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Saturday, October 31, 2020

विसंगतियों की जकड़न में फिल्म विभाग


कोविड काल में कई महीनों तक सिनेमा हॉल बंद रहने के बाद जब खुला तो एक दिन सोचा कि फिल्म देखने चला जाए। पहुंचा। कम लोग थे। थोड़े इंतजार के बाद फिल्म का प्रदर्शन शुरू हुआ। फिल्म के पहले कुछ विज्ञापन भी चले। राष्ट्रगान भी हुआ। राष्ट्रगान खत्म हुआ तो दिमाग में एक बात कौंधी। कई साल पहले सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले फिल्म प्रभाग, भारत सरकार की शॉर्ट फिल्में चला करती थीं। इन फिल्मों में भारत सरकार की उपलब्धियों का बखान होता था। देश के प्रधानमंत्री के कामों को उनके देश विदेश के दौरों को दिखाया जाता था। अगर वो किसी महत्वपूर्ण इमारत का शिलान्यास आदि करते थे को उसको भी इन फिल्मों में दिखाया जाता था। सिर्फ सिनेमाघरों में ही नहीं बल्कि विद्यालयों आदि में जब साप्ताहिक फिल्मों का प्रदर्शन होता था तब भी फिल्म प्रभाग की ये छोटी फिल्में चला करती थीं। ये वो दौर था जब स्कूलों में छात्रों को हर महीने के तीसरे या चौथे शुक्रवार को फिल्में दिखाई जाती थीं। भारत सरकार का फिल्म प्रभाग ही इसका आयोजन करती थी और स्कूलों में पर्दा और प्रोजेक्टर लगाकर फिल्में दिखाई जाती थीं। फिल्मों के पहले दिखाई जाने वाली फिल्म प्रभाग की ये छोटी छोटी प्रमोशनल फिल्में इस तरह से पेश की जाती थीं कि दर्शकों को लगता था कि उसमें दिखाई जानेवाली उपलब्धियां देश की हैं। जबकि परोक्ष रूप से वो उस समय के प्रधानमंत्रियों की छवि चमकाने का काम करती थी।

महेन्द्र मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय सिनेमा’ में लिखा है, ‘सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्म्स डिवीजन की स्थापना 1948 में हुई। फिल्म्स डिवीजन उस समय शायद दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक केंद्र था जिसमें समाचार और अन्य राष्ट्रीय विषयों पर वृत्तचित्र बनाए जाते थे। ये वृत्तचित्र, समाचार चित्र और लघु फिल्में पूरे देश में प्रदर्शन के लिए बनती थीं। प्रत्येक फिल्म की नौ हजार प्रतियां बनती थीं जिनकी संख्या कभी कभी चालीस हजार तक पहुंच जाती थीं। ये भारत की तेरह प्रमुख भाषाओं और अंग्रेजी में पूरे देश में सभी सिनेमाहॉलों में मुफ्त प्रदर्शित की जाती थीं। समाचर चित्रों और लघु फिल्मों एवं वृत्तचित्रों का परोक्ष रूप से दर्शकों पर व्यापक प्रभाव पड़ा जिसने उनकी रुचि बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।‘  

दर्शकों पर व्यापक प्रभाव और रुचि बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका की बात, हो सकता है, महेन्द्र जी सिनेमा के संदर्भ में कह रहे हों लेकिन इस बात पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि इन लघु फिल्मों के माध्यम से राजनीतिक हित कितने सधे। किसके सधे। जब फिल्म प्रभाग की न्यूज रील चला करती थी और नेहरू जी, इंदिरा जी और राजीव जी के सर भारत की तमाम उपलब्धियों का सेहरा बंधता था तो दर्शकों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता होगा। स्कूली छात्रों पर उसका कितना और कैसा प्रभाव पड़ता होगा। किस तरह से राजनीतिक रुचि बदलती होगी?  फिल्म प्रभाग की स्थापना तो इस उद्देश्य से की गई थी कि ये देश में फिल्मों की संस्कृति को विकसित और मजबूत करेगा। लेकिन अपनी स्थापना के शुरुआती दिनों से लेकर उदारीकरण के दौर शुरू होने से पहले तक इसने अपनी ज्यादा ऊर्जा प्रधानमंत्रियों के पब्लिसिटी विभाग के तौर पर काम करने में लगाया। 1991 में जब देश में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो प्रचार के माध्यमों का स्वरूप भी बदलने लगा। प्रचार के अन्य माध्यम सामने आए तो फिल्म प्रभाग में बनने वाले वृत्तचित्र या समाचार चित्र देश के सिनेमा घरों में कम दिखने लगे। ऐसा प्रतीत होने लगा कि इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों से तालमेल बिठाने में फिल्म प्रभाग पिछड़ गया। बावजूद इसके फिल्म्स डिवीजन अब भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वतंत्र विभाग के तौर पर काम कर रहा है।

फिल्म प्रभाग की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक मुंबई मुख्यालय के अलावा दिल्ली, कोलकाता और बेगलुरू में भी इसकी शाखाएं हैं। यहां अब भी दावा किया जा रहा है कि पूरे देश के सिनेमाघरों में लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है। इसके अलावा ये प्रभाग डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट और एनिमेशन फिल्मों के लिए द्विवार्षिक मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन भी करता है। इसके अलावा पूरे देश में फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करना भी इसका एक दायित्व है। इस संस्था का बजट देखने पर पता चलता है कि वित्त वर्ष 2019-20 में केंद्रीय स्कीम के लिए 7.7 करोड़, कर्मचारियों के वेतन पर 41.5 करोड़ और नेशनल म्यूजियम ऑफ इंडियन सिनेमा को चलाने के लिए 2.98 करोड़ रु का प्रावधान रखा गया है। करीब 52 करोड़ रुपए के बजट वाले इस विभाग में कई काम ऐसे हो रहे हैं जो इसी मंत्रालय के दूसरे विभाग में भी हो रहे हैं। जैसे उदाहरण के लिए अगर हम देखें तो फिल्म प्रभाग भी फिल्मों का निर्माण करता है और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम और चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी भी फिल्मों का निर्माण करती है। फिल्म प्रभाग भी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करता है, चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी भी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करती है और फिल्म फेस्टिवल निदेशालय भी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करता है। कई एक जैसे काम हैं जो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अलग अलग विभाग करते हैं।

दरअसल अगर हम इसपर विचार करें तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फिल्मों से सबंधित कई विभाग ऐसे हैं जिनका गठन उदारीकरण के दौर के पहले हुआ था। उस समय की मांग के अनुसार उनके दायित्व तय किए गए थे। समय बदलता चला गया, सिनेमा के व्याकरण से लेकर उसके तकनीक तक में आमूल चूल बदलाव आ गया लेकिन फिल्मों से संबंधित इन संस्थाओं में अपेक्षित बदलाव नहीं हो पाया। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तो उस समय भारत सरकार की एक समिति ने इन संस्थाओं में युक्तिसंगत बदलाव की सिफारिश की थी पर उसके बाद कुछ हो नहीं सका। यूपीए के दस साल के शासनकाल में सबकुछ पूर्ववत चलता रहा। 2016 में नीति आयोग ने फिर से इन संस्थाओं के क्रियाकलापों को लेकर कुछ सिफारिशें की थीं। फिर 2017 के अंत में इस तरह की खबरें आईं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने विभागों के कामकाज को युक्तिसंगत बनाने जा रहा है। फिर कई महीने बीत गए। पिछले साल ये खबर आई कि पूर्व सूचना और प्रसारण सचिव विमल जुल्का की अगुवाई में फिल्म से जुड़े लोगों की एक समिति बनाई गई, राहुल रवैल भी उसके सदस्य थे। उनकी सिफारिशें भी आ गईं। लेकिन उन सिफारिशों का क्या हुआ अबतक सार्वजनिक नहीं हुआ है। सभी विभाग पूर्ववत चल रहे हैं।

दरअसल सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाले और फिल्मों से जुड़े कई विभागों में बेहतर तालमेल की तो जरूरत है ही, उनके कार्यों को भी समय के अनुरूप करने की आवश्यकता है। अब तो फिल्मों का स्वरूप और बदल रहा है। कोविड की वजह से ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) लोकप्रिय हो रहे हैं। सिनेमाघरों में लोगों की उपस्थिति कम है। कोविड के भय से मुक्ति के बाद भी ओटीटी की लोकप्रियता कम होगी इसमें संदेह है। बदलते तकनीक की वजह से भी फिल्मों का लैंडस्केप बदलेगा। फिल्म संस्कृति को मजबूती देने और विदेशों में भारतीय फिल्मों को पहचान दिलाने के उद्देश्यों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।यह तभी संभव है जब मंत्रालय के स्तर पर पहल हो, योजनाएं बनें और उसको यथार्थ रूप देने के लिए उन लोगों का चयन किया जाए जो फिल्मों से जुड़े हों। पिछले दिनों फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे में शेखर कपूर की नियुक्ति सही दिशा में उठाया गया एक कदम है। रचनात्मक कार्य के लिए रचनात्मक लोगों को चिन्हित करके उनको सही जगह देना और राजनीति और लालफीताशाही से मुक्त करना सरकार का प्रमुख दायित्व है।  

Saturday, October 24, 2020

फिर विवादों के भंवर में महेश भट्ट


हिंदी फिल्म जगत और ड्रग्स का मामला थमता नजर नहीं आ रहा है। अभी सुशांत सिंह राजपूत के केस में ड्रग्स का मामला उछला था और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने दीपिका पादुकोण समेत कई अभिनेत्रियों से घंटों तक पूछताछ की थी। अभी ये मामला शांत भी नहीं हुआ था कि एक दूसरे मामले में निर्देशक महेश भट्ट का नाम ड्रग्स के आरोपों से जुड़ गया है। फिल्म ‘कजरारे’ की अभिनेत्री लवीना लोध ने एक मिनट अड़तालीस सेंकेंड का एक वीडियो जारी कर महेश भट्ट पर सनसनीखेज आरोप लगाया है। लवीना ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट विडियो में कहा है कि ‘मेरी शादी महेश भट्ट के भांजे सुमित सभलवाल के साथ हुई थी और मैंने उनके खिलाफ डायवोर्स केस फाइल किया है क्योंकि मुझे पता चल गया था कि वो ड्रग सप्लाई करते हैं एक्टर्स को...उनके फोन में भी अलग अलग किस्म की लड़कियों की तस्वीरें होती हैं जो वो डायरेक्टर्स को दिखाते हैं...और इन सारी बातों की जानकारी महेश भट्ट को है। महेश भट्ट सबसे बड़ा डॉन है इंडस्ट्री का। ये पूरा सिस्टम वही ऑपरेट करता है और अगर आप उनके हिसाब से नहीं चलते हैं तो वो आपका जीना हराम कर देते हैं। महेश भट्ट ने कितने लोगों की जिंदगी बर्बाद कर दी है, कितने एक्टर्स, डायरेक्टर्स को उन्होंने काम से निकाल दिया है, वो एक फोन करते हैं पीछे से और लोगों का काम चला जाता है। लोगों को पता भी नहीं चलता है। ऐसे उन्होंने बहुत जिंदगियां बर्बाद की हैं। और जबसे मैंने उनके खिलाफ केस फाइल किया है वो हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गए हैं। अलग अलग तरीके से मेरे घर में घुसने की कोशिश कर रहे हैं, पूरी कोशिश की उन्होंने मुझे इस घर से निकालने की। जब मैं पुलिस स्टेशन में शिकायत (एनसी) लिखाने जाती हूं तो कोई मेरी शिकायत भी नहीं लेता। बहुत मुश्किल के बाद अगर मैं शिकायत लिखा भी देती हूं तो कोई एक्शन नहीं होता।‘ लवीना लोध यहीं पर नहीं रुकती हैं और वो ये भी कहती हैं कि अगर कल कोई हादसा उनके या उनके परिवार के साथ होता है तो सिर्फ महेश भट्ट, मुकेश भट्ट सुमित सभरवाल, आदि उसके लिए जिम्मेदार होंगे। लवीना का कहना है कि वो ये वीडियो इस लिए भी बना रही हैं कि लोगों को पचा चले कि बंद दरवाजे के पीछे इन लोगों ने कितनी जिंदगियां बर्बाद की हैं और ये क्या क्या कर सकते हैं। वो अपनी बात इस वाक्य पर खत्म करती हैं कि महेश भट्ट बहुत ही ताकतवर और प्रभावशाली हैं। अगर एक मिनट को इसको पारिवारिक कलह भी मान लिया जाए तो इसमें जो ड्रग्स की बात सामने आ रही है या अन्य आरोप लगे हैं उसकी जांच तो की जा सकती है। लवीना ने तो जिन एक्टर्स को ड्रग्स की सप्लाई की जाती है उनके नाम भी इस वीडियो में लिए हैं। 

सुशांत सिंह राजपूत के केस में रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी भी आरोपों के आधार पर ही हुई थी। दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर, सारा अली खान और रकुलप्रीत जैसी मशहूर अभिनेत्रियों से घंटों पूछताछ भी सिर्फ आरोपों के आधार पर हुई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस तत्परता के साथ नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड ने इतनी मशहूर और प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों से पूछताछ की थी वैसी ही सक्रियता लवीना के आरोपों पर भी दिखाई जाएगी? अगर ये नहीं होता है तो क्या ये माना जाए कि अभिनेत्री लवीना की उन बातों में दम है कि महेश भट्ट बेहद ताकतवर और प्रभावशाली हैं। महेश भट्ट पहले भी कई तरह के व्यक्तिगत और अन्य विवादों में घिरते रहे हैं। अगर उस दौर की फिल्मी और अन्य पत्रिकाओं के लेखों को देखें तो उनके और परवीन बॉबी के रिश्ते को लेकर बहुत कुछ लिखा गया था। कहा गया  था कि परवीन से अफेयर की वजह से उनका पारिवारिक कलह हुआ था। उन्होंने अपनी पहली पत्नी किरण भट्ट और बेटी पूजा को छोड़कर परवीन के साथ रहना शुरू कर दिया था। परवीन जब सिजोफ्रेनिया की गिरफ्त में आईं तो वो उनको छोड़कर अपने परिवार के पास लौट आए थे। कई इंटरव्यू में महेश भट्ट ने परवीन बॉबी के साथ अपने रिश्ते को माना भी है। इसके अलावा उनका बेटा राहुल भट्ट भी मुंबई हमले की साजिश के आरोपी डेविड हेडली से संपर्कों की वजह से शक की जद में आया था। तब ये आरोप लगा था कि डेविड हेडली ने राहुल भट्ट को ये कहा था कि वो हमले वाले दिन दक्षिणी मुंबई की ओर नहीं जाए। राहुल भट्ट जब संदेह के घेरे में थे तो उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में महेश भट्ट पर भी निशाना साधा था। खैर ये मुद्दे अब खत्म हो चुके हैं लेकिन अतीत बहुत जल्द पीछा छोड़ते नहीं।

बात बॉलीवुड और ड्रग्स की करते हैं। लगातार दो मामलों में ड्रग की बात सामने आने के बाद, खासतौर पर सुशांत सिंह राजपूत केस में जिस तरह से हिंदी फिल्मों की दुनिया शक के घेरे में आई उसको साफ करना जरूरी है। ये जिम्मेदारी बॉलीवुड को ही उठानी होगी। सुशांत सिंह केस के दौरान सुपरस्टार अक्षय कुमार ने एक वीडियो जारी कर माना था कि कई ऐसे मुद्दे हैं जिनपर बॉलीवुड को खुद के गिरेबां में झांकने की जरूरत है। नारकोटिक्स और ड्रग्स की बात करते हुए भी उन्होंने कहा था कि कैसे दिल पर हाथ रखकर कह दें कि ये समस्या नहीं है,ये समस्या है। तब अक्षय ने पूरी इंडस्ट्री को बदनाम दुनिया की तरह नहीं देखने की अपील भी की थी। अक्षय ने ठीक कहा था, सबको एक ही रंग से रंगना उचित नहीं है। हर जगह अच्छे और बुरे लोग होते हैं। इस कड़ी में ही बॉलीवुड की कई प्रोडक्शन कंपनियों और उनके संगठनों ने दिल्ली हाईकोर्ट में दो चैनलों की रिपोर्टिंग के खिलाफ गुहार लगाई थी। यहां ये रेखांकित करना जरूरी लगता है कि हाईकोर्ट से गुहार लगानेवाली इन प्रोडक्शन कंपनियों में महेश भट्ट की कंपनी शामिल नहीं हैं। बॉलीवुड के जिन लोगों ने अदालत से गुहार लगाई है उनको महेश भट्ट पर लग रहे आरोपों पर भी अपनी बात रखनी चाहिए। प्रोड्यूसर गिल्ड को कम से कम ये बयान तो जारी करना चाहिए कि अभिनेत्री लवीना के आरोपों की जांच हो, ड्रग्स सप्लाई के आरोपों को लेकर भी एजेसियां कानूनसम्मत ढंग से काम करें।

