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Friday, October 23, 2015

कम्युनिस्टों का फासिज्म

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने एक बार फिर से अजीबोगरीब फरमान जारी कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है । वहां के शासक दल के नए हुक्मनामे के मुताबिक पार्टी कॉडर के गोल्फ खेलने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है । तर्क यह दिया गया है कि इससे भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलेगी । चीन ती कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमिटी के नए फरमान के मुताबिक पार्टी के करीब पौने नौ करोड़ सदस्यों के लिए जिस आठ सूत्रीय नैतिक फॉर्मूले को जारी किया गया है उसमें गोल्फ के अलावा होटलों में अधिक खाने पीने की मनाहीतो है ही विवाहेत्तर संबंधों पर रोक भी लगा दी गई है । गोल्फ से तो कम्युनिल्ट पार्टी का पुराना बैर रहा है । माओ ने इसको बुर्जुआ खेल मानते हुए इसपर पाबंदी लगाई थी । उसके बाद देंग के शासनकाल में गोल्फ को अनुमति मिली थी लेकिन लगातार इस खेल के खिलाफ चीन में मुहिम चलती रही । चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के इस नए निर्देशों के बाद पूरी दुनिया में मानवाधिकार को लेकर सचेत लोगों ने विरोध के स्वर तेज कर दिए हैं लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को मानवाधिकार की कहां फिक्र है । सेंट्रल कमटेी ने अपने कॉडर से साफ तौर पर कहा है कि वो व्यक्तिगत बातों को पार्टी के साथ साझा करें और फैसले की जिम्मेदारी पार्टी पर छोड़े । कार्यकर्ताओं की रुचि से लेकर उसकी व्यक्तिगत जिंदगी तक तो पार्टी के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है । उनका चेयरमैन हमारा चेयरमैन का नारा लगानेवाली प्रगतिशील जमात चीन के इस कदम पर खामोश है । इस खामोशी से ही भारत में प्रगतिशील जमात ने अपनी साख गंवा दी है । दरअसल कम्युनिस्ट पार्टियों का ये अमानवीय चेहरा नया नहीं है । जे चांग और जॉन हैलीडे ने अपनी किताब द अननोन स्टोरी माओ में इस तरह के कई वाकयों का जिक्र किया है । कुछ इसी तरह का जिक्र तो शौकत कैफी ने अपनी किताब यादों की रहगुजर में भी किया है । जब कैफी और शौकत की शादी हुई थी तो वो कम्यून में रहते थे । उनका जीवन सामान्य चल रहा था । उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ था । अचानक सालभर में बच्चा टी बी का शिकार होकर काल के गाल में समा गया । इस विपदा से शौकत पूरी तरह से टूट गई थी । अपने इस पहाड़ जैसे दुख से उबरने की कोशिश में जैसे ही शौकत को पता चला कि वो फिर से मां बनने जा रही हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । उस वक्त तक शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी । जब शौकत की पार्टी को इसका पता चला तो तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। उस वक्त शौकत पार्टी के इस फैसले के खिलाफ अड़ गईं थी और तमाम बहस आदि के बाद उनको बच्चे की अमुमति मिली थी । दरअसल ये कम्युनिस्टों का बेहद अमानवीय चेहरा है । इस वजह से जब वो नारी स्वतंत्रता की बात करते हैं या फिर जीने से लेकर अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं तो खोखलापन नजर आता है ।
ऐसा नहीं है कि इस तरह के फरमान सिर्फ चीन में ही जारी होते रहे हैं, रूस में इस तरह के वाकयों का लंबा इतिहास रहा है । जो गाहे बगाहे बाहर भी आते रहे हैं । यह अकारण नहीं है कि हॉवर्ड फास्ट जैसे मशहूर लेखक अपनी कृति दे नेकेड गॉड में कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी मशीन है जिसमें प्राय: अच्छे लोग प्रवेश करते हैं जो अन्नत: बुरे लोगों में परिवर्तित हो जाते हैं । सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टियों में इस प्रक्रिया से बच पाना आमतौर पर जान देने की कीमत पर ही होता है । अब अगर हम हॉवर्ड फास्ट, शौकत कैफी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी के हालिया फरमान पर नजर डालें तो यह लगता है कि कम्युनिस्ट विचारधारा फासिस्ट है जो फासिज्म का डर दिखाकर फलती फूलती रही है ।

Sunday, October 18, 2015

यादव जी जिंदा होते तो…

इस वक्त समकालीन हिंदी साहित्य में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की होड़ लगी हुई है । होड़ शब्द का इस्तेमाल इस वजह से कि नियमित अंतराल पर कुछ साहित्यकारों की संवेदनाएं जागृत हो रही हैं । सरकार की नीतियों के खिलाफ साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाया जा रहा है । यह ठीक है कि लेखकों को पुरस्कार या सम्मान लौटाने की उतनी ही आजादी है जितनी कि उसको स्वीकार करने की । पुरस्कार वापसी के इस माहौल में एक लेखक मित्र ने पूछा कि अगर राजेन्द्र यादव आज के माहौल में जिंदा होते तो क्या करते । यह सवाल काल्पनिक है लेकिन मौजूं भी है । राजेन्द्र यादव ने अपने लेखकीय जीवन में हंस के नाम पर दो एक पुरस्कार लिए । उसको लेकर भी खासा बखेड़ा हुआ था । बिहार सरकार से लालू यादव के शासन के दौरे में राजेन्द्र यादव के पुरस्कार लेने पर कई लेखकों ने वितंडा खड़ा करने की कोशिश की थी । यादव जी पर जमकर साहित्यक हमले भी हुए थे लेकिन अपने स्वभाव के अनुकूल राजेन्द्र यादव अपने फैसले पर अडिग रहे थे । इसी तरह से जब हिंदी में विभूति नारायण राय का छिनाल विवाद उठा तब भी स्त्री विमर्श के उस पुरोधा राजेन्द्र यादव ने विभूति का समर्थन किया था । तब तमाम महिला संगठनों और लेखिकाओं ने उनकी लानत मलामत की थी लेकिन वो टस से मस नहीं हुए थे । इस वक्त यह जानना दिलचस्प होता कि राजेन्द्र यादवव का क्या स्टैंड होता । इसलिए जब मेरे मित्र ने ये सवाल पूछा तो मैं यादव जी के व्यक्तित्व और उनको जितना जाना उतने के आधार पर इसका जवाब तलाश करने लगा ।

