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Saturday, May 27, 2023

हिंदी पुरस्कारों पर उदासीन केंद्र सरकार


आज संसद के नए भवन का शुभारंभ होनेवाला है। उसपर जमकर राजनीति हो रही है। कई विपक्षी दल इसके उद्घाटन समारोह के बहिष्कार की घोषणा कर चुके हैं तो कई दल समर्थन में हैं। इस बीच गृह मंत्री अमित शाह ने स्वाधीनता के बाद सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक सेंगोल के बारे में देश की जनता को बताया। इसके बाद सेंगोल को लेकर भी पक्ष विपक्ष में दलीलें दी जाने लगीं। कुछ लोगों ने सेंगोल की महत्ता पर प्रश्न खड़े कर दिए। सेंगोल की परंपरा को जब चोल सम्राज्य से जोड़ा गया तो कथित लिबरल और सेक्यूलर बुद्धिजीवियों ने इसको हिंदू राष्ट्र से जोड़ दिया। यहां वो ये भूल गए कि सत्ता के हस्तांतरण के समय इस तरह के दंड को सौंपने का विधान हमारे देश में सदियों से रहा है। महाभारत के शांति पर्व में विस्तार से इस बारे में चर्चा है। कर्नाटक के हंफी के विरुपाक्ष मंदिर में नटराज की मूर्ति के साथ सेंगोल भी है, जिसके शीर्ष पर नंदी की आकृति है। बताया जाता है कि ये मंदिर सातवीं शताब्दी का है। सेंगोल की परंपरा हमें ग्रंथों और मूर्तियों में मिलते हैं। इस पर अनावश्यक विवाद है। जब विवाद अनावश्यक होते है तो शोरगुल ज्यादा होता है।संसद के उद्घाटन और सेंगोल की प्रामाणिकता के शोरगुल में एक महत्वपूर्ण मुद्दा दब गया। सियासी शोर में भाषा के मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं। 

भारतीय भाषाओं के विस्तार और उसको समृद्ध करने के लिए कई संस्थाएं कार्य करती हैं। इनमें हिंदी से जुड़ी संस्थाएं भी हैं जो अन्य कार्यों के अलावा हिंदी और गैर हिंदी भाषियों को हिंदी में श्रेष्ठ लेखन के लिए पुरस्कृत करती रही हैं। ऐसी ही एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय। ये भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग के अंतर्गत आती है। 17 मई 2023 को इस संस्था ने एक महत्वपूर्ण सूचना जारी की। विषय़ था शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत विभिन्न भाषाओं द्वारा दिए जा रहे पुरस्कारों का युक्तिकरण-हिंदी भाषा में पुरस्कारों को बंद करने के सबंध में। इस सूचना में बताया गया कि भाषा प्रभाग, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, दिल्ली के उपसचिव के निदेश पत्रांक एफ संख्या 8-86/2015/एल-II दिनांक 4 मई 2023 की अनुपालना के परिप्रेक्ष्य में सर्वसाधारण को सूचित करने का निदेश हुआ है कि शिक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा शिक्षा पुरस्कार योजना तथा हिंदीतर भाषी लेखक पुरस्कार योजना के अंतर्गत दिए गए पुरस्कारों को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यानि कि पिछले कई वर्षों से दिए जा रहे इन पुरस्कारों को भारत सरकार ने बंद कर दिया। बताया जा रहा है कि इसी तरह से केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के पुरस्कारों को भी शिक्षा मंत्रालय ने बंद कर दिया है। केंद्रीय हिंदी संस्थान भी हिंदी सेवियों के अलावा गैर हिंदी भाषियों को हिंदी में श्रेष्ठ कार्य करने के लिए पुरस्कृत करती है। प्रवासी लेखकों को भी। केंद्रीय हिंदी संस्थान के पुरस्कार बेहद सम्मानित माने जाते हैं। ये राष्ट्रपति के हाथों दिए जाते थे जो परंपरा कई वर्षों से बंद है। संस्थान से सुब्रह्मण्य भारती, दीनदयाल उपाध्याय, सरदार वल्लभ भाई पटेल, गंगा शरण सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महानुभावों के नाम से वर्षों से दिए जा रहे पुरस्कारों को बंद कर दिया गया। प्रश्न ये उठता है कि इन महत्वपूर्ण पुरस्कारों को बंद करने का निर्णय सरकार के स्तर पर हो गया या हिंदी भाषा के लिए कार्य कर रहे विद्वानों या इन संस्थाओं में शीर्ष पर बैठे लोगों से विमर्श किया गया। 

शिक्षा मंत्रालय की तरफ से इन संस्थानों को 4 मई 2023 को जो आदेश आया है उसमें लिखा है कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर राष्ट्रपति द्वारा दिए जानेवाले पुरस्कारों और अन्य भाषाई पुरस्कारों का युक्तिकरण किया जा रहा है। इस सिलसिले में शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में एक बैठक 15.11.2022 को हुई। इस बैठक में चर्चा के दौरान ये बात सामने आई कि हिंदी के लिए विभिन्न मंत्रालयों और संस्थाओं द्वारा पुरस्कार दिए जाते हैं। इसलिए शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय हिंदी संस्थान और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पुरस्कार के संबंध में किसी प्रकार की कार्यवाही न की जाए। कुछ इसी तरह का निर्देश राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद को भी प्राप्त हुआ है। उनको भी निर्देशित किया गया है कि वो अपने पुरस्कारों पर किसी तरह की कार्यवाही न करें। 

इन सूचनाओं से ये पता चलता है कि गृह मंत्रालय के निर्देश के आलोक में शिक्षा मंत्रालय ने हिंदी के पुरस्कारों को बंद करने का निर्णय लिया है। हैरानी की बात है कि गृह मंत्री अमित शाह हिंदी की व्याप्ति को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं और उनके ही मंत्रालय के निर्देश पर हिंदी और हिंदीतर भाषियों के पुरस्कारों को बंद किया जा रहा है। जब 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में आई थी तो उसके दो वर्ष बाद 2016 में केंद्रीय हिंदी संस्थानों के पुरस्कारों की राशि एक लाख रुफए से बढ़ाकर पांच लाख रुपए कर दी गई थी। तब उसका हिंदी जगत में स्वागत हुआ था। सात वर्षों में ऐसा क्या हो गया कि यही सरकार उन पुरस्कारों को बंद कर रही है। एक अनुमान के मुताबिक देश में हिंदी भाषियों की संख्या 60-70 करोड़ के करीब है। ऐसे में अगर अलग अलग मंत्रालय और संस्थाएं हिंदी सेवियों को पुरस्कृत करती हैं तो उसमें हानि क्या है। अगर इन पुरस्कारों को युक्तिसंगत करने के लिए बंद किया गया है तो हिंदी भाषी लोगों से इस बारे में चर्चा करनी चाहिए थी। 

एक तरफ गृह मंत्रालय हिंदी और हिंदीतर भाषा के पुरस्करों को बंद कर रही है दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाला एक बैंक 61 लाख रुपए के पुरस्कारों की घोषणा कर चुका है। पुरस्कारों के लिए उसकी लांगलिस्ट प्रकाशित हो चुकी है। ये अलग बात है कि बैंक का ये पुरस्कार अनुवाद के लिए है। हैरानी की बात है कि इस पुरस्कार के लांगलिस्ट में भी हिंदी में अनूदित कोई पुस्तक नहीं है। इस पुरस्कार की जूरी के सदस्यों के नाम देखने पर फिल्म द कश्मीर फाइल्स के एक संवाद का स्मरण होता है- सरकार कोई भी हो सिस्टम तो अपना ही चलता है। इस पुरस्कार की जूरी में बुकर पुरस्कार से सम्मानित और वैचारिक रूप से वामपंथ के साथ गीतांजलिश्री, प्रसिद्ध वामपंथी लेखक अरुण कमल और पुष्पेश पंत आदि हैं। इसमें अनुवाद के लिए पहला पुरस्कार कृति की मूल भाषा के लेखक को रु 21 लाख और अनुवादक को 15 लाख रुपए देने का प्रविधान है। इसके अलावा 5 अन्य अनुवाद के पुरस्कार दिए जाने हैं जिसमें मूल कृति के लेखक को तीन लाख रुपए और अनुवादक को 2 लाख रु दिए जाएंगे। राशि के लिहाज से अगर देखें तो ये भारत का सबसे बड़ा पुरस्कार है। क्या ये वित्त मंत्रालय की बिना सहमति के आरंभ हुआ है। अगर बगैर भारत सरकार की सहमति के इतनी भारी भरकम रकम का पुरस्कार सरकारी बैंक से दिया जा रहा है तो भी चिंता की बात है। पुरस्कार की ये राशि भी करदाताओं के पैसे दिए जाने हैं और हिंदी निदेशालय या हिंदी संस्थान के पुरस्कार भी करदाताओं के पैसे दिए जाने हैं। अगर गृह मंत्रालय पुरस्कारों को युक्तिसंगत करना चाहता है तो क्या वहां से वित्त मंत्रालय को किसी प्रकार का निर्देश गया था। 

भारत सरकार को हिंदी भाषा की समृद्धि और उसके विस्तार के लिए काम करनेवालों को दिए जानेवाले इन पुरस्कारों को बंद किए जाने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह को हस्तक्षेप करना चाहिए। कुछ वर्षों पूर्व इसी तरह से हिंदी की संस्थाओं के विलय का प्रस्ताव आया था लेकिन तब प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद उसका कार्न्वयन रोक दिया गया था। सरकार को हिंदी के पुरस्कारों को युक्तिसंगत बनाते समय हिंदी भाषा-भाषियों की संख्या पर भी विचार करना चाहिए। 


Saturday, May 20, 2023

मेरा दर्शक-तेरा दर्शक का खतरनाक खेल


जिस दिन फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ प्रदर्शित हुई उसी दिन एक और फिल्म का प्रदर्शन हुआ, जिसका नाम है ‘अफवाह’ । एक तरफ द केरल स्टोरी में कोई चमकता सितारा नहीं है वहीं दूसरी तरफ अफवाह फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दिकि और भूमि पेडणेकर जैसे सितारों ने काम किया है। फिल्म अफवाह को सुधीर मिश्रा ने निर्देशित किया है। ‘द केरल स्टोरी’ न केवल चर्चित हुई, हो रही है, बल्कि सुदीप्तो सेन निर्देशित इस फिल्म ने बंपर कारोबार भी किया। फिल्म ‘अफवाह’ को पालिटिकल थ्रिलर बताया गया लेकिन इस फिल्म की न तो चर्चा हो पाई और न ही इसने औसत कारोबार किया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस फिल्म ने पहले सप्ताह में करीब तीस लाख का कारोबार किया। कुछ ट्विटरवीरों ने इस फिल्म के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया लेकिन हवा बन नहीं पाई। फिल्म फ्लाप हो गई। इस पृष्ठभूमि को बताने का आशय ये नहीं है कि किस फिल्म ने कितना बिजनेस किया। इसको बताने का उद्देश्य ये है कि फिल्म अफवाह के निर्देशक सुधीर मिश्रा ने एक ट्वीट किया जिसके निहितार्थ बेहद गंभीर हैं। इस ट्वीट में सुधीर ने लिखा, द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं। क्षमा करें, मुझे ये कहना पड़ा। फिर उन्होंने हैशटैग लगाकर अपनी फिल्म का नाम अफवाह लिखा।

