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Thursday, March 28, 2019

किताब के सिराहने 'सियासत'


लेखकों और साहित्यकारों को राजनीति करनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर पूरी दुनिया में एक बहस चली थी जिसमें दुनिया भर के विचारकों ने अपने मत प्रकट किए थे। लुकाच से लेकर ब्रेख्त और बेंजामिन जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखकों की राय है कि लेखक और राजनीति का संबंध होना चाहिए। अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने लेखकों में राजनीतिक चेतना की वकालत की है। हिंदी में भी अगर हम देखें तो कई लेखक सक्रिय राजनीति में रहे तो कइयों ने परोक्ष रूप से राजनीति की। हिंदी के मशहूर आलोचक नामवर सिंह ने तो लोकसभा का चुनाव तक लड़ा था। कवि रामधारी सिंह दिनकर, मैथिली शरण गुप्त और श्रीकांत वर्मा, भारतीय ज्ञान परंपरा पर विपुल लेखन करनेवाले विद्यानिवास मिश्र के अलावा भी कई लेखकों ने सक्रिय राजनीति की। प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में शामिल होने वाले इन लेखकों के अलावा कई लेखक परोक्ष रूप से राजनीति करते रहे। हिंदी में राजनीतिक कविता का एक लंबा इतिहास रहा है। नागार्जुन ने तो कांग्रेस के खिलाफ कई कविताएँ लिखीं, नेहरू जी के खिलाफ भी कविता लिखी, रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने भी ।  समकालीन कविता की दुनिया में सक्रिय कई कवियों ने वर्तमान राजनीति पर भी कविताएं लिखी। पर पिछले पांच साल से एक नया ट्रेंड मजबूती के साथ सामने आ रहा है वो है चुनाव के समय राजनीतिक विषयों पर किताबें आना। दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव के थोड़ा पहले मोदी पर दर्जनों किताबें आईं तो राहुल गांधी और सोनिया गांधी को केंद्र में रखकर भी किताबें लिखी गईं। 2014 में राकेश पांडे ने जननायक राहुल गांधी नाम से एक किताब लिखी थी, जिसका विमोचन प्रियंका गांधी ने किया था। इसी तरह से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले अखिलेश यादव को केंद्र में रखकर समाजवाद का सारथी नाम से संजय लाठर ने एक किताब लिखी गई थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके कार्यों पर कई किताबें लिखी गईं।
अब फिर से लोकसभा चुनाव सर पर हैं। फिर से इस तरह की किताबें बाजार में आने लगी हैं। हाल ही में हर्षवर्धन त्रिपाठी और शिवानंद द्विवेदी के संपादन में एक किताब आई जिसका नाम है नए भारत की ओऱ। इस किताब में मोदी सरकार की नीतियों को कसौटी पर कसने का दावा किया गया है। पुस्तक के संपादक शिवानंद द्विवेदी और हर्षवर्धन त्रिपाठी का कहना है कि किसी भी सरकार के कार्यकाल के खत्म होने पर उसकी नीतियों और कार्यक्रमों की पड़ताल होती रही है। उनके मुताबिक मोदी सरकार नए भारत के निर्माण की बात करती रही है, यह पुस्तक इस दिशा में हुए कार्यों की पड़ताल करती है। इसमें उन्नीस लेख हैं जो अलग अलग क्षेत्र के लोगों ने लिखे हैं और भूमिका वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लिखी है। इस किताब में लेखकों ने नीतियों और कार्यक्रमों की पड़ताल करने के साथ साथ अपने सुझाव भी दिए हैं। शिवानंद द्विवेदी साफ तौर पर यह स्वीकार करते हैं कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक की योजना बनाई गई थी। दूसरी तरफ एक किताब आई है वादा फरामोशी’, जिसके लेखक हैं संजॉय बसु, नीरज कुमार और शशि शेखर। इस पुस्तक में भी मोदी सरकार की पच्चीस स्कीमों को परखने का दावा किया गया है। इस पुस्तक के लेखकों में से एक शशि शेखर के मुताबिक चयनित स्कीमों को लेकर सरकार से सूचना के अधिकार के आधार पर जानकारी मांगी गई और सरकार से मिले जवाब के आधार पर उसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। नए भारत की ओर का विमोचन केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने किया तो वादा फरामोशी का विमोचन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किया।
इसी तरह से लेखक विजय त्रिवेदी की किताब बीजेपी कल आज और कल प्रकाशित हुई है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह पुस्तक भारतीय जनता पार्टी की स्थापना से लेकर अबतक की कहानी कहती है। पुस्तक परिचय में लिखा भी गया है कि यह उस पार्टी की कहानी है जिसने सामूहिक नेतृत्व की शुरुआत की, नागपुर में अपना रिमोट कंट्रोल रहने दिया, और 7 लोक कल्याण मार्ग तक आते आते वन मैन पार्टी बन गई। ये किताब 2019 के चुनावों के बरअक्स भारत की राजनीति के सबसे दिलचस्प और सबसे नए अध्याय- भारतीय जनता पार्टी को समझने का प्रयास है। विजय त्रिवेदी ने इसके पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अटल बिहारी वाजपेयी पर भी किताब लिखी है जो दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर में शामिल रही है। नरेन्द्र मोदी सेंसर्ड के नाम से अशोक श्रीवास्तव की एक किताब प्रकाशित हुई है। इसके लेखक का कहना है कि पिछले साढे चार साल में जिस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर फेक नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है, उसको उनकी पुस्तक निगेट करती है। इसमें 2014 में दूरदर्शन पर मोदी के इंटरव्यू को सेंसर करने की कोशिशों की कहानी भी है।  2014 के लोकसभा चुनाव के पहले मोदी मंत्र लिखनेवाले हरीश बर्णवाल की इस लोकसभा चुनाव के पहले भी मोदी नीति के नाम से एक किताब प्रकाशित हुई है। हरीश का कहना है उनकी यह किताब चुनाव को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गई है बल्कि वो इस बात को स्थापित करना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जब कुछ बोलते हैं तो वो सुचिंतित होता है और कुछ भी अचानक नहीं होता है। उनका दावा है कि इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के सैकड़ों भाषणों को देखा और उनमें से तथ्यों को इकट्ठा कर उसकी व्याख्या की। इस किताब में एक अध्याय हरीश बर्णवाल और रामबहादुर राय ने मिलकर लिखा है।
चुनावी मौसम में एक और राजनीतिक किताब आ रही है जिसका नाम है भगवा का राजनीतिक पक्ष, वाजपेयी से मोदी तक। इस पुस्तक की लेखिका हैं पत्रकार सबा नकवी। सबा ने यह पुस्तक पहले अंग्रेजी में लिखी थी जिसका हिंदी अनुवाद शीघ्र ही प्रकाशित हो रहा है। सबा की इस किताब के शीर्षक से भी स्पष्ट है कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और दक्षिणपंथी राजनीति को कसौटी पर कसा है। अटल बिहारी वाजपेयी और मोदी के वक्त दक्षिणपंथी राजनीति में क्या बदलाव आया है इसको परखने की कोशिश की गई है। राजनीति को केंद्र में रखकर दर्जनों किताबें प्रकाशित हुई हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिंदी में इस तरह की पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है, देशभर की अलग अलग भाषाओं में इस तरह की पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है।
चुनाव के वक्त इस तरह की पुस्तकों के प्रकाशन का मकसद लगभग साफ होता है। एक तो पुस्तक की चर्चा हो जाए और जिसको केंद्र में रखकर प्रशंसात्मक या आलोचनात्मक किताब लिखी गई हो उसपर पुस्तक का प्रभाव पड़े। पुस्तक की मार्फत राजनीति का ये ट्रेंड भारत में नया है। अमेरिका में हर चुनाव के पहले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को केंद्र में रखकर प्रशंसात्मक और विध्वंसात्मक किताबें आती रही हैं। वहां तो संभावित उम्मीदवारों के निजी प्रसंगों तक पर किताबें लिखने का ट्रेंड रहा है। अब अगर हिंदी के लेखकों ने इस ट्रेंड को अपनाया है तो उनसे पाठकों की एक अपेक्षा यह बन रही है कि ये पुस्तकें भक्तिभाव से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ होकर लिखी जाए ताकि फौरी तौर पर चर्चित होने के बाद ये किताबें गुमनाम ना हो जाएं।

