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Saturday, July 10, 2021

यथास्थितिवाद से उबारने की चुनौती


संस्कृति एक ऐसा विषय है जिसको लेकर वर्तमान सरकार से पूरे देश को बहुत उम्मीदें हैं, अपेक्षाएं भी । संस्कृति का फलक इतना व्यापक है कि कई मंत्रालय इसके अंतर्गत काम करते हैं। मुख्यतया तीन मंत्रालय ही देश की संस्कृति को मजबूत और समृद्ध करने का काम करते हैं। संस्कृति मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और सूचना और प्रसारण मंत्रालय। मंत्रिपरिषद के हालिया विस्तार में इन तीनों मंत्रालयों के मंत्री बदले गए हैं। नरेन्द्र मोदी जब 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने थे तब से ही संस्कृति मंत्रालय क जिम्मा स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री के पास था। अब संस्कृति मंत्रालय का जिम्मा प्रधानमंत्री ने कैबिनेट मंत्री जी किशन रेड्डी को सौंपा है। उनके साथ दो राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी और अर्जुन राम मेघवाल भी संस्कृति मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालेंगे। लंबे अरसे के बाद संस्कृति मंत्रालय को इतनी अहमियत मिली है। संस्कृति मंत्रालय के जिम्मे कई सारे ऐसे कार्यक्रम हैं जो पिछले कई वर्षों से बहुत धीमी गति से चल रहे हैं। इसमें एक बहुत ही महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है नेशनल मिशन आन कल्चरल मैपिंग एंड रोडमैप। आज से करीब चार-पांच साल पहले इसकी शरुआत हुई थी और तब इसको कला-संस्कृति विकास योजना के अंतर्गत रखा गया था। 2017 से लेकर 2020 तक इस काम के लिए करीब 470 करोड़ रुपए का बजट भी स्वीकृत किया गया था। कुछ दिनों बाद मंत्रालय के संयुक्त सचिव, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र का काम भी देखते थे, को इस मिशन का जिम्मा सौंपा गया था। इस मिशन के उद्देश्य को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांटा गया था।पहला था, हमारी संस्कृति हमारी पहचान अभियान, दूसरा था सांस्कृतिक प्रतिभा खोज अभियान और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण था कि पूरे देश की सांस्कृति संपत्ति और साधन की खोज करना और उसका एक डेटाबेस तैयार करके एक पोर्टल पर डालना। इस पोर्टल को इतना महात्वाकाक्षी बनाना था कि इसमें एक ही जगह पर देश के सभी हिस्सों के कला रूपों और कलाकारों की जानकारी तो हो ही, उसके सम्मानों के बारे में भी जानकारी मिल सके। कलाकारों से लेकर कला के विभिन्न रूपों की जानकारी वाला ये पोर्टल अगर पूरी तौर पर तैयार हो पाता तो कोरोनाकाल में जरूरतमंद कलाकारों की पहचान हो पाती और उनको सरकारी मदद समय पर मिल पाती। पता नहीं किन वजहों से सांस्कृतिक मैपिंग का ये कार्य अबतक या तो फाइलों में ही अटका हुआ है या बहुत धीमी गति से चल रहा है। नए मंत्री के सामने ये सबसे बड़ी चुनौती है कि वो इस काम में तेजी लाएं। 

अगले साल हम देश की स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं और हमें अबतक अपने देश की संस्कृतिक संपत्ति और संसाधन का ही पता नहीं है। जबतक कला संपदा और संसाधन का आकलन नहीं हो पाएगा तबतक संस्कृति को लेकर ठोस योजनाएं बनाना और उसका क्रियान्वयन कैसे संभव हो पाएगा। संस्कृति मंत्रालय का एक और बेहद महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है प्रधानमंत्रियों का म्यूजियम। ये दिल्ली में बनना है। इमारतें तो अपनी रफ्तार से बन जाएंगी, उसकी साज-सज्जा भी हो जाएगी लेकिन उस म्यूजियम में जो फिल्में दिखाई जाएंगी या जो ऑडियो प्रेजेंटेशन होगा उसका स्तर कैसा होगा, इसपर बहुत ध्यान देने की जरूरत पड़ेगी। इन दो चुनौतियों के अलावा उनके सामने नियमित कामकाज की चुनौती है। कई सारे काम अटके हुए हैं जिसकी वजह से साहित्य और कला जगत क्षुब्ध है। साहित्य अकादमी को छोड़कर अन्य अकादमियों का बुरा हाल है। संगीत नाटक अकादमी में साल भर से अधिक समय से चेयरमैन नहीं हैं, कलाकारों को पुरस्कार नहीं दिए जा सके हैं। ललित कला अकादमी लगातार विवादों में रह रही है। वहां लगभग अराजकता की स्थिति है। चेयरमैन रिटायर हो जाते हैं फिर उनको ही चंद दिनों बाद प्रभार दे दिया जाता है। ललित कला अकादमी के कई मामले अदालत में हैं और उसके पूर्व अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच भी चल रही है। यहां रखे कलाकृतियों का क्या हाल होगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक की नियुक्ति का पेंच अदालत में फंसा है। तीन साल बगैर निदेशक के विद्यालय चला और जब सारी प्रक्रिया संपन्न हो गई तो अब मामला कोर्ट में है। इन जगहों पर प्रशासनिक स्तर पर चूलें कसने की जरूरत है।

शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा धर्मेन्द्र प्रधान को दिया गया है, उनकी छवि अपने कार्य को कुशलतापूर्वक संपन्न करने की रही है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की है। इसके साथ ही राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद को क्रियाशील बनाते हुए उसके पुस्तकों की समीक्षा का काम भी बहुत बड़ा है। वर्ष 2005 में पाठ्यपुस्तकों को तैयार किया गया था, उसके बाद मामूली बदलावों के साथ पुस्तकें रीप्रिंट होती आ रही हैं। इस महत्वपूर्ण काम को करने के लिए सबसे पहले पिछले साल से खाली पड़े निदेशक के पद को भरना होगा ताकि प्रशासनिक कार्य सुचारू रूप से चल सके। स्कूली पाठ्यक्रमों के पुस्तकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप बनाने के अलावा कॉलेजों के पाठ्यक्रमों को भी नई शिक्षा नीति के हिसाब के करवाने का श्रमसाध्य कार्य करना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत केंद्रित शिक्षा की बात की गई है। पाठ्यक्रम बनाने से लेकर पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने में विद्वानों को चिन्हित करना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कला संगीत को बढ़ावा देने की बात की गई है और उसको शिक्षा की मुख्यधारा में लाने पर जोर है। इसके लिए कितने और किस तरह के संसाधनों की आवश्यकता होगी इसका आकलन कर क्रियान्वयन करवाने की चुनौती भी बड़ी होगी। एक महत्वपूर्ण कार्य कॉलेजों और स्कूलों की क्लस्टरिंग का है। ये कार्य विधायी संशोधन की मांग करता है। इसके अलावा इसमें राज्य और केंद्र के अधिकारों का प्रश्न भी उठेगा, उसका हल ढूंढना होगा। इनसे इतर एक प्रसासनिक दायित्व है केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति का। दर्जन भर से ज्यादा केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति का पद खाली है। 

सूचना और प्रसारण मंत्रालय में युवा मंत्री अनुराग ठाकुर लाए गए हैं। यहां चर्चा सिर्फ संस्कृति से जुड़े विभागों की होगी। अनुराग ठाकुर को विरासत में कुछ समस्याएं मिली हैं, विवाद भी। उसको सुलझाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अभी ताजा मामला तो सिनमैटोग्राफी एक्ट में संशोधन का है, इसके अलावा ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म के नियमन के क्रियान्वयन का है। कुछ महीनों पहले मंत्रालय के कई विभागों को मिलाकर एक कर दिया गया था। इनमें फिल्म निदेशालय, प्रकाशन विभाग आदि थे। लेकिन इन विभागों के विलय को मूर्तरूप देना अभी बाकी है। इनमें से एक प्रकाशन विभाग की कार्यशैली का एक उदाहरण काफी होगा। महीनों पहले प्रकाशन विभाग ने प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम के उद्बोधनों का संकलन प्रकाशित किया था। ये संकलन किसी पुस्तकालय तक पहुंच नहीं पाया है जबकि अपेक्षा थी इसको देशभर के पुस्तकालयों में पहुंचाने की। प्रधानमंत्री से जुड़े संकलन को लेकर अगर ये कार्यशैली है तो बाकी का अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। इसी विभाग से एक साहित्यिक पत्रिका निकलती है जो लगातार वामपंथियों को अपने कवर पर छापती रहती है लेकिन राष्ट्रीय विचारों को अपेक्षाकृत कम जगह देती है। इस मंत्रालय के कई विभागों में नियुक्तियां लंबित हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्यों को लेकर भ्रम की स्थिति है कि उनका कार्यकाल खत्म हो गया है या नहीं। क्षेत्रीय स्तर पर भी सदस्यों को नामित करने का काम होना है।  

अभी इन मंत्रियों को पद संभाले तीन चार दिन ही हुए हैं लेकिन उनके सामने अपेक्षाओं का अंबार है। तीनों मंत्रालयों के मंत्री युवा हैं, ऊर्जावान हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वो अपने अपने मंत्रालयों में यथास्थितिवाद को खत्म करेंगे और लंबित पड़े कामों को पूरा करने के अलावा कला और संस्कृति को समृद्ध करने की दिशा में प्रयास करते दिखेंगे। 

Wednesday, July 7, 2021

दिलीप कुमार का अमेठी कनेक्शन


दिलीप कुमार फिल्मों के बेहतरीन अभिनेता थे। फिल्मों के अलावा नेता का उनका रूप अल्पज्ञात है। दिलीप कुमार का उत्तर प्रदेश के अमेठी की राजनीति से नाता रहा है। इमरजेंसी के बाद 1977 में आम चुनाव की घोषणा हुई थी। संजय गांधी अमेठी से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। दिलीप कुमार ने अमेठी में चुनाव प्रचार की इच्छा जताई थी। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र में इस बात का जमकर प्रचार किया कि फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार चुनाव प्रचार के लिए सात मार्च को अमेठी पहुंच रहे हैं। उन जगहों पर सुबह से लोगों की भीड़ जमा हो गई थी । लोग दिलीप कुमार को देखना चाहते थे। लेकिन अमेठी की जनता इंतजार करती रह गई क्योंकि दिलीप कुमार नहीं आए। कांग्रेस के किसी ने तारीख को लेकर घपला कर दिया था। 

दिलीप कुमार का दौरा आठ मार्च का था। वो आठ मार्च को फुर्सतगंज हवाई अड्डे पहुंचे लेकिन वहां उनको रिसीव करने के लिए कोई नहीं था। उन दिनों अमेठी में यातायात की सुगम व्यवस्था नहीं थी। एक पीपल के पेड़ के नीचे दिलीप कुमार दो घंटे अकेले खड़े इंतजार करते रहे। दो घंटे बाद एक बस आई और उससे दिलीप कुमार अमेठी पहुंचे। जहां वो एक चाय दुकान पर उतरे और किसी से कांग्रेस के दफ्तर में खबर भिजवाई गई। थोड़ी देर बाद एक जीप दिलीप कुमार को लेने आई और फिर आनन फानन में उनकी सभा तय की गई। चूंकि उनके नाम का प्रचार नहीं किया जा सका था इसलिए बमुश्किल कुछ ही लोग दिलीप कुमार की सभा में आ पाए। चुनावी सभा असफल हो गई। दिलीप कुमार मायूस होकर लौट गए। अपनी पुस्तक द संजय स्टोरी में विनोद मेहता ने इस प्रसंग का उल्लेख चुनाव के दौरान कांग्रेस की बदइंतजामी और खराब प्लानिंग के सिलसिले में की है। इस घटना के 23 साल बाद कांग्रेस ने उनको राज्यसभा में भेजा ।      

दो सितारों की दोस्ती की मिसाल


दिलीप कुमार के पेशावर से मुंबई (तब बांबे) आने की भी बेहद दिलचस्प कहानी है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुनिया में कई बदलाव आने लगे थे। कारोबार के अवसर कम हो गए थे और कारोबारी नए नए व्यवस्या की तलाश में इधर उधर जाने लगे थे। दिलीप कुमार के पिता भी कारोबार के सिलसिले में मुंबई आ गए थे। एक दिन बेहद दिलचस्प घटना घटी। शाम को दिलीप साहब के पिताजी मुंबई के अपोलो बंदर इलाके में टहल रहे थे। एक दिन उन्होंने देखा कि एक दंपति अपने बेहद खूबसूरत बच्चे को प्रैम में लिटाकर टहल रहे थे। उस बच्चे के चेहरे को देखकर उनको अपने छोटे से बच्चे युसूफ की याद आ गई। वो प्रैम तक पहुंचे और बच्चे को उठाकर गले से लगा लिया। हट्टे-कट्ठे पठान को प्रैम से अपने बच्चे को उठाते देखकर दंपति शोर मचाने लगे। ये देखकर युसूफ के पिताजी ने बच्चे को प्रैम में लिटा दिया और दंपति से ये कहकर क्षमा मांगी कि बच्चे को देखर उनको अपने बेटे की याद आ गई थी इसलिए गोद में उठा लिया था। लेकिन इस घटना ने एक पिता को बेचैन कर दिया। वो पेशावर लौट गए और फिर अपनी पत्नी और सात बच्चों को लेकर मुंबई आ गए। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वो अपने परिवार के साथ फ्रंटियर मेल से मुंबई के लिए रवाना हो गए। ठीक से याद नहीं पर ये 1935 के आसपास की बात होगी। ये उनकी पहली ट्रेन यात्रा थी, इस वजह से सभी बच्चे बेहद उत्साहित थे। रास्ते में उनके रिश्तेदार और पहचान वाले उनसे मिलने आते थे और कहीं सामिष तो कहीं निरामिष भोजन मिलता था। दिलीप कुमार ने एक बेहद अजीब सी बात लिखी है अपनी आत्मकथा में। उन्होंने लिखा है कि जब ट्रेन स्टेशन पर रुकती थी तो चायवाले जोर जोर से चिल्लाते थे- हिंदू चाय, हिंदू पानी, मुस्लिम चाय, मुस्लिम पानी। दिलीप कुमार के मुताबिक उनके परिवार के लोग इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं देकर कोई भी पानी और कोई भी चाय पी ले रहे थे। उनके डब्बे में बैठे कई लोग भी ऐसा ही कर रहे थे लेकिन कई लोग अपने धर्म के हिसाब से चाय और पानी पी रहे थे। सुबह सुबह इनकी ट्रेन कोलाबा पहुंची और वहां से तांगा करके ये लोग किराए के घर में क्रॉफर्ड मार्केट के निकट नागदेवी रोड पर अब्दुल्ला बिल्डिंग में रहने आ गए। वहां तीन कमरों के फ्लैट में दिलीप कुमार का परिवार रहने लगा। दिलीप कुमार की पढ़ाई भी शुरु हुई और 1937 में उनके पिता ने उऩका नामांकन अंजुमन इस्लाम हाई स्कूल में पांचवीं क्लास में करवा दिया। फिर वहां से वो खालसा कॉलेज पहुंचे जहां रा कपूर से उनकी मुलाकात हुई। दोनों का पेशावर कनेक्शन था और दोनों दोस्त बन गए। दिलीप कुमार के पिता सरवर खान और राज कपूर के दादा बसेश्वरनाथ मित्र थे। सरवर खान बहुधा बसेश्वरनाथ को कहा करते थे कि यार! तुम कैसे अपने बेटे पृथ्वीराज को नाचनेवालियों के साथ काम करने की इजाजत दे देते हो। उस दौर में फिल्मों में कई लोग पेशेवर नृत्यांगनाओं के बारे में इस शब्द का प्रयोग करते थे। जब युसूफ खान को देविका रानी ने फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव दिया था तब दिलीप कुमार अपने पिता के रुख से परिचित थे, उनको इस बात की आशंका भी थी कि पिता उनको अनुमति नहीं देंगे। उन्होंने अपनी मां को बताया कि उनको एक नौकरी मिल गई है। मां ने जब पूछा कि क्या नौकरी मिली है तो उन्होंने ये कहकर मां को बरगला दिया कि उनकी अच्छी उर्दू की वजह से नौकरी मिली है।

