्यूरमेंट (खरीद) कमेटी बनाई जिसमें भी अदूरगोपालकृष्णन थे। अदूर गोपालकृष्णनको बताना चाहिए कि सलाहकार समिति ने 2019 तक क्या काम किया। क्या उस वक्त अदूर गोपालकृष्णन ने सरकार को ये सलाह दी थी कि पुणे की फिल्म आर्काइव को ही म्यूजियम बना दिया जाए। नौ वर्षों में सलाहकार समिति की बैठकों पर करदाताओं का कितना व्यय हुआ। बताना तो ये भी चाहिए कि सलाहकार समिति के रहते 2017 में  म्यूजियम की गुणवत्ता में सुधार के लिए नई समिति का गठन क्यों करना पड़ा। जिसके बाद म्यूजियम आकार ले सका। फिल्म विकास निगम ने समांतर सिनेमा या न्यू वेव सिनेमा के नाम पर जिस प्रकार के फिल्मों को वित्तीय सहायता दी उसका भी आकलन किया जाना चाहिए। दरअसल जब फिल्मों और उससे जुड़ी संस्थाओं में सुधार की बात होती है तो एक पूरा इकोसिस्टम उसके खिलाफ हो जाता है। अदूर गोपालकृष्णन उसी इकोसिस्टम के हिस्सा हैं। उन्होंने पहली बार इसका विरोध नहीं किया है । जब से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं और फिल्मों की संस्थाओं पर कुंडली जमाकर बैठे एक विचारधारा विशेष के लोगों को चुनौती मिलने लगी तभी से इस तरह की बातें सामने आने लगी हैं। कहा जाने लगा कि वर्तमान सरकार का फिल्मों के प्रति रवैया नकारात्मक और विध्वंसात्मक है। अब ये लोग संस्थाओं के पुनर्गठन को संस्कृति के संरक्षण और क्षरण से जोड़कर प्रचारित कर रहे हैं। 

अदूर गोपालकृष्णन और उन जैसे लोगों को ये समझना होगा कि तकनीक के आगमन के बाद फिल्मों से जुड़ी पुरानी संस्थाओं के कार्य की समीक्षा आवश्यक है। अगर फिल्म विकास निगम फिल्म बनवाने में सक्षम है या उसके पास फिल्म बनाने या फिल्म निर्माण को प्रोत्साहित करने का मैंडेट है तो फिर दूसरी सरकारी संस्था फिल्म क्यों बनाए। क्यों नहीं फिल्म विकास निगम ही बच्चों की फिल्मों के निर्माण का कार्य करे। क्यों नहीं एक सरकारी संस्था सभी तरह के फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करे। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को पुर्नगठन और इन संस्थाओं में प्रशासवनिक सुधार के कार्य को तेज करना चाहिए। मंत्रालय के अधीन आनेवाले विभाग सांग और ड्रामा डिवीजन एवं प्रकाशन विभाग की उपोगिता पर भी पुनर्विचार करना चाहिए। उन्नत तकनीक के इस दौर में इन संस्थाओं के मैंडेट को भी बदले जाने की आवश्यकता है। 


योजनाबद्ध तरीके से किया था नरसंहार


जलियांवाला बाग में अंग्रेजो ने जो नरसंहार किया था, वो मानवता के इतिहास की क्रूरतम घटनाओं में से एक है। औपनिवेशिक शासन के दौरान अंग्रेजों का ये कृत्य इतिहास के एक काले अध्याय के तौर पर दर्ज है। जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने जो किया वो किसी तात्कालिक वजह से नहीं किया गया था बल्कि बेहद सोच समझ कर उस नरसंहार को अंजाम दिया गया था। कई इतिहासकारों ने इस बात की चर्चा की है कि 13 अप्रैल 1919 के पंजाब के जलियांवाला में जनरल डायर ने जो कहर बरपाया उसके पीछे 10 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर में हिंसक प्रदर्शन और अंग्रेज औरतों पर हमले रहे। ये ठीक है कि अमृतसर में जो हिंसक प्रदर्शन और आगजनी की घटना हुई उसके बाद शहर को सेना के हवाले कर दिया गया था। लेकिन जलियांवाला बाग में जो नरसंहार जनरल डायर ने किया अगर उसके पहले और बाद की घटनाओं को देखें तो ये स्पष्ट होता है कि अंग्रेजों ने भारतीयों को सबक सिखाने की योजना बना ली थी और उस योजना को जनरल डायर को अंजाम देने का जिम्मा सौंपा गया था। 

