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Saturday, October 1, 2022

वैश्विक आयोजन की सार्थकता पर सवाल


विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर हिंदी जगत में चर्चा होती रहती है। 2018 में जब मारीशस में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था तो उस वक्त ही ये तय हो गया था कि अगला यानि 12वां विश्व हिंदी सम्मेलन फिजी में आयोजित होगा। चार वर्ष बीत जाने के बाद भी अबतक तिथि की आधिकारिक घोषणा नहीं हो पाई है। जोहानिसबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुआ था कि दो विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच यथासंभव अधिकतम तीन वर्ष का अंतराल हो । इसके पहले ये व्यस्था थी कि विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच कोई भी अंतराल निश्चित नहीं था । सरकारों की इच्छा और अफसरों की मर्जी पर विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन होता रहा है। आधिकिक घोषणा नहीं होने के कारण इस वर्ष के मध्य में चर्चा ने जोर पकड़ा था कि फिजी में होनेवाला विश्व हिंदी सम्मेलन इस वर्ष हिंदी दिवस यानि 14 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है। 14 सितंबर की तिथि आई और निकल गई लेकिन इस आयोजन के बारे में अटकलें ही लगती रहीं। 

विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन विदेश मंत्रालय करता है। हिंदी दिवस के चार दिनों बाद विदेश मंत्रालय का एक पोस्टर ट्वीट किया गया जिसमें बारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के लोगो डिजाइन प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा की गई थी। इसके बाद फिजी में आयोजित होनेवाली तिथियों को लेकर एक बार फिर से हिंदी समाज में अटकलें लगाई जाने लगीं। अब इस बात की संभावना जताई जा रही है कि फिजी में आयोजित होनेवाला विश्व हिंदी सम्मेलन फरवरी के मध्य में होगा। दरअसल भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की तरफ से किसी घोषणा के नहीं होने से इस तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। फरवरी के पहले एक बार इस बात की भी चर्चा हुई थी कि इस वर्ष दिसंबर में इस सम्मेलन का आयोजन हो सकता है। फिजी में इस वर्ष के अंत तक आम चुनाव होने हैं। फिजी की राजनीति को जाननेवालों का मत है कि अगर इस वर्ष वहां हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया जाता है तो इसको आमचुनाव में भारतवंशी राजनेताओं के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। संभव है कि इन बातों के मद्देनजर ही भारत सरकार ने हिंदी सम्मेलन को अगले वर्ष फरवरी में करवाने की योजना बनाई हो। 

प्रश्न आयोजन की तिथियों को लेकर नहीं हैं। तिथियां तो सबकुछ देख समझकर तय कर दी जाएंगी। प्रश्न ये है कि फिजी में विश्व हिंदी सम्मेलन क्यों आयोजित हो रहा है। तर्क ये दिया जाता है कि फिजी में हिंदी भाषा भाषियों की संख्या अधिक है। फिजी की आधिकारिक भाषाओं में से एक हिंदी है। इसलिए फिजी में हिंदी सम्मेलन के आयोजन को लेकर उत्साह होगा, स्थानीय लोग भी हमारी भाषा से जुड़ाव महसूस करेंगे। लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो ये तर्क उचित नहीं प्रतीत होते हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का प्राथमिक उद्देश्य पूरी दुनिया में हिंदी का प्रचार प्रसार और इस भाषा के प्रति अहिंदी भाषियों के मन में आकर्षण पैदा करना है। मारीशस, फिजी, सूरीनाम में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करके हम किस तरह से इस सम्मेलन के उद्देश्यों को पूरा करने का उपक्रम कर रहे हैं, इसपर भारत सरकार विशेषकर विदेश मंत्रालय में इस आयोजन से जुड़े लोगों को विचार करना चाहिए।

अबतक 11 विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हो चुका है। पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 1975 में नागपुर में आयोजित हुआ था। तब से लेकर अबतक तीन बार मारीशस में, नागपुर के अलावा भोपाल और दिल्ली में, एक सूरीनाम में, एक त्रिनिदाद और टोबैगो में आयोजित हो चुका है। इसके अलावा लंदन , न्यूयार्क और जोहानिसबर्ग में आयोजन हुआ है। ग्यारह में से आठ तो हिंदी से परिचित और हिंदी मूल के लोगों को बीच ही विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ। यह विचारणीय है कि क्या विश्व हिंदी सम्मेलन के प्राथमिक उद्देश्य तक पहुंचने के लिए गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं। हिंदी को वैश्विक स्तर पर लेकर जाने के लिए क्या ये उचित नहीं होता कि इसका आयोजन चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी आस्ट्रेलिया, इटली जैसे देशों में होता। इसका एक लाभ ये होता कि इन देशों की भाषाओं के साथ हिंदी का संवाद बढता और एक दूसरे की भाषा को जानने का अवसर भी प्राप्त होता। अनुवाद के अवसर भी उपलब्ध हो सकते थे जिससे हिंदी की कृतियों को वैश्विक मंच पर एक पहचान मिलती। विश्व हिंदी सम्मेलन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अन्य देशों को बताने का एक मंच भी बन पाता। अगर समग्रता में इसकी योजना बनाकर कार्य किया जाए तो ये सम्मेलन भाषाई कूटनीति का एक माध्यम बन सकता है। विदेश मंत्रालय में तमाम विद्वान कूटनीतिज्ञ बैठे हैं और अगर वो गंभीरता से इस आयोजन को लेकर कोई नीति बनाएं तो निश्चित रूप से उसमें सफलता मिल सकती है। आवश्यकता सिर्फ अपनी भाषा हिंदी को मजबूत करने के लिए इच्छाशक्ति की है। 

1975 में जब पहली बार नागपुर में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था तब से ही ये सम्मेलन हिंदी के नाम पर ठेकेदारी करनेवालों की नजर में आ गया। उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस बात को समझा था और उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा को इस आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका दी थी। उस समय इस निर्णय को लेकर दिल्ली हिंदी प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन से जुड़े गोपाल प्रसाद व्यास और काशी नागरी प्रचारिणी सभा के सुधाकर पांडे नाराज हो गए थे। उनको लगा था कि इस तरह के आयोजन में उनकी भूमिका होनी चाहिए थी। बाद में सुधाकर पांडे, रत्नाकर पांडे और श्रीकांत वर्मा की तिकड़ी ने अपनी स्थिति मजबूत की और मारीशस में हुए दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन में केंद्रीय भूमिका में आ गए। उस वक्त के साहित्यकार एक बेहद मजेदार किस्सा सुनाते हैं। मारीशस जाने के लिए पत्रकार और दुनियाभर में रामायण सम्मेलनों के आयोजन से जुड़े लल्लन प्रसाद व्यास दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे। जब वो इमीग्रेशन की पंक्ति में खड़े थे तो उनके पास एक अधिकारी आया। उनको बताया गया कि उनके पासपोर्ट की जांच होनी है ताकि विदेश में उनको किसी प्रकार की कोई दिक्कत न हो। कहते हैं कि उनको पासपोर्ट तब वापस दिया गया जब मारीशस जानेवाले विमान का गेट बंद हो गया। कहा तो यहां तक जाता है कि कवि श्रीकांत वर्मा ने ही ये करवाया था। इस तरह की बातों का कोई प्रमाण नहीं होता। इसका भी नहीं है। जब विमान मारीशस के पोर्टलुई हवाई अड्डे पहुंचा तो उस समय के वहां के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम स्वयं हिंदी सम्मेलन के प्रतिभागियों की अगवानी के लिए उपस्थित थे। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के सदस्य कर्ण सिंह से पूछा था कि लल्लन नहीं दिखाई दे रहे हैं। उनके पास कोई उत्तर नहीं था। लल्लन प्रसाद व्यास हिंदी सम्मेलन की तैयारियों के सिलसिले में तीन बार मारीशस जा चुके थे इसलिए शिवसागर जी उनके बारे में जानना चाहते थे। लल्लन को इस वजह से रोका गया क्योंकि वो पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में आयोजक मधुकर राव चौधरी के साथ सक्रिय थे। उनको सबक सिखाना था। जबतक विश्व हिंदी सम्मेलन साहित्यकारों की राजनीति से मुक्त होकर भाषाई कूटनीति का माध्यम नहीं बनेगा तबतक इस आयोजन की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगते रहेंगे। इस वक्त देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पूरी दुनिया में भारत का सर गर्व से ऊंचा किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वो विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर भी कोई ऐसी ही युक्ति सोचेंगे जिससे हमारी राजभाषा के बारे में विदेश में एक उत्सुकता का वातावरण बने।   


Saturday, September 24, 2022

आंकड़ों और दावों के तिलिस्म में ‘ब्रह्मास्त्र’


पिछले पखवाड़े एक फिल्म आई जिसका नाम है ब्रह्मास्त्र पार्ट वन शिवा। फिल्म त्रयी की ये पहली फिल्म है। इसके निर्माता करण जौहर और अन्य हैं। इसका निर्देशन अयान मुखर्जी ने किया है। रणबीर कपूर और आलिया भट्ट मुख्य भूमिका में हैं। ब्रह्मास्त्र को हिंदी की सबसे महंगी फिल्मों में से एक कहकर प्रचारित किया गया था। फिल्म के निर्माताओं की ओर से बताया गया था कि इस फिल्म को बनाने में 410 करोड़ रुपए खर्च हुए। फिल्म के प्रदर्शित होने के पहले से ये चर्चा आरंभ हो गई थी कि ये फिल्म चलेगी या नहीं। इसके पहले प्रदर्शित आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा और अक्षय कुमार अभिनीत रक्षाबंधन को दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाया था। ये दोनों फिल्में अपनी लागत भी नहीं निकाल पाईं। फिल्म ब्रह्मास्त्र की सफलता को लेकर भी फिल्मों से जुड़े लोग आशंकित थे। इस फिल्म के बायकाट का ट्रेंड भी इंटरनेट मीडिया पर चल रहा था। फिल्म सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो गई। इसके निर्माताओं और निर्देशक की तरफ से ये दावा किया गया कि पहले ही दिन इस फिल्म ने पूरी दुनिया में 75 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इसको हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी ओपनिंग में से एक बताया गया। इंटरनेट मीडिया पर इस फिल्म के बायकाट की बातें निर्माताओं के दावे में दबने सी लगी। लेकिन कुछ लोग इस फिल्म के पहले दिन के कुल कारोबार की रकम को लेकर प्रश्न भी उठा रहे थे। आमतौर पर किसी भी हिंदी फिल्म की ओपनिंग देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शन का कुल कारोबार माना जाता रहा है। करण जौहर और उनकी टीम ने पहले दिन कुल वैश्विक कारोबार का ब्यौरा देकर माहौल बनाने का प्रयास किया। निर्देशक अयान मुखर्जी भी कुल वैश्विक कारोबार को ही प्रचारित कर रहे हैं। बावजूद इसके फिल्म 15 दिनों में अपनी लागत 410 करोड़ रुपए का कारोबार नहीं कर पाई है। 

एक और बात जिसपर ध्यान दिया जाना चाहिए। फिल्म ब्रह्मास्त्र के बारे में बताया गया कि वो देशभर में 8000 पर्दे पर प्रदर्शित की गई। फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का अनुमान है कि एक स्क्रीन पर किसी फिल्म को प्रदर्शित करने का औसत खर्च करीब 30 हजार रुपए आता है। अगर ब्रह्मास्त्र को 8000 स्क्रीन पर प्रदर्शित किया गया तो फिल्म के प्रदर्शन का कुल खर्च 24 करोड़ रुपए होता है। इसके अलावा फिल्म के प्रचार प्रसार पर हुए खर्च को दस करोड़ रुपए भी माना जाए तो ब्रह्मास्त्र पर निर्माण से लेकर रिलीज तक कुल खर्च 444 करोड़ रुपए होता है। दस दिनों के कुल वैश्विक कारोबार को देखा जाए तो 10 दिनों में ब्रह्मास्त्र ने 360 करोड़ का कारोबार किया है। फिल्म उद्योग से जुड़े ट्रेड विश्लेषकों की मानें तो इस फिल्म का चौदह दिनों में देश में सकल कारोबार करीब 266 करोड़ रुपए का है। विदेश में इस फिल्म का सकल कारोबार करीब 93 करोड़ रुपए का है। इस लिहाज से इस फिल्म का सकल वैश्विक कारोबार लागत तक नहीं पहुंच पाई है। लाभ की बात तो दूर । चूंकि करण जौहर को फिल्म उद्योग जगत के अग्रणी निर्माताओं में से एक माना जाता है इसलिए उनकी कारोबार दिखाने के इस तरीके का प्रभाव इंडस्ट्री पर पड़ेगा। इसको विपणन का एक तरीका माना जा सकता है। इस तरीके का प्रभाव सकारात्मक होगा या नकारात्मक इसका आकलन आनेवाले समय में ही हो पाएगा। 

ब्रह्मास्त्र के प्रचार के इस तरीके को देख कुछ वर्षों पूर्व नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले की एक घटना की याद आ गई। एक पुस्तक प्रकाशित होकर आनेवाली थी। मेले में इस बात का खूब प्रचार किया जा रहा था कि अमुक पुस्तक अमुक दिन अमुक समय पर प्रकाशित होकर बिक्री के लिए मेले में उपलब्ध होनेवाली है। अमुक दिन भी आ गया। तय समय पर जब पाठक पुस्तक खरीदने पहुंचे तो बताया गया कि पुस्तक का पहला संस्करण बिक गया है। मेले में इस बात की खूब चर्चा रही। प्रकाशक ने भी ये प्रचारित किया कि पुस्तक का पहला संस्करण चंद घंटों में बिक गया। अगले दिन ढेर सारे पुस्तक प्रेमी उस पुस्तक को खरीदने के लिए प्रकाशक के स्टाल पर पहुंचे। वहां वो पुस्तक उपलब्ध थी लेकिन उसके कवर पर छपा था, दूसरा संस्करण। पुस्तक की जमकर बिकी हुई। खरीदनेवाले ये बात करते हुए जा रहे थे कि कुछ तो बात होगी इस पुस्तक में कि कुछ ही समय में पहला संस्करण खत्म हो गया। बाद में पता चला कि ये मार्केटिंग का तरीका था। पुस्तक के पहले संस्करण का प्रकाशन ही दूसरे संस्करण की मुहर के साथ हुआ था। ये बात दूसरे प्रकाशक को पता चली तो वो और आगे चला गया। उसने एक युवा लेखक की पुस्तक प्रकाशित की तो पुस्तक के अंदर लिखवा दिया प्रथम संस्करण जनवरी और द्वितीय संस्करण जनवरी। मतलब एक महीने में दो संस्करण। ये भी प्रचार का एक तरीका था। दूसरे प्रकाशक की पुस्तक अपेक्षित संख्या में नहीं बिकी क्योंकि तबतक पाठकों के बीच ये बात फैल गई थी कि संस्करणों का खेल पुस्तक की बिक्री बढ़ाने और किताब के पक्ष में माहौल बनाने का एक तरीका है। इस तरह से प्रकाशन जगत की साख संदिग्ध हो गई। ब्रह्मास्त्र को लेकर जिस तरह से वैश्विक कारोबार को प्रचारित कर एक माहौल बनाने की कोशिश की गई उससे ये आशंका है कि इससे हिंदी फिल्म जगत की साख कम हो सकती है। माहौल बनाने से नुकसान कम हो सकता है लेकिन फिल्म जब चलती है तो उसका पता चल जाता है। जैसे द कश्मीर फाइल्स की लागत 25-30 करोड़ बताई जाती है लेकिन इसने करीब 300 करोड़ का कारोबार किया। इसको हिट कहा जाता है।     

