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Saturday, March 21, 2020

यथास्थितिवाद के चक्रव्यूह में संस्कृति


जब आम बजट की तैयारी हो रही थी तो उस वक्त एक महत्वपूर्ण घटना घटी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यालय में देश के बड़े उद्योगपतियों के साथ बैठक की थी और उनके विचार जाने थे। जिस दिन प्रधानमंत्री इन बड़े उद्योगपतियों के साथ बैठक कर रहे थे उसी दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमरण एक दूसरी बैठक में थीं। वो भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में थिंक टैंक के प्रतिनिधियों, भारतीय जनता पार्टी की पत्रिका कमल संदेश के संपादकीय विभाग से जुड़े लोगों और शिक्षा संस्कृति के क्षेत्र में काम करनेवालों के साथ बैठक कर रही थीं। उस दिन सोशल मीडिया पर दोनों बैठकों की फोटो लगाकर कई लोगों ने तंज भी कसा था। यहां तक कहा गया कि बजट को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा से वित्त मंत्री को बाहर रखा गया। जब बजट पेश किया गया तो इसका असर दिखा। वित्त मंत्री निर्मला सीतामरण ने जो बजट पेश किया उसमें शिक्षा और संस्कृति पर खासा ध्यान दिया गया। शिक्षा के बजट में पांच फीसदी की बढ़ोतरी की गई। संस्कृति मंत्रालय को 2018-19 की तुलना में करीब 200 करोड़ रुपए अधिक आवंटित किए गए। इसका मतलब है कि शीर्ष स्तर पर संस्कृति को लेकर एक सोच है। इस बजट में ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज एंड कन्जरवेशन बनाने की घोषणा भी की गई। घोषणाएं भी हुई और बजट में अधिक धन भी मिला लेकिन संस्कृति को लेकर क्या हालात है इसपर विचार करने की आवश्यकता है।
इस स्तंभ में संस्कृति को लेकर कई बार चर्चा भी की जा चुकी है और इस बात पर भी विस्तार से लिखा जा चुका है कि संस्कृति से जुड़े कई संस्थानों में अहम पद खाली हैं। खाली पदों की संख्या बढ़ती जा रही है, नियुक्तियों में देरी हो रही हैं या नियुक्ति हो नहीं रही है। दरअसल जब हम संस्कृति की बात करते हैं तो हमें सिर्फ संस्कृति मंत्रालय मात्र को ही नहीं देखना चाहिए। इसमें कई मंत्रालय आते हैं जिसको लेकर संस्कृति का वृत्त पूरा होता है। इन सबके सामूहिक प्रयत्नों से ही संस्कृति को मजबूती मिल सकती है या एक नई संस्कृति का विकास हो सकता है। इसमें प्रमुख रूप से संस्कृति मंत्रालय के अलावा सूचना प्रसारण मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विदेश मंत्रालय आते हैं। संस्कृति मंत्रालय और उससे संबद्ध संस्थाओं में खाली पड़े पदों की चर्चा कई बार हो चुकी है। उसमें संगीत नाटक अकादमी का अध्यक्ष पद और जुड़ गया है क्योंकि शेखर सेन का कार्यकाल खत्म हो गया और नई नियुक्ति हुई नहीं।
इस बार हम सूचना और प्रसारण मंत्रालय पर नजर डालते हैं जिसके अंतर्गत संस्कृति का एक बेहद अहम हिस्सा फिल्म और उससे जुड़ी कलात्मक दुनिया आती है। फिल्म से जुड़ी कई संस्थाएं इस मंत्रालय के अंतर्गत आती हैं जो देश में फिल्म संस्कृति के विकास और उसको मजबूत करने में अहम भूमिका निभाती हैं। सबसे पहले हम बात करते हैं फिल्म समारोह निदेशालय की। इस निदेशालय की स्थापना 1973 में की गई थी। भारतीय फिल्मों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई थी। इसको ही फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार देने की जिम्मेदारी भी दी गई थी जिसके अंतर्गत निदेशालय हर वर्ष अलग अलग श्रेणियों में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार देते हैं। इसके अलावा इस संस्था के पास अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के आयोजन का जिम्मा भी है। कई अन्य काम करना भी इसके उद्देश्यों मे शामिल है। अब जरा इस संस्था पर गौर करते हैं। 11 अप्रैल 2018 को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इसके निदेशक सी सेंथिल राजन को वापस उनके कैडर में भेज दिया था और उनकी जगह दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक चैतन्य प्रसाद को इस पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। करीब दो साल बीतने को आए लेकिन अबतक ये संस्था पूर्णकालिक अध्यक्ष की बाट जोह रहा है। चैतन्य प्रसाद दूरदर्शन और मंत्रालय के अपने दायित्व के अलावा इस काम को भी देख रहे हैं। जब कोई भी व्यक्ति किसी काम को अतिरिक्त रूप से संभालता है तो जाहिर सी बात है कि वो अपनी प्रथामिक जिम्मेदारी के बाद बचे हुए समय में ही अतिरिक्त जिम्मेदारी का निर्वाह कर पाता है।
पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान लगी आचार संहिता की वजह से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का आयोजन टला था। इस पुरस्कार को हर वर्ष तीन मई को दिए जाने की परंपरा रही है। ये परंपरा असाधारण परिस्थियों में ही कभी टूटी होगी। पर पिछले वर्ष ये परंपरा टूटी। जो पुरस्कार तीन मई को दिए जाने थे उसकी घोषणा ही अगस्त में हुई जबकि चुनाव नतीजे 23 मई को आ गए थे। पुरस्कार दिसंबर में प्रदान किए जा सके। इस वर्ष भी अबतक पुरस्कारों के लिए जूरी की बैठक शुरू नहीं हो सकी है। पहले ये बैठक 5 मार्च से होने की बात सामने आई थी जूरी बनने में देरी होने की वजह से इसको 15 मार्च तक के लिए टाल दिया गया। अब तो कोरोना की वजह अनिश्चितकाल के लिए टल गया है। इसके अलावा फिल्म समारोह निदेशालय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करता है जिसके लिए पिछले दो साल से कोई फेस्टिवल डायरेक्टर नहीं है। दो साल पहले सुनीत टंडन फेस्टिवल डायरेक्टर थे।
फिल्म समारोह निदेशालय के अलावा सूचना और प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध फिल्म की अन्य संस्थाओं की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के चेयरमैन नहीं हैं, प्रबंध निदेशक भी नहीं हैं। चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी इंडिया में भी चेयरमैन का पद खाली है। भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान पुणे को जो सोसाइटी चलाती है उसमें भी कई सदस्य नहीं हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सीईओ का पद भी लंबे समय से रिक्त है। ये सूची हो सकता है और लंबी हो। ये सब संस्थान ऐसे हैं जो किसी भी देश में फिल्म संस्कृति के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकते हैं। और तो और प्रसार भारती में भी इस वक्त को कोई चेयरमैन नहीं है और इसके पांच बोर्ड सदस्यों का पद भी खाली हैं। फिल्मों से इतर एक और संस्था भारतीय जन संचार संस्थान, जो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आता है, में भी डायरेक्टर जनरल का पद खाली है। लंबे समय से चयन की प्रक्रिया चल रही है लेकिन अबतक नतीजा सामने नहीं आया है।
ये सब वही संस्थाएं हैं जिसको वामपंथियों ने अपने और अपनी विचारधारा को मजबूत करने और उसका दायरा बढ़ाने में उपयोग किया। इमरजेंसी में समर्थन के एवज में इंदिरा गांधी ने वामपंथियों को इन संस्थाओं को आउटसोर्स कर दिया था। उसके बाद से ही वामपंथियों ने इनको अपनी विचारधार को बढ़ाने के औजार के तौर पर उपयोग करना शुरू कर दिया। इसका फल भी उनको मिला। 2014 में जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनी तो वामपंथियों को ये आशंका सताने लगी थी कि इन संस्थाओं से उनका कब्जा खत्म हो सकता है। हलांकि ऐसा हुआ नहीं। लेकिन सवाल ये उठता है कि संस्कृति के लिए अहम इन संस्थाओं को लेकर केंद्र सरकार उदासीन क्यों हैं। बहुत संभव है कि अफसरशाही इस काम को होने नहीं देना चाहती है। अगर इन संस्थाओं में पूर्णकालिक चेयरमैन, निदेशक या अन्य पदों पर भर्तियां हो जाएंगीं तो अफसरों का दबदबा खत्म हो जाएगा। अफसरशाही तो हमेशा से चाहती है कि यथास्थितिवाद बना रहे और अगर उनके यथास्थितिवाद के मंसूबों को संरक्षण मिलता है तो फिर वो यथास्थितिवाद के देवता बन जाते हैं। नरेन्द्र मोदी की जब सरकार आई तो उसके बाद जिस तरह के फैसले होने लगे थे तो उनको डिसरप्टर कहा गया था। डिसरप्टर मैनेजमेंट में उपयोग होनेवाला एक ऐसा सकारात्मक शब्द है जिसका उपयोग उसके लिए किया जाता है जो यथास्थितिवाद को चुनौती देता है। डिसरप्टर कोई व्यक्ति भी हो सकता है, कोई संस्था हो सकती है या कोई नई शुरुआत भी हो सकती है। हैरानी तब होती है जब राजनीतिक डिसरप्टर की अगुवाई में ही कुछ मंत्रालयों में यथास्थितिवाद जड़ जमाकर बैठा है। क्या इन संस्थाओं में नियमित अध्यक्ष, निदेशक, प्रबंध निदेशक आदि की नियुक्ति रोकने के पीछे कोई संगठित मंशा है। क्या वामपंथ की ओर झुकाव रखनेवाले अफसर इस काम को येन-केन-प्रकारेण रोक रहे हैं। इस बात पर बहुत गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए प्रशासनिक स्तर भी और राजनीतिक स्तर पर भी क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से भले ही फिल्म और उससे जुड़ी बातें राजनीति को प्रभावित नहीं करती हों लेकिन परोक्ष रूप से वो राजनीति को भी और समाज को भी प्रभावित करती हैं।       

Saturday, March 14, 2020

फूहड़ संवाद और दृश्यों की फिल्म ‘गिल्टी’


ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर लंबे समय से विमर्श हो रहा है। इंटरनेट के फैलते दायरे को देखते हुए इसपर विमर्श कभी तेज होता है तो कभी वो नेपथ्य में चला जाता है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी इस प्लेटफॉर्म पर पेश किए जानेवाले वेब सीरीज और फिल्मों की कथावस्तु से लेकर उसके संवादों और दृश्यों को लेकर नजर बनाए हुए है। मंत्रालय की पहल पर कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है। लेकिन अबतक ये बातचीत के स्तर पर ही है। कोई ठोस फैसला नहीं लिया जा सका है। इस बीच इन प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज के अलावा फिल्में भी आ रही हैं। अभी एक फिल्म आई है नेटफ्लिक्स पर जिसका नाम है गिल्टी। इस फिल्म को करण जौहर की कंपनी धर्माटिक इंटरटेनमेंट ने पेश किया है। पिछले साल सितंबर में करण जौहर की कंपनी और नेटफ्लिक्स के बीच करार हुआ था। ये कंपनी नेटफ्लिक्स के लिए फिल्मों और वेब सीरीज का निर्माण कर रही है। गिल्टी फिल्म के प्रोड्यूसर करण जौहर हैं। इस महीने के शुरुआत में ये फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध हुई। करण जौहर का नाम जुड़ा होने की वजह से इस फिल्म को पर्याप्त प्रचार मिला, दर्शकों के बीच एक उत्सकुकता का माहौल भी बना। करण जौहर पारिवारिक और रोमांटिक फिल्मों के निर्माता के तौर पर जाने जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वो बहुत हद तक साफ सुथरी फिल्में भी बनाते हैं। इस वजह से भी लोगों में एक उत्सुकता थी कि करण की कंपनी जब फिल्म बना रही है तो वो बेहतर फिल्म होगी। इस फिल्म का निर्देशन रुचि नारायण ने किया है जो इसके पहले कल, यस्टरडे एंड टुमारो नाम की फिल्म का निर्देशन कर चुकी हैं। हलांकि ये फिल्म कुछ खास अच्छा नहीं कर पाई थी। उनके निर्देशन में ये दूसरी फिल्म है।
हम फिल्म गिल्टी की समीक्षा नहीं कर रहे बल्कि इस फिल्म के माध्यम से उस प्रवृत्ति या ट्रेंड की तरफ इशारा करना चाह रहे हैं जिसने वेब सीरीज या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चलने वाले कंटेंट को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ओटीटी पर पेश किए जानेवाले कंटेंट को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं है। वहां निर्माता-निर्देशकों को खुलकर कुछ भी दिखाने की छूट है और ये प्लेटफॉर्म इस छूट का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। किसी भी तरह का नियमन नहीं होने की वजह से भरपूर यौनिक दृश्य, जुगुप्साजनक और लंबे यौनिक संवाद, अश्लीलता की सीमा पार करनेवाली गालियां आम बात हो गई है। इसके अलावा इन वेब सीरीज के माध्यम से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश भी कई बार होती है,धर्म को बदनाम करने की कोशिश भी। कुछ वेब सीरीज में तो भारतीय सेना का भी आपत्तिजनक तरीके से चित्रण किया गया है। इस बारे में इस स्तंभ में समय-समय पर लिखा भी गया है। पहले के वेब सीरीज की सामग्रियों को छोड़ भी दें तो अब भी जो पेश किया जा रहा है उसपर भी यथास्थितिवादियों का ध्यान नहीं जा रहा है।
हम गिल्टी फिल्म की ही बात करें तो इसमें जिस तरह के दृश्य और संवाद हैं उसपर बहुत ही संजीदगी से ध्यान देने की जरूरत है। इस फिल्म की कहानी मी टू के इर्द गिर्द घूमती है। कॉलेज के छात्रों के बीच एक छात्रा का रेप होता है और फिर सोशल मीडिया और मीडिया पर उठे बवंडर के मध्य कहानी चलती है। कियारा आडवाणी ने बेहतरीन अभिनय करते हुए पात्र को जीवंत कर दिया है। लेकिन एक तरफ वो लड़की बेहतरीन कविताएं लिखती है, फैज अहमद की शायरी सुनती है लेकिन संवाद इतने घटिया हैं कि वो उस जीवंतता पर ग्रहण लगा देते हैं। छात्रों की आपसी बातचीत में इतनी गालियां और घटिया और अश्लील शब्द आते हैं जो निर्देशक या संवाद लेखकों की कुंठा को ही प्रदर्शित करते हैं। संवाद में जितनी गालियां आती हैं वो बिल्कुल ही ठूंसे हुए लगते हैं। यौनिक दृश्यों की बहुतायत भी कॉलेज छात्रों को अपमानित करने जैसा है। क्या ऐसी फिल्में या सीरीज बनानेवाले ये मानते हैं कि देश के युवाओं की भाषा इतनी घटिया है। फिल्म को यथार्थ के करीब ले जाने की कोशिश में निर्देशक इसको यथार्थ से बहुत दूर ले जाती है। इस पूरी फिल्म को देखने के बाद यही लगता है कि फिल्मकारों को छात्र जीवन के बारे में जानकारी नहीं है या किसी तीसरी दुनिया के छात्रों के बारे में बात हो रही है। कम से कम भारतीय समाज में अभी छात्र इतने घटिया स्तर पर संवाद नहीं करते हैं। एक बेहतरीन फिल्म को,कियारा के बेहतरीन अभिनय को संवाद के घटियापन ने सतही और फूहड़ बना कर रख दिया। भारत अभी भी भारत है, इसकी अपनी एक संस्कृति है।   
दरअसल भारत में बनने वाले वेब सीरीज या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलनेवाली फिल्मों को लेकर एक अजीब सी धारणा विकसित होती जा रही है। मानसिक रूप से विपन्न एक निर्माता और निर्देशक ने जिस तरह की शुरुआत की थी वो एक ट्रेंड के तौर पर विकसित हो रहा है। मानसिक रूप से विपन्न और कुंठित उस निर्देशक ने अपने एक वेब सीरीज में मुंबई की दुनिया दिखाने के चक्कर में जिस तरह की भाषा और दृश्य का उपयोग वेब सीरीज में किया था, वो उनके अपने जीवन का प्रतिबंब हो सकता है, समाज का तो कतई नहीं है।ये मानसिक विपन्नता और कुंठा उनकी सार्वजनिक टिप्पणियों में बहुधा दिखती भी है। वेब सीरीज के निर्माताओं को लगता है कि गालियों के बगैर दर्शक नहीं मिलेंगे। यहीं पर सरकार की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। कुछ लोगों के तर्क हैं कि ओटीटी पर दिखाए जानेवाले इस तरह के कंटेंट में छोटा सा लिखा होता है कि ये अठारह साल से अधिक उम्र के लोगों के देखने के लिए है। लेकिन क्या ये लिख भर देने से किसी माध्यम को अश्लील दृश्य या बर्बरता पूर्ण हिंसा दिखाने की अनुमति मिल जाती है। क्या कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर युवा पीढ़ी के सामने अश्लीलता परोसने की इजात दी जा सकती है। कलात्मक अभिव्यक्ति की भी एक सीमा तो तय करनी चाहिए।
इसके अलावा एक तर्क और दिया जाता है कि इन प्लटफॉर्म पर वही जा सकते हैं जो जाना चाहते हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्में दर्शक सामूहिक रूप से देखते हैं लेकिन ओटीटी पर निजी तौर पर देखते हैं। ये तर्क बचकाना है। लाख आधुनिकता के दावे किए जाएं लेकिन यहां के लोग अब भी पारिवारिक संस्कार या सामाजिक मर्यादा के बंधन में बंधे हैं। ये अमेरिका नहीं है कि जहां लोक-लाज के लिए कोई जगह नहीं है। दरअसल ये ऑनलाइन बाजार पर कब्जा और उससे मुनाफा कमाने की होड़ है। पिछले दिनों कई रिपोर्ट आईं जो यह बताती हैं कि भारत में इंटरनेट का फैलाव बहुत तेज गति से हो रहा है और इंटरनेट पर वीडियो देखनेवालों की संख्या में इजाफा हो रहा है। लोग देर तक इंटरनेट पर वीडियो देखने लगे हैं। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले दो साल में वीडियो कंटेंट देखने के समय में दोगुने से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। दो साल पहले उपभोक्ता दिनभर में ग्यारह मिनट वीडियो देखता था जो अब बढ़कर चौबीस मिनट हो गया है। जैसे जैसे स्मार्ट फोन के उपभोक्ता बढ़ेंगे वैसे वैसे ये समय और बढ़ेगा। एक और अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट ये कहती है कि हमारे देश में अभी प्रति उपभोक्ता औसत करीब 10 जीबी डेटा की खपत है जिसके 2024 तक अठारह जीबी प्रतिमाह प्रति उपभोक्ता होने का अनुमान है। इस तरह से हम देखें तो ये एक बड़े बाजार का आकार ले रहा है। यहां पेश किए जानेवाले वीडियो कटेंट की व्याप्ति बहुत अधिक होनेवाली है। जाहिर सी बात है कि व्याप्ति का सीधा संबंध मुनाफे से है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार इस बारे में शीघ्र कोई फैसला ले। स्वनियम की बात लंबे समय से चल रही है। इसके लिए एक ड्राफ्ट भी तैयार किया जा चुका है लेकिन कई प्लेटफॉर्म इसको मानने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसी खबरें आई हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्री ने इन प्लेटफॉर्म्स को सौ दिन का समय दिया है ताकि वो किसी प्रकार के नियमन के बारे में अंतिम निर्णय पर पहुंच सकें। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या मुनाफा कमाने के लिए कलात्मक अभिव्यक्ति की आड़ को सरकार स्वीकार करेगी। स्वनियमन को एक प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है लेकिन जिस तरह का ट्रेंड है उसमें ओटीटी कंटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था बनाने की दिशा में ही सरकार को सोचना होगा। आज नहीं तो कल।

Friday, March 13, 2020

असमय चला गया प्रतिभाशाली कथाकार

हिंदी के प्रतिभाशाली लेखक, कहानीकार और संपादक प्रेम भारद्वाज ने बहुत ही कम उम्र में दुनिया छोड़ दी। हिंदी साहित्य में जब राजेन्द्र यादव के संपादन में साहित्यिक पत्रिका हंस अपनी कहानियों और पत्रिका में उठाए गए विवादों की वजह से चर्चा बटोर रहा था तब प्रेम भारद्वाज ने पाखी के संपादन का बीड़ा उठाया था। अपने संपादकीय कौशल की वजह से प्रेम भारद्वाज ने पाखी को हिंदी साहित्य की एक ऐसी पत्रिका के रूप में स्थापित किया जो हंस को चुनौती देने लगा था। राजधानी के साहित्य जगत में बहुधा इस बात की चर्चा होती थी साहित्य में अब नोएडा और दरियागंज के बीच मुकाबला है। हंस का प्रकाशन दरियागंज से होता था जबकि पाखी नोएडा से निकलती है। प्रेम भारद्वाज भी अपने संपादकीयों में अक्सर विवाद उठाने की कोशिश करते थे लेकिन वो राजेन्द्र यादव की तरह खुलकर नहीं खेलते थे। वो परोक्ष रूप से अपनी बात कहते थे। प्रेम भारद्वाज आज से करीब बीस-बाइस साल पहले पटना से दिल्ली आए थे। पाखी में उन्होंने लंबे समय तक काम किया। साहित्यिक पत्रिका में संसाधनों की कमी की बात हमेशा सामने आती है लेकिन बावजूद इसके प्रेम भारद्वाज ने पाखी की स्तरीयता को कभी कम नहीं होने दिया। पाखी में उन्होंने नए लेखकों को जोड़ा।
मुझे याद पड़ता है कि पिछले वर्ष के विश्व पुस्तक मेला में प्रेम भारद्वाज की मांग सबसे अधिक थी। हमलोग मजाक में कहते भी थे कि वो घंटे के हिसाब से कार्यक्रमों में उपस्थित हो रहे हैं। लगातार किताबों पर होनेवाले कार्यक्रमों का संचालन करना या फिर नई किताबों पर बोलना यह साबित करता था कि प्रेम भारद्वाज के अध्ययन का दायरा बहुत विस्तृत था। कुछ सालों पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। फिर अप्रिय परिस्थियों में उनको पाखी छोड़ना पड़ा था जिसके बाद उन्होंने दिल्ली से ही भवन्ति नाम की साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था। इस पत्रिका के शुरुआती अंकों ने काफी चर्चा बटोरी थी। अचानक एक दिन खबर आई थी कि प्रेम भारद्वाज नोएडा के मेट्रो अस्पताल में भर्ती हो गए हैं। बाद मे पता चला था कि कैंसर ने उनको अपनी चपेट में ले लिया है। नोएडा-दिल्ली और अहमदाबाद में उनका इलाज चला और वो ठीक होने लगे थे। सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए थे और उन्होंने पाठकों को भरोसा दिया था कि जल्द ही भवन्ति का नया अंक सामने होगा। अचानक एक दिन खबर फैली की उनको ब्रेन हेमरेज हो गया। उसके चंद दिनों बाद प्रेम भारद्वाज के निधन की खबर से हिंदी जगत सन्न रह गया। उऩका कहानी संग्रह फोटो अंकल काफी चर्चित रहा था। प्रेम भारद्वाज ने सबरंग साहित्य के लिए कई बार लिखा था। उनको श्रद्धांजलि।

