Translate

Saturday, July 29, 2023

कलाओं के संरक्षण और संवर्धन की चुनौती


मणिपुर पर संसद में चल रहे गतिरोध और शोरशराबे के बीच 24 जुलाई को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी राष्ट्रीय अकादमियां और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के कामकाज से संबंधित एक रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में अकादमियों के बीच समन्वय पर टिप्पणी की गई है। इसके अलावा इन अकादमियों और संस्कृतिक संस्थाओं की चुनौतियों और अवसरों पर भी बात की गई है। 96 पन्नों की यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में संसदीय समिति ने 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान के कारणों पर मंथन किया और अपने सुझाव दिए। एक बार फिर याद दिला दें कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले सुनियोजित तरीके से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया गया था। इस स्तंभ में पुरस्कार वापसी अभियान की चर्चा कई बार हो चुकी है, उसके प्रमुख रणनीतिकारों के बारे में विस्तार से लिखा गया है इसलिए उन सबको दोहराना उचित नहीं होगा। 

पुरस्कार वापसी अभियान के करीब आठ वर्ष बाद संसदीय समिति ने उसपर विचार किया है। समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अकादमियों को पुरस्कार देने के पहले संभावित लेखकों, कलाकारों से एक वचन पत्र लेना चाहिए कि अगर उनको पुरस्कार दिया जाता है तो वो भविष्य में उसको नहीं लौटाएंगे। बौद्धिक जगत में इसको केंद्र सरकार से जोड़कर आलोचना हो रही है। कहा जा रहा है कि सरकार अब लेखकों को पुरस्कार देने के पहले वचन पत्र लेना चाहती है। आलोचना करनेवाले यह भूल गए कि पुरस्कार वापसी अभियान के समय एक लेखक ने घोषणा करके खूब प्रचार हासिल किया। जब मामला ठंडा पड़ गया तो साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर पुरस्कार वापसी पर खेद प्रकट करते हुए पुरस्कार अपने पास रखने का आग्रह किया। अकादमी के संविधान में पुरस्कार वापसी का कोई प्रविधान ही नहीं है इसलिए उसने किसी का लौटाया गया पुरस्कार स्वीकार नहीं किया। पुरस्कार वापसी अभभियान के समय कई लेखकों ने साहित्य अकादमी परिसर में कदम न ऱकने की कसम खाई थी। वो भी राजनीतिक कसम साबित हुआ । अब वो सभी लेखक साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में न केवल नजर आते हैं बल्कि सक्रिय सहयोग भी कर रहे हैं। संसदीय समिति ने ठीक लिखा है कि पुरस्कार वापसी अभियान पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था। अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कारों को राजनीतिक का औजार बनने से रोकने के लिए समिति ने वचन पत्र का सुझाव दिया है। संसदीय समिति का मानना है कि इस तरह राजनीतिक अभियानों का हिस्सा बनने से पुरस्कारों की प्रतिष्ठा कम होती है। अकादमियों का ये दायित्व है कि वो अपने द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के सम्मान को बनाए रखने का प्रयास करे। संसदीय समिति ने ये भी सुझाव दिया है कि अगर वचन पत्र के बावजूद कोई लेखक या कलाकार पुरस्कार वापसी करता या करती है तो उसके नाम पर भविष्य में किसी भी प्रकार के पुरस्कार के लिए विचार नहीं किया जाए। 

संसदीय समिति की रिपोर्ट के इस बिंदु पर जितनी चर्चा हुई उसकी वजह से अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्षों या राय पर चर्चा नहीं हो पाई। बौद्धिक जगत अगर इन टिप्पणियों पर चर्चा करता तो देश में साहित्य कला संस्कृति को लेकर एक सकारात्मक वातावरण बनता। संसदीय समिति की रिपोर्ट के दो अन्य बिंदुओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। वो है कला और संस्कृति से जुड़े अधिकारियों की संवेदनशीलता और अकादमी और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी। संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सांस्कृतिक प्रबंधन से जुड़े अधिकतर अधिकारियों और कर्मचारियों को इसका बहुत कम ज्ञान है। समिति ने इसके लिए व्यापक स्तर पर कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने की अपेक्षा की है। कहा गया है कि मंत्रालय पहले इन कर्मचारियों के प्रशिक्षण क्षेत्रों का आकलन करे और फिर उसके आधार पर कला प्रबंधन के लिए इनके प्रशिक्षण का प्रबंध करे। संस्कृति मंत्रालय में समय-समय पर रेलवे, आयकर, रेलवे लेखा, डाक सेवा और अन्य सर्विस के अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, अब भी हैं। इनसे कला और कलाकारों को लेकर उस तरह की संवेदशीलता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सूचना सेवा के अधिकारी को अगर कला के संरक्षण का जिम्मा दिया जाएगा तो उनको परेशानी होगी और संरक्षण का कार्य प्रभावित होगा। रेलवे या लेखा विभाग के अधिकारी को अगर नाट्य प्रशिक्षण का कार्य देखने का दायित्व होगा तो उनसे इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वो हमारे देश की नाट्य परंपराओं को जानें और उसकी संवेदनशीलता को समझते हुए इस क्षेत्र को समृद्ध करने में अपना योगदान दे सकें। इस संबंध में भी इस स्तंभ में कई बार लिखा जा चुका है कि देश में एक संस्कृति नीति बने और कला संस्कृति के अधिकारियों का एक कैडर बने। संसदीय समिति जब अगली बार अपनी रिपोर्ट तैयार करे तो सांसदों को इस दिशा में मंथन करते हुए सरकार को अपनी सुझावों से अवगत करवाना चाहिए। 

संसदीय समिति ने दूसरी एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित किया है वो है इन अकादमियों और संस्थाओं में अधिकारियों और कर्माचरियों की कमी। संसदीय समिति ने सूक्ष्मता से इसका आकलन किया है और बताया है कि संगीत नाटक अकादमी में 111 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 65 रिक्त हैं। ललित कला अकादमी में 170 में से 99 पद रिक्त हैं। साहित्य अकादमी में 175 में से 44 पद रिक्त हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में 176 में से 82 पद रिक्त हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के 248 स्वीकृत पदों में से 88 रिक्त हैं। इस तरह से देखा जाए तो सात संस्थाओं के 1078 स्वीकृत पदों में 450 पद रिक्त हैं। यानि औसतन एक तिहाई से अधिक पद रिक्त हैं। अभी हाल ही में राष्ट्रीय संग्रहालय से जुड़ी एक बेहद रोचक जानकारी संज्ञान में आई। वहां के एक अधिकारी अगले महीने सेवानिवृत होने जा रहे हैं। उनके पास कलाकृतियों के संरक्षण का दायित्व है। संस्था में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिनको वो सेवानिवृत्ति के वक्त चार्ज दे सकें। अगर चार्ज नहीं देंगे तो उनको सेवानिवृत्ति पर मिलनेवाली जमा राशि आदि नहीं मिल पाएगी। उनको कहा जा रहा है कि संस्थान उनको किसी अन्य विधि से सेवा में बनाए रखना चाहती है लेकिन वो सेवानिवृत्ति होना चाहते हैं। देखना होगा कि किस प्रकार से ये मामला परिणति तक पहुंचता है। कला और संस्कृति के इस विषय को संस्कृति मंत्रालय को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। संसदीय समिति ने अपनी पिछली रिपोर्ट में भी और इस रिपोर्ट में भी मंत्रालय को इन पदों को जल्द से भरने का सुझाव दिया है लेकिन पता नहीं किन कारणों से ये संभव नहीं हो पा रहा है। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं और अगर इस वर्ष दिसंबर या अगले वर्ष जनवरी तक भर्तियां नहीं हो पाती हैं तो फिर मसला जून जुलाई तक टल जाएगा। यह कला संस्कृति के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी। 

संस्कृति मंत्रालय का प्राथमिक दायित्व कला और संस्कृति का संरक्षण और सवर्धन है। अगर संस्कृति मंत्रालय अपने इन दायित्वों से हटकर कार्यक्रमों के आयोजन में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगा देती है तो फिर संरक्षण और संवर्धन का क्या होगा जिसपर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार बल देते हैं। कार्यक्रमों का तात्कालिक महत्व होता है, वो आयोजित होने चाहिए लेकिन संस्कृति मंत्रालय को बहुत गंभीरता के साथ कला संस्कृति को समृद्ध करनेवाले दीर्घकालीन योजनाएं बनाकर उसके क्रियान्वयन पर कार्य करने की आवश्यकता है। संस्कृति मंत्री किशन रेड्डी के पास पहले से पर्यटन और अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी है। अब तो उनको तेलंगाना का प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया गया है। ऐसे में उनके सामने बड़ी चुनौती है कि वो किस तरह से मंत्रालय के अपने प्राथमिक दायित्व का निर्वहन कर पाते हैं।      


Saturday, July 22, 2023

प्रभावी नीति की आवश्यकता


ओवर द टाप ( ओटीटी) प्लटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री के विनियमन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था बनाई गई थी, उसके परिणाम संतोषजनक नहीं दिखाई दे रहे हैं। न  तो अश्लीलता रुक रही है और न ही विवादित प्रसंग। सरकार की तरफ से लगातार ओटीटी प्लेटफार्म्स को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उनको सरकारी समारोहों में भागीदार बनाया जा रहा था। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव से लेकर गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल तक में उनकी भागीदारी के रास्ते खोले जा रहे थे। इस वर्ष तो फिल्म फेस्टिवल में ओटीटी के लिए पुरस्कार की भी घोषणा की गई है। दूसरी तरफ इन प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर शिकायतें भी बढ़ती जा रही थीं। ओटीटी प्लेटफार्म्स की सामग्रियों के प्रमाणन को लेकर एक संस्था बनाने पर भी निरंतर चर्चा हो रही है। लोगों को लगता है कि भारत जैसे देश में ओटीटी प्लेटफार्म्स पर किसी तरह का रेगुलेशन नहीं होने से अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है। इन चर्चाओं को ध्यान में रखते हुए कुछ दिनों पहले सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की जिनमें इन सब बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इस चर्चा में सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया। अनुराग ठाकुर ने नसीहत दी कि ओटीटी प्लेयर्स को कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता दिखाने से बचना चाहिए। मंत्री ने इन प्लेटफार्म्स को सलाह दी कि वो भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और विविधताओं को लेकर सतर्क भी रहें और संवेदनशील भी। बताया जाता है कि इस बैठक में लस्ट स्टोरीज और राना नायडू जैसे सीरीज की सामग्री को लेकर चर्चा हुई। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है वो भारतीय समाज के लिए कितना उचित है। चर्चा तो इस बात पर भी हुई कि कि ओटीटी प्लेटफार्म्स के रेगुलेशन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें एक स्तर और जोड़ा जाए। ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री की स्क्रिप्ट को शूटिंग के पहले एक कमेटी देखे। ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों को 15 दिनों का समय दिया गया है ताकि वो इसको लेकर कोई व्यवस्था बनाएं और सरकार को सुझाएं। हलांकि ये व्यवस्था कितनी व्यावहारिक होगी ये देखनेवाली बात होगी।

ओटीटी प्लेटफार्म्स  पर दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा हो रही है। सामग्री के पक्ष और प्रतिपक्ष में कई प्रकार के तर्क सामने आते रहते हैं। कई बार यहां दिखाई जानेवली वेब सीरीज को लेकर हंगामा तक हो चुका है। मामला पुलिस से लकर अदालतों तक में गया है। वेब सीरीज में गालियों की भरमार, यौनिकता और नग्नता का प्रदर्शन, जबरदस्त हिंसा और खून खराबा, अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां, कई बार सेना और सैनिकों की छवि खराब करने जैसे प्रसंग भी सामने आते रहे हैं। कोरोना काल के पहले जब ओटीटी प्लेटफार्म्स और वेब सीरीज हमारे देश में लोकप्रिय हो रहे थे तब कई निर्माताओं ने सेक्स और गाली गलौच के जरिए लोकप्रिय होने का रास्ता चुना था। कई विदेशी वेब सीरीज में तो नग्नता आम बात थी। ओटीटी को लेकर किसी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने के कारण नग्न दृश्यों के प्रदर्शन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं था। अब भी नहीं है। कोरोना काल में ओटीटी बेहद लोकप्रिय हो गया। नेटफ्लिक्स ने दिसंबर 2021 में ग्राहकों को कम मूल्य पर अपनी सेवाएं उपलब्ध करवाना आरंभ किया। नेटफ्लिक्स ने दो तरह की रणनीति अपनाई थी। एक तो ग्राहकों को जो शुल्क देना पड़ता था उसको कम किया और अपने प्लेटफार्म पर भारतीय फिल्में और भारतीय कहानियों पर बनीं वेब सीरीज को प्राथमिकता देना आरंभ कर दिया। इंडस्ट्री को जानकारों का मानना है कि नेटफ्लिक्स को इसका काफी लाभ हुआ। इसी तरह से प्राइम वीडियो, हाटस्टार आदि ने भी भारतीय कहानियों को केंद्र में रखकर कहानियां पेश करनी शुरु कर दी। उनको भी इसका लाभ हुआ। कहना न होगा कि कोरोना के बाद जिस तरह से ओटीटी प्लेटफार्म्स ने स्थानीय कंटेंट को बढ़ावा दिया और ग्राहकों के शुल्क को युक्तिसंगत बनाया उससे इनकी लोकप्रियता काफी बढ़ी।

एक तरफ ओटीटी प्लेटफार्म्स की लोकप्रियता बढ़ रही थी लेकिन साथ ही साथ वहां दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे थे। सरकार की नजर भी इनपर थी। इंडस्ट्री को लोगों को लेकर लंबे समय तक चले विचार विमर्श के बाद फरवरी 2021 में इंटरनेट मीडिया को लेकर केंद्र सरकार ने एक गाइडलाइन जारी की थी। उसके अंतर्गत ही ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक त्रिस्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई गई थी। तब ओटीटी प्लेटफार्म्स से जुड़े लोगों ने इसका स्वागत किया था। उस व्यवस्था का कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला। वेब सीरीज और ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद जारी रहे। शिकायतें भी आती रहीं उसका निबटारा भी होता रहा लेकिन विवाद फिर भी जारी रहे। बाद के दिनों में एक खास प्रकार की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी कि इन ओटीटी प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री में कभी प्रत्यक्ष तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक विचारों को उठाने और गिराने का खेल चलने लगा। संवाद से लेकर दृश्यों तक में। अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता और यथार्थ  की आड़ में नग्नता और गाली गलौच दिखाने का चलन कम नहीं हुआ। इस वर्ष अप्रैल में संसदीय समिति ने ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली अश्लीलता पर चिंता प्रकट की थी। समिति के अधिकांश सदस्यों का मानना था कि जिस प्रकार की अश्लीलता इन सीरीज में दिखाई जाती है वो भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ता है। सरकार और समाज के स्तर पर भी इसको लेकर निरंतर मंथन हो रहा है।ओटीटी प्लेटफार्म्स भी अपने ग्राहकों की संख्या को बढ़ाने, उसको कायम रखने के लिए लगातार कंटेंट में प्रयोग करते रहे। अब भी कर भी रहे हैं। यह एक अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी।

प्रश्न ये उठता है कि जब इस देश में फिल्मों को लेकर एक प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था है तो फिर् ओटीटी को लेकर क्यों नहीं इस तरह की व्यवस्था बन सकती है। ओटीटी का आकार इतना व्यापक होता जा रहा है कि अगर इसके लिए किसी प्रमाणन की व्यवस्था तय होती है तो उसके लिए काफी संसाधन की आवश्यकता होगी। अगर प्रोडक्शन के पहले स्क्रिप्ट देखने की व्यवस्था बनाई जाती है तो इसके लिए भी क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर समितियों का गठन करना होगा। अगर इसके अलावा किसी तरह की कोई व्यवस्था बनाई जाती है तो उसके भी व्यावहारिक पक्ष को देखने की आवश्यकता होगी। इस स्तंभ में पहले भी कई बार ओटीटी की सामग्रियों के प्रमाणन या फिर किसी अलग प्रकार के मैकेनिज्म की चर्चा हो चुकी है। आज जिस प्रकार से इन प्लेटफार्मस पर वेब सीरीज के माध्यम से राजनीति की जा रही है या जिस प्रकार से हिंदुत्व और उसके प्रतीक चिन्हों पर टिप्पणियां की जाती हैं उसको ध्यान में रखना चाहिए। धर्म विशेष या समुदाय विशेष को बदनाम करने वाले कंटेंट का इंटेंट देखा जाना चाहिए। आलोचना हो लेकिन आलोचना के पीछे राजनीतिक उद्देश्य न हो। आलोचना के पीछे किसी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने की मंशा न हो। क्योंकि जब मनोरंजन राजनीति का औजार बनता है तो कई बार समाज का बड़ा वर्ग उसको समझ नहीं पाता है और वो परोक्ष रूप से लोकतंत्र को कमजोर करता है। ओटीटी आज एकक ऐसे सेक्टर के तौर पर उभरा है जहां अनेक प्रकार की संभावनाएं हैं। उन संभावनाओं को बाधित किए बगैर ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक प्रभावी नियमन होना चाहिए। विमर्श काफी लंबे समय से चल रहा है अब वक्त है कि सरकार एक नीति बनाकर उसको लागू कर दे।  

