Translate

Saturday, September 12, 2015

हास्यास्पद विरोध, लचर दलील

भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन खत्म हो गया । इस तरह के सम्मेलनों की सार्थकता को लेकर पिछले हफ्ते भर से सवाल खड़े किए जा रहे हैं । एक खास वर्ग और खास विचारधारा के लेखकों के द्वारा । इन सवालों को विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह के कथित बयान ने और हवा दे दी । खबरों के मुताबिक वी के सिंह ने कहा था कि इस बार का सम्मेलन पूर्व के सम्मेलनों से जुदा है । पहले साहित्यकार लोग आते थे, खाते-पीते थे और पर्चा पढ़कर चले जाते थे । उनके मुताबिक इस बार भाषा पर बात होनी थी साहित्य और साहित्यकारों पर कम, लिहाजा उनको नहीं बुलाया गया । बाद में उन्होंने अपने इस बयान का खंडन करते हुएमीडिया पर उसको तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप जड़ दिया । खैर चाहे जो भी हो लेकिन जनरल वी के सिंह के उक्त बयान के बाद विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर विरोध तेज हो गया था, खासकर सोशल मीडिया आदि पर सक्रिय लेखकों ने छाती कूटनी आरंभ कर दी थी । विरोध में मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी गई, इस तरह की शब्दावलियों का प्रयोग किया जैसी शब्दावलियां इस्तेमाल करने के पहले जाहिलों और अनपढ़ों को भी हिचक होती है । फेसबुक पर भक्तों से भाषा की मर्यादा की अपेक्षा करनेवालों ने मर्यादा तार-तार कर दी । दरअसल यह एक पुरानी कहावत है कि अगर किसी का चौबीसों घंटे विरोध करोगे तो उसके बहुत सारे गुण-अवगुण तुम्हारे अंदर भी आ जाएंगे । भक्तों के विरोधियों के साथ भी यही हुआ । वो वैसी ही भाषा बोलने-लिखने लग गए । इस बार अगर सरकार ने तय किया था कि विश्व हिंदी सम्मेलन में साहित्य पर कम भाषा पर ज्यादा बात होगी तो इसमें गलत क्या था । भाषा के प्रचार प्रसार के लिए तकनीक से जुड़ने पर विमर्श होने में बुराई क्या है । दरअसल ललबबुआओं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उद्धाटन सत्र को संबोधित करने से दिक्कत थी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निजी हमले हुए । उनकी कविताओं को लेकर तंज कसे गए । यह सब सही है लेकिन यहां पर आग्रह सिर्फ इतना है कि किसी भी विरोध के पहले इतिहास बोध का ज्ञान होना आवश्यक है,अन्यथा विरोध खोखला लगता है या फिर वो व्यक्तिगत कुंठा की अभिव्यक्ति मात्र होकर रह जाती है । विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन को लेकर हो हल्ला मचानेवालों को यह याद दिलाना जरूरी है कि जब पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में हुआ था तब उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी सम्मेलन के उद्धाटन सत्र को 10 जनवरी 1975 को संबोधित किया था । इस बात का या तो मोदी का विरोध करनेवालों को ज्ञान नहीं है या फिर वो सुविधानुसार भुला देने का खेल खेल रहे हैं । दोनों ही स्थिति चिंताजनक है । अज्ञानता तो फिर भी कम खतरनाक है लेकिन अगर जानबूझकर लोगों को भरमाने के लिए तथ्य छिपाए जा रहे हैं तो यह अपेक्षाकृत ज्यादा खतरनाक है । दरअसल एक खास विचारधारा के लोगों कि यह खूबी है जिसमें वो तथ्यों को छिपाकर विरोध का खेल खेलते हैं । अश्वत्थामा हतो नरो के बाद शंख बजाकर द्रोणाचार्य पर हमला करने की नीति का अनुसरण करते हैं । उन्हें यह याद रखना चाहिए कि धर्मराज युधिष्ठिर के दामन पर सिर्फ वही एक दाग है ।
विश्व हिंदी सम्मेलन के विरोधियों के पेट में इस बात को लेकर भी दर्द हो रहा है कि अमिताभ बच्चन को क्यों बुलाया गया । ये तो अच्छा हुआ कि अमिताभ बच्चन के दांत दर्द ने उनके विरोधियों के पेट दर्द को ठीक कर दिया । अमिताभ बच्चन को विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन में एक सत्र में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था । अंतिम समय में उनकी तबीयत खराब होने की वजह से वो नहीं आ पाए । तबतक उनपर आरोपों की बौछार शुरू हो गई थी ।  