Saturday, March 23, 2019

लगभग अप्रासंगिक हुए वाम दल


लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन का दौर शुरू हो चुका है। चुनावी बिसात पर सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं। दलबदल का खेल बदस्तूर जारी है। नए-नए लोगों को राजनीति में दीक्षित किया जा रहा है, संभव है उनको चुनाव में प्रत्याशी भी बनाया जाए। आरोप-प्रत्यारोप और वोटरों तक पहुंचने की नई-नई प्रविधियां आ रही हैं। दलों के बीच महागठबंधन से लेकर छोटे-छोटे समझौते हो रहे हैं। इन चुनावी हलचल के बीच एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात हो रही है जिसको कायदे से रेखांकित नहीं किया जा रहा है और उसकी वजहों पर भी चर्चा नहीं हो रही है। बिहार में एनडीए के खिलाफ महागठबंधन बना। इस महागठबंधन में लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी, जीतन राम मांझी की पार्टी, वीआईपी पार्टी और शरद यादव की पार्टी शामिल हुई। इन दलों के बीच सीटों का बंटवारा भी हो गया, लेकिन इस महागठबंधन में वामपंथी दलों को शामिल नहीं किया गया। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय जनता दल अपने कोटे से कम्युनिस्ट पार्टियों में से एक माले को एक सीट देने पर राजी हो गई है। लंबे समय ये कयास लगाए जा रहे थे कि बिहार के बेगूसराय से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार सीपीआई के उम्मीदवार होंगे। महागठबंधन में सीपीआई को जगह नहीं मिलने से अब कन्हैया उनका उम्मीदवार नहीं हो पाएगा। बेगूसराय को पूरब का लेनिनग्राद कहा जाता था लेकिन उस सीट के लिए भी सीपीआई से समझौता नहीं होना राजनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण संकेत दे रहा है। सिर्फ बिहार ही क्यों पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच लोकसभा चुनाव को लेकर कोई समझौता अबतक नहीं हो पाया है। इस बात को ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब लेफ्ट पार्टी किसी ना किसी गठबंधन की या तो धुरी या उसका महत्वपूर्ण घटक हुआ करता था। उन्नीस सौ नब्बे के दशक में तो कई बार लेफ्ट के नेता हरकिशन सिंह सुरजीत किंगमेकर की भूमिका में नजर आते थे। फिर तीन चार दशकों में ही ऐसा क्या हो गया कि वामपंथी दल अन्य राजनीतिक दलों के लिए अस्पृश्य होते चले गए।
वामपंथी दल को देश की जनता ने आजादी के बाद काफी महत्व दिया। शुरुआती तीन लोकसभा चुनाव में उनके वोट बढ़ते रहे जो करीब दस फीसदी तक जा पहुंचा था, बावजूद इसके कि 1947 में जब देश आजाद हुआ था तो सीपीआई ने इसको आजादी मानने से इंकार करते हुए उसको बुर्जुआ के बीच का सत्ता हस्तांतरण करा दिया था। भारतीय जनमानस को नहीं समझने की शुरुआत यहीं से होती है । जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था और नवजात गणतंत्र अपने पांव पर खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहा था तो वाम विचारधारा ने गणतंत्र के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत कर दी थी। उस वक्त रूसी तानाशाह स्टालिन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इस विद्रोह को खत्म करने में भारत की मदद की थी । महात्मा गांधी को भी 1947 में कहना पड़ा था-कम्यूनिस्ट समझते हैं उनका सबसे बड़ा कर्तव्यसबसे बड़ी सेवा (देश में ) मनमुटाव पैदा करनाअसंतोष को जन्म देना है। वे यह नहीं सोचते कि यह असंतोषये हड़तालें अंत में किसे हानि पहुंचाएंगी । अधूरा ज्ञान सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है ....कुछ लोग ये ज्ञान और निर्देश रूस से प्राप्त करते हैं। हमारे कम्युनिस्ट इसी हालत में जान पड़ते हैं, ये लोग अब एकता को खंडित करनेवाली उस आग को हवा दे रहे हैंजिसे अंग्रेज लगा गए थे।  
दूसरी चूक जो वामपंथियों से हुई वो ये कि वो भारत को मार्क्स के नजरिए से समझने की कोशिश करते रहे। राजनीतिक विश्लेषक और इतिहासकार एंथोनी पैरेल ने ठीक ही कहा था- भारतीय मार्क्सवादी भारत को मार्क्स के सिद्धांतों के आधार पर बदलने की कोशिश करते हैं और वो हमेशा मार्क्सवाद को भारत की जरूरतों के अनुरूप ढालने की कोशिशों का विरोध करते रहे हैं । नतीजा यह हुआ कि मार्क्सवाद को भारतीय परिप्रेक्ष्य में विकसित और व्याख्यायित करने की कोशिश ही नहीं की गई । नुकसान यह हुआ कि मार्क्सवाद को भारतीय दृष्टि देने का काम नहीं हो पाया । वामपंथी दलों को की ताकत उसकी सैद्धांतिकी हुआ करती थी। सिद्धांतों को लेकर उनकी सोच साफ होती थी। उन्ही सिद्धांतों पर पोलित ब्यूरो भी काम करता था और उसी पर एक आम कार्यकर्ता भी। जब देश में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो वामपंथी दल अपने सिद्धांतों को लेकर भ्रमित होने लगे। उस समय देश में एक चिंता थी कि आर्थिक उदारीकरण का समाज के सभी वर्गों को एक समान लाभ नहीं मिलेगा और इससे अमीरों और गरीबों के बीच की खाई और गहरी होती जाएगी। जब देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो एक नैरेटिव ये भी बना था कि अमीरों को इसका ज्यादा लाभ मिलेगा, गांव की तुलना में शहरी आबादी को ज्यादा फायदा होगा, पिछड़ों की तुलना में अगड़े इससे ज्यादा लाभान्वित होंगे। एक नैरेटिव दलितों को लेकर चला था। भोपाल में दलित बुद्धिजीवियों की एक बैठक हुई थी जिसके बाद एक दस्तावेज जारी किया गया था। उस दस्तावेज में दलित उद्यमियों की कमी पर चिंता प्रकट की गई थी। इस तरह के नैरेटिव का प्रभाव समाज पर दिखा। लगभग उसी समय भारत में अन्य पिछड़ी जाति का राजनीति पर प्रभाव बढ़ा। जातिगत राजनीति ने भी जोर पकड़ा और अलग अलग राज्यों में जाति के नेता मजबूत होने लगे। वामदल वर्ग संघर्ष की बात करते रहे और जातियां मजबूत होती चली गईं। ऐसा होता देख वामदलों ने भी क्लास की जगह कास्ट को तवज्जो देना शुरू किया। यह कोलकाता में फरवरी 1948 में आयोजित दूसरी पार्टी कांग्रेस के प्रोग्राम ऑफ डेमोक्रैटिक रिवोल्यूशन में जाति के खिलाफ संघर्ष की घोषणा से विचलन था। यहां से उनकी सैद्धांतिकी कमजोर पड़ने लगी। वामदलों ने इसको ना समझकर बड़ी भूल की। इसके अलावा वामपंथ के नेतृत्व के बीच भ्रम की स्थिति ने भी इस दल को कमजोर किया। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी के बीच जो वैचारिक द्वंद दिखता है उसका प्रत्यक्ष असर कार्यकर्ताओं पर पड़ा। साम्यवाद के सामने बड़ी चुनौती क्या है पूंजीवाद या सांप्रदायिकता ये तय ही नहीं हो पा रहा है।     
इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी मजबूत होने लगी थी। वामपंथी दलों ने भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने के लिए वामदलों ने एक बार फिर कांग्रेस का दामन थाम लिया। वामपंथी दल पहले भी कांग्रेस को समर्थन देते रहे हैं। इंदिरा गांधी ने जब देश में इमरजेंसी लगाई थी तब भी सीपीआई ने उनका समर्थन किया था। प्रगतिशील लेखक संघ ने अपने एक सम्मेलन में मशहूर लेखक भीष्म साहनी की अध्यक्षता में इमरजेंसी के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया था। इसके पहले भी 1970 से लेकर 1977 तक सीपीआई कांग्रेस के साथ रही। कालांतर में जब केंद्र में देवगौड़ा और गुजराल की सरकार बनी तो सरकार में शामिल भी हुए। बाद में तो भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए 2004 में कांग्रेस को समर्थन देकर सरकार बनवा दिया। कांग्रेस की आर्थिक नीतियां लगभग वही रहीं जो उसने शुरू की थीं, जो अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मजबूती से आगे बढ़ीं थी। वामदलों ने जिस न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर मनमोहन सिंह या कांग्रेस को समर्थन दिया था वो ज्यादातर कागजों में ही रहा। 2008 में जब मनमोहन सरकार ने अमेरिका के साथ परमाणु करार किया तो वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उस दौरान पार्टी का हुक्म को नहीं मानने पर करात ने सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा स्पीकर रहते हुए पार्टी से निकाल दिया था ।सोमनाथ चटर्जी ने अपनी पुस्तक कीपिंग द फेथ, मेमॉयर ऑफ अ पार्लियामेंटेरियन में विस्तार से उस वक्त सीपीएम के महासचिव प्रकाश करात की तानाशाही के बारे में लिखा है।सोमनाथ चटर्जी ने वाम दलों को गंभीर आत्मविश्लेषण की भी सलाह दी थी। 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले सोमनाथ चटर्जी ने वामदलों की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए उनके हार की भविष्यवाणी की थी, जो लगभग सही साबित हुई थी।
कांग्रेस के साथ रहते हुए वामपंथी दलों को सत्ता का सुख मिलने लगा। कांग्रेस ने साहित्य कला और संस्कृति का क्षेत्र वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया। वामपंथियों की राजनीति को करीब से देखनेवालों का मानना है कि कांग्रेस ने ऐसा करके वामपंथियों को सत्ता की मीठी गोली दे दी जिसका असर लंबे समय बाद अब जाकर दिखाई दे रहा है। इन क्षेत्रों में काम कर रहे मार्क्सवादियों के आचरण और सिद्धांत में बहुत अंतर रहा जो साफ तौर पर दिखता भी था। इसने जनता के बीच उनकी साख कमजोर करनी शुरू कर दी। एक बार साख में सेंध लग जाए तो उसको वापस पाना बहुत मुश्किल होता है। वामदलों के साथ यही हुआ हलांकि इस वक्त ना तो वो भारतीय जनमानस को समझने की कोशिश करते दिख रहे हैं और ना ही अपनी खोई साख वो वापस पाने के लिए प्रयत्नशील।  


Saturday, March 16, 2019

संस्कृति की ओट में चुनावी आखेट


लोकसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा के बाद देशभर में चुनावी राजनीति जोर पकड़ने लगी है। बयानों के वीर अपने अपने तीर से अपने-अपने विपक्षी नेताओं को धराशायी करने में जुटे हैं। अलग-अलग विचारधारा के लोग अपनी-अपनी विचारधारा और दल को श्रेष्ठ साबित करने में जुटे हैं। श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में जिस तरह के विशेषणों का उपयोग हो रहा है वो बेहद दिलचस्प होता जा रहा है। आजादी के बाद के चुनावों में बौद्धिकों के बीच समाजवाद, सामंती समाजवाद, सच्चा समाजवाद, रूढ समाजवाद, पारंपरिक समाजवाद से लेकर गरीब जनता और पूंजी जैसे विशेषणों का सहारा लिया जाता रहा है। दो हजार चौदह के आम चुनाव के बाद से लगातार बजने वाला राग फासीवाद इस बार धीमे स्वर में बज रहा है। दरअसल फासीवाद शब्द अब इतना घिस और पिट गया है और जिस उदारता के साथ उसका पिछले चार सालों में उपयोग किया गया कि उसने अपना अर्थ खो दिया।लोगों पर अब इस शब्द का प्रभाव लगभग खत्म सा होता दिखाई दे रहा है। फासीवाद का इस्तेमाल करनेवालों को भी यह बात समझ में आने लगी है। अब फासीवाद की जगह लोगों ने अलग शब्द चुन लिया है। अब गाहे बगाहे अघोषित आपातकाल जैसे शब्द चुनावी फिजां में गूंजने लगे हैं। असहिष्णुता का माहौल बनानेवाले अशोक वाजपेयी और रामचंद्र गुहा जैसे बौद्धिकों की रुचि भी अब इस जुमले में भी नहीं दिखाई पड़ती है, क्योंकि फासीवाद की तरह असहिष्णुता शब्द का भी प्रभाव अब क्षीण पड़ गया है। हलांकि गाहे बगाहे इस शब्द का इस्तेमाल हो जाता है। मोदी सरकार पर यह आरोप बहुत आसानी से लगाते रहे हैं कि वो असहिष्णु है, अपने विरोधियों को स्पेस नहीं देते हैं। यही आरोप अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर लगते रहे थे। इसको लेकर लंबे समय तक मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की जाती रही । असहिष्णुता का ये आरोप अगर कोई प्रभाव छोड़ने में असफल रहा तो इसके पीछे संस्कृति मंत्रालय की उदारता रही। 2014 से लेकर अबतक संस्कृति मंत्रालय ने जिस उदारता के साथ सरकार के विरोधियों को आर्थिक से लेकर हर प्रकार की मदद की उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। इस स्तंभ में संस्कृति मंत्रालय की उदारता और वौचाकिक विरोधियों को अहमियत और आर्थिक मदद की चर्चा होती रही है।
हाल में दो ऐसी घटनाएं घटी जिसने एक बार फिर से संस्कृति मंत्रालय की उदारता और बगैर भेदभाव के काम करने की छवि को मजबूत किया। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का शपथ लेने से लेकर अबतक ये आरोप लगता रहा है कि शिक्षा और संस्कृति विभाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कब्जा हो गया है। केंद्र सरकार के इन दो मंत्रालयों के अधीन या संबद्ध संस्थाओं में नियुक्ति और वहां से आर्थिक अनुदान तक संघ की हरी झंडी मिलने के बाद ही मिलती है। पर दर्जनों ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिससे ये साफ तौर पर दिखता है कि संघ और इसके अनुषांगिक संगठनों का किसी प्रकार का प्रभाव इन मंत्रालयों पर हो, या संघ के इशारे पर काम होता हो। एक ताजा उदाहरण देखा जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक संस्था है संस्कार भारती। संघ से संबद्ध ये संस्था साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम करती है। प्रयागराज कुंभ के दौरान संस्कार भारती ने 15 जनवरी से लेकर 4 मार्च तक अपना पूर्वोत्तर नाम से एक कार्यक्रम किया। किसी भी कुंभ में ये पहली बार हुआ कि पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के कलाकारों ने उसमें हिस्सा लिया। पूर्वोत्तर के अलग अलग विधा के तीन हजार के करीब कलाकारों ने संस्कार भारती के इस आयोजन में हिस्सा लिया। इसके अलावा संस्कार भारती ने कुंभ के दौरान ही संस्कृति विद्वत कुंभ के नाम से भारतीय साहित्य, सिनेमा और भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वानों के साथ तीन दिन के विचार कुंभ का आयोजन भी किया। इस कार्यक्रम के आयोजन में आर्थिक मदद के लिए संस्कार भारती ने संस्कृति मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें पौने दो करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की मांग की गई थी। बताया जा रहा है कि संस्कृति मंत्रालय ने संस्कार भारती के इस प्रस्ताव को मौखिक स्वीकृति दे दी थी। फाइल प्रोसेस हो गई थी। इस आयोजन का निमंत्रण पत्र आदि छप गया था जिसमें संस्कृति मंत्रालय के सहयोग का उल्लेख था। कार्यक्रम से चंद दिनों पहले संस्कृति मंत्रालय ने इस आयोजन के लिए आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया। आयोजकों के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में दूसरा निमंत्रण पत्र छपा, जिसमें से संस्कृति मंत्रालय के सहयोग का उल्लेख हटाया गया। अन्य प्रचार सामग्री में भी ऐसा ही करना पड़ा। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दबाव या प्रभाव संस्कृति मंत्रालय पर होता तो इस तरह की स्थिति नहीं बनती। आखिरी वक्त में संस्कार भारती को अन्य संस्थाओं की मदद और संसाधनों से इस कार्यक्रम को करना पडा।
संस्कृति मंत्रालय से जुड़ा एक और उदाहरण। पटना की एक संस्था है जिसने 12 और 13 मार्च को टीवी पत्रकार रवीश कुमार की कृति इश्क में शहर होना पर एक नाटक का आयोजन किया। कालिदास रंगालय में दो दिनों तक हुए इस मंचन के लिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने आर्थिक मदद दी। रवीश कुमार मोदी सरकार की नीतियों के कठोर आलोचकों में से हैं। सरकार की नीतियों के विरोध में स्क्रीन काला करने से लेकर अपने कार्यक्रम में स्टूडियो में विदूषकों तक को बिठा चुके हैं। मोदी सरकार के लिए तरह तरह के विशेषणों का प्रयोग करते रहे हैं। बावजूद इसके उनकी कृति पर होनेवाले नाटक को संस्कृति मंत्रालय से आर्थिक मदद दी गई। बगैर किसी दुराग्रह और पूर्वाग्रह के। यह भी तर्क नहीं दिया जा सकता है कि मंत्रालय में निचले स्तर पर चूक हुई होगी। इसकी एक प्रक्रिया है जिसके तहत संस्थाएं नाटक के मंचन के लिए आर्थिक सहयोग की मदद के लिए आवेदन देती हैं । अपने आवेदन में वो नाटक के मंचन की तिथि के अलावा किस लेखक की कृति पर आधारित नाटक का मंचन होगा, आयोजन स्थल आदि सभी जानकारी अपने आवेदन के साथ संलग्न करते हैं। आवेदन पर मंत्रालय में उच्च स्तर पर फैसला लिया जाता है। अगर किसी तरह का पूर्वग्रह होता या भेदभाव होता तो क्या ये संभव हो पाता। यह अलग बात है कि इश्क में शहर होना का नाट्य रूपांतर कैसा हुआ होगा क्योंकि वो छोटी छोटी कहानियों का संग्रह है।
इस वर्ष फरवरी और मार्च में संस्कृति मंत्रालय के इन दो फैसलों से साफ है कि संस्कृति मंत्री ने जो शपथ ली थी, जिसमें कहा जाता है कि बगैर किसी राग या द्वेष के काम करेंगे, उसको अक्षरश: निभाया है। बावजूद इसके अगर मोदी सरकार पर असहिष्णुता और संघ के इशारे पर काम करने का आरोप लगता है तो वो सही नहीं प्रतीत होता है। दरअसल अगर हम 2014 से मोदी सरकार पर लग रहे इस तरह के आरोपों का विश्लेषण करते हैं तो इसमें राजनीति की एक अंतर्धारा साफ नजर आती है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद और राज्यों के विधानसभा चुनावों के पहले इस तरह की बातें फैला कर मोदी विरोधी राजनीति को मजबूत करने की एक कोशिश की जाती रही है। यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी अभियान को एक सोची समझी रणनीति के तहत शुरू किया गया था। इस बात की पुष्टि पिछले दिनों तब हुई जब साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने एक लंबा लेख लिखकर सारी घटनाओं को क्रमबद्ध तरीके से देश के सामने रख दिया। इसी तरह से 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले जुटान नाम से संगठन बनाकर वामपंथी लेखकों ने मोदी सरकार के विरोध करने की योजना बनाई थी। कुछ कार्यक्रम भी किए थे जिसमें देशभर में प्रतिरोध के बिखरे हुए स्वर को एक करने की आवश्यकता जताई गई थी। गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद इस जुटान का क्या हुआ ये पता नहीं चल पा रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले भी इस तरह की कोशिश की गई थी। लेखकों और साहित्यकारों को राजनीति करनी चाहिए या नहीं, इसको लेकर चली बहस में पूरी दुनिया के विचारकों ने अपने मत प्रकट किए। लुकाच से लेकर ब्रेख्त और बेंजामिन जैसे विश्वप्रसिद्ध लेखकों की राय है कि लेखक और राजनीति का संबंध होना चाहिए। अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने लेखकों में राजनीतिक चेतना की वकालत की है लेकिन इस बात का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है कि लेखक सांस्कृतिक मसलों की आड़ लेकर राजनीति करें। पिछले पांच सालों से हो ये रहा है कि एक खास विचारधारा के लेखक साहित्यिक और सांस्कृतिक मसलों की आड़ में राजनीति कर रहे हैं। अगले महीने से लोकसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होगा, उसके पहले भी इस तरह के मसले उठेंगे, पर कहते हैं न कि ये जो पब्लिक है वो सब जानती है। इसमें जोड़ सकते हैं कि वो सब समझती भी है।