Thursday, July 13, 2023

तथ्यहीन आधार पर नैरेटिव


पिछले दिनों कल्याण पत्रिका चर्चा में रही। गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा हुई थी। कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री अपने गोरखपुर दौरे के समय गीता प्रेस गए। पुरस्कार की घोषणा और प्रधानमंत्री के गीता प्रेस जाने के समय इस बात का बार-बार उल्लेख किया गया कि कल्याण पत्रिका के अंकों में महात्मा गांधी की हत्या पर कुछ भी नहीं प्रकाशित किया गया। ऐसा कहनेवालों ने कल्याण पत्रिका और इसके संपादक को गांधी विरोधी करार दिया। इस तरह की टिप्पणियां की गईं जिसके भ्रम का वातावरण बने कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार और बापू के हत्यारे के बीच संबंध थे। उनके ऐसा कहने के पीछे अंग्रेजी में प्रकाशित एक पुस्तक गीता प्रेस एंड द मेकिंग आफ हिंदू इंडिया में उल्लिखित प्रसंग का सहारा लिया गया। इस पुस्तक के लेखक अक्षय मुकुल हैं। उन्होंने अपने पुस्तक के पेज 58 पर लिखा है कि गीता प्रेस ने गांधी की हत्या पर खामोशी ओढ़ ली थी। कल्याण के लिए जिस व्यक्ति का आशीर्वाद और लेखन बेहद महत्वपूर्ण था उसी पत्रिका में अप्रैल 1948 के अंक तक एक बार भी उनका (गांधी) उल्लेख नहीं हुआ। इस अंक में पोद्दार ने गांधी से अपनी विभिन्न मुलाकातों के बारे में लिखा। बाद के अंकों में भी गांधी का लेखन कल्याण में प्रकाशित हुआ। लेकिन अक्षय मुकुल ये प्रश्न उठाते हैं कि फरवरी और मार्च 1948 के अंक में गांधी के बारे में कुछ भी प्रकाशित क्यों नहीं हुआ। अक्षय ने हाल के अपने लेख में भी इस ओर फिर से संकेत किया है। मुकुल इस बात का भी दावा करते हैं कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार, महात्मा गांधी के कटु आलोचक थे। इस संबंध में वो कुछ प्रसंगों और पत्रों का हवाला देते हैं जहां पोद्दार गांधी के विचारों की आलोचना करते है। अक्षय मुकुल ने जो व्याख्या की हैं उसमें कई दोष रह गए हैं। 

गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी। कल्याण पत्रिका का जनवरी अंक बहुत सारे ग्राहकों को भेजा जा चुका था। कुछ अंक ग्राहकों को नहीं भेजे जा सके थे। गांधी की हत्या का समाचार आते ही बचे हुए अंकों का डिस्पैच रोककर उसमें तीन पन्ने अलग से लगाए गए। एक पूरे पन्ने पर बापू की तस्वीर लगाई गई जिसके ऊपर लिखा गया ‘महाभागवत बापू’ और तस्वीर के नीचे लिखा गया ‘सकल लोक मां सहु ने बंदे’। एक पेज पर राघवदास जी की एक टिप्पणी प्रकाशित है जिसका शीर्षक है ‘महाभागवत पूज्य बापू जी’। उसमें राघवदास जी ने लिखा है कि पूज्य बापू जी कहा करते थे मेरा ह्रदय चीरकर देखो तो उसमें राम-राम लिखा मिलेगा। बहुतों को ये बात समझने में बहुत दिक्कत होती हो, पर जब हम उनको तारीख 30.1.48 को साढे पांच बजे बजे गोली का शिकार होते देखते हैं तो उनके मुंह से हे राम, हे राम यह दो शब्द ही निकलते हैं। मैंने गोली का अभ्यास करनेवालों से बातें की तो उन्होंने मुझे बताया कि गोली लगने पर मुख की आकृति बिगड़ जानी चाहिए, परेशानी चेहरे पर आनी चाहिए पर वैसा नहीं हुआ... कितना सुंदर स्वरूप है इस महाभागवत का। ग्रंथों में संतों के वर्णन पढ़े थे. पर प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर इसी महापुरुष के जीवन में हमें मिला। बोलिए महाभागवत की जय। राघवदास जी की कल्याण में प्रकाशित इस टिप्पणी में गहरी श्रद्धा परिलक्षित होती है।    

अब नजर डाल लेते हैं कल्याण के 1948 के जनवरी अंक में तत्कालीन संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार की टिप्पणी पर। वो लिखते हैं, पूज्य महात्मा जी संत थे, महापुरुष थे मानवमात्र का हित चाहनेवाले थे और विश्व की एक महान विभूति थे। वे धर्म और जाति के भेद से ऊपर उठे हुए थे और सत्य और अहिंसा के सच्चे पुजारी थे। वे मानवता के खरे प्रतीक थे। ईश्वर की प्रार्थना के समय जाते हुए उनकी निर्मम हत्या करके हत्यारे ने अपना तो लौकिक और पारलौकिक महान अहित किया ही, हिंदू जाति पर भी-जो धर्मत: और स्वभावत: अहिंसाप्रिय है- कलंक का अमिट टीका लगा दिया। अगर हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को नापसंद करते, तो कलंक का अमिट टीका जैसी कठोर टिप्पणी हिंदू जाति पर नहीं करते।  अपनी इस टिप्पणी में हनुमानप्रसाद पोद्दार लिखते हैं कि बापू के साथ उनका पारिवारिक संबंध था। बापू उनको पुत्र के समान मानते और स्नेह करते थे। उनके स्नेह की एक एक बात याद करके दिल भर आता है। इस तरह की टिप्पणियों को पढ़ने के बाद क्या संदेह रह जाता है कि हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को पसंद नहीं करते थे। वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन उसको व्यक्तिगत द्वेष की तरह देखना और व्याख्यायित करने में अंतर है। अक्षय मुकुल इस अंतर को समझ नहीं पाए या समझ कर अनदेखी की। एक और बात मुकुल ने जोर देकर पूछी है कि कल्याण पत्रिका के 1948 के फरवरी और मार्च अंक में गांधी का उल्लेख क्यों नहीं है। यहां भी मुकुल की लापरवाही या तथ्यों की अनदेखी दिखाई देती है। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंचने की लापरवाही या किसी खास कारण से अनदेखी। 1948 के फरवरी अंक में हिंदू विधवा के नाम से बापू की टिप्पणी है, कवर पर भी उल्लेख है। तो क्या ये माना जाए कि लेखक इतना लापरवाह था कि वो बगैर देखे बड़े-बड़े दावे कर रहा था या वो जानबूझकर कुछ तथ्यों को छिपाकर एक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा था। अनुत्तरित तो ये प्रश्न है। 1926 से लेकर 1948 तक बापू की कई टिप्पणियां कल्याण के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हुईं। 

एक और दोषपूर्ण टिप्पणी अक्षय ने अपनी पुस्तक में की है कि गीता प्रेस के निजी अभिलेखागार में गांधी की हत्या से संबंधित कोई रेफरेंस उपलब्ध नहीं है। पिछले सप्ताह मैं गोरखपुर में था।  गीता प्रेस जाकर कल्याण के उस अंक को स्वयं देखा जिसमें बापू की हत्या पर तीन पृष्ठ हैं। यह अंक उनके अभिलेखागार में उपलब्ध है। कोई भी अनुमति लेकर देख सकता है। मुझे लगता है कि मुकुल ने कल्याण पत्रिका की फाइल देखी ही नहीं। उसने उन विशेषांकों को देखा जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। प्रतिवर्ष कल्याण का जनवरी अंक विशेषांक होता है जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित होता है। जनवरी 1948 का अंक भी विशेषांक था, नारी अंक, जो कालांतर में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। अब जो नारी अंक बाजार में उपलब्ध है उसमें गांधी की हत्या के प्रसंग पर राघवदास जी, पोद्दार जी की टिप्पणियां नहीं हैं। गांधी का चित्र भी नहीं है। ये तो पुस्तक प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। जब किसी पत्रिका के विशेषांक को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता है तो उसमें तात्कालिक या घटनात्मक टिप्पणियां नहीं रखी जाती हैं। बिना फाइल देखे सिर्फ बाद में प्रकाशित पुस्तक के आकार पर टिप्पणी करना ये दर्शाता है कि लेखक कितनी लापरवाही से तथ्यों को इकट्ठा कर रहा था। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंच रहा था। लेकिन बड़े बड़े प्रश्न खड़े कर रहा था। 

कल्याण, गांधी और हनुमानप्रसाद पोद्दार के संबंधों को समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो अक्षय मुकुल के पास नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्षय मुकुल ने एक विशेष नैरेटिव को बल देने के लिए ये पुस्तक लिखी। पुरस्कृत हुए। अब उसी पुस्तक में वर्णित गलत तथ्यों और प्रसंगों को उद्धृत नैरेटिव बनाए जा रहे हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में लोगों के पास किसी भी प्रसंग या घटना को समग्रता में देखने या उसकी पड़ताल करने का धैर्य नहीं है। अगर मैं भी गोरखपुर के गीताप्रेस जाकर इन प्रसंगों को नहीं देखता समझता तो संभव है कि मान लेता कि कल्याण में बापू की हत्या के बाद कुछ नहीं प्रकाशित हुआ। 


Tuesday, July 11, 2023

कोलाहल में दबती फिल्म निर्माण कला


बीते शुक्रवार को फिल्म 72 हूरें रिलीज हुईं। इस फिल्म का भी कुछ लोगों ने एजेंडा और प्रोपगैंडा फिल्म बताकर विरोध किया।न कई लोग इसको एक समुदाय विशेष को बदनाम करनेवाली फिल्म बताने में जुटे रहे। इसके पहले जब फिल्म द केरल स्टोरी रिलीज हुई थी तो भी इसी तरह का वातावरण बना था। द केरल स्टोरी के पहले द कश्मीर फाइल्स के प्रदर्शन के बाद इसके निर्देशक विवेक अग्नहोत्री को काफी विरोध झेलना पड़ा था। उनको जान से मरने की धमकियां भी मिली थीं। इन सबके बीच शाह रुख खान की फिल्म पठान आई थी। उसके एक गाने में अभिनेत्री के वस्त्र को लेकर विवाद हुआ था। इन विवादों में एक बात समान रूप से देखने को मिलती है। अधिकतर लोग फिल्म को बिना देखे उसका विरोध करते हैं। यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रहा हूं। पिछले दिनों द केरल स्टोरी को लेकर भी मेरा यही अनुभव रहा था और अब 72 हूरों को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। जो लोग 72 हूरों को एजेंडा और प्रोपगैंडा फिल्म बता रहे हैं उनमें से अधिकतर ने ये फिल्म नहीं देखी है। मजे की बात ये कि फिल्म को एजेंडा और प्रोपगैंडा बतानेवाले अधिकतर लोग इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर रहे हैं कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी है। ये कैसा विरोध? किसी भी रचनात्मक कृति की आलोचना उसको बिना देखे या पढ़े कैसे की जा सकती है, ये समझ से परे है।

फिल्मों को लेकर इस तरह के वाद-विवाद की वजह से फिल्म कला का नुकसान हो रहा है। शोर मचाकर फिल्म हिट करवा लेने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से देश में फिल्म संस्कृति के विकास की दिशा भटक रही है। इसपर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। विवादों के इस कोलाहल में फिल्म कला या फिल्म के क्राफ्ट उसकी कहानी और ट्रीटमेंट पर बात नहीं होती है। फिल्म पर गंभीरता से लेखन नहीं हो रहा है। फिल्मों पर लिखनेवाले अधिकतर लोग भी चाहे-अनचाहे इन विवादों का हिस्सा बन जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि फिल्म के क्राफ्ट पर बात हो, छायांकन और दृश्यांकन कला पर चर्चा हो। संवादों में जो फूहड़पन है और गीतों में जिस तरह से शब्दों का उपयोग हो रहा है उसपर बात होनी चाहिए। निर्देशकों की कला और संगीतकारों के प्रयोगों पर मंथन होना चाहिए। ये नहीं हो रहा है। हमेशा से इस तरह की बातें कम होती थीं लेकिन होती थीं। अब तो लगभग नहीं के बराबर हो रही हैं। कोरोना महामारी के दौरान फिल्म फेस्टिवल्स का आयोजन भी बाधित हुआ था। इस कारण वहां होनेवाले विमर्श भी नहीं हो पाए। फिल्मों पर गंभीर बात करने-कराने और उसके क्राफ्ट पर चर्चा करवाने में फिल्म फेस्टिवल्स की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जागरण फिल्म फेस्टिवल जैसे उत्सव देश के अठारह शहरों में आयोजित किए जाते हैं। जिनमें देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में दिखाई जाती हैं। फिल्मों से जुड़े लोगों से संवाद होता है। निर्देशकों से उनके सोच के बारे में दर्शकों को जानने समझने का अवसर मिलता है। इस तरह के आयोजन देश में फिल्म संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण होते हैं। फिल्म फेस्टिवल्स की उपयोगिता असंदिग्ध है, इस पर फिर कभी बात होगी। 