ये कहा गया कि उनका हिंदी से क्या लेना देना । पिता की कविताओं को महफिलों में पढ़कर पैसे कमाने से लेकर भांड आदि तक कहा गया । सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय एक अध्यापक-लेखक ने कहा कि- हिंदी साहित्य में अभिनेता अमिताभ बच्चन के योगदान के बारे में गूगल से लेकर राष्ट्रीय पुस्तकालय तक पर कहीं कोई रचना नहीं मिलेगी । इसके बावजूद उनको मोदी सरकार ने दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन सत्र में आमंत्रित किया है । यह संकेत है कि मोदी जी की निष्ठा साहित्य में नहीं मुंबईया सिनेमा में है । अब इतने विद्वान लेखक को क्या बताया जाए कि ये विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन नहीं था । मैं यह मानकर चलता हूं कि उनको इतना तो ज्ञान होगा ही कि साहित्य और भाषा में थोड़ा फर्क तो है । रही बात अमिताभ बच्चन के हिंदी साहित्य में योगदान की । ना तो अमिताभ बच्चन ने और ना ही इस वक्त की सरकार ने कभी ये दावा कि बच्चन साहब बड़े साहित्यकार हैं । पर हिंदी के प्रचार प्रसार को लेकर अमिताभ के प्रयास सराहनीय है । अमिताभ बच्चन का विरोध करनेवालों को मालूम होना चाहिए कि अमिताभ बच्चन अब भी देवनागरी में ही फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, जिसका चलन बॉलीवुड में अब खत्म हो गया है । सारी हिंदी फिल्मों के डॉयलॉग रोमन में लिखे जाते हैं और अभिनेता और अभिनेत्री उसको ही पढ़ते हैं । ऐसे माहौल में अमिताभ बच्चन का देवनागरी को अहमियत देना काबिले तारीफ है । दरअसल अमिताभ बच्चन को जिस सत्र में बोलना था उसका विषय था- अच्छी हिंदी कैसे बोलें । आज अमिताभ बच्चन के उच्चारण और कठिन से कठिन हिंदी शब्दों को सहजता के साथ बोलकर लोकप्रिय बना देने की कला का सानी नहीं है । कौन बनेगा करोड़पति में उन्होंने हिंदी के उन लुप्तप्राय शब्दों को संजीवनी दे दी जिसका प्रयोग तो अब हिंदी के साहित्यकार भी नहीं करते हैं । पंचकोटि जैसा शब्द एक बार फिर से चलन में आ गया । अमिताभ बच्चन के विरोध को देखकर जोहानिसबर्ग में हुए नवें विश्व हिंदी सम्मेलन में मॉरीशस के कला और संस्कृति मंत्री मुकेश्वर चुन्नी का भाषण याद आ गया । मॉरीशस के कला और संस्कृति मंत्री मुकेश्वर चुन्नी ने ये माना था कि हिंदी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड फिल्में और टीवी पर चलनेवाले सीरियल्स का बहुत बड़ा योगदान है । उन्होंने इस बात को स्वीकार किया था कि उनकी जो भी हिंदी है वो सिर्फ हिंदी फिल्मों और टीवी सीरियल्स की बदौलत है । जब वो हिंदी में बोल रहे थे तो उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी जबरदस्त था , भारतीय राजनेताओं की तरह जबरदस्ती ओढे हुए गंभीरता के आवरण से एकदम अलग । चुन्नी ने अपने भाषण में कहा कि वो किसी और कार्यक्रम के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर थे और उन्हें विश्व हिंदी सम्मेलन में आना पड़ा । इस वजह से उनके अधिकारियों को उनका भाषण तैयार करने का मौका नहीं मिला पाया, लिहाजा वो हिंदी में बगैर किसी नोट्स के बोले थे । चुन्नी ने  फिल्मों और टेलीवीजन सीरियल्स के जमकर तारीफ की और कहा कि हिंदी के फैलाव में सबसे ज्यादा योगदान उनका ही है । जोहानिसबर्ग में तीन दिन तक कई अहिंदी भाषी लोगों से बातचीत के बाद मुझे भी यह लगा था कि हिंदी के प्रचार प्रसार में फिल्मों का बहुत योगदान है । दरअसल फिल्मी कलाकारों को लेकर हिंदी के वामपंथी लेखक कभी संजीदा नहीं रहे । फिल्म वालों को बुर्जुआ संस्कृति को सोषक मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती रही । हिंदी फिल्मों के बड़े से बड़े गीतकार को हिंदी का कवि नहीं माना गया जबकि विचारधारा का झंडा उठाकर घूमनेवाले औसत कवियों को महान घोषित कर दिया गया । ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मान समारोह में भी अमिताभ बच्चन को बुलाने को लेकर विरोध हुआ था लेकिन तब भी हिंदी समाज ने चंद लेखकों के विरोध को खापिज कर दिया था, अहमियत नहीं दी थी ।
विश्व हिंदी सम्मेलन का विरोध करनेवाले इन्हीं छोटी चीजों में उलझकर रह गए । इस बात पर सवाल खड़े होने चाहिए कि सत्रों के वक्ताओं का चयन किस आधार पर हुआ । उन वक्ताओं की क्या विशेषता रही है । सवाल इस बात पर खड़े किए जाने चाहिए कि पिछले नौ सम्मेलनों में जो प्रस्ताव पारित किए गए थे उनका क्या हुआ । हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए सरकार की तरफ से क्या प्रयास किए जा रहे हैं । हिंदी के युनिवर्सल फांट आदि को लेकर सरकार क्या कर रही है । दरअसल तथ्यों के आधार पर विरोध करने के लिए मेहनत की आवश्यकता है, गंभीर सवालों से मुठभेड़ के लिए गंभीरता से अध्ययन की भीआवश्यकता होती है  । फेसबुक आदि पर जिस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी की अराजकता है उसमें तो बगैर तथ्यों के सिर्फ हवाबाजी के आधर पर विरोध होता है जिसका कोई अर्थ नहीं होता है बल्कि उस तरह का विरोध हास्यास्पद हो जाता है । और विरोध जब हास्यास्पद होते हैं तो विरोध करनेवाले हास्य के पात्र बन जाते हैं । आग्रह यही है कि खुद को हास्यास्पद ना बनाएं ।

