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Monday, April 25, 2011

इज्जत की जमींदारी

शादी के ग्यारह साल बाद ससुराल जाने का मौका मिला । लंबा अंतराल इस वजह से कि ससुराल के सबलोग बिहार के ऐतिहासिक शहर गया में बस गए थे । शादी भी वहीं से हुई और जब भी जाना हुआ गया ही गया । पत्नी के पैतृक गांव यानि अपनी असली ससुराल जाने का अवसर, जैसा कि उपर बता चुका हूं शादी के ग्यारह साल बाद मिला । इतने लंबे अंतराल के बाद वहां पिछले साल दिवंगत हुए अपने श्वसुर की बरसी में गया था। हमें जाना था गया से तकरीबन साठ-सत्तर किलोमीटर दूर औरंगाबाद जिले के रायपुर बंधवा गांव में, हमलोग गया से चलकर दो घंटे में वहां पहुंचे । बिहार की सड़के पिछले सालों में बेहद अच्छी हो गई हैं और रास्ते में पड़नेवाले आजादी के पूर्व बने सारे सड़क पुल के समांतर नए पुल बन रहे थे । जब मैं रास्ते में था तो सोच रहा था कि लगभग एक दशक पूर्व अपनी शादी में मुझे जमालपुर से गया के लगभग सौ एक सौ दस किलोमीटर का सफर तय करने में ग्यारह घंटे लगे थे । तब बिहार में लालू राज था और सड़कें लगभग गायब हो चुकी थी । खैर यह अवातंर प्रसंग है । मैं बात कर रहा था अपने बंधवा सफर की । औरंगाबाद जिले के बंधवा तक जाने का रास्ता पूरी तरह से नक्सल प्राभवित इलाका गोह, हसपुरा से होकर जाता था । लेकिन टाटा मैजिक से दो घंटे का सफर बेखौफ होकर तय किया । रास्ते में सबकुछ सामान्य लग रहा था । रास्ते में मिलनेवाले कस्बानुमा बाजार में खूब भीड़ भाड़ और चहल पहल थी, किसी भी तरह के डर का वातावरण नहीं दिख रहा था, कहीं कोई पुलिसवाला भी नहीं दिखा, अर्धसैनिक बल के जवान तो दूर की बात । हमलोग दोपहर बाद बंधवा पहुंचे । वहां का घर पुराने जमाने का बना था, मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारें और खूब उंचाई पर छत । गांव में घुसते ही एक बोर्ड दिखाई दिया - यह गांव राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत उर्जाकृत ग्राम है । लेकिन घर पहुंचते ही राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की पोल खुल गई । वहां तक बिजली के तार-खंभे तो हैं लेकिन बिजली नहीं है । कई घरों में सोलर एनर्जी से काम चल रहा था । मेरे लिए बिना बिजली के रहने का यह नया अनुभव नहीं था लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद बगैर बिजली के चार-पांच दिन गुजारा था । यह एक संयोग ही बना कि जब पहली बार भारत ने क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता था तब भी मैंने रेडियो पर ही भारत के जीत की दास्तां सुनी थी और इस बार भी क्रिकेट के महायुद्ध में जब भारत श्रीलंका को पराजित कर रहा था तो मैं रेडियो से ही चिपक कर बैठा था । लेकिन सबसे मजेदार बात यह थी कि एक ओर जहां टीवी और बिजली से दूर था वहीं मेरा मोबाइल मुझे बाहर की दुनिया से जोड़े हुथा और मुझे अपडेट रख रहा था । उन पांच दिनों में मैंने मोबाइल इंटरनेट का जमकर इस्तेमाल किया, फेसबुक और ट्विटर से वर्ल्ड कप पाइनल के दौरान लोगों के जोश और उत्साह का अंदाज मिल रहा था ।
