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Saturday, November 24, 2018

विरोधियों को मदद करती सरकार


साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर इस देश में बहुधा विवाद होते रहते हैं। कोई कार्यक्रम हो जाए तो विवाद, कोई कार्यक्रम टल जाए तो विवाद। कोई नियुक्ति हो जाए तो विवाद, कोई नियुक्ति ना हो पाए तो विवाद। किसी संस्थान में कोई अध्यक्ष चुन लिया जाए तो विवाद और ना चुना जाए तो विवाद। इन विवादों में ज्यादातर तर्क आरोप की शक्ल में सामने आते हैं। दो हजार चौदह में जब से नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से साहित्य-संस्कृति के विवादों में आरोपों को विचारधारा से भी जोड़ा जाने लगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडा को बढ़ाने का आरोप लगना भी तेज हो गया। इसके पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब भी इस तरह की बात हुआ करती थी। अब तो हालत ये हो गई है कि कोई भी छोटा-मोटा विवाद भी हो तो उसमें प्रधानमंत्री को घसीट लिया जाता है। कोई कार्यक्रम चाहे किसी भी वजह से स्थगित हो उसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर डाल दी जाती है। बात इतने पर ही नहीं रुकती है, आरोप लगाने वाले इसको फासीवाद से जोड़ देते है। कोई इसको अघोषित इमरजेंसी बता देता है। मतलब हालात यह है कि जिसके मन में जिस तरह की बात आती है उसी तरह के आरोप लगा देता है, तथ्य, आधार और स्तर की परवाह किए बगैर।
जबकि साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र पर नजर डालें तो मौजूदा केंद्र सरकार बेहद उदार दिखाई देती है। अब अगर हम कृष्णा और सोनल मानसिंह के कार्यक्रम रद्द होने के मसले को ही देखें तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इन लोगों के कार्यक्रम की आयोजक स्पिक मैके नाम की एक संस्था थी। ये संस्था सालों से भारतीय शास्त्रीय संगीत और कला के क्षेत्र में काम कर रही है। इस ताजा विवाद के बाद इस संस्था पर भी सवाल उठे। इनको केंद्र सरकार और इनके उपक्रमों से मिलनेवाली आर्थिक मदद को लेकर भी प्रश्न खड़े किए गए। कुछ लोगों की राय इस तरह की भी सामने आई कि इस पूरे विवाद में स्पिक मैके की परोक्ष भूमिका थी, लिहाजा केंद्र सरकार को उनको आर्थिक मदद देने पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस विचार को संस्कृति मंत्रालय ने बिल्कुल तवज्जो नहीं दिया। बताया जा रहा है कि कुंभ के सिलसिले में कार्यक्रम करने के लिए इस संस्था को डेढ़ करोड़ से अधिक की राशि देने का फैसला किया गया है।संस्कृति मंत्रालय इतनी उदार है कि उनको अपने क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों से ज्यादा भरोसा स्पिक मैके पर है। देशभर में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक कार्यलय हैं, संगीन नाटक अकादमी है, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र है, कई अन्य संस्थान हैं लेकिन निजी संस्थान स्पिक मैके पर ही संस्कृति मंत्रालय को भरोसा है। इस भरोसे की क्या वजह है वो साफ नहीं है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में भारतीय रूपंकर कला के इतने बेहतरीन कार्यक्रम आयोजित होते हैं और वो भी नियमित होते हैं लेकिन कला केंद्र से भी स्पिक मैके को तीन साल में एक करोड़ चालीस लाख रुपए दिए गए हैं। इतना ही नहीं बल्कि स्पिक मैके को कार्यक्रमों के आयोजन के लिए विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजविक उपक्रमों से लाखों का अनुदान मिलता है। अगर मौजूदा सरकार बदले की भावना से काम करती या अगर इस सरकार की नीतियां अपनी विचारधारा से इतर विचारवालों को तंग करना होता तो इतनी उदारता से स्पिक मैके को अनुदान नहीं दिया जाता। स्पिक मैके के मंच पर तो मोदी सरकार से विरोध रखनेवाले कलाकारों को आमंत्रित किया ही जाता रहा है। दरअसल ये सरकार कलाकार को कलाकार की नजर से देखती है।
संस्कृति मंत्रालय तो इस मामले में बेहद उदार है। वो पहले भी साहित्यिक पत्रिका हंस के आयोजनों को आर्थिक मदद करती रही है जहां मंच पर घोषित मोदी विरोधी लोग बैठते थे और सरकार को कोसते थे। वो दृष्य कितना मनोहारी और समावेशी होता है जब वक्ता के पीछे बोर्ड पर लिखा होता है, संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित, और वक्ता उस बोर्ड के आगे खड़े होकर नरेन्द्र मोदी और फासीवाद को कोसते हैं। देश में इमरजेंसी जैसे हालात को लेकर गरजते हैं। पर यह कितनी हास्यास्पद बात है कि संस्कृति मंत्रालय के आर्थिक सहयोग से सजे मंच पर खडे होकर आप कह रहे हैं कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं। दरअसल इस तरह के आरोप लगानेवालों को इमरजेंसी जैसे हालात का अंदाज ही नहीं होता है। अगर इमरजेंसी जैसे हालात होते तो सरकारी मदद वाले मंच से सरकार के विरोध के बोल नहीं गूंजते। इमरजेंसी के दौर में अनुदान देने के पहले मंच पर बैठनेवालों की सूची मांगी जाती थी। सूची से संतुष्ट होने के बाद ही धन जारी किया जाता था। सूचना के अधिकार के तहत संस्कृति मंत्रालय से प्रश्न पूछकर यह पता लगाया जा सकता है कि क्या कभी इस मंत्रालय ने वक्ताओं या मंच पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के नाम को देखकर धन दिया। शुरुआत में तो संस्कृति मंत्रालय ने कई ऐसे कार्यक्रमों को आर्थिक मदद दी जिसमें धुर वामपंथी शामिल होते रहे हैं। मोदी सरकार पर इस तरह के आरोप लगानेवालों को संस्कृति मंत्रालय के कामकाज को देखना चाहिए।
संस्कृति मंत्रालय तो इतनी उदार है कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और आमसभा के सदस्यों के चुनाव के समय भी सिर्फ अपनी राय ही दे पाई। आम सभा के सदस्यों ने तो सस्कृति मंत्रालय की राय को ठुकरा दिया। संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने मंत्रालय की तरफ से एक उम्मीदवार को नामित किया था और आमसभा से उनको वोट देने को कहा था लेकिन उस उम्मीदवार की हार हो गई। मंत्रालय ने कुछ नहीं किया, साहित्य अकादमी के कामकाज में किसी तरह की बाधा खड़ी नहीं की। अगर किसी तरह की असहिष्णुता होती तो यहां उसका असर तो दिखता। साहित्य अकादमी ही क्यों अगर हम संगीत नाटक अकादमी की बात करें तो वहां भी समावेशी माहौल है। संगीत नाटक अकादमी की जो समिति है उसमें कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर को इसी सरकार ने नामित किया। नक्सली होने का आरोप झेल रहे एक शख्स के रिश्तेदार को संगीत नाटक अकादमी ने पुरस्कृत किया। कहीं कोई विरोध या कहीं किसी तरह की हलचल तक नहीं हुई। इसी तरह से आरोप लगता है कि नियुक्तियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर नियुक्तियां होती हैं। यह भी मिथ्या आरोप है। ऐसे ऐस शख्सियतों को सरकार ने अहम जिम्मेदारी दी है जो घोषित तौर पर मोदी और संघ के विरोधी रहे हैं। इस स्तंभ में समय समय पर ऐसे लोगो के बारे में लिखा जाता रहा है, जिसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है।
असहिष्णु तो मोदी के पहले की सरकारें थीं। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि जब 2004 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा और कांग्रेस की अगुवाई में वामपंथियों के समर्थन से सरकार बनी तो साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में क्या हुआ था। 2005 में संगीत नाटक अकादमी के अद्यक्ष के पद से सोनल मानसिंह को बर्खास्त कर दिया गया था। यह पहली बार हुआ था कि राष्ट्रपति के आदेश से संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष को पद से हटाया गया। उस दौर के अखबारों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि सोनल मानसिंह को वामपंथी दलों के दबाव में हटाया गया था। इसी तरह से तत्कालीन सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष अनुपम खेर को हटा दिया गया था। तब पार्टी के पत्र पीपल्स डेमोक्रेसी में हरकिशन सिंह सुरजीत ने लेख लिखकर अनुपम खेर को हटाने की बात की थी और खेर को संघ का आदमी करार दिया था। इस तरह के कई वाकए उस दौर में हुए थे लेकिन तब की सरकार को किसी ने असहिष्णु नहीं कहा था। इस वक्त की यूपीए सरकार पर किसी कोने अंतरे से फासीवाद को बढ़ावा देने का आरोप नहीं लगाया गया था। जब आप कोई काम करें और उसके लिए आपको जिम्मेदार ना ठहराया जाए और जब आप वो काम ना करें तो उसके लिए आपको जिम्मेदार ठहराया जाए। यह किस तरह का मैनेजमेंट है इसको समझने की जरूरत है। दरअसल ये पूरा खेल अर्थ से जुड़ा है। जब तक अनुदान मिलता रहता है वामपंथ से जुड़े संगठन या उस विचारधारा के खुद को करीब माननेवाले खामोश रहते हैं और जहां आर्थिक मदद में कटौती होने की आशंका दिखाई देती है तो फासीवाद का शोर मचने लगता है ताकि सरकार पर दबाव बने और इस तरह के आरोपों से बचने के लिए आर्थिक मदद में कटौती नहीं हो सके। आजाद भारत की ये इकलौती और पहली सरकार है जो उन संगठनों को मदद करती है जिसके मंच पर से उसके सबसे बड़े नेता की व्यक्तिगत और वैचारिक दोनों आलोचना की जाती है।