बांबे टॉकीज में एक दिन अचानक उनको राज कपूर मिल गए, दोनों ने आश्चर्य से एक दूसरे को आश्चर्य से देखा और राज कपूर ने देविका रानी के सामने ही पूछ लिया कि तुम्हारे पिता जानते हैं कि तुम फिल्मों में काम करते हो। दिलीप कुमार ने फौरन बात बदल दी और खालसा कॉलेज के दौर की अपनी और राज कपूर  बातें देविका रानी को बताने लगे। बाद में राज और दिलीप कुमार की दोस्ती और परवान चढ़ी। बहुत कम लोगों को मालूम है कि ‘संगम’ फिल्म के लिए राज कपूर ने दिलीप कुमार को ऑफर दिया था जिसे दिलीप साहब ने ठुकरा दिया था। तब दिलीप कुमार और राज कपूर के बीच एक खास तरह का खिंचालव रहता था, प्रतिद्वंदिता थी। जब राज कपूर दिल्ली के एम्स के आईसीयू में भर्ती थे और जिंदगी की जंग लड़ रहे थे तो दिलीप कुमार उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे थे। राज कपूर अचेत थे। दिलीप कुमार ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहने लगे ‘उठ जा राज! अब उठ जा, मसखरापन बंद कर। तू तो बेहतरीन कलाकार है जो हमेशा हेडलाइंस बनाता है। मैं अभी पेशावर से आया हूं और चपाली कबाब लेकर आया हूं। याद है राज हम बचपन में पेशावर की गलियों में साथ मिलकर ये स्वादिष्ट कबाब खाया करते थे।‘ बीस मिनट तक दिलीप कुमार आईसीयू में राज कपूर का हाथ अपने हाथ में लेकर बोलते रहे थे। आज दिलीप कुमार के निधन से एक युग का अंत हो गया। 

https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-dilip-kumar-unknown-facts-personal-and-professional-life-and-career-21806889.html

बदल गई दिलीप कुमार की जिंदगी


अब से कुछ देर पहले हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े नायकों में से एक दिलीप कुमार का निधन हो गया। उनके निधन की खबर सुनते ही 1940 के बाद के दौर के कुछ दिलचस्प प्रसंग की याद ताजा हो गई। दिलीप कुमार के फिल्मों में आने का प्रसंग। दरअसल हुआ ये था कि अपने पति हिमांशु राय के निधन के बाद देविका रानी बांबे टॉकीज को अपने साथियों अमिय चक्रवर्ती और एस मुखर्जी के साथ मिलकर चला रही थीं। थोड़े दिनों तक सब ठीक चला फिर चक्रवर्ती और मुखर्जी में टकराव शुरू हो गया। देविका रानी ने अमिय चक्रवर्ती का साथ दिया और मुखर्जी बांबे टॉकीज छोड़कर चले गए। उसी समय फिल्म ‘किस्मत’ को लेकर अशोक कुमार और अमिय चक्रवर्ती में झगड़ा हो गया और अशोक कुमार ने भी बांबे टॉकीज छोड़ दिया था। उस वक्त अशोक कुमार बेहद लोकप्रिय अभिनेता थे और उनका बांबे टॉकीज छोड़ना देविका रानी के लिए बड़ा झटका था। वो दौर था जब ज्यादातर अभिनेता किसी स्टूडियो में मासिक वेतन पर काम किया करते थे। अशोक कुमार को भी उस समय हजार रुपए प्रतिमाह मिला करते थे। खैर... ये अवांतर प्रसंग है। जब अशोक कुमार बांबे टॉकीज छोड़कर चले गए तब से देविका रानी किसी नए हीरो की तलाश में थीं। जहां भी जाती थीं वहां वो इस संभवना को तलाशती रहती थीं। 

अपनी नई फिल्म की लोकेशन देखने के लिए वो नैनीताल गई हुई थीं। इस बात की बहुत चर्चा होती है कि वहीं उन्होंने एक युवा फल कारोबरी को देखा जो अपने पिता के फलों के बिजनेस के सिलसिले में आया हुआ था। तब देविका रानी ने उनको कहा था कि मुंबई आओ तो मिलना। लेकिन दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा, ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में इस घटना को अलग तरीके से लिखा है और भ्रम को साफ किया। दिलीप कुमार एक दिन चर्च गेट पर खड़े थे तो उनको मनोविज्ञानी डॉ मसानी दिखे। दिलीप कुमार ने उनको अपने कॉलेज में सुना था। वो स्टेशन पर उनके पास पहुंचे और अपना परिचय दिया। डॉ मसानी युसूफ खान से गर्मजोशी से मिले क्योंकि वो उनके पिता से परिचित थे। उन दिनों दिलीप कुमार काम की तलाश में थे। डॉ मसानी ने उनसे कहा कि वो बांबे टॉकीज की मालकिन से मिलने जा रहे हैं और युसूफ खान को भी साथ लेकर चले गए। युसूफ खान जब डॉ मसानी के साथ बांबे टॉकीज के स्टूडियो में पहुंचे तबतक उन्होंने कोई फिल्म भी नहीं देखी थी सिवाय एक डॉक्यूमेंट्री के। डॉ मसानी के साथ जब युसूफ खान देविका रानी के कमरे में दाखिल हुए तो देविका ने उनसे कहा, कुर्सी खींचिए और बैठ जाइए। खान साहब ने लिखा है कि देविका रानी उनको इस तरह से देख रही थीं जैसे स्कैन कर रही हों। इस बीच डॉ मसानी ने युसूफ खान का परिचय करवाया और उनको साथ लाने का उद्देश्य बताया। 

देविका रानी और युसूफ खान की इस मुलाकात के कई वर्जन उपलब्ध हैं। अपनी आत्मकथा के अलावा दिलीप कुमार ने अपने जीवनकाल में प्रकाशित अपनी जीवनी के लिए उसके लेखक बनी रूबेन को भी इस मुलाकात का विवरण दिया था। जब देविका रानी को पता चला कि युसूफ खान काम की तलाश में हैं तो उन्होंने उनसे पूछा कि क्या आप उर्दू जानते हैं। उनके इतना पूछते ही डॉ मसानी ने युसूफ खान के पेशावर कनेक्शन के बारे में विस्तार से देविका रानी को बताया। उर्दू के बाद सीधे वो सिगरेट पर पहुंच गईं और पूछा कि क्या आप सिगरेट पीते हैं तो संकोच के साथ युसूफ खान ने कहा नहीं। अगला प्रश्न था कि क्या कभी अभिनय किया है इसका उत्तर भी आया नहीं। फिर वो प्रश्न आया जिसने युसूफ खान की जिंदगी की राह बदल दी। देविका रानी ने पूछा कि क्या आप अभिनय करना चाहते हैं। जवाब आया हां। इतना सुनते ही देविका रानी ने अपने कमरे में बैठे अपने सहयोगी अमिय की ओर देखते हुए युसूफ खान के सामने 1250 प्रतिमाह के वेतन पर काम करने का प्रस्ताव दे दिया। उस वक्त ये बड़ी रकम थी। युसूफ खान को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे रिएक्ट करें। वहां से हां करके निकल आए। रास्ते में उनके और डॉ मसानी के बीच ज्यादा बातचीत नहीं हुई। वो घर पहुंच गए पर कशमकश जारी रही। वो इस बात पर यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि उनको 1250 प्रतिमाह वेतन मिलेगा। उस वक्त राज कपूर को सिर्फ 170 रु महीने मिला करते थे। इसी उधेड़बुन में वो फिर से डॉ मसानी के घर पहुंचे और उनसे कहा कि 1250 रु सालाना बहुत कम है और इतने कम पैसों में काम करना मुश्किल होगा। डॉ मसानी ने कहा कि 1250 रु तो प्रतिमाह था। खैर युसूफ खान के कहने पर उन्होंने देविका रानी को फिर से फोन किया और ये बात तय हो गई कि 1250 रु प्रतिमाह का प्रस्ताव है। 

अगले दिन जब युसूफ खान बांबे स्टूडियो पहुंचे तो देविका रानी से मिले। देविका रानी ने उनसे कहा कि युसूफ खान नाम नहीं चलेगा इसको बदलना चाहिए। इस बात की जानकारी नहीं मिलती है कि देविका रानी ने नाम बदलने की क्यों सोची लेकिन अनुमान है कि उस वक्त हिंदू मुसलमान के बीच बढते तनाव को देखते हुए देविका रानी ने ऐसा सोचा होगा। उन्होंने युसूफ खान के सामने तीन नाम रखे- जहांगीर, वासुदेव और दिलीप कुमार। बनी रुबेन ने लिखा है कि युसूफ खान ने उनको बताया कि जब ये तीन विकल्प उनके सामने आए तो उन्होंने दिलीप कुमार को चुना जबकि उऩको दूसरा नाम पसंद था। दूसरे जीवनीकारों का मानना है कि युसूफ खान को जहांगीर नाम पसंद आया था लेकिन देविका रानी के किसी सलाहकार ने दिलीप कुमार के नाम पर जोर डाला और युसूफ खान दिलीप कुमार बन गए। देविका रानी को भी दिलीप कुमार नाम पसंद आया क्योंकि ये अशोक कुमार से मिलता जुलता था। उसके बाद की कहानी तो इतिहास है। जब बांबे टॉकीज की फिल्म ‘ज्वार भाटा’ दिलीप कुमार  को मिली तो उनकी उम्र उन्नीस साल पांच महीने थे। आज 98 साल की उम्र में उनके निधन के बाद उनसे जुड़े कई प्रसंग याद आते हैं, कई फिल्मों में उनका शानदार अभिनय भी। 

https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-when-dilip-kumar-met-with-devika-rani-she-offered-him-to-come-in-bollywood-and-she-change-actor-name-yusuf-khan-to-dilip-kumar-verified-21806711.html

Monday, July 5, 2021

बोलती आंखों वाले अभिनेता


अभिनेता संजीव कुमार की बात हो तो दो फिल्मों और उसके बनने के दौर की कई दिलचस्प प्रसंग याद आते हैं। एक फिल्म थी रमेश सिप्पी की ‘शोले’ और दूसरी फिल्म थी के आसिफ की ‘मुहब्बत और खुदा’। ‘शोले’ समय पर रिलीज हो गई लेकिन ‘मोहब्बत और खुदा’ कई वर्षों बाद रिलीज हो सकी। पहले तो गुरुदत्त के निधन की वजह से रुकी फिर के आसिफ की मौत की वजह से इसके पूरा होने में समय लगा। ‘शोले’ की जब शूटिंग हो रही थी उस वक्त संजीव कुमार और हेमा मालिनी के रोमांस के किस्से फिल्मी पत्रिकाओं में छाए रहते थे। ‘शोले’ की शूटिंग के दौरान इन चर्चाओं से बचने के लिए संजीव कुमार उस होटल में नहीं रुके थे जिसमें धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन आदि ठहरे हुए थे। वो एक अलग होटल में रहते थे। जब शूटिंग शुरू हुई तो एक दिन धर्मेन्द्र को लगा कि इस फिल्म का असली हीरो तो गब्बर सिंह है। वो रमेश सिप्पी के पास पहुंचे और जिद करने लगे कि उनको वीरू का नहीं गब्बर सिंह का रोल करना है। रमेश सिप्पी ने काफी समझाया लेकिन धर्मेन्द्र मानने को तैयार नहीं थे। अचानक रमेश सिप्पी राजी हो गए और कहा कि ठीक है ‘गब्बर’ का रोल आप कर लो मैं ‘वीरू’ की भूमिका संजीव कुमार को देता हूं, पर सोच लो फिल्म में वीरू और बसंती की जोड़ी है और संजीव कुमार और हेमा मालिनी फिल्म में रोमांस करते नजर आएंगे। इतना सुनना था कि धर्मेन्द्र फौरन बोले नहीं-नहीं, मेरे लिए वीरू की भूमिका ही ठीक है। मिहिर बोस ने अपनी पुस्तक ‘बॉलीवुड’ में इस दिलचस्प प्रसंग का उल्लेख किया है। बाद के दिनों में जो हुआ वो सभी को पता है। जब हेमा मालिनी से संजीव कुमार और उनके रोमांस के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि ‘वो बेहद व्यक्तिगत और जटिल मामला था’। 

गुरुदत्त के निधन के कई सालों बाद जब के आसिफ ने ‘मोहब्बत और खुदा’ की शूटिंग करने का फैसला लिया तो उऩके सामने अभिनेता के चयन की समस्या थी। उस समय तक संजीव कुमार थिएटर में नाम कमा रहे थे। के आसिफ के किसी दोस्त ने फिल्म की उस भूमिका के लिए संजीव कुमार का नाम सुझाया। दोनों मिले और के आसिफ ने संजीव कुमार को फिल्म के सेट पर बुलाया । अगले दिन संजीव कुमार फिल्म के सेट पर पहुंचे तो के आसिफ ने उनको तैयार होने के लिए कहा और अपने कमरे में चले गए। संजीव कुमार शूटिंग के लिए तैयार होकर सेट पर बैठ गए। के आसिफ कमरे से सेट पर बैठे संजीव कुमार को देख रहे थे जो बेचैन हो रहे थे। के आसिफ यही चाहते थे, वो संजीव कुमार के चेहरे के भावों को पढ़ रहे थे। करीब तीन घंटे के बाद के आसिफ अपने कमरे से निकले और संजीव कुमार को गले लगा लिया। उनको अपनी फिल्म का हीरो मिल गया था। दरअसल संजीव कुमार हिंदी फिल्मों के ऐसे नायक थे जिनकी आंखें भी अभिनय करती थी। उनका चेहरे के भाव और आंखों की भाषा दर्शकों से संवाद करती थीं। संजीव कुमार इकलौते ऐसे अभिनेता थे जो किसी भी रोल में खुद को ढाल लेते थे। वो छवि के गुलाम नहीं थे। ए के हंगल की शागिर्दी में थिएटर करनेवाला ये अभिनेता जब फिल्मों में आया तो वो रूपहले पर्दे के अपनी छवि के चक्कर में नहीं पड़ा। उसके लिए किरदार महत्वपूर्ण होता था। ये साहस संजीव कुमार ही कर सकते थे कि ‘परिचय’ में जया बच्चन के पिता की भूमिका निभाई तो ‘अनामिका’ में जया बच्चन के प्रेमी की। दर्शकों ने दोनों भूमिका में उनको खूब पसंद किया। ‘शोले’ में तो वो जया बच्चन के श्वसुर की भूमिका में थे। फिल्म ‘नया दिन नई रात’ में तो उन्होंने नौ अलग अलग चरित्रों को पर्दे पर साकार कर दिया था। गुजराती कारोबारी परिवार से जब ये रंगमंच पर पहुंचे तो इनका नाम हरिभाई जेठालाल जरीवाला था। थिएटर से फिल्म में पहुंचे तो हरिभाई संजीव कुमार हो गए। संजीव कुमार को कम उम्र मिली लेकिन अपनी अभिनय क्षमता से भारतीय फिल्मों को समृद्ध कर गए । 


माहिम पुलिस थाने से 'मदर इंडिया'


माहिम पुलिस स्टेशन में एक नौजवान पुलिस इंस्पेक्टर तैनात था। उसको फिल्मों में काम करने का बेहद शौक था। उसका दिन पुलिस की नौकरी से अधिक फिल्मों में लगता था। फिल्मी दुनिया में उसके कई दोस्त थे। पुलिस की नौकरी करते हुए उसके कई फिल्मों में छोटी मोदी भूमिकाएं कर भी ली थीं, जिसमें रंगीली, घमंड और लाखों में एक जैसी फिल्में थीं। उसने भले ही कई फिल्मों में काम किया लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उसकी खास पहचान नहीं बन पाई थी और वो माहिम पुलिस थाने में पुलिस की नौकरी ही कर रहा था, पर चाहत तो बड़े फिल्म में केंद्रीय भूमिका करने की थी। सबकी होती है। पुलिस इंसपेक्टर साहब अपनी इस हसरत को अपने मित्रों के साथ साझा किया करते थे। वक्त निकला जा रहा था लेकिन इंसपेक्टर साहब को फिल्मों में अच्छी भूमिका नहीं मिल पा रही थी। एक दिन वो माहिम थाने में बैठे थे, शाम हो चुकी थी। अचानक उनका एक मित्र थान पहुंचा और उनको कल सुबह महबूब खान से मिलने के लिए कहकर चला गया। उस वक्त तक महबूब खान बड़े निर्देशक के तौर पर जाने जाने लगे थे। अगले दिन अपने मित्र के बताए समय पर इंसपेक्टर साहब महबूब खान से मिलने पहुंच गए। वहां उनका वो दोस्त भी मिला। वो महबूब खान का सहायक था। इंसपेक्टर साहब का दोस्त उनको लेकर महबूब खान के पास पहुंचा और उनसे कहा कि ‘ये बहुत अच्छे कलाकार हैं और एक अच्छी फिल्म की तलाश में हैं। इनको मदर इंडिया में कोई रोल दे दीजिए’। उस समय महबूब खान अपनी फिल्म ‘मदर इंडिया’ की कास्टिंग कर रहे थे। महबूब खान ने इंसपेक्टर साहब को ऊपर से नीचे तक देखा और गहरी सांस लेकर पूछा कि क्या आप फिल्मों में शौकिया तौर पर काम करना चाहते हैं या फिर संजीदगी से फिल्मों को अपना करियर बनाना चाहते हैं। इंसपेक्टर साहब ने महबूब खान को कहा कि वो फिल्मों में अभिनय को ही अपना करियर बनाना चाहते हैं, इंसपेक्टर की नौकरी छोड़कर अभिनेता बनने के लिए भी तैयार हैं। इंसपेक्टर साहब ने अपने अंदाज में अपनी बात जारी रखी और अपने मित्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि ‘इसने मुझे बताया कि आप एक बड़ी फिल्म बना रहे हैं और मुझे सलाह दी कि मैं आपसे बात करूं’। 