दरअसल फिल्मों के कारोबार को समझने के लिए हमें सिनेमाघरों से बाहर निकलना होगा। पहले तो किसी फिल्म के हिट या फ्लाप होने का पैमाना सिनेमाघरों से होनेवाले कारोबार या वहां से अर्जित होनेवाले लाभ पर आधारित होता था। बदलते समय और मनोरंजन के अन्य माध्यमों के आने के बाद परिदृश्य बदल गया है। अब माना जाता है कि सिनेमाघरों से 50 प्रतिशत और ओवर द टाप प्लेटफार्म(ओटीटी) और अन्य माध्यमों पर उसको दिखाने के समझौते से पचास फीसदी कारोबार होता है। अब फिल्मकार अपनी फिल्मों को सिनेमाघर में रिलीज होने के पहले ही ओटीटी पर बेच देता है। उससे पैसे मिलते हैं। टेलिवजन पर दिखाने का अधिकार, अन्य भारतीय भाषाओं में रिमेक का अधिकार, म्यूजिक का अधिकार आदि से भी निर्माता अपनी लागत निकाल लेना चाहते हैं। कुछ फिल्मकार तो अपनी फिल्में सीधे ओटीटी प्लेटफार्म पर ही रिलीज करने लगे हैं। अक्षय कुमार की कटपुतली और मधुर भंडारकर की बबली बाउंसर तो ओटीटी पर ही रिलीज हुई। ब्रह्मास्त्र के बारे में भी फिल्म उद्योग जगत में चर्चा है कि इसको ओटीटी पर 150 करोड़ में बेचा गया है। अगर इस राशि को सही मानकर उसके सकल कारोबार में जोड़ भी दिया जाए तो ब्रह्मास्त्र अपनी लागत से कुछ अधिक राशि का कारोबार करेगा। 

जानकारों का ये भी मानना है कि अगर किसी फिल्म पर 450 करोड़ खर्च किया जाता है और पांच सवा पांच सौ करोड़ का कारोबार होता है तो उसको हिट नहीं माना जा सकता है। अगर फिल्म के बनने में अधिक समय लग गया तो उसमें निवेश की गई राशि पर लगनेवाले ब्याज को भी जोड़ा जाता है। ब्रह्मास्त्र को रिलीज करनेवाली सिनेमाघरों की शृंखला चलानेवाली एक कंपनी के शेयर में गिरावट देखी गई। बाजार हमेशा सेंटिमेंट्स पर चलता है और अगर उसको ब्रह्मास्त्र के रिलीज में उपरोक्त कंपनी को लाभ मिलता दिखता तो शेयर चढता। फिल्मों के हिट या फ्लाप की तिलस्मी दुनिया की चर्चा होती रहेगी लेकिन इतना तय है कि फिल्म की विषयवस्तु और उसका ट्रीटमेंट ही उसको हिट बनाती है, विपणन का कोई औजार नहीं।  

Saturday, September 17, 2022

शब्दकोश संस्कृति पर संगठित प्रयास


उपराष्ट्रपति के पद से वेंकैयानायडू का विदाई समारोह चल रहा था। सभी गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वेंकैया जी के राजनीतिक गुणों की चर्चा कर रहे थे। राजनीतिक गुणों के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके भाषा प्रेम की प्रशंसा की। वहां प्रधानमंत्री ने एक सूचना साझा की कि भारत सरकार ने भाषिणी के नाम से एक वेबसाइट बनाई है। प्रधानमंत्री मोदी ने बतया कि इस वेबसाइट पर भारतीय भाषाओं की समृद्धि को प्रदर्शित किया गया है। यहां एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में अनुवाद करने की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने मंच पर बैठे लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से एक अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि संसद के दोनों सदनों में जब कोई सदस्य मातृभाषा में भाषण करें या सदस्य किसी चर्चा में हस्तक्षेप करते हैं तो कई सदस्य के भाषण से या किसी चर्चा पर उनके हस्तक्षेप से बहुत बढिया शब्द निकलते हैं। भारतीय भाषाओं के वो शब्द दूसरी भाषा के सदस्यों के लिए बहुत रुचिकर भी होता है और सार्थक भी लगता है। प्रधानमंत्री ने मंच से ही ओम बिरला और हरिवंश से अनुरोध किया कि हमारे दोनों सदनों में ऐसे सार्थक, रुचिकर और भाषा वैविध्य को लेकर आनेवाले भारतीय भाषा के शब्दों का संग्रह करने की व्यवस्था की जाए। उसके बाद प्रतिवर्ष ऐसे शब्दों का एक संग्रह प्रकाशित करने की परंपरा का आरंभ किया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने वेंकैया जी के मातृभाषा प्रेम के हवाले से एक बेहद गंभीर बात तो की ही, भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की पहल करने का सुझाव भी दे दिया। 

पिछले दिनों हिंदी दिवस के अवसर पर सूरत में आयोजित हिंदी दिवस समारोह में गृह मंत्री अमित शाह ने शब्द सिंधु के नाम से एक खोजपरक डिजीटल शब्दकोश के पहले संस्करण का शुभारंभ किया। ये शब्दकोश हिंदी से हिंदी का है। इसमें शब्दों के अर्थ और आवश्यकतानुसार वाक्य प्रयोग भी दिए गए हैं। इसमें अभी इक्यावन हजार शब्द डाले गए हैं। भविष्य में इस शब्दकोश में शब्दों की संख्या बढ़ाई जाएगी। इसमें विज्ञान. तकनीक, न्यायिक प्रक्रिया और प्रोद्योगिकी से जुड़े शब्दों को शामिल किया गया है। ये शब्दकोश गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी निदेशालय और विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध होने की बात कही गई । इस शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को भी शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। शब्दकोश में भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करने में एक असुविधा हो रही है। हिंदी के कई शब्द ऐसे हैं जिनका भारतीय भाषाओं और बोलियों में अलग अर्थ होता है। उदाहरण के तौर पर अगर शिक्षा शब्द को लिया जाए तो हिंदी में इसका अर्थ होता सिखाना। कुछ भारतीय भाषा और बोलियों में सिखाने का प्रयोग दंड के तौर पर भी होता है। इस शब्दकोश को बनाने वालों के सामने ये बड़ी चुनौती है कि किस प्रकार से भारतीय भाषाओं और हिंदी के शब्दों में साम्य स्थापित किया जाए ताकि अर्थ का अनर्थ न हो। बताया गया कि भाषा विशेषज्ञ इस पर कार्य कर रहे हैं। इस शब्दकोश का एक लाभ ये है कि सरकारी कार्यालयों में जिस प्रकार की हिंदी का प्रयोग होता है उसको सरल बनाया जा सकेगा। दूसरी भाषाओं से हिंदी में अनुवाद करने में भी ये शब्दकोश सहायक सिद्ध होगा। इस शब्दकोश को अद्यतन करने के लिए विशेषज्ञों और तकनीकविदों की एक समिति निरंतर कार्य कर रही है। इसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि अभी इसका पहला संस्करण जारी किया है और भविष्य में इसके अनेक संस्करण प्रकाशित होते रहेंगे। 

सूरत के सम्मेलन में ही राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी भारतीय भाषाओं के शब्दों को लेकर अपनी प्राथमिकता बताई। उनके मुताबिक भारतीय भाषाओं के सात सौ से अधिक शब्दों का चयन किया गया है जो रुचिकर और सार्थक शब्द हैं। इन शब्दों का उपयोग सभी भाषाओं में हो सकता है। इन प्रयासों से ये लगता है कि भारतीय भाषाओं और हिंदी को समृद्ध करने के लिए सरकारी स्तर पर गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं। स्वाधीनता के अमृतकाल में इस तरह की बातों के सामने आने से मातृभाषा या भारतीय भाषाओं के लिए सरकार के स्तर संगठित प्रयास भाषा-प्रेमियों के साथ साथ बौद्धिक जगत के लिए भी संतोष के संकेत हैं। हिंदी में शब्दकोश की परंपरा को पुनर्जीवित करके भाषा को समृद्ध किया जा सकता है। अब भी हिंदी के शब्दकोश की बात होती है तो दशकों पूर्व प्रकाशित ज्ञानमंडल शब्दकोश या फादर कामिल बुल्के के शब्दकोश या फिर हरदेव बाहरी के शब्दकोश तक बात आकर रुक जाती है। अपने देश में शब्दकोश संस्कृति सशक्त नहीं हो पाई है। शब्दों के अर्थ और उसकी उत्पत्ति को लेकर हम सजग नहीं रहते हैं। हिंदी या भारतीय भाषाओं में जो भाषाई समृद्धि है उसको जानने समझने के लिए शब्दकोश संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। इससे न केवल अकादमिक जगत में बल्कि पूरे भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना का विकास होगा। शब्दकोश को अद्यतन करने और उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों को शामिल करके न केवल भाषा को समृद्ध किया जा सकता है बल्कि इसका दायरा भी बढ़ाया जा सकता है। एक तरह से देखें तो ये औपनिवेशिक भाषाओं के चंगुल से मुक्ति का अभियान भी है।

इस संबंध में फ्रांस का उदाहरण दिया जा सकता है। सूरत में एक चर्चा के दौरान पता चला कि फ्रांस के लोग अपनी भाषा और मातृभाषा को लेकर कितने सजग हैं। एक मित्र ने बताया कि फ्रांस में अगर आप रास्ता भटक जाएं तो कभी भी किसी फ्रेंच से अंग्रर्जी में रास्ता न पूछें। वो बिना बताए आगे बढ़ जाएगा। आप भले ही हिंदी या भोजपुरी या तमिल में बात करें वो ठहरकर आपके हावभाव से आपके प्रश्नों को समझने का प्रयास करेंगे और आपकी सहायता भी करेंगे। जैसे ही आपने अंग्रेजी में कुछ कहा कि वो आपसे बात किए बिना आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन स्वाधीनता के पचहत्तर वर्ष बीतने के बाद भी हमारे देश में विदेशी भाषा की अहमियत बनी हुई है। अगर इसके कारणों की पड़ताल करेंगे तो इसके पीछे स्वाधीनता के बाद के शीर्ष भारतीय नेतृत्व की कमजोरी और उनका विदेशी भाषा प्रेम ही दिखाई पड़ता है। भाषा के नाम पर इस देश ने बहुत राजनीति देखी, भाषा को लेकर हिंसा भी हुई है, भाषाई आधार पर राज्यों का विभाजन भी हुआ है। दो भाषाओं के बीच कटुता भी देखी गई है। पूर्व में साहित्य अकादमी के चुनाव के दौरान इस तरह की कटुता खुलकर सामने आती रही है। हिंदी का विरोध भी देखा गया। हिंदी विरोध के पीछे राजनीति रही है जिसने शिक्षा और अकादमिक जगत में भाषाई विष फैलाने का काम किया है। अब इस विष को खत्म करने का कार्य आरंभ हुआ है। हिंदी नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने की नीति पर कार्य हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात की गई है। इस दिशा में समग्रता में कार्य भी हो रहा है। 

यह अनायस नहीं है कि प्रधानमंत्री एक सभा में भारतीय भाषाओं के शब्दकोश बनाने की बात करते हैं। इसके लिए संसद के दोनों सदनों के जिम्मेदार अधिकारियों से अनुरोध करते हैं और दूसरी तरफ गृह मंत्री हिंदी शब्दकोश को अद्यतन करने का उपक्रम आरंभ करते हैं। उसके क्रियान्वयन की जानकारी राष्ट्र को देते हैं। यह सरकार का भाषा के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी है और अपनी संस्कृति पर अभिमान भी। अपनि संस्कृति पर अभिमान के इस अभियान में हर भारतीय नागरिक को जुड़ना चाहिए और आनेवाली पीढ़ी को शब्दकोश से संपर्क बनाने और बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। 


Sunday, September 11, 2022

विरह और प्रेम का राग पहाड़ी


फिल्मी गीतों में रागों का प्रयोग लंबे अरसे से हो रहा है लेकिन जब संगीतकार लोक से जुड़े दृश्यों को दिखाते हैं तो उनकी पहली पसंद राग पहाड़ी होती है। जैसा कि इस राग के नाम से ही स्पष्ट है कि इसकी उत्पत्ति पहाड़ी इलाकों में हुई होगी। माना जाता है कि हिमालय की तराई वाले इलाकों में ये राग प्रचलन में रहा है। संगीत के जानकारों का कहना है कि राग पहाड़ी को सबसे पहले कश्मीर के लोकगीतकारों ने आरंभ गाना किया। संगीत की परंपरा में इसको बजाने का समय देर शाम या रात्रि के आरंभिक समय को माना गया है। इस राग का संबंध बिलावल थाट से है और इसमें राग पीलू की सुगंध भी महसूस की जा सकती है। इस राग की एक विशेषता ये भी है कि इसको आरोह और अवरोह में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। इस राग की एक विशेषता ये है कि इसको सुनते हुए कई बार प्रेम की अग्नि और विरह की पीड़ा के साथ साथ प्रेमी की प्रतीक्षा करती नायिका के मनोभावों को इस राग में अभिव्यक्ति मिलती है। इस राग को सुनते हुए कई बार ये भ्रम होता है कि ये एक धुन है। अगर इसको बजाने या गानेवाला कलाकार अगर सिद्ध होता है तो इसके राग के आरोह और अवरोह को बरतने में इसके सरगम के मानकों का इतनी निपुणता से विन्यास करता है कि वो इसको राग की ऊंचाई प्रदान कर देता है। इसी कारण ये राग सधता है और लोक संगीत को एक खास प्रकार की कर्णप्रियता से सजाता है। 

फिल्मों में जब भी लोक से जुड़े प्रसंग आते हैं तो राग पहाड़ी संगीतकारों और गायकों की पसंद बन जाता है। राज कपूर ने राग पहाड़ी का अपनी कई फिल्मों में उपयोग किया है। फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में नायिका मंदाकिनी जब पर्दे पर ‘हुस्न पहाड़ों का ओ साहिबा, क्या कहना कि बारों महीने, यहां मौसम जाड़े का’ गाती है तो राग पहाड़ी अपने उत्स पर होती है। इस गाने का संगीत दिया है रवीन्द्र जैन ने और इसको लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से अमर कर दिया। आर डी बर्मन को भी राग पहाड़ी बेहद पसंद था और वो अपनी कई फिल्मों के गानों में राग पहाड़ी का उपयोग किया करते थे। 1966 में एक फिल्म आई थी ‘तीसरी मंजिल’ जिसमें एक गाना था ‘ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना...।‘ इसको लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने। इस गीत में आर डी बर्मन ने बेहद खूबसूरती के साथ राग पहाड़ी का उपयोग किया था। आर डी बर्मन ने  इस गीत का संगीत तैयार करते समय राग पहाड़ी और जैज के छोटे टुकड़ों को गीत में पिरो दिया था। आशा और रफी की आवाज में ये गीत पचास साल से अधिक समय से श्रोताओं की पसंद बना हुआ है। 