इस वक्त के माहौल में अगर राजेन्द्र यादव जीवित होते तो उनका विरोध दादरी कांड के बाद शुरू नहीं होता । वो अपने संपादकीयों और वक्तव्यों से वो दो हजार तेरह से ही सत्ता के खिलाफ माहौल बना रहे होते । अगस्त दो हजार तेरह में जब दाभोलकर की हत्या की गई थी तब वो बेहद उद्वेलित थे लेकिन काल के क्रूर हाथों ने उसी साल अक्तूबर में यादव जी को हमसे छीन लिया । अपने संपादकीयों के माध्यम से यादव जी ने पूर्व में भी सांप्रदायकिता और कट्टरता पर हमला बोला था । मेरी कई बार उनसे उनके संपादकीयों को लेकर लंबी लंबी बहसें हुआ करती थी । वो इस बात को लेकर कन्विंस थे कि सांप्रदायिकता से देश को बड़ा खतरा है लेकिन छद्मधर्मनिरपेक्षता को लेकर भी उनकी चिंता गाहे बगाहे सामने आ जाती थी । यादव जी हिंदी धर्म की बुराइयों पर तगड़ा हमला करते थे लेकिन इस्लाम और क्रिश्चियनिटी को लेकर उनके अपने तर्क थे । वो कहा करते थे कि पहले अपने घर को ठीक करो फिर दूसरे के घर की चिंता करना, हलांकि वो इस्लाम में बढ़ती कट्टरता को लेकर चिंता जाहिर करते थे । जब मुस्लिम कट्टरपंथी तस्लीमा नसरीन के खिलाफ थे उस वक्त राजेन्द्र यादव ने तस्लीमा का स्तंभ अपनी पत्रिका हंस में शुरू किया था । उस स्तंभ में तस्लीमा कट्टर पंथियों पर हमले करती थी । यादव जी कहा करते थे कि उनका यही प्रतिरोध है । आज के माहौल में अगर यादव जी जीवित होते तो अपनी पत्रिका हंस में इस मुद्दे पर व्यापक और गंभीर बहस चलाते । दोनों विचारधारा के लेखकों से लिखवाते क्योंकि राजेन्द्र यादव के रहते हंस में अस्पृश्यता नहीं थी और ना ही वो स्नॉब थे । जो करते थे डंके की चोट पर करते थे । वहां धुर वामपंथी भी छपते थे तो रमेश पोखरियाल निशंक की रचनाएं भी छपती थी । इस वजह से उनकी साख थी और आज के माहौल में साहित्यक जगत को इसी लेखकीय साख की जरूरत है । पुरस्कार वापसी से प्याले में तूफान में खड़ो हो सकता है लेकिन साख के अभाव में उसके व्यापक असर में संदेह है । 

