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Saturday, March 18, 2017

हिंदी के हक की पहल


दो हजार चौदह में जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में आई है तब से हिंदी को लेकर एक खास तरह के उत्साह का माहौल देखने को मिल रहा है । दो हजार चौदह में ही केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों को अन्य भाषाओं के साथ हिंदी में भी जानकारी जारी करने का आदेश दिया गया था । केंद्र सरकार की सूचनाएं हिंदी में उपलब्ध भी होने लगीं । वो हिंदी कैसी हैं इसपर बाद में विचार किया जा सकता है । हिंदी के उपयोग को लेकर उत्साह का माहौल है लेकिन इसमें सरकारी कामकाज और रोजगार की भाषा बनाने की दिशा में अभी बहुत ठोस कदम उठाने की जरूरत है । आजादी के सत्तर साल बाद भी देश के उच्च और सर्वोच्च न्यायलयों में भारतीय भाषाओं में काम-काज नहीं हो पा रहा है कई बार हाईकोर्ट में स्थानीय भाषाओं में सुनवाई और फैसलों का प्रस्ताव सामने आया लेकिन वो योजना परवान नहीं चढ़ पाई और इन अदालतों में अब भी अंग्रजी में ही कामकाज हो रहा है
अब इस दिशा में भी कुछ हलचल नजर आ रही है । भारतीय जनता पार्टी के महासचिव और सांसद भूपेन्द्र यादव ने देश के पिछले सप्ताह उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की स्वतंत्रता के लिए राज्यसभा में निजी विधेयक - उच्च न्यायालय, (राजभाषाओं का प्रयोग) विधेयक-2016 पेश किया। इस बिल में उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं के प्रयोग की अनुमति, एक अधिकार के रूप में प्रस्तावित किया गया है । भूपेन्द्र यादव ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा - उच्च न्यायालयों में वादी अपनी भाषा में न्याय की गुहार लगा सके और प्रतिवादी को भी अपनी भाषा में अपनी बात रखने का अधिकार हो यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यह सर्वथा अनुचित है कि हमारे देशवासी अपने ही देश में अपनी भाषाओं में अपने उच्च न्यायालयों में न्याय की गुहार नहीं लगा सकते हैं। वर्तमान प्रावधानों के मुताबिक़ उच्च न्यायालयों की न्यायिक प्रक्रियाओं में भारतीय भाषाओं की स्वीकार्यता नहीं है और समूची प्रक्रिया अंग्रेजी में ही होती है। अगर अपनी अदालत में अपनी भाषाओं में अपनी बात रखने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तो यह किसी भी ढंग से निश्पक्ष न्याय मिलने के अधिकार और वास्तविक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मानकों पर खरी उतरने वाली बात नहीं कही जा सकती है जो कि हमारे देश के संविधान का मूल है। पारदर्शी ढंग से अदालती सुनवाई को सुनिश्चित करने के लिए यह अनिवार्य है कि भारतीय भाषाओं को उच्च न्यायालयों में स्वीकार्यता प्रदान की जाए। अगर देश की संसद में एवं अन्य संवैधानिक कार्यों में देश की सभी भाषाओं में बोलने की स्वतंत्रता है तो फिर न्यायपालिका इससे अलग क्यों हैं ? किसी को उसकी भाषा में न्याय मांगने से रोकना, यह साबित करता है कि हम स्वतंत्रता के मूल्यों को सही ढंग से अभी भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। न्याय की गुहार से लेकर न्याय की सुनवाई एवं प्राप्ति तक की प्रक्रिया वादी-प्रतिवादी की अपनी भाषाओं में ही होनी चाहिए तभी सही मायने में न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता एवं न्याय की स्वतंत्रता को हासिल किया जा सकेगा। भारत अकेला ऐसा देश है जहां की जनता को यह अधिकार नहीं है।
भूपेन्द्र यादव के इस निजी विधेयक के पहले इस दिशा में एक और ठोस पहल सामने आई थी । उच्च न्यायलयों में अंग्रेजी के दबदबे को खत्म करने की दिशा में कानून मंत्रालय की संसदीय समिति ने बेहद अहम प्रस्ताव रखा था संसदीय समिति ने देश के सभी चौबीस उच्च न्यायलयों में हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में कामकाज करने की सिफारिश की है संसदीय समिति के प्रस्ताव के मुताबिक संविधान में केंद्र सरकार को इस बारे में फैसला लेने का अधिकार दिया गया है संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश में इस बात पर भी जोर दिया है कि इस मसले पर अदालतों की सलाह लेने की जरूरत नहीं है संसदीय समिति ने न्यायिक सलाह नहीं लेने पर जोर इस वजह से दिया, लगता, है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर दो हजार बारह में गुजरात, तमिलनाडू, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के उच्च न्यायलयों में स्थानीय भाषाओं में कामकाज के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था
सुप्रीम कोर्ट ने उन्नीस सौ सत्तानवे और उन्नीस सौ निन्यानबे के अपने पुराने फैसलों के हवाले से इन प्रस्तावों को खारिज किया था पिछले दिनों भी इस मसले पर एक याचिका दायर की गई थी जिसपर उस वक्त के मुख्य न्यायधीश ने याचिकाकर्ता पर कठोर टिप्पणी की थी अब संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर संबंधित राज्य सरकारें इस तरह का प्रस्ताव देती है तो केंद्र सरकार संविधान में मिले अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए उसको लागू करने का फैसला ले सकती है इस मसले पर संविधान में तो प्रावधान है लेकिन उन्नीस सौ पैंसठ में कैबिनेट के एक फैसले से न्यायलयों से इस बारे में सलाह लेने की परंपरा की शुरुआत हुई थी जो अबतक चली रही है अब अगर केंद्र सरकार संसदीय समिति की सिफारिशों को लागू करना चाहती है तो उसको कैबिनेट के फैसले पर पुनर्विचार करना होगा मौजूदा सरकार को इस मसले पर संजीदा रुख अख्तियार करना होगा
अदालतों में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में कामकाज करने का विरोध यह कहकर किया जाता है कि इससे न्यायधीशों को दिक्कत होगी और उच्च न्यायलयों में किसी प्रदेश के जज को किसी भी प्रदेश में स्थानांतरण की प्रक्रिया बाधित होगी संभव है कि ऐसा हो, लेकिन इसके लिए कोई मैकेनिज्म बनाया जा सकता है ताकि न्यायाधीशों को दिक्कत ना हो और उनके स्थानांतरण को लेकर भी प्रक्रिया बाधित ना हो ।लेकिन न्यायलयों में हिंदी में काम नहीं होने पर कई बार केस मुकदमे में अदालत पहुंचे पीड़ितों को अदालत की भाषा या वहां जारी बहस समझ नहीं आती है और वो मूकदर्शक बने रहते हैं निर्भया के मामले में भी ऐसा हो रहा था उसकी मां लगातार सुप्रीम कोर्ट जाती थी और कई बार बगैर कुछ समझे बूझे वहां से वापस हो लेती थी बाद में उनकी मदद की गई और उनको हिंदी में अदालती कार्यवाही समझाने के लिए एक शख्स को लगाया गया
अगर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को उच्च न्यायलयों में कामकाज की एक भाषा बनाने का फैसला होता है तो इससे भाषा का गौरव बढ़ेगा, साथ ही ज्यादातर पीड़ितों को भी इंसाफ की भाषा समझ में सकेगी भूपेन्द्र यादव के निजी विधेयक पर संसद को विचार करना चाहिए । अगर इस विधेयक पर बहस होती है तो भाषा के सवाल पर सभी दलों के नेताओं के विचार सामने आ सकेंगे । यह सिर्फ हिंदी का मामला नहीं है,यह सभी भारतीय भाषाओं से जुड़ा मसला है, लिहाजा हिंदी को थोपने जैसे तर्क भी बेमानी साबित होंगे । काफी लंबे समय से हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के सामने दुश्मन की तरह पेश करके हिंदी की राह में बाधा खड़ी की जाती रही है । यह तर्क दिया जाता रहा है कि हिंदी अगर बढ़ी को अन्य भारतीय भाषाओं को दबा देगी या उसके अस्तित्व को संकट में डाल देगी । आजादी के सत्तर साल में यह तो साबित हो ही गया है कि हमारे देश में हिंदी की वजह से किसी भी भाषा के दबे रह जाने या उसके अविकसित होने की आशंका गलत थी ।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने तो काफी पहले लिखा था- हिंदी का आंदोलन सभी भाषाओं का आंदोलन है । हिन्दी यदि बढ़ी तोसभी भाषाएं बढ़ेंगी । हिन्दी यदि रोक दी गई तो देश की बहुत सी भाषाएं अवरुद्ध हो जाएंगीं । तब दिनकर ने कहा था- प्रत्येक के लिए अपनी मातृभाषा और सबके लिए हिंदी । लेकिन यह अबतक हो नहीं सका है । अंग्रेजी का दबदबा अबतक कायम है और अंग्रेजी की भाषाई औपनिवेश को कहीं से कोई चुनौती नहीं मिल पा रही है । उल्टे अब ये हो रहा है कि बोलियों को भाषा के बरक्श खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। बोलियों को भाषा बनाने के पीछे की राजनीति को भी चिन्हित किया जाना आवश्यक है । यहां एक और उदाहरण देना समीचीन होगा । बिहार में जब अदालतों की भाषा के रूप में हिंदी को भी मान्यता देने का आंदोलन शुरू हुआ था तब उस आंदोलन के सबसे प्रबल समर्थक भूदेव चौधरी थे जो उस समय स्कूलों के इंसपेक्टर के पद पर काम कर रहे थे । इसी तरह से सभी भाषाओं को देवनागरी में लिखे जाने की शुरुआत भी बंगाल में हुई थी । जस्टिस शारदाचरण मित्र बंगाली थे जिन्होंने नागरी के व्यापक प्रचार प्रसार के लिए देवनागर नाम से एक पत्र भी निकाला था ।
अगर अदालतों के अलावा भी भाषा के सवाल पर विचार करें तो हमें लगता है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी हम अपनी भाषा को लेकर कोई ठोस नीति नहीं बना पाए अब वक्त गया है कि भाषा संबंधी ठोस नीति बने और उसको बगैर किसी सियासत के लागू किया जा सके  