Saturday, September 10, 2022

भाषाई सांप्रदायिकता से हिंदी की हानि


दो दिन बाद हिंदी दिवस है। हिंदी भाषा के बारे में जमकर चर्चा होगी। हिंदी को बाजार और रोजगार से जोड़ने की कई तरह की बातें होगी। स्वाधीनता के बाद से लेकर अबतक हिंदी की व्याप्ति बढ़ने पर हिंदी समाज प्रसन्न भी होगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर अधिक प्रयास करने पर बल देते लोग भी मिलेंगे। हिंदी को  संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए केंद्र सरकार से अपील भी होगी। हर वर्ष हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े में इस तरह के वाक्य सुनाई पड़ते हैं। हिंदी के विकास और उसकी समृद्धि को लेकर कार्य भी हो रहे हैं। शब्दकोश से लेकर भारतीय भाषाओं के कोश तैयार किए जा रहे हैं। हिंदी को तकनीक से जोड़ने के लिए सांस्थानिक और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भले ही हिंदी शब्द का उल्लेख नहीं है लेकिन मातृभाषा और भारतीय भाषा को प्राथमिकता की बातें हैं। इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकी शिक्षा के लिए हिंदी में पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। पर स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के बाद अब अमृतकाल में हमें उन ऐतिहासिक कारणों को भी देखना चाहिए जिसकी वजह से हिंदी को पराधीन हिंदुस्तान में संघर्ष करना पड़ा और जिसका असर स्वाधीनता के बाद भी हिंदी पर दिखाई दे रहा है। 

पिछले दिनों उपरोक्त कारणों की पड़ताल कर रहा था तो गोरखपुर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के 19वें अधिवेशन में 2 मार्च 1930 को गणेश शंकर विद्यार्थी का अध्यक्षीय भाषण देखने को मिला। अपने भाषण में गणेश शंकर विद्यार्थी ने विस्तार से उन कारणों और परिस्थितियों की चर्चा की है जिसकी वजह से हिंदी को पराधीन भारत में परिधि पर डालने और उसको वहीं बनाए रखने का षडयंत्र किया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने लंबे वक्तव्य के आरंभ में ही इस ओर ध्यान दिलाया था। उन्होंने तब कहा था कि ‘आज से उन्नीस वर्ष पहले जब इस सम्मेलन का जन्म नहीं हुआ था और उसके जन्म के पश्चात भी कई वर्षों तक अपनी मातृभाषा का स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध करने के लिए पग पग पर न केवल संस्कृत, प्राकृत, शौरसैनी, मागधी, सौराष्ट्री आदि की छानबीन करते हुए शब्द-विज्ञान और भाषा-विज्ञान के आधार पर यह सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ा करती थी कि हिंदी भाषा संस्कृत या प्राकृत की बड़ी कन्या है, किंतु बहुधा बात यहां तक पहुंच जाया करती थी और यह भी सिद्ध करना पड़ता था कि नानक और कबीर, सूर और तुलसी की भाषा का बादशाह शाहजहां के समय जन्म लेनेवाली उर्दू बोली के पहले, कोई अलग गद्य रूप भी था। जिस भाषा में पद्य की रचना इतने ऊंचे दर्जे तक पहुंच चुकी हो, उसके संबंध में इस बात की सफाई देनी पड़े कि उसका उस समय गद्य रूप भी था, इससे बढ़कर कोई हास्यास्पद बात हो नहीं सकती।‘  गणेश शंकर विद्यार्थी के मुताबिक उस समय ये संभव हो सकता है कि गद्य लिखने की परिपाटी न हो और बड़े बड़े ग्रंथ पद्य में लिखे जाते रहे हों। उन्होंने इस संबंध में ईरान, ग्रीस, रोम और चीन का उदाहरण देकर अपनी बातें स्पष्ट की थीं। हिंदी को लेकर इस तरह की बातें कहनेवालों पर उपहास की शैली में प्रहार भी किया था। अब अगर हम गणेश शंकर विद्यार्थी के उपरोक्त कथन को देखें तो वो हिंदी को भाषा कहते हैं और उर्दू को बोली। इससे भी साफ होता है कि उस समय हिंदी और उर्दू की क्या स्थिति रही होगी। 

गणेश शंकर विद्यार्थी के चिंतन के मूल में एक और बात थी जो उनके वक्तव्य में परिलक्षित होती है। उनके मुताबिक राजनीतिक पराधीनता पराधीन देश की भाषा पर अत्यंत विषम प्रहार करती है। राजनीतिक पराधीनता का भाषा पर किस प्रकार असर पड़ता है उसको भी विद्यार्थी जी स्पष्ट किया। उन्होंने तब कहा था कि ‘राजनीतिक पराधीनता ने भारतवर्ष में भी उसी प्रकार, जिस प्रकार उसने अन्य देशों में किया, भाषा विकास की राह में रोड़े अटकाने में कोई कमी नहीं की।...इस देश के मुसलमान शासकों के कारण भारतीय भाषाओं का सहज सवाभाविक विकास नहीं हो सका। सबसे अधिक हानि हिंदी की हुई। उनकी सत्ता देश के उत्तर, पश्चिम और मध्यवर्ती भाग में थी। यही प्रदेश शाही सत्ता के कारण अरबी अक्षरों और फारसी साहित्य से इतने प्रभावित हुए कि उनका रंग रूप ही बदल गया। एक भाषा दूसरी भाषा के संसर्ग में आकर शब्दों और वाक्यों का सदा दान-प्रतिदान किया करती है। यह हानिकारक या अपमानजनक बात नहीं है किन्तु जब ये दान-प्रतिदान प्रभुता या पराधीनता के भाव से होता है, एक भाषा को दूसरी भाषा के शब्दों  और वाक्यों को इसलिए लेना पड़ता है कि दूसरी भाषा के लोग बलवान हैं, उनकी प्रभुता है, उनको प्रसन्न करना है, उनके सामने झुकना है, तो इससे लेनेवाले की उन्नति नहीं होती, वो अपनी गांठ का बहुत कुछ खो देते हैं और पर-भाषा की सत्ता को स्वीकार करके अपनी परवशता और हीनता को पुष्ट करते हैं और अपने सर्वसाधारण जन से दूर जा पड़ते हैं। इस देश में विजेताओं के साथ फारसी के प्रवेश से ये बातें हुईं।‘  अब यहां से सूत्र पकड़ने की आवश्यकता थी जिसमें बाद के विद्वानों से चूक हुई या उनमें से कुछ अपनी विचारधारा की वजह से इन कारणों को जानबूझकर छोड़ दिया। परिणाम ये हुआ कि हिंदी भाषियों को यह सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ी कि फारसी के आगमन और उर्दू के जन्म के पहले भी हिंदी गद्य का स्वतंत्र अस्तित्व था।

इस प्रकार का वातावरण लंबे कालखंड तक चला और फिर मगुलों के बाद इस देश पर अंग्रेजों का शासन कायम हुआ। उस समय अदालतों की भाषा फारसी थी। अंग्रेजों ने फारसी के स्थान पर उर्दू को स्थापित कर दिया। जबकि उर्दू का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। गणेश शंकर विद्यार्थी के मुताबिक उस समय मुसलमान जिस हिंदी को बोलते और लिखते थे और जिसमें वे फारसी के कुछ शब्दों का प्रयोग करते थे वही उर्दू थी। अंग्रेजों ने उत्तर भारत में उर्दू को ऐसा स्थान देकर जो उसे पहले से प्राप्त न था, हिंदी और उर्दू के विवाद का सूत्रपात किया। इस प्रकार बहुसंख्यक हिंदी भाषा-भाषी लोगों की सुविधा और विकास में बाधा उत्पन्न कर दी। अब अगर इन बिंदुओं पर विचार करें तो हिंदी के लंबे संघर्ष को समझा जा सकता है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिंदी का उपयोग एक बार फिर से बढ़ा और उसको हिंदुस्तान के लोगों को जोड़ने वाली भाषा के तौर पर देखा जाने लगा। उस समय के कई नेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा की संज्ञा देते हुए ये अपेक्षा की थी कि स्वाधीनता के बाद हिंदी देश की राष्ट्रभाषा बनेगी। ये सबको स्वीकार भी था। अगर हम स्वाधीनता संग्राम के दौरान होनेवाले विरोध अभियानों का नाम देखें तो हिंदी की स्थिति स्पष्ट होती है। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, जैसा सुंदर हिंदी शब्द हो, नमक सत्याग्रह या पूर्ण स्वराज या भारत छोड़ो आंदोलन। ये हिंदी शब्दों की स्वीकार्यता और संप्रेषणीयता थी जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक कर दिया। जब गांधी दक्षिण अफ्रका से भारत वापस लौटे थे तब वो भी हिंदी के पक्षधर थे। वो हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर देखते थे लेकिन कालांतर में वो हिन्दुस्तानी के पक्षधर होते चले गए। वो हिन्दुस्तानी जिसको लेकर स्वाधीनता के बाद संविधान सभा में बहस हुई, पहले आमचुनाव के बाद संसद में बहस हुई लेकिन आज वो अपनी पहचान और प्रासंगिकता दोनों खो चुका है। मुगलों के समय हिंदी आक्रांताओ की भाषाई सांप्रदायिकता का शिकार बनी, उसके बाद अंग्रेजों ने हिंदी को उर्दू से दबाने की कोशिश की। अंग्रेजी को प्राथमिकता देकर भारतीय भाषाओं का तिरस्कार किया। कुल मिलाकर अमृतकाल में हमें इन बातों पर विचार करते हुए हिंदी और भारतीय भाषाओं को मजबूत करने का प्रण लेना चाहिए। 

कब हटेंगे परतंत्रता के चिन्ह ?


स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री ने देश की जनता से अमृत काल में पांच प्रण का आह्वान किया था। उसमें से एक प्रण था गुलामी के अंश की समाप्ति। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन को जोड़ने वाली सड़क का नाम कर्तव्य पथ किया गया। इसके लान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा उसी जगह लगाई जहां जार्ज पंचम की प्रतिमा थी तो इसको प्रधानमंत्री के गुलामी के अंश की समाप्ति के आह्वान से जोडा गया। लेकिन कर्तव्य पथ के चार से पांच किलोमीटर के दायरे में गुलामी के कई निशान अब भी हैं। इंडिया गेट से निकलनेवाली सड़कें आक्रांताओं के नाम पर हैं। अकबर रोड से लेकर हुमांयू और शाहजहां रोड तक। औरंगजेब रोड का नाम तो बदला लेकिन औरंगजेब लेन अब भी है। यहां से थोड़ी दूर बंगाली मार्केट के पास बाबर रोड और बाबर लेन मुगल आक्रांताओं की याद दिलाता रहता है। हुमांयू को कई इतिहासकार उदार बादशाह के रूप में देखते हैं। लेकिन उसने भारतीय संस्कृति को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया। भारतीय कलाओं को नेपथ्य में धकेलकर फारसी कलाओं को प्राथमिकता दी। फारस से वास्तुविद और चित्रकार आदि हिन्दुस्तान बुलाए। कहा जा सकता है कि भारत में सांस्कृतिक स्लतनत की स्थापना हुमांयू ने की। मुगल सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए जासूसी का पूरा तंत्र विकसित करनेवाले मिर्जा नजफ खां के नाम पर भी एक सड़क है जो लोदी कालोनी के बाहर से निकलती है। जिस तुगलक राजवंश ने देश की जनता पर भायनक अत्याचार किया, अकाल के समय जनता को लूटा उसके नाम पर तुगलक रोड, तुगलक लेन और तुगलक क्रेसेंट अपनी मौजूदगी से उनके अत्याचारों की याद दिलाता है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुगलों और उनके कर्मचारियों के नाम पर नई दिल्ली इलाके में सड़कें हैं। उन अंग्रेजों के नाम पर भी सड़कें हैं जिन्होंने हमारे देश को गुलाम बनाने और गुलाम बनाए रखने में भूमिका निभाई। हिन्दुस्तान के विभाजन की जमीन तैयार करनेवाले और देश में सांप्रदायिकता का बीज बोने वाले चेम्सफोर्ड के नाम पर भी सड़क है। एक और अंग्रेज अफसर था जिसका नाम था विलियम मैल्कम हेली था। 1912 में दिल्ली का कमिश्नर नियुक्त हुआ था। उसको जनता के बीच ब्रिटिश राज की स्वीकार्यता बढ़ाने का काम सौंपा गया था। उसने चतुराई से ये कार्य किया। उसके नाम पर हेली रोड है। गुलामी के ऐसे कई चिन्ह देश की राजधानी में अब भी बने हुए हैं। कर्तव्य पथ के अस्तित्व में आने के बाद क्या ये उम्मीद की जानी चाहिए कि अमृत काल में परतंत्रता के इन प्रतीकों को हटाया जाएगा।   

Saturday, September 3, 2022

राजनीति के ‘रंगबाज’ और ‘महारानी’

मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद बिहार में सामाजिक बदलाव की बयार बही थी। लगभग उसी समय बिहार में कई ऐसे बाहुबली भी उभरे जो बाद में राजनीति के रास्ते विधानसभा और संसद के सदस्य बने। इनमें पप्पू यादव से लेकर आनंद मोहन तक और शहाबुद्दीन से लेकर सूरजभान सिंह तक का नाम शामिल है। बाद के दिनों में भी ये क्रम चलता रहा और स्थानीय स्तर के अपराधी भी विधानसभा पहुंचने लगे। इन आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं का लगभग सभी राजनीतिक दल ने अपने हित में उपयोग किया। किसी ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इन नेताओं उपयोग सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाने में किया तो किसी ने सरकार बचाने के लिए। 1990 के बाद के दशकों में बिहार की राजनीति का अपराधीकरण तेज हुआ। उसी समय राजनीति के अपराधीकरण पर देशव्यापी चर्चा हुई थी। चुनाव में बूथ लूटने और कब्जा करने की घटनाएं भी खूब हुई, चुनावी हिंसा भी। ये वही दौर था जब बिहार में जाति और विचारधारा के नाम पर सामूहिक नरसंहार हुए। नक्सलियों ने विचारधारा और समानता हासिल करने की आड़ में नरसंहार किए तो जाति आधारित निजी सेनाओं के बीच भी खूनी खेल खेला गया। जातियों के नए नेता पैदा होते चले गए। जातियों के बीच चौड़ी होती खाई को नेताओं ने अपने वोटबैंक के तौर पर उपयोग करना आरंभ कर दिया। पाटने की कोशिश किसी ने नहीं की। लालू प्रसाद यादव जैसे गरीब परिवार से आनेवाले व्यक्ति बिहार के मुख्यमंत्री बने तो सामाजिक न्याय का नारा जोरशोर से लगा। उनपर जब घोटाले का आरोप लगा तो उन्होंने अपने राजनीतिक सहयोगियों को नजरअंदाज करते हुए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। कहना न होगा कि उस समय बिहार में राजनीति और अपराध की दुनिया में बहुत कुछ घट रहा था जो किसी फिल्मी पटकथा से कम रोचक और दिलचस्प नहीं था। बिहार में उन्हीं दिनों की राजनीतिक घटनाओं और बाहुबलियों को केंद्र में रखकर कई बेवसीरीज बने भी और अब भी बन रहे हैं।