Saturday, October 17, 2015

अकादमी में पारदर्शिता का सवाल

जितने लोगों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए हैं उनमें से ज्यादातर वामपंथी हैं और ये पूरा मामला कहीं ना कहीं राजनीति से प्रेरित है । यह कहना है साहित्य अकादमी से सम्मानित बुजुर्ग लेखक गोविंद मिश्र का । इसके बाद हम गौर करें अरुण कमल के वक्तव्य पर जहां वो कहते हैं साहित्य सभी तरह के पुरस्कारों, सम्मानों और सुविधाओं का प्रतिकार करता है । इसलिए पुरस्कार आदि वापस करना हमारा मुख्य मुद्दा है ही नहीं । मैंने अपने जीवन में अपने सिद्धांतों को त्याग कर कभी भी पुरस्कार, सम्मान और लाभ अर्जित नहीं किया । अशोक वाजपेयी जैसे लेखक जो लगातार सत्ता विरोधी लेखकों को कमतक करके आंकते रहे हैं उनकी दृष्टि अभी भी साफ नहीं हो पाई है । साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित एक और लेखक वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी मानते हैं कि कुछ लेखकों के साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने को लेकर वो कोई दबाव महसूस नहीं करते हैं । उनका कहना है कि साहित्यकार को सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के मुद्दों पर आंदोलन करना चाहिए । वो जोर देकर कहते हैं कि इस बात को सामने आना चाहिए कि लेखक के सरोकार क्या हैं । लीलाधर जगूड़ी कहते हैं कि साहित्य अकादमी का काम कानून व्यवस्था को ठीक करना नहीं है । ये तीन वरिष्ठ लेखकों के वक्तव्य हैं जो कि कमोबेश अलग अलग धारा के हैं । अब इन वक्तव्यों के आलोक में हम साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के पीछे की राजनीति की पड़ताल करते हैं तो वहां सिसायत की एक अलग तरह की रेखा दिखाई देती है । सिसायत केंद्र सरकार के खिलाफ और सियासत साहित्य अकादमी की स्वायत्ता के खिलाफ । साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की शुरुआत उदय प्रकाश ने की उस वक्त मुद्दा था कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी की संवेदनहीनता । तब यह भी प्रचारित किया गया था कि साहित्य अकादमी से सम्मानित लेखक कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने ना तो विरोध जताया और ना ही उन्होंने कोई शोक सभा की । कालांतर में यह बात भी झूठ साबित हुई जब यह बात सामने आई कि साहित्य अकादमी ने बैंगलोर में कालबुर्गी की हत्या के बाद एक शोक सभा की थी जिसमें अकादमी के उपाध्यक्ष कंबार समेत कई स्थानीय लेखक मौजूद थे । अब इस बात पर विचार होना चाहिए कि पुरस्कार वापसी अभियान की शुरुआत की जो बुनियाद थी उसमें झूठ की भी एक ईंट थी । उदय प्रकाश के बाद दो धवलकेशी साहित्यकारों- अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया । अबतक साहित्यकारों पर हो रहे हमलों का प्रतिरोध हो रहा था लेकिन इन दो लेखकों ने इसमें बहुलतावादी संस्कृति पर खतरे को भी अपने प्रतिरोध से जोड़ दिया । इन्होंने दादरी हत्याकांड और गोमांस विवाद पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल खड़े कर दिए । अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल के बाद तो करीब दो दर्जन साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर दिया । साहित्य अकादमी पर भी दबाव बना और उसके अध्यक्ष ने तेइस अक्तूबर को कार्यकारिणी की बैठक बुलाने का एलान कर दिया। लेकिन अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल के केंद्र सरकार को इसमें घसीटने के बाद धीरे-धीरे विरोध करनेवालों की मंशा साफ होने लगी । आज तक वामपंथियों के निशाने पर रहे अशोक वाजपेयी अचानक से उनको अच्छे लगने लगे । लेकिन खेल इतना सीदा नहीं था । इस खेल के पीछे हैं केंद्र सरकार पर हमले की आड़ में साहित्य अकादमी में अराजकता पैदा करना । साहित्य अकादमी की इस अराजकता की आड़ में उसके अध्यक्ष को अस्थिर करना । अब इस बात का खतरा पैदा हो गया है कि इस स्वायत्त संस्था पर इस अराजकता की आड़ में संस्कृति मंत्रालय दखल दे और इसका हाल भी ललित कला अकादमी जैसा हो । हमारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा कर प्रतिरोध जता रहे लेखकों से इस बात को लेकर ही विरोध है कि वो परोक्ष रूप से सरकार की मदद कर रहे हैं । वो एक ऐसी जमीन तैयार करके सरकार को दे रहे हैं जो भविष्य में साहित्य अकादमी की स्वायत्ता के लिए खतरा हो सकती है । यह बात इस वजह से कह रहा हूं कि इन लेखकों ने पूर्व में साहित्य अकादमी की गड़बड़ियों पर कभी भी रोष नहीं जताया । पुरस्कारों के लिए लेखकों के चयन में होनेवाली धांधली पर इन्होंने कभी भी एतराज नहीं जताया क्योंकि साहित्य अकादमी में मिल बांट कर खाने की परंपरा चली आ रही है । क्या इन लेखकों के कभी साहित्य अकादमी के संविधान में लंबे समय से चली आ रही खामियों पर कोई सवाल उठाया । क्या पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों ने कभी भी साहित्य अकादमी की सामान्य सभा के सदस्यों के चुनाव में होनेवाली धांधली पर सवाल खडडे किए । क्या कभी इन लेखकों ने साहित्य अकादमी की गतिविधियों में पारदर्शिता लाने की मांग करते हुए कोई आवाज उठाई । क्या इन लेखकों ने साहित्य अकादमी के लेखकों में हित में काम करने के लिए दबाव बनाने के लिए कुछ किया । हर सवाल का जवाब मिलेगा नहीं । लिहाजा अब जब वो साहित्य अकादमी को घेरने की कोशिश कर रहे हैं तो अपेक्षित माहौल नहीं बन पा रहा है ।
साहित्य अकादमी के गठन के बाद से ही उसके संविधान में कई गड़बड़ियां हैं । भारत के संविधान में काल और परिस्थिति के हिसाब से करीब सौ संशोधन हो चुके हैं लेकिन अकादमी के संविधान में कितने संशोधन हुए हैं ये ज्ञात नहीं है । 1954 में जब साहित्य अकादमी की स्थापना की गई थी तो कौशल विकास और शोध प्रमुख उद्देश्य थे । तकरीबन छह दशक के बाद भी साहित्य अकादमी देश की सभी भाषाओं में शोध और कौशल विकास को अपेक्षित स्तर पर नहीं ले जा पाई ।
सत्रह दिसंबर दो हजार तेरह को संसद के दोनों सदनों में सीताराम येचुरी की अध्यक्षता वाली एक संसदीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी । इस रिपोर्ट में साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी के अलावा इंदिरा गांधी कला केंद्र और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कामकाज पर टिप्पणियां की गई थी । येचुरी की अगुवाई वाली इस समिति ने माना था कि साहित्य अकादमी के पुरस्कारों में पारर्दर्शिता का अभाव है । अकादमियों की इन बदइंतजामियों के बारे में संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट के पैरा 56 में लिखा- समिति यह दृढता से महसूस करती है कि ऐसी स्थिति को बनाए नहीं रखा जा सकता है और इन अकादमियों को व्यवस्थित करने के लिए कुछ करने का यह सही समय है । सांस्कृतिक संस्थानों के कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए । ये समीक्षाएं बाहरी व्यक्तियों और समितियों द्वारा की जानी चाहिए और उन्हें उन वार्षिक प्रतिवेदनों में शामिल किया जाना चाहिए । संसदीय समिति की इस रिपोर्ट के बाद जनवरी 2014 में यूपीए सरकार के दौरान अभिजीत सेन की अध्यक्षता में एक हाई पॉवर कमेटी का गठन किया गया । अकादमियों के कामकाज की समीक्षा के बारे में 1988 में हक्सर कमेटी बनी थी और तकरीबन पच्चीस साल बाद अब सेन कमेटी का गठन हुआ था । इस कमेटी में  नामवर सिंह, रतन थियम, सुषमा यादव, ओ पी जैन आदि सदस्य थे । इस कमेटी का गठन इन अकादमियों के संविधान और उसके कामकाज में बदलाव को लेकर सुझाव देना था । इस कमेटी ने मई 2014 में अपनी रिपोर्ट पेश की । लगभग सवा सौ पृष्ठों की रिपोर्ट में इस कमेटी ने भी माना कि इन अकादमियों में जमकर गड़बड़झाले को अंजाम दिया जा रहा है । इस कमेटी ने अपनी सिफारिश में कहा है कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष की उम्र सीमा भी 70 साल हो । उपाध्यक्ष के पद को बेकार मानते हुए उसे खत्म करने और सचिव का कार्यकाल तीन साल करने की सिफारिश की गई है ।
इसके अलावा अगर हम साहित्य अकादमी के संविधान पर गौर करें तो सामान्य सभा के चुनाव में जिस तरह से सदस्यों का चुनाव होता है वह माफियागीरी को बढ़ावा देता है । हर भाषा के नुमाइंदे बंटवारा कर लेते हैं और चुनाव हो जाता है । इसी तरह से अगर किसी भाषा का प्रतिनिधि अपने कार्यकाल के बीच में सदस्यता छोड़ता है या उसका निधन हो जाता है तो उसकी जगह खाली रहेगी । ये विसंगति दूर होनी चाहिए और सामान्य सभा के सदस्यों का चुनाव मतपत्र के आधार पर होना चाहिए । इस तरह की पारदर्शिता के बगैर अकादमी ना तेवल अपनी साख खोती जा रही है बल्कि स्वायत्ता खत्म करने के लिए सरकार के हाथ में हथियार भी दे रही है । आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान अध्यक्ष और सचिव साहित्य अकादमी को उसके मूल उद्देश्यों की ओर ले जाएं और वहां प्रतिभा का सम्नान हो । सेटिंग गेटिंग का खेल साहित्य अकादमी में बंद होना चाहिए ।
 