इस वक्त तक महबूब खान ‘मदर इंडिया’ के लिए नर्गिस, सुनील दत्त और राजेन्द्र कुमार को फाइनल कर चुके थे। उनको ‘शामू’ के रोल के लिए किसी अभिनेता की तलाश थी। उन्होंने फौरन अपने असिस्टेंट से कहा कि इंसपेक्टर साहब का शामू के चरित्र के हिसाब से मेकअप करो, हम इनका स्क्रीन टेस्ट लेना चाहते हैं। जब इंसपेक्टर साहब मेकअप के लिए गए तो उनके एक दूसरे सहायक ने महबूब खान से कहा कि ये शख्स शामू के रोल के लिए उपयुक्त नहीं होगा क्योंकि इसके चेहरे पर एक आक्रामकता है। अनीत पांध्ये ने अपनी पुस्तक में इस प्रसंग को विस्तार से लिखा है। थोड़ी देर बाद इंसपेक्टर साहब का स्क्रीन टेस्ट हुआ और वो पास हो गए। ये इंसपेक्टर साहब राज कुमार थे। ‘मदर इंडिया’ रिलीज होने के बाद की कहानी तो इतिहास बन गई है। शामू के रोल से राज कुमार को जो पहचान मिली उसने उनको काफी काम दिलवाया और वो कुछ ही समय बाद शीर्ष के अभिनेताओं में शुमार होने लगे। फिल्म ‘वक्त’ ने तो उनको बेहद लोकप्रिय बना दिया। बाद के दिनों में तो राज कुमार को लेकर अनेक तरह के किस्से फिल्मी दुनिया में मशहूर हुए। उनकी संवाद अदायगी से लेकर उनकी अभिनय कला अनूठी थी। सौदागर फिल्म में जब वो शूटिंग के लिए आते थे तो उनके साथ चार गाड़ियों का काफिला चला करता था। एक में राज कुमार बैठते थे, दूसरी गाड़ी में उनके सहायक और बाकी दो गाड़ियों में उनके कपड़े, जूते, हैट इत्यादि रखे जाते थे। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में इस प्रसंग को बेहद रोचक तरीके से लिखा है। आज से पच्चीस साल पहले 3 जुलाई को ये बेहतरीन और स्टाइलिश अदाकार इस दुनिया को अलविदा कह गया।  

(https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-interesting-facts-about-legendary-actor-rajkumar-in-mother-india-movie-entry-21795172.html)

Saturday, July 3, 2021

अर्धसत्य की ओट में भ्रम का प्रपंच


देश की फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे झंडाबरदार हैं जो किसी न किसी मसले पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने की फिराक में रहते हैं। चाहे वो फिल्मी से जुड़ी संस्थाओं का विलय हो, ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म के लिए नियमन का मुद्दा हो या कुछ वर्ष पीछे जाएं तो असहिष्णुता का मामला हो या नागरिकता संशोधन कानून की बात हो । बॉलीवुड के कुछ चेहरे हस्ताक्षर अभियान से लेकर बयानबाजी तक में शामिल हो जाते हैं। इनमें से तो एक अभिनेत्री ऐसी भी हैं जिन्होंने इमरजेंसी के समर्थन में उस समय बयान भी दिया था। अब ये सब एक बार फिर से केंद्र सरकार को घेरने के लिए एकजुट नजर आ रहे हैं। मामला है सिनेमेटोग्राफी एक्ट में प्रस्तावित संशोधन का। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सिनेमेटोग्राफी एक्ट में प्रस्तावित संशोधन पर आम जनता की राय आमंत्रित की थी। मंत्रालय के इस कदम को इन सब ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर बयान और हस्ताक्षर अभियान आरंभ कर दिया। लेख लिखने लगे। अपने बयानों में और लेख से इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है जैसे सरकार केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पंगु करना चाह रही है। कहा ये जा रहा है कि सरकार केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्मों को जनता की शिकायत के बाद फिर से प्रमाणित करने का अधिकार अपने पास लेना चाहती है। कुछ लोग तो सुपर सेंसर जैसी बातें भी करने लगे हैं। ये सारी बातें आशंकाओं पर आधारित हैं, तथ्यों पर नहीं। अपने बयानों से लेकर लेख में वो अर्धसत्य का प्रदर्शन करके जनता को लगातार भ्रमित कर रहे हैं। 

सरकार के खिलाफ जो माहौल बनाया जा रहा है उसका आधार सिनेमैटोग्राफी एक्ट के अनुभाग छह के उपखंड एक में संशोधन है। इस प्रस्तावित संशोधन से फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए मिले प्रमाण-पत्र के पुनरीक्षण की शक्ति केंद्र सरकार को मिलती है। इसमें ये प्रस्तावित किया गया है कि केंद्र सरकार को ये अधिकार होगा कि वो केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से सर्टिफाइड फिल्म को फिर से बोर्ड के चेयरमैन के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकती है। जो लोग इस आधार पर सरकार की आलोचना कर रहे हैं और सुपर सेंसर की बात उठा रहे हैं वो लोग इसके आगे की पंक्ति को नजरअंदाज कर रहे हैं। प्रस्तावित संशोधन में कहा गया है कि सरकार के पास अगर सिनेमेटौग्राफी एक्ट के खंड पांच बी (1) के उल्लंघन की शिकायत आती है उसके अंतर्गत ही सरकार ये कदम उठा सकती है। अब यहां ये जानना जरूरी है कि सिनेमैटोग्राफी एक्ट का खंड पांच बी(1) क्या है? इसके अनुसार अगर किसी भी फिल्म से या उसके किसी हिस्से से राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और अन्य राष्ट्रों के संबंधों पर असर पड़ता है तो उसको सर्टिफाई नहीं किया जा सकता है। इसमें ही आगे उल्लेख है कि अगर किसी फिल्म से सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता या अदालत की अवमानना होती हो तो उसका प्रमाणन नहीं हो सकता है। प्रस्तावित संशोधन में इसको ही स्थापित करने की बात की जा रही है जो सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 में पहले से मौजूद था। बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्म को केंद्र सरकार पुनर्विचार के लिए बोर्ड को नहीं भेज सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2000 के अपने एक फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अपने उसी फैसले में ये भी कहता है कि विधायिका किसी खास केस में न्यायिक या कार्यकारी आदेश को उचित कानून बनाकर इसको रद्द कर सकती है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय का तर्क है कि कई बार सरकार को ये शिकायत मिलती है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्म से भी सिनेमैटोग्राफी एक्ट के खंड पांच बी का उल्लंघन होता है, लिहाजा वो अपने पास किसी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए दिए जानेवाले प्रमाणपत्र को पुनर्विचार के लिए बोर्ड के चेयरमैन को भेजने का अधिकार रखना चाहती है। इस वजह से सिनेमैटोग्राफी एक्ट में बदलाव की आवश्यकता है। अगर समग्रता में इस पर विचार करें तो ये बात सामने आती है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय सिनेमैटोग्राफी एक्ट में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले की व्यवस्था को बहाल करना चाहती है। अगर ये संशोधन हो भी जाता है तो सुप्रीम कोर्ट का वो आदेश तो तब भी प्रभावी है कि सरकार किसी खास केस में ही अपनी इस शक्ति का प्रयोग कर सकती है। तो फिर इसमें तानाशाही जैसी बात या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात की बात कहां से आती है। 

जब से मामला सामने आया है तब से ये भी कहा जा रहा है कि 2016 में श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में बनाई गई कमेटी ने भी इस बारे में कुछ नहीं कहा है। बेनेगल कमेटी ने अपनी जो रिपोर्ट सौंपी थी उसकी सिफारिशों में बिंदु संख्या 5.2 में कमेटी सिनेमैटोग्राफी एक्ट के खंड 5 बी के उल्लंघन की बात करती है और स्पष्ट रूप से कहती है कि अगर इस खंड का उल्लंघन होता है तो किसी फिल्म को प्रमाण पत्र नहीं दिया जा सकता है। बेनेगल कमेटी का गठन तब किया गया था जब अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री थे। उस कमेटी में श्याम बेनेगल के अलावा कमल हासन, राकेश ओम प्रकाश मेहरा, गौतम घोष जैसे लोग शामिल थे। इनमें से कई तो भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा के विरोधी माने जाते हैं, लेकिन उन्होंने भी पांच बी को हटाने की बात नहीं की। अब श्याम बेनेगल को भी ये प्रस्तावित संशोधन अर्थहीन लगता है। वो भी इसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं। जनता को अर्धसत्य बताकर बरगलाने की कोशिश हो रही है। 

दरअसल अगर इस पूरे मामले पर समग्रता में तथ्यों के आधार पर विचार करें तो ये मुद्दा न तो सुपर सेंसर का है, न ही अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा है और न ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को पंगु करने का है। अगर विचार ही करना है तो केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के क्रियाकलापों में सुधार पर करना चाहिए। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को और शक्तिशाली और समयानुकूल बनाने की बात होनी चाहिए। अभी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन और बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति सूचना और प्रसारण मंत्रालय करती है। अगस्त 2017 में मशहूर गीतकार प्रसून जोशी को बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया था उसके साथ ही बोर्ड का भी पुनर्गठन हुआ था। प्रसून जोशी की अगुवाई में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने कई जटिल मसलों का हल निकाला। उनके पहले पहलाज निहलानी बोर्ड के चेयरमैन थे, हर दिन कोई न कोई विवाद होता था। प्रसून जोशी के आने के बाद सभी विवाद थम गए। अगर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन और सदस्य संजीदा होंगे तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि सरकार किसी भी फिल्म के प्रमाण पत्र को पुनर्विचार के लिए बोर्ड को भेजे। इस बात की भी आवश्यकता है कि बोर्ड के क्षेत्रीय सदस्यों का चयन करते समय सावधानी बरती जाए। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को विस्तार की भी आवश्यकता है। फिल्मों की संख्या इतनी बढ़ गई है लेकिन बोर्ड में उसके अनुपात में सुविधाएं या कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ाई गई हैं। यह सब कुछ तभी संभव हो पाएगा जब 1952 के एक्ट में समय के अनुकूल बदलाव होगा। मनोरंजन की दुनिया का स्वरूप बहुत बदल गया है और बदलते समय के हिसाब से पूरे एक्ट में बदलाव पर विमर्श होना चाहिए। इस काम में सूचना और प्रसारण मंत्री को पहल करनी होगी। ये पहल तभी सफल हो पाएगी जब मंत्रालय में बैठे यथास्थिवाद के पैरोकारों को उचित स्थान पर भेजा जाएगा। 


Saturday, June 26, 2021

कहानियों के बदलते तेवर और कलेवर


एक कार्यक्रम के दौरान अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने हिंदी फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स की वजह से फिल्मों का लोकतांत्रीकरण हुआ है। प्रियंका चोपड़ा के अलावा अमेजन प्राइम से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित ने भी ओटीटी को लेकर एक अहम बात कही। उनके अनुसार ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए कहानियों के चयन में उसकी प्रमाणिकता के साथ-साथ कहानी में स्थानीयता पर भी जोर रहता है। गाहे बगाहे ओटीटी पर रिलीज होनेवाली फिल्मों और वेब सीरीज की कहानियों और उसके स्वरूप पर बात होती रही है। पिछले दिनों इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। प्रियंका चोपड़ा जब फिल्मों के लोकतांत्रिकरण की बात करती हैं तो उसके कई आयाम सामने आ जाते हैं। कहांनी के स्तर पर अगर हम देखें तो बॉलीवुड में उस तरह की कहानियों को निर्माता मिलने लगे हैं जिनको पहले कोई हाथ भी नहीं लगाता था। पहले फिल्मों में एक नायक होता था, एक नायिका होती थी, चार पांच बेहद दिलकश गाने होते थे, कुछ फाइट सीन होते थे और फिर फिल्म का सुखांत हो जाता था। उसके भी पीछे जाएं तो हिंदी फिल्मों में धार्मिक कहानियों को प्राथमिकता मिलती थी और उन कहानियों को दर्शक भी खूब मिलते थे। बाद में पश्चिमी देशों में बनने वाली फिल्मों के प्रभाव में हिंदी फिल्मों में हिंसा और मारपीट का जोर बढ़ा। एक्शन मूवी का विशेषण ही आरंभ हो गया था। इसी दौर में हिंदी फिल्मों ने स्टारडम भी देखा, सुपरस्टार से लेकर मेगास्टार तक हुए, जिनकी उपस्थिति फिल्म के हिट होने की गारंटी मानी जाती थी। निर्माता उनको मुंहमांगी रकम देने को तौयार रहते थे। बीच में कुछ निर्माताओं ने यथार्थवादी फिल्में भी बनाई और उसको एक विचारधारा विशेष से जोड़कर समांतर सिनेमा से लेकर कला फिल्मों तक का नाम दिया। उनमें यथार्थ तो होता था पर फिल्में लोकप्रिय नहीं होती थी। इन कथित यथार्थवादी फिल्मों के बनाने वाले अपनी फिल्मों की लोकप्रियता को लेकर अधिक चिंता भी नहीं करते थे वो तो विचार को आगे बढ़ाने की फिराक में रहते थे। ये अलग से शोध का विषय है कि कला फिल्मों के निर्माता नुकसान कैसे झेलते थे, क्या उस समय सरकार फिल्म बनाने के लिए पैसे देती थी, जिसके बल पर उनको दर्शकों की फिक्र नहीं होती थी। खैर ये अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी और चर्चा होगी। 

प्रियंका चोपड़ा जब फिल्मों के लोकतांत्रीकरण की बात करती हैं तो मुझे लगता है कि वो बहुत हद तक सही कह रही हैं और फिल्मी दुनिया के ट्रेंड की ओर इशारा कर रही हैं। ओटीटी पर जो सीरीज आ रहे हैं उनमें कहानी प्रमुख हो गई है। ये आवश्यक नहीं है कि सीरीज को हिट कराने के लिए बड़े स्टार की मौजूदगी आवश्यक हो। अभी पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म ऑल्ट बालाजी पर एक वेबसीरीज आई थी जिसका नाम था ‘बिच्छू का खेल’। बिच्छू का खेल अमित खान के उपन्यास पर आधारित है जिसकी कहानी बनारस की है। इस वेब सीरीज के डॉयलॉग लिखे हैं युवा लेखक क्षितिज राय ने। क्षितिज राय के संवादों ने सीरीज में बनारस और बनारसीपने को जीवंत कर दिया है। ‘वक्त अच्छा हो तो कुत्ता भी कोक पीता है’ जैसे कई संवाद इसमें हैं। बनारस की बोली से लिए गए शब्दों का भी क्षितिज ने संवाद में ठीक-ठाक उपयोग कर लिया है। इस सीरीज के हीरो हैं दिव्येन्दु शर्मा। ना कोई बड़ा नाम, न कोई सुपर स्टार का तमगा लेकिन अपनी अदायगी के बल पर पूरी वेब सीरीज में दर्शकों को बांधने में कामयाब रहते हैं। एक और वेब सीरीज आई ‘काठमांडू कनेक्शन’। कहानी और उसके किरदार लखनऊ, मुंबई, दिल्ली से लेकर काठमांडू तक में घूमते हैं। न्यूज चैनल भी इसमें आता है, इस वेब सीरीज के लेखक सिद्धार्थ मिश्रा न्यूज चैनलों से जुड़ी कई घटनाओं को भी बेहद खूबसूरती के साथ कहानी में पिरो देते हैं। ये छोटी घटनाएँ होती हैं लेकिन होती दिलचस्प है। कहानी 1993 के मुंबई धमाकों की जांच से आरंभ होती है लेकिन फिर परत दर परत खुलती है और उसके कई आयाम दर्शकों के सामने आते हैं। इसमें अमित सियाल, गोपाल दत्त जैसे कलाकार हैं पर इसको देखते हुए कभी भी ये नहीं लगता है कि आप अमित सियाल को देख रहे हैं या गोपाल दत्त को देख रहे हैं। कहानी के पात्रों की रचना इतनी मजबूती से की जाती है कि दर्शक नायक को भूलकर पात्र के नाम के साथ जुड़ जाता है। इसमें डीसीपी समर्थ कौशिक या सनी को ही लोग याद रखते हैं। इस लिहाज से देखें तो प्रियंका चोपड़ा ठीक कह रही है कि फिल्मों का लोकतांत्रिकरण हुआ है। बल्कि यहां तक कहा जा सकता है कि फिल्मों में जो वर्ण व्यवस्था थी उसको ओटीटी प्लेटफॉर्म ने तोड़ा है। वर्ण व्यवस्था यानि ये ए लिस्टर हैं, ये बी लिस्टर हैं आदि आदि। यहां अब कोई सुपर स्टार नहीं है, कहानी ही स्टार है। यहां कोई ऐसा स्टार नहीं है कि उसकी उपस्थिति मात्र सफलता की गारंटी है। यहां तो कहानियों के किरदार हैं जिसको दर्शक पसंद करते हैं या नापसंद करते हैं । सैफ अली खान ने भी कुछ वेब सीरीज में काम किया लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि उसको देखने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दर्शकों की बड़ी संख्या पहुंची और ‘बिच्छू का खेल’ या ‘काठमांडू कनेक्शन’ को देखने के लिए कम। थोडा बहुत का अंतर हो सकता है। लेकिन जितना ‘घोउल’ को देखा होगा उससे कम लोगों ने ‘बिच्छू का खेल’ नहीं देखा होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। इस मसले पर प्रियंका चोपड़ा का ही उदाहरण दिया जा सकता है। प्रियंका चोपड़ा बेहद सफल अभिनेत्री हैं। हिंदी फिल्मों की सबसे महंगी नायिका के तौर पर उनका नाम लिया जाता था, वॉलीवुड में भी काम रही हैं। पिछले दिनों उनकी फिल्म ‘व्हाइट टाइगर’ ओटीटी पर रिलीज हुई । ये फिल्म अरविंद अडिगा के अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित थी। लेकिन इसको अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 