Wednesday, September 9, 2015

बाजार को सही पकड़े हैं...

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में एक प्रसंग में लिखा है – घन घमण्ड नभ गरजत घोरा/ प्रियाहीन डरपत मनमोरा । गोस्वामी जी इस पूरे प्रसंग में मौसम, बारिश और उफनती नदी के बहाने से नीतियों की बात करते हैं । राम और लक्ष्मण के इस संवाद में समाज और राजकाज के बारे में राम अपने विचार प्रकट करते हैं । दरअसल इस तरह की बातें करके राम अपने मन की बात अनुज लक्ष्मण से छिपाना चाहते हैं । लेकिन प्रियतमा का विछोग छुपाना मुश्किल है और मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी राम के मुख से उपरोक्त पंक्तियां निकल ही जाती हैं । वो बारिश के मौसम में सीता के वियोग का दर्द उनकी जुबां पर आ ही जाता है । हिंदी के वरिष्ठ लेखकों की हालत भी राम के जैसी ही है । वो भी मन ही मन बाजार की चाहत रखते हैं लेकिन नीतियों, सिद्धांतों और विचारधारा की वजह से उसकी बात करना उचित नहीं समझते हैं । उन्हें लगता है कि सार्वजनिक रूप से बाजार की वकालत करने से उनकी छवि पर विपरीत असर पड़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे राम के मन में ये द्वंद चलता है कि अपनी प्रियतमा के विछोह के दर्द को अपने छोटे भाई के साथ कैसे साझा करें । हिंदी के साहित्यकारों के लिए अब तक बाजार एक अछूत की तरह था । बाजार का नाम लेना तक उन्हें गंवारा नहीं था और जब भी उनके लबों पर बाजार आता था तो उसके खिलाफ ही आवाज निकलती थी । यह विरोधाभास हिंदी में लंबे समय तक चलता रहा । विरोधाभास इस वजह से कि लेखक कोई भी रचना लिखता है तो उसकी आकांक्षा होती है कि वो छपे । जैसे ही वो प्रकाशक के पास जाता है वैसे ही वो बाजार में प्रवेश करता है । किताब छपने के बाद हर लेखक की आकांक्षा होती है कि वो हिंदी के विशाल पाठक वर्ग तक पहुंचे । अब ये जो चाहत है वो बाजार के बगैर पूरी नहीं हो सकती । किताब छपने और बिकने के तंत्र में बाजार आवश्यक है । हमारे हिंदी के लेखक इस बात को नहीं समझ पाए और विचारधारा की जकड़न में बेवजह बाजार का विरोध करने लगे । नतीजा यह हुआ कि बाजार भी हिंदी साहित्य के प्रति उदासीन होता चला गया । हाल के दिनों में अलका सरावगी ने फेसबुक के जरिए बाजार में अपनी पैठ बनाने की छोटी सी कोशिश की तो उनकी हिंदी के लोगों ने इतनी लानत मलामल कि दूसरे लेखकों को उस तरह की पहल करने से पहले सोचने को मजबूर होना पड़ेगा । हिंदी साहित्य जगत में अक्सर ये बात सुनी जाती है कि साहित्यक किताबें नहीं बिकतीं । प्रकाशक भी बिक्री नहीं होने की बात करते हुए साहित्यक कृतियों के प्रकाशन के प्रति उत्तरोतर उदासीन होने लगे हैं । कविता के प्रकाशक तो मिलने लगभग बंद हो गए हैं । बाजार और बाजार का विरोध विचारधारा के आधार पर करने को गलत ठहराना इस लेख का मकसद नहीं है । मकसद सिर्फ इतना जाहिर करना है कि इस ठस मानसिकता और विरोध ने साहित्य का कितना नुकसान किया ।