सुधीर मिश्रा के इस ट्वीट पर ‘द कश्मीर फाइल्स’ के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने उत्तर दिया। लिबरल का अर्थ जानना चाहा। सुधीर मिश्रा को चर्चा के लिए आमंत्रित किया। दोनों के बीच चर्चा भी हुई। सुधीर ने अपना पक्ष रखा और विवेक का अपना पक्ष था। हम यहां उस चर्चा के बिंदुओं पर नहीं जाएंगे। सुधीर ने अपने ट्वीट में जो लिखा उसके पीछे की मानसिकता को डिकोड करने का प्रयास करेंगे। सुधीर ने लिखा कि विवेक के दर्शक और हमारे दर्शक। सुधीर की छवि एक संजीदा फिल्मकार की है । जाने किस मानसिकता में उन्होंने हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बंटवारा कर दिया। दर्शकों को बांटने की बात सार्वजनिक रूप से कहकर सुधीर ने एक विभाजक रेखा खींच दी। इस विभाजन की बात बहुत दूर तक जाएगी और इसके खतरनाक परिणाम भी हो सकते हैं। अगर निर्देशकों का अपना दर्शक वर्ग होने लगा तो फिल्म उद्योग संकट में फंस सकता है। हिंदी फिल्म जगत जिसको बालीवुड के नाम से भी जाना जाता है, पहले से ही कई खेमों में बंटा हुआ है। बावजूद इसके दर्शकों को लेकर कभी भी बंटवारे की बात नहीं होती थी। यह विभाजन हिंदी फिल्म जगत के लिए ठीक नहीं है। अभी तक ऐसा कोई संदर्भ या प्रसंग नहीं आया जिसमें किसी गंभीर फिल्मकार ने अपने और दूसरे के दर्शक की बात की हो। सुधीर ने ऐसा क्यों किया। क्या उनकी फिल्मों के लगातार फ्लाप होने की कुंठा से ये शब्द उपजे या कारण कुछ और है। अगर हम देखें तो सुधीर की पिछली कई फिल्में अच्छा बिजनेस नहीं कर पाई हैं। वो लाख कहें कि वो सौ करोड़, दो सौ करोड़ कमाने की होड़ में नहीं हैं लेकिन फिल्म अपनि लागत वसूल सके, इतना तो चाहते ही होंगे। संभव है कि उनको लगता हो कि वो जिस विचारधारा के अनुयायी हैं उस विचारधारा को माननेवाले लोग उनकी फिल्में देखने क्यों नहीं आते हैं। ये बात इस वजह से कह रहा हूं कि उन्होंने विवेक से बातचीत के क्रम में ये स्वीकार किया कि वो लेफ्टिस्ट हैं। उनकी फिल्मों में सर्वहारा की जीत होती है। उनकी फिल्मों का अंत सुखांत नहीं होता है। उनकी फिल्में कई असुविधाजनक सवाल खड़े करती हैं। आदि आदि। यदि ऐसा है तो सुधीर को अभी वामपंथियों को समझना शेष है।

सुधीर के तथाकथित दर्शक अगर उनकी फिल्म देखने के लिए नहीं आते हैं। सुधीर को इस बात की तकलीफ है। क्या ये माना जाए कि सुधीर मिश्रा सिर्फ अपने वैचारिक मित्रों के लिए ही फिल्में बनाते रहे हैं। समाज और फिल्मों से प्रश्न खड़े करने और दर्शकों से संवाद के दावे खोखले हैं। क्या उनकी फिल्मों में वामपंथ का एजेंडा या उस विचारधारा का प्रोपेगैंडा होता रहा है। सुधीर को ये बातें स्पष्ट करनी चाहिए। फिल्म जगत में वामपंथियों का एजेंडा किस तरह से चलता रहा है,किस प्रकार से हिंदी फिल्मों की दुनिया में में रूसियों के सहयोग से वामपंथियों ने अपना ईकोसिस्टम तैयार किया। उसके बारे में पिछले सप्ताह इस स्तंभ में चर्चा की गई थी। सुधीर की टिप्पणी से उस चर्चा को बल मिलता है। सुधीर ने विवेक अग्निहोत्री से बातचीत में ये भी कहा कि अब फिल्म उद्योग के लोग चुप हो गए हैं। शायद वो भूल गए कि उनके इर्दगिर्द जिन फिल्म निर्देशकों को देखा जाता है या जिनके साथ उनकी तस्वीरें इंटरनेट मीडिया पर आती हैं वो मुखरता से न सिर्फ अपनी बातें कहते हैं बल्कि कई बार तो सार्वजनिक मंचों पर गाली गलौच की भाषा का भी उपयोग करते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में धरने में शामिल होकर बिरयानी खाते हुए नारे लगाते भी देखे जाते हैं। सुधीर अपने मित्रों की भाषा तो नहीं बोलते हैं लेकिन उनके मन में क्या चलता है ये उनकी टिप्पणी से पता चलता है। विवेक से बातचीत में वो कहते हैं कि इन दिनों लोग चुप हो गए हैं। दबी जुबान में भय के माहौल की चर्चा भी करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में कई सितारों ने पहले भी भय की चर्चा की थी। उनमें से एक शाह रुख खान की फिल्म पठान ने बंपर बिजनेस किया। तब तो किसी ने तुम्हारा दर्शक और मेरा दर्शक का प्रश्न नहीं उठाया। दरअसल जो लेफ्ट की विचारधारा में आस्था रखते हैं वो लगातार अर्धसत्य के साथ चलते रहते हैं। सुधीर भी इस दोष के शिकार हो गए प्रतीत होते हैं। 

वामपंथी लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं। अवसर मिलने पर आक्रामक होकर अपनी बात ऱखना और नारे लगाना उनका शौक है। उनके नारे, उनकी आक्रामकता सब खोखले हैं। अपनी विचारधारा को प्रभावी बनाने के लिए वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हैं। कई बार जब उनकी विचारधारा से जुड़े लोग कुछ ऐसा कर जाते हैं जो उनके विचारों के विपरीत होता है तो वहां उनको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं सताती है। अभी कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी। गांधी और गोडसे, एक युद्ध। ये फिल्म हिंदी के वरिष्ठ लेखक और जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष असगर वजाहत के नाटक गोडसे@गांधी.काम पर आधारित था। असगर वजाहत पर आरोप लगे कि उन्होंने इस फिल्म में गोडसे को गांधी के समकक्ष खड़ा कर दिया। गांधी के परिवार के तुषार गांधी भी इस विवाद में कूदे थे। हिंदी साहित्य जगत में इस बात की खूब चर्चा रही कि जनवादी लेखक संघ का एक धड़ा असगर वजाहत को संगठन के अध्यक्ष पद से हटाना चाहता है। हिंदी साहित्य की इस चर्चा को मानें तो प्रश्न उठता है कि वामपंथी लेखकों के इस संगठन, जनवादी लेखक संघ, को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की कितनी चिंता थी। उनके संगठन के अध्यक्ष ने एक नाटक लिखा, उस नाटक में उन्होंने गांधी के विचारों के आधार पर एक काल्पनिक परिदृष्य गढ़ा, जिसपर फिल्म बनी। ये उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी। चूंकि असगर वजाहत के विचार उनके संगठन के विचारों से अलग थे लिहाज उनके विरुद्ध एक माहौल बनाया गया। आवश्यकता इस बात की है फिल्म के दर्शक सुधीर की टिप्पणी के निहितार्थों को समझें और अपने विवेक से निर्णय लें।       

Saturday, May 13, 2023

वेब सीरीज ने खोली कम्युनिस्टों की पोल


इन दिनों एजेंडा फिल्म की चर्चा हो रही है। फिल्म द केरल स्टोरी को एक विशेष वर्ग के लोग एजेंडा या प्रोपगैंडा फिल्म कहकर प्रचारित कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि द केरल स्टोरी को एजेंडा फिल्म बतानेवालों ने फिल्म नहीं देखी है। दरअसल एक पूरा ईकोसिस्टम है जो वैकल्पिक विमर्श वाली फिल्मों को एजेंडा के तौर पर प्रचारित कर परोक्ष रूप से बहिष्कार करते हैं। कई फिल्में, डाक्यूमेंट्री या वेबसीरीज ईकोसिस्टम की विचारधारा के अनुकूल नहीं होती हैं। उनमें उनकी विचारधारा की करतूतों का पर्दाफाश होता है। ऐसी फिल्मों या वेबसीरीज के उन बिंदुओं को लेकर शोर मचाते हैं जिसमें विचारधारा की आड़ में की गईं करतूतें दब जाती हैं। उनपर जनता या दर्शकों का पर्याप्त ध्यान नहीं जा सके। ऐसी ही एक सीरीज है, जुबली। इस सीरीज में स्वाधीनता के कुछ वर्ष पहले और उसके बाद के चंद वर्षों की हिंदी फिल्मों की कहानी कही गई है। इसमें राय टाकीज के बनने उसके खत्म होने से लेकर नायकों के बनने और नायिकाओं की स्थितियों का चित्रण किया गया है। विक्रमादित्य मोटवानी के निर्देशन में बनी इस सीरीज में उस दौर के कई नायकों और नायिकाओं का चित्रण किया गया है। इस वेब सीरीज को लेकर जो विमर्श हो रहा है वो ये कि इसका नायक मदन कुमार किस हीरो के चरित्र से मेल खाता है।नायिका नीलोफर में किसकी छवि दिखती है। राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय का चरित्र क्या हिमांशु राय से मिलता है या मालकिन का किरदार देविका रानी से। क्या इसका एक और नायक जय खन्ना राज कपूर के व्यक्तित्व से प्रेरित है आदि। इस बात की दबी जुबान में भी चर्चा नहीं हो रही है कि रूसियों ने किस तरह से हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा चलाया। 

विक्रमादित्य मोटवानी ने इस सीरीज में उस दौर में हिंदी फिल्मों में सोवियत रूस और अमेरिका के एजेंडे को सामने लाकर रख दिया है। इस फिल्म के एक संवाद पर नजर डालते हैं। आवाम तक अपनी आवाज पहुंचाने के दो जरिए हैं, सिर्फ दो। सिनेमा और रेडियो। सोवियत संघ और अमेरिका इस समय दोनों भारत सरकार की खुशामद कर रहे हैं, सिनेमा और रेडियो में अपने पैर जमाने के लिए। कोल्ड वार शुरु हो चुका है। दोनों ही मुल्क अपने अपने प्रोपगैंडा के लिए फिल्में बनाना चाहते हैं। और इसी सिलसिले में सोवियत संघ ने अपना खास आदमी ब्लादीमीर यहां भेजा है। इन्होंने प्रोपगैंडा फिल्मों के लिए काफी काम किया है चाइना में। संवाद से स्पष्ट है कि सोवियत संघ हिंदी फिल्मों को लेकर कितना गंभीर था। वो उस दौर के उभरते हुए सितारे मदन कुमार को अपने एजेंडा के लिए काम करवाने के लिए उत्सुक था। उसको प्रोत्साहित करनेवाले राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय से रूस के प्रतिनिधियों की भेंट भी होती है। श्रीकांत राय उनके प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। रूसी उस समय हिंदी फिल्मों  में काफी निवेश करना चाहते थे। उनको कोई भी स्टार नहीं मिल रहा था जिसकी फिल्मों पर पैसा लगाया जा सके। परिस्थितियां इस प्रकार की बनती है कि जय खन्ना अपने फाइनेंसर वालिया को फिल्म बनाने के लिए तैयार करता है। ये दोनों रूसियों के संपर्क में आते हैं। एक बेहतरीन दृश्य है जब वालिया एक फिल्म का पोस्टर तैयार करवाता है। फिल्म का नाम होता है मजदूर। मजदूर की कहानी भी उसके पास नहीं होती है लेकिन वो कमिटमेंट कर देता है। उसके और जय खन्ना के बीच बहस होती है। जय कहता है कि उसके पास कहानी नहीं है तो वालिया उत्तर देता है कि मास्को में ढेर सारी टैरेटरी खुलनेवाली है। रूस का दरवाजा खुलावाना है। रशियन तीन फिल्मों का फाइनेंस करने को तैयार हैं। रशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होगा जिसमें इन फिल्मों को दिखाया जाएगा। आदि आदि। इसलिए मजदूर की कहानी तो लिखनी होगी। उस दौर को याद करिए जिस दौर की बात हो रही है। राज कपूर की कई फिल्में आती हैं, रूस में रिलीज होती हैं। वहां के अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में उनको दिखाया जाता है। राज कपूर की आरंभिक फिल्मों के बारे में कहा गया कि वो समाजवाद से प्रेरित हैं। उसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ या इप्टा लोकप्रिय होने लगा था। फिल्मों में रुचि रखनेवालों को याद होगा कि महबूब खान जिन्होंने मदर इंडिया बनाई उनके प्रोडक्शन हाउस का लोगो हशिया और हथौड़े के निशान के बीच में अंग्रेजी में एम लिखा था। वही हंशिया और हथौड़ा जो कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का निशान था। प्रश्न यही उठता है कि क्या इन सबके बीच किसी प्रकार का कोई संबंध था। वेब सीरीज जुबली ने इन परिस्थितियों को दस एपिसोड में दर्शकों के सामने पेश कर दिया है। ये सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है बल्कि ये बताता है कि कम्युनिस्टों ने हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा किस तरह से चलाया। विचार और विचारधारा का प्रोपगैंडा कैसे किया। 