रायपुर बंधवा के अपने बंगले पर जब हमलोग शाम को बैठे तो लोगों के आने जाने का सिलसिला शुरू हो गया । चूंकि मैं घर का दामाद था इस लिए मुझे खास तौर पर इज्जत बख्शी जा रही थी। गांव में मेरे दिवंगत श्वसुर प्रोफेसर प्रियव्रत नारायण सिंह की काफी इज्जत थी । गांव से बाहर रहने के बावजूद उनका दिल गांव में ही बसता था । हर साल दो तीन बार गांव जरूर जाते थे । शाम को जब मैं और मेरी पत्नी के बड़े भाई राजेश जी गांव में घूमने निकले तो इस इज्जत का एहसास और गहरा हो गया । रास्ते में हर छोटा बडा़ आदमी राजेश जी को सलाम मालिक कह रहा था । जमींदारी तो 1953 में ही चली गई थी लेकिन इज्जत की जमींदारी अब भी कायम थी । कई लोग जो हमसे मिलने आ रहे थे वो राजेश जी और उनके चाचा के सामने कुर्सी या बेंच पर बैठने की बजाए जमीन पर बैठ रहे थे । मुझे यह सामंती लग रहा था लेकिन जब उनसे बात हुई तो पता चला कि यह उनके सम्मान देने का एक तरीका है, उन्हें कोई इसके लिए फोर्स नहीं करता है । यह सदियों से चली आ रही एक परंपरा है जिसे निभाया जा रहा है । यहां मेरे दिमाग में एक बात बार-बार उठ रही थी कि सुदूर गांव में हर कोई एक दूसरे को विश करने के लिए सलाम का इस्तेमाल कर रहा था । बोलचाल में उर्दू के लफ्जों का जमकर इस्तेमाल हो रहा था। उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहने वालों को उन इलाकों में जाकर देखना चाहिए कि जहां कोई मुस्लिम आबादी नहीं है वहां भी बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के, सिर्फ परंपरा के सहारे लोग उर्दू का इस्तेमाल कर रहे थे । भाषा के बीच दरार पैदा करनेवाले लोगों को एसी कमरों से बाहर निकलकर लोगों के बीच जाने की जरूरत है।
इन पांच दिनों तक वहां रहने के दौरान कई अनुभव हुए । एक दिन अचानक दोपहर में घर के बरामदे पर बैठा था तो दर्जनों बच्चे थाली पीटते हुए सामने से गुजरे । पूछने पर पता चला कि ये बच्चे मिड डे मील स्कीम के तहत खाना खाने स्कूल जा रहे हैं । और दरियाफ्त की तो आगे पता चला कि बच्चों का नामांकन तो स्कूल में कर दिया गया है लेकिन उनकी पढ़ाई और उनके स्कूल में उपस्थिति ज्यादातर रजिस्टर में ही दर्ज होती है । बच्चे स्कूल में पढ़ने की बजाए दोपहर का खाना खाने आते हैं । दस बजे के करीब से स्कूल में खाना बनना शुरू हो जाता है और बारह-एक बजे तक बच्चों को खाना खिलाकर स्कूल के मास्टर लोग फारिग हो जाते हैं । उसी तरह से आंगनबाड़ी केंद्र का काम भी चल रहा था । लेकिन गांव के ही लोगों ने बताया कि मिड डे मील में जमकर घपला होता है । रजिस्टर में फर्जी छात्रों के नाम भी दर्ज होते हैं और जिले के आला शिक्षा अधिकारियों की मिलीभगत से यह फर्जीवाड़ा धड़ल्ले से चलता है । बातों -बातों में बता चला कि वहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी है जिसमें तैनात डॉक्टर घंटे -डेढ़ घंटे के लिए केंद्र में आते हैं । गांव के लोग इस बात से ही खुश दिखे कि कम से कम घंटे भर के लिए तो डॉक्टर गांव में होता है । नीतीश राज के पहले तो स्वास्थ्य केंद्र का ताला ही महीनों में खुलता था । यह भी पता नहीं चलता था कि किसी