Saturday, March 7, 2020

असाधारण विद्रोह अब भी प्रासंगिक


इन दिनों फिल्म थप्पड की बहुत चर्चा हो रही है। निर्देशक अनुभव सिन्हा ने बेहतर फिल्म बनाई है। अनुभव सिन्हा से विचारधारा के स्तर पर असहमत लोग भी इस फिल्म की कथावस्तु को लेकर उनकी सराहना कर चुके हैं। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति इरानी ने तो साफ तौर पर कहा भी और लिखा भी कि कितने लोगों ने सुना है कि औरत को ही एडजस्ट करना पड़ता है। कितने लोग सोचते हैं कि मार पिटाई सिर्फ गरीब औरतों के ही पति करते हैं। कितने लोगों को ये विश्वास होगा कि पढ़े लिखे लोग कभी हाथ नहीं उठाते। कितनी महिलाएं अपनी लड़कियों को या बहुओं को कहती हैं कि कोई बात नहीं बेटा ऐसा तो हमारे साथ भी हुआ लेकिन देखो आज कितने खुश हैं। इंस्टाग्राम पर अपनी पोस्ट में आगे स्मृति इरानी ने लिखा कि मैं निर्देशक की राजनीतिक विचारधारा को समर्थन नहीं करती हूं, कुछ कलाकारों से कुछ मुद्दों पर मेरी असहमति हो सकती है लेकिन ये ऐसी कहानी है जिसको देखूंगी और उम्मीद करती हूं कि लोग भी इसको देखेंगे। किसी भी महिला को मारना उचित नहीं है, एक भी थप्पड़। इस टिप्पणी के दो बिंदुओं पर ध्यान देना खास है।एक तो वो जब खुश रहने की बात कही जाती है और दूसरा तब जब महिलाओं के खिलाफ हिंसा की बात आती है।
आज विश्व महिला दिवस है और महिलाओं के खिलाफ होनेवाली हिंसा या उनकी पसंद को तवज्जो देने के मसले पर बात करने का उचित अवसर भी है। जब फिल्म थप्पड़ को लेकर बात हो रही थी तो ये बात भी जेहन में आई कि हमारे देश में कई महिलाएं ऐसी भी हुईं जिन्होंने हिंसा के अलावा भी अन्य मुद्दों पर पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ संघर्ष किया। अपने संघर्ष में उनको बहुधा अपमानित भी होना पड़ा लेकिन पुरुष प्रधान समाज में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पिछले दिनों सुधीर चंद्र की पुस्तक रख्माबाई, स्त्री अधिकार और कानून पढ़ रहा था। रख्माबाई की कहानी और उनके संघर्ष को सरसरी तौर पर सुन चुका था लेकिन उनके संघर्ष को पढ़ते हुए लगातार ये लग रहा था कि 1884 में जो मुकदमा चला था और उसको रख्माबाई ने जिस जिजीविषा से लड़ा वो अतुलनीय है। उस समय के हिसाब से रख्माबाई का विद्रोह एक असाधारण घटना थी, मेरे जानते इससे पहले किसी भारतीय स्त्री ने कानूनी तौर पर ग्यारह साल की उम्र में हुए विवाह को मानने से इंकार नहीं किया था। रख्माबाई ने किया। वो बाल विवाह के चक्रव्यूह से निकलना चाहती थी। दरअसल अन्य कारणों के अलावा जिस बात को लेकर रख्माबाई सबसे परेशान थी वो ये कि बाल विवाह के बाद उसका स्कूल जाना बंद हो गया था। वो पढ़ना चाहती थी लेकिन वो संभव नहीं हो रहा था। उन्होंने बाद में लिखा भी कि- मैं उन अभागी स्त्रियों में हूं जो बाल विवाह की प्रथा से जुड़े अवर्णनीय कष्टों को चुपचाप झेलते रहने के लिए विवश हैं। सामाजिक रूप से बेहद गलत इस प्रथा ने मेरे जीवन की खुशियों को समाप्त कर दिया। यह मेरे और उन चीजों के बीच आ खड़ी हुई है जिन्हें मैं सबसे ज्यादा मूल्यवान मानती हूं- अध्ययन और मानसिक विकास। मेरा कोई दोष न होते हुए भी मुझे समाज से अलग-थलग जीने का शाप झेलना पड़ रहा है। अपने अज्ञानी बहनों से ऊपर उठने की मेरी हर आकांक्षा को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
रख्माबाई ने बाल विवाह को ही चुनौती दे दी थी और अपने पति के घऱ जाने से इंकार कर दिया था। लगातार अपमानित होने, अदालतों में वकीलों के अपमानजनक प्रश्नों का सामने करने, सामाजिक दुत्कार को झेलने के बावजूद भी रख्माबाई ने हिम्मत नहीं हारी। वो पढ़ना चाहती थी, अपने तरीके से अपनी मर्जी की जिंदगी जीना चाहती थी। उसको ये मंजूर नहीं था कि वो अपने उस पति के लिए अपना सर्वस्व होम कर दे जिसकी नजर उसकी संपत्ति पर थी। जो उससे ज्यादा प्यार पच्चीस हजार रुपये कीमत की संपत्ति के साथ करता था जो रख्माबाई को विरासत में मिली थी। इसको हासिल करने के लिए रख्माबाई के पति ने अपने वैवाहिक अधिकारों के लिए केस किया। रख्माबाई ने जमकर केस लड़ा और पहला निर्णय उसके पक्ष में आया। लेकिन रख्माबाई के पति अपील में चले गए जहां से रख्माबाई को निर्देश मिला कि वो अपने पति के साथ रहने जाए या छह महीने जेल की सजा भुगते। रख्मबाई ने साहस के साथ छह महीने जेल की सजा भुगतने को चुना था। पर रख्माबाई ने हार नहीं मानी थी और अदालत के फैसले के खिलाफ क्वीन विक्टोरिया के पास अपील कर दी थी। क्वीन ने ना सिर्फ उनकी अपील को स्वीकार किया था बल्कि थोड़े समय विचार करने के बाद रख्माबाई के बाल विवाह को रद्द कर दिया था। लीं कानूनी लड़ाई के बाद रख्माबाई की जीत हुई थी।  दरअसल अगर हम देखें तो इस पूरे केस में इस बात पर बहस हुई थी कि एक महिला अपने पति से संबंध बनाने की सहमति या असहमति दे सकती है या नहीं। रख्माबाई ने अपने पति के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इंकार कर दिया था। उधर पति इसको अपना अधिकार मानते हुए अदालत चला गया था। अलग अलग अदालतों ने अलग अलग फैसले दिए थे। सबसे पहले जिस अदालत में ये मुकदमा चला उसके जज पिनी ने अपने फैसले में साफ किया- कानून के अनुसार, मैं वादी को उसके द्वारा मांगी गई राहत प्रदान करने के लिए और इस बाइस वर्षीय युवा महिला को उसके साथ उसके घऱ में रहने का आदेश देने के लिए, ताकि वादी उक्त महिला के साथ उसके बचपन में हुए अपने विवाह को परिणति तक पहुंचा सके, बाध्य नहीं हूं।बाद में अपलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया था।
जब ये केस चल रहा था तो समाज में इसको लेकर व्यापक बहस हुई थी। हिंदू मान्यताओं, परंपराओं से लेकर कानून तक को आधार बनाकर पूरे देश के उस वक्त के समाचार पत्रों ने लेख छपे थे। पूरा समाज इस केस पर बंटा हुआ था। इस दौर में नैतिकता और कानून के जटिल संबंधों को लेकर भी वंदा-विदा हुआ था। उस दौर में भी रख्माबाई ने छद्म नाम और द हिंदू लेडी के नाम से अखबारों में लेख लिखकर उस बहस में हिस्सा लिया था। रख्माबाई के उस दौर में लिखे गए लेख इस महिला की क्रांतिकारी सोच को सामने लाते है। रख्माबाई के चरित्र के खिलाफ जब लेख छपा तो भी वो डिगी नहीं और उसने उसका भी लिखित जवाब दिया था।
उस समय के लिहाज से रख्माबाई का विद्रोह एक बहुत बड़ी सामाजिक घटना थी। इस केस के इर्द गिर्द कई रूढ़िवादियों ने इसमें धर्म को घुसाने का भी प्रयत्न किया। इसको हिंदू धर्म के खिलाफ, हिन्दू मान्यताओं और परंपराओं के खिलाफ बताने की कोशिश भी की गई। बावजूद इसके रख्माबाई दबाव में नहीं आई और अपने निश्चय पर दृढ़ रही। इस केस में रख्माबाई ने प्रत्यक्ष रूप से बाल विवाह को तो चुनौती दी ही, परोक्ष रूप से इस बात को भी सामने रखा कि महिला किसके साथ संबंध बनाए, कब बनाए. विवाह होने के बाद भी ये उसका अपना फैसला होगा। सहमति और असहमति के इस विमर्श पर ही फिल्म पिंक बनी। महिला अधिकारो या महिलाओं के संघर्ष पर कई फिल्में बनी हैं लेकिन अनुभव ने थप्पड़ में जिस तरह से एक मामूली घटना को महिला के स्वाभिमान से जोड़ दिया और उसके इर्द गिर्द पूरी कहानी बुन दी उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। आज जब सौ करोड़, दो सौ करोड़ के मुनाफे की होड़ लगी हो तो ऐसे दौर में इस तरह की संवेदनशील फिल्मों का निर्माण एक तरह की आश्वस्ति भी देता है। आश्वस्ति कला की, आश्वस्ति क्राफ्ट की और आश्वस्ति सोच की भी।
रख्माबाई के संघर्ष को याद करने, समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ उस महिला के अदम्य साहस को रेखांकित करने और नई पीढ़ी को अपने समाज की ऐसी साहसी महिला के बारे में बताने के लिए महिला दिवस से बेहतर कोई अवसर हो नहीं सकता। रख्माबाई उस भारतीय नारी की प्रतीक हैं जो अपने अधिकारों के लिए तन कर खड़ी ही नहीं होती हैं बल्कि उसको हासिल करने तक डटीं भी रहती हैं। अपने अधिकारों को हासिल कर लेने के बाद दंभ नहीं करतीं,जयघोष नहीं करती बल्कि उस अधिकार को आधार बनाकर सामज को और देश को अपनी ओर देने का प्रयत्न भी करती हैं। रख्माबाई का विद्रोह भले ही सवा सौ साल पहले का हो लेकिन उससे निकली बहस अब भी प्रासंगिक है।