हाल में दो वेबसीरीज आई है जिसके केंद्र में बिहार की राजनीति, बिहार के बाहुबली और बिहार की राजनीतिक और आपराधिक घटनाएं हैं। जी 5 पर बाहुबलियों को केंद्र में रखकर एक सीरीज आती है जिसका नाम है ‘रंगबाज’। इस वेब सीरीज के पहले सीजन में उत्तर प्रदेश के खतरनाक अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ल के कारनाओं पर आधारित पूर्वांचल की राजनीति को दिखाया गया था। इसमें हरिशंकर तिवारी और वीरेन्द्र शाही के बीच चलनेवाले खूनी खेल को फिक्शनलाइज किया गया था। रंगबाज का पहला सीजन 22 दिसंबर 2018 को रिलीज हुआ था। इस शृंखला में 20 दिसंबर 2019 को राजस्थान के गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के अपराध पर सीरीज आई। इस कहानी में राजस्थान की राजनीति के उन आयामों को भी दर्शकों के सामने पेश किया गया है जिसके बारे में देश दुनिया को जानकारी कम थी। ‘रंगबाज फिर से’ नाम से के बाद इस वर्ष 29 जुलाई को ‘रंगबाज, डर की राजनीति’ के नाम से बिहार के सिवान के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के बनने और उनके मिटने की कहानी को दर्शकों के सामने पेश किया गया है। रंगबाज के इस सीजन में बिहार में सामाजिक न्याय के दौर की राजनीति के दांव पेंच और अपने राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा लेने के बारे में विस्तार से बताया गया है। शहाबुद्दीन के किरदार के साथ विनीत कुमार सिंह ने न्याय किया है। वेब सीरीज के इस सीजन की स्क्रिप्ट बहुत कसी हुई है। इसमें शहाबुद्दीन की प्रेमकथा वाले प्रसंग को भी उभारा गया है। शहाबुद्दीन के चरित्र के क्रूरतम पक्ष पर अपेक्षाकृत कम फोकस किया गया है। चंदा बाबू, जिनके बेटों की हत्या हुई थी, के दर्द और संघर्ष को उभारने में निर्देशक लगभग नाकाम रहे हैं। कहा जा सकता है कि ये सीजन शहाबुद्दीन पर केंद्रित है इस वजह से चंदा बाबू पर ज्यादा फोकस नहीं किया गया है। अगर चंदा बाबू के दर्द और संघर्ष को उभारा गया होता तो शहाबुद्दीन के कारनामों को अधिक प्रामाणिकता के साथ पेश किया जा सकता था। दरअसल इस तरह से सीरीज के लेखक सुनी सुनाई बातों, पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर कहानी कंस्ट्रक्ट करते हैं। उनको उस दौर के समाचरपत्रों को भी देखना चाहिए और कहानी लिखने के पहले प्राथमिक स्त्रोतों तक पहुंचना चाहिए था।

बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव जब घोटाले के भंवर में फंसे तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। उस घटना पर केंद्रित वेब सीरीज महारानी का दूसरा सीजन भी आया है। दूसरे सीजन में निर्देशक और लेखक ने इसकी कहानी को बहुत अधिक काल्पनिक बनाकर फिल्मी बनाने की कोशिश की है। इसमें पति पत्नी के बीच के संघर्ष में ‘वो’ की एंट्री कहानी को ‘पति पत्नी और वो’ की ओर ले जाती है। केंद्रीय पात्र भीमा भारती का अपनी पार्टी की कार्यकर्ता कीर्ति सिंह के साथ प्रेम चलता है। फिल्मी अंदाज में तीज वाले दिन जब भीमा भारती अपनी प्रेमिका कीर्ति सिंह के साथ अकेले कमरे में होते हैं तो रानी भारती की एंट्री कराई जाती है। ये बेहद पुराना फार्मूला रहा है। इस सीरीज में भी जब ये प्रसंग आता है तो दर्शक चौंकता नहीं है क्योंकि उसको पता है कि आगे क्या होनेवाला है। प्रेम प्रसंग के अलावा इसमें राजनीति की तमाम साजिशें हैं, तिकड़में हैं, डरा धमकाकर नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश भी है। पूरी कहानी अविभाजित बिहार में चलती है जहां शिबू सोरेन का किरदार भी महत्वपूर्ण पात्र के रूप में सामने आता है। झारखंड राज्य को लेकर सियासी सौदेबाजी भी है। इसके अलावा कई किरदार बिहार की समकालीन राजनीति के नेताओं से मेल खाते हैं। बहुत वर्षों पहले पटना में एक विधायक ने एक लड़की के साथ रेप किया था। वो आपराधिक वारदात देश भर में चर्चित हुआ था। उस घटना को भी महारानी सीजन 2 में दिखाकर इसको बिहार की कहानी बताने और बनाने की कोशिश निर्माताओं ने की है। और तो और इसमें चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के चरित्र से मेल खाता एक महिला पात्र गढ़ा गया है जो हमेशा लैपटाप पर आंकड़ों का खेल करती है। अपने नेता की छवि निर्माण में लगी रहती है।

रानी भारती के रोल में हुमा कुरैशी ने बेहतरीन अभिनय किया है लेकिन उनको अपने उच्चारण पर काम करने की जरूरत है। जब वो बिहार की कम पढ़ी लिखी मुख्यमंत्री के रूप में बोलती हैं तो ये उनके बोली से परिलक्षित नहीं होता है। कई स्थितियों में उनका इस तरह का उच्चारण खटकता है। बावजूद इन कमियों के महारानी का सीजन 2 पहले सीजन से बेहतर है। अब निर्माताओं ने तीसरे सीजन का भी संकेत दे दिया है। भीमा भारती की हत्या हो जाती है। दूसरे सीजन के अंत में जिस तरह से वेबसीरीज को मर्डर मिस्ट्री बनाने की कोशिश हुई है उसको देखकर लगता है कि इस सीरीज को लिखनेवालों के सामने राजनीति की जमीन को पकड़े रहने की चुनौती होगी। अन्यथा राजनीति से आरंभ होकर ये वेबसीरीज प्रेम त्रिकोण के रास्ते अपराध कथा में बदल जाएगी। ये अच्छी बात है कि बिहार की राजनीति और यहां की आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर मनोरंजन की दुनिया का ध्यान गया है। बिहार में इस तरह के पात्रों और घटनाओं की कमी नहीं है। अभी न बने लेकिन भविष्य में इस बात की संभवाना तो है ही कि जब महारानी का चौथा या पांचवा सीजन आएगा तो उसमें नीतीश कुमार के राजनीतिक दांव-पेंच और अलग अलग पार्टियों के साथ सरकार बनाने की घटनाओं पर भी रोचक कहानी कंस्ट्रक्ट होगी। तब इसको देखना और दिलचस्प होगा।   

Saturday, August 27, 2022

राजभाषा हिंदी की बढ़ने लगी व्याप्ति


राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं से प्रेम करते थे। उनके लेखन और वक्तव्यों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति उनका लगाव झलकता है। जब दिनकर राज्यसभा के सदस्य थे तो उस दौर में हिंदी को लेकर काफी चर्चा हुई थी। 6 मई 1963 को राज्यसभा में दिनकर ने हिंदी को लेकर अपनी बात रखी थी। भाषा पर पेश विधायी प्रस्ताव पर संशोधन प्रस्तुत करते हुए दिनकर ने आशा प्रकट की थी कि ‘केंद्रीय सरकार तत्काल कुछ ऐसा उपयुक्त तंत्र बनाएगी जो केंद्रीय सरकार को केंद्रीय सरकार की विभिन्न शाखाओं में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग पर सलाह देगा और संसद की सभाओं को हिंदी की प्रगति के संबंध में समय समय पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा, ताकि 1975 के वर्ष तक हिंदी विधि निर्माण तथा प्रशासन का उतना ही प्रभावी माध्यम बन जाए, जितना इस समय अंग्रेजी है।‘ दिनकर की चिंता स्वाधीनता के बाद हिंदी को उसका उचित अधिकार नहीं मिलने को लेकर थी। उनके वक्तव्य से स्पष्ट है। वो इससे चिंतित थे कि शासन के तंत्र में हिंदी की प्रगति अंग्रेजी के साथ साथ कैसे की जा सकती है। उन्होने उस वक्त के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के एक वक्तव्य को भी अपनी चिंता से जोड़ा था। गृहमंत्री ने तब कहा था कि  ‘हम अंग्रेजी को अनिश्चित काल के लिए जीवन-दान दे रहे हैं, अनंत काल के लिए नहीं।‘  दिनकर ने गृहमंत्री के इस वाक्य को उद्धृत करते हुए अपना मत रखा था, ‘जिस प्रकार सरकार इस बारे में कार्य करती है, उससे मुझे भय होता है कि वह ‘कल-कल’ की बात अनंत काल तक बढ़ जाएगी।‘  दिनकर हिंदी को राजभाषा बनाए जाने और फिर 15 वर्षों के बाद उसकी समयावधि बढ़ाने को लेकर सशंकित थे। दिनकर की आशंका स्वाधीन भारत में सही साबित हुई और हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिशें ‘कल-कल’ करते हुए सचमुच अनंतकाल तक चलती चली जा रही हैं। 

हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रश्न बहुत पुराना है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ये तय था कि स्वतंत्रता के बाद हिंदी राष्ट्रभाषा बनेगी। गांधी भी अपने लेखों और भाषणों में इसके आग्रही दिखते हैं। वो अपनी पत्रिका हरिजन में और अपने वक्तव्यों में इस बात के संकेत देते रहते थे कि हिंदी को स्वाधीनता के बाद राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए। गांधी जी तो स्वराज्य के लिए भी भारतीय भाषाओं को आवश्यक मानते थे। 1921 में उन्होंने कहा था, अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी भारतीय मस्तिष्क का सर्वोच्च विकास संभव होना चाहिए। अंग्रेजी से प्रेरणा लेने की गलत भावना से छुटकारा होना स्वराज्य के लिए अत्यावश्यक है। 1947 में अपनी पत्रिका हरिजन में भी गांधी ने लिखा, ‘मेरा आशय यह है कि जिस प्रकार हमने सत्ता हड़पनेवाले अंग्रेजों के राजनैतिक शासन को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंका उसी प्रकार हमें सांस्कृतिक अधिग्रहण करनेवाली अंग्रेजी को भी हटा देना चाहिए। यह आवश्यक परिवर्तन करने में जितनी देरी होगी उतनी ही अधिक राष्ट्र की सांस्कृतिक हानि होती जाएगी।‘ गांधी निरंतर अंग्रेजी को हटाने की बात कर रहे थे लेकिन उनके अनुयायी और स्वाधीनता के बाद सत्ता में आए नेता गांधी की इन बातों को राजनीतिक वजहों से नजरअंदाज करते रहे। संविधान सभा में सदस्यों ने भाषा संबंधी गांधी की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा। भाषा के प्रश्न पर लगातार बहस से बचते रहे और उसको अंतिम बैठकों के लिए टालते रहे। आखिरकार  12 सितंबर 1949 को संविधानसभा में भाषा के प्रश्न पर बहस आरंभ हुई। चर्चा तीन दिनों तक चली। तमाम तरह के तर्क वितर्क हुए। 14 सितंबर 1949 को ये तय किया गया कि देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी देश की राजभाषा होगी। संविधान सभा में हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर भी बहस और मतविभाजन हुआ था लेकिन हिंदी के पक्ष में बहुमत था। 

कुछ लोग संविधान सभा में हिंदी के पक्ष में बहुमत को भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद लोगों के मत बदलने से भी जोड़कर देखते हैं। प्रख्यात गांधीवादी अप्पा साहब पटवर्धन ने भी कहा था कि ‘यह उचित ही है कि हमलोग अब हिंदी को ही राष्ट्रभाषा कहें क्योंकि पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू होगी।‘ हिंदी को लेकर पक्ष विपक्ष की बातें होती रहीं पर यह प्रविधान बना कि संविधान के लागू होने के 15 वर्षों तक अंग्रेजी चलती रहेगी। 15 वर्षों के बाद अगर संसद को लगता है कि आगे भी इस प्रविधान की जरूरत है तो वो कानून बनाकर इसको लागू रख सकती है। फिर भाषा आयोग बना,अध्यादेश जारी हुए। हिंदी राजभाषा तो बनी रही पर सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का दबदबा कायम रहा। 1963 तक पूरे देश में ऐसी स्थिति बन गई जिससे साफ हो चला था कि 1965 में यानि संविधान लागू होने के 15 वर्ष बाद भी शासन की भाषा हिंदी नहीं हो पाएगी। 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में घोषणा कर दी कि ‘जबतक अहिंदी भाषी राज्य अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे तब तक हिंदी के साथ-साथ केंद्र में अंग्रेजी भी चलती रहेगी।‘ नेहरू का ये वक्तव्य भाषा अधिनियम का आधार बना। तब से लेकर अबतक अंग्रेजी शासन की भाषा बनी हुई है। उसका दबदबा कायम है क्योंकि इसको लेकर गंभीरता से प्रयास नहीं हुए, जो भ्रांतियां हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच पैदा की गईं उनको दूर करने का राजनीतिक स्तर पर प्रयास नहीं हुआ। देश को चलानेवाले अधिकतर लोग अंग्रेजीदां रहे और उनके लिए शासन की भाषा अंग्रेजी रखना आसान रहा। 

लेकिन हिंदी को मजबूती देने का काम अहिंदी भाषियों ने भी किया चाहे वो वीर सावरकर हों, तिलक हों, भूदेव मुखर्जी हों, सुनीति कुमार चाटुर्ज्या हों या अन्य महानुभाव। उसी तरह से जब 2014 में केंद्र में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और गुजराति होते हुए भी उन्होंने अपनी प्राथमिक भाषा हिंदी बनाई तो शासन की भाषा बदलने लगी। 2019 में जब अमित शाह गृह मंत्री बने तो उन्होंने खामोशी से राजभाषा हिंदी को मजबूत करने का प्रयास आरंभ कर दिया। अमित शाह भी गुजराती हैं और उन्होंने हिंदी सीखी। वो खुद हिंदी में लिखने लगे और अधिकारियों को हिंदी में लिखने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करने लगे। जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी में कार्य करने लगे तो अन्य मंत्रियों ने भी इसको प्राथमिकता देना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ कि अन्य मंत्रालयों में हिंदी में कामकाज को वरीयता मिलने लगी। राजभाषा गृह मंत्रालय के अंतर्गत आता है और गृहमंत्री राजभाषा हिंदी को प्राथमिकता दे रहे हैं। 2019 में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में दूसरी बार सरकार बनी तो गृह मंत्री अमित शाह ने रुचि लेकर 49 मंत्रालयों में हिंदी सलाहकार समिति का गठन करवाया। राजभाषा विभाग की सक्रियता सतह पर दिखने लगी। अन्य भारतीय भाषाओं को हिंदी से जोड़ने का कार्य आरंभ हुआ। ‘लीला राजभाषा’ और ‘लीला प्रवाह’ के अंतर्गत 14 भारतीय भाषाओं में हिंदी सीखने की सहूलियतें प्रदान की गई। अनुवाद का साफ्टवेयर ‘कंठस्थ’ और ‘ईमहाशब्दकोश’ तैयार हुए। संसदीय राजभाषा समिति ने दस खंडों में अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को दीं। पिछले वर्ष काशी में पहला अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन आयोजित किया गया। हिंदी दिवस के अवसर पर अगले महीने सूरत में राजभाषा का एक सम्मेलन गृह मंत्रालय आयोजित कर रहा है। एक शब्दकोश पर भी कार्य हो रहा है। इसके अलावा कर्मचारियों के हिंदी प्रशिक्षण को लेकर भी राजभाषा विभाग सक्रिय दिख रहा है। गृह मंत्रालय की पहल पर गैर हिंदी भाषी कर्माचरियों में हिंदी सीखने की ललक बढ़ी है। गृह मंत्री अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि वो खुद हिंदी के व्यापक प्रयोग को लेकर सतर्क रहते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि दिनकर ने जो आशंका जताई थी वो अब निर्मूल साबित होगी और हिंदी को उसका उचित स्थान मिलेगा और वो शासन के साथ ज्ञान और रोजगार की भाषा भी बनेगी।  