फिल्मकारों को सोवियत रूस के प्रतिनिधि बताते थे कि सिस्टम के खिलाफ लड़नेवाला नायक कैसा होना चाहिए। फिल्मों में सेठ को गाली दी जानी चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि गरीब अपने वेतन पर कपड़ा नहीं खरीद सकता, पूरे परिवार को खाना नहीं खिला सकता। अगर गरीब जाग गया तो सबकी रातों की नींद उड़ा देगा। फिल्मकारों को प्रलोभन दिया जाता था कि अगर उनकी फिल्में रूसियों की विचारधारा का प्रोपगैंडा करेंगी और उनके एजेंडा पर चलेंगी तो उनकी फिल्मों को तत्कालीन सोवियत संघ, तुर्की और यूरोप में प्रदर्शित करवाया जाएगा। फिल्म बनाने के लिए पैसे दिए जाएंगे। एक और बेहद चौंकानेवाला प्रसंग इस सीरीज में है। रूसी हिंदी फिल्मी गानों के विरुद्ध थे। 1952 में तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों पर प्रतिबंध लगा दिया। कारण ये दिया गया कि ये गाने भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। रूसी भफी यही कहते थे। प्रश्न ये उठता है कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध थे या रूसी अपनी विचारधारा को गाढ़ा करने के लिए इनपर प्रतिबंध लगवाना चाहते थे। प्रतिबंध के दौर में अमरीकियों ने हिंदी गानों को रेडियो सिलोन पर बजवाने का प्रबंध किया था। राय टाकीज के मालिक जब रूसियों के सामने नहीं झुकते हैं तो उनकी तबाही का षडयंत्र रचा जाता है। उनकी पत्नी सुमित्रा को रूसी अपनी तरफ करते हैं। उनके वित्त विभाग की देखरेख करनेवाले को घूस भी दिया जाता है और वादा भी किया जाता है कि उनके बेटे का दाखिला मास्को के इंजीनियरिंग कालेज में करवा दिया जाएगा। उस दौर में इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के लिए कई छात्र सोवियत रूस गए थे। गजब समानता है। उस वक्त रूसियों ने फिल्मकारों के फोन टैप करके उनको ब्लैकमेल भी किया था। सरकारें खबरें भी रुकवा देती थीं। कहानी में इन सबका चित्रण है।  

आज जो कम्युनिस्ट या वाम विचारधारा के लोग फिल्मों में एजेंडा और प्रोपगैंडा की बात करते हैं उनको इस वेब सीरीज को देखना चाहिए। किस तरह से भारत की स्वाधीनता के बाद से लेकर सोवियत संघ के विघटन तक हिंदी फिल्मों में रूसियों की विचारधारा का एजेंडा चलता रहा। किस तरह से वर्ग संघर्ष को बढ़ावा दिया गया।। कई फिल्मों में इसको नेहरू के समाजवाद और गांधी की ग्राम-व्यवस्था के बीच के संघर्ष के तौर पर दिखाया गया। उद्देश्य और मंशा तो वामपंथी विचार को बढ़ावा देना था। यह अनायास नहीं था कि इप्टा जैसे संगठन और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखक लोकप्रिय होने लगे थे। कैफी आजमी से लेकर जावेद अख्तर तक इस तरह का लेखन कर रहे थे जिसमें वर्ग संघर्ष का चित्रण था। दस एपिसोड में विक्रमादित्य मोटवानी ने कुछ ही परतें खोली हैं, संभव है कि दूसरे सीजन में और भी दिलचस्प खुलासे हों।   


Saturday, May 6, 2023

फिल्म विरोध का एजेंडा नाकामयाब


फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ इन दिनों चर्चा में बनी हुई है। इसके पक्ष-विपक्ष में लगातार दलीलें दी जा रही हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देशभर में एक बार फिर से बहस हो रही है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाण पत्र मिलने के बाद भी इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया। केरल हाईकोर्ट में फिल्म के रिलीज होने वाले दिन तक सुनवाई हुई। अदालतों ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। आश्चर्य की बात है कि कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर किसी भी तरह की सामग्री दिखाने के पक्षधर और स्वयं को लिबरल कहनेवाले लोग भी इस फिल्म के प्रदर्शन के विरुद्ध थे। इस शोरगुल के बीच केरल हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की टिप्पणियां अलक्षित रह गईं। न्यायमूर्ति एन नागरेश और न्यायमूर्ति एस थामस की पीठ ने इस फिल्म के प्रदर्शन को रुकवाने की याचिका की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट की कार्यवाही की लाइव रिपोर्टिंग करनेवाली वेबसाइट लाइव ला के अनुसार पीठ ने स्पष्ट किया इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र मिल चुका है। ऐसे में इसको रोकना उचित नहीं होगा। न्यायपीठ ने इस बात को भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ताओँ में से किसी ने भी फिल्म देखी नहीं है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि अगर किसी ने फिल्म देखी नहीं थी तो इसको रुकवाने की याचिका लेकर अदालत के सामने क्यों उपस्थित हो गए। कुछ लोगों का आरोप है कि ये फिल्म एजेंडा फिल्म है लेकिन क्या फिल्म को बगैर देखे उसके प्रदर्शन को रुकवाने के लिए उच्च न्यायालय पहुंच जाना एजेंडा नहीं है। असल एजेंडा तो यही प्रतीत होता है कि आपने फिल्म देखी नहीं लेकिन कथित आसन्न खतरे को लेकर अदालत पहुंच गए। इस एजेंडा की चर्चा कहीं नहीं हो रही है न ही याचिकाकर्ताओं की मंशा पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। 

सुनवाई के दौरान न्यायपीठ ने कहा कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और कलात्मक स्वतंत्रता को संतुलित तरीके से देखा जाना चाहिए। इस टिप्पणी के गहरे निहितार्थ हैं। अगर हम कोर्ट की इस टिप्पणी के आलोक में देखें तो स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर वर्ग और समुदाय के लिए एक समान है। संविधान में इसकी ही व्यवस्था है। सुनवाई के दौरान कोर्ट की ये टिप्पणी भी उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया कि इस फिल्म में इस्लाम के विरुद्ध कुछ नहीं है, इस्लाम पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया है। इस फिल्म में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के करतूतों को दिखाया गया है। इस टिप्पणी से के बाद ये सवाल उठता है कि अगर किसी फिल्म में अगर फिल्मकार आतंकवादी संगठन के खिलाफ दिखाता है तो उस फिल्म को बिना देखे इस्लाम के खिलाफ या मुसलमानों के खिलाफ कैसे मान लिया जाता है। सिर्फ मान ही नहीं लिया जाता है बल्कि उनकी रक्षा के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। वो भी ऐसे लोग जो खुद को लिबरल या सेक्युलर मानते हैं। क्या इस देश में किसी आतंकवादी संगठन के खिलाफ फिल्म बनाना अपराध है। अबतक इस देश में कई ऐसी फिल्में बनीं जिसमें स्पष्ट रूप से आतंकवादियों को लेकर फिल्मकार साफ्ट रहे हैं। अधिकतर फिल्मों में आतंकवादी के बनने के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार दिखाया गया है। फिल्म मिशन कश्मीर में ऋतिक रोशन ने जिस अल्ताफ खान का चरित्र निभाया है, उसको याद करिए या फिर फिल्म फना में आमिर खान ने जिस आतंकी रेहान का रोल किया। आतंकी रेहान की कब्र पर जब उसका बेटा अपनी मां से पूछता है कि क्या रेहान ने गलत किया था तो उसकी मां कहती है कि रेहान ने वही किया जो उसको ठीक लगता था। इस तरह के संवाद आतंकवाद का परोक्ष समर्थन न भी हो लेकिन आतंकवाद को लेकर एक रोमांटिसिज्म तो है ही। इस तरह के कई प्रसंग हिंदी फिल्मों में देखे जा सकते हैं। 

केरल हाईकोर्ट की न्यायपीठ की एक और टिप्पणी थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के साथ फिल्म के ट्रेलर को कोर्ट में ही देखा और कहा कि ये काल्पनिक है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि इस फिक्शनल फिल्म का उद्देश्य मुसलमानों को खलनायक के रूप में पेश करना है। कोर्ट ने इससे भी असहमति जताई और कहा कि फिल्मों में कई तरह की चीजें दिखाई जाती हैं। भूत और पिशाच भी नहीं होते हैं लेकिन फिल्मों में काल्पनिक रूप से उनको भी दिखाया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति नागरेश ने की वो ये कि कई फिल्मों में हिंदू संन्यासियों को तस्कर और बलात्कारी दिखाया गया है लेकिन कभी भी किसी ने उसपर आपत्ति नहीं जताई। आपने हिंदी और मलयालम में इस तरह की कई फिल्में देखी होगी। मलयालम में तो एक फिल्म में पुजारी को मूर्ति पर थूकते दिखाया गया था लेकिन उससे भी किसी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई थी। आप कल्पना कर सकते हैं कि वो फिल्म पुरस्कृत भी हुई थी। इस टिप्पणी ने भारतीय फिल्म जगत के उस एजेंडे को बेनकाब कर दिया जो अबतक निर्बाध रूप से चल रहा था। आईआईएम रोहतक के निदेशक धीरज शर्मा ने अपनी पुस्तक फिल्में और संस्कृति में लिखा है कि ऐसी फिल्में हमारे मूल्यों, परंपरा, हिंदुत्व की विचारधारा और भारतीय संस्कृति की जड़ें कमजोर कर रही हैं। बालीवुड व्यवस्थित तरीके से हिंदू धर्म को नीचा दिखाने में लगा हुआ है। धर्म के खिलाफ नकारात्मक धारणा, भावना या गतिविधि को बढ़ा रहा है। उदाहरण के लिए फिल्म वास्तव, संजू, सिंघम, सरकार में जितने भी नकारात्मक पात्र दिखाए गए हैं, उन सबने हिंदुओं के प्रतीक चिन्ह धारण कर रखे हैं और वे साफ नजर भी आते हैं। संभवत: यह दर्शाने के लिए हिंदू धर्म के प्रतीक जिन्होंने धारण कर रखे हैं, वे बुरे इंसान हैं। इसके उलट अगर किसी ने अन्य धर्म के प्रतीक धारण कर रखे हैं तो उसको पवित्र व्यक्ति के तौर पर पेश किया जाता है। फिल्म दीवार के नायक को भी इस संदर्भ में याद किया जाना चाहिए। अमिताभ बच्चन ने फिल्म दीवार में जिस विजय वर्मा का किरदार निभाया है वो हिंदू मंदिरों में जाने का इच्छुक नहीं होता है, लेकिन हमेशा अपनी जेब में 786 नंबर का बिल्ला रखता है। पुलिस से बचकर भागते समय उसका बिल्ला कहीं खो जाता है और उसको जान गंवानी पड़ती है। इससे परोक्ष रूप से क्या संदेश दिया जाता है। 

‘द केरल स्टोरी’ को लेकर जिस तरह की बातें इन दिनों हो रही है लगभग उसी तरह की बातें पिछले वर्ष ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर हो रही थीं। उसको भी एजेंडा फिल्म से लेकर समाज को बांटनेवाली फिल्म तक करार दिया गया था। ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद ‘द केरल स्टोरी’ में आतंकवादियों की करतूतों को दिखाया गया है। कुछ लोग इसको बेवजह इस्लाम से जोड़ कर अपना एजेंडा चलाना चाह रहे हैं। इन दोनों फिल्मों में किसी धर्म के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखाया गया है। अगर ऐसा होता तो देश की अदालतें इसका संज्ञान अवश्य लेतीं। जो लोग इन फिल्मों को इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध बता रहे हैं उनको गंभीरता से इस बारे में सोचना चाहिए कि वो ऐसा क्यों कह रहे हैं। कश्मीर में हिंदू पंडितों का नरसंहार करनेवाले आतंकवादी या आईएसआईएस के आतंकवादियों को मुसलमानों या इस्लाम जोड़ना अनुचित है। फिल्म इंडस्ट्री में कुछ ऐसे निर्माता हैं जिनकी आस्था न तो भारत में है न ही भारतीयता में। उनका लक्ष्य है किसी तरह से कला की आड़ में अपना एजेंडा चलाना। लेकिन इस बार अदालत ने उसे नाकाम कर दिया।  