फिल्मों पर जारी शोरगुल के बीच जब क्राफ्ट की बात होती है तो बिमल राय, व्ही शांतारम, सत्यजित राय, गुरुदत्त जैसे फिल्मकार याद आते हैं। आज गुरुदत्त की जयंती है। तीन दिन बाद 12 जुलाई को बिमल राय की जयंती है। बिमल राय की फिल्मों ने जिस तरह से भारतीय सिनेमा को ऊंचाई प्रदान की उसमें कई बार वो सत्यजित राय से बड़े फिल्मकार दिखाई देते हैं। उनकी फिल्म दो बीघा जमीन, सुजाता और बंदिनी को देखकर लगता है कि हमारे देश में कितनी उन्नत फिल्में बना करती थीं। फिल्मों की कहानियों में उसके पात्रों के माध्यम से बिमल राय जिस प्रकर से मानव मन की उलझनों को या यों कहें कि मनोविज्ञान के उलझे रेशे को दिखाते हैं वो अप्रतिम है। बिमल राय ये मानते थे कि मानव मन के अंदर चलनेवाले द्वंद्व का चित्रण दर्शकों को बांधता है। बिमल राय फिल्मों में यौनिकता के अत्यधिक प्रदर्शन के विरुद्ध थे। वो कहा करते थे कि फिल्मों में सेक्स सीन की बहुलता वही दिखाते हैं जिनको प्यार और प्रेम की समझ नहीं होती है। फिल्म दो बीघा जमीन में बिमल राय ने जिस प्रकार से स्वाधीनता के बाद औद्योगिक विकास और किसानों की समस्या को दिखाया है वो दर्शकों को झकझोरता है। इस फिल्म को देखकर किसी विदेशी आलोचक ने फिल्मकार की उस दृष्टि की प्रशंसा की थी जिसमें वो अपने देश के आर्थिक विकास की क्रूरता को रेखांकित करता है। बिमल राय की फिल्म देवदास, मधुमति और यहूदी की खूब चर्चा होती है क्योंकि ये फिल्में व्यावसायिक रूप से भी काफी सफल रही थीं। इन फिल्मों से दिलीप कुमार का अभिनय निखरा था। बिमल राय की फिल्म देवदास की तुलना प्रथमेश बरुआ की 1935 में बनी फिल्म देवदास से की जाती रही है। अधिकतार फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि बिमल राय की फिल्म बरुआ की फिल्म से बेहतर बनी थी। बिमल राय की एक फिल्म की चर्चा कम होती है। ये फिल्म भारतीय फिल्मों के इतिहास में उल्लेखनीय मानी जा सकती हैं। ये फिल्म है परख। यह फिल्म तीसरे आम चुनाव के पहले की है। इस फिल्म में बिमल राय ने चुनावी राजनीति को विषय बनाया था और उसपर व्यंग्यात्मक लहजे में प्रहार किया था। फिल्मकार ने इस फिल्म में गांव में चलनेवाली राजनीतिक दांव-पेंच को बेहद सूक्ष्मता से पकड़ा और उसको अपने फिल्म के माध्यम से दर्शकों के सामने पेश कर दिया था। चुनाव किस तरह से एक शांत गांव को अशांत बनाता है, यह देखना हो तो फिल्म परख देखी जानी चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों से ये कहा जाने लगा कि फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए होती हैं। बिमल राय इससे अलग सोचते थे। वो मानते थे कि फिल्में दर्शकों का मनोरंजन तो करे ही विषय विशेष को लेकर बौद्धिक रूप से समृद्ध भी करे। बिमल राय की फिल्मों में ये दिखता भी है। इंटरनेट मीडिया के इस युग में फिल्मों पर लिखनेवाले बढ़े हैं, फेसबुक से लेकर ट्विटर पर आपको फिल्मों के कई प्रकार के विशेषज्ञ मिल जाएंगे लेकिन फिल्मों के क्राफ्ट पर गंभीरता से विमर्श का आभाव दिखता है। आज अधिकतर फिल्मकारों की रुचि बाक्स आफिस के आंकड़ों में रह गई है। इस आंकड़ों में रुचि रखना गलत नहीं है लेकिन बाक्स आफिस के अलावा फिल्मों के कंटेंट और उसके ट्रीटमेंट पर भी ध्यान रखना चाहिए। फिल्म निर्माण का उद्देश्य लाभ कमाना होना चाहिए। लेकिन लाभ के लिए कला को समाप्त करने की प्रवृत्ति रोकने के भी प्रयास किए जाने चाहिए। कलात्मकता के नाम पर फूहड़ता या यौनिकता के अत्यधिक प्रदर्शन से तात्कालिक लाभ तो हो सकता है लेकिन उससे कला का नुकसान होता है। याद पड़ता है कि जब बिमल राय की फिल्में देवदास, मधुमति और यहूदी जबरदस्त कामयाब हुईं तो इस बात की चर्चा आरंभ हो गई थी कि बिमल राय भी व्यावसायिकता की होड़ में शामिल हो गए हैं। इन तीन फिल्मों के बाद बिमल राय ने बंदिनी और सुजाता बनाकर इस धारणा का निषेध किया था। कहने का अर्थ ये है कि अगर आपके पास फिल्म निर्माण की कला होगी तो बाक्स आफिस भी आपके साथ होगा और बेहतर फिल्में भी बनेंगी। आज जिन फिल्मकारों के पास फिल्म की समझ दिखाई देती है उनको प्रोड्यूसर मिलने में कठिनाई होती है। आज बहुत कम ऐसे प्रोड्यूसर बचे हैं जो फिल्मों की बारीकियों को समझते हैं। ऐसे में दर्शकों का दायित्व बढ़ जाता है कि वो बेहतर फिल्मों के लिए दबाव बनाएं। 


Saturday, July 1, 2023

प्रतिभा विकास में भाषा बाधक न बने


दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेट्रो रेल से विश्वविद्यालय गए। मेट्रो की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने साथ यात्रा कर रहे छात्रों से बातचीत की। छात्रों से चर्चा के समय प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत ही अच्छी बात कही जिसपर देशव्यापी सोच बनना चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक छात्र से जानना चाहा कि वो मूल रूप से कहां के रहनेवाले हैं। छात्र ने बताया कि वो रांची, झारखंड का है। प्रधानमंत्री ने सहजता से पूछा कि बाहर के किसी को दोस्त बनाया। रांची के उस छात्र ने उत्साह से बताया कि यूपी के लड़कों से दोस्ती की। वो जिस कालेज में पढ़ते हैं उसका प्रबंधन बालाजी मंदिर भी चलाते हैं तो वहां तेलुगु भाषी भी हैं। उसने तेलुगु बोलनेवालो से भी दोस्ती की है। वो उत्साह से बोले जा रहा था लेकिन प्रधानमंत्री कुछ और जानना चाह रहे थे। वो जानना चाह रहे थे कि दक्षिण भारत के राज्यों के छात्रों से दोस्ती की और उनसे उनकी भाषा के पांच-दस वाक्य सीखे या नहीं। प्रधानमंत्री के इतना बोलते ही एक छात्रा फटाक से बोल पड़ी कि उसने ऐसा किया है। एक वाकया भी बताया। वो अपने कालेज परिसर में थी तो उसने देखा कि एक लड़की फोन पर बात कर रही थी। बातचीत की भाषा वो नहीं समझ पा रही थी। बात खत्म होने के बाद उसने जानना चाहा कि किस भाषा में बात हो रही थी। पता चला कि बातचीत मलयालम में हो रही थी। इसके बाद उसने उस लड़की से अनुरोध किया कि उसे भी मलयालम के कुछ वाक्य बता दे। जैसे कि अगर को किसी को हैलो करना हो या हालचाल पूछना हो तो मलयालम में कैसे और क्या बोलेंगे। जब उस लड़की ने मलयालम में बताना आरंभ किया तो हिंदी भाषी लड़की ने फोन पर रिकार्ड कर लिया, ताकि बाद में उसको सुनकर सीख सके। इसी तरह से एक छात्रा ने बताया कि उसने मणिपुरी छात्राओं से मित्रता करके उनको हिंदी सिखाई तो असम की छात्रा ने बताया कि दिल्ली विवविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान उसने अपने कई साथियों का असमिया सिखाई। 

देखने में ये पूरा प्रसंग बहुत सामान्य लग रहा है लेकिन अगर सूक्ष्मता और गंभीरता से विचार करें तो एक देश के प्रधानमंत्री अपने देश के छात्रों को देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषाओं को सीखने के लिए प्रेरित कर रहे थे। सहजता के साथ। इस देश ने भाषा के नाम पर अतीत में बहुत हिंसा झेली है। राज्यों का बंटवारा देखा है। खून खराबा देखा है। भारतीय भाषाओं को राजनीति का औजार बनते देखा है। अभी भी कभी कभार इस तरह के प्रसंग देखने को मिल जाते हैं। तमिलनाडु जैसे भाषाई रूप से समृद्ध प्रदेश के नेता अकारण हिंदी विरोध का झंडा उठाते रहते हैं। अब स्थितियां कुछ बदलती दिखने लगी हैं। सत्ता के शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं ने भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने और उसके बल देने का उपक्रम आरंभ किया है। भाषा की राजनीति अपेक्षाकृत कम होने लगी है। प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के क्रम में एक छात्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के महत्व की चर्चा की। इसपर प्रधानमंत्री मोदी का उत्तर बेहद सधा हुआ था। सधा हुआ इस वजह से कि उन्होंने अंग्रेजी की आलोचना नहीं की। बिना अंग्रेजी की आलोचना के उन्होंने भारतीय भाषाओं की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हमारे देश के गांवों में बहुत प्रतिभा है लेकिन अधिकतर को अंग्रेजी का सौभाग्य नहीं मिला तो वे प्रतिभाएं बाधित हो गईं, रुक गईं। बातचीत के क्रम में ही प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि प्रतिभा के विकास में भाषा बाधक नहीं होनी चाहिए। इस बातचीत से जो संदेश निकल रहा था वो ये भी था कि भारतीय भाषाओं के बीच किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं होना चाहिए। हर भारतीय को मातृभाषा के अलावा एक और भाषा सीखनी चाहिए। 

पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के बीच बेहतर समन्वय और अतीत की कटुता को दूर करने के लिए वाराणसी और गुजरात में तमिल संगम जैसे कार्यक्रम हुए। उसके पहले पिछले वर्ष शिमला में साहित्य अकादमी ने उन्मेष नाम से चार दिनों का एक कार्यक्रम किया था। शिमला में आयोजित उस कार्यक्रम में भारतीय भाषाओं के चार सौ के करीब लेखकों की भागीदारी रही थी। विभिन्न विषयों पर मंथन किया गया था। आगामी अगस्त के पहले सप्ताह में फिर से साहित्य अकादमी भोपाल में उन्मेष का आयोजन कर रही है। इसमें भी भारतीय भाषाओं के विद्वानों की भागीदारी होगी। तमिल से लेकर कश्मीरी तक, गुजराती-मराठी से लेकर बांगला और पूर्वोत्तर की भाषाओं के लेखकों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होगा। अगर देखा जाए तो केंद्र सरकार के स्तर पर भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास निरंतर चल रहा है। 

स्वाधीनता के पहले हिंदी और तमिल के बीच इतना अधिक साहचर्य था कि 1910 में तत्कालीन मद्रास से काशी आकर बी कृष्णस्वामी अय्यर ने घोषणा की थी कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। तमिल और हिंदी भाषा के बीच कृतियों के अनुवाद की बेहद समृद्ध परंपरा थी। जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति कामायनी और आंसू दोनों काव्यों के अनुवाद तमिल में प्रकाशित हुए थे। प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन का भी तमिल में अनुवाद हुआ था और उसपर तो तमिल में एक फिल्म भी बनी थी। सुब्रह्मण्य भारती की रचनाओं को अनुवाद हिंदी में हो रहा था। आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तमिल के महावि कंब के रामायण का हिंदी में अनुवाद बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना से प्रकाशित हुआ था। अन्य भारतीय भाषाओं के बीच भी अनुवाद के क्रम चलते रहते थे। स्वाधीनता के कुछ वर्षों बाद जब भाषा के आधार पर राजनीति आरंभ हुई तो ये प्रक्रिया बाधित हुई। राजनीति ने भाषा को औजार बनाकर भारत को बांटने का काम किया। स्वाधीनता के पहले दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात उठती रहती थी। उन प्रदेशों के लोगों के मस्तिष्क में हिंदी को लेकर आशंका के बीज बो दिए गए। संविधान सभा में देश की भाषा समस्या पर तीन दिनों तक चर्चा हुई थी। वहां पुरषोत्तमदास टंडन जी के विचारों को आज याद करने की आवश्यकता है। टंडन जी को इस कारण क्योंकि वो हिंदी के प्रचंड समर्थक थे। जब हिंदी में अंतरराष्ट्रीय अंकों की स्वीकार या अस्वीकार करने पर बात हो रही तो किसी ने कहा कि जनमत लेने से तो हिंदी आएगी नहीं। इसपर टंडन जी का उत्तर था कि ‘यदि विभिन्न प्रांत हिंदी को स्वीकार नहीं करते हैं तो मैं किसी भी स्थिति में उनपर हिंदी लादने को तौयार नहीं हूं। प्रांत हिंदी को ग्रहण करेंगे या नहीं यह निश्चय तो उन्हीं को करना है। जो लोग आज जिम्मेदारी की जगहों पर बैठे हैं उनसे मैं अपील करूंगा कि वे अपनी अन्तरात्मा की बारीक आवाज को सुनने की कोशिश करें और ऐसी कोई भी बात स्वीकार नहीं करें जो उनके प्रांतों को अमान्य होगी।‘ 

भाषा को लेकर जिस प्रकार को जोश और उत्साह स्वाधीनता के पहले दिखता है वो स्वाधीनता के बाद शिथिल हो गया। जब भाषा में राजनीति का प्रवेश हुआ तो उसने भारतीय भाषाओं को लड़ाकर अंग्रेजी की स्थिति मजबूत कर दी। जब देश की अर्थव्यवस्था को खोला गया या उदारीकरण का दौर चला तब भी भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। अंग्रेजी की स्थिति शासकों की भाषा वाली बनी रही। प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भारतीय भाषाओं को लेकर एक सुचिंतित मुहिम शुरु हुई है। ये मुहिम निरंतर आगे बढ़ रही है जो भारतीय भाषाओं के लिए सुखद है। 


Saturday, June 24, 2023

औपनिवेशिक ताकतों का प्रतिकार


गीता प्रेस, गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार देने की घोषणा होते ही इंटरनेट मीडिया और अन्य समाचार माध्यमों में सकारात्मक और नकारात्मक टिप्पणियां देखने को मिलने लगीं। कांग्रेस पार्टी ने तो एक पुस्तक की आड़ लेकर गीता प्रेस की तुलना गोडसे से कर डाली। कांग्रेस की इस तुलना के बाद मामले ने तूल पकड़ा और गीता प्रेस के साथ-साथ इससे जुड़े हनुमानप्रसाद पोद्दार के बारे में भी अनाप-शनाप लिखा जाने लगा। किसी ने उनको हिंदू सांप्रदायिकता से जोड़ा, किसी ने उनके संपादन में निकलनेवाली पत्रिका कल्याण में मुस्लिम लेखकों की खोज आरंभ कर दी, किसी ने उनको राष्ट्रीय स्वयंसेव संघ का एजेंडा चलानेवाला व्यक्ति बताया। हनुमानप्रसाद पोद्दार जी के बारे में विभिन्न प्रकार की टिप्पणियां पढ़ते हुए स्वर्गीय नरेन्द्र कोहली की एक बात याद आई। जब भी श्रीरामचरितमानस या महाभारत के बारे में कोई पाठक उनसे मूर्खतापूर्ण प्रश्न करता था तो वो हंसते हुए कहते थे कि अज्ञान असीमित होता है जबकि ज्ञान की सीमा होती है। हुनमानप्रसाद पोद्दार के बारे में भी अधिकतर टिप्पणीकारों ने असीमित अज्ञान का ही प्रदर्शन किया है। दरअसल होता ये है कि जब आप पूर्वाग्रह से भर कर किसी का आकंलन करते हैं या किसी एजेंडा के तहत किसी व्यक्तित्व या संस्थान का मूल्यांकन करते हैं तो उनके योगदानों को एकांगी होकर देखते हैं। गीता प्रेस और हनुमानप्रसाद पोद्दार पर टिप्पणी करते समय भी कई लोग इस दोष के शिकार हो गए। एक तो अज्ञान दूसरे एजेंडा। कांग्रेस ने क्यों हनुमानप्रसाद पोद्दार की तुलना गोडसे से की ये वही जानें लेकिन मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी में हिंदुत्व और हिंदू महापुरुषों को लेकर एक भ्रम की स्थिति है जिसका प्रदर्शन उस पार्टी के नेता नियमित अंतराल पर करते रहते हैं। खैर हम राजनीति की बात नहीं करके पुस्तक और कल्याण पत्रिका को केंद्र में रखकर चर्चा करेंगे। 

गीता प्रेस की स्थापना 1923 में हुई। उस समय को याद करना चाहिए। भारत अंग्रेजों के अधीन था। उसके पहले हमारा देश मुगलों और अन्य आक्रांताओं की यातनाओं को झेल चुका था। भारतीय संस्कृति को लगातार मिटाने के प्रयास मुगलकाल में भी हुए और अंग्रेजों ने भी उसको आगे बढ़ाया। ऐसे कठिन समय में गीता प्रेस की स्थापना हुई। हिंदू धार्मिक ग्रंथों के इस प्रकाशन गृह ने हिंदुओं को बेहद सस्ते दामों पर अपने पौराणिक ग्रंथों से परिचय करवाया। गीता प्रेस के योगदान को इस दृष्टि से भी देखे जाने की आवश्यकता है कि इसने स्वाधीनता संग्राम के लिए देश के जनमानस को तैयार किया। भारतीय पौराणिक ग्रंथों का प्रकाशन और उसको जन-जन तक पहुंचाकर गीता प्रेस ने जो कार्य किया है उसके समांतर विश्व इतिहास में कम उदाहरण मिलते हैं। इन ग्रंथों को पढ़कर, धर्म के प्रति, न्याय के प्रति, अपने अधिकारों के प्रति, समाज के प्रति और देश के प्रति जनता के मन जो भावना जाग्रत हुई उसके आकलन के बिना गीता प्रेस और उसके योगदान पर लिखा नहीं जा सकता है। यह तो भारतीय इतिहास लेखन की दोषपूर्ण पद्धति रही है कि उसने हिंदू धर्म से जुड़ी संस्थाओं और संस्थानों के योगदानों की चर्चा तक नही की। अगर कहीं उल्लेख करने की मजबूरी हुई तो एक पंक्ति में लिख दिया। आज फ्रांस के प्रकाशक गालीमर की चर्चा पूरी दुनिया में होती है क्योंकि उस देश के लेखकों ने इस प्रकाशन गृह के बारे में, उसके योगदान के बारे में लिखा लेकिन गीता प्रेस को धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन करार देकर उसको हाशिए पर डालने का प्रयास हुआ। 