अगर गिल्ड या प्रोडक्शन कंपनियों का ऐसा कोई बयान नहीं आता है या वो कोई पहल नहीं करते हैं तो एक बार फिर से उनकी साख पर सवाल उठेगा और लोगों को बॉलीवुड पर आरोप लगाने का मौका। चुनी हुई चुप्पी और चुनिंदा मामलों में बोलना दोनों ही किसी भी संगठन या इंडस्ट्री की साख पर असर डालते हैं। हमने अपने देश में देखा है कि वामपंथियों ने सालों तक इस चुनी हुई चुप्पी या सेलेक्टिव सेक्युलरिज्म को अपनाया। आज इस वजह से उनको कितना नुकसान हुआ ये सबके सामने है। उनकी राजनीतिक जमीन देखते देखते उनके नीचे से खिसक गई। उनकी साख इस कदर छीज गई है कि अकादमिक दुनिया ने भी उनको गंभीरता से लेना कम कर दिया है। बॉलीवुड में ड्रग्स का नाम भी आता है तो वहां काम कर रहे संगठनों को बहुत मुखरता के साथ उसका प्रतिरोध करना होगा। इससे लोगों के बीच बॉलीवुड की साख और मजबूत होगी अन्यथा लोगों को ये लगेगा कि फिल्मी दुनिया के बड़े और गंभीर मानी जानेवाली आवाज भी चुनिंदा लोगों के आरोपों पर ही अपनी बात सामने रखती है। 


Saturday, October 17, 2020

अपनी जड़ों की ओर लौटता भारत


एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि ‘किसान क्षेत्र के हित के लिए करनेवाला हमारा संगठन सर्वमान्य संगठन बन गया है, और ऐसे हमारे संगठन को अनुकूलता भी प्राप्त हो गई है। क्योंकि जो हमारा विचार है, विज्ञान ने ही ऐसी करवट ले ली है कि हमने जिन तत्वों का उद्घोष अपनी स्थापना के समय से हम करते आए, विरोधों के बावजूद, उनको मान्यता देने के बजाए दूसरा कोई पर्याय रहा नहीं अब दुनिया के पास। कृषि के क्षेत्र में और जो कॉलेज में से पढ़ा है ऐसा कोई व्यक्ति आपकी सराहना करे ऐसे दिन नहीं थे। आज हमारे महापात्र साहब भी आपके कार्यक्रम में आकर जैविक खेती का गुणगान करते हैं। जैविक खाद के बारे में पचास साल पहले विदर्भ के नैड़प काका बड़ी अच्छी स्कीम लेकर केंद्र सरकार के पास गए थे। ये स्कीम अपने भारत की है, भारत के दिमाग से उपजी है, केवल मात्र इसके लिए उसको कचड़े में डाला गया। आज ऐसा नहीं है। पिछले छह महीने से जो मार पड़ रही है कोरोना की, उसके कारण भी सारी दुनिया विचार करने लगी है और पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधनेवाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है, आशा से देख रही है।‘ मोहन भागवत के भाषण के इस छोटे से अंश में कई महत्वपूर्ण बातें हैं जिनकी ओर उन्होंने संकेत  किया है। पहली बात तो ये कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है। भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को मान्यता मिलने लगी है। मोहन भागवत ने ठीक ही इस बात को रेखांकित किया कि पूरी दुनिया भारत की ओर आशा से देख रही है।

मोहन भागवत के इस वक्तव्य के उस अंश पर विचार करने की जरूरत है जिसमें वो कह रहे हैं कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है। दरअसल हमारे देश में हुआ ये कि मार्कसवाद के रोमांटिसिज्म में पर्यावरण की लंबे समय तक अनदेखी की गई। आजादी के बाद जब नेहरू से मोहभंग शुरू हुआ या यों भी कह सकते हैं कि नेहरू युग के दौरान ही मार्क्सवाद औद्योगीकरण की अंधी दौड़ में शामिल होने के लिए उकसाने वाला विचार लेकर आया। औद्योगिकीकरण में तो विकास पर ही जोर दिया जाता है और कहा भी जाता है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए। अगर विकास नहीं होगा तो औद्योगिकीकण संभव नहीं हो पाएगा।लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया। औद्योगिकीकरण का समर्थन करनेवाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव है। ये उपेक्षा इस हद तक है कि मार्क्स ने ‘मास्टरी ओवर नेचर’ की बात की है यानि प्रकृत्ति पर प्रभुत्व। सृष्टि के इस महत्वपूर्ण अंग, प्रकृति पर प्रभुत्व की कल्पना मात्र से ही इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत में बुनियादी दोष है। क्या ये मनुष्य के लिए संभव है कि वो प्रकृत्ति पर प्रभुत्व कायम कर सके। लेकिन मार्क्स ऐसा चाहते थे। उनके प्रकृत्ति को लेकर इस प्रभुत्ववादी नजरिए को उनके अनुयायियों ने जमकर बढ़ाया। इस बात का उल्लेख यहां आवश्यक है कि स्टालिन ने सोवियत रूस की सत्ता संभालने के बाद संरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट किया। औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की। नतीजा क्या हुआ ये सबके सामने है। बाद में इस गलती को सुधारने की कोशिश हुई लेकिन तबतक बहुत नुकसान हो चुका था। खैर ये अवांतर प्रसंग है इस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। अभी तो इसके उल्लेख सिर्फ ये बताने के लिए किया गया कि साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा की बुनियाद प्रकृति को लेकर बेहद उदासीन और प्रभुत्ववादी रही है। इसके विपरीत अगर हम विचार करें तो भारतीय विचार परंपरा में प्रकृत्ति को भगवान का दर्जा दिया गया है। हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं। इस पंचतत्व का निषेध या उससे आगे जाकर कुछ और नया खोज वैज्ञानिक अभी तक कर नहीं पाए हैं सिवा इसके कि वो इन पंच तत्वों के अंदर के अवयवों को ढूंढ निकालने का दावा कर रहे हैं। हमारी परंपरा में तो नदी पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है। कभी भी आप देख लें किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृत्ति को भी याद किया जाता है। 

मोहन भागवत ने इस ओर भी इशारा किया है कि कोरोना के बाद स्थितियां बहुत बदल गई हैं। सचमुच बहुत बदली हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती हैं आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। हमारे जो वामपंथी प्रगतिशील मित्र आयुर्वेद का मजाक उड़ाया करते थे उनको सुबह शाम काढ़ा पीते या फिर गिलोई चबाते देखा जा सकता है। आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है। हमारे यहां तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है। मौसम तो छोड़िए सूर्यास्त और और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है। आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है। आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है। आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है। भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। स परंपरा को अंग्रेजी के आभिजात्य मानसिकता और वामपंथ के विदेशी ज्ञान ने पिछले कई दशकों से नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की। सफल भी हुए। मोहन भागवत जी ने विदर्भ के एक किसान का जो उदाहरण दिया वो बेहद सटीक है। किसी भी प्रस्ताव को इस वजह से रद्दी की टोकरी में फेंका जाता रहा कि वो भारतीय परंपरा और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित होती थी। अब देश एक बार फिर से अपनी जड़ों और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरास की ओर लौटता नजर आ रहा है। 

अगर इस बात पर गंभीरता से विचार किया जाए तो हम ह पाते हैं कि हमारे देश में कथित तौर पर प्रगतिशील विचारों के शक्तिशाली होने की वजह से आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी विचारों का अंधानुकरण शुरू हो गया। भारतीय विचारों को, भारतीय चिकिस्ता पद्धति को, भारतीय दर्शन को, भारतीय पौराणिक लेखन को सायास पीछे किया गया। उसको दकियानूसी, पुरानतनपंथी या परंपरावादी आदि कहकर उपहास किया गया। पश्चिमी आधुनिकता के आख्यान का गुणगान या उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय जीवन शैली और भारतीय पद्धति को प्रभावित करना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में एक ऐसा समाज बनने लगा था जो पूरी तरह से न तो भारतीयता में यकीन करता था और न ही पूरी तरह से पश्चिमी रीति-रिवाज को आत्मसात कर पा रहा था। पश्चिमी आधुनिकता और भारतीयता के इस द्वंद ने लंबे समय तक भारतीय ज्ञान पद्धति को प्रभावित किया। कोरोना की वजह से और देश में बदले राजनीति हालात ने एक अवसर प्रदान किया है जिसकी वजह से एक बार फिर से देश अपनी जड़ों की ओर लौटता दिख रहा है।   


Saturday, October 10, 2020

‘म्यूट’ नहीं मुखर है भारत का लोकतंत्र


अभी हाल ही में दिल्ली में शाहीन बाग में लंबे समय तक चले धरना प्रदर्शन को लेकर आम नागरिकों को होनेवाली दिक्कतों पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है। हमारे देश में अदालतों की कार्यवाही अपनी गति से चलती हैं। शाहीन बाग में धरना खत्म होने के कई महीनों बाद इसपर फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि विरोध प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक जगहों पर कब्जा जमाना अनुचित है। शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनकारियों ने करीब सौ दिनों तक रास्ता बंद कर प्रदर्शन किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा है कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन निर्धारित स्थानों पर होने चाहिए। देश की सर्वोच्च अदालत का फैसला अंतिम और संविधानसम्मत होता है। लेकिन हमारे देश में एक कथित बौद्धिक वर्ग है तो सर्वोच्च अदालत के फैसले भी अपने मन की ही चाहते हैं। कहना न होगा कि जब उनके मन मुताबिक फैसला नहीं आता है तो वो उस फैसले का विरोध शुरू कर देते हैं। यह सही है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की जा सकती है। की भी जाती रही है। लेकिन जब ये स्पष्ट तौर पर दिखता है कि कोई व्यक्ति या समूह फैसलों की आलोचना या प्रशंसा के पीछे अपना एजेंडा चलाना चाहते हैं तो उसको रेखांकित किया जाना जरूरी हो जाता है। शाहीन बाग के प्रदर्शन को लेकर कुछ लोगों की आलोचना इसी तरह की है।

दक्षिण भारत के एक शास्त्री संगीत गायक हैं। नाम है टी एम कृष्णा। विवादप्रिय रहे हैं। शाहीन बाग पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उनको बेहद तकलीफ है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लेकर विरोध प्रकट किया है। उनका कहना है कि अगर सार्वजनिक स्थानों पर धरना प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जाती है तो हम एक खामोश लोकतंत्र के तौर पर रहेंगे। अब कृष्णा से ये पूछा जाना चाहिए कि जीवंत लोकतंत्र के लिए ये क्यों जरूरी है कि सार्वजनिक स्थानों पर धरना प्रदर्शन की अनुमति हो? किसी लोकतंत्र के लिए यह क्यों आवश्यक हो कि किसी समुदाय को वैसे सार्वजनिक स्थानों पर धरना प्रदर्शन की अनुमति दी जाए जिसकी वजह से लाखों लोगों को रोज दिक्कतों का सामना करना पड़े। शाहीन बाग में धरना प्रदर्शन की वजह से दिल्ली से नोएडा का रास्ता लंबे समय तक बंद रहा और इसकी वजह से लोग परेशान रहे। जो फासला मिनटों में तय हो सकता था उसके लिए घंटों का सफर तय करना पड़ा। क्या जीवंत लोकतंत्र का अर्थ ये होता है कि सैकड़ों लोग किसी सड़क पर बैठ जाएं और सौ दिन से अधिक समय तक बैठे रहें? क्या जीवंत लोकतंत्र में इस बात की अनुमति होनी चाहिए कि कुछ लोगों के विरोध प्रदर्शन की वजह अन्य लोग परेशान रहें। भारत के सभी नागरिकों को या नागरिकों के समूह को सड़क, फुटपाथ या पार्कों में विरोध प्रदर्शन करने की छूट है। उनको इस बात की भी छूट है कि वो सरकारी इमारतों के बाहर भी प्रदर्शन कर सकें। इस अनुमति के साथ ये अपेक्षा भी की गई है कि इन विरोध प्रदर्शनों की वजह से आवाजाही बाधित न हो। विरोध प्रदर्शनों की वजह से अगर लोगों को आने जाने में दिक्कत होती है तो पुलिस को ये अधिकार है कि वो प्रदर्शनकारियों को सड़क के किनारे चलने को कहें ताकि आवाजाही सुगम रहे। सरकारी इमारतों के बाहर अगर प्रदर्शन हो रहा है तो इमारत में आने जानेवाले को तकलीफ न हो।

कृष्णा जैसों को नागरिकों को मिले इन अधिकारों से कोई मतलब नहीं है। उनको तो मतलब सिर्फ इस बात से है कि जो उनके एजेंडे में फिट नहीं बैठे उसका येन केन प्रकारेण विरोध किया जाए। ऐसे लोग इस ताक में रहते हैं कि उनको अवसर मिले और वो उसका लाभ उठा सकें। इसके लिए वो बड़े भारी भरकम शब्द भी लेकर आते हैं। अपने विद्वता के आवरण में लपेटकर किसी भी मुद्दे को गंभीर बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन ये फॉर्मूला अब पुराना पड़ चुका है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कृष्णा ने तमिल के एक शब्द ‘पोरमबुक’ की व्याख्या की है। तमिल में इस शब्द का प्रयोग अपमानित करने लिए किया जाता है। इसका प्रचलित अर्थ बांझ या बंजर होता है। कृष्णा ने इस शब्द का प्रयोग प्रचलित अर्थ से अलग बताया है और इसके अर्थ को सार्वजनिक या नागरिकों की साझा अधिकार वाली जगहों से जोड़ा है। शाहीन बाग उनके लिए ‘पोरमबुक’ है यानि कि वो साधारण नागरिक की साझी अधिकार वाली जगह है। कृष्णा ने अपने लेख में एक खूबसूरत नैरेटिव गढ़ने का प्रयत्न तो किया है लेकिन उसमें वो सफल नहीं हो सके बल्कि उल्टे उसमें फंस गए। अगर कोई साधारण जनता के साझा अधिकारों वाली सार्वजनिक जगह है तो क्या चंद लोगों को ये हक है कि वो अपने अधिकारों के लिए दूसरों के हक की हत्या कर दें। और अगर आप साझा अधिकारों वाली सार्वजनिक जगह की बात करते हैं तो इसमें धार्मिक कट्टरता कहां से आती है? यह सवाल इस वजह से क्योंकि शाहीन बाग पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते वक्त कृष्णा धार्मिक कट्टरता को इन जगहों के अतिक्रमणकारी के तौर पर देखने लगते हैं। कृष्णा ये भूल जाते हैं कि हमारे देश का संविधान आम नागरिकों को कई प्रकार के अधिकार देता है लेकिन साथ ही वही संविधान हमारे कर्तव्यों को भी तय करता है।