हिंदी साहित्य की आत्ममुग्ध पीढ़ी

काफी दिनों के बाद दिल्ली के साहित्य अकादमी जाना हुआ, वहां हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक से मुलाकात हुई । बातें चली तो इन दिनों सक्रिय लेखकों की सृजनात्मकता पर बात शुरू हुई । कविता, कहानी आलोचना से लेकर फेसबुक पर चल रही साहित्यक गतिविधियों पर भी बात हुई । इस बातचीत में उन्होंने कई ऐसी टिप्पणी की जो समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर सटीक बैठती है । उन्होंने साहित्य की मौजूदा पीढ़ी को हिंदी साहित्य की आत्ममुग्ध पीढ़ी की संज्ञा दी । जब मैंने एतराज जताया तो बोले कि आप जरा वस्तुनिष्ठ होकर विचार करो तो मेरी बात सही लगेगी । उनके तर्क थे कि आज के लेखक अपने वरिष्ठ लेखकों को पढ़कर उनकी रचनाओं से आगे जाने का कोई उपक्रम करते दीख नहीं रहे हैं, वो तो बस अपनी ही पीढ़ी के लेखकों के कंधों पर पांव रखकर आगे निकल जाने की होड़ में शामिल हैं । हर लेखक पुरस्कृत होना चाहता है और उसको लगता है कि वो शेक्सपियर और दस्तावस्की जैसा महान लेखक हो गया है । उन्होंने जोर देकर कहा था कि साहित्य लंबे समय तक चलनेवाली एक ऐसी साधना है जिसमें फल मिलने की गुंजाइश नहीं के बराबर होती है लेकिन इन दिनों जो लोग कहानी या उपन्यास लिख रहे हैं उनको साधना से कोई लेना देना नहीं है वो तो तप के पहले ही वरदान के आकांक्षी हुए जा रहे हैं । मैंने उनसे कहा कि इस तरह हवा में बातें ना करें और उदाहरण देकर बताएं । उन्होंने छूटते ही कहा कि साहित्यक पत्रिका पाखी में कहानीकार-उपन्यासकार अल्पना मिश्रा का साक्षात्कार देख लें । उनके मुताबिक यह साक्षात्कार आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा है, जिसमें कोई लेखक अपनी ही रचना को महान बता रहा है और दूसरे की रचना को फ्लॉप करार दे रहा है । यह आत्ममुग्धता नहीं तो और क्या है । मैं अवाक उनको सुन रहा था और वो धाराप्रवाह पाखी के उस इंटरव्यू की धज्जियां उड़ा रहे थे । उस साक्षात्कार में अल्पना जी ने प्रेम भारद्वाज के शब्दों को लेकर खुद को अनकन्वेंशनल लेखक कहा है । मुझे लगता है कि अल्पना मिश्र जी की सारी रचनाएं लगभग पारंपरिक ही हैं, उनकी कहानियां भी और उनका उपन्यास भी ।
मुझे लगा कि इस बातचीत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए और मैं आलोचक महोदय को लेकर साहित्य अकादमी की कैंटीन की तरफ बढ़ा । मौजूदा पीढ़ी के कहानीकारों पर चर्चा चल रही थी । उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम बताओ कि पिछले दस साल की कितनी कहानियां याद हैं । कहानी के गिरते स्तर को लेकर उनकी चिंता और उसका प्रकटीकरण जारी था । उन्होंने कहा कि कुछ सालों पहले नीलाक्षी सिंह को लेकर बहुत शोर मचा था लेकिन अब वो कहां हैं । उनकी कहानियों को अपने कंधे पर लेकर घूमनेवाले संपादक भी नीलाक्षी को साहित्य या कहानी की दुनिया में स्थापित नहीं कर पाए । इन दोनों लेखकों के अलावा उन्होंने कई लेखक, लेखिकाओं के नाम गिनाए । उनका दुख यही था कि वो खूब कहानियां पढ़ते हैं लेकिन लगभग सभी कहानियों को पढ़ने के बाद उनको निराशा होती है । उनका मानना था कि हर युग में अच्छी कहानियां लिखी जाए यह आवश्यक नहीं है लेकिन कहानी को लेकर जो विवेक है उसका बचना जरूरी है । यही विवेक आज खतरे में है । उनका कहना था कि कहानी भी गीत और गजल की तरह बाजार के जाल में फंसती जा रही है । उनका कहना था किआज के कहानीकारों के अनुभव बहुत सीमित हैं । मैंने उन्हें और लेखकों के बारे में कुरेदा । मुझे यह जानकर घोर आश्चर्य हुआ कि समकालीन हिंदी कहानी के सभी लेखकों को लगभग वो पढ़ चुके थे । उन्होने बताया कि हिंदी की तमाम साहित्यक पत्रिकाएं उनके पास आती हैं और वो सबको पढ़ते हैं, नए से नए लेखकों से लेकर वरिष्ठ लेखकों तक की रचनाएं । उन्होंने माना कि वो जितनी कहानियां पढ़ते हैं उतनी ही निराशा बढ़ती जाती है । यह एक आलोचक के अलावा एक गंभीर पाठक का भी दर्द था । उन्होंने यह भी माना कि साहित्य में गंभीर लेखन के प्रशंसकों में कमी आई है । प्रकाशक भी अब चालू और तुरत-फुरत लोकप्रियता हासिल करनेवाली फूहड़ रचनाओं को तवज्जो देने में लगे हैं । करीब डेढ घंटे तक हमारी बातचीत होती रही । अंत में मैने उनसे पूछा कि इस वक्त किस महिला कथाकार की रचनाओं में उनको दम नजर आता है । उन्होंने छूटते ही कहा कि इस वक्त अपनी पीढ़ी में मनीषा कुलश्रेष्ठ सबसे समर्थ रचनाकार हैं । उन्होने मनीषा की कुछ कहानियों के नाम भी गिनाए । जब उनको मंडी हाउस के पास टैक्सी पर बिठाकर जब विवाद दे रहा था तो उन्होंने कहा कि इस वक्त हीं साहित्य बजबजा रहा है, लिहाजा इसपर चिंता करना ।

मैं वापस अकादमी के परिसर में लौटा तो मेरे सामने उनकी कई टिप्पणियां थी जिनपर विचार करना आवश्यक था । उनकी इस बात में तो मुझे दम लगा कि आज के ज्यादातर लेखक अपने समकालीन को तो नहीं ही पढ़ते हैं अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों की रचनाओं को भी नहीं पढ़ते हैं । उनका तर्क यह होता है कि वो दूसरे की रचनाओं को पढ़ने से उनकी रचनात्मकता प्रभावित होगी । चले अगर एक मिनट के लिए इस तर्क को मान भी लिया जाए तो समकालीन रचनाकारों को पढ़ने में क्या दिक्कत है । दरअसल आज की पीढ़ी के कई रचनाकारों में एक खास किस्म का एरोगैंस दिखाई देता है, बदतमीजी की हद तक । वो खुद को विद्वान ही नहीं मनाते बल्कि यह अपेक्षा भी रखते हैं कि दूसरे भी उनको ज्ञानी मानें । यहीं से उनकी रचनात्मकता बाधित होनी शुरू हो जाती है । बाधित रचनात्मकता को जब छद्म विद्वता बोध का साथ मिलता है तब उससे उपजती है पुरस्कृत होने की चाहत और इस चाहत के वशीभूत होकर शुरू होता है पुरस्कार पाने की गोलबंदी । और तय मानिए कि जब साहित्य में गोलबंदी या घेरेबंदी शुरू हो जाए तो उसका संक्रमण काल शुरू हो जाता है । इस संक्रमण काल को आप उस दौर की रचनाओं में आसानी से लक्षित कर सकते हैं । जरूरत इस बात की है कि आज की आत्ममुग्ध पीढ़ी के रचनाकार अपने समकालीनों और पूर्ववर्तियों को पढ़ें और उनको रचनात्मक स्तर पर चुनौती पेश करें । अगर ऐसा हो पाता है तो समकालीन साहित्य का परिदृश्य बदल सकता है और कुछ अच्छी रचनाएं सामने आ सकती हैं ।     

द्रौपदी पर टिप्पणी पर ‘महाभारत’

मशहूर फिल्म अभिनेता कमल हासन के खिलाफ तमिलनाडू में एक संगठन हिंदू मक्कल काची ने पुलिस को शिकायत दी है । इस संगठन का आरोप है कि कमल हासन ने हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में हिंदुओं के धर्मग्रंथ महाभारत पर आपत्तिजनक टिप्पणी की जिससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं । दरअसल कमल हासन ने अपने इंटरव्यू में महाभारत में द्रौपदी के जुए में हारने को लेकर अपनी टिप्पणी की थी । उनका कहना था कि इस ग्रंथ में स्त्री को पुरुषों की हाथ की कठपुतली बताया गया है जिसको उसके पति जुए में दांव पर लगा देता है । कमल हासन के मुताबिक जिस ग्रंथ में एक महिला को जुए में दांव पर लगाने वाली चीज के तौर पर वर्णित किया गया हो उस ग्रंथ को भारत में महान माना जाता है । इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कमल हासन की घेरेबंदी शुरू हुई और हिंदू मक्कल काची ने पुलिस को शिकायत दे दी कि कमल हासन की टिप्पणी से हिंदुओं की दार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं । यहां यह समझने की जरूरत है कि कमल हासन ने किस संदर्भ में यह बात कही है क्योंकि संदर्भ से काटकर किसी भी वाक्यांश को पेश करने से बहुधा अर्थ का अनर्थ हो जाता है ।
इसके अलावा यह भी देखने की जरूरत है कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लेखकों में धार्मिक मिथकों को लेकर अलग अलग मत रहे हैं । अगर हम सिर्फ रामायण को ही देखें तो उसमें राम और सीता को लेकर अलग अलग तरह के वर्णन हैं । वाल्मीकि रामायण में अगर देखें तो राम को मानवीय व्यक्तित्व के तौर पर पेश किया गया है जबकि मलयालम में देवत्व का रूप दिया गया है और उसी तरह गोस्वामी तुलसीदास के यहां आध्यात्मिक रूप दिखाई देता है । इसी तरह से अगर हम सीता के अपहरण के प्रसंग को देखें तो उसके वर्णन में भी भिन्नता नजर आती है । वाल्मीकि में सीता के साथ जोर जबरदस्ती का उल्लेख है तो रामचरित मानस में अपहरण के बाद सीता के स्पर्श की बात कही गई है लेकिन जब हम कंबन रामायण को देखते हैं तो वहां सीता को कुटिया समेत उठाकर ले जाने का प्रसंग है । उइसका अलावा अगर दक्षिण भारत के लोकमानस की बात करें तो वहां रावण को राक्षस के तौर पर नहीं देखा जाता है । उनका सम्मान भी किया जाता है । दक्षिण भारत के लोक में रावण वहां राम के बराबर श्रद्धा पाते हैं । धार्मिक मिथकों को लेकर प्राचीन काल से ही लेखकों में मत भिन्नता रही है । यह अब भी कायम है । हमारे दौर के लेखक आनंद नीलकंठम की किताबों- राइज ऑफ शिवगामी से लेकर असुरा, टेल ऑफ वेनिक्विस्ट तक में धार्मिक चरित्रों के अलग रूप प्रस्तुत किए गए हैं । तो कमल हासन ने अगर द्रौपदी के आधार पर अपनी राय बनाई तो उसका उनको हक है लेकिन इतना ही हक हिंदू मक्कल काची को भी है कि वो उनके खिलाफ पुलिस को शिकायत करे । इस पूरे मसले पर कानून को अपना काम करने देना चाहिए ।    
पुलिस जांच कर ही रही थी कि हिंदू मक्कल काची की शिकायत पर सियासत शुरू हो गई । वामपंथी संगठनों से जुड़ी कविता कृष्षन ने ट्वीट करके इसको सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की । कविता ने कमल हासन के खिलाफ हिंदू मक्कल काची के इस कदम को हिंदू संगठनों की मुसलमानों के खिलाफ उठाए गए कदम के तौर पर देखा और उसको उसी तरह से प्रचारित भी किया । किसी एक राज्य के एक छोटे से संगठन के एक व्यक्ति के खिलाफ शिकायत को मुसलमानों से जोड़ देना एक तरह की सांप्रदायिकता ही है । कविता ने लिखा- हिंदू संस्कृति भारतीय संस्कृति है- हिंदू गंगठन । लेकिन एक मुसलमान अभिनेता महाभारत के बारे में बात नहीं कर सकता है । किसी को भी अधिकार है कि वो रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, बाइबिल, कुरान और बौद्ध साहित्य में महिलाओं को लेकर जिस तरह की बातें हुई हैं उसकी आलोचना करे । कविता कृष्णन बिल्कुल सही कह रही है कि सभी धर्मग्रंथों में महिलाओं की स्थिति के बारे में टिप्पणी करने का हक है लेकिन हक नहीं है कि वो किसी व्यक्तिगत राय को हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखे । यह प्रवृति बेहद खतरनाक है और समाज को बांटनेवाली भी है । इसका एक दुष्परिणाम यह होता है आमतौर पर सहिष्णु हिंदू भी कट्टरता की ओर कदम बढ़ा देता है । क्या कविता कृष्णन ने आजतक मुसलमानों या ईसाइयों के मसले को कभी इस तरह के सांप्रदायिक चश्मे से देखा है । क्या कविता कृष्षण ने कभी तस्सीमा नसरीन के खिलाफ ज्यादतियों पर आवाज उठाई है । अगर हम महिलाओं के हितों की पैरोकारी ही करना चाहते हैं तो क्या तसलीमा नसरीन महिला नहीं है। क्या किसी भी कथित प्रोग्रेसिव लेखक या एक्टिविस्ट वने कभी इस्लाम में महिलाओं की स्थिति को लेकर विपरीत टिप्पणी करने का साहस दिखाया । कहना आसान होता है लेकिन करना बेहद कठिन ।