Friday, May 5, 2023

'बुखारा' के स्वाद का क्रेज


कोलकाता से एक मित्र का फोन आया और उसने चौंकानेवाली बात की। उन्होंने अनुरोध किया कि दिल्ली के आईटीसी मार्या होटल स्थित बुखारा रेस्तरां में चार लोगों के डिनर के लिए अमुक तारीख को व्यवस्था करवा दें। मैंने उनसे कहा कि क्या सिर्फ खाने के लिए आपलोग कोलकाता से दिल्ली आ रहे हैं। उत्तर मिला कि हां वो लोग शाम की फ्लाइट से आएंगे और डिनर के बाद रात की फ्लाइट से वापस लौट जाएंगे। मैंने भी उनको हां कह दिया। सोचा किसी से कहकर उनके लिए बुखारा में टेबल का इंतजाम करवा देंगे। टेबल के लिए जब प्रयास करना आरंभ किया तो पता चला कि ये बेहद कठिन कार्य है। बताया गया कि चाणक्यपुरी के जिस इलाके में होटल मौर्या है उस क्षेत्र के पुलिस अधिकारियों, इंकम टैक्स अधिकारियों से लेकर एक्साइज वालों तक पर बुखारा में टेबल का इंतजाम करने/करवाने का भारी दबाव होता है। जब कई लोगों ने इस काम के लिए हाथ खड़े कर दिए तो मन में जिज्ञासा हुई कि क्यों न चलकर इस रेस्तरां को देखा जाए कि क्या कारण है कि इसमें टेबल मिलना इतना कठिन है। 

चाणक्यपुरी के आलीशान पांच सितारा होटल आईटीसी मौर्या के इस रेस्तरां में पहुंचा तो इसके बाहर लगे टेबलों पर बैठे लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। रेस्तरां में अंदर घुसते ही उसके इंटीरियर ने ध्यान खींचा। पत्थरों से सजी दीवारें और लकड़ी से बने आकर्षक खंभे इसको अलग ही लुक दे रहे थे। खाने की मेज की एक तरफ दीवार से लगी बेंच थी और दूसरी तरफ स्टूल लगे हुए थे। टेबल और स्टूल की ऊंचाई भी कम थी लेकिन लोग चाव से आनंदित होकर भोजन करने में लीन थे। सौभाग्य से हमें भी जगह मिली और हम वहां खाने बैठ गए। वेज और नानवेज प्लैटर के अलावा दाल बुखारा और भरवां कुलचा और पुदीना पराठा की खेप आई। दाल बुखारा बेहद स्वादिष्ट था। बुखारा की रसोई में काम करनेवाले शेफ ने बताया कि दाल को बनाने में कई घंटे लगते हैं। उड़द की दाल को सात-आठ घंटे तक पानी में भिगो कर रखा जाता है। उसके टमाटर को उबालकर और पीस कर मसालों और मक्खन में मिलाकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में करीब सत्रह से अठारह घंटे लगते हैं। धीमी आंच पर पकाने की वजह से दाल बुखारा बेहद स्वादिष्ट बन जाता है। दाल बुखारा को पुदीना पराठा के साथ खाने का अपना अलग ही मजा है। कई लोग दाल बुखारा को खस्ता रोटी के साथ खाना पसंद करते हैं। बुखारा की एक और विशेषता है वहां एक बहुत बड़े साइज का नान परोसा जाता है। बड़े आकार का एक नान चार पांच लोगों के लिए काफी होता है। नानवेज पसंद करनेवालों के लिए भी यहां कई तरह के विक्लप उपलब्ध थे। सीक कबाब और पेशावरी कबाब के अलावा यहां आनेवाले लोग सिकंदरी रान को पसंद कर रहे थे। सिकंदरी रान कम उम्र के लैंब के मांस से तैयार किया जाता है। उसको सिरका में मैरीनेट करने के बाद उसमें दालचीनी, काला जीरा और मिर्ची का पेस्ट डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। इसके अलावा तंदूरी झींगा भी यहां की खास डिश है। बताते हैं कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा भारत के दौरे पर आए थे तो उनको बुखारा का तंदूरी झींगा बेहद पसंद आया था। बड़े आकार की झींगा मछली को अजवाइन फ्लैवर वाली दही में मैरिनेट किया जाता है। मैरिनेट करने के दौरान इसमें लाल मिर्च, हल्दी और गरम मसाला भी मिला दिया जाता है। थोड़ी देर बाद इसको सीक में डालकर धीमी आंच पर सेंका जाता है। 

मेनकोर्स के बाद बारी आई डेजर्ट्स की। बुखारा अपने ग्राहकों के लिए गुलाब जामुन, कुल्फी, फिरनी और रसमलाई पेश करते हैं। मिट्टी के बरतन में परोसा जानेवाला फिरनी बेहद स्वादिष्ट था। एक छोटे बाउल में 6 छोटी छोटी रसमलाई थी जिसका स्वाद बाजार में मिलनेवाले अन्य रसमलाई से अलग। थोड़ा कम मीठा लेकिन स्वाद अप्रतिम। दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित इस रेस्तरां में जगह मिलने में भले ही कठिनाई होती हो लेकिन एक बार आपको जगह मिल जाती है तो बेहतरीन खाने का स्वाद संघर्ष के बाद मिली सफलता सरीखी होती है।  


Thursday, May 4, 2023

लव जेहाद की परतें खोलती फिल्म


आज फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ रिलीज हो रही है। ये फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगु और मलयालम में प्रदर्शित होगी। फिल्म अपने प्रदर्शन के पहले ही चर्चा के केंद्र में आ गई है। फिल्म की रिलीज को रुकवाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। इस फिल्म के ट्रेलर को लेकर लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला । यूट्यूब पर फिल्म के ट्रेलर को सात दिनों में एक करोड़ अस्सी लाख से अधिक लोगों ने देखा और एक लाख से अधिक लोगों ने कमेंट किए। इंटरनेट मीडिया के लिहाज से ये बहुत बड़ी संख्या है। फिल्मों के बारे में आनलाइन आंकड़े देनेवाली साइट आईएमडीबी पर सबसे अधिक प्रतीक्षावाली फिल्मों और सीरीज की सूची में ‘द केरला स्टोरी’ शीर्ष पर है। इस फिल्म को करीब पचास प्रतिशत पेज व्यू  मिला है वहीं शाह रुख खान की जून में रिलीज होनेवाली फिल्म जवान को लेकर करीब सोलह प्रतिश्त पेज व्यू है। स्पष्ट है कि द केरला स्टोरी को लेकर दर्शकों के बीच जबरदस्त उत्सुकता है। 

‘द केरल स्टोरी’ में कोई बड़ा स्टार नहीं है, कोई ग्लैमरस अभिनेत्री नहीं है, बावजूद इसके इस फिल्म को लेकर अगर इतनी उत्सुकता है तो उसके पीछे कारण है इस फिल्म की कहानी। इस फिल्म की कहानी केरल के उन हिंदू लड़कियों की कहानी है जिनका मतांतरण करवाकर आतंकी संगठन आईएसआईएस के गिरोह में शामिल करवा दिया जाता है। फिल्म के ट्रेलर का एक संवाद है, एक गरीब को लाओ, खानदान से जुदा करो, जिस्मानी रिश्ते बनाओ, जरूरत पड़ने पर उनको प्रेगनेंट करो और जल्द से जल्द उनको अगले मिशन के लिए हैंडओवर करो। फिल्म में ये भी दिखाया गया है कि किस तरह से हिंदू लड़कियों का ब्रेनवाश करके मतांतरण के लिए तैयार किया जाता है। ब्रेनबाश भी संवाद की शैली में किया जाता है। हिजाब पहने एक लड़की का हिंदू लड़कियों से बातचीत दिखता है। पूछा जाता है कि तुमलोग किस गाड को मानता है। उत्तर मिलता है शिव। तब कहा जाता है कि जो गाड अपनी पत्नी के मरने पर आम इंसानों की तरह रोता हो वो कैसा भगवान। लव जिहाद के जरिए हिंदू लड़कियों को आतंकी संगठन में भेजने का षडयंत्र कितना भयावह होता है, ये फिल्म उसकी तस्वीर दिखाती है। फिल्मकारों का दावा है कि ये फिल्म सत्य घटनाओं पर आधारित है। फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्टर और प्रोड्यूसर विपुल शाह का मानना है कि उन्होंने इस फिल्म का निर्माण इसलिए किया क्योंकि इसकी कहानी बेहद शाकिंग है। अगर हमारे देश के किसी हिस्से में ऐसा घटित हो रहा है तो उसको सबके सामने आना चाहिए। इसमें किसी भी तरह का कोई एजेंडा नहीं है बल्कि पूरी कहानी को मानवता के दृष्टिकोण से पेश किया गया है। गीतकार मनोज मुंतशिर कहते हैं कि धोखे या दबाव से धर्मांतरण के लिए विवश करना, भारत के संविधान की अवमानना है। जो लोग फिल्म की प्रामाणिकता पर संदेह कर रहे हैं उनको मैं ये बता दूं कि मैं व्यक्तिगत तौर पर फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन और निर्माता विपुल शाह के भागीरथ प्रयास का साक्षी रहा हूं। तीन सौ घंटे के वीडियो रिसर्च और पांच सौ केस स्टडीज के आधार पर ये फिल्म बनी है। 

दरअसल केरल में लव जिहाद और वहां की लड़कियों के आतंकी संगठन आईएसआएस में जाने की खबरें आती रही हैं। उनके बारे में चर्चा भी होती रही है लेकिन उन घटनाओं को केंद्र में रखकर और आईएसआईएस में जाने के कारणों, और परिस्थितियों को पहली बार फिल्मी पर्दे पर उतारा गया है। पहले हिंदू लड़कियों को प्रेम के जाल में फंसाया जाता है, तरह तरह से प्रलोभन देकर सुनहले भविष्य का सपना दिखाया जाता है फिर आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल करके नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया जाता है। इस पूरे प्लाट को ये फिल्म एक्सपोज करती है। दैनिक जागरण से बातचीत में इस फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने कहा कि इस फिल्म में हम ऐसे सत्य को उद्घाटित करने जा रहे हैं जिसने दशकों से हमारी मां-बेटियों की जिंदगी नरक बना दी थी। उनका दावा है कि इस फिल्म में उन परिस्थितियों को दिखाया गया है जिसके बारे में अबतक सोचा भी नहीं गया था। उनका कहना है कि उन्हें इस बात की खुशी है कि सात साल की मेहनत आखिरकार जनता के बीच पहुंच रही है। वो इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि इससे देश की बहनों की जिंदगी पर सकारात्मक असर पड़ेगा। 

Saturday, April 29, 2023

कला की आड़ में राजनीति


गुनीत मोंगा की डाक्यूमेंट्री द एलिफेंट व्हिसपर्रस को आस्कर पुरस्कार मिला। इसके पहले कान फिल्म फेस्टिवल में आल दैट ब्रीद्स को गोल्डन आई अवार्ड से सम्मानित किया गया। माना जा रहा है कि इन दो डाक्यूमेंट्री के अंतराष्ट्रीय मंच पर सम्मानित होने के बाद देश में दर्शकों का रुझान डाक्यूमेंट्री की तरफ बढ़ा है। ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स की लोकप्रियता के कारण भारत में बनने वाली डाक्यूमेंट्रीज को वैश्विक मंच मिला ओटीटी पर किसी प्रकार के प्रमाणन की भी बाध्यता नहीं है। अगर कोई डाक्यूमेंट्री निर्माता उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करके सिर्फ ओटीटी प्लेटफार्म पर प्रदर्शित करना चाहता है तो उसको केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास भी नहीं जाना होता है ।इसने डाक्यूमेंट्रीज के लिए एक ऐसा मंच खोल दिया जहां वो किस भी प्रकार की सामग्री और किसी भी प्रकार का संवाद दर्शकों के सामने पेश कर सकते हैं। इस विधा को राजनीतिक औजार के रूप में उपयोग में ला सकते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर किसी विचारधारा विशेष को नीचा दिखा सकते हैं और किसी को उठा सकते हैं। 