Friday, October 16, 2015

बात निकलेगी तो दूर तलक...

जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में लेनिन ने कहा था रि वहां के लेफ्टिस्ट खुद को वामपंथी नहीं मानते हैं और अपने आप को सैद्धांतिक आधार पर प्रतिपक्ष करार देते हैं । लेनिन ने उस वक्त जर्मनी के वामपंथियों की उस प्रवृत्ति को इंफैन्टाइल डिसऑर्डर ऑफ लेफ्टिज्म कहा था । हाल ही में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा बताते हुए जिस तरह से करीब दो दर्जन लेखकों ने साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाया है उसको देखकर लेनिन के शब्द उधार लेकर कहा जा सकता है कि प्रतिपक्ष के लेखक भी इंफैन्टाइल डिसऑर्डर के शिकार हैं । यहां भी कमोबेश सभी लेखकों ने खुद को सिद्धांत का विरोध पक्ष करार दिया है । अब अगर हम प्रतिपक्ष के सैद्धांतिक पक्ष को परखते हैं तो यह साफ तौर पर उभरता है कि वो देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से अपना पक्ष बदलते रहे हैं । आज जिन लोगों को अभिवय्क्ति की आजादी पर खतरा नजर आ रहा है उनमें से ज्यादातर लोग इमरजेंसी के दौर में लिख रहे थे । यह बात बहस से परे है कि भारत में अगर अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न हुआ था तो वो इमरजेंसी का दौर था । उस वक्त तो हमारे मौलिक अधिकारों पर भी पहरा लगा दिया गया था । अब जरा उस दौर में लेफ्टिस्टों को याद करिए कि उनका रुख क्या था । दिल्ली में उपन्यासकार भीष्म साहनी की अध्यक्षता में हुई प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में इमरजेंसी का समर्थन किया गया था और उसको अनुशासन पर्व करार दिया था । उस वक्त किसी भी लेखक की अंतरात्मा की आवाज नहीं जागी थी और किसी ने पुरस्कार वापसी का कदम नहीं उठाया था । क्योंकि उस वक्त इन संस्थाओं पर वामपंथियों का कब्जा था । यह वही दौर था जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के समर्थन के एवज में वामपंथियों को साहित्यक संस्थाओं की जागीरदारी सौंप दी थी । अब अगर हम चौरासी के सिख विरोधी दंगों के बाद की बात ना भी उठाएं, हम दो हजार दो के गुजरात दंगों के दौरान लेखकों की पुरस्कार वापसी के बाबत सवाल ना भी पूछें लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों की बात तो उठानी चाहिए । दादरी के पास इखलाक की हत्या को भी पुरस्कार वापस करनेवालों ने मुद्दा बनाया है । दादरी से चंद किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर के दंगों में बासठ लोगों की हत्या की गई । उसके बाद अखिलेश सरकार ने अपने सालाना साहित्यक पुरस्कार का एलान किया । गाजे बाजे के साथ हिंदी के लेखकों ने जाकर यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कर कमलों से चार लाख से लेकर चालीस हजार तक के दर्जनों पुरस्कार लिए । तब किसी को कुछ भी याद नहीं आया । याद तो तब भी नहीं आया था जब कॉमरेड पानसरे की हत्या की गई थी या सही मायनों में बुद्धिवादी दाभोलकर साहब का कत्ल किया गया । ना तब किसी ने साहित्य अकादमी पर सवाल उठाए और ना ही साहित्य अकादमी से स्टैंड लेने का दुराग्रह किया । क्योंकि उस वक्त की सरकारों से प्रत्यक्ष रूप से विचारधारा को और परोक्ष रूप से स्वार्थ को कोई खतरा नहीं था । 