धर्म इस देश में बेहद संवेधनशील मुद्दा रहा है और कमोबेश हमारे देश की जनता धार्मुक भी रही है । धर्म को अफीम बतानेवाली विचारधारा इस वजह से यहां सफल नहीं हो पाई । लेकिन जब भी धर्म को मुद्दा बनाकर राजनीति की गई है तो उसका असर समाज के सभी तबकों पर पड़ा है । नेताओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वो धर्म के आधार पर राजनीति ना करें लेकिन महिला अधिकारों की रक्षा के नाम और इसकी आड़ में राजनीति करना बहुत खतरनाक होता है । इससे भी ज्यादा खतरनाक होता है बौद्धिकता के आवरण में लपेटकर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना । कमल हासन के मसले को हिंदू मुसलमान के चश्मे से देखना इसका ही एक नूमना है । कविता कृष्णन जैसे लोग यही काम कर रहे हैं और बौद्धिक समाज को इन जैसों को चिन्हित कर उनके मंसूबों को सामने लाना होगा । इससे हमारे देश की बहुलतावादी संस्कृति को बल भी मिलेगा और लोकतंत्र भी मजबूत होगा ।     

Friday, March 17, 2017

ये फिल्मी कोठेवालियां

विद्या बालन । बेबाक । बिंदास । बेहतरीन अदाकारा जो फिल्मों में अपनी छवि को लगातार तोड़ती चलती हैं और भूमिका के हिसाब से अपनी छवि गढ़ती और जीती रहती हैं । कहानी दो में बगैर मेकअप के पूरी फिल्म करने का साहस दिखाकर विद्या ने खासी प्रशंसा बटोरी थी । बॉलीवुड में पश्चिम की नायिकाओं की तरह कपड़ों के माध्यम से अपनी सेक्स अपील को बढ़ाने की चलन को विद्या साड़ी में सेंसुअस दिखकर पारंपरिकता से आधुनिकता को चुनौती देती चलती हैं । फिल्मों में बोल्ड सींस और बोल्ड संवादों के लिए भी विद्या को तारीफ मिलती रही है । फिल्म डर्टी पिक्टर में विद्या के रोल को लेकर हॉल में सीटियां बजनी शुरू होती थी तो रुकने का नाम ही नहीं लेती थी । अब विद्या बालन एक बार फिर से वेश्या के चुनौतीपूर्ण रोल में आ रही हैं । फिल्म का नाम है बेगम जान और इसको राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी डायरेक्ट कर रहे हैं और निर्माता है महेश और मुकेश भट्ट । कोठे के मालकिन की भूमिका में विद्या बेहद बिंदास नजर आ रही हैं । भारत पाकिस्तान के बंटवारे की पृष्ठभूमि और बांग्ला फिल्म राजकहिनी का ये हिंदी रीमेक है। कोठे को लेकर भारतीय फिल्मकारों के मन में हमेशा से एक खास किस्म का आकर्षण रहा है । फिल्मकारों से लेकर कलाकारों तक की इच्छा होती है कि वो कोठे के जीवन को लेकर एक फिल्म जरूर बनाए । हिंदी फिल्मों की परंपरा को देखें तो यहां कोठों को लेकर सैकडों फिल्में बनी हैं । सबसे मजेदार तथ्य तो यह है कि कोठेवाली बनने में नई से लेकर पुरानी अभिनेत्रियों को कभी गुरेज नहीं रहा । कोठेवाली की भूमिका को अभिनेत्रियां चुनौतीपूर्ण मानती रही हैं ।
विद्या बालन की इस फिल्म के पहले देखें तो करीना कपूर ने चमेली में वेश्या की भूमिका निभाई । इस फिल्म में करीना को उसका चाचा वेश्यावृत्ति के लिए बेच देता है लेकिन बिंदास करीना अपनी अदाओं से बैंकर राहुल बोस को प्रभावित करती है । वेश्या होने के हुनर के साथ साथ उसके मानवीय गुणों से भी राहुल प्रभावित होता है । इस फिल्म में चमेली के रोल को करीना ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया था । इस फिल्म के आठ साल बाद करीना एक बार फिर से वेश्या की भूमिका में दिखी फिल्म तलाश में जिसमें उसके साथ आमिर खान और रानी मुखर्जी भी थे । रीमा बुगती की इस फिल्म में भी करीना ने जोरदार अभिनय किया । करीना के अलावा रानी मुखर्जी ने भी साल दो हजार सात में दो फिल्मों में वेश्या की भूमिका निभाई थी – सांवरिया और लागा चुनरी में दाग सांवरिया में उसको रणबीर से इश्क होता है लेकिन कहानी को कुछ और ही मंजूर था और रणबीर, सोनम के इश्क में डूबने लगता है और रानी को भुला देता है । लेकिन रानी की फिल्म लागा चुनरी में दाग एक बेहतरीन और यादगार भूमिका वाली फिल्म है जब एक लड़की बनारस से मुंबई आती है । वो अपने परिवार की खुशहाली के लिए पैसे कमाना चाहती है लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । पैसे कमाने की चाहत में बनारस की वो लड़की हाईप्रोफाइल एस्कार्ट बन जाती है । इसी तरह से दो हजार एक में आई फिल्म चांदनी बार में तब्बू की भूमिका ने उस साल उसकी झोली पुरस्कारों से भर दी थी । डांस बार में काम करनेवाली डांसर मुमताज एक गैंगस्टर के प्यार के जाल में फंसती है और उससे शादी कर लेती है लेकिन बाद में उसको अपने और अपने परिवार के लिए फिर से वेश्यावृत्ति के दलदल में उतरना पड़ता है । मुमताज के रोल को इस फिल्म में तब्बू ने निभाया था ।
इक्कसवीं सदी की शुरुआत में कई फिल्में बनीं जिसमें उस दौर की टॉप की हिरोइंस ने वेश्या का रोल निभाया । जैसे दो हजार एक में ही बनी फिल्म चोरी चोरी चुपके चुपके में प्रीति जिंटा वेश्या थी जिसे सलमान खान सैरोगेसी के लिए तैयार करते हैं क्योंकि कारोबरी सलमान और उसकी पत्नी रानी मुखर्जी को बच्चा नही हो रहा था । खेल तब पलट जाता है जब बच्चा पैदा होने के बाद प्रीति जिंटा को बच्चे के साथ साथ सलमान से भी प्यार हो जाता है  । इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया था । इसी तरह से अगर देखें तो दो हजार नौ में आई फिल्म देव डी में कल्कि ने भी हाई प्रोफाइल काल गर्ल की भूमिका निभाई थी जो दिन में कॉलेज की छात्रा होती थी और रात में वेश्यावृत्ति करती थी । इस फिल्म में आधुनिक समाज में एक लड़की के वेश्यावृत्ति के धंधे में किस मजबूरी में उतरना पड़ता है इसको फिलमकार ने बेहद सधे अंदाज में पेश किया है और कल्कि ने अपने दमदार अभियन से इस रोल को एक नया आयाम भी दिया है । इस वक्त की सफलतम अभिनेत्रियों में से एक कंगना रनावत ने भी दो हजार तेरह में बनी फिल्म रज्जो में मुंबई के रेड लाइट एरिया में रहनेवाली वेश्या का रोल किया था । कहानी वही थी कि कैसे एक लड़का उसके प्यार में गिरफ्तार होता है और फिर मुसीबतों को सामना करना पड़ता है । दो हजार पांच में आई फिल्म नो एंट्री में बिपाशा बसु ने भी एक सेक्स वर्कर का रोल किया था । फिल्म मार्केट में मनीषा कोइराला तो जूली में नेहा धूपिया ने भी वेश्या का रोल किया है ।

फिल्मों में वेश्या के रोल को जिस तरह से हिरोइंस चुनौतीपूर्ण मानती रही हैं उसी तरह से निर्माता और निर्देशक भी वेश्या के इर्द गिर्द फिल्म बनाने को चैलेंज की तरह लेते रहे हैं । भारतीय समाज में वेश्या का चरित्र हमेशा से लोगों को लुभाता रहा है, सेक्स के अलावा अन्य वजहों से भी । उनके रहन-सहन से लेकर बात व्यवहार से लेकर उनके जीवन की परतों को देखने समझने की आकांक्षा जनमानस में होती है । भारतीय समाज में स्त्रियों की खुली जिंदगी में झांकने की जो दबी छुपी इच्छा मर्दों में रहती है, फिल्मकार उसको ही भुनाने के लिए वेश्या को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते और सफल होते रहे हैं । हिरोइंस भी इस तरह के रोल को लीक से हटकर मानती रही हैं और उनको भी लगता है कि वेश्या का सफल रोल निभाना उनके करियर का एक अगम पड़ाव हो सकता है, लिहाजा कोई भी हिरोइन वेश्या के रोल से परहेज नहीं करती है ।   