जब कान फिल्म फेस्टिवल में आल दैट ब्रीद्स को पुरस्कृत किया गया तो चर्चा इस बात की हुई कि वो दिल्ली के दो भाइयों मोहम्मद और नदीम की कहानी है जो घायल पक्षियों को उपचार देने का काम करता है। इस डाक्यूमेंट्री में उन दोनों भाइयों के संघर्ष को रेखांकित किया गया। ये बताया गया कि किस तरह से दो मुस्लिम भाई दिल्ली के वजीराबाद इलाके में एक बेसमेंट में घायल पक्षियों विशेषकर चीलों को उपचार देते हैं। कान फिल्म फोस्टिवल में पुरस्कृत होने के शोरगुल के बीचतब इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि ये डाक्यूमेंट्री केवल घायल पक्षियों के देखभाल तक सीमित नहीं है। इस डाक्यूमेंट्री में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (सीएए) और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स (एनआरसी) पर भी टिप्पणी है। संवाद में चर्चा इस बात की भी है कि उनको फारेन कंट्रीव्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के अंतर्गत विदेश से धन लेने की अनुमति नहीं मिलती है और सरकार इसका कार भी नहीं बताती हैजबकि ऐसा होता नहीं है। सरकार अगर किसी के आवेदन को अस्वीकार करती है तो उसका कारण अवश्य बताती हैडाक्यूमेंट्री निर्माता इतने पर ही नहीं रुकते हैं बल्कि वो दिल्ली के दंगों पर भी टिप्पणी करते चलते हैं। पृष्ठभूमि से लेके रहेंगे आजादी जैसे नारे भी लगते रहते हैं। इतना ही नहीं एक पत्रकार की आवाज भी गूंजती है जिसमें वो बताता है सीएए के पास होने पर पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को वहां प्रताड़ित होने की दशा में भारत में नागरिकता नहीं मिलेगी जबकि अन्य धर्म के लोगों को मिलेगी।इस समाचर के अंश के प्रसारित होने के बाद परिवार में इस बात पर चर्चा होती है कि अगर नाम में स्पेलिंग गलत हो जाए तो भी दिक्कत आ सकती है। एक संवाद है जिसमें घर का बेटा अपनी पत्नी से पूछता है कि रिफ्यूजी बनकर कहां जाना चाहती हो, पाकिस्तान, बंगलादेश या अफगानिस्तान। वो जब कहती है कि क्या कहीं और नहीं जा सकते तो उत्तर मिलता है कि अगर कहीं और जाना है तो सरकार के निकालने के पहले जाना होगा। सरकार के निकालने के बाद पाकिस्तान जाने पर वहां पाकिस्तानी होने का सबूत मांगा जाएगा इस पूरे संवाद पर विचार करना चाहिए कि इसमें घायल पक्षियों की देखभाल और उनके संघर्ष से क्या लेना देना है। 

इसी तरह से इस संवाद के पहले नेपथ्य ये किसी का भाषण प्रसारित होता है। कहा जा रहा होता है कि एक बात का हमेशा ध्यान रखिए कि ये लड़ाई शांति और अहिंसा की है। ये लड़ाई विचार और विचारहीनता की है।..हमें इस देश के संविधान को बचाना है। इसी तरह से एक अन्य जगह कहा जाता है कि बहुमत का अर्थ क्या है? देश की चालीस प्रतिशत जनता। बहुमत हमेशा सही नहीं सोचती है या बहुमत का निर्णय सदैव सही नहीं होता है। फिर दिल्ली के दंगों की रिपोर्टिंग के दौरान की आवाजें और एक मीनारनुमा इमारत पर झंडा फहराने के लिए चढ़ता एक व्यक्ति। दंगों की चपेट में आए इलाकों की तस्वीरें। नेपथ्य से आवाज, दंगे कोई नई बात नहीं है। हम छत पर खेला करते थे और पता चलता था कि नीचे दंगा हो रहा है। पर इस बार अलग है। इस बार सिर्फ नफरत नहीं है चारों तरफ घिन फैली हुई है। इस तरह के संवादों से निर्माता निर्देशक की मंशा स्पष्ट हो जाती है। 

इसी तरह की एक और डाक्यूमेंट्री सीरीज आई है, डासिंग आन द ग्रेव। ये डाक्यूमेंट्री 1991 में बेंगलुरू में हुए चर्चित रिचमंड रोड केस पर आधारित है। इसमें एक हिंदू स्वामी श्रद्धानंद और एक मुस्लिम महिला की प्रेम कहानी और उसके बाद मर्डर मिस्ट्री है। शाकिरा खलीली मैसूर के दीवान की बेटी थी जो अपने पहले पति को छोड़कर स्वामी से शादी कर लेती है। उस समय ये प्रम विवाह काफी चर्चित हुआ था क्योंकि तब महा चार बच्चों की मां थी। 1991 में अचानक शाकीरा गायब हो जाती है। पहले पति से उसकी बेटी अपनी मां की तलाश में जुटती है। तीन साल बाद पता चलता है कि शाकिरा के पति स्वामी श्रद्धानंद ने ही उसको माकर अपने घर के आंगन में दफना दिया था। इस डाक्यूमेंट्री में सबकुछ है। विवाहित महिला का प्रेम है, हिंदू संत हैं, अकूत संपत्ति है, ड्रग है, मर्डर है और फिर स्वामी को अपनी पत्नी की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा है। इस डाक्यूमेंट्री को बनाया है पैट्रिक ग्राहम ने। अब जरा पैट्रिक ग्राहम के बारे में जान लेते हैं। इसके पहले पैट्रिक घोउल वेब सीरीज लिख और निर्देशित कर चुके हैं। इस सीरीज में भयानक हिंसा थी। इसके अलावा पैट्रिक वेब सीरीज लैला की टीम के साथ भी जुड़े रहे हैं। इस डाक्यूमेंट्री के संवाद में भी और दृष्यों में भी आपको स्पष्ट रूप से एक एजेंडा दिखाई देगा। हिंदू धर्म के खिलाफ एजेंडा। एक संवाद है जिसमें कहा गया कि मुझे लगता था कि वो ऐसे इंसान हैं जिसे दिव्य शक्ति प्राप्त है। वह भगवान का दूत लगता था। संवादों के अलावा अगर दृष्यों की बात करें तो जब स्वामी श्रद्धानंद की शादी शाकीरा खलीली की शादी हिंदी रीति रिवाज से होती है तो उसको बहुत विस्तार से दिखाया जाता है। हाथों में बंधे कलावा तक पर फोकस किया गया है। दृश्यों और संवादों से एक अलग तरह का माहौल बनाने का प्रयास किया गया है। पहले वेब सीरीज में इस तरह के संवाद आदि होते थे लेकिन जब उसको लेकर शोरगुल मचा तो अब वेब सीरीज में कम डाक्यूमेंट्रीज में अधिक होने लगा। 

इस तरह की डाक्यूमेंट्रीज में प्रत्यक्ष रूप से विषय कुछ और होता है लेकिन उसके अंदर परोक्ष रूप से कुछ और कहा जा रहा होता है। यह बेहद खतरनाक है क्योंकि मनोरंजन और कलात्मकता को राजनीति के औजार के तौर पर उपयोग में लाया जाता है। इसमें जिस तरह से राजनीतिक टिप्पणियां की जाती हैं वो दर्शकों के अवचेतन मन में धंसी रह जाती है जो लंबे समय तक अपना असर दिखाती रहती है। चीलों को बचाने के नाम पर संविधान को बचाने की बात हो, सीएए और एनआरसी के खिलाफ भ्रामक बातें हों या अपराध कथा में हिंदू धर्म प्रतीकों का उपयोग इस तरह के किया जाए जिसका अर्थ कुछ और निकले ऐसे में नीति निर्धारकों को इसके व्यापक असर के बारे में सोचना चाहिए।। विचार तो इस बात पर भी करना चाहिए कि क्या ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री के लिए कोई व्यावहारिक और प्रभावी नियमन हो। लंबे समय से इसको लेकर बातें हो रही हैं। स्व नियमन जैसी व्यवस्था है भी लेकिन ये प्रभावी नहीं है। 

 

Saturday, April 22, 2023

इतिहास से अनभिज्ञ राहुल

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद राहुल गांधी पिछले कई महीनों से चर्चा में बने हुए हैं। पहले अपनी पैदल यात्रा को लेकर, फिर वीर सावरकर पर की गई टिप्पणियों को लेकर, फिर ब्रिटेन में अलग अलग जगहों पर दिए गए अपने वक्तव्यों को लेकर, और फिर मानहानि के केस में सजा और उसके बाद की घटनाओं को लेकर। पैदल यात्रा खत्म होते ही इसकी चर्चा कम हो गई। वीर सावरकर पर की गई टिप्पणियों पर शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जो कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां हैं, ने आपत्ति जताई। उसके बाद वीर सावरकर पर कोई टिप्पणी नहीं आई है। ब्रिटेन में उन्होंने कई तरह की टिप्पणी की जिनमें से एक थीं भारत के लोकतंत्र को लेकर। वहां उन्होंने जो कहा था उससे ये ध्वनित हो रहा था कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है और लोकतंत्र के रखवाले कहां हैं। उनके इस बात पर पर्याप्त चर्चा हो रही थी फिर सूरत की अदालत का निर्णय आ गया। मानहानि के एक केस में उनको दो साल की सजा हो गई। सजा होते ही संसद से उनकी सदस्यता समाप्त हो गई। फिर कानूनी दांव-पेंच और अब सजा पर रोक की उनकी याचिका खारिज होने के कारण निरंतर चर्चा में बने हुए हैं। इन बातों की चर्चा करने का उद्देश्य केवल इतना है कि भारत में लोकतंत्र को लेकर राहुल गांधी ने जिस तरह से ब्रिटेन की धरती पर अपनी बात रखी और जिस तरह से लोकतंत्र के कथित पहरेदारों को ललकारा उसपर पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी। न्यूज चैनलों की डिबेट में शोरगुल के बीच इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर और तथ्यपरक चर्चा की जगह राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप ज्यादा हुआ। 

अब राहुल गांधी के उस अपेक्षा की चर्चा करते हैं जो उन्होंने ब्रिटेन की धरती से विश्व के लोकतांत्रिक देशों से की। उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, अगर यहां लोकतंत्र का पतन होता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। हम तो उसको झेल लेंगे लेकिन उसका असर आप पर भी पड़ेगा। इस चेतावनी में एक भाव ये भी है कि दुनिया के देशों विशेषकर यूरोप और अमेरिका को भारत के लोकतंत्र पर नजर रखनी चाहिए। इसके पतन के आसन्न खतरों को देखते हुए उसको बचाने का प्रयत्न भी करना चाहिए। इस भाव को लेकर जमकर राजनीति हुई लेकिन इस आलेख में इस बात की चर्चा करेंगे कि क्या ब्रिटेन और अमेरिका लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए कार्य करते रहे हैं या फिर लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर दुनियाभर के देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की जुगत में रहते हैं। अमेरिका ने इराक में लोकतंत्र के नाम पर क्या किया वो जगजाहिर है। इस मसले पर अमेरिका का इतिहास देखे जाने की जरूरत थी। अब जरा ब्रिटेन की भी चर्चा कर लेते हैं। राहुल गांधी को या उनके सलाहकारों को तो ये याद होगा कि ब्रिटेन ने लंबे समय तक हमें गुलाम बनाकर रखा था। उनके नाना और नाना के पिता ने अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में हिस्सा लिया था। उनकी दादी भी अंग्रेजों के खिलाफ स्वाधीनता आंदोलन में शामिल रही थीं। इंदिरा जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति का बर्ताव कैसा रहा था, इसको देश की जनता ने अभी तक भुलाया नहीं है। 