गीता प्रेस से प्रकाशित पत्रिका कल्याण में प्रेमचंद से लेकर निराला तक ने लेख लिखे हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने इसकी चर्चा तक नहीं की। यहां तक की जब इन लेखको का मूल्यांकन करते हुए आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी गईं तो कल्याण में प्रकाशित उनके लेखों  की उपेक्षा की गई। अगर निराला और प्रेमचंद के कल्याण में प्रकाशित लेखों को सामने रखा जाता तो उनको वामपंथी विचार का लेखक सिद्ध करने में परेशानी होती। वो भारतीय विचारों के लेखक के तौर पर देश के सामने होते। प्रेमचंद ने कल्याण के कृष्णांक में जो लेख लिखे थे वो गीता प्रेस से पुस्तकाकार प्रकाशित है और अब भी बाजार में उपलब्ध हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े नंददुलारे वाजपेयी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, चतुरसेन शास्त्री और बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे दिग्गज रचनाकार कल्याण पत्रिका के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार के संपर्क में थे। नंददुलारे वाजपेयी ने तो 24.12.1931 के अपने पत्र में लिखा भी, कल्याण के द्वारा आप समाज की जो सेवा कर रहे हैं वो मुझे बहुत अच्छी लगती है। आपने महर्षि शंकराचार्य आदि के मूल्यावान ग्रंथों की प्रकाशन व्यवस्था करके हिंदी पर बड़ा उपकार किया है। 

गीता प्रेस और कल्याण पत्रिका ने सनातन संस्कृति को बल देने का कार्य भी किया। देश सैकड़ों वर्षों से गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ था। सनातन पर दूसरी संस्कृति को थोपने के लगातार प्रयास हो रहे थे। ऐसे वातावरण में सनातनी ग्रंथों का प्रकाशन और सनातनी विचारों से पूर्ण पत्रिका कल्याण के द्वारा गीता प्रेस ने औपनिवेशिक ताकतों का प्रतिकार किया। कल्याण पत्रिका ने न केवल सनातनी संस्कृति को बल दिया बल्कि उसने हिंदी भाषा के क्षितिज का भी विस्तार किया। जब देश में अंग्रेज शासक उर्दू को बढ़ावा दे रहे थे तो कल्याण के जरिए और अपने प्रकाशनों के जरिए गीता प्रेस हिंदी को मजबूती प्रदान कर रही थी। 1932 के 12 मार्च को बनारसीदास चतुर्वेदी ने हनुमान प्रसाद पोद्दार को एक पत्र लिखकर कहा कि कल्याण के 16 हजार ग्राहक हैं। यदि आप उसके मूल्य में चार आने की भी वृद्धि कर दें और उस चार हजार रुपयों से हिंदी के लेखकों से अच्छे लेख लिखाने और अनुवाद आदि कराने में व्यय करे तो अनेक लेखकों का आप उद्धार कर सकते हैं। अपने इसी पत्र में चतुर्वेदी जी ने हनुमानप्रसाद पोद्दार जी को स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी का अनुसरण करने की सलाह दी और लिखा, स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी को मैं सच्चा आस्तिक और भक्त मानता हूं। इस पंक्ति से भी एजेंडा लेखन की पोल खुलती है जो गणेश शंकर विद्यार्थी को वामपंथी सिद्ध करते रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि गीता प्रेस गोरखपुर के योगदान का मूल्यांकन समग्रता में किया जाए। 

इस पूरे प्रकरण से एक बात और स्पष्ट हो गई है कि वर्तमान समय में जो विचारधारा का संघर्ष चल रहा है उसमें पुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। कर्नाटक चुनाव के पहले देवारुण महादेव की एक पतली सी पुस्तक आई थी आरएसएस, द लांग एंड शार्ट आफ इट। इस पुस्तक का फोरवर्ड रामचंद्र गुहा ने आफ्टरवर्ड योगेन्द्र यादव ने लिखा था। कवर पर हिंदी लेखिका गीतांजलिश्री की टिप्पणी प्रकाशित थी। कन्नड में लिखी गई इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया गया। चुनाव के पहले प्रदेश में माहौल बनाने के लिए इस पुस्तक को चर्चित करने और पाठकों तक पहुंचाने का उपक्रम किया गया। जैसा कि इस पुस्तक के नाम से जाहिर है कि इसका केंद्रीय विषय राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ है। इसमें लेखक ने राष्ट्रीय संव्यंसेवक संघ के कार्यक्रमों की आलोचना की। कुछ गलत तथ्यों के साथ भी। जब देश के तथाकथित बड़े लेखक और इतिहासकार उसकी चर्चा करते हैं तो आम पाठकों के बीच उस पुस्तक को लेकर एक उत्सुकता पैदा होती है। यह सही है कि पुस्तकों का चुनावी राजनीति पर सीधा असर नहीं होता है लेकिन पुस्तकों में प्रकाशित विचार मतदाताओं को परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इस वक्त विचारधारा विशेष के लेखक और बुद्धीजीवी पुस्तकों के माध्यम से राजनीति करने में लगे हैं और उनको हिंदी और अंग्रेजी के कुछ प्रकाशकों का साथ भी मिल रहा है। वैकल्पिक विचारधारा के लेखकों को भी पुस्तक का उत्तर पुस्तक से ही देना होगा।    


Saturday, June 17, 2023

उद्देश्य बदलने की आवश्यकता


आज देश की राजनीति में नेहरू से जुड़ा कोई प्रसंग अगर आता है तो उसपर फौरन राजनीति आरंभ हो जाती है। पक्ष विपक्ष के बीच बयानों के तीर चलने लगते हैं। कुछ दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है। ताजा मामला नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय से जुड़ा हुआ है। दिल्ली के इस परिसर का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय कर दिया गया है। उसी परिसर में नेहरू समेत भारत के सभी प्रधानमंत्रियों का एक विश्वस्तरीय संग्रहालय बनाया गया था। इसके आधार पर ही नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय सोसाइटी के सदस्यों ने इसका नाम बदलने का निर्णय लिया। कांग्रेस के नेता सोसाइटी के इस कदम से आगबबूला हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने लंबा ट्वीट लिखकर इसपर अपनी आपत्ति जताई और भारतीय जनता पार्टी को निशाने पर लिया। ये तो हुई राजनीति की बातें। जब भी किसी जिले, शहर, भवन या रोड आदि का नाम बदला जाता है उसपर विवाद उठते ही रहते हैं। बयानबाजी और राजनीति भी होती ही है। ये तो स्वाधीनता के बाद से ही चलता आया है। कांग्रेस की इस बात लेकर आलोचना होती रही है कि देशभर में सैकड़ों सड़कों, भवनों, संस्थानों आदि के नाम नेहरू, इंदिरा, राजीव और संजय गांधी के नाम पर रखे गए। बाद की सरकारों ने भी अपने नेताओं या अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों के नाम पर भवनों, सड़कों आदि के नाम रखे। कभी कम तो कभी अधिक विवाद हुए। लेकिन आज हम बात कर रहे हैं नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय के नाम बदले जाने पर उठे विवाद की। 

पहले जान लेते हैं कि नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय किन परिस्थियों में और किन उद्देश्यों को लेकर बनाया गया था। नेहरु की कैबिनेट में शिक्षा मंत्री रहे मोहम्मदअली करीम छागला की आत्मकथा है रोजेज इन दिसंबर। ये पुस्तक भारतीय विद्या भवन से प्रकाशित है। इसमें छागला ने नेहरू के कालखंड की बहुत सारी स्मृतियों को सहेजा है। उन्होंने स्वाधीन भारत में इतिहास लेखन आरंभ करने के प्रसंग पर भी लिखा है। छागला औपनिवेशिक इतिहासकारों के लिखे से संतुष्ट नहीं थे। देश के इतिहास को नए सिरे से लिखवाने के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में लेक्चरर रहीं मिस थापर को चुना था। छागला के मुताबिक मिस थापर तर्कवादी और आधुनिक सोच वाली महिला थीं। पूर्वाग्रह से भी मुक्त। उन्होंने इतिहास की दो पुस्तकें तैयार की। इसके अलावा वो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना की कहानी भी बताते हैं। लिखते हैं कि, ‘नेहरू के निधन के बाद मैंने ये व्यवस्था की कि तीन मूर्ति भवन का एक हिस्सा उसी तरह से संजोया जाए जिस तरह  नेहरू के जीवित रहते हुआ करता था। मैं चाहता था कि पूरे भारवर्ष से लाखों लोग आएं और इस घऱ को राष्ट्र मंदिर के तौर पर देखें। उस वक्त के राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने एक भव्य समारोह में तीनमूर्ति भवन को इस उद्देश्य के लिए समर्पित किया। लेकिन मैं ये नहीं चाहता था कि ये सिर्फ एक संग्रहालय के तौर पर रहे मृतप्राय स्थिति में रहे बल्कि मेरी इच्छा थी कि ये विचार और आदर्श के जीवंत केंद्र के रूप मे विकसित हो। इसको ध्यान में रखते हुए वहां एक पुस्तकालय की स्थापना की गई। इस पुस्तकालय में आधुनिक भारत की प्रगति से संबंधित पुस्तकें और सामग्री रखने की योजना बनी। इसको ध्यान में रखते हुए इस विषय से संबंधित उपलब्ध पुस्तकों को जुटाया गया। छात्रों को पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया। उन लोगों के अनुभवों को टेप पर रिकार्ड किया गया जो नेहरू से मिले थे। अब समस्या थी एक ऐसे निदेशक को खोजने की जो इस तरह के कार्यों में रुचि रखता हो। फिर मेरी नजर रेल मंत्रालय में काम करनेवाले श्रीमान नंदा पर नजर गई। उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं, जो मैंने देखी थीं। मैंने उनको नेहरू संग्रहालय में नियुक्त कर दिया।‘ इस प्रसंग को बताने के क्रम में वो ये भी स्वीकार करते हैं कि नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना के बाद देश में इतिहास लेखन को प्रोत्साहन मिला।

छागला की आत्मकथा के इस प्रसंग के कई बातें ध्वनित होती हैं जो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की स्थापना के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हैं। एक तो ये कि उस वक्त की सरकार नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय को राष्ट्र मंदिर के तौर पर स्थापित करना चाहती थी। एक ऐसा राष्ट्र मंदिर जहां नेहरू देवता के तौर पर स्थापित हों और देश की जनता उनको और उनके विचारों की पूजा करे। छागला ने जो लिखा है उससे स्पष्ट है कि इस केंद्र को इतिहास लेखन के केंद्र के रूप में विकसित करने की भी योजना बनी। इतिहास लिखा भी गया। किस तरह का इतिहास लिखा गया ये सबको पता है। अगर आप किसी व्यक्ति को केंद्र में रखकर राष्ट्र मंदिर बनाएंगे तो वहां लिखा जाने वाला इतिहास भी तो उस व्यक्ति की महत्ता को स्थापित करने के कार्य में जुटेगा। ठीक से याद नहीं है लेकिन किसी अन्य पुस्तक में इस बात भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी भी चाहती थीं कि तीन मूर्ति किसी भी कीमत पर सरकार के पास नहीं जाए और वहां नेहरू से जुड़ी चीजें आदि रखी जाएं। रही बात इसको आदर्श वैचारिक केंद्र बनाने की तो वो ये केंद्र कभी बन नहीं पाया। यहां के जो भी निदेशक हुए उनमें से अधिकतर ने जो कार्य करवाए उसके केंद्र में नेहरू और कांग्रेस रही। ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए एक उदाहरण देता हूं। 2011 में कांग्रेस पार्टी के इतिहास पर केंद्रित दो खेंडो में पुस्तक आई। नाम था कांग्रेस एंड द मेकिंग आफ द इंडियन नेशन। इस पुस्तक के प्रधान संपादक थे प्रणब मुखर्जी और इसको तैयार करने में मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी और अन्य की भूमिका थी। अब जरा जान लीजिए कि मृदुला मुखर्जी कौन हैं। वो नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय की निदेशक थीं। उनको सोनिया गांधी का आशीर्वाद प्राप्त था। जब रामचंद्र हुहा के नेतृत्व में उनको नेहरू मेमोरियल के निदेशक पद से हटाने की मुहिम चली थी तो उन्होंने एक प्रसंग में कहा था कि उनको सोनिया गांधी का मैंडेट प्राप्त है। तब ये प्रश्न मुखरता से नहीं उठा था कि सोनिया गांधी ने किस हैसियत से नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय के निदेशक को मैंडेट दिया था। इस प्रसंग का उल्लेख इस कारण कर रहा हूं कि छागला ने जिस सोच के साथ नेहरू स्मारक औऐर संग्रहालय की स्थापना की थी उसको कालांतर में खाद पानी डालकर पोसा गया। नेहरू संग्रहालय और पुस्तकालय के अलावा नेहरू स्मारक निधि भी उसी परिसर से चलता है। इस निधि से शोध करने के लिए भी धन दिया जाता है। इस निधि से शोध करनेवाले शोधार्थियों की सूची और उनके विषयों पर नजर डाल लीजिए पता चल जाएगा कि कैसे एक परिवार और पार्टी विशेष को केंद्र में रखकर इसको चलाया जा रहा था। 

अभी तो नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय का नाम बदला गया है। सोसाइटी को ये निर्णय करना चाहिए कि भारत के सभी प्रधानमंत्रियों के कालखंड में देश को प्रभावित करने या दिशा देनेवाली घटनाएं घटी हैं उनपर शोध हो। उनका दस्तेवाजीकरण किया जाए। उन घटनाओं से जुड़े लोगों के साक्षात्कार रिकार्ड करवाकर इस पुस्तकालय में रखे जाएं ताकि आनेवाली पीढ़ियों के शोधार्थियों को देश के सभी प्रधानमंत्रियों के योगदान के बारे में जानकारी उपलब्ध हो सके। संस्कृति मंत्रालय के अधीन आनेवाले इस संस्थान को इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। देश के सभी प्रधानमंत्रियों ने इस राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दिया है। उनके विचारों को और उनके समय की परिस्थियों को जानने का अधिकार हर भारतीय को है। अगर ऐसा हो पाता है तो इस संग्रहालय के नाम बदलने की सार्थकता सिद्ध होगी अन्यथा तो बस राजनीति और बयानों के भंवर में ये मुद्दा खो जाएगा.

Saturday, June 10, 2023

कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक पर राजनीति


नई संसद के उद्घाटन को करीब एक पखवाड़ा होने को आया लेकिन सेंगोल पर प्रश्न अब भी उठ रहे हैं। स्वाधीनता के समय सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर सेंगोल को लार्ड मांउटबैटन को सौंपा गया था।फिर उनसे लेकर समारोहपूर्वक जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। सरकार का तर्क है कि सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर बनाया गया था। विपक्ष इसकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। कांग्रेस इस प्रसंग को कालपनिक बता रही है। 14 अगस्त 1947 का एक चित्र भी उपलब्ध है जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ में सेंगोल है और उनके साथ थिरूवावडुथुरई अधीनम के कुमारस्वामी तम्बीरमन खड़े हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की सलाह पर सेंगोल तैयार करने का दायित्व थिरूवावडुथुरई अधीनम को अनुरोधपूर्वक सौंपा गया था। जिस जूलर ने सेंगोल बनया था उसने भी इसको प्रमाणित कर दिया। अभी थिरूवावडुथुरई अधीनम की तरफ से एक लिखित बयान जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वो 1947 के सेंगोल समारोह का हिस्सा रहे हैं। सरकार के आमंत्रण पर थिरूवावडुथुरई अधीनम से संतों का एक समूह सेंगोल लेकर दिल्ली गया था। वहां सबसे पहले सेंगोल को लार्ड मनाउंटबेटन को सौंपा गया। माउंटबेटन से वापस लेकर सेंगोल का गंगाजल से अभिषेक करवाया गया। अभिषेक के बाद सेंगोल को जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। 