Saturday, March 9, 2019

फॉर्मूलाबद्ध लेखन की बेड़ी में साहित्य


आगामी सितंबर में स्कॉटलैंड में इंटरनेशनल क्राइम राइटिंग फेस्टिवल का आयोजन होना है। इस क्राइम राइटिंग फेस्टिवल का नाम ब्लडी स्कॉटलैंड है। इस फेस्टिवल में दुनिया की अलग अलग भाषाओं के अपराध कथा लेखक शामिल होते हैं। इस फेस्टिवल की चर्चा इस वजह से हो रही है क्योंकि पिछले दिनों एक साहित्योत्सव के दौरान संस्कृतिकर्मी मित्र संदीप भूतोडिया ने बातचीत के दौरान बताया कि ब्लडी स्कॉटलैंड इंटरनेशनल क्राइम राइटिंग फेस्टिवल ने तय किया है कि वो हिंदी से भी एक अपराध कथा लेखक को इस फेस्टिवल में निमंत्रित करेंगे। तीन चार साहित्यिक मित्र वहां खड़े थे। इस खबर को सुनने के बाद सबके चेहरे पर खुशी का भाव था क्योंकि उनको लग रह था कि हिंदी लेखकों की पूछ वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है। हम सब लोग खुश हो ही रहे थे कि संदीप भूतोड़िया ने हमसे हिंदी के एक क्राइम फिक्शन या अपराध कथा लेखक का नाम पूछा ताकि ब्लडी स्कॉटलैंड फेस्टिवल के आयोजकों को सुझा सकें। वहां खड़े सबके मुंह से निकला सुरेन्द्र मोहन पाठक। फिर पता चला कि पाठक जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। पाठक जी के अलावा किसी क कोई नाम सूझ नहीं रहा था। लंबी चर्चा के बाद भी हम सब हिंदी के किसी अपराध कथा लेखक का नाम नहीं सुझा पाए। हिंदी के अपराध कथा लेखक पर बात चल निकली। जितने भी नाम आए लगभग सभी पॉकेट बुक्स के लेखक के आए चाहे वो कर्नल रंजीत हों, वेद प्रकाश शर्मा हों या ओम प्रकाश शर्मा हों। तथाकथित मुख्यधारा के साहित्यकारों में से कोई भी ऐसा नाम नहीं आया जिसको हिंदी में अपराध कथा लेखक के तौर पर स्वीकृति मिली हो। ले देकर एक गोपाल राम गहमरी का नाम याद पड़ता है जिन्होंने अपनी पत्रिका जासूस के लिए कई जासूसी उपन्यास लिखे। खूनी की खोज, अद्भुत लाश, बेकसूर की फांसी और गुप्तभेद उनके चर्चित उपन्यास रहे हैं। आजादी के कुछ दिनों पहले ही गोपाल राम गहमरी का निधन हो गया। दरअसल अगर हम देखें तो गहमरी ने हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं के अलावा जासूसी उपन्यास लिखे। उन्होंने जमकर अनुवाद भी किए। गहमरी के निधन के बाद उनके कद का तो छोड़ दें, कोई उनसे कमतर जासूसी लेखक भी हिंदी साहित्य को नहीं मिला। अपराध कथा पढ़ने वाले हिंदी के पाठक अपनी पाठकीय क्षुधा मेरठ से छपनेवाले पॉकेट बुक्स से पूरी करते रहे। एक जमाना था जब रेलवे स्टेशन के व्हीलर के स्टॉल पर राजन-इकबाल सीरीज के जासूसी उपन्यासों के लिए किशोरों की लाइन लगा करती थी। नए-नए पाठक राजन-इकबाल सीरीज के नए उपन्यासों की प्रतीक्षा करते थे। उसकी अग्रिम बुकिंग हुआ करती थी।  
अब इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि हिंदी में अपराध कथा लेखक क्यों नहीं हुए या क्यों बहुत कम हुए। हिंदी समेत पूरी दुनिया की अलग अलग भाषाओं में अपराध कथा का विशाल पाठक वर्ग है। अंग्रेजी में तो क्राइम फिक्शन लिखनेवाले लेखकों की एक बेहद समृद्ध परंपरा है। अमेरिकी क्राइम फिक्शन लेखक जेम्स पैटरसन दुनिया के सबसे अमीर लेखकों में से एक हैं। वो जासूसी उपन्यास के साथ साथ, रोमांस और एडल्ट फिक्शन भी लिखते हैं। उनके जासूसी उपन्यासों के लोग दीवाने हैं। लेकिन हिंदी साहित्य में अगर इस विधा पर विचार करें तो एक सन्नाटा नजर आता है। सुरेन्द्र मोहन पाठक को भी हाल के वर्षों में तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों के बराबर सम्मान मिलना शुरू हुआ जब उनको हार्पर कॉलिंस जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह ने छापना शुरू किया। दरअसल हिंदी साहित्य लेखन में एक खास किस्म की वर्ण व्यवस्था दिखाई देती है। इसमें अलग अलग विधाओं में लेखन करनेवाले और अलग अलग प्रकाशकों से छपनेवाले वर्णव्यवस्था के अलग अलग पायदान पर हैं। ये वर्ण व्यवस्था इतनी कठोर या रूढ़ है कि इसके खांचे को तोड़ पाना लगभग नामुमकिन है। इसको समझने के लिए एक उदाहरण ही काफी होगा। हिंदी में प्रेम पर लिखनेवाले दो उपन्यासकार हुए। एक धर्मवीर भारती जिनका लिखा गुनाहों का देवता बहुत प्रसिद्ध हुआ। दूसरे हुए गुलशन नंदा जिनके कई उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुए, उनके लिखे उपन्यासों पर खूब फिल्में बनीं। प्रेमकथा लिखनेवाले धर्मवीर भारती और गुलशन नंदा में साहित्यिक वर्ण व्यवस्था में धर्मवीर भारती केंद्र में रहे और गुलशन नंदा तमाम लोकप्रियता और फिल्मों में स्वीकार्यता के बावजूद उसकी परिधि के भी बाहर रहे। क्यों? तथाकथित मुख्यधारा के आलोचकों ने कभी गुलशन नंदा की कृतियों को विचार योग्य भी नहीं समझा। क्यों? जब भी गुनाहों का देवता का नया संस्करण छपता उसपर चर्चा होती, उसको और मजबूती प्रदान की जाती। अगर अब भी गुलशन नंदा के किसी एक उपन्यास की प्रतियों की संख्या और गुनाहों के देवता की अबतक बिकी प्रतियों की तुलना की जाए तो बेहद दिलचस्प आंकड़े और नतीजे सामने आ सकते हैं।  
साहित्य की इस वर्ण व्यवस्था को वामपंथी विचारधारा ने बहुत मेहनत से तैयार और मजबूत किया। इस विचारधारा को मानने वाले लेखकों और आलोचकों ने एक ऐसा मजबूत घेरा तैयार किया जिसमें बाहरी विचारधारा के लेखकों को मान्यता ही नहीं दी। गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत और इन जैसे अन्य लेखकों का मूल्यांकन क्या उसपर चर्चा ही नहीं की गई । इनको लुगदी लेखक कहकर साहित्यिक वर्णव्यवस्था से बहिष्कृत रखा। यही हाल वर्षों तक फिल्मों और गीत संगीत पर लिखनेवालों का रहा। उनको भी गंभीर लेखक नहीं माना गया। फिल्मों और गीत संगीत को लेकर वामपंथी आलोचकों की राय अच्छी नहीं रही। उनको वो बुर्जुआ के लिए किया गया उपक्रम मानते रहे। नतीजा यह हुआ कि इस विधा पर लिखने वालों का विकास नही हो सका और हिंदी फिल्मों को लेकर जितना अच्छा और अधिक अंग्रेजी में लिखा गया उतना हिंदी में नहीं लिखा जा सका। हिंदी साहित्य जब वामपंथ के जकड़न से मुक्त होने लगी तो फिल्म और संगीत पर लेखन बढ़ने लगा। लेकिन अबतक हिंदी में इन विषयों पर लेखन इतना पीछे रह गया है कि उसको अंग्रेजी के बराबर आने में काफी वक्त लगेगा। अपराध कथा और जासूसी उपन्यासों को लेकर भी यही स्थिति रही। जासूसी उपन्यासों के लेखकों को हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठा नहीं मिली लिहाजा इस विधा में हाथ आजमाने वाले कम हुए। साहित्य के वाम विचारधारा काल में यथार्थवादी लेखन या मजदूरों और दबे कुचलों के पक्ष में इतना अधित लेखन हुआ, और उस लेखन को प्रतिष्ठा दिलाने का चक्र चला कि बाकी विधाएं या तो दम तोड़ गईं या फिर उनमें लिखनेवाले कम होते चले गए। इतना ही नहीं जनलेखक और अभिजन लेखक के खांचे में बांटकर भी लेखकों को उठाने और गिराने का खेल खेला गया। जनवादिता, प्रगतिशीलता और क्रांतिकारिता के नाम पर जिस तरह से साहित्यिक यथार्थ गढे गए उसने भी लेखकों को एक फॉर्मूला दिया। उस फॉर्मूले को अपनाकर पुरस्कार और प्रसिद्धि दोनों मिले। लेकिन उसने हिंदी साहित्य का नुकसान किया। उसके विस्तार को बाधित किया। फॉर्मूलाबद्ध लेखन लंबे समय तक चल नहीं सकता है।
जासूसी कथा या अपराध कथा नहीं लिखे जाने की एक औक वजह समझ में आती है वो है कि यह विधा लेखक से बहुत मेहनत की मांग करती है। इसमें पॉर्मूलाबद्ध लेखन नहीं हो सकता है, इसमें पाठकों के लिए हर पंक्ति में आगे क्या की रोचकता बरकरार रखनी होती है। यहां काल्पनि यथार्थ नहीं चलता है। दूसरी बात ये कि अपराध कथा में सूक्षम्ता से स्थितियों का वर्णन करना होता है जिसके लिए कानून और अपराध दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है। अन्य विधा में इतनी सूक्ष्मता से वर्णन की अपेक्षा नहीं की जाती है वहां काल्पनिक यथार्थ से भी काम चल जाता है। एक और वजह ये हो सकती है कि हिंदी के प्रकाशकों ने भी लंबे समय तक अपराध कथा को छापने का साहस नहीं किया। लेखकों से अपराध कथा या जासूसी उपन्यास लिखवाने की कोई योजना नहीं बनाई। पिछले दिनों जब कॉलेज की कहानियां बेस्टसेलर होने लगी तो हिंदी के तमाम प्रकाशकों ने एक खास तरह के लेखन को ना केवल स्वीकारा बल्कि उसको बढ़ावा देने के लिए कमर कस कर तैयार हो गए। जासूसी उपन्यासों को लेकर हिंदी के प्रकाशकों में किसी तरह का उत्साह नहीं दिखा क्योंकि अगर उत्साह दिखता तो उसको छापने का प्रयत्न भी सामने आता। प्रकाशकों की उदासीनता ने भी लेखकों को जासूसी कथा लिखने से दूर किया। उपन्यासकार प्रभात रंजन कहते भी हैं कि अगर वो जासूसी उपन्यास लिख भी देगें तो छापेगा कौन। इअगर छपेगा ही नहीं तो लिखने का क्या फायदा। दरअसल अगर हम देखें तो भारतीय प्रकाशन जगत के एक बड़े हिस्से पर भी वामपंथी विचारधारा और रूस के धन का व्यापक प्रभाव लंबे समय तक रहा। उसने भी कायदे से हिंदी में अलग अलग तरह के लेखन का विकास अवरुद्ध किया। मार्क्स और मार्क्सवाद की आड़ में ना केवल पौराणिक लेखन को प्रभावित किया बल्कि अलग अलग विधा को भी पनपने से रोका। जबकि मार्क्स ने तो साफ कहा था कि पुराणों में अतिलौकिक और धार्मिक तत्व ही नहीं होते वो मनुष्य की नैतिक मान्यताओं और यथार्थ के प्रति उसके सौंदर्यात्मक दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित करते हैं।जरूरत इस बात की है कि इन कारगुजारियों पर हिंदी साहित्य विचार करे।    