Saturday, August 20, 2022

बहिष्कार के मकड़जाल में बालीवुड


इन दिनों कुछ फिल्मों के बहिष्कार को लेकर खूब चर्चा हो रही है। इंटटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर फिल्मों के बायकाट को लेकर पक्ष विपक्ष में हलचल दिखती है। अभिनेता आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा की रिलीज के पहले से उसके बायकाट की अपील जारी होने लगी थी। फिल्म रिलीज हुई और फ्लाप हो गई। इसी तरह से अक्षय कुमार की फिल्म रक्षाबंधन को लेकर भी बायकाट की अपील इंटरनेट मीडिया पर हुई। ये फिल्म भी फ्लाप हो गई। हम इन फिल्मों के बायकाट और इनके फ्लाप होने पर बात करेंगे लेकिन उसके पहले देख लेते हैं कि और कौन सी बड़ी बजट की फिल्में फ्लाप हुईं। यशराज फिल्म्स की दो बेहद महात्वाकांक्षी फिल्म आई, सम्राट पृथ्वीराज और शमशेरा। दोनों फिल्मों ने बाक्स आफिस पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार फिल्म सम्राट पृथ्वीराज की लागत तीन सौ करोड़ रुपए थी और उसने बाक्स आफिस पर तिरानवे करोड़ रुपए का बिजनेस किया। इसी तरह से शमशेरा के निर्माण की लागत डेढ सौ करोड़ रुपए थी और इस फिल्म ने भी चौंसठ करोड़ रुपए का बिजनेस किया। अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म बच्चन पांडे को बनाने में एक सौ अस्सी करोड़ रुपए खर्च हुए और बाक्स आफिस बिजनेस तेहत्तर करोड़ का रहा। बच्चन पांड को लेकर कहा गया था कि वो ‘द कश्मीर फाइल्स’ की वजह से पिट गई थी।खुद अक्षय कुमार ने भी भोपाल में चित्र भारती के मंच से ऐसा ही कहा था। सम्राट पृथ्वीराज और शमशेरा के खिलाफ न तो कोई बायकाट की अपील थी और न ही कोई हैशटैग चला था। बायकाट की अपील होती क्यों हैं इसके पीछे के कारणों को देखना चाहिए। 

आज से करीब दो दशक पहले गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। उसके बाद अभिनेता आमिर खान ने एक साक्षात्कार दिया था। उस साक्षात्कार में उन्होंने उस वक्त के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर जमकर आरोप लगाए थे। गुजरात में हुई हिंसा में मरनेवालों के लिए नरेन्द्र मोदी को उत्तरदायी माना था। उसी साक्षात्कार में आमिर खान ने नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा नहीं मिलने का उपहास भी उड़ाया था। 2006 में आमिर खान मेधा पाटकर के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन में शामिल हुए थे और उस वक्त की गुजरात सरकार के विरोध में जमकर बयानबाजी की थी। 2015 में जब गजेन्द्र चौहान को पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान का चेयरमैन नियुक्त किया गया था तो छात्रों ने उसका विरोध किया था। आंदोलन भी हुआ था। उस समय भी आमिर खान मुखर हुए थे और आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन किया था। 2015 में ही जब पुरस्कार वापसी अभियान चल रहा था तब भी आमिर खान ने देश में असहिष्णुता का राग अलापा था। उस वक्त की अपनी पत्नी किरण राव से एक बातचीत का हवाला दिया था और कहा था कि वो देश के माहौल से डरकर देश छोड़ने की बात करती है। आमिर खान के इन बयानों से स्पष्ट है कि वो राजनीति में एक पक्ष विशेष का विरोध कर रहे थे और परोक्ष रूप से एक पक्ष का समर्थन कर रहे थे। जब आप राजनीतिक होना चाहते हैं तो विरोध के लिए भी तैयार रहना चाहिए। ये संभव नहीं कि जब आपकी फिल्म आए तो लोग राजनीतिक समरत् या विरोध को भुलाकर फिल्म देखने चले जाएं। आपकी फिल्म को सफल बनाएं। आप जिस पक्ष का विरोध कर रहे थे उनको भी तो आपके विरोध का अधिकार है। उसी अधिकार की परिणति है बहिष्कार की अपील। बायकाट का हैशटैग।

आमिर खान या तमाम वो अभिनेता जो राजनीतिक टिप्पणियां करते रहे हैं उनके खिलाफ अगर बायकाट की अपील होती है तो इससे उनको परेशान नहीं होना चाहिए। राजनीति में तो वार पलटवार होते ही रहते हैं। दीपिका पादुकोण भी जब अपनी फिल्म छपाक के रिलीज के पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी के छात्रों के प्रदर्शन में गई थीं तो उसका नकारात्मक प्रभाव फिल्म के कारोबार पर पड़ा था। अभी एक और फिल्म रिलीज हुई दोबारा, जिसमें अभिनेत्री तापसी पन्नू हैं। पिछले दिनों तापसी पन्नू और उस फिल्म के निर्देशक का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो फिल्मों के बायकाट के ट्रेंड का मजाक बना रही थीं। उनका निर्देशक भी राजनीतिक बातें कर रहा था। वो पहले भी नेताओं को लेकर अपमानजनक और घटिया बातें करता रहा है। उनको गंभीरता से कोई लेता नहीं। तापसी की इस फिल्म को लेकर भी बायकाटदोबारा ट्विटर पर ट्रेंड हुआ। फिल्म पहले दिन सिर्फ 72 लाख का कारोबार कर पाई। कई शोज रद्द करने पड़े। थिएटरों में सन्नाटा रहा। इस फिल्म की लागत भी करीब तीस करोड़ रुपए है। अब तापसी पन्नू और उसके निर्देशक को समझ में आ रहा होगा कि ये बहिष्कार की अपील का मजाक उड़ाना उनको कितना महंगा पड़ा। हो सकता है कि इन अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और निर्देशकों को फिल्मों के फ्लाप होने पर धनहानि न होती हो क्योंकि पैसा तो निर्माता का लगता है। ये लोग फिल्म पूरी करके अपना मेहनताना लेकर निकल लेते हैं। लेकिन इनको ये सोचना होगा कि इसका प्रभाव उनके करियर पर पड़ सकता है। 

बहिष्कार को लेकर एक बात और कही जाती है कि इंटरनेट मीडिया के जमाने में ये नया ट्रेंड आरंभ हुआ है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर भले ही बहिष्कार नया लगता हो लेकिन हमारे देश में तो बहिष्कार की अपील स्वाधीनता पूर्व से होती रही है। गांधी जी ने भी अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए बहिष्कार की अपील को अपना हथियार बनाया था। इमरजेंसी के दौर में भी लोगों ने बहिष्कार की अपील की थी। पिछले दिनों जगदीशचंद्र माथुर का नाटक कोणार्क पढ़ रहा था। इस पुस्तक में मई 1961 में लिखी माथुर साहब की एक टिप्पणी है, ‘यों तो इस नाटक के विषय में मुझे अनेक रोचक अनुभव हुए, किंतु सबसे दिलचस्प अनुभव हुआ दिल्ली के अंग्रेजी समाचारपत्रों में इस नाटक के अभिनय की समालोचना पढ़कर । उनमें से एक समालोचक महोदय (अथवा महोदया!) ने लिखा कि इस नाटक की भाषा इतनी दुरूह है कि इस नाटक का बहिष्कार होना चाहिए, क्योंकि लेखक ने यह नाटक संस्कृतमयी हिंदी का प्रचार करने के लिए लिखा है।‘ इससे स्पष्ट है कि रंगमंच की दुनिया में 1961 में बहिष्कार की अपील की गई थी। ये अलग बात है कि उस समय इंटरनेट मीडिया नहीं था। तो जो लोग इसको नया ट्रेंड बता रहे हैं उनको इतिहास में जाने और समझने की आवश्यकता है। 

एक और बात है जो बायकाट ट्रेंड के साथ सामने आ रही है। पहले फिल्मों का जब विरोध होता था तो सिनेमा हाल के पोस्टर फाड़े जाते थे, कई बार उनमें आग भी लगा दी जाती थी। विरोध प्रदर्शन जब उग्र होता था तो शहरों में भी प्रदर्शन आदि होते थे। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब फिल्म पद्मावत को लेकर कई शहरों में विरोध प्रदर्शन और आगजनी हुई थी। अब इस तरह के प्रदर्शन लगभग बंद हो गए हैं और इंटरनेट मीडिया पर विरोध होता है। क्या इसको भारतीय समाज के मैच्योर होने के संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए। हिंसा और आगजनी वाले विरोध प्रदर्शन से अलग विरोध का एक ऐसा तंत्र जिसमें अपनी बात भी पहुंच जाए और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान भी न हो। पुलिस और अन्य तंत्र का समय भी खराब न हो। फिल्मों के फ्लाप होने की एकमात्र वजह बायकाट नहीं है। उसपर एक अलग लेख लिखा जा सकता है कि इन दिनों बड़े बजट की अधिकतर हिंदी फिल्में क्यों पिट रही हैं। क्यों वो अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रही हैं। लेकिन बायकाट के इस खेल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उलझ गई है और उसको फिलहाल कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। 

Saturday, August 13, 2022

सलमान रश्दी पर हमले से उपजे प्रश्न


बुकर पुरस्कार से सम्मानित और करीब तीन दशक से भारी सुरक्षा में जीवन बसर कर रहे भारतीय मूल के लेखक सलमान रश्दी पर अमेरिका के न्यूयार्क में हमला हुआ। हमलावर हादी मतर ने उनकी गरदन, हाथ और पेट पर चाकू से वार किए। उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। उनके लिटरेरी एजेंट के अनुसार उनकी एक आंख की रोशनी जा सकती है। हमले में उनके हाथ की नस कट गई है और लीवर भी जख्मी हुआ है। सलमान रश्दी पर हमले की आशंका काफी लंबे समय से बनी हुई थी। जब उनकी पुस्तक ‘द सेटेनिक वर्सेस’ प्रकाशित हुई थी तो उनपर ईशनिंदा का आरोप लगा था। उसके बाद 14 फरवरी 1989 को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खोमैनी ने सलमान रश्दी की मौत का फतवा जारी किया था। खोमैनी ने उस किताब को ईशनिंदा और इस्लाम का मजाक उड़ाने का दोषी करार दिया था । खोमैनी के फतवे के बाद सलमान रश्दी बहुत दिनों तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहे थे। कभी ब्रिटेन में तो कभी नार्वे में रहे। अपने निर्वासन के दिनों को सलमान रश्दी ने अपनी पुस्तक ‘जोसेफ एंटन’ में विस्तार से लिखा है। साढे छह सौ पृष्ठों की इस पुस्तक में सलमान रश्दी ने निर्वासन का दर्द तो लिखा ही है कई जगहों पर अपने जीवन पर मंडरा रहे आसन्न खतरे का भी उल्लेख किया है। सलमान रश्दी पर हमले के बाद कई बिंदुओं पर एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता है। सलमान पर जानलेवा हमला अमेरिका के शहर न्यूयार्क में हुआ। वो भी करीब ढाई हजार लोगों की उपस्थिति में। यहां ये प्रश्न उठता है कि जो अमेरिका पूरी दुनिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाता रहता है उसके यहां इस तरह के हमले क्यों हो जाते हैं। ब्रिटेन और नार्वे में तो सलमान रश्दी पर हमला नहीं हो पाया। अमेरिका में हमलावरों ने अपने नापाक मंसूबे को कैसे अंजाम तक पहुंचा दिया। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटनेवाला देश अपनी धरती पर एक लेखक को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता है? 

सलमान रश्दी पर हमले के बाद दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न ये उठता है कि कोई मजहबी नेता या मजहबी रहनुमा किसी की हत्या का फतवा कैसे जारी कर सकते हैं। इस्लाम में कई बार ये देखने को मिलता है कि ईशनिंदा के आरोप में मौत का फतवा जारी कर दिया जाता है। मौत का फतवा जारी करने के साथ ही इनाम की घो]षणा भी की जाती है। अयातुल्ला खोमैनी ने जब सलमान रश्दी की मौत का फतवा जारी किया था तब भी मारनेवाले को भारी भरकर रकम इनाम में देने की बात की गई थी। ये सब धर्म की आड़ में किया जाता है। अमेरिकी मीडिया में छप रही खबरों के मुताबिक सलमान रश्दी पर हमला करनेवाला हादी मतर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नामक संस्था का सदस्य है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध उसके परिचय में शिया उग्रवादी संगठनों से संबंध का शक भी है। अब किस तरह से हादी मतर को रैडिकलाइज किया गया कि वो भीड़ के बीच किसी की जान लेने चला गया। 

सलमान रश्दी अकेले नहीं हैं जिनपर ‘द सैटेनिक वर्सेस’ की वजह से हमला हुआ है। द सैटेनिक वर्सेस से जुड़े कई लोगों पर हमले हुए। एक व्यक्ति की तो जान भी गई। 1991 में सलमान की इस पुस्तक का इटालियन में अनुवाद करनेवाले एत्तोरे कैपरियोलो पर मिलान में हमला हुआ। उनके भी गले, हाथ और छाती पर चाकू से वार कर उनको बुरी तरह से घायल कर दिया गया था। 1991 में ही सैटेनिक वर्सेस का जापानी में अनुवाद करनेवाले  हितोशी इहारशी की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। उनका शव जापान के एक विश्वविद्यालय के परिसर में मिला था। इसके दो साल बाद नार्वे में उस प्रकाशक पर हमला हुआ जिसने नार्वे में ‘द सैटेनिक वर्सेस’ का प्रकाशन किया था। उनको उनके घर के सामने गोली मारी गई थी जिसमें वो बुरी तरह से जख्मी हो गए थे। इन वारदातों के बाद सलमान रश्दी की सुरक्षा और बढ़ा दी गई थी। अगर नार्वे की घटना को छोड़ दिया जाए तो सभी हमले लगभग एक ही तरीके से किए गए हैं यानि गले पर वार। ऐसा प्रतीत होता है कि हर हमलावर सर को तन से जुदा करने की कोशिश में गले पर वार करता है। 

अब अगर हम अपने देश में सलमान रश्दी पर हुए हमले पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रगतिशील पैरोकारों की प्रतिक्रिया को देखते हैं। लगभग हर जगह इसके लिए धर्मांधता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, बिना उस धर्म का नाम लिए। जावेद अख्तर ने सलमान पर हमला करनेवाला को ‘किसी कट्टरपंथी’ कहा। उन्होंने हमलावर का नाम और पहचान सामने आने के बाद से चुप्पी साध ली है। हमलावर को इस्लामी कट्टरपंथी कहने में इनके हाथ कांपने लगते हैं, उंगलियां सुन्न हो जाती हैं। अगर कोई अपराधी हिंदू होता है तो उसको हिंदू धर्मांध या हिंदू फैनेटिक कहने में देर नहीं करते हैं। सलमान रश्दी पर हमले के ठीक पहले उन्होंने एक रिट्वीट किया है जिसमें अक्षय कुमार को कनाडा कुमार बताकर उनका मजाक उड़ाया गया है और आमिर खान की इस बात के लिए प्रशंसा की गई है कि उसने अपनी फिल्म पाकिस्तान में रिलीज करने के मना कर दिया था। जावेद अख्तर भी बहुधा नैतिकता की मीनार पर खडे होकर अपनी निष्पक्षता का ढिंढोरा पीटते रहते हैं लेकिन समय आने पर उनकी निष्पक्षता का ढोंग उजागर हो जाता है। कई वामपंथी बुद्धिजीवी सलमान पर हुए हमले को लेकर बहुत हल्की प्रतिक्रिया दे रहे हैं। हमलावर को धर्मांध कहने से इस समस्या का समाधान नहीं निकलनेवाला है। धर्मांध कहकर तो अपराध कम करते हैं। अपराधी के कुकर्मों पर धर्म का परदा डालने की कोशिश करते हैं। 