अब एक नजर डालते हैं पुरस्कार वापस करनेवाले लेखकों पर । उदय प्रकाश तो योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार लेकर इस योग्य नहीं रह गए हैं कि उनपर चर्चा की जाए या उनको गंभीरता से लिया जाए । बात करेंगे अशोक वाजपेयी और कृष्णा सोबती की । हलांकि आपको याद दिलाते चलें कि उदय प्रकाश अशोक वाजपेयी को पॉवर ब्रोकर मानते रहे हैं और दावा करते हैं कि उनको हिंदी में कोई गंभीरता से नहीं लेता लेकिन यह भी दिलचस्प है कि उदय प्रकाश को जिस जूरी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया उसके अशोक वाजपेयी सदस्य थे । दरअसल इन साहित्यक पुरस्कारों की साख खत्म हो चुकी है । एक उदाहरण देखिए कि जब सीताकांत महापात्र संस्कृति मंत्रालय के सचिव थे तो उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलता है और उसी मंत्रालय में संयुक्त सचिव अशोक वाजपेयी को साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलता है । क्या इसके पीछे मेधा या प्रतिभा है या कुछ और । इसके अलावा अशोक वाजपेयी को दयावती मोदी पुरस्कार मिला था तब उसको लेकर उठे विवाद को दोहराने की आवश्यकता नहीं है । अशोक वाजपेयी कितने संवेदनशील हैं इसको समझने के लिए भोपाल गैस त्रासदी के बाद आयोजित कवि सम्मेलन के दौर के उनके बयान को याद करना चाहिए । तब अशोक वाजपेयी ने कहा था कि मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता है । इस तरह के बयानों के बाद अब जब वही शख्स संवदेनशीलता की उम्मीद करता है तो उसका अपेक्षित असर नहीं होता है । कहना ना होगा कि अशोक वाजपेयी के बयानों और पुरस्कार लौटाने का भी उतना असर नहीं पड़ा । दरअसल साहित्यक पुरस्कारों की साख पिछले कई सालों में छीजती चली गई । इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं उसपर लेखक समुदाय को विचार करना चाहिेए । देश की बहुलतावादी संस्कृति पर खतरे के बाद कृष्णा सोबती ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया । एक जमाने में कृष्णा जी ने पुरस्कारों को लेकर कहा था कि चंद साहित्यक लोगों को ही दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के बार में जाने की सहूलियत है जहां पर साहित्य के कई मसले तय होते हैं । अब अगर साहित्यक पुरस्कार आईआईसी की बार में तय होते हैं तो उसको लौटा ही दिया जाना चाहिए । दरअसल इस विरोध के पीछे की मंशा को भी समझने की जरूरत है । केंद्र सरकार ने फोर्ड फाउंडेशन समेत कई गैर सरकारी संगठनों के विदेशी चंदों पर रोक लगा दी है । इस बात की भी पड़ताल होनी चाहिए कि सरकार के इस कदम के बाद साहित्यकारों के विरोध ने जोर क्यों पकड़ा । क्योंकि बात निकलेगी को दूर तलक जाएगी । 