Saturday, November 17, 2018

राजनीति का औजार बनती कला


साहित्य और कला को राजनीति का औजार नहीं बनाया जाना चाहिए लेकिन हमारे देश में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। हमारे यहां साहित्य और कला को दशकों से राजनीति के औजार के तौर इस्तेमाल किया जाता रहा है। होता यह है कि जब किसी राजनीतिक दल की साख छीजती है तो उसको किसी सहारे की जरूरत होती है तो वो साहित्य कला की ओर देखने लगता है। साहित्य और कला से मजबूत सहारा और क्या हो सकता है? इससे साख कायम होती है। इसके सैकड़ों उदाहरण हिंदी साहित्य और भारतीय कला जगत में मौजूद हैं जब कला को राजनीति औजार के तौर परर इस्तेमाल किया गया। हाल ही में संगीत से जुड़े एक और मसले पर जमकर राजनीति हुई। कर्नाटक संगीत के गायक टी एम कृष्णा इस राजनीति के औजार बने या उन्होंने इस राजनीति को आगे बढ़ाने में मदद की इसपर बात करना बहुत आवश्यक है। आवश्यक यह भी है कि कला के नाम पर अपनी राजनीति करनेवालों से सवाल पूछे जाएं।
दरअसल ये पूरा मामला दिल्ली में एक आयोजन से जुड़ा है। दिल्ली के इस आयोजन में टी एम कृष्णा के साथ सोनल मानसिंह का भी कार्यक्रम तय और विज्ञापित किया गया था। इस कार्यक्रम की आयोजक स्पिक मैके नाम की संस्था थी और प्रायोजक एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया था। जब ये कार्यक्रम विज्ञापित हुआ तो इसको लेकर सोशल मीडिया पर विमानन मंत्रालय की आलोचना शुरू हो गई। आलोचना का आधार यह था कि मोदी विरोधी को एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया कैसे प्रोयजित कर रही है। इस आलोचना को वाम दलों से सहानुभूति रखने या खुद को उस विचारधारा के करीब पानेवाले लोगों ने दक्षिणपंथी ट्रोल का हमला करार दिया। विरोध करने का हक सबको है, उसको ट्रोल कह देना अन्यायपूर्ण है। यह सब चल ही रहा था कि एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने इस कार्यक्रम से अपना हाथ खींच लिया।
एयरपोर्ट अथॉरिटी के इस कदम के बाद अभिव्यक्ति की आजादी के चंद झंडाबरदारों को इसमें एक अवसर नजर आया। अवसर अपनी राजनीति चमकाने का, अवसर अपने राजनीतिक आकाओं को राजनीति की जमीन और औजार देने का। अब जिस तरह के ट्वीट को लेकर इन लोगों ने कार्यक्रम के विरोधियों को दक्षिणपंथी ट्रोल करार दिया था उससे ज्यादा आक्रामक तरीके से सरकार पर कुछ लोगों ने हमले करने शुरू कर दिए पर मैं अपने इस लेख में उनको वामपंथी ट्रोल नहीं कहूंगा। क्योंकि संवाद में या लेखन में शब्दों के चयन में बहुत सावधान रहने की जरूरत होती है। शब्द लेखक की मानसिकता को उजागर करते चलते हैं। इस पूरे मसले पर स्तंभकार रामचंद्र गुहा भी अति उत्साह में ऐसे शब्दों का प्रयोग कर बैठे जो उनके इतिहासकार होने के दावे पर ही प्रश्नचिन्ह लगा गया। रामचंद्र गुहा ने अपने लेख में यह लिखा दिया कि कृष्णा को दिल्ली में गाने से रोकना असभ्य दुनिया का परिचायक है। रामचंद्र गुहा के ट्वीटर हैंडल पर उन्होंने अपने परिचय में खुद को लोकतंत्र का इतिहासकार बताया है। अब वो कैसे इतिहासकार हैं इसको उनके उपरोक्त शब्दों के चयन से समझा जा सकता है। एक कार्यक्रम के रद्द होने से दुनिया को असभ्य करार देना अतिवाद है। आगे भी अपने उस लेख में गुहा ने कृष्णा को अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर महान संगीतज्ञ करार दिया है। हो सकता है कृष्णा उतने ही महान हों, जितना राम गुहा उनको साबित करने में लगे हैं। लेकिन मुझे याद है कि कुछ अरसा पहले कृष्णा ने एक पत्रिका में महान गायिका सुबुलक्ष्मी के बारे में एक लेख लिखा था। उस लेख में कृष्णा ने लक्ष्मी के बारे में अनर्गल, आधारहीन बातें की थीं और उनपर घटिया व्यक्तिगत लांछन भी लगाए थे। कृष्णा ने वो लेख तब लिखा था जब सुबुलक्ष्मी का निधन हो चुका था और आरोपों पर सफाई देनेवाला कोई था नहीं।
गुहा को कृष्णा महान कलाकार लगते हैं, इसी तरह कुछ लोगों को कृष्णा की महानता पर तब शक हुआ था जब वो मुंबई हमले के गुनहगार आतंकवादी अजमल कसाब के मानवाधिकार को लेकर चिंतित हुए थे। दरअसल गुहा जैसे इतिहासकार लगातार अपना गोलपोस्ट बदलते रहते हैं, जब जैसी बहे बयार, पीठ तब वैसी कीजिए के सिद्धांत पर चलते रहते हैं। इस वजह से प्रचुर मात्रा में लेखन करने के बावजूद उनको एक इतिहासकार के रूप में मान्यता मिलना शेष है। अब भी स्थापित इतिहासकार गुहा को कोशकार ही कहते हैं। साख के लिए शब्दों के चयन में सावधान रहना बेहद आवश्यक है।
कृष्णा का मोदी विरोध जगजाहिर है, वो राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के खिलाफ भी लगातार बोलते लिखते रहे हैं। उनकी प्राथमिकताएं भी जगजाहिर हैं। अब अगर उनकी इस विचारधारा के आधार पर उनका कार्यक्रम स्थगित किया जाता तो चंद महीने पहले राजस्थान में उनका कार्यक्रम कैसे हो पाता। वहां भी तो भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और प्रायोजक भी संभवत: सरकार ही थी। हिंदी में तमाम ऐसी प्रत्रिकाएं छपती हैं जिनमें भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारों के बड़े बड़े विज्ञापन होते हैं और उसके संपादकीय में मोदी सरकार की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। संस्कृति मंत्रालय ने कई ऐसे कार्यक्रमों को प्रोयजित किया है और उनको आर्थिक मदद दी है, जहां मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जमकर आलोचना की गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देश को बांटने वाला संगठन तक करार दिया गया। अगर सरकार किसी कार्यक्रम को इस आधार पर रोकती तो इस तरह के आयोजनों को या इन पत्रिकाओं को कोई आर्थिक मदद नहीं मिल पाती। कृष्णा का कार्यक्रम राजस्थान में नहीं हो पाता।दूसरी बात यह कि दिल्ली का कार्यक्रम सिर्फ कृष्णा का नहीं था, इसमें अन्य कलाकार भी थे। उसमें से एक कलाकार सोनल मानसिंह भी थीं जिनको कि मोदी सरकार ने राज्यसभा में मनोनीत किया है।
स्पिक मैके के कार्यक्रम के रद्द होने में दिल्ली की केजरीवाल सरकार को एक अवसर नजर आया। ये अवसर भी राजनीति का भी था और अपनी सरकार को अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार के तौर पर स्थापित करने का भी। आनन फानन में यह तय किया गया कि कृष्णा का कार्यक्रम उसी तिथि को दिल्ली में आयोजित किया जाएगा जिस तिथि का कार्यक्रम रद्द हुआ। उसके बड़े बड़े विज्ञापन छपे और कार्यक्रम को आवाम की आवाज का नाम दिया गया। विज्ञापनों में कृष्णा की तस्वीर के साथ दिल्ली के उपमुख्यमंत्री की भी बड़ी सी तस्वीर छपी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी जनता से इस कार्यक्रम में आने का अपील की। लेकिन इसमें भी राजनीति हो गई क्योंकि दिल्ली सरकार ने सिर्फ कृष्णा को आमंत्रित किया और सोनल मानसिंह और अन्य कलाकारों को छोड़ दिया। क्या सोनल और अन्य कलाकारों ने कोई गुनाह किया था। या कला भी अब राजनीति के खांचे में बंटकर प्रदर्शित की जाएगी। कला के राजनीति का पिछलग्गू बनने का यही सबसे बड़ा नुकसान दिखाई देता है।
इस मसले पर जो राजनीति हो रही है उसमें देश के प्रधानमंत्री तक को घसीट लिया गया है। दरअसल चार राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं और चंद महीनों के बाद लोकसभा के चुनाव होने हैं। अब आने वाले दिनों में इस तरह के मसलों को और हवा देकर मौजूदा मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश होगी। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले जिस तरह से असहिष्णुता के मुद्दे पर पुरसाकर वापसी का अभियान चालाया गया था, उसी की तर्ज पर कुछ करने की कोशिश होगी। इस बात के पुख्ता संकेत एक डेढ़ साल पहले से मिलने शुरू हो गए, जब दिल्ली में एक खास विचारधारा के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का जमावड़ा हुआ था और ये घोषणा की गई थी कि पूरे देशभर में गोष्ठियों और कार्यक्रम किए जाएंगे ताकि कथित तौर पर सांप्रदायिक शक्तियों को मात दी जा सके। जुटान के नाम से दिल्ली में आयोजित इस गोष्ठी में जिस तरह के भाषण इत्यादि हुए थे उसने भी उनके इरादे साफ कर दिए थे।दरअसल अगर हम देखें तो वामपंथी विचारधारा के लेखक हमेशा से ये काम करते रहे हैं। लेखक संगठनों की भमिका उनकी स्थापना के बाद से इस तरह से बदलती चली गई कि वो अपने राजनीतिक दलों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह से काम करने लगे। साहित्यिक लेखन भी राजनीति दलों की उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाने लगा। हिंदी कविता इस तरह से नारेबाजी की शक्ल में लिखी जाने लगी कि पाठक उससे दूर होने लगे। मशहूर अमेरिकी कवि गिंसबर्ग ने कहा भी था कि कविता कभी भी पार्टी लाइन को अभिव्यक्त करने का माध्यम नहीं हो सकती है। रात को सोते समय जब कोई शख्स अपनी निजी सोच को सार्वजनिक करने के बारे में सोचता है तो कविता आकार लेने लगती है। अमूमन कवि से अपेक्षा भी यही की जाती है। लेकिन ज्यादातर हिंदी कविता इसके उलट पार्टी लाइन पर चलती रही और पाठकों से दूर होती चली गई। कला को राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमाल करनेवालों को चिन्हित करना जनता को बताना बेहद आवष्यक है।      

Monday, November 12, 2018

किताबों से राजनीति की प्रवृत्ति


शशि थरूर, समकालीन राजनीति का एक ऐसा नेता जिनका विवाद के साथ चोली दामन का साथ है।कई बार विवाद हो जाता है,जबकि बहुधा वो विवादों को आमंत्रित करते हैं। पिछले दिनों उनकी किताब द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर आई थी जो नरेन्द्र मोदी पर केंद्रित है। पैराडॉक्सिकल का शाब्दिक अर्थ तो मिथ्याभासी होता है परंतु इस पुस्तक में पैराडॉक्सिकल को परोक्ष रूप से एक विशेषण की तरह केंद्र में रखा गया है जिसका अर्थ होता है लोक-विरुद्ध। इस विशेषण को व्याख्यायित और स्थापित करने के लिए शशि ने तर्क जुटाए और उसको किताब की शक्ल दे दी। अपनी इस किताब में थरूर ने अंग्रेजी के इस शब्द को इस तरह से इस्तेमाल किया जिससे कि ये पुस्तक और उसका शीर्षक दोनों उनकी और उनकी पार्टी कांग्रेस की राजनीति के लिए फायदेमंद हो और पार्टी में उनका भी कद बढ़े। इस पुस्तक के विमोचन पर जिस तरह से नेताओं का जमावड़ा लगा था वो भी इस बात को पुष्ट भी करता है। विमोचन के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर पूर्व केंद्री मंत्री चिदंबरम, अरुण शौरी ने प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा किया था। जमकर राजनीतिक बयानबाजी हुई थी। शशि का अंग्रेजी भाषा ज्ञान बहुत जबरदस्त है और वो अपनी इस प्रतिभा का उपयोग बहुधा ट्वीटर पर करते भी रहते हैं। उस भाषा ज्ञान का दर्शन यहां भी पाठकों को होता है।
किताब से सियासत की बात इस वजह से भी पुष्ट होती है कि थरूर अब नेहरू पर लिखी अपनी पुरानी किताब को भी राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमान करने जा रहे हैं। डेढ़ दशक पहले 2003 में थरूर ने जवाहरलाल नेहरू पर एक किताब लिखी थी, नेहरू, द इंवेन्शन ऑफ इंडिया। अब इस पुस्तक के नए संस्करण का विमोचन कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी 13 नवंबर को करेंगी। स्टैच्यू ऑफ यूनिटि को लेकर सरदार पटेल और उनके योगदान की पूरे देश में जमकर चर्चा हो रही है। ऐसे माहौल में नेहरू पर पंद्रह वर्ष पूर्व लिखी और प्रकाशित पुस्तक का विमोचन समारोह करना और उसमें सोनिया गांधी का आना साफ तौर पर एक राजनीति का संकेत कर रहा है। पुस्तक प्रकाशन जगत में इस तरह की कोई परंपरा नहीं रही है कि किसी किताब के नए संस्करण को समारोहपूर्वक जारी किया जाए। जिस तरह से शशि की किताब द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर में नेताओं का जमावड़ा लगा था उससे ये अंदाज लगाया जा सकता है कि नेहरू वाली किताब के विमोचन में भी विपक्षी दलों के नेताओं का जुटान होगा। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के बीच यहां राजनीतिक भाषण से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह की राजनीति अमेरिका में जमकर होती रही है, वहां चुनाव के पहले नेताओं को केंद्र में रखकर पुस्तकें लिखी जाती रही हैं और फिर उसके आधार पर पक्ष और विपक्ष में माहौल बनाया जाता है। हमारे देश के लिए यह एक नई प्रवृत्ति है जिसमें ये देखना दिलचस्प होगा कि इसका असर चुनावी राजनीति पर कितना गहरा होता है।   