दरअसल कृष्णा कुछ भी उल्टा सीधा बोलकर चर्चा में बने रहने की जुगत में रहते हैं। उन्होंने मुंबई हमले के गुनहगार पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब के मानवाधिकार को लेकर चिंता प्रकट की थी। जिस दिन अजमल कसाब को फांसी की सजा सुनाई गई थी उस दिन के देश के माहौल पर भी उन्होंने प्रतिकूल टिप्पणी की थी। उन्होंने एक पत्रिका में महान गायिका एम एस सुबुलक्ष्मी के खिलाफ बेहद घटिया लेख लिखा था जिसमें वो बार बार इस बात पर जोर देते थे कि वो देवदासी थीं। सुनी सुनाई निजी बातों को प्रामाणिकता के साथ पेश करने का दुस्साहस तब किया जब सुबुलक्ष्मी जी इस दुनिया में नहीं रहीं। कृष्णा जैसे लोगों के सार्वजनिक व्यक्तित्व और सार्वजनिक मसलों पर उनकी टिप्पणियों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करने पर एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। टीएम कृष्णा शास्त्रीय गायन करते हैं। शास्त्रीय संगीत की दुनिया में अब भी वो सबसे उपर की पायदान पर नहीं पहुंच पाए हैं। जब किसी फनकार को लगने लगता है कि वो अपने फन की बदौलत शीर्ष पर नहीं पहुंच पाएगा तो वो राजनीति की उंगली पकड़कर शीर्ष पर पहुंचना चाहता है। कृष्णा के साथ भी यही हो रहा है। वो वामपंथी नैरेटिव का पोस्टर बॉय बनकर प्रसिद्धि और काम दोनों पाना चाहते हैं। मुझे याद आता है कि जब कुछ साल पहले दिल्ली में उनका एक कार्यक्रम स्थगित हुआ था तो उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। नतीजा ये हुआ था कि दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार ने फौरन उनका एक कार्यक्रम आयोजित करवा दिया। इस तरह के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। अब उनको शाहीन बाग पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में संभावना नजर आ रही है तो उस फैसले से भारत के लोकतंत्र को परिभाषित करने में लगे हैं। पर उनको ये बात समझनी चाहिए कि भारत का लोकतंत्र इतना मजबूत और मुखर है कि यहां शाहीन बाग प्रदर्शन से लेकर आतंकी अजमल कसाब तक के मामले में न्याय ही होता है। क्योंकि संविधान सर्वोपरि है।  

Saturday, October 3, 2020

चयन में पारदर्शिता पर उठते सवाल


इस सप्ताह के आरंभ की बात है। हिंदी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल की एक फेसबुक पोस्ट पर नजर गई। उसमें उन्होंने लिखा कि ‘कथा यूके (लंदन) ने अपने पिछले 5 सालों के पुरस्कारों की घोषणा की है। सभी लेखकों को बधाई। इन पुरस्कारों की घोषणा के तुरंत बाद इस बात को लेकर विवाद शुरू हो गया है कि जिन लेखकों की रचनाओं पर भी विचार किया गया, उनके नामों की आयोजकों द्वारा सार्वजनिक घोषणा नहीं की जानी चाहिए थी। एक लेखक होने के नाते मैं इस तर्क से पूरी तरह सहमत हूँ । मेरे मन में जो सम्मान उन लेखकों का है जिनका चयन इन सम्मानों के लिए किया गया है, उतना ही इन लेखकों के प्रति भी है जिनका नाम सार्वजनिक किया गया है। चूंकि साल 2009 के लिए यह सम्मान मुझे भी मेरे एक उपन्यास 'रेत' पर प्रदान किया जा चुका है, इसलिए अपने लेखक बंधु-बांधवों की एकजुटता और उनके मान-सम्मान के पक्ष में, मैं अपना इंदुशर्मा कथा सम्मान लौटाने की घोषणा करता हूं।‘ भगवानदास मोरवाल जी पुरस्कार वापसी की इस घोषणा को पढ़ते हुए अचानक पांच साल पहले का पुरस्कार वापसी प्रपंच दिमाग में कौंध गया। उस वक्त भी बिहार विधानसभा का चुनाव होना था और ऐसे ही एक लेखक ने पुरस्कार वापसी की घोषणा करके उस प्रपंच का आरंभ किया था। लगा कि फिर से पुरस्कार वापसी को राजनीतिक अस्त्र के रूप में तो इस्तेमाल नहीं किया जानेवाला है। फौरन कथा यूके के कर्ताधर्ता तेजेन्द्र शर्मा की पोस्ट देखने गया तो वहां पुरस्कृत लेखकों की तस्वीरों के साथ एक पोस्टर लगा देखा। उससे ये सूचना मिली कि पिछले पांच सालों से स्थगित इंदु शर्मा कथा सम्मान देने की घोषणा की गई थी। जिनको सम्मानित किया जाना था उनके नाम और तस्वीरें लगी थीं। पुरस्कार प्रदान करने की सूचना भी शामिल की गई थी। यहां तक तो मसला ठीक था लेकिन उस पोस्टर के नीचे सोलह लेखक और लेखिकाओं के नाम का उल्लेख इस आशय से था कि इनकी रचनाओं पर भी गौर किया गया। भगवानदास मोरवाल इन सोलह लेखकों की सूची प्रकाशित करने से आहत हो गए और उन्होंने पुरस्कार वापसी का अपना फैसला सार्वजनिक कर दिया। 

उपरोक्त पुरस्कार के आयोजक चूंकि लंदन में रहते हैं इस वजह से बुकर पुरस्कार आदि से प्रेरणा लेते हुए उन लेखकों के नाम भी सार्वजनिक कर दिए जिनके नामों पर विचार किया गया। पर यहीं पर कथा यूके से एक बड़ी चूक हो गई। चूक ये कि उन्होंने इस पुरस्कार के निर्णायकों का नाम सार्वजनिक नहीं किया। इस बात में भी संदेह प्रकट किया जा रहा है कि इस पुरस्कार के लिए कोई निर्णायक होता नहीं है। पुरस्कृत लेखकों की जो सूची जारी की गई है कि उसके साथ लिखा भी गया है कि ‘हमारे निर्णायक मंडल एवं मित्रों ने सहयोग किया और हम अंतत: किसी निर्णय पर पहुंच पाए’।‘  इसका अर्थ तो ये हुआ कि ‘हम’ ही अंतिम निर्णायक हैं। दरअसल कुछ अंतराष्ट्रीय पुरस्कार देनेवाली संस्थाएं उन लेखकों के नाम भी सार्वजनिक करती हैं जिनके नाम पर पुरस्कार की चयन समिति या निर्णायक मंडल ने विचार किया। लेकिन उनकी चयन प्रक्रिया बेहद पारदर्शी होती है और हर चरण पर नामों का खुलासा होता रहता है इसलिए वो अपमानजनक नहीं लगता है। दिक्कत इऩ जैसे व्यक्तिगत पुरस्कारों में यही होती है कि इनमें पारदर्शिता का अभाव होता है। दरअसल ये व्यक्ति विशेष की मर्जी पर निर्भर होता है कि वो कब किसको पुरस्कार दे, किस वर्ष पुरस्कार दे और किस वर्ष रोक दे। अब अगर हम देखें तो इंदु शर्मा कथा सम्मान ही पिछले पांच वर्ष से नहीं दिया जा रहा है। बीच में एक बार कथा सम्मान की जगह एक गजलकार को सम्मानित कर दिया गया। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, व्यक्ति विशेष का पुरस्कार है वो जिसे चाहे, जब चाहे दे या न दे। दिक्कत तब होती है जब प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह काम करनेवाली ये संस्थाएं पब्लिक लिमिटेड कंपनी की राह भी पकड़ना चाहती हैं। व्यक्तिगत स्तर पर दिए जानेवाले इन पुरस्कारों के आयोजकों की अपेक्षा ये होती है कि उनको पारदर्शी तरीके से दिए जानेवाले पुरस्कारों जैसा माना जाए। लेकिन तब मोरवाल जी जैसा कोई लेखक सामने आकर ना केवल पुरस्कार देनेवालों को आइना दिखाता है बल्कि पुरस्कार वापसी की घोषणा कर अपना विरोध भी प्रकट करता है। उनकी इस घोषणा से इस तरह के पुरस्कारों की साख पर भी सवाल खड़े होते हैं। व्यक्तिगत या निजी तौर पर पुरस्कार देने के मामले में दो ऐसे पुरस्कार हैं जिनकी साख लंबे समय से बची हुई है। एक है देवीशंकर अवस्थी के नाम पर आलोचना के लिए दिया जानेवाला पुरस्कार और दूसरा है भारत भूषण अग्रवाल के नाम पर दिया जानेवाला कविता पुरस्कार। इन दोनों पुरस्कारों में चयन की प्रक्रिया का हिंदी जगत को पता है। निर्णायकों के नाम भी हर वर्ष सार्वजनिक किए जाते हैं।  

अब हिंदी के लेखकों को पद्म पुरस्कार कम छद्म पुरस्कार अधिक मिलने लगे हैं। कोरोना काल में तो पुरस्कार देना और भी आसान हो गया है। व्यक्तिगत स्तर पर पुरस्कार की घोषणा करके उसको ऑनलाइन गोष्ठी आयोजित कर आभासी पुरस्कार दे दिए जाते हैं। पहले तो पुरस्कार देनेवाले को कम से कम एक आयोजन करना होता था। अगर पुरस्कार के तहत कोई राशि नहीं भी गी जाती थी तो उसमें शॉल और प्रतीक चिन्ह आदि देने पड़ते थे। उसमें कुछ राशि तो खर्च करनी पड़ती थी। अब तो हालात ये है कि सबकुछ आभासी हो गया है। पोस्टर पर विज्ञप्ति जारी हो जाती है। ऑनलाइन अर्पण समारोह हो जाता है। ईमेल से पुरस्कार का प्रमाण पत्र भेज दिया जाता है। यह एक ऐसी प्रविधि विकसित हो रही है जिसमें सभी खुश रहते हैं। कथा यूके के पुरस्कार को पांच साल बाद शुरू करने के पीछे भी एक वजह से ये भी हो सकती है कि अब सबकुछ ऑनलाइन संभव है। अन्यथा 2015 के पहले तो पुरस्कृत लेखकों को लंदन बुलाया जाता था, उनके आने जाने का खर्च, लंदन में रुकने का खर्च सब आयोजकों को वहन करना पड़ता है। 

दरअसल व्यक्तिगत पुरस्कार देनेवालों में से ज्यादातर की मंशा खुद को साहित्य की चर्चा के केंद्र में रखने की भी होने लगी है। सोशल मीडिया के इस दौर में हिंदी में लेखकों का एक ऐसा वर्ग सामने आ गया है जो अपनी औसत रचनाओं पर पुरस्कृत होकर प्रसिद्धि की चाहत रखता है। इन पुरस्कार पिपासु लेखकों के लिए व्यक्तिगत स्तर पर दिए जानेवाले पुरस्कार प्रसिद्ध होने की लालसापूर्ति का एक अवसर होता है। मध्यप्रदेश से दिए जानेवाले एक पुरस्कार के लिए तो बकायदा लेखकों से एक निश्चित राशि का बैंक ड्राफ्ट भी आवेदन के साथ मांगा जाता है। लोग देते भी हैं और फिर पुरस्कृत होकर प्रचार भी करते हैं। इसी तरह से बिहार की एक संस्था हर वर्ष दर्जनों लोगों को पुरस्कृत करती है। कई लोग तो कहते हैं कि इन पुरस्कारों का एक अर्थतंत्र भी होता है। आयोजनकर्ता किसी को पकड़ लेते हैं और उनके नाम पर या उनके पिता-माता के नाम पर पुरस्कार देने की बात कहकर उनसे एक निश्चित रकम ले लेते हैं। फिर किसी हिंदी के लेखक को आभासी दुनिया में पुरस्कृत करके धन देनेवाले को संतुष्ट कर देते हैं। अब हिंदी के लेखकों को यह तय करना होगा कि कौन सा पुरस्कार लिया जाए और कौन सा ठुकराया जाए। अपेक्षा तो वरिष्ठ लेखकों से भी की जाती है कि वो इस तरह का माहौल बनाएंगे या अपने सान्निध्य में आनेवाले युवा लेखकों को हिंदी साहित्य की गरिमा को संजोए रखने के लिए प्रेरित भी करेंगे।    


Thursday, October 1, 2020

बड़े लक्ष्य के लिए फिल्मों से उदासीनता


गांधी की फिल्मों में कोई रुचि नहीं थी और वो फिल्मों को समाज के लिए बुरा मानते थे। इसके तात्कालिक कारण थे। गांधी जी मनोरंजन को समाज के लिए आवश्यक मानते थे लेकिन मनोरंजन को लेकर उनके अपने कुछ मानक थे। उनका मानना था कि मनोरंजन ऐसा हो जो बेहतर समाजिक मूल्यों को स्थापित करे। फिल्म देखनेवाले में अच्छे संस्कार का बीज डाले या उसके अंदर के अच्छे संस्कार को मजबूत करे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश की जनता खासकर युवाओं को संगठित करने और उनको भटकने नहीं देने के लिए गांधी प्रतिबद्ध थे। ये वही गांधी हैं जिनकी लंदन में रहने के दौरान संगीत में रुचि जगी थी। मशहूर अमेरिकी पत्रकार जोसेफ लेलीविल्ड ने अपनी पुस्तक ‘ग्रेट सोल, महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया’ में इस बात को रेखांकित भी किया है कि लंदन में गांधी वायलिन बजाना भी सीखने जाते थे। इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि गांधी ने पश्चिमी नृत्य सीखने की भी कोशिश की थी। वो क्लबों में जाकर डांस भी किया करते थे। दरअसल जब गांधी भारत लौटे तो यहां की फिल्मों के बारे में उनकी राय पोस्टरों को देखकर या फिल्मों के बारे में लोगों से सुनकर बन रही थी। ये वही दौर भी था जब भारतीय मूक फिल्मों में पौराणिक कहानियों पर बन रही फिल्मों से इतर भी फिल्में बनने लगी थीं। सी ग्रेड अमेरिकी फिल्मों का प्रदर्शन भी शुरू हो गया था जिसमें यौन संबंधों और नग्नता का चित्रण होता था। भारतीय दर्शकों के लिए यह एक अलग ही दुनिया थी जहां स्त्री देह को खुलेपन के साथ दिखाया जाने लगा था। इसका प्रभाव समाज पर पड़ने लगा था। उसी दौर में 1925 में डी एन संपत ने मूक फिल्म ‘सती अनुसूइया’ बनाई तो उसमें अभिनेत्री सकीना बाई ने बगैर कपड़ों के एक सीन किया था। इस तरह की बातें गांधी तक पहुंचती थी और फिल्मों को लेकर उनकी राय नकारात्मक होती जाती थी। 

कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में सिर्फ एक ही फिल्म, रामराज्य, देखी थी जिसके बाद भी उनकी राय बदल नहीं सकी। इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि गांधी ने फिल्मकार विजय भट्ट को बेहद संक्षिप्त मुलाकात में गुजरात के प्रख्यात कवि नरसी मेहता पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया था। अपनी किताब ‘महात्मा गांधी और सिने संसार’ में इकबाल रिजवी ने लिखा है कि ‘फिल्मकार विजय भट्ट गांधी के बड़े प्रशंसक थे। गांधी जी एक बार वलसाड प्रवास पर थे तो विजय भट्ट उनसे मिलने पहुंचे। सुबह की सैर की समय गांधी से उनकी बेहद संक्षिप्त भेंट हुई। गांधी ने उनसे पूछा कि आप क्या करते हैं? विजय भट्ट ने कहा कि वो फिल्मकार हैं। गांधी ने फिर एक सवाल दागा ‘क्या कभी आपने नरसी मेहता पर फिल्म बनाने के बारे में सोचा है?‘ विजय भट्ट ने उत्तर दिया कि वो फिल्म बनाने की कोशिश करेंगे। दो सवालों की इस बेहद संक्षिप्त मुलाकात के बाद ही विजय भट्ट ने फिल्म ‘नरसी भगत’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ भजन भी शामिल किया गया था। पर जब 1940 में ये फिल्म रिलीज हुई तो इसको भी गांधी अपनी राजनीतिक व्यस्तता की वजह से देख नहीं सके।

गांधी भले ही फिल्मों को उचित माध्यम नहीं मानते थे लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कई नेता थे जो फिल्मों को समाज को बदलने का एक प्रभावी माध्यम मानते थे। सरदार पटेल तो किशोर साहू की फिल्म ‘वीर कुणाल’ के प्रीमियर के मौके पर मुंबई के नॉवल्टी थिएटर में पहुंचे भी थे। ये आजादी से दो साल पहले की बात है। फिल्म शुरू होने के पहले उन्होंने छोटा सा भाषण भी दिया था। उस भाषण का सार ये था कि कांग्रेस कला और फिल्मों से विमुख नहीं है। उन्होंने तब जोर देकर कहा था कि अगर बरतानिया हुकूमत देश में विदेशी पूंजी से स्टूडियो खोलेगी तो कांग्रेस उसका विरोध करेगी और वो खुद उस विरोध का नेतृत्व करेंगे। इसी तरह से जब 1945 में पृथ्वीराज कपूर और शोभना समर्थ अभिनीत फिल्म ‘वीर अर्जुन’ रिलीज हुई थी तो उसको देखने डॉ राजेन्द्र प्रसाद और श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहुंचे थे। कहना ना होगा कि गांधी भले ही मनोरंजन के इस माध्यम फिल्म को पसंद नहीं करते थे लेकिन उन्होंने कभी भी इसकी राह में बाधा बनने की कोशिश नहीं की, बल्कि गांधी और उनके सिद्धांतों ने हिंदी फिल्मों को गहरे तक प्रभावित किया। 

