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Friday, February 17, 2017

बॉलीवुड में महिलाओं का जलवा

इन दिनों हिंदी साहित्य में नया वाला फेमिनिज्म पर जमकर चर्चा हो रही है । पतनशील पत्नियों के नोट्स जैसी शीर्षकवाली किताबें छप ही नहीं रही हैं बल्कि पसंद भी की जा रही हैं । कुछ ऐसा ही हाल इस वक्त हिंदी फिल्मों का भी है । हिंदी फिल्मों में इस वक्त अभिनेत्रियों का स्वर्णकाल चल रहा है । अगर पिछले एक दशक की फिल्मों पर नजर डालें तो महिला किरदारों पर केंद्रित कितनी ही फिल्में आईं और करीब करीब सभी को दर्शकों ने पसंद किया । जिस तरह से महिला किरदारों पर केंद्रित फिल्में लिखी और फिल्माई जा रही हैं तो उससे यह साबित होता है कि इस वक्त समाज में दर्शक महिलाओं की सफलता, उसके संघर्ष और इसकी जिजीविषा को देखना चाहते हैं क्योंकि बहुधा फिल्मों में चरित्रों का बार-बार चित्रण होना समाज की रुचियों का प्रकटीकरण होता है । इस तरह की फिल्मों के बनने से यह भी पता चलता है कि हमारे समाज के दर्शकों की रुचियों का भी परिष्कार हुआ है । दो हजार तेरह में जब विकास बहल के निर्देशन में बनी फिल्म क्वीन आई थी तो उसमें कंगना के रोल ने दर्शकों को झकझोरा था । किस तरह दिल्ली के मध्यमवर्गी. परिवार की एक पंजाबी लड़की अपनी शादी के पहले शादी तोड़ने की खबर से सदमे में आकर विदेश जाती है और वहां खुद को रीडिस्कवर करती है । इस फिल्म में कंगना के रोल ने उनको राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया । इसी तरह के कहानी में विद्या बालन ने एक गर्भवती महिला का रोल किया है जो कोलकाता में अपने पति तको तलाशने में जुटती है । सुजय घोष की इस फिल्मने जबरदस्त बिजनेस किया था । विद्या के रोल ने इस कहानी को हिट कर दिया था । इस फिल्म का सीक्वल भी अभी हाल ही में रिलीज हुआ था जिसमें विद्या बालन की भूमिका की प्रशंसा हुई थी । इसमें विद्या ने एक बेहद बोल्ड फैसला किया था जहां पूरी फिल्म में किरदार की मांग के मुताबिक उसने ना तो ग्लैमरस कपड़े पहने और ना ही किसी प्रकार का मेकअप किया । हिंदी फिल्मों में खूसूरत और ग्लैमरस दिखने और दिखाने की चाहत वालों के लिए यह फिल्म नया वाला फेमिनिज्म को ही सामने लाता है जहां महिलाएं जो है जैसी हैं वैसी ही रूपहले पर्दे पर आने का साहस दिखाती हैं । इसी तरह से विद्या बालन की फिल्म डर्टी पिक्चरे ने भी नये वाले फेमिनिज्म को आगे बढाया । उसके बोल्ड गाने, उसके बोल्ड सींस आदि ने इस वक्त देशव्यापी चर्चा को जन्म दिया था । सेंसर बोर्ड की कैंची भी चली थी और दूरदर्शन ने उसको रात के स्लॉट में दिखाया था । विवाद चाहे जितना हो लेकिन डर्टी पिक्चर बेहद सफल रही थी 
अभी पिछले साल जूब अनिरुद्ध रायचौधरी की फिल्म पिंक रिलीज हुई थी तो यह पूरी फिल्म एक बॉलीवुड से लेकर समाज तक में विमर्श का नया आधार प्रदान कर गई थी । सार्थक सिनेमा के दौर का खत्म हो जाने के बाद कमर्शियस फिल्मों में इस तरह के विषय को उठाने के साहस को जनता का भी समर्थन मिला । अगर कोई महिला स्वछंद है, सिगरेट और शराब पीती है तो इसका यह मतलब तो नहीं होता है कि वो चालू है और किसी के साथ भी सोने के लिए उपलब्ध है । नहीं का मतलब नहीं होता है इसको इस फिल्म ने पुरजोर तरीके से पेश किया। चंद सालों पहले तक इस तरह की फिल्मों के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था । मीनल को जिस तरह से सरेआम उठा लिया जाता है और उसके साथ यौन शोषण कर गाड़ी से बाहर फेंक दिया जाता है और उसके बाद उसको ही गिरफ्तार करवा दिया जाता है । अपने को साबित करने की जद्दोजहद में एक लड़की को कितना संघर्ष करना पड़ता है यह दर्शकों को पसंद आया क्योंकि इस तरह की वारदातें हर रोज उनके आसपास घटित होती रहती हैं । फिल्मकार ने दर्शकों की इस मानसिकता को पकड़ा और पिंक बनाकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया । इस तरह की फिल्म में एक रिस्क भी था लेकिन वो रिस्क फिल्मकार ने उठाया ।
इसी तरह से अनुष्का शर्मा की फिल्म एनएच10 भी दर्शकों को खूब पसंद आया। ये फिल्म भी समकालीन सामाजिक यथार्थ के बेहद करीब थी लिहाजा दर्शकों ने पसंद किया । किस तरह से हाइवे पर बदमाशों का गैंग महिलाओं के साथ बदतमीजी करता है और उसको बचाने आनेवाले पर हमला करता है यह इस फिल्म की शुरुआत है और उसके बाद नायिका मीरा अपने तरीके से प्रतिशोध लेती है । ऐसा नहीं है कि सिर्फ सामाजिक अपराध को झेल रही स्त्रियों के विषय को उठाकर ही फिलमें बनाई जा रही हैं । अगर आप गौरी शिंदे की फिल्म इंगलिश विंगलिश पर नजर डालें तो इसमें एक ऐसी स्त्री का चित्रण है जो अंग्रेजी नहीं बोल पाती है और उसका पति और बेटी हर दिन उसका मजाक उड़ाते हैं । लड्डू का बिजनेस करनेवाली शशि गोडबोले की भूमिका में श्रीदेवी वे अपने जीवंत अभिनय से रंग भर दिए थे । यह फिल्म पंद्रह साल बाद श्रीदेवी की फिल्मों में वापसी की मुनादी भी थी । घर परिवार का संघर्ष, क्लास में अंकुरित होता प्रेम जिसको सामाजिक मान्यताओं के बोझ तले दबाकर अपने अरमानों का गला घोटती अभिनेत्री के रूप में फिल्म बेहद सफल रही थी ।  कहने का अर्थ यह है कि इस दौर में फिल्मकार महिलाओं से जुड़े मुद्दे को लेकर लगातार प्रयोग कर रहे हैं और अच्छी बात यह है कि इस तरह के प्रयोग सफल भी होते रहे हैं ।

ऐसा नहीं है कि पहलवे महिला प्रधान फिल्में नहीं बनीं । मदर इंडिया से लेकर आंधी जैसी फिल्में बॉलीवुड में मील का पत्थर हैं । महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया जब 1957 में रिलीज हुई थी तो उसने भी समाज को झकझोरा था । इसी तरह से इसके बीस साल बाद रिलीज हुई फिल्म भूमिका में एक बाल कलाकार की अबिनेत्री बनने की कहानी को जिस तरह से पेश किया गया था उसकी वजह से इसको नई सिनेमा की शुरुआत माना गया था । उसके बाद अर्थ, मिर्च मसाला, दामिनी, चंदानी बार, नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्में भी आईं थी लेकिन अब की फिल्मों का धरातल थोड़ा अलग है ।  

Thursday, February 16, 2017

लिटरेचर के साथ लिटरेसी

इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि कोई लिटरेचर फेस्टिवल गंभीरता से गांव की ओर जाएगा । अभी तक हमारे देश में लिटरेचर फेस्टिवल का जो स्वरूप बना है या बनता दिख रहा है उसमें पैनल डिस्कशन के अलावा फिल्म और संगीत पर बात होती रही है । एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त पूरे देश में छोटे-बड़े करीब साढे तीन सौ लिटरेचर फेस्टिवल होते हैं और कमोबेश सभी एक जैसे ही होते हैं । देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में साहित्य, कला और संगीत का प्रतिष्ठित संगम, लिट-ओ-फेस्ट ने अपने तीसरे संस्करण में एक अनूठी पहल की है जो उसको अन्य लिट फेस्ट से अलग बनाती है । पिछले दो संस्करणों में लिट-ओ-फेस्ट ने साहित्य, कला और संगीत की दुनिया में अपना एक मुकाम हासिल किया था जहां हिंदी और अंग्रेजी साहित्य के दिग्गजों के अलावा संगीत और कला के क्षेत्र की मशहूर हस्तियों ने इस उत्सव में शिरकत की थी । लेकिन अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझते हुए और उसके निर्वहन के लिए लिट-ओ-फेस्ट ने इस बार साहित्य, कला और संगीत को गांव तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है । इस सिलसिले में मुंबई के पास के शाहपुरा जिले के दहीगांव को लिट ओ फेस्ट ने गोद लिया है । लिट ओ फेस्ट इस गांव में शिक्षा को बढ़ावा देने, कौशल विकास, स्वच्छता अभियान आदि के बारे में वहां के लोगों को जागरूक बना रही है । फेस्टिवल शुरू होने के पहले उस गांव में एक स्कूल का जीर्णोद्धार करवा दिया गया है औरर वहां लड़कों और लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाए गए हैं । लिट ओ फेस्ट की योजना है कि वहां के स्कूल में ई एडुकेशन को बढ़ावा दिया जाए । नोटबंदी के पहले शुरू हुई इस पहल के बाद अब मुंबई के इस साहित्य महोत्सव ने तय किया कि लोगों को ई बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग सिखाया जाएगा । लिठ ओ फेस्ट की फेस्टिवल डायरेक्टर स्मिता पारिख के मुताबिक लिटरेचर के साथ-साथ लिटरेसी भी आवश्यक है । हमारे देश में इतनी खूबसूरत साहित्य सृजन हुआ है उसके पाठक बनाना भी हमारा फर्ज हैं । अपनी इसी जिम्मेदारी को समझते हुए लिट ओ फेस्ट ने महानगर के पास के गांव में पाठक तैयार करने का बीड़ा उठाया है । इस योजना को पंख लगाने के लिए दहीगांव में एक पुस्तकालय की स्थापना की जा रही है । लिट ओ फेस्ट से जुड़े प्रकाशकों ने इस पुस्तकालय के लिए किताबें देने का एलान भी किया है । इस मायने में अगर देखा जाए तो मायानगरी मुंबई में तेइस और 24 फरवरी को आयोजित होनेवाला यह साहित्योत्सव अपनी तरह का एक अलग उत्सव है ।
इस पहल के अलावा इस वर्ष के सत्र भी साहित्य, संगीत और कला के अलावा शिक्षा और सुरक्षा पर मंथन करने का अवसर भी प्रदान करता है । हिंदी के मशहूर कवि केदारनाथ सिंह के अलावा लता मंगेशकर पर बेहद गंभीर किताब लिखनेवाले यतीन्द्र मिश्र, कहानीकार गीताश्री, वाणी प्रकाशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी और सीएसडीएस में प्रोफेसर अभय कुमार दुबे खोई हुई दास्तां पर बात करेंगे । गीत संगीत पर अंकित तिवारी से लेकर अनु मलिक, अनूप जलोटा, सोनू निगम, हरिहरन और अमृता फड़णबीस की महफिल जमने वाली है । एक और दिलचस्प सत्र बायोग्राफी बनाम आटोबॉयोग्राफी का है जिसमें सीमा सोनिक, शाहिद रफीक और यतीन्द्र अपने अनुभवों को साझा करेंगे । इसके अलावा सौरभ दफ्तरी, मेघना पंत, अंजलि कृपलानी, अश्विन सांघी जैसे लेखक भी इस लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत कर रहे हैं । दो साल पहले मुंबई के मशहूर जे जे कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स से जो सफर शुरू हुआ था वो सेंट जेवियर्स क़लेज से होते हुए अब मेडिकल जिमखाना तक पहुंचा है । मुंबई में आयोजित इस लिट ओ फेस्ट में सत्रों का कैनवस बहुत बड़ा है । गैर हिंदी प्रदेश मुंबई में आयोजित लिट ओ फेस्ट में हिंदी को लेकर कई सत्र होते हैं । यह बात खौस तौर पर रेखांकित की जानी चाहिए कि चाहे वो हिंदी कविता पाठ का सत्र हो या फिर लखनऊ शहर और उसके मिजाज पर सत्र । गुरू शिष्य परंपरा पर सोनम मानसिंह से बातचीत का भी एक सत्र रखा गया है ।

इस लिटरेचर फेस्टिवल की खास बात यह है कि इसके पहले आयोजक नवोदित लेखकों की पांडुलिपियां मंगवाते हैं और फिर उनकी जरी उनमें से चुनाव कर उसको प्रकाशित भी करवाते हैं । उदाहरण के तौर पर पिछले वर्ष चुनी गई पांडुलिपियों का प्रकाशन हो चुका है और इस साल आयोजित लिट ओ फेस्ट में उसको जारी किया जाएगा इसमें बिंदू चेरुन्गात का उपन्यास मेरी अनन्या, करण बजाज की जिंदगी तुमसे है और वैशाख राठौड़ का सरनेम प्रमुख है । इस साल भी आमंत्रित पांडुलिपियों में से जूरी ने चुनाव कर लिया है और कश्मीर की कहानियों को प्रमुखता से चुना गया है । अगर हम समग्रता में विचार करें तो मुंबई में आयोजजित होनेवाले इस लिटरेचर फेस्टिवल ने तीन साल में ही अपनी एक अलग पहचान बनाई है । और लिटरेचर फेस्टिवल को गांवों से जोड़ने की अवनूठी पहले करके इसके आयोजकों ने अन्य लिटरेचर फेस्टिवल्स के सामने एक मिसाल तो पेश की है, चुनौती भी दी है । क्योंकि अगर शब्द के कद्रदान बचेंगें तभी तो सृजन भी बचेगा और सृजन का उत्सव भी  । 