अब  स्थितियां थोड़ी बदलने लगी हैं । बाजार और उसके औजारों का उपयोग लेखक अपनी रचनाओं से लेकर उसकी बिक्री तक में करने लगे हैं । इसके सकारात्मक नतीजे भी मिलने लगे है । हिंदी के युवा लेखकों ने अपनी भाषा बदली, कहानी का विषय वस्तु बदला, परिवेश बदला और सबसे बड़ी बात कि रूढ़ होता जा रहा यथार्थ भी उनके रचनाओं में नए रूप में आने लगा । अब हम अगर इस वक्त के समकालीन साहित्यक परिदृश्य डालते हैं तो जो युवा या युवा होने की दहलीज पार कर चुके हैं उनकी रचनाओं में एक तरह का टटकापन नजर आता है । अगर हम उपन्यास लेखन पर बात करें तो जिस तरह से पंकज दूबे और सत्य व्यास ने अपने पहले ही उपन्यास से हिंदी के पाठकों को ना केवल चौकाया बल्कि उसकी बिक्री ने भी पहली कृति के लिहाज से सफलता के झंडे गाड़ दिए । पंकज दूबे के उपन्यास ‘लूजर कहीं का’ दो भाषाओं में लिखा गया- अंग्रेजी और हिंदी । अंग्रेजी में भी वो काफी सफल रहा । पंकज दूबे ने अपने इस उपन्यास को सफल बनाने के लिए बाजार से दोस्ती की । विषयवस्तु में नयापन था, प्रेम भी वैसा ही था जो कॉलेज के दिनों में होता है, बस कमी थी पाठकों तक पहुंचने की, जैसे ही इस कमी को दूर किया गया पाठकों के साथ साथ बाजर ने उसको हाथों हाथ लिया । इसी तरह से सत्य व्साय के उपन्यास ‘बनारस टॉकीज’ को भी पाठकों ने हाथों हाथ इस वजह से लिया कि उसने अपनी भाषा से, अपने कथानक से अपन किस्सागोई से पाठकों को अपनी ओर खींचा । भाषा को उसकी शुद्धता के जकड़न से मुक्त कर विश्वविद्लाय के छात्रों के बीच बोली जानेवाली भाषा को अपनाया । जैसे ‘बाबा’ शब्द विश्वविद्लायों में काफी चलता है, सत्य ने इस शब्द को अपने एक चरित्र के माध्यम से जीवंत कर दिया । इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने शीर्षक भी पाठकों के साथ साथ बाजार को ध्यान में रखते हुए चुना है । लूजर कहीं का और बनारस टॉकीज । शीर्षक के अलावा दोनों किताबों की कीमत भी कम सवा सौ रुपए के रेंज में है । दोनों लेखकों और उनके प्रकाशकों ने भी इन किताबों को बेचने के लिए सोशल मीडिया से लेकर ऑनलाइन बुक स्टोर्स पर जमकर प्रचार किया । नतीजा मिला । पंकज दूबे का नया उपन्यास ‘इश्कियापा’ भी छपकर आनेवाला है । उस किताब का कवर उसके प्रकाशक ने रिलीज कर दिया है और किताब को लेकर पाठकों के बीच उत्सकुकता का माहौल बनाने का काम भी जारी है । इसी तरह अभी वाणी प्रकाशन से प्रभात रंजन की किताब ‘कोठागोई’ प्रकाशित हुई है । इस किताब में हिंदी के लगभग वर्जित प्रदेश में लेखक घुसता है और वहां से कहानी को उठाता है । बिहार के मुजफ्फरपुर की बदनाम बस्ती चतुर्भुज स्थान में संगीत की एक समृद्ध परंपरा थी जो कि बदनामी में दबी हुई थी । प्रभात ने उसको उठाकर सामने रख दिया । इसके अलावा प्रभात रंजन और उसके प्रकाशक ने भी बाजार से रार नहीं ठानी और उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया । किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए ऑफर से लेकर उपलब्धता तक को इंश्योर किया गया । यासिर उस्मान नाम के एक युवा लेखक ने राजेश खन्ना पर हिंदी और अंगेजी दोनों भाषाओं में एक साथ लिखा – राजेश खन्ना, कुछ तो लोग कहेंगे । राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा का एक ऐसा किरदार है जिसके बारे में अब भी किवदंतियां चलती हैं । यासिर की इस पहली किताब को भी पाठकों ने हाथों हाथ लिया । हिंदी के एक और प्रकाशक हिंदी युग्म ने भी बाजार को लेखक के साथ जोड़ने का उपक्रम शुरू किया है ।कम कीमत की पुस्तकें और ऑनलाइन बिक्री का कॉकटेल । इसका नतीजा भी मिल रहा है । अनु सिंह चौधरी से लेकर निखिल सचान तक की किताबों की जमकर बिक्री हो रही है । प्रकाशक का दावा है कि उनके लेखकों के किताबों की ऑनलाइन प्री बुकिंग भी होती है । यह बहुत अच्छी बात और साहित्य के लिए शुभ संकेत है। हिंदी युग्म ने बिल्कुल नए लेखकों को अपने साथ जोड़ा और उनको ऑनलाइन बिक्री के प्लेटफॉर्म पर पाठकों के सामने पेश कर दिया । उनका दावा है कि उनकी कई किताबें हजारों में बिकी हैं । अब एक दूसरा पक्ष । गीताश्री ने अपने नए कहानी संग्रह- स्वप्न साजिश और स्त्री में अपनी भाषा और नए कथ्य से पाठकों को चौकाया है । गीताश्री के पास चमत्कृत कर देनेवाली भाषा है और  विषय का नयापन भी । अगर इस किताब को प्रकाशक ऑनलाइन स्टोर्स पर उपलब्ध करवा सकें तो यह पाठकों के बीच जबरदस्त लोकप्रिय होने के पूरे आसार हैं ।  