ब्रिटेन की धरती पर जब लोकतंत्र को लेकर राहुल गांधी चर्चा कर रहे थे तो संभवत: उनको जलियांवाला बाग नरसंहार की याद नहीं रही होगी। वही जलियांवाला बाग जहां सैकड़ों निर्दोष भारतीयों को अंग्रेज सिपाहियों ने गोलियों से भून दिया था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला नरसंहार हुआ था। इस ब्रितानवी नरसंहार के एक सौ चार वर्ष बाद एक पुस्तक आई है गांधी,जलियांवाला बाग विचार कोश। इसके लेखक हैं कमल किशोर गोयनका। कमल किशोर गोयनका की ख्याति प्रेमचंद के अध्येता के तौर पर रही है और उन्होंने प्रेमचंद के लेखन और उनके व्यक्तित्व के बारे में विपुल लेखन ही नहीं किया है बल्कि प्रेमचंद को लेकर जिस तरह की भ्रांतियां फैलाई गईं थी उसका निषेध भी किया था। अब अपनी इस नई पुस्तक गांधी, जलियांवाला विचार कोश में कमल किशोर गोयनका ने श्रमपूर्वक इस नरसंहार से जुड़े दस्तावेजों पर आधारित ऐतिहासिक तथ्यों को जुटाकर गांधी और के विचारों और योजनाओं की तस्वीर प्रस्तुत की है। कमल किशोर गोयनका ने बरतानवी अधिकारियों और उनके प्रतिनिधियों की रिपोर्ट, उनके आदेश को भी समेटा है। इतना ही नहीं गोयनका ने उस दौर के पत्रकारों, लेखकों और समाजेवियों के लिखे या उनके रिकार्डेड वक्तव्यों को भी आधार बनाया है। इनमें ब्रिटेन की वो मानसिकता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है जो उनके लोकतंत्र प्रेम को एक्सपोज कर देती है। जलियांवाला बाग की नृशंसता के बाद पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सर माइकल ओ डायर ने अपनी गवाही में कहा था कि मेरे निजी अनुभव के अनुसार शांति का अर्थ है जब कोई गोरा आदमी , बड़े साहब से लेकर आर्डिनरी टामी तक, बिना शस्त्र के हिंदुस्तान के किसी भी स्थान पर अकेला सैर कर सके और सुरक्षित रहे। कोई उसे बुरी नजर से न देखें, इस डर से कि उसकी आंखे निकाल ली जाएंगी, हाथापाई करने पर हाथ काट दिए जाएंगे और उपद्रव करनेवालों के गांव जला दिए जाएंगे। प्रकृति का सच है कि ताकतवर राज करते हैं। इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद ब्रिटेन से किसी प्रकार की अपेक्षा शेष नहीं रहती है। आज भी स्थिति बदली नहीं है। इस हत्याकांड के सौ वर्ष बाद ब्रिटेन की संसद में इसपर बहस होती है। इस नरसंहार पर क्षमा मांगने को लेकर चर्चा होती है लेकिन अबतक ऐसा नहीं करके ब्रिटेन ने जता दिया है कि वो एक राष्ट्र के तौर पर अब भी नरसंहार को लेकर न तो शर्मिंदा है और न ही क्षमा मांगना चाहते हैं। इस पुस्तक में ऐसे सैकड़ों दृष्टांत हैं। जलियांवाला को लेकर महात्मा गांधी के विचारों को भी समग्रता में पेश किया गया है जो कि शोधार्थियों को लिए एक नई जमीन तैयार करती है। गांधी की एक नई छवि भी सामने आती है। 

कमल किशोर गोयनका अपनी इस पुस्तक में साबित करते हैं कि ब्रिटेन का शासन नस्ली था, क्रूर था। क्रूर इस वजह से कि जलियांवाला में गोलियां बरसाने के बाद जिस तरह की स्थितियां बनीं वो ब्रिटेन के दामन पर काला धब्बा है। जनरल डायर और माइकल ओ डायर के कृत्यों का जिस तरह से ब्रिटेन में बचाव होता रहा है उससे ये तो साबित होता है कि वहां का मानस कैसा है। ऐसे मानस वाले राष्ट्र से लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए आगे आने की अपेक्षा करना व्यर्थ है। राहुल गांधी जब ब्रिटेन की धरती पर जाकर ऐसी बातें करते हैं तो इतिहास से अनभिज्ञ नजर आते हैं। उनको भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को ठीक तरह से आत्मसात करना चाहिए क्योंकि वैश्विक मंचों पर वो भारत के प्रमुख विपक्षी दल के नेता के तौर पर बोलते हैं। उनको लोग गंभीरता से सुनते हैं। अगर वो वैश्विक मंचों पर इस तरह की बातें करेंगे तो उनके बारे में अलग राय बनेगी। उनकी पार्टी के नेता तो उनकी प्रशंसा करेंगे ही लेकिन जब समर्थक पत्रकार भी सुर में सुर मिलाने लगते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि उनके समर्थकों का इतिहास बोध कितना कमजोर है। कुछ लोगों को राहुल गांधी के इन वक्तव्यों में उनका गांभीर्य दिखा था,अपने राष्ट्र को लेकर उनकी चिंता दिखी थी। उनके अपने तर्क थे लेकिन ऐतिहासिक तथ्य और घटनाएं तो कुछ अलग ही कहती हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के विपक्ष के नेता से ये अपेक्षा तो की जा सकती है कि वो वैश्विक मंच के अपने भाषण में उठाने वाले बिंदुओं पर बोलने के पहले समग्रता में विचार कर लें।  

Friday, April 21, 2023

स्वाद और एबियंस का काकटेल


जब भी उत्तर भारतीय खाने की बात आती है तो लोग दाल मखनी या बटर चिकन और तंदूरी रोटी की बात करने लगते हैं। उत्तर भारत के खान-पान परंपरा को देखें तो इसका दायरा दाल मखनी और बटर चिकन आदि से काफी विस्तृत है। उत्तर भारत की जो प्राचीन खान-पान परंपरा है उसका स्वाद मसालों के साथ साथ उनको बनाने की विधि पर निर्भर करता था। धीमी आंच पर खाना पकाने की पद्धति उसके स्वाद को कई गुणा बढ़ा देती है। धीमी आंच पर बनी दाल, लोहे की कड़ाही में बना मटन इसका स्वाद ही अलग होता है। दिल्ली के चाणक्यपुरी में सरदार पटेल मार्ग पर स्थित ताज पैलेस होटल में एक रेस्तत्रां है लोया। ताज पैलेस में घुसते ही ताज समूह की सिगनेचर स्टाइल की साज सज्जा। लेकिन जैसे ही आप लोया रेस्तत्रां में प्रवेश करते हैं तो वहां की साज सज्जा बिल्कुल ही अलग है। रेस्तत्रां के बीच में बार और उसके सामने और दोनों तरफ करीने से लगी मेज और कुर्सियां। वहां बैठकर आप न सिर्फ भोजन कर सकते हैं बल्कि बार टेंडर को कलात्मक तरीके से ड्रिंक्स तैयार करते और शेफ को किचन में खाना बनाते भी देख सकते हैं। इसके मेन्यू और डेकोरेशन में भी एक थीमैटिक जुड़ाव है। इस रेस्तरां की विशेषता है कि ये उत्तर भारत के अलग अलग इलाकों में प्रचलित खाने को उसी अंदाज में बनाते हैं जैसे कि वहां वर्षों पहले बनाई जाती थीं। उत्तर भारत का मतलब हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, जम्मू कश्मीर आदि। इनका पूरा ध्यान खाने के स्वाद और उसको बनाने के तरीके पर होता है।

इस रेस्तरां में कटहल और बैंगन का भर्ता बहुत स्वादिष्ट है। लोया के शेफ गगन सिक्का ने इसकी रेसिपी बताई। किस तरह से बैंगन को रोस्ट करके और फिर कटहल और मसाले के साथ मिक्स करके ये स्वादिष्ट डिश तैयार किया जाता है। सर्व करने के पहले थोड़ी देर तक इसको धीमी आंच पर चढ़ा कर रखते हैं। इसी तरह से हिमाचल की प्रसिद्ध दाल का स्वाद उसको बनाने के तरीके से खास हो जाता है। गगन सिक्का के अनुसार यहां के स्वाद में दादी और नानी के नुस्खों का खास ख्याल रखा जाता है। उसी तरह से मसालों को पीसकर वेज नानवेज में डाला जाता है जिस तरह से पुराने जमाने में डाला जाता था। वेज की तरह नानवेज पसंद करनेवालों के लिए भी कई तरह के स्वादिष्ट डिसेज उपलब्ध हैं। दम नल्ली का स्वाद भी नानवेज खानेवालों को बेहद पसंद आता है। धीमी आंच पर काफी देर तक पकाने के कारण मसालों का स्वाद टेंडर मटन के अंदर तक चला जाता है। इसी तरह से कांगड़ा खोड़िया गोश्त, मलेरकोटला कीमा छोले आदि भी क्षेत्र विशेष की रेसिपी के हिसाब से बनाकर परोसे जाते हैं। लोया के खाने में देसी खुशबू महसूस होती है। लोये के मेन्यू में स्वीट डिश के लिए मिट्ठा शब्द का प्रयोग किया गया है। यहां भी उत्तर भारत में प्रचलित मीठे को करीने से बनाकर पेश किया जाता है। अगर आप दूध जलेबी खाना चाहते हैं तो करीने से कांसे के ट्रे में तीन छोटे ग्लास में पिस्ता, छुहारा और केसर मिल्क और उनके ऊपर रखी गई एक एक जलेबी। इसी तरह से गुड़ की रोटी और खीर की डिश भी उन दिनों की याद दिलाते हैं जब गांवों में बच्चे रात को गुड़ की रोटी खाने की जिद करते थे और दादी मां उनको मीठी रोटी खिलाकर संतुष्ट कर देती थी। कई बार ये कहा जाता है कि फाइव स्टार का खाना काफी महंगा होता है लेकिन लोया में पांच छह हजार रु में दो लोग आराम से स्वादिष्ट भोजन कर सकते हैं।

Saturday, April 15, 2023

भाषाई गुलामी से मुक्त होती व्यवस्था


हाल में दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोरा ने एक परिपत्र जारी कर आदेश दिया है कि किसी भी अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के समय सरल शब्दों का प्रयोग किया जाए। दिल्ली पुलिस का ये आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश के आलोक में जारी किया गया है। उच्च न्यायालय ने एक मामले में ये आदेश दिया था कि प्राथमिकी शिकायतकर्ता के शब्दों में होनी चाहिए। बहुत अधिक जटिल भाषा, जिसका अर्थ शब्दकोशों की मदद से खोजा जाता है, प्राथमिकी में इस्तेमाल नहीं किया जाना है। पुलिस अधिकारी बड़े पैमाने पर आम जनता के लिए काम कर रहे हैं और उन लोगों के लिए नहीं जो उर्दू, हिंदी या फारसी भाषा में डाक्टरेट के पदवी धारक हैं। जहां तक संभव हो प्राथमिकी में सरल शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। न्यायालय के इस आदेश के अनुपालन में दिल्ली पुलिस ने कई कठिन शब्दों की एक सूची तैयार की और उसके सरल हिंदी शब्द की सूची भी परिपत्र के साथ जारी की। दिल्ली पुलिस के इस कदम को लेकर कुछ लोगों ने व्यंग्यात्मक शैली में अपनी बात की तो कइयों ने इसको उर्दू के खिलाफ कदम माना। भाषा की राजनीति करनेवाले इसको लेकर सक्रिय हुए। हिंदी उर्दू के परस्पर संबंधों की दुहाई दी गई। गंगा-जमुनी तहजीब की बात की गई। लेकिन आलोचना करनेवालों से एक चूक हो गई। उन्होंने उर्दू और अरबी फारसी को लेकर घालमेल कर दिया। फारसी और उर्दू का घालमेल करनेवालों और दिल्ली पुलिस के इस कदम की आलोचना करनेवालों को डा सैयद अली बिलग्रामी का कथन याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा था कि शिक्षा की दृष्टि से मुसलमानों की पिछड़ी हुई दशा का प्रधान कारण दोषपूर्ण फारसी वर्णमाला है जो उनके बच्चों को बर्षों तक उलझाए रखती है। उनको सरल और व्यवस्थित नागरी वर्णमाला स्वीकार कर लेनी चाहिए जिसे छह ही महीनों में सीखा जा सकता है। इन दिनों उर्दू कू सबसे बड़ी चिंता यही है कि उसकी लिपि में लिखने पढ़नेवाले निरंतर कम होते जा रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के इस परिपत्र को देखने के बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल के एक लेख की कुछ पंक्तियां याद आ गई। रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी के समर्थन में लीडर पत्रिका में एक लेख लिखा था। उसमें एक अदालती नोटिस का उल्लेख है जो देवनागरी लिपि में लिखी गई थी, इसको देखा जाना चाहिए- लिहाजा बजरिय :  इस तहरीर के तुम रामपदारथ मजकूर को इत्तला दी जाती है कि अगर तुम जर मजकूर यानि मुबलिग पंद्रह रुपए छह आने, जो अजरुए डिगरी वाजिबुल अदा है, इस अदालत में अंदर पंद्रह रोज तारीख मौसूल इत्तलानामा हाजा से अदा करो वरन :  वजह जाहिर करो कि तुम मुंदर्जी जैल खेतों से जिनके बावत बकाया डिगरी शुदा बाजिबुल अदा है, बेदखल क्यों न किए जाओ। आचार्य शुक्ल ने लिखा कि उपरोक्त नोटिस में क्रियाओं और सर्वनामों के अतिरिक्त सभी शब्द फारसी और अरबी के हैं और जिन लोगों ने मौलवी का प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है उनकी समझ से पूर्णत: बाहर है। सरल बनाने के लिए इसको हिंदी में इस प्रकार से लिखा जा सकता है- सो इस लेख से तुमको जताया जाता है कि तुम ऊपर कहा हुआ रुपया जिसकी तुम्हारे ऊपर डिगरी हो चुकी है इस नोटिस को पाने के पंद्रह दिन के भीतर इस अदालत में चुकता करो, नहीं तो कारण बतलाओ कि तुम नीचे लिखे खेतों में से जिनके ऊपर डिगरी का रुपया आता है, क्यों न बेदखल किए जाओ। भले ही ये अदालती नोटिस है लेकिन किसी भी थाने में जो प्राथमिकी दर्ज की जाती है वो भी लगभग ऐसी ही भाषा में लिखी जाती है जो समझ से परे है। दिल्ली पुलिस ने जो शब्दों की जो सूची जारी की है वो भी इस तरह की कहानी ही कहते हैं। सूची को देखें तो उसमें भी अदम पता (जिसका पता न चले), अदम शनाख्त (जिसकी पहचान न हुई हो), अरसाल (प्रस्तुत है), काबिल दस्त अंदाजी (संज्ञेय अपराध) जैल (निम्न), ततीमा (अतिरिक्त), फर्द मकबूजगी (किसी वस्तु को कब्जे में लेने के लिखित दस्तावेज) आदि जैसे शब्द हैं। इनको भी समझने के लिए या तो शब्दकोश की आवश्यकता होगी या मौलवी का प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति की सहायता की।