किसी भी अपराधी को धर्मांध बनाता कौन है इसपर विचार करना होगा, उन कारकों को चिन्हित करना होगा, उन स्थितियों की पहचान करनी होगी जिसमें कोई किसी की जान लेने की हद तक चला जाता है। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को इन कारणों पर विचार करके मुखर होना पड़ेगा अन्यथा उनकी प्रतिक्रिया रस्म अदायगी बनकर रह जाएगी। वैसे इस जमात से इस प्रकार की अपेक्षा रखना व्यर्थ है क्योंकि निर्वासित बंगालादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के मसले पर इन्होंने कभी कुछ नहीं बोला। जब बंगाल की वामपंथी सरकार ने उनको पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी या जब ममता सरकार ने उनको अपने राज्य में रखने से मना कर दिया, तब भी इन प्रगतिशीलों ने अपने मुंह सिल लिए थे। मेरे जानते दुनिया में इस्लाम अकेला ऐसा मजहब है जिसके माननेवालों के बीच मौत के फतवे की अवधारणा है। धर्म की आड़ में जिस तरह से हत्या होती है उसके बारे में मुस्लिम समाज के रहनुमाओं को भी विचार करना होगा। साहस के साथ इसके विरोध में अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। ईशनिंदा की सजा मौत की लगातार मजबूत होती जा रही अवधारणा पर न केवल विचार करने की आवश्यकता है बल्कि इसका निषेध भी समय की मांग है। इसके लिए मुस्लिम समाज को अपने मजहब में व्यापक स्तर पर धार्मिक सुधार की आवश्यकता है। वैज्ञानिक तरीके से अपने मजहबी विचारों की व्याख्या करने की जरूरत है। आधुनिक और सभ्य समाज में कानून और संविधान से बाहर जाकर मौत की सजा देने का अधिकार किसी को नहीं है। इस बात को प्रचारित प्रसारित करना होगा। यह काम आसान प्रतीत नहीं होता है। लेकिन आज नहीं तो कल इसपर काम करना ही पड़ेगा। बेहतर है कि इस कार्य को शीघ्र आरंभ कर दिया जाए, ताकि कम से कम लोगों की जान जाए और जो दहशत में जी रहे हैं उनको खुली हवा में सांस लेने का अवसर मिल सके। 

Saturday, August 6, 2022

प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना क्यों छोड़ा?


हिंदी में कथा सम्राट के नाम से प्रसिद्ध प्रेमचंद के कृतित्व और व्यक्तित्व को लेकर हिंदी में विपुल लेखन हुआ है। उनकी रचनाओं को आधार बनाकर देशभर के विश्वविद्यालयों में सैकड़ों शोध हुए हैं। इस बारे में भी सैकड़ों लेख लिखे गए कि कैसे प्रेमचंद गरीबों और किसानों की समस्याओं को अपनी रचनाओं में स्थान देते थे। उनकी रचनाओं में गरीबों और किसानों की समस्या के चित्रण के आधार पर उनकी प्रगतिशीलता और जनपक्षधरता को भी रेखांकित किया जाता रहा है। इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि प्रेमचंद पहले उर्दू में नवाबराय के नाम से लिखते थे। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि जुलाई 1908 में कानपुर से सोजेवतन नामक उनके पहले कहानी संग्रह का प्रकाशन हुआ था। इस संग्रह में प्रकाशित देशप्रेम की कहानियों को अंग्रेजों ने आपत्तिजनक माना था। तब कानपुर के कलक्टर ने उनको बुलाकर फटकारा था और कहा था कि अगर मुगलों का राज होता तो तुम्हारे दोनों हाथ काट लिए जाते। तुम्हारी कहानियां एकांगी हैं और तुमने अंग्रेजी राज की तौहीन की है। कलक्टर ने कहानी संग्रह को जब्त कर उसमें आग लगवा दी थी। फिर पुलिस के अफसरों के साथ कलेक्टर ने मीटिंग की जिसमें ये निष्कर्ष निकाला गया कि कहानियां राजद्रोह की श्रेणी में आती हैं। प्रेमचंद ने लिखा- ‘पुलिस के देवता ने कहा कि ऐसे खतरनाक आदमी को जरूर सख्त सजा देनी चाहिए।‘ मामला किसी तरह रफा दफा हुआ। उनको चेतावनी दी गई थी कि वो अपनी रचनाएं प्रकाशन पूर्व प्रशासन को दिखवा लिया करें। कहानी संग्रह की जब्ती और अंग्रेज कलेक्टर की फटकार के बाद नवाबराय ने प्रेमचंद के नाम से हिंदी में लिखना आरंभ कर दिया। इस तरह के आलेखों में ये बताया जाता रहा है कि इस कारण से ही प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना बंद कर दिया। लेकिन ये सत्य नहीं बल्कि अर्धसत्य है। इस बात की चर्चा कम होती है कि प्रेमचंद ने जब ‘कर्बला’ नाम का नाटक लिखा था तो उसका उस दौर के मुस्लिम लेखकों ने जमकर विरोध किया था। ये तर्क दिया गया था कि हिंदू लेखक मुसलमानों के इतिहास को आधार बनाकर कैसे लिख सकते हैं। प्रेमचंद इस तरह की बातों के आधार पर अपनी आलोचना से बेहद खिन्न हुए थे। इस बात की चर्चा हिंदी के प्रगतिशील लेखकों ने बिल्कुल ही नहीं की है बल्कि उनके जीवनीकार ने भी इसका उल्लेख नहीं किया। कमलकिशोर गोयनका जैसे प्रेमचंद साहित्य के अध्येता इस बात को रेखांकित करते रहे हैं। 

अब देखते हैं कि प्रेमचंद ने स्वयं उर्दू में नहीं लिखने का क्या कारण बताया है। 1964 में साहित्य अकादमी से एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जिसका नाम है प्रेमचंद रचना संचयन। इस पुस्तक का संपादन निर्मल वर्मा और कमलकिशोर गोयनका ने किया था। इस पुस्तक में 1 सितंबर 1915 का प्रेमचंद का अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र का अंश प्रकाशित है। इस पत्र में प्रेमचंद ने लिखा है, ‘अब हिंदी लिखने की मश्क (अभ्यास) भी कर रहा हूं। उर्दू में अब गुजर नहीं। यह मालूम होता है कि बालमुकुंद गुप्त मरहूम की तरह मैं भी हिंदी लिखने में जिंदगी सर्फ (खर्च) कर दूंगा। उर्दू नवीसी में किस हिंदू को फैज (लाभ) हुआ है, जो मुझे हो जाएगा।‘  इस वाक्यांश को ध्यान से समझने की आवश्यकता है, उर्दू में अब गुजर नहीं है और उर्दू नवीसी में किस हिंदू को लाभ हुआ है। इससे प्रेमचंद के आहत मन का पता चलता है कि वो उर्दू वालों या अपने समकालीन मुसलमान लेखकों के विरोध से कितने खिन्न थे। वो स्पष्ट रूप से प्रश्न की शक्ल में कह रहे थे कि उर्दू में लिखने से किसी हिंदू को लाभ नहीं हो सकता । प्रेमचंद के इस आहत मन को प्रगतिशील आलोचकों और लेखकों ने या तो समझा नहीं या समझबूझ कर योजनाबद्ध तरीके से दबा दिया। इस बात की संभावना अधिक है कि जानबूझकर इस प्रसंग को नजरअंदाज किया गया। प्रेमचंद को प्रगतिशील जो साबित करना था। जानबूझकर इस वजह से क्योंकि प्रेमचंद से संबंधित कई तथ्यों को ओझल किया गया। नई पीढ़ी को ये जानना चाहिए कि 1920 में प्रकाशित कृति ‘वरदान’ को प्रेमचंद ने राजा हरिश्चंद्र को समर्पित किया था। उसको बाद के संस्करणों में हटा दिया गया। इसी तरह प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ का नाम ही बदल दिया गया। पंडित जनार्दन झा ‘द्विज’ ने अपनी ‘पुस्तक प्रेमचंद की उपन्यास कला’ में स्पष्ट किया है कि प्रेमचंद ने पहले अपने उपन्यास का नाम गौ-दान रखा था। द्विज जी के कहने पर उसका नाम गो-दान किया गया। गो-दान 1936 में सरस्वती प्रेस, बनारस और हिंदी ग्रंथ-रत्नाकर कार्यालय, बंबई (अब मुंबई) से प्रकाशित हुआ। लेकिन आज जो उपन्यास उपलब्ध हैं उसका नाम गोदान है। गो और दान के बीच के चिन्ह को हटाकर इसको मिला दिया गया। प्रेमचंद की रचनाओं में भी बदलाव किए गए जिसके प्रमाण उपलब्ध हैं। 

प्रेमचंद के उपरोक्त कथन कि उर्दू में लिखने से किसी हिंदू को लाभ नहीं हो सकता, में उपेक्षा का दर्द है और वो दर्द कालांतर में हिंदी-उर्दू संबंध में भी दिखता है। प्रगतिशीलों ने उर्दू में हिंदू लेखकों की उपेक्षा को अपने लेखन में प्रमुखता नहीं दी और उर्दू के पक्ष में खड़े होकर गंगा-जमुनी तहजीब के विचार को प्रमुखता देते रहे। यह अनायास नहीं है कि उर्दू लेखकों को जितना मान-सम्मान और स्थान हिंदी साहित्य में मिला उस अनुपात में हिंदी लेखकों को उर्दू में नहीं मिल पाया। उर्दू के तमाम शायर इकबाल से लेकर फैज तक देशभर में तब लोकप्रिय हो पाए जब उनके दीवान देवनागरी लिपि में छपकर आए। उर्दू वालों ने ये सह्रदयता हिंदी के लेखकों को लेकर नहीं दिखाई। निराला, दिनकर, पंत आदि की रचनाओं का उर्दू में अपेक्षाकृत कम अनुवाद हुआ। अंग्रेजों के साथ मिलकर उर्दू ने करीब सौ सालों तक हिंदी को दबाने का काम किया। उन्नसवीं सदी के आखिरी वर्षों में जब हिंदी अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रही थी तो सर सैयद अहमद ने अलीगढ़ में ‘उर्दू डिफेंस एसोसिएशन’ नाम की संस्था बनाई। इसी तरह जब 1900 में संयुक्त प्रांत के गवर्नर मैकडानल ने हिंदी को उर्दू के बराबर दर्जा देने की घोषणा की तो सर सैयद के उत्तराधिकारी मोहसिन उल मुल्क ने इसका विरोध किया था। ये बातें नामवर सिंह भी स्वीकार करते थे। लेकिन नामवर के इस स्वीकार का भी प्रचार प्रसार नहीं हो पाया और उसको दबा दिया गया। कहना न होगा कि प्रगतिशील विचार के झंडाबरदार हर उस विचार को दबा देते थे जिससे उर्दू और उर्दू वालों की छवि हिंदी और हिंदीवालों के विरोध की बनती थी। 

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में या अमृतकाल में प्रेमचंद के साथ हुए इन छल के दोषियों को चिन्हित करना चाहिए। चिन्हित करने के साथ-साथ प्रेमचंद की रचनाओं को मूल स्वरूप में लाकर उनका समग्रता में मूल्यांकन भी होना चाहिए। साहित्य अकादमी  लेकर प्रेमचंद के नाम पर बनी संस्थाएं और विष्वविद्यालयों के हिंदी विभागों का ये उत्तरदायित्व है कि वो अपने पूर्वज लेखक की रचनाओं के साथ हुए इस अनाचार को दूर करने की दिशा में ठोस और सकारात्मक पहल करें। एक लेखक जिसका मन हिंदू धर्म में पगा है, जो अपनी रचनाओँ में भारत और भारतीयता की बात करता है, जो बच्चों के लिए रामचर्चा जैसी कथा पुस्तक लिखता है, जो स्वामी विवेकानंद को उद्धृत करता है उसको मूल रूप में पुनर्स्थापित किया जाए। प्रेमचंद को मार्क्सवाद की जकड़न से आजाद करवाने के लिए सांस्थानिक प्रयत्व किए जाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए बनाए जानेवाले पाठ्यक्रमों में प्रेमचंद के वास्तविक स्वरूप को छात्रों को पढ़ाया जा सके, इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए।   

Saturday, July 30, 2022

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन


आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई।  जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई। 

प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा।  साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘  इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे। 

हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने  काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘  इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘ 

उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की । 

इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था।  उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए। 


Saturday, July 23, 2022

रचनात्मकता से समृद्ध होंगी भाषाएं


दो दिन पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। फीचर फिल्मों और लोकप्रिय सितारों को पुरस्कार मिले। उनकी खूब चर्चा हुई लेकिन कुछ फिल्मों का उल्लेख नहीं हो पाया। ये उन भाषाओं में बनी फिल्में हैं जो हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जाती हैं। कई बार छोटे भूभाग पर बोली जानेवाली भाषा में बेहतरीन फिल्म देखने को मिल जाती हैं कई बार ऐसा होता कि भौगोलिक रूप से बड़े क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा में अच्छी फिल्में बनती हैं। दो दिन पहले घोषित राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट नान फीचर फिल्म के लिए डांगी भाषा की फिल्म टेस्टीमनी आफ एना चुनी गई। इस भाषा के बारे में कम ही जानकारी है। गुजरात का एक जिला है डांग जो महाराष्ट्र की सीमा से लगता है। उस जिले में आदिवासी आबादी है और वहां डांगी बोली जाती है। इस छोटे से आदिवासी बहुल जिले में बोली जानेवाली भाषा में बनी नान फीचर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में स्वर्ण कमल प्रदान किया जाएगा। इसी तरह 2020 के लिए ही बेस्ट शार्ट फिल्म कर्बी भाषा में बनी एक फिल्म को दिए जाने की घोषणा की गई है। हरियाणवी में दादा लख्मी पर बनी फिल्म , दिमासा में अमी बरुआ की फिल्म और टुलू में संतोष माडा की फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया जाएगा। इसके अलावा राजस्थानी की एक फिल्म को भी सम्मानित करने की घोषणा की गई है।

उपरोक्त सभी भाषाओं पर विचार करें तो इनमें से कोई भी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है। राजस्थानी को छोड़कर सभी भाषाएं अपेक्षाकृत छोटे भूभाग की भाषा है लेकिन इन भाषाओं में लगातार फिल्में बन रही हैं। लगातार इस वजह से कि पिछले तीन वर्षों के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची देखने पर इस तरह की कई भाषाओं की फिल्में दिखती हैं जिनको स्वर्ण कमल या रजत कमल से सम्मानित किया गया है। 2017 में तो निर्देशक की पहली सर्वोत्तम फिल्म का अवार्ड लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म सिंजर को दिया गया था। इस फिल्म का चयन करनेवाली जूरी के अध्यक्ष मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर थे। करीब 115 मिनट की ये फिल्म लक्षद्वीप में रहनेवाले एक मछुआरे पर वैश्विक आतंकवाद के प्रभाव की कहानी है। फिल्म में ये दिखाया गया है कि जब उसकी बहन और मंगेतर को आईएसआईएस के आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाया जाता है तो पता चलता है कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब पता चलता है कि युवतियां गर्भवती हैं। जब उनसे संवाद होता है तो ये बात सामने आती हैं कि वो अपना गर्भ गिराने को तैयार नहीं हैं। इस पूरी कहानी और नायक के मन के द्वंद्व को निर्देशक पैंपली ने बेहतरीन तरीके से दर्शकों के सामने रखा है। फिल्म के साथ साथ निर्देशक को भी सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष लद्दाखी और टुलू भाषा में बनी फिल्मों को भी पुरस्कृत किया गया था। अगले वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में भी राजस्थानी, गारो, सेरदुकपेन जैसी भाषाओं में बनी फिल्मों को सम्मानित किया गया। अगले वर्ष यानि 2019 में पर्यावरण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मोनपा में बनी फिल्म को दिया गया। इसके साथ ही खासी, मीशिंग, पानिया, टुलू और छत्तीसगढ़ी में बनी फिल्मों को भी पुरस्कार मिले।