Wednesday, March 4, 2020

खबरों की रीमिक्स करती फिल्में


फिल्म एक ऐसा माध्यम है जिसपर गंभीरता विचार कम ही होता है। इसके आयामों को लेकर, इसके क्राफ्ट को लेकर, इसकी कहानियों को लेकर या इसकी प्रस्तुतिकरण को लेकर सामाजिक संदर्भों के साथ बात कम होती है। हिंदी में तो और भी कम।आजादी के सत्तर साल बाद भी बहुत कम ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां फिल्म अध्ययन का अलग विभाग है। पिछले दिनों हिंदी फिल्मों की कहानियों पर काफी चर्चा होनी शुरू हुई है। इसमें यथार्थ के चित्रण पर भी बहुत बातें हुई। यह भी कहा गया कि इन दिनों हिंदी फिल्मों की कहानियां आपकी हमारी कहानियों को चित्रित कर रही हैं लिहाजा इनको दर्शक पसंद भी कर रहे हैं। यह सही भी है कि फिल्मों में इन दिनों यथार्थवादी कहानियों को ज्यादा पसंद किया जा रहा है। उनमें से कई फिल्मों को समीक्षक, तो कइयों को समीक्षक और दर्शक दोनों पसंद कर रहे हैं। पर इन दिनों जो यथार्थवादी कहानियां दिखाई जा रही हैं उसके प्रस्तुतिकरण को देखने की जरूरत है। कहना ना होगा कि इन यथार्थवादी कहानियों का प्रस्तुतिकरण काल्पनिक होने लगा है। पहले के दौर में ये होता था कि काल्पनिक कहानियों का चित्रण यथार्थवादी तरीके से होता था। चाहे वो सत्यजित रे की फिल्में हों, गोविंद निहलानी की फिल्में हो या फिर श्याम बेनेगल की। ये लोग काल्पनिक कहानियों को चुनते थे और उसके प्रस्तुतिकरण यानि नायक नायिकाओं के परिवेश से लेकर उसके कास्ट्यूम तक में यथार्थ दिखाते थे। अब क्या हो रहा है कि कहानियां को यथार्थवादी हो गई हैं लेकिन इनका प्रस्तुतिकरण काल्पनिक हो गया है। ये काल्पनिकता फिल्म मुल्क से लेकर छपाक तक में दिखाई देती है। यहां कहानियां तो दर्शकों के जीवन से उठाई जा रही हैं लेकिन पात्रों से लेकर परिवेश तक को काल्पनिक बना दिया जा रहा है। यथार्थवादी कहानियों में न तो यथार्थवादी ड्रेस डिजायनिंग पर ध्यान दिया जाता है न ही पात्रों के चित्रण पर।
दूसरी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात जो इन कथित यथार्थवादी फिल्मों के बारे में रेखांकित की जा सकती है वो ये है कि इस तरह की ज्यादातर फिल्में खबरों के सहारे यथार्थ के करीब जाती हैं। जैसे अगर हम देखें तो दिल्ली से सटे नोएडा में 2008 में एक स्कूली छात्रा आरुषि तलवार और उसके नौकर की हत्या होती है। इस दोहरे हत्याकांड की पूरे देश में चर्चा होती है। इस हत्याकांड और इसकी जांच और उस वक्त के सामाजिक माहौल को केंद्र में रखकर विशाल भारद्वाज एक कहानी लिख देते हैं जिसपर मेघना गुलजार 2015 में तलवार नाम से एक फिल्म बना देती हैं। इसी तरह से अगर देखें तो उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में कटरा सहादतगंज में दो लड़कियों की लाश पेड़ से लटकी मिली थी। उस वक्त इस बात की देश विदेश में चर्चा हुई थी कि इन दोनों लड़कियों को गैंगरेप के बाद हत्या कर पेड़ से लटका दिया गया था। इस वारदात पर जमकर राजनीति भी हुई थी। इस बड़ी खबर को केंद्र में रखकर अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी ने एक कहानी लिख दी और उसपर आर्टिकल 15 नाम की फिल्म बन गई। इस फिल्म ने खूब वाहवाही बटोरी, कई पुरस्कार भी मिले। इसी तरह से 2017 में लखनऊ में एक एनकाउंटर हुआ था जिसमें एक आतंकवादी मारा गया था। मारे गए आतंकवादी के पिता ने अपने बेटे का शव लेने से ये कहकर इंकार कर दिया था कि वो देश के गद्दार का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। उस दौर में ये खबर भी बहुत चर्चित हुई थी। यथार्थ के करीब जाने के लिए अनुभव सिन्हा ने इसपर एक फिल्म लिख दी जो मुल्क के नाम से बनी।
दरअसल ये एक ट्रेंड शुरू हो गया। इसी ट्रेंड के आधार पर अंकिता चौहान और मेघना गुलजार ने एक फिल्म लिखी जिसका नाम था छपाक। दरअसल 2005 में लक्ष्मी नाम की एक लड़की पर एसिड फेंक दिया गया। एसिड फेंकने की इस घटना को लेकर पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी। खुले में एसिड बिक्री पर रोक की मांग को लेकर आंदोलन हुए. मामला कोर्ट कचहरी तक गया। फैसला हुआ। लक्ष्मी की पीड़ा को लेकर अखबारों में भी काफी चर्चा हुई थी। उरी द सर्जिकल स्ट्राइक, तो उरी में 2016 में आतंकवादी हमले और उसके बाद भारतीय सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है। इस फिल्म ने साढे तीन सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस किया।
खबरों के आधार पर फिल्म बनाने का ये चलन चल पड़ा। फिल्म लेखकों से लेकर निर्माताओं को लगता होगा कि दर्शकों के मानस पटल पर ये घटनाएं अंकित होंगी जिसका फायदा बॉक्स ऑफिस पर दिखेगा। कई फिल्मों में दिखा भी। कुछ फिल्मों ने मुनाफा कमाया तो कुछ ने मुनाफा के साथ साथ नाम भी। दरअसल खबरों के आधार पर कहानी लिखने की जो प्रवृत्ति बॉलीवुड में चली उसके भी आर्थिक कारण हैं। हिंदी फिल्मों में सबसे कम खर्च कहानियों और स्क्रिप्ट पर किया जाता है। जबकि इसके उलट हॉलीवुड में कहानियों या स्क्रिप्ट पर बहुत अधिक खर्च किया जाता है। इस तरह के कई फिल्म लेखकों का तो ये हाल है कि इन घटनाओं को कवर करनेवाले पत्रकारों से पूछकर कहानियां लिखते हैं। दरअसल वो कहानियां नहीं लिख रहे होते हैं बल्कि वो घटनाओं के आधार पर सीन लिख रहे होते हैं। सीन लेखन का ये उपक्रम कहानी पर होनेवाले खर्च को बचा लेता है। कहना न होगा कि ये खबरों का रीमिक्स पेश करने का दौर हैं। जैसे एक दौर ऐसा आया था कि पुराने हिट गानों को रीमिक्स करके पेश किया गया, उनमें से कई गाने खूब हिट रहे तो अब खबरों को रीमिक्स किया जा रहा है। यही हाल ऐतिहासिक बड़ी खबरों के साथ भी रहा है। खबरों के रीमिक्स पर काम करने के क्रम में कुछ लेखक तो इतिहास की बड़ी खबरों तक जा पहुंचे। उन खबरों तक जिनमे गौरवगाथा भी हो। फिल्म दंगल से लेकर फिल्म सुल्तान या गोल्ड तक में इस चलन को रेखांकित किया जा सकता है। सांड की आँख का अगर उदाहरण लें तो कहानी को सबको मालूम थी लेकिन फिल्म के लेखक ने सीन लिखे और फिल्म बन गई।
खबरों का रीमिक्स कर फिल्म की कहानी बनाने का नतीजा ये होता है कि इन फिल्मों से मुनाफा तो कमा लिया जाता है, प्रशंसा भी बटोर ली जाती है लेकिन इनको लंबे समय तक याद किया जाएगा इसमें भी संदेह है। ये कालजयी नहीं हो सकतीं। एक दौर वो भी था हिंदी फिल्मों का जब राज कपूर जैसे निर्देशक कहानियों पर जमकर काम करते थे। एच एस रवैल जैसे लोग कहानियों को लेकर बेहद सतर्क होते थे। तभी उनकी फिल्में अबतक याद की जाती हैं। ये फिल्में टिकाऊ नहीं होती। यह अनायास नहीं है कि इन दिनों फिल्मों का फैसला ओपनिंग के आधार पर होने लगा है। पहले तीन दिन में सौ करोड़ कमाया या नहीं, इसके आधार पर फिल्म को सफल या असफल कहा जाने लगा है। फिल्मों की कहानी और क्राफ्ट पर कम बात होती है। अच्छी फिल्म का मानदंड उसकी कमाई हो गई है। ये अनायास नहीं है कि फिल्म की सफलता में अब इसपर भी बात होती है कि उस फिल्म को कितने स्क्रीन मिले। कितने स्क्रीन पर एक साथ फिल्म रिलीज हुई। यह अनायास नहीं है कि पिछले सालों में चर्चित हस्तियों पर खूब जमकर बॉयोपिक भी बने, इन शख्सियतों की सफलता को भुनाने के लिए उनपर फिल्में बनीं। फिल्म निर्माताओं ने मुनाफा भी कमाया लेकिन अगर बॉयोपिक को याद किया जाता है तो अब भी सबसे पहले रिचर्ड अटनबरो की फिल्म गांधी की ही याद आती है। फिल्मों का ये असर वेब सीरीज पर भी पड़ा है। वहां प्रमाणन की कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए यथार्थ के नाम पर अराजकता है।
सौ वर्षों से अधिक के लंबे सफर के बाद अब हिंदी फिल्मों के कर्ताधर्ताओ को इसपर विचार करना चाहिए कि कहानी पर कितना काम हो, उसपर कितना खर्च किया जाए। जबतक फिल्म की कहानी पर उसके स्क्रिप्ट पर खर्च नहीं किया जाएगा तो जिस तरह से लोकेशन की भव्यता का दौर भी खत्म होता दिख रहा है वैसे ही खबरो की रीमिक्स पर बनने वाली फिल्मों का दौर भी खत्म हो सकता है। दर्शकों के सामने एक ही तरह की फिल्म आने की वजह से एकरसता का खतरा उत्पन्न हो सकता है। हिंदी फिल्मों में एकरसता से उबने का सबसे बडा उदाहरण शाहरुख खान हैं। लंबे कालखंड तक दर्शकों ने रोमांस के बादशाह को देखा, सराहा भी लेकिन बांहें फैलाकर हीरोइन को आमंत्रण देनेवाले नायक को नकारने में भी दर्शकों ने वक्त नहीं लिया। यथार्थ के नाम पर रीमिक्स का दौर भी लंबा चलेगा इसमे संदेह है।   