दरअसल अब अगर हम विचार करें तो ये पाते हैं कि मनोरंजन की दुनिया पूरी तरह से बदलती जा रही है। उसकी कहानियां बदल गई हैं। उसको कहने का अंदाज भी बदल गया है। अब ज्यादा यथार्थवादी कहानियों पर फिल्म या वेब सीरीज बन रही हैं। इस तरह की कहानियों से दर्शक खुद का जुड़ाव महसूस करते हैं, उनको लगता है कि वो इन कहानियों से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। जब यथार्थ के नाम पर जब कहानी को अनावश्यक विस्तार दिया जाता है तो दर्शक फौरन उससे दूर चले जाते हैं। कुछ दिनों पहले एक वेब सीरीज आई थी ‘स्कैम 1992’। ये शेयर दलाल हर्षद मेहता और उसके मार्फत 1992 के शेयर बाजार घोटाले की कहानी कहती है। वेब सीरीज देवाशीष बसु और सुचेता दलाल की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘द स्कैम, हू वन, हू लास्ट, हू गाट अवे’ पर आधारित है। इसके संवाद कई लोगों ने मिलकर लिखे हैं लेकिन दस एपिसोड में कहानी कहने के चक्कर में सीरीज बोझिल और उबाऊ हो गया है। कहना न होगा कि यथार्थवादी कहानियों या सत्य घटनाओं पर वेब सीरीज या फिल्म बनाते वक्त फिल्म निर्माण की बुनियादी बातों का तो ध्यान रखना ही होगा। ओटीटी ने न सिर्फ फिल्मों या वेब सीरीज का लोकतांत्रिकरण किया है बल्कि उसने दर्शकों को भी पहले से ज्यादा मुखर बना दिया है। अब वो अपनी पसंद और नापसंद खुलकर व्यक्त करने लगे हैं। उनके पास इंटरनेट मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म भी हैं जो उनको ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से मुखरित होने का मंच और अवसर दोनों देते हैं। सिनेमा का ये बदलता स्वरूप दर्शकों को भा भी रहा है।

Saturday, June 19, 2021

भारतीय विचार और दृष्टिकोण की जरूरत


दिनांक 15 जून 2021, समय शाम छह बजकर 12 मिनट। केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने एक ट्वीट किया, ‘आज साहित्य अकादमी के कामकाज की विस्तृत समीक्षा की। हाई पावर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जानकारी देने का निर्देश दिया।‘ संस्कृति मंत्री ने अपने इस ट्वीट को प्रधानमंत्री कार्यालय, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जे पी नड्डा, संस्कृति मंत्रालय, भारतीय जनता पार्टी और मध्य प्रदेश बीजेपी के अलावा कुछ अन्य ट्वीटर हैंडल को भी टैग किया। अपने इस ट्वीट के साथ मंत्री ने चार फोटो भी पोस्ट किए। इस ट्वीट से पता चला कि संस्कृति मंत्री दिल्ली के रवीन्द्र भवन स्थित साहित्य अकादमी के मुख्यालय पहुंचे थे। वहां उन्होंने साहित्य अकादमी के कामकाज की समीक्षा की। इस ट्वीट में उन्होंने हाई पावर कमेटी की बात करके पुरानी याद ताजा कर दी। हाई पावर कमेटी का गठन संस्कृति मंत्रालय ने अपने कार्यालय पत्रांक संख्या 8/69/2013/अकादमी दिनांक 15 जनवरी 2014 को किया था। इस कमेटी का गठन संसद की संस्कृति मंत्रालय की स्थायी समिति के प्रतिवेदन संख्या 201 के आधार पर करने की बात की गई थी। इसके चेयरमैन पूर्व संस्कृति सचिव अभिजीत सेनगुप्ता थे। उनके अलावा इसमें सात अन्य सदस्य थे, रतन थिएम, नामवर सिंह, ओ पी जैन, सुषमा यादव, संजीव भार्गव और संस्कृति मंत्रालय के तत्कालीन अतिरिक्त सचिव के के मित्तल। इस कमेटी का मुख्य काम संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र की कार्यप्रणाली की समीक्षा और उसको बेहतर करने के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत करना था। इस कमेटी ने एक सौ तीस पन्नों की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

अब मंत्री जी ने ‘हाई पावर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर जानकारी देने का निर्देश’ दिया है। यह अच्छी बात है, पर हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि इस कमेटी के सदस्यों में से कितने लोग वामपंथ की विचारधारा की जकड़न में थे और सांस्कृतिक संस्थाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण क्या था? नामवर सिंह और रतन थिएम की विचारधारा के बारे में तो सबको ज्ञात है ही। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ही स्वीकार किया है कि सरकार ने उसको तीन महीने में अपने सुझाव देने को कहा था लेकिन तीन सप्ताह के कार्य विस्तार के साथ ये रिपोर्ट पांच मई 2014 को तैयार कर दी गई। पांच मई 2014 को ही इस कमेटी के चेयरमैन का हस्ताक्षर इस रिपोर्ट पर है। इस वजह से माना जा सकता है कि इसके एक-दो दिन बाद ये रिपोर्ट सरकार को सौंप दी गई होगी। पांच मई 2014 वो तिथि है जब देश में लोकसभा चुनाव चल रहे थे और पांच चरणों का मतदान संपन्न हो चुका था। चुनाव के बीच और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के पहले संस्कृति मंत्रालय को ये रिपोर्ट सौंप दी गई। प्रश्न ये उठता है कि इतने महत्वपूर्ण रिपोर्ट को तैयार करने और सौंपने में इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई गई। जिस दिन ये रिपोर्ट फाइनल हुई उस दिन इसके एक सदस्य रतन थिएम अनुपस्थित थे और उन्होंने इंफाल से पत्र लिखकर इसकी संस्तुतियों पर अपनी सहमति जताई। इतनी जल्दबाजी क्यों? 

इस रिपोर्ट को लेकर प्रश्न यह भी उठता है कि क्या सिर्फ तीन या चार महीने में इतने महत्वपूर्ण संस्थाओं के क्रियाकलापों का आकलन और सुझाव देना संभव है? कमेटी खुद ये बात स्वीकार करती है कि संस्कृति मंत्रालय को बगैर प्रशासनिक दायित्वों को और कमेटी के तौर तरीकों को तय किए हाई पावर कमेटी नहीं बनानी चाहिए थी। इस हाई पावर कमेटी के पहले 1988 में हक्सर कमेटी बनी थी जिसने 1990 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। हक्सर कमेटी ने पूरे देशभर का दौरा किया था और संबंधित लोगों से बातचीत करके दो साल में अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। उसके पहले भी संस्कृति मंत्रालय ने अकादमियों के कामकाज के आकलन के लिए खोसला कमेटी बनाई थी। इस कमेटी का गठन भी 19 फरवरी 1970 को हुआ था और उसने अपनी रिपोर्ट 31 जुलाई 1972 को सौंपी थी। संस्थाओं का आकलन करना, उसके संविधान का अध्ययन करना, उसकी परंपराओं को देखना समझना और फिर सुझाव देना बेहद श्रमसाध्य कार्य है, जिसके लिए समय तो चाहिए था। एक और बात को रेखांकित करना आवश्यक है जो कि इस कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में ही कही है। वो ये कि ये ‘हाई पावर कमेटी संस्कृति मंत्रालय के आदेश से बना दी गई इसके लिए सरकार की तरफ से कोई प्रस्ताव पास नहीं किया गया था, जैसे कि पूर्व में परंपरा रही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि संस्कृति मंत्रालय को अपने कार्यालय आदेश पर बनाई गई हाई पावर कमेटी और सरकार के प्रस्ताव पर बनी कमेटी का अंतर मालूम नहीं था।‘

इस हाई पावर कमेटी को सुझावों को सात साल बीत चुके हैं। नरेन्द्र मोदी को दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री का पद संभाले दो साल बीत चुके हैं। संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल भी दो साल से संस्कृति मंत्री का दायित्व संभाल रहे हैं। 15 जून को संस्कृति मंत्री जिस रवीन्द्र भवन स्थित साहित्य अकादमी गए थे और वहां के काम काज का जायजा लिया था। अच्छा होता कि मंत्री जी उसी भवन में स्थित संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी भी गए होते तो उनको इस बात का एहसास होता कि उनके मंत्रालय से संबद्ध संस्थाएं कैसे काम कर रही हैं। संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी में चेयरमैन नहीं है। ललित कला अकादमी को लेकर तो कई मुकदमे भी अदालत में चल रहे हैं। बेहतर तो ये भी होता कि मंत्री जी सड़क पार करके राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय भी हो आते जहां इन दिनों करीब तीन साल बाद निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सरगर्मी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक के चयन के लिए इस महीने की 24 और 25 तारीख को साक्षात्कार तय किए गए हैं। निदेशक के चयन के लिए बनाई गई समिति को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है, क्योंकि इसमें तीन सदस्य महाराष्ट्र से जुड़े हैं। सतीश आलेकर और विजय केंकड़े के अलावा दर्शन जरीवाला का कार्यक्षेत्र भी महाराष्ट्र ही है। आरोप स्वाभाविक हैं कि किसी अखिल भारतीय संस्था के निदेशक की खोज करने के लिए सिर्फ एक प्रदेश से जुड़े लोगों का पैनल क्यों बनाया गया है। विविधता की अपेक्षा रखना गलत नहीं है और ऐसा होता तो आरोप भी नहीं लगते। 

मंत्री जी जिस हाई पावर कमेटी की बात कर रहे हैं उसने संस्कृति मंत्रालय को लेकर भी कुछ सुझाव दिए हैं। इसमें से दो सुझाव बेहद अहम हैं जिसपर तत्काल अमल करने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। पहला सुझाव है कि संस्कृति मंत्रालय के सभी कर्मचारियों को सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र, दिल्ली में एक सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए जिससे कि वो देश के सांस्कृतिक परिवेश को समझ सकें। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रशासन की बुनियादी ट्रेनिंग भी हो। दूसरा सुझाव है कि संस्कृति मंत्रालय में एक आनेवाले नए अधिकारियों और कर्मचारियों को मंत्रालय से संबंधित एक नोट दिया जाना चाहिए जिसमें भारतीय सांस्कृतिक सिद्धातों और कला संबंधित जानकारी हो। ये सुझाव महत्वपूर्ण इसलिए है कि संस्कृति मंत्रालय में कभी रेलवे सेवा के तो कभी डाक सेवा के तो कभी राजस्व सेवा के अफसरों की नियुक्ति हो जाती है। ये गलत नहीं है लेकिन उन अफसरों को संस्कृति से जुड़ी बारीकियों से परिचित कराने का उपक्रम तो होना ही चाहिए। अगर अफसर सांस्कृतिक प्रशासन की बारीकियों को या कला की महत्ता से परिचित नहीं होंगे तो इसको भी अन्य प्रशासनिक मसलों की तरह देखेंगे जिससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाएंगे। सात साल पुरानी हाई पावर कमेटी की जगह बेहतर हो कि एक नई कमेटी बने जो बहुत सोच समझकर, बगैर किसी हड़बड़ी के, समग्रता में अपनी रिपोर्ट दे और फिर उसकी प्रगति रिपोर्ट के बारे में बात हो और उसकी दृष्टि और दृष्टिकोण दोनों भारतीय हो। 

Saturday, June 12, 2021

बचकानी गलतियों से बचें फिल्मकार


हाल में राजनीति की पृष्ठभूमि पर बनी दो वेबसीरीज, ‘महारानी’ और ‘द फैमिली मैन’ आई। ‘महारानी’ बिहार की राजनीति को केंद्र में रखती है। ये कहानी लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी की कहानी से प्रेरित है। इसमें ये लिखा भी गया है कि कैसे एक अनपढ़ स्त्री एक राज्य को मुख्यमंत्री के तौर पर संभालती है। कहती भी है कि जो औरत घर संभाल सकती है कि वो राज्य भी और देश भी संभाल सकती हैं। इसमें चारा घोटाला से लेकर बिहार की राजनीति के खूनी दौर को भी रेखांकित किया गया है। रणवीर सेना और नक्सलियों के बीच खूनी खेल की कहानी भी साथ-साथ चलती है। इसके कुछ दिन पहले एक वेब सीरीज और आई थी जिसका नाम था ‘तांडव’। इस वेब सीरीज की कहानी भी राजनीति को केंद्र में रखती है। इसके कुछ दृश्यों को लेकर भारी विवाद हुआ था और मामला कोर्ट में भी पहुंचा था। इसी दौरान एक दलित महिला के जीवन के संघर्षों पर आधारित एक फिल्म आई थी ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ । इसकी कहानी एक दलित महिला के इर्द गिर्द घूमती है जो एक दिन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनती हैं। उपरोक्त तीनों वेब सीरीज का अगर हम विश्लेषण करें तो एक बात स्पष्ट रूप से समझ में आती है कि राजनीतिक घटना को या राजनीतिक चरित्रों को केंद्र में रखकर फिल्म बनाना बेहद मुश्किल काम है। इसकी कहानी और संवाद लिखने से लेकर पात्रो के चयन और फिल्मांकन में बहुत सतर्कता की जरूरत होती है। लेखक और निर्देशक के लिए यह बहुत आवश्यक होता है कि उसको राजनीति की बारीकियों की समझ हो, संसदीय परंपरा का सामान्य ज्ञान हो, दलीय परंपरा और अफसरशाही की कार्यशैली के बारे में जानकारी हो। 

‘महारानी’ वेबसीरीज को देखें तो लेखक और निर्देशक दोनों एक पर एक बचकानी गलतियां करते चलते हैं। इस सीरीज में रानी भारती सरकार के खिलाफ चार-पांच महीने के अंदर ही दूसरा अविश्वास प्रस्ताव आ जाता है। ये छोटी सी बात लग सकती है लेकिन जो इस सीरीज को देख रहे होंगे उनके दिमाग में यह बात जरूर उठेगी कि हमारे देश की संसदीय व्यवस्था में किसी भी सरकार के खिलाफ दो अविश्वास प्रस्ताव के बीच का अंतराल छह महीने से कम नहीं हो सकता है। इसमें ही निर्देशक ये दिखाता है कि राज्य का वित्त सचिव अकेले ही छानबीन करने पहुंच जाता है। जिलाधिकारी जब दस्तावेज देने में बहानेबाजी करते हैं तो वो रात में अपने एक सहयोगी के साथ उनके आफिस पहुंच जाते हैं और चौकीदार को चकमा देकर कार्यालय का ताला तोड़कर उसमें घुसते हैं। वहां उनपर गोली चलती है, वित्त सचिव बच जाते हैं, लेकिन किसी को कानोंकान खबर नहीं होती। ये सारी घटनाएं इतनी बचकानी हैं कि इसको काल्पनिक कारर देकर भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है। ये तो लेखक की कमियों को, उसके अज्ञान को उजागर करनेवाले प्रसंग या दृश्य हैं। महारानी में ऐसे कई प्रसंग हैं। 