साहित्य में युवा लेखकों ने जिस तरह से बाजार की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है और खुद को विचारधारा आदि की जकड़ने से मुक्त कर पाठकों को ध्यान में रखकर लिखना शुरू किया है वह एक शुभ संकेत हैं । लेखक और प्रकाशक के साझा प्रयास से बाजर पर फतह संभव है । बाजारवाद के इस दौर में बुद्धिमानी यही है कि बाजार का अपने हक में इस्तेमाल करें, इससे साहित्य, साहित्यकार और पाठक तीनों का भला होगा, प्रकाशक का तो होगा ही । 

Tuesday, September 8, 2015

'हंस' के तेवर को क्या हुआ

पिछले हफ्ते 28 अगस्त को हिंदी की बहुपठित और प्रतिष्ठित पत्रिका हंस के संपादक और कथाकार राजेन्द्र यादव का जन्मदिन था । आज अगर यादव जी जीवित होते तो वो छियासी साल के होते । करीब दो साल पहले जब उनका निधन हुआ था तब ये सवाल उठा था कि उनके संपादन में निकलनेवाली पत्रिका हंस का क्या होगा । उनकी मृत्यु के बाद कथाकार और रंगकर्मी संजय सहाय को हंस के संपादन की कमान सौंपी गई । राजेन्द्र जी के निधन के बाद जो अंक निकला था उसमें यादव जी की पत्नी और वरिष्ठ कथाकार मन्नू भंडारी ने पाठकों को आश्वस्त किया था कि हंस लगातार निकलता रहेगा । उस संदेश में यह भी अंतर्निहित था कि यादव जी की परंपरा पर ही हंस आगे बढ़ेगा । हंस की आवर्तिता बरकरार है लेकिन यादव जी की कमी को साफ तौर पर खटक रही है । राजेन्द्र यादव के संपादन में जब हंस निकलता था तो उसकी अपनी एक अलग पहचान और अलग तेवर था । दरअसल राजेन्द्र जी में हर अंक में कुछ नया करने की ललक होती थी । इसके लिए वो महीने भर लगातार लेखकों और पाठकों से संवाद करते थे । बातीचत में वो हमेशा ये कहा करते थे कि एक संपादक को लगातार संवाद करते रहना चाहिए था । नतीजा सबके सामने था । मेरा मानना है कि वो जितने बेहतर कहानीकार थे उतने ही बेहतर संपादक भी थे, थोड़े बेहतर भी कह सकते हैं । उनके संपादन में हंस ने जिस वैचारिक ताप से हिंदी साहित्य को झकझोरा था वो ठंडा पड़ता नजर आ रहा है । हंस के संपादकीय के लिए हमारे जैसे पाठक पूरे महीने इंतजार करते थे । यादव जी एक स्टैंड लेते थे और फिर उसपर बहस ही नहीं करते थे बल्कि टिके भी रहते थे, तमाम विरोध और आक्रमणों के बावजूद ।
यादव जी के बाद हंस को निकलते लंबा वक्त हो गया । अबतक नए संपादक की छाप उसपर दिखने लगनी चाहिए थी । लेकिन हंस अब एक आम साहित्यक पत्रिका की भीड़ में शामिल हो गया है । जिसमें कुछ नियमित स्तंभ होते हैं, चंद कहानियां होती हैं और कुछ कविताएं । राजेन्द्र जी हमेशा कहा करते थे कि छोटे लेख लिखा करो । उनकी भाषा में – ज्यादा ज्ञान मत पेलो यार । पाठकों पर रहम करो । अब ये देखकर हैरानी होती है कि हंस में अकादमिक किस्म के, लंबे-लंबे बोरियत से भरपूर लेख प्रकाशित होते हैं । हंस को हंस बनाने के लिए यादव जी जितने सक्रिय या सजग रहते थे उसका अभाव दिखता है । यादव जी की एक खास बात और थी कि वो पूरे विश्व में साहित्य जगत में नया क्या हो रहा है इसको जानने के लिए उत्सुक ही नहीं रहते थे, हंस के पाठकों तक उसको पहुंचाने के लिए प्रयत्नशील भी रहते थे । लिहाजा उनसे विश्व साहित्य पर बात करके बहुत मजा आता था । कई बार वो ये भी कहते थे कि अमुक तरह की रचना तो पचास के दशक में फलां लेखक ने लिखी थी । यादव जी खुद ही नया से नया पढ़ते थे और उसमें से अगर उनको कुछ पाठकों के लिए जंचता था तो फौरन उसको छापते थे । हंस से जुड़े लोग इस बात की तस्दीक कर सकते हैं । हलांकि यादव जी को सौ फीसदी जानने और समझने का दावा कोई नहीं कर सकता है । उन्होंने खुद एक साक्षात्कार में मुझसे कहा था कि वो खुद अपने को नहीं समझ पाए तो और कोई क्या उनको समझ पाएगा । यादव जी के जाने के बाद हिंदी जहत में जो सन्नाटा पैदा हुआ है वो उनके निधन के लगभग दो साल बाद भी थोड़ा भी भरा नहीं जा सका है । हंस से जो अपेक्षा थी वो अबतक अपेक्षा ही है ।