थिरूवावडुथुरई अधीनम के मुताबिक हाल ही में अधीनम का इतिहास प्रकाशित हुआ है। उस पुस्तक में सेंगोल सिरापु नाम से एक अध्याय है जिसमें भी इस बात का उल्लेख है कि सेंगोल को पहले लार्ड माउंटबेटन को सौंपा गया और उसके बाद जवाहरलाल नेहरू को। थिरूवावडुथुरई अधीनम से जुड़े मसीलामणि पिल्लै इस पूरे घटनाक्रम को अपनी आंखों से देख चुके हैं। वो इस वक्त 96 वर्ष के हैं और इस पूरे घटनाक्रम को सही बता रहे हैं। पिल्लै ने ये भी बताया कि सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण का पूरा कार्य चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पहल पर हुआ था। इस बात के भी प्रमाण हैं कि 1947 में मद्रास के कलेक्टर थिरूवावडुथुरई अधीनम आए थे और उन्होंने सेंगोल की व्यवस्था के कार्य को परखा था। कुछ लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि अगर माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था तो उसकी कोई तस्वीर क्यों नहीं है। अधीनम ने उसका भी उत्तर दिया है कि माउंटबेटन से मिलने संतों का जो समूह गया था उसमें कोई कैमरामैन नहीं था। सवाल ये उठता है कि थिरूवावडुथुरई अधीनम के दावों पर प्रश्न क्यों उठाए जा रहे हैं। जब उस पूरी घटना के दो जीवित गवाह हैं जो ये कह रहे हैं कि माउंटबेटन को सेंगोल सौंपा गया था उसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया। उनके बयान के बाद संदेह की गुंजाइश बचती कहां है। सेंगोल से सत्ता हस्तांतरण की परंपरा चोल राजवंश में थी उसको स्वतंत्र भारत में सनातन से जोड़कर अपनाया गया। समाज के उस हिस्से को सेंगोल बनाने और सत्ता हस्तांतरण समारोह की जिम्मेदारी दी गई जो गैर ब्राह्मण थे, लेकिन शिव और सनातन में उनकी आस्था थी। थिरूवावडुथुरई अधीनम तमिलनाडू के शिवभक्तों का एक बड़ा और प्रभावशाली समूह है। इस समुदाय को स्वाधीन देश से जोड़ने का चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का सोच था जिसको माउंटबेटन से लेकर नेहरू तक ने माना था।   

सेंगोल की कहनी पर प्रश्न उठ रहे हैं तो पंडित नेहरू से जुड़ा एक और प्रसंग याद आ रहा है। उस प्रसंग को बताने के पहले नेहरू के बारे में आधुनिक भारत के इतिहासकारों की राय देखते हैं। लगभग सभी इतिहासकारों ने इस बात पर बल दिया है कि नेहरू धर्म को शासन से अलग रखना चाहते थे। उनकी छवि भी इसी प्रकार से गढ़ी गई कि वो सरकारी कामों से धर्म को अलग रखना चाहते थे। इतिहासकारों से इस आकलन में चूक हुई। नेहरू सत्ता में बने रहने के लिए इस तरह का कार्य किया करते थे। जब उनको लगता था कि सत्ता के लिए या राजनीति के लिए धर्म का उपयोग आवश्यक है तो वो बिल्कुल नहीं हिचकते थे। अब उस प्रसंग पर आते हैं जिससे ये बात साफ भी हो जाएगी। तिथि 14 अगस्त 1947। शाम के समय डा राजेन्द्र प्रसाद के घर पूजा और हवन आदि का आयोजन किया गया। हिंदू पुरोहितों को बुलाया गया था कि वो हवन आदि करवाएं। भारत की नदियों से पवित्र जल मंगवाए गए थे। डा राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू हवन कुंड के सामने बैठे थे और वहां उपस्थित महिलाओं ने दोनों के माथे पर चंदन का तिलक लगाया। फिर नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद ने हवन आदि किया। पूजा और हवन के पहले नेहरू ने सार्वजनिक रूप से ये स्टैंड लिया था कि उनको ये सब पसंद नहीं है। तब उनके कई मित्रों ने समझाया कि सत्ता प्राप्त करने का हिंदू तरीका यही है। नेहरू इस हिंदू तरीके को अपनाने को तैयार हो गए। इसका उल्लेख ‘आफ्टरमाथ आफ पार्टिशन इन साउथ एशिया’ नाम की पुस्तक में मिलता है। कई अन्य जगहों पर भी। बावजूद इसके आधुनिक भारत के अधिकतर इतिहासकारों ने नेहरू के व्यक्तित्व को धर्म से निरपेक्ष व्यक्तित्व के तौर पर गढ़ा। 

नेहरू से जुड़ा एक और किस्सा है। 1952 में लोकसभा का चुनाव चल रहा था। नेहरू उत्तर प्रदेश के फूलपुर में एक स्थान पर चुनावी सभा कर रहे थे। तभी उसी रास्ते से स्थानीय राजा अपने हाथी पर सवार होकर निकले। नेहरू की सभा के कारण राजा और उनके हाथी को रोक दिया गया। राजा नाराज हो गए। मंच पर बैठे नेहरू को जब इस बात का पता चला तो वो वहां से उतरकर राजा के पास पहुंचे। वहां पहुंचकर नेहरू ने महाराज की जय हो कहकर उनका अभिवादन किया। राजा खुश हो गए। हाथी से उतरकर नेहरू के साथ मंच पर गए और सभा में उपस्थित जनता से नेहरू को वोट देने की अपील कर दी। उसके बाद राजा वहां से चले गए। राजा के जाने के बाद नेहरू ने उस अधिकारी को समझाया कि राजा को जयकारे की जरूरत थी और और मुझको वोट की। मैंने राजा की इच्छा पूरी की और उन्होंने मेरी। इसी तरह से लेनार्ड मोस्ले की 1961 में प्रकाशित पुस्तक द लास्ट डेज आफ ब्रिटिश राज में इस बात का उल्लेख मिलता है कि नेहरू रेडक्लिफ को भारत पाकिस्तान के सीमा निर्धारण के लिए अधिक समय देने के पक्ष में नहीं थे। उनको लगता था कि जल्द से जल्द भारत की स्वाधीन सरकार बने। सीमा निर्धारण बाद में दोनों देश आपसी सहमति से कर लेंगे। परिणाम सबके सामने है। 

सेंगोल प्रकरण में प्रश्न तो ये उठाया जाना चाहिए कि भारत के इतिहास का इतना महत्वपूर्ण अध्याय क्यों दब या दबा दिया गया। सेंगोल जैसा महत्वपूर्ण प्रतीक राष्ट्रीय संग्रहालय में न होकर प्रयागराज के संग्रहालय में क्यों और कैसे पहुंचा। सनातन को मानने वाले समाज के पिछड़े वर्ग के समूह अधीनम को प्रतिनिधित्व देने के राजा जी की इंक्लूसिव सलाह को इतिहास के पन्नों में गुम करने का षडयंत्र किसने रचा। देश इन प्रश्नों का उत्तर चाहता है। कहानियों में उलझाने से बेहतर है कि इन प्रश्नों पर बात हो। 

Saturday, June 3, 2023

नसीरुद्दीन शाह का बुढ़भस


तीन-चार वर्ष पूर्व की बात है।फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने एक साहित्योत्सव में कहा था कि वो फिल्मों में इस कारण आए थे क्योंकि वो लोकप्रिय होना चाहते थे। नसीरुद्दीन शाह इतने पर ही नहीं रुके थे बल्कि यहां तक कहा था कि वो फिल्मों के माध्यम से कला की सेवा करने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में नहीं आए थे बल्कि वो तो लोकप्रियता चाहते थे। जो लोग फिल्मों में आने का कारण कला की सेवा बताते हैं वो झूठ बोलते हैं। सचाई ये है कि लोग फिल्मों में धन कमाने और प्रसिद्ध होने के लिए आते हैं। ये वो व्यक्ति बोल रहा था जिनको श्रेष्ठ कलाकार और कला को नई ऊंचाई पर पहुंचानेवाला अभिनेता आदि कहा जाता रहा है। नसीरुद्दीन शाह के इस वक्तव्य के कुछ महीनों पहले उनकी पुस्तक आई थी। दरअसल देश में पिछले कई वर्षों से एक ट्रेंड चल रहा है कि जिन फिल्मी कलाकारों को काम नहीं मिलता है या कम काम मिलता है वो पुस्तक लिख देते हैं। पुस्तक लिखने का एक फायदा यह होता है कि उनको बुद्धीजीवी मान लिया जाता है और दूसरा कि उनको साहित्योत्सवों में आमंत्रित किया जाने लगता है। साहित्योत्सवों से एक अलग प्रकार की लोकप्रियता मिलती है। तो नसीरुद्दीन शाह को जब काम कम मिलने लगा तो उन्होंने भी पुस्तक लिख दी। कई साहित्योत्सवों में बुलाए गए। वहां विवादित बयान देकर चर्चित हुए। पुस्तक भी खूब बिकी। इस बात को भी कई वर्ष बीत गए। उनकी कोई दूसरी पुस्तक नहीं आई तो साहित्योत्सवों से आमंत्रण मिलना बंद हो गया। अब उन्होंने चर्चित होने का एक नया तरीका निकाला। समय समय पर विवादित बयान देने लगे। कभी देश में डर का माहौल बताने लगे तो तो कभी इस भय के वातावरण के कारण अपने बच्चों की चिंता जताने लगे। कभी अनुपम खेर को जोकर कह दिया तो कभी अन्य साथी कलाकारों पर घटिया टिप्पणी कर दी। इंटरनेट मीडिया के इस युग में इस तरह के विवादित बयानों को प्रचलित होते देर नहीं लगती है और पक्ष विपक्ष में बयानवीर खड़े हो जाते हैं। 

जब नसीर को फिल्मों में कम काम मिलने लगा तो उन्होंने ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स की ओर रुख किया। जब उनकी कोई बेव सीरीज रिलीज होती तो फिर वो सामने आते और विवादित बातें कहकर चर्चा में बने रहने का प्रयास करते। अभी जब उनकी वेब सीरीज ताज,रेन आफ रिवेंज आई तो एकबार फिर से नसीर को इंटरव्यू आदि देने का अवसर मिला। इस बार नसीरुद्दीन शाह को तो डर नहीं लगा बल्कि इस बार वो इस बात को रेखांकित करते दिखे कि हिंदी फिल्मों के बड़े कलाकार भयभीत हैं। इसके अलावा वो नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का भी उपहास उड़ाते नजर आए। नसीर ने प्रश्न उठाया कि नए संसद के उद्घाटन के समय इस तरह के भव्य समारोह की क्या आवश्यकता थी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लिए बिना यहां तक कह दिया कि देश के सुप्रीम नेता स्वयं के लिए स्मारक बनवा रहे हैं। उनको इस बात पर भी आपत्ति है कि संसद के शुभारंभ समारोह में नरेन्द्र मोदी हाथ में धर्म दंड लिए पुजारियों से क्यों घिरे हुए थे। उपहास के अंदाज में कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ब्रिटेन का राजा बिशपों के साथ चल रहा हो। अब नसीरुद्दीन शाह को भारतीय परंपराओं के बारे में कौन समझाए। जब उनका मूल उद्देश्य ही प्रचार पाना हो तो वो उस प्रकार की बातें ही करते हैं जो हेडलाइन बने और इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो सके। उनको शायद ये ज्ञात नहीं होगा कि जब देश को स्वाधीनता मिली थी तो जवाहरलाल नेहरू ने भी डा राजेन्द्र प्रसाद के घऱ पर पूजा पाठ की थी। देशभर की नदियों के जल का छिड़काव करवाया गया था। पूजा-पाठ के उस कार्यक्रम के बाद जवाहरलाल नेहरू, डा राजेन्द्र प्रसाद और अन्य स्वाधीनता सेनाननियों के साथ संविधान सभा की बैठक में भाग लेने गए थे। जब आपको अपने देश की परंपरा का बोध न हो और आलोचना करके प्रसिद्धि हासिल करना उद्देश्य हो तो इस तरह के अनर्गल बातें ही की जा सकती हैं। जब उनसे ये पूछा गया कि शाह रुख खान ने तो संसद भवन और उसकी भव्यता की प्रशंसा की तो उन्होंने खामोशी ओढ़ ली।

नसीरुद्दीन शाह मुंह खोलें और डर की बात न करें ये तो संभव ही नहीं है। शाह रुख और आमिर जैसे अभिनेताओं को भी 2014 के बाद इस देश में डर लगा था लेकिन अब वो भयमुक्त होकर काम कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी का विरोध करनेवाले आमिर खान न केवल प्रधानमंत्री मोदी से मिलते हैं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से मिलने-जुलने में उनको किसी प्रकार का परहेज नहीं है। एक नसीरुद्दीन शाह बचे हैं जिनको अब भी लगता है कि हिंदी फिल्मों के जिन लोगों की बातों में वजन है वो किसी डर से चुप हैं। नसीरुद्दीन शाह इस बात को लेकर चिंतित नजर आते हैं कि इस समय देश में एजेंडा और प्रोपगैंडा वाली फिल्में बन रही हैं और हिंदी फिल्मों के दिग्गज किसी अनजान डर से इसके विरोध में चुप हैं। नसीर साहब इस बात को भूल गए कि जब वो समांतर सिनेमा के दौर में प्रसिद्धि पा रहे थे तो उन फिल्मों में किस विचारधारा का एजेंडा चल रहा था। उस समय तो वो सफल थे, उनकी बातों का वजन और असर होता। तब तो उनको न तो एजेंडा दिखा और न ही प्रोपेगैंडा। उस दौर के पहले जाएं तो जब ख्वाजा अहमद अब्बास के नेतृत्व में अभिनेताओं की टीम सोवियत रूस जाकर वहां कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थे। वहां की सरकार के आतिथ्य का आनंद उठाती थी और लौटकर उनकी विचारधारा के आधार पर फिल्में बनाती थी। उसके बारे में कभी नसीरुद्दीन शाह ने कुछ नहीं बोला। इसको कहते हैं चुनिंदा चुप्पी या चुनिंदा मसलों पर प्रतिक्रिया देना। इस तरह की बातें अब देश की जनता समझने लगी है। समझ तो इनका एजेंडा भी आ गया है। 

नसीरुद्दीन शाह के बारे में जावेद अख्तर और सलीम खान की राय एक है। दोनों का मानना है कि नसीर कुंठा में इस तरह के बयान देते हैं। दरअसल कुछ वर्षों पूर्व नसीरुद्दीन शाह ने राजेश खन्ना को औसत कलाकार कहकर उनका मजाक उड़ाया था। तब जावेद अख्तर ने स्पष्टता के साथ कहा था कि ‘नसीर साहब को कोई सक्सेसफुल आदमी पसंद नहीं है। अगर कोई पसंद हो तो नाम बताएं कि ये आदमी मुझे अच्छा लगता है क्योंकि वो सक्सेसफुल है। मैंने तो आज तक नहीं सुना। वो दिलीप कुमार को क्रिटिसाइज करते हैं, अमिताभ बच्चन को क्रिटिसाइज करते हैं, हर आदमी जो सक्सेसफुल है उनको अच्छा नहीं लगता है।‘ लगभग उसी समय सलीम खान ने भी नसीरुद्दीन शाह को कुंठित और कड़वा व्यक्ति कहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि सलीम खान और जावेद अख्तर का नसीरुद्दीन शाह पर दिया गया बयान ठीक था। वो इस बात से कुंठित हो सकते हैं कि उनकी ही आयु के अनुपम खेर इस वक्त भी अलग अलग तरह की भूमिकाएँ कर रहे हैं और व्यस्त हैं। उनसे बड़ी आयु के अमिताभ बच्चन को अब भी काम मिल रहा है जबकि नसीरुद्दीन शाह को फिल्म इंडस्ट्री में बहुत कम लोग पूछ रहे हैं। हिंदी फिल्मों की दुनिया इस मायने में बहुत ही निर्मम है कि अगर किसी अभिनेता को दर्शक पसंद नहीं कर रहे हैं या उनकी फिल्में सफल नहीं हो पा रही हैं तो उनकी तरफ देखते भी नहीं हैं, उनके साथ फिल्म करना तो बहुत ही दूर की बात है। नसीर को ये समझना होगा। 


Friday, June 2, 2023

मिलन की वो रैना


3 जून 1973 को फिल्मों के महनायक और अभिनेत्री जया बच्चन की शादी हुई थी। 50 वर्ष पहले बांबे (अब मुंबई) में दोनों परिणय सूत्र में बंधे थे। अमिताभ की शादी में हरिवंश राय बच्चन के कुछ मित्र शामिल हुए थे। अमिताभ के दोस्त संजय गांधी भी। बारात निकलने के पहले पंडित नरेन्द्र शर्मा ने कहा कि दूल्हे को काजल का दिठौना लगना चाहिए। अमिताभ की मुंहबोली बहन नीरजा खेतान तैयार थीं। पुष्पा भारती ने लिखा है कि नीरजा ने जैसे ही काजल की डिबिया में अपनी ऊंगली डाली, उसकी आंखों में एक शरारती चमक तैर गई। तेजी जी ने उसको भांपते हुए कहा कि तेरा नेग तुझे मुंहमांगा मिल जाएगा, कोई शरारात मत करना। छोटा सा दिठौना लगा। बच्चन जी के अमिताभ को तिलक लगाने के बाद बारात मालाबार हिल के लिए चल पड़ी। संयोग ये था कि हिंदी के प्रसिद्ध लेखक भगवती चरण वर्मा बच्चन जी की शादी समारोह में भी थे और अब अमिताभ और जया को आशीर्वाद देने के लिए भी उपस्थित थे। 