Wednesday, October 14, 2015

अकेलेपन का स्वप्न

मुझे ध्यान नहीं आ रहा है लेकिन नामवर सिंह ने कहीं आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हवाले से लिखा है कि कहानी सुनने वाला आगे की घटना के लिए आकुल रहता है । कविता सुनने वाला कहता है जरा फिर तो कहिए । नामवर जी ने हलांकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इस मत का निषेध किया है और कहा कि निसंदेह घटना वैचित्र्यपूर्ण कहानियों को ध्यान में रखकर यह बात कही गई है लेकिन ध्वनि स्पष्ट है कि कहानी विषयक ये कुतूहल निम्न कोटि का है । नामवर जी अपनी इस धारणा के समर्थन में ई एम फोस्टर को भी उद्धृडत करते हैं जहां वो कहते हैं कि कहानी संबंधी कुतूहल अवर कोटि का है क्योंकि इसके मूल में गुहावासी आदिम मानव मनोवृत्ति है । नामवर जी का मानना है कि चूंकि यह कुतूहल आदिम है, इसलिए इसके मूल में एक प्रकार का अविवेक है । इस पर काफी लंबा विवाद हो सकता है लेकिन एक स्कूल ऑफ थॉट है जो यह मानता है कि कविता पाठकों के लिए पीछे की ओर जाती है वहीं कहानी पाठकों को आगे की ओर ले जाती है । कहानी और कविता दोनों अलग विधा है और उपरोक्त व्याख्या के मुताबिक दोनों विधाएं विपरीत दिशा में जाती हैं । अब अगर कोई लेखक इन दोनों विधाओं में लेखन करता है और उसको साधकर रखता है तो एक बड़ी चुनौती को साधने जैसा है । दो विपरीत दिशा में जा रहे घोड़े की रास को थामना और उसको काबू में करते हुए उसको मुकाम तक पहुंचाने जैसा होता है । हाल ही में ऐसे ही एक रचनाकार संजय कुंदन की कहानियों का संग्रह श्याम लाल का अकेलापन प्रकाशित हुआ है । संजय कुंदन ऐसे ही रचनाकार हैं जो कविता की दुनिया से कहानी में आए और फिर उन्होंने उपन्यास भी लिखा । संजय की कविताओं को खासी प्रसिद्धि मिली थी और मिल रही है, पाठकों का प्यार भी ।  मुझे याद आता है कि संजय कुंदन ने अपनी पहली कहानी दो हजार एक या दो में लिखी थी । कहानी का नाम था केएनटी की कार । इस कहानी के तद्भव में प्रकाशित होने के पहले उसका पाठ राजेन्द्र यादव के घर पर हुआ था । उस कहानी पाठ में मैं, यादव जी और मैत्रेयी पुष्पा थीं । केएनटी की कार की यादव जी ने खूब तारीफ की थी । दरअसल संजय कुंदन की पहली कहानी केएनटी की कार और अब समीक्ष्य संग्रह की शीर्ष कहानी श्याम लाल का अकेलापन को अगर पढें तो पाठकों को एक कहानीकार के तौर पर संजय कुंदन की विकास यात्रा समझ में आती है । संजय कुंदन की कहानियों में रात, स्वप्न और संघर्ष लगातार उपस्थित रहते हैं । ये सिर्फ उनकी कहानियों में नहीं बल्कि उनकी कविता में भी मौजूद है । जैसे उनके पहले कविता संग्रह कागज के प्रदेश में छपी एक कविता है टैक्सी स्टैंड । उसकी चंद पक्तियां हैं रात के आखिरी पहर में/ एक चिड़िया सड़क पर पैदल चलती हुई/ दिखाई पड़ रही है/ हवा में उड़ती है नींद/ सरदार जी चुटकी बजाकर भगाते हैं नींद/ चुटकियों से ही भगाते हैं वो हर दुख । अब उनकी पहली कहानी केएनटी की कार की चंद पक्तियां देखते हैं रात में उन्होंने एक डरावना सपना देखा । देखा कि उनकी सोसाइटी में एक नकाबपोश आ रहा है । धीरे धीरे चलता वो उनकी कार तक आया और उसे एक हाथ में उठा लिया । केएनटी चीखे- ऐ क्या कर रहे हो तुम । नकाबपोश ने ठहाका लगाया और बोला साले कार चलाओगे। औकात है चलाने की । बड़े आए कारवाले । अचानक कार छोटी होते-होते खिलौने की तरह हो गई । नकाबपोश ने उसे अपनी जेब में रख लिया और आकाश की ओर उठने लगा । केएनटी उसके पीछे लपके और चिल्लाने लगे चोर चोर । तभी उनकी नींद खुल गई । उनकी पत्नी भी हड़बड़ाकर उठ गई । केएनटी ने खिड़की से झांका । उनका मकान पहली मंजिल पर था । वे अपनी कार ठीक सामने खड़ी करते थे । उन्होंने देखा उनकी कार से अड़कर चौकीदार खड़ा है । उन्हें पता नहीं क्या सूझा, वे नीचे आये । उन्होंने चौकीदार से डपटकर कहा- ये गाड़ी से अलग हटो, टूट जाएगी । क्या कहते हो साब । मेरे सट जाने से गाड़ी टूट जाएगी । चौकीदार ने हंसते हुए कहा ।
अब जरा संजय कुंदन के नए संग्रह की कहानी श्यामलाल का अकेलापन की कुछ पंक्तियों पर गौर फर्मा लेते हैं ओह जल्दी से सुबह क्यों नहीं हो जाती है । उन्होंने घड़ी देखी तो रात के दो बज रहे थे । इतना समय कैसे काटा जाए, नींद तो आ नहीं रही है । श्यामलाल चुपचाप उठे । उन्होंने दरवाजा इस तरह खोला कि कोई आवाज ना हो । वे उसे सटाकर बाहर आ गए । रात के घर से निकलकर श्यामलाल अपार्टमेंट के गार्ड रूम में जा पहुंचते हैं और वहां बातचीत के क्रम में गाने बजाने का कार्यक्रम शुरू हो जाता है । फिर देखिए- श्यामलाल को किसी ने झकझोरा तो वो हड़बड़ाकर उठे । चारों ओर उजाला फैल चुका था । सामने सुपरवाइजर खड़ा था सर आप गाना गाते हुए सो गए थे, हम लोगों ने आपको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा..सर आप बहुत अच्छा गाते हैं । ये तीनों प्रसंग बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि पाठकों को पता चल सके कि संजय कुंदन की कहानियों का जो नायक होता है वो मध्यवर्गीय चरित्र किस-किस तरह की मनोदशा में जीते हैं । समाज के बीच अपनी पहचान और हनक बनाने के लिए उनके मन में कैसे कैसे विचार आते हैं । रात को जब संजय कुंदन का नायक अकेला होता है तो अपनी अपेक्षाओं के सपने देखता है और जब वो अपेक्षाएं पूरी हो जाती हैं तो उसके खत्म होने के खतरे से आशंकित रहता है । संजय की पहली कहानी का नायक केएनटी एक कार खरीदने के सपने को जीना चाहता है । इस चक्कर में वो तमाम सघर्षों के बावजूद एक सेकेंडहैंड कार खरीद लेता है । उसके पीछे का मनोविज्ञान सिर्फ समाज से अपने आसपास के लोगों से कंपीट करने का है । इसी तरह से श्यामलाल अपने आसपास के लोगों को देखकर कुढ़ता रहता है कि उसके पास अमुक चीज नहीं है । फिर उसकी चाहत में परेशान रहता है । संजय कुंदन ने अपने समाज के लोगों के इसी मनोविज्ञान को पकड़कर कहानी में धर देते हैं किस्सागोई के छौंक के साथ ।

