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Sunday, February 14, 2016

बार-बार बेनकाब वामपंथी

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंकवादी अफजल गुरू को लेकर किए गए एक सेमिनार ने मार्क्सवादियों के मंसूबों को एक बार फिर से उघाड़ कर रख दिया है । वामपंथियों का गढ़ माने जानेवाले जवाहरलाल युनिवर्सिटी में आतंकवादी अफजल गुरू को फांसी पर लटकाए जाने को विषय बनाकर एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए गए। इसके अलावा वहां आजाद कश्मीर के पक्ष में भी जमकर नारेबाजी हुई । खबर आने के तीन दिन बाद दिल्ली पुलिस नींद से जागी और धरपकड़ शुरु हुई । युनिवर्सिटी के छात्र संघ के अध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया । इसके अलावा दिल्ली के प्रेस क्लब में भी इसी तरह की एक गोष्ठी हुई जिसमें भारत विरोधी नारे लगे । यहां भी केंद्र में अफजल गुरू ही था । उसके अलावा कश्मीर में भी अफजल गुरू के नाम पर कार्यक्रम आदि हुए जहां आजाद कश्मीर की बात की गई और भारत विरोधी नारे लगे । कश्मीर में तो पहले भी भाड़े के आतंकवादियों ने इस तरह की हरकतें की हैं लेकिन चिंता की बात है कि इस तरह के वाकयात कश्मीर से निकलकर दिल्ली तक पहुंच गए हैं । क्या इन आयोजनों को कोई एक सूत्र संचालित कर रहा है । क्या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश है । क्या इस तरह के आयोजनों की आड़ में भारत के खिलाफ लोगों को भड़काने की गहरी साजिश रची जा रही है । जांच एजेंसियों को इस बात की भी पड़ताल करनी चाहिए । यह पड़ताल इसलिए भी आवश्यक है कि जेएनयू में जिस तरह से अफजल गुरू और कश्मीर की आजादी के समर्थनमें नारे लगे उसके पाकिस्तान में बैठा आतंकी सरगना हाफिज सईद के नाम से एक ट्वीट भी सामने आया जिसमें इसका समर्थन किया गया । इस बात का पता लगना भी आवश्यक है कि इन कार्यक्रमों की फंडिंग कहां से हो रही है । इस तरह के आयोजनों से जुड़े तमाम लोगों के अतीत को भी खंगालने की आवश्यकता है । इनमें से कई लोग तो वो भी भी हैं जिन्होंने भारत के असहिष्णु होने की आवाज उठाई थी । प्रेस क्लब के सेमिनार हॉल की बुकिंग करवाने वाले अली जावेद तो साहित्य अकादमी के बाहर जुलूस में भी दिखे थे । इन सारे सूत्रों को मिलाकर जांच की जानी चाहिए कि क्या भारत या भारत सरकार को बदनाम करने के लिए कोई संगठन या ग्रुप सक्रिय तो नहीं है । क्या कोई सरगना कहीं दूर बैठकर इन सारे कार्यक्रमों को हवा तो नहीं दे रहा है । पड़ताल इस बात की भी होनी चाहिए कि जब से गैर सरकारी संगठनों की फंडिंग पर भारत सरकार ने सख्ती दिखाई है तब से ही इस तरह के वाकयात क्यों सामने आ रहे हैं । यह पूरा मसला हिंदू या मुसलमान का नहीं है बल्कि ये मामला राष्ट्रवादी और देशद्रोहियों के बीच का है ।
जेएनयू में आतंकवादी अफजल गुरू के के ज्यूडिशियल किलिंग के नाम पर जिस तरह से भारत के खिलाफ जंग की बातें की गई उसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कवच नहीं पहनाया जा सकता है । हमारा संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी जरूर देता है लेकिन वही संविधान इस अधिकार की सीमा भी तय करता है । किसी को भी, मतलब किसी को भी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के खिलाफ बगावत के लिए उकसाने या उसके लिए माहौल बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है । उन लोगों की मंशा पर भी सवाल खड़े किए जाने चाहिए जो इसको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखने की कोशिश कर रहे हैं । देशद्रोहियों को देशद्रोही कहना ही होगा । भारत की बर्बादीके नारों के समर्थन में किसी तरह की बात करनेवालों को भी देशद्रोहियों की श्रेणी में रखना ही होगा । वो लाख चीखें लेकिन उनके नापाक मंसूबों को बेनकाब करने का वक्त आ गया है । इसको जेएनयू की अस्मिता और गौरवशाली अतीत से जोड़कर देखनेवाले भी सामने आने शुरु हो गए हैं । छात्र संघ के अध्यक्ष की गिरफ्तारी और युनिवर्सिटी कैंपस में पुलिस के प्रवेश को लेकर भी बयानबाजी शुरू हो गई है । ऐसा करनेवाले ललबबुआओं को ये समझना होगा कि देश से बड़ा कोई संस्थान नहीं होता और जहां देश की बर्बादी की बात की जाए वहां पुलिस के जाने से रोकना भी देशद्रोह है । यह अच्छी बात है कि वामपंथियों ने इस बार जेएनयू में जो हुआ उसकी निंदा की परंतु उन्होंने उस निंदा के साथ लेकिन शब्द जोड़कर अपनी राजनीति को बढ़ाने की भी कोशिश की । वो जेएनयू के बारे में या उसके अतीत के बारे में इस तरह की बातें कर रहे हैं जैसे कि वो उनकी मिल्कियत रही हो और अपनी मिल्कियत पर शासन के दौरान जो अच्छे काम किए गए उसका इश्तेहार चस्पां कर रहे हों । अतीत में की गई कथित अच्छाई की आड़ में मिल्कियत पर आए खतरे के लिए बुक्का फाड़कर रो रहे हों । बजाए इस बात के उनको देशद्रोहियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जांच की मांग करनी चाहिए थी ।
