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Sunday, April 14, 2019

साहित्य के तिलिस्म में जासूसी लेखन


साहित्य में वो दौर महफिलों का था, कॉफी हाउस से लेकर कई साहित्यिक ठीहों पर साहित्यकारों का जमावड़ा हुआ करता था। जहां साहित्य की विभिन्न विधाओं और प्रवृत्तियों पर बहसें हुआ करती थीं, एक दूसरे की रचनाओं पर बातें होती थीं,रचनाओं की स्वस्थ आलोचना होती थी। इन साहित्यिक जमावड़ों और महफिलों का साहित्य सृजन में बड़ी भूमिका रही है। कई साहित्यकारों ने अपने संस्मरणों में इन साहित्यिक ठीहों पर होनेवाले दिलचस्प किस्सों को लिखा है। ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प वाकया है एक साहित्यिक महफिल का जिसमें राही मासूम रजा, इब्ने सफी, इब्ने सईद और प्रकाशक अब्बास हुसैनी के अलावा कई और साहित्यकार बैठे थे। चर्चा देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता की शुरू हो गई। अचानक राही मासूम रजा ने एक ऐसी बात कह दी कि वहां थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया। राही मासूम रजा ने कहा कि बगैर सेक्स प्रसंगों के तड़का के जासूसी उपन्यास लोकप्रिय नहीं हो सकता है। इब्ने सफी, रजा की इस बात से सहमत नहीं हो पा रहे थे। दोनों के बीच बहस बढ़ती जा रही थी। सफी लगातार राही मासूम रजा का प्रतिवाद कर रहे थे। अचानक राही मासूम रजा ने अपने खास अंदाज में इब्ने सफी को चुनौती देते हुए कहा कि वो बगैर सेक्स प्रसंग के जासूसी उपन्यास लिखकर देख लें कि उसका क्या हश्र होता है। सफी ने रजा की इस चुनौती को स्वीकार किया और बगैर किसी सेक्स प्रसंग के एक जासूसी उपन्यास लिखा। जिसे प्रकाशक अब्बास हुसैनी ने अपने प्रकाशन निकहत पॉकेट बुक से प्रकाशित किया। वो उपन्यास जबरदस्त हिट हुआ और उसने जासूसी उपन्यासों की दुनिया में तहलका मचा दिया। इस सफलता के बाद इब्ने सफी जासूसी उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए थे। यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि इब्ने सफी बंटवारे के वक्त पाकिस्तान नहीं गए बल्कि पांच साल बाद 1952 में पाकिस्तान गए। वहां जाने के बाद भी उनके उपन्यास प्रकाशित होने के लिए अब्बास हुसैनी के पास आते थे जो उर्दू और देवनागरी लिपि में छपा करते थे। बाद में अनुदित होकर अन्य भाषा के पाठकों तक पहुंचते थे। इब्ने सफी इतने लोकप्रिय थे और उनकी कीर्ति इतनी थी कि अगाथा क्रिस्टी जैसी मशहूर लेखिका ने भी ये माना था कि वो बेहद मैलिक लेखन करते हैं। इब्ने सफी का इमरान सीरीज काफी लोकप्रिय हुआ था। माना जाता है कि इब्ने सफी ने ही जासूस जोड़ी की शैली में लिखना शुरू किया जिसे बाद के कई लेखकों ने अपनाया। इब्ने सफी के उपन्यास प्रकाशित करने के पहले अब्बास हुसैनी दो पत्रिकाएं निकालते थे जासूसी दुनिया और रूमानी दुनियाजासूसी दुनिया में सफी साहब और रूमानी दुनिया में राही मासूम रजा लिखा करते थे। कहा तो ये भी जाता है कि जब जरूरत होती थी तो राही मासूम रजा भी नाम बदलकर जासूसी कहानियां लिखा करते थे। इब्ने सफी की सफलता के दौर में ही इलाहाबाद से जासूसी पंजा नाम की पत्रिका में अकरम इलाहाबादी भी एक जासूसी कथा श्रृंखला लिखा करते थे। ये सीरीज बेहद लोकप्रिय थी। जासूसी पंजा में प्रकाशित होनेवाली जासूसी कथा की लोकप्रियता को देखकर ही हिंद पॉकेट बुक्स ने एक रुपए मूल्य के पुस्तकों की सीरीज छापनी शुरू की थी। प्रकाशन जगत में यह प्रयोग काफी सफल रहा था।  