Saturday, November 10, 2018

हिंदी साहित्य जगत में सन्नाटा



इन दिनों समकालीन हिंदी साहित्य में सन्नाटा पसरा हुआ है। ना कोई रचनात्मक स्पंदन, ना ही किसी प्रकार का कोई साहित्यिक वाद-विवाद, ना ही किसी लेख आदि से विचारोत्तेजक माहौल, ना ही की साहित्यिक आंदोलन खड़ा हो पा रहा है। इस वर्ष कोई ऐसी कृति भी नहीं आई है जिसको लेकर साहित्य जगत में क्रिया-प्रतिक्रिया वाला माहौल हो। हिंदी साहित्य के फॉर्मूलाबद्ध जुमले में कहें तो नई जमीन तोड़ती कोई रचना भी इन दिनों नहीं आई है। कोई साहित्यिक फतवेबाजी भी सुनने को नहीं मिल रहा है। साहित्य जगत में व्याप्त इस सन्नाटे की कई वजहें हो सकती हैं। कुछ लेखकों की खामोशी से तो ये लगता है कि वो दम साधे 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन इस श्रेणी में तो वही लेखक आते हैं जो बहुत सोच समझकर, शतरंज की तरह अपनी चाल चलते हैं। इस कोष्ठक के लेखक इंतजार कर रहे हैं कि सरकार बदले तो उस हिसाब से लेखन प्रारंभ करें। इसके अलावा जो दो तीन वजहें मुझे समझ में आ रही हैं उनमें से पहली वजह लघु पत्रिकाओं के चरित्र का बदल जाना है। 
हिंदी साहित्य के परिदश्य को वैचारिक उतेजना प्रदान करने में इन लघु पत्रिकाओं का बड़ा योगदान रहा है। हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरूआत 1957 में ङुई थी, ऐसा माना जाता है, जब बनारस से विष्णुचंद्र शर्मा ने कवि पत्रिका का संपादन शुरू किया था। उसके बाद तो व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरोध में ढेर सारी लघु पत्रिकाएं निकलीं। इसके पहले भी हिंदी साहित्य में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक समृद्ध इतिहास मौजूद है लेकिन कवि पत्रिका के प्रकाशन के बाद जिस तरह से लघु पत्रिका आंदोलन के नाम से इस तरह की पत्रिकाओ का प्रकाशन शुरू हुआ उसने साहित्यिक परिदृश्य को जीवंत बनाए रखा। लंबे समय तक लघु पत्रिकाएं निकलती रही लेकिन बाद में वो अपनी राह से भटक गईं। आज लघु पत्रिका आंदोलन अरना चरित्र ही नहीं बल्कि स्वरूप भी खो चुका है। जब लघु पत्रिका आंदोलन की शुरूआत हुई थी तो ये उपक्रम अव्यावसायिक था लेकिन ये जो भटकाव आया उसने इन पत्रिकाओं को घोर व्यावसायिक बना दिया। ज्ञानरंजन के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका पहल को अगर देखें तो शुरूआती अंकों में पहल की जो प्रतिबद्धता थी वो बाद के अंकों में छीजती चली गई। बाद के अंकों में पहल में खूब विज्ञापन छपने लगे थे जिससे पत्रिका का खर्चा ते निकल ही जाता था, उनके कर्ताधर्ताओं को लाभ भी होने का अंदाज लगाया जाता था। इस मामले में राजेन्द्र यादव ने ईमानदारी बरती और उन्होंने जब हंस पत्रिका का पुर्प्रकाशन शुरू किया तो उसके अव्यावसायिक होने की घोषणा या दावा नहीं किया। वो हंस को कंपनी की तरह चलाते रहे और उसके लाभ हानि की चिंता भी करते रहे। इसी तरह से अखिलेश के संपादन में निकलने वाली पत्रिका तद्भव एक बेहतरीन और स्तरीय साहित्यक पत्रिका है लेकिन उसमें जितने विज्ञापन होते हैं उससे ये प्रतीत होता है कि पत्रिका का बैलेंस सीट हमेशा मुनाफा ही दिखाता होगा।
अब लघु पत्रिकाओं ने अपना चाल चरित्र और चेहरा तीनों बदल लिया है। लघु के नाम को भी छोड़ दिया है। अब तो साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर व्यक्तिगत बातचीत में भी लघु शब्द का प्रयोग नहीं होता है। साहित्य छापने वाली इन पत्रिकाओँ को अब मोटे तौर पर तीन श्रेणी में विभाजित किया जा सकता है। अध्यापकीय, सांस्थानिक और व्यक्तिगत। व्यक्तिगत श्रेणी में वैसी पत्रिकाएं आती हैं जो ज्यादातर किसी ना किसी लेखक पर विशेषांक निकालती हैं। बड़े लेखकों को विशेषांक निकालकर संपादक अपना हित साधता है, उसको साहित्य से कुछ लेना देना नहीं होता है। इस काम के लिए किसी साहित्यिक दृष्टि की आवश्यकता भी नहीं होती है, बस आपको कुछ लेखकों को जानना आवश्यक होता है जिससे तय लेखक पर लेख लिखवाए जा सकें और हित साधक अंक प्रकाशित हो सके। इस तरह की पत्रिका से वैसे लेख की अपेक्षा करना व्यर्थ हो जिससे साहित्य जगत में किसी तरह का विमर्श खड़ा हो सके।
पत्रिका की दूसरी श्रेणी है अध्यापकीय। इस तरह की पत्रिकाएं रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स के यहां रजिस्टर्ड होती हैं और उनके पास भारत सरकार से जारी किया जानेवाला एक विशेष नंबर जिसको आई एस एस एन नंबर कहते हैं वो भी होता है। इस तरह की पत्रिकाओं में ज्यादातर लेख हिंदी के अध्यापकों के छपते हैं जो अध्ययन-अनुशीलन टाइप से लिखा जाता है। यह विशुद्ध कारोबार है। इसमें संपादक अध्यापकों से पैसे लेकर उनके लेख छापते हैं। आरएनआई से रजिस्टर्ड और आईएसएसएन नंबर वाली इन पत्रिकाओं में लेख छपने से अध्यापकों को प्रमोशन आदि में लाभ मिलता है। यह एक कारोबार की तरह फल फूल रहा है जिससे संपादक के अलावा देशभर के ज्यादातर अध्यापक लाभान्वित होते हैं। यह कुटीर उद्योग की तरह विकसित हो गया है। जहां जहां कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं वहां वहां इस तरह की एक पत्रिका का प्रकाशन आपको अवश्य मिलेगा। इन व्यावसायिक पत्रिकाओ से भी किसी प्रकार के वैचारिक उद्वेलन की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। बच गई सांस्थानिक पत्रिकाएं जो ज्यादातर सरकारी या अर्धसरकारी अकादमियों या संस्थाओं से निकलती है। इस तरह की पत्रिकाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, मंत्रियों से लेकर विभागीय अध्यक्षों के संदेशों के साथ पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। किसी भी तरह की कोई विवादास्पद रचना इसमें छप नहीं सकती हैं। इल तरह की पत्रिकाओं को निकालनेवाले ज्यादतर संपादक पत्रिका की साज सज्जा से लेकर उसके प्रस्तुतिकरण पर ध्यान देते है। उसमें भी कभी कभार गलतियों हो जाती हैं। जैसे विदेश मंत्रालय के एक उपक्रम से निकलनेवाली पत्रिका में विभागीय मंत्री सुषमा स्वराज का नाम सुषमा स्वराज्य छप गया था। पत्रिका के संपादन स जुड़े शख्स का दावा है कि मंत्रालय ने मैटर सीधे प्रेस में भेज दिया था जिससे ये चूक हुई। इस तरह से माहौल में जो पत्रिकाएं निकलती हों उनसे रचनात्मक उत्कृष्टता की अपेक्षा व्यर्थ है।
लघु पत्रिकाओं के खत्म होने या उसके चरित्र और स्वरूप बदल जाने के अलावा हिंदी साहित्य में रचनात्मक सन्नाटे की जो वजह मेरी समझ में आती है वो है अच्छी कृतियों को अच्छी और खराब कृतियों को खराब कहने के साहस का अभाव। अब वो जमाना बिल्कुल नहीं रहा कि किसी कृति को आप खराब कहें। हिंदी में प्रकाशित हो रही सभी कृतियां बेहतरीन होती हैं, अपनी तरह की अनूठी होती हैं, उस तरह की रचना पहले कभी नहीं आई हुई होती हैं, आदि आदि। ये अतिशयोक्ति नहीं है बल्कि साहित्यिक पत्रिकाओं से लेकर सोशल मीडिया और फेसबुक पर आपको इस तरह की टिप्पणियां बहुतायत में दिख जाएंगीं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पाठक साहित्य से दूर होने लगे। प्रशंसात्मक समीक्षाएं या टिप्पणियां पढ़कर आम पाठक कोई कृति खरीद तो लेता है लेकिन पढ़ने के बाद जब वो खुद को ठगा हुआ महसूस करता है तो साहित्यिक समीक्षाओं और टिप्पणियों से उसका भरोसा उठ जाता है। मेरा यह मानना है कि जब किसी लेखक की ज्यादा तारीफ होने लगती है तो उसकी रचनात्मकता छीजने लगती है।। ऐसे दर्जनों उदाहरण साहित्य में हैं, लगभग दर्जनभर कहानीकार तो हैं ही जिनकी कहानियां 1990 के बाद के वर्षों में हंस में छपकर चर्चित और प्रशंसित हुई थी। इतनी प्रशंसित हुई कि अब वो लेखक कहां हैं इसका पता कर पाना मुश्किल हो गया है।
साहित्यिक परिदृश्य में सन्नाटे की एक अन्य वजह जो मुझ समझ में आती है वह है स्थापित लेखकों का ना लिखना। यहां यह पूछने का मन करता है कि हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश की आखिरी कहानी कब प्रकाशित हुई थी। लंबी कहानी को उपन्यास की श्रेणी में रखकर साहित्य अकादमी ने उनको पुरस्कृत किया लेकिन उसके बाद उनका कौन सा उपन्यास आया ये साहित्य जगत जानना चाहता है। अब वो देश विदेश के साहित्यिक कार्यक्रमों में मंच से साहित्य पर ज्ञान देते हैं। क्रांतिकारी कवि आलोक धन्वा हिंदी के बड़े कवि माने जाते हैं लेकिन उनकी आखिरी कविता कब प्रकाशित हुई। अरुण कमल भी साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि हैं लेकिन उनके लिखने की रफ्तार भी अपेक्षाकृत कम है। यह भी नहीं है कि इनकी अवस्था वो हो गई है कि ये लिख नहीं पाएं। दरअसल स्थापित लेखकों की निरंतरता बेहद आवश्यक है।
हिंदी साहित्य में राजेन्द्र यादव के जाने से बाद से सार्वजनिक बुद्धिजीवी की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही है। अशोक वाजपेयी से उम्मीद थी लेकिन वो वामपंथ के चंगुल में इस कदर फंस गए हैं कि उनका वक्तव्य राजनीतिक होता है, साहित्यिक सवालों से भी जब वो मुठभेड़ करते हैं तो उसमें भी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से राजनीति ले आते हैं। लेखक संघों की तो बात करना ही व्यर्थ है। साहित्य जगत में व्याप्त इस सन्नाटे को अगर जल्द नहीं तोड़ा गया तो इसका असर बहुत गहरा होगा।