Tuesday, March 14, 2017

साईबाबा को उम्रकैद से निकलते संदेश

उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव और उसके नतीजों के कोलाहल के बीच एक बेहद अहम खबर लगभग दब सी गई । राजनीतित विश्लेषखों ने इस खबर को उतनी तवज्जो नहीं दी जितनी मिलनी चाहिए थी । उस खबर पर प्राइम टाइम में उतनी बहस नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी । वह खबर थी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के शिक्षक जी साईबाबा और चार अन्य को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश रचने से लेकर प्रतिबंधित माओवादियों को मदद देने के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाए जाने की । सजा सुनाते वक्त महाराष्ट्र के गढचिरौली के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने बेहद कड़ी टिप्पणी की । उन्होंने कहा कि मुजरिमों के क्रियाकलापों की वजह से कई लोगों की जान गई और सरकारी संपत्ति का भारी नुकसान हुआ । जज ने कहा कि उम्रकैद की सजा इन लोगों के लिए मुकम्मल नहीं है लेकिन उनके हाथ यूएपीए कानून की धाराओ से बंधे हैं । अदालत से साईबाबा को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद अखबारों में उनकी पत्नी का जो बयान छपा है उसपर ध्यान देने की जरूरत है । प्रोफेसर जी एन साईबाबा की पत्नी ने सजा के बाद कहा- इस फासिस्ट गवर्नमेंट ने हमारे साथ ऐसा किया कि हमारे आंख में आंसू नहीं आ रहे, आग आ रही है । उन्होंने अपने बयानों में राज्य और केंद्र सरकार द्वारा न्यायपालिका पर दबाव डाले जाने की आशंका भी जताई । आंखों में आंसू नहीं आग आ रही है । सवाल यह उठता है कि आग किस चीज की, क्या उनकी पत्नी किसी तरह के इंतकाम की ओर संकेत कर रही हैं या फिर सिर्फ तात्कालिक गुस्से की वजह से उन्होंने ऐसा बयान दे दिया । साईबाबा की पत्नी ने केंद्र और राज्य सरकार पर भी संगीन इल्जाम लगाए । उनके पति को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है  और वो इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में अपील कर सकती हैं । बजाए न्यायपालिका पर भरोसा जताने के साईबाबा की पत्नी ने न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है । दरअसल यह उनका दोष नहीं है यह उस विचारधारा का असर है जिसमें सत्ता बंदूक की नली से निकलती है । यह उस विचारधारा का प्रभाव है जिसका लोकतंत्र में नहीं हिंसातंत्र में यकीन है । अगर लोकतंत्र में यकीन होता तो आंखों में आग नहीं आती । यह अकारण नहीं है कि 27 दिसंबर 1997 को महाश्वेता देवी ने हस्तलिखित अपील में सीपीआई एमएल से बिहार में बदला लेने का आह्वान किया था । रणवीर सेना पर उस वक्त एक सामूहिक नरसंहार का आरोप लगा था उसके बाद महाश्वेता देवी ने यह अपील की थी । उस वक्त महाश्वेता देवी किससे बदला लेने के लिए उकसा रही थीं, ऊमती जाति के उन गरीब लोगों पर जो निरीह थे । यह हिंसा के लिए उकसाना वर्ग शत्रुओं के सफाए की विचारधारा या सिद्धांत का पोषक ही कर सकता था । इस विचारधारा को पोषकों को ना तो संविधान की फिक्र है ना ही कानून और अदालतों पर उनका भरोसा है । व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर, गरीबों, मजलूमों को उनका हक दिलाने के नाम पर निरीह, निर्दोष लोगों की हत्या को अंजाम दिया जाता रहा है ।
महाश्वेता देवी पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि उनको गरीबों का मसीहा माना जाता था और गरीबों की हत्या का बदला लेने के लिए उकसाने को लेकर कहीं किसी प्रकार का स्पंदन नहीं हुआ था । जब साईबाबा को नक्सलियों से सांठगांठ के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो मार्क्सवादियों को सांप सूंघ गया था । इसको तानाशाही से लेकर फासीवाद आदि आदि तक करार दिया गया था । दरअसल 22 अगस्त दो हजार तेरह को हेम मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद इनलोगों के मंसूबों का पर्दाफाश हुआ था । आरोप लगा था कि साईबाबा ने मिश्रा के हाथों गढ़चिरौली इलाके में सक्रिय खूंखार नक्सली कमांडर नर्मदा अक्का के पास एक माइक्रोचिप भिजवाया था । उसके बाद मिश्रा और उनके साथियों की गिरफ्तरी और पूछताछ के बाद पुलिस साईबाबा तक पहुंची थी । करीब छह सात महीने तक साई बाबा पर नजर रखने के बाद महाराष्ट्र पुलिस ने 9 मई दो हजार चौदह को साई बाबा को दिल्ली से गिरफ्तार किया था । पुलिस ने उस वक्त दावा किया था कि साईबाबा के घर से उनको जो हॉर्ड डिस्क मिला था उससे साईबाबा की नक्सलियों के साथ संलिप्तता साबित होती थी । पुलिस को जांच के दौरान यह भी पता चला था कि साईबाबा रिवोल्यूशनरी डेमोक्रैटिक फ्रंट का संयुक्त सचिव था । यह संगठन खुले तौर पर इस बात की वकालत करता था कि नक्सली तौर-तरीकों से ही सरकार को हटाया जा सकता है । उनकी जमानत याचिका हाईकोर्ट की नागपुर बेंच से खारिज हुई थी, फिर बांबे हाईकोर्ट से उनको अस्थायी जमानत मिली थी जिसे बाद में रद्द भी किया गया था । पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने साईबाबा को जमानत दे दी थी ।
अब सवाल यही उठता है कि नक्सलियों के रोमांटिसिज्म में या फिर हिंसक विचारधारा के प्रभाव में भारत के खिलाफ युद्ध झेड़ने का जुर्म साबित होने पर उम्रकैद होने से नक्सलियों या उनके बौद्धिक समर्थकों के बीच कड़ा संदेश जाएगा । दरअसल नक्सलियों के जो बौद्धिक समर्थक हैं वो उनके स्लीपर सेल के तौर पर काम करते हैं । रहा होगा किसी जमाने में नक्सलबाड़ी आंदोलन की नैतिक आभा लेकिन पिछले एक दो दशक से तो नक्सली खालिस अपराधी हो गए हैं जो ठेकेदारों से रंगदारी वसूलते हैं, लूटपाट करते हैं, बलात्कार करते हैं, अपने संगठन की महिलाओं पर जमकर यौन अत्याचार करते हैं । यह कौन सी विचारधारा है जो गांधी के इस देश में हिंसा का प्रचार प्रसार करती है । अब इसपर नक्सलियों को बौद्धिक आधार देनेवालों को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वो हिंसा के साथ हैं या अहिंसा के साथ ।    

Saturday, March 11, 2017

विकल्पहीनता और मैत्री का पुरस्कार


दिल्ली की हिंदी अकादमी ने अभी अपने सालाना पुरस्कारों का एलान किया है । पुरस्कृत लेखकों की सूची को देखकर लगा कि हिंदी में पुरस्कारों को लेकर जोखिम उठाने का साहस कोई कर नहीं सकता है ।पिछले वर्ष जब हिंदी अकादमी ने अपने सालाना पुरस्कारों का एलान किया था तब कमोबेश चयन को लेकर एक आश्वस्ति हुई थी । कुछ नाम तब भी विवादास्पद थे लेकिन सरकारी संस्था होने के कारण उसके कर्ताधर्ताओं पर बाहरी-भीतरी कई तरह के दबाव होते हैं । बावजूद इसके पिछले वर्ष के नामों को देखकर लगा था कि हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा में जोखिम लेने का साहस है । मैत्रेयी पुष्पा ने दिल्ली की हिंदी अकादमी को गतिशील कर वहां की साहित्यक जड़ता को तोड़ा है लेकिन इस वर्ष के चुनाव में नामों को देखकर लगता है कि मैत्रेयी जी दो साल में व्यवस्था से लड़ते लड़ते थक गई हैं और हथियार डाल दिए हैं । इस वर्ष का सबसे बड़ा पुरस्कार यानि श्लाका सम्मान मैनेजर पांडे को दिया गया है । इन पुरस्कारों पर टिप्पणी करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि पुरस्कारों की चयन समिति में कौन कौन से विद्वान थे । मैत्रेयी पुष्पा के अलावा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई, लेखक वीरेन्द्र यादव और प्राध्यापक सुधा सिंह । अब इस सूची से ही बहुत कुछ साफ हो जाता है कि हिंदी अकादमी अपने पुरस्कारों के चयन को लेकर कितनी संजीदा थी । लीलाधर मंडलोई के अलावा जो दो विद्वान इस जूरी में थे उनके बारे में हिंदी जगत को ज्ञात है । वीरेन्द्र यादव हिंदी के आलोचक माने जाते हैं, हिंदी अकादमी में हाल में इनकी सक्रियता बढ़ी है, संभव है अकादमी की उपाध्यक्ष से उनकी नजदीकी फिर से कायम हो गई हो । अन्यथा दिल्ली में रहनेवाले तमाम आलोचकों को दरकिनार कर यादव जी को जूरी में रखने का औचित्य समझ से परे है । दरअसल संस्थाओं पर से मार्क्सवादियों के खत्म होते वर्चस्व के मद्देनजर वीरेन्द्र यादव जैसे सम्मानित वामपंथी लेखक अलग अलग ठीहा तलाशने में लगे हैं । ठीहे की तलाश के क्रम में दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार वामपंथ के अनुयायियों के लिए सबसे मुफीद जगह है । मैत्रेयी पुष्पा अपने लेखन से लेकर अपने विचार में कभी भी किसी पंथ या वाद में नहीं बंधी लेकिन जब सरकारी पद पर पहुंची तो उनके सामने भी अपने सरकार के एजेंडे के हिसाब से काम करने का परोक्ष या प्रत्यक्ष दबाव तो होगा ही । वीरेन्द्र यादव जी को रायपुर में रमन सिंह सरकार द्वारा आयोजित लेखक सम्मेलन पर घोर आपत्ति थी क्योंकि वहां उनके मुताबिक फासीवादी सरकार है, उस पार्टी की सरकार है जिसपर गुजरात दंगों के दाग हैं । वीरेन्द्र यादव जी को गुजरात दंगे याद रहते हैं लेकिन वो मुजफ्फरनगर दंगों को भुलाते हुए अखिलेश यादव सरकार से खुद सम्मानित हो जाते हैं । यादव जी स्वयं बता सकते हैं कि उनके इस विचलन के पीछे उनकी क्या सोच रही होगी, लखटकिया पुरस्कार या कुछ और । खैर यह अवांतर प्रसंग है । अब बचती हैं सुधा सिंह जी, दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं और कोलकाता विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के साथ कई पुस्तकों का लेखन किया है । उनका साहित्यक कद इतना बड़ा नहीं है कि वो जूरी के अन्य सदस्यों के मत का विरोध आदि कर सकें । इसमें से सिर्फ लीलाधर मंडलोई से निरपेक्ष होकर निर्णय की अपेक्षा की जा सकती है ।
अब श्लाका पुरस्कार से पुरस्कृत मैनेजर पांडे के साहित्यक अवदान पर बात कर लेते हैं । पांडे जी बड़े आलोचक हैं । जन संस्कृति मंच से लंबे समय तक जुड़े रहे हैं ।  मैं समझता हूं कि श्लाका सम्मान एक तरह से लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड है, लिहाजा उनको मिल ही जाना चाहिए था । पर पांडे जी को श्लाका सम्मान मिलने पर मुझे पिछले साल नामवर सिंह के जन्मदिन पर प्रोफेसर कृष्ण कुमार सिंह के संपादन में प्रकाशित बहुवचन पत्रिका में नामवर जी के अपनी बेटी को लिखे एक पत्र की याद आ गई । नामवर जी ने वो पत्र अपनी पुत्री को दार्जिलिंग से बारह जून दो हजार पांच को लिखा था । पत्र की पृष्ठभूमि यह है कि दार्जिलिंग के होटल में कोई पांडे नाम के सज्जन पहुंचे और पांच सौ पृष्ठों के महाकाव्य पर नामवर जी से कुछ लिखने का आग्रह किया । नामवर जी लिखते हैं – बेटू, मेरी वह पुरानी जन्मकुंडली कहीं पड़ी हो तो इस बार लौटने पर मुझे दे देना । मैं उसे किसी ज्योतिषी को दिखाना चाहता हूं । मुझे शक है, उसमें कहीं ना कहीं पांडे-पीड़ा का उल्लेख अवश्य होगा । काशी तो पांडे-पीड़ित हैं ही, कहीं ना कहीं मुझे भी वह छूत लग गई है । भदैनी पर रहने के लिए किराए का जो मकान लिया था वह रामनाथ पांडे का ही दिया हुआ था और बाद में बगल का जो मकान खरीदा वह भी उन्हीं पांडे जी ने दिलवाया था । इस क्रम में मैनेजर पांडे भी याद आ रहे हैं जो जोधपुर में मिले तो मिले ही, मेरी शामत आई कि उनको जेएनयू ले आया और अंत में अवकाश ग्रहण करने के बाद तीन साल के लिए सेंटर पर थोप दिया, जिसके लिए सभी लोग आज भी कोस रहे हैं । जो हो, दार्जीलिंग भीइस पांडे-पीड़ा से सुरक्षित नहीं है । जाने यह पीड़ा कहां-कहां तक और कब तक मेरा पीछा करती रहेगी ।नामवर जी के इस उद्गार में कुछ और जोड़ने की आववश्यकता नहीं है ।
इसके अलावा भी जिन अन्य लोगों को पुरस्कार दिए गए हैं उनके चयन को लेकर यह तर्क दिया जा रहा है कि विकल्पहीनता की वजह से इन लोगों का चयन हुआ । कहा तो यहां तक जा रहा है कि हिंदी अकादमी के सामने विकल्प ही नहीं बचे हैं लिहाजा जो हैं उन्हीं में से चुनाव किया जा रहा है । पर मुझे लगता है कि कुछ को विकल्पहीनता, कुछ को आम आदमी पार्टी के प्रति निष्ठा, कुछ को मैत्रीवश तो कुछ को उनकी उम्र का ख्याल रखकर दिया गया है । इन कोष्ठकों में नाम रख देने से उनका अनादर होगा लेकिन दिल्ली के हिन्दी जगत के लोग इसको बखूबी समझ सकते हैं । वफादारी का इनाम हर जगह मिलता है लेकिन वफादारी को नैतिकता के आवरण में लपेटकर दिया गया इनाम हमेशा संदेहास्पद भी हो जाता है ।  मैत्रेयी पुष्पा ने जब हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष का पद संभाला था तब यह उम्मीद जगी थी कि वो हिंदी की घिसी पिटी लीक से अलग हटकर अपना रास्ता बनाएंगी । एक दो बार इस तरह के जोखिम उठाने के बाद वो भी लीक से हटकर चलने का कौशल नहीं दिखा पाईं । घिसे-पिटे तरीके को अपनाकर मैत्रेयी जी ने भी यह बता दिया कि व्यवस्था को बदलना आसान नहीं है, इसके लिए अदम्य साहस के साथ साथ अपने साथियों की नाराजगी का खतरा मोल लेने की हिम्मत दिखानी पड़ती है । क्या यह संभव नहीं है कि उन कम उम्र लेखकों को पुरस्कृत किया जाए जिन्होंने अपनी लेखनी और सृजनात्मरता से समकालीन हिंदी साहित्य में सार्थक हस्तक्षेप किया है । मैत्रेयी जी को तो यह बात समझनी चाहिए थी क्योंकि उन्होंने तो इसको देखा और महसूसा है कि कैसे बेहतर लेखन के बावजूद उनको सम्मानित नहीं किया गया था । अब वक्त आ गया है कि बेहतर लेखन को रेखांकित कर उसको पुरस्कृत किया जाए चाहे वो किसी आयुवर्ग के लेखक ने किया हो या फिर डंके की चोट पर यह बता देना चाहिए कि लेखक को उसके समग्र योगदान के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है । इससे किसी तरह के सवाल उठने की गुंजाइश नहीं रहेगी ।  
एक और बात जिसका दिल्ली की हिंदी अकादमी को खुलासा करना चाहिए था, वह ये कि उन्होंने आम जनता से या लेखकों आदि से जो संस्तुतियां मंगवाई थी उससे इस पुरस्कार को तय करने में कोई मदद मिली या नहीं । अगर मदद मिली तो उसको सार्वजनिक करना चाहिए क्योंकि केजरीवाल जी स्वयं पारदर्शिता की पैरोकारी करते रहे हैं । अगर आमंत्रित संस्तुतियों से पुरस्कार के निर्णायकों को किसी तरह की मदद नहीं मिली तो इस प्रक्रिया को बंद कर देना चाहिए । हिंदी अकादमी अगर यह भी बताती कि किन लेखकों के नामों की संस्तुति सबसे ज्यादा आई है तो निर्णय की विश्वसनीयता बढ़ती ।  बताना तो हिंदी अकादमी को यह भी चाहिए कि पुरस्कार के निर्णायकों का चयन किस आधार पर किया गया है । दिल्ली की अकादमी होने के बावजूद एनसीआर से बाहर के लेखक को निर्णायक मंडल का सदस्य, हिंदी अकादमी की किस नियम के तहत, बनाए गए । अगर इस मसले पर हिंदी अकादमी के नियम खामोश हैं तो इसको परिभाषित किए जाने की भी जरूरत है क्योंकि दिल्ली-एनसीआर में योग्य निर्णायकों के होने के बावजूद बाहर के निर्णायक बुलाने से बेवजह खर्च बढ़ता है । इस खर्च का वहन दिल्ली के करदाताओं के पैसे से होता है और बेहतर होता कि यहीं के लेखकों को जोड़कर अकादमी बेहतर साहित्यक माहौल बनाने की कोशिश करती । राज्यों की अकादमी इसलिए तो केंद्रीय साहित्य अकादमी की प्रकृति से अलग होती है । 