इसके पहले हिंदी उस दौर को देख चुकी थी जब देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता के तिलिस्मी कथा के सम्मोहन में पाठक उलझे थे। उनकी लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि उसको पढ़ने के लिए लोग हिंदी सीखते थे। चंद्रकांता की लोकप्रियता और पाठकों में तिलिस्मी-ऐयारी कथा की भूख को देखते हुए देवकीनंदन खत्री के दो पुत्रों ने विपुल मात्रा में जासूसी लेखन किया। उनके एक लड़के दुर्गाप्रसाद खत्री ने स्थानीय पात्रों और घटनाओं को केंद्र में रखते हुए जासूसी उपन्यास लिखे तो उनके दूसरे बेटे परमानंद खत्री ने कई विदेशी जासूसी उपन्यासों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया। उनके अलावा भी उस दौर में अन्य लेखकों ने विदेशी जासूसी उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद किया। उर्दू लेखक जफर उमर का एक जासूसी उपन्यास प्रकाशित हुआ जिसके बारे में कहा जाता है कि वो एक विदेशी उपन्यास का अनुवाद था। यह उपन्यास भी बेहद लोकप्रिय हुआ। उसी समय तीरथराम फिरोजपुरी ने भी कई जासूसी उपन्यासों का अनुवाद उर्दू में किया जो बाद में हिंदी में भी छपा। हिंदी में जासूसी उपन्यासों की चर्चा गोपाल राम गहमरी के बगैर अधूरी है। गोपाल राम गहमरी पत्रकार थे और कई पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े थे। उन्होंने 1900 में जासूस नाम की पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। जब इस पत्रिका का विज्ञापन उनके संपादन में निकलनेवाले समाचारपत्र भारत मित्र में प्रकाशित हुआ तो लोगों में नई पत्रिका के कंटेंट को लेकर उत्सकुकता का भाव पैदा हुआ। जासूस पत्रिका का विज्ञापन इतना रोचक और दिलचस्प तरीके से लिखा गया था कि उसके एडवांस बुकिंग से गहमरी साहब को करीब पौने दो सौ रुपए मिले थे। सैकड़ों की संख्या में वार्षिक ग्राहक बने थे। आज मार्केटिंग के नाम पर प्री-बुकिंग का चाहे जितना शोर मचे और उसको नई प्रवृत्ति बताई जाए लेकिन ये काम गहमरी ने आज से एक सौ उन्नीस साल पहले सफलतापूर्वक कर दिखाया था। अपनी पत्रिका जासूस को लेकर गहमरी बेहद संवेदनशील थे। हर अंक में एक नए जासूसी उपन्यास के प्रकाशन की चुनौती अपने उपर ले रखी थी, नतीजा यह होता था कि या तो वो किसी दूसरी भाषा के जासूसी उपन्यास का अनुवाद करते थे या फिर मौलिक उपन्यास लिखते थे। अनुमान और उपलब्ध तथ्यों और संस्मरणों के मुताबिक गोपाल राम गहमरी ने साठ से अधिक मौलिक जासूसी उपन्यास लिखे और करीब डेढ़ सौ अन्य भाषा के उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद किया था। गोपाल राम गहमरी ने ही हिंदी को देवकीनंदन खत्री की ऐयारी की जगह जासूसी शब्द दिया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेखन में गहमरी का उल्लेख किया है, उनके काम को रेखांकित भी किया है लेकिन जितनी महत्ता इस विधा को मिलनी चाहिए थी उतनी हिंदी के आलोचकों ने इसको दी नहीं। आलोचकों की उदासीनता की वजह से ही इस विधा का उतनी मजबूती से विकास नहीं हो सका जिसकी ये हकदार थी। उपेक्षा से किसी विधा के लगभग खत्म होने का यह नमूना है।  
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब देश में हिंदी साहित्य को मजबूती मिलने लगी तो जासूसी की इस विधा के योगदान को भी लगभग नकार दिया गया। इस बात को भी शिद्दत से रेखांकित नहीं किया गया कि हिंदी के प्रसार में जासूसी उपन्यासों और पत्रिकाओं की अहम भूमिका थी। हिंदी के आलोचक जब मार्क्सवाद के प्रभाव में आए और उस विचारधारा ने मजबूती से आकार ग्रहण करना शुरू किया तो हिंदी साहित्य में अजीब तरह की वर्णवादी व्यवस्था ने भी जन्म लिया। इस साहित्यिक वर्णवादी व्यवस्था में कविता को शीर्ष पर रखकर साहित्य का आकलन शुरू हुआ। कहना ना होगा कि इस वजह से कई विधाएं अस्पृश्य होती चली गईं। हिंदी में