Saturday, November 3, 2018

सांस्कृतिक मंच से सियासत


हाल ही में भारतीय जन नाट्य संघ यानि इप्टा का प्लैटिनम जुबली समारोह पटना में मनाया गया। हर संस्था अपनी स्थापना के महत्वपूर्ण पड़ावों पर समारोहों का आयोजन करती है। भारतीय जन नाट्य संघ ने भी किया। आजादी के पहले स्थापित इस संस्था का उद्देश्य नाटकों के माध्यम से सांस्कृतिक जागरण फैलाना था। ये संस्था शुरू से ही वामपंथी विचारकों द्वारा स्थापित थी और कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक ईकाई के रूप में काम करती रही है। इसी स्थापना के संकेत प्रगतिशील लेखक संघ की 1936 में हुई बैठक में ही मिलने लगे थे और सात साल बाद स्थापना हो गई। आजादी मिलने के बाद भारतीय जन नाट्य संघ ने अपने नाटकों के माध्यम से जमकर वामपंथी विचारधारा का प्रचार किया, लेखन और मंचन दोनों में। वामपंथी और कांग्रेसी सरकारों की छत्रछाया में ये संगठऩ खूब फले फूले भी, लेकिन जब वामपंथी विचारधारा धीरे-धीरे एक्सपोज होने लगी तो इस तरह के संगठनों की ताकत भी कम होती चली गई। ये संगठन अपने मातृ संगठनों के लिए काम करते रहे। प्रगतिशील लेखक संघ से लेकर जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे संगठन किसी भी फैसले के लिए अपने राजनीतिक आका का मुंह जोहते रहे। उनके निर्देशों के पालन में साहित्य और संस्कृति को ढाल बनाकर राजनीति करते रहे। इस तरह के सैकड़ों वाकए हैं जब इन संगठनों ने साहित्य कला और संस्कृति को ढाल बनाकर राजनीति की। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद असहिष्णुता की मुहिम हो या पुरस्कार वापसी का अभियान हो, इन सबके पीछे यही मानसिकता काम करती रही। ये उस सुविधापरक राजनीति का अंग है कि जिसके तहत वो लेखक जो अशोक वाजपेयी को कल्चरल माफिया और भारत भवन को अजायबघर कहते नहीं थकते थे वो सभी आज अशोक वाजपेयी और रजा फाउंडेशन के झंडे तले एकजुट नजर आते हैं। यह उसी सुविधाजनक राजनीति का हिस्सा है जो एम एफ हुसैन पर हमले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखता है और दूसरी तरफ तस्लीमा नसरीन पर हमला होता है तो खामोशी छा जाती है। इस तरह के इतने उदाहरण हैं कि एक पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। संस्कृति के नाम पर राजनीति करना कोई इनसे सीखे।
हम बात कर रहे थे पटना में आयोजित जन नाट्य संघ के समारोह की जिसमें एक बार फिर से जमकर राजनीति हुई। नाटकों की आड़ में राजनीति का ये बेहतर नमूना है। इसके उद्घाटन सत्र में मंच पर बैठे वक्ताओं की सूची से ही पता चल जाता है कि आयोजकों की मंशा क्या रही होगी। शबाना आजामी, एम के रैना. जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी। शबाना आजमी, एम के रैना की बात तो समझ में आती है कि वो रंगकर्म से जुड़े हुए लोग हैं। कन्हैया ने भी ये बताया कि वो बचपन में अपने गांव में इप्टा में सक्रिय थे । उन्होंने स्वीकार किया कि वो अपने गांव में इप्टा में सक्रिय न होते तो उनमें ये चेतना भी न आयी होती। उन्होंने आगे स्वीकार किया वो जो 'आज़ादी ' का गाना गाते हैं वो भी इप्टा  का ही है।  उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस वक्त देश में बहुत सारे ऐसे स्टैंडअप कॉमेडियन हैं जो इप्टा जैसे किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं लेकिन उनके कंटेंट उतने प्रगतिशील हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को साथ जोड़ने की वकालत भी की। वो उस तरह के स्टैंड अप कॉमेडियंस की बात कर रहे थे जो मंच पर खड़े होकर नरेन्द्र मोदी का मजाक उड़ाते हैं। प्रगतिशीलता की पहली शर्त ही नरेन्द्र मोदी की आलोचना या उनका मजाक उड़ाना है। ये ठीक भी है क्योंकि कन्हैया कुमार तो राजनीति कर रहे हैं और उनके इरादे बिहार के बेगूसराय लोकसभा चुनाव से निर्वाचित होने की भी है। उसके लिए वो तैयारी भी कर रहे हैं। एक चतुर राजनेता की तरह वो इप्टा के मंच का इस्तेमाल भी करते हैं। उनको मालूम है कि सूबे की राजधानी में आयोजन हो और उसमें मौजूदा केंद्रीय हुकूमत पर हमला बोला जाए तो मीडिया में जगह मिलेगी ही।
अगर ये मान भी लिया जाए कि कन्हैया का रंगकर्म से कोई लेना देना है लेकिन यह मानना मुश्किल है कि जिग्नेश मेवाणी का नाटक से कोई लेना देना है। जिग्नेश गुजरात से निर्दलीय विधायक हैं जिनको कांग्रेस का समर्थन है। जिग्नेश ने इप्टा के मंच से राजनीतिक भाषण दिया और कहा कि संगठन को सिर्फ लाल और नीले रंग की चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि सभी रंगों का ख्याल रखना चाहिए। रंगों की बात इस वजह से चली कि शबाना ने अपने भाषण में भी रंग से बात शुरू की थी। शबाना ने कहा था कि जब वो छोटी थी तो अपने पिता कैफ़ी आज़मी साहब उनको मदनपुरा के मज़दूरों के रैली में ले जाते थे। जब दुनिया में आँखे खोलीं तो सबसे पहले   लाल रंग ही देखी। उनका मानना है कि लाल रंग लोगों को जोड़ने के काम आता है। उन्होंने लाल रंग की महत्ता स्थापित करने के बाद कहा कि आज लड़ाई धर्म और मज़हब की नहीं बल्कि विचारधारा की है। उन्होंने बेहद चतुराई के साथ कहा कि वो एक महिला हैं, बेटी हैं, पत्नी हैं, फिल्म अभिनेत्री हैंसामाजिक कार्यकर्ता हैंऔर एक मुस्लिम भी हैं। जोर देकर कहा कि मुस्लिम शब्द आते ही उनकी सारी पहचान गौण हो जाती हैं और सिर्फ मुस्लिम के तौर पर पहचान बच जाती है। अब हमें इश बात पर विचार करना चाहिए कि ये भाषण एक सांस्कृतिक संगठन के मंच से हो रहा था। शबाना आजामी प्रकारांतर से राजनीति कर रही थी जिसको जिग्नेश मेवाणी जैसे नेता आगे बढ़ा रहे थे।
अगर हम देखें तो इप्टा के प्लैटिनम जुबली समारोह को राजनीति का मंच बना दिया गया। इस आयोजन का जिम्मा भारतीय जन नाट्य संघ की पटना ईकाई के जिम्मे था और इसके मुख्य पदाधिकारी लंबे समय तक राष्ट्रीय जनता दल के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के मुखिया रहे हैं। साफ है कि उनकी प्रतिबद्धता किस ओर है। इप्टा का ये आयोजन विपक्ष की राजनीति को मजबूत करने के लिए किया गया प्रतीत होता है। जिसमें अमूमन सभी वक्ताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। हद तो तब हो गई थी कि जब कांग्रेस के नेता शकील अहमद खान भी मंच पर पहुंचे और उन्होंने वहां से लगभग राजनीतिक भाषण दिया। कुछ लोगों का कहना है कि शकील अहमद खान ने कहा कि अब इस तरह के कार्यक्रम उन जगहों पर करने चाहिए जहां वक्ताओ की ऊंची आवाज को सुनने में दिक्कत ना हो।  दरअसल हुआ ये था कि आयोजन में मंचन और भाषण के दौरान तेज आवाज की वजह से पड़ोसियों को दिक्कत हो रही थी और पुलिस ने हस्तक्षेप की वजह से कार्यक्रम को मैदान से हटाकर हॉल में करना पड़ा था। वाम दलों के अलावा इस जुटान में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के नेता भी पहुंचे थे और मंचासीन भी हुए थे। इप्टा से ज्यादा ये समारोह विपक्षी दलों का सम्मेलन बन गया था।
बिहार की भूमि इस तरह की राजनीति को लेकर हमेशा से उर्वर रही है। पाठकों को याद होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले भी वामपंथियों ने इसी तरह से असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी का मुद्दा उठाया था। नीतीश कुमार की जीत के बाद उनमें से कइयों को पुरस्कृत भी किया गया। वामपंथियों की नीतीश कुमार से दिल्ली में मुलाकात भी हुई थी जिसमें ये तय किया गया था कि बुद्धिजीवियों के बीच नीतीश की छवि बनाने के लिए काम किया जाएगा। इस काम का टेंडर हो गया था,लेकिन ठेकेदारी शुरू हो पाती इसके पहले नीतीश कुमार ने ही महागठबंधन को छोड़ दिया। इसके बाद इस योजना पर पानी फिर गया। अब एक बार फिर से वामपंथियों ने अपने सांस्कृतिक संगठन के माध्यम से राजनीति की बिसात बिछानी शुरू कर दी है जिससे की लोसकभा चुनाव के पहले मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा सके। वाम दलों का तो कांग्रेस के साथ बने रहने का इतिहास रहा है, उन्होंने तो इमरजेंसी तक का समर्थन किया था। इसका उनको इनाम भी मिला था और इंदिरा गांधी ने देश के कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े सरकारी, गैर सरकारी और स्वयत्त संगठनों की कमान वामपंथियों को सौंप दी थी। पिछले चार साढे चार सालों में ये व्यवस्था बाधित हुई जिसका सबसे बड़ा असर कम्युनिस्टों पर ही पड़ा। लोकसभा चुनाव में उनको संभावना नजर आ रही है कि किसी तरह से भारतीय जनता पार्टी हारे और वो लोग एक बार फिर से सांस्कृतिक सत्ता की मलाई खा सकें। इनको ये नहीं भूलना चाहिए कि इसके लिए जनता का भरोसा जीतना होता है।   