दिल्ली पुलिस के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि न्याय व्यवस्था की पहली सीढ़ी तो पुलिस थाना या चौकी ही है। किसी भी तरह के अपराध की पहली रिपोर्ट तो वहीं दर्ज की जाती है। न्यायालय में तो केस बाद में जाता है। थाना या पुलिस चौकी में जिस भाषा में अपराध की शिकायत दर्ज की जाती है उसके अधिकतर शब्द अरबी या फारसी के होते हैं। इससे शिकायत दर्ज करवानेवाला अपनी शिकायत के बारे में समझ नहीं पाता है कि उसने जो शिकायत लिखवाई वो सही से प्राथमिकी में दर्ज हुई या नहीं। अगर राजनीति से अलग हटकर बात करें तो पूरे देश में एक सामान्य भाषा को लेकर लोग बात भी करने लगे हैं और उसको साकार करने का प्रयत्न भी। भारत की लगभग सभी भाषाएं शब्दों के लिए हिंदी की तरह ही संस्कृत के द्वार पर जाती हैं। हिंदी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि में इतनी अधिक समानता है कि इससे एक भाषाई गठबंधन बनने की प्रबल संभावना है। कहीं पढ़ा था कि उर्दू को संस्कृत से परहेज है और वो संस्कृत से नहीं बल्कि फारसी और अरबी से शब्द उधार लेती है। इस कारण उर्दू न केवल दुरूह होती चली गई बल्कि भारतीय भाषाओं से एक दूरी भी बना ली। बाद में उर्दू के कई पैरोकार मुस्लिम विद्वानों औरर रहनुमाओं ने हिंदी को लेकर अनर्गल टिप्पणियां की। बावजूद इसके हिंदी का फैलाव होता रहा और उर्दू सिकुड़ती चली गई। इन कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। फारसी के दुरूह शब्दों का उपयोग कम करने से उर्दू कमजोर नहीं होगी बल्कि उर्दू को ताकत ही मिलेगी और वो भारतीय भाषाओं के गठबंधन के करीब आ सकेगी। यहां के लोगों में उसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी।

दिल्ली पुलिस के इस कदम पर भाषा की राजनीति करना व्यर्थ और अनुचित है। यह भारत सरकार के भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की व्यापक योजना को हिस्सा तो है ही न्यायिक व्यवस्था को सुगम बनाने का उपक्रम भी। गृह मंत्री अमित शाह निरंतर भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के कार्य में लगे हैं। गृह मंत्रालय के अधीन ही राजभाषा विभाग आता है जो हिंदी को लेकर गंभीरता से काम कर रहा है। दिल्ली पुलिस भी गृह मंत्रालय के अधीन है। अभी कुछ दिनों पूर्व गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में जनरल ड्यूटी के सिपाहियों की भर्ती के लिए हिंदी और अंग्रेजी समेत 13 अन्य भारतीय भाषाओँ में परीक्षा आयोजित करने का आदेश दिया। इसमें उर्दू भी शामिल है। इससे इन भाषा के प्रभाव वाले क्षेत्र के युवकों को अपनी मातृभाषा में परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। केंद्रीय बलों में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी। अगर बिना किसी राजनीतिक चश्मे के भाषा को लेकर उठाए गए कदमों का समग्रता में विश्लेषण करें तो यह महत्वपूर्ण कदम नजर आता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को महत्व दिया गया है। शिक्षा से लेकर रोजगार तक अगर भारतीय भाषाओं को महत्व मिल रहा है तो प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में भी भारतीय भाषा को प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। आक्रांताओं की भाषा को कब तक ढोते रहेंगे। स्वाधीनता के अमृत काल में तो स्वभाषा का उपयोग बढ़ाने का प्रयास हर स्तर पर होना चाहिए। सरकारी भी और गैर सरकारी संस्थाओं को भी आगे आकर भारतीय भाषाओं को सुदृढ़ करने के कार्य में लगना चाहिए। उर्दू के लिए भी बेहतर स्थिति यही होगी कि वो अरबी और फारसी की जगह भारतीय भाषाओं के शब्दों को उपयोग में लाए।

Saturday, April 8, 2023

भ्रांतियां दूर करने की चुनौती


पिछले दिनों एक सेमिनार में हिस्सा लिया था। वहां मुगलों और अंग्रेजों पर बात हो रही थी। एक वक्ता ने मंच से कहा कि भारत में कई सारी चीजें मुगल और कई अंग्रेज लेकर आए। इन चीजों और प्रथाओं ने भारतीय समाज को अपेक्षाकृत आधुनिक बनाया। यहां से होते हुए बात हिंदी-उर्दू पर चली गई और वहां से भारतीय पहरावा और खान-पान पर। मंच से ये तक कहा गया कि भारत में सिले हुए वस्त्र मुगलों के साथ आए और उसके पहले यहां के लोग सिले हुए वस्त्रों से परिचित ही नहीं थे। इस संबंध में उन्होंने चीनी यात्री फाहयान के यात्रा वृत्तांत का उदाहरण देते हुए ये साबित करने की कोशिश की मध्यकाल के पहले भारत में सिले हुए वस्त्रों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। कुछ देर तक इसके पक्ष-विपक्ष में बहस चलती रही लेकिन मुगलों और अंग्रेजों के पक्ष में तर्क रख रहे सज्जन ने विदेशी लेखकों के नाम गिनाने आरंभ किए तो सभागार में बैठे लोगों को लगा कि उनकी बातों में दम है। सत्र समाप्त हुआ। इसके बाद भी लोगों के बीच इस विषय पर चर्चा होती रही। लोग पक्ष विपक्ष में तर्क देते रहे लेकिन चूंकि हमारी शिक्षा पद्धति में इस तरह की बातों को उतना महत्व नहीं दिया इस कारण नई पीढ़ी तक बातें पहुंच नहीं पाई। विदेशियों की पुस्तकों के उद्धरणों और विदेशी विद्वानों के लिखे को अंतिम सत्य मानने वाले विद्वानों ने उनके आधार पर निरंतर ये भ्रम फैलाया कि भारत में सिले हुए वस्त्रों से परिचय मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण के बाद हुआ। विदेशी लेखक बकनन हैमिल्टन ने अपनी पुस्तक ईस्टर्न इंडिया में ये कहा है प्राचीन हिंदू जाति सिले हुए वस्त्र के व्यवहार से पूर्णतया अनभिज्ञ थी, उका प्रचार मुसलमानों के आक्रमण के पश्चात हुआ। उनके इसी कथन को म्योर और वाटसन जैसे यूरोपीय विद्वानों ने आधार मानकर इस धारणा को आगे बढ़ाया। जिन लोगों ने सिर्फ इन विद्वानों को पढ़ा है उनको लगता है कि ये बात सही है। जबकि भारतीय लेखन में इसका कई बार प्रमाण सहित प्रतिकार किया जा चुका है। 

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पत्रिका में 1902 में एक लेख लिखकर प्रमाण सहित बताया था कि प्राचीन भारत में सिले हुए वस्त्रों और सुई का प्रमाण उपलब्ध है। आचार्य शुक्ल ने अपने लेख में प्राचीन ग्रंथों और प्राचीन मूर्तियों के सहारे ये स्थापित किया कि सिले हुए वस्त्रों का चलन भारत में बहुत पहले से था। उन्होंने ऋगवेद का उदाहरण दिया जहां सुई और सीने का उल्लेख है। सिव्यतु अपच शुच्य छेद्यमानय, 2(288)। वो कहते हैं कि ‘मूल शब्द शूचि है जिसके लिए ये अनुमान बांधना कि उससे कांटे या और किसी नोकीली वस्तु से अभिप्राय है, उपहासजनक होगा। यह भी विचार करने का स्थल है कि प्राचीन आर्य लोहे के शस्त्र इत्यादि बनाने में कुशल होकर भी सुई से पूरे अनभिज्ञ बने रहते।‘  उन्होंने कर्नल टेलर के इस कथन का भी सोदाहरण निषेध किया है कि प्राचीन हिंदू जाति में दर्जी का होना प्रमाणित नहीं है और न ही उनकी भाषा में इसके लिए कोई शब्द है। इस संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल अमरसिंह के अमर कोष का संदर्भ देते हैं। यहां यह बताना आवश्यक है कि अमरसिंह का अमरकोष ईसा से पूर्व का माना जाता है। अमरसिंह के कोष में दर्जी के लिए दो शब्द प्रयोग किए गए हैं। एक है तन्तुवाय और दूसरा है सौचिक। (तन्तुवाय: कुविंद: स्यात्तुन्नवायस्तु  सौचिक:-अमरकोष)। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेख में इस बात को भी रेखांकित किया है कि पाणिनी के सूत्रों में भी इस शब्द का उल्लेख है। रामायण और महाभारत के अलावा भी संस्कृत के अन्यान्य ग्रंथों में इस तरह के पहिरावों का उल्लेख है जो बगैर सुई और सीने के बन नहीं सकते। उदाहरण के तौर पर कंचुक, कंचुलिक, अंगिका, चोलक, चोल, कुर्पासक। 

इन शब्दों को अर्थ और उसके प्रयोग को देखते हैं तो इस बात के प्रमाणिक संकेत मिलते हैं कि प्राचीन काल में भारत में सुई और सिले हुए वस्त्रों की परंपरा रही है। ऐसे वस्त्र पहने जाते थे तो सिलकर ही तैयार हो सकते थे। अब अगर कंचुक शब्द के अर्थ को ही देखें तो इसका अर्थ होता है सैनिकों का कुर्ते जैसा एक विशेष वस्त्र। कई जगह ‘सन्नाह’ शब्द का प्रयोग लोहे के कवच और सूत के बने वस्त्रों के लिए भी किया जाता है। सन्नाह को कंचुक का पर्यावाची मानकर कई कोष में उसका अर्थ वाणों से बचाव के लिए लोहे से निर्मित पहिराव के तौर पर किया गया है। रामचंद्र शुक्ल इस बात को प्रमाणित करते हैं कि प्रचीन काल में कंचुक का अभिप्राय सूत से बने वस्त्रों के लिए भी किया जाता था। इस संदर्भ में वो महाभारत का उदाहरण देते हैं कि युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के समय ऋषियों का कंचुक और पगड़ी धारण करने का उल्लेख है। (विवशुस्ते सभां दिव्यां सोष्णीषां धृतकंचुका:)। अब एक और शब्द को देखते हैं। अंगिका एक प्रकार की कुर्ती होती थी जिसको हिंदी में अंगिया कहते हैं। अंगिया शब्द संस्कृत के अंगिका का अपभ्रंश है। इस बात को प्रमाणित करता है कि प्राचीन काल में सिले हुए वस्त्र पहने जाते थे। एक शब्द है नीवी। नीवी कहते हैं इजारबंद को जो घाघरे में डाला जाता है। अगर प्राचीन काल में घाघरे नहीं थे तो नीवी का क्या काम था। 