Saturday, March 2, 2019

समग्र मूल्यांकन की चुनौती


हिंदी साहित्य जगत में नामवर जी की उपस्थिति एक आश्वस्ति की तरह थी। उनके निधन के बाद यह आश्वस्ति थोड़ी कम हो गई है। खत्म हो गई इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्योंकि नामवर सिंह की कृतियां हमारे साथ हैं। यह हमारे भारतीय संस्कार में है कि किसी भी व्यक्ति के निधन के बाद हम उनके व्यक्तित्व या कृतित्व का विश्लेषण उदार होकर करते हैं। नामवर सिंह के निधन के बाद कुछ लोग उनके लेखन और कथित व्यक्तिगत विचलन को लेकर उनकी आलोचना कर रहे हैं। हिंदी में यह बहुत कम होता है कि किसी के निधन के फौरन बाद उनकी आलोचना शुरू हो जाए। नामवर के निधन के बाद ऐसा हुआ। उनके निधन के बाद कुछ लोग उनको प्रगतिशील विचारधारा के ध्वजवाहक के तौर पर पेश करने लगे।इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी इसपर विचार किया जाना चाहिए। नामवर सिंह प्रगतिशील लेखक संघ के सालों तक अध्यक्ष रहे लेकिन जब भी उनको उचित लगा उन्होंने पार्टी लाइन से अलग हटकर भी फैसला लिया। इस संबंध में एक प्रसंग याद आता है जिसका जिक्र निर्मला जैन ने अपनी पुस्तक में किया है। पांच साल की बेरोजगारी के बाद नामवर सिंह को कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार जनयुग में नौकरी मिली और वो दिल्ली आ गए थे। कुछ दिन ही बीते थे कि राजकमल प्रकाशन की उस वक्त की मालकिन शीला संधू ने उनके सामने अपने प्रकाशन गृह के सलाहकार बनने का प्रस्ताव किया था। दो हजार रुपए महीने के वेतन पर। उस वक्त के लिहाज से प्रस्ताव बहुत अच्छा था। राजकमल प्रकाशन में सलाहकार की नौकरी और जनयुग का संपादन दो साल तक साथ-साथ चलता रहा। अचानक एक दिन शीला संधू ने उनके दो जगह नौकरी करने पर सवाल उठा दिया। शीला जी ने नामवर सिंह से दोनों में से एक जगह नौकरी करने के विकल्प को चुनने को कहा। नामवर सिंह थोडे परेशान हुए। एक तरफ पार्टी के प्रति निष्ठा और दूसरी तरफ राजकमल की आकर्षक वेतन वाली नौकरी। नामवर सिंह को निर्मला जैने ने सलाह दी थी कि किसी भी व्यापारिक संस्थान की तुलना में पार्टी समर्थित अखबार का ठिकाना ज्यादा भरोसेमंद होगा। ये उस वक्त की बात है जब कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति अच्छी थी। लेकिन नामवर जी ने फैसला राजकमल प्रकाशन के पक्ष में लिया। वजह क्या रही होगी इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। कुछ लोगों ने उस वक्त राजकमल प्रकाशन से मिलनेवाली पगार को इसका कारण माना था। ये लगता नहीं है क्योंकि ऐसा मानना नामवर सिंह की पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा है। नामवर सिंह ने पार्टी पर एक निजी संस्थान को तरजीह दी। मुझे लगता है कि ऐसा उन्होंने इस वजह से किया होगा कि राजकमल प्रकाशन में रहकर उनका संपर्क पूरे हिंदी जगत के लेखकों से होगा और वो हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के संपर्क में रहकर ज्यादा बेहतर काम कर पाएंगें।
ऐसे कई उदाहरण हैं जब नामवर सिंह ने प्रगतिशील लेखक संघ यानि प्रलेस या कम्युनिस्ट पार्टी की बात नहीं मानी। ज्यादा पुरानी बात नहीं है। करीब तीन साल पहले जब नामवर सिंह नब्बे साल के हुए थे तो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने उनके जन्मदिन समारोह का आयोजन किया था। गृहमंत्री राजनाथ सिंह और संस्कृति मंत्री महेश शर्मा उस समारोह में शामिल हुए थे। नामवर सिंह के इस समारोह में शामिल होने के फैसले के विरोध में प्रलेस ने बयान जारी किया था। प्रलेस के उस बयान में ये कहा गया था कि 2012 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष पद से हटने के बाद नामवर सिंह संघ के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। प्रलेस के महासचिव के मुताबिक उनके संगठन के पास नामवर सिंह को रोकने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन वो संगठन को नामवर सिंह से अलग तो कर ही सकते हैं। बावजूद इसके नामवर सिंह अपने जन्मदिन समारोह में शामिल हुए।
एक सांस्कृतिक संगठन का यह दायित्व होता है कि वो अपने वरिष्ठ लेखकों का सम्मान करे। इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र अपने इसी दायित्व का निर्वाह कर रहा था। कला केंद्र ने तो उसके बाद नामवर सिंह के विपरीत विचारधारा के लेखक देवेन्द्र स्वरूप जी को लेकर भी समारोह आयोजित किया। देवेन्द्र स्वरूप जी के निधन के बाद उनके नाम से भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन के लिए एक फेलोशिप की घोषणा भी की है। दोनों विद्वानों ने अपनी लाइब्रेरी भी कला केंद्र को सौंपने का फैसला कर लिया था। दरअसल बहिष्कारवादियों को ये बातें कहां समझ में आती हैं। उन्हें तो अपना स्वार्थ और अपनी राजनीति दिखती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि नामवर सिंह कम्युनिस्ट थे। वो विचारधारा के स्तर पर मार्क्सवादी भी थे लेकिन जड़ता से दूर थे। वो अपने लेखन में भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रतीकों का जमकर उपयोग करते थे। एक बेहद दिलचस्प प्रसंग मैनेजर पांडे के संदर्भ में है। नामवर सिंह ने अपनी पुत्री समीक्षा को दार्जिलिंग से 12 जून 2005 को एक पत्र लिखा था । पत्र की पृष्ठभूमि यह है कि दार्जिलिंग के होटल में कोई पांडे नाम के सज्जन पहुंचे और पांच सौ पृष्ठों के महाकाव्य पर नामवर जी से कुछ लिखने का आग्रह किया । पत्र में नामवर जी लिखते हैं बेटू, मेरी वह पुरानी जन्मकुंडली कहीं पड़ी हो तो इस बार लौटने पर मुझे दे देना । मैं उसे किसी ज्योतिषी को दिखाना चाहता हूं। मुझे शक है, उसमें कहीं ना कहीं ‘पांडे-पीड़ा’ का उल्लेख अवश्य होगा । काशी तो ‘पांडे-पीड़ित’ हैं ही, कहीं ना कहीं मुझे भी वह छूत लग गई है । भदैनी पर रहने के लिए किराए का जो मकान लिया था वह रामनाथ पांडे का ही दिया हुआ था और बाद में बगल का जो मकान खरीदा वह भी उन्हीं पांडे जी ने दिलवाया था । इस क्रम में मैनेजर पांडे भी याद आ रहे हैं जो जोधपुर में मिले तो मिले ही, मेरी शामत आई कि उनको जेएनयू ले आया और अंत में अवकाश ग्रहण करने के बाद तीन साल के लिए सेंटर पर थोप दिया, जिसके लिए सभी लोग आज भी कोस रहे हैं । जो हो, दार्जीलिंग भी इस ‘पांडे-पीड़ा’ से सुरक्षित नहीं है । जाने यह पीड़ा कहां-कहां तक और कब तक मेरा पीछा करती रहेगी ।
इस पूरे प्रसंग को बताने का मतलब सिर्फ इतना है कि नामवर सिंह निजी संवाद में भी जिन प्रतीकों का उपयोग करते हैं वो खांटी भारतीय समाज के होते हैं। इसी तरह अगर देखें तो नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी और उसको नई कहानी की पहली कहानी करार दिया। उस वक्त भी ढेर सारे कम्युनिस्ट लेखक उनसे इस तमगे की अपेक्षा कर रहे थे। निर्मल वर्मा के विचारों से पूरा देश और खासतौर पर हिंदी साहित्य समाज अवगत है, जाहिर सी बात है नामवर सिंह भी रहे होंगे। बावजूद इसके वो पार्टी लाइन से अलग जाकर अपनी स्वतंत्र राय सामने रखते हैं और उस राय को लगातार स्थापित भी करते चलते हैं। बाद के दिनों में तो ऐसी प्रवृत्ति बढ़ती ही चली गई। पिछले वर्ष एक इंटरव्यू में तो वो खुलकर ईश्वर को याद कर रहे थे। ईश्वर की कृपा की आकांक्षा करते भी दिख रहे थे।
नामवर सिंह पर एक आरोप यह है कि उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की उपेक्षा की। हो सकता है ये किया हो क्योंकि एक समारोह में उन्होंने रेणु पर भाषा को भ्रष्ट करने का आरोप जड़ा था। पर रेणु के उपन्यास मैला आंचल में वह ताकत थी जो उसको लोकप्रिय होने से रोक नहीं सकी। रेणु की उपेक्षा करने की कोशिश तो सबने की। शुरुआत में जब मैला आंचल पटना के समता प्रकाशन से छपा तो पटना विश्वविद्यालय के शिक्षक और आलोचक नलिन विलोचन शर्मा ने उसपर लेख लिखकर हिंदी जगत का ध्यान आकृष्ट किया। उसके बाद 15 जुलाई 1955 को गिरिलाल जैन ने अंग्रेजी में इसपर लिखा। गिरिलाल जैन ने लिखा कि भारत के गांवों को समझने और उसको अपनी कृति में उकेरनेवाले प्रेमचंद के बाद रेणु दूसरे लेखक हैं। जैन ने भी रेणु की स्थानीय भाषा के ज्यादा उपयोग पर टिप्पणी की लेकिन साथ ही ये भी कहा कि चरित्रों का चित्रण इतना बेहतर है कि भाषा पठनीयता को बाधित नहीं करती है। रेणु की उपेक्षा की कोशिश सिर्फ नामवर ने क्यों कई लोगों ने की। अभी राग दरबारी के पचास साल पूरे होने पर जश्न से लेकर लेख आदि तक लिखे गए लेकिन मैला आंचल के प्रकाशन के पचास साल कब पूरे हो गए किसी को पता चला क्या? नामवर सिंह ने लेखकों को उठाने गिराने का खेल खेला, ऐसा भी कहा जाता है लेकिन बावजूद इसके सभी लेखक उनसे अपनी कृति पर प्रमाण पत्र चाहते थे ऐसा क्यों ? इसपर विचार हो। नामवर सिंह का समग्र मूल्यांकन हो, टुकड़ों में न तो आरोप लगे और ना ही महान बनाया जाए।  