इसी तरह से ‘तांडव’ वेब सीरीज में एक प्रसंग है जहां एक ब्लैकमेलर बड़े आराम से नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक के इलाके में आता है और कूड़ेदान में कोई सामान रखकर चला जाता है। नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक दिल्ली का वो इलाका है जहां प्रधानमंत्री कार्यालय है, वित्त मंत्रालय, रक्षा और गृह मंत्री का दफ्तर है। ये इलाका बेहद सुरक्षित है जो चौबीस घंटे सुरक्षा बलों की निगरानी में रहता है और वहां आसानी से कोई सामान रखकर चला जाए ये आसान नहीं। इस तरह के कई प्रसंग ‘तांडव’ में हैं जो ये संकेत देते हैं कि लेखक को इन विषयों की बारीकियों की जानकारी नहीं है या उसने लापरवाही में वो सब प्रसंग लिखे या पर्याप्त शोध नहीं किया। अपेक्षाकृत ‘द फैमिली मैन’ की घटनाएं और प्रसंग यथार्थ के ज्यादा करीब प्रतीत होती हैं। इसमें लेखक ने दृश्यों को लिखने के पहले उस विषय के बारे में सूक्ष्मता से अध्ययन किया और फिर लिखा है। चाहे वो प्रधानमंत्री के साथ खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों की बैठक का संवाद हो या फिर सुरक्षा संबंधी तैयारियों का विवरण हो। 

दरअसल जब फिल्मों या वेब सीरीज का लेखन होता है तो इसके ज्यादातर लेखकों से एक चूक होती है कि वो पहले क्लाइमैक्स सीन सोच लेते हैं और फिर वहां तक पहुंचने का रास्ता तलाशते हैं। जैसे ‘तांडव’ में ये सोच लिया गया कि हमारी व्यवस्था एकदम खराब है, राजनीति में सबकुछ साजिशों पर ही चलता है, राजनीति में आनेवाली स्त्रियां हर तरह के समझौते करती हैं आदि आदि। अब इन सबको सही ठहराने के लिए कहानी में इससे जुड़े प्रसंग ठूंसे जाते हैं। ‘महारानी’ में भी ये दिखता है कि लेखक ने पहले ही तय कर लिया कि भीमा भारती को चारा घोटाले के लिए परिस्थिति और राज्यपाल ने मजबूर किया था। फिर उसके हिसाब से कहानी गढ़ी गई जो अविश्वसनीय हो गई। दरअसल कहानी लेखन की यह प्रविधि ही दोषपूर्ण है। कहानी का प्रवाह सहज होना चाहिए या किसी राजनीतिक घटना पर फिल्म या वेबसीरीज बना रहे हैं तो उस दौर में घटी घटनाओं के क्रम को ध्यान में रखकर कहानी का विकास करना चाहिए, दृश्यों की संरचना करनी चाहिए। इन राजनीतिक वेब सीरीज या हाल की फिल्मों को देखकर ये लगता है कि हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज के सभी वर्गों को न्याय मिल पाए ये संभव ही नहीं है। ज्यादातर अज्ञानतावश और कुछ एजेंडा के तहत देश की व्यवस्था और संसदीय प्रणाली को भी नकार दिया जाता है। इसके पहले भी इस स्तंभ में इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि कैसे समाज के एक वर्ग के मन में देश और पुलिस व्यवस्था के खिलाफ जहर भरने का काम इन वेब सीरीज के माध्यम से किया जाता रहा है। 

दरअसल राजनीति पर फिल्म बनाना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। रोमांटिक फिल्में बनाना, घटना प्रधान फिल्में बनाना, धार्मिक फिल्में बनाना अपेक्षाकृत आसान हैं। जब आप राजनीति पर फिल्म बनाते हैं तो आपकी कल्पनाशक्ति और यथार्थ को कहने की संवेदना की परीक्षा होती है। आपको दोनों के बीच संतुलन कायम रखना पड़ता है। इस संदर्भ में मुझे याद पड़ता है गुलजार की फिल्म ‘आंधी’ । आंधी की नायिका में इंदिरा गांधी की छवि देखी गई थी। उनकी वेशभूषा से फिल्मकार ने भी यही छवि गढ़ने की कोशिश भी की थी। इस फिल्म की नायिका मालती देवी का जो महात्वाकांक्षी चरित्र गुलजार ने गढ़ा वो यथार्थ के बहुत करीब दिखता है। वो चरित्र स्वार्थी और महात्वाकांक्षी तो है लेकिन अपने परिवार के साथ जब होती है तो उसकी संवेदना को भी फिल्मकार उभारते हैं। यह कौशल ही फिल्मकार को भीड़ से अलग करता है। इसी तरह फिल्म ‘आंधी’ में हमें संसदीय व्यवस्था के बारे में कोई गलती, बचकानी गलती नजर नहीं आती है। मालती देवी जब विपक्ष के नेता चंद्रसेन से या अपने चुनावी सलाहकार लल्लू बाबू से संवाद करती हैं तो उसमें कोई झोल नहीं है। बेहद सधा हुआ और तथ्यों से तालमेल के साथ संवाद और कहानी दोनों आगे बढ़ती है। ‘आंधी’ के अलावा पिछले दिनों प्रकाश झा ने कुछ अच्छी राजनीतिक फिल्में बनाई हैं। प्रकाश झा की फिल्मों में राजनीति या संसदीय व्यवस्थाओं की बारीकियों को लेकर कोई झोल नहीं होता है। प्रकाश झा व्यवस्था की खामियों पर चोट करते हैं लेकिन संसदीय व्यवस्था को नकारते नहीं हैं। फिल्मकारों और वेब सीरीज निर्माताओं को राजनीति या राजनीतिक घटनाओं पर फिल्म बनाते समय इसकी बारीकियों और घटनाओं का ध्यान रखना आवश्यक होता है अन्यथा उनका स्थायी महत्व नहीं बन पाता। वो बस आई गई फिल्म या वेब सीरीज की श्रेणी में बद्ध होकर रह जाते हैं।

Saturday, June 5, 2021

कलाकार को ठोस मदद की दरकार


कोरोना संक्रमण के दौरान पूरे देश में कलाकारों के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। ये संकट आर्थिक है लेकिन इसका असर उनके मानस पर भी पड़ने लगा है। जाहिर सी बात है कि अगर कलाकारों का मन और मानस शांत नहीं होगा तो कला का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। कोरोना की पहली लहर के दौरान भी कलाकारों के सामने आयोजन बंद होने से जीविकोपार्जन का संकट आ गया था। उस समय भी इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी और संबधित व्यक्तियों ने इस संकट को दूर करने के लिए विमर्श भी किया था। तब संस्कृति मंत्रालय की तरफ से ये आश्वासन दिया गया था कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की एक सूची तैयार की जाएगी और उस सूची के आधार पर उनकी मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से किन कलाकारों की मदद की गई या कितने कलाकारों को आर्थिक मदद दी गई ये ज्ञात नहीं हो पाया है। इन केंद्रों के माध्यम से मदद हुई भी या नहीं ये भी सवालों के घेरे में है। अगर सरकार ने इन केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की मदद की तो उस योजना का प्रचार कला जगत के लोगों के बीच इस तरह से किया जाना चाहिए कि ज्यादातर लोग उसका फायदा उठा सकें। ये इस वजह से क्योंकि सबसे अधिक परेशानी में वो कलाकार हैं जो बड़े कलाकारों के साथ संगत करते हैं और आयोजन नहीं होने से उनकी आय का स्त्रोत सूख गया है। बड़े गायकों के साथ तबले से लेकर अन्य वाद्य यंत्रों पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के सामने आर्थिक समस्या विकराल है क्योंकि उनकी नियमित आय बंद हो गई है। नाटक में भी यही स्थिति है। बड़ा कालाकर तो अपनी आय से जीवन चला रहा है लेकिन जो तकनीशियन हैं, जो लाइटमैन हैं, जो साउंड के कर्मचारी हैं या इसी तरह से नेपथ्य में रहकर काम कर रहे हैं वो परेशान हैं। अनुमान ये है कि नाटक से जुड़े वैसे कलाकार जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनकी संख्या दो फीसदी है जबकि बाकी अट्ठानवे फीसदी लोग नाटकों के मंचन से होनेवाली नियमित आय पर निर्भर रहते हैं। सरकार प्रोडक्शन और रिपर्टरी ग्रांट तो दे रही है लेकिन नेशनल प्रजेंस वाली संस्थाएं अभी तक मदद की आस में हैं।

अभी कुछ दिनों पहले संस्कार भारती ने कलाकारों की मदद के उपायों पर विचार के एक गोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें देशभर के कला और संस्कृति से जुड़े लोगों ने भाग लिया था। उस बैठक का स्वर भी यही था कि कलाकारों को अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है, लिहाजा संस्कार भारती को पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी आगे आना चाहिए। इसी तरह से अन्य संस्थाएं भी कलाकारों की मदद कर रही हैं पर ये नाकाफी है। संस्कृति मंत्रालय को संकट के समय कलाकारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए। संकट के समय संकट से निबटनेवाली योजनाएं बनाई जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर नीतिगत बदलाव भी किए जाने चाहिए ताकि कोई नियम मदद में बाधा न बन सके। कोरोना की पहली लहर के आने से लेकर अबतक कलाकारों को केंद्र में रखकर कोई ठोस योजना नहीं बन सकी है। 

संस्कृति मंत्रालय के 2001-22 के बजट को देखें तो उसमें चार सौ पचपन करोड़ रुपए कला संस्कृति विकास योजना, संग्रहालय के विकास, जन्म शताब्दियों के आयोजन आदि के लिए आवंटित किए गए हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर में संस्कृति से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के लिए एक सौ दो करोड़ आवंटित किए गए हैं। इन दोनों राशियों को मिलाकर देखें तो करीब साढे पांच सौ करोड़ से अधिक की राशि संस्कृति मंत्रालय के पास है जिसको प्रशासनिक फैसलों से कलाकारों की मदद की तरफ मोड़ा जा सकता है। इस आवंटन के तहत मंत्रालय को कोई ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे कि देशभर के विभिन्न हिस्सों में फैले रूपकंर कला के कलाकारों को मदद मिल सके। संस्कृति मंत्राल के अधीन राष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाली जो अकादमियां हैं उनको भी आगे आकर मदद की पहल करनी चाहिए। संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आदि जैसी संस्थाओं को एक साथ आकर समन्वय बनाकर कलाकारों और लेखकों की मदद करने के लिए कार्ययोजना बनाकर काम करना चाहिए। इन अकादमियों ने पूर्व में भी आकस्मिक परिस्थितियों में कलाकारों की आर्थिक मदद की है। जैसे जब चेन्नई में बाढ़ आई थी और कई कलाकारों के वाद्य यंत्र आदि पानी से नष्ट हो गए थे, तब संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन ने अपनी पहल पर उनकी मदद की थी। इस वक्त कोरोना काल में इन अकादमियों की गतिविधियां भी लगभग ठप हैं। उनका व्यय भी न्यूनतम हो रहा है। बचे हुए धन को कलाकारों की मदद में उपयोग में लाया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इस दिशा में सोचा जाए और उसको क्रियान्वयित किया जाए। 

इस काम में एक ही बाधा आ सकती है कि वो ये कि इन अकादमियों में से ज्यादातर में शीर्ष पद खाली हैं। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन का कार्यकाल 27 जनवरी 2020 को समाप्त हो गया लेकिन अबतक उस पद पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसका असर काम काज पर पड़ता ही है। संगीत नाटक अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कार 2018 के बाद घोषित नहीं हो सके हैं। 2018 का पुरस्कार 2019 में घोषित हुआ था जो अबतक कलाकारों को प्रदान नहीं किए जा सके हैं। ललित कला अकादमी के चेयरमैन उत्तम पचारणे का कार्यकाल पिछले महीने की 21 तारीख को समाप्त हो गया। तीन साल का उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा। उनके कार्यकाल के समाप्त होने के पहले नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ हो जानी चाहिए थी जो हो नहीं सकी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की वेब साइट के मुताबिक इसके निदेशक वामन केंद्रे का कार्यकाल सितंबर 2018 में समाप्त हो गया और उसके बाद कार्यकारी निदेशक सुरेश शर्मा संस्थान चला रहे हैं। यहां पिछले साल चेयरमैन के पद पर परेश रावल की नियुक्ति हुई लेकिन निदेशक का पद विज्ञापित होने के बाद भी अबतक भरा नहीं जा सका। कला संस्कृति और साहित्य से जुड़ी कई ऐसी संस्थाएं हैं जहां शीर्ष पद खाली है। इन पदों के खाली रहने का बड़ा नुकसान ये है कि बड़े फैसले नहीं हो पाते हैं क्योंकि उसके लिए शीर्ष स्तर की मंजूरी आवश्यक होती है।

कोरोना संक्रमण के इस दौर में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य पर जो संकट दिखता है उसको दूर करने के लिए दूरगामी योजनाएँ बनानी होंगी। यह ठीक बात है कि इस वक्त देश की प्राथमिकता अपने नागरिकों की जान की रक्षा करना, वायरस को फैलने से रोकने के उपाय करना और आसन्न खतरे से निबटने की योजना बना है। अब संक्रमण की दर कम होने लगी है, टीकाकरण की रफ्तार तेज हो रही है और स्थितियां सामान्य होती दिख रही हैं तो केंद्र सरकार को ज्यादातर कलाकारों की चरमरा गई आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान देने की नीति पर काम करना चाहिए। स्थितियां इस कदर बिगड़ चुकी हैं कि इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दखल देकर एक ऐसी नीति निर्माण की दिशा में पहल करनी होगी जिससे कोरोना जैसे संकट में कलाकारों के सामने जीवन जीने का संकट पैदा नहीं हो सके। कला और संस्कृति किसी भी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर हम विश्व के इतिहास पर नजर डालें या फिर अपने ही देश के पौराणिक काल में सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करें तो यह पाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा वहां के कलाकारों के माध्यम से संस्कृति के आंगन में खिलखिलाती हैं। सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए, नीतिया बनाएं और नियुक्तियां करें ताकि समेकित योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन हो सके। 


सच्ची कहानी उस प्यार की


शाम ढल चुकी थी, समंदर की लहरें हिलोरें ले रही थीं, हवा में थोड़ी ठंडक थी, मुंबई(तब बांबे) की सड़क पर एक फिएट कार धीमी गति से चली जा रही थी। नई चमचमाती उस कार को अभिनेता सुनील दत्त चला रहे थे और उनकी बगल वाली सीट पर उस वक्त फिल्मों की सफल अभिनेत्री नर्गिस बैठी हुई थीं। शूटिंग खत्म होने के बाद सुनील दत्त, नर्गिस को छोड़ने उनके घर जा रहे थे। कार की खिड़की का शीशा थोड़ा खुला था और ठंडी हवा सुनील दत्त के गालों को छूकर निकल रही थी। पर सुनील दत्त के माथे पर पसीने की बूंदें थीं, वो बार-बार नर्गिस से कह रहे थे, ‘मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं’ जब नर्गिस ने बोला कहिए तो वो चुप हो गए। फिर सुनील दत्त ने कहा कि ‘मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं’। नर्गिस ने फिर कहा फर्माएं। लेकिन वो फिर खामोश। इसी तरह से बातचीत चल रही थी और कार भी अपने रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी। सुनील दत्त के दिल की बात जुबां पर आ नहीं पा रही थी। उनको लग रहा था कि अगर नर्गिस ने मना कर दिया तो उनका क्या होगा? इतने में नर्गिस का घर आ गया। सुनील दत्त ने गाड़ी रोकी तो नर्गिस ने उनकी तरफ इस तरह से देखा जैसे आंखें कोई पर्सनल सा सवाल करना चाह रही हों। लेकिन वो भी कुछ कह नहीं पाईं और कार का दरवाजा खोलकर उतरने लगीं। तब सुनील दत्त ने लंबी सांस लेकर कहा ‘मैं तुमको पसंद करता हूं और तुमसे शादी करना चाहता हूं’ । नर्गिस ने सुनील दत्त की बातें सुनीं और कार का दरवाजा बंद करके बगैर कोई उत्तर दिए अपने घर की ओर चल पड़ीं। अब सुनील दत्त परेशान। अपनी पसंदीदा फिएट कार लेकर वो वापस घर की ओर लौटे। किसी तरह बेचैनी में रात कटी। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि अगर नर्गिस ने उनके प्रणय निवेदन को स्वीकार नहीं किया तो वो हरियाणा में अपनी मां के गांव लौट जाएंगे।