जलियांवाला बाग नरसंहार के पहले के इतिहास के पन्ने को पलटते हैं तो अंग्रेजों की भारतीयों के सबक सिखाने के सूत्र स्पष्ट तौर पर दृष्टिगोचर होते हैं। 1918 में अहमदाबाद में मिलों में हड़ताल और उसके मिले जनसमर्थन से अंग्रेजों के कान खड़े हो गए थे। इस बीच 1919 के आरंभ में रालेट एक्ट आ गय़ा। इस कानून में आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के नाम पर भारतीयों के नागरिक अधिकारों पर पाबंदी लगाई गई थी। विश्वयुद्ध के बाद इस तरह के कानून की अपेक्षा नहीं की गई थी। जब ब्रिटिश सरकार ने जल्दबाजी में इस कानून को पारित करवाने की कोशिश की तो उसका उल्टा असर भारतीय जनमानस पर पड़ा। पूरे देश में उसके खिलाफ माहौल बना। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह सभा की स्थापना की और स्वाधीनता सेनानियों से गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करने की अपील की। गुलामी की बेड़ियों को काटने के लिए सत्याग्राह का उपयोग असर दिखाने लगा था। इसी दौर में बड़ी सभाएं होने लगी थीं जिसमें आम लोगों की भागीदारी बढ़ने लगी थी। इस लिहाज से अगर विचार करें तो 1919 का मार्च और अप्रैल का महीना स्वाधीनता आंदोलन के दौर में जनता के राजनीतिक रूप से जागरूक और बरतानिया हुकूम के खिलाफ आम जनता के उठ खड़े होने का दौर था। स्वाधीनता को लेकर चल रहे संग्राम में आमलोगों की बढ़ती भागीदारी से बरतानिया हुकूमत की परेशानी बढ़ने लगी थी और वो इसको दबाने की योजना बनाने लगे थे। 

जब रालेट एक्ट के विरोध में पूरे देश में हड़ताल, विरोध प्रदर्शन होने लगे तो उस वक्त अंग्रेजों ने इसको दबाने के लिए बल प्रयोग किया। लखनऊ,पटना,कलकत्ता(अब कोलकाता) बांबे (अब मुंबई), कोटा और अहमदाबाद में इन विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए अंग्रेजों ने निहत्थे लोगों पर जमकर लाठियां चलाईं, कहीं कहीं गोलियां भी। इन विरोध प्रदर्शनों की तीव्रता और उसमें जनभागीदारी से उत्साहित होकर गांधी ने 6 अप्रैल को राष्ट्रव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। लोगों का उत्साह अपने चरम पर पहुंच चुका था । वो गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के लिए बेचैन हो रहे थे। उधर अंग्रेज इस जन आंदोलन को दबाने के लिए अपना दमनचक्र तेज कर दिया था। लोगों को जेल में ठूंसा जाने लगा, बिना किसी कारण के गिरफ्तारियां होने लगीं। पूरे देश में इसकी बेहद तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इस बीच 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में लोग विरोध प्रदर्शन के लिए जमा हुए। इस प्रदर्शन को दबाने के लिए जनरल डायर ने जो अपराध किया उसने ब्रिटिश साम्राज्य को कुछ सालों तक भारत पर शासन करने की ताकत भले दे दी लेकिन भारत की जनता इस जख्म को नहीं भूल सकी। जलियांवाला बाग नरसंहार में बहे खून ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा दे दी।