संजय कुंदन के इस संग्रह-श्यामलाल का अकेलापन में ग्यारह कहानियां संकलित हैं । संजय की कहानियां का मूल स्वर या कह सकते हैं कि उनकी कहानियों में एक जो अंतर्धारा बहती है वो है महानगरीय जीवन । महानगर के जीवन में बौने होते लोग और सुरसा के बदन की तरह बढ़ती उनकी महात्वाकांक्षाएं । ऐसा नहीं है कि सभी कहानियां इसी विषय पर लिखी गई है । इस संग्रह में एक कहानी है हीरो । इसका नायक चंदर ऑटो चलाता है और उसकी फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश है । लेकिन यह कहानी चंदर से शुरू होती है और मीडिया के वर्तमान हालात पर खत्म होती है । चंदर की वजह से एक मशहूर शख्सियत की बहू की दहेज हत्या होने से बच जाती है । सास ससुर के चंगुल से उसको छुड़ा लिया जाता है । चंदर को एसपी के दफ्तर में पत्रकारों के बीच हीरो की तरह से पेश किया जाता है । सभी चैनल और अखबार वाले उसके साथ बात करते हैं । चंदर को लगता है कि मशहूर होने का उसका सपना पूरा होनावाला है । दोस्तों के साथ पार्टी करता है । लेकिन अगले दिन के सारे अखबारों और चैनलों पर उसकी बहादुरी के किस्से का एक लाइन ना तो छपता है ना ही दिखता है । फिर दो पत्रकारों की बातचीत के हवाले से कहानीकार यह बताता है कि आजकल खबरें कैसे और किन दबावों में तय होती हैं । चंदर के अंदर बहुत कुछ दरक जाता है । दरअसल चंदन तो एक पात्र मात्र है लेकिन खबरों को लेकर समाज के अंदर इन दिनों कुठ इसी तरह के विचार पनपने लगे हैं । यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए बेहतर नहीं है । यह कहानी चंदर के बहाने से मीडिया को भी कठघरे में खड़ा करती है उसपर बड़े सवाल भी उठाती है । संजय कुंदन की कहानियों को पढ़ते हुए पाठकों को यथार्थ के पठार से गुजरना होता है । नामवर जी बहुधा कहते हैं कि समझने के लिए ना कहानी को दोबारा पढ़ने की जरूरत और ना अपने ही दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की तकलीफ । ऐसे ही लोगों की धारणा है कि कहानी में समझने के लिए कुछ नहीं होता । और जाहिर है जहां समझने के लिए कुछ नहीं होगा, वहां समझाने के लिए भी गुंजाइश नहीं होगी । ऐसे समझदार लोगों के सामने यदि कहानी के बारे में समझने की बात की जाए तो ये गुस्ताखी होगी ।‘  नामवर जी ये बातें तंज में कहते हैं । पर संजय कुंदन की कहानियों को पढ़ते हुए पाठकों को उसकी अंतर्धारा और फिर उसके परिणाम को जोड़कर देखने की जरूरत है । पाठकों को पठनीयता भी मिलती है लेकिन उनकी कहानियां समाजिक मनोविज्ञान को उघाड़ने के साथ साथ कुछ ऐेस बिंदुओं पर चोट भी करती है जो जरूरी है । संजय कुंदन अपनी पीढ़ी के उन चंद रचनाकारों में से हैं जिन्होंने विवादों और प्रचारप्रियता से दूर रहकर साहित्य सृजन का फैसला लिया है । उनके दो कविता संग्रह कागज के प्रदेश में और योजनाओं का शहर और दो कहानी संग्रह बॉस की पार्टी और श्यामलाल का अकेलापन के अलावा एक उपन्यास इसकी तस्दीक भी करते हैं । समीक्ष्य कृति श्यामलाल का अकेलापन में संजय अपनी कहानियों के माध्यम से खुद को कहानी की जमीन पर और मजबूत करते हैं । 

Monday, October 12, 2015

विरोध का पाखंड पर्व

 
नयनतारा सहगल अंग्रेजी साहित्य का बड़ा नाम है माना जाता है कि आजाद भारत की पहली भारतीय अंग्रेजी लेखिका हैं जिन्हें इतनी शोहरत मिली साठ और सत्तर के दशक में उन्होंने अपने स्तंभों से भारतीय राजनीति में अपनी पारिवारिक विरासत से इतर अपनी पहचान बनाई थी नयनतारा सहगल जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं अभी हाल ही में उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर सुर्खियां बटोरी हैं नयनतारा सहगल का मानना है कि इस वक्त देश का माहौल ठीक नहीं है और यहां आतंक का राज है । उनके शब्द है रेन ऑफ टेरर । नयनतारा के मुताबिक इस वक्त देश में असहमति के स्वर को साजिशन दबाया जा रहा है और विरोध की आवाज का कत्ल किया जा रहा है नयनतारा सहगल ने अपने बयान में कहा है कि मौजूदा वक्त में असहमति के अधिकार की लड़ाई लड़नेवालों को भय के वातावरण में जीना पड़ रहा है भारत की बहुलतावादी संस्कृति पर आए इस खतरे के विरोध स्वरूप उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है । नयनतारा सहगल का कहना है कि साहित्य अकादमी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही है और साहित्य अकादमी की खामोशी उनको पुरस्कार लौटाने को मजबूर कर रही है । नयनतारा सहगल की अपेक्षा है कि साहित्य अकादमी मौजूदा हालात में लेखकों के पक्ष में खड़े होकर उसकी सियासत का हिस्सा बने । नयनतारा सहगल की इस चाहत पर आगे बात होगी लेकिन पहले कुछ तथ्यों पर नजर डाले लेते हैं । दरअसल नयनतारा सहगल को उन्नीस सौ छियासी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था । यह सम्मान उनको उनकी अंग्रेजी में छपी किताब रिच लाइक अस पर दिया गया था साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने के करीब तीन दशक के बाद नयनतारा सहगल की संवेदना जागी और उन्होंने देश की मौजूदा हालात के मद्देनजर विरोध दर्ज करवाने का फैसला लिया अब जरा कुछ और तथ्य़ों पर गौर करते हैं उन्नीस सौ छियासी में नयनतारा सहगल को साहित्य अकादमी ने अपने पुरस्कार से नवाजा उसके दो साल पहलेउनकी ममेरी बहन और उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षा गार्डों ने गोलियों से भून डाला था । इंदिरा गांधी की हत्या के विरोध में दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे हुए थे । दिल्ली के सिख विरोधी दंगों में हजारों सिखों का कत्ल कर दिया गया था । उनमें से कइयों को जिंदा जला दिया गया था । इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों के बाद देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बयान दिया था कि जब बड़ा पेड़ गिकता है तो आसपास की जमीन हिलती ही है सिखों के नरसंहार और उसके बाद उस वक्त के प्रधानमंत्री के इस संवेदनहीन बयान के बाद भी नयनतारा सहगल जी की संवेदना नहीं जगी थी । संभव है कि हाल में मिला साहित्यक पुरस्कार और उससे मिल रहा यश उनकी संवेदना पर भारी पड़ गया हो खैर नयनतारा सहगल की संवेदना तो उनको पुरस्कार मिलने के तीन साल बाद हुए भागलपुर में हुए सांप्रदायिक दगों के बाद भी नहीं जगी भागलपुर दंगे में भी सैकड़ों लोग मारे गए थे इस तरह के हादसों की बड़ी लंबी फेहरिश्त है दो हजार दो के गुजरात दंगों के वक्त भी वो खामोश रहीं अब पुरस्कार मिलने के उनतीस साल बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान करना सवाल खड़े करता है उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के अपने बयान में दादारी हत्याकांड से लेकर नरेन्द्र डाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कालबुर्गी तक की हत्या पर चिंता जताई है उनकी चिंता जायज है किसी भी सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता है विचारों की लड़ाई सिर्फ और सिर्फ कलम से लड़ी चली जानी चाहिए । उसमें गोली बंदूक का कोई स्थान नहीं होना चाहिए । गोी बंदूक से विचारों की लड़ाई लड़ने का इतिहास या तो वामपंथियों के नाम है या फिर इन दिनों आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के नाम । इसी तरह से हिंसा के बाद उसपर सियासत करना या उसको आधार बनाकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करना भी उचित नहीं है नयनतारा सहगल ने अपनी संवेदना आहत होने की जो वजह बताई है वो कम से कम उन्नीस सौ चौरासी के सिख दंगे और भागलपुर या गुजरात के सांप्रदायिक दंगे से कम भयावह है उस वक्त देश का जो माहौल था क्या अब उससे अधिक खराब है । अतीत को आधार बनाकर वर्तमान की गड़बड़ियों को सही नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन जब संवेदना जगने की बात होगी तो तुलनात्मक विश्लेषण होना तय है ।