बारात चली तो अजिताभ और संजय गांधी अपनी गाड़ी को लेकर बहुत तेज चलने लगे। पीछे की गाड़ियां भी तेज रफ्तार पकड़ने लगी तो भगवती बाबू ने एकदम से कहा कि बारात को धीरे-धीरे चलना चाहिए। उनके इतना कहते ही धर्मवीर भारती ने गाड़ी धीरे चलानी शुरू कर दी। आराम से मालाबार हिल्स पहुंचे। द्वारपूजा के बाद हल्की बारिश शुरु हो गई तो किसी ने कहा कि लगता है कि जया ने बचपन में कड़ाही की खुरचन चाटी है तभी ब्याह के समय पानी बरसने लगा है। खुशनुमा माहौल था। जया के मुंहबोले भाई गुलजार भी अपनी नई नवेली दुल्हन राखी के साथ मौजूद थे। छत पर बने विवाह मंडप में रस्में होने लगीं। जब अग्नि के फेरे का समय आया तो जया की बहन नीता अपनी बहन का लहंगा संभालने के चक्कर में दो फेरे लगा गईं। ये देख तेजी बच्चन ने कहा अगर नीता इस तरह से सात फेरे ले लेगी तो उसपर भी अमित का हक हो जाएगा। इतना सुनते ही मंडप ठहाकों से गूंज उठा और नीता ने फौरन जया का लहंगा छोड़ा और बैठ गई। एक और दिलचस्प वाकया हुआ। मंडप पर धान की रस्म के समय दुल्हन के भाई गुलजार की खोज शुरु हुई लेकिन वो कब के निकल चुके थे। पुष्पा जी ने लिखा था, नई नवेली खूबसूरत पत्नी और मौसम की पहली फुहार। इतनी देर तक कहां...। विवाह संपन्न हुआ। बारात के पहले बहन ने भाई को काजल का जो दिठौना लगाया था उसने आजतक भाई को बुरी नजर से बचाकर रखा है।  


Saturday, May 27, 2023

हिंदी पुरस्कारों पर उदासीन केंद्र सरकार


आज संसद के नए भवन का शुभारंभ होनेवाला है। उसपर जमकर राजनीति हो रही है। कई विपक्षी दल इसके उद्घाटन समारोह के बहिष्कार की घोषणा कर चुके हैं तो कई दल समर्थन में हैं। इस बीच गृह मंत्री अमित शाह ने स्वाधीनता के बाद सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक सेंगोल के बारे में देश की जनता को बताया। इसके बाद सेंगोल को लेकर भी पक्ष विपक्ष में दलीलें दी जाने लगीं। कुछ लोगों ने सेंगोल की महत्ता पर प्रश्न खड़े कर दिए। सेंगोल की परंपरा को जब चोल सम्राज्य से जोड़ा गया तो कथित लिबरल और सेक्यूलर बुद्धिजीवियों ने इसको हिंदू राष्ट्र से जोड़ दिया। यहां वो ये भूल गए कि सत्ता के हस्तांतरण के समय इस तरह के दंड को सौंपने का विधान हमारे देश में सदियों से रहा है। महाभारत के शांति पर्व में विस्तार से इस बारे में चर्चा है। कर्नाटक के हंफी के विरुपाक्ष मंदिर में नटराज की मूर्ति के साथ सेंगोल भी है, जिसके शीर्ष पर नंदी की आकृति है। बताया जाता है कि ये मंदिर सातवीं शताब्दी का है। सेंगोल की परंपरा हमें ग्रंथों और मूर्तियों में मिलते हैं। इस पर अनावश्यक विवाद है। जब विवाद अनावश्यक होते है तो शोरगुल ज्यादा होता है।संसद के उद्घाटन और सेंगोल की प्रामाणिकता के शोरगुल में एक महत्वपूर्ण मुद्दा दब गया। सियासी शोर में भाषा के मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं। 

भारतीय भाषाओं के विस्तार और उसको समृद्ध करने के लिए कई संस्थाएं कार्य करती हैं। इनमें हिंदी से जुड़ी संस्थाएं भी हैं जो अन्य कार्यों के अलावा हिंदी और गैर हिंदी भाषियों को हिंदी में श्रेष्ठ लेखन के लिए पुरस्कृत करती रही हैं। ऐसी ही एक संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय। ये भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग के अंतर्गत आती है। 17 मई 2023 को इस संस्था ने एक महत्वपूर्ण सूचना जारी की। विषय़ था शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत विभिन्न भाषाओं द्वारा दिए जा रहे पुरस्कारों का युक्तिकरण-हिंदी भाषा में पुरस्कारों को बंद करने के सबंध में। इस सूचना में बताया गया कि भाषा प्रभाग, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, दिल्ली के उपसचिव के निदेश पत्रांक एफ संख्या 8-86/2015/एल-II दिनांक 4 मई 2023 की अनुपालना के परिप्रेक्ष्य में सर्वसाधारण को सूचित करने का निदेश हुआ है कि शिक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा शिक्षा पुरस्कार योजना तथा हिंदीतर भाषी लेखक पुरस्कार योजना के अंतर्गत दिए गए पुरस्कारों को समाप्त करने का निर्णय लिया है। यानि कि पिछले कई वर्षों से दिए जा रहे इन पुरस्कारों को भारत सरकार ने बंद कर दिया। बताया जा रहा है कि इसी तरह से केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के पुरस्कारों को भी शिक्षा मंत्रालय ने बंद कर दिया है। केंद्रीय हिंदी संस्थान भी हिंदी सेवियों के अलावा गैर हिंदी भाषियों को हिंदी में श्रेष्ठ कार्य करने के लिए पुरस्कृत करती है। प्रवासी लेखकों को भी। केंद्रीय हिंदी संस्थान के पुरस्कार बेहद सम्मानित माने जाते हैं। ये राष्ट्रपति के हाथों दिए जाते थे जो परंपरा कई वर्षों से बंद है। संस्थान से सुब्रह्मण्य भारती, दीनदयाल उपाध्याय, सरदार वल्लभ भाई पटेल, गंगा शरण सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महानुभावों के नाम से वर्षों से दिए जा रहे पुरस्कारों को बंद कर दिया गया। प्रश्न ये उठता है कि इन महत्वपूर्ण पुरस्कारों को बंद करने का निर्णय सरकार के स्तर पर हो गया या हिंदी भाषा के लिए कार्य कर रहे विद्वानों या इन संस्थाओं में शीर्ष पर बैठे लोगों से विमर्श किया गया। 

शिक्षा मंत्रालय की तरफ से इन संस्थानों को 4 मई 2023 को जो आदेश आया है उसमें लिखा है कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर राष्ट्रपति द्वारा दिए जानेवाले पुरस्कारों और अन्य भाषाई पुरस्कारों का युक्तिकरण किया जा रहा है। इस सिलसिले में शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में एक बैठक 15.11.2022 को हुई। इस बैठक में चर्चा के दौरान ये बात सामने आई कि हिंदी के लिए विभिन्न मंत्रालयों और संस्थाओं द्वारा पुरस्कार दिए जाते हैं। इसलिए शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय हिंदी संस्थान और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पुरस्कार के संबंध में किसी प्रकार की कार्यवाही न की जाए। कुछ इसी तरह का निर्देश राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद को भी प्राप्त हुआ है। उनको भी निर्देशित किया गया है कि वो अपने पुरस्कारों पर किसी तरह की कार्यवाही न करें। 

इन सूचनाओं से ये पता चलता है कि गृह मंत्रालय के निर्देश के आलोक में शिक्षा मंत्रालय ने हिंदी के पुरस्कारों को बंद करने का निर्णय लिया है। हैरानी की बात है कि गृह मंत्री अमित शाह हिंदी की व्याप्ति को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं और उनके ही मंत्रालय के निर्देश पर हिंदी और हिंदीतर भाषियों के पुरस्कारों को बंद किया जा रहा है। जब 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में आई थी तो उसके दो वर्ष बाद 2016 में केंद्रीय हिंदी संस्थानों के पुरस्कारों की राशि एक लाख रुफए से बढ़ाकर पांच लाख रुपए कर दी गई थी। तब उसका हिंदी जगत में स्वागत हुआ था। सात वर्षों में ऐसा क्या हो गया कि यही सरकार उन पुरस्कारों को बंद कर रही है। एक अनुमान के मुताबिक देश में हिंदी भाषियों की संख्या 60-70 करोड़ के करीब है। ऐसे में अगर अलग अलग मंत्रालय और संस्थाएं हिंदी सेवियों को पुरस्कृत करती हैं तो उसमें हानि क्या है। अगर इन पुरस्कारों को युक्तिसंगत करने के लिए बंद किया गया है तो हिंदी भाषी लोगों से इस बारे में चर्चा करनी चाहिए थी। 

एक तरफ गृह मंत्रालय हिंदी और हिंदीतर भाषा के पुरस्करों को बंद कर रही है दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाला एक बैंक 61 लाख रुपए के पुरस्कारों की घोषणा कर चुका है। पुरस्कारों के लिए उसकी लांगलिस्ट प्रकाशित हो चुकी है। ये अलग बात है कि बैंक का ये पुरस्कार अनुवाद के लिए है। हैरानी की बात है कि इस पुरस्कार के लांगलिस्ट में भी हिंदी में अनूदित कोई पुस्तक नहीं है। इस पुरस्कार की जूरी के सदस्यों के नाम देखने पर फिल्म द कश्मीर फाइल्स के एक संवाद का स्मरण होता है- सरकार कोई भी हो सिस्टम तो अपना ही चलता है। इस पुरस्कार की जूरी में बुकर पुरस्कार से सम्मानित और वैचारिक रूप से वामपंथ के साथ गीतांजलिश्री, प्रसिद्ध वामपंथी लेखक अरुण कमल और पुष्पेश पंत आदि हैं। इसमें अनुवाद के लिए पहला पुरस्कार कृति की मूल भाषा के लेखक को रु 21 लाख और अनुवादक को 15 लाख रुपए देने का प्रविधान है। इसके अलावा 5 अन्य अनुवाद के पुरस्कार दिए जाने हैं जिसमें मूल कृति के लेखक को तीन लाख रुपए और अनुवादक को 2 लाख रु दिए जाएंगे। राशि के लिहाज से अगर देखें तो ये भारत का सबसे बड़ा पुरस्कार है। क्या ये वित्त मंत्रालय की बिना सहमति के आरंभ हुआ है। अगर बगैर भारत सरकार की सहमति के इतनी भारी भरकम रकम का पुरस्कार सरकारी बैंक से दिया जा रहा है तो भी चिंता की बात है। पुरस्कार की ये राशि भी करदाताओं के पैसे दिए जाने हैं और हिंदी निदेशालय या हिंदी संस्थान के पुरस्कार भी करदाताओं के पैसे दिए जाने हैं। अगर गृह मंत्रालय पुरस्कारों को युक्तिसंगत करना चाहता है तो क्या वहां से वित्त मंत्रालय को किसी प्रकार का निर्देश गया था। 

भारत सरकार को हिंदी भाषा की समृद्धि और उसके विस्तार के लिए काम करनेवालों को दिए जानेवाले इन पुरस्कारों को बंद किए जाने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह को हस्तक्षेप करना चाहिए। कुछ वर्षों पूर्व इसी तरह से हिंदी की संस्थाओं के विलय का प्रस्ताव आया था लेकिन तब प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद उसका कार्न्वयन रोक दिया गया था। सरकार को हिंदी के पुरस्कारों को युक्तिसंगत बनाते समय हिंदी भाषा-भाषियों की संख्या पर भी विचार करना चाहिए। 


Saturday, May 20, 2023

मेरा दर्शक-तेरा दर्शक का खतरनाक खेल


जिस दिन फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ प्रदर्शित हुई उसी दिन एक और फिल्म का प्रदर्शन हुआ, जिसका नाम है ‘अफवाह’ । एक तरफ द केरल स्टोरी में कोई चमकता सितारा नहीं है वहीं दूसरी तरफ अफवाह फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दिकि और भूमि पेडणेकर जैसे सितारों ने काम किया है। फिल्म अफवाह को सुधीर मिश्रा ने निर्देशित किया है। ‘द केरल स्टोरी’ न केवल चर्चित हुई, हो रही है, बल्कि सुदीप्तो सेन निर्देशित इस फिल्म ने बंपर कारोबार भी किया। फिल्म ‘अफवाह’ को पालिटिकल थ्रिलर बताया गया लेकिन इस फिल्म की न तो चर्चा हो पाई और न ही इसने औसत कारोबार किया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस फिल्म ने पहले सप्ताह में करीब तीस लाख का कारोबार किया। कुछ ट्विटरवीरों ने इस फिल्म के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया लेकिन हवा बन नहीं पाई। फिल्म फ्लाप हो गई। इस पृष्ठभूमि को बताने का आशय ये नहीं है कि किस फिल्म ने कितना बिजनेस किया। इसको बताने का उद्देश्य ये है कि फिल्म अफवाह के निर्देशक सुधीर मिश्रा ने एक ट्वीट किया जिसके निहितार्थ बेहद गंभीर हैं। इस ट्वीट में सुधीर ने लिखा, द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं। क्षमा करें, मुझे ये कहना पड़ा। फिर उन्होंने हैशटैग लगाकर अपनी फिल्म का नाम अफवाह लिखा।

सुधीर मिश्रा के इस ट्वीट पर ‘द कश्मीर फाइल्स’ के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने उत्तर दिया। लिबरल का अर्थ जानना चाहा। सुधीर मिश्रा को चर्चा के लिए आमंत्रित किया। दोनों के बीच चर्चा भी हुई। सुधीर ने अपना पक्ष रखा और विवेक का अपना पक्ष था। हम यहां उस चर्चा के बिंदुओं पर नहीं जाएंगे। सुधीर ने अपने ट्वीट में जो लिखा उसके पीछे की मानसिकता को डिकोड करने का प्रयास करेंगे। सुधीर ने लिखा कि विवेक के दर्शक और हमारे दर्शक। सुधीर की छवि एक संजीदा फिल्मकार की है । जाने किस मानसिकता में उन्होंने हिंदी फिल्मों के दर्शकों का बंटवारा कर दिया। दर्शकों को बांटने की बात सार्वजनिक रूप से कहकर सुधीर ने एक विभाजक रेखा खींच दी। इस विभाजन की बात बहुत दूर तक जाएगी और इसके खतरनाक परिणाम भी हो सकते हैं। अगर निर्देशकों का अपना दर्शक वर्ग होने लगा तो फिल्म उद्योग संकट में फंस सकता है। हिंदी फिल्म जगत जिसको बालीवुड के नाम से भी जाना जाता है, पहले से ही कई खेमों में बंटा हुआ है। बावजूद इसके दर्शकों को लेकर कभी भी बंटवारे की बात नहीं होती थी। यह विभाजन हिंदी फिल्म जगत के लिए ठीक नहीं है। अभी तक ऐसा कोई संदर्भ या प्रसंग नहीं आया जिसमें किसी गंभीर फिल्मकार ने अपने और दूसरे के दर्शक की बात की हो। सुधीर ने ऐसा क्यों किया। क्या उनकी फिल्मों के लगातार फ्लाप होने की कुंठा से ये शब्द उपजे या कारण कुछ और है। अगर हम देखें तो सुधीर की पिछली कई फिल्में अच्छा बिजनेस नहीं कर पाई हैं। वो लाख कहें कि वो सौ करोड़, दो सौ करोड़ कमाने की होड़ में नहीं हैं लेकिन फिल्म अपनि लागत वसूल सके, इतना तो चाहते ही होंगे। संभव है कि उनको लगता हो कि वो जिस विचारधारा के अनुयायी हैं उस विचारधारा को माननेवाले लोग उनकी फिल्में देखने क्यों नहीं आते हैं। ये बात इस वजह से कह रहा हूं कि उन्होंने विवेक से बातचीत के क्रम में ये स्वीकार किया कि वो लेफ्टिस्ट हैं। उनकी फिल्मों में सर्वहारा की जीत होती है। उनकी फिल्मों का अंत सुखांत नहीं होता है। उनकी फिल्में कई असुविधाजनक सवाल खड़े करती हैं। आदि आदि। यदि ऐसा है तो सुधीर को अभी वामपंथियों को समझना शेष है।