जलियांवाला बाग नरसंहार के छह महीने बाद उसकी जांच का दिखावा भी बरतानिया हुकूमत ने किया। ब्रिटिश सरकार ने लार्ड विलियम हंटर की अगुवाई में एक कमेटी बनाई और उसको नरसंहार की जांच का जिम्मा सौंपा। इसको हंटर कमीशन के नाम से जाना गया। हंटर कमीशन के सामने जनरल डायर ने जो  बयान दिए उसको देखकर ये लगता है कि एक हजार से अधिक निहत्थे लोगों का हत्यारा कितना बेखौफ था। उसने कहा था कि भीड़ पर गोली चलाने की योजना बनाई गई थी ताकि भविष्य में कोई भी ब्रिटिश सरकार से विद्रोह करने की सोचे भी नहीं। उसने तो यहां तक कहा था कि अगर उस समय हथियारबंद गाड़ियां होतीं तो वो लोगों को कुचलवा देता। इस बयान को अगर जनरल डायर के कृत्य को हाउस आफ लार्ड्स में मिले समर्थन से जोड़कर देखें तो ये स्पष्ट है कि अंग्रेजों ने एक नरसंहार की योजना बनाई थी। यह अकारण नहीं था कि जब हाउस आफ लार्ड्स जनरल डायर के कारनामे के पक्ष में वोटिंग कर रही थी उसी समय ब्रिटेन की जनता ने जनरल डायर के लिए उस वक्त तीसस हजार पाउंड की राशि जुटाई थी। जलियांवाला बाग नरसंहार ब्रिटिश उपनिवेश का एक ऐसा चेहरा है जिसके लिए अंग्रेजों को पूरी मानवता से क्षमा मांगनी चाहिए। गाहे बगाहे इसकी मांग उठती भी रहती है लेकिन इसके लिए संगठित होकर प्रयास करना चाहिए। 


Friday, April 8, 2022

विभाजन ने बढ़ाया फिल्मकारों का संघर्ष


स्वाधीनता के पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) फिल्म निर्माण का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था। इसका बड़ा कारण बड़ा बंगाली दर्शक वर्ग था। उनकी रुचि को ध्यान में रखकर बांग्ला में फिल्में बनती थीं जो बहुत अच्छा बिजनेस किया करती थीं। हीरालाल सेन से लेकर बिमल राय तक एक बेहद समृद्ध परंपरा रही है। प्रथमेश बरुआ, नितिन बोस, देवकी बोस जैसे लोगों ने बंगाल में रहकर ही फिल्म निर्माण का शिखर छुआ था। बिमल राय ने अपना करियर कलकत्ता के न्यू थिएटर के साथ आरंभ किया था और बाद में प्रथमेश बरुआ के साथ उनकी फिल्मों में कैमरापर्सन के तौर पर काम किया। कलकत्ता में बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री बहुत अच्छे तरीके से चल रही थी। फिल्मकारों को अच्छा खासा मुनाफा होता था और वो सभी लोग तकनीक पर निवेश कर रहे थे। अच्छे से अच्छा कैमरा और फिल्म निर्माण से जुड़ी मशीनों के आयात पर खर्च किया जाता था। उधर देश में स्वाधीनता का संग्राम भी अपने चरम पर पहुंचने लगा था। हमें स्वाधीनता मिली लेकिन विभाजन की विभीषिका भी साथ ही मिली। विभाजन के बाद की हिंसा चर्चा के केंद्र में रही है। इस हिंसा पर सैकड़ों लेख लिखे गए लेकिन विभाजन ने समाज के अन्य हिस्सों पर जो प्रभाव छोड़ा उसकी चर्चा कम हुई। हिंसा और आर्थिक नुकसान के अलावा विभाजन ने भारत के फिल्म उद्योग को बुरी तरह से प्रभावित किया था, खास तौर पर बंगाली फिल्मी दुनिया को। 

विभाजन के बाद बंगाल का पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान को मिला। इस तरह से बांग्ला फिल्मों का बाजार दो देशों में बंट गया। इसने बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री को बुरी तरह से प्रभावित किया। दर्शक संख्या विभाजित होने की वजह से बांग्ला फिल्मों से होनेवाला मुनाफा कम हो गया। इसकी वजह से कालांतर में बंगाली फिल्मों के निर्माण पर भी असर पड़ा। बांग्ला में कम फिल्में बनने लगीं और फिल्मों से जुड़े लोगों को काम नहीं मिलने लगा। कलकत्ता की उस दौर की फिल्म निर्माण की सफल फिल्म कंपनी न्यू थिएटर पर संकट के बादल छा गए। विभाजन की वजह से आर्थिक संकट इतना बढ़ा कि कंपनी अपने कलाकारों को वेतन तक नहीं दे पा रही थी। नई फिल्मों के बनाने का काम भी बाधित हुआ। न्यू थिएटर से जुड़े सभफी फिल्मकारों के साथ साथ बिमल राय भी आर्थिक संकट से प्रभावित हुए थे। उनको भी अपने परिवार की चिंता सताने लगी थी। इस चिंता के साथ बिमल राय बांबे (अब मुंबई) पहुंचे थे। 