हिंदी फिल्मों को दो थीम ने बहुत गहरे तक प्रभावित किया है। पहली थीम है राम कथा और दूसरी थीम है गांधी का व्यक्तित्व और उनके सिद्धांत। 1948 में बनी फिल्म ‘शहीद’ से लेकर 2006 में बनी फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ तक पर अगर सूक्षम्ता से नजर डालते हैं तो ऐसी सैकड़ों फिल्में रेखांकित की जा सकती हैं जिसमें किसी ना किसी रूप में गांधी उपस्थित हैं। गांधी का जो विराट व्यक्तित्व है और उनके सिद्धांतों की जो वैश्विक व्याप्ति है, हिंदी फिल्में उनके प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई हैं। 

   


Saturday, September 26, 2020

कथावाचन का उर्दू संस्करण दास्तानगोई


दो तीन साल पहले की बात है, दिल्ली में एक साहित्यिक समारोह में दास्तानगोई सुनने का अवसर मिला था। दो नामी दास्तानगो मंच पर थे। दोनों ने सफेद अंगरखा और सफेद टोपी पहनी हुई थी। सामने कटोरे में पानी रखा था। उनमें से एक विवादों के भंवर से मुक्त होकर आए थे। दास्तानगोई आरंभ करने के पहले दोनों ने माहौल बनाना शुरू किया। सबसे पहले उन दोनों ने इस विधा के बारे में बताना शुरू किया। बेहद उत्साह और ऊंची आवाज में उन दोनों की जुगलबंदी में ये बताया गया कि दास्तानगोई भारत में ईरान से आई। फिर उन्होंने अमीर खुसरो से लेकर अकबर तक का नाम लिया और कई मिनट तक इस विधा को महिमामंडित करते रहे। तब मेरे दिमाग में ये बात खटकी जरूर थी लेकिन इसपर विचार नहीं किया। बात आई गई हो गई। चंद दिनों पहले फिर एक दूसरे दास्तानगो को सुनने को मिला। उन्होंने भी दास्तानगोई की विधा को ईरान से भारत में आया बताया। ईऱान से आई इस विधा की प्रशंसा में उन्होंने ढेर सारी बातें कहीं, दास्तानगोई के अनूठे फॉर्म को लेकर बड़े बड़े दावे किए जैसे कि ये कोई नई विधा हो या लुप्त होती विधा को पुनर्जीवित किया गया हो। थोड़ी देर के लिए ये माना भी जा सकता है कि उर्दू में ये विधा ईरान से आई होगी। लेकिन इनकी बातचीत में दावा किया जा रहा था कि भारत में ये विधा विदेश से आई। आधारहीन दावा।  

जब दो जगह ये बात सुनी कि दास्तानगोई भारत में विदेश से आई तो लगा कि अज्ञान की धारा बह रही है। हमारे देश में कथावाचन की परंपरा बहुत पुरानी है। हमारे देश में तो कहानी कहने की परंपरा प्राचीन काल से चल रही है। कहानी सुनाने के अलग-अलग तरीके हैं। अलग अलग क्षेत्र में, अलग अलग विधा में, अलग अलग कलाओं में कहानी कहने की अपनी एक परंपरा रही है। अगर हम याद करें तो महाभारत में संजय युद्ध की आंखों देखी धृतराष्ट्र को सुनाते हैं और जबतक युद्ध चलता रहता है तबतक वो हर रोज नियम से युद्ध की आंखोदेखी धृतराष्ट्र को सुनाते रहते हैं। यह कहानी कहने की ही तो कला है। श्रीरामचरितमानस भी तो कथावाचन की शैली में ही है। श्रीरामचरितमानस की इन पंक्तियों पर ध्यान देना चाहिए, उमा कहिउं सब कथा सुहाई/जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई। इसका अर्थ ये है कि शंकर जी पार्वती से कहते हैं कि, हे उमा! मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी को सुनाई थी। यहां गौर करने की बात है कि कथा सुनाने या कहने की बात की गई है। बात सिर्फ श्रीरामचरितमानस या महाभारत की नहीं है। सैकड़ों ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं जिससे ये साबित होता है कि भारत में कहानी कहने की परंपरा बहुत पुरानी है। हम संस्कृत नाट्यशास्त्र की बात करें तो वहां जिस सूत्रधार का उल्लेख मिलता है वो क्या करता है। वो भी तो कहानी ही सुनाता है। मंच पर खड़े होकर कहानी सुनाता है। पूर्वोत्तर में भी तकिए पर बैठकर एक व्यक्ति भाव भंगिमाओं के साथ महाभारत की कथा सुनाता है। यह परंपरा बहुत पुरानी है। इसके अलावा अगर हम गुजरात की बात करें तो वहां के माणभट्ट गायक विष्णु कथा को ‘हरिकथाकालक्षेपम’ की परंपरा में सदियों से गाते रहे हैं। राजस्थान में भी ‘कहन’ की परंपरा कितने समय से चली आ रही है इसका आकलन करना मुश्किल है। दादा दादी की कहानियां सुनाने की बात तो हमारे देश के हर घर परिवार में सुनी जा सकती है। राजाओं के दरबार में भांड भी तो किस्सा ही सुनाते थे। यह सूची बहुत लंबी हो सकती है लेकिन यहां मकसद सिर्फ ये बताना है कि दास्तानगोई करनेवाले जब ये कहते हैं कि भारत में ये परंपरा ईरान से आई तो वो गलत दावा करते हैं। चिंता इस बात की कि गलत बात को अगर लगातार बोला जाए और नाटकीय तरीके से सार्वजनिक तौर पर समूह के सामने पेश किया जाए तो कई बार उसको सच मान लिया जाता है। लिहाजा इस तरह की गलत बातों को रेखांकित करना आवश्यक है। गलत बातों को रेखांकित करने के साथ साथ ये बाताना भी उचित होता है कि सचाई क्या है।

दास्तानगोई करने वालों का दावा है कि उनकी विधा इस वजह से अलग होती है कि ये कई दिनों तक चलती है। उनका दावा है कि ईरान में या अमीर खुसरो ने जब दास्तानगोई की थी तो वो कई दिनों तक चली थी। यहां वो फिर भूल कर जाते हैं कि हमारे देश में कथावाचन की जो परंपरा रही है वो अलग अलग फॉर्मेट की रही है। संजय ने तो अठारह दिन तक सुबह से शाम तक धृतराष्ट्र को कथा सुनाई थी। कई बार कथावाचन सात दिन तो कई बार दस दिन तक भी चलती है। राधेश्याम कथावाचक कई दिनों तक राम कथा कहते थे। उनकी शैली अद्धभुत होती थी और वो स्थानीय बोलियों के शब्दों को भी अपनी कथा का हिस्सा बनाते थे। यही काम दास्तानगोई करनेवाले भी करते हैं। वो उर्दू के कवियों या कहानीकारों या लेखकों के किस्सों को संस्मरणों के तौर पर सुनाते हैं। आज के दौर में भी मोरारी बापू कथावाचन ही तो करते हैं और वो भी कई दिनों तक चलता है। मौजूदा दौर में तो दास्तानगोई एकल या युगल परफॉरमेंस की तरह हो गई है। फॉर्मेट और फॉर्म की बात करके दास्तानगोई को विदेश से आई अनूठी विधा के तौर पर स्थापित करने की कोशिशें भले ही की जाएं पर दरअसल वो भारतीय कथावाचन का ही एक रूप है। भाव भंगिमाओं से और वस्त्र से कोई परफॉर्मेंस अलग विधा के तौर पर स्थापित नहीं हो सकती है। नाटककार और निर्देशक सलीम आरिफ से पटना साहित्य महोत्सव के दौरान दास्तानगोई पर एक अनौपचारिक चर्चा हुई थी। चर्चा में उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था कि ‘फॉर्म से कंटेंट पैदा नहीं किया जा सकता है, कटेंट से फॉर्म बनाया जा सकता है।‘ दास्तानगोई के साथ यही दिक्कत है कि इसमें फॉर्म से कंटेंट बनाने की कोशिश हो रही है, जो संभव नहीं है। दास्तानगोई को एक विधा के तौर पर स्थापित करने की कोशिशें भी हो रही हैं लेकिन जब आधार ही नहीं होगा तो वो अलग क्या हो पाएगी। वो भारतीय कथावाचन का उर्दू संस्करण है।

आज जब पूरी दुनिया अपनी जड़ों की ओर लौट रही है। अपनी परंपराओं को फिर से अपनाने के लिए आतुर दिखाई दे रही है ऐसे में भारत की कहानी कहने की या किस्सागोई की शानदार परंपरा को नेपथ्य में धकेलने की कोशिश हो रही हैं। ऐसा करनेवाले ये भूल जाते हैं कि भारत में किस्से कहानियां सुनाने की विधा लोकमानस में इस तरह से रची बसी है कि उसको किसी आयातित विधा से चुनौती नहीं दी जा सकती है। अब से कुछ दिनों बाद नवरात्र आरंभ होनेवाला है। देशभर के अलग अलग अलग हिस्सों में रामलीला का आयोजन होगा। अलग अलग तरीके से नौ दिनों तक रामकथा का वाचन या मंचन होगा। दास्तानगोई को अलग विधा मानने या बतानेवालों को रामलीला में जाकर देखना चाहिए कि वहां किस तरह से कथा सुनाई जाती है और कितनी लोकप्रिय है। दास्तानगोई करनेवालों को ये मानना चाहिए बल्कि गर्व से ये स्वीकार करना चाहिए कि ये विधा इसी धरती पर उपजी है, यहीं की है और हम अपनी ही पारपंरिक विधा को नए स्वरूप में आपके सामने पेश कर रहे हैं। संभव है कि तब ये विधा लोकमानस के मन पर अंकित हो सकेगी।  


 

Saturday, September 19, 2020

महानायक के लिए भी सजी थीं थालियां


फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद हिंदी फिल्म जगत लगातार एक के बाद एक विवाद में घिरता जा रहा है। हिंदी फिल्म जगत का ये विवाद पिछले दिनों संसद में भी गूंजा जब गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता रवि किशन ने ड्रग्स का मामला लोकसभा में उठाया। रवि किशन के अगले दिन अपने जमाने की प्रख्यात अभिनेत्री और अब समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सदस्य जया बच्चन ने बैगर किसी का नाम लिए बॉलीवुड को बदनाम करने का आरोप जड़ा। अपने छोटे से वक्तव्य में जया बच्चन ने बेहद हल्की बात कह दी। उन्होंने बॉलीवुड पर सवाल उठानेवालों को निशाने पर लेते हुए कहा कि कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। अब ‘जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं’ से जया बच्चन एक ऐसा रूपक गढ़ने की कोशिश करती हैं जो उनकी मानसिकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देता है। इस समय थाली और छेद के रूपक का उपयोग करके जया बच्चन अपनी सामंती मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर गईं। मतलब ये कि बॉलीवुड में कोई मालिक है जो छोटे लोगों के लिए थाली सजाता है। परोक्ष रूप से ये बयान रवि किशन और कंगना पर वार था। इन दोनों ने अपनी मेहनत से फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाई किसी ने इनके लिए थाली सजाई हो अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया है। थाली और छेद का रूपक जया जी और उनके परिवार को कठघरे में खड़ा कर देता है। जया बच्चन फिल्मी दुनिया की बेहद समादृत अभिनेत्री रही हैं, फिर लंबे समय से सांसद भी हैं। उनके पति अमिताभ बच्चन तो सदी के महानायक ही हैं, उनके भारत में करोड़ों प्रशंसक हैं।

जब जया जी राज्य सभा में थाली और उसमें छेद का रूपक गढ़ रहीं थीं तो शायद वो यह भूल गईं कि अमिताभ बच्चन और उनके परिवार के लिए भी थाली कई लोगों ने कई बार सजाई थी। ख्वाजा अहमद अब्बास से लेकर अमर सिंह तक ने। उन्होंने थाली में छेद किया या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन थाली के पलट दिए जाने की कहानी कई लोग कहते हैं। फिल्म अभिनेता महमूद का एक बेहद चर्चित साक्षात्कार है जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन के बारे में, उनके संघर्षों के बारे में बताया है। बात उन दिनों की थी जब अमिताभ बच्चन फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ कर रहे थे। उस फिल्म का निर्देशन ख्वाजा अहमद अब्बास कर रहे थे। उसमें महमूद के छोटे भाई अनवर अली भी काम कर रहे थे। उस दौर में महमूद ने और उनके भाई अनवर अली ने अमिताभ की काफी मदद की थी। उनको अपने घर में रखा। महमूद तो उनको अपना बेटा मानते थे। उसके बाद भी जब अमिताभ की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं तब भी महमूद ने अपनी फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ में अमिताभ को लीड रोल में लिया। इसमें शत्रुघ्न सिन्हा, अरुणा इरानी के अलावा अनवर अली ने भी काम किया था। इस फिल्म ने औसत से थोड़ा ही बेहतर बिजनेस किया था पर अमिताभ के काम को यहीं से पहचान मिली। महमूद ने उसी साक्षात्कार में बताया कि किस तरह से बाद के दिनों में अमिताभ बच्चन ने उनको भुला दिया। जब महमूद की बाइपास सर्जरी हुई थी तो वो मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थी। वहीं अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन भी अपना इलाज करवा रहे थे। महमूद को इस बात का बेहद दुख था कि एक ही अस्पताल में रहने के बावजूद अमिताभ उनसे मिलने नहीं आए, गेट वेल सून का कार्ड या एक फूल तक नहीं भेजा। महमूद की ‘थाली’ का क्या हुआ?   

फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ के बाद अमिताभ को फिल्म ‘जंजीर’ से काफी शोहरत मिली। फिल्म ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन के चयन की दिलचस्प कहानी है। प्रकाश मेहरा के सामने जब ‘जंजीर’ की कहानी आई तो वो इसको लेकर धर्मेन्द्र और देवानंद के पास गए लेकिन दोनों ने इंकार कर दिया। वो दौर राजेश खन्ना का था और उनका जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा था। ज्यादातर अमिनेता रोमांटिक फिल्में कर रहे थे या करना चाहते थे। ‘जंजीर’ की कहानी अलग हटकर थी। जब प्रकाश मेहरा को धर्मेन्द्र और देवानंद ने मना कर दिया तब फिल्म ‘जंजीर’ लिखनेवाली मशहूर जोड़ी के सलीम खान ने उनको अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था। उन्होंने फिल्म ‘बांबे टू गोवा’ देखी थी और उसमें अमिताभ का फाइट सीन उनको खास पसंद आया था। उसके बाद की कहानी तो इतिहास है। लेकिन जब सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी टूटी थी तो इसकी खबर उस वक्त मुंबई के एक समाचार पत्र में छपी थी। अखबार के उसी अंक में अमिताभ बच्चन के हवाले से ये कहा गया था कि वो जावेद अख्तर के साथ हैं। सलीम-जावेद और अमिताभ के अन्य प्रसंग दीप्तकीर्ति चौधरी की किताब, ‘द स्टोरी ऑफ हिंदी सिनेमा’ज ग्रेटेस्ट स्क्रीन राइटर्स’ में देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं इस बात का भी अन्यत्र उल्लेख मिलता है कि बाद के दिनों में प्रकाश मेहरा जब अमिताभ से मिलने की कोशिश करते थे तो लंबी प्रतीक्षा के बाद भी उनको ये सौभाग्य प्राप्त नहीं होता था। वजह का पता नहीं। अमिताभ बच्चन के लिए सफल फिल्मों की ‘थाली’ तो प्रकाश मेहरा ने भी सजाई थी।  