वादों की कसौटी पर आम आदमी पार्टी सरकार

वेलेंटाइन डे के दिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के दो साल पूरे हो गए । दो साल किसी भी सरकार के काम-काज का आंकलन करने के लिए काफी होता है । वेलेंटाइन डे वाली सरकार दो साल तक केंद्र सरकार से टकराव के रास्ते पर चलती रही और उनके कुछ मंत्री विवादों में पड़े । संभव है कि आम आदमी पार्टी ने टकराव को ही अपनी राजनीति का आधार बनाया हो लेकिन लोकतंत्र में जनहित के कामों को लेकर आंकलन किया जाना चाहिए लिहाजा दो साल बाद प्रधानमंत्री को साइकौपैथ कहने की बात हम नहीं करेंगे ना ही फर्जीवाड़े में फंसे कानून मंत्री जितेन्द्र तोमर को लेकर सवाल खड़े करेंगे और ना ही मंत्री के भ्रष्टाचार के आरोपों में बर्खास्त होने को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार पर ऊंगली उठाएंगे । हम तो चुनाव पूर्व जनता से किए वादों को परखने की कोशिश करेंगे । दिल्ली महानगर में तीन बुनियादी सवालों से हर रोज यहां की जनता को जूझना पड़ता है, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य । सुरक्षा को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार पल्ला झाड़ लेती है कि दिल्ली पुलिस उसके पास नहीं है लिहाजा वो कुछ नहीं कर सकती । हलांकि चुनाव पूर्व रेडियो पर इस बात का धुंआधार प्रचार किया गया था कि राजधानी में ब्लैक स्पॉट को चिन्हित कर वहां रोशनी का इंतजाम किया जाएगा । इसका क्या हुआ पता नहीं । वादा तो सैंतालीस फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का भी था लेकिन जानकारी के मुताबिक अब तक एक भी नया फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बनाया जा सका है बल्कि आरोप तो यह भी लग रहे हैं कि दो साल बीत जाने के बाद भी सरकार इस काम के लिए जरूरी धन मुहैया नहीं करवा पाई है ।
वादा तो ये भी किया गया था कि दिल्ली में बसों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे । वादे के मुताबिक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिल्ली की करीब साढे तीन हजार बसों में सीसीटीवी कैमरा लगाया जाना था । लेकिन वादे हैं वादों का क्या । इसी तरह से फ्री वाई फाई सुविधा का भी अता-पता नहीं है । हो सकता है व्यवस्थागत दिक्कतें आ रही हों लेकिन अब तो ये चुटकुला चलने लगा है कि दिल्ली में फ्री वाई-फाई का पासवर्ड पंजाब है । खैर ये अलहदा बातें हैं । सुरक्षा के बाद सबसे जरूरी है शिक्षा । आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि वो दिल्ली में पांच सौ सरकारी स्कूल और बीस नए कॉलेजों की स्थापना करेगी । यह सही है कि दिल्ली सरकार ने पहले से बने स्कूलों में कमरों की संख्या बनाई है और सरकार के दावों के मुताबिक आठ सौ नए कमरे बनाए गए हैं । लेकिन स्कूलों में कमरों की संख्या को बढ़ाकर नए स्कूल खोलने के वादे को पूरा करने का तर्क समझ से परे हैं । शिक्षा के क्षेत्र में काम हो रहा है । हाल ही में पैरेंट्स-टीचर मीट भी हुए जो सरकारी स्कूलों में नहीं हुआ करते थे । लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो ये सब कॉस्मेटिक बदलाव हैं जो शिक्षा की सुधार की दिशा में किए गए वादों की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरे जैसी बात है ।
अब बात करते हैं स्वास्थ्य की । स्वास्थ्य के क्षेत्र में वादा किया गया था कि नौ सौ नए प्राइमरी हेल्थ सेंटर खोले जाएंगे और अस्पतालों में तीस हजार बेड बढाए जाएंगे । इस दिशा में आम आदमी पार्टी की सरकार ने एक सौ पांच मोहल्ला क्लिनिक खोलें हैं लेकिन अस्पतालों में बेड की संख्या बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो पाया है । मोहल्ला क्लिनिक में भी मंत्री सतेन्द्र जैन की बेटी को कंसलटेंट बनाए जाने को लेकर विवाद हुआ था जिसके बाद उन्होंने पद छोड़ दिया था । बिजली बिल को आधा करने के वादे पर अमल हुआ था लेकिन उससे क्या फायदा हुआ । सरकार बिजली कंपनियों को सब्सिडी देकर उनकी ही तिजोरी भर रही है । आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि पांच साल में दिल्ली बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगी लेकिन सिर्फ पिछले ही साल दिल्ली ने बाहर से करीब अट्ठाइस हजार मिलियन यूनिट बिजली खरीदी । बिजली के बाद पानी को लेकर आम आदमी पार्टी ने मुद्दा बनाया था और कहा था कि सरकार में आते ही देश की राजधानी में पानी माफिया को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे लेकिन शुरुआती दिनों में छापेमारी के बाद अब निर्बाध गति से पानी माफिया अपना काम कर रही है । यमुना को लेकर भी बड़े बड़े वादे किए गए थे लेकिन दिल्ली की जनता हर रोज देखती है कि यमुना का क्या हाल हो गया है । यमुना किनारे आरती का कार्यक्रम करने से इस मरती हुई नदी का भला नहीं हो सकता है । इसके लिए ठोस इच्छा शक्ति और कड़े प्रशासनिक फैसलों की दरकार है । यमुना टैक्सी तो दूर की बात है यमुना सफाई भी नहीं हो पाई।

अगर समग्रता में आम आदमी पार्टी के वादों को देखें तो कमोबेश बहुत सारा काम अभी होना बाकी है । दिल्ली के कई इलाकों में सड़कों का बुरा हाल है । प्रदूषण रोकने के लिए ऑड इवन का प्रयोग कितना सफल रहा यह कहा नहीं जा सकता है क्योंकि सरकार ने इस प्रयोग की आवर्तिता बढ़ाई नहीं । आम आदमी पार्टी से दिल्ली की जनता को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन दो साल बीतने के बाद जिस तरह से काम हो रहा है उससे लगता नहीं है कि ये उम्मीदों पर खरा उतर पाएगी । जिस तरह से इसके रहनुमा अन्य राज्यों की राजनीति में उतरते जा रहे हैं उससे दिल्ली पर ध्यान देने का वक्त उनको नहीं मिल पाता है । उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के सामने अब बड़ी चुनौती है कि बाकी बचे तीन सालों में इन वादों में से कुछ को तो पूरा कर दिखाएं । 

Monday, February 13, 2017

बिसरती विधा का स्मरण

तकनीक के विस्तार ने साहित्य की एक विधा पत्र-साहित्य को लगभग खत्म कर दिया है । जब मोबाइल और इंटरवेट का विस्तार नहीं हुआ था तब साहित्यकारों के बीच पत्रों का आदान प्रदान होता था और लेखक साहित्यक सवालों पर एक दूसरे से मुठभेड़ ही नहीं करते थे बल्कि सार्थक विमर्श भी होता था । समय के साथ साथ उन पत्रों का प्रकाशन भी होता था जिससे उस दौर की साहित्यक प्रवृत्तियों का इतिहास भी बनता था । तकनीक के विस्तार की वजह से ईमेल और एसएमएस, व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म ने साहित्य की इस विधा को नेपथ्य में धकेला और अब तो पत्र लेखन लगभग समाप्त हो चुका है । नामवर सिंह के काशीनाथ सिंह के नाम पत्र या फिर मुक्तिबोध और नेमिचंद्र जैन के बीच का पत्र व्यवहार हिंदी साहित्य की थाती है । हिंदी साहित्य में पत्र-साहित्य की विधा काफी समृद्ध रही है- व्यक्तिगत पत्रों से लेकर पत्रिकाओं को लिखे पत्रों के संकलन प्रकाशित हो चुके हैं । प्राचीन हिंदी पत्र-संग्रह और अठारहवीं शती के हिंदी पत्र जैसी किताबें से मराठी साहित्य की अहम जानकारी मिलती है । चांद पत्रिका ने तो अपना एक पूरा अंक पत्र-साहित्य पर ही केंद्रित किया था । दरअसल साहित्यकारों के पत्र संकलनों से हिंदी के पाठकों के लिए साहित्यिक ज्ञान और अनुभव का एक ऐसा संसार खुलता है जो आमतौर पर कृतियों में नहीं आ पाता है लेकिन अब इस संसार का रास्ता बाधित हो गया है और निकट भविष्य में इसके खुलने की उम्मीद भी बेमानी है ।

हाल ही में दिल्ली में खत्म हुए विश्व पुस्तक मेले में वरिष्ठ लेखक आलोचक भारत भारद्वाज की दो पुस्तकें देखने को मिली । पहली पुस्तक है प्रिय भग्गन जो उनके अग्रज और आलोचक नंदकिशोर नवल के उनको लिखे पत्रों का संकलन है । इन पत्रों में सत्तर के दशक से लेकर दो हजार तक के साहित्यक परिदृश्य पर टिप्पणियां भी हैं । भी इस वजह से क्योंकि इन पत्रों में दोनों के पारिवारिक समस्याओं का भी जिक्र भी है । इन पत्रों में लेखक-प्रकाशक संबंध, लेखक-लेखक संबंध, दिल्ली की साहित्यक गतिविधियों से लेकर एक वरिष्ठ लेखक की अपनी कृतियों की समीक्षा छपवाने की बेचैनी भी साफ नजर आती है । लेखकों के बारे में बदलती राय या फिर विचलन को भी रेखांकित किया जा सकता है । उस दौर में भी लेखक रॉयल्टी को लेकर कितना परेशान रहते थे इसके विस्फोटक प्रसंग इस किताब में हैं । सरकारी खरीद की तिकड़मों से लेकर अपनी किताब की खराब छपाई पर भी टिप्पणियां हैं । दूसरी किताब है – ये पुराने पत्र’  । यह किताब भारत भारद्वाज को ही लिखे हिंदी के तैंतीस वरिष्ठ लेखकों के पत्रों का संकलन है जिनमें से कई तो अब इस दुनिया में नहीं रहे । भारत भारद्वाज का कहना है कि हिंदी के महान साहित्यकारों के ये पत्र इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं कि इसमें ना केवल अपने समय की आहट है बल्कि समकालीन रचनाशीलता का बजता संगीत भी है । इसमें ये जोड़ा जा सकता है कि उस वक्त की सामाजिक हकीकतों का चित्र भी उभरता है । जैसे अमृतलाल नागर एक पत्र में लिखते हैं – भारत जतियों का देश है, यहां जातियां उठाईं और गिराई भी गई हैं । उनका इतिहास जाने बिना नया भारतीय बहुत सी बौद्धिक गलतियों का शिकार हो रहा है, और अधिक भी हो सकता है । इसलिए जाति समस्या से मुक्त होने के लिए हमें जातियों का इतिहास समझना होगा । अब नागर साहब की ये टिप्पणी भारतीय बौद्धिक परिदृश्य पर कितनी बड़ी टिप्पणी है । बगैर जातियों के इतिहास को समझे जिस तरह का शोर पिछले कई दशकों से मचाया जा रहा है उससे उनकी अधिक गलतियों की आशंका सही साबित हो रही है । इन दोनों किताबों का प्रकाशन आश्वस्तिकारक है ।    

मोहब्बत की मिसाल 'पाकीजा'