Saturday, February 23, 2019

साहित्यिक आयोजन में राग फासीवाद


दिल्ली में एक संस्था है रजा फाउंडेशन। यह संस्था विश्व प्रसिद्ध चित्रकार सैयद हैदर रजा के नाम पर स्थापित है। रजा के मित्र अशोक वाजपेयी इस संस्था के सर्वेसर्वा हैं। हिंदी जगत में यह माना जाता है कि रजा के नाम पर स्थापित ये संस्था रजा साहब के अर्जित धन से चलता है। अशोक वाजपेयी अब तमाम आयोजन इसी संस्था के तहत करते हैं। साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर यह संस्था बहुत सक्रिय है, दिल्ली में नियमित आयोजन करती है, पुस्तकों का प्रकाशन करती है, फेलोशिप भी देती है. जरूरतमंद साहित्यकारों को आर्थिक मदद भी करती है। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद जिस तरह से अशोक वाजपेयी और वामपंथी लेखकों ने हाथ मिला लिया है उसका प्रकटीकरण बहुधा रजा फाउंडेशन के आयोजनों में होता रहता है। अशोक वाजपेयी को ये श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होंने जनवादी और प्रगतिशील लेखकों को एक साथ कर दिया। दिल से भले ही ना मिले हों पर मंच पर तो एक साथ कर ही दिया है। जो काम वैचारिकी नहीं कर पाई उस काम को पूंजी ने पूरा किया। अगर कभी मौजूदा दौर का साहित्यिक इतिहास लिखा गया तो कलावादी-वामपंथी लेखकों का यह गठजोड़ दिलचस्प शोध की मांग करेगा। निष्कर्ष भी रोचक निकलेगा।   
अभी हाल ही में इस संस्था ने दिल्ली में रजा उत्सव का आयोजन किया था। मुख्यत: कविता पर केंद्रित ये आयोजन एशियाई कविता पर आयोजित था जिसे रजा बिनाले ऑफ एशियन पोएट्री 2019 का नाम दिया गया था।। इस आयोजन में भारत के अलावा अन्य एशियाई देशों के कवियों को आमंत्रित किया गया था। इस आयोजन में भी कई जनवादी और प्रगतिशील लेखक कवि आमंत्रित किए गए थे। आमंत्रित कवियों में एक जनवादी कवि असद जैदी भी थे। एक सत्र में असद जैदी ने कहा कि वर्तमान समय को सबसे खराब समय करार दिया क्योंकि ये मोदी का इंडिया है, क्योंकि इस दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सभी जगह पर कब्जा कर रखा है, फासिस्ट ताकतों ने हर जगह आधिपत्य जमा लिया है। सबसे खराब दौर में, जब हर ओर फासिस्ट ताकतों का आधिपत्य है, तब भी असद जैदी ये सारी बातें सार्वजनिक तौर पर कह पा रहे थे। ये विरोधाभास जैसा लगता है। दरअसल असद जैदी जैसे लोग मौजूदा दौर से इस वजह से परेशान हैं कि उनका सत्ता सुख कम हो गया है, और उत्तरोत्तर कम ही होता जा रहा है। वामपंथी लेखक लगातार राग फासीवाद गा कर मौजूदा हुकूमत को बदनाम करने की मुहिम में 2014 मई के बाद से ही लगे हैं। जब भी जहां भी उनको अवसर मिलता है वो ये राग फासदीवाद छेड़ने से बाज नहीं आते हैं। तभी तो कविता समारोह में भी असद जैदी ने फासीवाद, मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सवालों के घेरे में लाने का प्रयत्न किया, बेशक लचर दलीलों के साथ। वामपंथियों के लिए फासीवाद का मतलब है बीजेपी, आरएसएस और नरेन्द्र मोदी । उनके लिए स्कूलों में योग शिक्षा भी फासीवाद है, उनके लिए स्कूलों में वंदे मातरम का पाठ भी फासीवाद है, उनके लिए सरस्वती वंदना भी फासीवाद है, उनके लिए अकादमियों या सरकारी पदों से वामपंथी विचारधारा के लोगों को कार्यकाल खत्म होने के बाद हटाया जाना भी फासीवाद है, उनके लिए इतिहास अनुसंधान परिषद में बदलाव की कोशिश भी फासीवाद है । दरअसल उनके लिए वामपंथ की चौहद्दी से बाहर किसी भी तरह का कार्य फासीवाद है । इस तरह का शोरगुल इन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त भी मचाया था । वामपंथी जमात को यह समझना होगा कि नरेन्द्र मोदी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के मुखिया है और जनता ने उनको पांच सालों के लिए चुना है। अभी दो महीने में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं एक बार फिर से जनता की राय सबके सामने होगी। अगर देश में हालात इने बुरे हैं तो जनता अपने विवेक से उसको ठीक कर देगी।
जैदी ने रजा उत्सव के इसी मंच से गुजरात दंगों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने गुजरात दंगों को नरसंहार करार दिया। उन्होंने गुजरात दंगे के बाद वहां के साहित्यकारों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों की चुप्पी को रेखांकित किया। वो इस बात को लेकर व्यथित दिखे कि गुजरात दंगों के बाद वहां के संस्कृतिकर्मियों में एक खास किस्म की खामोशी व्याप्त हो गई थी। उन्होंने गुजरात नरसंहार के बाद सांस्कृतिक चुप्पी जैसा जुमला भी उछाला। इस जुमले को या वक्तव्य के पीछे की राजनीति को समझने की जरूरत है। एक तरफ असद जैदी गुजरात दंगों में गुजराती के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों की खामोशी को रेखांकित कर रहे हैं वहीं अब से चंद दिन पहले प्रकाशित पहल पुस्तिका में अशोक वाजपेयी ने लिखा था- 2002 में गुजरात के भीषण नरसंहार के बाद महाश्वेता देवी और अपूर्वानंद के के साथ बड़ोदरा गया था। हमारी बैठक में एकाध कलाकार को छोड़कर कोई गुजराती लेखक, विद्वान या कलाकार नहीं आया। माहौल में इस कदर डर व्याप गया था।अब इस पंक्ति और असद जैदी के वक्त्वय को मिलाकर देखें तो एक सोची समझी रणनीति नजर आती है कि किस तरह से इस बात को आगे बढ़ाया जाए कि गुजरात दंगों के बाद सिर्फ एक या दो लेखकों ने इसका विरोध करने की हिम्मत दिखाई थी, इसमें भी अशोक वाजपेयी प्रमुख थे। एशियाई कविता के दौरान इस बात को परोक्ष और कहीं कहीं प्रत्यक्ष रूप से स्थापित करने की ये दयनीय कोशिश दिखती है। दयनीय इस वजह से भी एक जमाने में क्रांति आदि की बात करनेवाले जनवादी कवि को अशोक वाजपेयी का भोपाल गैस कांड के बाद दिया गया संवेदनहीन बयान याद नहीं आता है। हजारों नागरिकों की मौत पर दिया गया वो बयान, मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता, असद जैदी को याद नहीं आता। उनको इमरजेंसी एक नॉस्टेल्जिया के तौर पर याद आता है, 1984 का सिख विरोधी दंगा तो याद ही नहीं आता। इमरजेंसी में वामपंथियों का रुख क्या था, इसकी कई बार चर्चा इस स्तंभ में हो चुकी है और उसको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है।
2002 के दंगों पर गुजरात के संस्कृतिकर्मियों की खामोशी पर गुजराती के वरिष्ठ साहित्यकार शीतांशु यशश्चंद्र की राय अलहदा है। उनका मानना है कि बहुलतावादी देश में विरोध और समर्थन की पद्धति भी अलग-अलग है। गुजरात का विरोध करने का तरीका उस तरह का नहीं हो सकता है जिस तरह से बंगाल का है। महाराष्ट्र में विरोध का तरीका अलग है और बिहार में अलग। तो ये दुराग्रह उचित नहीं है कि सभी के विरोध का तरीका वही हो जैसा असद जैदी जानते समझते हैं। यहां एक और प्रश्न उठता है कि आप किसके सामने कौन सी बात कर रहे हैं। असद जैदी जहां ये बातें कह रहे थे वहां एशिया के कई देशों के कवि आमंत्रित थे। वो भारत की कैसी छवि लेकर अपने देश में जाएंगे। आप आधारहीन बातें कर रहे हैं, आर पूरे देश को फासीवाद की जकड़न मे बता रहे हैं आप परोक्ष रूप ये कहना चाहते हैं कि यहां अपनी बात कहने में डर लगता है। जबकि स्थिति इसके ठीक उलट है। यहां हर कोई बेखौफ होकर अपनी बात कह रहा है। हर तरह की बात कह रहा है, प्रधानमंत्री से लेकर तमाम मंत्रियों की आलोचना हो रही है। इसी तरह से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्ताकलीन अध्यक्ष की गिरफ्तारी के खिलाफ विदेशों से विद्वानों से एक सामूहिक अपील जारी करवा कर देश के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की गई थी। नोम चोमस्की, ओरहम पॉमुक समेत दुनिया भर के करीब एक सौ तीस बुद्धिजीवियों ने बयान जारी किया था । उनके बयान के शब्दों से साफ था कि उन्हें किस बात से दिक्कत थी । अमेरिका, कनाडा, यू के समेत कई देशों के प्रोफेसरों ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि भारत की मौजूदा सरकार असहिष्णुता और बहुलतावादी संस्कृति पर हमला कर रही थी । उन्होंने जेएनयू में कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को शर्मनाक घटना करार दिया था । नोम चोमस्की की प्रतिबद्धता तो सबको मालूम ही है। उनके बयान में लिखा था कि जेएनयू परिसर में कुछ लोगों ने, जिनकी पहचान विश्वविद्यालय के छात्र के तौर पर नहीं हो सकी, कश्मीर में भारतीय सेना की ज्यादतियों के खिलाफ नारेबाजी की थी । नोम चोमस्की को शायद ये ब्रीफ नहीं दिया गया कि वहां भारत की बर्बादी के भी नारे लगाए गए थे। इस अपील को अपने कंधे पर लेकर भारत में शोर मचानेवाले कई चेहरे रजा उत्सव में दिखाई दे रहे थे। स्वार्थ की राजनीति के चक्कर में देश की छवि और साख से भी खेलने में इनको कोई परहेज नहीं है। जिस तरह से साहित्य और संस्कृति के कंधे पर चढ़कर राजनीतिक और व्यक्तिगत हित साधे जा रहे हैं उसकी पहचान आवश्यक है।