उपरोक्त सारी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं है। कहने का अर्थ ये है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं होते हुए भी इन भाषाओं में बेहतर कार्य हो रहा है। वो अपनी जमीन से जुड़ी कहानियों और अपने समाज में फैली कुरीतियों पर अपनी कला के माध्यम से प्रहार कर रहे हैं। अच्छी बात ये है कि कला जगत इनके कार्यों को रेखांकित भी कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि इन भाषाओं में अधिक से अधिक काम हो ताकि उन इलाकों में फैली कहानियों को देश के सामने लाया जा सके। अब जैसे इस वर्ष अभिनेता यशपाल शर्मा की फिल्म दादा लख्मी को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। दादा लख्मी हरियाणवी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार थे। उनको हरियाणा में सूर्य कवि कहा जाता है। लोक कला के क्षेत्र में दादा लख्मी की बहुत प्रतिष्ठा है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने श्रमपूर्वक दादा लख्मी के जीवन को पर्द पर उतारा है। इसके लिए उनको इस बात की आवश्कता नहीं हुई कि हरियाणवी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा हो। किसी भी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग अपनी जगह सही हो सकती है लेकिन उस भाषा के लोगों का ये भी दायित्व होता है कि वो अपनी भाषा में बेहतर काम करें और उसको समृद्ध बनाएं।

इस देश में भाषा के नाम पर स्वाधीनता के बाद से राजनीति हो रही है। कभी राष्ट्रभाषा के नाम पर तो कभी राज्यों के बंटवारे के नाम पर तो कभी शिक्षा नीति में भाषा को मिलनेवाली प्राथमिकता के नाम पर। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने के बाद भी भाषा को लेकर एक विभाजन करने की कोशिश की गई थी लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा का उल्लेख होने की वजह से वो विभान संभव नहीं हो पाया। कला जगत में भाषा के नाम पर राजनीति अपेक्षाकृत कम है लेकिन जो कलाकार भाषा के आधार पर कला से महत्व चाहते हैं उनको अपनी भाषा में रचनात्मक कार्य करना चाहिए। रचनात्मक कार्यों से उस भाषा के प्रति लोगों के मन में एक आकर्षण पैदा होगा और वो अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी। अगर हम लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म संजर का ही उदाहरण लें तो निर्देशक ने अपनी कला के माध्यम से अपनी भाषा को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। जिस प्रकार से उन्होंने अपनी फिल्म ने वैश्विक आतंकवाद और उसके प्रभाव का मुद्दा उठाया और उसको वैश्विक मंचों पर सराहना मिली। उसने फिल्म से साथ साथ जेसरी भाषा के बारे में जानने की उत्सकुकता भी पैदा की। इस तरह के प्रयासों से न केवल भाषा का फैलाव होता है बल्कि भाषा को मजबूती भी मिलती है।

देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषा में फिल्में बनने का एक और लाभ है।    हमारे यहां कथावाचन की एक सुदीर्घ और लंबी परंपरा रही है। उस परंपरा को समृद्ध करने के लिए अपने देश की हर भाषा में जो कदम कदम पर कहानियां बिखरी पड़ी हैं, जो लोककथाएं सुनाई जाती हैं उनको फिल्मों के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा सकते है। 2017 में ही एक फिल्म पुरस्कृत हुई थी जिसका नाम है विलेज राकस्टार और इसकी निर्देशक हैं रीमा दास। असमिया में बनी इस फिल्म में एक उत्तर पूर्व के एक 10 वर्षीय बच्ची धुनू की कहानी है। वो अपना राक बैंड बनाना चाहती है। इस फिल्म में उसके सपने और संघर्ष के बीच चलती कथा है जिसमें उसकी विधवा मां है और लड़कों का एक समूह है। इसको जिस तरह से निर्देशक ने कहानी में पिरोया है वो अद्भुत है। पिछले दिनों कान में आयोजित फिल्म फेस्चिवल में भारत को दुनिया का कंटेंट हब बनाने की बात हुई थी। तमाम तरह की सहूलियतों के साथ साथ हमारे देश की सैकड़ों भाषा में फैली कहानियां भी इस योजना में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। अगर हम गंभीरता से अपनी भाषा को समृद्ध और मजबूत करना चाहते हैं तो उसमें रचनात्मक कार्य करें। दुनियाभर का उदाहरण हमारे सामने है कि कोई भी भाषा आंदोलन से न तो दीर्घजीवी हुई है और न ही समृद्ध। उसमें होनेवाले रचनात्मक कार्य ही उस भाषा को और उसको बरतनेवालों को दीर्घायु बनाते हैं।  

दक्षिण में लहराया स्वदेशी का झंडा


भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोगों ने एकजुट होकर भाग लिया और योगदान दिया। यह इतिहासकारों की समस्या रही कि उन्होंने स्वाधीनता का इतिहास लिखते समय स्वतंत्रता संग्राम के कई ऐसे नायकों को या तो भुला दिया या उनके महत्व का आकलन सही तरीके नहीं किया गया। दक्षिण भारत के स्वाधीनता सेनानियों की तो ब्रिटिश इतिहासकारों ने उपेक्षा ही की। सुनील खिलनानी ने अपनी पुस्तक इनकारनेशंस में इतिहासकार डेविड वाशब्रुक को उद्धृत किया है। उनके मुताबिक ‘1895 से 1916 के बीच मद्रास (अब चेन्नई) की सड़कों पर कोई ब्रिटिश विरोधी कुत्ता शायद ही भौंका होगा। तूतीकोरन अपवाद था।‘ जब डेविड वाशब्रुक तूतीकोरन को अपवाद मान रहे थे तो उसकी वजह थे, वी ओ चिंदबरम पिल्लै। चिंदबरम पिल्लै ने न केवल ब्रिटिश कंपनियों को चुनौती दी बल्कि उन्होंने स्वदेशी के नारे को साकार भी किया। उन्होंने समंदर में ब्रिटिश कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। इसकी भी बेहद दिलचस्प कहानी है। चिदंबरम पिल्लै का जन्म 1872 में हुआ था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो वकालत करने के लिए तूतीकोरन पहुंचे थे। यहां वो शैव सभा के संपर्क में आए और उनका रुझान साहित्य और संस्कृति की ओर हुआ। शैव सभा में सक्रिय चिदंबरम पिल्लै का लेखकों से संपर्क बढ़ा और एक दिन उनके किसी साथी ने उनको बाल गंगाधर तिलक के लेख आदि पढने को दिए। चिंबरम पिल्लै पर तिलक के लेखन का जबरदस्त प्रभाव पड़ा और उनका युवा मन देश को गुलामी की बेड़ियों के आजाद करवाने के लिए तड़पने लगा। 

इस बीच अंग्रेजों ने बंगाल के विभाजन का निर्णय लिया जिसकी देशभर में कठोर प्रतिक्रिया हुई। देशभर में अंग्रजी वस्तुओं का बहिष्कार आरंभ हुआ। युवा पिल्लै ने भी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ साथ अंग्रेजों के स्कूलों और अन्य संस्थाओं के बहिष्कार की भी अपील की। अब वो सक्रिय राजनीति में आ चुके थे। पिल्लै ने विदेशी वस्तुओं और संस्थाओं के बहिष्कार के लिए अपने इलाके के लोगों को शपथ दिलानी शुरू की। पिल्लै ने लोगों को पानी में खड़े होकर मां काली की शपथ दिलाई थी कि वो विदेशी सामान और संस्थाओं का बहिष्कार करेंगे। इसका जबरदस्त असर तूतीकोरन और आसपास के इलाके में हुआ। इस दौरान ही चिदंबरम पिल्लै ब्रिटिश पुलिस की नजरों में आ गए थे। इतने से पिल्लै का मन नहीं भरा था और वो कुछ बड़ा करके ब्रिटिश राज को चुनौती देना चाहते थे। वो जिस इलाके में रहते थे वो व्यापार का बड़ा केंद्र था। वहां के समुद्री तट पर ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कंपनी के जहाजों का कब्जा था। इनके माध्यम से ब्रिटिश कंपनियां भारतीय उत्पाद एक जगह से दूसरे जगह ले जाकर बेचती और मुनाफा कमाती थी। पिल्लै के मन में ये विचार पनप रहा था कि एक देसी जहाज कंपनी होनी चाहिए ताकि यहां के व्यापारियों को लाभ मिल सके। उन्होंने 1906 के अप्रैल में एक योजना बनाई और उसपर अमल आरंभ कर दिया। दिसंबर 1906 में पिल्लै ने अपनी कंपनी स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी बनाई और इस कंपनी का एक जहाज समंदर में उतार दिया। इनकी कंपनी का रेट कम होने की वजह से इनको अधिक यात्री और कारोबारी मिलने लगे। इससे बौखलाई ब्रिटिश कंपनी ने पुलिस और प्रशासन का सहारा लिया। स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी को कानूनी अड़चनें लगाकर बाधित करने का प्रयास किया जाने लगा लेकिन चिदंबरम ने हार नहीं मानी। उन्होंने पैसे जुटाकर दो और जहाज खरीद लिए। ये दोनों जहाज पहलेवाले से बड़े थे। इन दोनों जहाजों पर पिल्लै ने हरा, पीला और लाल झंडा पेंट करवाकर बड़े बड़े अक्षरों में वंदे मातरम लिखवा दिया था। उनका ये प्रयोग बहुत सफल रहा था और लोग उनको स्वदेशी पिल्लै कहने लगे थे। 

ये सब चल ही रहा था कि पिल्लै ने एक और युवा साथी शिवम के साथ मिलकर तूतीकोरन में मिल मजदूरों का आंदोलन आरंभ कर दिया। अधिक सुविधा और वेतन की मांग करते हुए कोरल मिल में हड़ताल हो गई। ये हड़ताल इतनी सफल रही कि अंग्रेजों ने मजदूरों से समझौता करना पड़ा। इसके बाद पूरे इलाके में चिदंबरम पिल्लै की लोकप्रियता और बढ़ गई और इससे बढा उनका हौसला भी। लेकिन अंग्रेजों ने चिदंबरम को फंसाने की योजना बना ली थी और उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में तूतीकोरन में भयंकर हिंसा और आगजनी हुई थी। अंग्रेज सरकार ने आनन-फानन में पिल्ले को डबल उम्रकैद की सजा सुनाकर जेल भेज दिया। जेल में उको आम कैदी की तरह रखा गया और हाड़तोड़ मेहनत करवाई जाती थी। चिंदबरम पिल्लै ने हाईकोर्ट में अपील की और फिर उनका केस प्रीवी काउंसिल तक गया। उनकी सजा कम हुई और चार साल के बाद उनको रिहा कर दिया गया। इन चार सालों में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी लगभग बंद हो चुकी थी और जहाज बिक गए थे। उनका वकालत का लाइसेंस रद कर दिया गया था। बाद में गांधी से मतभेद के चलते पिल्लै ने 1920 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। फिर बैंक मैनेजर की नौकरी की। इससे ऊबकर उन्होंने वकालत का लाइसेंस वापस करने की अपील की जिसको न्यायालय ने मान लिया। वो फिर से वकालत भी करने लगे और कांग्रेस पार्टी भी ज्वाइन कर ली। धीरे धीरे वो गुमनामी में चले गए और 1936 में तूतीकोरन के कांग्रेस के कार्यलय में अंतिम सांसे लीं। स्वदेशी का झंडा बुलेंद करनेवाले इस स्वाधीनता सेनानी ने शिपिंग में जिस तरह के स्वावलंबन की राह दिखाई थी उसपर आगे चलकर भारतीय कंपनियों ने काम किया। 

Saturday, July 16, 2022

इंदिरा, इमरजेंसी और कंगना


कंगना रनोट बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं। कई फिल्मों में उनका उत्कृष्ट अभिनय देखने को मिला है। कमर्शियल फिल्मों में उनकी सफलता की कहानी तो सबको मालूम है। कई बार वो लीक से हटकर फिल्में करती हैं और उसमें अपने अभिनय से दर्शकों का मन मोह लेती हैं। पिछले दिनों तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही जयललिता की जिंदगी पर उनकी फिल्म थलाइवी आई थी। उस फिल्म में कंगना ने जयललिता के किरदार को पर्दे पर अपने अभिनय कौशल से जीवंत कर दिया था। तमिल और हिंदी में बनी इस फिल्म में उनके अभिनय की बेहद सराहना हुई थी। अब कंगना ने एक और बेहद चुनौतीपूर्ण विषय और पात्र का चयन किया है। अब वो आपातकाल पर फिल्म बना रही हैं। इस फिल्म में वो इंदिरा गांधी की भूमिका में होंगी। कंगना ने इस फिल्म का एक छोटा सा वीडियो इंटरनेट मीडिया पर साझा किया है। उसको देखकर लगता है कि कंगना ने इस किरदार को निभाने के लिए बहुत श्रम किया है। छोटे से वीडियो में कंगना ने इंदिरा गांधी के हाव-भाव और उनके बोलने के स्टाइल को पूरी तरह से किरदार में उतार दिया है। इस वीडियो को देखकर इस बात का अंदाज लग रहा है कि इस फिल्म में कंगना की एक और दमदार और यादगार भूमिका दर्शकों के सामने होगी। इस फिल्म को कंगना स्वयं निर्देशित भी कर रही हैं। इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का वो काला अध्याय है जिसने समाज के हर अंग को प्रभावित किया था। उस दौर की अनेक कहानियां अब भी लोगों की स्मृतियों में शेष हैं। इमरजेंसी में जितना कुछ घटा या जिस प्रकार से इंदिरा गांधी के इस निर्णय और संजय गांधी के तानाशाही रवैये ने लोगों को परेशान किया उस अनुपात में फिल्में नहीं बनीं। रचनात्मक लेखन भी न के बराबर हुआ। लेख आदि अवश्य लिखे गए, पत्रकारों और राजनेताओं की पुस्तकें आईं लेकिन बहुत कम साहित्यकारों ने इमरजेंसी को विषय बनाकर उपन्यास या कहानी लिखी। 