बांबे में वो अपने मित्र हितेन चौधरी से मिले जो उस वक्त मशहूर अभिनेता अशोक कुमार के साथ मिलकर फिल्म निर्माण कंपनी बांबे टाकीज चला रहे थे। बिमल राय ने उनके सामने कलकत्ता में फिल्म से जुड़े लोगों की चिंता और न्यू थिएटर की आर्थिक दिक्कतों को रखा और उनसे ये जानना चाहा कि क्या अगर व बांबे आते हैं तो उनको हिंदी फिल्मों में काम मिलेगा। हितने चौधरी ने उनसे कोई वादा तो नहीं किया लेकिन उनके लिए कुछ करने का भरोसा दिया। बिमल राय कलकत्ता लौट गए थे। एक दिन हितेन चौधरी ने बिमल राय के बारे में अशोक कुमार से चर्चा। अशोक कुमार ने ध्यान से उनकी बात सुनी और हितेन चौधरी से बिमल राय को फौरन बाबे बुलाने को कहा। हितेन चौधरी ने बिमल राय को बांबे बुलाया। बिमल राय अपने चार साथियों के साथ कलकत्ता से बांबे आए थे। ये साथी थे ह्रषिकेश मुखर्जी, असित सेन, नबेंदु घोष और पाल महेन्द्र। बिमल राय को  हिंदी फिल्मों में काम मिला। इन लोगों ने काम करना आरंभ किया और बाद की बातें इतिहास हैं। बिमल राय ने ‘दो बीघा जमीन’ से लेकर ‘परिणीता’ से लेकर ‘देवदास’ और ‘मधुमती’ जैसी कालजयी फिल्में बनाईं। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमें इन महान फिल्मकारों की संघर्ष यात्रा का स्मरण करना चाहिए।   