सुधीर के तथाकथित दर्शक अगर उनकी फिल्म देखने के लिए नहीं आते हैं। सुधीर को इस बात की तकलीफ है। क्या ये माना जाए कि सुधीर मिश्रा सिर्फ अपने वैचारिक मित्रों के लिए ही फिल्में बनाते रहे हैं। समाज और फिल्मों से प्रश्न खड़े करने और दर्शकों से संवाद के दावे खोखले हैं। क्या उनकी फिल्मों में वामपंथ का एजेंडा या उस विचारधारा का प्रोपेगैंडा होता रहा है। सुधीर को ये बातें स्पष्ट करनी चाहिए। फिल्म जगत में वामपंथियों का एजेंडा किस तरह से चलता रहा है,किस प्रकार से हिंदी फिल्मों की दुनिया में में रूसियों के सहयोग से वामपंथियों ने अपना ईकोसिस्टम तैयार किया। उसके बारे में पिछले सप्ताह इस स्तंभ में चर्चा की गई थी। सुधीर की टिप्पणी से उस चर्चा को बल मिलता है। सुधीर ने विवेक अग्निहोत्री से बातचीत में ये भी कहा कि अब फिल्म उद्योग के लोग चुप हो गए हैं। शायद वो भूल गए कि उनके इर्दगिर्द जिन फिल्म निर्देशकों को देखा जाता है या जिनके साथ उनकी तस्वीरें इंटरनेट मीडिया पर आती हैं वो मुखरता से न सिर्फ अपनी बातें कहते हैं बल्कि कई बार तो सार्वजनिक मंचों पर गाली गलौच की भाषा का भी उपयोग करते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में धरने में शामिल होकर बिरयानी खाते हुए नारे लगाते भी देखे जाते हैं। सुधीर अपने मित्रों की भाषा तो नहीं बोलते हैं लेकिन उनके मन में क्या चलता है ये उनकी टिप्पणी से पता चलता है। विवेक से बातचीत में वो कहते हैं कि इन दिनों लोग चुप हो गए हैं। दबी जुबान में भय के माहौल की चर्चा भी करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में कई सितारों ने पहले भी भय की चर्चा की थी। उनमें से एक शाह रुख खान की फिल्म पठान ने बंपर बिजनेस किया। तब तो किसी ने तुम्हारा दर्शक और मेरा दर्शक का प्रश्न नहीं उठाया। दरअसल जो लेफ्ट की विचारधारा में आस्था रखते हैं वो लगातार अर्धसत्य के साथ चलते रहते हैं। सुधीर भी इस दोष के शिकार हो गए प्रतीत होते हैं। 

वामपंथी लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं। अवसर मिलने पर आक्रामक होकर अपनी बात ऱखना और नारे लगाना उनका शौक है। उनके नारे, उनकी आक्रामकता सब खोखले हैं। अपनी विचारधारा को प्रभावी बनाने के लिए वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हैं। कई बार जब उनकी विचारधारा से जुड़े लोग कुछ ऐसा कर जाते हैं जो उनके विचारों के विपरीत होता है तो वहां उनको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं सताती है। अभी कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी। गांधी और गोडसे, एक युद्ध। ये फिल्म हिंदी के वरिष्ठ लेखक और जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष असगर वजाहत के नाटक गोडसे@गांधी.काम पर आधारित था। असगर वजाहत पर आरोप लगे कि उन्होंने इस फिल्म में गोडसे को गांधी के समकक्ष खड़ा कर दिया। गांधी के परिवार के तुषार गांधी भी इस विवाद में कूदे थे। हिंदी साहित्य जगत में इस बात की खूब चर्चा रही कि जनवादी लेखक संघ का एक धड़ा असगर वजाहत को संगठन के अध्यक्ष पद से हटाना चाहता है। हिंदी साहित्य की इस चर्चा को मानें तो प्रश्न उठता है कि वामपंथी लेखकों के इस संगठन, जनवादी लेखक संघ, को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की कितनी चिंता थी। उनके संगठन के अध्यक्ष ने एक नाटक लिखा, उस नाटक में उन्होंने गांधी के विचारों के आधार पर एक काल्पनिक परिदृष्य गढ़ा, जिसपर फिल्म बनी। ये उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी। चूंकि असगर वजाहत के विचार उनके संगठन के विचारों से अलग थे लिहाज उनके विरुद्ध एक माहौल बनाया गया। आवश्यकता इस बात की है फिल्म के दर्शक सुधीर की टिप्पणी के निहितार्थों को समझें और अपने विवेक से निर्णय लें।       

Saturday, May 13, 2023

वेब सीरीज ने खोली कम्युनिस्टों की पोल


इन दिनों एजेंडा फिल्म की चर्चा हो रही है। फिल्म द केरल स्टोरी को एक विशेष वर्ग के लोग एजेंडा या प्रोपगैंडा फिल्म कहकर प्रचारित कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि द केरल स्टोरी को एजेंडा फिल्म बतानेवालों ने फिल्म नहीं देखी है। दरअसल एक पूरा ईकोसिस्टम है जो वैकल्पिक विमर्श वाली फिल्मों को एजेंडा के तौर पर प्रचारित कर परोक्ष रूप से बहिष्कार करते हैं। कई फिल्में, डाक्यूमेंट्री या वेबसीरीज ईकोसिस्टम की विचारधारा के अनुकूल नहीं होती हैं। उनमें उनकी विचारधारा की करतूतों का पर्दाफाश होता है। ऐसी फिल्मों या वेबसीरीज के उन बिंदुओं को लेकर शोर मचाते हैं जिसमें विचारधारा की आड़ में की गईं करतूतें दब जाती हैं। उनपर जनता या दर्शकों का पर्याप्त ध्यान नहीं जा सके। ऐसी ही एक सीरीज है, जुबली। इस सीरीज में स्वाधीनता के कुछ वर्ष पहले और उसके बाद के चंद वर्षों की हिंदी फिल्मों की कहानी कही गई है। इसमें राय टाकीज के बनने उसके खत्म होने से लेकर नायकों के बनने और नायिकाओं की स्थितियों का चित्रण किया गया है। विक्रमादित्य मोटवानी के निर्देशन में बनी इस सीरीज में उस दौर के कई नायकों और नायिकाओं का चित्रण किया गया है। इस वेब सीरीज को लेकर जो विमर्श हो रहा है वो ये कि इसका नायक मदन कुमार किस हीरो के चरित्र से मेल खाता है।नायिका नीलोफर में किसकी छवि दिखती है। राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय का चरित्र क्या हिमांशु राय से मिलता है या मालकिन का किरदार देविका रानी से। क्या इसका एक और नायक जय खन्ना राज कपूर के व्यक्तित्व से प्रेरित है आदि। इस बात की दबी जुबान में भी चर्चा नहीं हो रही है कि रूसियों ने किस तरह से हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा चलाया। 

विक्रमादित्य मोटवानी ने इस सीरीज में उस दौर में हिंदी फिल्मों में सोवियत रूस और अमेरिका के एजेंडे को सामने लाकर रख दिया है। इस फिल्म के एक संवाद पर नजर डालते हैं। आवाम तक अपनी आवाज पहुंचाने के दो जरिए हैं, सिर्फ दो। सिनेमा और रेडियो। सोवियत संघ और अमेरिका इस समय दोनों भारत सरकार की खुशामद कर रहे हैं, सिनेमा और रेडियो में अपने पैर जमाने के लिए। कोल्ड वार शुरु हो चुका है। दोनों ही मुल्क अपने अपने प्रोपगैंडा के लिए फिल्में बनाना चाहते हैं। और इसी सिलसिले में सोवियत संघ ने अपना खास आदमी ब्लादीमीर यहां भेजा है। इन्होंने प्रोपगैंडा फिल्मों के लिए काफी काम किया है चाइना में। संवाद से स्पष्ट है कि सोवियत संघ हिंदी फिल्मों को लेकर कितना गंभीर था। वो उस दौर के उभरते हुए सितारे मदन कुमार को अपने एजेंडा के लिए काम करवाने के लिए उत्सुक था। उसको प्रोत्साहित करनेवाले राय टाकीज के मालिक श्रीकांत राय से रूस के प्रतिनिधियों की भेंट भी होती है। श्रीकांत राय उनके प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। रूसी उस समय हिंदी फिल्मों  में काफी निवेश करना चाहते थे। उनको कोई भी स्टार नहीं मिल रहा था जिसकी फिल्मों पर पैसा लगाया जा सके। परिस्थितियां इस प्रकार की बनती है कि जय खन्ना अपने फाइनेंसर वालिया को फिल्म बनाने के लिए तैयार करता है। ये दोनों रूसियों के संपर्क में आते हैं। एक बेहतरीन दृश्य है जब वालिया एक फिल्म का पोस्टर तैयार करवाता है। फिल्म का नाम होता है मजदूर। मजदूर की कहानी भी उसके पास नहीं होती है लेकिन वो कमिटमेंट कर देता है। उसके और जय खन्ना के बीच बहस होती है। जय कहता है कि उसके पास कहानी नहीं है तो वालिया उत्तर देता है कि मास्को में ढेर सारी टैरेटरी खुलनेवाली है। रूस का दरवाजा खुलावाना है। रशियन तीन फिल्मों का फाइनेंस करने को तैयार हैं। रशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होगा जिसमें इन फिल्मों को दिखाया जाएगा। आदि आदि। इसलिए मजदूर की कहानी तो लिखनी होगी। उस दौर को याद करिए जिस दौर की बात हो रही है। राज कपूर की कई फिल्में आती हैं, रूस में रिलीज होती हैं। वहां के अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में उनको दिखाया जाता है। राज कपूर की आरंभिक फिल्मों के बारे में कहा गया कि वो समाजवाद से प्रेरित हैं। उसी दौर में भारतीय जन नाट्य संघ या इप्टा लोकप्रिय होने लगा था। फिल्मों में रुचि रखनेवालों को याद होगा कि महबूब खान जिन्होंने मदर इंडिया बनाई उनके प्रोडक्शन हाउस का लोगो हशिया और हथौड़े के निशान के बीच में अंग्रेजी में एम लिखा था। वही हंशिया और हथौड़ा जो कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया का निशान था। प्रश्न यही उठता है कि क्या इन सबके बीच किसी प्रकार का कोई संबंध था। वेब सीरीज जुबली ने इन परिस्थितियों को दस एपिसोड में दर्शकों के सामने पेश कर दिया है। ये सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है बल्कि ये बताता है कि कम्युनिस्टों ने हिंदी फिल्मों में अपना एजेंडा किस तरह से चलाया। विचार और विचारधारा का प्रोपगैंडा कैसे किया। 

फिल्मकारों को सोवियत रूस के प्रतिनिधि बताते थे कि सिस्टम के खिलाफ लड़नेवाला नायक कैसा होना चाहिए। फिल्मों में सेठ को गाली दी जानी चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि गरीब अपने वेतन पर कपड़ा नहीं खरीद सकता, पूरे परिवार को खाना नहीं खिला सकता। अगर गरीब जाग गया तो सबकी रातों की नींद उड़ा देगा। फिल्मकारों को प्रलोभन दिया जाता था कि अगर उनकी फिल्में रूसियों की विचारधारा का प्रोपगैंडा करेंगी और उनके एजेंडा पर चलेंगी तो उनकी फिल्मों को तत्कालीन सोवियत संघ, तुर्की और यूरोप में प्रदर्शित करवाया जाएगा। फिल्म बनाने के लिए पैसे दिए जाएंगे। एक और बेहद चौंकानेवाला प्रसंग इस सीरीज में है। रूसी हिंदी फिल्मी गानों के विरुद्ध थे। 1952 में तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री ने आकाशवाणी पर हिंदी गानों पर प्रतिबंध लगा दिया। कारण ये दिया गया कि ये गाने भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। रूसी भफी यही कहते थे। प्रश्न ये उठता है कि गाने भारतीय संस्कृति के विरुद्ध थे या रूसी अपनी विचारधारा को गाढ़ा करने के लिए इनपर प्रतिबंध लगवाना चाहते थे। प्रतिबंध के दौर में अमरीकियों ने हिंदी गानों को रेडियो सिलोन पर बजवाने का प्रबंध किया था। राय टाकीज के मालिक जब रूसियों के सामने नहीं झुकते हैं तो उनकी तबाही का षडयंत्र रचा जाता है। उनकी पत्नी सुमित्रा को रूसी अपनी तरफ करते हैं। उनके वित्त विभाग की देखरेख करनेवाले को घूस भी दिया जाता है और वादा भी किया जाता है कि उनके बेटे का दाखिला मास्को के इंजीनियरिंग कालेज में करवा दिया जाएगा। उस दौर में इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के लिए कई छात्र सोवियत रूस गए थे। गजब समानता है। उस वक्त रूसियों ने फिल्मकारों के फोन टैप करके उनको ब्लैकमेल भी किया था। सरकारें खबरें भी रुकवा देती थीं। कहानी में इन सबका चित्रण है।  

आज जो कम्युनिस्ट या वाम विचारधारा के लोग फिल्मों में एजेंडा और प्रोपगैंडा की बात करते हैं उनको इस वेब सीरीज को देखना चाहिए। किस तरह से भारत की स्वाधीनता के बाद से लेकर सोवियत संघ के विघटन तक हिंदी फिल्मों में रूसियों की विचारधारा का एजेंडा चलता रहा। किस तरह से वर्ग संघर्ष को बढ़ावा दिया गया।। कई फिल्मों में इसको नेहरू के समाजवाद और गांधी की ग्राम-व्यवस्था के बीच के संघर्ष के तौर पर दिखाया गया। उद्देश्य और मंशा तो वामपंथी विचार को बढ़ावा देना था। यह अनायास नहीं था कि इप्टा जैसे संगठन और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखक लोकप्रिय होने लगे थे। कैफी आजमी से लेकर जावेद अख्तर तक इस तरह का लेखन कर रहे थे जिसमें वर्ग संघर्ष का चित्रण था। दस एपिसोड में विक्रमादित्य मोटवानी ने कुछ ही परतें खोली हैं, संभव है कि दूसरे सीजन में और भी दिलचस्प खुलासे हों।   


Saturday, May 6, 2023

फिल्म विरोध का एजेंडा नाकामयाब


फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ इन दिनों चर्चा में बनी हुई है। इसके पक्ष-विपक्ष में लगातार दलीलें दी जा रही हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देशभर में एक बार फिर से बहस हो रही है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाण पत्र मिलने के बाद भी इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया। केरल हाईकोर्ट में फिल्म के रिलीज होने वाले दिन तक सुनवाई हुई। अदालतों ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। आश्चर्य की बात है कि कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर किसी भी तरह की सामग्री दिखाने के पक्षधर और स्वयं को लिबरल कहनेवाले लोग भी इस फिल्म के प्रदर्शन के विरुद्ध थे। इस शोरगुल के बीच केरल हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की टिप्पणियां अलक्षित रह गईं। न्यायमूर्ति एन नागरेश और न्यायमूर्ति एस थामस की पीठ ने इस फिल्म के प्रदर्शन को रुकवाने की याचिका की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट की कार्यवाही की लाइव रिपोर्टिंग करनेवाली वेबसाइट लाइव ला के अनुसार पीठ ने स्पष्ट किया इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र मिल चुका है। ऐसे में इसको रोकना उचित नहीं होगा। न्यायपीठ ने इस बात को भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ताओँ में से किसी ने भी फिल्म देखी नहीं है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि अगर किसी ने फिल्म देखी नहीं थी तो इसको रुकवाने की याचिका लेकर अदालत के सामने क्यों उपस्थित हो गए। कुछ लोगों का आरोप है कि ये फिल्म एजेंडा फिल्म है लेकिन क्या फिल्म को बगैर देखे उसके प्रदर्शन को रुकवाने के लिए उच्च न्यायालय पहुंच जाना एजेंडा नहीं है। असल एजेंडा तो यही प्रतीत होता है कि आपने फिल्म देखी नहीं लेकिन कथित आसन्न खतरे को लेकर अदालत पहुंच गए। इस एजेंडा की चर्चा कहीं नहीं हो रही है न ही याचिकाकर्ताओं की मंशा पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। 