किसी तरह रात कटी, सुनील दत्त अगले दिन तैयार होकर शूटिंग पर चले गए। दिनभर बेचैन रहे। नर्गिस का कोई उत्तर या उनकी तरफ से कोई संकेत उनतक नहीं पहुंचा। शाम को काम खत्म करके वो अपनी फिएट से वापस घर लौट आए। बुझे बुझे से जब सुनील दत्त अपने घर में दाखिल हुए तो उऩकी बहन रानी खुशी से चहक रही थीं। उन्होंने सुनील दत्त का हाथ पकड़कर कहा ‘भाई मुबारक हो’। बेमन से सुनील दत्त ने पूछा ‘किस बात की बधाई’। तो उनकी बहन ने कहा कि ‘उन्होंने हां कर दी है’। सुनील दत्त कुछ देर के लिए समझ ही नहीं पाए कि किन्होंने हां कर दी है। वो कुछ पूछते तबतक रानी ने ही राड खोला, ‘नर्गिस जी आई थीं और उन्होंने रजामंदी दे दी है’। सुनील दत्त की खुशी का पारावार नहीं रहा। वो मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चले गए। ये किस्सा सुनील और नर्गिस की बेटी नम्रता दत्त ने अपनी किताब में विस्तार से लिखी है। लोकचर्चा इस बात की होती है कि ‘मदर इंडिया’ फिल्म में आग से बचाने की वजह से नर्गिस ने सुनील दत्त को प्रपोज किया था लेकिन सचाई ये है कि सुनील दत्त ने उनको अपनी फिएट कार में प्रपोज किया था। यही वजह है कि सुनील दत्त ने बहुत पुरानी हो जाने के बाद भी अपनी उस 1933 नंबर की फिएट कार को अपने पास रखे रखा था। ‘मदर इंडिया’ में आग की घटना के बाद दोनों के बीच प्यार और गहरा जरूर हुआ था।

अब नर्गिस ने हां तो कर दी थी लेकिन दोनों अपने प्यार की और शादी की बात सार्वजनिक नहीं कर पा रहे थे। फिल्म ‘मदर इंडिया’ के निर्माता निर्देशक महबूब खान नहीं चाहते थे कि उनकी फिल्म रिलीज के पहले इस प्यार की खबर बाहर निकले। उनका मानना था कि अगर नर्गिस और सुनील दत्त के प्यार और रोमांस की खबरें छपीं तो उनकी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। उनकी सोच थी कि भारतीय दर्शक इस बात को स्वीकार नहीं कर पाएंगे कि फिल्मी पर्दे पर मां बेटा की भूमिका निभाने वाले कलाकार असल जीवन में शादी करने जा रहे हैं और रोमांस कर रहे हैं। उन्होंने दोनों पर दबाव बनाया कि वो अपने प्यार को छिपा कर रखें। दूसरी दिक्कत ये थी नर्गिस के बड़े भाई अख्तर इस विवाह के खिलाफ थे। खैर 11 मार्च 1958 को दोनों की शादी हो गई। तबतक मदर इंडिया रिलीज होकर हिट हो चुकी थी।  

Saturday, May 29, 2021

नए अंदाज में रामकथा का चित्रण


पिछले दिनों राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित समीक्षक विनोद अनुपम जी से बात हो रही थी। बात फिल्मों से होते हुए वेब सीरीज ‘रामयुग’ पर जा पहुंची। उन्होंने बहुत ही दिलचस्प बात कही कि राम कथा दुनिया की एकमात्र ऐसी कहानी है जिसके क्लाइमेक्स को जानने की उत्कंठा नहीं होती, बस उससे गुजरते जाने का मन करता है। कोरोना संक्रमण के पहले दौर में दूरदर्शन पर रामानंद सागर के रामयण को फिर से दिखाया गया था। दर्शकों ने उसको खूब पसंद किया था। व्यूअरशिप के कई नए कीर्तिमान बने थे। जब कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आया तो लगभग उसी समय एमएक्स प्लेयर पर वेब सीरीज ‘रामयुग’ रिलीज की गई। इस वेब सीरीज को लेकर इन दिनों काफी चर्चा हो रही है। चर्चा इसके कथा कहने के अंदाज को लेकर हो रही है। ‘रामयुग’ में कहानी का आरंभ ‘स्वर्णमृग’ प्रसंग से होता है और फिर कहानी आगे बढ़ती जाती है। ‘रामयुग’ में कहानी फ्लैशबैक के सहारे आगे बढ़ती है। आठ एपिसोड की इस सीरीज में इसी प्रविधि को अपनाया गया है। कहानी कहने के अंदाज के अलावा इसके फिल्मांकन से लेकर, कलाकारों की वेशभूषा और संवाद अदायगी तक में एक नयापन है। इस वेब सीरीज के निर्देशक कुणाल कोहली हैं, संवाद लेखक कमलेश पांडेय हैं और रामायण सलाहकार स्वर्गीय नरेन्द्र कोहली हैं। ‘रामयुग’ का राम या रावण या अन्य पात्र राजा रवि वर्मा के राम के चित्र या रामानंद सागर के राम की वेशभूषा से मुक्त होकर आधुनिक गेटअप में हैं। राम के चरित्र के साथ कोई बदलाव नहीं किया गया है लेकिन एक संदेश ये है कि हर युग का अपना राम और अपना रावण होता है। रामयुग की एक और विशेषता है कि इस सीरीज में भले ही राम को आधुनिक रूप में दिखाने की कोशिश की गई हो लेकिन उनके मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र को उसी तरह से पेश किया गया है जैसा कि वाल्मीकि ने ‘रामायण’ में या तुलसीदास ने ‘श्रीरामचरितमानस’ में किया है। इस कहानी में ज्यातार प्रसंग श्रीरामचरितमानस से लिए गए हैं लेकिन कुछ प्रसंगों का फिल्मांकन वाल्मीकि के रामायण के अनुसार किया गया है, जैसे राम रावण युद्ध के समय का जो दृश्य है या फिर मेघनाथ और कुंभकर्ण से युद्ध के समय दृश्य रामायण से लिया गया प्रतीत होता है। 

‘रामयुग’ की कहानी में कई बदलाव भी किए गए हैं, हो सकता है कि विद्वान पटकथा लेखक और सलाहकार ने राम कथा को अलग अलग ग्रंथों से लिया होगा। जैसे मेघनाद के संहार का जो प्रसंग ‘रामयुग’ में दिखाया गया है उसका उल्लेख न तो श्रीरामचरितमानस में मिलता है और न ही वाल्मीकि के रामायण में। रामयुग में जब मेघनाद का संहार करने के लिए लक्ष्मण पहुंचते हैं तो वो नदी में पूजा कर रहा होता है। इस वेब सीरीज में लक्ष्मण को देखकर मेघनाद कहता है कि निहत्थे पर वार करना उचित नहीं होता है लेकिन लक्ष्मण उसको याद दिलाते हैं कि रावण ने जब सीता का हरण किया था तो वो निहत्थी थीं, जटायु को जब रावण ने मारा था तब पक्षीराज निहत्थे थे। इतना कहने के बाद लक्ष्मण ने मेघनाथ पर बाण से वार कर उसका वध कर दिया। युद्ध के पहले पूजा का प्रसंग श्रीरामचरितमानस में भी है, लेकिन वहां इस बात उल्लेख है कि जब मेघनाद साधना कर रहा था और लक्ष्मण वहां अंगद, नील, नल, मयंद और हनुमान के साथ पहुंचे थे। अपनी साधाना में बाधा देखकर मेघनाद बहुत नाराज हुआ था और उसने लक्ष्मण पर प्रचंड त्रिशूल से वार किया था। मेघनाथ के उस वार को  लक्ष्मण जी ने अपने बाण से काट दिया था। तुलसीदास जी कहते भी हैं, ‘प्रभु कहं छांड़ेसि सूल प्रचंडा, सर हति कृत अनंत जुग खंडा’। यहां पर मेघनाद और लक्ष्मण के बीच युद्ध होता है लेकिन ‘रामयुग’ में  मेघनाद के निहत्था होनेपर वध दिखाना हैरत में डालता है। संभव है लेखकों ने किसी और भाषा के रामायण से इस प्रसंग को उठाया हो। 

‘रामयुग’ में कहानी चूंकि फ्लैशबैक प्रविधि के साथ चलती है और आठ एपिसोड में खत्म करने का दबाव रहा होगा इसलिए कई प्रसंगों को छोटा किया गया है। कई प्रसंगों को अपेक्षाकृत कम नाटकीय दिखाया गया है। युद्ध में कुंभकर्ण तो बहुत ही जल्दी मार डाला जाता है। राम उसके दोनों हाथ काटते हैं और फिर गरदन। इस वेब सीरीज में राम तलवार से कुंभकर्ण की गर्दन काटते दिखाए गए हैं जबकि श्रीरामचरितमानस में तो राम अपने बाणों से उसकी गरदन काटते हैं और कुंभकर्ण का कटा हुआ सर रावण के आगे जाकर गिरता है जिसको देखकर रावण बहुत व्याकुल हो उठता है। तुलसीदास कहते भी हैं- ‘सो सिर परेउ दसानन आगें, बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।‘ लेकिन सीरीज में ऐसा नहीं चित्रित किया गया है। वेब सीरीज में रावण वध के प्रसंग को थोड़ा नाटकीय किया गया है। दस रावण चारो तरफ से घेरकर राम के साथ युद्ध करते हैं। रावण वध का प्रसंग श्रीरामचरितमानस से लिया गया है। वेब सीरीज में राम अपने बाण से रावण की नाभि पर वार करते हैं क्योंकि उनको विभीषण ने बताया था कि रावण की नाभिकुंड में अमृत का निवास है और वो उसके ही बल पर जीता है। तुलसीदास जी लिखते भी हैं कि, ‘सायक एक नाभि सर सोषा, अपर लगे भुज सिर करि रोषा’। यानि कि एक बाण ने रावण नाभि के अमृतकुंड को सोख लिया और बाकी तीस बाण उसके सिरों और भुजाओं में जा लगे। वाल्मीकि रामायण में पूरा प्रसंग अलग है। यहां रावण का वध ब्रह्मा जी के दिए अस्त्र से होता है जिसका निर्माण ब्रह्मा जी ने इंद्र के लिए किया था। उस बाण का संधान कर राम ने रावण की छाती पर वार किया जिससे उसकी मौत हो गई। वाल्मीकि रामायण में संस्कृत में जो लिखा है जिसका हिंदी में अनुवाद ये है कि शरीर का अंत कर देनेवाले उस महान वेगशाली बाण ने छूटते ही दुरात्मा रावण के हर्दय को विदीर्ण कर डाला।  

रामयुग को लेकर कुछ लोगों ने आपत्तियां भी जताई हैं कि इसमें मूल कथा से छेड़छाड़ की गई है। लेकिन इस सीरीज को देखने के बाद ये लगता है कि पटकथा लेखक ने कुछ छूट जरूर ली है लेकिन ये छूट रचनात्मक दायरे में है। ऐसा लगता है कि इस सीरीज के निर्माता और पटकथा लेखक ने रामकथा को आधुनिक और समकालीन बनाने के लिए इस तरह का बदलाव किया है। यह अकारण नहीं है कि राम जब वनवास में होते हैं तो बेहद करीने से ट्रिम की गई दाढ़ी रखते हैं, रावण का हाव भाव एक दंभी खलनायक की तरह का है। ये बदलाव सकारात्मक इस वजह से कहे जा सकते हैं क्योंकि आज के युवा अपने आपको इस कथा से एकाकार कर सकते हैं। इस सीरीज के लेखक बार-बार रावण और राम के मुंह से ये बात कह कर इन बदलावों का औचित्य भी साबित करते हैं। हर युग का अपना राम होता है, हर युग का अपना रावण होता है। कहने का मतलब ये कि हर युग में अच्छाई और बुराई का स्वरूप होता है। इस सीरीज को देखते हुए नरेन्द्र कोहली जी का भी स्मरण हो आया क्योंकि उनसे जब भी बात होती थी तो वो रामकथा को इसी स्वरूप में देखते थे। वो हमेशा वानरों को वनवासी के तौर पर देखते थे।  उनका मानना था कि रामकथा हर युग में अपने बदले हुए स्वरूप में सामने आती है। मूल कथा तो राम, सीता के बीच रावण के आ जाने की ही है। कथा कहने की प्रविधि और घटनाएं और परिस्थियों में अंतर हो सकता है। यही ‘रामयुग’ में दिखता है।  

Saturday, May 22, 2021

नए विकल्प की ओर फिल्मी दुनिया




सलमान खान की कोई फिल्म आनेवाली होती है तो दर्शकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बन जाता है। दर्शक प्रतीक्षा करने लग जाते हैं। हाल ही में रिलीज हुई सलमान खान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ को लेकर ऐसा ही माहौल बना। सिनेमा हॉल के लगभग बंद होने की स्थिति में सलमान की फिल्म को लेकर सप्ताहांत में जो माहौल बनता है वो तो इस बार नहीं बन पाया। सिनेमा हॉल के बंद होने की वजह से सलमान की फिल्म के निर्माताओं ने इस फिल्म को ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म जी-5 पर रिलीज किया। ओटीटी के साथ ही फिल्म डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) सेवा देनेवाली कंपनियों, टाटा स्काई, डिश टीवी और एयरटेल डिजीटल, पर भी रिलीज की गई। फिल्मों की रिलीज में ये एक नया प्रयोग था। दर्शकों को जी 5 पर फिल्म देखने के लिए अलग से पैसे देने पड़े। आमतौर पर ये होता है कि किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म की अगर आपने सदस्यता ली हुई है तो वो आप वहां उपलब्ध ज्यादातर सामग्री देख सकते हैं। कुछ समाग्री को देखने के लिए अलग से पैसे देने पड़ते हैं। सलमान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ को देखने के लिए अलग से दो सौ उनचास रुपए देने पड़ रहे हैं। इस वक्त जब फिल्म इंडस्ट्री पर कोरोना का संकट छाया हुआ है, नई फिल्में बन नहीं पा रही हैं, शूटिंग रुकी हुई हैं, कई फिल्में तैयार हैं लेकिन सिनेमा हॉल बंद होने की वजह से उनकी रिलीज टलती जा रही है, ऐसे में ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ की रिलीज से एक नए रास्ते का संकेत मिलता है। एक ऐसा रास्ता जिसपर चलना अगर सफल रहा तो फिल्म उद्योग को बड़ी राहत मिल सकती है।

नए रास्ते का संकेत इस वजह से कह रहा हूं कि सलमान खान की फिल्म जब रिलीज हुई, तो ओटीटी प्लेटफॉर्म के मुताबिक, पहले दिन बयालीस लाख दर्शक मिले। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक सभी प्लेटफॉर्म को मिलाकर अगर विचार किया जाए तो पहले दिन मिले दर्शकों की संख्या संतोषजनक कही जा सकती है। पहले दिन तो जी 5 पर इतने दर्शक पहुंचे कि वो प्लेटफॉर्म थोड़ी देर तक दर्शकों का बोझ ही नहीं उठा सका और हैंग हो गया। इस संख्या के हिसाब के फिल्म के बिजनेस पर नजर डालते हैं। हर दर्शक को फिल्म देखने के लिए 249 रु देने पड़ रहे थे। अगर दर्शकों की संख्या और एक बार फिल्म देखने के पैसे पर विचार करें तो तो पहले ही दिन फिल्म ने सौ करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस कर लिया। ये किसी भी फिल्म के लिए ऐसी ओपनिंग है जो स्वप्न सरीखी है। कुछ लोगों का कहना है कि जो बयालीस लाख दर्शकों का आंकड़ा है वो सभी पैसे देनेवाले दर्शक न हैं। उनका तर्क है कि एक परिवार के चार लोगों ने बैठ कर देखा होगा तो दर्शकों का वास्तविक आंकड़ा तो करीब साढे दस लाख का ही होता है। पर इस तरह के अनुमान का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है, सिर्फ अटकल ही लगाई जा सकती है। अगर कोई कंपनी अपनी किसी फिल्म के दर्शकों का आंकड़ा जारी करती है तो ये माना जाता है कि आकलन का आधार भुगतान होता है । क्योंकि पे पर व्यू (एक बार देखने का भुगतान) तो दर्शकों को एक ही बार फिल्म देखने की अनुमति देता है। ये भी सिनेमा हॉल के टिकट की तरह है कि अगर आपने एक शो का टिकट लिया है तो आप तय शो में ही फिल्म देख सकते हैं और वो भी एक ही बार। ओटीटी पर भी अगर कोई फिल्म पे पर व्यू है तो वहां भी दर्शक एक बार ही देख सकते हैं। सलमान खान की फिल्म ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’ के बारे में फिल्म के कारोबार पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि इस फिल्म को पहले चार दिन में सत्तर लाख दर्शक मिले। अगर ये अनुमान सही है तो पहले चार दिन में इस फिल्म ने करीब पौने दो सौ करोड़ रुपए का बिजनेस कर लिया है। यानि कि गुरूवार से लेकर रविवार तक इस फिल्म को जमकर दर्शक मिले। ये तो तब हो रहा था जब ‘राधे, योर मोस्ट वांटेड भाई’, पूरी फिल्म व्हाट्सएप और अन्य इंटरनेट मीडिया के माध्यमों पर सर्कुलेट हो रहा है। फिल्म के निर्माताओं ने इसको लेकर मुंबई पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई और जांच चल रही है। 