साहित्य उत्सव की सार्थकता

एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त देशभर में करीब साढे तीन सौ लिटरेचर फेस्टिवल हो रहे हैं । अलग अलग भाषाओं में अलग अलग संस्थानों के बैनर तले । अगर बाजार की भाषा में कहें तो ये लिटरेचर फेस्टिवल अब उस स्तर पर पहुंच गए हैं जहां से आगे और ग्रोथ की गुंजाइश नहीं बनती है। कुछ भाषा के नाम पर होने लगे हैं तो कुछ क्षेत्र के नाम पर । इन लिटरेचर फेस्टिवलों में संजीदगी का भी ह्रास देखने को मिलने लगा है, सत्रों में भी और वक्ताओं में भी । कई वक्ता तो इसको घूमने फिरने के अवसर के तौर पर लेते हैं और बगैर तैयारी के इन साहित्यक जमावड़े में शामिल हो जाते हैं । लेकिन अभी हाल ही में दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में दो दिनों का हिन्दी महोत्सव संपन्न हुआ । इस महोत्सव की खास बात यह रही है कि ये छात्रों के बीच साहित्य की पैठ बढ़ाने की कोशिश करता दिखा । दो दिनों के कई सत्रों में गंभीर विषयों पर चर्चा करवाकर इस हिन्दी महोत्सव के आयोजक वाणी फाउंडेशन की युवा कर्ताधर्ता अदिति महेश्वरी ने आनेवाले दिनों में इस आयोजन के भविष्य के संकेत कर दिए हैं । इस आयोजन में सबसे खास बात यह रही है कि हिन्दी महोत्सव में सभी गुट, मठ, वाद, संप्रदाय के लोगों को जोड़ने की कोशिश की गई । इसके पहले हिंदी के आयोजनों में इस तरह का साहस कम ही दिखता था । तीन-चार साल पहले दिल्ली में कलमकार फाउंडेशन के आयोजन में एक मंच पर राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी, विभूति नारायण राय और अब स्वर्गीय रवीन्द्र कालिया दिखाई दिए थे ।

हिन्दी महोत्सव के शहरों पर एक बेहद दिलचस्प चर्चा हुई जिसमें प्रोफेसर पुष्पेश पंत, शहरनामा फैजाबाद के लेखक यतीन्द्र मिश्र से युवा कथाकार अनु सिंह चौधरी ने बात की । पुष्पेश पंत ने पहाड़ से दिल्ली आकर रहने के अपने अनुभवों को स्वाद के आधार पर जिस तरह से विश्लेषित किया वो रोचक तो था ही किसी भी शहर को विश्लेषित करने का एक नया आधार भी देता था । शिक्षा पर कृष्ण कुमार का व्याख्यान हुआ । इस तरह के आयोजन के घंटे भर के सत्र में जब एक ही वक्ता बयालीस मिनट बोलें तो सत्र की उपयोगिता लगभग खत्म हो जाती है । ऐसे में सत्र संचालक की भूमिका बेहद अहम हो जाती है । लेकिन इस सत्र में संचालिका ने बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं किया जिससे संवाद एकालाप में बदल गया । कृष्ण कुमार की ख्याति एक शिक्षाविद के रूप में है लेकिन जिस तरह से उन्होंने शिक्षकों को कठघरे में खड़ा किया वह सोचने को तो मजबूर करता है ,लेकिन जिम्मेदार पद पर रहते हुए उन्होंने क्या किया, यह सवाल भी खड़ा होता है । विचारधारा और सृजन पर एक अन्य सत्र में लोकसभा टीवी के संपादक श्याम किशोर सहाय, वरिष्ठ उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल और वर्तिका नंदा के साथ इन पंक्तियों के लेखक ने भी शिरकत की । इस सत्र में यह बात निकल कर आई कि विचार की भूमि पर सृजन हो सकता है लेकिन विचारधारा बहुधा सृजन को बाधित करती है । वक्ताओं ने वामपंथी विचारधारा को भी कसौटी पर कसा । लोकप्रिय लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक के साथ प्रभात रंजन की बातचीत भी अच्छी रही । लिटरेचर फेस्टिवल की चमक दमक से दूर छात्रों के बीच इस तरह के आयोजन के लिए मंच प्रदान करके इंद्रप्रस्थ कॉलेज की प्राचार्य बबली मोइत्रा श्रॉफ ने उदाहरण पेश किया है । साधुवाद । इन दिनों विश्वविद्यालयों में जिस तरह से सेमिनारों के नाम पर कुछ भी आयोजित करवाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली जाती है वैसे में इंद्रप्रस्थ की प्राचार्य ने एक नया रास्ता तलाश किया है । अब हिंदी अकादमी भी इसी तर्ज पर हिंदू कॉलेज में अपना साहित्य उत्सव कर रही है ।          

Tuesday, March 7, 2017

कमबैक से सफल होने की चुनौती

बॉलीवुड को लेकर एक बेहद पुरानी कहावत प्रचलित है । कहा यह जाता है कि एक बार जो भी रूपहले पर्द पर आ जाए, ताउम्र उसके मोह से बाहर नहीं निकल सकता है । यह लगातार देखने को भी मिलता रहा है कि शादी के बाद भी हिरोइनें फिल्मों में काम करने के लिए आतुर दिखती हैं । इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन ये ग्लैमर की दुनिया है जहां दर्शक हीरो-हीरोइन के आकर्षण में पंसकर सिनेमा हॉल तक पहुंचते रहे हैं । यह कहना भी गलत होगा कि शादी के बाद आकर्षण खत्म हो जाता है लेकिन पुरुषवादी सोच वाले समाज में यह देखने को मिलता है कि बहुत कम हिरोइंस को दर्शकों ने शादी के बाद पसंद किया है । दर्शकों से ठुकरा दिए जाने के खतरे के बावजूद हिरोइंस इपनी बढ़ती और ढलती उम्र में भी रूपहले पर्द का मोह छोड़ नहीं पाती हैं । कुछ हिरोइंस अपनी उम्र के हिसाब से अपनी भूमिकाएं बदलती रहकर प्रासंगिक बनी रहती हैं तो कइयों को यह एहसास ही नहीं हो पाता है कि ग्लैमर का सिरा उनसे छूटता जा रहा है । कई असफलताओं के बाद उनकी समझ में ये बात आती है लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी होती है । इस पूरे बैकग्राउंड को बताने का मकसद सिर्फ इतना था कि हाल ही में खबर आई है कि अपने जमाने की मशहूर और हिट अभिनेत्री रानी मुखर्जी एक बार फिर से बॉलीवुड का दरवाजा खटखटाने जा रही हैं । यशराज फिल्म के बैनर तले बनने वाली फिल्म हिचकी में रानी मुखर्जी को लीड रोल के लिए साइन किया गया है । इस फिल्म को सिद्धार्थ मल्होत्रा डायरेक्ट करेंगे औकर मनीष शर्मा उसके प्रोड्यूसर होंगे । रानी मुखर्जी अपनी इस फिल्म को लेकर खासी उत्साहित दिख रही हैं । यशराज फिल्मस के आदि चोपड़ा के साथ ब्याह रचाने के बाद रानी मुखर्जी फिल्म मर्दानी में नजर आई थीं लेकिन उसके बाद खबर आई थी कि वो मां बनने वाली हैं लिहाजा वो फिल्मों से दूर रही । अब जब उनकी बेटी थोड़ी बड़ी हो गई हैं तो उन्होंने एक बार फिर से बॉलीवपड का रुख किया है । ऐसा नहीं हैं कि शादी और मां बनने के बाद फिल्मों में वापसी करनेवाली रानी मुखर्जी पहली हिरोइन हैं । अभी हाल के दिनों में हीउनकी कज़न काजोल ने भी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के बाद कई फिल्में की, जिनमें से कुछ सफल रहीं तो कुछ को औसत सफलता मिली । इसी तरह से अगर देखें तो एश्वर्या राय ने भी शादी और मां बनने के बाद दोबारा फिल्मी दुनिया में कदम रखा और सरबजीत जैसी फिल्म भी की और ऐ दिल है मुश्किल में ग्लैमरस रोल भी किया । दर्शकों ने उनको पसंद भी किया । लेकिन जिस तरह से एश्वर्या राय ने ऐ दिल है मुश्किल में अपने को एक्सपोज कर दर्शकों को लुभाने की कोशिश की उसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है । बच्चन परिवार की बहू होने के बावजूद सफलता के लिए एश्वर्या राय ने तमाम तरह के लटके झटके दिखाए । इस मामले में काजोल ने जब फिल्मों में वापसी की तो संजीदगी के साथ । अंग प्रदर्शन आदि के सहारे से दूर रहकर उसने अपने अभिनय से दर्शकों को सिनेमा ह़ल तक लाने में सफलता पाई । अब रानी मुखर्जी के सामने यह चुनौती है कि वो दर्शकों को किस तरह से हिचकी देखने के लिए सिनेमा हॉल तक लाती है ।