Saturday, October 27, 2018

संस्कृति को अज्ञानता की चुनौती


आधीरात को सीबीआई के निदेशक और विशेष निदेशक को छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद जिस तरह का घटनाक्रम चला उसमें एक महत्वपूर्ण बहस दब गई। केंद्र सरकार के इस फैसले के ठीक पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने मुंबई में एक बयान दिया था जो सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के संदर्भ में था। स्मृति ईरानी ने कहा कि उनका इस बात में विश्वास है कि उनको प्रार्थना या पूजा का अधिकार है लेकिन अपवित्र करने का अधिकार नहीं है।अपनी इस बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह भी सवाल पूछा था कि क्या कोई रजस्वला स्त्री अपने दोस्त के घर सैनिटरी नैपकिन लेकर जाती है। ईरानी की पूरी बात को समग्रता में समझे बगैर उसपर हंगामा मचा दिया गया। खुद को प्रगतिशील कहनेवाली चंद महिलाओं ने इस बयान को इस तरह के पेश किया जैसे कि रजस्वला स्त्री को अपवित्र कहा जा रहा है। ये किसी भी बात को संदर्भ से काटकर पेश करने का नमूना था। संदर्भ सबरीमला मंदिर का था जहां से इस तरह की खबरें आ रही थीं कि कुछ महिला कार्यकर्ता सैनिटरी नैपकिन लेकर मंदिर में प्रवेश करने की जुगत में थीं। दरअसल सबरीमला मंदिर को लेकर यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही थी कि वहां 10 से 50 साल की किशोरियों और महिलाओं को प्रवेश नहीं होता था। लेकिन 28 सितंबर के अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आयुवर्ग की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की इजाजत दे दी थी। उसके बाद से मंदिर में प्रवेश को लेकर केरल में काफी विवाद हो रहा है। मंदिर में प्रवेश को लेकर ये विवाद काफी लंबे समय से चल रहा है, माना यह जाता रहा है कि इस तय आयुवर्ग में किशोरियां और महिलाएं रजस्वला हो जाती हैं तो उस दौर में मंदिर में ही नहीं जाना चाहिए। अब इसको परंपरा कह लें या रूढ़ियां कि ये आम भारतीय परिवारों में माना जाता है कि रजस्वला स्त्रियां पूजा पाठ नहीं करती हैं। स्त्रियां इसको स्वयं मानती हैं और उन दिनों में उसी के अनुसार काम करती हैं। दरअसल परंपरा और रूढ़ियों से ज्यादा ये मसला संस्कार और संस्कृति का है।   
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद महिला अधिकारों के झंडाबरदार काफी आगे चली गईं। उनको लगने लगा कि ये महिला अधिकारों का हनन है, स्त्री स्वातंत्र्य का गला घोंटा जा रहा है। उनको अगर ये महसूस हो रहा है तो यह उनका अधिकार है, लेकिन भारतीय समाज में स्त्रियों के जो संस्कार हैं या उनके त्याग के जो उदाहरण हैं वो अप्रतिम हैं। वो अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अपने अंग तक काट सकती हैं और कई उदाहरण तो ऐसे हैं कि स्त्रियों ने अपने प्राण भी त्याग दिए। पौराणिक कथा है जिसको देखा जाना आवश्यक है। कहानी के मुताबिक उत्तरापथ जनपद में उत्पलावती नाम का एक शहर था। उस शहर में भयंकर अकाल की वजह से लोगों का जीना कठिन हो गया था, भोजन मिलना अत्यंत मुश्किल था। उस दौर में वहां रूपावती नाम की एक बेहद सुंदर स्त्री रहती थी। एक बार रूपावती शहर घूमने निकली और घूमते घूमते एक घर में पहुंची जहां एक स्त्री ने बच्चे को जन्म दिया था। जन्म देनीवाली स्त्री इतनी भूखी थी कि उसने अपने जन्म दिए हुए बच्चे को ही खाने की इच्छा जताई। यह जानकर रूपावती ने उससे पूछा कि ये क्या कर रही हो। उस स्त्री ने कहा कि बहुत भूखी हूं इस वजह से अपने बच्चे के मांस से ही भूख मिटाना चाहती हूं। रूपावती ने फिर पूछा कि क्या तुम्हारे घर में अन्न नहीं है, क्या क्योंकि संतान तो दुर्लभ होती है। स्त्री ने रूपावती को उत्तर दिया कि मेरे घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं है और संसार में सबसे दुर्लभ तो जीवन है। रूपावती उसको भरोसा देती है कि वो अपने घर जाकर खाने का कुछ सामान लेकर आती है, लेकिन वो स्त्री भूख से इतनी व्याकुल थी कि उसने कहा कि जब तक तुम घर जाकर खाना लाओगी तबतक मेरी मृत्यु हो जाएगी। अब रूपावती के सामने संकट था। वो सोच रही थी कि अगर बच्चे को लेकर गई तो स्त्री भूख से मर जाएगी और अगर बच्चे को छोड़कर गई तो ये स्त्री उसको खा लेगी। उसी वक्त रूपावती सोचती है कि अगर वो अपने आत्मतेज, बल और उत्साह का सहारा लेकर इस स्त्री को अपने मांस से तृप्त कर दे तो दोनों की जान बच जाएगी। रूपावती ने उस स्त्री से पूछा कि तुम्हारे घर में कोई हथियार है। उस स्त्री ने उसको वह जगह बताई जहां कटार रखी थी। रूपावती ने उस तीखी कटार से अपने दोनों स्तन काटकर उस स्त्री को रक्त और मांस से तृप्त कर दिया। उसके बाद रूपावती ने उस स्त्री से वादा लिया कि वो जबतक अपने घर से उसके लिए खाने का सामान लेकर आती है तबतक वो अपने बच्चे को सुरक्षित रखेगी। रूपावती अपने घर पहुंची को उसके शरीर से रक्त बहता देख पति ने पूछा कि क्या हुआ तो उसने पूरा वाकया बताया और अनुरोध किया कि खाना लेकर उसके घर जाओ।
यह सुनकर उसके पति ने कहा कि भोजन लेकर तो तुम ही जाओगी। रूपावती के पति ने सत्य की शपथ की और कहा कि तेरे जिस सत्य वचन से इस प्रकार का आश्चर्यमय अभूतपूर्व धर्म हुआ है वह कभी ना तो देखा गया और ना ही कभी सुना गया। उस सत्य की महिमा से तेरे दोनों स्तन पूर्ववत हो जाएं। सत्य के शपथ के उच्चारण के साथ ही महिला के दोनों स्तन पूर्ववत हो गए। कहा जाता है कि रूपावती के इस त्याग को देखकर इंद्र का सिंहासन भी हिल उठा था। इंद्र भेष बदलकर रूपावती के मन की थाह लेने पहुंचे और पूछा कि तुम्हारे मन में क्या विचार आए थे जो तुमने ऐसा किया। रूपावती ने कहा कि उसने उसने जो किया वो न तो राज्य के लिए, न भोगों के लिए , न इंद्रपद के लिए और न चक्रवर्ती राजाओं जैसे साम्राज्य के लिए था।
दरअसल सच्चे कार्यकर्ता का जो त्याग होता है उसका ध्येय यही होता है कि जो बंधन में हैं वो बंधन मुक्त हो जाएं, जो निराश हैं उनके अंदर आशा का संचार हो और मुष्य के अंदर के दुख को समाप्त किया जाए। उसके लिए भाव महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय संस्कृति में भाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी इस भाव को देखा जाना आवश्यक है और मुझे तो कई बार लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय को अपने फैसले के बाद इन घटनाओं पर भी नजर रखना चाहिए। होना ह चाहिए कि कोर्ट के फैसले के बाद कोई रजस्वला स्त्री अगर चाहे जो जाए और पूजा और दर्शन करके लौट आए। यही भाव होना चाहिए। अपने रजस्वला होने का प्रदर्शन करते हुए पूजा करने जाना तो मंशा पर सवाल खड़े करता ही है। जब कोई स्त्री अपने रसजस्वला होने का प्रदर्शन कर मंदिर जा रही होती तो उसका भाव पूजा का या भगवान के दर्शन का नहीं होता है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वो प्रदर्शन के लिए जा रही हैं। स्मृति ईरानी का बयान इसी भाव को ध्यान में रखकर दिया गया प्रतीक होता है। उन्होंने तो इस बयान के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए। उनके बयान को छद्म-प्रगतिशीलता के आईने में देखा गया और बेवजह वितंडा खड़ा करने की कोशिश की गई। अगर बयान के भाव को समझा गया होता, अगर भारतीय संस्कृति और संस्कार का ध्यान रखा जाता तो इस तरह से विवाद खड़ा नहीं होता। विवाद खड़ा के लिए आवश्यक था कि बयान के साथ साथ पूरे मसले को इस तरह से पेश किया जाए कि इससे स्त्री का अपमान हुआ है। और यह कोई नई बात नहीं है, इस तरह से भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाने की पहले भी कोशिश हुई है। स्मृति ने कहीं ऐसा नहीं कहा कि मंदिर में रजस्वला स्त्री को नहीं जाना चाहिए। उसने कहीं नहीं कहा कि रजस्वला स्त्री अपवित्र होती है लेकिन इसको प्रचारित इसी तरह से किया गया। स्त्री को अधिकार दिलाने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई जाए, सैकडों सालों से चली आ रही मान्यताओं पर प्रहार किया जाए। कुरीतियों पर प्रहार जरूरी है लेकिन कुरीति, रूढ़ी और परंपरा में अंतर है और इस अंतर को जब प्रगतिशीलता का झंडा उठानेवाले लोग समझ जाएंगें तो इस तरह के अज्ञानतापूर्ण विवाद खड़े नहीं होंगे।

Friday, October 26, 2018

दुर्लभ पुस्तकों और चित्रों का खजाना


दिल्ली के फिरोजशाह रोड पर रवीन्द्र भवन में साहित्य अकादमी का कार्यालय 1961 में आया, इसके पहले अकादमी का दफ्तर कनॉट प्लेस से चलता था। जब 1961 में अकादमी रवीन्द्र भवन में शिफ्ट हआ तो वहां एक पुस्तकों की प्रदर्शनी लगी। उस पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान लोगों की तरफ से ये राय आई कि यहां एक स्थायी पुस्तकालय होना चाहिए और उसी वर्ष साहित्य अकादमी पुस्तकालय की स्थापना की गई। इस वक्त साहित्य अकादमी पुस्तकालय में एक लाख तेरासी हजार पुस्तकें हैं। इन पुस्तकों में खास बात ये है कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की सारी पुस्तकें यहां मौजूद हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कृतियों और साहित्य अकादमी प्रकाशनों के अलावा हर भाषा की पुस्तक यहां मौजूद है। इस पुस्तकालय में अलग अलग भाषाओं के 32 समाचार पत्र हर दिन आते हैं । इसके अलावा विभिन्न विषयों और आवर्तिता की दो सौ पत्रिकाएं भी साहित्य अकादमी पुस्तकालय में आती हैं। इस पुस्तकालय में हिंदी की करीब पचास हजार पुस्तकें उपलब्ध हैं। पुस्तकों के इतने बड़े भंडार में से अपनी पसंद की पुस्तकें ढूंढना आसान है क्योंकि सभी जानकारी कंप्यूटरीकृत हैं। पुस्तकों और पत्र पत्रिकाओं के अलावा यहां फोटो का विशाल भंडार है। साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों की तस्वीरें यहां सहेज कर रखी जाती हैं। पचास सालों से अधिक अवधि के महत्वपूर्ण फोटो यहां देखे जा सकते हैं। अकादमी के लाइब्रेरियन डॉ सूफियान अहमद ने बताया कि अकादमी के अन्य केंद्रों की लाइब्रेरी भी कंप्यूटर के माध्यम से दिल्ली केंद्र से जुड़े हैं और कोई किताब अगर मुंबई या बेंगलुरू में उपलब्ध है और सदस्य को चाहिए तो उसको मंगावा दिया जाता है।पिछले दिनों साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपीचंद नारंग ने निजी पुस्तकों का संग्रह अकादमी को दिया। इस संग्रह में उर्दू की कई दुर्लभ किताबें हैं।
साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी की सदस्यता बहुत आसान है। यहां कोई भी व्यक्ति जिसके पास वैध पहचान पत्र हो, दो हजार रुपए जमा करवाकर लाइब्रेरी का सदस्य बन सकता है। ये दो हजार रुपए गारंटी के तौर पर अकादमी के पास जमा रहेंगे और जब आप सदस्यता छोड़ेंगे तो आपको वापस मिल जाएंगे। अकादमी के पुस्तकालय की सदस्यता का सालाना रिन्यूल होता है जिसके लिए दो सौ रुपए देने होते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए सालाना शुल्क सौ रुपए ही है। लाइब्रेरी में एक बेहतरीन रीडिंग रूम भी है जहां बैठकर करीब सौ लोग पढ़ सकते हैं। अगर सदस्य चाहें तो किताबें इश्यू करवाकर घर भी ले जा सकते हैं। सदस्यों के लिए यहां प्रतिदिन एक घंटे तक मुफ्त इंटरनेट की व्यवस्था भी है। इस वक्त साहित्य अकादमी के साढे तेरह हजार सदस्य हैं जिनमें से 300-400 लोग रोजाना यहां आते हैं।  साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी तक पहुंचना भी बहुत आसान है। मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन से पैदल चलकर वहां पहुंचा जा सकता है। फिरोजशाह रोड पर साहित्य अकादमी की गेट पर ही बस स्टैंड भी है। यहां दिल्ली के विभिन्न इलाकों से बसें आती हैं। साहित्य अकादमी की लाइब्रेरी के पास एक कैंटीन भी है जहां भोजन और चाय-नाश्ते का प्रबंध भी है। अकादमी की लाइब्रेरी सोमवार से शुक्रवार तक खुली रहती है और इसका समय सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक है।