सिनेमा पर लंबे समय तक गंभीर लेखन नहीं हो पाया क्योंकि उसको लोकप्रिय विधा कहकर गंभीरता से लिया ही नहीं गया। लोक और जन की बात करनेवालों ने लोकप्रिय विधा के मूल्यांकन की जरूरत ही नहीं समझी। इसी तरह से जासूसी उपन्यासों को हाशिए पर डाल दिया गया और उनको दशकों तक लुगदी साहित्य कहकर मजाक उडाया जाता रहा। कर्नल रंजीत, ओम प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, मनोज आदि के जासूसी उपन्यासों ने भी खूब धूम मचाई लेकिन वो तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य़ में प्रवेश नहीं पा सके। जेम्स हेडली चेज के हिंदी में अनुदित उपन्यासों की खूब मांग होती थी, इसके लोकप्रिय होने की वजह इसमें सेक्स प्रसंगों का होना भी माना जा सकता है। जब वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास वर्दी वाला गुंडा प्रकाशित होनेवाला था तो कई शहरों में उस उपन्यास के होर्डिंग लगे थे। ये उपन्यास खूब बिक रहे थे, पाठक इनको हाथों हाथ ले रहे थे लकिन हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक इसको अपनाने और मानने को तैयार नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि हिंदी में जासूसी उपन्यास लिखनेवाले कम होते चले गए। दो सौ उपन्यास लिखनेवाले सुरेन्द्र मोहन पाठक को पिछले पांच सात सालों में तथाकथिक मुख्यधारा के साहित्य में स्वीकृति मिलनी शुरू हुई है।
दूसरी एक और वजह ये रही कि शीतयुद्ध खत्म होने के बाद जासूसों से जुड़ी खबरें कम आने लगीं थीं। एक दौर था जब रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी और अमेरिका की एजेंसी सीआईए से जुड़ी खबरें लगातार आती थीं, जिससे जासूसों के क्रियाकलापों को लेकर एक उत्सकुकता का माहौल बनता था। इस माहौल की वजह से भी जासूसी उपन्यासों की मांग बढ़ती थी। इस माहौल का ही असर था कि पॉकेट बुक्स के अलावा बाल पाकेट बुक्स भी छपने लगे थे। बाल पॉकेट बुक छात्रों को ध्यान में रखकर छपते थे। 1980 के दशक में राजन-इकबाल के जासूसी सीरीज के उपन्यासों की धूम रहती थी। हमें याद है कि अपने स्कूली दिनों में जमालपुर रेलवे स्टेशन पर व्हीलर की दुकान पर जाकर राजन-इकबाल सीरीज के उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग करवाया करते थे। अगर अग्रिम बुकिंग नहीं करवा पाते थे तो इस बात की कोई गारंटी नहीं होती थी कि आपको उपन्यास मिल ही जाएगा। कहा ये भी जाता है कि टीवी और इंटरनेट के फैलाव ने भी जासूसी उपन्यासों की लोकप्रियता को कम किया, लेकिन ये वजह उपयुक्त नहीं प्रतीत होती है। अगर ऐसा होता तो अंग्रेजी में जासूसी उपन्यासों की इतनी जबरदस्त मांग कैसे रहती। वहां तो हमसे पहले से टीवी भी है और इंटरनेट भी। इस नतीजे पर पहुंचने के लिए शोध की आवश्यकता है।

4 comments:

विकास नैनवाल 'अंजान' said...

कथानकों की घटती क्वालिटी भी इस विधा के कम होने के पीछे एक कारण है। फिर पहले विदेशी उपन्यासों का भारतीयकरण लोग मौलिक उपन्यास के रूप में छाप देते थे और वो चल जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। पाठको की पहुँच अब इन विदेशी उपन्यासों तक है। वो सीधा उसे पढ़ लेते हैं। ऐसे में जब उन्हें उठाया हुआ कंटेंट मिलता है तो यही सोचते हैं कि हिंदी में कोई मौलिक नहीं लिख रहा है। यही कारण है कि विदेशी उपन्यास लेखन फल फूल रहा है। उधर मौलिक और उत्कृष्ट क्वालिटी का काम हो रहा है। इधर अगर होगा तो इधर भी लोग पढ़ेंगे।

अरुण खामख्वाह said...

जानकारी पूर्ण...रुचिकर लेख

sanjay patel said...

बहुत शोधपरक लेख है अनन्त भाई

प्रदीप जिलवाने said...

जासूसी दुनिया की पड़ताल करता यह लेख रोचक है।