Monday, March 2, 2020

बंगला नंबर 5 और मोरारजी


मोरारजी देसाई और दिल्ली का बहुत गहरा रिश्ता रहा है। 1956 में वो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर दिल्ली आए और फिर इस शहर को ही अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। मोरारजी देसाई पर लिखी गई किताब में अरविंदर सिंह ने उनके दिल्ली से जुड़े कई प्रसंगों को लिखा है। उनके  मुताबिक जवाहरलाल नेहरू उनको अपने मंत्रिमंडल में चाहते थे और इस वजह से 1956 में उनको महाराष्ट्र की राजनीति छोड़कर दिल्ली बुला लिया था।14 नवंबर 1956 को मोरारजी देसाई देश के वाणिज्य और उद्योग मंत्री बनाए गए थे। जब उन्होंने वाणिज्य और उद्योग मंत्री का पद संभाला था तो उस वक्त इस मंत्रालय का दफ्तर नॉर्थ ब्लॉक में हुआ करता था। लेकिन समय बीतने के साथ मंत्रालयों को बड़े कार्यालय की जरूरत पड़ने लगी तो यह तय किया गया कि वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को अन्यत्र ले जाया जाए। 1957 में जब उद्योग भवन बनकर तैयार हो गया तो मोरारजी देसाई का कार्यालय नॉर्थ ब्लॉक से उद्योग भवन आ गए। तब उनको नहीं मालूम था कि वो जल्द ही फिर से नॉर्थ ब्लॉक में शिफ्ट होनेवाले हैं। गड़बड़ियों के आरोप के चलते फरवरी 1958 में वित्त मंत्री टी टी कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। इनके इस्तीफे के बाद मार्च 1958 में मोरारजी देसाई वित्त मंत्री बने और फिर से नॉर्थ ब्लॉक जा पहुंचे। लेकिन मोरारजी देसाई को तब कहां मालूम था कि नियति ने उऩके लिए साउथ ब्लॉक का प्रधानमंत्री कार्यालय भी तय कर रखा था। यह अलग बात है कि मोरारजी देसाई को राजपथ को क्रास करके साउथ ब्लॉक तक पहुंचने में करीब दो दशक लगे। उन्होंने नार्थ ब्लॉक से साउथ ब्लॉक जाने की कोशिश कई बार की लेकिन हर बार उऩको असफलता ही हाथ लगी।
कुलदीप नैयर ने अपनी किताब बियांड द लाइंसमें उनके साउथ ब्लॉक जाने के पहले प्रयास के बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि जब 27 मई 1964 को नेहरू जी का निधन हो गया था तो उसके अगले दिन वो मोरारजी देसाई के घर गए थे जहां उनकी मुलाकात मोरारजी के बेटे कांतिभाई से हुई थी। वहां कांतिभाई ने नैय्यर को शास्त्री का आदमी बताते हुए कहा था कि जाकर शास्त्रीजी से कह दें कि वो प्रधानमंत्री पद की रेस से बाहर जो जाएं। कांतिभाई के हाथ में तब कांग्रेस के उन सांसदों की सूची थी जो मोरारजी देसाई को समर्थन दे रहे थे। वहां से लौटकर कुलदीप नैयर ने एक लेख लिखा जो कि समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया से जारी हुआ। उस लेख को कई अखबारों ने छापा। उस लेख में कुलदीप नैयर ने लिखा कि मोरारजी पहले शख्स हैं जो नेतृत्व करने के लिए सामने आए हैं और उसके अंत में ये लिखा दिया कि शास्त्री हिचक रहे हैं। इस लेख का तब गहरा असर पड़ा था और उस वक्त कहा गया था कि मोरारजी को समर्थन करनेवाले सौ सांसद पीछ हट गए थे। वजह ये थी कि जनता जब नेहरू जी के निधन पर शोकाकुल थी तो मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनने में लगे थे। तब कुलदीप नैयर को शास्त्री जी ने भी संकेत किया था कि अब कोई जरूरत नहीं है किसी लेख की। अरविंदर सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने किसी सवाल पर कुलदीप नैयर से कहा था कि अगर कुलदीप नैयर ने उनको 1964 में प्रधानमंत्री बनने दिया होता तो ये समस्याएं नहीं आतीं।
दूसरी बार भी मोरारजी देसाई साउथ ब्लॉक नहीं पहुंच पाए वो वर्ष था 1966। शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद एक बार फिर से देश के सामने ये सवाल था कि कौन बनेगा प्रधानमंत्री। मोरारजी देसाई ने तब भी तय किया था कि वो कांग्रेस संसदीय दल क नेता पद का चुनाव लडेंगे। वो लड़े भी और इंदिरा गांधी से पराजित हुए लेकिन 165 सांसदों का समर्थन उनको मिला था। अरविंदर सिंह का कहना है कि कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के लिए हुआ आखिरी चुनाव था। इस पराजय के बाद भी मोरारजी निराश नहीं हुए और देशभर का दौरा करने लगे । तब वो दिल्ली के ड्यूप्लेक्स रोड पर रहते थे जिस सड़क का नाम बदलकर अब कामराज रोड कर दिया गया है। दरअसल समय समय पर दिल्ली के सड़कों का नाम बदला जाता रहा है, खासतौर पर उन सड़कों का नाम जो गुलामी के दौर की याद दिलाते हैं। दिल्ली की कई सड़कों का नाम बदला गया था जिसमें केनिंग रोड, चेम्सफोर्ड रोड और हार्डिंग रोड के साथ-साथ ड्यूप्लैक्स रोड भी शामिल था। जोजेफ फ्रांस्वा ड्यूप्लैक्स अठारहवीं शताब्दी के मध्य में भारत में फ्रांसीसी कब्जे वाले इलाके के गवर्नर जनरल थे।
ड्यूप्लैक्स रोड के बंगले से ही मोरारजी देसाई के साउथ ब्लॉक पहुंचने का रास्ता खुला था। दरअसल 1975 मे जनता की नाराजगी कांग्रेस सरकार के खिलाफ बढ़ने लगी थी। गुजरात विधानसभा को भंग कर दिया गया था। तब मोरारजी देसाई ने 7 अप्रैल 1975 को एलान किया था कि वो अपने दिल्ली के घर 5, ड्यूपलैक्स रोड पर आमरण अनशन पर बैठेंगे। उन्होनें घोषणा की थी कि उनका ये आमरण अनशन देश में लोकतंत्र की बेहतरी के लिए है। उन्होंने तीन मांगे उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने रखी थी। पहली कि गुजरात विधानसभा के चुनाव की तारीखों का एलान किया जाए, दूसरा राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर मीसा ( मेंटनेंस ऑफ इंटरनल सेक्युरिटी एक्ट) नहीं लगाया जाए और तीसरा कि बांग्लादेश युद्ध के समय देश पर जो वाह्य इमरजेंसी लगाई गई थी, उसको हटाया जाए। उनकी इन मांगों पर इंदिरा गांधी के साथ बातचीत भी हुई लेकिन वो बेनतीजा रही। दिल्ली के ड्यूप्लैक्स रोड का ये पांच नंबर का बंग्ला उस दौर की राजनीति का केंद्र बनने लगा और इंदिरा विरोधियों की भारी भीड़ वहां जुटने लगी थी। मोरारजी देसाई का समर्थन बढ़ता देख इंदिरा गांधी ने तब उमाशंकर दीक्षित को उनके घऱ भेजा और कहलवाया कि सरकार उनकी गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित करने की मांग मानने को तैयार है और बाकी दोनों मांगों पर भी विचार किया जा रहा है। सरकार के इस आश्वासन के बाद मोरारजी देसाई अनशन तोड़ने को राजी हुए थे। 13 अप्रैल की शाम पांच बजे के करीब जयप्रकाश नारायण मोरारजी देसाई के घर पहुंचे और साढे पांच बजे उनको जूस पिलाकर अनशन समाप्त करवाया। इस तरह ड्यूप्लैक्स रोड का ये बंगला इंदिरा सरकार को झुकाने की गतिविधियों का गवाह बना था।
इस बीच देश में राजनीति का घटनाक्रम तेजी से चला और कोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया। कांग्रेस के ज्यादातर नेता तब भी इंदिरा गांधी के पक्ष में थे। एक बार फिर से मोरारजी देसाई ने कमान संभाली और उनके चेयरमैनशिप में लोकसंघर्ष समिति का गठन हुआ। राजनीतिक गतिविधि का केंद्र एक बार फिर से दिल्ली का वही पांच नंबर ड्यूप्लैक्स रोड का बंगला बना। इंदिरा गांधी ने 26 जून को देश में इमरजेंसी लगा दी। उनका विरोध करनेवाले सभी नेता गिरफ्तार किए जाने लगे। सुबह सुबह पुलिस मोरारजी देसाई के बंगले पर पहुंची और उनको गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार करके मोरारजी देसाई को पहले सोहना टूरिस्ट सेंटर गेस्ट हाउस में रखा गया फिर ताउरू के गेस्ट हाउस में रखा गया। इन दोनों जगहों पर मोरारजी देसाई को डेढ़ साल तक रखा गया था। सोहना में तो उनके बगल के कमरे में जयप्रकाश नारायण भी रहा करते थे। बाद में उनको चंडीगढ़ शिफ्ट कर दिया गया था। अरविंदर सिंह लिखते हैं कि इमरजेंसी में अपनी गिरफ्तारी के दिनों में मोरारजी देसाई ने अन्न छोड़ दिया था और वो सिर्फ दूध और फल खाते थे। डेढ साल तक इसी तरह का जीवन जीने के बाद 18 जनवरी 1977 की सुबह कुछ पुलिसवाले उनके पास पहुंचे और कहा कि सरकार ने उनको बगैर किसी शर्त रिहा करने का आदेश दिया है। मोरार जी संकट में पड़े उनके पास पैसे तो थे नहीं दिल्ली लौटते कैसे। उन्होंने अपनी मुश्किल पुलिस वालों को बताई। प्रशासन ने गाड़ी का इंतजाम किया और उनको दिल्ली के ड्यूप्लैक्स रोड के उनके घऱ तक छोड़ा गया। इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर दी थी और चुनाव की तारीखों का एलान हो गया था। 18 जनवरी 1977 की शाम से ही राजनीतिक बैठकों का दौर शुरू हो गया था और दो दिन बाद दिल्ली के इसी 5 ड्यूप्लैक्स रोड वाले मोरारजी देसाई के घर पर जनता पार्टी के गठन की घोषणा की गई थी। आगे की कहानी तो इतिहास है लेकिन इस बार किस्मत मोरारजी देसाई के साथ थी और उनका साउथ ब्लॉक जाने का सपना पूरा हुआ था। पांच नंबर के इसी बंगले से वो देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने निकले थे। अब भले ही दिल्ली की इस सड़क का नाम बदल दिया गया है लेकिन इस सड़क ने और इस बंगले ने इतिहास को बनते देखा है।

Saturday, February 22, 2020

यथार्थ की आड़ में कमी छिपाते निर्देशक


इन दिनों हिंदी फिल्मों के बदलाव को लेकर काफी बातें होती हैं। बदलाव की इन बातों में कथानक, फॉर्म, क्राफ्ट से लेकर तकनीक और संगीत तक पर चर्चा होती है। ये चर्चा होनी भी चाहिए। दरअसल सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसमें लगातार बदलाव करते रहने की जरूरत भी है क्योंकि दर्शक एकरसता से उब जाते हैं। हिंदी फिल्मों में आ रहे इन तमाम बदलावों के बीच पिछले तीन चार वर्षों से एक बात अधिक सुनने को मिल रही है कि अब हिंदी फिल्मों की कहानियां यथार्थ के ज्यादा करीब पहुंच रही हैं। विकी डोनर से लेकर दम लगा के हइशा, बरेली की बर्फी जैसी फिल्में बनीं और लोगों ने इसको पसंद भी करना शुरू किया तो छोटे शहरों की बड़ी कहानियों की बातें शुरू हो गईं। फिर मुल्क, आर्टिकल 15, पिंक जैसी फिल्में भी आईं जो सफलता के फॉर्मूले को न अपनाते हुए कहानी के साथ चलीं। सफल भी हुईं। 2015 में बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म मसान आई। बेहद शानदार फिल्म, कलाकारों का सधा अभिनय भी। इस तरह की फिल्मों को कालांतर में कंटेट फिल्म कहा जाने लगा। ये नामकरण ठीक वैसा ही है जैसे हिंदी में नई वाली हिंदी को चलाने की कोशिश की गई। कंटेंट फिल्म कहने का अभिप्राय चाहे जो भी रहा हो लेकिन इससे एक अलग भाव यह भी निकलता है कि सिर्फ इन्हीं फिल्मों में कंटेंट है और अन्य फिल्में कंटेंटविहीन हैं। ऐसा नहीं है, इस कोष्ठक से बाहर की फिल्मों में भी कंटेंट होता है। दरअसल जिन कथित फॉर्मूलाबद्ध फिल्मों से खुद को अलग दिखाने की कोशिश में कंटेंट फिल्मका नाम चलाने की कोशिश की जा रही है वो फिल्में पहले भी थीं और आगे भी रहेंगी।
 हिंदी फिल्मों के इतिहास पर नजर डालें तो ये बहस बहुत पुरानी है। आजादी के बाद जब राज कपूर फिल्में बना रहे थे तब भी उनके सामने ये प्रश्न आया था। तब ये थोड़े बदले हुए रूप में आया था जब फिल्मों को बौद्धिक और संवेदनशील फिल्मों की श्रेणी में बांटकर देखा जाता था। राज कपूर फिल्मों को बौद्धिक माध्यम नहीं मानते थे उनका मानना था ये माध्यम संवेदना से चलता है। और वो इस बात को कहते भी थे। राज कपूर की बात सच भी है। हिंदी फिल्मों के इतिहास में अबतक ज्यादातर दर्शकों को वही फिल्में पसंद आती हैं या आ रही हैं जो कहानी को संवेदना की जमीन पर बुनती हैं। संवेदना से अलग खुरदरे यथार्थ को पेश करनेवाली फिल्में थोड़े दिनों के लिए चर्चा तो हासिल कर सकती हैं लेकिन ये चर्चा बेहद अल्पजीवी होती है। इसका सबसे सटीक उदाहरण अनुराग कश्यप नाम के एक निर्देशक हैं। अबतक इस निर्देशक ने जितनी भी फिल्में बनाई हैं, उनमें से ज्यादातर एक खास वर्ग द्वारा प्रशंसित रही हैं, दर्शकों में व्याप्ति का दायरा बेहद छोटा रहा। कहा जा सकता है कि इन साहब की फिल्में सुपरफ्लॉप लेकिन क्रिटिकली अकेल्मड फिल्मों की स्मारक हैं। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता और अश्लीलता परोसने में इनको महारथ हासिल है। खैर ये अलहदा विषय है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी।
ये सही है कि इन दिनों हिंदी फिल्मों के विषय अपेक्षाकृत यथार्थ के करीब जाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस बात को रेखांकित करना भी आवश्यक है कि यथार्थ के करीब जाने में वो जीवन को जस का तस उठा कर रख देने की ओर भी बढ़ने लगे हैं। जीवन को जस का तस रखने का अर्थ है कि वो सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के उन प्रसंगों या उन घटनाओं को उसी तरह से फिल्मा कर दर्शकों के लिए पेश कर देना। व्यक्तिगत जीवन में कई ऐसे पल होते हैं जिनको सीधे सीधे फिल्मों में नहीं उतारा जा सकता है, उसको दिखाने की एक न्यूनतम मर्यादा अपेक्षित होती है। फिल्मों में जीवन जस का तस पेश करने की प्रवृत्ति पर ध्यान देने के लिए क्रेंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड है लेकिन इंटरनेट के माध्यम से चलनेवाले प्लेटफॉर्म पर पेश किए जानेवाले कंटेंट पर ध्यान देने की कोई प्रविधि अभी है नहीं। इसका नतीजा क्या है। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता, अश्लीलता, भयानक हिंसा, जुगुप्साजनक यौनिक दृश्य का चित्रांकन। इस स्तंभ में ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर पहले भी कई बार चर्चा हो चुकी है। इस माध्यम के विनियमन को लेकर भी चर्चा हो चुकी है। सरकार ने वेब सीरीज की दशा और दिशा को लेकर एक-दो बैठक भी कर ली है। अबतक नतीजा कुछ नहीं निकला है। हो सकता है सरकार इन सीरीज पर पेश किए जा रहे कंटेंट को लेकर संतुष्ट हो गई हो।
अभी हाल ही में नेटफ्लिक्स पर एक सीरीज आई है नाम है जामताड़ा। दस एपिसोड में पेश किए गए इस सीरीज के केंद्र में झारखंड का कस्बा जामताड़ा है जहां से बैंक फ्रॉड की वारदात को अंजाम दिया जाता है। अब अगर इस सीरीज को ही देखें तो इसमें जीवन को जस का तस दिखाने की प्रवृत्ति के कई प्रसंग हैं। इस वेब सीरीज में गालियों की भरमार है, कोई भी एपिसोड ऐसा नहीं है, बल्कि ये भी कह सकते हैं कि लगभग सभी प्रसंगों में गालियां उपस्थित हैं। जामताडा के युवाओं को इस तरह से पेश किया गया है कि प्रतीत होता है कि वहां का युवा कोई वाक्य बगैर गाली के बोलता ही नहीं है। हद तो तब हो जाती है जब नायक अपनी प्रेमिका से प्रेम प्रसंगों में गाली में ही बात करता है। ये यथार्थ है या फिर सारी सामाजिक वर्जनाओं को छिन्न भिन्न कर मुनाफा कमाने की युक्ति। इसपर विचार करने की जरूरत है। सरकार से अधिक निर्माताओं और निर्देशकों को समझने की जरूरत है। जामताड़ा की भाषा को लेकर भी इस वेब सीरीज में घालमेल किया गया है। कनटाप शब्द कानपुर से इतना जुड़ा है कि हिंदी पट्टी का कोई भी व्यक्ति इसको जानता है। जब इस सीरीज जामताडा में वहां के स्थानीय लड़के अपने संवाद मे कनटाप का प्रयोग करते हैं तो ये संवाद लेखक से लेकर निर्देशक के अज्ञान को ही दर्शकों के सामने पेश करता है। इसके अलावा भी अगर इस वेब सीरीज को देखें तो जाति व्यवस्था को सूक्ष्मता से समझे बगैर पात्रों के जातीय वर्गीकरण को चित्रित करने की कोशिश की गई है। जामताडा में जिस सहजता के साथ अपराधी बैंक में पैसे जमा करते और निकालते हैं वो भी यथार्थ से दूर नजर आता है। अगर आप बैंकों के फ्रॉड को लेकर कोई सीरीज बना रहे हैं तो इसके लिए न्यूनतम शोध तो अपेक्षित ही होता है।
यथार्थ के नाम पर कहानी के लोकेशन और गाली वाली भाषा को पेश करने की जो भेड़चाल इस दौर की वेब सीरीज में दिखाई देती है उसपर भी विचार करना होगा। यथार्थ के चित्रण के लिए जिस कौशल की जरूरत होती है वो न तो अनुराग कश्यप में है और न ही गाली गलौच और अश्लीलता दिखाने वाले निर्देशकों में। दरअसल इस तरह के लोग अपनी कमजोरियों को ढ़कने के लिए गालियों, हिंसा और यौनिक दृश्यों का सहारा लेते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि फिल्म या वेब सीरीज के क्राफ्ट या निर्देशकों के कौशल पर बात नहीं होती है और सारी चर्चा इन गालियों और फूहड़ता पर केंद्रित हो जाती है। समांतर सिनेमा के दौर में भी फिल्मों में यथार्थ दिखाया जाता था चाहे वो गोविंद निहलानी की फिल्में हों या श्याम बेनेगल की या महेश भट्ट की। इनकी फिल्मों में भी यथार्थ होता था, वैसा य़थार्थ जो बगैर लाउड हुए जीवन को दर्शकों के सामने पेश करता था। 1982 में महेश भट्ट निर्देशित एक फिल्म आई थी अर्थ। इस फिल्म में समाज का ऐसा यथार्थ है जिसकी चर्चा फिल्म बनने के करीब चार दशक बाद अब भी होती है। फिल्म का अंतिम दृश्य जिसमें नायिका शबाना और नायक कुलभूषण खरबंदा का संवाद है वो इतना पॉवरफुल है कि अब भी दर्शकों के मानस पटल पर अंकित है। उस यथार्थ के चित्रण में फिल्मकार का कौशल दिखाई देता था। उनको अपने कौशल पर भरोसा होता था और वो उसी भरोसे के आधार पऱ फिल्म बनाते थे और उसी कौशल ने उनकी फिल्मों को अबतक जिंदा रखा है, उसकी चर्चा होती है। अब जिस कंटेंट फिल्म की चर्चा हो रही है उसको कबतक याद रखा जाएगा ये तो आनेवाले समय में पता चलेगा। लेकिन यथार्थ की आड़ में अपनी कमी छुपाने वाले निर्देशक इतिहास में गुम हो जाएंगे इस बात को समझने के लिए किसी समय का इंतजार नहीं करना होगा।  