रानी मुखर्जी को की कनमबैक फिल्म हिचकी उनके होनम प्रोडक्शन की फिल्म है इसका लाभ उनको मिल सकता है । इतने बड़े बैनर से कमबैक करने का अलग फायदा है । लेकिन वी आर फैमिली फेम के सिद्धार्थ मल्होत्रा का निर्देशन कैसे रहता है इसपर भी बहुत कुछ निर्भर करता है । सिद्धार्थ पहली बार यशराज बैनर के लिए फिल्म डायरेक्ट कर रहे हैं । लगभग चालीस साल की होने जा रही रानी मुखर्जी ने कई यादगार फिल्में दी हैं और उनकी झोली में सात फिल्मफेयर अवॉर्ड भी हैं । कुछ कुछ होता है में काजोल और रानी मुखर्जी की जोड़ी ने धमाल मचा दी थी      और फिल्म सुपर हिट रही थी । उसके बाद रानी मुखर्जी चोटी की हिरोइन में शुमार होने ली थी । दो हजार दो में जब साथिया फिल्म रिजील हुई तो उसमें रानी मुखर्जी ने अपने अभिनय का लोहा भी मनवा लिया । कहा गया वो कि ब्यूटी विद द ब्रेन हैं ।उसके बाद तो रानी ने बॉलीवुड पर कई वर्षों तक राज किया लेकिन इस बीच उनका दिल आदि चोपड़ा पर आ गया और उन्होंने दो हजार चौदह में शादी कर ली । ब्लैक में उनकी भूमिका के लिए रानी मुखर्जी को नेशनस अवॉर्ड भी मिला था । मेरे लिहाज से रानी ने इस फिल्म में अपने अभिनय के शिखर पर थीं । इसके बाद भी उन्होंने नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्में की जिसको अपेक्षिक सफलता नहीं मिल पाई । दो हजार तीन में यह बात भी सामने आई थी कि चलते चलते के फिल्मकारों ने एश्वर्या राय को हटाकर उस फिल्म में रानी को लिया था । कहा यह गया था कि फिल्म के निर्माता ने एश्वर्या और सलमान के बीच के लफड़े को देखते हुए ऐश को फिल्म से अग कर दिया था । हलांकि तब शाहरुख खान ने रानी की तरफदारी करते हुए कहा था कि रानी ही इस फिल्म के लिए पहली पसंद थी । खैर.. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि रान मुखर्जी अपनी कमबैक फिल्म हिचकी से अपना जलवा बिखेर पाने में कामयाब हो पाती हैं या नहीं । काजोल और श्रीदेवी ने अपनी कमबैक फिल्मों से अपने को फिर से स्टैबलिश किय़ा था, रानी के सामने वो चुनौती भी है । यशराज बैनर की इस फिल्म के लिए अभी किसी हीरो का एलान नहीं किया गया है । ब़ॉलीवुड में इस बात की चर्चा भी है कि ये नायिका प्रदान फिल्म होगी और जिसमें रानी का रोल बेहद सकारात्मक होगा । अगर ऐसा होता है तो रानी के कंधों पर फिल्म को सफल बनाने की दोहरी चुनौती होगी । 

विजय से खुलते नए क्षितिज

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने में अब चंद दिन ही शेष रह गए हैं । राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव के नतीजे को लेकर तरह तरह का आंकलन कर रहे हैं । बौद्धिक जुगाली के लिए हर तरह के जातिगत और अन्य आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है । भारतीय जनता पार्टी की नीतियों का लंबे समय से विरोध करनेवाले व्यक्ति और संस्थाएं भी इस बात पर एकमत दिखती हैं कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने जा रही है । इन राजनीतिक ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों की सचाई का पता ग्यारह मार्च की दोपहर तक चल जाएगा । चुनाव में हार जीत होती रहती है और ये लोकतंत्र की खूबसूरती और ताकत दोनों है । उत्तर प्रदेश के चुनावी शोरगुल के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण घटना को राजनीतिक विश्लेषकों ने अहमियत नहीं दी । देश के मतदाताओ के रुझान में या कह सकते हैं कि उनकी पसंद में एक बड़ा शिफ्ट देखने को मिल रहा है जिसको प्रमुखता से रेखांकित किया जाना चाहिए । देश के कई राज्यों में पिछले कुछ सालों से हो रहे स्थानीय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने धीरे धीरे अपनी उपस्थिति काफी मजबूत की है । अगर हम देखें तो उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय के चुनाव से लेकर महाराष्ट्र और ओडिशा से लेकर केरल तक के स्थानीय निकाल चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को महत्वपूर्ण सफलता मिली है । दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में पार्टी की शानदार सफलता के बाद उसने स्थानीय चुनावों में जिस तरह से पैठ बनाई है उसपर विचार करना आवश्यक है ।
अभी हाल ही में बृह्नमुंबई महानगर पालिका के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार सफलता हासिल की और पिछले चुनाव में बत्तीस सीटों के मुकाबले बयासी सीटें जीतकर इस बात को साबित किया स्थानीय स्तर पर भी उनके वोटर मजबूती से पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं । यह तब हुआ जब भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का गठबंधन नहीं हो पाया और बीजेपी ने अकेले दम पर जीत का परचम लहराया । यह स्थिति सिर्फ वृह्नमुबंई महानगर पालिका में ही नहीं बनी बल्कि अगर पूरे महाराष्ट्र के स्थनीय निकाय चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि मुबंई से बाहर तो स्थिति और भी अच्छी रही और नौ शहरों में से आठ पर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सफलता के झंडे गाड़े । महाराष्ट्र के दस शहरों के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो बीजेपी की सीटें, शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी तीनों पार्टियों की सीटों की संयुक्त संख्या से अधिक है । इसके अलावा बीजेपी ने महाराष्ट्र के जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनावों में भी अपनी स्थिति काफी मजबूत की है । इसी तरह से अगकर ओडिशा के स्थानीयनिकाय चुनावों पर नजर डालें तो बीजेपी ने यहां सफलता तालिका में बेहतपीन प्रदर्शन करते हुए आठ गुना ज्यादा सीटें जीती हैं । पार्टी ने कुल आठ सौ इक्यावन जिला परिषद सीटों में से दो सौ चौरानवे पर जीत हासिल कर अपनी स्थिति काफी मजबूत की है । यह सही है कि चार सौ सड़सठ सीटें जीतकर बीजू जनता दल अब भी शीर्ष पर बनी हुई है लेकिन बीजेपी ने पिछड़े इलाकों में अपनी स्थिति मजबूत कर बीजू जनता दल के लिए दो हजार उन्नीस में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले खतरे की घंटी बजा दी है ।
पहले यह कहा जाता था कि जहां जहां कांग्रेस कमजोर हो रही है वहीं वहीं बीजेपी को फायदा हो रहा है । जहां क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत हैं वहां बीजेपी अपनी ल्थिति बेहतर नहीं कर पा रही हैं । इस संबंध में बिहार और दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र तक का उदाहरण दिया जाता रहा है । लेकिन स्थनीय निकाय के चुनाव नतीजों ने इस राजनीतिक अवधारणा को निगेट किया है । महाराष्ट्र जैसे राज्य में जहां कांग्रेस कमजोर है लेकिन शिवसेना और एमसीपी जैसे क्षेत्रीय दल हैं वहां भी बीजेपी ने अपनी स्थिति मजबूत की है । ओडिशा के स्थानीय निकाय चुनाव में तो बीजेपी ने पिछले डेढ दशक से सत्ता में रही बेहद मजबूत क्षेत्रीय दल बीजू जनता दल को ही सीधी चुनौती देते हुए अपनी स्थिति मजबूत की है । हलांकि केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में भी जिस तरह से बीजेपी को सफलता मिली है वह भी रेखांकित की जानी चाहिए । केरल में बीजेपी ने जिला परिषदसे लेकर पंचायत चुनाव में अपनी स्थिति काफी बेहतर की थी और पलक्कड नगरपालिका में चेयरमैन के पद पर कब्जा किया था । यह अलहदा है कि पार्टी अपनी इस सफलता को विधानसभा चुनाव में आगे नहीं बढ़ा पाई । लेकिन केरल जैसे पारंपरिक रुप से वामपंथ और कांग्रेस के बीच झूल रहे राज्य में बीजेपी का मजबूत होना पार्टी की अकिल भारतीय स्वरूप की स्वीकार्यता का उदाहरण मात्र है । इन चुनावी नतीजों ने इस बात को भी स्थापित किया है सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी खुद को उन इलाकों में भी मजबूत कर रही है जहां पहले उसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था । इस बात को श्रेय बीजेपी की उस रणनीति को दिया जा सकता है जिसमें पार्टी ने स्थानीय नेताओं को मजबूकी देनी शुरू की । महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में जिस तरह की सफलता मिली है, बहुत हद तक उलसका श्रेय देवेन्द्र फड़णवीस को है जिनको पार्टी के आला नेतृत्व ने अपनी नीतियों से मजबूती प्रदान की । इसी तरह से पार्टी ने ओडिशा में धर्मेन्द्र प्रधान को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है । बीजेपी के मजबूत क्षेत्रीय नेता शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा राजे के अलावा देवेन्द्र फड़णवीस को जिलस तरह से मजबूत किया जा रहा है उसने पार्टी को अपना दायरा बढ़ाने में काफी मदद की है । कांग्रेस से यह चूक इंदिरा गांधी के पार्टी के केंद्र में आने के बाद से ही हुई और पार्टी के मजबूत क्षेत्रीय नेताओं को एक एक करके हाशिए पर डाला गया जो अब तक जारी है । सोनिया गांधी और राहुल गांधी के दौर में भी क्षेत्रीय नेतृत्व को उभरने का मौता नहीं दिया गया और बगैर जनाधार वाले नेताओं को पार्टी में अहमियत मिली । नतीजा सबके सामने है । इससे उलट नरेन्द्र मोदी ने अपनी मजबूत छवि और भ्रश्टाचार के खिलाफ लड़नेवाले योद्धा के रूप में खुद को पेश कर जनता को एक संदेश दिया कि वो एक ऐसे नेता हैं जो बेहतर गवर्नेंस के लिए प्रतिबद्ध हैं । इन सबके मेल से ही किसी दल को सफलता मिलती है । 