Saturday, October 20, 2018

विवाद से बिक्री बढ़ाने की जुगत


अंग्रेजी में प्रकाशित ज्यादातर आत्मकथात्मक पुस्तकों के प्रकाशन के पहले एक उत्सुकता का वातावरण बनाया जाता है या फिर किताब को लेकर सकारात्मक-नकारात्मक चर्चा की रणनीति तैयार की जाती है। चर्चा के लिए सबसे आसान होता है पुस्तक के किसी विवादास्पद हिस्से को प्रकाशन के पहले जारी कर देना। ये ट्रेंड पूरी दुनिया में है। पिछले कुछ सालों की पुस्तकों पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। जब ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की आत्मकथा अ जर्नी प्रकाशित होनेवाली थी तो प्रकाशकों ने उसके रसभरे प्रसंगो के चुनिंदा अंश लीक कर दिए। ये रणनीति जोरदार बिक्री का आधार बनी और प्रकाशन के चार हफ्ते के अंदर उसके छह रिप्रिंट करने पड़े। इसी तरह से न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादन जोसेस लेलीवेल्ड की गांधी पर लिखी किताब ग्रेट सोल महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया प्रकाशित होनेवाली थी तो लंदन के एक अखबार में लेख छपा था जिसका शीर्षक था, गांधी लेफ्ट हिज वाइफ टू लिव विद मेल लवर। लंदन के अखबार में छपी खबर के आधार पर मुंबई के एक समाचारपत्र ने लेख छाप दिया। जमकर विवाद हुआ। तब गुजरात विधानसभा में राज्य में पुस्तक पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पास हो गया था। बाद में जब किताब आई तो पता चला कि गांधी और उनके जर्मन मित्र हरमन कैलबाख के पत्रों के आधार पर लेखक ने ये संकेत देना चाहा कि गांधी समलैंगिक थे। प्रचारित ये किया गया कि गांधी के बारे में जोसेफ लेलीवेल्ड ने कोई नया तथ्य उद्घाटित किया है। किताब को पढ़ने के बाद ये साफ हुआ कि ये पुरानी बात है, लेकिन तबतक पुस्तक हिट हो चुकी थी। इसी तरह से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति कैनेडी पर मिमी अल्फर्ड की किताब वंस अपॉन अ सीक्रेट, माई अफेयर विद जॉन एफ कैनेडी एंड इट्स ऑफ्टरमाथ प्रकाशित होनेवाली थी तो पुस्तक के चुनिंदा अंश लीक करके किताब की बिक्री बढ़ाने का उपक्रम किया गया था।
हाल ही में जब भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल रहे और अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर जमीरउद्दीन शाह की किताब द सरकारी मुसलमान प्रकाशित होनेवाली थी तो 2002 के गुजरात दंगों को लेकर एक विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई। 2002 के गुजरात दंगों के वक्त शाह वहां सेना की अगुवाई कर रहे थे। अपनी पुस्तक में उन्होंने एक जगह लिखा है कि 1 मार्च को सुबह सात बजे तक अहमदाबाद एयरपोर्ट पर सेना के तीन हजार जवान पहुंच गए थे। राज्य सरकार ने सूबे के अलग अलग हिस्लों में सेना के जवानों की तैनाती के लिए गाड़ी आदि मुहैया करवाने में एक दिन की देरी की। लेखक का दावा है कि उन्होंने उस वक्त के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुबह दो बजे तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की मौजूदगी में अनुरोध किया था, बावजूद इसके सेना की तैनाती में देरी हुई।  इसको लेकर विवाद होना ही था, हुआ भी लेकिन यह भी पुस्तक की बिक्री का एक ट्रिक ही साबित हुआ क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी इस मामले में पहले ही सरकार को क्लीन चिट दे चुकी है।

उत्सवधर्मिता को बचाए रखने की चुनौती


भारतीय संवत्सर में दो नवरात्र धूमधाम से मनाए जाते हैं, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में। इन दोनों नवरात्र में शक्ति की पूजा की जाती है जो भारतीय समाज की विशेषता है। दो दिन पहले आश्विन नवरात्र खत्म हुआ है। नवरात्रों में शक्ति की पूजा की जाती है और दोनों शक्ति पर्व के पूर में मनाए भी जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से दुर्गा पूजा को लेकर अप्रिय विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। वर्ग विशेष के लोग देवी दुर्गा और महिषासुर को लेकर जिस तरह की बातें करते हैं वो व्यर्थ है। नाहक विवाद से समाज में कटुता पैदा होती है। आस्था पर प्रहार से समाज में वैमनस्य होता है। दुर्गा और काली की प्रतिमाओं पर टिप्पणी करने वालों को भारतीय समाज में धर्म और उससे जुड़े दर्शन के बारे में पता नहीं होता है। दुर्गा और काली को लेकर समाज के हर वर्ग में कितनी आस्था है और वो आस्था कितनी गहरी है इसको मापने का पैमाना शायद उपलब्ध नहीं है। जब दुर्गा और काली को किसी वर्ग विशेष की देवी और महिषासुर को किसी वर्ग विशेष का बताकर टिप्पणियां पढ़ता हूं तो लगता है कि ये लोग भारतीय समाज के यथार्थ से कितने कटे हुए हैं। इस तरह की टिप्पणियों को पढ़ते हिए मुझे बिहार के अपने शहर जमालपुर की याद आने लगती है। जमालपुर-मुंगेर जुड़वां शहर हैं। मुंगेर, कर्ण के दान करने के स्थल कर्णचौरा और मीरकासिम के किले की वजह से प्रसिद्ध है तो जमालपुर रेलवे कारखाना की वजह से। किसी जमाने में इस कारखाने में भाप इंजन बनाए जाते थे। इन दोनों शहरों में दुर्गा पूजा बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। यहां स्थापित होनेवाली काली और दुर्गा की प्रतिमाओं को या तो नंबर से या फिर इलाके के नाम से जाना जाता है।
जमालपुर में काली की एक प्रतिमा स्थापित होती हैं जिनका नाम है नंबर एक काली। नंबर एक काली का मतलब यह माना जाता है कि शहर में सबसे पहले इसी स्थान पर काली की प्रतिमा स्थापित हुई होगी। इस काली का नाम ही सिर्फ नंबर एक नहीं है बल्कि इस स्थान को पूजा से लेकर विसर्जन तक में नंबर एक होने का सम्मान और प्रतिष्ठा भी हासिल है। विसर्जन के वक्त भी जब शहर की सारी प्रतिमाएं जुलूस की शक्ल में निकलती हैं तो नंबर एक काली सबसे आगे रहती हैं। काली की इस प्रतिमा के विसर्जन के बाद ही अन्य प्रतिमाओं का विसर्जन सालों से होता आ रहा है। नंबर एक काली के बारे में एक और बताना आवश्यक है । काली की इस प्रतिमा की स्थापना बाबूलाल नाम के एक सफाई कर्मचारी के पूर्वजों ने की थी। बाबूलाल जमालपुर नगरपालिका में सफाई कर्मचारी हुआ करते थे और वहां वो मुनादी का काम करते थे। बाबूलाल ने अपने पूर्जवों द्वार स्थापित कालीस्थान को मंदिर का स्वरूप दिया और उसको व्यवस्थित किया जिसकी वजह से उसको बाबूलाल की काली कहा जाने लगा।  बाबूलाल की काली को शहर में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा और मान्यता प्राप्त है। आजादी के पहले का समाज, उसमें सफाई कर्मचारियों की स्थिति, जहां कई बार उनको मंदिरों में प्रवेश की इजाजत नहीं दी जाती थी, वैसे माहौल में सफाई करनेवाले समाज से आनेवाले एक परिवार ने जमालपुर में काली की प्रतिमा स्थापित की। सभी वर्गों ने उसको स्वीकार ही नहीं किया बल्कि आस्था के साथ सर भी झुकाया। यहां यह भी बाताना जरूरी है कि इस कालीस्थान में पूजा-पाठ का काम बाबूलाल और उसके परिवार के लोग ही करते रहे हैं। इसी तरह से जमालपुर में सदर बाजार पुलिस फांड़ी के पास अंग्रेजों के जमाने का एक विशाल कुंआ होता था। उस कुंए पर विजय भगत नाम के एक व्यक्ति ने काली मंदिर बनवाया। उस मंदिर का वो पुजारी भी बना। इसमे भी कहीं से जात-पात आड़े नहीं आया। किसी ने कभी कोई आपत्ति नहीं की। काली माता प्रमुख रहीं बाकी सब गौण। अब इसको देखते हुए लगता नहीं है कि काली और दुर्गा वर्ग विशेष की देवी हैं, जैसा कुछ लोग प्रचारित करना चाहते हैं।
भारतीय समाज में बहुत कुरीतियां रही हैं, छुआछूत तक भी रहा है, जाति व्यवस्था अपने विद्रूप रूप में भी मौजूद रही है लेकिन बाबू लाल की काली मंदिर जैसे उदाहरण भी रहे हैं। जमालपुर में तो देवी स्थान की पहचान भी इलाके के हिसाब से है। जोगमाया दुर्गा या जिसे बड़ी दुर्गा भी कहते हैं को छोड़कर सभी दुर्गा इलाके या समुदाय के हिसाब से भी जानी जाती हैं। मुंगरौड़ा दुर्गा, दलहट्टा दुर्गा, आशिकपुर दुर्गा, बंगाली दुर्गा, मारवाड़ी दुर्गा आदि। इसमे किसी प्रकार का ना तो कोई भेदभाव है और ना ही हमारे-तुम्हारे का एहसास।  
दरअसल हमें यह सोचना होगा कि भारतीय समाज में जिस तरह की उत्सवधर्मिता थी, त्योहारों के समय जो अपनत्व छलक कर बाहर आता था वो कम क्यों होता जा रहा है। हमारा भारतीय समाज उत्सवी समाज है, यहां हर अवसर के लिए उत्सव और गीत है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। आधुनिकता के दबाव में हमारे समाजी की ये उत्सवधर्मिता खत्म होती जा रही है। उत्सवधर्मिता के खत्म होने का परिणाम ये हो रहा है कि हमारा समाज संकुचित होता जा रहा है, हम आत्मकेंद्रित होते जा रहे है। त्योहार पर जिस तरह की उत्सव होते थे उससे सामाजिक समरसता तो बढ़ती ही थी रोजगार के अवसर भी पैदा होते थे। मुझे अपना बचपन याद आता है। दुर्गापूजा के मौके पर चार पांच दिन का उत्सव होता था उसमें अलग अलग तरह के मिट्टी के खिलौने बिकते थे, डमरू और बासुरी बिका करती थी, अलग अलग रंगों और आकार के गुब्बारे, किसी में गैस भरी जाती थी तो किसी में पंप से हवा डालकर फुलाया जाता था। इन सब चीजों की खूब बिक्री होती थी। अब जब से उत्सव का स्वरूप बदला है तो इन चीजों की बिक्री पर असर पड़ा है। मिट्टी के खिलौने तो लगभग खत्म ही होते जा रहा हैं, चूंकि बिक्री होती नहीं है लिहाजा इसके कारीगर तैयार नहीं हो रहे है। ये भी संभव है कि आनेवाले वर्षों में ये कला ही समाप्त हो जाए। बांसुरी जगह माउथ-आर्गन ने ले ली है। विसर्जन के समय युद्ध कला का भी प्रदर्शन होता था। लाठियां भांजी जाती थी, तलवारबाजी का प्रदर्शन होता था, छल्ले को लेकर कलाकारी होती थी आदि आदि। ये सब विसर्जन के जुलूस में प्रतिमा के आगे हुआ करता था। ये इतना रोमांचक होता था कि इसको देखने के लिए लोग रात भर जागकर सड़क किनारे की इमारतों पर जाकर बाठ जाते थे। धीरे-धीरे इन कलाओं की जगह डीजे और नाच गाने ने ले ली है। स्थानीय कला का प्रदर्शन लगभग खत्म हो गया है। संभव है इऩ वजह से भी लोगों की रुचि कम होने लगी हो। चार-पांच दिनों तक दुर्गापूजा का जो मेला लगता था, उसमें हमें घर से सभी बड़े लोग पैसे देते थे मेला घूमने के लिए। हम पैसे लेकर दुर्गास्थान और उसके आसपास लगे कठघोड़वा और चरखी पर बार-बार चढ़ने जाते थे। काठ की चरखी और काठ के घोड़े पर गोल-गोल घूमने के लिए बच्चों और किशोरों मे दीवानगी लक्षित की जा सकती थी। कठघोड़वा और चरखी लानेवालों की मेले में खूब कमाई होती थी। जाइंट व्हील में वो मजा कहां जो काठ की छोटी चरखी में होती थी।
ये सब ऐसी चीजें होती थीं, जो पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाती थी। चरखी और कठघोड़वा हाथ से चलाए जाते थे, मिट्टी के खिलौने से पर्यावरण को नुकसान नहीं होता था, यही हाल बांसुरी और डमरू का होता था। अब इन मेलों में इस तरह के सामानों की बिक्री होती है जिनमें से ज्यादातर प्लास्टिक से बने होते हैं जो पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है। पूजा के दौरान मेले में कानफाड़ू शोर भी नहीं मचा करता था, फिल्मी गानों की तर्ज पर भक्ति गीत-संगीत का शोर भी सुनने को नहीं मिलता था। इतनी आतिशबाजी नहीं होती थी। पूजा और मेले में पंडाल के नहीं होने से शक्ति प्रदर्शन जैसी कोई बात भी नहीं होती थी। हमने जिस तरह से बचपन में पूजा के दौरान मेला और उसका स्वरूप देखा है उसका स्वरूप बदलता जा रहा है। बदलते वक्त के साथ सकारात्मक बदलाव होने चाहिए, अपनी परंपराओं को कायम रखते हुए और रूढ़ियों को छोड़ते हुए उत्सवधर्मिता को कायम रखना होगा। क्योंकि हमारे समाज से उत्सवधर्मिता का खत्म होना खतरनाक है क्योंकि विविध धर्म, जाति, संप्रदाय वाले हमारे देश में उत्सवधर्मिता ही हमें जोड़ती है। उत्सवधर्मिता ही वह साझा सूत्र है जो पूरे भारत को एक करती है। मौजूदा पीड़ी का ये दायित्व है कि वो आनेवाली पीढ़ियों को उत्सवधर्मी बनाए ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत बची रह सके।