Thursday, February 20, 2020

पुरस्कार से उठते विवादों के बोल


हिंदी फिल्मों के लंबे इतिहास में पुरस्कारों को लेकर विवाद उठते रहे हैं। ताजा विवाद उठा है गीतकार मनोज मुंतशिर के एक फैसले से। इस वर्ष के फिल्मफेयर अवॉर्ड की घोषणा के बाद मनोज मुंतशिर ने ट्वीटर पर ये एलान किया कि वो अब किसी अवॉर्ड फंक्शन का हिस्सा नहीं होंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि वो इस बात से खफा हो गए कि फिल्म केसरी के लिए लिखे उनके गीत की बजाए गली बॉय के गीत अपना टाइम आएगा को फिल्मफेयर अवॉर्ड से पुरस्कृत कर दिया गया। मनोज इतने क्षुब्ध हो गए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर वो अब भी अवॉर्ड का ध्यान रखते हैं तो ये उनकी कला का अपमान होगा। मनोज मुंतशिर अपने लिखे गीत को पुरस्कृत गीत से बेहतर मानते हैं इस वजह से दुखी हैं। उन्होंने अपने दुख को सार्वजनिक भी किया, बाद में उनका एक बयान भी प्रकाशित हुआ कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है और गीत तेरी मिट्टी किसी भी पुरस्कार से परे है। मनोज मुंतशिर ने जिस तरह से पूरे मसले को सामने रखा उसको देखते हुए मुझे यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक लता सुरगाथा का एक प्रसंग याद आ गया जिसमें लता जी कहती हैं आपसे एक दिल की बात शेयर कर रही हूं, वह यह कि मुझे पूरी उम्मीद थी कि वो कौन थी के लिए मदन मोहन को फिल्मफेयर पुरस्कार मिलेगा। उनको वह नहीं मिला, इसके लिए मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत दुख हुआ था। मैंने मदन भैया से उनके घर जाकर यह व्यक्त भी किया था कि मुझे उम्मीद थी कि ये पुरस्कार इस साल आपको मिलेगा, मगर नहीं मिला। इसपर मदन भैया ने मुझसे कहा था, लता! तुमको अगर यह लगता है कि मुझको ये पुरस्कार मिलना चाहिए था और तुम्हें इस बात से तकलीफ है कि मुझे यह नहीं मिला, तो समझ लो कि मुझे यह पुरस्कार आज मिल गया। इससे बड़ा पुरस्कार मेरे लिए क्या होगा कि तुम्हें लगता है और न मिलने का दुख है। मनोज का लिखा गीत भी देश के लाखों लोगों को पसंद है यही उनका पुरस्कार है।
फिल्मफेयर अवॉर्ड को लेकर हमेशा से विवाद होते रहे हैं और हिंदी फिल्मों से जुड़े ज्यादातर लोगों को इसकी हकीकत पता भी है। इस हकीकत को ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लमखुल्ला में बयां भी किया है। अपने और अमिताभ बच्चन के संबंधों पर ऋषि कपूर ने लिखा है कि फिल्म कभी-कभी की शूटिंग के दौरान उनके और अमिताभ के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति थी और दोनों में बातचीत भी नहीं होती थी। ऋषि को लगता था कि अमिताभ इस बात से खफा थे कि ऋषि को बॉबी फिल्म के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था क्योंकि उनको लगता था कि उसी साल रिलीज हुई फिल्म जंजीर के लिए ये पुरस्कार उनको मिलना चाहिए था। ऋषि कपूर ने असली कहानी इसके बाद बताई, दरअसल वो पुरस्कार मैंने खरीदा था, मैं अनुभवहीन था और मेरा एक पीआरओ था तारकनाथ गांधी, उसने मुझसे कहा कि सर तीस हजार दे दो तो आपको मैं अवॉर्ड दिला दूंगा। मैंने बगैर कुछ सोचे समझे उसको तीस हजार दे दिए। तब मेरे सेक्रेटरी घनश्याम ने भी मुझे कहा था कि सर देते हैं, मिल जाएगा अवॉर्ड इसमें क्या है।तीस हजार रुपए देने के बाद उस साल का फिल्मफेयर अवॉर्ड ऋषि कपूर को मिल गया। बाद में किसी ने अमिताभ बच्चन को सारी बातें बता दीं। ऋषि कपूर के फिल्मफेयर पुरस्कार खरीदने की बात जानकर अमिताभ नाराज हो गए थे। इस तरह से देखा जाए तो फिल्मफेयर अवॉर्ड की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। मनोज मुंतशिर जो बात कहते हैं कि उनके गीत पुरस्कारों से परे हैं तो उसको ही सार्वजनिक जीवन में जीना भी चाहिए।   