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो काल से होड़ लेती हुई कालजयी हो जाती हैं । ऐसी ही एक फिल्म है पाकीज़ा । आज से करीब साठ साल पहले यानि सत्रह जनवरी 1957 में एक फिल्म का मुहूरत हुआ था और मुहूरत के पंद्रह साल बाद 4 फरवरी 1972 में ये फिल्म रिलीज हो पाई । यह एक ऐसी ऐतिहासिक फिल्म थी जिसको लेकर फिल्मी दुनिया में कई किवदंतियां अब भी मौजूद हैं । कहा जाता है कि जब फिल्म पाकीज़ा बनकर तैयार हो गई तो कमाल अमरोही ने फिल्म के जानकारों और समीक्षकों को यह फिल्म दिखाई । फिल्म के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया उनको मिली उससे उनका दिल टूट गया । उन्होंने जमकर शराब पी और घर लौटकर फिर शराब पीने लगे । उस दिन कमाल अमरोही ने जितनी शराब पी थी उतनी कभी नहीं पी थी । शराब के नशे में उन्होंने अपने बच्चों को पास बुलाया और कहा कि उनके मरने के बाद वो स्टूडियो और कामकाज को अच्छी तरह से संभालें । कमाल के परिवारवाले उनकी यह हालत देखकर बेहद परेशान हो गए । उन्होंने मीना कुमारी के पास जाकर कमाल की हालत बतलाई, तब मीना कुमारी उनसे अलग रहने लगी थी । जब 1964 में मीना कुमारी कमाल का घर छोड़कर बाहर निकली थीं तो उन्होंने कसम खाई थी कि उस घर में कभी नहीं जाएंगीं । लेकिन कमाल की हालत में वो उनके घर तक आई और बाहर ही गाड़ी में बैठी रहीं । उनके बच्चों से कहा कि सब ठीक हो जाएगा । जब रात ढलने लगी तो कमाल के बच्चों ने गाड़ी में बैठी मीना कुमारी को बताया कि वो सो गए हैं तो मीना कुमारी अपने घर लौट आईं । इस तरह के कई किस्से इस फिल्म से जुड़े हैं ।
दरअसल फिल्म दायरा के फ्लॉप होने के बाद कमाल अमरोही के दिमाग में पाकीज़ा का आइडिया आकार लेने लगा था । वो दस्तों से कहते थे कि मीना कुमारी को लेकर ऐक ऐसी फिल्म बनाना चाहते हैं जो ना केवल ऐतिहासिक हो बल्कि अपनी महबूब पत्नी की प्रतिभा को सर्वोत्तम तरीके से उभार सके । उनके करीबी बताते हैं कि कमाल साहब हमेशा कहते थे कि शाहजहां ने अपनी मोहब्बत के लिए ताजमहल बनवाया और वो अपनी मोहब्बत के लिए पाकीज़ा बनाना चाहते हैं । पाकीज़ा फिल्म के संवाद की हर पंक्ति इस बात की गवाही देती है कि वो मीना कुमारी को ध्यान में रखकर लिखी गई थी । फिल्म पाकीजा को बनाते वक्त कमाल अमरोही के दिमाग में के आसिफ की फिल्म मुगल-ए-आजम थी और वो चाहते थे कि भव्यता और विजुअल ट्रीटमेंट में पाकीज़ा उससे आगे निकल जाए । पाकीज़ा पहले व्लैक एंड व्हाइट में शूट होनी शुरू हुई, तकनीक बदली तो फिर से कलर फिल्म पर शूट होने लगी उसके बाद सिनेमास्कोप का जमाना आया तो उसमें शूटिंग हुई । पहले के सारे शूट रद्दी में डाल दिए गए ।
सिनेमास्कोप को लेकर भी एक दिलचस्प प्रसंग इस फिल्म से जुडा़ हुआ है । कमाल अमरोही को परफैक्शनिस्ट के तौर पर जाना जाता है । वो फिल्म के लोकेशन से लेकर हर शॉट का बेहद बारीकी से ध्यान रखते थे । जब उन्होंने पाकीजा के कलर शूट को रद्दी में डालकर सिनेमास्कोप में शूट शुरू किया तो उन्हें लगा कि सिनेमास्कोप के जिस लैंस से वो शूटिंग कर रहे थे उसका फोकस ठीक नहीं था । उस जमाने में एमजीएम नाम की विदेशी कंपनी से लैंस आता था कभी किराए पर तो कभी अन्य शर्तों पर । कमाल अमरोही उस जमाने में इस लैंस के लिए पचास हजार रुपए महीने चुका रहे थे । कमाल अमरोही ने लेंस के फोकस की त्रुटि के बारे में एमजीएम कंपनी को खत लिखा । कंपनी के नुमाइंदों ने लेंस की जांच की तो अमरोही की शिकायत सही पाई गई । बाद में उस लेंस को कंपनी ने कमाल अमरोही को उपहार के तौर पर भेंट कर दिया ।
पाकीजा को तकनीक से आधुनिक बनाने के कमाल अमरोही के जुनून के बीच उनका और मीना कुमारी के संबंध में खटास आनी शुरू हो गई थी । लोकेशन को लेकर कमाल अमरोही ने इतनी यात्राएं की कि उस वक्त ये भी कहा जाने लगा था कि इस फिल्म का नाम इंडिया ट्रिप रख देना चाहिए । मीना कुमारी की ज्वेलरी के लिए भी उन्होंने बनारस, जयपुर और त्रिवेन्द्रम तक की यात्रा की । फिल्म के शुरू होने के सात वर्षों के बाद मार्च उन्नीस सौ चौंसठ में मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग हो गए । जब कमाल अमरोही और मीना कुमारी अलग हो गए तो लगा था कि ये फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाएगी । इस बीच इस फिल्म में काम करने वाले कई लोग इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए तो कइयों की मौत हो गई । मीना कुमारी भी अपना इलाज करवाने विदेश गईं, लौट कर आईं लेकिन फिल्म की गाड़ी पटरी पर लौट नहीं रही थी । मीना कुमारी की बॉक्स ऑफिस पर तूती बोल रही थी । आखिरकार कमाल अमरोही ने 25 अगस्त 1968 को मीना कुमारी को एक पत्र लिखा- सिर्फ पाकीज़ा की रिलीज ही बच गई है । तुमने एक शर्त रखी है कि जबतक मैं तुमको तलाक नहीं दूंगा तबतक तुम पाकीज़ा पूरी नहीं करोगी । मैं तुम्हें इस बंधन से आजाद कर दूंगा अगर तुम अपनी पाकीजा को पूरा रना चाहोगी तो मुझे खुशी होगी ।अब ये इस पत्र का कमाल था या फिर कुछ और मीना कुमारी मे फिल्म में दोबारा काम करने की हामी भर दी । फिल्म पूरी हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर अच्छी शुरुआत नहीं मिली । लेकिन इस बीच मीना कुमारी अस्पताल में भर्ती हो गईं और उनकी बीमारी की खबर फैलने लगी थी । 31 मार्च को उन्होंने अंतिम सांसे ली । उनकी मौत के बाद पाकीज़ा देखने दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी । कहा गया कि पहले तो मीना कुमारी ने अपने पैसों से फिल्म पाकीज़ा बनाई और फिर अपनी मौत से । 


प्रवासी बहाना, स्तरहीनता निशाना

दिल्ली की हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष और वरिष्ठ उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने हाल ही में फेसबुक पर एक टिप्पणी की – दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आनेवाले ज़्यादातर कॉलेजों का हाल यह है कि उनके यहाँ की साहित्यक गोष्ठी के नाम के साथ 'अन्तर्राष्ट्रीय ' शब्द जुड़ जाये ,बस इसी लालच में विदेशों से छुट्टी मनाने आये औसत दर्जे के कहानी और कविता लेखकों को बुलाना नहीं भूलते । साहित्यक गोष्ठियों में जहाँ जाओगे "उन्हें" पाओगे जो दोनों हाथों में लड्डू की मुद्रा में मुस्करा रहे होते हैं । मैत्रेयी पुष्पा की इस टिप्पणी पर साहित्य जगत में अच्छा खासा विवाद हो गया । प्रवासी लेखक तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी फेसबुक वॉल पर मैत्रेयी जी की इस पोस्ट को उद्धृत करते हुए मैत्रेयी पुष्पा पर जोरदार हमला बोला और उनको इशारों इशारों में साहित्य की अरविंद केजरीवाल बता दिया । तेजेन्द्र शर्मा ने व्यंग्य लेखक प्रेम जनमेजय के भी एक पोस्ट को उद्धृत किया- "इसी मौसम में प्रवासी साहित्यकार भी तो आते हैं - प्रजनन और थोड़े दिन ठहरने के लिये। कुछ दाना चुगने आते हैं और कुछ दाना डालने आते हैं। इसी समय तो हिंदी साहित्य का वसंत आता है। प्रवासी साहित्यकारों की काली कोयल कूकती है। काले कौए भी कांव-कांव करते हैं। कौओं तक के लिये पलक पावड़े बिछाए जाते हैं। आजकल कोयल हो या कौवा काले का बोलबाला है। यशस्वी प्रवासी को साधारण से लेकर असाधारण प्रकाशक तक संपूर्ण निहारते हैं। हवा में हाथ हिला कर या मुस्कान फेंक कर भ्रम में डाल जाता है। पीतल की चमक सोने को कुंठिंत कर रही है। घर की मुर्गियां दाल के बराबर भी नहीं रहीं उन्हें बर्ड फ़्लू हो गया है।" तेजेन्द्र शर्मा ने लिखा कि मैत्रेयी पुष्पा की तो समझ में आती है। वे तो पूरी युवा पीढ़ी के लेखन को नकार चुकी हैं। क्योंकि केजरीवाल ने उन्हें दिल्ली हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया है, वे उसी की भाषा भी बोल रही हैं। मगर प्रेम जनमेजय के मन की कुण्ठा मुझे समझ नहीं आई। अगर उनको लगता है कि उपरोक्त भाषा किसी व्यंग्य की है तो व्यंग्य का अन्धकार युग आने में देर नहीं है। यह केवल अपने मन की भड़ास की अभिव्यक्ति है। प्रेम तो सुधा ओम धींगरा, दिव्या माथुर, सुषम बेदी और ज़किया ज़ुबैरी आदि के साहित्य पर समय समय पर बोल चुके हैं। उनकी गोष्ठियां अपने घर में आयोजित भी की हैं। प्रवासी लेखकों को लेकर मन में ऐसी कुण्ठा क्यों है। प्रेम जनमेजय तो व्यंग्य लेखक हैं उनकी बातें चुटीली होंगी ।
हो सकता है कि लंदन में रह रहे कहानीकार तेज्नद्र शर्मा को किसी की कुंठा समझ में नहीं आ रही हो लेकिन प्रवासी साहित्य को लेकर जिस तरह से ढोल पीटा जाता है उससे तो यही लगता है । देश के बाहर रहनेवाले कुछ लेखक अपनी पहचान को लेकर बहुत परेशान रहते हैं । अपने देश से निकलने के पहले ही अपने भारत प्रवास के दौरान के कार्यक्रमों को इस तरह से विज्ञापित, प्रचारित करते हैं कि जैसे शहंशाह अकबर के यात्रा के पहले मुनादी की जा रही हो । यह क्या है ।आत्मश्लाघा, आत्मप्रचार और आत्मदंभ में डूबे प्रवासी लेखक अपनी दुंदुभि खुद ही बजाते घूमते रहते हैं । दरअसल कुछ प्रवासी लेखकों ने अपने देश में अपने लेखन की एजेंसी दे रखी है जिसके अभिकर्ता समय समय पर बदलते रहते हैं जो उनके हितों का ध्यान रखते हैं । बदले में अभिकर्ताओं को क्या  मिलता है यह ज्ञात नहीं है क्योंकि यह गोपनीय होता है ।  दूसरी बात यह कि साहित्य, साहित्य होता है उसको प्रवासी और निवासी के खांचे में बांधना ही गलत है । दरअसल अगर हम देखें तो हिंदी का जो प्रवासी साहित्य है उसका एक बड़ा हिस्सा विदेशों से लाए जानेवाले मोजे, टाई, कलम और इत्र की शीशियों पर टिका है । अब इसको ज्यादा विस्तार देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हिंदी के पाठक बेहद सजग हैं और वो साहित्यकारों की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं । प्रवासी नामकरण कर देने से साहित्य का एक अलग खांचा बन जाता है और फिर उन खाचों में रहनेवाले लेखक अपने बीच ही तुलना का आग्रह करते हैं । इसका एक फायदा यह होता है कि औसत रचनाएं भी नजर में आ जाती हैं । जो लोग प्रवासी साहित्य के झंडाबरदार हैं उनको अपनी रचनाओं के अलावा अन्य कृतियां या काम दिखाई नहीं देते हैं । स्व के शोरगुल में वो दूसरे लेखकों को नजरअंदाज करते चलते हैं । कहना ना होगा कि प्रवासी साहित्य का ये परिदृश्य बेहद एकहरा है जबकि इसको प्रामाणिकता हासिल करने के लिए समावेशी होना पड़ेगा । अगर प्रवासी साहित्य को समकालीन भारतीय साहित्य में मजबूती से स्थापित करना है तो हमें विदेशों में रह रहे भारतीय भाषाओं के सभी लेखकों की रचनाओं को साथ लेकर चलना ही नहीं होगा उसपर विचार और मंथन भी करना होगा । इकहरे प्रचार प्रसार से फौरी तौर पर प्रसिद्धि तो मिल सकती है, मिल भी रही है , लेकिन उसका कोई स्थायी महत्व नहीं होगा । जिस तरह से प्रवासी साहित्य का कोलाहल गूंज रहा है उसमें डॉ पी जयरामन का नाम लगभग नहीं लिया जाता है । लंबे समय से अमेरिका में रह रहे पी जयरामन जी जिस खामोशी के साथ हिंदी साहित्य के लिए काम कर रहे हैं वो प्रवासी लेखकों के लिए उदाहरण है । डॉ पी जयरामन ने तमिल के भक्त कवियों की रचनाओं का अनुवाद किया है जो कि दस खंडों में प्रकाशित है । तमिल से हिंदी में अनुवाद और उसको पाठकों की सुविधानुसार शब्दों के साथ पिरोना एक ऐतिहासिक काम था और इस काम ने हिंदी और तमिल के बीच की खाई को पाटने की कोशिश तो की ही दोनों भाषाओं के बीच एक मजबूत सेतु निर्माण का कार्य भी किया । डॉ जयरामन पिछले करीब चार दशकों से अमेरिका में रह रहे हैं और वहां हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए सक्रिय हैं । नब्बे साल की उम्र में भी उनकी काम करने की ललक देखते ही बनती है । चार छह कहानियां लिखकर, दो चार पत्रिकाओं के अंक अपने उपर प्रकाशित करवा अगर कोई साहित्यकार महान बन सकता तो अबतक कई महान साहित्यकार स्थापित हो चुके होते ।
मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी पोस्ट में एक और सवाल उठाया जिसपर विस्तार से गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है ।मैत्रेयी जी ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आनेवाले ज़्यादातर कॉलेज अपनी साहित्यक गोष्ठियों में इस वजह से विदेशों से आए औसत दर्ज के लेखकों को बुलाते हैं ताकि उनके सेमिनारों में अंतराष्ट्रीय शब्द जुड़ सके । यह प्रवृत्ति पिछले कई सालों से जोर पकड़ रही है । तेजेन्द्र शर्मा ने उत्तेजना में भले ही मैत्रेयी जी को बुरा भला कह दिया हो लेकिन उनकी चिंता दिल्ली विश्वविद्यालयों में सेमिनारों के गिरते स्तर को लेकर थी । जब अंतराष्ट्रीय सेमिनार की परिकल्पना की गई होगी तो यह माना गया होगा कि ऐसे आयोजनों में विदेशों के उन विद्वानों को आमंत्रित किया जाएगा जिन्होंने अपनी लेखनी से संबंधित विषय में सार्थक हस्तक्षेप किया हो । अब अगर इस अवधारणा पर विचार करें तो तेजेन्द्र शर्मा को अपनी टिप्पणियों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता होगी या फिर ये बताने की कि उनके लेखकीय योगदान ने किस तरह से संबंधित विषय या विधा में हस्तक्षेप किया । मैत्रेयी पुष्पा और प्रेम जनमेजय पर हमलावर होने की बजाए अगर वो अपनी उपलब्धियों को बताते तो सार्थक होता । क़ॉलेजों का क्या है वो तो अपनी नैक की रैकिंग को लेकर चिंतित रहते हैं और शिक्षक अपने प्रमोशन में जुड़नेवाले प्वाइंट के लिए जुगाड़रत । इस तरह के सेमिनारों से दोनों का फायदा होता है, कागजी खानापूरी हो जाती है लेकिन विद्यार्थियों को क्या नई दृष्टि मिलती है, मैत्रेयी की टिप्पणी में छिपे इस सवाल का उत्तर सामने आना चाहिए । दरअसल हर वर्ष के आखिरी तिमाही में शैक्षणिक सेमिनारों की बाढ़ सी आ जाती है । देशभर के महाविद्यालय या फिर विश्वविद्यालयों के विभाग अपने अपने यहां सेमिनार आयोजित करते हैं । कुछ लोग तो इसको साहित्य की मार्च लूट भी कहते हैं । विश्वविद्लायों इस तरह के सेमिनार के लिए अनुदान देनेवाली संस्थाओं को इनकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देने के लिए एक मैकेनिज्म को बनाने की आवश्यकता है ताकि साहित्य की इस मार्च लूट पर लगाम लगाई जा सके । अगर फंडिंग एजेंसी इस तरह के सेमिनारों की स्तरीयता बनाने या बचाने के लिए कोई मैकेनिज्म बना सकेंगे तो विद्यार्थियों का भी भला होगा और साहित्य का भी । विद्यार्थियों में वैश्विक दृष्टि का निर्माण होगा और अपने यहां के साहित्य को नई प्रवृत्तियों के बरक्श रखकर तुलनात्मक अध्ययन के द्वार खुल सकेंगे । लेकिन अगर यथास्थिति बरकरार रही तो करदाताओं के पैसे बर्बाद होते रहेंगे और बहुत संभव है कि जब पानी सर से उपर चला जाए तो सरकार इसको रोकने के लिए दखल दे । तब विश्वविद्लायों की स्वायत्ता का रोना रोया जाएगा, बेहतर हो उस आसन्न रुदन के पहले स्थितियां ठीत कर ली जाएं ।    