Saturday, April 2, 2022

नष्ट होने के कगार पर सांस्कृतिक धरोहर


जब भी बनारस जाने का अवसर मिलता है तो थोड़ा समय निकालकर वहां के पुस्तकालयों को देखने जरूर जाता हूं। करीब तीन साल पहले बनारस गया था। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के उस समय के कुलपति प्रोफेसर राजाराम शुक्ल ने मनोयोगपूर्वक अपने विश्वविद्यालय का पुस्तकालय दिखाया था। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्लाय की लाइब्रेरी बेहद समृद्ध है। हमने वहां काफी समय बिताकर ग्रंथों और पांडुलिपियों को देखा था। उस पुस्तकालय में पहली बार स्वर्णाक्षरों में लिखी पांडुलिपि देखी थी। पांडुलिपियों और उनके संरक्षण के बारे में बातचीत के क्रम में राजाराम शुक्ल ने उनको बेहतर ढंग से सहेजे जाने को लेकर चिंता जताई थी। संसाधन की कमी की बात सामने आई थी। पांडुलिपियों को एक खास किस्म के कपड़े में लपेटकर रखा जाता है जिसके लिए धन की आवश्यकता थी। उसी समय काशी विश्वनाथ मंदिर के पास के गोयनका पुस्तकालय देखा था। वहां कई दुर्लभ ग्रंथ थे, जो या तो खुली रैक पर रखे थे या फिर अल्मारियों में बंद थे। बेहतर रखरखाव की कमी थी। बताया जा रहा है कि अब गोनका पुस्तकालय को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया है। पता नहीं पुस्तकें किस हाल में हैं। बनारस में ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी है, नाम है सयाजीराव गायकवाड़ ग्रंथालय। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की इस लाइब्रेरी का बेहद समृद्ध इतिहास रहा है। पुस्तकालय की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी स्थापना 1917 में की गई थी। कई बार इसकी जगह बदली। 1941 से वर्तमान भवन में पुस्तकालय चल रहा है। इस पुस्तकालय भवन का निर्माण बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने करवाया था। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने 1931 में लंदन प्रवास के दौरान ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी देखी थी। उन्होंने ही बड़ौदा के महाराज को सुझाव दिया था कि काशी हिंदू विश्वविद्लाय के पुस्तकालय की इमारत भी वैसी ही होनी चाहिए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ग्रंथालय से आरंभिक दिनों में प्रख्यात इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार जुड़े रहे थे।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इस ग्रंथालय की चर्चा इस वजह से की जा रही है कि यहां रखी ऐतिहासिक महत्व की पत्रिकाएँ बहुत बुरी स्थिति में हैं। ग्रंथालय के प्रथम तल पर पत्र- पत्रिकाओं के विभाग में बेहद महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ संग्रहित हैं। इन पत्रिकाओं में सरस्वती, विशाल भारत,माधुरी, कल्पना, विश्वमित्र, कलकत्ता रिव्यू, हिन्दुस्तान रिव्यू, जर्नल आफ इंडियन ट्रेड, इंडियन फाइनेंस जैसी पत्रिकाओं की फाइलें उपलब्ध है। इन पत्रिकाओं का स्थायी महत्व है क्योंकि उसमें उस दौर का पूरा इतिहास है। साहित्यिक पत्रिकाओं में हिंदी साहित्य का स्वाधीनता पूर्व से लेकर बाद के कई दशकों का इतिहास दर्ज है। वित्त और वाणिज्य से जुड़ी पत्रिकाएं इन विषयों में शोध करनेवालों के लिए बेहतरीन सोर्स हैं। समाज शास्त्र की पत्रिकाओं से समाज में हो रहे बदलाव या उसके विकासक्रम को रेखांकित कर सकते हैं। रखरखाव के अभाव में पत्रिकाएं नष्ट होने के कगार पर पहुंच गई हैं। कुछ पत्रिकाओं की जिल्द इतनी खराब हो गई हैं या उनके पृष्ठ इतने जर्जर हो गए हैं कि छूते ही फट जा रहे हैं। पत्रिका खोलकर देखने पर पन्ने हाथ में आ जाते हैं। कई ऐतिहासिक पत्रिकाएं तो फाइलों में रस्सियों से बांध कर खुले रैक पर रखी हुई हैं। नमी और धूल से वो खराब हो रही हैं। पत्रिकाओं को पलटने के बाद उनको संभालना बेहद कठिन है। ग्रंथालय के इस हिस्से में रोशनी भी कम है और अगर वहां की  खिड़की खोलने का प्रयास किया जाए तो उसके भी टूटने का खतरा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि देश के सबसे समृद्ध पुस्तकालयों में एक में उपलब्ध पत्रिकाओं को नमी और धूल से बचाने का कोई उपाय नहीं किया गया है 