Saturday, February 15, 2020

वैचारिक जकड़न से आजाद होते उपन्यास

हिंदी कथा परिदृश्य की अगर बात करें तो हम पाते हैं कि पिछले कुछ सालों में इसने अपने भूगोल का विस्तार किया है। वामपंथी विचार के प्रभाव में खास तरह की कहानियां या उपन्यास लिखे जा रहे थे। ये दौर बहुत लंबे समय तक चला और एक खास तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां और उपन्यास लिखे जाते रहे। एक गरीब होगा, उसका संघर्ष होगा, समाज के प्रभावशाली व्यक्ति के गरीबों के शोषण का चित्र होगा, उसमें लंबे लंबे वैचारिक आख्यान होगें और फिर कई बार सुखांत को कई बार दुखांत होगा। ये कथा-प्रविधि चलती रही। कुछ लेखक इससे हटकर भी लिखते रहे लेकिन जोर इसी तरह के लेखन का रहा। दुनिया को बदलने का स्वप्न देखनेवाले कथा लेखक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से अपनी कहानियों या उपन्यासों को भी दुनिया को बदलने का औजार बनाते चले गए।  जब इस तरह के औजार के प्रयोग हुआ तो उसने हिंदी के पाठकों को चौंकाया। लेकिन जब यही प्रविधि ज्यादातर लेखक लगातार उपयोग करने लगे तो पाठकों के बीच एक खास किस्म की ऊब पैदा हुई।
विचारधारा की जकड़न वाले ऐसे कथा लेखक इस बात का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उद्घोष भी करते रहे कि वो विचारधारा के पोषण के लिए और उसको मजबूत करने के लिए लिखते हैं। वो पाठकों की परवाह भी नहीं करते थे, बाजार की परवाह करना तो खैर उनकी मातृ-विचार के खिलाफ ही था। इसका दुष्परिणाम हिंदी साहित्य को झेलना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब हिंदी साहित्य जगत में पाठकों की कमी को लेकर विमर्श शुरू हो गया। बड़े बड़े संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं में हिंदी के पाठकों की कमी का रोना रोते हुए लेख आदि छपने लगे। पाठकों की कमी की बात जब मुखर होने लगी तो उसी दौर में ये बाते में भी सामने आने लगीं कि हिंदी के कहानी संग्रह और उफन्यासों का संस्करण तीन सौ प्रतियों का होने लगा। लेकिन कभी भी इस बात की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की गई कि पाठक क्यों कथा साहित्य से दूर जाने लगे हैं। लेखकों ने पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा और कहते भी थे कि वो रुचि का ध्यान रखकर लेखन नहीं कर सकते हैं। अगर बाजार की भाषा में इसको समझने की कोशिश करें तो कह सकते हैं कि वामपंथी लेखकों ने उपभोक्ता यानि पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा। वो रवीन्द्रनाथ टैगोर का कहा भी भूल गए। टैगौर साहब ने साहित्य की सामग्री नामक अपने लेख की शुरुआत में ही कहा था- केवल अपने लिए लिखने को साहित्य नहीं कहते हैं- जैसे पक्षी अपने आनंद के उल्लास में गाता है उसी प्रकार हम भी अपने आनंद में विभोर होकर केवल अपने लिए ही लिखते हैं, मानो श्रोता या पाठक का उस से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। यह बात बिल्कुल निर्विवाद रूप से नहीं कही जा सकती कि पक्षी जब गाता है तब वह पक्षी समाज जरा भी उसके ध्यान में नहीं होता। यदि नहीं होता को न सही, इस बात पर तर्क करने से लाभ ही क्या है? परंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि लेखक की रचना का प्रधान लक्ष्य पाठक-समाज होता है।लेकिन वामपंथी लेखकों ने पाठक समाज को ध्यान में नहीं रखा उनका लक्ष्य तो कथा साहित्य से अपनी विचारधारा को पुष्ट करना था।  
जब वामपंथी विचारधारा का पराभव शुरू हुआ तो हिंदी साहित्य का कथा लेखन भी इस वैचारिक लेखन से मुक्त होने लगा। इसके बीच आर्थिक उदारीकरण के बाद के दौर में ही कथाभूमि में पड़ने शुरू हो गए थे। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में बदलाव का ये पौधा उगना शुरू हो गया था और लोगों ने इससे अलग हटकर उपन्यास लिखना शुरू कर दिया था। इसी दौर में मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों ने अपनी नवीनता की वजह से हिंदी के पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया था। भगवानदास मोरवाल का उपन्यास रेत और मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास अल्मा कबूतरी ने पाठकों को कथा के ऐसे प्रदेश से परिचय करवाया जिस ओर जाने से हिंदी के उपन्यास लेखक हिचकते थे। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों ने जिन समुदायों को कथा के केंद्र में रखा है उसके जीवन को पाठकों के सामने पेश करने की कोशिश की, मोरवाल ने कुछ हिचक के साथ तो मैत्रेयी ने बोल्ड होकर। हम इन दोनों उपन्यासों को विचारधारा से मुक्त होने का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। हलांकि मोरवाल के उपन्यासों में उसके अवशेष यदा कदा दिख जाते हैं।
इसके बाद के कथा लेखन खास तौर पर उपन्यासों को देखें तो वहां वैचारिक प्रतिबद्धता को पाठकों की रुचि ने विस्थापित कर दिया। नए लेखकों ने विश्वविद्यालय कैंपस की जिंदगी को विषय बनाया और पाठकों ने उनको खूब पसंद किया। इनमें से कुछ लेखक अब कैंपस से बाहर निकल गए हैं और उन्होंने अपने दायरे का विस्तार कर लिया जबकि कई लेखक अब भी कैंपस के ही चक्कर लगा रहे हैं। इनमें से जो लेखक कैंपस से बाहर निकल गए हैं उनकी व्याप्ति बढ़ी है और जो कैंपस में ही अटके हैं उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वो अपनी कथाभूमि का विस्तार करें। पिछले दो तीन सालों को देखें तो कथा भूमि का और विस्तार दिखाई देता है। अब उपन्यासों के विषयों में पहले की अपेक्षा अधिक विविधताएं दिखाई देने लगी हैं। हिंदी का लेखक समाज बहुत बड़ा है और उसी अनुपात में पुस्तकें भी प्रकाशित होती हैं। लेकिन जिन उपन्यासों ने अपनी विषयगत नवीनता की वजह से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा उसमें पर्यावरण पर लिखा उपन्यास है, उसमें समाज में व्याप्त कानूनी असामनता को लेकर लिखा गया उपन्यास है। पिछले वर्ष के अंतिम महीने में दो ऐसे उपन्यास आए जिसने अपनी विशयगत नवीनता से पाठकों को चौंकाया। रत्नेश्वर ने फिर से पर्यावरण को अपने उपन्यास का विषय बनाया। उनका उपन्यास एक लड़की पानी पानी ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसमे रत्नेश्वर ने पानी की समस्या को बेहद रोचक तरीके से उठाया है। स उपन्यास के केंद्र में पानी की समस्या है, उपन्यास के पात्रों के बीच पानी की कमी को लेकर चलनेवाला विमर्श है जो भविश्य के खतरों के प्रति लोगों को आगाह भी करती है। इसी तरह से भगवानदास मोरवाल ने अपने नए उपन्यास वंचना में महिलाओं और बच्चों के लिए बनाए गए कानून की खामियों को विषय बनाया है। इस उपन्यास में मोरवाल ने बेहद सधे हुए अंदाज में संवेदनशील तरीके से उन स्थितियों की चर्चा की है। इन दोनों उपन्यासों में लेखकों के सामने अपनी कृतियों को पठनीय बनाए रखने की चुनौती थी जिसका सामना दोनों ने बखूबी किया। इस तरह के विषय हिंदी उपन्यासों के लिए पहले बिल्कुल नहीं सोचे गए थे। अगर लिखे गए हों तो संभव है कि मेरी नजर में ना आए हों। मार्क्सवादी लेखकों ने तो पर्यावरण को इस वजह से अपने लेखन में तवज्जो नहीं दी क्योंकि उनके आराध्य ने ही इस विषय पर कुछ नहीं देखा। दुनिया बदवे का स्वप्न देखते देखते बदलती हुई दुनिया उऩसे छूट गई।
ऐतिहासिक, पौराणिक और मिथकीय चरित्रों पर पहले भी लेखन होता था और अब उसमें काफी वृद्धि हुई है। राष्ट्रवाद के दौर में पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर ढेर सारे लेखकों ने महाभारत और रामायण के चरित्रों को लेकर उपन्यास लिखे। पहले नरेन्द्र कोहली ने अकेले इन विषयों पर विपुल लेखन किया जिसे बाद में अमीश से लेकर कई अन्य लेखकों ने बढाया। लेकिन पिछले ही साल नरेन्द्र कोहली का एक उपन्यास सागर मंथन प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कथा के एक बिल्कुल नए क्षेत्र में प्रवेश किया जिसमें पौराणिकता के साथ साथ विज्ञान भी है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि जो हिंदी में कथा साहित्य का जो मौदूदा दौर है उसको विचारधारा की गुलामी से मुक्त होने का दौर कह सकते हैं। उसको वर्तमान और भविष्य की चिंताओं को अपने अपने उपन्यासों का विषय बनाकर पाठकों के समक्ष ले जाने का जोखिम उठाने का दौर है। इस दौर को पाठकों या व्यापक हिंदी समाज की रुचियों की पूर्ति का दौर भी कह जा सकता है। यह अकारण नहीं है कि अब प्रकाशक लगातार सार्वजनिक तौर पर अपनी पुस्तकों के नए संस्करणों की बात करने लगे हैं। वो खुलकर ये बताने लगे हैं कि अमुक उपन्यास या अमुक पुस्तक की इतनी प्रतियां बिकीं। इस बदलाव को एक सुखद बदलाव के तौर पर भई देखा और रेखांकित किया जाना चाहिए। ये दौर उन आलोचकों के लिए भी चुनौती का दौर है जो सिर्फ उन्हीं पुस्तकों पर विचार करते रहे हैं जो उनकी विचारधारा के करीब रही है।

Wednesday, February 12, 2020

बल्लीमारान के ‘प्राण’


उर्दू के मशहूर शायर गालिब और हिंदी फिल्मों के शानदार अभिनेता प्राण दिल्ली की मिट्टी जोड़ती है। अपनी शादी के बाद गालिब अब के पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान में रहने चले आए थे वहीं अपनी शादी के बाद प्राण बल्लीमारान छोड़कर लाहौर चले गए थे। बल्लीमारान के एक खानदानी रईस परिवार में प्राण का जन्म हुआ था। प्राण के पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद पेशे से सिविल इंजीनियर थे और ब्रिटिश हुकूम के दौरान सरकारी निर्माण का ठेका लिया करते थे। केवल कृष्ण सिकंद को सरकारी इमारतों, सड़कों और पुल बनाने का विशेषज्ञ माना जाता था और जहां भी सरकार को इस तरह का काम करवाना होता था तो वो उनको बुलाकर ठेके देती थी। सिकंद परिवार की बल्लीमारान ही क्या पूरी दिल्ली में बहुत प्रतिष्ठा थी और वो आर्थिक रूप से बहुत संपन्न थे। प्राण की जन्म तिथि को लेकर भी एक दिलचस्प कहानी है। प्राण बताते थे कि उनकी बुआ कहा करती थीं कि तुम्हारा जन्म 1920 के फरवरी के तीसरे सप्ताह में हुआ था। प्राण जब ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने पहुंचे तो फॉर्म में जन्मतिथि का कॉलम था लेकिन उनको तिथि पता नहीं थी। अपनी बुआ की फरवरी के तीसरे सप्ताह वाली बात याद करके उन्होंने 20 फरवरी की तारीख फॉर्म में भर दी, जो उनकी आधिकारिक जन्मतिथि बन गई। इस बीच प्राण एक अभिनेता के तौर पर मशहूर होने लगे थे और पत्र-पत्रिकाओँ में उनके बारे में छपने लगा था।
अचानक एक दिन प्राण को बल्लीमारान के एक निवासी का पत्र मिला। उन्होंने प्राण को लिखा कि एक लेख में मैंने आपकी जन्मतिथि 20 फरवरी 1920 पढ़ी है लेकिन मेरे पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि आपकी जन्मतिथि 12 फरवरी 1920 है। पत्र पढ़ने के बाद प्राण की उत्सुकता बढ़ी और उन्होंने पत्र का उत्तर लिखा और थोड़े चुनौती भरे अंदाज में उनसे पूछा कि आपके पास क्या प्रमाण है। कुछ दिन बीत गए। प्राण इस बात को भूल गए थे अचानक एक दिन वो अपनी डाक देख रहे थे तो एक लिफाफा में उनको अपना मूल जन्म प्रमाण पत्र दिखा जिसपर उनके जन्म की तिथि 12 फरवरी 1920 लिखी थी। प्रमाण पत्र के साथ उसी व्यक्ति का एक पत्र भी था जिसमें उन्होंने बताया था कि वो नगरपालिका का कर्मचारी था और उसने प्राण का जन्म प्रमाण पत्र देखा था। प्राण ने उस व्यक्ति को धन्यवाद का पत्र लिखा और तब से उनकी जन्मतिथि 12 फरवरी 1920 हो गई। 12 फरवरी 2020 को प्राण के सौ साल पूरे हो गए।
प्राण के पिता के पेशे की वजह से उनका स्थान परिवर्तन होता रहता था। जब भी कोई नया ठेका मिलता तो वो परिवार के साथ वहां शिफ्ट कर जाते। प्राण ने रामपुर के स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की। लेकिन प्राण का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। मैट्रिक पास करने के बाद एक दिन उनके पिता ने बुलाकर पूछा कि आगे क्या पढ़ोगे तो प्राण ने कहा कि वो अब पढ़ना नहीं चाहते हैं और फोटोग्राफी सीखना चाहते हैं। कुछ दिनों तक सोचविचार करने के बाद प्राण के पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद ने बेटे को अपने मन की करने की अनुमति दे दी लेकिन साथ ही एक शर्त भी लगा दी वो कनॉट प्लेस स्थित ए दास एंड फोटोग्राफर्स में प्रशिक्षण लें। प्राण को मालूम था कि ए दास एंड फोटोग्राफर्स के मालिक उनके पिता के दोस्त हैं तो वो भी तैयार हो गए। प्राण ने वहां फोटोग्राफी की ट्रेनिंग के साथ साथ फिल्म को डेवलप और प्रिंट करने की कला भी सीखी। अब यहां से नियति प्राण को अभिनय की ओर ले गई। ए दास एंड कंपनी ने शिमला में एक शाखा खोली तो प्राण को वहां भेज दिया। शिमला में रहकर प्राण ने फोटोग्राफी में निपुण तो हुए ही वहां ही पहली बार अभिनय भी किया। वहां आयोजित होनेवाली वार्षिक रामलीला में उन्होंने सीता का अभिनय किया। उस रामलीला में उनके साथ राम की भूमिका मदनपुरी ने निभाई थी जो बाद में हिंदी फिल्मों के मशहूर अभिनेता बने।
शिमला में अपने कारोबार से उत्साहित होकर ए दास एंड कंपनी ने लाहौर में अपनी दुकान खोली और प्राण को वहां भेज दिया। लाहौर की रामलुभाया की पान दुकान पर उस समय फिल्म यमला जट लिख रहे लेखक वली मुहम्मद वली ने प्राण को पान खाते देखा और उनका अंदाज इतना भाया कि उन्होंने वहीं उनको फिल्म का ऑफर दे दिया। प्राण ने ए दास कंपनी की सौ रुपए की नौकरी छोड़कर पंचोली आर्ट स्टूडियो की पचास रुपए की नौकरी कर ली। इस बीच ये खबर बल्लीमारन में रहनेवाले उनके पिता तक पहुंची। वो थोड़े झुब्ध हो गए क्योंकि उस वक्त फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। प्राण के पिताजी ने उनको दिल्ली बुला लिया और फिल्म छोड़कर कोई और काम करने को कहा। प्राण फिर से ए दास एंड कंपनी से जुड़े लेकिन उनका मन नहीं लग रहा था। फिर घर के बड़े लोगों ने मिलकर तय किया कि उनकी शादी कर दी जाए। दिल्ली के ही एक संपन्न अहलूवालिया परिवार की लड़की से उनकी शादी तय कर दी गई। इस बीच उनके पिता का निधन हो गया। पिता के निधन के बाद प्राण फिर से फिल्मों में काम करने के लिए बल्लीमारान की गलियां छोड़कर लाहौर जा पहुंचे। लेकिन शादी तो तय हो चुकी थी। लड़की वाले प्राण के फिल्मों में काम करने को लेकर थोड़े सशंकित थे लेकिन उनकी लड़की और प्राण दोनों पहले मिल चुके थे और कह सकते हैं कि प्रेम भी अंकुरित हो चुका था। 1945 में प्राण की शादी हुई। शादी के बाद प्राण ने दिल्ली जरूर छोड़ा लेकिन पहले लाहौर और फिर मुंबई में रहते हुए वो बल्लीमारान को नहीं भूल पाए थे, उसकी गलियों को याद करते थे और याद तो वो कनॉट प्लेस में बिताए अपने दिनों को भी करते थे। ये भी कौन जानता था कि सीता जैसी महिला के किरदार से अभिनय की शुरुआत करनेवाले प्राण इस तरह के रोल करेंगे कि कोई अपने बच्चे का नाम प्राण नहीं रखेगा। खालिस दिल्ली की मिट्टी की खुशबू के साथ पला बढ़ा ये अभिनेता भारतीय सिनेमा में अपने दमदार अभिनय के बूते पर आज भी याद किया जाता है।  