Friday, February 10, 2017

इंसाफ में देरी पर सवाल

अच्छा होता अगर उपहार हादसे के बाद मैंने कानून को अपने हाथ में लेकर अपराधियों को मार दिया होता । कानूनी प्रक्रिया में मुझे चौदह साल की जेल होती और चौदह साल की जेल की सजा काटकर में अब सुकून से जिंदगी जी रही होती – यह बयान है पिछले बीस साल से अदालतों का चक्कर लगा रही और उपहार अग्नि-कांड में अपने दो बच्चों को गंवाने वाली नीलम कृष्णमूर्ति का । नीलम कृष्णमूर्ति का यह बयान देश की न्यायिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है । बीस साल से कोर्ट कचहरी का थका देनेवाला चक्कर, आरोपियों की तरफ से धमकी, और सबसे अधिक अपने बच्चों को खोने का गम जिन्हें नहीं तोड़ सका उनको सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने तोड़कर रख दिया । सुप्रीम कोर्ट ने उपहार अग्निकांड में जानेमाने बिल्डर गोपाल अंसल को एक साल की सजा सुनाई लेकिन उसके बड़े भाई सुशील अंसल को उनकी इम्र का हवाला देते हुए सजा नहीं देने का फैसला सुनाया । सुशील अंसल की उम्र लगभग सतहत्तर साल बताई जा रही है । अब अगर सत्तावन साल की उम में किसी ने कोई अपराध किया और अदालतों में मामला बीस साल तक चल गया तो क्या उसको इस बिनाह पर बरी किया जा सकता है या जेल नहीं भेजा जा सकता है कि वो बहुत लंबी उम्र का है । क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद सभी जेलों में बंद अस्सी साल के उम्र के कैदियों को रिहा कर दिया जाना चाहिए । ये कुछ असुविधाजनक सवाल हैं जो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद खड़े हो रहे हैं । जून उन्नीस सौ सत्तानवे में दिल्ली के उपहार सिनेमा हाल में आग लग गई थी जिसमें उनसठ लोग जलकर मर गए थे । लंबी अदालती लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सिनेमा हॉल के मालिक अंसल बंधुओं को गोर लापरवाही का दोषी माना था । सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिनेमा हॉल का मालिक होने की वजह से वहां जाने वाले दर्शकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी है । कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अंसल बंधुओं की रुचि लोगों की सुरक्षा से ज्यादा पैसे बनाने में थी । सिनेमाघर में सीटें बढ़ाए जाने से बाहर निकलने का रास्ते बंद हो गए थे जिसकी वजह से जब आग लगी तो वहां बैठे दर्शक हॉल से बाहर नहीं निकल सके थे और धुंए की वजह से उनकी दम घुटने से मौत हो गई। कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को भी खारिज कर दिया था कि अंसल बंधु सिनेमा हॉल के रोज के कामकाज में दखल नहीं देते हैं । कोर्ट ने कहा था कि दस्तावेजों और सबूतों से यह साफ है कि सिनेमा हॉल के आर्थिक मामलों को वो दोनों लगातार देखते थे । अब सवाल यही है कि इतना सबका दोषी ठहराए जाने के बावजूद सुशील अंसल को बरी कर देना कहां तक उचित है । क्या कानून अलग अलग वर्ग और आय वर्ग के लोगों के लिए अलहदा होता है । क्या सचमुच न्याय की देवी की आंखों पर काली पट्टी बंधी होती है । कानून की यह कैसी व्याख्या है जो दोषियों को बख्श देने के लिए उम्र और बीमारी का आधार लेती है । इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर सवाल खड़ा नहीं किया जा रहा है लेकिन फैसले पर सवाल उठाने का हक तो संविधान ने हर भारतीय नागरिक को दिया है ।

बीस साल पहले जब उपहार हादसा हुआ था तब सीबीआई ने मुंबई से अंसल बंधुओं को गिरफ्तार किया था । उसी साल सीबीआई ने अंसल बंधुओं समेत सोलह लोगों पर चार्जशीट दाखिल कर दी थी । करीब डेढ साल बाद ट्रायल शुरू हुआ औ तीन साल बाद आरोप तय किए गए । गवाहों के बयान औरर सबूतों पर जिरह और हाईकोर्ट के दखल के बाद नवंबर दो हजार सात में निचली अदालत ने इस केस में फैसला सुनाया था । यानि हादसे के दस साल बाद । इस फैसले में अंसल बंधुओं को दो साल की सजा सुनाई गई थी । इसके बाद न्याय के लिए लड़ाई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी लगभग दस साल चली । हाईकोर्ट ने अंसल बंधुओं की सजा को घटाकर एक साल कर दिया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बहाल रखा । फिर ट्रामा सेंटर बनाने के लिए दोनों पर तीस तीस करोड़ का जुर्माना लगाया गया जिसे उन्होंने जमा करवा दिया। फिर अब पुनर्विचार याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने गोपाल अंसल को बाकी बची सजा काटने के लिए चार हफ्ते में सरेंडर करने का हुक्म दिया और सुशील को सजा से राहत दे दी । इस पूरे मामले में तो दोषी न्यायिक प्रक्रिया हुआ । अगर वक्त रहते इस मामले में सजा सुना दी जाती तो सुशील अंसल को राहत नहींमिल पाती क्योंकि तब वो साठ या बासठ साल के होते । न्यायालयों में लगनेवाले समय पर सुप्रीम कोर्ट को भी विचार करना होगा । निर्भया हत्याकांड में भी चार साल बीच चुके हैं सेकिन सजा पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है । सुप्रीम कोर्ट को कोई ऐसा रास्ता तलाशना चाहिए जिसमें समाज को प्रभावित करनेवाले अपराध पर जल्द से जल्द फैसला देकर एक संदेश देने की कोशिश करनी चाहिए । अगर इस तरह के सामाजिक अपराधों में भी न्याय मिलने में देरी होगी तो फिर् न्यायिक व्यवस्था में लोगों का भरोसा छीजने लगेगा । लोकतंत्र के लिए यह बहुत दुखद होगा कि जनता का न्यायपालिका में भरोसा कम हो ।  

Thursday, February 9, 2017

आंतरिक लोकतंत्र से कांग्रेस को परहेज ·

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच एक बेहद अहम खबर दब सी गई । चुनाव आयोग ने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को अपने आतंरिक चुनाव तीस जून तक करवाने का आदेश दिए हैं । चुनाव आयोग ने साफ तौर पर कहा है कि अब इसको और टालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है । दरअसल जो हजार पंद्रह के सितंबर से लेकर अब तक कांग्रेस पार्टी अपने आंतरिक चुनावों को टालने का अनुरोध दो बार चुनाव आयोग से कर चुकी है जिसको आयोग ने मान लिया था । लेकिन अब आयोग ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कांग्रेस को तीस जून तक संगठन के अध्यक्ष समेत सभी स्तरों के चुनाव संपन्न करवाने का हुक्म दिया है और साथ ही यह भी कहा है कि अब संगठन के चुनाव को टालने की और छूट नहीं दी जा सकती है । दरअसल कांग्रेस में सभी स्तरों पर सांगठनिक चुनाव दो हजार दस में ही हुए थे और दो हजार तेरह में राहुल गांधी को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था । सोनिया गांधी उन्नीस सौ अट्ठानवे से कांग्रेस की अध्यक्ष बनी हुई हैं और नियमित अंतराल पर इस बात की चर्चा होती रहती है कि अब कांग्रेस की कमान राहुल गांधी को सौंपी जानेवाली है ।
अब कांग्रेस चुनाव आयोग के इस निर्देश का विरोध कर रही है और कह रही है कि दिसंबर के पहले चुनाव करवाना संभव नहीं है । कांग्रेस के प्रवक्ता अब यह दलील दे रहे हैं कि चुनाव आयोग को किसी भी राजनीतित दल के आंतरिक चुनावों की तारीख तय करने का हक नहीं है । कांग्रेस की दलील है कि उनकी पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक कार्यसमिति ने चुनावों की तारीखें तय की है और उसके हिसाब से ही चुनाव करवाए जाएंगे । कांग्रेस के इस रुख के बाद पार्टी और चुनाव आयोग में टकराव की आशंका पैदा हो गई है । दरअसल देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में आजादी के बाद से आंतरिक लोकतंत्र धीरे धीरे खत्म होता चला गया । पहले नेहरू फिर इंदिरा जी और उसके बाद राजीव गांधी और सोनिया गांधी के दौर में पार्टी पर एक परिवार का वर्चस्व बढ़ता चला गया । राजीव गांधी की हत्या के बाद जब सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से मना तक दिया था उस दौर में उन्नीस सौ सत्तानवे में कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए थे । उस वक्त पार्टी के लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे सीताराम केसरी ने शरद पवार और राजेश पायलट को मात दी थी लेकिन उनका भी कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चल पाया था ।
लगभग सात साल से राजनीति से दूर रहनेवाली सोनिया गांधी ने एलान कर दिया कि वो उन्नीस सौ अट्ठानवे के आम चुनाव में कांग्रेस का प्रचार करेंगी । सोनिया के चुनाव प्रचार से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं हुआ लेकिन बगैर किसी सदन के सदस्य बने सोनिया गांधी को कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन चुन लिया गया । ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में यह पहली बार हुआ था । उन्नीस सौ सत्तर में इंदिरा गांधी भी इसी तरह से कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन चुनी गई थीं । सोनिया के राजनीति में आने के बाद पार्टी में सत्ता के दो केंद्र बनने लगे थे जिसकी परिणति सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाना । दो साल बाद यानि दो हजार दस में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ जिसमें सोनिया गांधी ने जितेन्द्र प्रसाद को भारी बहुमत से हरा दिया था । सतहत्तर सौ इकहत्तर वोट में से जितिन पसाद को सिर्फ चौरानवे वोट मिले थे । यह पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए आखिरी चुनाव था । इसके बाद से सोनिया गांधी के नेतृत्व को कभी चुनौती नहीं मिली और वो सर्वसम्मति से पार्टी की अध्यक्ष बनती रहीं । सोनिया गांधी कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक रहनेवाली अध्यक्ष हैं । कभी कभार निचले स्तर पर चुनाव हुए भी तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए किसी ने सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई । जितेन्द्र प्रसाद का हश्र सबसे सामने था । राहुल गांधी जब पार्टी के मामलों को देखने लगे तो उन्होंने ब्लाक, जिला और राज्य स्तर के चुनावों को करवाने का बीड़ा उठाया । कई राज्यों में चुनाव हुए भी और अध्यक्ष भी चुने गए ।