जिस पुस्तकालय का सपना महामना मदनमोहन मालवीय ने देखा और जिसको सर यदुनाथ सरकार ने जतन से संजोया वो आज इस हालत में क्यों पहुंच गया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का प्रशासन अपनी धरोहर को लेकर उदासीन क्यों है। ऐसिहासिक महत्व की पत्र-पत्रिकाएं धूल क्यों फांक रही हैं। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार से संबद्ध उच्च शिक्षण संस्थानों में धन की कमी है। इस वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा के बजट आवंटन को तेरह प्रतिशत बढ़ाकर चालीस हजार करोड़ से अधिक कर दिया है। सयाजीराव केंद्रीय ग्रंथालय की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वहां एक पुस्तकालयाध्यक्ष, आठ उप- पुस्तकालयाध्यक्ष और पांच सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष कार्यरत हैं। बावजूद इसके पत्रिकाओं का उचित देखभाल न हो पाना हैरान भी करता है और चिंतित भी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय केंद्रीय विश्वविद्यालय है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र में स्थित है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है कि ये ज्ञान का केंद्र है और देश विदेश के तमाम शोधार्थी यहां शोध करने के लिए आते हैं। जरा सोचिए कि जब शोधार्थी इतनी बड़ी लाइब्रेरी के किसी हिस्से को बदहाल देखते होंगे तो इस ज्ञान केंद्र की कैसी छवि उनके मन में बनती होगी।  सवाल यह उठता है कि हम अपनी समृद्ध विरासत को लेकर इतने उदासीन क्यों रहते हैं। इस उदासीनता की वजह क्या उन लोगों की नासमझी है जो इनके रखरखाव के लिए उत्तरदायी हैं या फिर उनकी लापरवाही है या दोनों। इस बारे में अगर समग्र दृष्टिकोण से विचार करते हैं तो ये लगता है कि उदासीनता की वजह नासमझी और लापरवाही दोनों है। इसके अलावा एक वजह तकनीक के उपयोग को लेकर उत्साही नहीं होना है। अन्यथा आज के डिजीटल युग में पत्रिकाएं इस तरह से नष्ट नहीं हो रही होतीं। उनको डिजीटाइज करके या उनकी माइक्रो फिल्म बनाकर संरक्षित किया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि किसी को इनका महत्व समझ में आए, और वो पहल करके  इनको डिजीटाइज करवा दे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार तकनीक के उपयोग पर जोर दे रहे हैं लेकिन उनके ही निर्वाचन क्षेत्र में स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय में तकनीक के उपयोग को लेकर उदासीनता समझ में नहीं आती। विश्वविद्यालय प्रशासन को तत्काल इन पत्रिकाओं को संरक्षित करने के लिए कदम उठाना चाहिए। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहा गया है कि ‘सभी शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य का अध्ययन करनेवाले अपने संस्थानों और विश्वविद्यालयों का विस्तार करेगा और उन हजारों पांडुलिपियों को इकट्ठा करने, संरक्षित करने और अनुवाद करने और उनका अध्ययन करने का मजबूत प्रयास करेगा, जिस पर अभी तक ध्यान नहीं गया है। इसी प्रकार से सभी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जिसमें शास्त्रीय भाषओं को और साहित्य पढ़ाया जा रहा है, उनका विस्तार किया जाएगा। अभी तक उपेक्षित रहे लाखों अभिलेखों के संग्रह, संरक्षण, अनुवाद और अध्ययन के दृढ़ प्रयास किए जाएंगे।‘  राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अभिलेखों के संरक्षण पर बल दिया गया है। ज्ञान साम्रगी के संरक्षण के लिए अगर आवश्यकता हो तो जनसहयोग भी लिया जाना चाहिए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में रखी पत्रिकाओं के संरक्षण के लिए निजी क्षेत्र का भी सहयोग लेना पड़े तो लिया जाना चाहिए। निजी कंपनियों से संपर्क करके उनको इस कार्य में निवेश करने के लिए संवाद किया जाना चाहिए। कोई सरकारी नियम इसमें बाधा बनती हो तो उसको तत्काल बदलना चाहिए। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में रखी गई दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए जिस विशेष कपड़े की आवश्यकता है उसके लिए भी संसाधन उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। पुस्तकें और पत्र पत्रिकाएं को संरक्षित कर हम अपनी संस्कृति को न केवल मजबूत करते हैं बल्कि आनेवाली पीढ़ी को संस्कारित भी करते हैं। पिछले दिनों बिहार के पूर्णिया से समाचर आया था कि वहां के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने अनूठी पहल की और जिले के 230 ग्राम पंचायतों में पुस्तकालय खोला है। ये जनसहयोग से संभव हो पाया। अगर जनसहयोग से नए पुस्तकालय खुल सकते हैं तो पहले के पुस्तकालयों का संरक्षण भी संभव है। आवश्यकता है इच्छाशक्ति और पहल की। 

Friday, April 1, 2022

माटी और फिल्म का प्रेम


स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर हमें फिल्म से जुड़े उन लोगों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने पराधीन भारत में फिल्म विधा को सशक्त करने में बड़ी भूमिका का निर्वाह किया। मूक फिल्मों के दौर में फिल्मों का छायांकन बेहद कठिन कार्य होता था क्योंकि कैमरा और तकनीक उन्नत नहीं थे। जो उन्नत कैमरा थे उनतक भारतीय फोटोग्राफर्स की पहुंच नहीं थी। ऐसे में उनके सामने चुनौती थी कि विदेश से आनी वाली फिल्मों के मुकाबले स्वदेशी फिल्मों के छायांकन की स्तरीयता बरकरार रखने का। महान फिल्मकार देवकी बोस जब धीरेन गांगुली की ब्रिटिश डोमेनियन कंपनी से जुड़े तो उन्होंने उस कंपनी के लिए कई मूक फिल्मों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस दौरान उनकी मित्रता लखनऊ के मूल निवासी और कैमरापर्सन कृष्ण गोपाल से हुई। कृष्ण गोपाल इतने कुशल कैमरामैन थे कि बहुत कम समय में उन्होंने देवकी बोस का दिल जीत लिया। फिल्म कंपनी में साथ काम करते हुए उन दोनों में गाढ़ी दोस्ती हो गई।