Saturday, March 4, 2017

आलोचना, अज्ञान और अवसर

हिंदी साहित्य में हर दौर में आलोचना को लेकर लंबी बहसस होती रहती है । बहुधा आलोचकों पर आरोप लगते हैं कि अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं । पर हाल के दिनों में रचनाकारों का आलोचकों को सर्टिफिकेट देने की प्रवृत्ति काफी बढ़ी है हलांकि हिंदी आलोचना के अभी इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि उनको रचनाकारों के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता पड़े । अगर हम गंभीरता से विचार करें तो रचनाकार और आलोचक के बीच के झगड़े का कोई अर्थ नहीं है । कुछ उत्साही लेखक तो आलोचना को रचना का परजीवी तक करार दे देते हैं । उनके तर्क होते हैं कि रचना ना हो तो आलोचना कैसे होगी । सतह पर या प्रत्यक्ष रूप से यह तर्क ठीक प्रतीत हो सकता है लेकिन रना और आलोचना कं संबंधों को जाननेवालों की राय अलग होती है । रचना के बगैर आलोचना के अस्तित्व को नकारने वाले यह भूल जाते हैं कि बगैर आलोचना के रचना भी नहीं हो सकती है । प्रत्य़क्ष और अप्रत्यक्ष के इस संबंध को पहचान नहीं पाने की भूल अक्सर साहित्य से जुड़े लोगों को हो जाती है । रचना और आलोचना को आमने सामने ऱड़ा करना भी लगभग अज्ञानता की ही बात है । अगर हम विचार करें तो आलोचना जहां रचना के अंदर की संवेदना के रेशे रेशे को अलग कर देखने का प्रयत्न है वहीं रचना में संवेदना अपने अखंड रूप में सृजित होती है । एक जगह पर आकर रचना और आलोचना दोनों मिलती है वह है भाषा । कई बार जो आनंद रचना की भाषा को पढ़कर होता है वैसा हीआनंद आलोचना की भाषा में भी प्राप्त होता है और कई बार तो आलोचना को पढ़ते हुए रचना का आस्वाद मिलता है । एक आलोचक ने लिखा भी है - आलोचना रचना है इसका एक अर्थ यह भी है कि अच्छी आलोचना रचना की तरह ही भाषा का शास्त्रीय नहीं बल्कि सृजनात्मक उपयोग करती है, जिससे उसे पढ़ते समय तक एक स्तर पर रचना को पढ़ने का आनंद मिलता है । जैसे रचना की एक कचना प्रक्रिया होती है, वैसे ही निश्चित रूप से आलोचना की भी । उदाहरण के तौर पर नामवर सिंह जब साठ के दशक में नई कहानियां में स्तंभ लिखते थे तो उस वक्त उसको पढ़ते हुए पाठकों को रचना का आस्वाद मिलता था । इसी तरह से अगर हम विजयदेव नारायण साही का लेख- शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट को पढ़े तो ऐसा लगता है कि कोई बेहतरीन रचना पढ़ रहे हों । यह लेख सृजनात्मक आलोचना का बेहतरीन नमूना माना जा सकता है । हलांकि कुछ आलोचर इसके कथ्य को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं । इसी तरह से नामवर सिंह की किताब दूसी परंपरा की खोज भी सृजनात्मक आलोचना का शिखर है ।  रचनात्मक भाषा को छोड़कर आलोचना ने रूढ भाषा को आलिंगनबद्ध कर लिया । इसके अलावा एक और दोष का शिकार हिंदी आलोचना हुई । हिंदी के आलोचकों ने अपने लेखों में अपने पांडित्य का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और एक विदेशी विद्वानों के हवाले से एक ऐसी शब्दावली विकसित कर दी जो हिंदी के आम पाठकों के समझ से बाहर की चीज होने लगी । विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का इस तरह की आलोचना में मुख्य योगदान है । पूरी तैयारी के साथ आलोचना लेखन का स्थान सरसरी तौर पर रचना का परिचय देने और सार संक्षेप बताने तक सीमित होने लगा । यह वैसा ही हुआ कि हाईवे पर जाने की बजाए हिंदी आलोचना ने आसान पगडंडियां ढूंढनी शुरू कर दी ताकि कठिन रास्ते से जाने का श्रम नहीं करना पड़े । आलोचकों और समीक्षकों ने भी हाल के दिनों में साहस के साथ लिखना छोड़ दिया है । कुछ साल पहले हिंदी की वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन से कहा था कि अब रचानाकरों में अपनी आलोचना सुनने पढ़ने का धैर्य नहीं रहा और अपनी रचना के खिलाफ लिखा उनको पसंद नहीं आता है । इस नापसंदगी की मार आलोचक को झेलनी पड़ती है क्योंकि रचनाकार उनसे दुश्मनी पाल बैठते हैं । तब भी मैंने लिखा था कि आलोचक का बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहना छोड़ देना साहित्य के लिए अच्छी स्थिति नहीं है ।
दरअसल आलोचना को जब से नारेबाजी की शक्ल दी गई या जब से आलोचना ने अपनी दृष्टि संकुचित कर ली तब से उसके पाठक कम होने लगे । हमारे आलोचक यह भी भूलने लगे कि आलोचना राजनीति नहीं है जिसमें समझौते की कोशिश की जाए या दोनों पक्षों की सहूलियतों का ध्यान रखा जाए । आलोचना का रास्ता दायित्व और विवेक का रास्ता है जिसको बेहतर ढंग से समझकर उसको अपने लेखन में अपनाया जाए । लेकिन मार्क्सवाद के सोवियत संस्करण के प्रभाव में लिखी जानेवाली आलोचना इस बात को समझ नहीं पाई । विचारधारा के जकड़न और गुलामी में लिखी गई आलोचना पथभ्रष्ट होती चली गई । कलांतर में सोवियत मार्क्सवाद के प्रभाव में ज्यादातर आलोचना उद्धरणों की विधा बनकर रह गई । अगर आप हिंदी के कई आलोचकों का लेखन देखें तो विदेशी विद्वानों के, विदेशी आलोचकों के एक एक पन्ने का उद्धरण फिर उसको आगे बढ़ाने के लिए एक वाक्य और फिर एक पन्ने का उद्धरण । इस तरह की आलोचना का एक नुकसान यह हुआ कि पाठकों उसको पढ़ने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा । उसको लगने लगा कि उसने तो अमुक का नाम देखकर किताब खरीदी थी लेकिन इसमें ज्यादातर तो राय दूसरे या विदेशी विद्वानों की है । इसके अलावा इस पद्धति का एक और दोष जो सामने आया वो ये कि इसने अपनी परंपरा और समृद्ध साहित्यक विरासत को हाशिए पर डालकर आलोचना की एक ऐसी पद्धति अपनाई जो विदेशी विद्वानों की अवधारणाओं पर आधिरत हो गई । विचारधारा विशेष के प्रभाव में लिखी जा रही आलोचना ने जानबूझकर भारतीय क्लासिक्स को दरकिनार करना शुरू कर दिया । उससे उद्धरण लेने की जरूरत ही महसूस हीं हुई । कोई भी आलोतर यह कहने का साहस नहीं जुटा पाया कि महाभारत पूरी दुनिया में किसी भी भाषा में लिखा गया सबसे बड़ा क्राइम थ्रिलर है । महाभारत का इस आधार पर मूल्यांकन नहीं होने का नतीजा यह रहा कि हमारी विरासत की इस अहम कृति को वैश्विक स्तर पर वो मान्यता नहीं मिल पाई जिसकी वो हकदार है । अब अंग्रेजी के लेखकों ने छोटे-छोटे महाभारत लिखकर शोहरत कमाना प्रारंभ कर दिया है तब जाकर भी हमारे आलोचकों की तंद्रा भंग नहीं हो पाई है । एक और विवाद उठाने की कोशिश की गई कि हिंदी में रचनाकार आलोचकों की कमी है । रचनाकार आलोचना की ओक नहीं जाते हैं । इसकी वजह को समझने की जरूरत है । रचनाकार जब आलोचना लिखता है तो उसके अवचेतन मन में अपनी खुद की रचनना होती है । जो उसको अपने बाड़े से आगे जाने से बार-बार रोकती है जिसका नतीजा उसके लेखन के स्वकेंद्रित हो जाना होता है । अगर आलोचना को एक विधा के तौर पर मजबूत करना है तो उसको विचारधारा की जकड़न, गुलामी से तो मुक्त होना ही होगा साथ ही उद्धरणों से आगे जाकर अपनी बात कहने का हुनर भी विकसित करना होगा ।