सुनवाई के दौरान न्यायपीठ ने कहा कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और कलात्मक स्वतंत्रता को संतुलित तरीके से देखा जाना चाहिए। इस टिप्पणी के गहरे निहितार्थ हैं। अगर हम कोर्ट की इस टिप्पणी के आलोक में देखें तो स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर वर्ग और समुदाय के लिए एक समान है। संविधान में इसकी ही व्यवस्था है। सुनवाई के दौरान कोर्ट की ये टिप्पणी भी उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया कि इस फिल्म में इस्लाम के विरुद्ध कुछ नहीं है, इस्लाम पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया है। इस फिल्म में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के करतूतों को दिखाया गया है। इस टिप्पणी से के बाद ये सवाल उठता है कि अगर किसी फिल्म में अगर फिल्मकार आतंकवादी संगठन के खिलाफ दिखाता है तो उस फिल्म को बिना देखे इस्लाम के खिलाफ या मुसलमानों के खिलाफ कैसे मान लिया जाता है। सिर्फ मान ही नहीं लिया जाता है बल्कि उनकी रक्षा के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। वो भी ऐसे लोग जो खुद को लिबरल या सेक्युलर मानते हैं। क्या इस देश में किसी आतंकवादी संगठन के खिलाफ फिल्म बनाना अपराध है। अबतक इस देश में कई ऐसी फिल्में बनीं जिसमें स्पष्ट रूप से आतंकवादियों को लेकर फिल्मकार साफ्ट रहे हैं। अधिकतर फिल्मों में आतंकवादी के बनने के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार दिखाया गया है। फिल्म मिशन कश्मीर में ऋतिक रोशन ने जिस अल्ताफ खान का चरित्र निभाया है, उसको याद करिए या फिर फिल्म फना में आमिर खान ने जिस आतंकी रेहान का रोल किया। आतंकी रेहान की कब्र पर जब उसका बेटा अपनी मां से पूछता है कि क्या रेहान ने गलत किया था तो उसकी मां कहती है कि रेहान ने वही किया जो उसको ठीक लगता था। इस तरह के संवाद आतंकवाद का परोक्ष समर्थन न भी हो लेकिन आतंकवाद को लेकर एक रोमांटिसिज्म तो है ही। इस तरह के कई प्रसंग हिंदी फिल्मों में देखे जा सकते हैं। 

केरल हाईकोर्ट की न्यायपीठ की एक और टिप्पणी थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के साथ फिल्म के ट्रेलर को कोर्ट में ही देखा और कहा कि ये काल्पनिक है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि इस फिक्शनल फिल्म का उद्देश्य मुसलमानों को खलनायक के रूप में पेश करना है। कोर्ट ने इससे भी असहमति जताई और कहा कि फिल्मों में कई तरह की चीजें दिखाई जाती हैं। भूत और पिशाच भी नहीं होते हैं लेकिन फिल्मों में काल्पनिक रूप से उनको भी दिखाया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति नागरेश ने की वो ये कि कई फिल्मों में हिंदू संन्यासियों को तस्कर और बलात्कारी दिखाया गया है लेकिन कभी भी किसी ने उसपर आपत्ति नहीं जताई। आपने हिंदी और मलयालम में इस तरह की कई फिल्में देखी होगी। मलयालम में तो एक फिल्म में पुजारी को मूर्ति पर थूकते दिखाया गया था लेकिन उससे भी किसी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई थी। आप कल्पना कर सकते हैं कि वो फिल्म पुरस्कृत भी हुई थी। इस टिप्पणी ने भारतीय फिल्म जगत के उस एजेंडे को बेनकाब कर दिया जो अबतक निर्बाध रूप से चल रहा था। आईआईएम रोहतक के निदेशक धीरज शर्मा ने अपनी पुस्तक फिल्में और संस्कृति में लिखा है कि ऐसी फिल्में हमारे मूल्यों, परंपरा, हिंदुत्व की विचारधारा और भारतीय संस्कृति की जड़ें कमजोर कर रही हैं। बालीवुड व्यवस्थित तरीके से हिंदू धर्म को नीचा दिखाने में लगा हुआ है। धर्म के खिलाफ नकारात्मक धारणा, भावना या गतिविधि को बढ़ा रहा है। उदाहरण के लिए फिल्म वास्तव, संजू, सिंघम, सरकार में जितने भी नकारात्मक पात्र दिखाए गए हैं, उन सबने हिंदुओं के प्रतीक चिन्ह धारण कर रखे हैं और वे साफ नजर भी आते हैं। संभवत: यह दर्शाने के लिए हिंदू धर्म के प्रतीक जिन्होंने धारण कर रखे हैं, वे बुरे इंसान हैं। इसके उलट अगर किसी ने अन्य धर्म के प्रतीक धारण कर रखे हैं तो उसको पवित्र व्यक्ति के तौर पर पेश किया जाता है। फिल्म दीवार के नायक को भी इस संदर्भ में याद किया जाना चाहिए। अमिताभ बच्चन ने फिल्म दीवार में जिस विजय वर्मा का किरदार निभाया है वो हिंदू मंदिरों में जाने का इच्छुक नहीं होता है, लेकिन हमेशा अपनी जेब में 786 नंबर का बिल्ला रखता है। पुलिस से बचकर भागते समय उसका बिल्ला कहीं खो जाता है और उसको जान गंवानी पड़ती है। इससे परोक्ष रूप से क्या संदेश दिया जाता है। 

‘द केरल स्टोरी’ को लेकर जिस तरह की बातें इन दिनों हो रही है लगभग उसी तरह की बातें पिछले वर्ष ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर हो रही थीं। उसको भी एजेंडा फिल्म से लेकर समाज को बांटनेवाली फिल्म तक करार दिया गया था। ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद ‘द केरल स्टोरी’ में आतंकवादियों की करतूतों को दिखाया गया है। कुछ लोग इसको बेवजह इस्लाम से जोड़ कर अपना एजेंडा चलाना चाह रहे हैं। इन दोनों फिल्मों में किसी धर्म के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं दिखाया गया है। अगर ऐसा होता तो देश की अदालतें इसका संज्ञान अवश्य लेतीं। जो लोग इन फिल्मों को इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध बता रहे हैं उनको गंभीरता से इस बारे में सोचना चाहिए कि वो ऐसा क्यों कह रहे हैं। कश्मीर में हिंदू पंडितों का नरसंहार करनेवाले आतंकवादी या आईएसआईएस के आतंकवादियों को मुसलमानों या इस्लाम जोड़ना अनुचित है। फिल्म इंडस्ट्री में कुछ ऐसे निर्माता हैं जिनकी आस्था न तो भारत में है न ही भारतीयता में। उनका लक्ष्य है किसी तरह से कला की आड़ में अपना एजेंडा चलाना। लेकिन इस बार अदालत ने उसे नाकाम कर दिया।  


Friday, May 5, 2023

'बुखारा' के स्वाद का क्रेज


कोलकाता से एक मित्र का फोन आया और उसने चौंकानेवाली बात की। उन्होंने अनुरोध किया कि दिल्ली के आईटीसी मार्या होटल स्थित बुखारा रेस्तरां में चार लोगों के डिनर के लिए अमुक तारीख को व्यवस्था करवा दें। मैंने उनसे कहा कि क्या सिर्फ खाने के लिए आपलोग कोलकाता से दिल्ली आ रहे हैं। उत्तर मिला कि हां वो लोग शाम की फ्लाइट से आएंगे और डिनर के बाद रात की फ्लाइट से वापस लौट जाएंगे। मैंने भी उनको हां कह दिया। सोचा किसी से कहकर उनके लिए बुखारा में टेबल का इंतजाम करवा देंगे। टेबल के लिए जब प्रयास करना आरंभ किया तो पता चला कि ये बेहद कठिन कार्य है। बताया गया कि चाणक्यपुरी के जिस इलाके में होटल मौर्या है उस क्षेत्र के पुलिस अधिकारियों, इंकम टैक्स अधिकारियों से लेकर एक्साइज वालों तक पर बुखारा में टेबल का इंतजाम करने/करवाने का भारी दबाव होता है। जब कई लोगों ने इस काम के लिए हाथ खड़े कर दिए तो मन में जिज्ञासा हुई कि क्यों न चलकर इस रेस्तरां को देखा जाए कि क्या कारण है कि इसमें टेबल मिलना इतना कठिन है। 

चाणक्यपुरी के आलीशान पांच सितारा होटल आईटीसी मौर्या के इस रेस्तरां में पहुंचा तो इसके बाहर लगे टेबलों पर बैठे लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। रेस्तरां में अंदर घुसते ही उसके इंटीरियर ने ध्यान खींचा। पत्थरों से सजी दीवारें और लकड़ी से बने आकर्षक खंभे इसको अलग ही लुक दे रहे थे। खाने की मेज की एक तरफ दीवार से लगी बेंच थी और दूसरी तरफ स्टूल लगे हुए थे। टेबल और स्टूल की ऊंचाई भी कम थी लेकिन लोग चाव से आनंदित होकर भोजन करने में लीन थे। सौभाग्य से हमें भी जगह मिली और हम वहां खाने बैठ गए। वेज और नानवेज प्लैटर के अलावा दाल बुखारा और भरवां कुलचा और पुदीना पराठा की खेप आई। दाल बुखारा बेहद स्वादिष्ट था। बुखारा की रसोई में काम करनेवाले शेफ ने बताया कि दाल को बनाने में कई घंटे लगते हैं। उड़द की दाल को सात-आठ घंटे तक पानी में भिगो कर रखा जाता है। उसके टमाटर को उबालकर और पीस कर मसालों और मक्खन में मिलाकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में करीब सत्रह से अठारह घंटे लगते हैं। धीमी आंच पर पकाने की वजह से दाल बुखारा बेहद स्वादिष्ट बन जाता है। दाल बुखारा को पुदीना पराठा के साथ खाने का अपना अलग ही मजा है। कई लोग दाल बुखारा को खस्ता रोटी के साथ खाना पसंद करते हैं। बुखारा की एक और विशेषता है वहां एक बहुत बड़े साइज का नान परोसा जाता है। बड़े आकार का एक नान चार पांच लोगों के लिए काफी होता है। नानवेज पसंद करनेवालों के लिए भी यहां कई तरह के विक्लप उपलब्ध थे। सीक कबाब और पेशावरी कबाब के अलावा यहां आनेवाले लोग सिकंदरी रान को पसंद कर रहे थे। सिकंदरी रान कम उम्र के लैंब के मांस से तैयार किया जाता है। उसको सिरका में मैरीनेट करने के बाद उसमें दालचीनी, काला जीरा और मिर्ची का पेस्ट डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। इसके अलावा तंदूरी झींगा भी यहां की खास डिश है। बताते हैं कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा भारत के दौरे पर आए थे तो उनको बुखारा का तंदूरी झींगा बेहद पसंद आया था। बड़े आकार की झींगा मछली को अजवाइन फ्लैवर वाली दही में मैरिनेट किया जाता है। मैरिनेट करने के दौरान इसमें लाल मिर्च, हल्दी और गरम मसाला भी मिला दिया जाता है। थोड़ी देर बाद इसको सीक में डालकर धीमी आंच पर सेंका जाता है। 

मेनकोर्स के बाद बारी आई डेजर्ट्स की। बुखारा अपने ग्राहकों के लिए गुलाब जामुन, कुल्फी, फिरनी और रसमलाई पेश करते हैं। मिट्टी के बरतन में परोसा जानेवाला फिरनी बेहद स्वादिष्ट था। एक छोटे बाउल में 6 छोटी छोटी रसमलाई थी जिसका स्वाद बाजार में मिलनेवाले अन्य रसमलाई से अलग। थोड़ा कम मीठा लेकिन स्वाद अप्रतिम। दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित इस रेस्तरां में जगह मिलने में भले ही कठिनाई होती हो लेकिन एक बार आपको जगह मिल जाती है तो बेहतरीन खाने का स्वाद संघर्ष के बाद मिली सफलता सरीखी होती है।  


Thursday, May 4, 2023

लव जेहाद की परतें खोलती फिल्म


आज फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ रिलीज हो रही है। ये फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगु और मलयालम में प्रदर्शित होगी। फिल्म अपने प्रदर्शन के पहले ही चर्चा के केंद्र में आ गई है। फिल्म की रिलीज को रुकवाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। इस फिल्म के ट्रेलर को लेकर लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला । यूट्यूब पर फिल्म के ट्रेलर को सात दिनों में एक करोड़ अस्सी लाख से अधिक लोगों ने देखा और एक लाख से अधिक लोगों ने कमेंट किए। इंटरनेट मीडिया के लिहाज से ये बहुत बड़ी संख्या है। फिल्मों के बारे में आनलाइन आंकड़े देनेवाली साइट आईएमडीबी पर सबसे अधिक प्रतीक्षावाली फिल्मों और सीरीज की सूची में ‘द केरला स्टोरी’ शीर्ष पर है। इस फिल्म को करीब पचास प्रतिशत पेज व्यू  मिला है वहीं शाह रुख खान की जून में रिलीज होनेवाली फिल्म जवान को लेकर करीब सोलह प्रतिश्त पेज व्यू है। स्पष्ट है कि द केरला स्टोरी को लेकर दर्शकों के बीच जबरदस्त उत्सुकता है। 

‘द केरल स्टोरी’ में कोई बड़ा स्टार नहीं है, कोई ग्लैमरस अभिनेत्री नहीं है, बावजूद इसके इस फिल्म को लेकर अगर इतनी उत्सुकता है तो उसके पीछे कारण है इस फिल्म की कहानी। इस फिल्म की कहानी केरल के उन हिंदू लड़कियों की कहानी है जिनका मतांतरण करवाकर आतंकी संगठन आईएसआईएस के गिरोह में शामिल करवा दिया जाता है। फिल्म के ट्रेलर का एक संवाद है, एक गरीब को लाओ, खानदान से जुदा करो, जिस्मानी रिश्ते बनाओ, जरूरत पड़ने पर उनको प्रेगनेंट करो और जल्द से जल्द उनको अगले मिशन के लिए हैंडओवर करो। फिल्म में ये भी दिखाया गया है कि किस तरह से हिंदू लड़कियों का ब्रेनवाश करके मतांतरण के लिए तैयार किया जाता है। ब्रेनबाश भी संवाद की शैली में किया जाता है। हिजाब पहने एक लड़की का हिंदू लड़कियों से बातचीत दिखता है। पूछा जाता है कि तुमलोग किस गाड को मानता है। उत्तर मिलता है शिव। तब कहा जाता है कि जो गाड अपनी पत्नी के मरने पर आम इंसानों की तरह रोता हो वो कैसा भगवान। लव जिहाद के जरिए हिंदू लड़कियों को आतंकी संगठन में भेजने का षडयंत्र कितना भयावह होता है, ये फिल्म उसकी तस्वीर दिखाती है। फिल्मकारों का दावा है कि ये फिल्म सत्य घटनाओं पर आधारित है। फिल्म के क्रिएटिव डायरेक्टर और प्रोड्यूसर विपुल शाह का मानना है कि उन्होंने इस फिल्म का निर्माण इसलिए किया क्योंकि इसकी कहानी बेहद शाकिंग है। अगर हमारे देश के किसी हिस्से में ऐसा घटित हो रहा है तो उसको सबके सामने आना चाहिए। इसमें किसी भी तरह का कोई एजेंडा नहीं है बल्कि पूरी कहानी को मानवता के दृष्टिकोण से पेश किया गया है। गीतकार मनोज मुंतशिर कहते हैं कि धोखे या दबाव से धर्मांतरण के लिए विवश करना, भारत के संविधान की अवमानना है। जो लोग फिल्म की प्रामाणिकता पर संदेह कर रहे हैं उनको मैं ये बता दूं कि मैं व्यक्तिगत तौर पर फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन और निर्माता विपुल शाह के भागीरथ प्रयास का साक्षी रहा हूं। तीन सौ घंटे के वीडियो रिसर्च और पांच सौ केस स्टडीज के आधार पर ये फिल्म बनी है। 

दरअसल केरल में लव जिहाद और वहां की लड़कियों के आतंकी संगठन आईएसआएस में जाने की खबरें आती रही हैं। उनके बारे में चर्चा भी होती रही है लेकिन उन घटनाओं को केंद्र में रखकर और आईएसआईएस में जाने के कारणों, और परिस्थितियों को पहली बार फिल्मी पर्दे पर उतारा गया है। पहले हिंदू लड़कियों को प्रेम के जाल में फंसाया जाता है, तरह तरह से प्रलोभन देकर सुनहले भविष्य का सपना दिखाया जाता है फिर आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल करके नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया जाता है। इस पूरे प्लाट को ये फिल्म एक्सपोज करती है। दैनिक जागरण से बातचीत में इस फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने कहा कि इस फिल्म में हम ऐसे सत्य को उद्घाटित करने जा रहे हैं जिसने दशकों से हमारी मां-बेटियों की जिंदगी नरक बना दी थी। उनका दावा है कि इस फिल्म में उन परिस्थितियों को दिखाया गया है जिसके बारे में अबतक सोचा भी नहीं गया था। उनका कहना है कि उन्हें इस बात की खुशी है कि सात साल की मेहनत आखिरकार जनता के बीच पहुंच रही है। वो इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि इससे देश की बहनों की जिंदगी पर सकारात्मक असर पड़ेगा।