कोरोना संकट की वजह से ये आशंका है कि निकट भविष्य में शायद ही सिनेमा हॉल खुल सके। कम से कम इस वर्ष अगस्त-सितंबर तक तो सिनेमा हॉल के खुलने की उम्मीद बहुत ही कम है, ऐसे में बड़ी बजट और बड़े सितारों की फिल्मों के रिलीज होने का एक नया मॉडल या विकल्प अपनाने से फिल्म उद्योग पर छाए संकट को कम किया जा सकता है। पे पर व्यू के हिसाब से ओटीटी और डायरेक्ट टू होम सेवा प्रदताओं के प्लेटफॉर्म पर पर फिल्म रिलीज करने का विकल्प। अगर ऐसा हो पाता है तो ये बिल्कुल नई शुरुआत होगी और नया ट्रेंड आरंभ होगा। सलमान खान की फिल्म की सफलता से बड़ी बजट की फिल्मों के निर्माताओं का हौसला बढ़ेगा। दरअसल बड़ी बजट की फिल्मों में निर्माताओं का पैसा लग चुका है और वो ज्यादा दिनों तक अपने निवेश को रोककर रखने की बजाए उससे मुनाफा कमाने के बारे में सोच सकते हैं। हो सकता है ओटीटी और डायरेक्ट टू होम पर फिल्मों को रिलीज करने से अपेक्षाकृत कम मुनाफा हो लेकिन रुका हुआ पैसा वापस आने से नए प्रोजेक्ट शुरू होंगे। लोगों को काम मिलेगा और इससे लगभग ठप पड़े फिल्म उद्योग में जान आ सकती है।

अगर फिल्मों के डिजीटल रिलीज को फिल्म निर्माता अपनाते हैं तो एक बेहद महत्वपूर्ण मसले पर ध्यान देना होगा। वो मसला है पायरेसी का। जिस तरह से सलमान खान की फिल्म का पायरेटेड वर्जन रिलीज वाले दिन ही इंटरनेट मीडिया पर घूमने लगा था, उसने इस फिल्म के निर्माताओं को चिंता में डाल दिया था। पायरेसी को रोकने के लिए इन प्लेटफॉर्म्स को ऐसा सिस्टम विकसित करना होगा कि वहां से कोई उसकी कॉपी न कर सके। अगर कोई कॉपी करने की कोशिश करे या कॉपी करने में सफल हो जाए तो संबंधित प्लेटफॉर्म के जरिए उस व्यक्ति तक पहुंचा जा सके जिसके डिवाइस से फिल्म की क़ॉपी की गई हो। आज तकनीक के इस दौर में ऐसा करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। फिल्म उद्योग को बचाने के लिए कानून का पालन करवानेवाली एजेंसियों को भी कठोर कदम उठाने होंगे। पायरेसी करते हुए पकड़े जाने पर कठोर सजा का प्राविधान हो, इसके लिए फिल्म उद्योग के लोगों को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। फिल्म उद्योग में कई ऐसा लोग हैं जो बयानवीर हैं, ट्वीटरवीर हैं लेकिन अपनी इंडस्ट्री और उससे जुड़े लोगों की समस्या का स्थायी हल ढूंढने में उनकी रुचि दिखाई नहीं देती है। इन वीरों को उनके हाल पर छोड़कर संजीदा निर्माताओं को सरकार के नुमाइदों से बात करने की पहल करनी होगी। कोरोना संकट के लंबा चलने की आशंकाओं के बीच हर क्षेत्र के लोगों को वैकल्पिक रास्ते पर विचार करना होगा, अगर कोई रास्ता सूझता है तो उसको अपनाने के लिए प्रयास करना होगा। इस तरह के प्रयासों से ही संबंधित क्षेत्र को राहत मिल सकती है, फिल्म जगत के सामने भी इसी तरह का विकल्प है कि वो अपने को बचाने के लिए नए रास्ते तलाशे। सलमान की फिल्म की रिलीज ने फिल्म उद्योग जगत को ऐसा ही एक रास्ता दिखाया है । 

Saturday, May 15, 2021

कमल हासन की हार से निकलते संदेश


इस महीने के आरंभ में कई राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव नतीजे आए और इसके साथ ही उन राज्यों के चुनाव संपन्न हो गए। पश्चिम बंगाल चुनाव के परिणामों के शोरगुल में तमिलनाडु विधासभा चुनाव  की एक महत्वपूर्ण खबर की अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मशहूर अभिनेता कमल हासन और उनकी पार्टी दोनों हार गई। कमल हासन ने दो हजार अठारह में मक्कल निधि मायय्म नाम से एक पार्टी बनाई थी और उसके बैनर तले दो हजार उन्नीस का लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। उस चुनाव में भी उनकी पार्टी का खाता नहीं खुल पाया था। कुछ चुनावी विशेषज्ञों और वामपंथी उदारवादी राजनीतिज्ञों को इसकी उम्मीद थी कि कमल हासन और उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव में बेहतर करेगी। कम से कम इस बात का अंदाज तो था ही कि कमल हासन की पार्टी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को त्रिकोणीय कर देगी। पर ऐसा हो नहीं सका। जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम आए तो कमल हासन कोयंबटूर दक्षिण सीट से भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की अध्यक्षा वनाथी श्रीनिवासन से पराजित हो गए। चुनाव प्रचार के दौरान कमल हासन ने वनाथी को छोटा राजनेता कहकर उनका मजाक भी उड़ाया था। तब वनाथी ने पलटवार करते हुए उनको ‘लिप सर्विस’ करनेवाला राजनेता बताया था। इस चुनाव के दौरान एक और दिलचस्प घटना घटी थी। प्रचार के दौरान कमल हासन के पैर में चोट लग गई थी, जब वनाथी को पता चला तो उन्होंने कमल हासन को फलों की एक टोकी भेजी और साथ में जल्द स्वस्थ होने की कामना का एक कार्ड भी। जब पत्रकारों ने उनसे इस बारे में सवाल किया था तब वनाथी ने कहा था कि कोयंबटूर वाले अपने मेहमानों का खास ख्याल रखते हैं और उन्होंने इस परंपरा को निभाया है। कहना न होगा कि कमल हासन को ‘मेहमान’ बताकर वनाथी ने मतदाताओं को ये संदेश दे दिया था कि हासन कोयंबटूर में बाहरी हैं। परिणाम सबके सामने है। 

कमल हासन की हार को इस वजह से भी रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि वो भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी से हारे, उनको कांग्रेस के प्रत्याशी से हार नहीं मिली। कांग्रेस का तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) से चुनावी गठबंधन था और इस बार पूरे राज्य में डीएमके की लोकप्रियता अन्य दलों से अधिक थी। चुनाव परिणामों में ये दिखा भी। कमल हासन का पराजित होना एक विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं है बल्कि इसके गहरे निहितार्थ हैं, खासकर तमिलनाडु की राजनीति में। कमल हासन तमिलनाडु के बेहद लोकप्रिय अभिनेता रहे हैं और पिछले करीब पांच दशक से वो फिल्मों में काम रहे हैं। उनको कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। वो अपनी फिल्मों में जिस तरह से प्रयोग करते रहे हैं उससे भी एक कलाकार के तौर पर उनकी काफी प्रतिष्ठा है। दक्षिण के राज्यों में फिल्मों के जो भी सुपरस्टार राजनीति में आए उन्होंने यहां भी सफलता प्राप्त की। ये सूची काफी लंबी है लेकिन अगर सिर्फ तमिलनाडु का ही संदर्भ लें तो एम जी रामचंद्रन, करुणानिधि और जयललिता के उदाहरण अभिनेताओं की चुनावी सफलता की कहानी कहते हैं। इन अभिनेताओं की चुनावी सफलता और राज्य में राजनीति के शिखर पर पहुंचने की परंपरा से प्रभावित होकर कमल हासन भी राजनीति में उतरे थे। कमल हासन अपने पूर्वज अभिनेताओं से प्रभावित होकर राजनीति में उतर तो गए लेकिन वर्तमान हालात का आकलन करने में चूक गए। इन नतीजों को देखने के बाद लगता है कि तमिल फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत इस वजह से ही राजनीति के मैदान में उतरने से हिचकते रहे । ऐसा लगता है कि उन्हें इस बात का अंदाज हो गया था कि अब वो समय नहीं रहा कि फिल्मों का लोकप्रिय अभिनेता, राजनीतिक दल बनाकर उतरे और जनता के भारी समर्थन से सत्ता पर काबिज हो सके। इस बात की कई बार चर्चा होती थी कि रजनीकांत राजनीति में आने वाले हैं लेकिन अबतक तो वो राजनीति में आए नहीं हैं। कमल हासन और उनकी पार्टी की हार से ऐसा प्रतीत होता है कि रजनीकांत का फैसला सही रहा।  

कमल हासन ने जब दो हजार अठारह में अपना राजनीतिक दल बनाया था तब उन्होंने मोदी विरोध का भी बिगुल भी फूंका था। राजनीतिक दल बनाने के बाद वो केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री विजयन से लेकर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी मिले थे। खबरों के मुताबिक मुलाकात तो उन्होंने ममता बनर्जी से भी की थी। उनके इन मुलाकातों से उनके मंसूबे साफ थे कि वो भारतीय जनता पार्टी के विरोध या विपक्ष की राजनीति करना चाहते थे। यही संदेश तमिलनाडु में भी गया। कमल हासन के विचारों से ऐसा प्रतीत होता है कि वो वामपंथ के करीब हैं। वो अपने वामपंथी विचारों को अपने साक्षात्कारों में प्रकट भी करते रहे हैं। उनके इन विचारों का प्रभाव स्पष्ट रूप से उनके राजनीतिक दल पर भी दिखा। तो क्या कमल हासन की चुनाव में हार और उनकी पार्टी का तमिलनाडु में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि वाम दलों के विचारों में लोगों का भरोसा न्यूनतम रह गया है। ‘न्यूनतम भरोसे’ के तर्क को यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य केरल के चुनाव में वामपंथी गठबंधन की सरकार बनी। ये ठीक है, लेकिन केरल की स्थितियां अलग थीं। वहां वामपंथी दलों के मोर्चे का मुख्य मुकाबला कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा से था। मतदाताओं को वहां वाम और कांग्रेस में से एक को चुनना था क्योंकि भारतीय जनता पार्टी अभी वहां संघर्ष ही कर रही है। मतदाताओं ने वाम मोर्चे को चुना। यह भी कहा जा सकता है कि कमजोर विकल्प की वजह से मतदाताओं ने वामपंथी गठबंधन को चुना। पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस और वामपंथी मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और इस गठबंधन का वहां खाता भी नहीं खुला। यहां मतदाताओं के पास विकल्प थे। आज से चंद साल पहले कोई इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बंगाल की जनता लेफ्ट को इस तरह से नकार देगी कि पूरे राज्य में उसको एक भी सीट नहीं मिलेगी। कल्पना तो ये भी नहीं की जा सकती थी कि बंगाल की नक्सलबाड़ी विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर लेगा। कमल हासन को तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी पराजित कर देगी। 

दरअसल अगर अब हम इन घटनाओं को देखें और अतीत की इसी तरह की घटनाओं के आधार पर विश्लेषण करें तो सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाएंगे। अब भारत का लोकतंत्र अपेक्षाकृत परिपक्व हुआ है। अब चेहरे या फिल्मी पर्दे की छवि के आधार पर वोट मिलना संभव नहीं है। अब जनता काम चाहती है, जनता उस पार्टी को पसंद करती है जिसका नेता उसको भरोसा दिला सके, भरोसा उनकी बेहतरी का, भरोसा देश की बेहतरी का और भरोसा समयबद्ध डिलीवरी का। आजादी के सात दशकों के बाद जनता इतनी परिपक्व हो गई है कि उसको अब नारों या नेताओं की राजनीति से इतर छवि से बहलाया नहीं जा सकता है। अब शायद ही संभव हो कि कोई अभिनेता एन टी रामाराव का तरह अपनी पार्टी बनाकर आएं, सालभर तक राज्य में घूमें फिर चुनाव लड़ें और जनता उनको भारी बहुमत से जिताकर गद्दी सौंप दें। कई चुनावों में तो हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार के प्रचार भी उम्मीदवारों का बेड़ा पार नहीं कर पाए। इस लिहाज से कमल हासन की हार भारतीय राजनीति को समझने का एक प्रस्थान बिंदु हो सकता है।   


Saturday, May 8, 2021

प्रकृति-पूजा से होगा कष्ट निवारण


आज पूरे देश के शहरी इलाकों में ऑक्सीजन को लेकर त्राहिमाम है। अदालतें ऑक्सीजन की सप्लाई को लेकर सरकार पर सख्ती बरत रही हैं, सरकारें ऑक्सीजन के उत्पादन और वितरण में रात दिन लगी हुई हैं। अस्पतालों में ऑक्सीजन के संयत्र लगाए जा रहे हैं, ऑक्सीजन वितरण के लिए विदेशों से टैंकर मंगाए जा रहे हैं। ऑक्सीजन के छोटे सिलिंडरों की कालाबाजारी हो रही हैं। विदेशों से ऑक्सीजन कंसंट्रेटर मगंवाए जा रहे हैं। समाजसेवी संस्थाएं और सक्षम लोग इन ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का वितरण कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कोरोना जैसी महामारी से निबटने के लिए ऑक्सीजन बेहद आवश्यक है। है भी। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि हमने प्रकृति के साथ अबतक क्या किया और अब इन कंसंट्रेटर के माध्यम से क्या करने जा रहे हैं। क्या हमारे वायुमंडल में मौजूद ऑक्सीजन की मात्रा पर इन कंसंट्रेटर का असर नहीं पड़ेगा? गर्मी के बढ़ने के साथ एरकंडीशनर का उपयोग बढ़ेगा और कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी होगी। याद करिए अमेरिका में कोरोना की पहली लहर का कितना भयानक असर हुआ था और उसने कैसी तबाही मचाई थी। वो तब था जब अमेरिका दुनिया का सबसे अधिक विकसित देश है और वहां स्वास्थ्य सेवाएं बहुत अच्छी हैं। 

दरअसल हम तथाकथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में इस कदर शामिल हो गए कि अपने भारतीय मूल्यों को लगातार बिसरते चले गए। हमारे देश में प्रकृति को लेकर एक अनुराग प्राचीन काल से रहा है। प्रकृति और पेड़ों को तो हमारे यहां भगवान मानकर पूजने की परंपरा रही है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में वृक्षों और पौधों को लेकर कई तरह की मान्यताओं की बात कही गई है। पीपल, वट, तुलसी आदि की तो पूजा तक की जाती रही है। इन वृक्षों और पौधों को लेकर लोक में जो मान्यता है वो उनको धर्म से भी जोड़ती हैं। महाभारत के आदिपर्व में एक श्लोक में घने वृक्षों की महिमा का वर्णन है। कहा गया है कि किसी भी गांव में घुसते ही जब आपको कोई वृक्ष दिखाई देता है जो पत्तों से छतनार हो और फलों से लदा हुआ हो तो वो अपने विशिष्ट लक्षणों के कारण प्रसिद्ध होता है। आसपास के लोग उस वृक्ष की पूजा करते हैं। वैदिक साहित्य में भी वृक्ष की महिमा का विस्तार से उल्लेख मिलता है। हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म में भी वृक्षों की पूजा की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। यह अनायास नहीं है कि बुद्ध और तीर्थंकर के नाम के साथ एक पवित्र वृक्ष भी जुड़ा हुआ है जिसे बोधिवृक्ष कहते हैं। हिंदू धर्म में भी कल्पवृक्ष की मान्यता है जो लोक में व्याप्त है। मान्यता ये है कि देवता और असुरों के समुद्र मंथन के समय ही कल्पवृक्ष का जन्म हुआ जिसको स्वर्ग में इंद्र देवता के नंदनवन में लगा दिया गया। लोक में इस कल्पवृक्ष की मान्यता के अलावा इसका उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है। उन ग्रंथों में इस वृक्ष को उत्तरकुरू देश का वृक्ष माना गया है। महाभारत में भी उत्तरकुरु देश में सिद्ध पुरुषों के रहने का वर्णन मिलता है और उस वर्णन के दौरान ऐसे वृक्ष का उल्लेख मिलता है जो हमेशा फलता फूलता रहता है। हमेशा हरा भरा रहता है। कुछ इसी तरह का वर्णन रामायण में भी मिलता है । सुग्रीव जब सीता को खोजने के लिए अपनी वानर सेना को उत्तर दिशा की ओर भेज रहा होता है तब वो अपनी सेना से कहते हैं कि इस दिशा के अंत में उत्तरकुरु प्रदेश है। उस प्रदेश की पहचान ये है कि वहां वहां वैसे वृक्ष मिलेंगे जो सदा फलते-फूलते रहते हैं। उन वृक्षों से ही उस प्रदेश की पहचान है।  