Saturday, February 16, 2019

वामपंथ के मंच पर अचूक कलावादी


इन दिनों पूरे देश में चुनाव का माहौल है। राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। हर दल लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की जुगत में है। गठबंधन और महागठबंधन हो रहे हैं। किसी का साथ छूट रहा है तो किसी का हाथ थामा जा रहा है। एक दूसरे के वैचारिक विरोधी साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ताना-बाना रच रहे हैं। उत्तर प्रदेश में धुर विरोधी मायावती और अखिलेश ने हाथ मिला लिया है। इसी चुनावी माहौल और सत्ता के लिए हो रहे गठबंधन के दौर में अचानक डाक से एक पुस्तिका प्राप्त हुई। यह पुस्तिका नए साल पर उपहार प्रति के तौर पर हिंदी के चर्चित कवि लेखक अशोक वाजपेयी की तरफ से भेजी गई थी। जब लिफाफा खोलकर पुस्तिका बाहर निकाली तो चौंका। इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रगतिशील रचनाओं का मंच पहल पत्रिका की तरफ से प्रकाशित पहल पुस्तिका के कवर पर अशोक वाजपेयी की तस्वीर थी। हैरत से पुस्तिका को पलटा तो बैक कवर पर भी अशोक वाजपेयी की तस्वीर थी।इसके अलावा दोनों इनर कवर पर भी अशोक वाजपेयी की विभिन्न भंगिमाओं की तस्वीर थी। हैरत इस वजह से कि अशोक वाजपेयी पहल पत्रिका के कवर पर कैसे? प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक होने का दावा करनेवाली इस पत्रिका में कलावादी और सौंदर्यवादी अशोक वाजपेयी कैसे? अशोक वाजपेयी का वामपंथ से विरोध जगजाहिर और पहल पत्रिका की वामपंथ से प्रतिबद्धता भी सबको पता है। मन में यह प्रश्न उठा कि ये गठबंधन कैसे हुआ? क्या राजनीति की तरह साहित्य में भी वैचारिक गठबंधन का दौर शुरू हो गया है।
हिंदी साहित्य जगत ने पहल के संपादक ज्ञानरंजन और अशोक वाजपेयी के बीच वैचारिक विरोध को वैयक्तिक विरोध के स्तर तक पहुंचते देखा है। किसी जमाने में पहल पत्रिका अलग अलग शहर में जाकर पहल सम्मान का आयोजन किया करती थी। करीब डेढ़ दशक पहले ऐसा ही एक आयोजन दिल्ली में भी हुआ था। दिल्ली में हुए पहल के उस आयोजन को लेकर विवाद उठा था। तब ज्ञानरंजन ने मुझसे एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान अशोक वाजपेयी को काफी बुरा भला कहा था। अशोक वाजपेयी भी वामपंथ पर हमला करने का कोई मौका कभी चूकते नहीं थे। अपने स्तंभ में अशोक वाजपेयी बहुधा वामपंथियों पर तंज कसते थे। एक बार अपने स्तंभ में उन्होंने लिखा था- यो तो इन दिनों दिल्ली का पारा बहुंत ऊंचा चढ़ा हुआ है। कहते हैं कि मई महीने में तापमान कभी इतना ऊंचा नहीं गया था जितना इस महीने जा चुका है। ऐसे उत्तप्त समय में हमारे प्रगतिशील और जनवादी मित्र तो निश्चय ही अपनी जगजाहिर प्रतिबद्धता के अनुरूप जनसंघर्ष में अपनी हिस्सेदारी तेज करने और कलावादी विचलन पर एक और वार करने की तैयारी कर रहे होंगे। लेकिन मुझ कुख्यात कलावादी को लगभग बेमौसम लेकिन लगातार कलाओं में ही ऊभ-चूभ करने का अवसर मिल रहा है।अपने इसी टिप्पणी के अंत में अशोक जी ने पूछा था- अपने अदम्य और अचूक कलावाद के चलते मैं उसके रसास्वादन में न डूबूं यह कैसे संभव है?’ अपनी इस टिप्पणी में अशोक वाजपेयी अपने को कुख्यात से लेकर अचूक कलावादी तक करार दे रहे हैं लेकिन वामपंथ के वैचारिक ध्वजवाहक ज्ञानरंजन अपनी पत्रिका में इस अचूक कलावादी को अवसर दे रहे हैं। क्या मौजूदा दौर की राजनीति की तरह कहीं कुख्यात कलावादीऔर धुर वामपंथी ने हाथ तो नहीं मिला लिया है। राजनीति में तो सत्ता के लिए बेमेल गठबंधन होते रहे हैं लेकिन साहित्य में किस सत्ता के लिए इस तरह के बेमेल वैचारिक गठबंधन हो रहे हैं ये शोध का विषय हो सकता है।
गठबंधन भी ऐसा कि प्रश्नकर्ता भी वही और उत्तर देनेवाले भी वही। यानि कि इस पुस्तिका में प्रश्न भी अशोक वाजपेयी के हैं और उत्तर भी उनके। इस तरह के आयोजन में उत्तर देनेवाले को असुविधाजनक प्रतिप्रश्नों को नहीं झेलना पड़ता है और अपने बनाए हुए प्रश्नों के आलोक में जितना बड़ा चाहें प्रवचननुमा उत्तर दे सकते हैं। ज्ञानरंजन ने यही अवसर अशोक जी को उपलब्ध करवाया। अशोक वाजपेयी मानते हैं कि यह थोड़ा अटपटा है कि इस दस्तावेज में प्रश्न भी मेरे हैं और उत्तर भी। कोशिश की है कि प्रश्न ऐसे हों जो किसी ना किसी रूप में मुझसे कभी ना कभी पूछे गये हैं या पूछे जाने चाहिए।ज्ञानरंजन को ये बात हिंदी जगत को स्पष्ट करनी चाहिए कि उन्होंने किस राग या फिर किस उद्देश्यपूर्ति के लिए अशोक वाजपेयी को ये अटपटा मौका दिया।
अपने एक प्रश्न के उत्तर में अशोक वाजपेयी ये कहते हैं कि लोकतंत्र को धर्म और जाति ने चांप रखा है। अशोक वाजपेयी बहुपठित व्यक्ति हैं। लगता है आशुतोष वार्ष्णेय की पुस्तक बैटल्स हॉफ वन, इंडियाज इंप्रोबेबल डेमोक्रैसीउनकी नजर से नहीं गुजरी। अपनी इस पुस्तक में आशुतोष ने इस बात को आंकड़ों और उद्धरणों से साबित किया है कि किस तरह से जाति और जातिगत राजनीतिक नेतृत्व ने लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की है। जाति व्यववस्था एक सामाजिक दुर्गुण है इससे किसी को इंकार नहीं है लेकिन लोकतंत्र को चांपने जैसी जिस तरह की शब्दावली का अशोक वाजपेयी उपयोग करते हैं वो उनके जैसे वरिष्ठ और बहुपठित लेखक से अपेक्षित नहीं है। प्रश्नोत्तरी की इस पुस्तिका में कई जगह पर अशोक जी अज्ञानवश या जानबूझकर भारतीय ज्ञान परंपरा को नीचा दिखाने की कोशिश करते नजर आते हैं। एक जगह पर वो कहते हैं कि पूरे भारत में इस वक्त उनको एक भी धर्म विचारक नजर नहीं आता। विचार की धर्मों से विदाई हो चुकी है। अव्वल तो अशोक वाजपेयी को धर्म विचारक की परिभाषा स्पष्ट करनी चाहिए। हर जगह फतवानुमा उत्तर देकर निकल जाते हैं जिससे वो खुद ही सवालों के घेरे में आ जाते हैं। धर्म को लेकर इस वक्त इतना काम हो रहा है जिसपर विचार करने और उसको रेखांकित करने की आवश्यकता है। जब व्यक्ति बुजुर्ग होने लगता है तो वो अतीतजीवी हो जाता है। प्रश्नोत्तरी की इस पुस्तिका में अशोक वाजपेयी अतीतजीवी होने के दोष में जकड़े नजर आते हैं। पुराने जमाने में ये अच्छा था, पुराने जमाने में वो अच्छा था, पहले के पत्रकार इतने अच्छे होते थे, पहले इतने विचारक होते थे आदि आदि। पहले का सब अच्छा और अब सब बुरा। ये सरलीकरण और सामन्यीकरण है।
इस पुस्तिका में अशोक वाजपेयी इस वक्त के चालू मुहावरे भी उठाते हैं जैसे वो गोदी मीडिया जैसे चालू जुमले का प्रयोग करते हैं तो लगता है कि वो एजेंडा विशेष को बढ़ा रहे हैं। वो ये भी कहते हैं कि पिछले चार सालों में सुनियोजित ढंग से संस्कृति-संबंधी राष्ट्रीय संस्थानों का कद हैसियत और व्यापक प्रासंगिकता को घटाया गया है, इस समय हमारे लोकतंत्र के इतिहास में इन सांस्कृतिक संस्थानों के शिखर पर अपने क्षेत्र के सर्वथा अज्ञातकुलशील लगभग बौने लोग नियुक्त किए गए हैं जिनकी पात्रता उनकी संघ वफादारी पर आधारित है। पहले नारायण मेनन, यू आर अनंतमूर्ति, गिरीश कारनाड, नामवर सिंह, जगदीश स्वामीनाथन आदि को जब नियुक्त किया गया था तो उनमें से किसी को भी कांग्रेसी नहीं कहा जा सकता था। यहां तक तो अशोक जी ठीक थे लेकिन क्या वो इस बात की गारंटी ले सकते हैं कि इनमें से कोई वामपंथी नहीं था। शायद वो ये भूल गए कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के समर्थन के एवज में कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े मसले वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिए थे। जहां तक संघ वफादारी की बात है तो इस टिप्पणी में भी अशोक वाजपेयी अगर उदाहरण देते तो आगे बात हो सकती थी। इस पुस्तिका में परोक्ष रूप से अशोक वाजपेयी ने वामपंथियों को उदार दृष्टि वाली विचारधारा बताने का प्रयास किया है। प्रश्न है कहा जा रहा है कि संसार भर में उदार और वाम राजनीकि हाशिए पर ढकेल दी गई है एक अनुदार संसार बन रहा है। क्या यह उदार दृष्टि का पराभव है। दिलचस्प और मजेदार यह है कि अशोक वाजपेयी वामपंथ का बचाव करते हैं और कहते हैं कि यह पूरी तरह से सही नहीं है- हमार पड़ोस नेपाल और भूटान में वाम शक्तियां प्रखर हैं। अशोक जी यहां चीन का नाम लेना भूल गए या फिर चतुर सुजान की तरह चीन का नाम नहीं लिया क्योंकि चीन में उदारता तो है नहीं। अगर वो चीन का नाम लेते तो फिर वहां की तानाशाही व्यवस्थाओं का बचाव मुश्किल होता। पाठकों को अशोक वाजपेयी के इस प्रश्नोत्तर के बाद कुछ-कुछ समझ में आ रहा होगा कि ज्ञानरंजन ने उनपर पहल पुस्तिका क्यों निकाली। गैर-वामपंथी अगर वामपंथ का बचाव करेंगे तो संभव है कि कुछ लोग सुन लें। वैसे यह भी संभव है कि पहल जिस वैज्ञानिक विकास और प्रगतिशीलता की बात करता है उसका रास्ता पूंजीवाद से होकर जाता हो। पूंजी के सामने प्रगतिशीलता ने रास्ता बदल लिया हो।  