बच्चन परिवार और गांधी परिवार की नजदीकियां और दूरियां भी सबको पता ही हैं उसको फिर से दोहराने की जरूरत नहीं हैं। लेकिन इतना तो कहना ही होगा कि गांधी परिवार या कांग्रेस ने भी बच्चन परिवार के लिए ‘थाली’ तो सजाई थी। हर किसी की जिंदगी में उतार चढ़ाव आते हैं, बच्चन साहब की जिंदगी में भी आए। तब उनकी मदद के लिए अमर सिंह सामने आए थे। संकट के समय बच्चन परिवार के लिए ‘थाली’ तो अमर सिंह ने भी सजाई। जया जी को समाजवादी पार्टी से सांसद बनवाने में भी उनकी भूमिका मानी जाती है। कालांतर में अमर सिंह की ‘थाली’ भी पलट गई और वो बच्चन परिवार से दूर हो गए। दरअसल जया बच्चन उम्र और प्रतिष्ठा के उस पड़ाव पर हैं जहां उनसे इस तरह की हल्की टिप्पणी की बजाय गंभीर और सकारात्मक टिप्पणियों की अपेक्षा होती है। आज बॉलीवुड को लेकर जो भी कहा या लिखा जा रहा है उसपर जया जी जैसी फिल्म जगत की वरिष्ठ और सम्मानित सदस्यों को सामने आकर देश को भरोसा देना चाहिए था। कहना चाहिए था कि अगर वहा नशा या कुछ और गलत हो रहा है तो उससे इंडस्ट्री को मुक्त करने की जरूरत है। ये अपेक्षा तो तब की जा सकती थी जब फिल्म जगत से जुड़े वरिष्ठ लोग सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस दिखा पाते। वरिष्ठ साहस नहीं दिखाते और कनिष्ठ या मानसिक रूप से विपन्न निर्देशक राजनीति करते हैं।

संजय दत्त ड्रग्स की गिरफ्त में आए थे, उसके बाद अन्य आपराधिक गतिविधि के चलते जेल में भी रहे। जब उनको नायक बनाने के लिए फिल्म ‘संजू’ का निर्माण होता है और उस फिल्म में संजय दत्त तीन सौ से अधिक महिलाओं के साथ हम बिस्तर होने की बात कहते हैं तो किसी को गटर की याद नहीं आती। कोई भी इस बात पर आपत्ति नहीं जताता कि इस फिल्म में इस प्रसंग को महिमामंडित नहीं किया जाना चाहिए था। बल्कि इस फिल्म की सफलता को बॉलीवुड ने सेलिब्रेट किया गया। तब फिल्मी दुनिया से जुड़े वरिष्ठ सदस्य उद्वेलित नहीं हुए कि राजू हिरानी ने अपनी फिल्म में महिलाओं को घोर आपत्तिजनक तरीके से पेश किया। अब समय आ गया है कि बॉलीवुड साहस दिखाए। साहस सही को सही और गलत को गलत कहने का। 

Saturday, September 12, 2020

कवरेज से कठघरे में न्यूज चैनल


लगभग चार साल बाद नोएडा के फिल्म सिटी गया। ये वही इलाका है जहां ज्यादातर न्यूज चैनलों के कार्यालय हैं। कोरोना की वजह से फिल्म सिटी में रौनक थोड़ी कम थी। न्यूज चैनल में कार्यरत एक मित्र से कुछ काम के सिलसिले में मिलने गया था। कोरोना की वजह से दफ्तर में बाहरियों के प्रवेश की मनाही थी। इस वजह से हमलोग फिल्म सिटी स्थित एक चाय की दुकान पर बैठकर बातें कर रहे थे। इतने में तीन पुराने सहयोगी चाय पीने उसी दुकान पर आ गए। ये सब अलग अलग चैनलों में काम करते हैं लेकिन चाय साथ ही पीते थे। वहीं खड़े खड़े बातें होने लगीं। मुझे ध्यान नहीं था कि वो दिन गुरूवार था और उसी दिन चैनलों की टीआरपी आती है। टीआरपी रेटिंग पर बातें होने लगी। न्यूज चैनल में लंबे समय तक काम करने की वजह से टीआरपी रेटिंग वाले दिन की अहमियत का पता था। उस दिन होनेवाली बातें भी वही थीं जो चार पांच साल पहले हुआ करती थी। लिहाजा मुझे लगा कि थोड़ी देर में ये बातें खत्म भी हो जाएगी लेकिन मेरे एक मित्र ने दूसरे को रेटिंग को लेकर छेड़ दिया। रिया,सुशांत, कंगना से लेकर चीन और कोरिया के घटनाक्रम केंद्र में आने लगे थे। तबतक मुझे लग रहा था कि हल्की फुल्की बातें हो रही हैं थोड़ी देर में हंसी मजाक करके खत्म हो जाएगी। सब इस वक्त अलग अलग न्यूज चैनलों में काम जरूर कर रहे थे लेकिन एक समय में सभी एक ही न्यूज चैनल का हिस्सा होते थे, गहरे मित्र भी थे। 

जिस मित्र ने दूसरे मित्र को रेटिंग कम होने को लेकर छेड़ा था उसने एक और बात कह दी जिसको लेकर बात बढ़ गई। उसने कह दिया कि ये पुराना फॉर्मूला है कि जो चैनल अपनी स्टोरी को लेकर जितना गिरेगा उसकी टीआरपी उतनी ही बढ़ेगी। ये जुमला सालों से फिल्म सिटी में गूंजता रहा था लेकिन मजाक में। पहले वाले मित्र ने कहा कि यार तुम ज्यादा ज्ञान मत दो। हमें मालूम है कि चैनलों ने टीआरपी के लिए क्या क्या नहीं किया। आज जब तुम्हारे चैनल की टीआरपी कम हो गई है तो तुम स्टोरी का वर्गीकरण करने लगे। जिस चैनल में इन दिनों तुम काम कर रहे हो न उस चैनल को आसमान में साईं बाबा की आंख दिखाई दी थी और घंटों तक वो विजुअल चलता रहा था। जरा याद कर लो । 

हम तीन लोग चुपचाप खड़े होकर उन दोनों की बातें सुन रहे थे। दोनों की बातों में तल्खी बढ़ने लगी थी। बीच बचाव करने की गरज से हम तीन में से एक बोल पडा कि अरे जाने दो भाई, सभी चैनलों ने कभी न कभी, कुछ न कुछ ऐसा चलाया है जो न्यूज चैनल पर नहीं चलना चाहिए था। इतना सुनना था कि आपस में झगड़ रहा हमारा एक साथी उसके उपर ही बिफर गया। कहने लगा कि तुम भी इसके साथ हो गए और ज्ञान देने लगे। वो दिन भूल गए जब तुमने स्वर्ग में सीढ़ी लगाई थी। वो दिन भूल गए जब ‘एरिया 51’ और ‘बारमूडा ट्राइंगल’ जैसे टीआरपी बटोरनेवाले कार्यक्रम लिखा करते थे। बड़े शौक और अकड़ से कॉलर ऊंचा करके उस दौर में घूमा करते थे कि इस हफ्ते नौ बजे की हमारी टीआरपी सबसे अधिक रही। शांति से अपनी बात कह रहा हमारा वो मित्र अपने ऊपर हुए व्यक्तिगत हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाया। अब पलटवार करने की बारी उसकी थी। बोला तुम क्या कम हो, आज जहां काम कर रहे हो उस चैनल को देख लोग सबसे पहले तो तुम्हीं लोगों ने ये काम शुरू किया था। प्रिंस जब गड्ढे में गिरा था तो किसने गानेवालों को स्टूडियो में बुलाकर गाना गवाया था। किसने स्टूडियो में हवन और पूजन करवाया था। क्या न्यूज चैनल में ये सब बातें उचित थीं। जिस दिन प्रिंस गड्ढे में गिरा था, दरअसल उस दिन ही न्यूज भी गड्ढ़े में गिरा था। 

हमारा चौथा मित्र जो शांति से सारी बातें सुन रहा था, वो जरा वामपंथी मिजाज का था। बहस बढ़ने लगी तो उसने भी सोचा कि वो क्यों पीछे रहे। उसने कहा कि देखिए दरअसल हमको पूरी गंभीरता से और समग्रता में न्यूज चैनलों की इस समस्या का विश्लेषण करना चाहिए। हमें इस बात को भी रेखांकित करना चाहिए कि कब से न्यूज चैनलों पर खबरों से अलग हटकर कटेंट देने की शुरुआत हुई। वो कौन सी सामाजिक-राजनीति-आर्थिक परिस्थितियां थीं जिनमें उस दौर में चैनलों को इस तरह की चीजें दिखाने को मजबूर किया था। अब तीनों मिलकर उसपर टूट पड़े। ज्यादा समग्रता-वमग्रता की बातें मत करो, जरा सोचो कि न्यूज चैनलों पर आत्मा से बातें करवानेवाले कार्यक्रम क्यों चले थे। एक मुस्लिम महिला के पति के गायब होने के बाद जब उसकी शादी किसी और से हो गई थी और उसके बाद जब उसका पहला पति लौट आया था तो इस घटना का तमाशा क्यों बना था। क्यों सरेआम कैमरे के आगे पंचायत लगावकर निजी रिश्तों को तार तार किया गया था। जब न्यूज चैनलों पर मंदिर का रहस्य से लेकर बिना ड्राइवर की कार और नागिन का इंतकाम चलता था तब तो तुम खामोश रहते थे। अब सैद्धांतिक बातें कर रहे हो। अब सभी एक साथ बोलने लगे थे और मैं सोच रहा था कि यार गलत दिन अपने मित्रों से मिलने आ गया। 

बहस लंबी चलती देख नंदू ने दूसरी बार चाय भेज दी। सबने चाय ली तो मुझे लगा कि अब बात खत्म हो जाएगी, लेकिन उस मित्र ने फिर से बात छेड़ दी जिसके चैनल की टीआरपी इन दिनों बढ़ी हुई थी। उसने वामपंथी मित्र पर तंज कसा कि देखो यहां कोई दूध का धुला नहीं है, तुम्हारे जो आदर्श हैं न उनके चैनल ने ही सबसे पहले एंकरिंग का मजाक बनवाया। बंटी और बबली फिल्म रिलीज होनेवाली थी या हुई थी तो अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी से एंकरिंग करवाई थी। तब से ही एंकरिंग का तमाशा बनना शुरू हुआ। अब भड़कने की बारी वामपंथी मित्र की थी, वो तो शुरू हो गया और लगा नाम लेकर सबकी बखिया उधेड़ने। उस दौर के संपादकों को बुरा भला कहने। उसकी आवाज भी ऊंची होने लगी थी। बात बिगड़ती देख मैंने कहा कि अब हम सबको चलना चाहिए। एक ने कहा भड़ास सुनते जाओ। वामपंथी मित्र अपेक्षाकृत जल्दी शांत हो गए। सभी इस पर सहमत दिखे कि टीवी न्यूज चैनलों के आरंभिक दिनों में गलतियां हुईं। एक ने तो कह भी दिया कि ‘जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय’। अब मेरे चारों मित्र उन पुराने न्यूज चैनल संपादकों के ज्ञान देने से झुब्ध दिखे जिनके कार्यकाल में खबरों के नाम पर तमाशा हुआ करता था। एक मित्र ने कहा कि क्या ही अच्छा होता कि नैतिकता आदि के प्रश्न उठानेवाले उस दौर के संपादक पहले ये मानते कि उन्होंने गलतियां की थीं। कहते कि न्यूज चैनल अपने शैशवावस्था में थे, गलतियां हुईं। अब तो न्यूज चैनलों की आय़ु बीस साल से अधिक हो गई है, अब जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। ऐसा होता तो पुराने संपादकों के उपदेश में वजन भी आता अन्यथा ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली बात लगती है। मैंने अपने मित्रों से विदा ली। लौटते समय बहुत देर तक सोचता रहा कि इसका क्या हल है? कब कोई खड़ा होगा और कहेगा कि खबरों को खबर की तरह चलाएं और उसकी सुनी भी जाएगी। उत्तर नहीं मिल पाया। 

Saturday, September 5, 2020

प्रमाणन को समकालीन बनाने की दरकार


भारतीय वायुसेना की महिला पॉयलट गुंजन सक्सेना पर बनी फिल्म पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। रक्षा मंत्रालय और भारतीय वायुसेना ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने नहीं माना। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि फिल्म के रिलीज होने के पहले वो अदालत क्यों नहीं आए? अब तो फिल्म की स्ट्रीमिंग नेटफिल्क्स पर हो रही है, ऐसे में उसको बीच में रोकना ठीक नहीं होगा। कोर्ट ने इस केस को एक बेहद ही दिलचस्प मोड़ भी दे दिया है। उन्होंने इस केस में गुंजन सक्सेना को भी पार्टी बनाया और कहा कि कोर्ट उनसे सीधे जानना चाहेगी कि फिल्म पर जो आरोप लग रहे हैं वो सही हैं या गलत? दरअसल इस फिल्म पर आरोप है कि उसने वायुसेना के उस समय के माहौल को महिला विरोधी दिखाया है जिससे वायुसेना की छवि खराब हुई है। वायुसेना का तर्क है कि किसी युद्ध के नायक या नायिकी पर बनाई गई फिल्म को बहुत अधिक काल्पनिक नहीं बनाया जा सकता है, उसका नाटकीय स्वरूप भी पेश करना उचित नहीं होगा। इस फिल्म के निर्माता धर्मा प्रोडक्शंस के वकील हरीश साल्वे ने अदालत में कहा कि ये गुंजन सक्सेना की जिंदगी से प्रेरित है। मतलब कि पूरे तौर पर उनकी जिंदगी पर आधारित नहीं है। फिल्म के निर्माताओं पर ये भी आरोप है कि 2013 के रक्षा मंत्रालय के गाइडलाइंस के हिसाब से इस फिल्म को रिलीज करने के पहले रक्षा मंत्रालय की प्रीव्यू कमेटी को नहीं दिखाया गया। नेटफ्लिक्स ने दावा किया है कि फिल्म के रिलीज होने के पहले न केवल इसकी स्क्रिप्ट भारतीय वायुसेना को दी गई बल्कि इस वर्ष फरवरी में उनको फिल्म भी दिखाई गई थी। ये तो कानूनी दांवपेंच है जिसका निस्तारण अदालत से होगा। लेकिन इन कानूनी दावपेंच से कई प्रश्न उठ खड़े हुए हैं।

फिल्म गुंजन सक्सेना, द कारगिल गर्ल को नेटफिल्कस पर दिखाया जा रहा है। इस फिल्म का प्रदर्शन ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर बदली हुई परिस्थितियों में किया गया। कोरोना की वजह से सिनेमा हॉल के बंद होने की वजह से इसका प्रदर्शन ओटीटी पर हुआ अन्यथा ये सिनेमा हॉल में प्रदर्शित होती। सिनेमा हॉल में प्रदर्शन के लिए इस फिल्म ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया था। चूंकि ओटीटी पर फिल्मों के प्रसारण के लिए किसी भी तरह के प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है इस वजह से जब नेटफ्लिक्स पर बगैर प्रमाणपत्र दिखाए इसका प्रसारण हुआ। अगर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इस फिल्म को देखकर प्रमाणित किया तो फिर इसको लेकर आपत्ति कैसी? और अगर आपत्ति है तो सवाल उठता है कि क्या केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से इस फिल्म को प्रमाणित करने में चूक हुई? इस फिल्म को प्रमाणित करने के पहले रक्षा मंत्रालय 2013 के गाइडलाइंस का ध्यान रखा गया या नहीं। सवाल तो ये भी उठता है कि रक्षा मंत्रालय के जो दिशा निर्देश हैं वो केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड पर लागू होते हैं या नहीं? क्या केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड उन गाइडलाइंस को मानने के लिए बाध्य है, क्योंकि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड हमारे देश में फिल्म प्रमाणन की वैधानिक संस्था है और ये सिनेमेटोग्राफ एक्ट से संचालित होती है। संसद से पारित सिनेमेटोग्राफी एक्ट, 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया था। 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया । उसके बाद भी इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है। फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने आखिरी गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही अबतक काम चल रहा है । इक्यानवे के बाद से हमारा समाज काफी बदल गया । आर्थिक सुधारों की बयार और हाल के दिनों में इंटरनेट के फैलाव ने हमारे समाज में भी बहुत खुलापन ला दिया है। ओटीटी की बढ़ती लोकप्रियता ने फिल्मों के प्रदर्शन की पद्धति को ही बदल दिया है। बदले माहौल में जब हम करीब तीन दशक पुरानी गाइडलाइंस के आधार पर सर्टिफिकेट देंगे तो दिक्कतें तो पेश आएंगी ।

सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) के मुताबिक किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए। मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – सार्वजनिक शांति, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए। अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है। हम अगर इस तरफ न भी जाएं तो इस बात को लेकर विचार तो अवश्य होना चाहिए कि संसद के पारित किसी कानून को किसी मंत्रालय के गाइडलाइंस से संशोधित किया जा सकता है। रक्षा मंत्रालय 2013 के दिशा निर्देशों के मुताबिक अगर कोई फिल्म सेना पर बनाई जाती है तो उस प्रस्ताव को रक्षा मंत्रालय को भेजा जाना चाहिए। फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद सेना की प्रीव्यू कमेटी को दिखाया जाना चाहिए। इस समिति में रक्षा मंत्रालय और सेना के अधिकारी होते हैं। प्रीव्यू कमेटी से अनुमति मिलने के बाद फिल्म को रिलीज करने के पहले इसको रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव (सेना) की अनुमति भी चाहिए। फिल्म बनाने के पहले फिल्म निर्माताओं को ये जानकारी भी देनी होती है कि वो कब तक फिल्म की शूटिंग खत्म कर लेंगे और कब इसको रिलीज करेंगे। इसके अलावा फिल्म की संकल्पना, फिल्म बनाने का उद्देश्य और फिल्म की स्क्रिप्ट भी सेना को देने की अपेक्षा की गई है। इसके अलावा भी फिल्मकारों से ये अपेक्षा की गई है कि वो फिल्म रिलीज कॉपी भी भारतीय सेना का उपलब्ध करवाएंगें। फिल्म निर्माताओं को सेना से संबंधित फिल्म बनाने और सेना के क्षेत्र में शूटिंग करने के लिए बहुत विस्तार से फॉर्म आदि भी भरने के अलावा अन्य औपचारिकताओं का भी प्रावधान है।

अरुण जेटली जब सूचना और प्रसारण मंत्री थी तो उन्होंने श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में फिल्म प्रमाणन में सुधारों के लिए कमेटी बनाई थी। उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। बेनेगल कमेटी ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सेंसर बोर्ड के कामकाज के अलावा फिल्मों को दिए जानेवाले सर्टिफिकेट की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की थी। बेनेगल कमेटी ने सुझाव दिया था कि प्रमाणन बोर्ड सिर्फ फिल्मों के वर्गीकरण का काम करे। फिल्म को देखे और उसको किस तरह के यू, ए या फिर यूए सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए, इसका फैसला करे। बेनेगल कमेटी ने ये सिफारिश भी की थी कि फिल्मकार स्वयं बताए कि उनको अपनी फिल्म के लिए किस श्रेणी का प्रमाण पत्र चाहिए। लेकिन इस कमेटी की सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं। अब ओटीटी के बाद तो स्थितियां काफी बदल गई हैं और नए सिरे सिनेमैटोग्राफिक एक्ट में बदलाव की आवश्यकता महसूस हो रही है। इसमें सेना और उससे जुड़ी घटनाओं के चित्रण से लेकर अन्य सभी बिंदुओं पर विचार कर उसको एक्ट में शामिल करना चाहिए। ओटीटी पर दिखाए जानेवाले कटेंट को भी इसके दायरे में लाने पर विचार किया जा सकता है। अगर ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के प्रमाणन की जिम्मेदारी भी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को दी जाती है तो इसके लिए बोर्ड को अपने संसाधन बढ़ाने होंगे ताकि फिल्म और वेब सीरीज निर्माताओं को मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़े। 

Monday, August 31, 2020

किताबों से झांकती राजनीति

जुलाई 1969 में राज्यसभा की सबसे पीछे वाली सीट पर बैठने वाले प्रणब मुखर्जी जब जुलाई 2012 में देश के प्रथम नागरिक बने तब उन्होंने सक्रिय राजनीति को अलविदा कहा। राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी ने अपनी यादों को संजोना शुरू किया था। प्रणब मुखर्जी के बारे में कहा जाता है कि उनकी याददाश्त हाथी के जैसी थी। वो जिस घटना के साक्षी बनते थे वो उनको याद रहता था, वो जिस कागज को एक बार देख लेते थे वो उनके मस्तिष्क पर छप जाता था। प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीति दौर को तीन पुस्तकों में समेटा, ‘द ड्रामैटिक डिकेड:द इंदिरा गांधी इयर्स’, ‘द टर्बुलेन्ट इयर्स’ और ‘द कोएलीशन इयर्स’। पहली किताब में प्रणब मुखर्जी ने इंदिरा गांधी के दौर के कांग्रेस की राजनीति का सूक्ष्मता से विवरण दिया। 1971 में पाकिस्तान से युद्ध जीतने वाली नायिका किस तरह से चार साल में ही देश में इमरजेंसी लगाने को मजबूर होती हैं, इसके कारण भी गिनाए। प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में सिद्धार्थ शंकर रे को परोक्ष रूप से आपातकाल लगाने के लिए पृष्ठभूमि बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया।

अपनी दूसरी किताब द टर्बुलेंट इयर्स में उन्होंने 1980 से लेकर 1996 की भारतीय राजनीति का विवरण दिया। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके बुरे दिन शुरू हो गए थे। यहां उन्होंने एक दिलचस्प टिप्पणी की है कि वो पार्टी और सरकार के काम में इतने व्यस्त हो गए थे कि काम लगानेवाले पर नजर नहीं रख सके थे। जितना जरूरी काम करना है उतना ही अहम काम लगानेवालों पर नजर रखना है।तीनों पुस्तकों में प्रणब मुखर्जी ने बहुत ही शास्त्रीय ढंग से राजनीतिक घटनाक्रम का विवरण पेश किया है, विवादों से दूर । तीसरी किताब द कोएलीशन इयर्स में उन्होंने कांची के शंकराचार्य की गिरफ्तारी के प्रसंग पर कैबिनेट की चर्चा का वर्णन किया है वो भी सपाट। लिखा कि ‘कैबिनेट की बैठक में शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती की गिरफ्तारी की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए गुस्सा हो गया और पूछा कि इस देश में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ हिंदुओं के लिए ही है, किसी की हिम्मत है कि वो ईद के समय किसी मुस्लिम धर्मगुरू को गिरफ्तार कर ले?’ इसके बाद फौरन शंकराचार्य की रिहाई के आदेश हो गए। इस तरह के प्रसंग बहुत कम हैं लेकिन कांग्रेस के संविधान, कांग्रेस कार्यसमिति के नियम और अधिकार से लेकर संसदीय नियामवलियों का कब कैसे उपयोग हुआ है उसकी विस्तार से जानकारी है। यह अकारण नहीं था कि जब उनका राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्होंने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दिया तो उस वक्त 97 मंत्रिमंडलीय समूह के अध्यक्ष थे।    

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ढकोसला


दिल्ली दंगों पर लिखी किताब ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन रोकने के प्रकाशक ब्लूम्सबरी के फैसले को लेकर वामपंथी लेखक-पत्रकार या कलाकार आदि बेहद खुश नजर आ रहे थे। उनको लग रहा था कि मोनिका अरोड़ा, सोनाली चीतलकर और प्रेरणा मल्होत्रा की इस किताब का प्रकाशन ब्लूम्सबरी प्रकाशन से रुकवाकर उन्होंने बड़ा तीर मार लिया है। लेकिन वो यह भूल गए कि ये भारत भूमि है जहां शब्दकोश में विकल्पहीनता शब्द नहीं है। ब्लूम्सबरी के प्रकाशन से इंकार के फौरन बाद गरुड़ प्रकाशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने की घोषणा करते हुए प्री बुकिंग शुरू कर दी। पाठकों का इतना प्यार मिला कि एकबार तो गरुड़ प्रकाशन की वेबसाइट ही क्रैश कर गई। प्रकाशक के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी को बंपर ओपनिंग मिली और चंद घंटों में ही 15000 प्रतियों की प्री बुकिंग हो गई। यह तो खैर इसकी लोकप्रियता का एक पक्ष है। लेकिन इस पूरी घटना से वामपंथी बौद्धिकों का खोखलापन उजागर हो गया। वामपंथ के ये झंडाबरदार लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर छाती कूटते रहते हैं। हर छोटी बड़ी घटना पर उनको लगता है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है और उनको जब ये लगता है तो सोशल मीडिया पर हाथों में तख्ती लेकर फोटो लगाने लगते हैं। इस बार जब उन्होंने दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी को रोकने के लिए अभियान चलाया तो वो ये भूल गए कि इस अभियान से उनकी खुद की पोल खुलने वाली है, उनका दुचित्तापन उजाहर होनेवाले है, उनके चेहरे पर लगा मुखौटा तार-तार होनेवाला है। जब वो इस किताब को रोक कर जश्न मनाने में लगे थे तो वो कुछ सालों पहले का एक वाकया भूल गए थे। भूल तो ये भी गए थे कि उस वक्त उन्होंने क्या क्या कहा था। वामपंथियों की स्मरण शक्ति कमजोर होती है लेकिन वो इतनी कमजोर होती है इसका अंदाजा नहीं था। ज्यादा समय नहीं बीते हैं छह साल पहले की ही बात है। हिंदू धर्म पर कई किताब लिखनेवाली लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब- द हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री को पेंग्विन बुक्स ने भारतीय बाजार से वापस लेने और छपी हुई अनबिकी प्रतियों को नष्ट करने का फैसला लिया । यह फैसला अदालत में उस किताब पर चल रहे केस के मद्देनजर याची के साथ समझौते के बाद हुआ । दरअसल दिल्ली की एक संस्था को इस किताब के कुछ अंशों पर आपत्ति थी और उस संगठन से जुड़े दीनानाथ बत्रा ने दो हजार ग्यारह में इस किताब के कुछ अंशों को हिंदुओं की भावनाएं भड़काने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था। किताब के खिलाफ याचिका दायर होने के तीन साल बाद आउट ऑफ द कोर्ट एक समझौता हुआ जिसके तहत किताब को वापस लेने का फैसला हुआ । दीनानाथ बत्रा ने पुस्तक को पढ़ने के बाद उसपर अपनी आपत्ति जताई थी। वामपंथियों की तरह नहीं कि बगैर ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ को पढ़े उसके खिलाफ नारे लगाने लगे या षड़यंत्र करने लगे।

वेंडि डोनिगर की पुस्तक छपने के बाद से ही उसपर विवाद शुरू हो गया था, अमेरिका में इसको खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ, लंदन में तो लेखिका पर अंडे तक फेंके गए थे। तब पेंग्विन के फैसले के बाद कुछ लोग इसको अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करार देने लगे थे। कुछ वामपंथियों ने इसको हिंदू संगठनों की कथित फासीवादी मानसिकता करार दिया था। सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों को हिंदू संगठनों पर हमलावर होने का बहाना चाहिए होता है। पेंग्विन के उस फैसले में भी उनको संभावना नजर आई थी और वो फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने लगे थे। तब भी मैंने सवाल उठाया था कि वर्ष दो हजार नौ में किताब छपी उसके पांच साल बाद इस किताब को वापस लेने का फैसला प्रकाशक ने लिया। इसमे फासीवाद कहां से आ गया था । क्या शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताना और संविधान से प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करना फासीवाद है? यह तो वैश्विक ट्रेंड है कि अगर किसी किताब पर या उसके अंश पर आपत्ति हो तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है। वेंडि डोनिगर की पुस्तक के खिलाफ भी याचिकाकर्ता ने भी भारतीय संविधान के तहत मिले अपने नागरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए कोर्ट में केस किया था । अदालत में मुकदमा चल ही रहा था कि दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया था।


प्रकाशक के उस फैसले के बाद लेखकों के एक बड़े समुदाय में इस बात को लेकर खासी निराशा का प्रदर्शन हुआ था।  विवादास्पद लेखिका अरुंधति राय से लेकर पत्रकार और लेखक सिद्धार्थ वरदराजन आदि भी उस वक्त विवाद में कूदे थे। सिद्धार्थ ने तो पेंग्विन से अपनी किताबों को नष्ट करने और क़ापीराइट वापस करने की मांग भी की थी। सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने पत्र में साफ लिखा था कि उन्हें अब पेंग्विन पर भरोसा नहीं रह गया, लिहाजा वो गुजरात दंगों पर लिखी गई उनकी किताब- दे मेकिंग ऑफ अ ट्रेजडी- के अधिकार वापस कर दें । सिद्धार्थ वरदराजन ने तब कहा था कि ‘अगर किसी समूह की भावना इस किताब से आहत हो जाती है और वो भारतीय दंड विधान की धारा 295 के तहत केस कर देता है, तो संभव है कि पेंग्विन उनकी किताब को भी वापस लेने का फैसला कर दे’। पता नहीं उनकी पुस्तकें नष्ट की गई या नहीं लेकिन अब भी सिद्धार्थ वरदराजन की ये किताब पेंग्विन बेच रहा है। ये है इनका विरोध। समय पर घोषणा करो, प्रचार हासिल करो और फिर भूल जाओ। ये है मार्क्सवाद का अर्धसत्य। वामपंथियों का झूठ का प्रचार एक बार होकर रुकता नहीं है वो सतत चलता रहता है। वेंडि डोनिगर के मसले के दो साल बाद पीईएन इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट पेश की थी, इमपोजिंग साइलेंस, द यूज ऑफ इंडियाज लॉज टू सप्रेस फ्री स्पीच। पेन कनाडा, पेन इंडिया और यूनिवर्सिटी ऑफ टोरेंटो के फैकल्टी ऑफ लॉ ने संयुक्त रूप से इस अध्ययन को करने का दावा किया था। पेन इंटरनेशनल कवियों, लेखकों और उपन्यासकारों की एक वैश्विक संस्था, जिसका दावा है कि वो पूरी दुनिया में साहित्य और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए काम करती है। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर स्थिति बेहद विकट है । उस रिपोर्ट की आरंभिक पंक्तियों से ही शोधकर्ताओं के मंसूबे साफ दिखे थे– भारत में इन दिनों असहमत होनेवालों को खामोश कर देना बहुत आसान है...दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ये स्थिति बेहद शर्मनाक है। भारत में धर्म पर लिखना मुश्किल होता जा रहा है।‘ इस संबध में वेंडी डोनिगर की ही किताब का उदाहरण दिया गया था। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पेन इंटरनेशनल की रिपोर्ट में ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने का जिक्र होता है या नहीं। वो इस तरह का शोध प्रस्तुत करते भी हैं या नहीं। अगर इनकी की रिपोर्ट में एक पुस्तक के प्रकाशन को रोकने की इन चालों का जिक्र नहीं होता है तो इनकी साख पर बड़ा सवालिया निशान लगेगा। दरअसल ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन का ब्लूम्सबरी ने प्रकाशन नहीं होने देना एक प्रकार की साहित्यिक माफियागीरी भी है। जिस तरह से पाकिस्तानी पिता की संतान लेखक आतिश तासीर ने ब्रिटेन के लेखक विलियम डेलरिंपल को ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ के प्रकाशन को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से बधाई दी उससे भारत के खिलाफ अंतराष्ट्रीय साजिश के भी संकेत मिलते हैं। ‘दिल्ली रॉयट्स 2020, द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोका जाना कोई साधारण घटना नहीं है बल्कि इसके दूरगामी असर होंगे। 