Sunday, September 6, 2015

पुरस्कार वापसी या प्रचार पिपासा !

कन्नड़ के लेखक प्रोफेसर एम एम कालबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्यक और सांस्कृतिक जगत उद्वेलित है । सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इस हत्या के विरोध में प्रदर्शन आदि भी हो रहे हैं । हत्यारों को पकड़ने और उसको सजा देने की मांग लगातार जोड़ पकड़ रही है । कर्नाटक में 30 अगस्त को प्रोफेसर एमएम कालबुर्गी की हत्या के बाद धीरे-धीरे विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं । विरोध का स्वर इस बात को लेकर भी तीखा है कि प्रोफसर कालबुर्गी वामपंथी विचारक लेखक थे और उनकी हत्या का आरोप हिंदूवादी संगठन पर लग रहा है । इस बहाने से वामपंथ के अनुयायियों को हिंदुत्ववादियों पर हमला करने का अवसर मिल गया है । गांधी के इस देश में किसी की भी हत्या का इससे भी तीव्र विरोध होना चाहिए । हत्या के विरोध में सिर्फ किसी खास विचारधारा के लोगों के प्रदर्शन की बजाए पूरे समाज को उठ खड़ा होना चाहिेए । सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए । प्रोफसर कालबुर्गी छिहत्तर साल के बुजुर्ग लेखक थे और कर्नाटक के धारवाड़ में सेवानिवृत्ति के बाद अपनी जिंदगी गुजार रहे थे । उन्हें पहले भी कुछ स्वयंभू हिंदू संगठनों से धमकियां मिली थीं क्योंकि वो अपने विचारों से रैशनलिस्ट माने जाते रहे हैं । धर्म आदि पर उनके विचार बहुधा धार्मिकता और अंधविश्वास आदि पर चोट करती थी । दो हजार चौदह में भी प्रोफेसर कालबुर्गी ने मूर्ति पूजा के विरोध में एक बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था । तब उन्होंने कहा था कि बचपन में वो भगवान की मूर्तियों पर पेशाब करके ये देखा करते थे कि वहां से कैसी प्रतिक्रिया मिलती है । यह विचार एक ऐसा छोर है जो कि मूर्तिपूजकों की भावनाओं को आहत कर सकता है । भवनाएं आहत होने पर कानून में उसके लिए प्रावधान है, इसका यह मतलब नहीं है कि किसी का कत्ल कर दिया जाए । विचारों की लड़ाई में खूव खराबे या हिंसा को कोई स्थान नहीं होना चाहिए । चंद सिरफिरे लोग ही इस तरह की हरकतें करते हैं । इसके पहले भी लिंगायत समाज के अराध्य बासव और उनकी पत्नी और बेटी के बारे में विवादित लेखन कर कालबुर्गी विवादों में घिरे थे । बाद में उन्होंने लिंगायत समुदाय के तगड़े विरोध के बाद खेद आदि भी जताया था । यह विरोध का लोकतांत्रिक तरीका था और इसका हक हमारा संविधान हमें देता है । अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी संविधान उस वक्त तक ही देता है जबतक कि उस आजादी से किसी अन्य शख्स के अधिकारों का हनन ना हो । दरअसल होता यह है कि कई बार हम अभिव्यक्ति की आजादी के हक को माते हुए अभिव्यक्ति की अराजकता तक जा पहुंचते हैं । विचारों की लड़ाई में बहुधा हम इस महीन सी लाइन के पार भी चले जाते हैं, उसका विरोध भी होता है, मंथन भी होता है, तर्क वितर्क होते हैं । हमें यह मालूम है कि मंथन से विष भी निकलता है लेकिन विचारों के मंथन से जो विष निकलता है वो जानलेवा नहीं होता है । होना भी नहीं चाहिए । जिस दिन विचार मंथन से निकलनेवाला विष जानलेवा हो जाएगा उस दिन ना तो हमारे समाज में विचार के लिए जगह बच पाएगी और ना ही अभिव्यक्ति की आजादी का माहौल रहेगा । हमें इतिहास को नहीं भूलना चाहिए कि किस तरह से सोवियत रूस और चीन में विचारों को लेकर हत्या का खेल खेला गया । किस तरह से विरोधी विचारधारा वाले लेखकों और पत्रकारों को यातनाएं दी गईं, किस तरह से राजसत्ता के द्वारा उनकी या तो हत्या कर दी गई या फिर उनको देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। चीन में तो अब भी यह आजादी हासिल नहीं है ।   
प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के बाद एक बार फिर से फेसबुकिए वामपंथी चिंतकों ने फासीवाद के आसन्न खतरे पर शोर मचाना शुरू कर दिया । दरअसल हमारे देश में वामपंथ के अनुयायी होने का दंभ भरनेवाले जो लोग चिंतक, विचारक आदि बने घूम रहे हैं उनको लगता है कि इस तरह की बातों से ही उनकी दुकानदारी कायम रह सकती है । पहले भी वो ऐसा कर अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने में कामयाब रहे हैं । इस तरह के फेसबुकिए वामपंथियों को अब हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश में एक नया नायक नजर आने लगा है । दरअसल उदय प्रकाश ने प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार राशि समेत लौटाने का एलान कर दिया है । फेसबुक पर उदय प्रकाश ने लिखा- ‘पिछले समय से हमारे देश में लेखकों, कलाकारों, चिंतकों और बौद्धिकों के प्रति जिस तरह का हिंसक, अपमानजनक, अवमानना पूर्ण व्यवहार लगातार हो रहा है, जिसकी ताज़ा कड़ी प्रख्यात लेखक और विचारक तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है।  अब यह चुप रहने का और मुँह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है। वर्ना ये ख़तरे बढ़ते जायेंगे। मैं साहित्यकार कुलबर्गी जी की हत्या के विरोध में ‘मोहन दास’ नामक कृति पर 2010-11 में प्रदान किये गये साहित्य अकादमी पुरस्कार को विनम्रता लेकिन सुचिंतित दृढ़ता के साथ लौटाता हूँ। अभी गॉंव में हूँ। 7-8 सितंबर तक दिल्ली पहुँचते ही इस संदर्भ में औपचारिक पत्र और राशि भेज दूँगा। मैं उस निर्णायक मंडल के सदस्य, जिनके कारण ‘मोहन दास’ को यह पुरस्कार मिला, अशोक वाजपेयी और चित्रा मुद्गल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, यह पुरस्कार वापस करता हूँ। आप सभी दोस्तों से अपेक्षा है कि आप मेरे इस निर्णय में मेरे साथ बने ।‘
अब जरा विचार कीजिए । उदय प्रकाश जिनकी लंबी कहानी मोहनदास को उपन्यास मानकर अकादमी ने पुरस्कृत कर उपकृत किया, लिहाजा उन्होंने उस वक्त के निर्णायकों का आभार जताया है । दूसरी बात यह है कि कि उन्होंने जिस बिनाह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया है वो दरअसल विरोध नहीं बल्कि प्रचार की बुनियाद पर खड़ा है । उनके शब्दों को देखते हैं – श्री कालबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है। उदय प्रकाश जी इतिहास या अतीत को बेहद सुविधाजनक तरीके से भुला रहे हैं । जब ये मतांध हिंदुवादी शब्द बोलेते हैं तो पूरे हिंदी साहित्य में उनकी वो तस्वीर कौंध जाती है जब वो गोरखपुर के सांसद महंथ आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित हो रहे होते हैं । महंथ आदित्यनाथ के हाथों मिले सम्मान को अपने साहित्यक मस्तक पर कलगी की तरह लगाकर घूम रहे उदय प्रकाश जब साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की बात करते हैं तो बात हजम नहीं होती । कम से कम विरोध की वजह तो हल्की हो ही जाती है । बेहतर होता कि उदय जी महंथ आदित्यनाथ के हाथों मिले पुरस्कार को मतांध हिंदीवादी ताकतों के विरोधस्वरूप लौटाते फिर आगे कोई कदम उठाते । साहित्य अकादमी लगभग सरकारी संस्थान है जो करदाताओं के पैसे से चलता है । पुरस्कार आदि भी उसी राशि से प्रदान किए जाते हैं । उदय प्रकाश का सहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने का फैसला नीतिगत दोष का भी शिकार है । परंपरा यह रही है कि सरकारी नीतियों आदि के विरोध में सरकारी पुरस्कार लौटाए जाते रहे हैं ।

उदय प्रकाश के इस कदम पर तमाम छोटे-बड़े और मंझोले वामपंथी विचारक लहालोट होकर उनको लाल सलाम कर रहे हैं । उनके साहस की दाद दे रहे हैं । दरअसल वामपंथियों के साथ ये बड़ी दिक्कत है कि वो इतिहास को सुविधानुसार विस्मृत कर देते हैं या फिर उसकी शवसाधना में जुट जाते हैं । दोनों ही स्थिति खतरनाक है । उदय प्रकाश के मामले में भी वामपंथी विचारकों ने अपनी सुविधा के लिए उस तस्वीर को विस्मृत कर दिया या फिर सायास उसको धुंधला करने की कोशिस कर रहे हैं जहां उदय प्रकाश महंथ आदित्यनाथ से पुरस्कृत हो रहे हैं । विचारो की इस लड़ाई में तथ्यों और इतिहास को भुलाने या सुविधानुसार इस्तेमाल करने का यह वामपंथी खेल बेहद खतरनाक है जो लोकतंत्र में जनता को बरगलाती है । जनता को बरगलाने का यह खेल अंतत: लोकतंत्र को कमजोर करता है जो कि वामपंथियों के बड़े डिजाइन का हिस्सा है । लोकतंत्र में उनकी आस्था कभी रही नहीं है । मार्क्स के अनुयायियों ने उनके सिद्धातों को इस तरह से आगे बढ़ाया कि लोगों की आस्था उसमें उत्तरोत्तर कम होती चली गई । वामपंथ जनता की बात तो करता है परंतु जनता को तमाम अधिकारों से वंचित रखने का कुत्सित खेल भी खेलता है । रूस और चीन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं । इन दो उदाहरणों के अलावा कुछ कहने की आवश्यकता बचती नहीं है । कालबुर्गी के हत्या के विरोध में खड़े लोगों की मंशा को भी परखने की जरूरत है । हत्या पर राजनीति ना हो , हत्यारों को गिरफ्तार किया जाए और उसको कड़ी से कड़ी सजाय हो, मंशा ये होनी चाहिए ।   