लहर सा उठा सारे तट धो गया


1942 एक ऐसा वर्ष है जिसने भारत की राजनीति, कला और पत्रकारिता पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। इसी साल अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का सूत्रपात हुआ जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा बुलंद किया। इसी वर्ष झांसी की ऐतिहासिक धरती से दैनिक जागरण का प्रकाशन का प्रारंभ हुआ और इसी वर्ष प्रयागराज की धरती पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ। कम लोगों को ही ये मालूम है कि अमिताभ बच्चन को उनके जन्म के सामय चंद दिनों के लिए एक नाम मिला था- इंकलाब राय। कुछ ही दिनों बाद हरिवंश राय बच्चन और तेजी को लगा कि उन्हें अपने बेटे का कोई पारंपरिक नाम रखना चाहिए। फिर दोनों ने तय कर अपने पुत्र का नाम इंकलाब राय की जगह अमिताभ रखा । पिछले दिनों अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में अपने करियर के पचास साल पूरे किए। अमिताभ बच्चन के पुत्र अभिषेक बच्चन ने इंस्टाग्राम पर और उनकी बेटी श्वेता नंदा ने अपने ट्वीटर अकाउंट पर जब इस बात को साझा किया तो पूरी दुनिया से बॉलीवुड के इस शहंशाह को बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया। अभिषेक बच्चन ने अपनो पोस्ट में अपने पिता को अपना सबसे अच्छा दोस्त, गाइड, सबसे बड़ा आलोचक, अपना आदर्श बताते हुए अंत में कहा कि वो हीरो हैं। अभिषेक के इस पोस्ट को पौने दो लाख से ज्यादा लोगों ने लाइक किया। श्वेता ने ट्वीटर पर एक वीडियो साझा किया जिसमें 1969 से लेकर अबतक के वर्षों को बेहद कलात्मक तरीके से पेश किया।
हिंदी फिल्मों को जिन चंद कलाकारों ने अपने क्राफ्ट से बदला और उसको एक नई दिशा दी उसमें अमिताभ बच्चन का नाम शीर्ष पर लिया जा सकता है। अमिताभ बच्चन की साहित्य में गहरी रुचि थी पर वो उस क्षेत्र में जाना नहीं चाहते थे। स्कूली दिनों से उनके अंदर थिएटर को लेकर गहरा लगाव था। अमिताभ की अभिनय कला को पहचान 1957 में निकोलाई गोगल के नाटक इंस्पेक्टर जनरल में मेयर की भूमिका से मिली। इसमें उनकी भूमिका इतनी दमदार थी कि उन्हें बेस्ट एक्टर के लिए केंडल कप मिला । उनको ये पुरस्कार जेफ्री कैंडल के हाथों मिला था, जो कि खुद ही एक महान अभिनेता थे। शशि कपूर ने उनकी बेटी से विवाह किया था। दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद अमिताभ बच्चन कोलकाता पहुंचे और वहां नौकरी करने लगे। अच्छी नौकरी थी, घर, गाड़ी और मोटी तनख्वाह लेकिन मन अभिनय में अटका हुआ था। कोलकाता में भी नाटकों में काम करने लगे, सराहना मिली। अभिनय के जुनून को देखते हुए उनके भाई अजिताभ ने कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल के सामने उनकी एक तस्वीर खींची फिल्मफेयर-माधुरी की राष्ट्रीय प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में भेज दी। अमिताभ का चयन नहीं हुआ। लेकिन इसी फोटो को देखकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने अमिताभ को मिलने के लिए बुला लिया था। सात हिन्दुस्तानी फिल्म मिलने की कहानी की कई बार चर्चा हो चुकी है लेकिन कम ही लोगों को ये पता होगा कि अमिताभ बच्चन को मनोज कुमार ने अपनी फिल्म यादगार में एक रोल ऑफर किया था। छोटा रोल होने की वजह से अमिताभ ने उसमें काम करने से मना कर दिया था। फिल्मों में रोल के लिए अमिताभ बच्चन का मुंबई के रूप तारा स्टूडियो में स्क्रीन टेस्ट भी हुआ था जिसमें भी वो सफल नहीं हो पाए थे। वहां उनको लेखन की ओर जाने की सलाह गई थी। फिर सात हिन्दुस्तानी में रोल मिला। बॉलीवुड में कहा जाता है कि जिसकी पहली फिल्म पिटती है वो बाद में हिंट होता है। अमिताभ के साथ भी यही हुआ। उनकी शुरुआती दस फिल्में पिटीं लेकिन जंजीर की सफलता ने अमिताभ के साथ साथ फिल्मों की भी दुनिया बदल दी।
अमिताभ बच्चन ने भी अपनी जिंदगी में उतार चढ़ाव देखे। सेट पर लगी गंभीर चोट से उबरने में लंबा वक्त लगा। फिर एक दौर आया जब उनकी फिल्में बुरी तरह से पिटने लगीं। उन्होंने एंटरटेनमेंट कंपनी बनाई वो घाटे में चली गई, राजनीति में गए वहां से बेआबरू होकर निकले। उन्होंने टीवी को चुना और कौन बनेगा करोड़पति को होस्ट किया। सफलता एकबार फिर से सदी के महानायक के कदम चूमने लगी। उस दौर में किसी सुपर स्टार के लिए फिल्म को छोड़कर टी वी को चुनना बहुत मुश्किल था लेकिन बिग बी ने ये जोखिम उठाया। फिल्मों और भूमिकाओं के चुनाव में भी सतर्क हुए। अमिताभ बच्चन को बचपन में मुक्केबाजी का शौक था। उनके पिता हरिवंश राय बच्चन ने उनको मुक्केबाजी पर एक किताब दी जिसपर प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि यीट्स की एक पंक्ति लिखी थी- तगड़ा प्रहार दिमाग के लिए बेहद आनंददायी होता है। संभव है बचपन में पिता से मिली इस सीख की वजह से हर मुश्किल को आनंदपूर्वक झेलते चले गए। प्रसून जोशी ने अमिताभ बच्चन पर एक कविता लिखी है जिसकी अंतिम पंक्ति है लहर सा उठा सारे तट धो गया।सचमुच।    

कैबरे देखने की हसरत रह गई


भगवानदास मोरवाल अपने दौर के सबसे चर्चित उपन्यासकारों में से एक हैं। मेवात के नूंह कस्बे के एक गरीब परिवार में जन्मे मोरवाल आज से करीब चालीस साल पहले दिल्ली आए और यहीं के होकर रह गए। पिछले दिनों प्रकाशित उनका उपन्यास हालाला खासा चर्चित रहा थाअभी हाल ही में उनका उपन्यास सुर बंजारन प्रकाशित हुआ है जो पाठकों को खूब पसंद आ रहा है। उ्न्होंने मेरे साथ अपने अनुभवों को साझा किया। 

दिल्ली के बारे में सोचने पर मेरी स्मृतियों में आज से लगभग चालीस साल पुराने असंख्य रेखाचित्र उभर आते हैं। एकदम अल्हड़ खुली सड़कें, दिल्ली परिवहन निगम की बसें, हर इलाके के सिनेमाघरों में चलने वाली फिल्मों के बिजली के खम्बों पर लटके पोस्टर l उन्नीस सौ अस्सी के एकदम शुरूआती दिनों में जब इसी दिल्ली के नारायणा विहार आया तो सबसे आकर्षण का केंद्र होता था रिंग रोड पर बना उमा रेस्टोरेंट और लिंडा रेस्टोंरेंट जहां कैबरे डांस हुआ करते थे। जब तक मैं नारायणा रहा उमा रेस्टोरेंट में होने वाले कैबरे डांस को देखने की चाह बनी रही l मगर यह कभी पूरी नहीं हो पाईl यह वही नारायणा है जहाँ ठीक उसके सामने बसे केंट इलाके में अपने सैनिकों के लिए कभी खुले सिनेमा घर हुए करते थे l इन सिनेमा घरों में देखी गयी जनता हवलदार और उमराव जान  फिल्मों के दृश्य आज भी दिमाग में ताजा हैं
उन्हीं दिनों दिल्ली में साहित्यिक गोष्ठियों के अनेक केंद्र थे l मंडी हाउस एक तरफ़ जहाँ गंभीर नाटकों के मंचन के केंद्र के रूप में जाना जाता था, तो दूसरी तरफ़ पंजाबी के द्विअर्थी हास्य नाटकों के मंचनों के लिए भी प्रसिद्ध था। इनमें जीजा दी हाँ, साली दी ना, कुड़ी जवान, ते मुंडा परेशान  जैसे नाटक उस दौर में बड़े लोकप्रिय थे l साहित्यिक गोष्ठियों के अलावा उन दिनों दिल्ली में कुछ ठीहे भी होते थे, जहां लेखक बैठकी जमाते थे। इनमें कनाट प्लेस का मोहन सिंह प्लेस स्थित कॉफ़ी हाउस तो था ही, श्रीराम सेंटर की केंटीन भी थी, जहां लंबे समय तक एक पुस्तक की दुकान भी होती थी।इस दुकान पर तमाम लघु पत्रिकाएं मिला करती थीं जो साहित्य रसिकों के लिए आकर्षण का केंद्र होती थी। एक छोटा-सा ठीहा और होता थाब्रज मोहन की दुकान l मद्रास होटल के पीछे हिंदी के युवा कथाकार और जनवादी गीतकार ब्रज मोहन की फोटो स्टेट की इस दुकान पर हंसराज रहबर, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह जैसे दिग्गज लेखख समेत अनेक नये-पुराने लेखक आते थे l प्रत्येक शनिवार को यहां अच्छा-ख़ासा जमघट लग जाता था, जो बाद में कॉफी हाउस तक पहुंचता था।
दिल्ली की कई प्रिय-अप्रिय घटनाओं का मैं गवाह रहा हूँ l मैंने 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में इस दिल्ली को धधकते हुए देखा हैl चांदनी चौक की उन्मादी भीड़ द्वारा लूटी जानेवाली दुकानों और पालम इलाके में हुई हत्याओं ने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था।  जिस मोहन सिंह प्लेस के कॉफ़ी हाउस में विष्णु प्रभाकर, भीष्म साहनी, रमाकांत, अरुण प्रकाश जैसे लेखकों की बहसें देखी हैं, वही कॉफ़ी हाउस आज लेखकों की बाट जोहता है l वही कॉफ़ी हाउस जिसकी आवारा मेज़-कुर्सियों पर गरमागरम चाय और कॉफ़ी के प्यालों की चुस्कियों ने न जाने कितनों को लेखक बनाया है, उसकी वीरानी अब देखी नहीं जातीl एक लेखक के तौर पर अगर दरियागंज के प्रकाशन की दुनिया का ज़िक्र न करूँ तो यह क़िस्सा-ए-दिल्ली अधूरी रह जाएगी l प्रकाशन की दुनिया में आज जो आकर्षण हिंदी के छोटे-बड़े, ख्यात-विख्यात लेखकों में राजकमल प्रकाशन और वाणी प्रकाशन के प्रति है, वह ठीक चार दशक पूर्व भी था l कहने का आशय यह है कि दिल्ली समय के साथ बड़ी तेज़ी से अपना रंग बदलती रही है l आज बहुत से लेखक जो लेखक बनने का दम भरते हैं इसी दिल्ली ने बनाए हैं l ग़ालिब इस दिल्ली पर ऐसे ही न्योछावर नहीं रहता था l

Saturday, February 9, 2019

हिंदी उपन्यास पर बाजार का प्रभाव !