कृष्ण गोपाल की फिल्मों में जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। वो पराधीन भारत में लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग में काम करते थे। मनमोहन चड्ढा ने अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि कृष्ण गोपाल जब लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग में काम कर रहे थे तो उनकी पहचान विभाग में काम करनेवाले कुछ अंग्रेजों से हो गई थी। उनमें से कुछ अंग्रेज शौकिया तौर पर फिल्में बनाया करते थे। 1926 से 1929 के दौर में कृष्ण गोपाल ने अपने विभाग के अंग्रेजों के साथ फिल्में बनाने के काम में जुड़े थे। उसी समय उन्होंने कैमरा चलाना और फिल्मों के लिए छायांकन की तकनीक सीखी थी। जब उन्हें कैमरा चलाना आ गया और उनके काम को प्रशंसा मिलने लगी तो स्वास्थ्य विभाग की नौकरी छोड़ दी। फिल्मों में छायांकन का काम करने के लिए कोलकाता (तब कलकत्ता) चले गए। वहां उनकी मुलाकात धीरेन गांगुली से हुई। उन्होंने उनको ‘ब्रिटिश डोमेनियन कंपनी’ में नौकरी पर रख लिया। वहां रहकर कृष्ण गोपाल ने अपनी  कला को और समृद्ध किया। फिर देवकी बोस की मित्रता और साथ ने ख्याति दिलाई।

कृष्ण गोपाल भले ही कोलकाता पहुंच गए थे लेकिन उनका मन लखनऊ में ही बसा हुआ था। वो चाहते थे कि लखनऊ में भी फिल्में बने। अपनी माटी के प्रेम में वो लखनऊ आ गए। यहां पहुंचे तो उनको पता चला कि लखनऊ की एक कंपनी ‘यूनाइटेड फिल्म कार्पोरेशन’ एक फिल्म बनाना चाहती है। हिंदी सिनेमा का इतिहास में चड्ढा लिखते हैं कि कृष्ण गोपाल ने इस फिल्म के निर्माण के लिए देवकी बोस को कोलकाता से लखनऊ बुलवा लिया। 1930 में देवकी बोस लिखित और निर्देशित फिल्म ‘द शैडो आफ द डेड’ बनकर तैयार हुई। फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई और निर्माताओं को नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद की घटना बेहद दिलचस्प है। फिल्म कंपनी के मालिकों को लगा कि कृष्ण गोपाल ने ही उनका नुकसान करवा दिया है। उन्होंने कृष्ण गोपाल को लखनऊ में ही रोक लिया। उनसे कहा कि वो लखनऊ छोड़कर तभी जा सकते हैं जब वो कंपनी के नुकसान की भारपाई कर दें। कई जगह उनको बंधक बनाने की बात भी मिलती है। जब देवकी बोस को इस बात का पता चला तो वो बेहद दुखी हो गए। उस समय देवकी बाबू  प्रथमेश बरुआ के साथ काम कर रहे थे। देवकी बोस अपने मित्र कृष्ण गोपाल को छुड़ाने के लिए लखनऊ आए। देवकी बोस की फिल्म कंपनी के मालिकों के साथ लंबी-लंबी बैठकें हुईं। किसी तरह कंपनी मालिक इस बात पर राजी हुए कि कृष्ण गोपाल को लखनऊ छोड़ने की अनुमति तभी मिलेगी जब वो किश्तों में नुकसान की भारपाई की शर्त मान लें । तय हुआ कि जब तक नुकसान पूरा नहीं होगा कृष्ण गोपाल अपने वेतन से एक हिस्सा कंपनी मालिकों को भेजते रहेंगे। किसी तरह से देवकी बोस उनको अपने साथ लेकर लखनऊ से कोलकाता गए। फिल्म और अपनी माटी के मुहब्बत में कृष्ण गोपाल लंबे समय तक अपने वेतन का हिस्सा लखनऊ की उस फिल्म कंपनी के मालिकों को भेजते रहे थे। बाद के दिनों में कृष्ण गोपाल ने देवकी बोस के साथ कई फिल्मों में काम किया और अपने छायांकन से उस दौर के कई महान फिल्मकारों को प्रभावित किया। विदेश से आनेवाली फिल्मों के मुकाबले कृष्ण गोपाल का छायांकन किसी भी तरह से कम नहीं होता था।