Saturday, October 13, 2018

नग्नता और यौनिकता का बोलबाला

हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान जब वेब सीरीज पर चर्चा हो रही थी, तो एक श्रोता ने उसके कंटेंट पर सवाल खड़े करते हुए वक्ताओ से ये सवाल पूछा कि क्या यहां दिखाई जानेवाली सामग्री पर किसी तरह का नियमन होना चाहिए? वहां बैठे ज्यादातर लोगों के उत्तर नकारात्मक थे। मंच पर बैठे एक वक्ता ने ये तो यहां तक कह दिया कि एक जगह तो छोड़ दो जहां सरकार का दखल नहीं हो। एक दूसरे वक्ता ने इस प्रश्न के उत्तर को कलाकारों की कलात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ दिया। तीसरे वक्ता ने सेंसर बोर्ड का हवाला देते हुए कहा कि अगर सरकार का दखल होगा तो बेव सीरीज भी संस्कारी हो जाएंगे। लेकिन प्रश्नकर्ता डटा हुआ था और वो इस विषय पर संवाद की मांग कर रहा था। खैर सत्र का समय नियत था और वो उसके प्रश्न के साथ ही खत्म हो गया। लेकिन उस श्रोता के प्रश्न इतने वाजिब थे सत्र खत्म होने के बाद भी उसपर चर्चा होती रही। दरअसल हाल के दिनों में जो चर्चित बेव सीरीज आए हैं उनमें जिस तरह की सामग्री आई है उसको लेकर भारतीय समाज में चर्चा होनी चाहिए। उसको यह कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता है कि वो कलात्मक स्वतंत्रता है। एक सीरीज आई थी लस्ट स्टोरीज। इसमें चार अलग अलग कहानियों का चार अलग अलग निर्देशकों ने बनाया था। अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी और करण जौहर। अब अगर उसकी सामग्री को देखें तो जिस तरह से यौन प्रसंगों को दिखाया गया है, वो प्रश्न तो खड़े करता है। इसी तरह से एक और बेव सीरीज चर्चित रही सेक्रेड गेम्स। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में गाली-गलौच वाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यही काम इस सीरीज में भी किया है।  इसके अलावा सेक्रेड गेम्स में सेक्स प्रसंगों की भरमार है, अप्राकृतिक यौनाचार के भी दृश्य हैं, नायिका को टॉपलेस भी दिखाया गया है। हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लिहाजा इस तरह के सेक्स प्रसंगों को कहानी में ठूंसने की छूट है। सेक्रेड गेम्स के लगभग हर एपिसोड में इस तरह से दृश्य हैं और ये सबसे सस्ता तरीका है दर्शकों को अपनी ओर खींचने का और उनकी उत्सुकता जगाने का । यौन-प्रसंगो में जिस तरह की नग्नता का चित्रण होता है और हिंसा के बाद जो शारीरिक विकृतियां दिखाई गई हैं वो जुगुप्साजनक हैं। ये कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता है। इन दो बेव सीरीज के बाद एक और सीरीज आई घोउल। इसमें भी वही सब रिपीट किया है। इसमें इतनी हिंसा और खून खराबा है जो किसी विकृत मानसिकता को ही संतुष्ट कर सकती है। इस तरह के कई विदेशी सीरीज पर इन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं।
दरअसल जब हम इस तरह क बेव सीजीज पर विचार करते हैं तो मुझे ऑल्ट बालाजी का गूगल पर दिखाई देनेवाला पेज याद आ जाता है। अगर आप गूगल पर ऑल्ट बालाजी सर्च करेंगे तो जो पेज खुलता है उसमें ये बताया गया है कि ये प्लेटफॉर्म मुख्यधारा की मनोरंजन का विकल्प है। लेकिन उसके नीचे लिखा है रागिनी एमएमएस, गेट हॉट विद रागिनी। उसके नीचे लिखा है हॉट, वाइल्ड एंड लस्टफुल बैयल (सुंदरी)। इसके आगे कहने को कुछ रह नहीं जाता है। इससे मंशा साफ हो जाती है कि प्लेटफॉर्म अपने दर्शकों को क्या दिखाना चाहता है। यहां आपको सुभाष बोस के बारे में भी समाग्री उपलब्ध है, लेकिन ये भी है। ये नाम इस लिहाज से ले रहा हूं कि ये चर्चित रहे हैं। इससे ये संदेश नहीं जाना चाहिए कि इनको ही लक्षित करके लिखा जा रहा है। कमोबेश सभी जगह यही हालात है। सवाल यही है कि फिल्मों में तो गाली को भी बीप करो और बेव सीरीज में गाली को फिल्मा कर दिखाओ। फिल्मों में अश्लीलता के नाम पर लंबे चुबंन दृश्यों पर आपत्ति लेकिन बेव सीरीज में नायिका को टॉपलेस दिखाने की छूट। फिल्मों में हिंसा को देखते ही सेंसर बोर्ड की कैंची तैयार लेकिन हिंसा की विकृतियों को चित्रित करने की बेव सीरीज को छूट। यह कैसी विडंबना है, यह कैसा दोहरा रवैया है, इस पर विचार तो होना ही चाहिए। अगर हम बेव सीरीज पर किसी भी प्रकार की नियमन की बात करें तो हमे केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की आधारभूत संरचना को देखना होगा। सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया । 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया। उसके बाद भी इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है । जैसे पहले फिल्मों की दो ही कैटेगरी होती थी ए और यू । कालांतर में दो और कैटेगरी जोड़ी गई जिसका नाम रखा गया यू ए और एस । यू ए के अंतर्गत प्रमाणित फिल्मों को देखने के लिए बारह साल से कम उम्र के बच्चों को अपने अभिभावक की सहमति और साथ आवश्यक किया गया ।एस कैटेगरी में स्पेशलाइज्ड दर्शकों के लिए फिल्में प्रमाणित की जाती रही हैं । फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने एक और गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही लंबे समय तक कामकाज चल रहा है।
सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) के मुताबिक किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए।मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए। अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है। बदलते वक्त के साथ शालीनता और नैतिकता की परिभाषा भी बदलती चली गई। जब अरुण जेटली के पास सूचना और प्रसारण मंत्री का प्रभार था तो उन्होंने श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जिसने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानि सीबीएफसी में सुधारों को लेकर रिपोर्ट सौंपी थी। उस समिति ने कई सुझाव दिए थे जो अब तक फाइलों में बंद है। यथास्थितिवाद के इस दौर में उस समिति की सिफारिशों पर आगे बढ़ने की सूरत नजर नहीं आती है। अब अगर बेवसीरीज के कंटेंट पर कलात्मक स्वतंत्रता की बात करें तो यह तर्क गले नहीं उतरता है। कलात्मक आजादी के नाम पर जिस तरह से नग्नता और विकृत हिंसा को परोसा जा रहा है उसके आलोक में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जे डी कपूर का आठ अप्रैल दो हजार चार के फैसले मैं साफ कर दिया था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी परोसना गलत है। अपने फैसले में उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ साथ जिम्मेदारी भी तय की थी। उन्होंने एम एफ हुसैन के एक मामले में कहा था कि याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रोपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज्जत की नजरों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के वक्त भी द्रोपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थी । इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रोपदी का चित्रण हुआ है वह साफ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला और नफरत पैदा करनेवाला है ।
बेवसीरीज में परोसेजानीवाली नग्नता और हिंसा को लेकर निर्माताओं को पहले तो स्वनियमन के बारे में सोचना चाहिए। उन्हें भारतीय समाज को ध्यान में रखते हुए, यहां के रिश्तों की संरचना को ध्यान में रखते हुए सीरीज बनानी चाहिए। भारतीय समाज अभी पश्चिम के उन देशों की तरह नहीं हो पाया हा जहां नग्नता पूरी तरह से स्वीकार्य है, जहां की फिल्मों में शारीरिक संबंधों का चित्रण आम बात हो। स्वनियमन अगर नहीं संभव है तो फिर सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म पर जिस तरह से थोड़े देसी और बहुतायत में विदेशी कंटेट उपलब्ध हो रहे हैं उसपर निगरानी की जरूरत है। अगर सरकार को लगता है कि इसपर नियमन की जरूरत नहीं है तो फिर फिल्मों पर नियंत्रण के लिए बनाई गई संस्था सीबीएफसी का भी कोई औचित्य है नहीं क्योंकि अगर इंटरनेट के माध्यम से नग्नता परोसने की छूट है तो फिर फिल्मवालों को क्यों नहीं? सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस दिशा में पहल करनी चाहिए और इस प्लेटफॉर्म पर केंटेट बनानेवालों के साथ बैठकर मंछन करना चाहिए। उसके बाद इसपर देशव्यापी बहस होनी चाहिए, हर पक्ष की राय को सामने लाने का उपक्रम हो ताकि सबकी सहमति से कोई हल निकाला जा सके।  