वामपंथियों की आस्था दरअसल कभी राष्ट्र में कभी रही ही नहीं । एक छोटा सा उदाहरण हमारे देश में सक्रिय राजनीतिक पार्टियों के नाम देखें । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय लोकदल आदि लेकिन जरा वामपंथी पार्टियों के नाम पर नजर डालें भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी ) । ये क्यों । क्योंकि इनको भारत से या किसी भी राष्ट्र से कुछ लेना देना नहीं है । ये खुद को भारत में काम करनेवाली कम्युनिस्ट पार्टी मानती हैं । राष्ट्रवाद इनके सिद्धातों में है ही नहीं । उन्नीस सौ बासठ में जब भारत और चीन में युद्ध हुआ था तब भी वामपंथियों ने ये प्रचारित किया था कि बुर्जुआ नेहरू ही हमलावर थे । 1962 का प्रसंग आते ही अब भी वामपंथी खामोश हो जाते हैं । चीन को दोष देना उनके बूते से बाहर है । सिद्धांत से तो है  ही । कम्युनिस्टों को आपसी बहस आदि में राष्ट्रवादी शब्द अपमानजनक लगता रहा है, वो लोग राष्ट्रवाद को दोष मानते हैं या कालांतर में उन्होंने राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता से जोड़ दिया । उनके आका मार्क्स भी मानते थे कि मजदूरों का कोई देश नहीं होता और जब देश ही नहीं होता तो देश भक्ति या राष्ट्रभक्ति उनके लिए छद्म या छलावा है । यहां यह बताना जरूरी है कि लेनिन ने भी उन्नीस सौ उन्नीस में कोमिंटर्न यानि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल बनाया था क्योंकि तब उनका मानना था कि यूरोप के कम्युनिस्ट अपने पथ से भटक गए हैं । जेएनयू के मामले में भी कम्युनिस्टों का रवैया कुछ उसी तरह का रहा है । कम्युनिस्ट हमेशा से भारत को देश नहीं बल्कि कई राष्ट्रीयताओं का झुंड मानते रहे हैं । यहां तक कि पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री रहे अशोक मित्रा ने भी कश्मीर की आजादी को लेकर एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखा था । हम अगर इस बात पर गहराई से विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि राष्ट्रवाद में निष्ठा नहीं होने की वजह से ही कम्युनिस्टों का पूरी दुनिया में ये हश्र हुआ है और वो हाशिए पर चले गए। अब भी वो मार्क्सवाद के रोमांटिसिज्म में जी रहे हैं और दुनिया के एक होने का सपना देख रहे हैं । लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए वो ये मानते हैं कि पॉवर ग्रोज़ आउट ऑफ द बैरल ऑफ अ गन । तो यह बात साफ है कि कम्युनिस्ट पूरी दुनिया में सत्ता हासिल करने के लिए तमाम तरह के षडयंत्र आदि में लिप्त रहे हैं और अब भी कोशिश करते रहे हैं ।
राष्ट्रवाद भारत की आजादी की लड़ाई लड़नेवाली कांग्रेस पार्टी के खाते में था लेकिन वामपंथियों के प्रभाव में धीरे-धीरे उन्होंने राष्ट्रवाद को प्लेट में सजाकर भारतीय जनता पार्टी को सौंप दिया । कांग्रेस हमेशा से लेफ्ट टू सेंटर की विचारधारा की पोषक रही है । जिस पार्टी ने आजादी की लड़ाई में देश की अगुवाई की आज उसके हाथ से राष्ट्रवाद का मुद्दा निकल गया है । कांग्रेस पार्टी को इस बात पर आत्ममंथन करना होगा कि ऐसा क्योंकर हुआ । भारत में आतंकवादियों के पक्ष में एकजुट होनेवाले लोग भारत की बर्बादी का दिवास्वप्न भले ही देख रहे हों लेकिन उनको ये समझना होगा कि हमारा महान देश किसी विचारधाऱा का या किसी वाद या संपद्राय का मोहताज नहीं है इसके सहिष्णु नागरिक ही इसकी ताकत हैं । भारत की बर्बादी का सपना देखनेवालों का हश्र पूरी दुनिया ने देखा है । जो पाकिस्तान दिन रात भारत का सपना देखता है वहां की हालत देख लीजिए । भारत से अलग होने के बाद वो एक बार फिर से टूटा, आतंक को पनाह देकर भारत को बर्बाद करने का सपना देखनेवाला पाकिस्तान आज खुद बर्बादी के ज्वालामुखी पर खड़ा है । हमारे देश की बहुलता को बदनाम करनेवाले लोग इतिहास के साथ दफन होते चले गए और भारत आज भी सीना ताने खड़ा है । हां इतना अवश्य करना चाहिए कि भारत की सरजमीं पर कोई अगर इसको बर्बाद करने का सपना देखे तो उसको उसकी सही जगह पर पहुंचा देना चाहिए ।  


3 comments:

Sachin Sharma said...

Jnu की घटना और उसके बाद के घटनाक्रम पर शानदार लेख.

keshav jha said...

उम्दा लेख और तथ्य परक आलेख।
बधाई

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विरोध के लिए विरोध की राजनीति - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...