हिंदी फिल्मों की अगर बात करें तो एक फिल्म याद आती है वो है किस्सा कुर्सी का। अमृत नाहटा की ये फिल्म इमरजेंसी के पहले बन गई थी और सेंसर बोर्ड के पास प्रमाणन के लिए गई थी। जबतक सेंसर बोर्ड से इसको प्रमाण पत्र मिलता तबतक देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई थी।  इस फिल्म में संजय गांधी और इंदिरा गांधी के क्रियाकलापों पर कटाक्ष किया गया था। संजय गांधी की कार फैक्ट्री लगाने के मंसूबों पर व्यंग्य भी था। संजय गांधी को जब इसका पता लगा तो वो भड़क गए थे। उसके बाद तो जो हुआ वो इतिहास में दर्ज है। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि सेंसर बोर्ड में जमा किए गए फिल्म के प्रिंट को उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल के आदेश पर जब्त कर लिया गया था। संजय गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। वो चाहते थे कि फिल्म के सभी प्रिंट नष्ट कर दिए जाएं। उनकी इस इच्छा की पूर्ति के लिए दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बांबे (अब मुंबई) के प्रभादेवी इलाके में एक फिल्म प्रोसेसिंग लैब पर छापा मारा। छापे में फिल्म के निगेटिव समेत सभी प्रिंट जब्त कर लिए गए और उसको लेकर पुलिसवाले दिल्ली आ गए। इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि पूरी सामग्री को मारुति कार फैक्ट्री के कैंपस में लाकर जला दिया गया था। इस फिल्म में मनोहर सिंह, शबाना आजमी और सुरेखा सीकरी मुख्य भूमिका में थे। बाद में वो फिल्म फिर से बनी और रिलीज हुई परंतु मूल फिल्म नष्ट कर दी गई। इस फिल्म को लेकर केस मुकदमा भी हुआ था।

ये तो इमरजेंसी के दौर की बात है लेकिन इमरजेंसी लगने के कुछ महीने पहले 1975 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था आंधी। फिल्म रिलीज हो गई। उसके बाद ये बात फैल गई कि ये फिल्म इंदिरा गांधी के जीवन पर है। फिर क्या था। इस फिल्म के निर्माताओं को घेरने की कोशिश होने लगी और आखिरकार इस फिल्म को बैन कर दिया गया। आई एस जौहर की एक फिल्म नसबंदी भी आई थी जिसमें इमरजेंसी के दौर में नसबंदी को लेकर की गई ज्यादतियों को दिखाया गया था। इस फिल्म को भी कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ा था। जबकि ये फिल्म इमरजेंसी के बाद बनी थी। 2017 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त निर्माता मधुर भंडारकर ने इंदु सरकार के नाम से फिल्म बनाई। इस फिल्म के खिलाफ पूरे देश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन आदि किया। हैरत की बात ये कि उस वक्त सेंसर बोर्ड ने भी इस फिल्म की रिलीज की राह में रोड़े अटकाए थे। क्या ये माना जाए कि उपरोक्त फिल्मों का हश्र देखकर इमरजेंसी पर फिल्म बनाने का साहस कम फिल्म निर्माताओं ने किया या इसकी कोई और वजह रही है। दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो इसके अलावा भी कई वजहें नजर आती हैं। एक तो यही कि अधिकतर फिल्म निर्माता कारोबारी हैं और वो अपने व्यवसाय में किसी प्रकार का झंझट नहीं चाहते हैं। वो चाहते हैं कि फिल्म में निवेश करें और मुनाफा कमाएं। ये प्रवृत्ति फिल्मकारों को किसी प्रकार का जोखिम लेने से रोकती है। ये अनायास नहीं है कि गांधी पर इस देश में बहुत कम फिल्में बनीं। एक संपूर्ण फिल्म बनी भी स्वाधीनता के पैंतीस साल बाद। उसको भी एक विदेशी रिचर्ड एटनबरो ने बनाई। 

एक और महत्वपूर्ण बात जो इस संदर्भ में रेखांकित की जानी चाहिए वो ये कि हिंदी में राजनीतिक विषयों पर कहानियां कम लिखी गईं। उपन्यास और भी कम। स्वाधीनता के बाद भारत-पाकिस्तान के विभाजन पर जो कल्ट फिल्म मानी जाती है वो है गरम हवा। वो इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है। विभाजन की त्रासदी पर हिंदी के लेखकों से अधिक पंजाबी के लेखकों ने लिखा क्योंकि वो भारत पाकिस्तान विभाजन से ज्यादा प्रभावित हुए थे। उसकी त्रासदी को नजदीक से देखा और महसूसा था। स्वाधीन भारत के इतिहास में कई ऐसी राजनीतिक घटनाएं हैं जिनपर बेहतरीन फिल्में बन सकती हैं। उनपर लिखा कम गया इस कारण फिल्मकारों का ध्यान भी उनपर कम गया। अगर हम स्वाधीनता के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम पर बात करें तो भाषा को लेकर आंदोलन और प्रांतों का विभाजन। उसके बाद की हिंसा। कांग्रेस में विभाजन और इंदिरा गांधी का उदय। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में राजीव गांधी को अकल्पनीय बहुमत और पांच साल में ही जनता का मोहभंग। विश्वनाथ प्रताप सिंह का प्रधानमंत्री बनने का घटनाक्रम और संसदीय दल की बैठक के पहले की साजिशें और बैठक के दौरान का नाटकीय घटनाक्रम। कई राजनीतिक विषय हैं जिनपर फिल्में बन सकती हैं। निर्माता निर्देशक जोखिम उठाएं तो उनको सफलता भी मिल सकती है। विवेक अग्निहोत्री ने लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु और कश्मीर नरसंहार पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाया। एक में उनको अपेक्षाकृत कम सफलता मिली लेकिन दूसरी फिल्म में जनता ने उनको इतना प्यार दिया जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी। 

अब कंगना रनोट इमरजेंसी पर फिल्म बना रही हैं तो ये उम्मीद की जानी चाहिए कि जो बाधाएं उनके पूर्ववर्ती फिल्मकारों के सामने आई थीं वो उसका सामना कंगना को नहीं करना पड़ेगा। इमरजेंसी के दौरान धरपकड़, पाबंदियां और जुल्म तो हैं ही उस दौर में संजय गांधी और उनकी महिला मित्रों की भी कई कहानियां इधर उधर पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी हुई हैं। अगर कंगना की टीम ने उन कहानियों को फिल्म की कहानी में ठीक से पिरो दिया तो फिर फिल्म की सफलता में कोई संदेह नहीं रहेगा। संभव है कि इस सफलता से और भी फिल्मकार राजनीतिक फिल्म बनाने के लिए प्रेरित हों।  


Saturday, July 9, 2022

ओटीटी प्लेटफार्म्स की चुनौतियां


कोरोना काल में जब लाकडाउन की वजह से सिनेमा हाल बंद हुए और लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे, ऐसे में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स काफी लोकप्रिय हुए थे। घर बैठे उनके सामने मनोरंजन का एक ऐसा विकल्प था जहां देश विदेश की असंख्य सामग्री उपलब्ध थी। सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी इन ओटीटी प्लेटफार्म को डाउनलोड करके लोगों ने मनोरंजन के इस नए विकल्प को अपनाया था। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान इन प्लेटफार्म्स पर बड़े सितारों की फिल्में भी रिलीज हुईंन थीं। उस समय दुनिया में ये आकलन किया गया था कि भारत ओटीटी प्लेटफार्म्स का या वीडियो आन डिमांड स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म्स का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। अनुमान ये भी लगाया गया था कि इस वर्ष के अंत तक देश में स्मार्ट फोन या इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं की संख्या 80 करोड़ पहुंच जाएगी। इस संख्या को ध्यान में रखते हुए ओटीटी प्लेटफार्म्स ने भारतीय बाजार को लेकर अपनी रणनीति बनाई और यहां निवेश किया। वैश्विक स्तर पर भी कोरोना के दौर में इस माध्यम को दर्शकों ने अपनाया था। आपदा में मिले इस अवसर की वजह से इन प्लेटफार्म्स को चलानेवाली कंपनियों को दो साल में काफी मुनाफा हुआ। कोरोना का भय कम होने की वजह से अब इन कंपनियों के सामने अपनी उस सफलता को बनाए रखने की चुनौती है। चुनौती तो ग्राहकों की संख्या को बरकरार रखने की भी है। 

कनाडा की मार्केटिंग विशेषज्ञ रेबेका आल्टर ने अपने एक लेख में लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स की वैश्विक चुनौतियों के बारे में लिखा है। रेबेका के मुताबिक इस वर्ष की पहली तिमाही में नेटफ्लिक्स ने दो लाख ग्राहक खो दिए और विशेषज्ञों का अनुमान है कि दूसरी तिमाही में करीब बीस लाख ग्राहक इस प्लेटफार्म को छोड़ सकते हैं। रेबेका इसके लिए यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस में अपनी सेवाएं बंद करने के नेटफ्लिक्स के फैसले को तो जिम्मेदार मानती ही है, साथ ही ग्राहक शुल्क में बढ़ोतरी को भी एक कारण माना है। वैश्विक बाजार की बात छोड़ भी दें तो अपने देश में भी नेटफ्लिक्स की सेवाएं अन्य सभी ओटीटी प्लेटफार्म्स से महंगी हैं। नेटफ्लिक्स मोबाइल पर देखने की सुविधा देने के एवज में प्रतिमाह 149 रु लेता है जो कि एक वर्ष का 1788 रु बनता है। अन्य लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म वार्षिक शुल्क के तौर पर हजार रुपए तक लेती हैं। अमेजन प्राइम, डिजनी हाटस्टार और सोनी लिव आदि का वार्षिक शुल्क एक हजार रु से कम ही है। लेकिन इन सभी प्लेटफार्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपने ग्राहकों को जोड़े रखने की। कोरोना महामारी के दौरान जितने ग्राहक जुड़े थे उनको बनाए रखना इनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2020 के अप्रैल से लेकर जुलाई तक विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म्स से करीब तीन करोड़ नए ग्राहक जुड़े थे। जो अब लगातार कम होते जा रहे हैं। इन प्लेटफार्म्स को नजदीक से जाननेवाले और इनकी गतिविधियों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि कोरोना काल में जितने ग्राहक इन प्लेटफार्म्स से जुड़े थे उनमें से करीब आधे ग्राहकों ने सब्सक्रिप्शन का नवीनीकरण नहीं करवाया। वैश्विक स्तर पर भी लगभग यही स्थिति है। सबसे बड़ा कारण कोरोना का भय खत्म होने लगा है और सिनेमा हाल खुल गए हैं। 

ओटीटी प्लेटफार्म्स से दर्शक क्यों जुड़े रहें, अगर इसका उत्तर ढूंढे तो सबसे पहले तो इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री की गुणवत्ता की बात होगी। दूसरी वजह इनको देखने का शुल्क। इसके अलावा हमारे देश में इन प्लेटफार्म्स को विवादों के कारण भी काफी फायदा मिला था। ओटीटी प्लेटफार्म पर उपलब्ध कंटेंट को लेकर जब विवाद होता है और उसकी चर्चा होती है तो इन प्लेटफार्म्स को नए ग्राहक मिलते हैं। लोग उस सामग्री को देखना चाहते हैं। ग्राहकों की यही चाहत उनसे इन प्लेटफार्म्स को डाउनलोड करवाती है। अब अगर इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री का आकलन करते हैं तो पाते हैं कि वहां बहुत अधिक दुहराव होने लगा है। पहले कुछ सामग्री चौंकाती थी और दर्शकों को अपने साथ रोकती थी। अब लगातार एक ही तरह की सामग्री उपलब्ध होने लगी तो दर्शकों के लिए वो सामान्य बात हो गई। नेटफ्लकिस पर पहले ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी सीरीज आई जिसमें नग्नता और भयंकर हिंसा थी। इन प्लेटफार्म्स पर किसी प्रकार की प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है इस वजह वो सेंसर बोर्ड की कैंची से मुक्त होकर खुले आम नग्नता और यौनिकता परोस रहे थे। हिंसा के नाम पर शरीर के अंगों को इस तरह से काटकर दिखा रहे थे कि कुछ दर्शकों को झटका लगता था। भाषा के स्तर भी सारी मर्यादा तोड़कर भरपूर गाली गलौच भरे संवाद भी दर्शकों को चौंका रहे थे। इन सबसे होनेवाली चर्चा से ग्राहक बढ़ रहे थे। धीरे धीर इनकी नवीनता खत्म हो गई।  

इसके अलावा भारतीय संस्कृति को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां या दृश्य दिखाने पर भी जमकर विवाद हुए। लैला जैसी सीरीज भी आई जिसने हिंदू मानस को झकझोरा था। नेटफ्लिक्स पर ही एक सीरीज आई थी ‘द सूटेबल बाय’। इसमें मंदिर प्रांगण में चुंबन दृश्य पर जमकर बवाल हुआ था। केस मुकदमे भी हुए। प्लटफैर्म को अपेक्षित प्रचार मिला और परिणामस्वरूप उसके ग्राहक भी बढ़े। इसी तरह से अगर देखें तो सभी ओटीटी प्लेटफार्म ने अलग अलग तरीके से दर्शकों की जेब से पैसे निकलवाने का उपक्रम किया। जो ओटीटी प्लेटफार्म मुफ्त में कंटेंट दिखा रहा था उसने वेब सीरीज के बीच में विज्ञापन दिखाना आरंभ कर दिया। इतनी बार विज्ञापन आता है कि दर्शक परेशान हो जाते हैं। तभी स्क्रीन पर एक फ्लैश आता है कि अगर आप बगैर विज्ञापन या बिना अवरोध के वेब सीरीज देखना चाहते हैं तो अमुक राशि देकर वार्षिक ग्राहक बनें। इसके अलावा कई प्लेटफार्म्स ने तय ग्राहक शुल्क पर एक ही डिवाइस पर देखने की सुविधा दी। मोबाइल की अलग दर और मोबाइल और टीवी पर देखने के लिए अलग दर। इन सब झंझटों से भी ग्राहक इनसे दूर हुए। एक और बात जिसको रेखांकित करना आवश्यक है वो ये कि इन प्लेटफार्म्स ने हिंदी फिल्मों के बड़े सितारों को भारी भरकम रकम देकर उके साथ कंटेंट के लिए समझौता किया। सामग्री अर्जित करने के लिए निवेश किया गया लेकिन उसको अपेक्षित दर्शक नहीं मिले। डिजनी हाटस्टार पर अजय देवगन की एक वेब सीरीज आई जिसका नाम था रुद्रा, द एज आप डार्कनेस। अजय देवगन की वजह से प्लेटफार्म ने इसपर भारी भरकम रकम खर्च की लेकिन ये सीरीज अपेक्षित सफलता अर्जित नहीं कर सकी। जानकारों का मानना है कि इससे भारी नुकसान हुआ। इसी तरह कुछ फिल्में भी खरीदी गईं जिनको सफलता नहीं मिली। 

इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है लगातार कटेंट में इस तरह का बदलाव जिससे दर्शकों को अपनी ओर खींचने और फिर उनको रोके रखने में सफलता मिल सके। विवाद की गुंजाइश अब लगभग खत्म सी हो गई है क्योंकि सभी निर्माता अब इसकी परिणति से बचना चाहते हैं। वो सतर्क होकर सीरीज बनाने लगे हैं। तीसरे अगर भारतीय बाजार में उनको बने रहना है और लंबे समय तक मुनाफे का कारोबार करना है तो ये आवश्यक है कि वो अपने शुल्क निर्धारण पर काम करें। भारत में इंटरनेट की लोकप्रियता की एक वजह उसका सस्ता होना भी है। अगर ये सस्ते पैकेज पर अपना कंटेंट उपलब्ध करवाने के बारे में सोच सकते हैं तो इनकी ग्राहक संख्या बढ़ सकती है। कस्बों और गांवों तक पहुंचना है तो उनको अपना ग्राहक शुल्क कम रखना ही होगा। आधार बढ़ाकर भी मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।