Saturday, August 29, 2015

विवादों के बवंडर में ‘युवा’ लेखक

इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में ‘युवा लेखन और लेखक‘ को लेकर घमासान मचा हुआ है । दरअसल पूरा प्रसंग ये है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी ने युवा कहानी और युवा कविता पर दो दिनों का आयोजन किया । हिंदी की वरिष्ठ और चर्चित लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने के बाद अकादमी का ये पहला बड़ा आयोजन था । कविता पर जो आयोजन हुआ था उसका नाम -कविता के नए रूपाकार, युवा कवियों के साथ एक शाम । कहानी पर हुए आयोजन को नाम दिया गया था – हमारे समय की हिंदी कहानियां, स्वरूप और संभावनाएं । सरकारी कार्यक्रम के लिहाज से देखें तो आयोजन बेहतर था । पूरे आयोजन पर मैत्रेयी पुष्पा की छाप दिख रही थी, उनकी पसंद और नापसंद दोनों की । कविता पर हुए आयोजन पर जिन कवियों को बुलाया गया था उसको लेकर सोशल मीडिया पर खूब हो हल्ला मचा । कवियों की उम्र को लेकर भी छींटाकशी की गई । विरोधस्वरूप दिल्ली के दर्जनभर से ज्यादा युवा कवियों ने एक अलग आयोजन किया और अपनी कविताएं पढ़ीं । यह सब तो साहित्य में हमेशा से चलता रहा है । सरकारी आयोजनों में जो उसके कर्ताधर्ता होते हैं उनकी ही चलती है लेकिन इस बार हिंदी अकादमी का चयन अपेक्षाकृत कम विवादित रहा । हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने सोशल मीडिया पर अपने अनेकानेक पोस्ट में इस बात को रखा कि अकादमी का यह पहला आयोजन है और उसको उसी कसौटी पर कसा जाना चाहिए । लेकिन युवा को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध जारी रहा ।युवा शब्द पर हुए इस विवाद की भी वजह है जिसका जिक्र इस लेख में आगे आएगा । फेसबुक आदि पर मचे हो-हल्ला के बीच आयोजन के दौरान हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने मंच से एलान किया कि अगले आयोजन से युवा शब्द हटा दिया जाएगा । इसको हिंदी के युवा लेखक और कवि अपनी जीत के तौर पेश कर रहे हैं । उन युवा लेखकों को ये सोचना होगा कि साहित्य में जीत या हार नहीं होती है। बहुत दिनों बाद हिंदी अकादमी को एक सक्रिय उपाध्यक्ष मिला है । हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वो वस्तुनिष्ठ होकर साहित्य के लिए काम करेंगी । उनको थोड़ा मौका भी दिया जाना चाहिए । हलांकि उनको जो टीम मिली है उससे बहुत ज्यादा उम्मीद बेमानी है, चंद लोगों को छोड़कर उनमें से ज्यादातर के साहित्यक अवदान को हिंदी साहित्य के सामने आना शेष है । हैरानी की बात है कि कहानी पर हुए आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडे को सौंपने को लेकर हुई । कहानी पर हुए आयोजन का अध्यक्ष पांडे जी को किस आधार पर बनाया गया । कम से कम मेरे जैसा पाठक अब तक मैनेजर पांडे के कहानी पर किए गए काम से अनभिज्ञ है । कार्यक्रम में मैनेजर पांडेय ने मेकी आशंका को सही साबित किया । उन्होंने इस आयोजन में ना तो कहानी के स्वरूप और ना ही संभावना पर गंभीरता से कोई अवधारणा प्रस्तुत की । एक अनाम सी पक्षिका के विशेषांक लेकर पहुंचे और उसके ही आधार पर कहानी के वर्तमान पर भाषण दे दिया । मैनेजर पांडे को बुलाने की वजह समझ से परे है । मैत्रेयी पुष्पा को मैं करीब डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त से जानता हूं, वो जो ठान लेती हैं उसपर चलती हैं । तमाम विरोध और झंझावातों के बावजूद । इस वजह से ही शायद उन्होंने मैनेजर पांडे को नहीं बदला होगा । अगर चयन में थोड़ी बहुत खामी रह जाए या फिर अपने अपने लोगों को बुलाया जाए तो किसी नतीजे पर पहुंचने के पहले सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखकों को धैर्य रखना चाहिए । सावधान तो उपाध्यक्ष को भी रहना चाहिए, उन्हें अब काफी लोग तारीफ करनेवाले मिलेंगे । आनेवाले दिनों में उनपर संचयन, पत्रिकाओं के विशेषांक आदि भी निकलेगे । अगर इस तरह के लोगों को बढ़ावा मिलता है तो जाहिर तौर पर वो घिरेंगी लेकिन हमें ये मानकर नहीं चलना चाहिए कि ऐसा ही होगा । खैर ये एक अवांतर प्रंसग है, जिसपर भविष्य में चर्चा होगी ।
