भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष ने कार्यभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत पार्टी के दिग्गज नेताओं की उपस्थिति में 45 वर्ष के नितिन नवीन ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाल लिया। कहीं से किसी प्रकार का विरोध या विद्रोह के स्वर सुनाई नहीं दिए। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन को उनकी कुर्सी पर बिठा रहे थे तो अचानक मेरे ध्यान में 2013 में गोवा में भारतीय जनता पार्टी कार्यकारिणी की बैठक का स्मरण हो आया। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाना चाहती थी तो कितना बवाल हुआ था। पार्टी के कई नेता पीढ़ीगत बदलाव चाहते थे। पार्टी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी की जगह नेतृत्व की कमान नरेन्द्र मोदी को देने की चर्चा थी। पार्टी के एक धड़े ने तय कर लिया था कि मोदी को कमान सौंपनी है लेकिन आडवाणी और उनके खेमे को ये मंजूर नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मोदी के नाम पर सहमति थी। गोवा में दो दिनों तक हाई वोल्टेज ड्रामा चला था। आडवाणी जी की उम्र उस समय 85 वर्ष थी और नरेन्द्र मोदी 63 वर्ष के थे। पार्टी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार हो रही थी पर आडवाणी और उनके समर्थक तैयार नहीं हो पा रहे थे। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में पहले दिन आडवाणी नहीं आए। दूसरे तक उनके आने की चर्चा होती रही लेकिन आखिरकार वो नहीं आए। उनके समर्थक और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वो नरेन्द्र मोदी के कारण नहीं आ रहे हैं। उन्होंने तब कहा भी था कि उनको नमोनिया नहीं हुआ है इस कारण वो गोवा नहीं जा रहे हैं। जसवंत सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता भी किसी बहाने से गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए थे।
नरेन्द्र मोदी के बढ़ते समर्थन को देखकर लालकृष्ण आडवाणी गोवा नहीं गए थे। कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे दिन तक ये चर्चा चलती रही थी कि दिल्ली विमानतल पर विशेष विमान खड़ा है जो आडवाणी को लकर गोवा आएगा। आडवाणी नहीं आए और उनकी अनुपस्थिति में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी को कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। आडवाणी जी की नाराजगी बनी रही। घोषणा के अगले ही दिन उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र देने की बात की। अपने पत्र में लालकृष्ण आडवाणी ने ये भी लिखा था कि पार्टी अपनी विचारधारा से हटती नजर आ रही है। इसके अधिकतर नेता अपना व्यक्तिगत एजेंडा चला रहे हैं। उस समय मीडिया के एक खास वर्ग ने इस विवाद को खूब हवा दी थी। गोवा प्रसंग की चर्चा सिर्फ इस कारण से ताकि पार्टी में नेतृत्व का कंट्रास्ट दिखाया जा सके। एक तरफ आडवाणी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार नहीं थे और उसको रोकने के तमाम प्रयास कर रहे थे। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही 49 वर्ष के अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने। अब 45 वर्ष के नितिन नवीन पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए हैं। भारतीय राजनीति में हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि मजबूत नेता किसी अन्य नेता को पनपने नहीं देता है। मजबूत नेता चाहता है कि उसके बाद नेतृत्व शून्यता की स्थिति बने। इस संबंध में इंदिरा गांधी का उदाहरण दिया जाता रहा है कि जब भी कोई कांग्रेसी मजबूत होते दिखता था तो उसके पर कतर दिए जाते थे। ये बात उस तरह के मजबूत नेता पर लागू होती है जिसको अपनी जनप्रियता या साख पर भरोसा नहीं होता है। जिस भी नेता को अपनी काबिलियत पर, जनता के बीच अपनी साख पर भरोसा होगा वो अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयत्न करता है। नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में जीत का कीर्तिमान बनाया है। नोटबंदी से लेकर कोरोना काल में जिस प्रकार से जनता ने मोदी के निर्णयों का समर्थन किया उसको भी देखा जाना चाहिए। विरोधी दलों के नेताओं का और उनके समर्थक विश्लेषकों का आकलन था कि नोटबंदी के बाद के चुनाव में मोदी को पराजय का सामना करना पड़ेगा। ये भी कहा गया कि पूरी दुनिया में जिस भी नेता ने नोटबंदी लागू की उसको जनता ने अगले चुनाव में नकार दिया। मोदी के मामले में इसके उलट हुआ। मोदी और ताकतवर बनकर उभरे। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां भारतीय पार्टी को 282 सीटें मिली थीं वहीं नोटबंदी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 300 से अधिक सीटें जीकने में कामयाब रही। लोकतंत्र में जिसको जनता पसंद करती है वही सर्वमान्य नेता माना जाता है।
एक बात और जो नितिन नवीन के चयन से स्पष्ट हुआ है वो ये कि भारतीय जनता पार्टी जात-पात की राजनीति का निषेध करने का प्रयास कर रही है। लंबे समय तक इस देश ने जाति आधारित राजनीति और उसपर ही आधारित चयन का दौर देखा है। किसी नेता को शीर्ष पद पर चुनने या मनोनयन के पहले उसकी जाति या उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि देखी जाती रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा भी कई राज्यों की राजनीतिक नियुक्तियों में जातिगत संतुलन का ध्यान रखा जाता रहा है। नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी से इसकी शुरुआत की है। नितिन नवीन कायस्थ जाति के हैं जिनके वोट उनके गृह प्रदेश में भी बहुत कम हैं। बावजूद इसके उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना देना, जातिगत राजनीति के निषेध की ओर बढ़ाए गए कदम की तरह देखा जा सकता है। सिर्फ नितिन नवीन ही क्यों बिहार में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को बनाया गया है। संजय सरावगी मारवाड़ी/वैश्य हैं और बिहार में मतदाता के लिहाज से मारवाड़ियों की संख्या बहुत नहीं है। बिहार में राजनीतिक नियुक्तियों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि अमुक व्यक्ति यादव हैं या राजपूत हैं या कुर्मी हैं तो इनको महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता है। ताकि उश समुदाय के वोटरों को आकर्षित किया जा सके। ये सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं बल्कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में देखा जाता रहा है।
कहना ना होगा कि मोदी युग में जिस तरह की राजनीति हो रही है वो स्वाधीन भारत की पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर है। इस युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीति विज्ञान के पुराने औजार से काम नहीं चलनेवाला है। जो पुराने राजनीतिकक सिद्धांत थे उसके आधार पर आकलन बहुधा गलत परिणाम देने लगे हैं। मोदी युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीतिक विश्लेषकों को अब नए तरीके से सोचना होगा, नए आधार पर आकलन करना होगा। जिस तरह से नरेन्द्र मोदी अपने निर्णयों से चौंकाते रहे हैं और कई बार जोखिम भरे निर्णय भी लेते हैं, इससे ये प्रतीत होता है कि उनको अपने मतदाताओं पर भरोसा है और मतदाताओं को भी उनपर विश्वास है कि उनके निर्णय देश और जनहित में ही होंगे।