इसके अलावा भी अगर हम अपनी परंपराओं पर विचार करें तो हमारे यहां उद्यानों की बहुत पुरानी परंपरा दिखाई देती है। आज जिसे किचन गार्डन कहकर महिमा मंडित किया जाता है उसकी जड़े हमारे पौराणिक समय में ही देखी जा सकती हैं। काव्यादर्श में तो स्पष्ट कहा गया है कि ‘महाकाव्य का स्वरूप तबतक पूरा नहीं समझा जा सकता है जबतक उसमें उद्यान क्रीड़ा या सलिल क्रीडा का वर्णन न हो।‘ मुगल काल में भी इसी परंपरा को बढ़ाते हुए गृह-उद्यान की परंपरा को अपनाया गया और उसको नजरबाग कहा गया। शासकों और राजाओं के उद्यान लीला का वर्णन साहित्यिक रचनाओं में भी मिलता है। उन उद्यानों में पेड़ों की कतार और उसके बीच छोटे छोटे तालाब या जलकुंड का उल्लेख मिलता है। राजाओं या जमींदारों की अपनी वाटिकाएं भी होती थीं। धर्म से लेकर लोक तक में प्रकृति के साथ जो संबंध थे वो कालांतर में बाधित होते चले गए। जिसका असर हमारे जीवन पर पड़ा। पेड़ों की महत्ता को लोक उत्सवों और वैवाहिक अनुष्ठानों के माध्यम से भी समझा जा सकता है। बिहार के कई इलाकों में लड़कियों की शादी से पहले आम के पेड़ से प्रतीकात्मक शादी करवाई जाती है। शादी वाले दिन कन्या को लेकर सभी सुहागिनें आम के पेड़ के पास जाती हैं और वहां लोकगीतों के बीच आम के पेड़ के साथ शादी की रस्म होती है। इसके बाद कन्या को लेकर सभी सुहागिनें लौटती हैं और रात में शादी संपन्न होती है। कहना न होगा कि पेड़ को लोक मान्यताओं में इतना महत्व दिया गया है कि लड़कियों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो पेड़ का भी उतना ही ख्याल रखे जितना अपने पति का। इसी तरह कई इलाकों में शादी के पहले बांस के पेड़ों के साथ भी लड़कियों के विवाह की परंपरा रही है। इसके अलावा उसी इलाके में सुहागन स्त्रियों का एक और पर्व होता है जिसे बरसायत कहते हैं। लड़की की शादी जिस वर्ष होती है उसके अगले वर्ष के जेठ माह की अमावस्या को वो बरगद की पूजा करती है। यह पूजा समारोहपूर्वक की जाती है।

आधुनिकता और शहरीकरण के अंधानुकरण के दबाव में हमने खुद को प्रकृति के दूर करना आरंभ किया। विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ का खेल खतरनाक स्तर पर पहुंच गया। पेड़ों की जगह गगनचुंबी इमारतों ने ले ली। हाइवे और फ्लाइओवर के चक्कर में हजारों पेड़ काटे गए। ये ठीक है कि विकास होगा तो हमें इन चीजों की जरूरत पड़ेंगी लेकिन विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना भी तो हमारा ही काम है। अगर हम पेड़ों को काट रहे हैं तो क्या उस अनुपात में पेड़ लगा रहे हैं। अगर हम विकास के नाम पर बड़े बड़े डैम बना रहे हैं तो क्या हम उससे प्रकृति को होनेवाले नुकसान का आकलन कर उसके भारपाई का प्रबंध कर रहे हैं। हमें इन सब बिंदुओं पर विचार करना चाहिए था। हमने नीम, पीपल और बरगद के पेड़ हटाकर फैशनेबल पेड़ लगाने आरंभ कर दिए थे, बगैर ये सोचे समझे कि इसका पर्यावरण और प्रकृति पर क्या असर पड़ेगा। आज जब ऑक्सीजन को लेकर हाहाकार मचा है तो हमें फिर से नीम और पीपल के पेड़ों की याद आ रही है। आज मरीज की जान बचाने के लिए कंसंट्रेटर का उपयोग जरूरी है पर उतना ही जरूरी है उसके उपयोग को लेकर एक संतुलित नीति बनाने की भी। आज हम कोरोना की महामारी से लड़ रहे हैं, ये दौर भी निकल जाएगा। हम इस महामारी के प्रकोप से उबर भी जाएंगे लेकिन प्रकृति को जो नुकसान हमने पहुंचा दिया है उसको जल्द पाटना मुश्किल होगा। कोरोना की महामारी ने हमें एक बार इस बात की याद दिलाई है कि हम भारत के लोग अपनी जड़ों की ओर लौटें, हमारी जो परंपरा रही है, हमारे पूर्वजों ने जो विधियां अपनाई थीं, उसको अपनाएं। हम पेड़ों से फिर से रागात्मक संबंध स्थापित करें, उनको अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।  

Friday, May 7, 2021

कठोर प्रशासक, संवेदनशील लेखक


करीब दो साल पहले की बात है। सर्दी के दिन थे। किसी मित्र ने दोपहर के भोजन के लिए इंडिया इंरनेशनल सेंटर(आईआईसी) आमंत्रित किया था। डायनिंग हॉल में जगह नहीं थी, तो हमलोग लॉन में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। अचानक सफेद पैंट शर्ट पहने एक बुजुर्ग पास से निकले, मैंने अपने दोस्त से कहा कि ये तो जम्मू कश्मीर के पूर्व गवर्नर जगमोहन लग रहे हैं। उसने पुष्टि की। जगमोहन जी लॉन में टहल रहे थे। थोड़ी देर टहलने के बाद वो धूप में बैठ गए। मैंने थोड़ा साहस जुटाया और उनको परिचय देकर पास रखे खाली कुर्सी पर बैठ गया। उनसे कश्मीर पर बात शुरू की। उनकी एक बात मुझे अब भी याद है। उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर समाप्त कर दो, समस्या बहुत हद तक खत्म हो जाएगी। थोड़ी देर की बातचीत के बाद वो ये कहते हुए उठ खड़े हुए कि लाइब्रेरी जाने का समय हो गया है। आईआईसी की लाइब्रेरी जाने के लिए बढ़े, फिर थोड़ा रुके और बोले कि अगर समय मिले तो मेरी किताब ‘माई फ्रोजन टरबुलेंस इन कश्मीर’ पढ़ना। तीन मई को तिरानवे साल की उम्र में जगमोहन जी के निधन की खबर सुनते ही ये मुलाकात याद आ गई।   

जगमोहन का जन्म अविभाजित भारत के हफीजाबाद में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार पंजाब आ गया। पंजाब से होते हुए जगमोहन दिल्ली पहुंचे थे।  पूरे देश ने उनका नाम इमरजेंसी में तब जाना जब वो दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष थे। उनके उपाध्यक्ष रहते हुए तुर्कमान गेट इलाके की अवैध इमारतों पर बुलडोजर चला था। काफी विरोध हुआ, प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं लेकिन जगमोहन ने काम नहीं रुकने दिया था। उस वक्त इस बात की चर्चा थी कि संजय गांधी चाहते थे कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद साफ-साफ दिखे और उसके बीच कोई बाधा न हो। जगमोहन ने संजय गांधी की इस ख्वाहिश को पूरा किया था। तुर्कमान गेट पर जब इमारतों को ढहाने का काम रोका नहीं गया तो कुछ लोग जगमोहन के पास पहुंचे थे। इलाके के लोगों ने अपने पुनर्वास की बात की और जगमोहन से अनुरोध किया कि उन सबको एक ही जगह रहने की व्यवस्था की जाए। तब जगमोहन ने उनसे दो टूक कहा था कि वो यहां एक दूसरा पाकिस्तान नहीं बसाना चाहते हैं। उमा वासुदेव की उन्नीस सौ सतहत्तर में प्रकाशित पुस्तक ‘टू फेसेस ऑफ इंदिरा गांधी’ में इस प्रसंग का उल्लेख है। 

आज हम दिल्ली के ज्यादातर इलाकों को झुग्गियों से मुक्त देखते हैं तो इसके लिए जगमोहन की दूरदर्शी नीति और उनके कठोर निर्णय के अलावा अपने फैसलों के क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति जिम्मेदार है। उन्नीस सौ बयासी में दिल्ली में  एशियाई खेल का आयोजन हो या फिर उसके अगले साल निर्गुट देशों के राष्ट्राध्यक्षों का सम्मेलन, जगमोहन ने अपनी प्रशासनिक क्षमता की छाप छोड़ी। जगमोहन जब राजनीति में उतरे तो नई दिल्ली लोकसभा सीट से सुपरस्टार राजेश खन्ना को मात दी। इस सीट से तीन बार सांसद रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में शहरी विकास मंत्री रहे। उनके निधन ने दिल्ली के बौद्धिक और प्रशासनिक जगत को थोड़ा विपन्न कर दिया है।   


Saturday, May 1, 2021

सृजनशीलता का स्वर्णिम शिखर


सत्यजित राय, भारतीय फिल्म जगत का एक ऐसा नाम, जिसपर हर भारतीय को गर्व है। सिनेमा के वैश्विक पटल पर सत्यजित राय ने अपनी फिल्मों के माध्यम से रचनात्मकता का परचम लहराया। उनकी बनाई हर फिल्म कला का नायाब नमूना है। एंड्रयू रॉबिंसन की पुस्तक ‘सत्यजित राय, द इनर आई’ में सत्यजित राय की फिल्मकला पर कई बेहतरीन टिप्पणियां हैं। इनमें से एक टिप्पणी तो प्रख्यात लेखक वी एस नायपॉल की भी है जो इनकी फिल्मों की या इन फिल्मों के दृश्यों की तुलना शेक्सपियर के लेखन से करते हैं जहां कम शब्दों में ऐसी बात कह दी जाती है जिसकी व्याप्ति बहुत अधिक होती है। उनकी फिल्मों का कलात्मक मूल्यांकन करते समय बहुधा समीक्षकों से कोई न कोई सिरा छूट ही जाता है। साहित्य को सिनेमा में रूपांतरित करने की कला में सत्यजित राय पारंगत थे। ‘पथेर पांचाली’ से लेकर ‘आगंतुक’ या ‘गणशत्रु’ या फिर ‘शतरंज के खिलाड़ी’ तक उन्होंने मशहूर साहित्यकारों की कृतियों को उठाया और उसको फिल्मी पर्दे पर इस तरह से उकेरा कि वो क्लासिक बन गई। सत्यजित राय ने विभूति भूषण, रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमेन्द्र मित्र और प्रेमचंद की कृतियों पर फिल्में बनाईं और कह सकते हैं कि ये सभी फिल्में और सौंदर्य और कहन में मूल कहानी या रचना से कमतर नहीं है बल्कि कई बार तो इस सत्यजित राय का ट्रीटमेंट उसको और बेहतर बना देता है। सत्यजित राय एक ऐसे निर्देशक थे जिनका फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र पर दखल रहता था। 

राय के मित्र चिदानंद दासगुप्त ने उन्नीस सौ सत्तावन में अमृत बाजार पत्रिका में एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘पटकथा फिल्म निर्माण का आरंभ है और संपादन उसका अंत होता है। निर्देशक इन दोनों स्तंभों पर निर्भर रहता है, कम से कम सत्यजित राय के मामले में तो ऐसा ही है। दोनों पर संपूर्ण नियंत्रण के माध्यम से सत्यजित अपने कृतित्व को अपनी सोची हुई तस्वीर की समग्र अभिव्यक्ति में रूपायित करते हैं।‘ दरअसल उनके ऐसा कहने के पीछे की सोच ये थी कि सत्यजित राय का शिल्प इस सिद्धांत पर आधारित होता था कि फिल्मकार को छायांकन की श्रेष्ठ समझ हो, वो संगीत में निपुण हो, विषय़ को उसके मूल स्वरूप में चित्रित करने की सलाहियत हो और अपने अभिनेताओं से उच्च श्रेणी का अभिनय करवाने की क्षमता हो। सत्यजित राय में ये सभी गुण थे। फिल्म ‘चारुलता’ में सत्यजित राय ने कैमरा थाम लिया था और फिल्म ‘तीन कन्या’ में उन्होंने संगीत की जिम्मेदारी भी उठा ली थी। कालांतर में तो सत्यजित राय ने संगीत की अपनी एक शैली ही विकसित कर ली थी। लेकिन फिल्मों में पार्श्व संगीत के पक्ष में सत्यजित राय नहीं थे। उन्होंने एक बार कहा भी था कि अगर अपनी फिल्मों का मैं इकलौता दर्शक होता तो उसमें पार्श्व संगीत नहीं डालता। उनका मानना था कि संगीत बाहरी तत्व है और उसके बिना भी अभिव्यक्ति संभव है। पटकथा लेखन में वो ये जानते थे कि मूल कहानी में से क्या रखना है और क्या छोड़ देना है। उनकी तमाम फिल्मों की पटकथा का अगर विश्लेषण किया जाए तो यह बात साफ तौर पर उभर कर आती है कि उसमें न तो अतिभावुकता होती थी, न ही दर्शकों को चमत्कृत करने या उसको प्रभावित करने के लिए कोई विशेष युक्ति अपनाई जाती थी। उन्नीस सौ बयासी में एक समारोह में राय ने माना भी था कि पटकथा का उद्देश्य कहानी का सहज प्रवाह होना चाहिए। उन्होंने कहा था कि, श्रेष्ठ फिल्म संवाद वो होता है जिसे सुनकर दर्शक को लेखक के अस्तित्व का भान ही न हो। मैं ऐसी फिल्म की बात कर रहा हूं जो यथार्थ के एहसास को दृश्य में बांधती है। यथार्थ को जस का तस रख देना कभी भी कला नहीं हो सकती है।‘ सत्यजित राय कभी भी अपनी फिल्म में काम करनेवाले अभिनेताओं से रिहर्सल नहीं करवाते थे। उनका मानना था कि अधिक रिहर्सल से अभिनय की स्वाभाविकता पर असर पड़ता है। अभिनेताओं से बेहतर निकलवाने का उनका अपना एक अनोखा तरीका था, वो करते ये थे कि सेट पर कहानी के अनुरूप ऐसा वातावरण तैयार कर देते थे कि अभिनेता या अभिनेत्री उसके प्रभाव में आकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करते थे, देते भी थे। वो हमेशा शूटिंग से पहले अपने अभिनेताओं को कहानी और सीन समझाते थे और अपनी अपेक्षा भी बताते थे। इस बात के लिए भी प्रेरित करते थे कि वो अपना स्वाभाविक अभिनय करें।  

भारतीय फिल्म के इस कुशल चितेरे के जन्म शताब्दी वर्ष का आरंभ आज से हो रहा है। भारत सरकार ने भी फिल्म से जुड़े इस कलाकार के जन्म शताब्दी वर्ष को भव्यता से मनाने का फैसला किया है। संस्कृति मंत्रालय और विदेश मंत्रालय भी शताब्दी वर्ष के दौरान सत्यजित राय से जुड़े आयोजन करेंगे। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने घोषणा की है कि इस वर्ष से सत्यजित राय के नाम से एक लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया जाएगा। इस पुरस्कार में दस लाख रुपए की राशि देने की घोषणा भी की गई है। ये पुरस्कार गोवा में आयोजित होने वाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया के दौरान दिए जाएंगे। पूरे वर्ष तक सत्यजित राय की फिल्मों का प्रदर्शन आदि भी होगा। सत्यजित राय की फिल्म कला की बारीकियों पर जमकर चर्चा होनी चाहिए, उसके विविध रूपों पर फिल्म के जानकारों के बीच विमर्श होने से नए लोगों की फिल्मों को लेकर दृष्टि और संपन्न होगी।