हिंदी में उपन्यास अपेक्षाकृत नई विधा है। हिंदी साहित्य में तो उपन्यास का जन्म ही आधुनिक काल में हुआ, बल्कि कह सकते हैं कि विश्व की अन्य भाषाओं में भी उपन्यास का आगमन बहुत बाद में हुआ। मार्क्सवादी आलोचक राल्फ फॉक्स ने अपनी मशहूर कृति द नॉवेल एंड द पीपल में माना है कि उपन्यास का एक विधा के तौर पर अविर्भाव यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर या उसके फौरन बाद हुआ। उपन्यास का आगमन हिंदी की जमीन पर बाद में हुआ अवश्य लेकिन ये एक महत्वपूर्ण और मजबूत विधा के रूप में स्थापित हुई। हलांकि मार्क्सवादी आलोचकों ने जब उपन्यास विधा पर विचार किया को तो वो भारतीय परंपरा पर विचार करने से चूक गए। उपन्यास भारतीय प्राचीन कथा परंपरा का विकास है। संस्कृत के हितोपदेश में इस विधा के बीज देखे जा सकते हैं। यह बात तो अब विदेशी विद्वान भी स्वीकार करने लगे हैं कि हितोपदेश की परंपरा में ही अलिफ लैला या फिर ईस्पस फेबिल्स लिखे गए। उपन्यास को लेकर देश-दुनिया में बहुत सी परिभाषाएं गढ़ी गईं लेकिन अबतक उपन्यास का फॉर्म निश्चित नहीं किया जा सका। हिंदी में ही देखें तो अबतक इसको लेकर आलोचकों में मतैक्य का अभाव दिखता है। अज्ञेय ने अपनी पुस्तक हिंदी साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य में लिखा है समकालीन साहित्य-विधाओं में उपन्यास शायद सबसे अधिक विशिष्ट और महत्वपूर्ण है। यह भी इसकी विशेषता है कि इसकी परिभाषा इतनी कठिन है। किसी ने कहा है कि उपन्यास की सबसे अच्छी परिभाषा उपन्यास का इतिहास है। इस उक्ति में गहरा सत्य है। अज्ञेय के अलावा भी कई हिंदी के आलोचकों ने कमोबेश उपन्यास को लेकर इसी तरह के विचार प्रकट किए हैं। अगर हम पिछले तीन दशक में प्रकाशित उपन्यासों पर नजर डाले तो अज्ञेय के उपरोक्त कथन की पुष्टि होती है। इस कालवधि में सबसे पहले उन्नीस सौ तिरानवे में सुरेन्द्र वर्मा का उपन्यास मुझे चांद चाहिए प्रकाशित हुआ जो करीब छह सौ पृष्ठों का था। सुरेन्द्र वर्मा का ये उपन्यास जबरदस्त रूप से सफल रहा। इसके धड़ाधड़ कई संस्करण प्रकाशित हो गए। उस कृति पर उनको साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल गया। उसके बाद तो हिंदी में मोटे उपन्यास लिखे जाने लगे। उन्नीस सौ सत्तानवे में मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास चाक का प्रकाशन हुआ जिसकी कथा भी चार सौ छत्तीस पृष्ठों में फैली थी। चाक ने मैत्रेयी पुष्पा को ना केवल साहित्य में नामवर बनाया बल्कि उन्हें एक उपन्यासकार के तौर पर स्थापित भी किया। ये उपन्यास भी खूब बिका और पाठकों और आलोचकों को पसंद भी आया।भगवानदास मोरवाल का उपन्यासकाला पहाड़ उन्नीस सौ निन्यानवे में आया जो चार सौ छियासठ पेज का है। उनका ही दूसरा उपन्यास पांच वर्षों बाद प्रकाशित हुआ बाबल तेरा देस में। इस उपन्यास की पृष्ठ संख्या चार सौ चौरासी है। भगवानदास मोरवाल के दूसरे उपन्यास के पहले चित्रा मुद्गल का उपन्यास आवां का प्रकाशन दो हजार एक में हुआ जिसकी पृष्ठ संख्या पांच सौ चौवालीस है। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड़ भी बेहद चर्चित हुआ और चित्रा मुद्गल के उपन्यास आवां ने भी खूब प्रशंसा बटोरी। दो हजार तीन में में अमरकान्त का भी भारी भरकम उपन्यास इन्हीं हथियारों से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में पांच सौ पैंतीस पेज हैं। असगर वजाहत का उपन्यास कैसी आग लगाई भी इसी दौर में प्रकाशित हुआ जो भी मोटे उपन्यास की श्रेणी में ही था। ये कुछ नाम हैं जिससे ये पता चलता है कि वो दौर भारी भरकम उपन्यासों का था। बाद में इनमें से ज्यादातर लेखकों के उपन्यासों के पृष्ठ संख्या कम होते चले गए। चित्रा मुद्गल ने आवां के बाद जो उपन्यास लिखा गिलिगडु वो अपेक्षाकृत पतला था, इसी तरह से असगर वजाहत का उपन्यास पहर दोपहर आया वो भी अपने पूर्ववर्ती उपन्यास से आकार में काफी छोटा था। भगवानदास मोरवाल के उपन्यासों की पृष्ठ संख्या भी कम होती चली गई। किसी भी हिंदी के आलोचक ने इस ओर ध्यान दिया, ऐसा ज्ञात नहीं है। क्या वजह रही कि उपन्यास मोटे हुए और फिर वो पतले होते चले गए।
जनवरी में दिल्ली में समाप्त हुए विश्व पुस्तक मेले में मेरी नजर से कई उपन्यास गुजरे जो दो सौ से कम पृष्ठों के हैं। सोशल मीडिया पर प्रशंसा बटोर रहा मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास मल्लिका एक सौ साठ पृष्ठों का है। यह उपन्यास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रेमिका मल्लिका के जीवन पर आधारित है। इस उपन्यास में कथा विस्तार की असीम संभवनाएं थीं लेकिन फिर भी इसको एक सौ साठ पृष्ठों में समेट दिया गया लेकिन इसकी कथा पर कोई फर्क पड़ा ऐसा नहीं है। इसी तरह युवा कथाकार कवि उमा शंकर चौधरी का पहला उपन्यास अंधेरा कोना विश्व पुस्तक मेला में जारी किया गया। यह उपन्यास भी पौने दो सौ पृष्ठों का है। कथाकार प्रत्यक्षा का उपन्यास बारिशगर भी एक सौ छिहत्तर पेज का है। अनु सिंह चौधरी का पहला उपन्यास आया है भली लड़कियां बुरी लड़कियां वो भी एक सौ छिहत्तर पेज का है। अब ज्यादातर उपन्यास दो सौ पेज या उससे कम के आ रहे हैं। तीन साल पहले रत्नेश्वर सिंह का चर्चित उपन्यास रेखना मेरी जान का प्रकाशन हुआ था वो भी एक सौ इकहत्तर पेज का था। पिछले दस सालों में ऐसा क्या हुआ कि हिंदी के उपन्यासों की पृष्ठ संख्या घटकर आधी से भी कम हो गई। क्या पाठकों की रुचि में बदलाव आया है? क्या बाजार का दबाव है? या फिर लेखकों का अनुभव सिमट गया है? इनपर विचार करना चाहिए।
उपन्यासकार भगनावदास मोरवाल को इसमें अलग ही वजह नजर आती है। वो ये तो मानते हैं कि लेखकों के पास जैसे जैसे अनुभवों की जमीन सूखती जाती है वैसे वैसे कथा विस्तार कम होता चला जाता है। वो जोर देकर यह भी कहते हैं कि हिंदी के उपन्यासों की पृष्ठ संख्या कम होने के पीछे आलोचकों की काहिली भी है। उनका तर्क है कि आलोचक अब मोटे उपन्यास पढ़ना नहीं चाहते हैं। अगर उनके सामने मोटे उपन्यास आएंगें तो उनको विश्लेषण करने के लिए ज्यादा पढ़ना और मेहनत करना होगा, जो हिंदी के आलोचक करना नहीं चाहते हैं तो उन्होंने परोक्ष रूप से मोटे उपन्यास का शोर मचा दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि उपन्यासकार जब लिखने बैठने लगे तो उनके मन में अपनी कृति के आकार को लेकर पहले से एक चौहद्दी खिंची रहने लगी। उपन्यासकार मोरवाल दूर की कौड़ी लेकर आए हैं लेकिन ये कौड़ी दिलचस्प है। अगर इस बात में सचाई है तो क्या ये माना जाए कि आलोचकों के दबाव में हिंदी के उपन्यासकार वांछित कथा विस्तार में भी कांट-छांट कर देते हैं। हिंदी उपन्यासों के आकार छोटे होने की वजहों पर बात करें तो मुझे इसके पीछे दो तीन कारण नजर आते हैं। पहला तो लेखक के अनुभव संसार का छीजना या अनुभव भंडार का कम होना। लेखक अपने प्रत्यक्ष अनुभवों को संकलित करता चलता है, एक ही घटना का प्रभाव अलग अलग लेखकों पर अलग अलग तरीके से पड़ता है। जब वो लिखने बैठता है तो उसको ही पन्नों पर उतारता चलता है जिसकी वजह से एक घटना पर आधारित होने की वजह से कृतियां अलग अलग रूप में आती हैं। दूसरा कि बाजार का दबाव जिसमें प्रकाशकों का आग्रह भी शामिल है। यह बात अब सभी कह रहे हैं कि युवा पाठकों के पास अब इतना समय नहीं है कि वो मोटे-मोटे उपन्यास पढ़ सकें तो बहुत संभव है कि अब लेखक, पाठकों की इस रुचि का ध्यान रखते हुए पतले उपन्यास लिख रहे हों। लेकिन अगर ऐसा है तो ये विधा के साथ न्याय नहीं है। रचनात्मकता अपना विस्तार या सीमा खुद तय करती है, बाजार या पाठकों की रुचि उसको तय नहीं कर सकती है। विलियम फॉकनर ने कहा था कि वो जब कोई किताब लिखते हैं तो उसके पात्र खुद खड़े हो जाते हैं और फिर वही तय करते हैं कि उनको कौन सा रूप मिलेगा और उनका अंजाम क्या होगा।अगर बाजार के दबाव में कोई कृति लिखी जा रही है तो बहुत संभव है कि एक लंबे कालखंड़ के बाद उसकी प्रवृत्ति और प्रकृति दोनों बदल जाए। कम पृष्ठ संख्या के उपन्यासों के प्रकाशन के पीछे प्रकाशकों की ये सोच हो सकती है कि अगर पुस्तक कम पृष्ठों की होगी तो उसका मूल्य कम होगा और मूल्य कम होने की वजह से उसकी बिक्री ज्यादा हो। हिंदी में उपन्यास पर बहुत कम काम हुआ है। लेखों को एक जगह जमा कर आलोचना की पुस्तकें बना ली गई हैं, विचारधारा के ध्वजवाहकों ने ऐसे लेखकों को आलोचक का तमगा भी दे दिया है लेकिन उपन्यासों पर, उसके बदलते फॉर्म पर, उसके आकार-प्रकार पर, उपन्यासों की बदलती कथा प्रविधि पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। अब वक्त आ गया है कि हिंदी में भी इस तरह के विषयों पर अध्ययन, चिंतन, मनन और लेखन हो।