असहिष्णुता का झंडाबरदार बेनकाब

नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बनी केंद्र सरकार को लेकर एक खास विचारधारा के लेखकों के बीच बेचैनी दिखाई देती है । इस खास विचारधारा के लोगों ने मई दो हजार चौदह के बाद से देश में फासीवाद से लेकर असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी पर आसन्न खतरे को लेकर खूब छाती कूटी है । पिछले साल कई लेखकों और कलाकारों ने पुरस्कार वापसी समूह में शामिल होकर केंद्र सरकार को घेरने का उपक्रम किया था । पुरस्कार वापसी से किसको क्या फायदा क्या नुकसान हुआ यह तो देश के लोगों ने देखा । लेखकों-कलाकारों की विश्वसनीयता भी सवालों के दायरे में आई । इन दिनों एक बार फिर से दिल्ली युनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज को लेकर पुरस्कार वापसी गैंग सक्रिय हो गया है । जेएनयू के वक्त कन्हैया कुमार इनके नायक थे और इस वक्त गुरमेहर कौर । पुरस्कार वापसी पार्ट वन के दौर में एक हिंदी के लेखक ने खूब सुर्खियां बटोरी थी जिनका नाम था उदय प्रकाश । हिंदी में कहानियां और कविताएं लिखते हैं और उपन्यास की विधा में साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने में सफल रहे हैं । यह उदय प्रकाश की प्रतिभा का ही कमाल था कि साहित्य अकादमी ने उनकी लंबी कहानी को उपन्यास मानते हुए उनको पुरस्कृत करने का फैसला किया था । उदय प्रकाश हिंदी साहित्य में अपनी आस्था बदलने के लिए मशहूर रहे हैं । खैर उदय प्रकाश के साहित्यक और गैर साहित्यक कृत्यों पर आगे बात होगी । पिछले दिनों मुंबई में आयोजित लिट ओ फेस्ट में उदय प्रकाश का असली चेहरा देखने को मिला । उदय प्रकाश पिछले दो साल से असहिष्णुता और फासीवाद के विरोध के गढ़े हुए नायक के तौर पर सामने आए हैं । लेकिन जिन लोगों ने उनकी मेहनत के साथ उनकी इस छवि का निर्माण किया उनको या तो उदय प्रकाश के अतीत के बारे में पता नहीं था या विकल्पहीनता के चलते उन्होंने इस तरह का कदम उठाया । यह उस वजह से कह रहा हूं कि उदय प्रकाश अपनी कहानियों के साथ साथ सार्वजनिक जीवन में भी जादुई यथार्थ गढ़ते चलते हैं, वैसा यथार्थ जो उनके सामने मुनाफे के द्वार खोलता चलता है ।
मुंबई लिट-ओ-फेस्ट के दौरान उदय प्रकाश ने खुद का फासीवादी और असहिष्णु चेहरा सामने रखा जब उन्होंने मेरे साथ सत्र में बैठने से इंकार कर दिया । पूरा किस्सा कुछ उस तरह का रहा कि फेस्टिवल शुरू होने के पहले वो मुंबई पहुंचे और वहां पहुंचते ही उनको पता पड़ा कि अन्य वक्ताओं के साथ वो भी उस सत्र में हैं जिसका संचालन उनको करना था । यह पता चलते ही उदय प्रकाश भड़त गए और उन्होंने आसमान सर पर उठा लिया और आयोजकों तक यह संदेश पहुंचाने लगे कि वो वापस लौटना चाहते हैं । होटल के कमरे में पहुंचकर जब उनको यह पता चला कि रसरंजन आदि की व्यवस्था आयोजकों की ओर से नहीं होकर स्वयं करनी है तो गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा । देर रात तक मान मनौव्वल का दौर चलता रहा । आयोजकों की ओर से मुझे ये जानकारी मिल रही थी कि उदय प्रकाश ने सामान पैक कर लिया है और वो वापस लौटना चाहते हैं । आयोजक मुझसे ये जानने की कोशिश कर रहे थे कि दरअसल उदय प्रकाश मुझसे खफा क्यों हैं क्योंकि उदय ने साफ कर दिया था कि वो किसी भी कीमत पर उस सत्र में नहीं बैठने वाले हैं जिसका संचालन मुझे करना था । उदय ने मेरे बारे में कई आपत्तिजनक बातें भी कही । आयोजक पर यह दबाव बनने लगा था कि वो होटल में आकर उदय प्रकाश से मिलें और उनको मनाने की कोशिश करें । इस लिट फेस्ट की आयोजक स्मिता पारिख टस से मस नहीं हो रही थी और वो अतत: उनको मनाने नहीं आईं । मुझे बताया गया कि उन्होंने ये संकेत दे दिया कि  दोनों उनके सम्मानित अतिथि हैं और अगर उदय जी को तकलीफ है तो वो अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं । इसके बाद मामला किसी तरह शांत हुआ और उदय प्रकाश अगले दिन शाम को वापस दिल्ली लौट आए । जब से असहिष्णुता का विवाद चला है तब से यह मुझे हवा हवाई मुद्दा लगता था लेकिन पहली बार मेरी मुलाकात असहिष्णुता से हुई और साहित्यक अस्पृश्यता का अनुभव हुआ । असहिष्णुता का प्रतिनिधित्व वो शख्स कर रहा था जिसने पिछले साल साहित्य अकादमी पुरस्कार को वापस करने का एलान कर सुर्खियां बटोरी थी ।
दरअसल उदय की पीड़ा यह रही है कि पुरस्कार वापसी के दौर में भी और उसके पहले भी मैंने उनके दोहरे चरित्र को लगातार उजागर किया है । जब उन्होंने गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथो पहला 'नरेन्द्र स्मृति सम्मान' लिया था तो उस वक्त भी मैंने अपने इसी स्तंभ में चर्चा की थी । उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं लेकिन योगी से  सम्मान ग्रहण के बाद उनकी नैतिक आभा निस्तेज हो गई थी । उदय को नजदीक से जानने वालों का दावा है कि उदय प्रकाश हमेशा से अवसरवादी रहे हैं और जब भी, जहां भी मौका मिला है उन्होंने इसे साबित भी किया है । परिस्थितियों के अनुसार उदय प्रकाश अपनी प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं तय करते हैं, भले ही उसको कोई नैतिक आवरण में ढंक कर । उदय प्रकाश ने अपनी कृति- सुनो कारीगर- को लगभग दर्जनभर साहित्यकारों को समर्पित किया था।एक साथ दर्जनभर से ज्यादा साहित्यकारों/आलोचकों को साधने की कोशिश । उदय प्रकाश भारत भवन की पत्रिका पूर्वग्रह से भी जुड़े रहे हैं,जब उदय प्रकाश को पूर्वग्रह से बाहर होना पड़ा था तो उदय जी अशोक वाजपेयी और उनकी मित्रमंडली को 'भारत भवन के अल्सेशियंस' तक कह डाला था । उदय प्रकाश अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और साहित्यक मर्यादा भूलकर अपने विरोधियों पर बिलो द बेल्ट हमला करते हैं । रविभूषण ने जब इनकी कहानियों पर विदेशी लेखकों की छाया की बात की थी तो मामला कानूनी दांव-पेंच में भी उलझा था ।
वर्तमान साहित्य के मई दो हजार एक के अंक में उपेन्द्र कुमार की कहानी 'झूठ का मूठ' छपी थी तो उस वक्त भी विवाद हुआ था कि इस कहानी के केंद्र में उदय हैं । उस कहानी पर सुधीश पचौरी ने लिखा था- अरसे से हिंदी कथा लेखन में एक न्यूरोटिक लेखक कई लेखकों को अपने मनोविक्षिप्त उपहास का पात्र बनाता आ रहा था । पहले उसने एक महत्वपूर्ण कवि की जीवनगत असफलताओं को अपनी एक कहानी में सार्वजनिक मजाक का विषय बनाया । फिर वामपंथी गीतकार की असफल प्रेमकथा का सैडिस्टिक उपहास उड़ाने के लिए कहानी लिखी । किसी ने रोका नहीं तो, तो जोश में कई हिंदी अद्यापकों और आलोचकों के निजी जीवन पर कीचड़ उचालनेवाली शैली में कविताएं भी लिख डाली ।  किसी दीक्षित मनोविक्षिप्त की तरह उसने ये समझा कि उसे सबको शिकार करने का लाइसेंस हासिल हो गया है । उसके शिकारों में से उक्त गीतकार तो आत्महत्या तक कर बैठा ।  हिंदी के कई पाठक उसकी आत्महत्या के पीछे का कारण इस साडिज्म को भी मानते हैं । यह लेखक दरअसल स्वयं एक 'माचोसाडिस्ट' है जो दूसरों को अपने 'मर्दवादी परपीड़क विक्षेप' में जलील करता और सताता आया है । यह पहली कहानी है जिसने एक दुष्ट शिकारी का सरेआम शिकार किया है । शठ को शठता से ही सबक दिया है ।'

उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी लंबी कहानी को उपन्यास बताकर दिया गया । पुरस्कार की चयन समिति की बैठक में जो बातें हुई, जो सौदेबाजी हुई उसने पुरस्कार को संदिग्ध बना दिया था । जूरी में अशोक वाजपेयी, चित्रा मुद्गल और मैनेजर पांडे थे । बैठक शुरू होने पर अशोक वाजपेयी ने रमेशचंद्र शाह का नाम प्रस्तावित किया था लेकिन उसपर मैनेजर पांडे और चित्रा मुदगल दोनों ने आपत्ति की । जब शाह के नाम पर सहमति नहीं बनी तो अशोक वाजपेयी ने उदय प्रकाश का नाम प्रस्तावित कर दिया था । मैनेजर पांडे ने जोरदार विरोध किया क्योंकि वो उदय प्रकाश की कहानी पीली छतरी वाली लड़की से आहत थे । मैनेजर पांडे ने मैत्रेयी पुष्पा का नाम अकादमी पुरस्कार के लिए बढाया । अब चित्रा जी के पास अशोक जी का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं था । इस तरह उदय प्रकाश को एक के मुकाबले दो मतों से साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला । उदय प्रकाश का हिंदी साहित्य को लेकर अपना एक फ्रस्टेशन है । उनको लगता है कि उनको जितना मिलना चाहिए था उतना साहित्य से मिला नहीं,उनकी प्रतिभा का साहित्य में सही इस्तेमाल नहीं हो पाया । हो सकता है इन्ही वजहों ने मनोवैज्ञानिक रूप से उदय प्रकाश को कमजोर कर दिया हो और वो अपने ध्येय को प्राप्त करने के चक्कर में रास्ते से बार बार फिसलते रहे हों । उदय प्रकाश की उन्हीं फिसलनों और विचलनों में से असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी का खेल भी खेला था लेकिन मुंबई लिट ओ फेस्ट के दौरान इस खेल से पर्दा हट गया । 

संवैधानिक अधिकार का मजाक

दिल्ली के रामजस कॅालेज में छात्रों के संगठनों के बीच जारी बवाल के बीच गुरमेहर कौर के एक ट्वीट और उसके बाद उस पर मचे घमासान के बाद एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर विमर्श का दौर शुरू हो गया है । गुरमेहर ने अपने एक ट्वीट में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के खिलाफ टिप्पणी करने के बाद उसकी सोशल मीडिया पर घेरेबंदी शुरू हो गई । कहा यह गया कि विद्यार्थी परिशद से जुड़े लोगों ने उसको रेप तक की धमकी दे डाली । इसके पहले राजमजस क़लेज के सेमिनार के खिलाफ भी काफी हल्ला गुल्ला मचा था । इस पूरे मसले को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देखना ही प्राथमिक तौर पर उसको गलत दिशा में मोड़ना है । गुरमेहर कौर ने अपनी बात रखी और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप अन्य लोगों ने उसकी आलोचना की । अब आलोचना का सवर क्या था इसपर बात होनी चाहिए । क्या वो स्वर मर्यादित है या फिर सीधे सीधे उसको अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर छोटी सी घटना के तूल देने जैसा नहीं होगा । गुरमेहर कौर को रेप की धमकी कानून व्यवस्था से जुड़ा मामला है और पुलिस को सख्ती से धमकी देने वाले की पहचान कर उसको दंडित करवाना चाहिए । दरअसल काफी लंबे समय से हमारे देश में कानून व्यवस्था के मसले को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देखे जाने की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा । राजनैतिक स्कोर सेट करने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी को ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है । भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) मके मुताबिक बोलने और लिखने की आजादी हमारा मौलिक अधिकार है लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है, संविधान कुछ शर्तों के साथ यह अधिकार अपने नागरिकों को देता है । यह अधिकार तबतक मिलता है जबतक कि् दूसरे इससे आहत ना हों ।

अभिव्यक्ति की आजादी संविधान हमें देता है लेकिन वही संविधान कुछ जिम्मेदारियां भी तय करता है । अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तो संविधान के पहले संशोधन के वक्त बहुत साफ कर दी गई थी । आजादी के बाद जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी अखंड भारत को लेकर आंदोलनरत थे तो उस वक्त उनके भाषणों को पाकिस्तान युद्धोन्माद बढ़ानेवाला मानते हुए आपत्ति जता रहा था । पाकिस्तान की शिकायत और नेहरू लियाकत समझौते के बाद तय हुआ कि अभियक्ति की आजादी की सीमा तय की जाए और फिर संविधान का पहला संशोधन हुआ जिसमें इसकी सीमा तय कर दी गई । तब बहाना बना था मद्रास से निकलनेवाली पत्रिका क्रासरोड और राष्ट्रीय संघ से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर में छप रहे लेख । क्रासरोड में नेहरू की नीतियों के खिलाफ लगातार छप रहा था जिसको लेकर नेहरू उसपर अंकुश लगाना चाहते थे । कोर्ट ने सरकार के कदमों को दरकिनार करते हुए क्रासरोड के लेखों को संविधानसम्मत माना था । उसके बाद ही संविधान में संशोधन की कवायद शुरू की गई थी । संविधान के प्रथम संशोधन के पहले अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार पूर्ण था लेकिन इस संशोधन के बाद इसका दायरा तय कर दिया गया । बावजूद इसके हमारे बौद्धिकों का एक वर्ग हर मसले को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले की तरह देखता और रिएक्ट करता है । कानून व्यवस्था के मसले को, या फिर जिस तरह के मसले आईपीसी की धारा 295 ए के तहत आते हैं उसको भी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) से जोड़कर प्रचारित किया जाता है । अब वक्त आ गया है कि छोटी छोटी घटानओं को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर प्रचारित करना बंद किया जाए वर्ना जब बड़े संकट से हमारा सामना होगा तो हम ढीले पड़े होंगे क्योंकि भेड़िया आया, भेड़िया आया के शोर में हम आसल कर जाएंगे । वह स्थिति ज्यादा खतरनाक होगी ।