Saturday, October 6, 2018

विवाद से उठते बड़े सवाल


हिंदी साहित्य को लेकर फेसबुक पर बहुधा ऐसे विवाद उठते रहते हैं जिनका लक्ष्य किसी लेखक को नीचा दिखाना होता है। फेसबुकिया विवादों से साहित्यिक सवाल कम ही उठते रहे हैं। हिंदी साहित्य में वाद-विवाद का इतिहास काफी पुराना है। अगर हम विवादों के इतिहास पर नजर डालें तो पहले के विवादों और अब के विवादों में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है। पहले रचनात्मक बहसें हुआ करती थीं। किसी खास रचना को लेकर, किसी स्थापना को लेकर विवाद हुआ करता था।  हिंदी में स्वस्थ साहित्यिक विवादों की परंपरा रही है, हलांकि उन्नीस सौ नब्बे के बाद के दौर को याद करें तो यह पाते हैं कि उस दौर में साहित्यिक विवादों का स्तर गिरने लगा था और साहित्यिक सवाल गौण होने लगे थे। व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप प्रमुख होते चले गए। उस वक्त जो प्रमुख विवाद उठे उसमें कवि उपेन्द्र कुमार की कहानी झूठ का मूठ को लेकर उठा विवाद था। उसी दौर में पहल पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन ने एक पुस्तिका छापी थी उसको लेकर भी खूब विवाद हुआ था। पहल पर लगे आरोपों पर ज्ञानरंजन ने जो सफाई दी थी उसकी भाषा देखिए, प्रोफेसर कॉलोनी भोपाल में शराब पीकर एक रमणी के घर के पास कार भिड़ा देने की खबरें भी अखबारों में हैं, पर हमको इसको पीली पत्रकारिता का हिस्सा मानते हैं।...एक कुलपति अपार राशि सालों तक केवल पत्रिकाएं निकालने, गोष्ठियां करने, अपना व्याख्यान जगह जगह करवाने, स्वागत करने में खरच् करता रहा। अपनी साहित्यिक हवस को पूरा करने में लगाता रहा। अपने कुनबे के लोगों को यहां वहां विभिन्न प्रकार के लाभ देने में लगाता रहा, वह अपने क़लम में सार्वजनिक कोषों का प्रगतिशील वामपंथी संगठनों या पत्रिकाओं द्वारा उपयोग की बात लिखते शरमाता भी नहीं। स्पष्ट है कि ये टिप्पणी अशोक वाजपेयी पर थी। जो अगले हिस्से में ज्ञानरंजन ने स्पष्ट भी कर दिया था। उसके बाद उन्होंने राजेन्द्र यादव पर मुलायम सिंह यादव से विज्ञापन और लालू यादव से पुरस्कार लेने की बात को रेखांकित किया था। लब्बोलुआब ज्ञानरंजन ये कहना चाहते थे कि यादव होने का फायदा राजेन्द्र जी ने बखूबी उठाया। ज्ञानरंजन ने उस वक्त प्रभाष जोशी पर भा हमला बोला था। उन्होंने लिखा था कि प्रभाष जोशी वही हिंदू हैं जिन्होंने देवराला सती कांड का प्रबल समर्थन करनेवाला संपादकीय लिखा था। जिन्होंने सती कांड को महिमामंडित किया और कभी उसको रिग्रेट नहीं किया। थकान और वृद्धत्व की वजह से ये लोग इस सचाई को शायद भूल गए। इसका विरोध लगभग एक सैकड़ा लेखकों ने किया, इसकी निंदा भी की थी। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि प्रभाष जोशी आर एस एस हेडक्वार्टर महाल नागपुर के सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति थे और वहां दिन रात उनके लिए दरवाजे खुले रहते थे। वहां प्रभाष जोशी की सत्ता थी। लेकिन राज्यसभा में जाने में मदद न करने की वजह से वे आखिरकार नाराज हुए, दूर हुए। रातोरात कोई परिवर्तन नहीं हो गया। मित्रों आपको शायद पता कि प्रभाष जी ही हरिशंकर परसाईं के घोर विरोधी थे। ज्ञानरंजन यहीं नहीं रुके थे उन्होंने नामवर जी पर भी हमला बोला था सारे प्रघानमंत्रियों से मैत्री के बावजूद वे न तो दूतावासों में जा सके, न राज्यपाल बन सके, न राज्यसभा में प्रवेश पा सके। साहित्य अकादमी अलग निकल गई। अब नोचे जाने के लिए हमलोग बचे हैं। अंत में उनकी टिप्पणी थी नामवर जी का ठंडा कसाईपन, मुद्रा राक्षस की कालिखी उमंग और राजेन्द्र यादव की जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा वाली धमकी हमारे लिए संघर्ष की नई राह खोलती है। इस तरह के शब्दों में व्यक्तिगत हमले शुरू हो गए थे। बकायदा पुस्तिका छाप कर क्योंकि तब फेसबुक जमाना नहीं था।
ये वही दौर था जब राजेन्द्र यादव के लेख होना/सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ को लेकर भी साहित्य जगत में जमकर वाद विवाद हुए थे। यहां यह बताना जरूरी है कि जब साहित्य अकादमी के चुनाव में महाश्वेता देवी और गोपीचंद नारंग के बीच मुकाबला हुआ था तो उस वक्त हिंदी जगत ने एक बेहद अप्रिय विवाद देखा था। गोपीचंद नारंग पर जिस तरह के आरोप लगाए गए थे वो बेहद घटिया थे। कहा गया था कि अगर नारंग अध्यक्ष बन गए तो साहित्य अकादमी संस्कार भारती की सैटेलाइट बन जाएगी। उस वक्त अपने सारे मतभेदों को भुलाकर नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव एक हो गए थे। गोपीचंद नारंग के खिलाफ साहित्यिक महागठबंधन बना था। महागठबंधन बना तो जरूर था लेकिन उसका फायदा महाश्वेता देवी को नहीं हो सका था और नारंग पर तमाम घटिया आरोपों के बावजूद उनकी जीत हुई थी और साहित्यिक महागठबंधन हार गया था।  इस तरह के कई विवादास्पद किस्से हैं। और अभी हाल मे जिस तरह से विश्वनाथ त्रिपाठी प्रकरण में साहित्यिक गरिमा तार तार हुई वो सबसे सामने है।
ताजा विवाद उठा हिंदी की वरिठ लेखिका उषाकिरण खान की एक टिप्पणी से जो उन्होंने उपन्यासकार रजनी गुप्त के हाल में प्रकाशित उपन्यास किशोरी बिन्नू का ब्लर्ब लगा कर लिखी। ऊषा किरण खान ने लिखा- मैत्रेयी पुष्पा जी ने सच कहा कि किशोरी बिन्नू बुंदेलखंड के हर गाँव में मिलेगी। मैं कहती हूँ भारत के सभी गांव में रहती है ऐसी स्त्री। यहां तक तो सब सामान्य था लेकिन इस पोस्ट पर मैत्रेयी की टिप्पणी से विवाद की ज्वाला भड़क गई। मैत्रेयी ने लिखा- किशोरी बिन्नू नामक रजनी गुप्त के उपन्यास का फ्लैप मैंने नहीं लिखा है। यह इस उपन्यास की लेखिका की धोखाधड़ी है। मेरे नाम का इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है। ऐसी लेखिकाएं ही आज के लेखन को संदेहास्पद बनाती हैं। मैत्रेयी पुष्पा की इस टिप्पणी पर रजनी गुप्त ने सफाई दते हुए मैत्रेयी को संबोधित टिप्पणी की। उसमें लिखा- यह उपन्यास किशोरी का आसमां के नाम से पहले छपा था जिसकी भूमिका आपने ही लिखी थी। रजनी गुप्त ने फिर कई टिप्पणियां की जिसमें वो लगातार ये जताने की कोशिश करती रही कि ये वही पुराना उपन्यास है सिर्फ शीर्षक बदला है। कुछ बचकानी दलीलें भी दीं कि ये दूसरा संस्करण है, सिर्फ शीर्षक ही तो बदला है। जब उनपर ये आरोप लगा कि ये पाठकों के साथ छल है तो उन्होंने कहा कि नए उपन्यास में पहले पृष्ठ पर ये साफ तौर पर लिखा है कि ये उपन्यास पहले फलां नाम से छप चुका है। विवाद इतना बढ़ा कि मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा कि रजनी गुप्त झूठ और धोखेबाजी की मास्टर हैं। फिर क्या था अन्य लोग भी इसमें कूद पड़े । कुछ रजनी के पक्ष में मैत्रेयी को कोसने लगे तो कुछ ने रजनी को नसीहत दी कि आपको मैत्रेयी को बताना चाहिए थे। मारने पीटने तक की अमर्यादित बातें हुईं। कुछ लोगों ने मजे लिए तो कुछ ने गंभीरता से सवाल उठाए। इस पूरे प्रकरण में सबसे अच्छी भूमिका प्रकाशक की रही, प्रकाशन ने फौरन खेद प्रकट किया, मैत्रेयी जी से माफी मांगी और फ्लैप को बाजर से वापस लेने का एलान कर दिया।
इस पूरे प्रकरण को देखने समझने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। पहली बात तो ये कि जो उपन्यास एक दशक पहले किसी अन्य प्रकाशन से छपा हो उसको नए प्रकाशक से दूसरे नाम से छपवाने का औचित्य क्या है। अगर छपवाना ही था तो नाम क्यों बदला गया? नाम बदला गया तो पुराने फ्लैप लेखक को सूचित क्यों नहीं किया गया। नए उपन्यास किशोरी बिन्नू में फ्लैप पर जो छपा है उसको देखने पर लगता है कि पूर्व में लिखे से छेड़छाड़ की गई। नए फ्लैप में लिखा है साहित्य जगत में लेखिका का नाम नया नहीं है, लेकिन प्रस्तुत उपन्यास का तेवर नया है, जिसका नाम है किशोरी बिन्नू। अब सवाल यही है कि अगर मैत्रेयी ने किशोरी का आसमां का फ्लैप लिखा था तो उसमें जाहिर सी बात है किशोरी का आसमां लिखा होगा, वो यहां वो किशोरी बिन्नू कैसे हो गया। इस बात का उत्तर तो रजनी गुप्त को देना चाहिए। अगर उन्होंने इसको बदला है तो इस बात की सूचना मैत्रेयी पुष्पा को दिया जाना चाहिए था। जो कि इस केस में नहीं हुआ प्रतीत होता है। यह क्या है इसको परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल हिंदी में प्रोफेशनलिज्म का घोर अभाव है और कोई किसी का नाम कहीं भी इस्तेमाल करते वक्त ये भूल जाता है कि आने वाले दिनों में ये समस्या हो सकती है। इस समस्या से जो विवाद उठता है वो इतना विद्रूप होता है जो साहित्य जगत को शर्मिंदा करने के लिए काफी होता है। इस पूरे प्रकरण में भी यही हुआ। झूठ, फरेब, मक्कारी से लेकर बीहड़ में ले जाकर मारने पीटने जैसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ, शर्मसार तो हिंदी साहित्य ही हुआ। पता नहीं कब हिंदी में प्रोफेशनलिज्म आ पाएगा?