दरअसल कांग्रेस में जो प्रवृति इंदिरा गांधी के वक्त मजबूत हुई उसने इस पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को कमोजर किया या कह सकते हैं कि बाधित किया । जब से काग्रेस पार्टी में एक व्यक्ति को राज्य का अध्यक्ष नियुक्त करने का अधिकार दिया जाने लगा तब से आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होने लगा । हर तरह के फैसले लेने का अधिकार आलाकमान को चाहे वो प्रदेश अध्यक्ष हो, प्रदेश कार्यकारिणी का गठन हो, मुख्यमंत्री का चुनाव हो या फिर बाद में प्रधानमंत्री का भी । कांग्रेस के नेता आलाकमान को खुश करने के लिए हर तरह के अहम फैसलों को लिए के उनको अधिकृत करने लगे । इससे चमचागिरी की राजनीति को बढ़ावा मिलने लगा और मजबूत स्थानीय नेतृत्व पनप नहीं सका । इसके दूरगामी परिणाम को कांग्रेस का नेतृत्व भांप नहीं सका । आज अगर कांग्रेस की हालात पतली है और एक के बाद एक राज्य से वो सत्ता से दूर हो रही है या जनता उनको नकार रही है तो उसके पीछे पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का नहीं होना है । आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर पार्टी में जिस तरह का छलावा होता है वो जगजाहिर है । लोकतंत्र में विपक्ष की अहम भूमिका होती है और अगर विपक्ष कमजोर होता है तो प्रकरांतर से लोकतंत्र भी कमजोर होता है । आज अगर कांग्रेस को खुद को मजबूत करना है तो उसको पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बहाल करना होगा और आलाकमान को अधिकृत करने की राजनीति से दूर जाना होगा । लेकिन इसके आसार नजर नहीं आ रहे हैं । राहुल गांधी की ताजपोशी भी बगैर चुनाव के ही होती नजर आती है क्योंकि वो निर्विरोध अध्यक्ष बनेंगे । 

Tuesday, February 7, 2017

चुनाव सुधार पर मामूली पहल

केंद्रीय बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चुनाव सुधार के लिए सरकार के संकल्पों को दोहराते हुए पार्टियों की फंडिंग की पारदर्शिता के लिए कुछ कदम उठाने का एलान किया है । चुनावी बॉंड और पार्टियों को नकदी के रूप में मिलनेवाली चंदे की रकम को बीस हजार से घटाकर दो हजार करने का प्रस्ताव किया गया है । ये चुनाव सुधार की दिशा में उठाए जानेवाले कदमों की शुरुआत भर मानी जा सकती है । इन दो कदमों से चुनावों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकेगा ऐसा मानना मुश्किल है परंतु किसी सरकार ने इस दिशा में कदम उठाने का साहस तो दिखाया । अगर रास्ते पर चल पड़े हैं तो कोईना कोई हल निकलेगा लेकिन अभी तो ये पहल नाकाफी हैं । दरअसल जब भारतीय जनता पार्टी ने काले धन को दो हजार चौदह के चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाया उसके बाद से ही राजनीतिक दलों को मिलनेवाले चंदे को लेकर बहस शुरू हो गई थी । जब पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विमुद्रीकरण का एलान किया तो उसके बाद से ही सरकार को घेरने के लिए चुनावी चंदों से लेकर चुनाव में होनेवाले बेहिसाब खर्चे को लेकर भी विशेषज्ञ सवाल खडे करने लगे थे । सरकार क्या सभी राजनीतिक दलों पर यह इल्जाम लग रहे थे कि धनकुबरों के काला धन पर लगाम लगाने के लिए तो कार्रवाई शुरू की गई लेकिन जब बात राजनीतिक दलों की आती है तो सभी दल मिलकर अपने आपको बचाने के लिए कानून बनाने या पुराने कानून को बचाने में एकजुट हो जाते हैं । इस सिलसिले में संसद की कैंटीन में मिलनेवाले सस्ते खाने को भी इससे जोड़ा जाता रहा है । लगातार इस तरह की बातों से राजनीतिक दलों के विरोधी में एक माहौल सा बनने लगा था । इस तरह के माहौल के बीच चुनाव आयोग ने भी सरकार को चुनाव के दौरान पारदर्शिता के लिए कई सुझाव दिए थे । शीतकालीन सत्र के शुरू होने के पहले हुई सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राजनीतिक दलों को होनेवाली फंडिंग पर चर्चा की थी और सभी दलों से आग्रह किया था कि इसमें सुधार के लिए अपने सुझाव दें ।
अब अगर आम बजट में सरकार के प्रस्तावों को देखें तो यह कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं है । एक स्त्रोत से नकद चंदे की रकम की सीमा बीस हजार से घटाकर दो हजार करने का प्रस्ताव है । इसका फायदा किसे होगा यह तो पता नहीं चल पा रहा है लेकिन राजनीतिक दलों को इतना नुकासन अवश्य होगा कि अब उनको एक की बजाए दस पर्चियां काटनी होगी । पहले बीस हजार के चंदे के लिए एक पर्ची काटनी पड़ती थी लेकिन अब दो दो हजार की दस पर्चियां कटेंगी । इस चंदे पर कोई पूछताछ नहीं होने का कानून है लिहाजा जितनी भी पर्चियां कटे क्या फर्क पड़ता है । अगर इस चंदे के साथ पैन कार्ड या फिर आधार कार्ड की फोटो प्रति अनिवार्य की जाती तो काले धन पर रोक लगाने में मदद मिल सकती थी या फिर राजनीतिक दलों को मिलनेवाले नकद चंदे में ज्यादा पारदर्शिता आ सकती थी । अगर ऐसा होता तो राजनीतिक दलों पर लगनेवाले आरोपों में कमी आ सकती थी । राजनीतिक दलों को तीन लाख तक की नकद लेन-देन की छूट भी दी गई है । यह उचित है क्योंकि अब भी भारत में कई तरह के खर्चे ऐसे होते हैं जो सिर्फ नकद में किए जा सकते हैं ।
आम बजट में जिस तरह से चुनावी बॉंड का प्रस्ताव दिया गया है उसके बारे में भी अभी तक स्थिति साफ नहीं है । अपने बजट प्रस्ताव में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि चुनावी बॉंड जारी करने के लिए आरबीआई एक्ट में संशोधन किया जाएगा ताकि कुछ बैंकों के माध्यम से इस बॉंड की बिक्री की जा सके । सरकारी प्रस्ताव के मुताबिक इस चुनावी बॉंड को सिर्फ चेक या फिर डिजीटल पेमेंट के माध्यम से ही खरीदा जा सकेगा । इस बॉंड को उन्हीं खातों में जमाकर भुनाया जा सकता है जो पंजीकृत राजनीतिक दलों के चंदा लेने के मकसद से खोले गए हों । इसके लिए एक निश्चित समय सीमा भी तय किए जाने का प्रस्ताव है । जिस तरह के बॉंड का प्रस्ताव है उसके बारे में विस्तृत जानकारी तो नहीं है लेकिन जो प्रस्ताव है उससे तो यही प्रतीत होता है कि यह धारक के लिए जारी होगा किसी खास राजनीतिक दल के नाम से जारी नहीं किया जाएगा । जिसके पास भी ये ब़ॉंड रहेंगे वो इसका मालिक होगा और जिस चाहे उस राजनीतिक दल का डोनेट कर सकेगा क्योंकि यह बॉंड बीयरर चेक की तरह होगा । ये बॉंड लगभग नकदी की ही तरह होता है इसलिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि राजनीतिक दल को नकद मिल रहा है या फिर बॉंड के माध्यम से । अब यहीं से गड़बड़ी की आशंका शुरू होती है । मान लीजिए किसी व्यक्ति ने दस लाख के बॉंड खरीदे और उसने ये खरीदारी चेक से या फिर डिजीटल पेमेंट के माध्यम से की । उसके बाद उसने लाख दो लाख के मुनाफे पर इसको दूसरे व्यक्ति को कैश पेमेंट पर बेच दिया । अगले ने उसको राजनीतिक दल को डोनेट कर दिया तो फिर कहां से काला धन के डोनेशन पर रोक लगी ।
चुनावी बॉडं के बाजार में खरीद बिक्री को कैसे नियंत्रित किया जाएगा इसपर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि बॉंड को लेकर इस तरह का वाकया पहले भी देखने को मिला है । दो हजार सतासी में राजीव गांधी के शासन काल के दौरान विकास के लिए धन जुटाने की मंशा से इंदिरा विकास पत्र जारी किए गए थे । इंदिरा विकास पत्र जारी करने का अधिकार डाकघरों को दिया गया था । इस बॉंड में भी वही दिक्कत थी कि यह लगभग बीयरर बॉंड था यानि जिसके पास रहेगा वो इसको भुना सकता था । नकद के जैसा । कुछ सालों के बाद सरकार को जब लगा कि इस बॉंड का इस्तेमाल मनी लॉंड्रिंग के लिए किया जा रहा है तो इसको बंद कर दिया गया । अब इस तरह का चुनावी बॉं जारी करने को लेकर भी विशेषज्ञों के बीच इसी आधार पर बहस शुरू हो गई है ।

दरअसल चंदे कि रकम की सीमा के घटाने या बॉंड जारी करना चुनाव सुधार की दिशा में उठाया गया एक बेहद ही मामूली कदम है । अगर सरकार और सभी राजनीतिक दल सचमुच चुनाव सुधार या चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता को लेकर संजीदा है तो उनको चुनाव आयोग को और अधिकार देने होंगे और पीपल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट में सुधार करते हुए उसको और मजबूती देनी होगी । इस तरह का कानून बनाना होगा कि चुनाव आयोग को ये अधिकार मिले की वो एक फंड बनाए और सभी राजनीतिक दलों को चुनाव के वक्त उस फंड से चुनाव लड़ने के लिए पैसे दिए जाएं । जो भी औद्योगिक घराना चुनाव के वक्त राजनीतिक दलों को चंदा देना चाहते हैं उनको चुनाव आयोग को देना चाहिए और फिर चुनाव आयोग इसका उचित वितरण करने का फॉर्मूला बनाए । इससे चुनावों में कालेधन पर रोक लगाई जा सकती है । सालों से स्टेट फंडिंग की बात होती रहती है लेकिन वो विमर्शों का ही हिस्सा बनकर रह जाती है उस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं । सालों पहले चुनाव सुधार के लिए बनाई गई इंद्रजीत गुप्ता कमेटी ने भी स्टेट फंडिंग का सुझाव दिया था लेकिन वो सुझाव फाइलों में धूल फांक रही है । इन प्रस्तावों को लेकर आरबीआई एक्ट और पीपल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट में संसद में संशोधन करवाना होगा, यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य राजनीतिक दल इसपर किस तरह का रुख अपनाते हैं ।     