डॉक्टर की तैनाती वहां है या नहीं । लेकिन बड़ा सवाल अब भी है कि क्या नीतीश कुमार शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में और सुधार कर पाएंगे । क्या केंद्र पर तैनात डॉक्टर पूरे समय तक मौजूद रहेंगे । क्या होटल में तब्दील हो रहे स्कूलों को विद्या का मंदिर बना पाएंगे । नितीश कुमार को प्रदेश की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ जिताकर दुबारा सत्ता तो सौंप दी लेकिन अब जनता की प्रचंड अपेक्षा भी है जिसपर नीतीश कुमार को खड़ा उतरना होगा । अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास पुरुष हो जाएंगे और इगर उसमें कोई कमी रह जाती है तो इतिहास पुरुष बनने की बजाए इतिहास में खो जाने का खतरा भी उत्पन्न हो जाएगा ।
बंधवा में चार पांच दिन रहने के बाद हमलोग दोपहर बाद फिर से गया के लिए रवाना हो गए । देवकुंड, अमझरशरीफ से होते हुए हमलोग हसपुरा के रास्ते जा रहे थे । शाम घिरने लगी थी लेकिन डर कहीं नहीं था, खुली गाड़ी में अंधेरे में सफर जारी था । मुझे याद है जब शादी के बाद मैं अपने ससुराल गया जाया करता था तो शाम ढलने के बाद भी मेरे श्वसुर जी पास के बाजार में भी नहीं जाने देते थे । एक अजीब तरह का डर और अपराधियों का खौफ लोगों के मन में इतने अंदर तक था कि हर कोई शाम ढ़लने के पहले घर लौट आता था लेकिन सिर्फ पांच साल में एक वयक्ति ने पूरी फिजां ही बदल दी । अंत में मैं एक मजेदार वाकया सुनाता हूं जो वहीं किसी ने मुझे सुनाया - हसपुरा से एक लड़का गोह जाने के लिए बस में चढ़ा और उसने किराए के तौर पर पंद्रह रुपए निकाल कर दिए । कंडक्टर ने कहा कि किराए के बीस रुपए बनते हैं । दोनों मे बकझक होने लगी । रंगदार टाइप के उस लड़के ने कंडक्टर पर धौंस जमाते हुए कहा कि तुम मुझे जानते नहीं मैं तो पंद्रह रुपए ही दूंगा । तो कंडक्टर ने जबाब दिया कि तुम भूल गए हो कि लालू यादव का राज खत्म हुए छह साल हो गए हैं और अगर तुम तत्काल से किराए के बाकी पैसे नहीं दोगे तो या तो बस से उतार दूंगा और अगर रंगदारी करोगो तो थाने में बंद करवा दूंगा । तो समाज के आम आदमियों में कानून के प्रति जो यह विश्वास कायम हुआ है है वो बहुत कुछ कह जाता है ।

2 comments:

Tarit Prakash said...

अनंतजी,
अभी तक जो नीतीश कर पाए हैं वह राहत की सांस भर है, वैसे लालू को भी श्रेय देना चाहिए क्‍योंकि ना मार पड़ती, ना दर्द होता और ना ही पिछले 60 सालों से सड़ रही व्‍यवस्‍था में आनंद ले रहे बिहार के लोगों को विकास की भूख लगती... पर आप खुद महसूस कर आए हैं कि "इज्जत की जमींदारी" अभी भी बनी हुई है ऐसे में विकास की कौन सी परिभाषा उनके गले उतरेगी यह तो समय ही बताएगा....
पर आपने ससुराल का भी जिक्र किया है जो मेरे ग्रह जिले के पड़ोस में है तो बचपन में पढ़ी हुई चार लाइने याद आ रहीं हैं-
ससुराल रहत बहुत निक
रहत दुई चार दिना.
हम छाए रहब बारहो मासा
हाथे खुरफी, कांधे कांछा...

Chetan Kashyap said...

haalaat har jagah kamovesh yahi hain...bachche thaali peetate hain...master chaawal lootate hain...haakim sabkuchh...