नयनतारा सहगल ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी निशाना साधा और दादरी से लेकर प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या तक पर उनकी खामोशी पर सवाल खड़े किए सवाल खड़े करने के बाद भी वो नहीं रुकीं और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को अपनी विचारधारा को समर्थन करनेवाले शैतानों तक के खिलाफ नरमी बरतनेवाला करार दिया या कहें कि उन्होंने साफ कर दिया कि अगर शैतान भी मोदी की विचारधारा का समर्थन करता हो तो मोदी उसके खिलाफ कार्रवाई से आंखें मूंद लेंगे । दरअसल नयनतारा सहगल का संघ विरोध पुराना है उन्नीस सौ उनहत्तर-सत्तर में उन्हॆंने अपने एक स्तभ में जनसंघ के नारे हिंदी-हिंदू-हिन्दुस्तान पर जनमकर वार किया था और इसको भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा करार दिया था। उसके बाद भी उन्होंने लगातार जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अपने स्तंभों में हमले किए । कालांतर मे वो इंदिरा गांधी के विरोध में लग गईं थी जो कि एक अवांतर और बेहद लंबा प्रसंग है अपने बयान में नयनतारा सहगल ने कहा है कि इस वक्त देश में आतंक का राज है नयनतारा सहगल बहुत ही अनुभवी पत्रकार, स्तंभ लेखक और राजनीति को बेहद करीब से देखनेवाली रही हैं । वो जब इस तरह के शब्दों या जुमलों का इस्तेमाल करती हैं तो हैरानी होती है । अचरच इस बात पर होता है कि इतनी वरिष्ठ लेखिका भारतीय लोकतंत्र को इतना कमजोर समझती हैं कि कोई भी शख्स पूरे देश में आतंक का राज कामयम कर ले जाएगा।  नयनतारा सहगल ने तो इमरजेंसी और उसके बाद के हालात को बहुत करीब से देखा है और उसपर एक किताब भी लिखी है । उन्हें इस तरह की गलतफहमी किस वजह से हो रही है ये समझ से परे है । नयनतारा सहगल और उनके एलान के बाद उनको लाल सलाम कर लहालोट होनेवाले उनके समर्थकों को यह समझने की आवश्यकता है कि हर घटना को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देखने का चुनिंदा फैशन बंद होना । नयनतारा सहगल की संवेदना उस वक्त क्यों नहीं जागी जब वामपंथी सरकार ने तसलीमा नसरीन के साथ अन्याय किया, वोटबैंक की खातिर उनको राज्य से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कांग्रेस ने भी उसको कायम रखा ।

हाल के दिनों में पुरस्कार लौटाने के पाखंड पर्व की शुरुआत जादुई यथार्थवादी कथाकार उदय प्रकाश ने की । काफी लंबे समय से उदय प्रकाश की लेखनी ठंडी पड़ी थी ऐसे में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का दांव चलकर उन्होंने प्रचार तो हासिल कर ही लिया । साहित्य अकादमी से लेखकों की अपेक्षा है कि वो हत्या और हिंसा के विरोध में प्रस्ताव पारित करे । दअसल ऐसी मांग करनेवाले लेखक और लोग साहित्य अकादमी की परंपरा और उसके संविधान आदि से अनजान हैं ।  लेखकों से साहित्य अकादमी की अपेक्षा विशुद्ध राजनैतिक है और वो अपनी राजनीति को साहित्य अकादमी के कंधे पर चलाना चाहते हैं । क्या ये संभव है । इन लेखकों को डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स ऑफ साहित्य अकादमी पढ़नी चाहिए जिसमें उन्होंने विस्तार से अकादमी के गठन और उसकी परंपरा का उल्लेख किया है । यह अलहदा बात है कि वामपंथी विचारधारा के लोग कांग्रेस के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कर रहे थे उस दौर में ही साहित्य अकादमी का पतन शुरू हुआ था । साहित्य अकादमी पर वाम विचारधारा के लोगों ने कब्जा जमाए रखा और उसके बाद भी ऐसी व्यवस्था कर दी कि लेखकों की बजाए विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का कब्जा रहेगा । विश्वविद्यालयों के उन शिक्षकों का जिनका समकालीन साहित्य में कम से कम लेखन के माध्यम से कोई हस्तक्षेप नहीं है । अब उन लोगों से यह अपेक्षा करना कि वो सरकार के खिलाफ या किसी घटना विशेष के खिलाफ तनकर खड़े हो जाएंगे, बेमानी है, बचपना है । पुरानी कहावत है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय । साहित्य अकादमी के पतन के जिम्मेदार लोग आज अकादमी से उच्च मानदंडों की अपेक्षा कर रहे हैं । इसी अपेक्षा की बुनियाद पर खड़ा विरोध हवाई लगता है ।