Sunday, February 5, 2017

फेसबुक की सफलता की परीकथा

कौन जानता था कि तेरह साल पहले हॉवर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए बनाई गई बेवसाइट फेसबुक पूरी दुनिया में इस कदर छा जाएगी कि वो संचार के वैकल्पिक साधन के तौर पर उपयोग में आने लगेगी । तेरह साल के सफर में ही करीब हर महीने दो अरब सक्रिय उपभोक्ताओं के साथ फेसबुक की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है । फेसबुक ने पिछली तिमाही के जो आंकड़ें जारी किए उसके मुताबिक सवा अरब लोग हर दिन फेसबुक पर सक्रिय रहते हैं । आज फेसबुक पूरी दुनिया की करीब सत्तर भाषाओं में उपलब्ध है और हर दस मिनट में करीब एक लाख फ्रेंड्स रिक्वेस्ट का आदान प्रदान होता है और औसतन करीब तीन लाख हर मिनट पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं । यही नहीं प्रति मिनट फेसबुक पर कमेंट करनेवालों की संख्या भी पांच लाख से उपर है और हर सेकेंड 8 नए उपभोक्ता फेसबुक से जुड़ते हैं । ये आंकड़े काल्पनिक लग सकते हैं लेकिन इसको हाल ही में फेसबुक ने खुद ही जारी किया है । दरअसल अगर हम देखें तो तेरह साल में सफलता की यह कहानी किसी परीकथा जैसी लगती है । चार फरवरी दो हजार चार को मार्क जुकरबर्ग, डस्टिन मोस्कोविज, क्रिस ह्यूसेस, एंड्र्यू मैकलम और एडुवर्डो सेवरिन के साथ मिलकर फेसबुक की औपचारिक शुरुआत की थी । औपचारिक शुरुआत के करीब तीन महीने पहले नार्क जुकरबर्ग ने हॉवर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए फेसमास ने एक साइट बनाई थी । फेसमास के लॉंच होने के चार घंटे के अंदर ही करीब पांच सौ विजिटर वहां पहुंचे जिन्होंने बीस हजार से ज्यादा फोटो देखा । फेसमास की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसपर प्रतिबंध लगा दिया लेकिन जुकरबर्ग और उनके साथियों ने इसकी सफलता की आहट को भांप लिया था और फेसमास पर पाबंदी के तीन महीने के अंदर ही उन्होंने फेसबुक नाम से सोशल नेटवर्किंग साइट की शुरुआत कर दी । बाकी बातें तो इतिहास हैं ।
अब फेसबुक सोशल नेटवर्किंग साइट से आगे बढ़कर दूसरे स्तर पर जाना चाहता है और उसके ही प्रयास में है । इन दिनों फेसबुक पर वीडियो की भरमार दिखाई देती है । फेसबुक अन्य बेवसाइट्स को उनके पेज पर किसी भी इवेंट को लाइव करने की सहूलियत प्रदान करने लगा है। फेसबुक के करीब उनासी फीसदी उपभोक्ता मोबाइल के माध्यम से वहां सक्रिय रहते हैं । फेसबुक को इसमें अपार संभावना नजर आई और उसने उपभोक्ताओं को मोबाइल से किसी भी घटना को लाइव करने या फिर सीधे अपना वीडियो पोस्ट करने की सहूलियत दे दी । वीडियो और लाइव करने की इस सहूलियत ने फेसबुक पर लाइक्स की संख्या बहुत बढ़ा दी। अब हर मिनट फेसबुक पर पांच लाख लाइक्स के बटन दबते हैं । लाइक्स के बटन के साथ फेसबुक ने लव, हा-हा, वाऊ, सैड और एंग्री के बटन दिए जिसने उपभोक्ताओ के ट्रैफिक को बढ़ाया । दरअसल फेसबुक अब वीडियो को तरजीह देकर यूट्यूब से पिछड़ने की भारपाई करना चाह रहा है । फेसबुक के लगभग साल भर बाद ही शुरु हुए यूट्यूब ने वीडियो का खजाना बनाकर इससे बहुत पैसा कमाया । पिछले दो तीन सालों से फेसबुक किसी ना किसी तरह से यूट्यूब को मात देने की जुगत में लगा है । अभी जियो के फ्री डाटा ऑफर और उसके बाद अन्य मोबाइल कंपनियों के डाटा दर में कमी के बाद फेसबुक की सही रणनीति ने उसकी पहुंच बहुत बढ़ा दी है । फेसबुक की चौथी तिमाही की रिपोर्ट में इस बात का माना भी गया है कि फ्री डाटा की वजह से उसको फायदा हुआ है । टेक्सट से ज्यादा वीडियो को तरजीह देने और फ्री डाटा की वजह से फेसबुक को इस तिमाही में इक्यावन फीसदी का मुनाफा हुआ । फेसबुक अब भारत के गावं गांव में पहुंच रहा है क्योंकि उन इलाकों में इंटरनेट का घनत्व बढ़ रहा है और सस्ते स्मार्टफोन लोगों की मुट्ठी में आ गए हैं । हमारे देश में जिसके हाथ में स्मार्ट फोन है लगभग उन सभी के पास फेसबुक भी है ।
हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक फेसबुक के उपभोक्ता हैं सप्ताह में एक बार कोई ना कोई वीडियो अवश्य देखते हैं । मोबाइल ओनली की अवधारणा को अपने विस्तार का आधार बनाने वाली फेसबुक ने माना है कि भारत उसके लिए सबसे मजबूत बाजार है जहां विस्तार की अपार संभावनाएं हैं । अब फेसबुक वीडियो से आगे जाकर इसको टीवी में बदलना चाहता है । उसकी योजना के मुताबिक वो अपने प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों को टीवी की सहूलियत देना चाहती है लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइट से टीवी में बदलना या टीवी की सहूलियतें देना इतना आसान नहीं है । टीवी चलानेवाले लोग भी फेसबुक कई इस योजना के बाद सतर्क हो गए हैं और उन्होंने भी अपने ग्राहकों, उपभोक्ताओं के टीवी देखने के पैटर्न का विश्लेषण कर आवश्यक बदलाव करने शुरू कर गिए हैं । खबरों के लिए फेसबुक का सहारा नहीं लिया जा सकता है । फेसबुक ने भले ही लोगों के अकाउंट वेरीफाई किए हैं लेकिन खबरों की सत्यता जांचने का कोई टूल अभी विकसित नहीं हुआ है । फेसबुक को अगर टीवी की जगह लेनी है तो उसको कोई ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें साख पर सवाल ना उठे ।


कट्टरता के खिलाफ कलम

बांग्लादेश से लेकर, पेरिस और तुर्की की वारदातों के हमलावरों की प्रोफाइल चिंता का सबब है । पहले कम पढ़े लिखों को धर्म की आड़ में और पैसों का लालच देकर आतंकवादी बनाने का खेल चलता था पर अब तो एमबीएम और इंजीनियरिंग के छात्र आतंकवाद को अपनाने लगे हैं । पूरी दुनिया में इस प्रवृत्ति पर मंथन हो रहा है कि इस्लाम को मानने पढ़े लिखे युवकों का रैडिकलाइजेशन क्यों और कैसे हो रहा है । भारतीय मूल के डैनिश लेखक ताबिश खैर की किताब जिहादी जेन औपन्यासिक शैली में लिखी गई है जिसमें वैचारिकी के अलावा पढ़े लिखे मुसलमानों की सोच का सामाजिक विश्लेषण भी है । इस उपन्यास में ताबिश खैर ने ग्रेट ब्रिटेन के यॉर्कशर में रहनेवाली दो मुस्लिम दोस्तों के कट्टरपंथ की ओर प्रवृत्त होने की वजहों को विय बनाया है । यॉर्कशर में रहनेवाली दो दोस्त जमीला और अमीना अलग-अलग पारिवारिक पृष्टिभूमि से आती हैं । जमीला परंपरागत मुस्लिम परिवार से तो भारतीय मूल की उसकी दोस्त अमीना बेहद आधुनिक । दोनों दोस्तों की पारिवारिक पृष्ठभूमि तो अलग है लेकिन एक बिंदु पर आकर दोनों मिलती हैं वो है उनका इस्लामिक कट्टरपंथ की ओर आकर्षण । हम गहराई से ताबिश खैर की इस किताब पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि बिल्कुल अलग पारिवारिक पृष्ठभूमि से आनेवाली इन दो मुस्लिम लड़कियों का रैडिकलाइजेशन बिल्कुल अलग अलग वजहों से होता है जो कि व्यक्तिगत भी हैं ,सामाजिक भी और धार्मिक भी, रूढियों से नाराजगी को लेकर विद्रोह भी । इन दो वजहों को पढ़ने के बाद एक बात जेहन में आती है कि कुछ पढ़े लिखे मुसलमान युवकों और युवतियों के कट्टरपंथ की ओर बढ़ने की कई वजहें हो सकती हैं – धर्म और समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी मानसिक यातना, महिलाओं को सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह देखा जाना, इस्लाम की गलत व्याख्या और कुरान और हदीस की आड़ में बरगलाने की कोशिश ।
अपनी पारिवारिक स्थितियों से उबकर कट्टर इस्लाम की ओर झुकाव रखनेवाली अमीना और जमीला सोशल नेटवर्किंग साइट्स और यूट्यूब पर कट्टरपंथी भाषणों को सुनने लगती हैं । इसके बाद आधुनिक विचारों वाली अमीना जीन्स स्कर्ट को छोड़ बुर्के तक पहुंचती है । उसका इस तरह से ब्रेनवॉश किया गया कि वो घर-बार छोड़कर सीरिया पहुंच जाती है । सीरिया पहुंचने के बाद दोनों अनाथालय में काम करने लगती हैं । अमीना शादी कर लेती है उधर जमीला का अनाथालय की हालत को देखकर मोहभंग होने लगता है । उस अनाथालय में छोटी छोटी लड़कियों को आत्मघाती दस्ता में शामिल होने के लिए तैयार किया जाता है । धर्म के नाम पर ये सब होता देख जमीला के अंदर कुछ दरकने लगता है । अमीना जब ये देखती है कि एक दस साल के बच्चे सबाह को यजीदी होने पर गला रेत कर हत्या कर दी जाती है तो उसके मन के कोने अंतरे में भी मोहभंग की चिंगारी सुलगने लगती है । अमीना तय करती है कि वो कुर्दिश हमलावरों के खिलाफ आत्मघाती दस्ता में शामिल होगी और जब उसका पति इसके लिए तैयार होता है तो वो आखिरी मौके पर वो खुद उड़ाती है और उस धमाके में इसका पति हसन और उसके साथी मारे जाते हैं । ये अमीना का इंतकाम था सबाह की कत्ल का । इस तरह की किताबों का आना आवश्यक है ताकि फिक्शन से ही सही यथार्थ का चित्रण हो सके । अपनी इस किताब जिहादी जेन के माध्यम से ताबिश खैर ने विमर्श को एक नया आयाम दिया है । 