बात हो रही थी हिंदी में युवा लेखकों पर । साहित्य में युवा कहने की कोई सीमा नहीं है । पचास पार या पचास को छूते लेखक को हिंदी साहित्य समाज में युवा माना जाता है । साहित्य अकादमी जो युवा सम्मान देती है उसके मुताबिक लेखक की उम्र पैंतीस साल से अधिक नहीं होनी चाहिए । लेकिन इस वक्त हिंदी में एक साथ इतनी पीढ़ी सक्रिय है कि सब गड्डमड् हो गया है । जिसके जो मन हो रहा है वो लिख रहा है । इस तरह के अराजक माहौल में चालीस पचास साल पार के लेखक लेखिका भी युवा हुए जा रहे हैं । इस संदर्भ में एक बेहद दिलचस्प प्रसंग याद आता है । सन दो हजार की बात होगी । हंस पत्रिका के दफ्तर में उसके संपादक राजेन्द्र यादव से मिलने गया था । हंस का ताजा अंक आया था जो यादव जी ने मेरी तरफ बढ़ाया । मैंने पन्ने पलटने के बाद उनसे पूछा कि बुढा़ती लेखिकाओं की आप जवानी के दिनों की तस्वीर क्यों छापते हैं । उन्होंने हल्के फुल्के अंदाज में गंभीर बात कह दी । उन्होंने कहा कि हिंदी के कई पाठक लेखिकाओं की तस्वीर देखकर हंस खरीद लेते हैं । अब जब युवा लेखक की उम्र को लेकर जब एक बार फिर से विवाद हो रहा है तो राजेन्द्र यादव की बात जेहन में कौंधी । कहीं ऐसा तो नहीं कि युवा कहकर युवाओं से जुड़ने की जुगत में उदारता के साथ लेखक खुद को या आयोजक लेखक को या आलोचक लेखक को युवा घोषित कर देता है । हलांकि यह बहुत दूर की कौड़ी है लेकिन कौड़ी है अच्छी ।
कुछ दिनों पहले मैत्रेयी पुष्पा जी ने भी स्त्री विमर्श को लेकर एक लंबा लेख लिखा था । उस लेख में मैत्रेयी जी ने लिखा था – ‘इक्कीसवीं सदी में जबसे ‘युवा लेखन’ का फतवा चला है, लेखन की दुनिया में खासी तेजी आई है। लेखिकाओं की भरी-पूरी जमात हमें आश्वस्त करती है। किताबें और किताबें। लोकार्पण और लोकार्पण। इनाम, खिताब, पुरस्कार जैसा बहुत कुछ। प्रकाशक, संपादक भी अपने-अपने स्टाल लेकर हाजिर। अपने-अपने जलसों की आवृत्तियां। कैसा उत्सवमय समां है। कौन कहता है कि यह दरिंदगी और दहशत भरा समय और समाज है? साहित्य जगत तो यहां आनंदलोक के साथ है। नाच-गाने और डीजे। शानदार पार्टियां और आपसी रिश्तों के जश्न। ऐसा लगता है जैसे कितनी ही कालजयी रचनाएं आई हैं। मगर इस समय की कलमकार के अपने रूप क्या हैं? युवा के सिवा कुछ भी नहीं, यह युवा लेखिका का फतवा किस दोस्त या दुश्मन ने चलाया कि इस समय की रचनाकार अपनी उम्र का असली सन तक अपने बायोडाटा में दर्ज नहीं करतीं, क्योंकि उम्र जगजाहिर करना युवा लेखन के दायरे से खारिज होना है। वे लेखन के हल्केपन की परवाह नहीं करतीं, जवानी को संजोए रखने की चिंता में हैं। इसी तर्ज पर कि रचना में कमी-बेसी से डर नहीं लगता साब, वयस्क कहे जाने से डर लगता है। परवाह नहीं उम्र पैंतालीस से पचास पर पहुंच जाए, युवा कहलाने का अनिर्वचनीय सुख मिलता रहे । लगता है मैत्रेयी जी जब हिंदी अकादमी के आयोजनों के लिए लेखकों का चयन कर रही थीं तो उन्होंने अपनी ही कही इस बात को भुला दिया । युवा के नाम पर चालीस पार की लेखिकाओं और लेखकों को युवा घोषित करते हुए कार्यक्रम में जगह दे दी । क्या वो अपना कहा ही भूल गईं कि जो लेखिका अपने बायोडाटा में अपनी उम्र दर्ज नहीं करती क्योंकि उम्र जाहिर करना युवा लेखन के दायरे से खारिज होना है । क्या वो भी आमंत्रित लेखक लेखिकाओं को वयस्क कहने से डर गईं । दरअसल सरकारी आयोजनों में एक कमेटी प्रतिभागियों का चुनाव करती हैं । संभव है उपाध्यक्ष ने चुनाव करते समय कमेटी के सदस्यों को छूट दी होगी । उस छूट का ही नतीजा है कि कुछ ऐसे लेखकों का चयन हो गया जिनपर और जिनके लेखन पर विवाद उठ खड़ा हो गया । यह भी संभव है कि युवाओं को जोड़ने का अनिर्वचनीय सुख हिंदी अकादमी भी लेना चाहती हो । हिंदी में युवा कहलाने का जो फैशन है उसपर गाहे बगाहे विवाद होता रहा है । मेरा मानना है कि साहित्यक विवाद होने चाहिए । इससे साहित्य की सेहत अच्छी बनी रहती है लेकिन जब विवाद के बीच व्यक्तिगत हमले होने लगते हैं, किसी के चरित्र से लेकर व्यक्तित्व पर सवाल खड़े होने लगते हैं तब साहित्य बीमार पड़ने लगता है । साहित्य में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन जिस तरह से उसको सोशल मीडिया ने मंच और हवा दोनों दी वो चिंता की बात है । लेखन पर सवाल खड़े होने चाहिए तर्कों और तथ्यों के साथ, फिर चाहे वो कितना भी बड़ा लेखक क्यों ना हो । युवाओं के लेखन को खास तौर पर कसौटी पर कसना चाहिए ।