रामचंद्र शुक्ल ने शब्दों के अलावा अपने उस लेख में मूर्तियों और उसपर उकेरे गए वस्त्रों के आधार पर इस बात को प्रमाणित किया कि प्राचीन काल में भारत में सिले हुए वस्त्रों का चलन था। उन्होंने अमरावती और ओडिशा की प्राचीन मूर्तियों और वस्त्रों को आधार बनाया है। अमरावती में कई मूर्तियां नग्नावस्था और अर्धनग्नावस्था में हैं लेकिन उनके बीच कई मूर्तियां ऐसी भी हैं जिनके वस्त्र उस काल में दर्जी के अस्तित्व के संकेत करते हैं। पुस्तक ‘एंटिक्स आफ ओडीशा’ में उदयगिरी की गुफाओं में चट्टानों से काटकर बनाई मूर्ति को एक चुस्त चपकन पहने दिखाया गया है। इस मूर्ति की अवस्था करीब 2300 साल पूर्व की मानी जाती है।ये चपकन जामे के जैसा है। पुरुषों के अलावा अगर स्त्रियों की बात करें तो इस बात के कई प्रमाण धर्मशास्त्र से लेकर बौद्धग्रंथों में भी उपलब्ध हैं कि स्त्रियां पर्याप्त वस्त्र पहनती थीं। स्त्रियों में साड़ी का प्रचलन था। संपन्न घरों की स्त्रियां घाघरा और कुर्ती और उसके उपर से कभी कभार अंगिया धारण करती थीं। आचार्य शुक्ल ने उक्त लेख के अंत में बहुत ही दिलचस्प बात कही है वो ये कि बंगाल इत्यादि प्रांतों में अधिकांश दर्जी समूह मुसलमान हैं जिसकी वजह से हेमिल्टन समेत कई लेखक भ्रमित हो गए कि दर्जी की अवधारणा भारतीय नहीं है। परंतु पूरे भारतवर्ष में ऐसा नहीं था। शेरिंग ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू कास्ट एंड ट्राइव्स आफ बनारस’ में हिंदुओं के दर्जी होने का उल्लेख किया है।ये भी बताया है कि हिंदुओं में किस जाति के लोग दर्जी का काम करते थे। 

अगर भारत के प्राचीन गंथों को और उस समय के विदेशी लेखकों के लेखन को समग्रता में देखें तो कई प्रकार की भ्रांतियां दूर होती हैं। आवश्यकता इस बात है कि हमारे देश में जो देसी विद्वानों ने जो लिखा उसको प्रचारित प्रसारित किया जाए। उसको नई पीढ़ी को बताया और पढ़ाया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए नए पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। नई पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। इस कार्य में उन विद्वानों को लगाना चाहिए जो सिर्फ ग्रंथों से परिचित ना हों बल्कि उन ग्रंथों को समग्रता से देखकर छात्रों के पाठ को तैयार कर सकें। अगर ऐसा हो पाता है तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सार्थकता स्थापित होगी और ये बदलाव का वाहक बन सकेगा। 


Saturday, April 1, 2023

महापुरुषों के कृतित्व का स्मरण काल


स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के बाद अब हम अमृतकाल में प्रवेश कर चुके हैं। अमृतकाल में इतिहास की जमीन पर विज्ञान के सहयोग से एक शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनाने का संकल्प हर भारतीय का है। इसके लिए आवश्यक है कि उन महापुरुषों के कृतित्वों का स्मरण किया जाए जिन्होंने भारत में शिक्षा से लेकर संस्कृति तक को शक्ति देने में अपना जीवन लगा दिया। अमृत महोत्सव के दौरान पूरे देश ने उन महापुरुषों को याद किया जिन्होंने स्वाधीनता पाने के लिए अपना सर्वस्व गंवा दिया। लेकिन इस विशाल भारत भूमि पर ऐसे अनेक सपूत पैदा हुए जिन्होंने स्वाधीनता की न केवल जमीन तैयार की बल्कि लोगों के मन में एक विश्वास पैदा किया कि वो स्वाधीन हो सकते हैं। विदेशी आक्रांताओं ने हमारे देश की शिक्षा पद्धति तो तहस-नहस किया। सामाजिक सरोकारों के केंद्र रहे मंदिरों को नष्ट किया। ऐसे में जनमानस को स्वाधीनता के लिए तैयार करने के लिए आवश्यक था कि उनके मन घर कर गई दास भावना का शमन किया जाए। इस तरह के कार्य भी अनेकों महापुरुषों ने किए। स्वाधीनता के बाद इतिहासकारों ने जिस तरह से आधुनिक भारत का इतिहास लेखन किया उसमें उत्तर भारत की घटनाओं और स्वाधीनता सेनानियों को वरीयता दी गई। दक्षिण और पश्चिम भारत पर भी लिखा गया लेकिन पूर्वोत्तर पर बहुत कम लिखा गया। कह सकते है कि इतिहास लेखन में पूर्वोत्तर की घटनाओं और वहां के लोगों के योगदान की उपेक्षा की गई।

पिछले दिनों असम के डाउन टाउन विश्वविद्यालय में हरिनारायण दत्त बरुआ की स्मृति में आयोजित समारोह में जाने का अवसर मिला। समारोह का निमंत्रण मिलने के बाद हरिनारायण दत्त बरुआ के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। उनके बारे में बहुत ही कम जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध है। असम जाकर कुछ पुस्तकें मिलीं जिनसे पता चला कि हरिनारायण दत्त बरुआ ने असमिया साहित्य को संजोने और उसको समृद्ध करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। हरिनारायण दत्त बरुआ स्कूली शिक्षक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन असमिया साहित्य के संरक्षण और उसके पुर्नप्रकाशन में लगा दिया। शिक्षा के क्षेत्र में किया गया उनका कार्य अनुकरणीय है। 1885 में उनका जन्म हुआ था। जब वो शिक्षक बने तो उनको असमिया भाषा में पाठ्य पुस्तकों की कमी का अनुभव हुआ। उन्होंने कई छात्रोपयोगी पुस्तकें लिख डालीं। कुछ अपने नाम से तो कुछ बिना लेखक का  नाम दिए। उस समय पूर्वोत्तर में शिक्षा की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। असमिया में पुस्तकों और उसके विक्रेताओं की कमी थी। इस कमी को पूरा करने के लिए हरिनारायण दत्त बरुआ ने अपने भाई के साथ मिलकर असम के नलबाड़ी में एक पुस्तक की दुकान खोली। यहां भी एक समस्या खड़ी हो गई। पुस्तकें बहुत कम संख्या में मिलती थीं और उनको बाहर से मंगवाना पड़ता था। इस कारण लागत अधिक हो जाती था। इस बीच उन्होंने 1932 में अपने पिता के नाम पर एक बालिका विद्यालय की स्थपना की। पुस्तकों की मांग इससे और बढ़ गई। किसी तरह से पांच छह साल तक पुस्तकों की आपूर्ति करते रहे। जब पुस्तकों की मांग बहुत अधिक बढ़ने लगी और बाहर से उतनी संख्या में पुस्तकें नहीं मिलने लगी तो उन्होंने तय किया कि एक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की जाए। लेकिन अर्थ का संकट। उस समय असम जैसे प्रदेश में प्रिंटिंग प्रेस लगाना बेहद मुश्किल और खर्चीला था। जब उद्देश्य पवित्र होता है तो राह आसान हो जाती है। उन्होंने 1938 में अपनी मां के नाम पर उमा प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की। प्रिटिंग प्रेस की स्थापना के बाद ये संकट उत्पन्न हुआ कि कौन सी पुस्तकें प्रकाशित की जाएं। उन्होंने छात्रोपयोगी पुस्तकों के साथ साथ असमिया भाषा में लिखी गई प्राचीन पुस्तकों का प्रकाशन आरंभ किया। हरिनारायण दत्त बरुआ की लिखी और संरक्षित पुस्तकों से प्राचीन असमिया साहित्य और इतिहास के सूत्र मिलते हैं। उनकी लिखी पुस्तकों में असम के साथ-साथ भारत के इतिहास की भी कई अनकही कहानियां दर्ज हैं। आवश्यकता इस बात की है कि उनको भारतीय भाषाओं में अनूदित करवा कर पूरे देश के लोगों तक पहुंचाया जाए। 

श्रीमंत शंकरदेव की कई कृतियों को हरिनारायण दत्त बरुआ ने न केवल संरक्षित किया बल्कि उसके मूल स्वरूप में प्रकाशित करने का बेहद महत्वपूर्ण कार्य भी किया। कुछ लोगों का मत है कि श्रीमंत शंकरदेव के व्यक्तित्व के कुछ आयामों से दत्त बरुआ ने जनता का परिचय करवाया। असम के प्रसिद्ध संत श्रीमंत शंकरदेव का जन्म 1449 में हुआ था। उनके बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पंडित महेंद्र कंदली की पाठशाला में विद्याध्ययन के लिए प्रवेश लिया था। मात्र चार वर्ष में हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन पूर्ण कर भगवद चिंतन में लग गए थे। घरवालों ने ये देखकर शंकरदेव का विवाह करवा दिया लेकिन वो भगवद चिंतन में ही रमा रहा। ये वो समय था जब कुछ लोग हिंदू धर्म के नाम पर तंत्र विद्या के विकृत रूप को चलाने में लगे हुए थे। जब शंकरदेव ने ये महसूस किया कि इससे हिंदू धर्म के बारे में गलत बातें फैल रही हैं तो उन्होंने हस्तक्षेप किया। उन्होंने एक ईश्वर में ध्यान लगाने के मत का प्रचार आरंभ किया। वो जनता के बीच जाकर ‘कलिका परम धर्म हरिनाम है’ का प्रचार करने लगे। उनकी वकतृत्व और तर्कशक्ति से प्रभावित होकर कई लोग धर्म प्रचारक बन गए जो कालांतर में धर्माचार्य कहलाए। शंकरदेव ने अपनी नीतियों में अहिंसा,छुआछूत, मद्य निषेध आदि को शामिल किया। वो श्रीकृष्ण को परमब्रह्म मानकर प्रचारित करने लगे। वो कहते थे कि एक कृष्ण की ही शरण लेकर उसी का नाम, गुण तथा श्रवण कीर्तन करने से सर्वसिद्धि प्राप्त होगी। इस कारण ही उनके प्रचारित मत को ‘एक शरण धर्म’ कहा गया। उनके शिष्य श्रीमंत माधवदेव की भी असम में बहुत ख्याति है। 

हरिनारायण दत्त बरुआ ने श्रीमंत शंकरदेव की रचनाओं को श्रमपूर्वक खोजकर निकाला और उसको प्रकाशित करवा कर जनता के बीच पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। श्रीमंत शंकरदेव के ‘चित्र भागवत’ का प्रकाशन एक ऐसी घटना है जिसको अगर ठीक से व्याख्यायित और प्रचारित किया जाए तो चित्रकला के बारे में बहुत सारी भ्रांतियां दूर होंगी। भारतीय चित्रकला का एक नया रूप सामने आएगा। हरिनारायण दत्त बरुआ ने 1946 में चित्र भागवत के प्रकाशन की प्रक्रिया आरंभ की थी और चार साल बाद उसका प्रकाशन हो सका था। अब ये पुस्तक मूल चित्रों की प्रतिलिपि के साथ प्रकाशित है। इस पुस्तक में चित्रों के साथ जो टिप्पणियां हैं वो असमिया, हिंदी और अंग्रेजी यानि तीन भाषाओं में प्रकाशित हैं। आज जब तमिलनाडू के मुख्यमंत्री दही के पैकेट पर हिंदी में दही लिखे जाने पर आगबबूला हो रहे हैं ऐसे में उनको हरिनारायण दत्त बरुआ से सीख लेनी चाहिए। जिन्होंने भाषा की दीवार को तोड़कर श्रीमंत शंकरदेव की कृतियों को व्यापक जनता तक पहुंचाने का स्वप्न देखा था। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा पर जोर दिया जा रहा है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनेक प्रकार की पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है। ऐसे में असम की सरकार को हरिनारायण दत्त बरुआ के बारे में देश की जनता को बताने का अभियान चलाना चाहिए। इससे न सिर्फ हरिनारायण दत्त बरुआ के योगदान के बारे में देश को पता चलेगा बल्कि अगर उनकी पुस्तकें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर प्रकाशित हो गईं तो श्रीमंत शंकरदेव की कृतियों से भी देश का परिचय होगा। असम में लोग हरिनारायण दत्त बरुआ के नाम के पहले साहित्यरत्न लगाते हैं लेकिन उनको सिर्फ साहित्य की चौहद्दी में नहीं बांधा जाना चाहिए। वो सच्चे अर्थों में भारत भूमि के ऐसे सपूत थे जिन्होंने शिक्षित भारत का ना केवल स्वप्न देखा बल्कि उसको साकार करने के लिए अंतिम दम तक लगे रहे।