Saturday, February 4, 2017

साहित्य-कला पर संजीदा पहल

इस बात को लेकर हिंदी साहित्य जगत में लगातार चर्चा होती है कि दिल्ली में कॉफी हॉउस के बंद होने के बाद से साहित्यक विमर्श के लिए कोई जगह नहीं बची । साहित्य और कला के अलग अलग केंद्र होने की वजह से साहित्य-कला प्रेमियों के एक जगह मिलने की कोई सूरत बन नहीं पाती है । दिल्ली के मंडी हाउस इलाके के श्रीराम सेंटर में एक किताब की दुकान हुआ करती थी जो लेखकों –पाठकों और साहित्यप्रेमियों के मिलने की जगह हुआ करती थी । पर उसके बंद होने के बाद दिल्ली की वो इकलौती जगह भी खत्म हो गई । चंद सालों पहले केंद्र और दिल्ली सरकार से दिल्ली के साहित्य-कला प्रेमियों ने ये मांग की थी कि नई दिल्ली में इलाके में कोई एक ऐसी जगह बनाई जानी चाहिए जहां साहित्यक विमर्श से लेकर नाटकों के मंचन आदि हो सकें । लेखन और अन्य आधुनिक प्रवृत्तियों पर संवाद हो सके । लेकिन साहित्य और कला हमेशा से सरकारों की प्राथमिकता में रही नहीं है लिहाजा इस मांग पर कोई विचार नहीं किया गया । नेताओं के बड़े बड़े स्मारकों के लिए जगह मिल गई लेकिन साहित्य कला केंद्र को लेकर संजीदगी से कोशिश नहीं की जा सकी क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व इसको लेकर उदासीन रहे । चंद व्यक्तिगत प्रयासों की वजह से साहित्य के छोटे-छोटे केंद्र आदि अवश्य बने हैं लेकिन वो नाकाफी हैं । ऐसे में एक उत्साही साहित्य-कालाप्रेमी अराधना प्रधान ने दिल्ली के बिजवासन इलाके में साहित्य कला और रंगमंच के केंद्र के रूप में एक बड़े परिसर मुक्तांगन का निर्माण किया है । मुक्तांगन को बेहद सुरुचिपूर्ण तरीके से बनाया-सजाया गया है । इस केंद्र में साहित्यक विमर्श के अलावा मंचन की सुविधा भी है ।
बाहरी दिल्ली के बिजवासन इलाके में बना यह साहित्य-कला केंद्र भले ही अभी दिल्लीवालों को दूर लगे लेकिन आने वाले दिनों में कार्यक्रमों की आवर्तिता पर इसकी लोकप्रियता निर्भर करेगी ।जैसे जैसे लेखकों और साहित्य प्रेमियों को इस केंद्रके बारे में पता चलेगा तो इसको मजबूती मिलेगी । अराधना प्रधान के उत्साह और साहित्य-कला-संगीत के लिए उनकी प्रतिबद्धता को देखकर इस बात की संभावना है कि आनेवाले दिनों में मुक्तांगन एक बड़े कला केंद्र के तौर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो सकेगा । पिछले दिनों इस केंद्र का शुभारंभ हुआ था और अबतक कई कार्यक्रम हो चुके हैं । संगीत की शाम के अलावा दिनभर चले कार्यक्रम में वैचारिक बहस के अलावा कहानी और शायरी पर भी कार्यक्रम हुए ।
मेरा राम मुख्त़लिफ है- इस विशय पर आयोजित एक सत्र बेहद विचारोत्तेजक रहा । इस सत्र में उपन्यासकार और दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय के सेवनिवृत्त प्रोफेसर अब्दुल विस्मिल्लाह ने कई रोचक व्याख्याएं की । उन्होंने हिन्दू शब्द की उत्पत्ति को आदम और हव्वा की संतान के नाम से जोड़ा, फिर अरबी के शब्दकोश का सहारा लिया और फिर उसको पैगंबर मोहम्मद साहब से जोड़कर एक नई व्याख्या प्रस्तुत करने की कोशिश की । अरबी में हिंदू का अर्थ काला और चोर बताने के बाद इन पंक्तियों के लेखक ने कड़ा प्रतिवाद किया और उनसे इसकी कड़ियां जोड़ने की चुनौती दी लेकिन अब्दुल बिस्मिल्लाह इसको साबित नहीं कर सके कि अरबी में इस्तेमाल हिंदू शब्द कैसे भारत पहुंचा और अरबी का हिंदी भारतीय हिंदू से कैसे जुड़ता है । क्या अलग अलग भाषा में समान शब्द पाए जाने को किसी शब्द की उत्पत्ति का आधार मान लिया जा सकता है । अब्दुल बिस्मिल्लाह पूरे सत्र के दौरान दायें बायें करते रहे लेकिन कई बार पूछे जाने के बाद भी इसको साबित नहीं कर पाए ना ही इन शब्दों को सही संदर्भ में प्रस्तुत कर पाए । मेरा राम मुख्तलिफ है वाले सत्र में राम पर जब भी अब्दुल बिस्मिल्लाह बात कर रहे थे तो उनके विचारों में भटकाव साफ तौर पर लक्षित किया जा सकता था । उन्होंने जोर देकर कहा कि तुलसी ने रामचरित मानस के सिर्फ बाल कांड में ही राम की सुंदरता का वर्णन किया है । यह बोलते हुए शायद वो यह भूल गए कि जब राम वापस अयोध्या आते हैं तो उनके रूप का फिर से वर्णन हुआ है । दरअसल राम को लेकर देश और दुनिया में इतना लिख गया है कि श्रीराम के रूप का वर्णन एक जगह होने की बात कहना ही बोलनेवाले को ही सावल के कठघरे में खड़ा कर देता है । राम के चरित्र का सभी विधाओं से लेकर धर्मों और भाषाओं में व्यप्ति को रेखांकित किया जा सकता है । कितने रामायण लिखे गए और लेखकों ने किस तरह से श्रीराम का चरित्र चित्रण किया इसका आंकलन होना अभी शेष है । तुलसी ने खुद ही कहा भी है- रामायन सत कोटि अपारा ।
दरअसल जब हम अपने अपने राम की बात करते हैं तो यह पाते हैं कि रामकथा भारत समेत दुनिया के कई देशों में लोक में व्याप्त हैं । जनश्रुतियों में व्याप्त रामकथाओं में राम के अलग अलग रूप सामने आते हैं, रामकथा की घटनाएं भी अलग हैं । अगर हम एक घटना का उदाहरण लें और तीन अलग अलग ग्रंथों में इसका उल्लेख देखें तो हर जगह ये अलग तरीके से आता है । सीता के अपहरण का वाल्मीकि रामायण में जिस तरह से उल्लेख है वह तुलसी के रामचरित मानस में अलग है और यही प्रसंग कंबन के रामायण में अलग है । वाल्मीकि सीता को रावण के साथ बिठाकर ले जाने का उल्लेख करते हैं तो तुलसी अपहरण के बाद यात्रा के दौरान रावण के सीता को स्पर्श के बारे में लिखते हैं वहीं कंब के मुताबिक रावण ने जब सीता को अगवा किया तो उनको कहीं से स्पर्श नहीं किया बल्कि उनको उनके कुटिया समेत उठा ले गया था । इसी तरह अहिल्या के संदर्भ में भी एक ही घटना को अलग अलग तरीके से लिखा गया है ।
दरअसल जब भी राम को एक भाषा, एक धर्म, एक संप्रदाय एक विचारधारा से जोडकर प्रतिपादित किया जाता है तो राम को समझने में बड़ी भूल का शिकार हो जाता है । दरअसल जब हम राम की बात करते हैं तो हमें यह समझना चाहिए कि राम का चरित्र या पूरी कथा में आदर्श ही इस कथा की आधारभूत परिकल्पना है । राम का चरित्र, उनके भाई का चरित्र, उनकी पत्नी का चरित्र, परिवार के सदस्यों का चरित्र चित्रण सभी में एक आदर्श है । यहां तक उनके दुश्मन रावण को भी एक विद्वान के रूप में दिखाया गया है । इसलिए राम पर बात करते वक्त अध्ययन के साथ साथ सावधानी भी आवश्यक है । अब्दुल बिस्मिल्लाह बहुत ही अप्रामाणिक और असावधान तरीके से राम पर बात करते रहे, टोकने के बावजूद । अब्दुल बिस्मिल्लाह की राम पर राय सुनकर राजेन्द्र यादव का मशहूर वकतव्य की याद हो आई जिसमें वो विश्वविद्लायों के हिंदी विभागों को प्रतिभाओं की कब्रगाह कहा करते थे । देश के ज्यादातर हिंदी विभागों के शिक्षक पढ़ाई लिखाई से दूर होते चले जा रहे हैं । कोई एक्टिविस्ट हो रहा है तो कोई समाज में क्रांति का बिगुल फूंकता नजर आता है । अपनी मूल जिम्मेदारियों को छोड़कर वहां के ज्यादातर शिक्षक सारे काम करते हैं । कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रभात रंजन ने अब्दुल बिस्मिल्लाह को वापस विषय पर लाने की एकाधिक कोशिश की हलांकि वो भी इस बहस को राजनीतिक रूप देने की जुगत में दिखाई दे रहे थे । राम के चरित्र पर स्त्री विमर्श के पैरोकार भी बहुधा सवाल उठाते रहते हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर अलग अलग ग्रंथों में वर्णित रामकथा की घटनाओं में उलझ कर अपने विरोध की अर्थवत्ता खो देते हैं ।
मुक्तागंन के इस कार्यक्रम- मेरा राम मुख़्तलिफ है के बाद कहानी पाठ का सत्र था, जिसमें वंदना राग, अनु सिंह चौधरी और प्रियदर्शन ने कहानी पाठ किया । अनु ने अपने आने वाले उपन्यास के एक अंश का पाठ किया । इन दिनों कई नए उपन्यासकार दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र जीवन को केंद्र में रखकर लिख रह हैं । पंकज दूबे, सत्य व्यास, जैसे मशहूर लेखक के अलावा कई अन्य लेखक भी दिल्ली विश्वविद्लाय जाकर सफल हो चुके हैं । अब अनु के इस उपन्यास में जिस तरह से एक लड़की की कथा के संकेत मिले वो दिलचस्प लगे । दरअसल दिल्ली विश्वविद्लाय के छात्रों के बीच जीवन के इतने छोर हैं कि एक सिरे को पकड़कर ही एक उपन्यास की रचना हो सकती है । अनु ने नाटकीयता के साथ कहानी पाठ करके उपस्थित श्रोताओं की दिलचस्पी बनाए रखी । कहानी पाठ के बाद गज़ल और शायरी का दौर चला । यह सत्र प्रताप सोमवंशी के वाणी प्रकाशन से सद्य: प्रकाशित शायरी की किताब इतवार छोटा पड़ गया से जोड़कर रखा गया था । प्रताप सोमवंशी के अलावा मशहूर शायर शकील जमाली ने अपनी शायरी से लोगों का दिल जीत लिया । शकील जमाली और प्रताप सोमवंशी ने अपनी कुछ नई रचनाएं भी सुनाईं । महानगरों में जब साहित्य से दूर जाने की बात जोर शोर से हो, अपनी विरासत और जड़ों से कटने पर ड्राइंग रूम में चर्चा हो, नई पीढ़ी के पढ़ने लिखने से दूर जाने को लेकर टीवी को कोसा जाए, ऐसे माहौल में रविवार के दिन साहित्य को सुनने सुनाने के लिए पचास-साठ लोगों की उपस्थिति आश्वस्तिकारक लगती है ।    


पाठकीयता के भूगोल का हो विस्तार

इन दिनों हिंदी में नई वाली हिंदी की काफी बातें हो रही हैं । कुछ ऐसी किताबें भी प्रकाशित की गई जिसकी मार्केटिंग के लिए इस नई वाली हिंदी का सहारा लिया गया । इस नई वाली हिंदी में बोलचाल की भाषा को जस का तस रखा गया है । यह अच्छी बात है लेकिन एक खास आयुवर्ग के समाज पर लिखते वक्त अगर बोलचाल की भाषा को जस का तस रख दिया जाता है तो उससे पाठकीयता पढ़ती हो इसपर किसी नतीजे पर पहुंचना शेष है । दरअसल साहित्य और पाठकीयता,यह विषय बहुत गंभीर है और उतनी ही गंभीर मंथन की मांग करता है । आजादी के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक जो तीन सौ से ज्यादा प्रकाशक साहित्यक कृतियों को छाप रहे हैं । प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक हर साल हिंदी की करीब दो से ढाई हजार साहित्यक किताबें छपती हैं । अगर पाठक नहीं हैं तो किताबें छपती क्यों है । यह एक बड़ा सवाल है जिससे टकराने के लिए ना तो लेखक तैयार हैं और ना ही प्रकाशक । क्या लेखक और प्रकाशक ने अपना पाठक वर्ग तैयार करने के लिए कोई उपाय किया । हम साठ से लेकर अस्सी के दशक को देखें तो उस वक्त पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने हमारे देश में एक पाठक वर्ग तैयार करने में अहम भूमिका निभाई । पीपीएच ने उन दिनों एक खास विचारधारा की किताबों को छाप कर सस्ते में बेचना शुरू किया । हर छोटे से लेकर बड़े शहर तक रूस के लेखकों की किताबें सहज, सस्ता और हिंदी में उपलब्ध होती थी । उसके इस प्रयास से हिंदी में एक विशाल पाठक वर्ग तैयार हुआ । सोवियत रूस के विघटन के बाद जब पीपीएच की शाखाएं बंद होने लगीं तो ना तो हिंदी के लेखकों ने और ना ही हिंदी के प्रकाशकों ने उस खाली जगह को भरने की कोशिश की । फॉर्मूला बद्ध रचनाओं ने पाठकों को निराश किया । नई सोच और नए विचार सामने नहीं आ पाए । यह प्रश्न उठ सकता है कि इससे पाठकीयता का क्या लेना देना है । संभव है कि इस प्रसंग का पाठकीयता से प्रत्यक्ष संबंध नहीं हो लेकिन इसने परोक्ष रूप से पाठकीयता के विस्तार को बाधित किया है । अगर किसी ने विचारधारा के दायरे से बाहर जाकर विषय उठाए तो उसे हतोत्साहित किया गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्य से नवीन विषय छूटते चले गए और पाठक एक ही विषय को बार बार पढ़कर उबते से चले गए ।
दरअसल नए जमाने के पाठक बेहद मुखर और अपनी रुचि को हासिव करने के बेताब हैं । नए पाठक इस बात का भी ख्याल रख रहे हैं कि वो किस प्लेटफॉर्म पर कोई रचना पढ़ेंगे । अगर अब गंभीरता से पाठकों की बदलती आदत पर विचार करें तो पाते हैं कि उनमें काफी बदलाव आया है । पहले पाठक सुबह उठकर अखबार का इतजार करता था और आते ही उसको पढ़ता था लेकिन अब वो अखबार के आने का इंताजर नहीं करता है । खबरें पहले जान लेना चाहता है । खबरों के विस्तार की रुचिवाले पाठक अखबार अवश्य देखते हैं । खबरों को जानने की चाहत उससे इंटरनेट सर्फ करवाता है । इसी तरह से पहले पाठक किताबों का इंतजार करता था । किताबों की दुकानें खत्म होते चले जाने और इंटरनेट पर कृतियों की उपलब्धता बढ़ने से पाठकों ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना शुरू किया । हो सकता है कि अभी किंडल और आई फोन या आई पैड पर पाठकों की संख्या कम दिखाई दे लेकिन जैसे जैसे देश में इंटरनेटका घनत्व बढ़ेगा वैसे वैसे पाठकों की इस प्लेटफॉर्म पर संख्या बढ़ सकती है ।
अगर संपूर्णता में विचार करें तो पाठकीयता के बढ़ने घटने के लिए कई कड़ियां जिम्मेदार हैं । पाठकीयता को एक व्यापक संदर्भ में देखें तो इसके लिए कोई एक चीज जिम्मेदार नहीं है इसका एक पूरा ईकोसिस्टम है । जिसमें सरकार, टेलीकॉम, सर्च इंजन, लेखक, डिवाइस मेकर, प्रकाशक, मीडिया और मीडिया मालिक शामिल हैं । इन सबको मिलाकर पाठकीयता का निर्माण होता है । सरकार, प्रकाशक और लेखक की भूमिका सबको ज्ञात है । टेलीकॉम यानि कि फोन और उसमें लोड सॉफ्टवेयर, सर्चे इंजन जहां जाकर कोई भी अपनी मनपसंद रचना को ढूंढ सकता है । पाठकीयता के निर्माण का एक पहलू डिवाइस मेकर भी हैं । डिवाइस यथा किंडल और आई प्लेटफॉर्म जहां रचनाओं को डाउनलोड करके पढ़ा जा सकता है । प्रकाशक पाठकीयता बढ़ाने और नए पाठकों के लिए अलग अलग प्लेटफॉर्म पर रचनाओं को उपलब्ध करवाने में महती भूमिका निभाता है ।
हिंदी साहित्य को पाठकीयता बढ़ाने के लिए सबसे आवश्यक है कि वो इस ईको सिस्टम के संतुलन को बरकरार रखे । इसके अलावा लेखकों और प्रकाशकों को नए पाठकों को साहित्य की ओर आकर्षित करने के लिए नित नए उपक्रम करने होंगे । पाठकों के साथ लेखकों के बाधित संवाद को बढ़ाना होगा । देश भर के अलग अलग शहरों में हो रहे करीब ढाई सौ लिटरेचर फेस्टिवल भी इसको बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं । इसके अलावा लेखकों को इंटरनेट के माध्यम से पाठकों से जुड़ कर संवाद करना चाहिए और अपनी रचनाओं पर फीडबैक भी लें । फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे की लेखिका ई एल जेम्स ने ट्राइलॉजी लिखने के पहले इंटरनेट पर एक सिरीज लिखी थी और बाद में पाठकों की राय पर उसे उपन्यास का रूप दिया । उसकी सफलता अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है और उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है । इन सबसे ऊपर हिंदी के लेखकों को नए नए विषय भी ढूंढने होंगे । जिस तरह से हिंदी साहित्य से प्रेम गायब हो गया है उसको भी वापस लेकर आना होगा । आज भी पूरी दुनिया में प्रेम कहानियों के पाठक सबसे ज्यादा हैं । हिंदी में बेहतरीन प्रेम कथा की बात करने पर धर्मवीर भारती की गुनाहों की देवता और मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास कसप ही याद आता है । हाल में खत्म हुए दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले नेएक बार फिर से इस बात को साबित किया कि लोगों में पढ़ने की भूख है । जरूरत है पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर लिखा जाए और अगर इसपर आपत्ति हो तो पाठकों के अंदर की रुचि का परिष्कार करने का उपक्रम किया जाए ताकि पाठतों में साहित्य पढ़ने का एक संस्कार विकसित हो सके । हिंदी को इस मामले में अन्य भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर कदम आगे बढ़ाना चाहिए ।