Saturday, August 29, 2020

भारतीय भाषाओं की बढ़ेगी ताकत


भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी, जिसमें हर भाषा के श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं की सरल किंतु सटीक शब्द भंडार तैयार किया जा सके, तथा निमित रूप से नवीन शब्दकोश जारी किया जा सके (विश्व में कई भाषाओं अन्य कई भाषाओं के सफल प्रयोग सदृश)। इन शब्दकोशों के निर्माण के लिए ये अकादमियां एक दूसरे से परामर्श लेंगी, कुछ मामलों में आम जनता के सर्वश्रेष्ठ सुझावों को भी लेंगी। जब संभव हो, साझे शब्दों को अंगीकृत करने का प्रयास भी किया जाएगा। ये शब्दकोश व्यापक रूप से प्रसारित किए जाएंगे ताकि शिक्षा, पत्रकारिता, लेखन, बातचीत आदि में इस्तेमाल किया जा सके एवं किताब के रूप में तथा ऑनलाइन उपलब्ध हों। अनुसूची आठ की भाषाओं के लिए इन अकादमियों को केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ परामर्श करके अथवा उनके साथ मिलकर स्थापित किया जाएगा। इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र अथवा/और राज्य सरकारों द्वार स्थापित की जाएगी।‘ यह कहा गया है राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बिन्दु संख्या 22.18 में। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में यह एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। हमारे देश में सक्रिय भाषा अकादमियों की आवश्यकता है और ये उस आवश्कता पूर्ति की दिशा में उठाया गया एक कदम साबित हो सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के बाद इसका देशव्यापी असर होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषा अकादमियों के बनाने के प्रस्ताव पर विचार करें तो यह बहुत ही व्यावहारिक विचार लगता है। इस तरह की बात पहले भी हो चुकी है जब 1948 में राधाकृष्णन कमीशन ने भी कुछ इसी तरह का प्रस्ताव दिया था। राजभाषा आयोग के सुझावों में भी भाषा अकादमियों की बात की गई थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी सितंबर 1959 में राज्यसभा में दिए अपने भाषण में भी कहा था कि ‘मुझे इस बात की नितांत आवश्कता दिखती है कि हिंदी समेत भारत की भाषाओं की एक नेशनल अकादमी बना दी जाए और उसका प्रधान कार्यालय हैदराबाद में रखा जाए। इस अकादमी के जरिए हम प्रत्येक भाषा-क्षेत्र में वहां की भाषा को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। इस अकादमी के जरिए हम प्रत्येक भाषा क्षेत्र में द्विभाषी, त्रिभाषी विद्वान तैयार कर सकते हैं और भाषाओं के भीतर भावात्मक एकता लाने के लिए सभी उपायों को काम में ला सकते हैं।‘ कई बार भाषाओं के नेशनल अकादमी की बात होती है तो लोग कहते हैं कि साहित्य अकादमी है तो, लेकिन भ्रमित नहीं होना चाहिए। साहित्य अकादमी तो भारतीय भाषाओं में रचे साहित्य के लिए है भाषा के लिए नहीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषा को लेकर बहुत महत्वाकांक्षी बातें की गई हैं तो उम्मीद की जा सकती है कि कुछ ठोस भी होगा। हलांकि भाषाई अकादमियों की स्थापना को लेकर चुनौतियां बहुत अधिक हैं।

चुनौतियां इस वजह से कि स्वतंत्रता के बाद देशभर में भाषा को लेकर कई तरह के संस्थान केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर बनाए गए। कई राज्यों में अलग अलग-अलग भाषाओं को लेकर अकादमियां हैं। उत्तर प्रदेश को ही लें तो वहां आठ भाषाई अकादमियां और संस्थान कार्य कर रहे हैं। जिनमें हिंदी, संस्कृत, उर्दू, सिंधी, पंजाबी, हिंन्दुस्तानी भाषाओं की अकादमियां हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में एक भाषा संस्थान भी है जिसका उद्देश्य ‘भारतीय भाषाओं और उसके साहित्य का अभिवर्धऩ है।‘ इस तरह से बिहार में मैथिली, अंगिका, भोजपुरी और मगही को लेकर भाषाई अकादमियां हैं। बिहार के इन अकादमियों की हालत पर किसी प्रकार की टिप्पणी करना व्यर्थ है। बिहार के भाषाई संस्थान संसाधनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके पा न तो अपेक्षित कर्मचारी हैं न ही धन। राजस्थान में भी आधा दर्जन भाषाई अकादमियां कार्य कर रही हैं, जिनमें राजस्थान साहित्य अकादमी, भाषा और संस्कृति अकादमी,संस्कृत अकादमी,उर्दू अकादमी, सिंधी अकादमी,पंजाबी अकादमी प्रमुख हैं। यहां क्या काम हो रहा है इसके बारे में जानना भी दिलचस्प होगा। राजस्थान में जो सबसे महत्वपूर्ण काम हुआ वो सीताराम लालस ने किया जिन्होंने दस खंडों में राजस्थानी का पहला शब्दकोश बनाया। सीताराम लालस मशहूर कोशकार और भाषाकर्मी थे। उसके बाद छिटपुट काम हुए। दिल्ली की हिंदी अकादमी भी आयोजनों में ही व्यस्त रहती है और अगर उससे समय मिलता है तो साहित्य पर काम होने लगता है। इन भाषाई अकादमियों में जो गड़बड़ियां हुईं वो इनके कर्ताधर्ताओं ने ही कीं। उन्होंने भाषा और साहित्य का घालमेल कर दिया। जिन संस्थाओं को काम भाषा को मजबूत करना और भाषा के क्षेत्र में नवाचार करना था वो साहित्य सेवा में जुट गए। साहित्यिक पत्रिकाएं निकालने लगे, साहित्य उत्सव होने लगे जिसमें भाषा से अधिक साहित्य के प्रश्नों पर चर्चा होने लगी। इससे भाषा के क्षेत्र में काम नहीं या बहुत कम हो सका। साहित्यिक कृतियों पर पुरस्कार देने लगे। इसके अलावा इन संस्थाओं में योग्य व्यक्तियों की नियुक्तियां भी बहुत कम हुईं। भाषाई अकादमियों के नाम पर कांग्रेस शासनकाल में जिन संस्थाओं का गठन किया गया उनमें से ज्यादातर अपने समर्थकों को फिट करने की मंशा थी, कागज पर लिखित उद्देश्य चाहे कुछ भी रहा हो।

केंद्रीय स्तर भी भाषा के संवर्धन के कई संस्थान हैं। मैसूर स्थित भारतीय भाषा संस्थान अपनी स्थापना के पचास साल पूरे कर चुका है। इस संस्थान की स्थापना भारतीय भाषाओं के विकास को समन्वित करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से भारतीय भाषाओं की मूलभूत एकता लाने के लिए की गई थी। मैसूर स्थित इस संस्थान ने अबतक अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्या किया इसपर विचार करना चाहिए। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए भी अलग अलग संस्थान हैं। तमिल के लिए चेन्नई स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल है। हिंदी के लिए तो दिल्ली में केंद्रीय हिंदी निदेशालय है, आगरा में केंद्रीय हिंदी संस्थान हैं। उर्दू और सिंधी के लिए केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद हैं। इस तरह के दर्जनों संस्थान देशभर में हैं। जरूरत है कि इन सभी संस्थानों के क्रियाकलापों पर विचार किया जाए और इन सारी संस्थाओं को एक केंद्रीय स्वरूप प्रदान किया जाए। एक ही भाषा के लिए जो अलग अलग संस्थाएं काम कर रही हैं और जिनके कामों के बीच दोहराव है उनका पुनर्गठन किया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भाषा संस्थाओं का पुनर्गठन बेहद आवश्यक है। भाषा अकादमियों के साथ-साथ जरूरत इस बात की भी है कि एक ऐसे केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए जहां सभी भारतीय भाषाएं और उसकी उपभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन पर काम किया जा सके। यह एक ऐसा उपक्रम होगा जिसमें एक ही परिसर में सभी भारतीय भाषाओं के विद्वान, शोधार्थी और छात्र उपस्थित रहेगें। इसका लाभ यह होगा कि भाषाओं के बीच समन्वय बढ़ेगा, एक दूसरे की भाषा के महत्वपूर्ण गुणों और शब्दों को जानने का अवसर भी मिलेगा। दो तीन वर्ष पूर्व भारतीय भाषाओं के विश्वविद्लाय की स्थापना को लेकर एक एक गंभीर कोशिश हुई थी लेकिन पता नहीं मंत्रालय या सरकारी फाइलों में वो कोशिश कहां गुम हो गई। अब जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की बात हो रही है तो जरूरत है कि भारतीय भाषा के विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रस्ताव को भी निकालकर फैसला करना चाहिए। अगर ऐसा हो पाता है तो सचमुच आजादी के बाद भारतीय भाषाओं को मजबूती प्रदान करने की एक गंभीर कोशिश होगी जिसका परिणाम देश को मजबूक करेगा, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा।      

Saturday, August 22, 2020

निष्पक्षता की आड़ में कुंठा- प्रदर्शन

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर हिंदी फिल्मों की दुनिया लगातार चर्चा में है। फिल्मी दुनिया के दांव पेंच, सितारों की निजी जिंदगी तक की बातें सामने आ रही हैं। फिल्मी सितारों के बीच के अंतरंग मैसेज भी सार्वजनिक होकर चर्चित हो रहे हैं। फिल्मों से जुड़े लोग इस या उस पक्ष में होने के संकेत अपने बयानों से दे रहे हैं। कुछ लोग बयानों से अपनी कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन भी कर रहे हैं। इसी तरह का एक बयान ताजा-ताजा बयानवीर बने नसीरुद्दीन शाह ने भी दिया। उन्होंने इशारों में कंगना रनौत को अर्धशिक्षित कह डाला। एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार में नसीरुद्दीन ने कहा कि उनका भारत की कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली में विश्वास है और कोई भी व्यक्ति किसी अर्धशिक्षित सितारे की राय जानने में रुचि नहीं रखता है। नसीरुद्दीन शाह के इस बयान पर कंगना ने सवाल खड़ा किया और पूछा कि क्या नसीर यही बात प्रकाश पादुकोण या अनिल कपूर की बेटी के लिए कह सकते हैं। यह एक अलग लेकिन वैध मुद्दा है जो कंगना उठा रही है, पहले भी वो इस तरह के मुद्दे पर मुखर रही हैं। नसीरुद्दीन शाह का किसी को भी अर्धशिक्षित कहना यह बताने के लिए काफी है कि वो अहंकार की ऊंची मीनार पर खड़े होकर दूसरों को हेय दृष्टि से देख रहे हैं। पिछले साल भी जब नागरिकता संशोधन कानून को लेकर उनसे सवाल जवाब हुआ था तब भी उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर निहायत ही व्यक्तिगत आक्षेप किया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री कभी छात्र रहे नहीं इसलिए वो छात्रों की बात नहीं समझ सकते हैं या उनके मन में छात्रों के लिए करुणा नहीं है। वो मानते हैं कि मौजूदा हुकूमत में कोई भी बुद्धिजीवी नहीं है, लिहाजा वो बुद्धिजीवियों की महत्ता को नहीं समझ सकते है। कहते हैं न कि लोग जोश में होश खो बैठते हैं या क्रोध विवेक को हर लेता है, नसीर भी इसके शिकार हैं। वो तो प्रधानमंत्री की डिग्री तक देखने की ख्वाहिश जताने लगे थे और अपने को हिंदी फिल्मों के मानसिक रूप से विपन्न एक निर्देशक की इच्छा के साथ जोड़ रहे थे। यह उस व्यक्ति का अहंकार ही बोल रहा था। 

पिछले कुछ सालों से नसीर इस बात की सफाई भी देने लगे हैं कि वो ये बात एक मुसलमान के तौर पर नहीं कह रहे हैं। इतना कहने के बाद वो अपनी भड़ास निकालने लगते हैं, वैसी भड़ास जिसमें तथ्य कम अहंकार अधिक रहता है। दरअसल नसीर जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये हुई कि उनकी फिल्मों में उनके अभिनय को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो गईं कि वो खुद को बहुत ही ऊंचे पायदान पर देखने लगे। दरअसल 1970 में जब समांतर या कला फिल्मों की शुरुआत हुई तो उसमें काम करनेवाले अभिनेता अभिनेत्री को पता नहीं किस वजह से बुद्धिजीवी भी मान लिया गया। नसीर भी उनमें से एक हैं। फिल्मों से हटकर जब भी नसीर बात करते हैं तो उनकी बातें फूहड़ और चालू लगती हैं। वो वही बातें करते हैं जिनका आधार सोशल मीडिया पर चलनेवाली आधारहीन और तथ्यहीन बातें होती हैं। आपको यकीन न हो तो नागरिकता संशोधन कानून या अन्य मसलों पर उनका साक्षात्कार देख लें। वास्तविकता सामने आ जाएगी। 

नसीरुद्दीन शाह की ही तरह एक शायर हैं नाम है मुनव्वर राना। अभी राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उन्होंने अपनी कुंठा सार्वजनिक कर दी और कहा कि अदालतों में तो फैसले होते हैं, इंसाफ नहीं। जबकि राम मंदिर के मामले पर तो इंसाफ की जरूरत थी। सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर पर दिए फैसले से वो इतने कुपित थे कि उन्होंने फैसला सुनानेवाले खंडपीठ में शामिल सुप्रीम कोर्ट के उस वक्त के चीफ जस्टिस रंजन गगोई पर बेहद संगीन इल्जाम लगा दिए। उन्होंने कहा कि रंजन गगोई बिक गए। जैसा कि उपर कहा गया कि बहुधा क्रोध विवेक को हर लेता है वहीं मुनव्वर राना के मामले में भी हुआ और वो एक ऐसी बात बोल गए जो उनकी सामंती मानसिकता को भी उजागर कर गया। उन्होंने कहा कि वो तो इतने में बिक गए जितने में तवायफें नहीं बिकतीं। मुनव्वर राना का ये निहायत ही घटिया बयान है, जिसकी भर्त्सना होनी चाहिए थी। जो लोग महिला अधिकारों की बातें करते हैं वो खामोश रहे, हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श का झंडा लहरानेवाली लेखिकाएं भी इस मसले पर आश्चर्यजनक रूप से खामोश रहीं। मुनव्वर राना के इस बयान में एक खास चीज जो रेखांकित की जानी चाहिए वो ये कि जब वो राम मंदिर के फैसले पर बोल रहे थे तो उन्होंने भी ये कहा कि वो खरा-खरा बोलते हैं जिससे हिंदू भी नाराज होते हैं और मुसलमान भी। परोक्ष रूप से वो ये कहना चाह रहे थे कि वो जो कह रहे हैं वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं कह रहे हैं बल्कि उनकी आवाज को एक स्वतंत्र आवाज समझी जानी चाहिए। यही बात नसीरुद्दीन शाह भी कहते हैं कि वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोल रहे हैं। 

एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोलने का दावा करने की बात को रेखांकित करते हुए अगर विश्लेषित करें तो पाते हैं कि इन दिनों ये बात आम हो गई है। कुछ कहने के पहले ये डिस्क्लेमर जरूर दिया जाता है। बावजूद इस पूर्वकथन के इनकी बातों से जो ध्वनित होता है वो यही है कि वो पक्के तौर पर एक मुसलमान होने के नाते ही ऐसी बातें कर रहे हैं, चाहे वो नसीरुद्दीन शाह हों या मुनव्वर राना या फिर दस साल तक देश के उप राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी। और अगर एक मुसलमान होने के तौर पर ये बातें कह भी रहे हैं तो उसमे हर्ज क्या है। ये देश स्वतंत्र देश है और हर किसी को चाहे वो किसी भी मजहब या धर्म का हो उसको अपनी बात कहने का अधिकार है। दरअसल ये मौजूदा हुकूमत की आलोचना करने के पहले ये जताना चाहते हैं कि वो निष्पक्ष होकर अपनी बात कह रहे हैं। पर इनकी मुखरता इनके इस दावे की पोल खोल देता है। हाल के दिनों में नसीरुद्दीन शाह को अपने बेटों को लेकर डर लगता है, लेकिन नसीरुद्दीन शाह को तब डर नहीं लगा था जब मुंबई में बम धमाके हुए थे, उनको तब भी डर नहीं लगा था जब यूपीए के शासनकाल में नियमित अंतराल पर देश के इलग अलग शहरों में बम धमाके हो रहे थे। तब उनकी बेबाकी को लकवा मार गया था। दरअसल अगर नसीर और राना जैसे लोगों के वक्तव्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें तो ये साफ तौर पर लगता है कि वो इस बात से आहत हैं कि इस देश का बहुसंख्यक अब अपनी बात मजबूती से रखने लगा है। बहुसंख्यकों की बात को और उनकी भावनाओं का सरकार सम्मान करने लगी है। बहुसंख्यकों के अपने हिस्से की बात करना उनको सांप्रदायिकता लगता है। यही मानसिकता उनसे ये कहवाती है कि वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोल रहे हैं। इसके अलावा ये लोग जिस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि वो मोदी सरकार के तीन तलाक खत्म करने से लेकर संविधान के अस्थायी अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले से भी खफा हैं। इसी को लेकर अपनी नाराजगी का प्रदर्शन वो कभी मोदी पर भड़ास निकालकर करते हैं तो कभी उनके मंत्रियों पर। पर इससे साख न तो मोदी की खराब होती है न उनके मंत्रियों की, बल्कि प्रतिष्ठा कम होती है नसीर और राना जैसों की। 