Saturday, February 8, 2020

बेनकाब होने से क्रोधित कवि


मीडिया और उसकी भूमिका या उसके काम करने का तरीका एक ऐसा विषय है जिसपर घंटों बात हो सकती है, पक्ष में भी और विपक्ष में भी। मीडिया पर होनेवाली चर्चा में कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जो पिछले कई सालों से बोली जा रही है यथा मीडिया चौराहे पर खड़ी है, मीडिया पर विश्वसनीयता का संकट है आदि आदि। इन सब जुमलेबाजियों के बीच मीडिया की अपनी साख कायम है, वो अपना विस्तार भी कर रही है। पर चर्चा है तो होती ही रहेगी। इसी तरह की एक चर्चा जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में रखी गई थी, विषय था चौथा स्तंभ। इसी तरह के कई जुमले वहां भी उछाले गए। पूर्व पत्रकार और अब राजस्थान के एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर विराजमान ओम थानवी, पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर, पत्रकारिता पर नजर रखने का दावा करनेवाली एक वेबसाइट के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया के साथ मैं भी इस चर्चा में शामिल था। चर्चा तो जैसी होनी चाहिए थी वैसी ही हुई।

इस तरह की चर्चा में अगर तैयारी के साथ वक्ता नहीं आते हैं तो वो राजनीति की उंगली पकड़कर अपना बेड़ा पार करवाना चाहते हैं। ओम थानवी ने यही किया और राजनीति की बात करते करते वो साहित्य के प्रदेश में जा पहुंचे। इस बात को रेखांकित करने लगे कि मीडिया ने सरकार का विरोध करनेवाले उऩ लेखकों को पुरस्कार वापसी गैंग का नाम दिया जिन्होंने कालबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी का अपना पुरस्कार लौटा दिया था। मैंने विस्तार से उनको बताया कि क्यों इन लेखकों को गैंग कहा गया। इस स्तंभ में साहित्य वाले हिस्से की चर्चा ही करूंगा क्योंकि चौथे स्तंभ पर बात करते करते वक्ता गांधी से लेकर गोडसे और नागरिकता संशोधन कानून से लेकर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तक चले गए थे। अतुल चौरसिया ने एक ऐसी स्थापना सामने रखने की कोशिश की जो बिल्कुल ही तथ्यहीन तर्क की बुनियाद पर टिकी थी। उन्होंने मोदी सरकार के पहले की सरकार को इस आधार पर उदारवादी बताया कि उनके समय में न्यूज चैनलों के लाइसेंस उदारता के साथ दिए जाते थे और मोदी के पूर्व के सरकारों में मीडिया फलता फूलता था। इसके लिए उन्होंने रजत शर्मा के इंडिया टीवी और एनडीटीवी का उदाहरण दिया। पर उत्साह में बहुधा चूक हो जाती है और अतुल भी चूक गए और उन्होंने यहां तक कह दिया कि मोदी के शासनकाल में सिर्फ अर्णब के चैनल को लाइसेंस दिया गया। मैंने प्रतिवाद किया और उनको मंच से ही बता दिया कि कितने चैनलों के लाइसेंस दिया गया। बाद में वो सोशल मीडिया पर और भी मनोरंजक सफाई देने में जुटे रहे। सूचना प्रसारण मंत्रालय की एक सूची लगाई लेकिन जो तर्क दिए वो भी गलत थे। दक्षिण भारत में कई हिंदीतर भाषाओं में क्षेत्रीय चैनल का प्रसारण कर रहे एक मीडिया समूह को राष्ट्रीय हिंदी चैनल चलाने की अनुमति भी मिली थी। वो चैनल शुरू भी हुआ। चल भी रहा है। कांग्रेस के एक नेता की पत्नी का चैनल भी शुरू हुआ।
दरअसल जब पिछले साल मेरी किताब मार्क्सवाद का अर्धसत्य प्रकाशित हुई थी तो कुछ वरिष्ठ लोगों में मुझसे कहा था कि झूठ की विचारधारा को अर्धसत्य क्यों कहा, तो कुछ साथियों ने इस बात पर चुटकी ली कि झूठ की विचारधारा से अर्धसत्य निकालने का काम मैं ही कर सकता हूं। लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं तो मेरा विश्वास इस बात को लेकर दृढ़ होता जाता है कि अर्धसत्य को एक विचारधारा के तौर पर स्थापित करने में मार्क्सवादियों और उनके अनुयायियों या साथियों का बड़ा योगदान है। अशोक वाजपेयी मार्क्सवादी नहीं हैं, पूर्व में वामपंथ के मुखर विरोधी थे लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में उनके समर्थक या साथी हैं। तमाम क्रांतिकारी कवि इन दिनों उनकी परिक्रमा करते नजर आते हैं। वो भी वामपंथियों के साथ रहते हुए अर्धसत्य को बढ़ावा देने की कला में माहिर हो गए हैं। पाठक इस बात को समझ सकते हैं कि अगर अवसर ही विचार हैं की अवधारणा अर्धसत्य के कंधे पर सवार हो जाए तो किस तरह की बातें सामने आ सकती हैं। अशोक वाजपेयी इन दिनों इसी मिश्रण के साथ साहित्य की भूमि पर खड़े नजर आते हैं।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मीडिया पर हुई चर्चा के दौरान पूरे समय वो बैठकर सुनते रहे थे। चर्चा खत्म होने के बाद तमतमाते हुए मेरे पास पहुंचे थे और कहा कि आप मंच से सफेद झूठ बोलते हैं। इस प्रसंग की चर्चा उनके कॉमरेड ओम थानवी ने सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट में भी की। लेकिन ओम थानवी ने अश्वत्थामा हतो, नरो के बाद शंख बजा दिया और इस प्रसंग को छोड़कर आगे बढ़ गए। अर्धसत्य के आधार पर अपनी बात को सामने रखने का एक और उदाहरण। जब अशोक वाजपेयी ने मुझपर झूठ बोलने का आरोप लगाया तो मैंने वहीं बहुत विनम्रतापूर्वक उनको याद दिलाया कि साहित्य में एकमात्र सत्यवादी हरिश्चंद्र तो वही हैं। मैं चाहता था कि अशोक वाजपेयी तथ्यों के आधार पर बात करें लेकिन क्रोध हमेशा विवेक का दुश्मन होता है और उस वक्त वो क्रोधित थे। क्रोध में उन्होंने यहां तक कह दिया कि 69 लोगों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया था। ये संख्या भी गलत है। साहित्य अकादमी के युवा, अनुवाद, बाल पुरस्कारों को जोड़ने के बाद भी पुरस्कार वापसी की घोषणा करनेवाले 39 लेखक थे। घोषणा इस वजह से कि ना तो उनके पुरस्कार वापस हो सकते थे और ना ही उऩके द्वारा भेजी गई राशि वापस हो सकती थी। इनमें से भी कई लेखकों ने राशि का चेक वापस नहीं किया, कुछ ने चेक भेजा तो उसमें किसी का नाम नहीं लिखा था, कुछ ने स्मृति चिन्ह नहीं भेजा। इसके अलावा एक लेखक ने तो खेद जताकर पुरस्कार वापसी की अपनी घोषणा को रद्द भी कर दिया। अब अशोक वाजपेयी इतने भोले तो नहीं हैं कि उनको लेखकों की इस चतुराई का पता ना हो। पकी आंखों से साहित्य की राजनीति करनेवाले अशोक वाजयेपी को ये भी मालूम होगा कि पुरस्कार वापस करने की घोषणा करनेवाले कई लेखक अब छाती ठोककर अपनी पुस्तक पर छपे अपने परिचय में अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक लिखते हैं। और तो और जो साहित्य अकादमी परिसर में कदम नहीं रखने की कसम खा चुके थे वो भी अब अकादमी की बैठकों में ना केवल शामिल होते हैं बल्कि अकादमी से बैठक में शामिल होने का मानदेय भी लेते हैं।
कोई भी व्यक्ति क्रोधित तब होता है जब उसके तर्क चुक जाएं। पुरस्कार वापसी अभियान पर अशोक वाजपेयी जब भी मुंह खोलते हैं तो उनका कहा गलत ही साबित होता है। पुरस्कार वापसी पर उनके तर्क एकदम कमजोर रहते हैं। पुरस्कार वापसी तो इतना लिखा जा चुका है कि अब कुछ शेष रहा नहीं है और ये कई बार साबित भी हो चुका है कि कैसे बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जनता दल यूनाइटेड के एक बड़े नेता के घर पर हुई बैठक में इसकी रणनीति बनी थी। किस तरह से पुरस्कार वापसी अभियान के एवज में बिहार में विश्व कविता सम्मेलन के आयोजन की ठेकेदारी की बात होती है। यह अलग बात है कि जिस नीतिश कुमार की राजनीति के लिए पुरस्कार वापसी अभियान चलाया गया था वही नीतीश, भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री मोदी के साथ हो लिए। इसके बाद विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन नहीं हो सका, टेंडर निकलने के बाद भी ठेका नहीं मिलने की पीड़ा तो होती ही है। इस स्तंभ में समय समय पर पुरस्कार वापसी अभियान से लेकर विश्व कविता के आयोजन की तिकड़मों पर लगातार लिखा जाता रहा है।
साहित्य की दुनिया में अशोक वाजपेयी लंबे समय से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से राजनीति करते रहे हैं। नौकरशाह होने की वजह से साधन और संसाधन की कमी कभी नहीं रही। अब भी रजा फाउंडेशन के स्वामित्व की वजह से संसाधन की कमी नहीं है लिहाजा अब भी उनकी राजनीति चल रही है। लेखकों के बीच भी और प्रकाशकों के बीच भी। फर्क इतना आया है कि अब उनके साहित्यिक वृत्त के बाहर के लेखक मुखर होकर उनकी राजनीति को रेखांकित करने लगे हैं। उनके अर्धसत्य को बेनकाब करने लगे हैं। अर्धसत्य का दौर अब रहा नहीं तो इस रेखांकन से उनका क्रोधित होने स्वाभाविक है। खिन्न तो वो इस बात से भी होंगे कि ललित कला अकादमी के उनके कार्यकाल के दौरान की गड़बड़ियों की सीबीआई जांच भी अंतिम चरण में है।