Thursday, February 2, 2017

लव-हेट रिलेशनशिप की सियासी मिसाल

अंग्रेजी में एक जुमला बहुत फेमस है वह है लव हेट रिलेशनशिप । मतलब कि एक ऐसा रिश्ता जिसमें मोहब्बत और घृणा साथ-साथ चलती है । महाराष्ट्र की सियासत में देखें तो बीजेपी और शिवसेना का जो गठबंधन है वह लव हेट रिलेशनशिप की शानदार मिसाल है । जब से उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की कमान संभाली है और बीजेपी पूरे देश में मजबूत हुई है तब से इस रिलेशनशिप को ये नया नाम मिला है । अमूमन हर चुनाव के वक्त और मंत्रिमंडल में फेरबदल या विस्तार के वक्त दोनों सहयोगियों में जमकर तलबारबाजी होती है लेकिन अंतत: सब सामान्य हो जाता है । अगर हम इतिहास में ना भी जाएं तो विधानसभा चुनाव के वक्त गठबंधन टूटने के पहले रूठना-मनाना से लेकर तमाम तरह की सियासी ड्रामेबाजी हुई लेकिन दोनों दल अलग अलग चुनाव लड़े । चुनाव के दौरान तमाम तरह के आरोप प्रत्यारोपों के तीर चले । चुनाव के बाद जब किसी को बहुमत नहीं मिला तो बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार में शिवसेना जूनियर पार्टनर के तौर पर शामिल हो गई । अकेले दम पर बहुमत का दावा दोनों दलों ने किया था लेकिन दो सौ अठासी सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी को एक सौ बाइस तो शिवसेना को तिरसठ सीटों पर संतोष करना पड़ा था । तमाम मान-मनौव्वल और सियासी जोड़तोड़ के बाद चुवाव पूर्व टूटा गठबंधन सत्ता के फेविकोल से जुड़ गया । इसी तरह से जब नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्रीय कैबिनेट के गठन से लेकर उसके विस्तार के वक्त भी ड्रामेबाजी देखने को मिली थी। मंत्रिमंडल की सीटों को लेकर लेकिन उस वक्त बीजेपी के कड़े रुख ने शिवसेना को समझौते पर मजबूर कर दिया था ।
गठबंधन के इस सियासी रंगमंचच पर नया ड्रामा जारी है बीएमसी यानि वृहन्नमुंबई नगरपालिका परिषद के चुनाव को लेकर । शिवसेना के सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने पिछले दो दशक से ज्यादा से जारी गठबंधन को तोड़ने का एलान कर दिया और कहा कि गठबंधन में रहकर हमने पच्चीस साल खराब किए । उन्होंने भविष्य में बीजेपी से किसी तरह के गठबंधन से भी इंकार किया । बीजेपी के नेताओं ने उद्धव को मर्यादा में रहकर बात करने की नसीहत दी और गठबंधन धर्म की याद दिलाई । आज से करीब अट्ठाइस साल पहले जब बाला साहब ठाकरे और अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्नीस सौ नवासी में इस गठबंधन की नींव रखी थी उस वक्त ये तय हुआ था कि अगर कभी दोनों दलों के बीच अलग होने की नौबत आती है तो नेता साथ चाय पिंएंगे और अलग अलग रास्ते पर चल पड़ेंगे । लेकिन अब अटल बिहारी वाजपेयी सक्रिय नहीं हैं और इस गठबंधन के दो शिल्पकार बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन इस दुनिया में ही नहीं रहे, लिहाजा चाय पीकर मर्यादित ढंग से अलग होने की बात अब निरर्थक है ।

शिवसेना और बीजेपी के बीच गठबंधन टूटने की फौरी वजह बीएमसी चुनाव में बीजेपी का दो सौ सत्ताइस सीटों में से एक सौ चौदह सीटें मांगना है । शिवसेना साठ सीटों से ज्यादा देना नहीं चाहती है । पिछले दो दशकों से बीएमसी पर शिवसेना-बीजेपी गठबंधन का कब्जा है । पिछले लोकसभा और सूबे के विधानसभा चुनाव में बीजेपी मजबूत होकर उभरी । शिवसेना को मुंबई और कोंकण तटीय इलाकों में मजबूत माना जाता था लेकिन पिछले चुनावों में स्थिति बदल गई और मुंबई में बीजेपी ने बेहतर प्रदर्शन किया और शिवसेना ने ग्रामीण इलाकों में पैठ बढाई । इन प्रदर्शनों के आधार पर बीजेपी अब खुद को बदली हुई भूमिका में देख रही है । सूबे में सत्ताइस फीसदी वोट बीजेपी को मिले थे जबकि शिवसेना को महज उन्नीस फीदी । संख्या बल बीजेपी के पक्ष में दिखता है, लिहाजा बीजेपी अब पूरी तौर पर अपने को बड़े भाई की भूमिका में देखना चाहती है और उसी तरह से व्यवहार भी करती है । दोनों दलों में पीढ़ीगत बदलाव भी हो चुके हैं । बीजेपी में अटल-आडवाणी युग खत्म हो गया है और शिवसेना में उद्धव युग की शुरुआत हो चुकी है । मोदी और शाह की राजनीति कई मायनों में अटल-आडवाणी की राजनीति से अलग है । अब बीजेपी उन राज्यों में भी खुद को मजबूत करना चाहती है जहां क्षेत्रीय क्षत्रपों की वजह से हो जूनियर पार्टी के तौर पर रही थी । महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इसी सियासी रास्ते पर चलकर सूबे में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी । अपनी मजबूती को कोई भी पार्टी भुनाना चाहती है क्योंकि सियासत में त्याग आदि तो बेमतलब की अवधारणा है । उद्धव ठाकरे राजनीति की जमीनी हकीकत को या तो भांप नहीं पा रहे हैं या फिर भांपने के बाद भी स्वीकार करने को तायर नहीं हैं । चुनाव दर चुनाव ये साबित हो रहा है कि बीजेपी के वोटों में इजाफा हो रहा है । बीएमसी का बजट करीब सैंतीस हजार करोड़ रुपए है और मुंबई का बादशाह बनने की ख्वाहिश अब बीजेपी के मन में भी हिलोरें ले रही है । बीजेपी को लगता है कि अगर उनकी सीटें ज्यादा आ गईं तो झख मारकर शिवसेना को उसके साथ आना ही होगा जैसा कि विधानसभा चुनाव के बाद हुआ था । उधर शिवसेना महाराष्ट्र में जूनियर पार्टनर बनने के बाद मुंबई में अपने गढ़ को बचाए रखना चाहती है । इसी सियासी दांवपेंच की भेंट चढ गया गठबंधन लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि बीएमसी के चुनाव नतीजों के बाद शिवसेना-बीजेपी फिर से एक बार साथ आते हैं या उद्धव का एलान स्थायी है । 

Tuesday, January 31, 2017

ऋतिक की जिंदगी में बहार

फिल्म काबिल की सफलता की चर्चा ऋतिक रोशन के डगमगाते करियर को तो सहारा देगा ही उनके परिवार में एक बार फिर से बहार आने के संकेत देने शुरू कर चुका है । ऋतिक रोशन जब सुजैन खान से अलग हुए थे तब उनके और कंगना के बीच कथित अफेयर की खबरें खूब आम होती थीं । दोनों के रोमांस के भी चर्चे आम थे । बाद में इस प्रेम कहानी में ईमेल का खलनायक आया जिसने ऋतिक और कंगना दोनों को कोर्ट कचहरी तक पहुंचा दिया । ईमेल के इस भंवर में प्रेम की नैया डूबती नजर आने लगी थी । दोनों तरफ से अलग अलग तरीके की खबरें आने लगी थीं । खैर यह अब इतिहास है, एक ऐसा अतीत जिसको ना तो ऋतिक याद रखना चाहते हैं और ना ही कंगना रनाउत । ऋतित के बारे में सवाल पूछने पर कंगना के चेहरे पर जिस तरह की विद्रूपता का भाव आता है उससे तो यह साफ तौर पर जाहिर होता है कि दोनों के बीच अब किसी तरह का प्रेम बचा नहीं है । कंगना और ऋतिक के प्रेमयुद्ध के बीच ऋतिक की फिल्म मोअनजोदड़ो रिलीज हुई जो बुरी तरह से पिट गई । इस फिल्म के पिटने के बाद ऋतिक की आस अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म काबिल पर टिक गई । एक तरफ ऋतिक फिल्मों के पिटने से परेशान थे तो दूसरी तरफ कंगना के साथ केस मुकदमे को लेकर भी खिन्न रहने लगे थे । ऐसे में उनको एक साथी की तलाश थी । बॉलीवुड से जुड़े लोगों का कहना है कि ऋतिक आपसी बातचीत में सुजैन को मिस करने लगे थे । तलाक के दो साल बाद अब ऋतिक को लगने लगा था कि उसकी जिंदगी में सुजैन का जो स्थान था वह कोई और भर नहीं पा रहा है । ऋतिक से जब एक पत्रकार ने सवाल किया था कि आजकल वो किसको डेट कर रहे हैं तो ऋतिक ने साफ मना कर दिया था कि वो किसी को भी डेट नहीं कर रहे हैं बल्कि इन दिनों वो एक रिलेशनशिप में हैं । तब किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि ऋतिक अपने सुजैन की बात कर रहे हैं । तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे ।
इस बीच सुजैन और ऋतिक दोनों अपने बेटों की खातिर मिलते जुलते थे । ऋतिक और सुजैन के फिर से साथ आने की खबरों को तब और बल मिला जब नए साल का जश्न मनाने ऋतिक और सुजैन अपने दोनों बेटों के साथ दुबई जा पहुंचे । वहां चारों ने कई दिन बिताए और कहा जा रहा है कि उस दौरान ऋतिक और सुजैन ने ये फैसला कर लिया कि वो अरने रिश्ते को एक और चांस देने की कोशिश करते हैं । दोनों के बीच इस बात को लेकर सहमति थी कि बेटों का खातिर भी ऋतिक और सुजैन को फिर से एक हो जाना चाहिए । इसके कुछ दिन बाद ऋतिक के जन्मदिन के मौके पर हुए जश्न में भी सुजैन को लोगों ने चहकते हुए देखा था । बर्थडे पार्टी में ऋतिक और सुजैन के बीच की क्लोजनेस इस बात की गवाही दे रहा था कि कुछ फिर से पकने लगा है । इसके बाद वो वक्त आ गया जब ऋतिक की फिल्म काबिल की प्राइवेट स्क्रिनिंग रखी गई । इस स्क्रीनिंग में भी सुनैजन पहुंची और ऋतिक के साथ ही बैठकर उसने पूरी फिल्म देखी । ऋतिक की हाथों में हाथ डाले उन्होंने मेहमानों का स्वागत भी किया । फिल्म देखने के बाद सुजैन ने सोशल मीडिया पर एक मैसेज पोस्ट किया – सो, सो प्राउड ऑफ यू ऋतिक । इस मैसेज को ऋतिक के उस इंटरव्यू से जोड़कर देखा जाने लगा जिसमें उन्होंने कहा था कि वो इन दिनों रिलेशनशिप में हैं । दरअसल बॉलीवुड में दोनों के एक साथ दुबई में नए साल का जश्न मनाए जाने की खबर के बाद ही ये माना जाने लगा था कि दोनों एक होने वाले हैं ।  
ऋतिक और सुजैन के बीच की इस रियल लाइफ केमिस्ट्री को देखकर कोई भी अंदाज लगा सकता है कि दो साल पहले तलाक लेने वाले इस खूबसूरत जोड़े ने एक फिर से जिंदगी को खूबसूरत बनाने का फैसला कर लिया है । सुजैन भी अपनी तरफ से इस रिश्ते को फिर से शुरू करने में जुटी है । हुआ यह कि ऋतिक की बहन के जन्मदिन के मौके पर सुजैन उसके ससुराल जा पहुंची । वहां ऋतिक और पूरा रोशन परिवार तो मौजूद था ही, ऋतिक की बहन के ससुरालवाले सभी रिश्तेदार भी मौजूद थे । जब सुजैन वहां पहुंची तो ऋतिक ने ईदे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया । रोशन सीनियर भी इसको देखककर बेहद खुश नजर आ रहे थे । दोनों परिवारों को निकट से जानने वाले एक शख्स का दावा है कि राकेश रोशन भी चाहते हैं कि ऋतिक और सुजैन फिर से एक हो जाएं और उनका बिखरा परिवार फिर से संवर जाए । इसलिए रोशन परिवार की तरफ से भी कोशिशें हो रही हैं ।

बॉलीवुड में अलग हुए सेलिब्रिटीज को लेकर कयासों का दौर चलता रहता है । अभी बीच में ये भी खबर आई थी कि अरबाज खानऔर मलाइका अरोड़ा एक बार फिर से साथ आ सकते हैं । दोनों के एक होटल में साथ खाना खाते तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी । बावजूद इसके दोनों के एक होने की संभावना क्षीण हो गई क्योंकि उसके कुछ ही दिन बाद दोनों मुंबई की एक अलादत मे तलाक के मुकदमे के सिलसिले में नजर आए थे । कहा तो ये भी जाता है कि सैफ अब भी अमृता सिंह से जुड़े हुए हैं और अमृता सिंह से अपनी बेटी के फिल्मी करियर को संवारने में लगे हुए हैं । हाल ही में ये खबर आई थी कि अमृता सिंह की बेटी ऋतिक के साथ फिल्म में डेब्यू करेंगी यह जानकर अमृता खफा हो गई थी वो नहीं चाहती थी कि उनकी बेटी अपने से दस साल बड़े अभिनेता के साथ डेब्यू क्यों कर रही हैं । उन्होंने इसके लिए सैफ को जिम्मेदार भी माना था । होता यह है कि असल जिंदगी में अलग हुए सितारे अपने बच्चों की खातिर एक दूसरे से जुड़े होते हैं । इसी जुड़ाव में कभी कभार प्रेम के अंकुर फिर से फूटने लगते हैं । ऋतिक औक सुजैन के मामले में तो कम से कम यही लगता है ।