Saturday, August 15, 2020

प्रमाणन से मुक्त होती फिल्में

फिल्म ‘गुंजन सक्सेना, द कारगिल गर्ल’ की प्रशंसा हो रही है। ये फिल्म भारतीय वायुसेना की पहली महिला हेलीकॉप्टर पॉयलट गुंजन सक्सेना के जीवन पर आधारित है। फिल्म में सितारों के अभिनय आदि पर बात हो ही रही थी कि भारतीय वायुसेना ने इस फिल्म के कई दृष्यों और संवादों को लेकर आपत्ति जता दी। वायुसेना ने अपनी आपत्तियों को लेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को एक पत्र भी लिखा जिसमें साफ तौर पर फिल्म में वायुसेना की नकारात्मक छवि पेश करने के आरोप का उल्लेख किया गया है। इस पत्र को नेटफ्लिक्स और धर्मा प्रोडक्शन को भी भेजा गया है। धर्मा ने इस फिल्म को बनाया है और नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित की गई। इस फिल्म में गुंजन सक्सेना जब उधमपुर एयरबेस पर पहुंचती हैं तो उनको कदम दर कदम इस बात का एहसास होता या कराया जाता है कि वो महिला हैं, कई बार प्रत्यक्ष तो कई बार परोक्ष रूप से। उधमपुर एयरबेस में गुंजन सक्सेना के रहने के दौरान की घटनाओं और स्थितियों के फिल्म में चित्रण पर वायुसेना को आपत्ति होगी। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस विवाद पर टिप्पणी की। इसके पहले भी सेना और सैनिकों के चित्रण को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। मुकदमे भी हुए। इन विवादों को देखते हुए 27 जुलाई 2020 को रक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को एक पत्र लिखा। इस पत्र में रक्षा मंत्रालय ने बोर्ड को लिखा है कि उनकी जानकारी में ऐसी बातें आई हैं कि कुछ फिल्मों और वेब सीरीज में सेना की नकारात्मक छवि दिखाई पेश की जा रही है। इसलिए रक्षा मंत्रालय को ये अपेक्षा है कि फिल्मों और वेब सीरीज के निर्माताओं को सलाह दें कि वो अपनी फिल्मों या वेब सीरीज में सेना के बारे में दिखाने के पहले रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र लें। उनको ये सलाह देने की अपेक्षा भी की गई कि सेना की नकारात्मक छवि दिखाने से बचें। सेना ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पत्र लिखकर अपनी अपेक्षाएं साझा कर लीं लेकिन रक्षा मंत्रालय से एक चूक हो गई।

रक्षा मंत्रालय से सक्षम अधिकारियों को ये पता होना चाहिए था कि वेब सीरीज या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाने वाली फिल्में या अन्य सामग्रियां केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में नहीं आती हैं। इस पत्र का कोई अर्थ है भी नहीं। 27 जुलाई को रक्षा मंत्रालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पत्र लिखा और 12 अगस्त को गुंजन सक्सेना को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई जिसके कुछ दृश्यों पर भारतीय वायुसेना को आपत्ति है। इस फिल्म पर भारतीय वायुसेना की आपत्तियों के विश्लेषण से दो बातें सामने आती हैं, पहली तो ये कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने रक्षा मंत्रालय की अपेक्षा के अनुसार सभी फिल्म और वेब सीरीज प्रोड्यूसर्स को सलाह नहीं दी कि वो सेना या वायुसेना या नौसेना के बारे में किसी भी तरह के कटेंट को सार्वजनिक करने से पहले अनापत्ति प्रमाण पत्र लें। दूसरी बात ये हो सकती है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने सलाह दी हो लेकिन निर्माताओं को ये आवश्यक नहीं लगा हो क्योंकि ऐसा कोई कानून तो है नहीं। ओटीटी पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों को इस बात के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है कि वो भारतीय सेना के बारे में कुछ भी दिखाने के पहले सक्षम अधिकारियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र लें। कोविड की वजह से सिनेमाघर बंद हैं और तमाम फिल्मों का प्रदर्शन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हो रहा है। ऐसे में तो इन फिल्मों के लिए भी किसी प्रकार की प्रमाणन की कोई आवश्यकता रही नहीं। फिल्म प्रमाणन बोर्ड तो उन फिल्मों को प्रमाणित करता है जिनका सामूहिक प्रदर्शन होना होता है चाहे वो सिनेमाघरों में हो या फिर किसी फिल्म फेस्टिवल में। फिल्मों का अगर सार्वजनिक और सामूहिक प्रदर्शन होना होता है तो रक्षा मंत्रालय या भारतीय सेना को उसके रिलीज से पहले देखने का अधिकार है। रक्षा मंत्रालय को अगर कोई शिकायत हो तो उसको इलेक्ट्रानिक और प्रोद्योगिकी मंत्रालय को लिखना चाहिए था।

इस पूरे प्रकरण से एक बार फिर से स्पष्ट होता है कि ओटीटी पर चलनेवाले कंटेंट को लेकर नियमन की आवश्यकता है। कोरोना काल में ओटी प्लेटफॉर्म मनोरंजन का एक अनिवार्य अंग हो गया है। सिनेमा हॉल के खुलने की अनिश्चितता के बीच इस माध्यम की अनिवार्यता स्थायित्व लेती नजर आ रही है। सभी बड़े बजट की फिल्में यहां रिलीज हो रही हैं। इस उपक्रम का आकार भी दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इस स्तंभ में पहले भी कई बार संकेत दिया जा चुका है कि मुनाफे के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाए जानेवाले कंटेंट में मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़ी जा रही हैं। अश्लीलता और मनोरंजन का भेद मिट सा गया है। अभी हाल ही में आए आंकड़ों ने इस बात की पुष्टि भी की है। एक वेब सीरीज है जिसका नाम है मस्तराम। एक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक इस वेब सीरीज को तीन जुलाई को एक दिन में एक करोड़ दस लाख से अधिक दर्शकों ने देखा। इसके मुताबिक इसको उस दिन तक छत्तीस करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। ये वेब सीरीज तमिल, तेलुगू और हिंदी में उपलब्ध है और ये संख्या इन तीन भाषाओं के दर्शकों को मिलाकर है। निर्माता इस वेब सीरीज को भले ही वयस्क की श्रेणी में डालकर पेश कर रहे हों लेकिन ये है तो अश्लील ही। मस्तराम के नाम से कुछ वर्षों पूर्व पीली पन्नी में लपेटकर इरोटिक पुस्तकें बेची जाती थीं लेकिन अब ये खेल खुलकर चल रहा है। कहीं न कहीं दर्शक संख्या मुनाफे से जुड़ता है।

एक और आंकड़े पर गौर करना चाहिए। मैंने एक दिन नेटफ्लिक्स के कस्टमर केयर पर फोन किया तो बातों बातों में कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव ने बताया कि कोरोना काल में पिछले तीन महीनों में नेटफ्लिक्स के डेढ करोड़ एप डाउनलोड हुए हैं। ये इतनी बड़ी संख्या है,जिसकी कल्पना नेटफ्लिक्स के कैलिफोर्निया में बैठे कर्ताधर्ताओं ने सपने में भी नहीं की होगी। इस संख्या में उनको व्यापक संभावना नजर आ रही है, बहुत बड़ा बाजार नजर आ रहा है और इसके साथ ही मुनाफे का एक ऐसा फॉर्मूला भी उनके हाथ लग गया है जिसमें जोखिम कम है। अगर हम सिर्फ इस डेढ़ करोड़ की संख्या को ही लें और उसको सबसे कम यानि 199 रु प्रतिमाह की सदस्यता शुल्क के आधार पर गणना करें तो करीब तीन अरब रुपए प्रतिमाह का कारोबार होता दिखता है। ये तो सिर्फ इन तीन महीनों में बने नए ग्राहकों के न्यूनतम सदस्यता शुल्क के आधार पर कारोबार का टर्न ओवर है। अगर इसमें पुराने ग्राहकों की संख्या भी जोड़ लें तो सालभर में अरबों का टर्नओवर हो जाता है। अगर कारोबार इतना बड़ा है तो मुनाफा की कल्पना भी की ही जा सकती है। ये तो सिर्फ एक प्लेटफॉर्म का आंकड़ा है। अगर सभी को जोड़ दिया जाएगा तो इसका कारोबार हिंदी फिल्मों के सालाना कारोबार से कहीं अधिक होगा। देश में सभी व्यवसाय को नियंत्रित करने के लिए अलग अलग तरह के नियमन हैं लेकिन ये एक ऐसा कारोबार है जहां मुनाफा कमाने के लिए कुछ भी करने की छूट अबतक प्राप्त है चाहे वो सामाजिक तानेबाने को तोड़ने वाले संवाद हों, सांप्रदायिकता को बढ़ाने वाले बोल हों या फिर भारतीय सेना की नकारात्मक छवि पेश करने वाले दृश्य हों। जबकि भारतीय सेना को भी इस अराजकता ने अपनी जद में ले लिया है तब तो अपेक्षा करनी चाहिए कि इसके नियमन को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

Saturday, August 8, 2020

देश की संस्कृति के आधार राम

अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बननेवाले भव्य मंदिर के भूमिपूजन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण के निहितार्थों पर पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए। अगर गंभीरता से विचार किया जाए तो पांच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ मंदिर के विधिवत निर्माण की शुरुआत ही नहीं की उन्होंने भारतीय संस्कृति के बारे में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने की नींव भी डाली। भारतीय संस्कृति को राम से जोड़कर नरेन्द्र मोदी ने उन उदारवादियों की सोच को भी सही दिशा में लाने की कोशिश की जो राम को धर्म से जोड़कर देखते और व्याख्यायित करते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी का अयोध्या में दिया गया भाषण कई मायनों में ऐतिहासिक है। मोदी ने जय श्रीराम के नारे के स्थान पर सियावर रामचंद्र की जय या जय सियाराम का उद्घोष करके एक और संदेश दिया। ऐसा संदेश जो अपेक्षाकृत समावेशी है। राम जन्मभूमि आंदोलन के समय जय श्रीराम का उद्घोष किया जाता रहा था, बाद में भी जय श्रीराम का ही नारा लगता रहा। कुछ लोगों को प्रधानमंत्री का सियावर रामचंद्र कहना प्रतीकात्मक लग सकता है, लेकिन संस्कृति के सवालों से जब मुठभेड़ होती है तो प्रतीकों का भी बहुत अधिक महत्व हो जाता है। अपने पूरे भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने राम के सांस्कृतिक पक्ष को सामने रखा और स्पष्ट रूप से ये संदेश दिया कि भारत में किसी भी व्यक्ति का धर्म कुछ भी हो सकता है लेकिन हम सबकी संस्कृति तो राम ही है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम। वो कहते हैं कि ‘राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए। इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। श्रीराम भारत की मर्यादा हैं, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।‘

अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी साफ तौर पर संस्कृति और धर्म को अलग करके देखते हैं। जब वो विदेशों का उदाहरण देते हैं तो ये और भी स्पष्ट होता है, ‘दुनिया में कितने ही देश राम के नाम का वंदन करते हैं, वहां के नागरिक, खुद को श्रीराम से जुड़ा हुआ मानते हैं। विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या जिस देश में है, वो है इंडोनेशिया। वहां हमारे देश की ही तरह ‘काकाविन’ रामायण, स्वर्णद्वीप रामायण, योगेश्वर रामायण जैसी कई अनूठी रामायणें हैं। राम आज भी वहां पूजनीय हैं। कंबोडिया में ‘रमकेर’ रामायण है, लाओ में ‘फ्रा लाक फ्रा लाम’ रामायण है, मलेशिया में ‘हिकायत सेरी राम’ तो थाईलैंड में ‘रामाकेन’ है! आपको ईरान और चीन में भी राम के प्रसंग तथा राम कथाओं का विवरण मिलेगा। श्रीलंका में रामायण की कथा जानकी हरण के नाम सुनाई जाती है, और नेपाल का तो राम से आत्मीय संबंध, माता जानकी से जुड़ा है। ऐसे ही दुनिया के और न जाने कितने देश हैं, कितने छोर हैं, जहां की आस्था में या अतीत में, राम किसी न किसी रूप में रचे बसे हैं! आज भी भारत के बाहर दर्जनों ऐसे देश हैं जहां, वहां की भाषा में रामकथा, आज भी प्रचलित है।‘ उनके वक्तव्य के इस अंश के निहितार्थ को अगर समझें तो ये साफ होता है कि राम और राम का चरित्र उन देशों में भी संस्कृति का आधार हैं जिन देशों का धर्म या मजहब अलग है। इस्लाम को मानने वाले देशों में भी राम वहां की संस्कृति के आधार हैं। कहना न होगा कि प्रधानमंत्री ये साफ कर रहे हैं कि किसी का धर्म इस्लाम हो सकता है, कोई ईसाई धर्म में विश्वास रख सकता है लेकिन अगर वो भारत में रहता है तो उसकी संस्कृति राम है। राम को सिर्फ धर्म विशेष से जोड़ना उचित नहीं है वो तो भारत के हर धर्म के लोगों से जुड़े हैं, उनके जीवन में हैं। और यही तो संस्कृति है। कहा भी गया है कि संस्कृति को हम लक्ष्णों से जान सकते हैं, उसको परिभाषित करना जरा मुश्किल है।

यह भी कहा गया है कि संस्कृति वह गुण है जो हम सब में व्याप्त है जबकि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है। तो राम तो हर भारतवासी के अंदर व्याप्त है, अपने अलग अलग रूपों में चाहे वो राम की मर्यादा हो, राम की नीति हो या फिर राम का नाम। दैनिंदिन अभिवादन से लेकर आचार व्यवहार तक में। तभी तो अपने भाषण में मोदी जोर देकर कहते हैं कि ‘जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जहां हमारे राम प्रेरणा न देते हों। भारत की ऐसी कोई भावना नहीं है जिसमें प्रभु राम झलकते न हों। भारत की आस्था में राम हैं, भारत के आदर्शों में राम हैं! भारत की दिव्यता में राम हैं, भारत के दर्शन में राम हैं! हजारों साल पहले वाल्मीकि की रामायण में जो राम प्राचीन भारत का पथ प्रदर्शन कर रहे थे, जो राम मध्ययुग में तुलसी, कबीर और नानक के जरिए भारत को बल दे रहे थे, वही राम आजादी की लड़ाई के समय बापू के भजनों में अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति बनकर मौजूद थे! तुलसी के राम सगुण राम हैं, तो नानक और कबीर के राम निर्गुण राम हैं।’ जब वो वाल्मीकि के रामायण से लेकर कबीर के निर्गुण राम तक आते हैं या फिर बापू के राम की बात करते हैं तो वो एक परंपरा को रेखांकित कर रहे होते हैं। वाल्मीकि का राम अलग है जो समय और काल के अनुरुप तुलसी के यहां बहुत अलग दिखाई देता है। यह अकारण नहीं है कि तुलसीदास शम्बूक वध और सीता परित्याग की घटना रामचरित मानस में नहीं लिखते हैं। अलग अलग कालखंड में राम का चरित्र चित्रण इस तरह से हुआ है कि वो समकालीन चुनौतियों से मुठभेड़ करता दिखता है। राम का चरित्र देश काल और परिस्थिति के अनुसार इतना लचीला है कि वो अपने अंदर तमाम तरह के बदलावों को समाहित कर लेता है। अपने युग के धर्म का पालन भी करता है।

राम की व्याप्ति के इतने गवाक्ष खोलकर प्रधानमंत्री ने उनको लोक से जोड़ दिया। जब हम लोक की संस्कृति की बात करते हैं तो हमें रामधारी सिंह दिनकर के एक लेख ‘रेती के फूल’ की पंक्तियां याद पड़ती हैं जिसमें वो कहते हैं कि ‘असल में संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। ...संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिनकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। संस्कृति असल में शरीर का नहीं आत्मा का गुण है और सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है, तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।‘  हमारे राम ऐसे ही तो हैं, उनका प्रभावव भी तो हमारे देश में पीढ़ियों से चला आ रहा है। प्रधानमंत्री के इस भाषण के बाद बहुत संभव है कि उन बुद्धिजीवियों के मानस पर वर्षों से जमा वो भ्रम का जाला भी साफ होगा जिसमें वो भारत को विविध संस्कृतियों का देश मानते और बताते रहते हैं। विविध संस्कृतियों का देश बतानेवाले सिद्धातों का निषेध होगा क्योंकि यह तो साफ है कि भारत की संस्कृति तो एक ही है, लेकिन हम इस एक संस्कृति में विविधता का उत्सव मनाते हैं।